सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5.
सूफ़ीमत का उदय-10
5.16 इमामत और रिसालत
रिसालत एक अरबी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ
है "संदेश भेजना" या "ईश्वर का पैगाम पहुँचाना"।
जब अल्लाह ने पृथ्वी पर मानवों को भेजा तो मानव क्या करे और क्या ना करे, कैसे जीवन व्यतीत करे, इसके
मार्गदर्शन के लिए ईश्वर (अल्लाह) मानवों में से एक मानव को चुन लेता था फिर वो
अपनी वाणी उस तक भेजता था और फिर उन्हें मार्गदर्शन करता था कि उचित जीवन और
मृत्यु के बाद की सफलता के लिए मानवों को कैसे जीवन व्यतीत करना है। जो व्यक्ति
इस दैवीय कार्य को करता है, उसे 'रसूल' या 'पैगंबर' कहा जाता है। इस्लाम में मुहम्मद साहब को अंतिम और सर्वोच्च ईश्वर का दूत
माना गया है। रिसालत के माध्यम से पैगंबर ईश्वर के नियमों, धर्मग्रंथों, और सत्य के मार्ग को आम जनता तक
पहुँचाते हैं। वे लोगों को बताते थे के तुम्हारा ईश्वर तुमसे क्या चाहता है। क़ुरआन के एक
श्लोक में ईश्वर (अल्लाह) कहता है: “पूरी मानवता एक कुनबा (क़बीला)
है, और अल्लाह ने
उनके अंदर दूत भेजे जो आकर लोगों को अच्छे कर्म करने पर शुभ सूचनाएं देते, और बुरे
कर्मों पर भयभीत करते, डराते और चेतावनी देते बुरे कर्मों से रुकने के लिए।” – (क़ुरआन 2:213)
यह आयत बताती है कि पहले सभी लोग एक
ही धर्म पर थे, लेकिन बाद में मतभेद होने पर अल्लाह ने रसूलों को खुशखबरी देने वाले और
चेतावनी देने वाले बनाकर भेजा। इस संसार में ईश्वर (अल्लाह) ने 1 लाख 24 हज़ार से
ज़्यादा प्रेषित भेजे और हर समुदाय हर जाति और जहां मानव बसते थे वहां ये आते थे और
एक सत्य ईश्वर (अल्लाह) का पैगाम लोगों को बताते थे। ईश्वर के
अंतिम दूत पैग़म्बर मोहम्मद (स.) थे। उनके बारे में क़ुरआन ये कहता है: “यह प्रेषित सिर्फ अरबों के या मुसलमानों के ही नहीं बल्कि सारे मानव जाति
के लिए मार्गदर्शक है और इनका सन्देश भी सारी मानव जाति के लिए है”। क़ुरआन में कहा
गया है – “हमने हर समुदाय (उम्मत) जहां भी इंसानियत बसती थी वहां नबी और प्रेषित भेजे, वो आकर लोगों को सन्देश
देते के सिर्फ एक ही सत्य ईश्वर की उपासना करो और उसके अतिरिक्त किसी और की उपासना
ना करो। फिर उनमें से कुछ को अल्लाह ने मार्गदर्शन दिया और कुछ पर गुमराह होना तय
हो गया।”। – (क़ुरआन 16:36)
ख़लीफ़ा और इमाम का अर्थ लगभग एक जैसा
ही है, इन दोनों का ही अर्थ ‘उत्तराधिकारी’ या
'प्रतिनिधि' का है। यानी दोनों ही समुदायों के बीच असल असहमति
मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी के पद को लेकर है। इनके कार्य और अधिकार क्षेत्र
अलग-अलग होते हैं, जिसके कारण दोनों ही समुदायों में काफी सारी भिन्नताएं हैं जो
दोनों को ही एक दूसरे से अलग करती है। इन दोनों समुदाय के लोगों की अज़ान
से लेकर नमाज़ तक के तौर तरीके अलग अलग हैं। “इमामत” (इमाम का बहुवचन) को शिया संप्रदाय इस्लाम के मौलिक सिद्धांत
में मानता है। इमाम का अर्थ है नेतृत्व
करने वाला, धर्मगुरु। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल.
में रिसालत और इमामत दोनों ही संचित थीं। वे अंतिम रसूल थे। उनके बाद रिसालत का क्रम समाप्त हो गया।
उनके बाद हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ में इमामत संचित हो गई। जाफ़र रज़ा ने इमामों
की संख्या बारह बताई है, जिन्हें इसना-अशरी-अइम्मा (बारह इमाम) कहते हैं। ये
इस प्रकार हैं :
अह्लबैत के इमाम –
1.
