मंगलवार, 12 नवंबर 2019

12 नवम्बर राष्ट्रीय पक्षी दिवस


12 नवम्बर राष्ट्रीय पक्षी दिवस

मनोज कुमार

Image result for सालिम अली का जीवन परिचयप्रत्येक वर्ष 12 नवम्बर को भारत के मशहूर पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी डॉ. सालिम अली के जन्मदिवस के अवसर पर राष्ट्रीय पक्षी दिवसमनाया जाता है।
डॉ. सालीम अली का पूरा नाम डॉ. सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली है। वे एक भारतीय पक्षी विज्ञानी, वन्यजीव संरक्षणवादी और प्रकृतिवादी थे, जिन्हें बर्ड मैन ऑफ़ इंडियाके रूप में भी जाना जाता है। वह भारत और विदेशों में व्यवस्थित पक्षी सर्वेक्षण करने वाले पहले वैज्ञानिकों में से एक थे। डॉ.सलिम अली का जन्म 12 नवम्बर 1896 में बॉम्बे के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता के सबसे छोटे और नौंवे बच्चे थे। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निशा की भी मृत्यु हो गई। सालीम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा द्वारा मुंबई की खेतवाड़ी इलाके में हुआ।
सालीम की प्राथमिक शिक्षा गिरगाम स्थित ज़ेनाना बाइबल और मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, बॉम्बे से आगे की शिक्षा ग्रहण की। बचपन मे वे गंभीर सिरदर्द की बीमारी से पीड़ित हुए, जिसके कारण उन्हें उन्हें अक्सर कक्षा छोड़ना पड़ता था। किसी ने सुझाव दिया कि सिंध की शुष्क हवा से शायद उन्हें ठीक होने में मदद मिले इसलिए उन्हें अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध भेज दिया गया। वे लंबे समय के बाद सिंध से वापस लौटे और वर्ष 1913 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के वोलफ्रेम (टंग्सटेन) माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा (टेनासेरिम) चले गए। यह स्थान सालीम की अभिरुचि में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता।
लगभग 7 साल बाद सलीम अली मुंबई वापस लौट गए और बंबई से उन्होंने जंतु विज्ञान में पक्षी शास्त्री विषय में प्रशिक्षण का एक कोर्स किया और फिर बंबई के नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटीके म्यूज़ियम में गाइड के पद पर नियुक्त हो गये। गाइड के रूप में वह मरे हुए सुरक्षित पक्षियों को दर्शकों को दिखाते और उनके विषय में बताते। इस कार्य के दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि पक्षियों के विषय में पूरी जानकारी तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके रहन-सहन को नजदीक से देखा जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह जर्मनी गए और विश्वविख्यात पक्षी विज्ञानी डॉक्टर इर्विन स्ट्रॉसमैन के संपर्क में आएँ। जर्मनी में उन्होंने उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया। सलीम अली ने बर्लिन में कई प्रमुख जर्मन ऑर्निथोलॉजिस्टों से परिचय किया और उनसे साथ बर्ड वेधशाला में कार्य किया।  जब एक साल बाद भारत लौटे तब पता चला कि उनकी गैरहाजिरी में संग्रहालय के गाइड की नौकरी समाप्त हो गई थी। सौभाग्यवश माहिम मे उनकी पत्नी तहमीना अली का एक छोटा-सा मकान था। वह उसी में जाकर रहने लगे।
उनके घर के अहाते में एक पेड़ था, जिस पर बया ने एक घोंसला बनाया था। सारे दिन वे पेड़ के नीचे बैठे रहते और बया के क्रिया-कलापों को एक नोट बुक में लिखते रहते थे। बया के क्रिया-कलापो और व्यवहार को उन्होंने एक शोध निबंध के रूप में प्रकाशित कराया। सन 1930 में छपा यह निबंध पक्षी विज्ञान में उनकी प्रसिद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इसके बाद वे जगह-जगह जाकर पक्षियों के विषय में जानकारी प्राप्त करने लगे। इन जानकारियों के आधार पर उन्होने ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्डसलिखी जो सन 1941 में प्रकाशित हुई।  यह आम आदमी के बीच एक लोकप्रिय पुस्तक के रूप में स्थापित हो गई और इस पुस्तक ने रिकॉर्ड बिक्री की। इस पुस्तक में पक्षियों के विषय में अनेक नई जानकारियां प्रस्तुत की गई थी। इसमें पक्षियों की उपस्थिति, आवास, प्रजनन आदतों, प्रवासन आदि शामिल हैं। इस पुस्तक से उन्हें एक पक्षी शास्त्रीके रूप में पहचाना मिली। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी पुस्तक हैण्डबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एण्ड पाकिस्तानभी लिखी। डॉ सालीम अली ने एक और पुस्तक द फाल ऑफ़ ए स्पैरोभी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र किया है।
