राष्ट्रीय आन्दोलन
483. कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न
1947
हिन्दू-मुस्लिम एकता के
लिए गांधीजी ने बार-बार लोगों को समझाया कि भारत के लोगों को अपने कार्यों से सिद्ध
करना होगा कि सीमा के उस पार पाकिस्तान में कुछ भी हुआ करे, हम तो अपने मुसलमान भाइयों
के साथ बिलकुल निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार ही करेंगे। गांधीजी ने कहा, “जैसे न्यायपूर्वक किसी
इस्लामी राज्य में ग़ैर-मुसलमानों पर मुसलिम क़ानून नहीं थोपा जा सकता, उसी तरह किसी
हिन्दू राज्य में ग़ैर-हिन्दुओं पर हिन्दू क़ानून नहीं लादा जा सकता।”
राष्ट्रभाषा के सवाल पर
भी झगड़े हो रहे थे। कुछ लोग यह मानते थे कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही होनी चाहिए
और उसकी लिपि देवनागरी। गांधीजी ने कहा, “मैं ऐसा प्रस्ताव नहीं
मान सकता। भारत जितनी हिन्दुओं की मातृभूमि है उतनी ही मुसलमानों की भी। इसलिए भारत
की राष्ट्रभाषा सादी हिन्दी और सादी उर्दू का सुमेल अर्थात हिन्दुस्तानी ही हो सकती”
मुसलिम लीग का जो पहले
नारा था, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’, अब बदल कर ‘हंस के लिया है पाकिस्तान,
लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ में बदल गया था। उनकी नज़र मुसलिम संस्कृति के केन्द्र
दिल्ली, आगरा, अजमेर और अलीगढ़ पर थी। इसलिए ग़ैर मुसलिमों में भय और आशंका था कि मुसलमान
धोखा देने वाले काम कर सकते हैं। गांधीजी ने कहा, “कुछ भी हो जाए, कांग्रेसी
सरकार धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध भेदभाव नहीं रख सकती। संदेह से प्रेरित होकर
हमें काम नहीं करना चाहिए। विश्वास के बिना संसार का काम नहीं चल सकता। यदि अल्पसंख्यक
लोग धोखा देने का काम करेंगे, तो राज्य उनके ख़िलाफ़ काम करेगा।”
गांधीजी पर मुसलमानों
के पक्षपात के आरोप लगते रहते थे। आने वाले अधिकाँश पत्रों में गालियां भरे होते
थे। मनु को धमकी दी गई कि वह यदि उसने प्रार्थना सभा में क़ुरान की आयतें पढ़ी, तो उसे जान से मार दिया जाएगा। गांधीजी को कहा गया कि “जो बात आप मुझसे कहते
हैं, वही बात आप मुसलमानों से क्यों नहीं कहते?” गांधीजी ने जवाब दिया, “वे आज मुझे अपना दुश्मन समझते हैं। हिन्दू मुझे अपना
दुश्मन नहीं समझते। इन प्रार्थना सभाओं में आपको रोज़ कौन सी शक्ति मिलती है। कोई
ज़बरदस्ती नहीं है। फिर भी आप चले आते हैं और मेरी बात धीरज से सुनते हैं। वह
शक्ति आपका मेरे प्रति प्रेम है। इसीलिए मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपने हथियार
समुद्र में फेंक दें और वीरों की अहिंसा की अनूठी शक्ति को समझें।” सत्याग्रह के विज्ञान
में केवल उसके नियम के प्रतिपादन की ही बात नहीं आती। उसमें ऐसी कार्य-पद्धतियां सोच
निकालने की बात भी शामिल हैं, जिनके द्वारा आम लोगों
को अपनी दैनिक समस्याएं हल करने के लिए सत्याग्रह का प्रयोग करना सिखाया जा सके।
धीरे-धीरे गांधीजी एक ऐसी ही शक्ति के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे थे।
ऐसा नहीं था कि केवल हिन्दू
ही उनपर पक्षपात के आरोप लगते थे। मुसलमान भी कुछ ऐसा ही सोचते थे। गांधीजी के कांग्रेसी
साथी सतारुढ़ थे। वे उनसे अपेक्षा रखते थे कि गांधीजी पटेल आदि से कहकर उनके हित में
कुछ करवा दें। गांधीजी को सावधानी रखनी पड़ती थी। गांधीजी नैतिक दृष्टिकोण रखते थे।
समस्याओं के बारे में शुद्ध नैतिक दृष्टिकोण सरकारी दृष्टिकोण से भिन्न होता है। प्रशासन
को लोकमत साथ लेकर चलना पड़ता है। परन्तु गांधीजी तो सुधारक थे, सुधारक लोकमत से बहुत
आगे जा सकता है। गांधीजी के साथी सरकार के सदस्य थे। वे व्यावहारिक मनुष्य थे। गांधीजी
अतिरिक्त सावधानी बरतते कि उनके मार्गदर्शन में हस्तक्षेप की गंध न आए। खाकसारों का
एक वर्ग था, जिसने ‘कराची से कलकत्ते तक अखंड पाकिस्तान’ की मांग की थी। इस
समूह ने जिन्ना के ख़िलाफ़ भी हिंसक प्रदर्शन किया था। उन्होंने दिल्ली के अधिकारियों
