सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
8. सूफ़ीमत का विकास-द्वितीय चरण-1
“हे नबी! हमने आपकी ओर सत्य पर आधारित पुस्तक (क़ुरआन) उतार दी, जो अपने पूर्व की
पुस्तकों को सच बताने वाली तथा संरक्षक है, अतः आप लोगों का
निर्णय उसी से करें, जो अल्लाह ने उतारा है तथा उनकी मनमानी पर उस सत्य से विमुख होकर न
चलें, जो आपके पास आया है। हमने सबके लिए अलग-अलग धर्म सिद्धांत और मार्ग निश्चित कर दिया है और
यदि ईश्वर चाहता तो सबको एक ही सम्प्रदाय का बना देता लेकिन वह अपने द्वारा प्रदान
की हुई विधि से तुम्हें परखना चाहता है। अतः तुम सब पुण्य की प्रतिस्पर्धा
करो कि अल्लाह ही की ओर तुम सबको लौटकर जाना है। वहां वह तुम्हें उन सभी बातों से
अवगत कराएगा, जिनमें तुम असहमति कर रहे थे।” (क़ुरआन : 5/48)
एक मत के अनुसार इस्लाम में सूफ़ीमत का विकास किसी धर्म
में होने वाले रहस्यवादी आंदोलन (Mystic Movement) की सफलता और लोकप्रियता का
महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प इतिहास है, जिसकी जड़ें कुरान की शिक्षाओं और पैगंबर
मुहम्मद सल्ल. के जीवन में हैं। यह आंदोलन केवल आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से
भी बेहद प्रभावशाली रहा है। यह मुख्य रूप से तत्कालीन साम्राज्यवादी भौतिकवाद और
कट्टरपंथी कर्मकांडों के विरोध में एक सहज प्रतिक्रिया के रूप में उभरा था, जो अत्यंत सफल और लोकप्रिय रहा। इसकी
सफलता और लोकप्रियता का मुख्य कारण यह था कि इसने बाहरी कर्मकांडों के बजाय ईश्वर
और मनुष्य के बीच सीधे प्रेम, आंतरिक
शुद्धि और मानवता की सेवा पर जोर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य 'इहसान' (ईश्वर की सर्वोच्च भक्ति और
आत्म-शुद्धि) प्राप्त करना है। भारत में इस्लाम के आने के बहुत पहले ही रहस्यवाद (मिस्टीसिज़्म) का दर्शन उपनिषदों में आ चुका था। बाद
में पतंजलि ने योग सूत्रों में, बादरायण
ने वेदांत में इसे प्रदर्शित किया। शंकराचार्य ने नौवीं और रामानुज ने ग्यारहवीं शताब्दी
में वेदांत सूत्रों पर टीकाएं लिखीं।
समय बीतने के साथ नक़्शब, तिर्मीज़, नीशापुर, बुस्ताम, बग़दाद और शीराज़ सूफ़ीमत के अन्य
प्रमुख केन्द्र बने। धीरे-धीरे इस्लाम अरब की सीमाओं से बाहर निकलकर पर्शिया, ईराक़, सीरिया, मिस्र और दुनिया के अन्य देशों में
फैलता चला गया। जहां एक तरफ़ मुसलमानों की संख्या में वृद्धि हो रही थी, वहीं दूसरी
तरफ़ उन लोगों की संख्या भी बढ़ती गई, जिनकी
इस्लाम में पूरी आस्था तो थी ही, साथ ही वे अपनी आत्मा में मचलते हुए ईश-प्रेम की
चाहत और अपने हृदय में प्रिय के दर्शन की कामना लिए साधना में तल्लीन थे।
8.1 इस्लाम, सूफ़ीमत और संन्यास
8वीं शताब्दी तक सूफ़ीमत की कोई विशिष्ट मान्यता या चिन्तन
धारा नहीं थी। इस मार्ग के साधक संन्यासपूर्ण जीवन,
आत्मचिंतन, ईश-प्रेम और तल्लीनता में विश्वास रखते थे। उनकी मान्यताओं में
