रविवार, 26 जुलाई 2026

सूफ़ीमत... 8. सूफ़ीमत का विकास-द्वितीय चरण-4

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


8. सूफ़ीमत का विकास-द्वितीय चरण-4

8.7 मध्यमार्ग

सूफ़ीमत में मध्यमार्ग (संतुलन का मार्ग) वह आध्यात्मिक संतुलन है जो अतिवाद से बचते हुए आंतरिक शुद्धि और ईश्वर-प्रेम पर ज़ोर देता है। यह बाहरी कर्मकांडों की कट्टरता और पूर्ण सांसारिक भोग-विलास दोनों के बीच का मार्ग है। इसमें सांसारिक जीवन में रहते हुए भी मोह-माया और अहंकार से दूर रहना समाहित था। इसके लिए शरीअत (धार्मिक नियम) के पालन के साथ-साथ तरीक़त (रहस्यवादी व आंतरिक साधना) को अपनाना था। सभी इंसानों से प्रेम और धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखना इसकी विशेषता थी। सूफीवाद में अक्सर उपवास, प्रार्थना और ध्यान जैसी आदतें शामिल होती हैं, जिससे दुनियावी मामलों से दूरी बन सकती है। लेकिन, मध्यमार्ग इस बात पर ज़ोर देता है कि पूरी तरह से अकेला रहना ही अकेला रास्ता नहीं है। कई सूफ़ी दुनिया में रहने, सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने और दुनियावी इच्छाओं से आध्यात्मिक दूरी बनाए रखते हुए समाज के साथ जुड़ने में विश्वास करते थे। सूफीवाद ईश्वरीय प्रेम और ईश्वर के साथ भावनात्मक संबंध पर अपने गहरे ध्यान केन्द्रित करने के लिए मशहूर है। मध्यमार्ग इस गहरे भावनात्मक अनुभव को समझदारी और बुद्धि के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करता है। यह मानता है कि प्यार सबसे ज़रूरी है, लेकिन समझदारी एक ढांचा देती है और आध्यात्मिक कामों को कट्टरता या बिना सोचे-समझे काम करने से रोकती है। बाहरी इस्लामी कानून (शरिया) जीवन के लिए नैतिक ढांचा देते हैं। मध्यमार्ग इस बात पर ज़ोर देता है कि शरिया का पालन करना ज़रूरी है, लेकिन सच्ची आध्यात्मिकता आध्यात्मिक प्रैक्टिस (तरीका) के ज़रिए इन कानूनों के पीछे के गहरे, गूढ़ मतलब (हकीका) को समझने में है। यह बाहरी तौर पर एक जैसा होने और अंदर के बदलाव के बीच एक संतुलन है। मध्यमार्ग संयम का रास्ता है जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रूहानी ख्वाहिशों को शामिल करने की कोशिश करता है।

नवीं शताब्दी तक सूफ़ियों को अपने आन्तरिक अनुभवों और वैराग्य को एक सुसम्बद्ध दर्शन देने की ज़रूरत महसूस होने लगी। इस काल में सूफीवाद केवल साधारण उपवास और प्रार्थना तक सीमित न रहकर गंभीर प्रेम और दार्शनिक चिंतन की ओर बढ़ने लगा था। सूफ़ीमत में भारतीय, यूनानी और ईरानी दर्शनशास्त्र का समागम शुरू हो गया था। जब सूफ़ी मतावलंबी सीरिया, मिश्र, फिलिस्तीन और यूनान पहुंचे तो इनका संपर्क ईसाई मतावलंबियों से हुआ। सर्वथा भिन्न चिन्तन धाराएं एक-दूसरे से टकरा रही थीं। जिसके परिणामस्वरूप एक विवेचनात्मक शाखा फूटी। और यहीं से एक नई दृष्टि से क़ुरआन की व्याख्या करने का प्रयास शुरु हुआ। जिसकी काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। धर्मशास्त्रियों और सूफ़ियों के बीच मतभेद भी बहुत तेज़ हो गया था। पर सूफ़ियों के लिए इस्लाम एक सागर था जिसमें विभिन्न विचारों की नदियां आकर मिलती हैं। विभिन्न पंथों की अच्छी अवधारणाओं को समाहित करने के प्रयास से सूफ़ी दर्शन पर अन्य दर्शनों का काफ़ी प्रभाव पड़ा। शुरुआती दौर का कड़ा वैराग्य और डर अब धीरे-धीरे गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-अनुशासन के दर्शन में बदलने लगा। साधकों ने आत्मा, परमात्मा, फना (अहंकार का विनाश) और बका (ईश्वर में अमरता) जैसे विचारों पर खुलकर विचार करना शुरू किया।

