राष्ट्रीय आन्दोलन
493. राजकोट सत्याग्रह (1938-1939)
राजकोट
सत्याग्रह (1938-1939) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश भारत की
रियासतों (प्रिंसली स्टेट) में लोकतांत्रिक सुधारों और नागरिक
स्वतंत्रता के लिए चलाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अहिंसक आंदोलन था। यह
आंदोलन इस मायने में अनोखा था कि इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी
को पहली बार किसी देशी रियासत के आंतरिक प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप करने पर मजबूर
किया। इसका कारण राजकोट के शासक
(ठाकुर) धर्मेंद्रसिंहजी और उनके दीवान वीरवाला द्वारा लगाए गए भारी कर, तानाशाही
रवैया और लोगों के नागरिक अधिकारों (भाषण और संगठन की स्वतंत्रता) पर प्रतिबंध था।
यह ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि ब्रिटिश संरक्षण
में चल रही एक रियासत (प्रिंसली स्टेट) के निरंकुश शासक और उसके दीवान के खिलाफ जनता का संघर्ष
था।
राजकोट शहर
काठियावाड़
प्रायद्वीप में स्थित राजकोट की आबादी लगभग 75,000 थी। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान, राजकोट शहर 'वेस्टर्न
इंडिया स्टेट एजेंसी' का प्रशासनिक मुख्यालय था। यहाँ ब्रिटिश रेजिडेंट का निवास स्थान
था, और ब्रिटिश
पॉलिटिकल एजेंट यहाँ से उस इलाके के कई राज्यों पर अपनी निगरानी रखता था। भौगोलिक
दृष्टि से यह आजी और न्ययारी नदियों के किनारे बसा हुआ है। यहाँ से प्रायद्वीप के
अन्य सभी प्रमुख शहरों की दूरी लगभग समान है। इस शहर की स्थापना वर्ष 1612 में
जाडेजा राजपूत वंश के ठाकुर साहब विभाजी अजोजी ने की थी। महात्मा गांधी ने अपने
जीवन के शुरुआती वर्ष राजकोट में ही बिताए थे। उनके पिता करमचंद गांधी यहाँ के
दीवान थे। गांधीजी की प्रारंभिक शिक्षा यहीं के 'अल्फ्रैड हाई
स्कूल' (अब महात्मा गांधी म्यूजियम) में हुई थी। यहाँ के राष्ट्रीय
शाला की
स्थापना 1921
में महात्मा गांधी ने गैर-सहयोग आंदोलन के दौरान की थी, ताकि
छात्रों को राष्ट्रीय और खादी आधारित शिक्षा दी जा सके। यह राजकोट सत्याग्रह का
मुख्य केंद्र भी रहा था और गांधीजी ने यहीं आमरण अनशन किया था।
लखाजीराज का शासन काल
राजकोट पर 1930
तक (बीस साल तक) लखाजीराज ने शासन किया। उन्होंने अपने राज्य के औद्योगिक, शैक्षिक और राजनीतिक विकास को बढ़ावा
देने के लिए बहुत प्रयास किए। लखाजीराज ने 1923 में 'राजकोट प्रजा प्रतिनिधि सभा' की शुरुआत करके सरकार में लोगों की
भागीदारी को बढ़ावा दिया। इस प्रतिनिधि सभा में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार
पर चुने गए 90 प्रतिनिधि शामिल थे। हालाँकि शासक, जिन्हें 'ठाकोर साहिब' कहा जाता था, के पास किसी भी सुझाव को वीटो करने
(अस्वीकार करने) का पूरा अधिकार था,
फिर भी लखाजीराज के शासनकाल में ऐसा बहुत कम ही होता था और उनके नेतृत्व में
लोगों की भागीदारी को काफी मान्यता मिली।
लखाजीराज ने
राष्ट्रवादी राजनीतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने 1921 में राजकोट में