धीरे-धीरे विकास हुआ। इस्लाम में संन्यास पर ज़ोर नहीं दिया गया है। हदीस में कहा
गया है, “ला रूहबानियत फिल इस्लाम”, अर्थात इस्लाम में संन्यास का
स्थान नहीं है। इस्लाम संन्यासी या पलायनवादी जीवन शैली की अनुमति नहीं देता है।
इसके बजाय, यह दुनिया में रहते हुए और समाज की
जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक संतुलित, नैतिक और ईश्वर-केंद्रित जीवन जीने की शिक्षा देता है। पैगंबर
मुहम्मद सल्ल. ने स्वयं सन्यास (ब्रह्मचर्य या वैराग्य) का विरोध किया और एक
सामान्य गृहस्थ जीवन व्यतीत किया। सांसारिक सुखों को पूरी तरह से छोड़ देने या
जंगलों, पहाड़ों में एकांतवास करने (संन्यास
लेने) को इस्लाम में हतोत्साहित किया गया है। परिवार का पालन-पोषण करना, ईमानदारी से कमाना, दान करना और समाज की भलाई के कार्य
करना धार्मिक कर्तव्यों में शामिल हैं। इस्लाम यह मानता है कि ईश्वर द्वारा दी गई नेमतों
(आशीर्वाद) का सही और जायज तरीके से उपयोग किया जाना चाहिए, न कि उनका त्याग करना चाहिए। इस्लाम
में सांसारिक मोह-माया में लिप्त होने के बजाय 'ज़ुहद' (अनासक्ति) की अवधारणा है, जिसका अर्थ है भौतिक चीजों से
अत्यधिक लगाव न रखना यानी व्यक्ति दुनिया के सुख-साधनों, धन-दौलत और ऐशो-आराम का गुलाम न बने, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को पूरी
तरह से निभाए। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि समाज से कटकर जंगलों या गुफाओं की ओर
चले जाएं। इसके बजाय,
इसे "ईश्वर के प्रति
समर्पण और समाज की सेवा" के रूप में परिभाषित किया गया है।
पवित्र कुरान (सूरह अल-हदीद, 57:27) में भी उल्लेख है "फिर उनके (पहले के नबियों के)
पीछे-पीछे हमने अपने रसूल भेजे और उनके बाद मरियम के बेटे ईसा को भेजा और उसे 'इंजील' दी। और जिन लोगों ने उसका अनुसरण
किया, उनके दिलों में हमने करुणा और दया रख
दी। लेकिन उन्होंने स्वयं 'वैराग्य' (संन्यासी जीवन) की प्रथा निकाल ली, जो हमने उन पर अनिवार्य नहीं की थी, बल्कि उन्होंने केवल अल्लाह की
प्रसन्नता पाने के लिए इसे गढ़ा था, फिर
उन्होंने इसका भी उस तरह पालन नहीं किया जैसा कि इसका पालन करने का हक था।"
अर्थात संन्यास (मठवाद) की प्रथा लोगों ने खुद शुरू की थी, ईश्वर ने इसका आदेश नहीं दिया था।
इसमें कहा गया है कि अल्लाह ने ईसा को इंजील दी और उनके अनुयायियों के दिलों में
करुणा रखी, लेकिन बाद में लोगों ने खुद ही 'वैराग्य' (सन्यास) की प्रथा शुरू कर ली। ईसाई
धर्म में संन्यास का तरीका (विवाह न करना और दुनिया से दूर हो जाना) लोगों द्वारा
स्वयं गढ़ा गया था,
जिसे अल्लाह ने अनिवार्य नहीं
किया था। स्पष्ट है कि क़ुरआन में कहा गया है, वैराग्य की साधना का अपना अधिकार है, परमात्मा ने उसके लिए आदेश नहीं
दिया है। फिर भी इस्लाम के आरंभ काल से ही बहुत से अनुयायी संन्यास धर्म का पालन
