5. सूफ़ीमत का उदय-7
5.12 (छ) क़ुरआन का संदेश
क़ुरआन
इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और सर्वोच्च ग्रंथ है। क़ुरआन का अर्थ उच्चरित या
पठित वस्तु है। 'क़ुरआन' शब्द अरबी भाषा के 'क़राअ' से बना है,
जिसका अर्थ है "पढ़ना" या "पाठ करना"। हालाकि क़ुरआन एक धार्मिक किताब है, दार्शनिक नहीं,
लेकिन यह उन सभी समस्याओं के बारे में
बताता है, जो धर्म और दर्शन में समान हैं। कुरान का मुख्य संदेश मानवता को एक
सच्चे ईश्वर (अल्लाह) की एकेश्वरवाद (तौहीद) की राह दिखाना, अच्छे कर्मों के प्रति प्रेरित करना और न्याय (इंसाफ) तथा शांतिपूर्ण
जीवन का मार्ग प्रशस्त करना है। क़ुरआन का संदेश संपूर्ण मानव
जाति के लिए है। इसमें मानव जीवन के सभी पक्ष समाहित हैं, - उसका विश्वास,
मान्यता, आराधना की विधि, आचार-संहिता, सामाजिक क़ानून-क़ायदे, शासन के सिद्धान्त, आर्थिक
प्रविधि। क़ुरआन द्वारा “तौहीद”
यानी एकेश्वरवाद को सामने लाया गया है। तौहीद का अर्थ होता है – “अल्लाह को एक सत्य ईश्वर माने, उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करें और उसी की
आराधना, उपासना
और पूजा करें,.. क्योंकि
वो निराकार एक सत्य ईश्वर अल्लाह ही है जिसने सारे जगत का निर्माण किया, वही उसका रचयिता, मालिक और उसका रब है…”। पूरी सृष्टि का केवल एक ही रचयिता और पालनहार
है, जिसका कोई साझीदार (बेटा या परिवार) नहीं है। वह
अद्वितीय और सर्वशक्तिमान है।
इस्लाम धर्म में धार्मिक शिक्षाओं और
कानूनों के सारे सिद्धांतों को दो विभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। एक को “उसूल”
(जड़ या मूल) कहते हैं और दूसरे को “फ़रू”
(शाखा)। ये दोनों मिलकर इस्लाम की पूरी रूपरेखा तैयार करते हैं। क़ुरआन
में ईमान और अमल की बात की गई है। ईमान असल में उसूल ही है
और अमल फ़रू है। 'उसूल' का अर्थ है मूल या नींव।
उसूल वे धार्मिक सिद्धांत (ईमान) हैं जिन्हें नबी ने बताया है। ये
इस्लाम के वे आधारभूत विश्वास और आस्थाएँ हैं जो अपरिवर्तनीय हैं। फ़रू उन सिद्धांतों के अनुसार आचरण (अमल) को कहते
हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि हज़रत मुहम्मद साहब के उपदेश उसूल हैं,
और उन पर अमल करने का नाम फ़रू है। ईमान उस सत्य की स्वीकृति है जिसे नबी
साहब ने उद्घोषित किया था। कुफ़्र (अविश्वास, इनकार) उसी सत्य की अस्वीकृति है। ईमान का सर्वोच्च शिखर
“तौहीद”
है। तौहीद यह सिखाती है कि ईश्वर को छोड़कर किसी और को मत पूजो। कुफ़्र का सबसे बुरा रूप “शिर्क”
है। क़ुरआन कहता है कि सभी पाप क्षमा किये जा सकते हैं,
परन्तु शिर्क के लिये क्षमा नहीं,
क्योंकि इससे मूल धर्म की नींव ही हिल जाती है। और मार्गदर्शन का केंद्र
ही बदल जाता है (क़ुरआन - 4:48)। शिर्क
के कारण ही मनुष्य ईश्वर के अलावा और देवताओं को भी ईश्वर मान लेता है या उसमें
ईश्वरीय गुण देखता है। शिर्क का एक रूप मूर्तिपूजा को मान लिया गया है। रसूल को