10 साल की उम्र में एक चिड़िया को मार गिराने पर पक्षियों को लेकर सालिम अली के मन में दिलचस्पी जागी और आगे चलकर वे एक पक्षी विज्ञानी बने। उन्होंने पेड़ पर बैठे एक पक्षी को नकली पिस्टॉल से मार गिराया था। वह उस पक्षी को उठाकर अपने चाचा के पास पहुंचे। पक्षी के गले पर पीला धब्बा देखकर वे चौंक पड़े। चाचा अमीरुद्दीन भी पक्षी को पहचान न सके। तो उसे वे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटीके ऑफिस ले गए जहां उनके जानकार डब्ल्यू.एस मिलार्ड थे जो पक्षी विशेषज्ञ थे। मिलार्ड ने बालक को कुछ नहीं बताया और उसे उस कमरे में ले गए जहां मृत पक्षियों का भूसा भर कर रखा गया था। उन्होंने उसे सभी पक्षियों को दिखाया, किंतु उन में उस जैसा एक भी पक्षी नहीं था, फिर मिलार्ड ने वैसा ही एक पक्षी दिखाया जैसा सालिम अली के हाथ में था। यह पक्षी नर बया था जिसके गले पर वर्षा ऋतु मे ही पीला धब्बा बनता है। अली को विभिन्न पक्षी देख कर आश्चर्य भी हुआ और उनके प्रति जिज्ञासा भी। वे उस विभाग पर पक्षियों के बारे में ज्ञान बढ़ाने आने लगे तथा उनकी रक्षा व अन्य जानकारियां के बारे में सोचने लगे।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बी.एन.एच.एस) के सचिव डबल्यू.एस मिलार्ड की देख-रेख में सालिम ने पक्षियों पर गंभीर अध्ययन करना शुरू किया, जिन्होंने असामान्य रंग की गौरैया की पहचान की थी। उन्होंने सालीम को कुछ किताबें भी दी जिसमें कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबईभी शामिल थी। मिल्लार्ड ने सालीम को पक्षियों के छाल निकालने और संरक्षण में प्रशिक्षित करने की पेशकश भी की। उन्होंने ने ही युवा सालीम की मुलाकात नोर्मन बॉयड किनियर से करवाई, जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में प्रथम पेड क्यूरेटर थे। सलीम की प्रारंभिक रूचि शिकार से संबंधित किताबों पर थी जो बाद में स्पोर्ट-शूटिंग की दिशा में आ गई जिसमें उनके पालक-पिता अमिरुद्दीन ने उन्हें काफी प्रोत्साहित भी किया। उनके आस-पड़ोस में अक्सर शूटिंग प्रतियोगिता का आयोजन होता था।
डॉ सालीम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सालीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली परिंदों की ज़ुबान समझते थे। उन्होंने पक्षियों के अध्ययन को आम जनमानस से जोड़ा और कई पक्षी विहारों की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों के बारे में अध्ययन के लिए देश के कई भागों और जंगलों में भ्रमण किया। कुमाऊँ के तराई क्षेत्र से डॉ अली ने बया पक्षी की एक ऐसी प्रजाति ढूंढ़ निकाली जो लुप्त घोषित हो चुकी थी। साइबेरियाई सारसों की एक-एक आदत की उनको अच्छी तरह पहचान थी। उन्होंने ही अपने अध्ययन के माध्यम से बताया था कि साइबेरियन सारस मांसाहारी नहीं होते, बल्कि वे पानी के किनारे पर जमी काई खाते हैं। वे पक्षियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते थे और उन्हें बिना कष्ट पहुंचाए पकड़ने के 100 से भी ज़्यादा तरीक़े उनके पास थे। पक्षियों को पकड़ने के लिए डॉ सलीम अली ने प्रसिद्ध गोंग एंड फायरडेक्कन विधिकी खोज की जिन्हें आज भी पक्षी विज्ञानियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। भरतपुर पक्षी अभयारण्य’ (केओलदेव राष्ट्रिय उद्यान) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने साइलेंट वैली नेशनल पार्कको बर्बादी से बचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सालिम अली हमारे देश के ही नहीं बल्कि दुनिया भर के पक्षी वैज्ञानिक के रूप में प्रसिद्ध हुए। पक्षियों के लिए सर्वे करने वाले वो हिंदुस्तान के शुरुआती लोगों में हैं। सालिम अली ने पक्षियों के सर्वेक्षण के लिए 65 वर्ष से भी अधिक समय तक समस्त भारत देश का भ्रमण किया। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष भारतीय पक्षियों के साथ बिताए। परिंदों के विषय में इनका ज्ञान इतना अधिक था कि लोग उन्हें परिंदों का चलता-फिरता विश्वकोश कहने लगे थे। उन्होंने पक्षियों का अध्ययन ही नहीं किया बल्कि प्रकृति संरक्षण की दिशा में भी बहुत काम किया। उन्हें 5 लाख रुपया का अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी को समर्पित कर दिया। उन्हें सन 1958 में पद्म भूषण व 1976 में पद्म विभूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी। सलीम अली 1967 में ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट यूनियन के स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले पहले गैर-ब्रिटिश नागरिक थे। उन्हें 1969 में नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ के जॉन सी फिलिप्स स्मारक पदक प्रदान किया था। 1973 में, यू.एस.एस.आर. एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज ने उन्हें पावलोवस्की शताब्दी मेमोरियल पदक प्रदान किया गया।
डॉ. सालिम अली प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। उनका निधन 91 साल की उम्र में 27 जून 1987 को 91 साल की उम्र में हुआ। 1990 में इनके नाम पर बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटीऔर पर्यावरण एवं वन मंत्रालयद्वारा कोयम्बटूर के निकट अनाइकट्टीनामक स्थान पर सलिम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र स्थापित किया गया।

