राष्ट्रीय आन्दोलन
486. भारत के विभाजन की विनाशलीला
1947
1947 में भारत का विभाजन मानव इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक था। पाकिस्तान के गठन और उसके परिणामस्वरूप भारत के विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर
आबादी का आदान-प्रदान हुआ, लाखों हिंदुओं और सिखों को अपने घरों को छोड़ने के
लिए मजबूर होना पड़ा। ब्रिटिश भारत को धर्म
के आधार पर भारत और पाकिस्तान में बांटने के इस निर्णय के कारण करीब 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए, 2 लाख से 20 लाख के बीच लोग मारे गए, और महिलाओं के खिलाफ
अकल्पनीय अत्याचार हुए। रातों-रात अपना ही देश उनके लिए विदेश बन गया। वे काफी तेज़ी
से सीमा पार कर गए। हिंदू और सिख पाकिस्तान से भारत की ओर भागे, जबकि मुसलमान भारत से पाकिस्तान की ओर गए। परिवहन के सभी उपलब्ध साधनों का
उपयोग करते हुए अनियंत्रित जनसमुदाय भारत के नगरों और गाँवों में बड़ी संख्या में
पहुँच गई। उन्हें रहने के लिए घरों की ज़रुरत थी। भारत के मुसलमान भी उतने ही दहशत
में थे और पाकिस्तान की ओर जा रहे थे। उनके द्वारा खाली किए गए घरों को बेघर
अप्रवासियों द्वारा जल्दी से जब्त कर लिया गया। शरणार्थियों की भीड़ इतनी अधिक थी
और क्रोध इतना भयंकर था कि किसी भी तरह की योजना या व्यवस्था को अराजकता में लागू
करना असंभव था। नेहरूजी ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष
राज्य बनने जा रहा है, और जो भी मुसलमान देश में रहना चाहते हैं, उन्हें पूर्ण सुरक्षा और नागरिकता के अधिकार दिए जाएंगे।
सीमा के दोनों ओर
(विशेषकर पंजाब और बंगाल में) भयंकर हिंसा भड़क उठी। धार्मिक उन्माद में गांवों के
गांव जला दिए गए और लोगों का नरसंहार किया गया। ख़लीकुज्ज़ामां ने लिखा है, “यह हिंदुस्तान के
इतिहास का सबसे अँधियारा दौर था।” आदमी शैतान हो गया था।
पड़ोसी ने पड़ोसी का खून किया। बच्चों, गर्भवती औरतों की निर्दयता से हत्या कर दी गई। पंजाब में बड़े पैमाने पर दंगे तो
अगस्त के पहले से ही चल रहे थे, और अगस्त 1947 तक 5,000 लोग मारे गए थे। अप्रैल
से जून तक घटनाएं इतनी तेज़ी से घटित हो रही थीं कि देश के नेता सांप्रदायिक विस्फोट
के नतीज़ों का आकलन करने में असमर्थ थे। यह झूठी आशा ही साबित हुई कि एक बार अंग्रेज़
चले जाएंगे तो भारतीय अपने मतभेद सुलझा लेंगे। सांप्रदायिकता को तो एक ऐसे ज़िद्दी नेता
ने हवा दी थी, जो किसी भी क़ीमत पर अपना अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध
था। उन दिनों गांधीजी कहा करते थे, “यदि लोगों ने विभाजन स्वीकार नहीं किया, तो पाकिस्तान ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं
सकता।” कुछ लोगों ने तो यह तक
आशा लगा रखी थी कि विभाजन शांतिपूर्ण होगा। उन्हें ऐसा लगता था कि जब पाकिस्तान की
मांग मंज़ूर कर ली जाएगी, तो फिर लड़ने के लिए क्या रह जाएगा? कुछ लोग कहते थे कि यह
जो नासूर है, यदि विभाजन के रूप में उसका ऑपरेशन हो जाता है तो सारा साम्प्रदायिक उन्माद
का पागलपन हवा हो जाएगा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद सीमा के दोनों ओर से जो नरसंहार शुरू
हुआ वह सर्वनाशी युद्ध के सामने कुछ भी नहीं था। कभी-कभी तो पूरी की पूरी रेलगाड़ी लाशों
से भरी आती थी। एक अनुमान के अनुसार 1,80,000 लोग मारे गए थे। इनमें से 60,000 लोग पश्चिम के थे और 1,20,000 लोग पूर्व के थे। मार्च 1948 तक 60 लाख मुसलमान और 45 लाख हिंदू शरणार्थी बन
चुके थे। इस त्रासदी का सबसे क्रूर दंश महिलाओं ने झेला। लाखों महिलाओं का अपहरण
हुआ, उनके साथ बलात्कार हुए, और उन्हें जबरन धर्म
परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। कई परिवारों ने अपनी ही महिलाओं की जान ले ली
ताकि वे दंगाइयों के हाथों न पड़ें।
बंटवारे की वजह से
बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हुआ और शरणार्थियों का संकट खड़ा हो गया। यह
आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा जन-पलायन (Mass Migration) था। लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और संपत्ति वहीं छोड़कर पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रेनों के माध्यम से केवल जान बचाने के लिए
भागे। विभाजन के बाद भारत के सामने इन करोड़ों शरणार्थियों को बसाना और पुनर्वास
करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया। दिल्ली में, जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम निवासी थे, स्थिति सबसे कठिन थी। राजधानी
किसी भी अन्य शहर की तुलना में शरणार्थियों की अधिक वेग-पूर्ण प्रवेश के अधीन थी। लेकिन
लोगों के रहने के लिए पर्याप्त घर नहीं थे। भारत सरकार ने भारतीय सिविल सेवा के एक
वरिष्ठ सदस्य को खाली किए गए संपत्ति का संरक्षक नियुक्त किया था। मुस्लिम संपत्ति
की रक्षा करना और कानून के अनुसार उसका प्रबंधन करना उसका कर्तव्य था। लेकिन यह आसान नहीं था।
गांधीजी ने एक लीगी नेता
से कहा था, “मैं अपने प्राण देकर भी इसका सामना करना चाहता हूं। मैं मुसलमानों को भारत की सड़कों
पर रेंगने नहीं दूंगा। वे आत्मसम्मान के साथ चलेंगे।” नेहरू की अंतरिम सरकार
इस बढ़ते हुए साम्प्रदायिक नरसंहार को असहाय होकर देखती रही। बिहार और नोआखाली के बिगड़ते हालात देखकर गांधीजी की बेचैनी
बढ़ती जा रही थी। गांधीजी ने कहा भी था, “इतने दिनों से दिल्ली में रहकर मैंने ‘कुछ भी उपयोगी सिद्ध नहीं’ किया। मुझे मानसिक
वेदना हो रही है। देश में भाई-भाई का ख़ून करने वाली छाया सर्वत्र छाई है।”
ब्रिटिश वकील सिरिल रेडक्लिफ को पंजाब और बंगाल के इलाकों को धार्मिक बहुलता के
आधार पर सीमाएं तय करने का काम सौंपा गया, जिसे भारत की जमीनी
हकीकत का कोई अनुभव नहीं था। सीमांकन की घोषणा स्वतंत्रता के ठीक बाद की गई, जिसके परिणामस्वरूप लोग गलत देशों के हिस्सों में रह गए। जल्दबाजी में खींची
गई इस रेडक्लिफ रेखा ने कई गांवों और परिवारों को दो देशों में बांट दिया। मुस्लिम-बहुल
इलाके पाकिस्तान को और सिख/हिंदू-बहुल इलाके भारत को दिए गए। अंग्रेजों ने सत्ता
हस्तांतरण की प्रक्रिया को छह महीने से भी कम समय में पूरा करने की कोशिश की, जिससे समाज पूरी तरह बिखर गया। बड़े पैमाने पर
हिंसा हुई, क्योंकि सत्ता के
लिए होड़ कर रहे स्थानीय लोगों ने अपने नए इलाकों को "साफ़" करने की
कोशिश की। कई गिरोहों ने आर्थिक फायदे का मौका देखा; वे संगठित लूटपाट में शामिल हुए और धर्म का
बहाना बनाकर कमज़ोर, नए-नए बने
"अल्पसंख्यक" समूहों को निशाना बनाया, जिनकी पुश्तैनी ज़मीनें अब सीमा के दूसरी तरफ़
पड़ गई थीं।
जुलाई के अंतिम सप्ताह
में विभाजन परिषद ने पंजाब के विभाजन क्षेत्रों में पचास हज़ार अफसरों और सैनिकों की
एक सीमा सेना तैनात कर दी। इसके बावजूद देश के अन्य भागों में सांप्रदायिक आग की लपटें
थम नहीं रही थी। गांधीजी को लगा, “ऐसी परिस्थिति में मेरा
सच्चा स्थान राजधानी में नहीं है। मुझे लोगों के साथ रहना चाहिए।” काश्मीर से लौटते हुए
वे दिल्ली न जाकर लाहौर पहुंचे। 3 अगस्त को श्रीनगर से वह
जम्मू गए फिर रावलपिंडी। वहाँ के शरणार्थी कैम्पों में आश्रितों का हालचाल लिया।
रावलपिंडी और उसके आसपास के क्षेत्रों के क़रीब 9,000 शरणार्थियों ने वहां शरण ले रखी थी। उनकी अवस्था बहुत ही भयानक थी। वहां के शरणार्थी
चाहते थे कि गांधीजी उनके साथ कम से कम 15 अगस्त तक रहें, लेकिन ज़रूरी व्यस्तताओं के कारण उन्हें लौटना ही था। उन्होंने
कहा, मैं अपनी जगह डॉ. सुशीला नय्यर को छोड़े जा रहा हूं। यह आपकी हर तरह से देखभाल
करेगी। लौटते वक़्त वे पंजा साहेब गुरुद्वारा भी गए। इस पर मुसलिम भीड़ द्वारा दो बार