से झगड़ा मोल ले लिया था। गांधीजी ने उन्हें समझाया, तो वे गांधीजी से नाराज़ हो गए और
बोले, “आप दिखावे के लिए प्रार्थना सभाओं में क़ुरान का पाठ करवाते हैं। राजनीतिक मामलों
पर जो आपके उद्गार होते हैं, उसमें मुसलमानों के विरुद्ध कटुता और बदले की भावना भरी
होती है। अब तो यह साबित हो गया है कि आप भारत के दस करोड़ मुसलमानों के दुश्मन हैं।
बिहार में जो हत्याकांड हुए हैं, वे सब आपके निर्देश से हुए हैं।”
7 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना
ने डकोटा विमान से दिल्ली से पाकिस्तान के कराची शहर के लिए उडान भरा। जब विमान
टेक-ऑफ कर रहा था तो उसने कहा, “मुझे लगता है मैं
आखिरी बार दिल्ली को देख रहा हूँ। अब लगता है यह अध्याय समाप्त हुआ।” कराची एयरपोर्ट पर दस
हज़ार लोग उसके स्वागत के लिए खड़े थे। जिन्ना उत्साह और जोश से भर गया। बहन फातिमा
के साथ कार से खुशियाँ मानते लोगों के बीच से वह कराची के गवर्नमेंट हॉउस के लिए
निकला। पहुँचने के बाद उसने अपने सहायक से कहा, “मैंने कभी अपने जीवन में पाकिस्तान के बन जाने की उम्मीद नहीं की थी।”
वह पाकिस्तान का पहला गवर्नर
जनरल बना और लॉर्ड माउंटबेटन भारत का। वह दिन सोमवार का था। किंग जॉर्ज-VI के आदेश के मुताबिक माउंटबेटन और जिन्ना की नियुक्ति 15 अगस्त से प्रभावी होनी थी। लॉर्ड माउंटबेटन को भारतीय नेताओं ने संघ के प्रथम गवर्नर
जनरल के पद पर चुना था। उसके अंग्रेज़ होने के कारण कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। गांधीजी
ने इस चुनाव का समर्थन किया था। बोले, “इस कदम से यह साबित होता
है कि हम सब प्रकार के पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर अपने कल तक के विरोधियों पर विश्वास
रखने की बहादुरी दिखा सकते हैं। वे राज्य के जहाज को अशांत सागर से पार लगाने के लिए
विशेष योग्य हैं।” गांधीजी का इतना बोलना
था कि एक अफ़वाह उड़ा दी गई कि कनाडा जैसे उपनिवेशों के झंडों की तरह भारत के झंडे में
भी यूनियन जैक रहेगा। गांधीजी ने कहा, “जहां शौर्य और आदर व्यक्त
करना उचित हो, वहां हमें इन दोनों गुणों का परिचय देना ही चाहिए। यूनियन जैक ने कोई
अपराध नहीं किया है। ग़ुलामी की अवधि के दौरान भारत के साथ जो अन्याय हुआ वह ब्रिटिश
अधिकारियों ने किया था। अब वे जा रहे हैं।” बाद में यह अफ़वाह निराधार
साबित हुई।
दक्षिण भारत में द्राविड़िस्तान
की मांग को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ भाषा-भाषी के लिए
अलग-अलग राज्यों की मांग उठी। हालांकि गांधीजी भाषावार राज्यों के पुनर्गठन के पक्ष
में थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि यह आंदोलन देश को छिन्न-भिन्न करने वाला कोई बड़ा
आंदोलन बन जाए। इसलिए उन्होंने कहा, “क्या आप चाहेंगे कि आपके
बारे में यह कहा जाए कि आप ग़ुलामी में ही एक राजनीतिक प्रणाली के योग्य थे? स्वतंत्र
होने पर आप ग़ुलामों की भांति अलग-अलग गुटों में बंट जाएंगे और प्रत्येक गुट अपनी डफली
अलग ही बजाएगा?”
गांधीजी ने कांग्रेस को तिरंगा झंडा दिया था, जिसमें बीच
में चरखा था। आज़ादी मिलने के बाद एक नया झंडा स्वीकार किया गया, जिसमें चरखे की जगह
अशोक स्तंभ का धर्मचक्र रख दिया गया। एक कांग्रेसी नेता ने अपने भाषण में कहा, “चरखे और अशोक चक्र में
कोई साम्य नहीं है। चरखा अहिंसा का प्रतीक है। नए झंडे में सुदर्शन चक्र है, जो हिंसा
का प्रतीक है।” गांधीजी ने कहा, “संशोधित चक्र में तकेय
और मालका न होना कोई दोष नहीं माना जाना चाहिए। कुछ लोगों को इस चक्र के द्वारा शांति
सम्राट अशोक की याद आएगी, जिन्होंने साम्राज्य की स्थापना की परन्तु जो अंत में वैभव
और सत्ता का परित्याग करके लोगों के हृदय सम्राट बन गए और सब धर्मों के प्रतिनिधि हो
गए।”
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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