शनिवार, 9 नवंबर 2019

सुदामा पाण्डेय धूमिल के जन्म दिन पर


सुदामा पाण्डेय धूमिल के जन्म दिन पर
Image result for सुदामा पाण्डेय धूमिल
जन्म : वाराणसी जनपद के एक साधारण से गांव खेवली में 9 नवम्बर, 1936 को।
मृत्यु : 10 फरवरी, 1975, लखनऊ।
शिक्षा : आई.टी.आई.
वृत्ति : प्रांतीय सरकारी नौकरी

सुदामा पाण्डेय धूमिल का प्रथम काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ था। इसमें ‘कविता’ शीर्षक रचना अपेक्षाकृत धूमिल की यह छोटी कविता है। यह ‘कविता’ उनके नये अंदाज़, कविता के प्रति उनकी गहरी सोच को अभिव्यक्त करती है। इस कविता में कवि संवेदना और अभिव्यंजना के संकटों की पहचान करता है। शब्दों की खोती हुई ताकत के कारण कविता रचने का काम कठिन होता जा रहा है। भाषा और मनोभाव की जिस पवित्र आत्मीयता से कविता रची जाती है, वे संबंध-सूत्र जीवन से लगातार टूट रहे हैं। कवि की दृष्टि में कविता की उत्पत्ति जिस मनः स्थिति में हुई थी और जिस सार्थक उद्देश्य से उसका सरोकार था, वह पूरी तरह उससे कट गई है। 

भाषा और अर्थ का आपसी संबंध सामाजिक जीवन की आधारशिला पर टिका होता है। सामाजिक जीवन में व्यक्ति अकेला होता जा रहा है, इसलिए कविता भी संक्षिप्त एकालाप बनकर रह गई है। उसमें बौखलाए हुए आदमी का आक्रोश है लेकिन एक प्रकार की विवशता से वह ग्रस्त है। वास्तव में साठोत्तरी कविता नवीन काव्याभिरुचि, नवीन सौन्दर्यबोध तथा नये संवेदन की कविता है। वह मुख्यतः साधारण आदमी की पहचान और उस पहचान की तलाश की कविता है। जब कवि यह कहता है - 

उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे
कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं
और हत्या अब लोगों की रूचि नहीं
आदत बन चुकी है
तो कविता की वर्तमान दशा पर स्वयं कविता की यह सोच कितना भेदक है। आज जिस तरह असलियत को शब्दों की ओट में दिखाया जाता है, उससे स्पष्ट है कि कविता की चिन्ता जनकल्याण न होकर उन चेहरों को छिपाना हो गया है, जिन्हें नंगा किया जाना चाहिए। पोल खोलने के नंगेपन को धूमिल वर्तमान वस्तु-स्थिति में अनिवार्य मानते हैं। इसी से कविता की हत्या हो रही है। अब हत्या करना रुचि नहीं आदत बन गई है। कविता का यह दुरुपयोग खुद कविता को ही खलता है। स्पष्ट है कि धूमिल समकालीन कविता के अपने मूल उद्देश्य आदमी होने की पहल से भटकने को लेकर चिन्तित हैं। दुराव आदमी के चरित्र का सबसे घातक पहलु है और कविता आज उसी शगल में फंस गई है।

धूमिल कविता के उद्भव के आदि स्रोत के रूप में ‘गंवार की ऊब’ को मानते हैं। वे कविता को उसके मूल सरोकार से जोड़कर देखते हैं, केवल मनोरंजन से नहीं। आदिम श्रम से ऊबे लोगों ने कविता को अपनी ऊब के लिए खोजा था, ताकि ऊब को सक्रियता दी जा सके। उसे जीवन-संघर्ष में अग्रसर करने का मनोबल दे। पढ़े-लिखे और शहरी संस्कृति में पलने वाले लोगों की करामात से ही कविता यथार्थ परिदृश्य को ओझल कर दुराव के तहत अपनी जड़ से कट चुकी है।

