सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5. सूफ़ीमत का उदय-2
5.3 पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’
('सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम' का अर्थ है:
"अल्लाह की रहमत और सलामती हो उन पर।" यह वाक्यांश पैगम्बर मोहम्मद का
नाम लेने के बाद सम्मान में कहा जाता है।)
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम’ ख़ुदा के पैग़ंबर दीन-ए-इस्लाम के नबी और
रसूल माने जाते हैं। ‘रसूल’ का अर्थ होता है “ईश्वर का दूत” या “संदेशवाहक”। रसूल को
ईश्वर ने मानव जाति के लिए अपना दूत (प्रेषित) बनाकर भेजा, ताकि वह
ईश्वर के
आदेशों, जिसे शरीअत (दैवी विधान) कहा जाता है, को स्थापित करे और समस्त
मानव-जगत का दिशा निर्देशन करे। शरीअत का आधार पैग़म्बर का पवित्र जीवन, उनके अह्लेबैत
(परिवारजन) और क़ुरआन है। इस्लामी मान्यता के अनुसार हर देश और हर काल में
युग-पुरुष आकर इंसान को दुनिया में रहने का तरीक़ा बताते रहे हैं। ख़ुदा का संदेश
लाने वालों को पैग़म्बर कह कर पुकारा गया है। क़ुरआन शरीफ़ में भी कहा गया है –
“वमा मुहम्मदुन
इल्ला रसूल कदखलत मिन्कब्लेहिर्रोसोलो”
अर्थात् ख़ुदा का पैगाम लाने वाले दुनिया में लगातार
आते रहे हैं, हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम’ उनमें से एक हैं। रिसालात
(रसूल का बहुवचन) को इस्लाम में मौलिक स्थिति प्राप्त है। रसूल का चुनाव अल्लाह
अपनी पसंद से करते हैं, जिसे इस्तफ़ा (अनेक वस्तुओं में से सर्वश्रेष्ठ का
चुनाव) कहा जाता है। आदम से लेकर हज़रत मुहम्मद साहब तक एक लाख चौबीस
हज़ार पैग़म्बर की संख्या बताई गई है। पृथ्वी
पर जितने प्रेषित आये उनमें से सिर्फ 25 प्रेषितों के नाम क़ुरआन में लिए है। जैसे के – आदम! जिनकी हम सब संतान है, तो हम
अपने-आपको आदमी कहते है, इसी
तरह नूह, या
जिसको नोहा कहते है, इब्राहीम
(अब्राहम), मूसा (मोसेस), ईसा (यशु) और प्रेषित मोहम्मद इन सबको भेजे थे। उनके साथ कुछ ग्रंथ भेजे और क़ुरआन ने 3 ग्रंथो
के नाम अपने अलावा अर्थात कुल 4 तौरात (धर्म-पुस्तक, अल्लाह की वाणी), या ग्रंथों के
नाम लिए है, ये है
1.
तौरेत (तौरह) – यह ग्रंथ
प्रेषित मूसा (अलैहि सलाम) पर अवतरण हुआ था
2. ज़बूर – यह ग्रंथ प्रेषित दाऊद (अलैहिस्सलाम) पर अवतरण हुआ था जिन्हें डेविड कहते है, दाऊद अलैहिस्सलाम पैगंबर तालूत की सेना में एक सैनिक थे, जिन को अल्लाह ने राज्य देने
के साथ नबी भी बनाया। उन्हीं के पुत्र सुलैमान अलैहिस्सलाम थे। दाऊद अलैहिस्सलाम
को अल्लाह ने धर्म पुस्तक ज़बूर प्रदान की। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का जीवन साहस, अल्लाह पर अटूट विश्वास, और न्याय का एक महान उदाहरण
है।
3. इंजील (बाइबिल) – प्रेषित ईसा
मसी (अलैहिस्सलाम) पर अवतरित हुआ था,
4. क़ुरआन – ये ग्रंथ ईश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर इसका अवतरण हुआ था। इसका एक नाम
फुरकान भी है, अर्थात
कसौटी (Criteria, "सत्य और
असत्य के बीच अंतर करने वाला"), फर्क करने वाली किताब, अर्थात अच्छे
और बुरे को अलग करनेवाली किताब है ये। क़ुरआन अपने पूर्व की धर्म पुस्तकों का
केवल पुष्टिकर ही नहीं, कसौटी (परख) भी है। यहाँ यह
प्रश्न उठता है कि जब तौरात तथा इंजील और क़ुरआन सब एक ही सत्य लाये हैं, तो फिर इन
के धर्म विधानों तथा कार्य प्रणाली में अन्तर क्यों है? क़ुरआन उस
का उत्तर देता है कि एक चीज़ मूल धर्म है, अर्थात
एकेश्वरवाद तथा सत्कर्म का नियम, और दूसरी चीज़ धर्म विधान तथा कार्य प्रणाली है, जिस के
अनुसार जीवन व्यतीत किया जाये, तो मूल धर्म तो एक ही है, परन्तु समय
