सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था-4
6.7 अब्बासी शासक
अब्बासी
शासक इस्लाम के तीसरे खिलाफत (साम्राज्य) के प्रमुख थे, जिन्होंने 750
ईस्वी से 1258 ईस्वी तक
इस्लामी दुनिया पर शासन किया। अब्बासी वंश वाले उमैय्यों की अपेक्षा हज़रत मुहम्मद
साहब के वंश के अधिक निकट थे। अब्बासी हज़रत मुहम्मद सल्ल. के सगे चाचा हज़रत अब्बास इब्न अब्दुल मुत्तलिब के वंशज थे। मुहम्मद साहब के पिता हज़रत अब्दुल्ला, हज़रत अली के पिता हज़रत
अबू तालिब और हज़रत अब्बास तीनों भाई थे और हज़रत अब्द अल मत्तालिब
के पुत्र थे। यह परिवार सीधे तौर पर बनू हाशिम (हाशमी
कबीले) से था, जिससे खुद हज़रत मुहम्मद ताल्लुक रखते थे। उमैय्यद
हज़रत मुहम्मद के परदादा के भाई उमय्या
इब्न अब्द शम्स के वंशज
थे। यह परिवार बनू उमैय्या कबीले से था। हालांकि बनू
हाशिम और बनू उमैय्या दोनों एक ही बड़े कबीले (कुरैश) की शाखाएं थे, लेकिन उमैय्यों का हज़रत मुहम्मद से रिश्ता अब्बासियों
जितना सीधा और करीबी नहीं था। अब्बासियों ने उमैय्यदों के खिलाफ क्रांति
के दौरान इसी बात का फायदा उठाया था। उन्होंने 'अहल अल-बैत' (पैगंबर के परिवार) के हक का नारा देकर लोगों का समर्थन
हासिल किया और उमैय्या खिलाफत को खत्म कर दिया।
हालाकि शिया संप्रदाय वाले हज़रत
अली के वंशजों को ही अपना खलीफ़ा मानते थे, फिर भी
उन्होंने उमैय्यों के विरुद्ध अब्बासियों की मदद की। अब्बासियों ने अपने लिए हुमैमा
को अपना कार्यस्थल चुना। लगभग 700 ईस्वी के
आसपास, अब्बासी परिवार (बनू हाशिम) सीरिया के
दमिश्क में उमय्यद सत्ता के करीब रहने के बजाय हुमैमा में बस गया। यह उमय्यद
राजधानी दमिश्क से काफी दूर एक एकांत स्थान था। यह सीरिया से मक्का हज जाने वाले
रास्ते में पड़ता था। अब्बासियों ने यहीं से उमय्यद खिलाफत को उखाड़ फेंकने के लिए
अपने गुप्त अभियानों और विद्रोह (अब्बासिद क्रांति) की योजना बनाई थी। उन्हें
खुरासान से भी पूरी मदद मिल रही थी। अब्बासियों के सबसे बड़े सहायक खुरासान के अबू
मुस्लिम थे। दोनों ने मिलकर उमय्यों के अंतिम ख़लीफ़ा को हरा दिया। अब्बासिद
क्रांति को 'काले वस्त्रों वाले पुरुषों का आंदोलन' भी कहा जाता था क्योंकि ये काले कपड़े और काले झंडे का
इस्तेमाल करते थे। उमय्यद शासक अरब मूल के लोगों को अधिक महत्व देते थे
और गैर-अरब मुसलमानों (मावली) व शिया समुदाय के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते
थे। उमय्यदों के इस भेदभावपूर्ण रवैये और भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक असंतोष ने इस
क्रांति की नींव रखी। 750 ईस्वी में जाब
नदी के युद्ध (Battle of the Zab) में
अब्बासिद सेना ने उमय्यदों को निर्णायक रूप से हराया, जिसके बाद
अंतिम उमय्यद खलीफा मारवान द्वितीय मिस्र भाग गया। अबू मुस्लिम खुरासानी अब्बासिद
क्रांति के मुख्य सूत्रधार, सेनापति और रणनीतिकार थे।
उन्हें अब्बासिद क्रांति का निर्माता माना जाता है, क्योंकि
उनके बिना उमय्यद राजवंश को उखाड़ फेंकना नामुमकिन था।
अब्दुल
अब्बास अब्बासी वंश के प्रथम ख़लीफ़ा बने। उन्होंने अपने आप को अल
सफ्फाह कहा। अब्बासियों ने उमैय्या वंश वालों को निर्ममतापूर्वक मार डाला।