अपनी ओर से क़ुरआन में संशोधन-परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि क़ुरआन
ईश्वर द्वारा पारित विधान है। रसूल क़ुरआन द्वारा निर्धारित सीमा तक आदेश देता है।
वह वही उपदेश देता है जो ईश्वर का आदेश होता है।
अल् फातिहा क़ुरआनशरीफ़
का पहला अध्याय है। उसमें मंत्र है –
बिस्मिल्लाहिर् रहमानिर् रहीम
(अल्लाह के नाम से, (आरम्भ
में भगवान का नाम) जो परम कृपालु तथा दयावान्
है)।
अल् हम्दु लिल्लाहि रब्बिल् आलमीन
(सब प्रकार की प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं,
जो सारे संसारों का पालनहार है)।
र्रहमानिर् रहीम (जो
अत्यंत कृपाशील और दयावान है।
अर्थात वह विश्व की व्यवस्था एवं रक्षा अपनी अपार दया से कर रहा है, अतः प्रशंसा एवं पूजा के योग्य भी मात्र वही है।)
मालिकि यौमिद्दीन
(जो प्रतिकार (आख़िरी/ प्रलय का दिन/ क़्यामत) के दिन का मालिक है)
इय्याक नअबुदु व इयाक नअस्तईन
(हे अल्लाह! हम
केवल तुझी को पूजते (इबादत) हैं और केवल तुझी से सहायता मांगते हैं।) इस्लाम
की परिभाषा में इसी का नाम ‘तौह़ीद’ (एकेश्वरवाद) है,
जो सत्य धर्म का आधार है।
इहदि नस् सिरातल मुस्तक़ीम (सीधा
रास्ता {सुपथ} दिखा
तू हमें)
सिराताल् लजीन अन्अम्त अलैहिम। (उन
लोगों की राह जिन पर तूने अपना इनाम फरमाया।)
ग़ैरिल मग्दूबि अलैहिम व लद्दाल्लीन।
(न कि उनका जिन पर प्रकोप उतारते हो, न उनका जो भ्रमित हैं)
क़ुरआन में यह संदेश दिया गया है कि हमें
सीधी राह पर चलनी चाहिए। ग़लत राह से हम सही मुक़ाम पर नहीं पहुंच सकते।
मार्गदर्शन के लिए ईश्वर ने आदम, नूह, इब्राहिम,
मूसा और ईसा सहित कई पैगंबर भेजे। पैगंबर मुहम्मद उनके अंतिम संदेशवाहक हैं, और कुरान मानवता के लिए अंतिम ईश्वरीय मार्गदर्शन
है।
क़ुरआन में यह संदेश दिया गया है कि सारी
सृष्टि का ईश्वर एक है और सभी इंसान उसी ईश्वर की एकता का रूप है। इस्लाम में
ईश्वर को ‘अल्लाह’ कहते हैं और इसके साथ ‘तआला’
शब्द का प्रयोग होता है, यह अरबी क्रिया 'ताला' से निकला है,
जिसका अर्थ है 'सबसे
ऊंचा', 'महानतम', या 'जो
हर चीज़ और हर सोच से परे और बुलंद है',
यानी जिसका अर्थ होता है सर्वश्रेष्ठ या महान। इस्लामी परंपरा में जब भी अल्लाह का
नाम लिया जाता है, तो उनकी महिमा और
सर्वोच्चता को व्यक्त करने के लिए उनके साथ सम्मान सूचक शब्द के रूप में 'तआला' जोड़ा
जाता है। ‘अल्लाह
तआला’ ('सर्वशक्तिमान ईश्वर')
सदैव से था, सदैव रहेगा। ईश्वर सिर्फ़ एक है, इसलिए वह सर्वोच्च है। उसके नियम और
क़ायदे अंतिम है। उसका आदेश अंतिम है। वह ख़ालिक़ (सृजनहार) है, वह रब
(पालनहार) है, वह मालिक व हाकिम (अधिकारी व शासक) है, वह आलिम
(ज्ञानी) है, वह अज़ीज़ (सर्वशक्तिमान) है, वह आदिल (न्यायी) है, वह मअबूद
(वंदनीय) है। इंसान अपनी बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति से इस सच्चाई को अच्छी तरह
समझ सकता है। इसलिए वह अपने उस मालिक के सामने, जिसने उसे पैदा किया है और सारी
