गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

गांधी जी का त्याग

गांधी और गांधीवाद-155

1909

गांधी जी का त्याग

निरामिषभोजी होने की हैसियत से उन्हें दूध लेने का अधिकार है या नहीं, इस विषय पर गांधी जी ने खूब विचार किया। खूब पढ़ा भी। काफ़ी सोच-विचार कर उन्होंने दूध त्याग कर दिया। वे केवल सूखे और ताजे फलों पर रहने लगे। आग पर पकाई गई हर तरह की खुराक उन्होंने त्याग दी। केवल फल खाकर वे पांच साल तक रहे। इससे न उन्होंने कोई कमज़ोरी महसूस की और न उन्हें किसी प्रकार की कोई व्याधि ही हुई। शारीरिक काम करने की उनमें पूरी शक्ति वर्तमान थी। यहां तक कि वे एक दिन में पैदल 55 मील की यात्रा कर सकते थे। दिन में 40 मील की मंजिल तय कर लेना तो उनके लिए मामूली बात थी। गांधी जी का मानना है कि, “ऐसे कठिन प्रयोग आत्मशुद्धि के संग्राम के अंदर ही किए जा सकते हैं। आख़िर लड़ाई के लिए टॉल्स्टॉय फार्म आध्यात्मिक शुद्धि और तपश्चर्या का स्थान सिद्ध हुआ।”

दूध का त्याग

ब्रह्मचर्य की दृष्टि से गांधी जी के आहार में पहला परिवर्तन दूध के त्याग का हुआ। उन्हें रायचन्द भाई से मालूम हुआ था कि दूध इन्द्रिय-विकार पैदा करने वाली वस्तु है। अन्नाहार विषयक अंग्रेज़ी पुस्तक के पढ़ने से इस विचार में उनकी वृद्धि हुई। उन्हें लगने लगा कि शरीर के निर्वाह के लिए दूध आवश्यक नहीं है और इन्द्रिय-दमन के लिए दूध छोड़ देना चाहिए। उन्हीं दिनों कलकत्ते से कुछ साहित्य आया। जिसमें गाय-भैंस पर ग्वालों द्वारा किए जाने वाले क्रूर अत्याचारों की कथा थी। इस साहित्य में उन्होंने पढ़ा था कि भैंसों का दूध बढ़ाने के लिए उनके साथ निर्मम व्यवहार किया जाता है। इसका उन पर चमत्कारी प्रभाव हुआ। इसकी चर्चा उन्होंने कालेनबैक से की। कालेनबैक ने सलाह दी, “दूध के दोषों की चर्चा तो हम प्रायः करते ही हैं। तो फिर हम दूध छोड़ क्यों न दें? उसकी आवश्यकता तो है ही नहीं।गांधी जी ने इस सलाह का स्वागत किया और उन दोनों ने उसी क्षण टॉल्स्टॉय फार्म में दूध का त्याग किया।

गांधी जी ने ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था। समस्या यह थी कि जननेन्द्रीय पर नियंत्रण किस प्रकार से किया जाए। उहोंने पढ़ रखा था कि यौन-प्रक्रियाओं को व्यक्ति का आहार प्रभावित करता है। उनका मानना था कि विकार से भरा मन ही विकारयुक्त आहार की तलाश करता है। इसलिए ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा के लिए यह ज़रूरी है कि आहार की मर्यादा बनाए रखी जाए। दूध उन्हें सबसे ज़्यादा विकारी लगता था। गांधी जी के अंग्रेज़ मित्र कालेनबाख ने राय दी कि दूध का त्याग किया जाए। दूध छोड़ने में नुकसान नहीं है। फ़ायदे ही हैं। और टाल्सटाय फार्म पर 1912 में गांधी जी ने दूध के त्याग का व्रत ले लिया।

फलाहार का निश्चय

दूध छोड़ने के कुछ ही दिनों के बाद गांधी जी ने फलाहार के प्रयोग का भी निश्चय किया। फलाहार में भी जो सस्ते फल मिले, उनसे ही अपना निर्वाह करने का उनका और कालेनबाक का निश्चय था। अमीर, मोटे तौर पर समृद्ध व्यक्ति, कालेनबाख, मेहनत के हर काम और आहार संबंधी प्रयोगों में उनका साथ देते थे। ग़रीब से ग़रीब आदमी जैसा जीवन बिताता है, वैसा ही जीवन बिताने की उमंग उन दोनों की थी। फलाहार में चूल्हा जलाने की आवश्यकता तो होती ही नहीं थी। बिना सिकी मूंगफली, केले, खजूर, नीबू और जैतून का तेल यह उनका साधारण आहार बन गया।

हालांकि गांधी जी का मानना था कि ब्रह्मचर्य के साथ आहार और उपवास का निकट संबंध है और उसका मुख्य आधार मन पर है। फिर भी वे मानते थे कि मैला मन उपवास से शुद्ध नहीं होता। आहार का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता। मन का मैल तो विचार से, ईश्वर के ध्यान से और आखिर ईश्वरी प्रसाद से ही छूटता है। किन्तु मन का शरीर के साथ निकट संबंध है। विकारयुक्त मन विकारयुक्त आहार की खोज में रहता है। विकारी मन अनेक प्रकार के स्वादों और भोगों की तलाश में रहता है। बाद में उन आहारों और भोगों का प्रभाव मन पर पड़ता है। इसलिए उस हद तक आहार पर अंकुश रखने की और निराहार रहने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। विकारग्रस्त मन शरीर और इन्द्रियों को अंकुश में रखने के बदले शरीर के इन्द्रियों के अधीन होकर चलता है। इसलिए उपवास की आवश्यकता पड़ती है। जिसका मन संयम की ओर बढ़ रहा होता है, उसके लिए आहार की मर्यादा और उपवास बहुत मदद करने वाले हैं।

उपवास

जिन दिनों गांधी जी ने फलाहार का प्रयोग शुरू किया था, उन्हीं दिनों उन्होंने संयम हेतु उपवास भी शुरू कर दिया था। इसमें भी कालेनबैक उनका साथ देने लगे थे। किसी मित्र ने उनसे कहा था कि देह-दमन के लिए उपवास की आवश्यकता है। बचपन से ही उन्होंने व्रत आदि किया था। बाद में आरोग्य की दृष्टि से उपवास रखा करते थे। किन्तु अब अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को सहारा देने के लिए उपवास रखने का उन्होंने निश्चय किया था। फलहारी उपवास तो अब वे रोज़ ही रखने लग गए थे। इसलिए अब पानी पीकर उपवास रखने लगे थे। फार्म में बहुत से लोगों ने एकादशी व्रत का उपवास रखने लगे थे। बहुत से लोगों ने चतुर्मास किया।

फार्म पर हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई सब धर्मों के बच्चे थे। गांधी जी यह खास ध्यान देते कि हर बच्चा अपने धर्म का पालन करे। श्रावण का महीना था। यह रमज़ान का भी महीना था। इस महीने उन्होंने उपवास का व्रत रखना चाहा। इस प्रयोग का प्रारम्भ टॉल्स्टॉय आश्रम में हुआ। कालेनबैक के साथ उन दिनों वे सत्याग्रही क़ैदियों के परिवार के सदस्यों की वे देख-रेख किया करते थे। इनमें बालक और नौजवान भी थे। उनके लिए स्कूल चलता था। इन नौजवानों में चार-पांच मुसलमान भी थे। उनके लिए नमाज़ वगैरह की सारी सुविधाएं मौज़ूद थीं। गांधी जी ने मुसलमान नौजवानों को रोज़ा रखने के लिए प्रोत्साहित किया। उन लोगों को कठिन उपवास सहन हो और उन्हें अकेलापन महसूस न हो, इसलिए गांधी जी और कालेनबाक भी उन लोगों के समान दिन-भर का निर्जला व्रत रखते थे। गांधी जी के द्वारा प्रोत्साहित किए जाने के बाद न सिर्फ़ मुसलमानों ने बल्कि पारसियों और हिन्दुओं ने भी रोज़ा रखने में उनका साथ दिया। मुसलमान तो शाम तक सूरज डूबने की राह देखते थे, जबकि हिन्दू या पारसी उससे पहले खा लिया करते थे, जिससे वे मुसलमानों को परोस सकें और उनके लिए विशेष वस्तु तैयार कर सकें। इसके अलावे मुसलमान सहरी खाते थे। इस प्रयोग का परिणाम यह हुआ कि लोग उपवास और एकाशन का महत्व समझने लगे। इससे एक-दूसरे के प्रति उदारता और प्रेमभाव में वृद्धि हुई।

आश्रम में अन्नाहार का नियम था। रोज़े के दिनों में मुसलमानों को मांस का त्याग कठिन तो प्रतीत हुआ लेकिन उन्होंने गांधी जी को उसका पता भी नहीं चलने दिया। वे आनंद और रस-पूर्वक अन्नाहार करते थे। इस प्रकार आश्रम में संयम का वातावरण बना रहा। उपवास आदि से गांधी जी पर आरोग्य और विषय-नियमन की दृष्टि से बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। गांधी जी का मनना था कि इन्द्रिय-दमन हेतु किए गए उपवास से ही विषयों को संयत करने का परिणाम निकल सकता है। संयमी के मार्ग में उपवास आदि एक साधन के रूप में हैं, किन्तु ये ही सबकुछ नहीं हैं। यदि शरीर के उपवास के साथ मन का उपवास न हो, तो वह हानिकारक सिद्ध होता है।

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सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

हमेशा ख़ुश दिखाई देता पत्रिंगा

पत्रिंगा

मेरॉप्स ओरिएंटेलिस – Merops orientalis

(Merops : Gr – the bee-eater, orientalis : L, eastern)