अब्बासी क्रूरता और निर्ममता में उमैय्यों से कम न थे। क्रांति के सफल होने के बाद
अबू मुस्लिम खुरासान जनता के बीच एक महानायक की तरह पूजे जाने लगे। उनकी यही
अत्यधिक लोकप्रियता और बढ़ती ताकत नए अब्बासिद शासकों से देखी नहीं गई और उनकी हत्या
करवा दी गई। इससे लोगों में अब्बास के ख़िलाफ़ रोष फैल गया। जिन लोगों को अब्बास पर भी
भरोसा नहीं हुआ उनमें हज़रत अली के शिया अनुयायी भी थे। अब्बास और उसके वंशजों ने अल-मंसूर
के ख़िलाफ़त के काल में दमिश्क (सीरिया) से बगदाद (इराक) में अपनी राजधानी बनाकर अगले
लगभग 500 सालों तक राज किया।
अब्बासियों के समय में ईरानियों को भी साम्राज्य
में भागीदारी मिली। हालांकि वे किसी धार्मिक ओहदे पर नहीं रहे पर स्थापत्य तथा कविता
जैसी कलाओं में अच्छे होने की वजह से ईरानियों को शासन का सहयोग मिला। साहित्य, संस्कृति, दर्शन आदि
की अभूतपूर्व उन्नति हुई। ध्यान रहे कि कई मध्यकालीन इस्लामी विचारक, ज्योतिषी और
कवि इसी समय पैदा हुए थे। उमर ख़य्याम (12वीं सदी) ने
ज्योतिष विद्या में पूर्वी ईरान में एक अद्वितीय ऊँचाई छूई - एक नए पंचांग का आविष्कार
किया। उन्होंने कविताओं की रुबाई शैली में महारत
हासिल की और विज्ञान में कई योग दान दिए - जिसमें बीज गणित और खनिज-शास्त्र भी शामिल
हैं। फ़िरदौसी (11वीं सदी, महमूद गज़नी
के पिता का दरबारी) जैसे फ़ारसी कवि और रुमी (जन्म 1215)
जैसे सूफ़ी विचारक इसी समय पैदा हुए थे। हालांकि इनमें से अधिकतर को बग़दाद से कोई आर्थिक-वृत्ति
नहीं मिली थी पर इस में इस्लाम के धर्म शास्त्रियों की दखल का न होना ही एक बड़ा योगदान
था।
इस समय निस्संदेह रूप से पूरे इस्लामी
साम्राज्य को, जो स्पेन से भारत तक फैला था, एक सैनिक नायक
के अन्दर रखना मुश्किल था। इसलिए बग़दाद सिर्फ धार्मिक मुख्यालय रहा और स्थानीय शासक
सैनिक रूप से स्वतंत्र रहे। पूर्वी ईरान में जहाँ सामानी और उसके बाद ग़ज़नवी स्वतंत्र रहे
वहीं मध्य तथा पश्चिम में सल्जूक तुर्क शक्तिशाली
हो गए। धर्मयुद्धों के समय (1098-1270) भी बग़दाद ने
कोई बड़ी सफलता लेने में नाकामी दिखाई। वहीं सत्ता से बाहर रहे उमय्यदों के वंशजों
ने स्पेन में सन् 929 में अपनी एक अलग ख़िलाफ़त बना ली जो बग़दाद का इस्लामी प्रतिद्वंदी
बन गया। 1258 में मंगोलों की तेजी से
बढ़ती शक्ति ने हलाकू खान के नेतृत्व में बग़दाद को हरा दिया और शहर को लूट लिया गया।
लाखों लोग मारे गए और इस्लामी पुस्तकालयों को जला दिया गया। अंतिम अब्बासी खलीफा
अल-मुस्तसिम की हत्या कर दी गयी और बगदाद को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया, जिससे इस महान साम्राज्य का अंत हो गया। उस समय मंगोल मुस्लिम नहीं थे लेकिन अगले 100 सालों में
वे मुस्लिम बन गए।
6.8 इस्लामी मूल्यों को संरक्षित करने की कोशिश
इस्लामी राजनीति में सत्ता-लोभ, पद-लोलुपता
और धन-संचय की भावना के बलवती होते ही इस्लामी जगत परस्पर कलह, निर्मम
हत्याओं और कुत्सित षडयंत्रों का शिकार होता गया। शासक वर्ग विलासितापूर्ण जीवन
जीने लगे। ऐसे मेँ परस्पर द्वेष और वैमनस्य तथा आडंबरपूर्ण जीवन के विरुद्ध एक
आवाज़ उठी जो सूफ़ी आन्दोलन की धारा के रूप में फूट पड़ी। लगातार विजयों और