हज़रत
अली इब्न अबी तालिब (610-661 ई.)
2.
इमाम
हसन (625-670 ई.),
3.
इमाम
हुसैन, (626-680
ई.),
4.
इमाम
ज़ैनुल आबिदीन, (657-713 ई.),
5.
इमाम
मुहम्मद बाक़िर, (677-733 ई.),
6.
इमाम
जाफ़र सादिक़, (702-765 ई.),
7.
इमाम मूसा काज़िम, (745-799 ई.),
8.
इमाम
अली रिज़ा (770-819
ई.),
9.
इमाम मुहम्मद तक़ी, (810-835 ई.),
10.इमाम अली नक़ी, (829-868 ई.),
11.इमाम हसन असकरी, (846-873 ई.), और
12.इमाम मुहम्मद अल- महदी आख़िरउज़्ज़मां (अर्थात्
अंतिम युग के इमाम) (870 ई. –
प्रलय)
इन इमामों का
उसी प्रकार अनुपालन किया जाता है जैसे ईश्वर, रसूल या पैग़म्बर का। शिया सम्प्रदाय
वालों का विश्वास है कि इमाम ईश्वरीय विधान के फलस्वरूप इस संसार में अवतरित होता
है। इसलिए वह विशिष्ट गुणों से अभिभूत होता है। इमाम
सर्वोत्कृष्ट चरित्र वाला और निष्पाप होता है। इमाम वह है जो उदाहरण स्वरूप दूसरों के सामने
रहे और जिसके उदाहरण को सामने रखकर लोग अपना जीवन बिताएं। इमामत का
उद्देश्य ईश्वर द्वारा स्थापित विधि की देख-रेख और उसका प्रवर्तन करना है। अल्लाह
द्वारा स्थापित उचित और अनुचित को स्थापित करना और मानव की स्वाभाविक स्वतंत्रता को पुनः स्थापित करना इसका परम
लक्ष्य है। इस्लाम मनुष्य और ईश्वर के बीच किसी मध्यस्थ की उपस्थिति या आवश्यकता
में विश्वास नहीं करता। सामूहिक नमाज़ में एक इमाम की ज़रूरत होती है।
शिया सम्प्रदाय
बाद के दिनों में विभिन्न उप-सम्प्रदायों में बंट गया। हाशिमिया और
इमामिया सम्प्रदाय शिया के दो प्रारंभिक दल थे। इमामियों के अनुसार इमाम वही हो सकता है जो
पैग़म्बर साहब की पुत्री हज़रत फातिमा की वंश परम्परा में पड़ता हो। यह शिया इस्लाम का
सबसे बड़ा और मुख्यधारा का संप्रदाय है, जो वर्तमान में ईरान, इराक और
लेबनान जैसे देशों में प्रमुखता से है। : इसे 'इथना-अशरी' (Twelver) या 'बारह इमामों को मानने वाले
शिया' भी कहा जाता है। इनका मुख्य सिद्धांत
यह है कि पैगंबर मुहम्मद के बाद उनके परिवार से 12 इमाम ईश्वर
द्वारा नियुक्त किए गए थे, जो आध्यात्मिक और सांसारिक
मामलों में मार्गदर्शक (इमामत) हैं। इनके बारहवें इमाम, मुहम्मद
अल-महदी हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे रहस्यमयी रूप से 'गायब' हो गए
हैं और न्याय की स्थापना के लिए कयामत के दिन लौटेंगे। हाशिमिया इमाम को
पैग़म्बर साहब की वंश परम्परा से जोड़ते थे। यह 8वीं और 9वीं शताब्दी का
एक प्रमुख धार्मिक-राजनीतिक संप्रदाय था। यह आंदोलन
पैगंबर मुहम्मद के दामाद, चौथे खलीफा हजरत अली के समर्थकों के बीच कूफा (इराक)
में उभरा। यह संप्रदाय हजरत अली के वंशजों—खासकर मुहम्मद इब्न
अल-हनफिया और उनके बेटे अबू हाशिम को अपना इमाम (धार्मिक नेता) मानता था। बाद में इसके
अधिकांश अनुयायी अब्बासिद परिवार के साथ जुड़ गए। उन्होंने उमय्यद
खिलाफत को उखाड़ फेंकने में बहुत बड़ी राजनीतिक भूमिका निभाई। इमामिया परम्परा
वाले हज़रत इमाम हसन और हुसैन को मानते हैं लेकिन हज़रत इब्नुल हनाफिया को नहीं
मानते जो हज़रत अली के पुत्र तो थे, लेकिन उनकी माँ हनफी वंश की थीं। वहीं हाशिमिया
हज़रत इब्नुल हनाफिया को इमाम मानते हैं। इनके मतानुसार
हज़रत अली द्वारा प्रकट किए गए ज्ञान का अधिकारी ही इमाम हो सकता है।
सुन्नी का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस
पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद
अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं। यह शब्द अरबी भाषा के शब्द 'सुन्ना' से बना है, जिसका अर्थ है पैगंबर हज़रत मुहम्मद
साहब के कथन, कर्म, और उनके द्वारा बताई गई जीवनशैली (यानी उनकी परंपरा)। सुन्नी सम्प्रदाय मुसलमानों
के बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। इस सम्प्रदाय में सुन्नत (पैग़म्बर का जीवन) और जमाअत (पैग़म्बर के सहयोगियों का समूह, खासकर ख़लीफ़ा) पर विश्वास रखना अनिवार्य है। इस्लाम
में सुन्नत और जमाअत (अह्लुस-सुन्नत
वल-जमाअत) का अर्थ है पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के बताए गए सही तरीकों (सुन्नत) और
उनके साथियों (सहाबा) की सामूहिक सहमति व एकता (जमाअत) का अनुसरण करने वाले लोग।
यह सुन्नी मुसलमानों के मुख्य समुदाय और विचारधारा को दर्शाता है। सुन्नी के हनफ़ी, शाफ़ई, मालकी और हम्बली पंथ हुए। इस्लामी न्यायशास्त्र यानि फ़िक़्ह
(ज्यूरिशप्रूडेंस) के पांच प्रमुख सिद्धांत हैं: हनफ़ी, शफ़ई, मालिकी, हम्बली और जाफ़री। जाफ़री या फ़िक़्ह जाफ़िरी शिया
समुदाय से संबंधित है। भारत में अधिकतर मुसलमान हनफ़ी
सिद्धांत को मानते हैं। सलफ़ी या अहले हदीस ख़ुद को इन सबसे अलग मानते हैं। ये दोनों समूह इस्लाम के आरंभिक दौर
के तरीके का सख्ती से पालन करने पर जोर देते हैं। सलाफी शब्द अरबी के 'सलाफ' से आया है, जिसका अर्थ है 'पूर्वज'। यह पैगंबर मुहम्मद के साथियों
(सहाबा) और उनके बाद की दो पीढ़ियों (ताबीईन) के शुद्ध और मूल इस्लाम के रास्ते पर
चलने को दर्शाता है। अहले हदीस का अर्थ है 'हदीस को मानने वाले'। यह नाम मुख्य रूप से भारतीय
उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) में इस विचारधारा को
मानने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। उनका मानना है कि ये सभी विचारधाराएँ
इस्लाम के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद की मौत के सदियों बाद वजूद में आई हैं और
ये इस्लाम को लेकर अलग-अलग इमामों की व्याख्याएँ हैं। इसलिए इनमें बहुत सी वैसी बातें
शामिल हो गई होंगी, जो
पैग़ंबर मोहम्मद सल्ल. के जीवन से अलग होंगी। अहले हदीस सिर्फ़ इस्लाम के पवित्र
ग्रंथ क़ुरान और हदीस के अनुसार इस्लाम को मानते हैं।
हदीस पैगंबर मोहम्मद की कही गई बातें
और अलग-अलग समय में रसूल ने जिन कामों को अंजाम दिया, उन पर आधारित संग्रह हैं। तीन जगहों पर जाना ही वो मुनासिब
समझते हैं। मस्जिदुल हराम यानी पवित्र
मस्जिद या
मक्का की महान मस्जिद, मस्जिदुल
नबवी और मस्जिदुल अक्सा। मदीना में मौजूद मस्जिदुल नबवी में
पैग़ंबर मोहम्मद की क़ब्र है। मस्जिद
अक्सा येरुशलम में है और मुसलमान ये मानते हैं कि पैग़ंबर यहीं से अपने जीवनकाल
में जन्नत को गए थे। सलफ़ी किसी तरह की समाधि या मज़ार पर
नहीं जाते हैं। सलफ़ी विचारधारा को मानने वाले क़ब्र को पक्का बनाना ग़लत मानते हैं।
ख़िलाफ़त का मतलब होता
है उत्तराधिकारी और ख़िलाफ़ते-राशिदा को विधिक उत्तराधिकार
कहते हैं। पैग़म्बर साहब के स्वर्गवास के बाद इस्लामी राज्य का नेतृत्व चार ख़लीफ़ाओं
हज़रत अबूबकर, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान और हज़रत अली द्वारा संपन्न
हुआ। कुछ विद्वान हज़रत इमाम हसन की ख़िलाफ़त का एक वर्ष, जब तक कि उन्होंने अमीर मुआविवा को सत्ता