स्मॉल ग्रीन बी-ईटर

स्थानीय नाम : इसे हिन्दी में हरियल और पत्रिंगा या हरियल कहते हैं। पंजाबी में यह छोटा पत्रंगा, बांग्ला में बांशपाती, मराठी में ताईलिंगी, वेदराघू, पतुर, पेतरी, गुजराती में नानो पत्रंगियो, कच्छ में छोटा हजामदा, असमिया में हरियल सोराई, कन्नड़ में सन्ना पतंगा, तेलुगु में चिन्ना पज़ेरिकी और मलयालम में वेलि तट्टा कहलाता है।

पहचान : पत्रिंगा एक रंगीन खूबसूरत और शहर के आस-पास, गांव के गाछों पर, हाईवे के किनारे टेलीफोन या बिजली के तार पर दिखने वाली बहुत ही आम चिडिया है। एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकती हुई यह चिड़िया हमेशा ख़ुश दिखाई देती है। आराम के समय एक जगह से उड़ कर फिर उसी जगह आकर बैठना इनकी आदत में शुमार है। इसका आकार गौरैया के समान 21 से.मी. का होता है। इस पक्षी का रंग मुख्य रूप से हरी घास सा चमकता हुआ होता है। इसके सर ओर गले पर कत्थई रंग का हल्का सी परछांई होती है। इसकी पूंछ के बीच में दो पंख काफ़ी लंबे होते हैं और आगे जाकर भोथरे पिन की तरह दिखाई देते हैं। इसकी चोंच लम्बी-पतली और जरा मुडी हुई होती है, जिससे कीडे पकडने में आसानी होती है। व्यस्क के गले में एक गहरी काली धारी होती है जो नैकलेस जैसी लगती है, किशोर में यह धारी नहीं होती। नर-मादा समान रंग और आकृति के होते हैं।

स्वभाव : इन्हें जोडे में या छोटे समूह में टेलीफोन के तारों, पेड क़ी टहनियों पर बैठे देखा जा सकता है। इसे खुले हरे-भरे इलाके, बाग, खेत, हलके जंगल, गोल्फ लिन्क, परती भूमि, आदि में रहना ही पसंद है। कभी कभी नदी के रेतीले किनारे और समुद्र तटों पर भी पाई जाती है। हवा में उड़कर ये मधु मक्खी आदि को अपनी लंबी-पतली चोंच में तड़क से पकड़ते हैं फिर पंखों से घेर कर अपने बसेरे तक पहुंचते हैं जहां अपने शिकार को मारकर निगल जाते हैं। यह पक्षी उड़ते और आराम करते समय भी टिट-टिट या ट्रीऽऽ ट्रीऽऽ जैसी आवाज निकालता है।

वितरण : हिमालय की 1000 मी की ऊंचाई से लेकर पत्रिंगा पूरे भारत में पाया जाता है। पाकिस्तान, बांगलादेश, श्रीलंका, म्यानमार का भी यह निवासी या स्थानीय प्रवासी पक्षी है।

भोजन : पत्रिंगा का भोजन उड़ने वाले कीट-पतंगे जैसे तितलियां, मधुमक्खियां, ड्रेगन फ़्लाई आदि होता है।

प्रजनन : इसका नीडन समय फरवरी से मई के बीच होता है। इसका घोंसला एक लंबी पतली सुरंग सा होता है जिसे ये नदी के किनारे, भूमि कटाव की जगहों और कभी-कभी सपाट ज़मीन पर मिट्टी या रेत के अन्दर बनाते हैं। इनके घोंसले एक कॉलोनी के रूप में बसे होते हैं। इनके घोंसले आगे से संकरे होते हैं, पीछे जहाँ अण्डे होते हैं वहाँ थोड़ा चौड़ा कमरा होता है। नर और मादा दोनों मिलकर घोंसला बनाते हैं, अण्डे सेते हैं और अपने बच्चों को खाना खिलाते हैं, उडना सिखाते हैं। मादा एक बार में 4 से 7 गोलाकार अण्डे देती है जो कि एकदम सफेद होते हैं।

अन्य प्रजातियां : इसकी पांच और प्रजातियां हमारे देश में पाई जाती हैं।

1. बड़ा पत्रिंगा या ब्ल्यू टेल्ड बी-ईटर (मेरोप्स फिलीपाइनस)

2. ब्ल्यू चीक्ड बी-ईटर (मेरोप्स परसिकस)

3. ब्ल्यू बीयर्डेड बी-ईटर (नेक्टियोर्निस एथरटोनी)

4. चेस्टनटहेड बी-ईटर, (मेरोप्स लेस्चेनौल्टी)

5. यूरोपियन बी-ईटर (मेरोप्स एपिएस्टर)

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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

फ़ुरसत में … प्रेम-प्रदर्शन

फ़ुरसत में … 

प्रेम-प्रदर्शन


मनोज कुमार
आज के विशिष्ट दिन पर इसी ब्लॉग से पुरानी रचना को झाड़-पोंछ कर सामने रख रहा हूं ...

एक वो ज़माना था जब वसंत के आगमन पर कवि कहते थे,
अपनेहि पेम तरुअर बाढ़ल
कारण किछु नहि भेला ।
साखा पल्लव कुसुमे बेआपल
सौरभ दह दिस गेला ॥ (विद्यापति)

आज तो न जाने कौन-कौन-सा दिन मनाते हैं और प्रेम के प्रदर्शन के लिए सड़क-बाज़ार में उतर आते हैं। इस दिखावे को प्रेम-प्रदर्शन कहते हैं। हमें तो रहीम का दोहा याद आता है,
रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांके तीन॥
खैर, खून, खांसी, खुशी, बैर, प्रीति, मद-पान।
रहिमन दाबे ना दबत जान सकल जहान॥

हम तो विद्यार्थी जीवन के बाद सीधे दाम्पत्य जीवन में बंध गए इसलिए प्रेमचंद के इस वाक्य को पूर्ण समर्थन देते हैं, “जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, वह तो रूप की आसक्ति मात्र है --- जिसका कोई टिकाव नहीं।”

आज सुबह-सुबह नींद खुली, बिस्तर से उठने जा ही रहा था कि श्रीमती जी का मनुहार वाला स्वर सुनाई दिया, “कुछ देर और लेटे रहो ना।”

जब नींद खुल ही गई थी और मैं बिस्तर से उठने का मन बना ही चुका था, तो मैंने अपने इरादे को तर्क देते हुए कहा, “नहीं-नहीं, सुबह-सुबह उठना ही चाहिए।”

“क्यों? ऐसा कौन-सा तीर मार लोगे तुम?”

मैंने अपने तर्क को वजन दिया, “इससे शरीर दुरुस्त और दिमाग़ चुस्त रहता है।”

अब उनका स्वर अपनी मधुरता खो रहा था, “अगर सुबह-सुबह उठने से दिमाग़ चुस्त-दुरुस्त रहता है, तो सबसे ज़्यादा दिमाग का मालिक दूधवाले और पेपर वाले को होना चाहिए।”

“तुम्हारी इन दलीलों का मेरे पास जवाब नहीं है।” कहता हुआ मैं गुसलखाने में घुस गया। बाहर आया तो देखा श्रीमती जी चाय लेकर हाज़िर हैं। मैंने कप लिया और चुस्की लगाते ही बोला, “अरे इसमें मिठास कम है ..!”

श्रीमती जी मचलीं, “तो अपनी उंगली डुबा देती हूं .. हो जाएगी मीठी।”

मैंने कहा, “ये आज तुम्हें हो क्या गया है?”

“तुम तो कुछ समझते ही नहीं … कितने नीरस हो गए हो?” उनके मंतव्य को न समझते हुए मैं अखबार में डूब गया।

मैं आज जिधर जाता श्रीमती जी उधर हाज़िर .. मेरे नहाने का पानी गर्म, स्नान के बाद सारे कपड़े यथा स्थान, यहां तक कि जूते भी लेकर हाजिर। मेरे ऑफिस जाने के वक़्त तो मेरा सब काम यंत्रवत होता है। सो फटाफट तैयार होता गया और श्रीमती जी अपना प्रेम हर चीज़ में उड़ेलती गईं।

मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा था। अत्यधिक प्रेम अनिष्ट की आशंका व्यक्त करता है।

जब दफ़्तर जाने लगा, तो श्रीमती जी ने शिकायत की, “अभी तक आपने विश नहीं किया।”

मैंने पूछा, “किस बात की?”

बोलीं, “अरे वाह! आपको यह भी याद नहीं कि आज वेलेंटाइन डे है!”

ओह! मुझे तो ध्यान भी नहीं था कि आज यह दिन है। मैं टाल कर निकल जाने के इरादे से आगे बढ़ा, तो वो सामने आ गईं। मानों रास्ता ही छेक लिया हो। मैंने कहा, “यह क्या बचपना है?”

उन्होंने तो मानों ठान ही लिया था, “आज का दिन ही है, छेड़-छाड़ का ...”

मैंने कहा, “अरे तुमने सुना नहीं टामस हार्डी का यह कथन – Love is lame at fifty years! यह तो बच्चों के लिए है, हम तो अब बड़े-बूढ़े हुए। इस डे को सेलिब्रेट करने से अधिक कई ज़रूरी काम हैं, कई ज़रूरी समस्याओं को सुलझाना है। ये सब करने की हमारी उमर अब गई।”

“यह तो एक हक़ीक़त है। ज़िन्दगी की उलझनें शरारतों को कम कर देती हैं। ... और लोग समझते हैं ... कि हम बड़े-बूढ़े हो गए हैं।

“बहुत कुछ सीख गई हो तुम तो..।”

वो अपनी ही धुन में कहती चली गईं,
“न हम कुछ हंस के सीखे हैं,
न हम कुछ रो के सीखे है।
जो कुछ थोड़ा सा सीखे हैं,
तुम्हारे हो के सीखे हैं।”

मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए विषय बदला, “पर तुम्हारी शरारतें तो अभी-भी उतनी ही अधिक हैं जितनी पहले हुआ करती थीं ...”