राज्य-सीमाओं में निरंतर वृद्धि के कारण पूरी क़ौम में एक प्रकार का उल्लास भर उठा।
विजय का नशा चढ़ने लगा, सांसारिकता बढ़ने लगी। आचरण और चारित्रिक
पतन हुआ। परलोक की प्राप्ति को सर्वोच्च सफलता मानने के स्थान पर लौकिक
सुख-समृद्धि और भोग-विलास पर ही दृष्टि टिककर रह गई। इस तरह की निन्दनीय परम्पराओं
का विरोध भी हुआ। कई लोगों ने अपने प्राणों की आहूति देकर इस्लामी परम्पराओं को
सुरक्षित रखने का भरपूर प्रयत्न किया तथा इस्लामी मूल्यों को आध्यात्मिक संस्थाओं
में संरक्षित करने की कोशिश की गई। इस्लामी मूल्यों और संस्कृति को संरक्षित व
प्रसारित करने के लिए राज्य, समाज और विद्वानों द्वारा भी कई
व्यापक प्रयास किए गए। शिक्षा प्रणाली इस्लामी मूल्यों को प्रसारित करने का सबसे
सशक्त माध्यम थी। शासकों और काजियों (न्यायाधीशों) ने इस्लामी न्याय व्यवस्था को
बनाए रखा। समाज में नैतिक व चारित्रिक विकास के लिए इस्लामिक मापदंडों का पालन
करना अनिवार्य माना जाता था। सूफी आंदोलन के माध्यम से इस्लामी अध्यात्म, प्रेम और
भाईचारे के मूल्यों को आम जनता तक पहुँचाया गया। खानकाहें इस्लामी नैतिकता और
शिक्षा के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। ‘कश्फ़-उलमहजूब’ में कहा
गया है कि “सूफ़ीवाद के
अस्तित्व में आने का मूल कारण उमय्या वंश के शासकों का भोग-विलास एवं
धार्मिक अवहेलना था।”
इन
परिस्थितियों में विरक्तों का विभिन्न स्थानों पर एकत्र होना स्वाभाविक था। ऐसे
समय में भी कुछ लोग थे जो विनम्रता, दानशीलता, त्याग, धैर्य, ईश-प्रेम का जीवन यापन कर रहे थे। ऐसे तमाम लोगों के बाहरी रहन-सहन और
निर्विकार जीवन को देखकर उन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। इनके जीवन से प्रेम, सौहार्द्र, नम्रता, त्याग और सेवा-भाव पल्लवित हो रहे थे। तसव्वुफ़ के दार्शनिकों और साधकों के जीवन और
सामान्य मुसलमानों के जीवन में अन्तर बढ़ता गया, इसलिए तसव्वुफ़ बाक़ायदा एक अलग पंथ बन गया। बसरा और कूफ़ा उनके
सर्वप्रथम केन्द्र बने। यहीं से सूफ़ीमत का वास्तविक इतिहास आरंभ होता है।
6.9 अह्लेबैत
"अह्ल" का अर्थ
'लोग' और "बैत"
का अर्थ 'घर', यानी घर के लोग, मतलब इस्लाम में मुहम्मद साहब सल्ल. के परिवार
और घर वालों को "अहल-ए-बैत" या :”अहल अल-बैत" कहते हैं। इस पवित्र
परिवार में पैगंबर की बेटी हज़रत फातिमा, उनके दामाद हज़रत अली, और उनके नवासे इमाम
हसन व इमाम हुसैन शामिल हैं। सभी मुसलमान अहल अल-बायत का बहुत आदर करते हैं।
अह्लेबैत, पैग़म्बर साहब के परिवारजन, का अनुपालन मुसलमानों का दायित्व माना गया है।
क़ुरआन में आदेश द्वारा पैग़म्बर से कहा गया है :
“आप कह दीजिए कि मैं
तुमसे अपने रसूल संबंधी कार्यों का कोई मानदेय नहीं चाहता, इसके सिवाय कि (तुम मेरे) परिवारजनों
से प्रेम करो।” (क़ुरआन : 42/23)
शिया समुदाय के
अनुसार, अहले बैत में पैगंबर मुहम्मद, हज़रत अली, हज़रत फातिमा, हज़रत हसन और हज़रत
हुसैन (जिन्हें 'चौदह मासूम' माना जाता है) के साथ-साथ इमाम हुसैन के नौ वंशज
(कुल बारह इमाम) शामिल हैं। इन्हें आध्यात्मिक रूप से त्रुटिहीन और पैगंबर के बाद
मुस्लिम समुदाय का वैध नेता माना जाता है। सुन्नी परंपरा में भी अहले बैत का