करते थे। बहुत से ऐसे फ़क़ीर थे जो हनीफ़ कहे जाते थे। हनीफ़ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ 'सच्चे एकेश्वरवादी' या 'सीधे रास्ते पर चलने वाले' होता है। हालाँकि, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं थी, बल्कि वे मक्का और उसके आस-पास के
गिने-चुने ऐसे सत्य-खोजी थे जो मूर्तिपूजा से दूर रहते थे और एकेश्वरवाद (एक
ईश्वर) में विश्वास करते थे। कहा जाता है स्वयं मुहम्मद साहब ने फ़क़ीरी जीवन
बिताया।
ज़ुहद या 'वैराग्य'
इस्लाम का प्रसार बहुत तेज़ी से हुआ और विभिन्न मतों का उस
पर प्रभाव हुआ। बहुत से विद्वानों का मानना है इस्लाम धर्म में संन्यास की भावना की
प्रेरणा देने वाला ईसाई धर्म है। ईसाई धर्म के अलावा हिन्दू और बौद्ध धर्म में भी
संन्यास की प्रथा आदिकाल से ही रही है। अतः हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि
इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए संन्यास की भावना कोई नई चीज़ नहीं थी। हालांकि
इस्लाम में ईसाई धर्म जैसी कठोर वैराग्य-पूर्ण संन्यास की मनाही है (जहाँ व्यक्ति
समाज और परिवार का पूर्णतः त्याग कर दे), लेकिन आध्यात्मिक और नैतिक रूप से सांसारिक सुखों से विरक्त रहने की
परंपरा इसके आरंभिक काल से ही मौजूद रही है। ह्रदय की शुद्धि के लिए तथा पापों के
प्रायश्चित के लिए लोग संन्यास धर्म का पालन करते थे। जहां तक सूफ़ियों का संबंध है, शुरू से ही उनमें संन्यास की बात
कही गयी है। सूफीवाद और आत्म-नियंत्रण (ज़ुहद) जैसी आध्यात्मिक
प्रवृत्तियों के विकास में ईसाई तपस्या का गहरा प्रभाव माना जाता है। अरबी भाषा
में जुह्द का
अर्थ ही 'सांसारिक मोह-माया का त्याग' और 'वैराग्य'
है। प्रारंभिक इस्लामी
साहित्य और पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के कई कथनों (हदीस) में सांसारिक लालच से दूर
रहकर परलोक पर ध्यान केंद्रित करने को बहुत महत्व दिया गया है। इस्लाम के शुरुआती
दशकों में ही कई मुसलमान दुनिया की चमक-दमक छोड़कर अल्लाह की इबादत में लग गए थे।
इन्हें 'ज़ाहिद' (संन्यासी/वैरागी) कहा जाता था। इनका मानना था कि दिल को
सांसारिक मोह-माया से पवित्र रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। ईसा मसीह (हजरत ईसा)
स्वयं इस्लामिक ग्रंथों में सर्वोच्च त्यागी (ज़ाहिद) माने गए हैं। उनके सादा जीवन ने
प्रारंभिक मुस्लिम और सूफी विचारकों को प्रेरित किया है। इस्लाम के पवित्र ग्रंथों
में दुनिया की ज़िंदगी को अस्थायी और आख़िरत (परलोक) की ज़िंदगी को स्थायी
बताया गया है। इस सीख ने मुसलमानों में स्वाभाविक रूप से धन-दौलत के प्रति
अनासक्ति (वैराग्य) की भावना पैदा की। शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रारंभिक काल
में ईसाई भिक्षुओं को आध्यात्मिक गुरुओं के रूप में सम्मान दिया जाता था, जिससे इस्लामिक ज़ुहद
(वैराग्य) का विकास हुआ। डॉ. पॉल वॉक्स और अन्य जैसे विद्वान बताते हैं कि आरंभिक
इस्लामी और ईसाई तपस्वियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ था। इस्लाम में