उनका जवाब तैयार था, “हमने अपने को उलझनों से दूर रखा है।”
उनकी वाचालता देख मैं श्रीमती जी के चेहरे की तरफ़ बस देखता रह गया। मेरी आंखों में छा रही नमी को वो पकड़ न लें, ... मैंने चेहरे को और भी सीरियस कर लिया। चेहरे को घुमाया और कहा, “तुम ये अपना बचपना, अपनी शरारतें बचाए रखना, ... ये बेशक़ीमती हैं!”

अपनी तमाम सकुचाहट को दूर करते हुए बोला, “लव यू!”
और झट से लपका लिफ़्ट की तरफ़।

शाम को जब दफ़्तर से वापस आया, तो वे अपनी खोज-बीन करती निगाहों से मेरा निरीक्षण सर से पांव तक करते हुए बोली, “लो, तुम तो खाली हाथ चले आए …”

“क्यों, कुछ लाना था क्या?”

बोलीं, “हम तो समझे कोई गिफ़्ट लेकर आओगे।”

मन ने उफ़्फ़ ... किया, मुंह से निकला, “गिफ़्ट की क्या ज़रूरत है? हम हैं, हमारा प्रेम है। जब जीवन में हर परिस्थिति का सामना करना ही है तो प्रेम से क्यों न करें?

लेकिन वो तो अटल थीं, गिफ़्ट पर। “अरे आज के दिन तो बिना गिफ़्ट के नहीं आना चाहिए था तुम्हें, इससे प्यार बढ़ता है।”

मैंने कहा, “गिफ़्ट में कौन-सा प्रेम रखा है? ...” अपनी जेब का ख्याल मन में था और ज़ुबान पर, “जो प्रेम किसी को क्षति पहुंचाए वह प्रेम है ही नहीं।” मैंने अपनी बात को और मज़बूती प्रदान करने के लिए जोड़ा, “टामस ए केम्पिस ने कहा है – A wise lover values not so much the gift of the lover as the love of the giver. और मैं समझता हूं कि तुम बुद्धिमान तो हो ही।”

उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आज ... यानी प्रेम दिवस पर उनके प्रेम कभी भी बरस पड़ेंगे। मेरा बार बार का एक ही राग अलापना शायद उनको पसंद नहीं आया। सच ही है, जीवन कोई म्यूज़िक प्लेयर थोड़े है कि आप अपना पसंदीदा गीत का कैसेट बजा लें और सुनें। दूसरों को सुनाएं। यह तो रेडियो की तरह है --- आपको प्रत्येक फ्रीक्वेंसी के अनुरूप स्वयं को एडजस्ट करना पड़ता है। तभी आप इसके मधुर बोलों को एन्ज्वाय कर पाएंगे।

मैंने सोचा मना लेने में हर्ज़ क्या है? अपने साहस को संचित करता हुआ रुष्टा की तरफ़ बढ़ा।

“हे प्रिये!”

“क्या है ..(नाथ) ..?”

“(हे रुष्टा!) क्रोध छोड़ दे।”

“गुस्सा कर के मैं कर ही क्या लूंगी?”

“मुझे अपसेट (खिन्न) तो किया ही ना ...”

“हां-हां सारा दोष तो मुझमें ही है।”

“चेहरे से से लग तो रहा है कि अब बस बरसने ही वाली हो।”

“तुम पर बरसने वाली मैं होती हूं ही कौन हूं?”

“मेरी प्रिया हो, मेरी .. (वेलेंटाइन) ...”

“वही तो नहीं हूं, इसी लिए ,,, (अपनी क़िस्मत को कोस रही हूं) ...”

"खबरदार! ऐसा कभी न कहना!!"

"क्यों कहूंगी भला! मुझे मेरा गिफ्ट मिल जो गया. सब कुछ खुदा से मांग लिया तुमको मांगकर!"

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हमारे जीवन में हमारा प्रेम-प्रदर्शन इसी तरह होता आया है।


संत रविदास के उपदेश हमें कर्म, सच्चाई और सेवा के लिए प्रेरित करते हैं

संत रविदास के उपदेश हमें कर्म, सच्चाई और सेवा के लिए प्रेरित करते हैं

संत रविदास जयंती पर …

मध्ययुगीन साधकों में संतकवि रैदास या रविदास का विशिष्ट स्थान है। निम्नवर्ग में समुत्पन्न होकर भी उत्तम जीवन शैली, उत्कृष्ट साधना-पद्धति और उल्लेखनीय आचरण के कारण वे आज भी भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में आदर के साथ याद किए जाते हैं।

संत रैदास के जीवनकाल की तिथि के विषय में कुछ निश्चित रूप से जानकारी नहीं है। इसके समकालीन धन्ना और मीरा ने अपनी रचनाओं में बहुत श्रद्धा से इनका उल्लेख किया है। ऐसा माना जाता है कि ये संत कबीरदास के समकालीन थे। ‘रैदास की परिचई’ में उनके जन्मकाल का उल्लेख नहीं है। डॉ. भगवत मिश्र ने अपने अध्ययन के अनुसार यह निष्कर्ष निकाला है कि उनका जन्म पंद्रहवीं शताब्दी में संत कबीर की जन्मभूमि लहरतारा से दक्षिण मडूर या मडुआडीह गांव, बनारस में विक्रम संवत 1456 (सन 1398) की माघ पूर्णिमा को हुआ था। इनके पिता का नाम संतोखदास (रग्घु) और माता का नाम कर्मा (घुरविनिया) है। वे विवाहित थे और उनकी पत्नी का नाम लोना था। उन्होंने सीद्धियां प्राप्त कर धर्मोपदेशक के रूप में यश कमाया। अपना परिचय देते हुए वे लिखते हैं :

काशी ढिंग माडुर स्थाना,

शूद्र वरण करत गुमराना,

माडुर नगर लीन अवतारा

रविदास शुभ नाम हमारा।

संत रविदास जी ने किसी स्कूल से शिक्षा नहीं पाई थी। संतों की संगति में रहकर उन्होंने ज्ञानार्जन किया था। बाल्यकाल में उनका अधिकांश समय साधुओं की सेवा में बीतता था। उनके पास जो भी धन होता उसे वे साधुओं की सेवा में ख़र्च कर देते। उनका यह व्यवहार उनके पिता को ठीक नहीं लगता। वे अपने पुत्र से क्रुद्ध रहते। पिता पुत्र में इस विषय लेकर विवाद भी हो जाता। एक बार पिता ने पुत्र को घर से निकाल दिया और उनके हाथ एक कौड़ी भी नहीं दी। संत रैदास एक झोपड़ी में रहने लगे। किसी तरह अपनी जीविका चलाते। भगवान के धुन में मस्त गाते रहते –

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम धन बन हम मोरा, जैसे चितवत चन्द चकोरा।

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

उन्होंने कई तीर्थयात्राएं भी की। हरिद्वार, मथुरा, वृंदावन, प्रयाग, भरतपुर, जयपुर, पुष्कर, चित्तौड़ आदि स्थानों का भ्रमण किया। सिकंदर लोदी के निमंत्रण पर वे दिल्ली भी गए थे। संत कबीर उनके गुरुभाई थे। रैदास को स्वामी रामानंद ने दीक्षा दी थी। संत रविदास रामानन्द के बारह शिष्यों सें से एक थे। बचपन से ही वे बड़े दयालू और परोपकारी थे। वे कर्म को ही पूजा मानते थे। उनका मानना था कि जो व्यक्ति अपने कर्म पूरे मन से करता है, वही सच्चा धार्मिक व्यक्ति है।

संत रैदास ने सामाजिक विषमता के प्रति अपना विरोध दर्ज़ किया। उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था की असमानता के प्रति आक्रोश अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया। वे कविताओं में बार-बार अपने को चमार कह कर संबोधित करते हैं। ‘ऐसी मेरी जाति विख्यात चमारं’, ‘चरन सरन रैदास चमैइया’, ‘कह रैदास खलास चमारा’ आदि। यह एक प्रकार से कवि का प्रतिरोध ही है। इस जाति का शोषण और अपमान अनंत काल से होता रहा है। इस भेदभाव की तीव्रता का अनुभव करते हुए कभी-कभी उनके धैर्य का बांध टूट जाता था –

जाके कुटुंब सब ढोर ढोवत

फिरहिं अजहूँ बानारसी आसपासा।

आचार सहित बिप्र करहिं डंडौति

तिन तनै रविदास दासानुदासा॥

हजारों वर्षों से दबाई हुई शोषित जाति का कंठ इसी आवेग से फूटता है। रैदास की आचारनिष्ठ विप्रों का दंडवत करना भक्ति-आन्दोलन की उस धारा की ओर संकेत करता है जिसके प्रखर प्रवाह में जाति-पांति के बांध एक सीमा तक टूट-फूट गये थे। जाति-प्रथा और कर्मकांड को उन्होंने तोड़ने का उपदेश दिया। उन्होंने बाह्य विधान का विरोध किया और आंतरिक साधना पर बल दिया। उन्होंने लोगों को निश्छल भाव से भक्ति की ओर उन्मुख करने का प्रयत्न किया। अपने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने सरल व्यावहारिक ब्रजभाषा को अपनाया, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ीबोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का मिश्रण है।