इश्क़ (प्रेम) के सिद्धांत को अद्वैत की आधार भूमि प्रदान करते हुए हज़रत अबू बक्र शिबली रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि साधक अपने मन की समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं को ईश-प्रेम में स्थानान्तरित कर दे। उनके अनुसार, सच्चा दिव्य प्रेम (इश्क़-ए-हकीकी) प्रेमी और प्रियतम (अल्लाह) के बीच की द्वैत भावना को पूरी तरह मिटा देता है। उनके विचार में प्रेम वह अग्नि है जो अहंकार और पृथकता को जलाकर केवल परम सत्य (अद्वैत चेतना) को शेष रखती है। हज़रत शिबली मानते थे कि जब तक प्रेमी में 'मैं' (अस्तित्व का अहंकार) मौजूद है, तब तक वास्तविक प्रेम शुरू नहीं होता। प्रेम की पराकाष्ठा में 'प्रेमी' और 'प्रेमी का लक्ष्य' एक हो जाते हैं। उनके अनुसार वास्तविक तौहीद यह है कि ईश्वर के सिवाय कुछ भी न देखा जाए। प्रेम इस अद्वैत अनुभव का सीधा साधन है, जहाँ दो (आशिक और माशूक) की भिन्नता समाप्त हो जाती है। शिबली का प्रेम संबंधी दृष्टिकोण बौद्धिक तर्कों से परे था। वह इसे पूर्ण आत्मसमर्पण और बाह्य दुनिया से बेखुदी (मस्ती) की अवस्था मानते थे, जो जीव को सीधे परमात्मा से मिला देती है। उन्होंने जमकर ख़ुदा के इश्क़ से ख़ाली बाह्याचार की निन्दा की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें पागलख़ाने में बंद कर दिया गया। ईश्वरीय प्रेम (इश्क-ए-इलाही) की अत्यधिक तीव्रता और दुनिया से बेपरवाह आचरण के कारण तत्कालीन समाज के कई लोग उन्हें मानसिक रूप से विक्षिप्त (पागल) समझने लगे थे। जब उनसे मिलने उनके कुछ अनुयायी (प्रेमी) अस्पताल पहुँचे, तो उन्होंने उन पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। शिबली ने उनसे कहा कि यदि तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो, तो इस कष्ट और विपत्ति को सहन करो।

दसवीं तथा ग्यारहवीं शताब्दी में सूफ़ीमत से संबंधित विश्वासों को संपादित किया गया। अबूनस्र सिराज (मृ. 988 ई.) की लिखी पुस्तक 'किताब अल-लुम्अ’ को सूफ़ीमत की शुरू की पुस्तकों में माना जाता है। इसमें फी मार्ग के नियम, व्यवहार और आध्यात्मिक शब्दावली का वर्णन है। इसमें सूफी साधना के विभिन्न स्तरों जैसे मकामात और अहवाल की व्याख्या की गई है। उन्होंने सूफ़ियों के लक्षणों को गिनाते हुए कहा है कि उन्हें धर्मशास्त्र का अनुपालन करना चाहिए। उन्होंने सूफ़ीमत से संबंधित ज्ञान को क़ुरआन और हदीस पर आधारित बताया है। इस पुस्तक में शुरुआती सूफी संतों और फकीरों के जीवन और उनके अनुभवों का संकलन भी है।

दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी मुस्लिम जगत में दार्शनिक, आध्यात्मिक और सूफ़ी चिंतन के लिए प्रसिद्ध है। दसवीं शताब्दी में सूफ़ियों की साधना पद्धति के दो सैद्धांतिक पक्ष स्थापित हो गए थे, जिन्हें सुक्र (होश) और सहव (इश्क़े ख़ुदा में होश खोना) कहा जाता था। सुक्र की कैफ़ियत में हज़रत बायज़ीद रह. और हज़रत मंसूर रह. का ज़िक्र आता है जबकि सहव में हज़रत मुसाहिबी रह. और हज़रत जुनैद रह.का नाम लिया जाता है।

8.8 हज़रत बायज़ीद अल बिस्तामी (804-874)

सूफ़ीमत में अद्वैत दर्शन की शुरुआत हज़रत बायज़ीद अल बिस्तामी, एक फारसी संत ने की थी, जिन्हें 'सुल्तान-उल-आरिफ़ीन' (ज्ञानियों का राजा) कहा जाता है। उनका जन्म ईरान के बिस्ताम (बस्तम) शहर में हुआ था, जहाँ उनका जीवन आध्यात्मिक साधना और आत्म-त्याग को समर्पित था। उनके पूर्वज ज़रथुस्‍ट्र (प्राचीन ईरान के धर्म) के अनुयायी थे। उनके दादा एक पारसी थे जिन्होंने बाद में इस्लाम अपनाया था। अपने प्रारंभिक जीवन में वे एक न्यायविद थे। बाद में उन्होंने सूफ़ीवाद की ओर रुख किया। रहस्यवाद में उनके गुरु कुर्द थे।

उनके बचपन के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है, लेकिन उन्होंने अपना अधिकांश समय अपने घर और मस्जिद में अलग-थलग बिताया। हालाकि वे भौतिक संसार से अलग-थलग रहे, फिर भी उन्होंने सूफ़ी क्षेत्र से ख़ुद को अलग नहीं किया। उन्होंने इस्लाम पर चर्चा करने के लिए अपने घर में लोगों का हमेशा स्वागत किया। वह इस्लामी आदेशों के पालन में कोई भी अतिक्रम को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे, चाहे वह कितना भी छोटा या महत्वहीन हो।