सौंप कर एकांतवास ग्रहण नहीं किया था, को भी शामिल करते
हैं और इमाम हसन को पांचवां ख़लीफ़ा मानते हैं। चारों ही ख़लीफ़ा उच्च कोटि के तपस्वी और
पैग़म्बर के महान सहाबी थे।
जब इस्लाम अरब
के बाहर फैलने लगा तो इस पर अनेक प्रकार के प्रभाव पड़ने लगे और ऐसा लगने लगा कि
इसमें परिवर्तन होंगे। इस स्थिति पर नियंत्रण रखने के लिए तीन बातों की व्यवस्था
की गई –
एक, इजमाअ
– इस्लामी कानून
(शरिया) में इज्माअ का अर्थ किसी विशेष समय में मुस्लिम समुदाय के धार्मिक
विद्वानों की आम सहमति या सर्वसम्मति, एकमत होना है। यह शर्त लगा दी गई कि
सभी युगों और सभी स्थानों में इस्लाम के उपदेशकों में पूरा-पूरा मतैक्य रहना
चाहिए।
दो, सुन्नत
– प्रथा,
प्रणाली। नबी साहब ने जो काम किए थे, उनका अनुसरण हदीस के अनुसार किया जाना चाहिए।
तीन, क़यास
– सोच-विचार। मूल
उपदेशों से क्या अर्थ लिए जा सकते हैं, इस पर सावधानी से विचार।
***
इस्लाम धर्म के प्राम्भिक चार ख़लीफ़ा निम्नलिखित थे –
1.
हज़रत अबूबक्र (632-34 ई.)
2. हज़रत उमर (634-43 ई.)
3. हज़रत उस्मान (643-55 ई.)
4. हज़रत अली (655-61 ई.)
शुरू के चारों ख़लीफ़ा, जिनकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं, ने सादगी, वीरता
और वैराग्य का असाधारण उदाहरण पेश किया। वे गृहस्थ रहकर भी वैरागी थे, वे युद्धरत
रहकर भी दयालु थे। ये गद्दी पाकर भी फ़क़ीर थे। इन गुणों का उदाहरण इस एक वर्णन में
देखा जा सकता है, कि जब हज़रत उमर ‘रज़ियल्लाहु
अन्हु’ ने ईरान पर विजय के बाद जेरूसलम में प्रवेश किया तो उनके ऊंट पर उनका
ग़ुलाम सवार था और वह पैदल थे, उनका सारा सामान भी लदा था और ये सामान थे, कम्बल का
एक खेमा, एक बोरा अनाज, एक बोरा खजूर और लकड़ी के कुछ बर्तन। जिस विजेता को पलक
झपकते ही राजमहल के सारे वैभव हासिल हो सकते थे, वह इतनी सादगी के साथ रहता था। ये
ख़लीफ़ा युद्ध के साथ-साथ उपदेश भी देते चलते थे। सभी जगह न्याय फैलाते चलते थे।
इन्होंने बहुविवाह प्रथा में सुधार लाया। उनके शासन काल में कर उगाही में ज़ोर-जबरदस्ती
नहीं की जाती थी। विलासिता से बचने का इन्होंने निर्देश दिया था। हज़रत अबूबक्र ‘रज़ियल्लाहु
अन्हु’ ने अपनी सेना को निर्देश दे रखा था कि न्यायी बनो, क्योंकि अन्याय से
उन्नति नहीं हो सकती, दयालु बनो क्योंकि बूढ़ों, बच्चों और स्त्रियों पर तलवार
उठाना पाप है। ये उन अधिकारियों को सज़ा देते थे जो रेशमी वस्त्र पहनते थे और
भोग-विलास में रहते थे।
लोगों को अंधविश्वास से बचाने और दार्शनिक उलझनों से दूर रखने वाला
इस्लाम शुरू में क्रांतिकारी धर्म था। यह
लोगों को शिक्षा देता था कि ईश्वर को छोड़कर किसी के सामने सिर झुकाने की ज़रूरत
नहीं है। उन दिनों जहां-जहां भी यह धर्म पहुंचा, वहां के समाज में भारी उथल-पुथल
मच गई। अरबी आक्रमणकारियों को जनता ने अपना रक्षक माना और उनका सत्कार किया। किंतु
पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्ल. की मृत्यु के सौ साल बीतते-बीतते विराट अरब
साम्राज्य में वे बातें प्रवेश कर गईं जिनसे दूर रहने का उपदेश शुरू के चारों
ख़लीफ़ा दिया करते थे। सादगी की जगह विलासितापूर्ण जीवन का समावेश, न्याय की जगह
अन्याय और सहिष्णुता की जगह अत्याचार ने ले ली। यहां तक कि ख़लीफ़ा पद के लिए आपसी
संघर्ष होने लगे और इसी संघर्ष के परिणामस्वरूप शिया और सुन्नी का भेद पैदा हुआ।
5.17 उमय्यद
उमय्यद (661-750
ई.)