धूमिल की कविता को गहराई तक समझने के लिए उनके कविता संबंधी दृष्टिकोण को जानना निहायत ज़रूरी है। उनकी सृजन प्रक्रिया के संबंध में काशीनाथ सिंह के शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा जा सकता है कि वे कविता करते नहीं थे, बनाते थे। पहले उनके दिमाग में समस्या आती थी और वे उसकी पूर्ति ऊपर की तीन या सात पंक्तियों से करते थे। उनके दिमाग में जुमले आते थे और ये जुमले कभी तो उनके उपजाऊ दिमाग की उपज होते थे और कभी उन्हें लोगों की बातचीत से हासिल होते थे। इस प्रकार का जुमले ‘कविता’ में भी देखा जा सकता है, जैसे –
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है
साठोत्तरी दशक में धूमिल पहला ऐसा कवि हैं, जिन्होंने सबसे अधिक कविताएं ‘कविता’ के बारे में लिखी है। वे इस बात का प्रमाण हैं कि धूमिल कविता के भविष्य, कविता की सार्थकता को लेकर कितने चिंतित थे। उन्होंने हिंदी कविता को एक नयी भाषा दी है। उन्होंने अनुभव किया कि कवि का पहला काम कविता को भाषाहीन करना है। साथ ही वे मानते थे कि अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से उसे मुक्त करना है। इसके कारण कविता की स्थिति उस औरत जैसी हास्यास्पद हो जाती है, जिसके आगे एक बच्चा हो, गोद में एक बच्चा हो और एक बच्चा पेट में हो। प्रतीक, बिम्ब जहां सूक्ष्म सांकेतिकता और सहज सम्प्रेषणीयता में सहायक होते हैं वहीं अपनी अधिकता से कविता को ग्राफिक बना देते हैं। आज महत्व शिल्प का नहीं कथ्य का है। सवाल यह नहीं कि आपने किस तरह कहा है, सवाल यह है कि आपने क्या कहा है? इससे स्पष्ट है कि धूमिल पच्चीकारी और अनावश्यक बिम्बों और प्रतीकों से कविता को मुक्त करना चाहते थे। स्पष्ट है ऐसी भाषा कविता और पाठक के बीच दीवार बनकर खड़ी होती है, धूमिल कविता को भाषाहीन करके इसी दीवार को तोड़ते नज़र आते हैं।
इस काव्ययात्रा की शुरुआत धूमिल के आत्मसंघर्ष से होती है। आदमी होने का उनका अपना अनुभव जो कुछ रहा, उसे उन्होंने कविता में अभिव्यक्त किया है। धूमिल वैयक्तिक अनुभवों को निर्वैयक्ति बनाकर पेश करते हैं। उनका काव्य-सरोकार आत्मकेन्द्रित न होकर सर्वात्म केन्द्रित है। उनकी कविता आदमी की आज़ादी के संघर्ष की कविता है, उसे किसी विशिष्ट काव्य मानदण्ड पर तौलना उसका अपमान होगा। इसलिए उनकी कविता निर्वैयक्तिक कही जाएगी क्योंकि उसमें उनका आत्मविसर्जन तो नहीं हुआ है, पर वह आत्म आम आदमी के आत्म का पर्याय अवश्य बन गया है। वे आत्मसंवेदना को विचार से जोड़कर ही उसे रचनात्मकता का दर्ज़ा देते हैं। 

धूमिल जब कहते हैं कि ‘कविता हर तीसरे पाठ के बाद धर्मशाला जो जाती है’, तो उनका आशय स्पष्ट है कि पाठ-प्रक्रिया के दुहराव के बाद उसमें नये अर्थसंधान का आकर्षण समाप्त हो जाता है। उन्हें दुख यह भी है कि
शब्दों के पीछे / कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं / आदत बन चुकी है। -
“इस लिए गँवार आदमी की ऊब से पैदा हुई कविता एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ / शहर में चली गई।” क्योंकि गाँव में रहकर संघर्ष करना पढ़े-लिखे नफ़ासत जीवन जीने के लोलुप आदमी के लिए आसान नहीं है। इस तरह शहरीकरण पर कविता के माध्यम से की गई यह टिप्पणी उन लोगों पर गहरा व्यंग्य है, जो सुविधाभोग के स्वार्थ में अपनी ज़मीन को ही भूल जाते हैं। ऐसे लोग ही उस कविता को भी अपनी ज़मीन से उखाड़कर शहर में स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। उनकी कविता पर धूमिल का व्यंग्य उल्लेखनीय है - 
नहीं अब वहाँ कोई अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
ये तस्कर संकेत उन प्रतीकों और उपमानों की ओर संकेत हैं, जिन्होंने गोल-गोल शब्दावली में वास्तविक अनुभव को दरकिनार कर दिया है। तभी धूमिल नए कवि को सलाह देते हैं
हाँ, हो सके तो बगल से गुज़रते हुए आदमी से कहो
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,
यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था
कविता को आदमी को उसकी पहचान देना है, जो सामयिक भीड़ में कहीं खो गया है। धूमिल की आदमी से यह सम्बद्धता इसलिए आ पायी है कि वे उसी की तरह ज़िन्दगी के संघर्ष में उसके हिस्सेदार हैं। भाषा में आदमी होने की तमीज़ से उनका आशय नगरीय-बोध से जुड़ी सभ्यता नहीं, वह आदिम संस्कार है जो उसकी अपनी पहचान है। वे आदमी को सांचे में ढालने की अपेक्षा उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, जिसके तहत वह अपने ढंग से जीवन संघर्ष करने में सफल हो सकता है। इसके अभाव में वह भीड़ का एक हिस्सा बनकर रह जायेगा।