हज़रत बायजीद बिस्तामी ने अपनी माँ की अनुमति और रज़ामंदी मिलने के बाद सांसारिक मोह-माया को त्याग दिया था तथा लंबी अवधि तक रेगिस्तानों और विभिन्न क्षेत्रों में कठोर तपस्या व भ्रमण किया था। तीस वर्षों तक सीरिया के रेगिस्तान में भटकते हुए हज़रत बायज़ीद ने तपस्वी जीवन व्यतीत किया और अल्लाह के साथ एक होने के लिए सभी सांसारिक सुखों को त्याग दिया। अंततः, इसने हज़रत बायज़िद को "आत्म-साक्षात्कार" की स्थिति में ला दिया, जो कई सूफ़ी आदेशों के अनुसार, एकमात्र स्थिति है जो एक व्यक्ति को भगवान के साथ एकता प्राप्त कराता है। उनके विचारों में हम अद्वैतवाद की ओर एक विशिष्ट प्रवृत्ति देखते हैं। वे पृथक्करण की प्रक्रिया द्वारा दिव्य एकता (devine unity) तक पहुँचने की कोशिश करते हैं, जब तक साधक सभी व्यक्तिगत गुणों से रहित नहीं हो जाता और ख़ुद को उस एक सत्ता में डूबा हुआ महसूस नहीं करता है। उनके प्रसिद्ध उद्गार जैसे "सुब्हानी, मा आ’दाम शानी" (मेरी महिमा है, मेरा रुतबा कितना महान है) इस अद्वैत प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।

वे जीवात्मा और परमात्मा में कोई फ़र्क़ नहीं मानते थे। उनके अनुसार परमात्मा ही एकमात्र सत्ता है और वही एकमात्र सत्य है। अतः अन्य सभी वस्तुओं का त्याग कर उसी परम सत्य को पाने की चेष्टा करनी चाहिए। साधक में विनम्रता और दीनता की भावना होनी चाहिए। उन्होंने परमानंद (Ecstasy), रहस्यवादी सिद्धांत (Mystic Doctrine) का सूफ़ीमत में समावेश किया। उनके पहले अल-मिस्री ने मारिफ़त के सिद्धांत को पेश किया था। यह एक ऐसी प्रणाली थी जिसने मुरीद और शेख़ को संवाद करने में मदद की। हज़रत बायज़ीद बिस्तामी ने हज़रत मिस्री के विचारों को एक क़दम आगे बढ़ाया और इस्लाम में धार्मिक परमानंद के महत्व पर ज़ोर दिया, जिसे उनके शब्दों में सुक्र’ (बेख़ुदी की अवस्था) के रूप में संदर्भित किया गया था, जो निर्माता की दिव्य उपस्थिति में ख़ुद को विलीन कर देने का एक साधन है। उन्होंने सूफ़ीवाद के मूल में दिव्य प्रेम की अवधारणा को रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई। उनसे पहले, सूफ़ी मार्ग मुख्य रूप से धर्मपरायणता और आज्ञाकारिता पर आधारित था। उन्होंने प्रेम को खूब महत्त्व दिया उनके अनुसार प्रेम से ही मारीफ (ईश्वरीय ज्ञान) प्राप्त होता है प्रेम को वे साधक और परमात्मा के बीच पर्दा जैसा मानते थे वे कहते थे कि प्रेम के अस्तित्व में ही द्वैत निहित है वे उसी को असीम मानते थे जिसकी कोई इच्छा न हो और परमात्मा की इच्छा ही उसकी इच्छा होउन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक किताबुल तवासीनमें लिखा- मैं’ ‘वह’ (ख़ुदा) हूं जिसे मैं प्रेम करता हूं और जिसे मैं प्रेम करता हूं वह वहहै। हम दो आत्माएं हैं, जो एक शरीर में अवतरित हो गई हैं। यदि तुम मुझे देखते हो तो उसे भी देखते हो और यदि तुम उसे देखते हो तो हम दोनों को देखते हो।

ज्ञान की साधना को वे अत्यंत कठिन मानते थे। उनका कहना था कि आरिफ (ज्ञानी) वह व्यक्ति नहीं है जिसने क़ुरआन को रट डाला है। वास्तविक ज्ञानी वह है जो सीधे परमात्मा से शिक्षा ग्रहण करता है। बायज़ीद ने ही दुनिया को ‘फ़ना’ शब्द से रूबरू करवाया। उन्होंने अनुभव किया कि उनकी अपनी व्यक्तिगत चेतना पूरी तरह ईश्वर की चेतना में विलीन हो चुकी है। उन्हें सूफ़ीवाद में 'फना' (अहंकार या आत्म-विनाश के माध्यम से ईश्वर में लीन हो जाने की अवस्था) के शुरुआती और प्रमुख प्रवर्तकों में गिना जाता है। इनका कहना था कि अपना अस्तित्व ख़ुदा में विलीन करने के बाद ही हम परम् आंनद को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने फ़ना (आत्मा का विलयन) और बक़ा (परमात्मा में स्थिति) के सिद्धान्त की नींव डाली।

हज़रत बायजीद आत्मा और पतरमात्मा के बीच अहं को बाधक मानते थे। उनके अनुसार जब साधक अपने 'अहम' (मैं) को पूरी तरह मिटा देता है, तब केवल दिव्य सत्ता ही शेष बचती है। उन्होंने कहा कि साँप जिस प्रकार केंचुली छोड़ता है, उसी प्रकार मैंने अपने अहं को छोड़कर, अपनी ओर देखा और पाया कि मैं और वह एक ही है। उनका मानना था कि जब तक इंसान अपने 'नफ़्स' (अहंकार और बुरी इच्छाओं) को नहीं मारता, तब तक उसे रूहानी सुकून और अल्लाह की मुहब्बत हासिल नहीं हो सकती। उन्होंने यह माना कि वही सब में है और वही सब कुछ है। सभी उस एक में जाकर मिल जाते हैं। उन्हें सूफी परंपरा में 'मस्त' (मस्ती या सुरूर की अवस्था) का प्रतीक माना गया है, जहाँ तार्किक सीमाओं से परे जाकर एकता का अनुभव किया जाता है। उनके बाद ही सूफ़ियों में प्रेमपियाला का प्रचलन हुआ। इस तरह तरीक़त की दोनों कैफ़ियतों को समझाने के लिए दो विशेषण वुजूद में आ चुके थे। इससे फ़ायदा यह हुआ कि अब बाद के सूफ़ियों को हज़रत मंसूर रह. जैसी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा।