और स्थितियों के अनुसार कार्य प्रणाली में अन्तर होता रहा है, क्योंकि
प्रत्येक युग की स्थितियाँ एक समान नहीं थीं, और यह मूल
धर्म का अन्तर नहीं, कार्य प्रणाली का अन्तर हुआ।
इस्लामी क्रांति के
प्रवर्तक, मानव अधिकारों के संरक्षक और अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पैग़म्बर हज़रत
अबुल क़ासिम मुहम्मद मुस्तफ़ा इब्न अब्दुल्लाह का जन्म 570 ई. (अधिकांश
सुन्नी परंपराओं के अनुसार 12 रबीअ-उल-अव्वल जबकि शिया परंपराओं के अनुसार 17 रबी-उल-अव्वल को (आम-अल-फ़ील (हाथी का वर्ष) में
अरब के रेगिस्तान के मक्का नामक शहर के
मुहल्ला बनू हाशिम के क़ुरैश क़बीले में हुआ था। उनकी पीढ़ियों का क्रम हज़रत
इब्राहिम के पुत्र हज़रत इस्माइल से जाकर मिल जाता है। अरबी रिवाज़ के मुताबिक़ उनका
पूरा नाम मुहम्मद बिन-अब्दुल्लाह (अब्दुल्लाह का बेटा मुहम्मद) था। ‘मुहम्मद’ का अर्थ होता है ‘जिस की अत्यन्त प्रशंसा
की गई हो' (प्रशंसनीय)। उनके पिताश्री हज़रत
अब्दुल्लाह-बिन-अब्दुल मुत्तलिब थे और माताश्री हज़रत आमिना बिन्त वहब
थीं। उनकी माता ज़ोहरा क़बीला के प्रमुख वहब फ़हरी की पुत्री थीं।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पूर्वजों में से एक हज़रत कोसई, क़ुरैश क़बीला
से थे। यह क़बीला बड़ा ही दबंग था। हज़रत कोसई ने ख़ुद को कभी बादशाह तो नहीं कहा, पर
व्यावहारिक तौर पर वे मक्का के बादशाह ही थे। उन्हें मक्का का व्यवस्थापक बनाया
गया था। उनके बाद भी इसी वंश के लोग काबा के प्रबंधक रहे। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के
जन्म के समय मक्का मूर्तियों का गढ़ था। केवल काबा में 360 मूर्तियाँ थीं और उनका
वंश कुरैश ही उसका पुजारी था। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के क़बीले का नाम बनू हाशिम
था, जो उनके पूर्वज हज़रत हाशिम के नाम पर पड़ा था। हालाँकि उनका नाम उमरू था, पर
समस्त मक्का वासियों को हशम (रोटी को चूरा कर शोरबा में भिंगाकर खिलाना) खिलाया
था, इसलिए वे हाशिम कहलाए। पवित्र तीर्थ-स्थल काबा का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य
रूप से हाशिमी ख़ानदान के ही हाथ में था।
पैग़म्बर हज़रत
मुहम्मद सल्ल. के दादा, हज़रत हाशिम के पुत्र हज़रत मुत्तलिब एक विराट
और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके दस बेटों में से एक पैग़म्बर हज़रत
मुहम्मद के पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह थे। व्यापार के सिलसिले में वे शाम गए थे और
व्यापारिक यात्रा करके जब वापस आ रहे थे तो मदीना में बीमार हो गए और वहीं हज़रत अब्दुल्लाह
का 25 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उस समय माताश्री आमिना गर्भवती थीं। हज़रत अब्दुल्लाह
की मृत्यु के दो महीने बाद हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म हुआ। उनके जन्म के छः
वर्ष बाद माता का भी निधन हो गया। माताश्री आमिना बीबी उन्हें लेकर दो सौ मील दूर
मदीना (यथरिब) गयी थीं। उन दिनों सफ़र में बहुत-सी तकलीफ़ें झेलनी पड़ती थी।
हज़रत आमिना बीबी जब अपने पति हज़रत अब्दुल्लाह की कब्र देखने और रिश्तेदारों से
मिलने के बाद वापसी की यात्रा कर रही थीं तो उनका रास्ते में ही अल-अब्वा (Al-Abwa) नामक स्थान पर देहांत हो गया। हज़रत अब्दुल
मुत्तलिब ने अपने पौत्र का बड़े प्यार से लालन-पालन किया। माताश्री बीबी आमिना की
मृत्यु के दो वर्ष बाद, जब हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. आठ साल के थे तो दादा हज़रत
अब्दुल मुत्तलिब का भी देहावसान हो गया। अब उनकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी हज़रत