धूमिल की कविताओं में अस्सी बार कविता का उल्लेख हुआ है। बार-बार कविताओं की बात कर, ऐसा लगता है धूमिल, मानों कविता की भूमिका का व्याकरण प्रस्तुत कर रहे हों। धूमिल का संघर्ष जीवन और कविता में एक-सा है। उनकी काव्य-यात्रा कविता होने की यात्रा हैं । उनके प्रथम संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ की यात्रा कविता से ही शुरु होती है और जीवन की अंतिम कविता में भी उनकी सही कविता की तलाश ज़ारी रहती है।

धूमिल की कविताएं अपनी अंतर्वस्तु और शिल्पगत बनावट-बुनावट की ताज़गी और सादगी के कारण हिंदी पाठकों और आलोचकों का ध्यान एक दम से अपनी ओर आकृष्ट करती है। धूमिल की कविताओं में आक्रोश है और उस आक्रोश के मूल में सभी शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध मानवीय मुक्ति का पक्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। भाषा और शैली की दृष्टि से धूमिल ने अपनी एक नयी पहचान बनायी है। हिंदी काव्य की परम्परागत रूपक योजना, मिथक रचना-प्रतीक-विधान का परित्याग कर इन्होंने भाषा एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से सपाट बयानी को अपनी कविता के लिए श्रेयष्कर समझा है। सामान्य बोल चाल की चालू भाषा और बिना लाग-लपेट के कहने का कौशल धूमिल की कव्य-शैली का प्रमुख आकर्षण है। धूमिल ने अकविता और श्मशानी भूखी-क्रुद्ध पीढ़ी के दौर में एक सार्थक विद्रोह भाव ही नहीं, एक नया काव्य-शिल्प भी हिंदी की आगे आने वाली पीढ़ी को दिया। भाव, भाषा और शिल्प सभी दृष्टियों से धूमिल ने हिंदी कविता की एक नयी परंपरा का सूत्रपात किया है। धूमिल ने विभिन्न काव्यान्दलोनों को चुनौती देकर अपना अलग व्यक्तित्व बनाये रखा। 

शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

आज अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस है ....


अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस
मनोज कुमार
हालांकि शिक्षक दिवसविश्व के अधिकांश देशों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है, लेकिन 05 अक्टूबर को अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस या विश्व शिक्षक दिवस  संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में मनाया जाता है। 5 अक्टूबर, 1966 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा यूनेस्को (सयुंक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की बैठक हुई थी, जिसमें अध्यापकों की स्थिति पर चर्चा हुई। इस बैठक में शिक्षकों के लिए कुछ मानदंड तय करने की बात कही गई थी एवं इस बात पर भी विचार किया गया कि शिक्षक ऐसा हो जो अभ्यास तथा निरंतर शिक्षा के माध्यम से स्वयं के ज्ञान को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करता रहे। बैठक के अंत में 'टीचिंग इन फ्रीडम' संधि पर हस्ताक्षर किया गया था। उस संयुक्त बैठक को याद करने के लिये अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को ने 05 अक्टूबर को अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवसघोषित किया। 1994 में आयोजित एक सम्मेलन में उच्चतर शिक्षा से जुड़े शिक्षकों की स्थिति को लेकर की गई यूनेस्को की अनुशंसाओं को अंगीकृत किया गया और तब से  इस दिन अन्तरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस लगातार मानाया जाता है।
विश्व शिक्षक दिवस का मुख्य उद्देश्य है शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देना और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करना और शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरुकता लानाइसका एक और प्रमुख उद्देश्य है कि इस पेशे में प्रतिभाशाली दिमाग और युवा प्रतिभाओं को आकर्षित किया जाए। 2019 में, विश्व शिक्षक दिवस की थीम है युवा शिक्षक: पेशे का भविष्य। इस दिन स्कूल-कॉलेजों आदि में अपने अध्यापकों तथा गुरुओं के सम्मान में अनेक प्रकार के कार्यक्रम आदि आयोजित किए जाते हैं। जिन शिक्षकों ने अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया होता है उन्हें इस विशेष दिवस के मौके पर सम्मानित किया जाता है। ।  विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा इस दिन एक छात्र की ज़िंदगी में शिक्षकों के महत्व को रेखांकित किया जाता है।
शिक्षक का समाज में आदरणीय व सम्माननीय स्थान होता है। अच्छे शिक्षक के बिना अच्छे समाज की परिकल्पना करना असंभव है। आइए हम शिक्षकों के पक्ष में जनसमर्थन जुटाएं और उनके सशक्तीकरण को सुनिश्चित करें ताकि आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों और समाज के प्रति अपनी विशिष्ट जिम्मेदारी को शिक्षक प्रोत्साहित होकर पूरा करते रहें। यदि हम शिक्षकों का सशक्तीकरण करेंगे तो प्रत्येक बच्चे और युवा को आज़ादी के साथ सीखने का अवसर मिलेगा। अपने शिक्षकों के महान कार्यों के बराबर हम उन्हें कुछ भी तो नहीं लौटा सकते, लेकिन हम उन्हें सम्मान और धन्यावाद तो दे ही सकते हैं।
“थैन्कयू टीचर!”