पहली काठियावाड़ राजनीतिक कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के लिए मनसुखलाल मेहता और
अमृतलाल सेठ को अनुमति दी, जिसकी
अध्यक्षता विट्ठलभाई पटेल ने की थी। वे खुद कॉन्फ्रेंस के राजकोट और भावनगर (1925)
सत्रों में शामिल हुए। राजकोट
में एक राष्ट्रीय स्कूल शुरू करने के लिए उन्होंने ज़मीन दान की। यह स्कूल राजनीतिक
गतिविधियों का केंद्र बन गया। ब्रिटिश
पॉलिटिकल एजेंट या रेजिडेंट की परवाह किए बिना, उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतीक के
तौर पर खादी पहनी। उन्हें गांधीजी और उनकी उपलब्धियों पर बहुत गर्व था। वे अक्सर 'राजकोट के बेटे' को दरबार में बुलाते थे और गांधीजी को
सिंहासन पर बिठाते थे, जबकि
वे खुद दरबार में बैठते थे। उन्होंने राज्य की यात्रा के दौरान जवाहरलाल नेहरू का
सार्वजनिक स्वागत किया।
ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने राज्य की
बागडोर संभाली
1939 में
लखाजीराज की मौत हो गई। उनके बेटे ठाकुर धर्मेंद्र सिंह ने राज्य की बागडोर संभाल
ली। नए ठाकुर को सिर्फ़ ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में दिलचस्पी थी। असली ताकत क्रूर
दीवान वीरवाला के हाथों में आ गई। उन्होंने ठाकुर को राज्य की दौलत बर्बाद करने से
रोकने के लिए कुछ नहीं किया। हालात इतने खराब हो गए कि राज्य को माचिस, कपड़े, चीनी, चावल
और सिनेमा लाइसेंस बेचने के एकाधिकार (मोनोपॉली) अलग-अलग व्यापारियों को बेचने
पड़े। इसका तुरंत असर कीमतों में बढ़ोतरी के तौर पर दिखा और लोगों में असंतोष और
बढ़ गया।
पहला संघर्ष
रियासत की जनता
के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने का अधिकार और बुनियादी शिक्षा
सुविधाओं का घोर अभाव था। राजकोट और काठियावाड़ में राजनीतिक समूहों के कई सालों
के राजनीतिक काम से संघर्ष की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। इस दमनकारी शासन के खिलाफ
जनता को संगठित करने के लिए 'राजकोट प्रजा परिषद' की स्थापना की
गई। पहले समूह का नेतृत्व मनसुखलाल मेहता और अमृतलाल सेठ ने किया और बाद में
बलवंतराय मेहता ने। दूसरे का नेतृत्व फूलचंद शाह ने किया; तीसरे
का व्रजलाल शुक्ला ने। चौथे समूह में गांधीवादी रचनात्मक कार्यकर्ता शामिल थे, जो
1936 के बाद यू.एन. ढेबर के नेतृत्व में राजकोट संघर्ष में मुख्य समूह के तौर पर
उभरे। स्थानीय 'प्रजा मंडल' और जनता रियासत में एक लोकतांत्रिक और
उत्तरदायी शासन (responsible government) की स्थापना चाहती थी।
पहला संघर्ष
गांधीवादी कार्यकर्ता बेचरवाला वढेरा और जेठालाल जोशी के नेतृत्व में शुरू हुआ। उन्होंने
दीवान वीरवाला के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन की थी। उन्होंने सरकारी कॉटन मिल के
800 मज़दूरों को एक यूनियन में संगठित किया और बेहतर काम की स्थितियों की मांग को
लेकर 1936 में इक्कीस दिन की हड़ताल का नेतृत्व किया। दरबार को यूनियन की मांगें
मानने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस जीत ने जोशी और वढेरा को मार्च 1937 में