नियामतें दी हैं, सर झुकाए और यह भी हिदायत दी गई है कि उसके सिवा किसी और की पूजा
नहीं की जानी चाहिए। सब उसका आदेश माने। रूहानी ज़िन्दगी का यह पहला उसूल
है।
मनुष्य को एक उद्देश्य के साथ बनाया गया
है। इस दुनिया के बाद 'न्याय
का दिन' (प्रलय)
आएगा, जहाँ हर इंसान को अपने अच्छे
और बुरे कर्मों का हिसाब देना होगा। इस्लाम में स्रष्टा और सृष्टि
में भिन्नता स्पष्ट है। दोनों का मक़ाम (पद) अलग है। मृत्यु के बाद मनुष्य स्वर्ग या नर्क का अधिकारी बनता है। दोनों का मिलन या
एकत्व की कोई अवधारणा नहीं है। यानी आत्मा का परमात्मा से मिलन या सूक्ष्म का
विराट से मिलन जैसी बात नहीं कही गई है। क़ुरआन में ईश्वर के द्वारा उतरे वे संदेश
हैं जो समय-समय पर ईश्वर ने पैग़म्बर मुहम्मद पर उतारे थे। चूंकि यह संदेश सीधे
ईश्वर से आए हैं इसलिए यह सर्वोच्च है और सबको इसका पालन करना ज़रूरी है। क़ुरआन में
इंसान के लिए दो तरह के कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं –
एक “हुकूक़
अल्लाह”
(ईश्वर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य) और दूसरा “हुकूक़-उल-इबाद”
(मनुष्य के प्रति मनुष्य का कर्तव्य)। “हुकूक़
अल्लाह”
को इंसान का फ़र्ज़ कहा गया है, जिसमें उसे नमाज़, रोज़ा, हज्ज, ज़कात,
आख़रत और फ़रिश्तों (देवदूतों) पर विश्वास शामिल है। इसे ही इबादत (पूजा) कहा
जाता है। इन फ़र्ज़ों को पूरा करने से इंसान में रूहानी ताक़त आती है। “हुकूक़-उल-इबाद”
यानी इंसान के लिए इंसान का कर्तव्य। क़ुरआन का पहला उसूल है कि “हुकूक़
अल्लाह”
के पूरा करने में यदि कोई कमी रह जाए तो ख़ुदा माफ़ कर सकता है, लेकिन “हुकूक़-उल-इबाद”
के पूरा करने में अगर थोड़ी सी भी कमी रह जाए तो ख़ुदा उसे हरगिज माफ़ नहीं करेगा।
ऐसे आदमी को न सिर्फ़ इस दुनिया में बल्कि दोनों में, ख़सारा (घाटा) उठाना
पड़ेगा।
क़ुरआन का दूसरा उसूल है कि नमाज़,
रोज़ा, हज्ज, और ज़कात (हकूक अल्लाह) इंसान के रूहानी (आध्यात्मिक)
जीवन और आत्मिक जीवन से संबंध रखते हैं। इसलिए इन्हें ईमान (श्रद्धा), ख़ुलूसे
कल्ब (शुद्ध हृदय) और बेग़र्ज़ी (निःस्वार्थ भाव) से पूरा करना चाहिए।
कोई निजी फ़ायदे की बात नहीं करनी चाहिए। यह केवल अल्लाह के नज़दीक पहुंचने के लिए
रूहानी शक्ति हासिल करने का ज़रिया है। ख़ुदग़र्ज़ी से इनका सही उद्देश्य जाता रहेगा। क़ुरआन प्रेम,
दया, सच्चाई, न्याय, और
बड़ों के सम्मान पर जोर देती है। यह गरीबों की मदद करने,
महिलाओं के अधिकारों और एक स्वस्थ,
अपराध-मुक्त समाज की स्थापना करने की शिक्षा देती है।
क़ुरआन का तीसरा उसूल है कि हर
इंसान को चाहिए कि जो रूहानी शक्ति ईश्वर की तरफ़ अपने कर्तव्यों के अदा करने से
हासिल हो उसे मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने में लगा दे। क़ुरआन में
पहला फ़र्ज़ यह बताया गया है कि ग़रीबों, लाचारों, दुखियों और पीड़ितों की सहायता की