अत्यंत सम्मान किया जाता है। इसमें पैगंबर के परिवार के सदस्य (अली, फातिमा, हसन और हुसैन) तो
शामिल हैं ही, साथ ही पैगंबर की पत्नियां और उनके पूरे वंशज (जैसे बनू हाशिम) भी
शामिल माने जाते हैं। कुरान की आयत (33:33) के अनुसार, अहल अल-बैत को
ईश्वर द्वारा सभी प्रकार की अशुद्धियों से (पवित्र) और निष्कलंक रखने की बात कही
गई है। “अल्लाह तो बस यही
चाहता है कि ऐ नबी के घरवालों, तुमसे गन्दगी को
दूर रखे और तुम्हें पूरी तरह पाक-साफ़ रखे।”
आगे बढ़ने के पहले एक
महत्वपूर्ण बात की चर्चा यहीं कर लेना ज़रूरी है। सूफ़ी अपनी विचारधारा में सांसारिक
जीवन जीते हुए धार्मिक जीवन का निर्वाह करते थे। लेकिन उनका सांसारिक जीवन और धार्मिक
जीवन अलग-अलग था। शिया इस विचार से सहमत नहीं थे कि धर्म के नाम पर सांसारिक जीवन और
आध्यात्मिक जीवन अलग-अलग हो। शिया इस्लाम में यह माना जाता है कि धर्म (दीन) और
राजनीति या सांसारिक मामले आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार, पैगंबर मुहम्मद और
उनके बाद के दिव्य रूप से नियुक्त इमामों के पास न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन, बल्कि सांसारिक
मामलों में भी नेतृत्व का अधिकार था। उनका मानना था कि अगर धर्म सांसारिक जीवन से अलग
हुआ तो शासक वर्ग पर अंकुश नहीं रखा जा सकेगा और वे अत्याचारी व निरंकुश हो जाएंगे।
अतः शिया सूफ़ियों से अलग हो गए। सुन्नी सम्प्रदाय जो अब तक सूफ़ीमत के प्रति एकमत नहीं
हुआ था, सूफ़ीवाद का समर्थक हो गया। इसीलिए सूफ़ी लोगो को सुन्नी कहा जाता है। फिर भी शिया
मुसलमानों के लिए यह ख़ुशी की बात थी कि सूफ़ी अह्लेबैत का गुण-गान करते थे, हज़रत अली
रज़ि. के समर्थक थे, हज़रत इमाम हुसैन की ताज़ियादारी में सम्मिलित होते थे।
शिया वर्ग के अनुसार अह्लेबैत
पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम)
बीबी फातिमा (पैगंबर
मुहम्मद की बेटी)
हज़रत अली (पैगम्बर के चाचा के बेटे और हज़रत फातिमा के शौहर)
हज़रत इमाम हसन (हज़रत अली और बीबी फातिमा के बेटे)
हज़रत इमाम हुसैन (हज़रत अली
और बीबी फातिमा के बेटे)
हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अली इब्न हुसैन) चौथे इमाम
हज़रत इमाम मुहम्मद अल-बाकिर (मुहम्मद इब्न अली) पाँचवें इमाम
हज़रत इमाम जाफ़र अल-सादिक (जाफ़र इब्न मुहम्मद) छठे इमाम
हज़रत इमाम मूसा अल-काज़िम (मूसा इब्न जाफ़र) सातवें इमाम
हज़रत इमाम अली रज़ा (अली इब्न मूसा) आठवें इमाम
हज़रत इमाम मुहम्मद तकी (मुहम्मद इब्न अली) नवें इमाम
हज़रत इमाम अली नकी (अली इब्न मुहम्मद) दसवें इमाम
हज़रत इमाम हसन अस्करी (हसन इब्न अली) ग्यारहवें इमाम
हज़रत इमाम मुहम्मद
अल-महदी (अल-हसन) बारहवें इमाम, शिया मान्यताओं के अनुसार, वे अभी भी जीवित
हैं, लेकिन अल्लाह के हुक्म से इंसानों की नज़रों से छिपे हुए हैं (गैबत)।
वे एक निर्धारित समय पर दुनिया में वापस प्रकट होंगे। सुन्नी विद्वानों के अनुसार, इमाम महदी का जन्म
अभी नहीं हुआ है। वे आख़िरी ज़माने में पैदा होंगे।
अह्लेबैत के इमाम
– इमाम
हसन (मृ. 670 ई.),
इमाम हुसैन, (मृ. 680 ई.), इमाम ज़ैनुलआबिदीन, (मृ. 713 ई.), इमाम मुहम्मद बाक़िर,
(मृ. 733 ई.),
और इमाम जाफ़र सादिक़, (मृ. 765 ई.)