काठियावाड़ राजकीय परिषद की पहली बैठक बुलाने के लिए प्रोत्साहित किया। 15,000 लोगों की उपस्थिति वाली इस
बैठक में जिम्मेदार सरकार, करों
में कमी और राज्य के खर्च में कटौती की मांग की गई। दरबार की तरफ से कोई जवाब नहीं
मिला।
सरदार पटेल का प्रवेश
15 अगस्त 1938
को परिषद के कार्यकर्ताओं ने गोकुलाष्टमी मेले में जुए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
किया। पहले से तय योजना के अनुसार,
प्रदर्शनकारियों को पहले एजेंसी पुलिस और फिर राज्य पुलिस ने बुरी तरह लाठियों
से पीटा। इसके परिणामस्वरूप राजकोट शहर में पूरी तरह से हड़ताल हो गई। मजदूरों और किसानों ने भी हड़तालें शुरू
कर दीं। आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर और जनता के निमंत्रण पर सरदार वल्लभभाई
पटेल ने आंदोलन
की कमान संभाली। उन्होंने सूती कपड़ों और राज्य के एकाधिकार वाली वस्तुओं के
बहिष्कार का आह्वान किया। 5 सितंबर को परिषद का एक सत्र आयोजित किया गया जिसकी
अध्यक्षता सरदार पटेल ने की। दीवान वीरावाला के साथ एक बैठक में, पटेल ने परिषद की ओर से
जिम्मेदार सरकार के लिए प्रस्ताव तैयार करने वाली एक समिति, प्रतिनिधि सभा के लिए नए चुनाव, भूमि राजस्व में पंद्रह प्रतिशत
की कमी, सभी एकाधिकार
या 'इजारे' को रद्द करने और राज्य के खजाने
पर शासक के दावे को सीमित करने की मांग की। दरबार ने मांगों को मानने के बजाय, रेजिडेंट से स्थिति से प्रभावी
ढंग से निपटने के लिए एक ब्रिटिश अधिकारी को दीवान नियुक्त करने को कहा। कैडेल ने
12 सितंबर को कार्यभार संभाला। इस बीच, वीरावाला खुद ठाकुर के निजी सलाहकार बन गए, ताकि वे पर्दे के पीछे से काम
करना जारी रख सकें।
सत्याग्रह अब
बड़े पैमाने पर फैल गया। इसमें ज़मीन का लगान न देना, एकाधिकार वाले अधिकारों को न मानना, और राज्य में बनी सभी चीज़ों का
बहिष्कार करना शामिल था। स्टेट बैंक में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और राज्य की कॉटन
मिल में हड़ताल हुई, साथ ही
छात्रों ने भी हड़ताल की। राज्य की आमदनी के सभी ज़रियों, जिनमें एक्साइज़ और कस्टम ड्यूटी
भी शामिल थे, को
रोकने की कोशिश की गई।
सरदार पटेल हर शाम टेलीफ़ोन के ज़रिए राजकोट के नेताओं के संपर्क में रहते थे।
काठियावाड़ के दूसरे हिस्सों से स्वयंसेवक आने लगे। इस आंदोलन में ज़बरदस्त संगठन देखने को मिला। कमांड की
एक गुप्त व्यवस्था यह पक्का करती थी कि अगर एक नेता गिरफ़्तार हो जाए, तो दूसरा नेता ज़िम्मेदारी संभाल ले। अख़बारों में
छपने वाले कोड नंबरों से हर सत्याग्रही को राजकोट पहुँचने की तारीख़ और वहाँ की
व्यवस्थाओं के बारे में जानकारी मिल जाती थी।
नवंबर के आखिर तक, अंग्रेज़ राजकोट में कांग्रेस की
संभावित जीत के नतीजों को लेकर साफ़ तौर पर परेशान थे। वायसराय लिनलिथगो ने
सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट को तार भेजा: ‘मुझे इसमें ज़रा भी शक नहीं है कि अगर
कांग्रेस राजकोट मामले में जीत जाती है, तो यह आंदोलन
पूरे काठियावाड़ में फैल जाएगा और वे अपनी गतिविधियाँ दूसरी दिशाओं में भी बढ़ा
लेंगे...’