सूफीवाद की पूरी नींव ही संन्यास और वैराग्य पर आधारित है। आरंभिक सूफी संतों ने
भौतिकवाद को नकारते हुए सादा जीवन, ईश्वर
की भक्ति और आंतरिक शुद्धता को सर्वोच्च माना। हज़रत अली सहित कई शुरुआती इस्लामी
हस्तियों और सूफी फकीरों ने सादगी और त्याग का ऐसा जीवन जिया, जिसे भारतीय संदर्भ में संन्यास ही
कहा जाएगा। जब इस्लाम का विस्तार हुआ, तब बौद्ध, ईसाई और हिंदू संन्यासियों के संपर्क में आने से भी
मुस्लिम संतों की वैराग्य परंपरा और अधिक समृद्ध हुई।
तौबा (पश्चाताप)
क़ुरआन (42:25) में अल्लाह की अपार क्षमा (तौबा) और दया का वर्णन है। इसमें
वर्णित है, "वही (अल्लाह) है जो अपने बंदों की तौबा (पश्चाताप) क़बूल करता है, गुनाहों को क्षमा करता है और तुम जो कुछ भी करते हो, उसे भली-भांति जानता है।" इस आयत का मुख्य संदेश यह है कि यदि
इंसान अपने गलत कामों या गुनाहों पर पछतावा करे और सच्चे मन से अल्लाह से माफ़ी
मांगे, तो वह उसके सभी गुनाहों को क्षमा कर
देता है। हदीस में भी आया है कि जब बंदा अपना पाप स्वीकार कर लेता है, और फिर तौबा
करता है तो अल्लाह उसे क्षमा कर देता है। पापों के प्रायश्चित के लिए सूफ़ी साधक तौबा को आध्यात्मिक
मार्ग पर अग्रसर होने के लिए पहली सीढ़ी और आधारशिला मानते हैं। तौबा का
अर्थ है अपने पाप पर लज्जित होना फिर उसे न करने का संकल्प लेना। सूफ़ी दर्शन में
तौबा का अर्थ केवल पापों के लिए पछताना नहीं, बल्कि बुराइयों को त्यागकर पूरी तरह
से ईश्वर की आज्ञाओं की ओर लौटना है। सूफ़ियों का विश्वास है कि किसी किए गए पाप के
लिए मनुष्य तौबा कर ले तो परमात्मा उसे दण्ड से बरी कर देता है। सूफी मत के अनुसार, जो व्यक्ति अपने पिछले गुनाहों से 'तौबा' नहीं करता, वह इस आध्यात्मिक मार्ग (तसव्वुफ़)
में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। पापों के कारण हृदय पर जो अंधकार छा जाता है, तौबा उसे धोकर हृदय को पवित्र और
ईश्वरीय प्रकाश (नूर) से प्रकाशित करती है, ताकि साधक
में ईश्वरीय प्रेम (इश्क) जागृत हो सके। यह दिल की सफाई (तज़किया-ए-नफ़्स) की शुरुआत
है, जिससे साधक के भीतर का अहंकार और
सांसारिक वासनाएं नष्ट होने लगती हैं। सूफी साधना में विभिन्न पड़ाव (मंज़िलें)
होते हैं, और ‘तौबा’ उनमें से पहला ‘मकाम’
(स्थान) है, जिस पर दृढ़ हुए बिना आगे के
आध्यात्मिक स्तरों (जैसे- वरा, ज़ुहद, फ़क़्र, सब्र, तवक्कुल, रज़ा आदि) को
प्राप्त नहीं किया जा सकता। मशहूर सूफ़ी संतों का मानना है कि जैसे बिना नींव के
मकान नहीं बन सकता,
वैसे ही बिना 'तौबा' के कोई भी मुरीद (शिष्य) तरीक़त
(आध्यात्मिक मार्ग) पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।
उपवास (रोज़ा)
इसी तरह उपवास (रोज़ा) का भी सूफ़ीमत में विशेष महत्त्व
है। वे यह मानकर चलते हैं कि यदि आहार साधना में बाधक हो तो अनाहार ही अच्छा है। इसे