सूफी इतिहास में हज़रत बायज़ीद बस्तामी और हज़रत जुनैद बगदादी के बीच का वैचारिक मतभेद सूफी साधना के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों को दर्शाता है। इसे सूफी शब्दावली में 'सुक्र' (मस्ती/उन्माद) बनाम 'सहव' (सचेतता/होश) का मार्ग कहा जाता है। हज़रत बायज़ीद बस्तामी के 'सुक्र' (मस्ती और बेखुदी) के मार्ग में साधक ईश्वर के प्रेम में इतना डूब जाता है कि उसे अपनी सुध-बुध नहीं रहती। इसे 'फ़ना' (अहंकार का पूरी तरह मिट जाना) की चरम सीमा माना जाता है। इस बेखुदी में उनके मुख से "सुब्हानी" (मैं पवित्र हूँ) जैसे शब्द निकले, जहाँ बोलने वाला व्यक्ति स्वयं नहीं बल्कि उसके भीतर व्याप्त ईश्वर था। रूढ़िवादी विद्वानों ने इसे ईश-निंदा माना, लेकिन सूफियों के अनुसार यह आत्मा का परमात्मा में पूरी तरह विलीन होना था। हज़रत जुनैद बगदादी के 'सहव' (होश और विवेक) के मार्ग के अनुसार ईश्वर से मिलाप के बाद साधक को वापस सामान्य मानवीय चेतना (होश) में लौटना चाहिए। इसे 'बका' (ईश्वर में रहकर संसार के कर्तव्यों को निभाना) की अवस्था कहा जाता है। हज़रत जुनैद हज़रत बस्तामी के विचारों का सम्मान करते थे, लेकिन उनका मानना था कि 'होश' का मार्ग अधिक पूर्ण है क्योंकि यह साधक को समाज और सामाजिक नियमों (शरिया) से जोड़े रखता है। उनके अनुसार पूर्ण सूफी वह है जो ध्यान की चरम अवस्था में भी अपने होश न खोए और दूसरों का मार्गदर्शन कर सके।

आइडिया आफ पर्सनाल्टी इन सूफी़ज्म में निकोल्सन ने कहा है बायज़ीद के समय तक सूफि़यों की सर्वात्मवादी भावनाएं विकसित होकर ईश्वर और जीव के संबंध में अद्वैत भावना तक पहुंच गईं। इस्लाम भावना के अंतर्गत मैं ब्रह्म हूं (अहं ब्रह्मास्मि) की भावना का स्थान नहीं है। वहां ईश्वर और जीव की अलग-अलग सत्ताएं मानी गयी हैं। सूफियों ने अपने चिंतन में इस ब्रह्मवादी विचार का समावेश किया। बायजीद बस्तामी ने कहा -तकून अंतजाक अर्थात वह तू ही है। ईश्वर से इस एकता की स्थिति में उन्होंने अपने अनुभवों को जो अभिव्यक्ति दी वह मंसूर हल्लाज  के अनल-हक़ की याद दिलाते हैं। मंसूर हल्लाज का प्रसिद्ध वाक्य -अनलहक़ (मैं ही सत्य ब्रह्म हूं), अहं ब्रह्मास्मि का अनुवाद प्रतीत होता है। हज़रत बायज़ीद बस्तामी अपने अनुभवों के बारे में कहते हैं, "मैं परमेश्वर के पास से परमेश्वर के पास गया, जब तक कि वह मुझ में मुझ से पुकारा, हे तू मैं।" "मेरी जय! मेरी महिमा कितनी महान है।" "जब मैं अपने 'स्व' से बाहर आया, तो मैंने प्रेमी और प्रिय को एक के रूप में पाया, क्योंकि विचार की दुनिया में, सब एक है।""बारह वर्षों तक मैंने अपने अंदर स्वयं (नफ़्स) के साथ व्यवहार किया, जैसा कि एक लोहार अपनी सामग्री के साथ करता है, तपस्या की अग्नि में बारी-बारी से गर्म करता और पीटता है और दोष को हथौड़े (मलमह) के साथ तब तक पीटा जब-तक उसका मैल नहीं हट गया, और वह दर्पण बन गया। पांच साल तक मैं इस शीशे को तरह-तरह की धार्मिक प्रथाओं से चमकाने में लगा रहा। एक साल के लिए मैंने अपने भीतर झाँका, और अपने कचरे के चारों ओर बेवफाई का एक घेरा पाया। और पाँच वर्षों तक मैंने उस कमरबंद को हटाने की कोशिश की जब तक कि मुझे अपना सच्चा विश्वास वापस नहीं मिल गया। फिर मैंने अपनी आंखों के सामने सब कुछ मृत पाया और भगवान अकेले जीवित हैं। तब मुझे अनुभव हुआ "तारे क्या है? यह मैं है। कुर्सी (कुर्सी) क्या है? यह मैं है। टैबल या पेन क्या है? यह मैं है। पैग़म्बर या दूत क्या हैं इब्राहीम, मूसा और मुहम्मद? वे मैं हैं। इसे आगे समझाते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि जो कोई ईश्वर में पूरी तरह से विनष्ट हो जाता है, तो वह पाता है कि जो कुछ भी है, वह ईश्वर है। मनुष्य के लिए बिना कुछ के रहने से बेहतर कुछ भी नहीं है: कोई तपस्या नहीं, कोई सिद्धांत नहीं, कोई अभ्यास नहीं। जब वह सबके बिना होता है तो सबके साथ होता है।" हजरत बायजीद बस्तामी के अनुसार, जब साधक अपने अहंकार और व्यक्तिगत अस्तित्व को ईश्वर में पूरी तरह मिटा देता है, जिसे 'फना' (स्वयं का विनाश) कहा जाता है, तो उसे अनुभव होता है कि हर तरफ केवल दिव्य सत्ता यानी ईश्वर ही मौजूद है।