लेकिन दरबार ने पॉलिटिकल डिपार्टमेंट की सलाह को नज़रअंदाज़ करने और सरदार
पटेल के साथ समझौता करने का फ़ैसला किया। 26 दिसंबर, 1938 को हुए समझौते में ठाकुर के 'प्रिवी पर्स' (शाही भत्ते) की सीमा तय करने और सुधारों की योजना बनाने के लिए राज्य के दस
लोगों या अधिकारियों की एक समिति बनाने की बात कही गई थी, ताकि लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार दिए जा सकें। ठाकुर की ओर से सरदार
को लिखे एक अलग पत्र में यह अनौपचारिक सहमति शामिल थी कि 'समिति के सात सदस्यों की सिफ़ारिश सरदार वल्लभभाई पटेल करेंगे और उन्हें हम
नामांकित करेंगे'। सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया और सत्याग्रह वापस ले लिया गया।
समझौते का
उल्लंघन
लेकिन ठाकुर की इस खुली बगावत का ब्रिटिश सरकार स्वागत नहीं कर सकती थी। ब्रिटिश
रेजिडेंट और दीवान वीरवाला के दबाव में आकर ठाकुर ने सरदार पटेल द्वारा सुझाए गए
नामों को खारिज कर दिया और समझौते को तोड़ दिया। तुरंत ही रेजिडेंट, पॉलिटिकल डिपार्टमेंट, वायसराय और सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के
बीच बातचीत हुई और ठाकुर को निर्देश दिया गया कि वे सरदार द्वारा भेजी गई कमेटी के
सदस्यों की सूची को स्वीकार न करें, बल्कि रेजिडेंट
की मदद से सदस्यों की एक नई सूची तैयार करें। इसके बाद, पटेल द्वारा भेजी गई नामों की सूची को खारिज कर दिया गया; इसका कारण यह बताया गया कि उस सूची में केवल ब्राह्मणों और बनियों के नाम थे
और उसमें राजपूतों,
मुसलमानों और दबे-कुचले वर्गों को कोई प्रतिनिधित्व
नहीं दिया गया था। इसके विरोध में जनवरी 1939 में आंदोलन फिर से उग्र हो गया।
कस्तूरबा
गांधी की गिरफ्तारी
राज्य द्वारा समझौते का उल्लंघन किए जाने के कारण 26 जनवरी 1939 को सत्याग्रह फिर से शुरू हो गया। वीरावाला ने इसका जवाब
कड़े दमन से दिया। पहले की तरह, इससे जल्द ही राजकोट के बाहर के
राष्ट्रवादियों में चिंता और आक्रोश बढ़ने लगा। गांधीजी की पत्नी कस्तूरबा, जो राजकोट में ही पली-बढ़ी थीं, वहाँ के हालात
से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने खराब सेहत और सबकी सलाह के बावजूद राजकोट जाने
का फैसला किया। वहाँ पहुँचने पर, उन्हें और उनकी साथी मणिबेन पटेल
(जो सरदार की बेटी थीं) को गिरफ्तार कर लिया गया और राजकोट से सोलह मील दूर एक
गाँव में नज़रबंद कर दिया गया।
महात्मा
गांधी का आमरण अनशन
राजकोट से गांधीजी का गहरा भावनात्मक लगाव था क्योंकि उनके पिता वहां के दीवान
रहे थे और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं हुई थी। जनता पर हो रहे
अत्याचारों को देखकर महात्मा ने तय किया कि
उन्हें भी राजकोट जाना चाहिए। गांधीजी 28 फरवरी 1939 को राजकोट पहुंचे। उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि ठाकुर साहब का किसी
पक्के समझौते को तोड़ना एक गंभीर मामला है और हर सत्याग्रही का फ़र्ज़ है कि वह