अब्दुल मुत्तलिब के पुत्र हज़रत अबू तालिब (अ.स.) पर आ गई।
मक्का की सरदारी और
राज्य को लेकर कुरैश जनजाति के कबीलों, विशेष रूप से बनू हाशिम (हज़रत अब्दुल
मुत्तलिब का परिवार) और बनू उमय्या (हरब इब्न उमय्या का परिवार) के बीच प्रतिस्पर्धा
थी। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की
मृत्यु (लगभग 578 ईस्वी) के बाद राज्य और सरदारी उन्हीं के वंशज की दूसरी शाखा
उम्मैय्या के पुत्र हरब इब्न उमय्या ने हथिया ली। ये लोग हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के
परिवार के घोर शत्रु थे। हरब ने ज़मज़म, जिसको खुदाई करके हज़रत हाशिम ने बरामद किया
था, और तीर्थ-यात्रियों का सेवा कार्य भी अपने सुपुत्र अब्बास को दे दिया। इस तरह
हर प्रकार से हज़रत अबू तालिब को सत्ता से बाहर कर दिया गया। उन्होंने अपने भतीजे
हज़रत मुहम्मद के पालन-पोषण और रक्षा को अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लिया। मक्का
में कुरैश के कड़े विरोध के बावजूद, उन्होंने अंतिम सांस तक पैगंबर मुहम्मद की रक्षा
की और उन्हें कबीले की दुश्मनी से बचाए रखा। इस काम को अंजाम देने में उनकी पत्नी
हज़रत फ़ातिमा-बिन्ते-असद ने उनकी भरपूर मदद की। हज़रत मुहम्मद ने भी हज़रत फ़ातिमा को
अपनी माताश्री के रूप में हमेशा सम्मान दिया। यहां तक कहा जाता है कि जब चाची हज़रत
फ़ातिमा का स्वर्गवास हुआ, तो जनाज़े के गहवारा (पालना, झूला, हिंडोला) के
नीचे-नीचे हज़रत मुहम्मद चलते रहे। किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, “जितनी देर तक
माताश्री की छत्रछाया सर पर बनी रहे, उचित ही है!”
5.4 हज़रत ख़दीजा (रज़िअल्लाहु
अन्हा)
पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.)
अपने चाचा के काम में भी हाथ बंटाने लगे। उनके चाचा हज़रत अबू तालिब व्यापार करते
थे। तेरह साल की उम्र में तिजारत (वाणिज्यिक व्यापार) में अनुभव हासिल करने के सिलसिले
में चाचा के साथ वे शाम (सीरिया) गए। जब वे पच्चीस साल के थे तो पैग़म्बर हज़रत
मुहम्मद सल्ल. को किसी व्यापारिक काम से मक्का की सबसे धनवान महिला हज़रत
ख़दीजा-बिन्त-खुवायलद (र.अ.) के माल के साथ जाना
पड़ा। वे एक संभ्रांत महिला थीं। उनका घर बनू हाशिम क्षेत्र में स्थित था। उन्होंने
गरीबों को भोजन और वस्त्र प्रदान किए, अपने रिश्तेदारों को आर्थिक सहायता दी और
गरीब रिश्तेदारों को शादी के खर्चों में मदद की। वह धनी भी थीं और ताक़तवर भी। वह 556 ईसवी में मक्का में
पैदा हुईं। सुशीलता, पवित्रता और चरित्रवान होने के कारण लोग उन्हें ‘ताहिरा’ (पवित्र) नाम से
पुकारा करते थे। उनके दादा, असद इब्न अब्द-अल-उज्जा, असद कबीले के [मक्का
में कुरैश़ जनजाति के पूर्वज] थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) एक अमीर
सौदागर खुवायलद इब्न असद की बेटी थीं। इस सौदागर ने अपने पुश्तैनी
काम को बढ़ा कर एक बड़े कारोबारी साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। लेकिन एक युद्ध
में पिता की मौत के बाद हज़रत खदीजा (र.अ.) ने ख़ुद आगे बढ़ कर इस कारोबारी
साम्राज्य की बागडोर संभाल ली। उनकी मां फातिमा बिन्त ज़ैदह्, कुरैश़ के आमिर
इब्न लुऐइ कबीले की सदस्य थी। हज़रत ख़दीजा अपना सारा कामकाज़ मक्का (सऊदी अरब) से
ही करती थीं। कारोबार के सिलसिले में उन्हें मध्य-पूर्व के देशों में सामान ले
जाने वाले कारवाँ रवाना करने पड़ते थे। ये कारवाँ लंबा सफ़र तय करते थे। ये
दक्षिणी यमन से लेकर उत्तरी सीरिया तक की राह नापते थे। हालाँकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को
काफ़ी सारा धन अपने परिवार से विरासत में मिला था लेकिन उन्होंने ख़ुद भी काफ़ी