हज़रत बायज़ीद ने अल्लाह को पाने और शुद्ध तौहीद (ईश्वर की एकता) के लिए 5 मुख्य बातों पर ज़ोर दिया: अल्लाह के आदेशों और पैग़म्बर के तौर-तरीकों का दृढ़ता से पालन करना। हमेशा सच बोलना और अपने व्यवहार में साफ़ रहना। अपने दिल को किसी के प्रति भी नफ़रत या ईर्ष्या से आज़ाद रखना। हमेशा हराम भोजन और कमाई से दूर रहना। धर्म में नई और मनगढ़ंत चीज़ों (बिदअत) को शामिल करने से बचना। हज़रत बायज़ीद बिस्तामी का विसाल (निधन) लगभग 875 ईस्वी (15 शबान 261 हिजरी) को हुआ। मज़ार शरीफ़: उनका मुख्य मज़ार ईरान के सेम्नान प्रांत के बिस्ताम शहर में स्थित है, जहाँ आज भी दुनिया भर से लोग उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने आते हैं।

सूफ़ीमत के विकास के इस दूसरे चरण में अब्बासी शासकों की राजधानी बगदाद में बादशाह मामू ने भारत से वेदान्त और बौद्धमत के दार्शनिकों और संतों को अपने दरबार में आमंत्रित किया था। इन दार्शनिकों की विचारधारा का प्रभाव सूफ़ियों पर पडा। सूफ़ीमत में विकास के इस चरण में ऐसे तत्त्वों का भी समावेश हो गया जो इस्लाम के मूल सिद्धांतों के अनुकूल नहीं समझा जाता था। वैदिक दर्शन के `तत्त्वमसि’ (छान्द्योग उपनिषद्), `अहंब्रह्मास्मि (बृहदारन्यकोपनिषद), आदि भारतीय दर्शनों का सूफ़ीमत पर प्रभाव पडा। हज़रत मंसूर व हज़रत हल्लाज ने स्वयं को सत अर्थात ब्रह्म मानकर `अनलहक़ कहा। यह तसव्वुफ़ के विकास और शरा (इस्लाम का क़ानून) के विरोध की चरम सीमा थी। सूफ़ियों ने साधना में जीव और परमात्मा के बीच मध्यस्थता करने वाले धार्मिकों को अनावश्यक कह कर उनके महत्त्व पर आघात किया था। शासक वर्ग के ईश्वरीय प्रतिनिधि स्वरुप को भी स्वीकार नहीं किया था। इन सब कारणों से हज़रत मंसूर हल्लाज जैसे कई सूफ़ी साधकों को जान गंवानी पडी। एक और बात ध्यान देने वाली है कि सूफ़ियों ने हज़रत मंसूर हल्लाज को मृत्यु दंड दिए जाने के बाद छोड़ा नहीं। इससे ऐसा लगना स्वाभाविक है कि उन्हें सिर्फ़ उनके सायुज्य एवं अवतरण के सिद्धांत के पोषक होने के कारण ही मृत्यु दंड नहीं दिया गया। हज़रत मंसूर हल्लाज के पहले ही हज़रत शेख़ बायज़ीद बस्तामी ने कुछ इसी तरह का ऐलान किया था। शैख़ अबूबकर शिबली ने कहा था, मुझमें और मंसूर हल्लाज में मात्र इतना अंतर है कि उनको लोगों ने बुद्धिजीवी मानकर मार डाला और मुझे दीवाना समझकर छोड़ दिया। इन बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि हज़रत मंसूर हल्लाज के मृत्युदंड का कारण राजनैतिक भी रहा होगा।

8.9 हज़रत मारुफ अल करखी

हजरत मारूफ अल-कारखी (रह.) इस्लाम के शुरुआती दौर के एक महान और प्रसिद्ध सूफी संत थे, जो अपनी सादगी, परोपकार और उच्च आध्यात्मिक अवस्था के लिए जाने जाते हैं। इनके विचारों में रहस्यवादी प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। वे बगदाद के करख में रहते थे। सूफीवाद (तसव्वुफ) के इतिहास में उनका बहुत ऊँचा स्थान है। वे सूफी परंपराओं में विशेष रूप से 'सिलसिला-ए-कादरिया' के शुरुआती और महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माने जाते हैं।