जानी चाहिए। समाज में लोग एकता और भाईचारे के साथ रहें। लोगों के सामने मानवता की
बेहतरी और कल्याण का ध्येय हो। यह बुनियादी सच्चाई सब धर्म ग्रंथों में मौज़ूद है।
क़ुरआन (41:34) में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को तथा उनके माध्यम से
सर्वसाधारण मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया है कि बुराई का बदला अच्छाई से तथा
अपकार का बदला उपकार से दें। जिसका प्रभाव यह होगा कि अपना शत्रु भी हार्दिक मित्र
बन जायेगा। इस तरह क़ुरआन में यह आदेश मिलता है कि ‘पाप का प्रतिकार पुण्य से ही
होना चाहिए’। बताया गया है ‘बुराई रफा करनी है तो वह अच्छाई से ही हो सकती
है’।
इन्नहू लफी जुबूरिल इल अव्वलीन
लि कुल्ले कौमिनहाद।
व इम्मिन उम्मतिन इल्ला खलाफीहा नजीर।
ला नुफ़र्रिको बैना अहदिम मिन रूसुलिह।
व मा अरसलना मिन कब्लेका मिर्रसूलिन।
ला इलाहा इला अना फ़ाबुदून।
(क़ुरआन शरीफ़, 14-4)
अर्थात्: जो कुछ मैंने तुमसे कहा है वह
सब पहले के लोगों के पवित्र ग्रंथों में मौज़ूद है। सब क़ौमों में अल्लाह ने पैग़म्बर
(ईश्वरीय संदेश वाहक) भेजे हैं। उन पैग़म्बरों में हम एक दूसरे के साथ किसी तरह का
फ़र्क़ नहीं करते। सबको एक बराबर मानते हैं और सबकी एक ही शिक्षा है। सबने एक ही
सच्चाई की घोषणा की है। सबक़ा मैं ही एक ईश्वर हूं। मेरे अलावा कोई दूसरा उपासना
योग्य नहीं है। “ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलल्लाह” इस्लाम का मूल-मंत्र है। इसका अर्थ
होता है – “अल्लाह के सिवा कोई और पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।” यह इस्लाम का धर्म
सूत्र है और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। सिर्फ़ अल्लाह को मानने
से ही कोई इंसान पक्का मुसलमान नहीं हो सकता। उसे यह भी मानना पड़ता है कि हज़रत मुहम्मद
साहब सल्ल. अल्लाह के नबी, रसूल और पैग़म्बर हैं। इसके बाद उसे पांच धार्मिक कृत्य
करने होने हैं।
कलमा पढ़ना – ‘ला इलाह इल्लल्लाह
मुहम्मदर्रसूलल्लाह’ मंत्र का पारायण करना। यह एक पवित्र वाक्य है, जो तौह़ीद का शब्द
है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर एक है और हज़रत मुहम्मद साहब उसके रसूल हैं।
इस्लाम का तौहीद (एकेश्वरवाद) इसी मंत्र पर आधारित है।
नमाज़ पढ़ना – प्रतिदिन पांच बार ईश्वर से प्रार्थना करना। इसे
सलात भी कहते हैं।
रोज़ा रखना – रमज़ान के महीने भर केवल एक शाम खाना खाना और वह
भी सूर्यास्त के बाद। रमज़ान के महीने में ही पहले-पहल क़ुरआन उतरा था।
ज़कात – अपनी वार्षिक आय का चालीसवां हिस्सा (ढाई
प्रतिशत) दान में दे देना।
हज्ज – तीर्थों में जाना।
पहले ये तीर्थ मक्का और मदीना थे, अब संतों की समाधियों को भी तीर्थ माना जाता है। क़ुरआन में कहा गया है, “निःसंदेह पहला घर, जो मानव के लिए (अल्लाह की वंदना का
केंद्र) बनाया गया, वह वही है, जो मक्का में है, जो शुभ तथा संसार वासियों
के लिए मार्गदर्शन है।” (3:96).