इनकी रचनाओं का कोई व्यवस्थित संकलन नहीं है, वह मात्र फुटकल के रूप में ही उपलब्ध होता है। उनके 40 पद “आदिग्रंथ” गुरुग्रंथ साहिब में संगृहीत हैं। अनन्यता, भगवत्‌ प्रेम, दैन्य, आत्मनिवेदन और सरल हृदयता इनकी रचनाओं की विशेषता है। सामाजिक एकता, सौहार्द्र और समरसता के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सारा जीवन वे लोककल्याण हेतु कार्य करते रहे। मीरा स्मृति ग्रंथ के अनुसार विक्रम संवत 1584 (सन 1527) में वे ब्राह्मलीन हुए। उनका मोक्ष स्थान काशी का गंगा घाट था। भक्तमाल के अनुसार चित्तौड़ की रानी उनकी शिष्या बन गई थीं। चित्तौड़ में उनके सम्मान में मंदिर और तालाब बनवाए गए थे। वहां आज भी रैदास जी की छतरी बनी है।

उन दिनों भारत के समाज में जातिवाद और छुआछूत जैसी कुप्रथाएं विद्यमान थी और समाज इन बुराईओं को इन कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्षरत था। समाज में विघटन था, विद्वेष था, असमानता थी। ऐसे हिंदू समाज के बीच संत रैदास ने बहुत ही सीधी-सादी ज़बान में समाज को एक्जुट रखने का प्रचार किया। सामाजिक बुराईयों का खुलकर विरोध किया। अंधविश्वास, कुरीतियों और कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ प्रचार किया। जो अपने लिए कोई भी इच्छा न रखे और परोपकार में अपना जीवन बिताए ऐसे लोगों को संत कहते हैं। रविदास सच्चे मायनों में सही संत थे। उनके उपदेश हमें हमेशा कर्म, सच्चाई और सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।

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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

लाल लंबी टांगों वाला गजपांव

लाल लंबी टांगों वाला गजपांव या टिंगुड़

@ Manoj Kumar at Giddhi Pokhar, Nalanda
@ Manoj Kumar at Giddhi Pokhar, Nalanda
Black-winged Stilt (Himantopus himantopus)

 स्थानीय नाम : बंगाल में इसे लाल गोन, लाल ठेंगी, लम गोरा कहा जाता है, जबकि पंजाबी में लामलट्टा, मराठी में शेकटा, बिहारी में सरगैन या सरगाइन, तमिल में पाविल्ला कल उल्लान और सिंध में गुस्लिंग।

@ Manoj Kumar at Giddhi Pokhar, Nalanda
पहचान : शरीर के अनुपात में सबसे लंबी टांगों वाला पक्षी गज पांव नदी या पानी के अन्य स्रोतों के किनारे पाया जाने वाला बड़ा ही आम पक्षी है। यह 25 सें.मी. के आकार का पतला और बहुत ही ख़ूबसूरत पक्षी है जिसके पंख काले, सलेटी भूरे और शरीर बगुला की तरह सफेद होता है। इसकी काले रंग की चोंच लंबी और पतली होती है। सबसे पहले हमारी नज़र इसकी टांग पर पड़ती है, जो काफ़ी लंबी और लाल रंग की होती है। लंबी टांगों के कारण ही इसे गज (मीटर) पांव कहा जाता है। नर और मादा के रंग में अंतर होता है। प्रजनन के समय पंख का रंग गहरा हरा हो जाता है। झील, पोखर आदि में ये जोड़ों की झुंड में होते हैं।

वितरण : यह पूरे भारत में पाया जाता है। इसके अलावा बांगलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यानमार में भी पाया जाता है। ये निवासी (Resident) और स्थानीय प्रवासी पक्षी हैं। ये सर्दियों के आगंतुक हैं।

@ Manoj Kumar at Giddhi Pokhar, Nalanda
स्वभाव : दलदली इलाक़े, झील, तालाब, पोखर, खारे खेतों और ज्वार से बने कीचड़ भरी जगहों पर पाया जाता है। Stilt एक लकड़ी होती है जिस पर पांव रखकर चलते हैं। इसकी Stilt टांग इसे गहरे जल में आराम से चलने में सहायक होती हैं। यहां यह पानी की सतह पर केंचुए, कोमल कवचधारी जीव, जलीय कीट आदि का शिकार करता है। कीचड़ या तलहटी में स्थित कीड़े, मोलस्क सीप, आदि को खाते समय ये सिर और गरदन को पानी के भीतर घुसा लेते हैं, जबकि इनका शरीर बाहर रहता है। तैरने में भी ये माहिर होते हैं। ये तेजी से नहीं उड़ पाते। उड़ते समय इनकी पतली गरदन आगे विस्तारित रहती है, जबकि लंबी लाल पतली टांग पीछे की ओर। ये उड़ते समय तीव्र बिप्‌-बिप्‌ कि आवाज़ करते हैं। गुस्से में ये चरचराने वाली चिक-चिक-चिक की चीखती हुई आवाज़ निकालते हैं।

नीड़न : इनके घोंसला बनाने का समय आमतौर पर अप्रैल से अगस्त के बीच होता है। इनका घोंसला झील या तालाब या पानी के स्रोत के निकट होता है। ज़मीन पर रहने वाले इनके शत्रुओं का ध्यान घोंसलों की तरफ़ आकर्षित न हो इसलिए ये घोंसले मिट्टी कुरेद कर एक छोटे से गड्ढ़े के रूप में बनाते हैं। या फिर किसी ऊंचे प्लेटफ़ॉर्म पर पानी के बीच पत्थरों से घेर कर ये घोंसला बनाते हैं जिसे ये फूस, पत्ते से घेर देते हैं। ये 3 से 4 अंडे देते हैं जो हलके बादामी रंग के होते हैं। नर और मादा दोनों मिलकर अंडे सेते हैं और चूजों की देखभाल करते हैं।

@ Manoj Kumar at Giddhi Pokhar, Nalanda


संदर्भ
1) The Book of Indian Birds – Salim Ali
2) A pictorial Guide to the Birds of the Indian Sub-continent – Salim Ali
3) Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, BiswajIt Roychowdhury
4) The Book Of Indian Birds – Salim Ali
5) Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carol Inskipp and Tim Inskipp
6) Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande
7) हमारे पक्षी – असद आर. रहमानी
8) The Birds – R. L. Kotpal

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया

पुण्य तिथि पर

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धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया

सुदामा पाण्डेय धूमिल के प्रथम काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ की ‘कविता’ शीर्षक रचना से लिया गए काव्यांश से बात की शुरुआत करते हैं ..

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे

कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं

और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं

आदत बन चुकी है

वह किसी गँवार आदमी की ऊब से

पैदा हुई थी और

एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ

शहर में चली गयी

अपेक्षाकृत धूमिल की यह छोटी कविता है। यह ‘कविता’ उनके नये अंदाज़, कविता के प्रति उनकी गहरी सोच को अभिव्यक्त करती है। इस कविता में कवि संवेदना और अभिव्यंजना के संकटों की पहचान करता है। शब्दों की खोती हुई ताकत के कारण कविता रचने का काम कठिन होता जा रहा है। भाषा और मनोभाव की जिस पवित्र आत्मीयता से कविता रची जाती है, वे संबंध-सूत्र जीवन से लगातार टूट रहे हैं। कवि की दृष्टि में कविता की उत्पत्ति जिस मनः स्थिति में हुई थी और जिस सार्थक उद्देश्य से उसका सरोकार था, वह पूरी तरह उससे कट गई है।

भाषा और अर्थ का आपसी संबंध सामाजिक जीवन की आधारशिला पर टिका होता है। सामाजिक जीवन में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है, इसलिए कविता भी संक्षिप्त एकालाप बनकर रह गई है। उसमें बौखलाए हुए आदमी का आक्रोश है लेकिन एक प्रकार की विवशता से वह ग्रस्त है। वास्तव में साठोत्तरी कविता नवीन काव्याभिरुचि, नवीन सौन्दर्यबोध तथा नये संवेदन की कविता है। वह मुख्यतः साधारण आदमी की पहचान और उस पहचान की तलाश की कविता है। जब कवि यह कहता है - उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे / कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं / और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं – / आदत बन चुकी है तो कविता की वर्तमान दशा पर स्वयं कविता की यह सोच कितना भेदक है। आज जिस तरह असलियत को शब्दों की ओट में दिखाया जाता है, उससे स्पष्ट है कि कविता की चिन्ता जनकल्याण न होकर उन चेहरों को छिपाना हो गया है, जिन्हें नंगा किया जाना चाहिए। पोल खोलने के नंगेपन को धूमिल वर्तमान वस्तु-स्थिति में अनिवार्य मानते हैं। इसी से कविता की हत्या हो रही है। अब हत्या करना रुचि नहीं आदत बन गई है। कविता का यह दुरुपयोग खुद कविता को ही खलता है। स्पष्ट है कि धूमिल समकालीन कविता के अपने मूल उद्देश्य आदमी होने की पहल से भटकने को लेकर चिन्तित हैं। दुराव आदमी के चरित्र का सबसे घातक पहलु है और कविता आज उसी शगल में फंस गई है।

धूमिल कविता के उद्भव के आदि स्रोत के रूप में ‘गंवार की ऊब’ को मानते हैं। वे कविता को उसके मूल सरोकार से जोड़कर देखते हैं, केवल मनोरंजन से नहीं। आदिम श्रम से ऊबे लोगों ने कविता को अपनी ऊब के लिए खोजा था, ताकि ऊब को सक्रियता दी जा सके। उसे जीवन-संघर्ष में अग्रसर करने का मनोबल दे। पढ़े-लिखे और शहरी संस्कृति में पलने वाले लोगों की करामात से ही कविता यथार्थ परिदृश्य को ओझल कर दुराव के तहत अपनी जड़ से कट चुकी है।

