मंगलवार, 21 जुलाई 2026

सूफ़ीमत... 8. सूफ़ीमत का विकास-द्वितीय चरण-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


8. सूफ़ीमत का विकास-द्वितीय चरण-2


8.3 हज़रत ज़ुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह (796-860 ई.)

हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह मिस्र के रहने वाले थे। वह 9वीं सदी के आरंभिक इस्लामी काल के एक महान सूफी संत थे। उन्हें 'जुल-नून अल-मिस्री' भी कहा जाता है'जुल-नून' का अर्थ होता है "मछली वाला"। यह उपाधि उनके आध्यात्मिक स्तर और त्याग को दर्शाती है। एक मशहूर रिवायत के मुताबिक, एक बार हज़रत ज़ुन्नून रह. एक कश्ती (नाव) में सफर कर रहे थे। उस कश्ती में सवार किसी मुसाफिर का एक कीमती मोती खो गया। लोगों ने शक के आधार पर हज़रत ज़ुन्नून मिस्री पर चोरी का आरोप लगा दिया और उन्हें प्रताड़ित करने लगे। उन्होंने अल्लाह की बारगाह में दुआ की, जिसके बाद दरिया की हज़ारों मछलियां अपने मुंह में चमचमाते हुए मोती लेकर पानी की सतह पर आ गईं। इस करामात को देखकर लोग दंग रह गए और उनसे माफी मांगी। इसी वाकये के बाद से उनको 'ज़ुन्नून' कहा जाने लगा।

सूफी संतों की जीवनी से जुड़ी किताब 'तज़किरातुल औलिया' में आपका नाम बहुत अदब और फख्र के साथ लिया जाता है। 796 ई. में मिस्र के अखमीम में जन्मे, हज़रत ज़ुन्नून मिस्री को सूफीवाद में 'मारिफ़ात' (ईश्वरीय ज्ञान) की अवधारणा को स्पष्ट करने वाले पहले संतों में से एक माना जाता हैं। उनका पूरा नाम अबुल फैज़ जून जून बिन इब्राहिम अल-मिस्री था। वे प्रकांड विद्वान और एक बहुत बड़े सूफ़ी साधक थे। उन्होंने चिकित्सा, यूनानी दर्शन और कीमियागरी (Alchemy) का गहरा अध्ययन किया था। अधिकांश जीवनीकारों द्वारा वे एक प्रसिद्ध रहस्यवादी विचारक के रूप में माने जाते हैं। अपने रहस्यवादी अनुभवों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति देने वाले वह पहले व्यक्ति थे। हजरत जुल-नून मिस्री अपनी अद्भुत आध्यात्मिक अवस्थाओं और ज्ञान के लिए जाने जाते थे। अन्य प्रारंभिक सूफ़ियों की तरह, उन्होंने अत्यंत कठिन तपस्या का अभ्यास किया। वे प्रलोभनों को अध्यात्म मार्ग की सबसे बडी बाधा मानते थे। उन्होंने एक सूफ़ी में निष्ठा को बढ़ावा देने के लिए एकांत को अपरिहार्य माना। उन्हें मिस्र के शुरुआती इस्लामी युग में चिकित्सकों का संरक्षक संत भी माना जाता था।

उनके अनुसार, रहस्यवादियों के अनुसरण के लिए दो अलग-अलग मार्ग हैं। पहला मार्ग, जो सरल है, वह है पाप से बचना, संसार को छोड़ना और वासना को नियंत्रित करना। दूसरा मार्ग, जो उच्च स्तर का है, ईश्वर को छोड़कर सब कुछ छोड़ देना और हर चीज़ से हृदय को खाली कर देना। उनके अनुसार तवक्कुल (ईश्वर पर पूर्ण भरोसा या निर्भरता) दुनिया और उसके लोगों के साथ एकांत और पूर्ण विराम की मांग करता है, और भगवान पर पूर्ण और पूर्ण निर्भरता की मांग करता है। उनके अनुसार तौबा (पश्चाताप) सभी के लिए आवश्यक है। वे मानते थे कि आम लोग अपने पापों का पश्चाताप करते हैं, जबकि चुने हुए लोग अपनी लापरवाही के लिए पश्चाताप करते हैं। पश्चाताप दो प्रकार का होता है: वापसी का पश्चाताप (इनबाह, दैवीय दंड के भय से पश्चाताप) और शर्म का पश्चाताप (इतिहाद, दैवीय क्षमादान की शर्म से पश्चाताप)। सूफियों के लिए इनबाह का अर्थ 'प्रभु की ओर लौटना', पश्चाताप करना या आध्यात्मिक जागृति है यह सूफी साधना की एक प्रमुख अवधारणा हैइसका उद्देश्य साधक के हृदय को शुद्ध करके उसे एक सच्चे इंसान के रूप में विकसित करना हैआम इंसान दुनिया की चकाचौंध और भौतिक सुखों में खोया रहता है, जिसे सूफीमत में 'ग़फ़लत' (अज्ञानता या सोई हुई अवस्था) कहा जाता है। 'इनबाह' वह अवस्था है जब साधक इस ग़फ़लत की नींद से जाग जाता है। इस अवस्था में साधक के दिल की आँखें (बसीरत) खुलती हैं। उसे इस बात का अहसास होता है कि मानव जीवन का असली उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं को पूरा करना नहीं, बल्कि परम सत्ता (अल्लाह) की प्राप्ति और आत्म-शुद्धि है। इनबाह के बाद साधक अपने भीतर झांकना शुरू करता है। वह अपने दोषों, अहंकार (नफ़्स) और कमजोरियों के प्रति सचेत हो जाता है और उन्हें सुधारने के मार्ग पर चल पड़ता है।