इसका विरोध करे। उन्हें यह भी लगता था कि राजकोट पर उनका मज़बूत दावा है, क्योंकि उनके परिवार के उस रियासत और ठाकुर के परिवार से करीबी संबंध थे; और इसी वजह से उनका व्यक्तिगत रूप से दखल देना सही और ज़रूरी था। उनकी इच्छा के अनुसार, बातचीत का
रास्ता बनाने के लिए बड़े पैमाने पर हो रहे सत्याग्रह को रोक दिया गया। लेकिन
रेजिडेंट, ठाकुर और दीवान वीरावाला के साथ कई दौर की बातचीत का कोई
नतीजा नहीं निकला। इसके बाद गांधीजी ने अल्टिमेटम दिया कि अगर 3 मार्च तक दरबार सरदार के साथ हुए समझौते को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो वे आमरण अनशन शुरू कर देंगे। ठाकुर, या यूँ कहें कि
वीरावाला—जो असल में सत्ता की बागडोर संभाले हुए थे—अपनी पुरानी बात पर अड़े रहे, जिससे गांधीजी के पास अनशन शुरू करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा।
ठाकुर द्वारा अपना वादा निभाने से इनकार करने पर गांधीजी ने 3 मार्च 1939 को राजकोट की 'राष्ट्रीय शाला' में आमरण अनशन (Fast unto death) शुरू कर दिया। यह उपवास देशव्यापी विरोध का संकेत था। गांधीजी की सेहत पहले से
ही खराब थी और लंबे समय तक उपवास करना खतरनाक हो सकता था। हड़तालें हुईं, विधानसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई और आखिर में यह धमकी भी दी गई कि
कांग्रेस सरकारें इस्तीफा दे सकती हैं। वायसराय को दखल देने की मांग करते हुए बहुत
सारे टेलीग्राम भेजे गए। गांधीजी ने खुद सर्वोच्च सत्ता से आग्रह किया कि वह ठाकुर
को अपना वादा पूरा करने के लिए मनाकर राज्य की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी
निभाए। गांधीजी के अनशन से पूरे देश में खलबली मच गई और गांधीजी के गिरते स्वास्थ्य
को देखकर ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। 7 मार्च को, वायसराय ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर द्वारा
मध्यस्थता का सुझाव दिया, ताकि यह तय किया जा सके कि क्या
ठाकुर ने वास्तव में समझौते का उल्लंघन किया है। यह एक उचित प्रस्ताव लगा। मुख्य
न्यायाधीश ने अपना फैसला सरदार पटेल और जनता के पक्ष में सुनाया, जिसके बाद 7 मार्च 1939 को गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा।
3 अप्रैल, 1939 को घोषित चीफ
जस्टिस के फ़ैसले ने सरदार के इस दावे को सही ठहराया कि दरबार उनके सात नॉमिनी
(नामित लोगों) को स्वीकार करने के लिए सहमत हो गया था। अब गेंद ठाकुर के पाले में
थी। लेकिन राजकोट में कोई बदलाव नहीं आया। वीरावाला ने राजपूत, मुस्लिम और दबे-कुचले वर्गों के प्रतिनिधित्व के दावों को
बढ़ावा देने की अपनी नीति जारी रखी और गांधीजी के उन प्रस्तावों को मानने से इनकार
कर दिया, जिनमें सरदार और परिषद के नॉमिनी
का बहुमत बनाए रखते हुए इन वर्गों के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने की बात कही गई
थी।
जल्द ही हालात बिगड़ने लगे। गांधीजी की
प्रार्थना सभाओं के दौरान राजपूतों और मुसलमानों ने विरोध-प्रदर्शन किए। मोहम्मद अली जिन्ना व अंबेडकर ने मुसलमानों और दबे-कुचले वर्गों के लिए अलग