धूमिल की कविता को गहराई तक समझने के लिए उनके कविता संबंधी दृष्टिकोण को जानना निहायत ज़रूरी है। उनकी सृजन प्रक्रिया के संबंध में काशीनाथ सिंह के शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा जा सकता है कि वे कविता करते नहीं थे, बनाते थे। पहले उनके दिमाग में समस्या आती थी और वे उसकी पूर्ति ऊपर की तीन या सात पंक्तियों से करते थे। उनके दिमाग में जुमले आते थे और ये जुमले कभी तो उनके उपजाऊ दिमाग की उपज होते थे और कभी उन्हें लोगों की बातचीत से हासिल होते थे। इस प्रकार का जुमले ‘कविता’ में भी देखा जा सकता है, जैसे – अब उसे मालूम है कि कविता / घेराव में / किसी बौखलाये हुए आदमी का / संक्षिप्त एकालाप है।

साठोत्तरी दशक में धूमिल पहला ऐसा कवि हैं, जिन्होंने सबसे अधिक कविताएं ‘कविता’ के बारे में लिखी है। वे इस बात का प्रमाण हैं कि धूमिल कविता के भविष्य, कविता की सार्थकता को लेकर कितने चिंतित थे। उन्होंने हिंदी कविता को एक नयी भाषा दी है। उन्होंने अनुभव किया कि कवि का पहला काम कविता को भाषाहीन करना है। साथ ही वे मानते थे कि अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से उसे मुक्त करना है। इसके कारण कविता की स्थिति उस औरत जैसी हास्यास्पद हो जाती है, जिसके आगे एक बच्चा हो, गोद में एक बच्चा हो और एक बच्चा पेट में हो। प्रतीक, बिम्ब जहां सूक्ष्म सांकेतिकता और सहज सम्प्रेषणीयता में सहायक होते हैं वहीं अपनी अधिकता से कविता को ग्राफिक बना देते हैं। आज महत्व शिल्प का नहीं कथ्य का है। सवाल यह नहीं कि आपने किस तरह कहा है, सवाल यह है कि आपने क्या कहा है? इससे स्पष्ट है कि धूमिल पच्चीकारी और अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से कविता को मुक्त करना चाहते थे। स्पष्ट है ऐसी भाषा कविता और पाठक के बीच दीवार बनकर खड़ी होती है, धूमिल कविता को भाषाहीन करके इसी दीवार को तोड़ते नज़र आते हैं।

इस काव्ययात्रा की शुरुआत धूमिल के आत्मसंघर्ष से होती है। आदमी होने का उनका अपना अनुभव जो कुछ रहा, उसे उन्होंने कविता में अभिव्यक्त किया है। धूमिल वैयक्तिक अनुभवों को निर्वैयक्ति बनाकर पेश करते हैं। उनका काव्य-सरोकार आत्मकेन्द्रित न होकर सर्वात्म केन्द्रित है। उनकी कविता आदमी की आज़ादी के संघर्ष की कविता है, उसे किसी विशिष्ट काव्य मानदण्ड पर तौलना उसका अपमान होगा। इसलिए उनकी कविता निर्वैयक्तिक कही जाएगी क्योंकि उसमें उनका आत्मविसर्जन तो नहीं हुआ है, पर वह आत्म आम आदमी के आत्म का पर्याय अवश्य बन गया है। वे आत्मसंवेदना को विचार से जोड़कर ही उसे रचनात्मकता का दर्ज़ा देते हैं।

धूमिल जब कहते हैं कि कविता हर तीसरे पाठ के बाद धर्मशाला जो जाती है, तो उनका आशय स्पष्ट है कि पाठ-प्रक्रिया के दुहराव के बाद उसमें नये अर्थसंधान का आकर्षण समाप्त हो जाता है। उन्हें दुख यह भी है कि शब्दों के पीछे / कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं / आदत बन चुकी है। -

“इस लिए गँवार आदमी की ऊब से पैदा हुई कविता एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ / शहर में चली गई।” क्योंकि गाँव में रहकर संघर्ष करना पढ़े-लिखे नफ़ासत जीवन जीने के लोलुप आदमी के लिए आसान नहीं है। इस तरह शहरीकरण पर कविता के माध्यम से की गई यह टिप्पणी उन लोगों पर गहरा व्यंग्य है, जो सुविधाभोग के स्वार्थ में अपनी ज़मीन को ही भूल जाते हैं। ऐसे लोग ही उस कविता को भी अपनी ज़मीन से उखाड़कर शहर में स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। उनकी कविता पर धूमिल का व्यंग्य उल्लेखनीय है - नहीं – अब वहाँ कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है / पेशेवर भाषा के तस्कर – संकेतों / और बैलमुत्ती इबारतों में / अर्थ खोजना व्यर्थ है ये तस्कर संकेत उन प्रतीकों और उपमानों की ओर संकेत हैं, जिन्होंने गोल-गोल शब्दावली में वास्तविक अनुभव को दरकिनार कर दिया है। तभी धूमिल नए कवि को सलाह देते हैं हाँ, हो सके तो बगल से गुज़रते हुए आदमी से कहो – / लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा, / यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

कविता को आदमी को उसकी पहचान देना है, जो सामयिक भीड़ में कहीं खो गया है। धूमिल की आदमी से यह सम्बद्धता इसलिए आ पायी है कि वे उसी की तरह ज़िन्दगी के संघर्ष में उसके हिस्सेदार हैं। भाषा में आदमी होने की तमीज़ से उनका आशय नगरीय-बोध से जुड़ी सभ्यता नहीं, वह आदिम संस्कार है जो उसकी अपनी पहचान है। वे आदमी को सांचे में ढालने की अपेक्षा उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, जिसके तहत वह अपने ढंग से जीवन संघर्ष करने में सफल हो सकता है। इसके अभाव में वह भीड़ का एक हिस्सा बनकर रह जायेगा।

धूमिल की कविताएं अपनी अंतर्वस्तु और शिल्पगत बनावट-बुनावट की ताज़गी और सादगी के कारण हिंदी पाठकों और आलोचकों का ध्यान एक दम से अपनी ओर आकृष्ट करती है। धूमिल की कविताओं में आक्रोश है और उस आक्रोश के मूल में सभी शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध मानवीय मुक्ति का पक्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। भाषा और शैली की दृष्टि से धूमिल ने अपनी एक नयी पहचान बनायी है। हिंदी काव्य की परम्परागत रूपक योजना, मिथक रचना-प्रतीक-विधान का परित्याग कर इन्होंने भाषा एवं शैली – दोनों ही दृष्टियों से सपाट बयानी को अपनी कविता के लिए श्रेयष्कर समझा है। सामान्य बोल चाल की चालू भाषा और बिना लाग-लपेट के कहने का कौशल धूमिल की कव्य-शैली का प्रमुख आकर्षण है। धूमिल ने अकविता और श्मशानी भूखी-क्रुद्ध पीढ़ी के दौर में एक सार्थक विद्रोह भाव ही नहीं, एक नया काव्य-शिल्प भी हिंदी की आगे आने वाली पीढ़ी को दिया। भाव, भाषा और शिल्प – सभी दृष्टियों से धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया है। धूमिल ने विभिन्न काव्यान्दलोनों को चुनौती देकर अपना अलग व्यक्तित्व बनाये रखा।

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रविवार, 9 फ़रवरी 2014

टॉल्सटॉय फार्म, कालेनबाक और सांपों का उपद्रव

गांधी और गांधीवाद-154

1909

टॉल्सटॉय फार्म, कालेनबाक और सांपों का उपद्रव

कालेनबेक

गांधी जी के संसर्ग में आकर न जाने कितने लोगों के जीवन में परिवर्तन आया। कालेनबेक भी उनमें से एक थे। वे बड़े रईस का जीवन जीते थे। उन्होंने कभी भी दुनिया की सर्दी-गर्मी नहीं सही थी। न कोई तकलीफ़ उठाई थी न कोई अड़चन सहा था। असंयम उनका धर्म हो गया था। संसार का हर सुख भोगना उनकी आदत थी। स्वच्छंद जीवन जीते थे। पैसे से जो चीज़ मिल सकती थी उसे हासिल करने के लिए उन्होंने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। ऐसा आदमी टॉल्स्टॉय फार्म में रहता था, सोता-बैठता, खाता-पीता थ। फार्मवासियों के जीवन के साथ अपने जीवन को उन्होंने पूरी तरह से मिला दिया था। भारतवासीयों को उनके इस रहन-सहन पर न सिर्फ़ आश्चर्य बल्कि आनंद भी हो रहा था, लेकिन कुछ गोरों ने तो कालेनबेक को मूर्ख और पागल मान लिया था। लेकिन कालेनबेक ने अपने त्याग को कभी भी दुखस्वरूप न माना। उनके इस त्याग-शक्ति के कारण कई लोगों के दिल में उनके प्रति आदर भाव भी बढ़ गया था। जितना आनंद उन्होंने सुखों के भोग में पाया था उससे अधिक उन्हें त्याग में मिल रहा था। छोटे-बड़े सबों के साथ वे हिल-मिल कर रहते।