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

विश्व पर्यटन दिवस


विश्व पर्यटन दिवस

मनोज कुमार


27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1980 में संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन के द्वारा हुई। इसी दिन वर्ष 1970 में विश्व पर्यटन संगठन का संविधान स्वीकार किया गया था। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि संसार में इस बात को प्रसारित किया जाए कि किस प्रकार पर्यटन वैश्विक रुप से, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक मूल्यों को बढ़ाने में तथा आपसी समझ बढ़ाने में सहायता करता है। यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड टूरिज्म ऑर्गेनाइजेशन किसी न किसी देश को इसका मेजबान बनाती है। इस बार का मेजबान देश 'भारत' है। पर्यटन दिवस की जागरुकता को लेकर भी हर साल एक थीम रखी जाती है. इस बार का थीम 'टूरिज्म एंड जॉब: ए बेटर फ्यूचर फॉर ऑल' है। पर्यटन आज दुनियाभर में लगातार बढ़ने वाला और विकासशील आर्थिक क्षेत्र बन गया है और इसीलिए यह विकासशील देशों के लिए नौकरी और आय का मुख्य स्रोत बन चुका है।
भारत सरकार द्वारा पर्यटकों का ध्‍यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए 2002 में अतुल्‍य भारतयोजना की भी शुरूआत की गई थी।  देश की पर्यटन क्षमता को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने वाला अपने किस्म का यह पहला प्रयास था। इस अभियान का उद्देश्य भारतीय पर्यटन को वैश्विक मंच पर बढ़ावा करना था। इस अभियान ने हिमालय, वन्य जीव, योग और आयुर्वेद पर अंतर्राष्ट्रीय समूह का ध्यान खींचा। इस अभियान के द्वारा देश के पर्यटन क्षेत्र के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुले हैं। भारत विश्व के शीर्ष पर्यटक स्थलों में से एक माना जाता है। भारत के विशाल तथा ख़ूबसूरत तटीय क्षेत्र, अछूते वन, शान्त द्वीप समूह, वास्तुकला की प्राचीन, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परम्परा, रंगमंच तथा कलाकेन्द्र, जनजातीय परंपराएं,  विश्व के विभिन्न देशों के पर्यटकों के लिए ख़ूबसूरत आकर्षण के केन्द्र बने हुए हैं। पर्यटन देश का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला उद्योग है। इसका राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में 6.88 प्रतिशत और भारत के कुल रोज़गार में 12.36 प्रतिशत योगदान है। भारत में 2018 में एक करोड़ पांच लाख पर्यटक भारत आए थे और 1.70 अरब घरेलू पर्यटकों ने सैर की। पर्यटन मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में वर्ष पिछले दस वर्षों में विदेशी सैलानियों से होने वाली कमाई में तकरीबन छह गुना की बढ़ोतरी हुई है। पर्यटन उद्योग की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर पैदा हुए हैं। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने लोगों से 2022 से पहले कम-से-कम 15 जगह की यात्रा करने का आग्रह किया है। आइए हम इस तरह के प्रयास करें कि यह देश दुनिया भर में पर्यटन के क्षेत्र में नंबर एक पर पहुंच जाए।

सोमवार, 23 सितंबर 2019

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जन्मदिवस पर ....


रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के जन्मदिवस पर ....

मनोज कुमार
जन्म : रामधारी सिंह दिनकर का जन्म  बिहार के मुंगेर (अब बेगूसराय) ज़िले के सिमरिया गांव में बाबू रवि सिंह के घर 23 सितम्बर 1908 को हुआ था।
 
शिक्षा और कार्यक्षेत्रढाई वर्ष की उम्र में पिता जी का देहांत हो गया। गांव से लोअर प्राइमरी कर मोकामा से मैट्रिक किया। 1932 में पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज से इतिहास में बी.ए. (प्रतिष्ठा) की परीक्षा पास करने के बाद वे कुछ दिनों के लिए बरबीघा उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक का काम किए। उसके बाद सरकारी नौकरी में चले आए और निबन्धन विभाग के अवर-निबंधक के रूप में 1934 से 1942 तक रहे। 1943 से 1945 तक सांग पब्लिसिटी ऑफीसर, फिर जनसम्पर्क विभाग के उपनिदेशक पद पर 1947 से 1950 तक रहे। उसके बाद उन्होंने 1950 से  1952 तक लंगट सिंह महाविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर के हिन्दी प्रध्यापक के अध्यक्ष पद को संभाला।