प्रतिनिधित्व की मांग की। दरबार ने इन सब बातों का इस्तेमाल समझौते को न तो
अक्षरशः और न ही उसकी भावना के अनुरूप मानने से इनकार करने के लिए किया। सर्वोच्च
सत्ता (ब्रिटिश सरकार) ने भी इसमें दखल नहीं दिया, क्योंकि
कांग्रेस की पूरी जीत सुनिश्चित करने में उसे कोई फायदा नहीं था, बल्कि नुकसान ही होता। साथ ही, रियासतों में
जिम्मेदार सरकार को बढ़ावा देने में भी उसे अपनी कोई भूमिका नहीं दिखी।
इस समय, अपनी असफलता के कारणों पर विचार करते हुए गांधीजी इस नतीजे
पर पहुँचे कि इसका कारण 'सर्वोच्च सत्ता' (Paramount Power) के अधिकार का इस्तेमाल करके ठाकुर को समझौते के लिए मजबूर
करने की उनकी कोशिश थी। उन्हें यह तरीका हिंसा जैसा लगा; अहिंसा का मतलब तो यह होना चाहिए था कि वे अपना अनशन सिर्फ़ ठाकुर और वीरावाला
के ख़िलाफ़ करते और 'हृदय परिवर्तन' के लिए सिर्फ़
अपनी तकलीफ़ की ताकत पर भरोसा करते। इसलिए, उन्होंने ठाकुर
को समझौते से मुक्त कर दिया, वायसराय और मुख्य न्यायाधीश से
उनका समय बर्बाद करने के लिए माफ़ी माँगी, साथ ही अपने
विरोधियों—मुसलमानों और राजपूतों—से भी माफ़ी माँगी और राजकोट छोड़कर ब्रिटिश भारत
लौट आए।
राजकोट
सत्याग्रह का ऐतिहासिक महत्व
यद्यपि राजकोट एक छोटी रियासत थी, लेकिन इस
सत्याग्रह का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर बहुत गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ा। राजकोट
सत्याग्रह ने रियासतों की उस स्थिति को उजागर कर दिया, जिसने विरोध के काम को बहुत मुश्किल बना दिया था। रियासतों के शासकों को सुधार
की किसी भी कोशिश के ख़िलाफ़ ब्रिटिश सरकार की ताक़त का संरक्षण हासिल था। सुधार के लिए ब्रिटिश सरकार पर जनता के दबाव का सामना हमेशा
रियासतों की स्वायत्तता (autonomy) की क़ानूनी स्थिति का हवाला देकर
किया जा सकता था। जब रियासतें कोई ऐसा रास्ता अपनाना चाहती थीं जो सर्वोच्च सत्ता
(Paramount Power)
को पसंद न हो, तो ब्रिटिश
अक्सर इस क़ानूनी आज़ादी को भूल जाते थे। आख़िरकार, ब्रिटिश सरकार
ने ही ठाकुर को सरदार के साथ हुए समझौते का पालन न करने के लिए उकसाया था।
रियासतों में विरोध के आंदोलन ब्रिटिश भारत के आंदोलनों के हालात से बहुत अलग थे।
कांग्रेस का यह कहना गलत नहीं था कि रियासती भारत और ब्रिटिश भारत के आंदोलनों को
मिलाया नहीं जा सकता। भारतीय रियासतों से टकराने में कांग्रेस अब तक हिचकिचाहट दिखाती
रही थी।
कुटिल राजनीतिक चालों के कारण यह सुधार समिति पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।
गांधीजी ने इसे अपनी "आध्यात्मिक हार" मानकर अपने अधिकार
स्वेच्छा से छोड़ दिए। फिर भी इस सत्याग्रह का भारतीय
इतिहास में बहुत बड़ा महत्व है: इसने देश की सभी रियासतों की जनता के भीतर चेतना
जगाई कि वे भी आजादी की लड़ाई का हिस्सा हैं। इसने भारत की अन्य 500 से अधिक रियासतों (Princely States) की जनता को यह संदेश दिया कि वे भी अपने अधिकारों के लिए
लड़ सकते हैं। इसने 'अखिल भारतीय