केवल शारीरिक भूख मिटाने या धार्मिक कर्तव्य तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि यह आंतरिक शुद्धि, अहं (नफ़्स) पर नियंत्रण और ईश्वर
से आध्यात्मिक संबंध (मारिफ़) गहरा करने का सबसे प्रमुख साधन माना जाता है। सूफ़ी
मनोविज्ञान में इंसान के भीतर की बुरी प्रवृत्तियों और वासनाओं को 'नफ़्स' (अहं) कहा जाता है। सूफ़ियों का मानना है
कि अत्यधिक भोजन नफ़्स को ईंधन देता है। उपवास के जरिए जब शरीर को भूखा रखा जाता
है, तो इंसान का अहंकार कमजोर होता है और
उसकी आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है। सूफी विचारक और महान सूफी संत इमाम गजाली, ने उपवास के तीन स्तर बताए हैं: सामान्य
उपवास: केवल खाने, पीने और शारीरिक इच्छाओं से दूर रहना, विशेष उपवास: अपने अंगों (आँखों, कानों, जीभ और हाथों) को पापों या बुराई से
बचाना और अति-विशेष उपवास : दिल और दिमाग को सांसारिक विचारों से मुक्त रखकर पूरी तरह
ईश्वर की याद में लीन रहना। सूफी परंपरा में माना जाता है कि पेट की भूख कम होने
से रूह (आत्मा) को ताकत मिलती है और अहंकार पिघलता है, जिससे साधक को दिव्य प्रेम और ज्ञान
की प्राप्ति होती है। सूफी संत अक्सर साल भर स्वेच्छा से भी उपवास रखते हैं ताकि
वे ईश्वर के और करीब आ सकें। कई सूफ़ी सिलसिलों (जैसे चिश्ती, कादिरी या सुहरावर्दी) में 'चिल्ला-नशीनी' की परंपरा है। इसमें साधक चालीस
दिनों तक एकांतवास में रहता है और न्यूनतम भोजन या निरंतर उपवास के साथ केवल ईश्वर
के ध्यान (ज़िक्र) में लीन रहता है ताकि आत्म-साक्षात्कार किया जा सके।
खिरक़ा (गुदड़ी)
सूफ़ी एक विशेष प्रकार का पोशाक धारण करते थे जिसमें फ़क़ीरी
दिखती थी। ऊनी वस्त्रों के उपयोग की बात सूफ़ियों के बीच की जाती है। खिरक़ा
(गुदड़ी) का व्यवहार सूफ़ियों में काफी प्रचलित है। पैबंद लगे गुदड़ी सूफ़ी साधकों की
एक विशेष पहचान बन गई। यह सूफी परंपरा का एक अभिन्न अंग है और इसे सादगी, त्याग और आध्यात्मिक दीक्षा के
प्रतीक के रूप में देखा जाता है। 'खिरक़ा'
एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ
"फटा हुआ कपड़ा" या चीथड़े होता है। सूफी संत और फकीर सांसारिक मोह-माया
और भौतिक विलासिता को त्यागने के प्रतीक के रूप में पैबंद (टुकड़े) लगे
पुराने वस्त्र पहनते थे, जिसे
गुदड़ी कहा जाता है। सूफ़ी साधकों ने सांसारिक वस्तुओं का त्याग और ग़रीबी तथा फ़क़ीरी
जीवन को श्रेष्ठ माना है। उनका मानना है कि साधक सब कुछ का त्याग करके ही साधना के
उच्च शिखर तक पहुँच सकता है। इस्लाम धर्म में भी सांसारिक वस्तुओं का त्याग और
दीनता को अच्छा माना गया है। जब कोई शिष्य (मुरीद) किसी सूफी गुरु (पीर
या मुर्शिद) की शरण में जाता है, तो गुरु उसे अपनी आध्यात्मिक विरासत, आशीर्वाद और दीक्षा के प्रतीक के रूप
में खिरक़ा प्रदान करते हैं। इसे पहनना यह दर्शाता है कि शिष्य ने सांसारिक दुनिया
को त्याग दिया है और गुरु के आदेशों के प्रति समर्पित है। खिरक़ा सूफी मत में एक
पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आध्यात्मिक शक्ति (बरकत) और अधिकार हस्तांतरित करने
का माध्यम भी है। जब एक गुरु अपने किसी शिष्य को अपना उत्तराधिकारी (खलीफा)
चुनता है, तो वह उसे अपना विशेष खिरक़ा सौंपता
है। यह इस बात का प्रमाण होता है कि शिष्य अब दूसरों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के
योग्य हो चुका है। सूफी संतों का मानना है कि खिरक़ा सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, बल्कि इसमें गुरु की रूहानी ताकत और
दुआएं (बरकत) शामिल होती हैं। सूफीवाद की शुरुआत ही भौतिकवाद और बढ़ती
विलासिता के विरोध में तपस्या और सादा जीवन जीने से हुई थी। खिरक़ा इसी
"तपस्वी" (दरवेश) जीवनशैली का सबसे प्रमुख दृश्यमान प्रमाण है।
8.2 सूफ़ीमत के विकास का द्वितीय चरण
एक मत
के रूप में सूफ़ीवाद नौवीं शताब्दी में उभरा। यद्यपि इसके आध्यात्मिक बीज सातवीं
शताब्दी के प्रारंभिक इस्लामी काल में ही मौजूद थे (जैसे-जैसे खलीफाओं के
साम्राज्य में भौतिकता और विलासिता बढ़ी, कुछ संतों ने इसका विरोध कर सादगी और वैराग्य का मार्ग चुना)। लेकिन
एक व्यवस्थित रहस्यवादी मत (तसव्वुफ़)
के रूप में इसका उदय नौवीं और दसवीं शताब्दी में बगदाद (इराक) के सूफ़ी संतों के
प्रयासों से हुआ। इससे पहले, सातवीं
और आठवीं शताब्दी में सूफीवाद केवल एक व्यक्तिगत वैराग्य, सादगी और ईश्वर के प्रति प्रेम (जैसे
राबिया बसरी का दर्शन) तक ही सीमित था, जो मुख्य रूप से बसरा और कूफा (इराक) में पनपा था। अब तक के सूफ़ी सिलसिलों
ने इस्लामी रहस्यवाद की नींव रखी। हालांकि सूफ़ीवाद की जड़ें सातवीं और आठवीं
शताब्दी के प्रारंभिक इस्लामी वैराग्य और तपस्या (जुहुद) में मिलती हैं, लेकिन नौवीं शताब्दी वह ऐतिहासिक मोड़
थी जब इसने एक विशिष्ट रहस्यवादी दर्शन, पारिभाषिक शब्दावली और संगठित रूप धारण किया। इसी काल में 'सूफ़ी' शब्द का प्रयोग एक विशेष आध्यात्मिक
दृष्टिकोण रखने वाले समूह के लिए सामान्य रूप से होने लगा। बग़दाद के संतों ने सूफी
आचार-विचार, ध्यान (जिक्र) और आध्यात्मिक
अवस्थाओं (मक़ामात) को एक व्यवस्थित प्रणाली में ढाला। ईश्वर के प्रति 'दिव्य प्रेम' (इश्क-ए-हकीकी) और आत्म-विलोपन (फ़ना) जैसे गहरे सिद्धांतों को इसी सदी में
स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया। लेकिन दार्शनिक तर्क की शुरुआत दसवीं शताब्दी में
हज़रत मंसूर-उल-हल्लाज रह. से हुई। इस रहस्यवाद के उसूलों को हज़रत
ग़ज़ाली ने ग्यारहवीं, हज़रत सुहरवर्दी ने बारहवीं, हज़रत
इब्न अरबी ने तेरहवीं
और हज़रत अब्दुल करीम जीली ने चौदहवीं शताब्दी में आगे बढ़ाया। पंद्रहवीं शताब्दी
में हज़रत जामी ने फारसी ज़बान में इन उसूलों को एक जगह जमा कर दिया। इस
कालखंड में विकसित हुई वैचारिक और व्यावहारिक विचारधारा को इतिहास में 'बगदाद स्कूल ऑफ सूफीज्म' (बगदाद संप्रदाय) के नाम से जाना जाता है।
आठवीं से नौवीं शताब्दी के काल को सूफ़ीमत के विकास की दूसरी