स्वंत्रता मिली और पहली संसद गठित होने लगी तो वे कांग्रेस की ओर से  भारतीय संसद के सदस्य निर्वाचित हुए और राज्यसभा के सदस्य के रूप में 1952 से 1963 तक रहे। 1963 से 1965 तक भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। अंततः 1965 से 1972 तक भारत सरकार के गृह-विभाग में हिन्दी सलाहकार के रूप में हिन्दी के संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए काफ़ी काम किया।
पुरस्कार व सम्मान : 
1. कुरूक्षेत्र के लिए काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार सम्मान मिला
2. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया
3. 1959 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्म विभूषण से किया विभूषित किया।
4. भागलपुर विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने इन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि प्रदान की।
5. 1972 में ‘उर्वशी’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मृत्यु : 24 अप्रैल 1974 को हृदय गति रुक जाने से उनका देहांत हो गया।

:: प्रमुख रचनाएं ::
:: काव्य रचनाएँ  :: चक्रवाल, रेणुका , हुंकार, द्वन्द्वगीत, रसवंती, सामधेनी, कुरुक्षेत्र, बापू, धूप और धुआं, रश्मिरथी, नील कुसुम, नये सुभाषित, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, हाहाकार,आत्मा की आंख, हारे को हरिनाम, संचयिता तथा रश्मि लोक।
   :: गद्य रचनाएं :: मिट्टी की ओर, अर्द्धनारीश्वर, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, शुद्ध  कविता की खोज, रेती के फूल, उजली आग, काव्य की भूमिका, प्रसाद, पंत और मैथिली शरण गुप्त, लोकदेव नेहरू, हे राम, देश-विदेश, साहित्यमुखी।

:: साहित्यिक योगदान ::
‘दिनकर’ जी के मानस पर तुलसीदास जी के ‘रामचरितमानस’ और मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं का काफ़ी प्रभाव पड़ा। देश का स्वतंत्रता संग्राम, विश्व-स्तर पर स्वातन्त्र्य-कामियों के संघर्ष, गांधी जी के कार्य और विचार, लेनिन के नायकत्व में निष्पादित क्रान्ति, भगत सिंह की और गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादतें, स्वामी सहजानन्द सरस्वती का किसान आन्दोलन, स्वामी विवेकानन्द, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, द्वितीय विश्वयुद्ध, आदि ने उनके मन पर गहरी छाप छोप छोड़ा।

‘दिनकर’ जी का मुख्य आधार है कविता। बारदोली सत्याग्रह के दौरान उनकी सर्वप्रथम प्रकाशित रचना ‘बारदोली विजय’ रीवां (मध्य प्रदेश) की ‘छात्र-सहोदर’ नामक पत्रिका में छपी थी, जिसमें राष्ट्रीयता के गीत थे।
1929 में पुस्तक रूप में ‘प्रणभंग’ नामक पहला खण्ड-काव्य प्रकाशित हुआ,  जिसमें उन्होंने लिखा था,
तोड़ी प्रतिज्ञा कृष्ण ने, विजयी बनाने पार्थ को
अघ ने क्या, नय छोड़ना लखकर स्वजन के स्वार्थ को।

‘रे रोक युधिष्ठिर को न यहां, जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।’
पंक्तियों के रचयिता राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध दिनकर जी को राष्ट्रीयता का उद्घोषक और क्रान्ति का उद्गाता माना जाता है। उन्होंने आज़ादी के आंदोलन के दौतान लिखना शुरु किया था। ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, ‘सामधेनी’ आदि की कविताएं स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बड़ी प्रेरक साबित हुईं।
श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
मां की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।
युवती के लज्जा-वसन बेच जब व्याज चुकाये जाते हैं,
मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी-सा द्रव्य बहाते हैं,
पापी महलों का अहंकार तब देता मुझको आमंत्रण,
झन-झन-झन-झन-झन-झनन-झनन।

1935 में प्रकाशित ‘रेणुका’ में ‘दिनकर’ जी के राष्ट्रीय चेतना के प्रखर स्वर के साथ ही रोमांटिकता और कोमल भावनाओं की क्षीण धारा भी प्रकट हुई है।
फूलों की क्या बात? बांस की हरियाली पर मरता हूं।
अरी दूब, तेरे चलते, जगती का आदर करता हूं।

वह कोमल भावना ‘रसवन्ती’ में सुविकसित होती है। यह इनकी वैयक्तिक भावनाओं से युक्त श्रृंगार परक काव्य-संग्रह है।
पड़ जाता चस्का जब मोहक, प्रेम-सुधा पीने का,
सारा स्वाद बदल जाता है, दुनिया में जीने का।
मंगलमय हो पंथ सुहागिनी, यह मेरा वरदान,
हरसिंगार की टहनी-से, फूलें तेरे अरमान।