राज्य जन परिषद' (All India States Peoples' Conference) के आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
इससे पहले तक कांग्रेस रियासतों के आंतरिक मामलों में सीधे हस्तक्षेप करने से
बचती थी (हरिपुरा अधिवेशन 1938 तक)। लेकिन
राजकोट सत्याग्रह के बाद कांग्रेस ने अपनी नीति बदली और रियासतों की जनता के
लोकतांत्रिक अधिकारों का खुलकर समर्थन करना शुरू किया। इसने साबित कर दिया कि कांग्रेस केवल ब्रिटिश भारत ही नहीं, बल्कि रियासतों के नागरिकों की लड़ाई लड़ने में भी सक्षम
है। इसी जन-प्रतिरोध की नींव के कारण आजादी के बाद राजकोट और
सौराष्ट्र की अन्य रियासतों का भारत में विलय बेहद सुगम हो सका।
राजकोट सत्याग्रह के साफ़ तौर पर नाकाम होने के बावजूद, इसने रियासतों के लोगों, खासकर पश्चिमी भारत के लोगों पर
राजनीतिक रूप से बहुत असर डाला। इसने राजाओं को यह भी दिखा दिया कि वे सिर्फ़
इसलिए टिके हुए थे क्योंकि अंग्रेज़ उन्हें सहारा दे रहे थे। इस तरह, राजकोट के संघर्ष और उस समय के दूसरे संघर्षों ने आज़ादी के समय रियासतों के
एकीकरण की प्रक्रिया को आसान बनाया। जिन राजाओं ने खुद देखा था कि लोग विरोध करने
में सक्षम हैं, वे 1947 में एकीकरण के दबाव का विरोध करने
में हिचकिचाए। इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि सरदार पटेल केवल ब्रिटिश सरकार से
ही नहीं, बल्कि चालाक देसी राजाओं और उनके
दीवानों से भी लोहा लेने में माहिर हैं। यही अनुभव आगे चलकर आजादी के बाद भारत के
राजनीतिक एकीकरण (रियासतों के विलय) में काम आया। अगर ये संघर्ष न हुए होते, तो एकीकरण की पूरी प्रक्रिया निश्चित रूप से बहुत मुश्किल और लंबी होती। इसमें
कोई हैरानी की बात नहीं है कि 1947-48 में एकीकरण कराने में सबसे अहम
भूमिका निभाने वाले व्यक्ति वही सरदार थे, जो राजाओं के
ख़िलाफ़ कई संघर्षों में शामिल रहे थे।
राजकोट रियासत (काठियावाड़ एजेंसी) का भारत में विलय 15 फरवरी 1948 को हुआ, जब अंतिम शासक ठाकुर साहब प्रद्युमनसिंहजी ने भारतीय संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद इसे नवगठित 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ काठियावाड़' में मिला दिया
गया, जिसे बाद में सौराष्ट्र राज्य कहा गया। 1947 में स्वतंत्रता के बाद, भारत के एकीकरण में राजकोट के शासक ने अपनी प्रजा की बेहतरी और शांतिपूर्ण
एकीकरण के लिए काठियावाड़ के लगभग 200 अन्य छोटे-बड़े
राज्यों के साथ मिलकर 'यूनाइटेड
स्टेट्स ऑफ काठियावाड़' के निर्माण पर सहमति दी। 15 अप्रैल 1948 को सौराष्ट्र
राज्य के अस्तित्व में आने के बाद राजकोट को इसकी प्रारंभिक राजधानी बनाया गया। 1 नवंबर 1956 को राज्य
पुनर्गठन अधिनियम के तहत सौराष्ट्र राज्य बॉम्बे स्टेट का हिस्सा बन गया। अंततः, 1 मई 1960 को भाषाई
विभाजन के बाद राजकोट नवगठित गुजरात राज्य का हिस्सा बना।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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