अवस्था माना जा सकता है। सूफ़ीमत के विकास के इस दूसरे चरण में सूफ़ियों की दिनचर्या
और मनोवृत्ति में परिवर्तन होना शुरू हो गया। अब्बासी वंश के मुस्लिम शासकों ने
दमिश्क को छोड़कर बगदाद को अपनी नई राजधानी बनाया था। बगदाद शहर सूफ़ी चिंतन
का मुख्य केंद्र बना। बगदाद उस समय विषय साहित्य की राजधानी के रूप में विख्यात
था। यहाँ सूफ़ी संतों ने एक व्यवस्थित सैद्धांतिक ढांचा तैयार किया जो पारंपरिक
रूढ़िवादी विचारधारा से अलग था। इस चरण में सूफीवाद केवल त्याग और वैराग्य तक
सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें दार्शनिक तत्वों का
विवेचन और रहस्यवादी सिद्धांतों का समावेश होने लगा। हज़रत जुनैद अल-बगदादी, हज़रत
मारुफ अल करखी,
हज़रत
मंसूर अल ह्लल्लाज, हज़रत
जून्नून अल मिस्री, हज़रत बायजीद अल बिस्तमी (जिन्होंने 'फना' का विचार दिया) जैसे प्रसिद्ध सूफ़ी साधक
इसी समय की देन हैं। सूफी मत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने वाले कई महत्वपूर्ण
ग्रंथ लिखे गए, जिसके परिणामस्वरूप दसवीं शताब्दी तक
सूफीवाद एक सुनिश्चित धार्मिक धारा के रूप में स्थापित हो गया।
पहले के सूफ़ी साधकों का लक्ष्य आदर्श फ़क़ीरी जीवन, ध्यान, ईश्वर आराधना था लेकिन अब उनका
लक्ष्य परमात्मा को प्रेम द्वारा पाना था। इसके लिए वे किसी प्रकार के वाह्याडम्बर
को मानने के लिए तैयार नहीं थे और उनका खुलकर विरोध करते थे। इस काल में सूफ़ी साधक
स्वयं और परमात्मा के बीच ‘अहं’ को सबसे बड़ा व्यवधान मानते थे और उसे दूर करने
पर ज़ोर देते थे। इस काल का सूफ़ी साधक प्रकृति के प्रत्येक वस्तु में परम-सत्ता का दर्शन
करने लगा। सूफ़ीमत के विकास के द्वितीय चरण में रहस्यवादी प्रवृत्तियों के उदय तथा
उसके उत्तरोत्तर विकास में सैद्धान्तिक तथा दार्शनिक चिन्तन की प्रधानता रही है। हज़रत हसन बसरी के अनुसार संसार अपने आप में एक
नीरस वस्तु तथा नकारात्मक है, परन्तु जब इसमें आध्यात्मिक भावनाएँ क्रियाशील हो
जाती हैं तब इसका स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। सभी कष्ट आनन्द में बदल जाते हैं।
हृदय तथा मस्तिष्क का उस समय सुन्दर संयोग दृष्टिगोचर होता है। इस अवस्था
में सूफ़ी साधकों ने परम सत्ता को प्रियतम के रूप में मानना प्रारम्भ किया। उसके
प्रेम को प्राप्त करना ही सूफ़ी साधकों के लिये अभीष्ट था। उसके सम्पूर्ण धार्मिक
कार्यों का उद्देश्य प्रियतम को प्राप्त करना था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि
सूफ़ी साधकों को विश्वास था कि इस अवस्था में इश्वर की कृपा से सब कुछ प्राप्त करना
संभव है। पहले जो परमात्मा मानव की पहुंच से बाहर था, अब वह 'अल हक्क़' ('सत्य', 'वास्तविकता') से प्रकट होने लगा। इस काल के साधक
प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में परम सत्ता को देखने लगे। अपने अहं को खोकर बेख़ुदी
की हालत में अपने परम सत्ता से साक्षात्कार करने लगे।