उनका असली नाम असदुद्दीन अबू महफूज़ मारूफ बिन फिरोज़ अल-कारखी था। बगदाद के पास 'कारख' या 'वासित' क्षेत्र में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम फ़िरोज़ था। वे ईसाई धर्म के अनुयायी थे। वे घर छोड़कर आठवीं शिया इमाम हज़रत अली बिन मूसा अल-रज़ा की संगति में चले गए और उनके प्रभाव में आकर इस्लाम स्वीकार कर लिया। बाद में उनके माता-पिता ने भी उनके हाथों पर इस्लाम अपनाया। बचपन में जब उनके ईसाई शिक्षक उन्हें 'त्रिमूर्ति' (ट्रिनिटी) का पाठ पढ़ाते थे, तो वे हमेशा कहते थे कि ईश्वर केवल एक ही है। इस कारण उन्हें बचपन में काफी प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शिक्षा और मार्गदर्शन मुख्य रूप से हज़रत इमाम अली रज़ा से प्राप्त किया। इसके अलावा वे हज़रत हबीब अजामी के विचारों से भी गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने कठिन तपस्या, विनम्रता और लोगों की निःस्वार्थ सेवा को अपने जीवन का मुख्य आधार बनाया। उन्होंने सूफ़ीवाद में ईश्वर के प्रेम को एक धार्मिक सिद्धांत के बजाय आध्यात्मिक सिद्धान्त के रूप में पेश किया। परमात्मा के प्रेम में वे डूबे रहते थे। उनका कहना था कि मनुष्य की शिक्षा से प्रेम नहीं होता। वह परमात्मा की कृपा और प्रसन्नता से ही संभव है। वे कहते थे परमात्मा से भय करके चलो। वे सबको देख रहे हैं। जिनका ध्यान परमात्मा में लगा रहता है, वे परमात्मा के सच्चे दास हैं। उनका मानना था कि बिना अच्छे कर्म किए जन्नत (स्वर्ग) की उम्मीद रखना एक गुनाह या धोखा है। उन्होंने सिखाया कि सच्चा प्रेम (मोहब्बत) किताबों या शिक्षा से नहीं सीखा जा सकता, बल्कि यह अल्लाह की तरफ से मिलने वाला एक रूहानी तोहफा है। वे हमेशा कहते थे कि अपनी जीभ को अपनी खुद की तारीफ करने से वैसे ही बचाओ जैसे तुम उसे गुनाहों से बचाते हो।

एक बार हज़रत मारुफ़ अल-करख़ी अपने कुछ शिष्यों के साथ बगदाद की प्रसिद्ध दजला नदी के किनारे बैठे थे। अचानक एक व्यक्ति नदी में डूबने लगा और मदद के लिए पुकारने लगा। नदी का बहाव बहुत तेज़ था और दूर-दूर तक कोई नाविक या नाव मौजूद नहीं थी। यह देखकर हज़रत मारुफ़ अल-करख़ी ने नदी की तरफ देखा और बेहद शांत भाव से पानी पर कदम रख दिया। पानी ने उनके पैर छुए लेकिन वे डूबे नहीं, बल्कि वे पानी की सतह पर ऐसे चलने लगे जैसे सूखी ज़मीन पर चल रहे हों। वे डूबते हुए व्यक्ति के पास पहुंचे, उसका हाथ पकड़ा और उसे सुरक्षित किनारे पर ले आए। जब शिष्यों ने उनसे इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बेहद सादगी से कहा, "जब कोई बंदा पूरी तरह अल्लाह के हुक्म के आगे खुद को सौंप देता है, तो कायनात की हर चीज़ उसके हुक्म का अदब करती है।"

उनकी मृत्यु 815 ई. में हुई। उनका मजार (दरगाह) इराक की राजधानी बगदाद शरीफ में दरिया-ए-दजला (टिग्रिस नदी) के किनारे स्थित है। इस मजार को बहुत बरकत वाला माना जाता है और लोग यहाँ सुकून व दुआ की कबूलियत के लिए आते हैं। बगदाद में यह बात मशहूर थी कि बीमार लोग जब अपनी बीमारियों से लाचार हो जाते, तो हज़रत मारुफ़ अल-करख़ी के पास आते थे। वे उनके लिए सिर्फ एक बार हाथ उठाकर अल्लाह से दुआ करते और लोग ठीक हो जाते थे। इसी वजह से आज भी उनके विसाल (देहांत) के सदियों बाद, बगदाद में उनकी मज़ार (दरगाह) को "तिर्याक-ए-मुजर्रब" (परखी हुई दवा) कहा जाता है, जहाँ लोग अपनी मन्नतें और दुआएं लेकर आते हैं।

8.10 हज़रत जुनैद बग़दादी रह.अ. (लगभग 830–910 ईस्वी)

हज़रत सैयदना जुनैद बग़दादी (लगभग 830 ईस्वी – 910 ईस्वी) इस्लामी इतिहास के सबसे महान और प्रसिद्ध सूफ़ी संतों में से एक हैं, जिन्हें 'सुलतान-अल-मुहाक़ीक़ीन' जैसी उपाधि से नवाज़ा गया है। बगदाद के जुनैद धर्मशास्त्र, न्यायशास्त्र और नैतिकता में पारंगत थे और सभी सूफ़ी सम्प्रदायों के सूफ़ियों द्वारा सूफ़ीवाद के क्षेत्र में काफी प्रशंसित थे। उन्हें 'सैय्यदुत ताइफा' (सूफियों के सरदार) के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म लगभग 830 ईस्वी में बगदाद, इराक में हुआ था। उनके परिवार की जड़ें ईरान के निहावंद शहर से जुड़ी थीं। बचपन में अनाथ होने के बाद उनका लालन-पालन उनके मामा और प्रसिद्ध सूफी संत हजरत सिर्री साक़ती की देखरेख में हुआ। वे बचपन से ही बेहद बुद्धिमान थे। उन्होंने सात साल की कम उम्र से ही धार्मिक और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करना शुरू कर दिया था। उन्हें कई सूफी आध्यात्मिक परंपराओं और 'जुनैदी सिलसिले' का मूल स्तंभ माना जाता है। वे हज़रत सिर्री साक़ती के मुरीद और ख़लीफ़ा थे। उनके पीर खुद फ़रमाते थे कि "जुनैद का मर्तबा मुझसे कहीं ज़्यादा ऊँचा है"। वे सूफ़ियों के 'जुनैदी सिलसिले' के संस्थापक माने जाते हैं। आज भी का़दरी, शाज़िली और रिफ़ाई जैसे कई बड़े सूफ़ी सिलसिले अपनी आध्यात्मिक कड़ियों (शजरा) के लिए हज़रत जुनैद बग़दादी से जुड़ते हैं।