ये हैं क़ुरआन के धार्मिक सिद्धांत। क़ुरआन
की आयतें लोगों को संदेश देती हैं कि वे नेकी की राह पर चलें और गुमराह न हों। क़ुरआन के मुताबिक
मुहम्मद ख़ुदा के आखिरी पैगंबर थे। इसलिए वह्य (ईश्वर प्रेषित ज्ञान) और ग़ैब
(रहस्य) की बातें जान लेने का और कोई ज़रिया नहीं है। क़ुरआन अपने से पहले के सब
धर्म ग्रंथों को अपनी तरह ही ठीक मानता है। दुनिया के सब धर्मों की शिक्षा एक ही
है। जो रसूल जिस क़ौम में भेजा गया है उसे उस क़ौम की ज़बान (भाषा) में
ईश्वरीय संदेश देकर भेजा गया है ताकि वे उन्हें साफ-साफ समझ सकें। पैग़म्बर मुहम्मद
साहब सल्ल. के मानने वालों के सम्प्रदाय (उम्मते मुहम्मदिया) के अनुसार क़ुरआन
और नबी श्री की बताई सारी बातें अंतिम हैं और इन पर मुसलमानों को ईमान रखना और
अडिग रहना है।
इस्लाम, धर्म के
नाम पर बल प्रयोग के विरुद्ध है। पाक कुरआन का कलाम है- ‘’लकुम दीनुकुम
वलि-य-दीन’’ तुम अपने दीन (धर्म) पर, मैं अपने दीन पर। जो
लोग एक रसूल (पैग़म्बर, अवतार) और दूसरे रसूल में फ़र्क़ करते हैं और कहते हैं कि हम किसी को मानते हैं
और किसी को नहीं मानते हैं, वही लोग काफ़ेरूना हक्का (असली काफ़िर) हैं। क़ुरआन मूर्ति
पूजा का और ईश्वर को छोड़कर किसी और की पूजा का बहिष्कार करता है। चूंकि क़ुरआन का
कहना है कि ईश्वर ने सभी जातियों में पैग़म्बर और रसूल (धर्मोपदेशक) भेजे हैं।
लेकिन ये पैग़म्बर ईश्वर के पुत्र नहीं माने जा सकते। यदि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न
करने वाले गुणों को जोड़ दिया गया तो यह कृत्य उन्हें मनुष्यों की श्रेणी में ले
आएगा। इसके कारण की व्याख्या करते हुए दिनकर जी कहते हैं, “इस्लाम विश्व के उस
भाग में जनमा, जहां वर्षा कम होती थी। निर्जन उजाड़ में आंख खोलने के कारण, उसने
विचारों को स्वच्छता से देखा, सजावट में नहीं। चित्र, मूर्ति और संगीत के प्रति
इस्लाम में निषेध का भी यही कारण था।”
क़ुरआन में कहा गया
है कि “सृष्टि की रचना
करने वालों में ईश्वर (ख़ुदा) सर्वश्रेष्ठ है।” ख़ुदा हज़रत मुहम्मद
साहब सल्ल. को जो पैग़ाम भेजते थे, वे पैग़ाम कभी-कभी देवदूत ज़िबरील ले आते थे। मलायका
(देवदूतों) को हम देख नहीं सकते। हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. उन्हें आध्यात्मिक
दृष्टि से देखते थे। शैतान जिन्न-योनि का है। शैतान में विश्वास रखने से क़ुरआन मना
करता है। क़ुरआन का कहना है कि, “धर्म यह है कि मनुष्य अल्लाह, मलायक,
क़यामत, किताब और नबी में विश्वास करे।”
क़ुरआन के अनुसार
इंसान में उच्च और नीच, दोनों तरह की वासनाएं होती हैं। नीच वासनाएं प्राण-धारण के