टॉल्सटॉय फार्म पर रहते हुए गांधी जी और कालेनबाक के बीच काफ़ी घनिष्ठ संबंध हो गया था। कालेनबाक क्प फलवाले बड़े पेड़ों का बहुत शौक था। इसलिए टॉल्सटॉय फार्म के माली का काम वे स्वयं करते थे। हां रोज़ सवेरे बच्चों और बड़ों से भी इनके काट-छांट और सींचने काम काम करवाते। हंसमुख स्वभाव के कालेनबेक मेहनत के सभी काम हंसते-हंसते करते और दूसरे लोगों को उनके साथ काम करने में बड़ा आनंद आता। वक़्त पड़ने पर रात के दो बजे उठकर टॉल्स्टॉय फार्म से जोहान्सबर्ग जाने वाली टोली के साथ पैदल निकल पड़ते।

गांधी जी के इस सिद्धांत में उन्हें विश्वास था कि ‘बुद्धि जिस वस्तु को स्वीकार कर ले उसका आचरण करना उचित और धर्म है’। गांधी जी के इस विचार से कि सांप आदि अन्य जानवर को मारना वे पाप है, शुरू में तो कालेनबाक को आघात पहुंचा पर अंत में तात्विक दृष्टि से उन्होंने इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। कालेनबाक सांप को मारने के पक्ष में रहते थे। गांधी जी इससे सहमत नहीं थे।

फार्म में सांपों का उपद्रव

हालांकि अहिंसा के प्रति पूर्ण वचनबद्धत के बावजूद भी सांपों के मारने पर बिल्कुल न मारने की पाबंदी नहीं थी। फार्म में सांपों का उपद्रव काफ़ी था। इस फार्म की स्थापना के पहले यह स्थान निर्जन था। गांधी जी यहां सांपों के बीच रहे। उनको तसल्ली थी कि एक सांप भी उन्होंने नहीं मारा। एक दिन कालेनबाक के कमरे में अचानक ऐसी जगह एक सांप दिखाई दिया, जहां से उसे भगाना या पकड़ना लगभग असंभव था। फार्म के एक विद्यार्थी ने उसे देखा। उसने गांधी जी को बुलाया और पूछा – “क्या करना चाहिए? यदि आप आज्ञा दें तो इसे मार दूं?” उस सांप को मार देने की इजाज़त देना गांधी जी ने अपना धर्म समझा। उन्होंने आज्ञा दे दी। सांप को मारने की आज्ञा देने में गांधी जी को धर्म दिखाई दिया। गांधी जी कहते हैं, “सांप को हाथ से पकड़ लेने या फार्मवासियों को और किसी तरह भयमुक्त कर देने की मुझमें शक्ति न थी और आज भी उसे उत्पन्न नहीं कर सकता।”

इसी क्रम में कालेनबेक ने सांपों की विभिन्न प्रजातियों को पहचानने के लिए कई पुस्तकों का अध्ययन किया। उन्होंने जाना कि सभी सांप ज़हरीले नहीं होते। कई तो खेतों और फसलों की रक्षा भी करते हैं। गांधी जी की सहायता से उन्होंने सर्पों को पहचानना भी सीख लिया।

एक विशाल अजगर जो फार्म में मिला था, उसे कालेनबेक ने पाल लिया था। उसको सदा अपने हाथ से खाना देते। उसे पिंजड़े में उन्होंने रखा था। यह देखकर गांधी जी ने कहा, “हालांकि आपका भाव शुद्ध है, फिर भी अजगर तो उसे पहचानने से रहा। आपकी प्रीति के साथ भय मिला हुआ है। उसको खुला रखकर उसके साथ खेलने की हिम्मत आपकी नहीं है। इसलिए इस सांप को पालने में मैं सद्भाव तो देखता हूं, पर उसमें अहिंसा नहीं देखता। इस सांप के तौर-तरीक़े, इसकी आदतें जानने के लिए आपने उसे क़ैद कर रखा है। यह एक प्रकार की विलासिता हुई। दोस्ती में किसी को बन्दी नहीं बनाया जाता।‘’

हालांकि कालेनबेक को गांधी जी की यह दलील जंची, फिर भी उसे तुरंत छोड़ देने की उनकी इच्छा नहीं हुई। पर इस सांप ने क़ैद से निकलने का रस्ता खुद निकाल लिया। शायद पिंजड़े का दरवाजा खुला रह गया हो। एक सुबह कालेनबेक उसे देखने गए तो देखा कि पिंजड़ा खाली है। वह ख़ुश हुए।

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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कौवों से भी काला पनकौवा

कौवों से भी काला पनकौवा

पनकौवा/Cormorant

वैज्ञानिक नाम: फैलाक्रोकोरेक्स नाइगर (Phalacrocorax niger)

सामान्य नाम : Little Cormorrant या छोटे पनकौवा

गण : बक (Order Ciconiformes)

कुल : जलकाक (Family Phalacrocoracidae)

स्थानीय नाम : बंगाल में इसे पनकौरी कहा जाता है। पंजाबी में जलकान, गुजराती में नानो काज्यो, मराठी में पनकाउला, तेलुगु में नातिकाकि, तमिल में नीर कागम, मलयालम में काक्तारावु और कन्नड़ में पुट्टा नीरू कागे।

पहचान

लगभग 50 से.मी. के आकार का यह आवासी प्रवासी पक्षी कौवों से भी अधिक काला होता है। इसकी कई जातियाँ सारे संसार में पाई जाती हैं। इसके पंख काले और चमकदार होते हैं। ये अपना अधिक समय पानी में ही बिताते हैं और पानी के भीतर मछलियों की तरह तैर लेते हैं। यह पानी में डूब कर मछलियों को पकड़ता है। तैरते समय इसका शरीर पानी के भीतर होता है, गरदन सीधी होती है और सिर और चोंच थोड़ा ऊपर की तरफ़ होते हैं। इसकी चोंच हुक के समान मुड़ी हुई होती है। चौड़ी पूंछ सीधी और तनी हुई होती है। इसके गले पर एक छोटा सा सफेद छाप होता है। इसकी टाँगें छोटी और उँगलियाँ ज़ालपाद होती है। बड़ा पनकौवा (Large Cormorrant) भी देखने में इसी की तरह होता है पर उसका आकार हंस के समान होता है और उसके दोनों तरफ़ बड़ा सफेद छाप होता है। नर और मादा पनकौवा में कोई अंतर नहीं होता। अकेला या 20 पक्षियों के झुंड में पाया जाता है। कभी-कभी झुंड इससे बड़ा भी होता है।

आवास-प्रवास

यह पक्षी पोखर, तालाब, झील, जलाशय, लैगून और सिंचाई के लिए बनाए गए जलस्रोतों के निकट पाया जाता है। मुख्यतः यह मछली, मेढ़क, घोंघे औए सीपी खाता है। शिकार पर ये दल बनाकर टूट पड़ते हैं। यह पानी में डूब कर मछलियों को पकड़ता है। हुक के समान मुड़ी चोंच में फंस कर शिकार निकल नहीं पाता। भरपेट भोजन खा लेने के बाद ये किनारे, चट्टानों, टीले, पेड़ों की शाखाओं आदि पर बैठ कर फ़ुरसत से अपने पंखों को फैलाकर सुखाते रहते हैं।

प्रजनन

इसके प्रजनन का कोई निश्चित समय नहीं होता। देश के विभिन्न भागों में इनका प्रजनन काल अलग-अलग देखा गया है। हां यह निश्चित है कि जिस समय इन्हें बहुतायत में भोजन मिलता है, उसी समय इनका प्रजनन काल शुरू हो जाता है। इसका कारण यह है कि इनके बढ़ते हुए चूजों को उस समय उचित खुराक मिल पाता है। उत्तर भारत में इस पक्षी में प्रजनन वर्षा ऋतु या मॉनसून के आगमनके समय, यानी जुलाई माह में शुरू होता है जो सितम्बर तक रहता है। क्योंकि इस मौसम में मछली और मेढ़कों की भरमार होती है। दक्षिण भारत में प्रजनन नवंबर से लेकर फरवरी तक होता है। जलाशयों के आसपास पाए जाने वाले वृक्षों पर यह अपना घोंसला बनाता है। यह चार से पांच नीले-हरे रंग का अंडा देता है। नर और मादा दोनों ही अंडों को सेते हैं।

अन्य प्रजातियां :

इस पक्षी की कई जातियाँ सारे संसार में पाई जाती हैं। सितकर्ण जलकौवा या इंडियन शैग (फेलाक्रोकोरेक्स फुसिकोलिस) : इसकी गरदन पतली और चोंच लंबी होती है। यह पक्षी देश भर में पानी के नजदीक पाया जाता है। बड़ा पनकौवा (Great Cormorant – P. carbo) 80 से.मी. के आकार का होता है। इसमें पीला gular pouch होता है।

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संदर्भ

1) The Book of Indian Birds – Salim Ali

2) A pictorial Guide to the Birds of the Indian Sub-continent – Salim Ali

3) Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, BiswajIt Roychowdhury

4) The Book Of Indian Birds – Salim Ali

5) Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carol Inskipp and Tim Inskipp

6) Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande

7) हमारे पक्षी – असद आर. रहमानी

The Birds – R. L. Kotpal

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

परिवार के साथ सामंजस्य और सत्याग्रह

गांधी और गांधीवाद-153

1909

परिवार के साथ सामंजस्य और सत्याग्रह

अपने आदर्श और सिद्धान्त के प्रति जिस तरह से गांधी जी वचनबद्ध थे, उस सनक से तालमेल बिठाना, उनकी पत्नी, बच्चों और यहां तक कि नजदीकी संबंधियों के लिए संभव नहीं था। सत्याग्रह, ब्रह्मचर्य और निर्धनता उनके लिये न सिर्फ़ राजनीतिक अस्त्र थे, बल्कि जीवन के अंग भी थे। अपने प्रयोगों के लिये वे किसी हद तक जाने के लिये तैयार थे, सत्य को वे ईश्वर मानते थे, और अपने सिद्धान्तों को प्रमाणित करने के लिये उनके अपने तर्क होते थे, जिसका खंडन करना मुश्किल ही नहीं असंभव होता था। इसलिये उनके निश्चय को शायद ही कभी परिवर्तित करना पड़ा हो।