अध्यात्म की राह पर पूरी तरह आने से पहले, वे बग़दाद के एक बेहद कुशल और शाही पहलवान भी रह चुके थे। एक बार बग़दाद के ख़लीफ़ा ने उनके लिए कुश्ती का आयोजन किया। अखाड़े में उनके सामने एक बेहद कमज़ोर और बूढ़ा व्यक्ति आया, जिसने चुपके से उनके कान में कहा कि "मैं रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की औलाद (सैयद) हूँ और तंगहाली की वजह से यहाँ आया हूँ; अगर आज तुम मुझसे हार जाओगे तो मुझे इनाम मिल जाएगा और मेरे बच्चों का पेट भर जाएगा"। हज़रत जुनैद ने अल्लाह के रसूल की आल की इज़्ज़त के लिए अपनी पूरी शोहरत दांव पर लगा दी और जानबूझकर उस कमज़ोर शख्स से हार गए। इस त्याग के बदले अल्लाह ने उन्हें विलायत (संतत्व) का सर्वोच्च मर्तबा अता किया।

वह शायद पहले रहस्यवादी थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से हज़रत अली को उनके रहस्यवादी ज्ञान के लिए अपना ऋण व्यक्त किया था। उनके अनुसार, हज़रत अली के पास अलौकिक और गूढ़ ज्ञान (इल्म और हिक्माह) दोनों की प्रचुरता थी। जुनैद ने बेख़ुदी (सुक्र) के विपरीत संयम (सब्र) के सिद्धांत की वकालत की। उनके अनुसार, नशा एक बुराई है, क्योंकि यह एक फ़क़ीर की सामान्य स्थिति को बिगाड़ देता है और विवेक और आत्म-नियंत्रण को नाश की ओर ले जाता है। उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि इंसान भले ही आध्यात्मिक दुनिया (तरीक़त) की कितनी भी ऊँचाइयों पर पहुँच जाए, उसे शरीयत (इस्लामी नियमों) और होश-ओ-हवास के दायरे में ही रहकर ज़िंदगी बसर करनी चाहिए।

जब हल्लाज अल-मक्की का साथ छोड़ने के बाद जुनैद के पास उनके संसर्ग की तलाश में आए, तो जुनैद ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, संसर्ग दिमागी सेहत की मांग करता है जिसकी आपमें कमी है। हल्लाज ने उत्तर दिया: हे शेख़, संयम और नशा मनुष्य के दो गुण हैं, और मनुष्य अपने भगवान से तब तक परदे में रहता है जब तक कि उसके ये गुण नष्ट नहीं हो जाते। जुनैद ने जवाब दिया: आप गलती कर रहे हैं। ईश्वर के संबंध में संयम किसी की आध्यात्मिक स्थिति की मज़बूती को दर्शाता है, जबकि नशा अत्यधिक लालसा और अत्यधिक प्रेम को दर्शाता है, और उनमें से कोई भी (लालसा या प्रेम) मानव प्रयास से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। वे शिफ़ाई न्यायशास्त्र (फिक़्ह) और तसव्वुफ (आध्यात्मिकता) के बीच संतुलन बनाने वाले प्रमुख विद्वान थे। संयम के सिद्धांत की वकालत ने हज़रत जुनैद को एक आदर्श सूफ़ी बना दिया, जो रहस्यवादियों और धर्मशास्त्रियों दोनों के लिए स्वीकार्य थे, और यही कारण है कि हम उन्हें धार्मिक क़ानून के पैरोकार के रूप में पाते हैं। उन्होंने शरीयत (इस्लामी कानून) और तरीकत (आध्यात्मिक मार्ग) के बीच की दूरी को मिटाया और सही मार्ग दिखाया , जिससे सूफ़ीवाद को एक नई और सुरक्षित दिशा मिली।

उनके स्पष्ट व्यवहार (ज़ाहिर) के संबंध में कोई भी उनके ख़िलाफ़ कोई आपत्ति नहीं उठा सकता था। एक ओर जहां उनका बाहरी व्यवहार (ज़ाहिर) शरिया के साथ पूर्ण अनुरूप था, वहीं दूसरी ओर उनकी आंतरिक स्थिति (बातिन) रहस्यवाद के सिद्धांतों के साथ पूर्ण अनुरूप थी। उनके अनुसार, केवल वही सही मायने में उस पथ (तरीक़त - साधना मार्ग की वह मंजिल है जिसमें साधक पवित्रता का सहारा लेता है। सांसारिक ऊंच नीच से ऊपर उठ जाता है और उसमें देवदूतों के गुण आ जाते हैं) को पार कर सकते हैं जो अपने दाहिने हाथ में ईश्वर की पुस्तक (अल-क़ुरआन) और अपने बाएं हाथ में पवित्र पैगंबर की सुन्नत के साथ चल सकता है।