प्रारंभिक इस्लामी इतिहास का पहला महान वंशानुगत राजवंश था। चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली
हज़रत मुहम्मद साहब के फ़रीक (चचेरे भाई) थे और उन्होंने मुहम्मद साहब की बेटी हज़रत
फ़ातिमा से शादी की थी। पर इसके बावजूद उनके खिलाफ़त के समय तीसरे ख़लीफ़ा उस्मान के समर्थकों
ने उनके ख़िलाफ़त को चुनौती दी और अरब साम्राज्य में गृहयुद्ध छिड़ गया। सन् 661
में
अली की हत्या कर दी गई और उस्मान के एक निकट के रिश्तेदार मुआविया ने अपने आप को ख़लीफ़ा
घोषित कर दिया। इसी समय से उमय्यद वंश का आरंभ हुआ। इसका नाम उस परिवार पर पड़ा जिसने
मक्का के इस्लाम के समक्ष समर्पण से पहले मुहम्मद साहब के साथ लड़ाई में प्रमुख भूमिका
निभाई थी।
जल्द ही अरब
साम्राज्य ने बैजेंटाइन साम्राज्य और सासानी साम्राज्य का रूप ले लिया।
खिलाफ़त पिता से बेटे को हस्तांतरित होने लगी। राजधानी दमिश्क बनाई गई। उमय्यद
ने अरबों को साम्राज्य में बहुत ही तरज़ीह दी पर अरबों ने ही उनकी आलोचना की। अरबों
का कहना था कि उमय्यदों ने इस्लाम को बहुत ही सांसारिक बना दिया है और उनमें इस्लाम
के मूल में की गई बातें कम होती जा रही हैं। इन मुस्लिमों ने मिलकर अली को इस्लाम का
सही ख़लीफ़ा समझा। उन्हें लगा कि हज़रत अली रजि.
ही इस्लाम का वास्तविक उत्तराधिकारी हो सकते थे। 750 ई. में
अब्बासिद (अब्बासी) क्रांति के दौरान उमय्यदों को हरा दिया गया।
5.18 अरबों का व्यापक साम्राज्य
सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उदय के बाद अरबों ने एक
विशाल साम्राज्य (खिलाफत) की स्थापना की, जो अटलांटिक महासागर से लेकर मध्य एशिया तक फैल गया। पैगंबर
मुहम्मद सल्ल. के निधन के बाद पहले चार खलीफाओं के नेतृत्व में (रशीदुन खिलाफत, 632–661 ई.)
साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ। 636 ई. में मेसोपोटामिया (इराक़) और साम (सीरिया) पर अरबों
ने जीत हासिल की। 637 ई. में उन्होंने बैतुलमुक्द्दस (जेरूसेलम) पर क़ब्जा
किया। इन्होंने 641 ई. तक मिस्र को भी अपने अधीन कर लिया। 651 ई. तक
ईरान भी उनके शासन के अधीन आ गया था। उमय्यद खिलाफत (661–750 ई.) के काल में इस वंश ने राजधानी दमिश्क से शासन किया और
साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार अपने चरम पर (लगभग 1.5 करोड़ वर्ग
किलोमीटर) पहुँचा दिया। 712 ई. में सिंध मुसलमानों की अधीनता में चला गया। उसी साल
मुसलमानी राज्य स्पेन में भी स्थापित हो गया। 715 ई. तक
तातार और तुर्किस्तान भी उनके साम्राज्य का एक हिस्सा थे। इसके साथ ही कई यूरोपीय
देश भी इनके अधीन आ चुके थे। एक सौ सालों में ही इन्होंने इतनी जीत हासिल की। इसके
बाद भी इनके विजय अभियान ज़ारी रहे। हिजरी
सन् के सौ साल (722 ई.) होते-होते, मुसलमानों के राज्य के समान शक्तिशाली
राज्य दुनिया में और कोई नहीं था। जहां एक ओर रोमन जैसे शक्तिशाली साम्राज्य के
निर्माण में छः सौ साल लगे, अरबों का व्यापक साम्राज्य इस्लाम के जन्म के केवल सौ
साल में फैल गया।
*** *** ***
मनोज
कुमार