संपत्ति कमाई थी। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपनी ही तरह की विलक्षण कारोबारी थीं। वह
अपने फ़ैसले ख़ुद लेती थीं। उनमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। वह ख़ुद अपने
कर्मचारियों का चयन करती थीं। वे ऐसे ख़ास हुनर वाले लोगों को चुनती थीं जो उनका
व्यापार बढ़ाने में मददगार साबित हों। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) निश्चित तौर
पर अपनी तरह से ज़िंदगी जीना चाहती थीं। वह अपनी राह पर चलती थीं।
वह बंधन में रहना
पसंद नहीं करती थीं। वह काफ़ी मज़बूत इरादों वाली महिला थीं। उन्होंने अपने
रिश्तों के भाइयों (कजिन) से शादी करने से इनकार कर दिया था। उनके परिवार में यह
परंपरा चली आ रही थी। लेकिन वह ख़ुद अपना जीवनसाथी चुनना चाहती थीं। उन दिनों के
तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने उनके सामने शादी के प्रस्ताव रखे लेकिन उन्होंने इनमें
से अधिकांश को ठुकरा दिया। आख़िरकार उन्होंने दो शादियां कीं। उनके पहले पति का
निधन हो गया और माना जाता है कि दूसरे पति से उन्होंने ख़ुद अलग होने का फ़ैसला
किया था। इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब फिर कभी शादी नहीं करेंगी। लेकिन थोड़े
वक्त के बाद उनकी ज़िंदगी में एक तीसरा शख़्स आया। वह थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद
साहब सल्ल. । उन दिनों वह किसी भागीदार के साथ साझा व्यापार किया करती थीं। अपना
कारोबार का कामकाज देखने के सिलसिले में उन्हें एक ऐसे शख्स के बारे में पता चला
जो बेहद ईमानदार और मेहनती माना जाता था। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से उनकी
मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात से संतुष्ट ख़दीजा (र.अ.) ने उन्हें
अपने एक कारवाँ की अगुआई करने के लिए चुन लिया। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपने
व्यापारिक कारवां के साथ यात्रा नहीं करती थी।
यह कहा जाता है कि कुरैश
के व्यापार कारवाँ जब गर्मियों में यात्रा करने के लिए सीरिया या सर्दियों में यात्रा
पर यमन के लिए एकत्र होते, तब हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के कारवाँ को
भी कुरैश के अन्य सभी व्यापारियों के कारवाँओं के साथ रखा जाता था। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) व्यापार
कारवाँ के साथ यात्रा नहीं करती थी, बल्कि नौकरों को अपनी ओर से व्यापार करने के लिए
कमीशन पर नियुक्त करती थीं। 595 ई. में सीरिया में एक सौदे के लिए ख़दीजा को एक
एजेंट की ज़रूरत पडी। हज़रत अबू तालिब इब्न अब्द अल मुतालीब ने उनके दूर के चचेरे भाई
मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला की सिफारिश की। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने हज़रत मुहम्मद
सल्ल. को काम पर रखा, तब वे 25 साल के थे। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने न सिर्फ़ उस
धनवान स्त्री हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के व्यापार में सहयोग किया बल्कि उस बार
व्यापार में उन्हें दोगुना से भी ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उनमें कुछ
अद्भुत गुण देखे थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) उस शख्स की दृढ़ता से बेहद प्रभावित थीं।
कारोबार के सिलसिले में ख़दीजा (र.अ.) से उनका वास्ता बढ़ता गया। उस शख़्स ने हज़रत
ख़दीजा (र.अ.) को इतना प्रभावित किया कि आख़िरकार उन्होंने उनसे शादी करने का
फ़ैसला कर लिया। इस तरह एक पति के निधन और दूसरे से अलगाव के बाद फिर कभी शादी न