को समस्त सूफ़ी परंपराएं अपना धार्मिक गुरु मानती
हैं।
नौंवीं शताब्दी में सूफ़ियों के जो धार्मिक गुरु हुए वे हैं, इमाम मूसा काज़िम, (मृ. 799 ई.), इमाम
रिज़ा (मृ. 819 ई.), इमाम मुहम्मद तक़ी, (मृ. 835 ई.), इमाम अली नक़ी, (मृ. 868 ई.), इमाम हसन असकरी, (मृ. 873 ई.), और इमाम महदी आख़िरउज़्ज़मां।
अपने क्रियाकलापों के आधार पर उस समय तक सूफ़ी समुदाय
निम्नलिखित थे –
नुस्साक – ईशवंदना में तल्लीन रहने वाले। ये वे लोग होते थे जो अपनी
भक्ति और तपस्या (इबादत) के लिए जाने जाते थे। इनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक
कर्मकांडों और रहस्यमयी इबादतों के माध्यम से अध्यात्म साधना करना होता था
बुक्कून – ईशवंदना में विलाप करने वाले। यह शब्द अरबी के रोने/विलाप
करने से संबंधित है। ये वे उपदेशक या साधक थे जो लोगों को अपने भाषणों और कहानियों
के माध्यम से रुलाते थे, जिसका
उद्देश्य लोगों के मन में पश्चाताप, वैराग्य, और ईश्वर का भय (ख़ौफ़) पैदा करना होता था।
क़ुस्सास – जनता में प्रवचन करने वाले। ये वे लोग थे जो मस्जिद या
सार्वजनिक स्थानों पर बैठ कर लोगों को धार्मिक कहानियाँ, नबियों
के किस्से, और
नैतिक शिक्षाप्रद कथाएँ सुनाते थे।
समय के साथ-साथ ये दो अलग-अलग चिंतन धारा में बंट गए –
बसरा (इराक़) को अपना केन्द्र बना कर रहने वाले सूफी धर्मगुरुओं में
सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम है – हज़रत हसन बसरी रह. (मृ. 728 ई.)। बसरा सूफीवाद का प्रमुख पालना माना जाता है, जहाँ से कई प्रसिद्ध संतों ने शुरुआत की, लेकिन वे अलग-अलग अरब और फारसी पृष्ठभूमि से आते
थे।
कूफ़ा (ईराक़) को अपना केन्द्र बनाकर रहने वाले - ये यमनी वंशज थे। इराक के
प्राचीन और महत्वपूर्ण शहर कूफ़ा की स्थापना के समय, इसकी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा दक्षिण अरब
(यमन) से आए कबीलों का था। दूसरे खलीफा उमर इब्न अल-खत्ताब द्वारा 638 ईस्वी में एक सैन्य छावनी
के रूप में कूफ़ा की स्थापना की गई थी। जब शुरुआती लोग यहां बसे, तो इसकी आबादी में आए अधिकाँश
लोग दक्षिणी अरब, विशेष रूप से यमन के शक्तिशाली कबीले जैसे कि किंदा, हमदान, और मदहिज, से थे। चौथे
खलीफा और शिया समुदाय के पहले इमाम, हज़रत अली इब्न अबी तालिब ने अपनी खिलाफत के दौरान मदीना से
अपनी राजधानी कूफ़ा स्थानांतरित की थी। इसके बाद, यह शहर पैगंबर मुहम्मद के
परिवार (अहल-ए-बैत) और उनके अनुयायियों के लिए एक मुख्य गढ़ बन गया। ऐतिहासिक रूप
से भी, कूफ़ा केवल एक सैन्य छावनी
नहीं रहा, बल्कि यह इस्लामिक रहस्यवाद
का एक महान केंद्र बन गया। हालाकि औपचारिक रूप से 'सूफी' शब्द बाद के सदियों में
अधिक प्रचलित हुआ, लेकिन
पैगंबर के परिवार और उनके साहसी साथियों द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान, रहस्यवाद और तपस्या का
अभ्यास इसी केंद्र से आगे बढ़ा। कालांतर में इस धारा के कुछ
धर्मगुरु बग़दाद आ गए और 886 ई. के बाद बग़दाद सूफ़ियों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बना। इनमें से प्रसिद्ध
नाम है – हज़रत ज़ुन्नून मिस्री, (मृ. 859 ई.), हज़रत मंसूर हल्लाज (मृ. 921 ई.)