आठवीं-नौवीं शताब्दी में अरब देशों में लगातार सत्ता के
लिए संघर्ष हुए। इस कलह, युद्ध और रक्तपात से लोग ऊब चुके थे। उन्होंने इस मार-काट
से ध्यान हटाकर आत्मलीन हो जाना ही बेहतर समझा और वे ईश-प्रेम में रत हो गए। सल्तनत
और साम्राज्य हथियाने के लिए हुए खूनी संघर्षों से आम जनता और कुछ शासक वर्ग भी
त्रस्त हो चुके थे। इस हिंसा से निराश होकर कई लोगों ने भौतिक दुनिया (सत्ता और
धन) को त्याग दिया और सूफ़ियों के आध्यात्मिक मार्ग को अपना लिया। क्रूरता, राजनीतिक उथल-पुथल और युद्धों ने जब
लोगों को भौतिक दुनिया से मोहभंग और गहरी मानसिक शांति की तलाश में धकेला, तब सूफ़ी संतों के प्रेम, शांति और भाईचारे के संदेशों ने
उन्हें एक नई राह दिखाई। रक्तपात और अत्याचार के दौर में सूफ़ी
खानकाह (आश्रम) ऐसे स्थान थे जहाँ सभी धर्मों और जातियों के लोगों को बिना किसी
भेदभाव के शरण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक सुकून मिलता था। इस आधार पर (रक्तपात से परे हटकर) हम
कह सकते हैं कि सूफ़ीमत ने काफ़ी हद तक इस्लाम को लोकप्रिय बनाने का काम किया। सूफ़ीवाद
प्रेम और मानवता के सिद्धांतों पर आधारित है। सत्ता की भूख के कारण होने वाली
हिंसा ने लोगों को यह समझाया कि सच्चा सुख और ईश्वर की प्राप्ति तलवार से नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और प्रेम से ही
संभव है। रूढ़िवादी धार्मिक सत्ता के बजाय लोगों को सूफ़ियों का प्रेम और सादगी का
मार्ग बेहतर लगा। अधिकांश सूफ़ी संतों ने राजाओं और दरबारों से खुद को दूर रखा। उन्होंने
अमीर-गरीब और जाति-धर्म का भेद मिटाकर सबको गले लगाया। धन का त्याग करके उन्होंने
मानवता की सेवा को ही ईश्वर की इबादत माना। सूफ़ीमत इस्लामी विधान का उल्लंघन नहीं
करता। यह दौर इस्लाम के अत्यधिक प्रभाव का दौर था। इस्लामी आदेशों का ज़रा-सा
उल्लंघन भी उस समय के धर्म-रक्षा के लिए प्रतिबद्ध शासकों को सह्य नहीं था। सूफियों का मानना था कि जब इंसान 'फना' (अहंकार का नाश) के चरम पर पहुंचता है, तो उसे परम सत्य का ज्ञान होता है और वह
खुद को ईश्वर का हिस्सा महसूस करता है। इस अवस्था में कई सूफी 'अनल-हक़' (मैं ही सत्य हूँ) जैसे नारे लगाते थे, जो रूढ़िवादियों के लिए असहनीय था। सूफ़ियों का परमात्मा से इश्क़ और
'फना' (स्वयं को मिटाने) का सिद्धांत इस्लाम
के धर्मानुयायियों को खटकने लगा था और इस रहस्यवादी और अद्वैतवादी विचारधारा के
कारण कई महान सूफी संतों और विचारकों को तत्कालीन शासकों और उलेमाओं (धार्मिक
विद्वानों) के विरोध का सामना करना पड़ा और अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत नूरी रह., हज़रत मंसूर -अल-हलाज रह., हज़रत शहाबुद्दीन
सुहरावर्दी रह.,
जैसे सूफ़ियों को ऐसे ही कुछ कारणों से दंडित होना पड़ा।
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मनोज
कुमार
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