मंगलवार, 21 जून 2011

भारत और सहिष्णुता-7

अंक-7

भारत और सहिष्णुता

clip_image002रक्षा मंत्रालय में कार्यरत जितेन्द्र त्रिवेदी  रंगमंच से भी जुड़े हैं, और कई प्रतिष्ठित, ख्यातिप्राप्त नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन कर चुके हैं। खुद भी नाटक लिखा है। न सिर्फ़ साहित्य की गहरी पैठ है बल्कि समसामयिक घटनाओं पर उनके विचार काफ़ी सारगर्भित होते हैं। वो एक पुस्तक लिख रहे हैं भारतीय संस्कृति और सहिष्णुता पर। हमारे अनुरोध पर वे इस ब्लॉग को आपने आलेख देने को राज़ी हुए। उन्हों लेखों की श्रृंखला हम हर मंगलवार को पेश कर रहे हैं।

    जितेन्द्र त्रिवेदी

पकुध कच्चायन अन्योन्यवादी थे। वे कहा करते थे, ''सात पदार्थ किसी के किये, करवाये, बनाये या बनवाये हुये नहीं हैं, वे तो वन्ध्य, कूटस्थ और नगर-द्वार के स्तम्भ की तरह अचल हैं। वे न हिलते हैं, न बदलते हैं, एक-दूसरे को वे नहीं सताते, एक-दूसरे का सुख-दुःख उत्पन्न करने में वे असमर्थ हैं। वे कौन -से हैं। वे हैं पृथ्वी, अप, तेज, वायु, सुख, दुःख एवं जीव। इन्हें मारने वाला, मरवाने वाला, सुनने वाला, सुनाने वाला, जानने वाला अथवा इनका वर्णन करने वाला कोई भी नहीं है। जो कोई तीक्ष्ण शस्त्र से किसी का सिर काट डालता है, वह उसका प्राण नहीं लेता। बस इतना ही समझना चाहिए कि सात पदार्थो के बीच के अवकाश में शस्त्र के अवकाश में शस्त्र घुस गया है।''

संजय वेलिटट्ठपुत्त विक्षेपवादी थे। वे कहा करते थे, ''यदि कोई मुझसे पूछे कि क्या परलोक है? और अगर मुझे ऐसा लगे कि परलोक है, तो मैं कहूँगा, हाँ! परन्तु मुझे वैसा नहीं लगता। मुझे ऐसा भी नहीं लगता कि परलोक नहीं है। औपपातिक प्राणी हैं या नहीं, अच्छे-बुरे कर्म का फल होता है या नहीं, तथागत मृत्यु के बाद रहता है या नहीं, इनमें से किसी भी बात के विषय में मेरी कोई निश्चित धारणा नहीं है"।

निगण्ठ नाथपुत्त चातुर्यामसंवरवादी थे। इन चारों यामों की जानकारी 'सामण्ञसुत्त' में मिलती है वह अपूर्ण है। फिर भी उनका मानना था कि सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपिरग्रह ये चार यम हैं और इनका पालन करने से व्यक्ति पापाचार से मुक्त हो जाता है।

चार्वाक पूर्णतया नास्तिक थे और उनका दर्शन इस श्‍लोक से भलीभांति स्पष्ट हो जाता हैः

''यावत्‌ जीवेद्, सुखम्‌ जीवेद् ऋणम्‌ कृत्वा घृतम्‌ पीवेत,

भस्मि भूतस्य पुनरागमनः कुतः''

अर्थात्‌ जब तक जियो मौज से जियो और ऋण ले कर भी मजा करो क्योंकि मरने के बाद किसी का ऋण चुकाने धरती पर पुनः नहीं आना होता।

आलार कालाम कहते थे कि व्यक्ति को मनोनिग्रह के मार्ग से ही शान्ति मिल सकती है और वे इसी से समाधि लगना बताते थे। उनका पूरा ध्यान इस बात पर था कि मनोनिग्रह करके व्यक्ति का चरम लक्ष्य समाधि में स्थिर होना है और किसी अन्य के प्रति उसका कोई दायित्व नहीं है।

महावीर जैन से पहले पार्श्‍वमुनि ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह चार यमों का उपद्देश्‍य दे दिया था। महावीर स्वामी ने उसमें ब्रह्मचर्य को भी जोड़ दिया था। उनका यह निचोड़ था कि उपरोक्त यमों तथा तपश्‍चर्या से पुर्नजन्म में किये हुये पापों का नाश किया जा सकता है और वर्तमान में पाप होने से बचा जा सकता है और इस प्रक्रिया के सम्पूर्ण होते ही व्यक्ति को कैवल्य प्राप्त हो जाता है जो जैन दर्शन का अन्तिम लक्ष्य है।