वे एकांत या संन्यास की बजाय समाज के बीच रहकर लोगों का मार्गदर्शन करने में विश्वास रखते थे। उन्होंने फ़क़ीरों के बजाय 'उलेमा' की पोशाक पहनना पसंद किया और अपने शिष्यों और अन्य लोगों के लगातार अनुरोध के बावजूद वे फ़क़ीरों के ऊनी वस्त्र (खिरक़ा) धारण नहीं किया। उनके अनुसार, लोगों के लिए एकमात्र सुरक्षित और खुला मार्ग पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा निर्धारित मार्ग है। इसी तरह सच्चे और निश्चित ज्ञान के लिए क़ुरआन में ईश्वर द्वारा प्रकट किया गया ज्ञान है और पवित्र पैगंबर द्वारा सुन्नत में सन्निहित है। उनके अनुसार, तौहीद उस परम-सत्य से अलगाव है। ईश्वर को हमारे प्रत्यक्ष अस्तित्व की किसी भी श्रेणी से नहीं समझा जा सकता है। एकीकरण, वास्तव में यह है कि एक व्यक्ति को भगवान के हाथों में एक आकृति होना चाहिए, जिस पर जैसा वह सर्वशक्तिमान चाहे, उसके आदेश गुजरे, और यह कि उसकी एकता के समुद्र में डूब जाए, स्वयं का विनाश कर दे, अर्थात्, उसकी स्थिति वैसी ही होनी चाहिए जैसी उसके पहले अस्तित्व में थी।

हज़रत जुनैद के अनुसार सत्य की खोज में मनुष्य के प्रयास उस स्थिति में लौटने के लिए होने चाहिए जिसमें वह पैदा होने से पहले था। वह 'उबुदियत' को परिभाषित करते हुए कहते हैं यह वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति को पता चलता है कि सभी चीज़ें भगवान की हैं, कि वह उनके अस्तित्व और अस्तित्व का कारण है, और वे सभी अकेले ही लौट आएंगे।

जुनैद के अनुसार, ईश्वर पर भरोसा (तवक्कुल), ईश्वर के साथ अपने संबंध को अब बनाए रखना है, जैसा कि आपके अस्तित्व में आने से पहले था। यह न तो अधिग्रहण (कस्ब) में है और न ही ग़ैर-अधिग्रहण में, बल्कि अपने दिल को भगवान के वादे के अनुरूप रखने में है। पश्चाताप में तीन चरण शामिल हैं: पहला, ग़लत किए जाने पर खेद प्रकट करना; दूसरा, हमेशा के लिए ग़लत करने से बचने का संकल्प, और तीसरा, अपने आप को सभी बुराइयों और अशुद्धियों से शुद्ध करना।

हज़रत जुनैद बग़दादी (रहमतुल्लाह अलैह) के अनमोल कथन (अक़्वाल) इंसानी भलाई, नैतिकता और आध्यात्मिक शुद्धि का खजाना हैं। उनके कुछ सबसे प्रसिद्ध कथन हैं: "अल्लाह की तरफ जाने वाले सारे रास्ते बंद हैं, सिवाय उस रास्ते के जो हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पदचिह्नों पर चलता है।" "हमारा यह सूफ़ीवाद (तरीक़त) पूरी तरह से अल्लाह की किताब (क़ुरआन) और रसूल की सुन्नत (परंपराओं) से बंधा हुआ है। जो क़ुरआन नहीं पढ़ता और हदीस नहीं लिखता, उसकी अध्यात्म में कोई जगह नहीं है।" "सूफ़ीवाद कोई दिखावा या रस्में नहीं हैं। यह तो अपने भीतर के बुरे अख़्लाक़ (व्यवहार) को मारना और अच्छे अख़्लाक़ को जिंदा करना है।" इख़्लास (ईमानदारी) का मतलब यह है कि आप अपनी नेकियों (अच्छे कामों) के बदले न तो इस दुनिया में किसी से तारीफ की उम्मीद रखें और न ही आखिरत (परलोक) में किसी इनाम का घमंड करें।" "सच्चा दोस्त वह है जिसे अपनी ज़रूरतें बताने के लिए तुम्हें शब्दों का सहारा न लेना पड़े, बल्कि वह तुम्हारी आँखों और खामोशी को देखकर ही सब समझ जाए।" "दुनिया को छोड़ देने का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे हाथ खाली हों। असली वैराग्य यह है कि तुम्हारा हाथ भले ही दुनियावी दौलत से भरा हो, लेकिन तुम्हारा दिल उससे बिल्कुल खाली (निरपेक्ष) हो।" "जब तुम अपनी सारी इच्छाओं को अल्लाह की इच्छा में विलीन कर देते हो, तो तुम्हें दुनिया की कोई भी परेशानी दुखी नहीं कर सकती।"

हज़रत जुनैद बग़दादी 910 ईस्वी में इस दुनिया से पर्दा किया। उनका मज़ार शरीफ़ बग़दाद (इराक़) के शुनीज़िया कब्रिस्तान में उनके पीर हज़रत सिर्री साक़ती के नज़दीक ही स्थित है, जहाँ आज भी लाखों ज़ायरीन (तीर्थयात्री या ज़ियारत करने वाले लोग) हाज़िरी देते हैं।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर   


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