कस्तूरबा गांधीपत्नी कस्तूरबा : इस असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी के साथ सामंजस्य बिठाये रखने के लिए पत्नी कस्तूरबा को काफी मशक्कत करनी पड़ी। उन्होंने तो किसी तरह इसे निभाना शुरू कर दिया था, लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों को काफ़ी दिक्क़तें आ रही थीं। 1905 के शुरुआती दिनों से ही हेनरी पोलाक उनके साथ परिवार के सदस्य की तरह रह रहे थे। दिसम्बर के आखिरी सप्ताह में पोलाक की मंगेतर मिली भी साथ रहने आ गई। 18 वर्षीय हरिलाल भारत में ही थे। 14 वर्ष के मणिलाल, 9 वर्ष के रामदास और 6 वर्ष के देवदास साथ में थे। गांधी जी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे आरंभिक दिनों से ही अंग्रेज़ी में सोचें और बोलें। उन्हें स्वयं गुजराती भाषा में शिक्षा देते थे।

बड़े भाई लक्ष्मीदास :

1906 का वर्ष कई मायनों में गांधी जी के लिए युगांतरकारी साबित हुआ। वकालत से काफी आमदनी होने लगी थी। जोहान्सबर्ग में वे एक आराम की ज़िन्दगी जी रहे थे। जब उनकी इच्छा होती फीनिक्स आश्रम चले जाते। अपने सार्वजनिक क्रिया-कलापों से नेटाल और ट्रांसवाल के लोगों के बीच वे काफ़ी प्रसिद्ध हो चुके थे। 37 वर्ष की उम्र में उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत ग्रहण कर लिया था। जब वे इंगलैंड में पढ़ाई कर रहे थे, तो बड़े भाई लक्ष्मीदास गांधी ने उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के इए हर संभव मदद की थी। अब वक़्त आ गया था कि वे अपने बड़े भाई की सहायता करें। अपनी नैतिक सीमाओं में रहते हुए वे इतना कमा लेना चाहते थे कि उनकी मदद की जा सके। नेटाल में रहते हुए उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी भाई को भेज दी थी। इंग्लैंड में पढ़ाई के समय लिए गए 13,000 रुपयों का क़र्ज़ चुकता किया था। इसके अलावे लगभग 60,000 रुपये संयुक्त परिवार के खाते में जमा करवा दिया था। हालांकि लक्ष्मीदास की वकालत अच्छी चल रही थी लेकिन अपनी आराम तलब ज़िन्दगी जीने की उनकी आदतों के कारण उनका खर्च काफ़ी बढ़ गया था। यह बात गांधी जी को अखरती थी। 1907 के अप्रैल माह में लिखे गए अपने पत्र में उन्होंने लक्ष्मी दास के इस विलासिता पूर्ण रहन-सहन की आलोचना की थी। लक्ष्मी दास ने अपने खर्चे की भरपाई के लिए गांधी जी से 100 रुपये प्रतिमास भेजने की मांग की थी जिसे गांधी जी ने देने से मना कर दिया था। उनका कहना था कि वे स्वयं एक बहुत ही सादगी का जीवन जीते हैं और अपने परिवार के ऊपर बहुत ही कम खर्च करते। जो बचता है वह वे सार्वजनिक कामों में लगा देते हैं। इसके कारण दोनों भाईयों के बीच खटास पैदा हुई।

दूसरे भाई करसनदास :

दूसरे भाई करसनदास गांधी जी से तीन साल बड़े थे। दोनों भाईयों के बीच काफ़ी घनिष्ठता थी। शेख़ मेहताब दोनों के दोस्त थे। उससे दोस्ती के कारण कई ऐसे काम उन्होंने किए जिसे अवसर-प्रतिकूल कहा जा सकता है। समय के साथ दोनों भाई दो अलग दिशाओं में चले गए। दक्षिण अफ़्रीका में मोहनदास गांधी, जहां उनकी वकालत काफ़ी अच्छी चल रही रही थी, और भारत में करसनदास एक पुलिस कर्मचारी के रूप में साधारण जीवन जी रहे थे। उनका मोहनदास के प्रति प्रेम अब भी बना हुआ था।

बहन रालियात : परिवार में सबसे बड़ी, बहन रालियात विधवा थी और उसने करसनदास के साथ रहना मंजूर किया था। उनके रहन-सहन के लिए गांधी जी नियमित रूप से मदद कर रहे थे। जब गांधी जी की अवस्था में परिवर्तन आया तो उन्होंने बहन से 20-25 रुपये मासिक में गुजारा करने की गुजारिश की।

बहन का बेटा गोकुलदास :

बहन का एकमात्र बेटा गोकुलदास पांच वर्षों तक गांधी जी के साथ दक्षिण अफ़्रीका में रहा। भारत लौटने के बाद उसने भी आराम-तलबी की ज़िन्दगी जीनी शुरू कर दी। 1907 में उनकी शादी हो गई, लेकिन दुर्भाग्यवश अगले ही साल, 1908 में, उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वे मात्र 20 वर्ष के थे।

बड़े लड़के हरिलाल :

ड़े लड़के हरिलाल सन 1907 में दक्षिण अफ़्रीका आए। आते ही वे पिता के काम में उत्साह से जुट गए। जुलाई 1908 में ट्रांसवाल की लड़ाई के समय बीस साल की छोटी उम्र में सत्याग्रही की तरह जेल गए। एक सप्ताह की क़ैद से जब आज़ाद हुए तो सत्याग्रह की लड़ाई उन्होंने ज़ारी रखी। अगस्त के मध्य में एक महीने के लिए जेल गए। फिर फरवरी, 1909 में छह महीने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। नवम्बर, 1909 में उन्हें फिर से छह महीने के लिए जेल जाना पड़ा। बार-बार जेल जाने और जेल की सज़ा को हंसते-हंसते सह लेने के कारण लोग इन्हें ‘छोटे गांधी’ कहकर बुलाने लगे। लेकिन इस सब के बावजूद हरिलाल उचित शिक्षा न मिल पाने के कारण असंतुष्ट रहने लगे। फीनिक्स की व्यवस्था से भी उन्हें खासी शिकायत रहती थी। पिता से जब उन्होंने इसकी चर्चा की तो पिता ने जवाब दिया, अगर तुम्हें लगता है कि फीनिक्स में दुर्गंध है तो तुम्हे ऐसे कार्य वहां करने चाहिए जिससे चारों ओर सुगंध फैल जाए। पिता द्वारा बार-बार दिए जाने वाले उपदेश हरिलाल को बहुत अच्छा नहीं लगता। वे आगे की पढ़ाई के लिए मई, 1911 में भारत आ गए। अहमदाबाद के एक स्कूल में उन्होंने दाखिला लिया। अपने से कम उम्र के बच्चों के साथ तालमेल बिठाने में उन्हें बहुत दिक्क़त आ रही थी। उन्होंने संकृत में पढ़ाई की लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी रुचि बदल गई और फ़्रेंच में दाखिला लिया। गांधी जी को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने हरिलाल को समझाया, लेकिन अब एक पिता के तौर पर नहीं एक मित्र के रूप में, लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। पिता और पुत्र में दूरी काफ़ी बढ़ चुकी थी। जिस तरह से हरिलाल अपने जीवन का रस्ता तय कर रहे थे, उससे भविष्य कोई सुनहरा नहीं लग रहा था।

दूसरे पुत्र मणिलाल :

गांधी जी के दूसरे पुत्र मणिलाल हरिलाल से चार साल छोटे थे। नियमित रूप से पढ़ाई न कर पाने का उन्हें भी मलाल था, लेकिन उनकी स्थिति हरिलाल से थोड़ी अलग थी। फिनिक्स के एक स्कूल में उनका दाखिला भी करा दिया गया था। जब हरिलाल सत्याग्रह की लड़ाई में व्यस्त थे तब उन्होंने भाभी गुलाब बहन के साथ मिलकर घर की और अस्वस्थ मां, कस्तूरबा की देखभाल भी की। जिन दिनों गांधी जी भी जेल में थे, जेल से मणिलाल को पत्र लिखा करते जिसमें तरह-तरह की हिदायतें होती थीं। जैसे संस्कृत और गणित पर सबसे अधिक ध्यान देना। संगीत का भी अध्ययन करना। घर के ख़र्चों का ठीक से हिसाब-किताब रखना। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की सीख तो होती ही थी। मणिलाल अपने कर्तव्यों के निर्वाह में तत्पर रहते। जब अलबर्ट वेस्ट बीमार पड़े, तो उन्होंने उनकी खूब देख-भाल की। गांधी जी का वेस्ट से परिचय दक्षिण अफ़्रीका के शुरुआती दिनों से ही था। दोनों की भेंट जोहान्सबर्ग के एक निरामिष भोजनालाय में हुई थी। बाद में 10पौंड के मासिक भुगतान पर उन्होंने इंडियन ओपिनियन का काम संभाला था। वेस्ट का जन्म इंगलैण्ड के लाउथ नामक गांव में एक किसान परिवार में हुआ था।