बुद्ध वैसे तो आलार कलाम के मनोनिग्रह मार्ग से ही सिद्धि कर रहे थे किन्तु उन्हे बाद में ऐसा लगने लगा कि यह मार्ग सारी मनुष्य जाति के लिए उपयोगी नहीं है क्योंकि मनोनिग्रह के बाद की अवस्था समाधि थी जिसे प्राप्त करने पर व्यक्ति आत्म सीमित हो जाता है और अन्य के प्रति उसका कोई दायित्व नहीं बचता। इसलिये महात्मा बुद्ध ने प्राणपण से प्रयत्न करके एक अभिनव मार्ग खोजा जो सभी मनुष्यों के लिये उपयोगी था और वह यह था कि जीवन में विपुल दुःख है (सब्बम्‌ दुख्खम्‌)। व्यक्ति का यह दुःख उसकी तृष्णा के कारण है। महात्मा बुद्ध ने मानव जाति के इतिहास में प्रथम बार यह दिखा दिया कि दुःख का असली कारण प्रकृति नहीं है बल्कि मनुष्य की तृष्णा है। बुद्ध का कहना था कि तृष्णा कहां से आयी, यह प्रश्‍न निरर्थक है, परन्तु यह शाश्‍वत सत्य है कि जबतक तृष्णा है जब तक दुःख उत्पन्न होता ही रहेगा अतः मनुष्य को यदि वास्तव में सुखी रहना है तो उसे तृष्णा का नाश करना ही पड़ेगा और तृष्णा के नाश का उपाय बौद्ध दर्शन में विस्तार से बताया गया है जिसे अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है। इस अष्टांगिक मार्ग का पहला सोपान है 'सम्यक दृष्टि' - काया, वाचा और मनसा, सभी को समान नज़र से देखना, दूसरा 'सम्यक संकल्प'- मन में निरन्तर यह भावना लाना की बुराई मूल रूप में मेरे स्वरूप का अंश नहीं है, मैं नित्य शुद्ध हूँ, नित्य मुक्त हूँ, नित्य बुद्ध हूँ । तीसरा 'सम्यक वाचा'- किसी भी स्थिति में किसी भी व्यक्ति को कड़वा नही बोलना। असत्य, चुगली, गाली, वृथा बकबक से बचना और प्रिय एवं मित भाषण करना। चौथा 'सम्यक कर्मान्त'- ऐसा कोई काम नही करना जिससे बाद में पछताना पड़े। बुद्ध ने ऐसे नहीं करने योग्य कामों की सूची दे दी है जो इस प्रकार हैः चोरी, व्यभिचार, प्राणघात, हिंसा, झूठ, कपट इत्यादि। पांचवा 'सम्यक आजीव'- अपनी आजिविका इस प्रकार चलाना जिससे समाज को हानि न पहुंचे। छठा 'सम्यक व्यायाम'- जो बुरे विचार मन में न आये हों उन्हे आने के लिये अवसर न देना और जो बुरे विचार मन में आते हों उन्हें यह भावना करके नष्ट करना कि यह मेरा अंग नहीं है इस मानसिक प्रयत्न को बढ़ाते जाना ही सम्यक व्यायाम है। सातवां 'सम्यक स्मृति'- यह बात बार-बार याद करना कि यह शरीर जरा धर्मी है, व्याधि धर्मी है, मरण धर्मी है। अतः इसका अधिक ध्यान रखना बेवकूफी है। यह शरीर ही नहीं सभी प्राणी मात्र जरा धर्मी है, व्याधि धर्मी है, मरण धर्मी है। अतः इनकी चिन्ता करना भी बेवकूफी है। इसलिये व्यक्ति को चाहिये कि वह निरन्तर यह विवेक जागृत रखे और स्व चित्त का बार-बार अवलोकन करे। आठवां 'सम्यक समाधि'- उपरोक्त सातों बातों को ख्याल करते हुये ध्यान में बैठे और अपने चित्त को एकाग्र करने का प्रयत्न करे किन्तु यह प्रयास कष्ट साध्य नहीं होना चाहिये। दो अन्तो तक न जाकर मध्यम मार्ग से ध्यान करने वाले व्यक्ति की समाधि लगना तय है। बुद्ध ने जिस 'समाधि' का उल्‍लेख किया है, वह दीन दुनियां से अलग-थलग रहकर वन में साधना करना नहीं है अपितु उनके यहां समाधि का मतलब अनंत सुख, अनंत शांति, अनंत विश्राम और इसे पा लेने के बाद व्‍यक्ति को चाहिये कि वह अन्य लोगो को भी बुद्ध बनने के लिये प्रोत्साहित करे।

बुद्ध का कहना था कि इसी मार्ग से पृथ्वी पर शांति आयेगी।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रेरणादाइ आलेख| धन्यवाद|

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  2. हमेशा की तरह सार्थक सुन्दर आलेख। शुभकामनायें।

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  3. विभिन्न दर्शनों का ऐतिहासिक विकास और उनमें विकीर्ण विभेदान्वेषण पर विचार-शृंखला प्रशंसनीय है।

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  4. शानदार और प्रेरणादायक आलेख! उम्दा प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  5. दार्शनिक परिचय के साथ उसका ऐतिहासिक विकास और तुलनात्मक चर्चा न केवल पठनीय है अपितु संग्रह करने योग्य भी. श्रम की सार्थकता नितांत रूप से अनुकरणीय. बधाई ..

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