खुरासान और फारस (ईरान/मध्य एशिया): इब्राहिम इब्न अधम जैसे
शुरुआती संतों के प्रयासों से बाल्ख और निशापुर जैसे शहर सूफी गतिविधियों के मुख्य केंद्र बने। बाल्ख के
राजा इब्राहिम इब्न अधम ने अपनी विलासितापूर्ण जिंदगी त्यागकर फकीरी और सादगी का
मार्ग अपनाया। उनके इस साहसिक वैराग्य ने लोगों को आकर्षित किया और उनके माध्यम से
इस क्षेत्र में 'तसव्वुफ़' (सूफीवाद) की आध्यात्मिक
नींव पड़ी। उनके शिष्य, जैसे कि शकीक अल-बल्खी ने आगे चलकर बाल्ख में इस रहस्यवादी परंपरा को और मजबूत
किया। बाल्ख की तरह ही निशापुर भी सूफीवाद का बड़ा केंद्र बना। यहाँ के संतों
(जैसे हजरत फातिमा निशापुरी, मलामतिया और करामिया आंदोलनों) ने सूफी विचार, आंतरिक शुद्धि और नैतिक
शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाया। बाल्ख और निशापुर जैसे शहरों में बाद में सूफी संत, विद्वान, और कवियों ने मिलकर खानकाह
और मदरसों की स्थापना की, जहाँ इन संतों की विचारधाराओं पर आधारित आध्यात्मिक चर्चाएं, साहित्य और दर्शन फले-फूले।
जब सूफी संत भारत आए, तो उन्होंने शुरुआत में
उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत (खास कर मुल्तान, सिंध, पंजाब और दिल्ली) को अपनी गतिविधियों का मुख्य केंद्र (खानकाह) बनाया। इसका
मुख्य कारण था मध्य एशिया और फारस (ईरान/अफगानिस्तान) से आने वाले सूफी संत
ज़्यादातर उत्तर-पश्चिमी सीमा से ही दाखिल होते थे। 12वीं और 13वीं सदी के दौरान
दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ दिल्ली राजनीति सत्ता का केंद्र बन गया।
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी जैसी कई संतो ने दिल्ली को अपना मुख्य आश्रम (खानकाह)
बनाया।
इनके बारे में चर्चा आगे की जाएगी।
तसव्वुफ़ या सूफ़ी-मत इस्लाम का ही एक रूहानी (आध्यात्मिक) और बातिन (आंतरिक)
हिसा है। सूफ़ी क़ुरान हदीस पर चलने वाले मोमिन होते हैं। सही तारीख वाले सूफी पक्के
मोमिन (मोमिनीन) होते हैं जो अपनी जिंदगी कुरान और हदीस के उसूलों के मुताबिक
गुज़ारते हैं। इस्लाम को अगर समझना है तो क़ुरान हदीस से
समझा जा सकता हैं और क़ुरान हदीस को जो समझे वो असल मोमीन होता है। मोमिन वह होता है जिसका ईमान उसके दिल और रूह में
गहराई तक उतर जाता है। यह आस्था का एक उच्च स्तर है। जो हज़रत मोहम्मद सल्ल. और सहाबा के तौर तरीके को अपनाता हैं और दुनिया को भूल कर अल्लाह की राह में ज़िन्दगी बसर यानि गुजारता हैं वही सूफ़ी होता है। अपनी सारी ज़िन्दगी
अल्लाह और उसके रसूल के नाम पर करने के बाद वो 'सच्चा मोमिन', 'वली' (अल्लाह का दोस्त/भक्त), या 'मुत्तकी' ('ईश्वर-भक्त') हो जाता हैं।
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मनोज
कुमार