लिए हैं, जबकि उच्च वासनाएं आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए। यदि नीच वासनाओं को
नियंत्रण में नहीं रखा जा सका तो इंसान का पतन हो जाएगा। नीच वासनाओं को उभारने का
काम “जिन्न” करते हैं। जिन्न
से बचने के लिए आदमी को हमेशा सावधान रहने की ज़रूरत है। जिन्न आदमी को गुमराह करता
है।
नबी मुहम्मद की
अजीम दुआ थी – “व कुर्रब्बी जि़दनी इल्मन’’ ऐ परवरदिगार मेरा इल्म (ज्ञान) और बढ़ा।
इसी तरह केनोपनिषद् में कहा गया है-
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥
शिष्य अपने गुरु को
उत्तर देते हुए कहता है: "मैं यह नहीं मानता कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह
(पूरी तरह) जानता हूँ। परंतु मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं उसे बिल्कुल नहीं
जानता। हममें से जो व्यक्ति 'मैं ब्रह्म को पूरी तरह से नहीं जानता, लेकिन मैं यह भी
नहीं कह सकता कि मैं उसे बिल्कुल नहीं जानता' इस गूढ़ सत्य को
समझता है, असल में वही ब्रह्म को सही अर्थों में जानता है।" यह श्लोक
अज्ञेय (जिसका पूरा ज्ञान संभव न हो) ईश्वर या ब्रह्म के स्वरूप को दर्शाता है। यह
बताता है कि ज्ञान केवल अहंकार नहीं है, बल्कि इस बात को
स्वीकार करना है कि असीम को सीमित बुद्धि से पूरी तरह जान पाना संभव नहीं है।
इल्म की फि़तरत है जुस्तज़ू, खोज। ज्ञान पिपासु लोगों के मन में यह बात
हमेशा से रही कि जो हम जानते हैं वह तो सत्य है
ही, जिसे दूसरों ने जाना है, वे भी सत्य होंगे। बौद्धिक दुराग्रह से मुक्त मानसिकता
वाले ऐसे लोग अन्य मतों के अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान या चिंतन-अन्वेषण से प्रेरणा लेते रहे और सभी के मंगल के लिए पाठ
पढ़ाते रहे। ऐसे लोग नमनशील विचार वाले थे, और उनकी इस धार्मिक
विशेषता ने उन्हें इतना समर्थ बनाया कि वे अपने से सर्वथा विपरीत विचारधारा
को भी आत्मसात कर सके। सूफ़ी कहते हैं ख़ुद क़ुरान में भी कहा गया है
कि ख़ुदा का ज़िक्र करने से दिल को सुकून मिलता है। बहुत सारे
सूफ़ियों ने आशिक़ों की मिसाल देकर अल्लाह से मोहब्बत में उस हालत को बयान करने के
लिए किया है, जो जिक्र के दौरान उन पर तारी हो जाती है। सूफ़ी संत
कहते हैं कि शरीअत को मानने का मतलब मज़हब के जिस्म से ताल्लुक़ है। वहीं ज़िक्र
के ज़रिए वो अल्लाह की रूह से रूबरू होते हैं। इस तरह से
वो ऊपरी तौर पर तो वो सामान्य दिखते हैं, मगर दिल ही दिल में वो अल्लाह की इबादत के नशे में डूबे
होते हैं।
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मनोज
कुमार