आक्रमण हुआ था। वहां से वे सीधे ट्रेन पकड़ने के लिए लाहौर स्टेशन पहुंचे जहां से पटना
होते हुए कलकत्ता होकर नोआखाली जाते। जो गांधीजी का विचार था, उसके कारण 15 अगस्त के स्वाधीनता-दिवस के अवसर पर सरकारी उत्सव में दिल्ली में गांधीजी का कोई
स्थान नहीं था। 8 अगस्त को लाहौर से पटना
पहुंचे। दिन भर रुके। लोगों से कहा, “15 अगस्त का दिन आप लोग प्रार्थना, उपवास और कताई-यज्ञ करके मनाइए।” 9 अगस्त को कलकत्ता चले आए। कलकत्ता कराह रहा था, ख़ून से लथपथ था। उनकी वहां मौजूदगी
बहुत ज़रूरी थी।
अब गांधीजी ने अपना ध्यान पंजाब की ओर
लगाया, जहां हिन्दुओं की एक बहुत बड़ी जनसंख्या के
पश्चिम से पूर्व की ओर और इतने ही मुसलमानों के पूर्व से पश्चिम की ओर भगदड़ ने, मानवीय कष्टों और तबाही का जो दृश्य उपस्थित
किया था, उसका उदाहरण समसामयिक इतिहास में मिलना मुश्किल
है। पंजाब के गांवों और शहरों के भयग्रस्त लोग काल्पनिक आशा-निराशा और आशंका के
बीच डूबते-उतराते मोर्चाबन्दी करके लड़ाई की तैयारी में लगे थे। सांप्रदायिक आधार
पर कर्मचारियों की अदला-बदली के कारण प्रशासन-तंत्र एकदम निकम्मा और कमजोर हो गया
था। अगस्त महीने के अंत तक पुलिस और फौज पर सांप्रदायिक तत्वों के पूरी तरह हावी
हो जाने के कारण हिन्दुओं का पश्चिमी पंजाब में और मुसलमानों का पूर्वी पंजाब में
रहना असंभव हो गया था। जब शरणार्थियों के काफिले मंजिल पर पहुंच कर आप-बीती के दुख
भरे वृत्तांत सुनाते तो वहां भी हिंसा और उत्तेजना फैल जाती। सितम्बर के शुरू में
जब गांधीजी दिल्ली पहुंचे तो भीषण उपद्रवों के कारण वहां का कामकाज ठप्प हो गया
था। नेहरू के नेतृत्व में सरकार ने निष्पक्षता से और बड़ी फुर्ती से काम किया था।
लेकिन पुलिस और सेना द्वारा थोपी गयी शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते
थे। वह हिन्दू और मुसलमानों के दिल से हिंसा को दूर करना चाहते थे। काम बड़ा ही
दुसाध्य था। राजधानी में कई शरणार्थी कैम्प थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भाग
कर आये हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान
सीमा के पार जाने की प्रतीक्षा में पड़े थे। शरणार्थी शिविरों में बीमारी और
भुखमरी से भी हजारों लोगों की मौतें हुईं।
मुसीबत
की जो कहानियां गांधीजी ने सुनी, उनसे उनकी
अन्तरात्मा को भारी आघात पहुंचा। लेकिन उनका यह विश्वास अडिग बना रहा कि विद्वेष
और हिंसा की उत्तरोत्तर वृद्धि का अन्त केवल प्रेम और अहिंसा से ही हो सकता है।
नित्य संध्या समय अपनी प्रार्थना-सभा में वह इस प्रश्न की चर्चा करते। वह इस बात
पर जोर देते कि बदला लेने से समस्या हल नहीं होगी। लोगों को शिक्षित करने के
प्रयास में उन्होंने अपने को थका डाला। वे रोज लोगों की शिकायतें सुनते, दुख दूर करने के उपाय सुझाते, रोज के अनगिनत मिलने वालों में किसी की पीठ
ठोंकते, किसी को झिड़कते, शरणार्थी कैम्पों का चक्कर लगाते और स्थानीय
अधिकारियों से भी मिलते रहते थे।
विभाजन के गहरे
घाव और नफरत ने दोनों देशों (भारत और पाकिस्तान) के संबंधों में कड़वाहट पैदा कर
दी, जिसके परिणामस्वरूप कई युद्ध हुए और आज भी कश्मीर
सहित कई सीमा विवाद बने हुए हैं। इस विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच की
कटुता आज तक विद्यमान है। मानवता पर हुए इस अत्याचार और अपनों से बिछड़ने के दर्द
को इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज भी लाखों पीड़ित परिवारों के जेहन में
उस खौफनाक दौर की यादें ताजा हैं। इस अमानवीय त्रासदी के बलिदानियों और
विस्थापितों को याद करने के लिए, भारत सरकार
द्वारा 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका
स्मृति दिवस' (Partition Horrors Remembrance Day) के रूप में
मनाया जाता है।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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