मंगलवार, 2 सितंबर 2014

बादल








बादल
- करण समस्तीपुरी

१.
भर अंबर में
रोर मचाए
प्यासी वसुधा
को तरसाए
चमक-दमक के
आश जगाए
ना बरसाए जल
ओ छलिया बादल। 

२.
गई जेठ की
तप्त दुपहरी
सावन रीता
बिन हरियरी
काना, हस्ती
गए स्वाती
चले न अब तक हल
ओ बेसुध बादल।

३.
भादों भद्रा
गई किसानी
का वर्षा जब
कृषी सुखानी
फटा कलेजा
रोए धरती
खेत रहे हैं जल
आफ़त-1ओ निर्मम बादल।

४.
पूरबा डोले
पछुआ डोले
चमके बिजुरी
बदरा बोले
झिर-झिर झीसी
छम-छम बारिस
अवनी हुई सजल
ओ प्यारे बादल।
५.
बजी बैल के
गले में घंटी
कजरी गाए
रहीं कलकंठी
दादुर मोर
पपीहा बोले
विहँस पड़े शतदल
मतवाले बादल।

६.
ताल तलैय्या
भर गया पानी
भयी धरा की
आँचल धानी
अन्न-धन-जीवन
आएगा घर
आँगन रहा मचल
सुखदायी बादल।
७.
दामिनि दमक
रही नभ माहीं
घर में फूटी
कौड़ी नाहीं
सोच-सोच
बाबा के माथे
पड़े हुए हैं बल
बौराए बादल।

८.
थोड़े-बहुत
बचे हैं दाने
ढक आँचल
माँ चली भुनाने
गीली लकड़ी
फ़ू-फ़ू करके
आँख रही है मल
ओ निष्ठुर बादल।

९.
मूसलाधार
बरसता गर-गर
बिजली काँप
रही है थर-थर
माटी का घर
फूस का छप्पर
जाए कहीं न गल
प्रलयंकर बादल।

१०.
आँगन आँगन
पानी पानी
है कागज़ की
नाव चलानी
बच्चे बोलें
बरखा रानी
आ जाना फिर कल
बलिहारी बादल।
११.
घर-घर गूँजे
राग मल्हार
द्वारे-द्वारे
तीज त्यौहार
बिन प्रीतम
कैसा श्रृंगार
विरही मन घायल
ओ बैरी बादल।

१२.
शूल चुभाए
सावन राती
मैं जलती
दीपक बिन बाती
पहुँचा दो
प्रियतम को पाती
मौसम गया बदल
निर्मोही बादल।

१३.
बिन चंदा के
रात अमावस
बिन मितवा के
कैसा पावस?
वर्षा में वह
कैसे आएँ
रुक जाओ दो पल
हरजाई बादल।

१४.
तुम हो
जीवनदायी बादल
अति हो
आतातायी बादल
जग से तेरी
मिताई बादल
करो न कभी
ढिठाई बादल
इतना बरसो
कि मन हरसे
जीवन रहे सरल
ओ नीले बादल।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बादल की सार्थकता इसी में है कि वह इतना बरसे कि मन हरसे और जीवन सरल बने ।

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-01-2015) को गणतंत्र दिवस पर मोदी की छाप, चर्चा मंच 1872 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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