वही कोमल भावना ‘उर्वशी’ के रूप में मनमोहिनी सिद्ध हुई। ‘उर्वशी’ हिन्दी साहित्य का गौरव-ग्रन्थ है। यह कामाध्यात्म संबंधी महाकाव्य है, जिसमें प्रेम या काम भाव को आध्यात्मिक भूमि पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया गया है।
जब से हम-तुम मिले, न जानें कितने अभिसारों में
रजनी कर श्रृंगार सितासित नभ में घूम चुकी है,
जानें, कितनी बार चन्द्रमा को, बारी-बारी से,
अमा चुरा ले गयी और फिर ज्योत्सना ले आयी है।

राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय स्वाभिमान का सबसे ज्वलन्त रूप प्रकट हुआ है उनकी सुविख्यात लम्बी कविता ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में। इसमें कवि ने राष्ट्रीय गौरव की रक्षा के लिए भारतीय जनता के शौर्यभाव को जगाने के लिए अत्यंत ओजभाव से युक्त वाणी का प्रयोग किया है।
वे देश शांति के सबसे शत्रु प्रबल हैं,
जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं,
हैं जिनके उदर विशाल, बांह छोटी है,
भोथरे दांत, पर जीभ बहुत मोटी है।
औरों के पाले जो अलज्ज पलते हैं,
अथवा शेरों पर लदे हुए चलते हैं।
युद्ध और शान्ति की समस्या का द्वन्द्व ‘कुरुक्षेत्र’ में व्यक्त हुआ है।
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो 
गद्य में भी वे अप्रतिम रहे हैं। उनका गहन अध्ययन और सुगम्भीर चिन्तन गद्य में मार्मिक अभिव्यक्ति पाता है। उनके गद्यों में विषयों की विविधता और शैली की प्रांजलता के सर्वत्र दर्शन होते हैं। उनका गद्य साहित्य काव्य की भांति ही अत्यंत सजीव और स्फ़ूर्तिमय है तथा भाषा ओज से ओत-प्रोत। उन्होंने अनेकों अनमोल ग्रंथ लिखकर हिन्दी साहित्य की वृद्धि की। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत ‘संस्कृति के चार अध्याय’ एक महान ग्रंथ है। इसमें उनकी गहन गवेषणा, सूक्ष्म अन्वेषण, भारतीय संस्कृति से उद्दाम प्रेम प्रकट हुआ है।
मानवता के प्रति प्रतिबद्धता, दलितों की दुर्दशा पर उत्साहपूर्ण रोष, गहन भारत-प्रेम और भारत-धर्म के परिपूर्णतम अभिव्यक्ति उनके साहित्य के सुन्दरतम लक्षण हैं।
दलित हुए निर्बल सबलों से, मिटे राष्ट्र उजड़े दरिद्र जन,
आह! सभ्यता आज कर रही असहायों का शोणित शोषण।
क्रान्ति-धात्रि कविते! जाग उठ, आडम्बर में आग लगा दे;
पतन, पाप, पाखण्ड जलें, जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।

उन्होंने काव्य, संस्कृति, समाज, जीवन आदि विषयों पर बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।
ऋण-शोधन के लिए दूध-घी बेच-बेच धन जोड़ेंगे,
बूंद-बूंद बेचेंगे, अपने लिए नहीं कुछ छोड़ेंगे।
शिशु मचलेंगे, दूध देख, जननी उनको बहलाएगी,
मैं फाड़ूंगा हृदय, लाज से आंख नहीं रो पायेगी।
इतने पर भी धनपतियों की उनपर होगी मार,
तब मैं बरसूंगी बन बेबस के आंसू सुकुमार।

उनका अन्तिम कविता-संग्रह ‘हारे को हरि नाम’ 1971 में प्रकाशित हुआ।
आधुनिक हिन्दी काव्य के पुरोधा, मिट्टी की सुगंध के अमर गायक, प्राची के आलोकधन्वा और युगधर्म की हुंकार राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचनाओं का स्वर युगधर्म की हुंकार माना जा सकता है। छायावाद की कुहेलिका को चीरकर आधुनिक हिन्दी काव्य कमल को जीवन की वास्तविकता एवं मिट्टी की गंध से परिपूरित करने वाले मानवतावादी ‘दिनकर’ ने दलितों, पीड़ितों के उद्धार का आदर्श भी प्रस्तुत किया है। वस्तुतः यही वह मूल प्रयोजन है जो आधुनिक युग जीवन को गौरव और अर्थकत्ता प्रदान करता है। साथ ही आर्थिक विषमता, रंगभेद, नीति, जाति, कुल सम्प्रदाय एवं साम्राज्यवाद से पीड़ित विश्व-मानव से रिश्ता जोड़ता है।