1909 के आखिरी दिनों में, जब हरिलाल जेल में थे, गांधी जी ने मणिलाल को भी सत्याग्रह आंदोलन के कूद पड़ने को कहा। ट्रांसवाल की सीमा को पार कर वे घर घर जाकर बिना लाइसेंस के फलों की फेरी लगाते। 14 जनवरी, 1910 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। कुछ दिनों की क़ैद के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। सीमा पार कर उन्होंने फिर से घर घर जाकर फलों की फेरी लगाना शुरू अर दिया। इस बार उन्हें तीन महीने की सज़ा हुई। मई, 1910 में रिहाई के बाद वे टॉल्सटॉय फर्म आ गए। साल 1912 के आते-आते उनके रहन-सहन में काफ़ी बदलाव आ गया। उनके कपड़ों, अंग्रेज़ों जैसा रहन-सहन और वेश-भूषा आदि में हुए परिवर्तन से गांधी जी ख़ुश नहीं थे। मणिलाल सारा जीवन पिता के आदेश को सम्मान दिया। एक बार गांधी जी ने इच्छा बताई थी कि मणिलाल का स्थान फीनिक्स में है। इसे शिरोधार्य कर वे अपना पूरा जीवन ‘इंडियन ओपिनियन’ और फीनिक्स आश्रम को समर्पित कर दिया। मणिलाल और उनकी पत्नी सुशीला ने ‘इंडियन ओपिनियन’ का संचालन वर्षों तक किया।

रामदास और देवदास :

जब परिवार फीनिक्स में रहने लगा तो रामदास और देवदास 9 और 6 साल के थे। घर में स्वावलंबन का वातावरण था, इसलिए ये बच्चे घर के काम में मदद करते थे। इस उम्र में पढ़ाई कैसी हो, इसकी उन्हें विशेष चिन्ता तो नहीं थी, लेकिन पिता के सादगी और निर्धनता के जीवन जीने की शैली से उन्हें कुछ परेशानी तो होती ही थी। भाभी गुलाब बहन उन्हें गुजराती पढ़ना-लिखना सिखाती थीं। जब परिवार टॉल्सटॉय फर्म रहने आया, तो यहां के रहन-सहन के साथ समझौता करने में उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सारा दिन उन्हें काफ़ी शारीरिक श्रम, जैसी ज़मीन की खुदाई, करना पड़ता। लेकिन इस तरह के काम में उन्हें काफ़ी आनन्द आता और उन्हें लगता वे एक अच्छे आदमी बन रहे हैं। पंद्रह वर्ष की छोटी उम्र में रामदास ने सत्याग्रह में भाग लेकर तीन माह की सज़ा पाई। जेल में किए जाने वाले अत्याचार के विरुद्ध उन्होंने उपवास भी रखा था। जेल में किए गए उनके व्यवहार, नम्रता, सरलता और दृढ़ता ने सबको चकित कर दिया। देवदास की कर्तव्यनिष्ठा और मेहनत करने की शक्ति गजब की थी। फीनिक्स में जब सभी बड़े लोग जेल में थे, तब 12-13 साल के देवदास ने पूरी जिम्मेदारी से प्रेस में काम किया और ‘इंडियन ओपिनियन’ का नियमित रूप से प्रकाशन ज़ारी रखा। वे विनोदी प्रकृति के इंसान थे।

जो शिक्षा अग्राह्य है, संस्कृति के लिए बाधक है, उसे नहीं देने के पक्ष में गांधी जी थे। अपने बच्चों की जिस तरह की परविश उन्होंने की वह सही था या ग़लत, यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन इसका मलाल उन्हें भी काफ़ी दिनों तक रहा। फिर भी अपने पुत्रों के प्रति उन्होंने अपनी क्षमता से भी अधिक किया। उन्होंने जान-बूझ कर उस तरह की शिक्षा का एक अंग होने से अपने पुत्रों को दूर रखा, जिसे वे बुराईयों से रहित नहीं मानते थे।

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

फ़ुरसत में ... 117 : अकेलापन

फ़ुरसत में ... 117

अकेलापन

मनोज कुमार

कभी-कभी हम ज़िन्दगी के ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं, जहां एक ओर हमें सामाजिक मर्यादाओं का ख़्याल रखना पड़ता है तो दूसरी तरफ़ अपने कर्तव्यों को भी अंजाम देना पड़ता है। ऐसे में हमारे दिल और दिमाग़ की रस्शाकशी चल रहा होता है और उस रस्साकशी में हमारा ख़ुद का दम घुट रहा होता है। ऐसे में अपने विवेक का सहारा लेकर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना एक तनी रस्सी पर चलने के समान होता है, जिसके एक तरफ़ खाई होती है तो दूसरी तरह कुंआ और हम होते हैं तन्हा। ऐसे तन्हा यानी अकेले लोगों के लिए जहां एक तरफ़ हिंदी की लोकोक्ति होती है, “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता” वहीं दूसरी तरफ़ गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर का संदेश होता है, -

जोदि तोर डाक शुने केउ ना आसे

तबे एकला चलो रे,

एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।

इन दो विचारधाराओं के बीच, गहराती रात को नींद नहीं आ रही होती है, तब बिस्तर से उठ बारामदे में टहलते हुए सामने के वृक्ष की शाखाओं के ऊपर नज़र जाती है। देखता हूं एक चिड़ियां दुबकी पड़ी है। उसका अकेलापन मुझे आकर्षित करता है। उसे इस तरह अकेले देख मेरे मन में ख़लील ज़िब्रान की पंक्तियां कौंधती हैं –

“हे रात्रि! तू प्रेमियों की सखी, एकान्तवासियों की सुखदात्री और असहायों का आतिथ्य करने वाली है।”

इस चिड़ियां में अंतिम (आतिथ्य) वाला गुण तो मुझे नहीं लगा, हां पहले दो कारण हो सकते हैं। साथी से बिछुड़ा यह पाखी है या ठुकरा दिया गया, कहना मुश्किल है। हम अपने आसपास भी पाते हैं कि कई बार आपस में तकरार बढ़ जाने पर कुछ लोग अपने जीवन साथी से अलग रहने लगते हैं। इसी लिए कहा गया है – “व्यर्थ बोलने की अपेक्षा मौन रहना ज़्यादा अच्छा है”। कई लोगों को रूठने की आदत-सी होती है। ऐसे लोग रूठते हैं और अलग रहने लगते हैं ... और मन को भरमाने के लिए कहते हैं – मैं अकेलापन एन्ज्वाय कर रहा हूं। अरे! यह रूठना भी कोई रूठना है लल्लू!

रूठने का लुत्फ़ यह है, रूठिए, मान जाइए

रूठते हैं आप, लेकिन रूठना आता नहीं।

हमारे एक रिश्तेदार दम्पत्ति एक-दूसरे से रूठे और पिछले दो सालों से अलग रह हैं। कौन पहल करे की फांस लग गई है दोनों में। ऐसे लोगों के लिए राजस्थान की यह कहावत काफ़ी मायने रखती है – “मित्र इतना ही मान करो जितना आटे में नमक होता है। बार-बार रूठने पर आख़िर तुझे मनाता कौन रहेगा?”

आज वे बेचारे बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हैं। किसी के साथ रिश्ते का महत्व यह नहीं है कि कोई उसके साथ होने से कितनी खुशी महसूस करता है बल्कि उसके नहीं रहने से कितना ख़ालीपन महसूस करता है, कितना अकेलापन महसूस करता है। मैंने पूछा ऐसी नौबत क्यों आई? बोले “वो बात-बात में मेरी ग़लती निकालती रहती है।” मैंने कहा “तो क्या हुआ? एक बात जान लो - इस संसार में ग़लतियां तो हर कोई करता है, पर सिर्फ़ बीवी और बॉस को हक़ है कि वे उन्हें ढूंढ़ निकालें, याद रखें और समय-समय पर उसके बारे में बताते रहें।

इस तरह के अकेलेपन का मुख्य कारण वाद से उत्पन्न विवाद है। इस लिए कहा गया है कि कम ही बोलो। वैसे भी “न्यून वाणी मूर्खों की समझ में नहीं आती और अधिक बोलना विद्वानों को उद्विग्न करता है।” इसलिए कोशिश यही हो कि प्रिय वचन बोला जाए। “प्रिय वचन बोलने से सब प्राणी संतुष्ट हो जाते हैं, अतः प्रिय ही बोलना चाहिए। वचन में क्या दरिद्रता।”

जाते-जाते शेख़ सादी की बात आपके सामने रखता जाऊं – “दो चीज़ें बुद्धि की लज्जा हैं – बोलने के समय चुप रहना और चुप रहने के समय बोलना।” आख़िर –

कुछ न कहना भी किसी के सामने

इक तरह का इन्किशाफ़े-राज़1 है। 1= रहस्य का उद्घाटन

अब मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है। इसलिए विराम देता हूं क्योंकि चार्ल्स कैलब काल्टन ने कहा है – Whenyou have nothing to say, say nothing.’’

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और अब एक कविता ...

रैन बसेरा ...!

--- --- मनोज कुमार

पाखी ! यहां न कोई तेरा !

तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,

भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,

और अकेला खड़ा विजन में,

नित देखे तू सांझ – सवेरा ।

पाखी ! यहां न कोई तेरा !

सरसिज पर क्रीड़ा मराल की,

लहरें चूमें तृषा डाल की।

तेरे भी कुछ सपने होंगे

चिर-स्नेही हो कोई मेरा।

पाखी ! यहां न कोई तेरा !

सबके साथी अपने-अपने,

देख रहे सब सौ-सौ सपने

तुमको मिला न कोई साथी,

करे यहां जो रैन बसेरा ...! ! ।

पाखी ! यहां न कोई तेरा !

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