करने का फ़ैसला करने वाली हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने अपना फिर कभी शादी न करने का
फ़ैसला बदल दिया था। कई अमीर कुरैश पुरुष पहले से ही हज़रत ख़दीजा से शादी के लिए
हाँ कह चुके थे, लेकिन उन्होंने सभी को मना कर दिया था।
हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उस ज़माने
के चलन के उलट ख़ुद उनकी उच्च विशेषताओं से प्रभावित होकर उनके पास विवाह करने का
संदेश भिजवाया। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. उस समय पच्चीस के थे और एक साधारण परिवार से
ताल्लुक रखते थे, जबकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) मक्का की सबसे धनवान महिला थीं और चालीस
साल की हो चुकी थीं। पैग़म्बर मोहम्मद अनाथ थे। उनको उनके चाचा ने पाला-पोसा था।
फिर भी 595 ई. में राज़ी-ख़ुशी निकाह हुआ, उनके दूसरे चाचा हज़रत हम्ज़ा ने निकाह
पढ़कर उनका विवाह सम्पन्न किया।
जीवन-पर्यन्त हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने बड़े प्रेम और वफ़ादारी से पैग़म्बर का साथ
निभाया। जन्म से ही हज़रत मुहम्मद सल्ल. ग़ुरबत (कंगाली, दरिद्रता) झेलते आए थे। हज़रत
ख़दीजा (र.अ.) से शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में अचानक 'काफ़ी निश्चिंतता
और आर्थिक समृद्धि' आ गई, शादी के बाद वे दौलतमंद हो गए थे। मगर उनका रुझान दुनिया के
ऐशो-आराम में न था। इसके बाद तो हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का सारा जीवन और धन-दौलत
इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ। माना जाता है कि इस दंपति की चार संतानें
हुईं। लेकिन एक बेटी को छोड़ कर बाक़ी बचपन में ही गुज़र गईं। उनकी सुपुत्री हज़रत
फ़ातिमा ज़हरा (र.अ.) थीं। उनका विवाह हज़रत अली-बिन-अबूतालिब से हुआ था। इन दोनों के
पुत्र इमाम हसन (शब्बर) और इमाम हुसैन (शब्बीर) थे, समूहिक रूप से इन्हें हसनैन
कहा जाता है। इनकी सुपुत्रियां हज़रत ज़ैनब और हज़रत उम्मे-कुल्सूम थीं।
हज़रत मुहम्मद सल्ल.
ने एक युवा संगठन “हल्फ़-उल-फ़ुज़ूल” (फ़ाज़िलों की
मंडली) बनाया। अभी उनकी उम्र 25 वर्ष की थी। यह अत्याचार के विरुद्ध न्याय की
स्थापना करने वाला एक ऐतिहासिक कबीलाई संघ था। बड़े आश्चर्य की बात है कि उनके इन
प्रयासों, उच्चतम जीवन मूल्यों, सत्यवादिता, के कारण उस समय के समाज ने उन्हें “अस्-सादिक़” (परम सत्यवादी) और
“अलअमीन” (परम विश्वासी,
निष्ठावान) की उपाधियों से अलंकृत किया, किन्तु जब 40 वर्ष की उम्र में
उन्होंने पैग़म्बर होना घोषित किया, तो वही समाज और प्रशंसक उनके घोर शत्रु हो गए,
खासकर अरब का धनवान वर्ग, जिसका नेतृत्व उमैय्या वंश कर रहा था।
ऐसा माना जाता है
कि इस्लाम प्राचीन धर्मों के विकास का अंतिम पड़ाव है। क़ुरआन में कहा गया है, “कोई जाति ऐसी नहीं
है, जिसमें निर्देशित करने वाला (नबी या पैग़म्बर) न हुआ हो।” (क़ुरआन : 35/24)। इस्लाम धर्म की
यह विशेषता है कि यह किसी जनसमूह, समाज या देश तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त मानव
प्राणी, देश-समाज और काल इसकी परिधि में आते हैं। इस्लाम यानी सुख-शांति – मतलब यह कि जो भी
सुख-शांति में विश्वास करता है, इसका अनुयायी है। इस्लाम शब्द सुलह-समझौता, कुशलता, विनम्रता, आज्ञापालन, समर्पण आदि अर्थों
में भी आता है। इसका ईश्वर सिर्फ़ मुसलमानों का पूज्य नहीं है, बल्कि वह तो “रब्ब-उल-आलमीन” है – यानी सारी दुनिया
का पालनहार है, वह “रहमत-उल-आलमीन” यानी सारी दुनिया
का दया निधान है। (क़ुरआन : 1 / 2, 21/107)। इसका संदेश सभी
मानव जाति के लिए एक समान है।
*** *** ***
मनोज
कुमार
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