सूफियों के लिए पश्चाताप का वास्तविक अर्थ यह महसूस करना है कि ईश्वर हमेशा अपने बंदों (भक्तों) पर असीम कृपा और प्रेम बरसाता है। जब साधक को यह एहसास होता है कि उसने अपने पालनहार (अल्लाह) की इतनी नेमतों और प्रेम के बावजूद उसे भुला दिया या उसकी अवज्ञा की, तो उसके भीतर एक गहरी आध्यात्मिक शर्म (हया) पैदा होती है। यह शर्म पाप के डर से नहीं, बल्कि ईश्वर के अत्यधिक प्रेम और क्षमाशीलता के सामने खुद को छोटा महसूस करने से आती है। इसे ही शर्म का पश्चाताप (इतिहाद) कहते हैं।

हज़रत जुल-नून मिश्री (रहमतुल्लाह अलैह) सूफ़ीवाद में 'मारिफ़त' (ईश्वरीय ज्ञान/Mysticism) के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से समझाने वाले पहले बुज़ुर्ग माने जाते हैं। उन्होंने इंसान के दिल की अवस्थाओं और अल्लाह की पहचान पर गहरा काम किया। वे आध्यात्मिक अनुभवों के विज्ञान (मुनाज़लात) के बारे में बात करने वाले पहले सूफी थे। हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह  ज्ञान को निश्चितता से अलग करते हैं। ज्ञान संवेदनात्मक अनुभूति का परिणाम है, अर्थात, जो हम शारीरिक अंगों के माध्यम से प्राप्त करते हैं, जबकि निश्चितता, अंतर्ज्ञान के माध्यम से जो हम देखते हैं उसका परिणाम है। उनके अनुसार ज्ञान तीन प्रकार का होता है: पहला, परमेश्वर की एकता का ज्ञान (तौहीद) और यह सभी विश्वासियों के लिए समान है; दूसरा, प्रमाण और प्रदर्शन से प्राप्त ज्ञान और यह ज्ञानियों, वाक्पटु और विद्वानों (उलेमा) का है; तीसरा, एकता के गुणों का ज्ञान और यह संतों (औलिया) का है, जो अपने हृदय में ईश्वर के चेहरे का चिंतन करते हैं, ताकि परमेश्वर अपने आप को उनके सामने इस तरह प्रकट करे जैसे वह नहीं है, दुनिया में किसी और के लिए प्रकट किया गया है। यह अल्लाह के करीब होने और दिल की पाकीज़गी से मिलने वाला रूहानी नूर है। इसे ही असली 'मारिफ़त' कहते हैं। मारिफ़त (सूफ़ी साधना-मार्ग की तीसरी मंजिल) वह ज्ञान है जिसमें ईश्वरीय ज्ञान से साधक (जीवात्मा) के परमात्मा से मिलन के रास्ते की सारी रुकावटें दूर हो जाती हैं। वह राग-विराग से मुक्त हो जाता है और उसे उस ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, जिसे दिव्यज्ञान कहा गया है, और इसके बारे में सबसे पहले हज़रत ज़ुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह ने ही चर्चा की थी

हज़रत ज़ुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह ने सूफ़ी मार्ग का विशद विवेचन किया है। उन्होंने आत्मा से परमात्मा तक की यात्रा का पूर्ण रूप से वर्णन किया है उन्होंने ईश्वरीय प्रेम को रहस्यवादी दीक्षाओं द्वारा अभ्यास किए जाने वाले रहस्य के रूप में माना सूफ़ी साधना में अहवाल (रूहानी अनुभूति) और मक़ामात (रूहानी पद) के महत्व को स्थापित करके मारिफ़त (तत्वज्ञान) को एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, मारिफ़त का मूल, किसी के दिल में आध्यात्मिक प्रकाश का ईश्वरीय संचार है। मआरिफ़ (ज्ञानविद्) प्रत्यक्ष ज्ञान से देखते हैं, बिना दृष्टि के, बिना जानकारी के, बिना अवलोकन के, बिना विवरण के, और बिना परदे के। वे अपने आप में नहीं होते; लेकिन जहाँ तक उनका अस्तित्व है, वे परमेश्वर में विद्यमान रहते हैं। उनकी हरकतें ईश्वर के कारण होती हैं और उनके शब्द ईश्वर के वचन हैं जो उनकी जीभ से बोले जाते हैं, और उनकी दृष्टि ईश्वर की दृष्टि है जो उनकी आंखों में प्रवेश कर गई है। इस प्रकार, उनके अनुसार रहस्यवादी की सबसे बड़ी उपलब्धि उच्च-बौद्धिक ज्ञान प्राप्त करना है जिसे मारिफ़त के रूप में जाना जाता है, ऐसी अवस्था में मनुष्य पूर्ण बेहोशी की अवस्था में आ जाता है। उन्होंने कहा है, "मनुष्य जितना अधिक ईश्वर को जानता है, उतना ही वह उसमें खो जाता है।" वे मानते थे कि परमात्मा अज्ञेय और अनन्त है, फिर भी उनसे व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। मारिफ़ (अध्यात्मिक ज्ञान) और तौहीद (परमात्मा के साथ एकत्व प्राप्त करना) के प्रतिष्ठाता भी वे ही थे।

हज़रत ज़ुल-नून मिस्री (रहमतुल्लाह अलैह) सूफ़ीवाद के इतिहास में 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (अल्लाह से सच्ची मोहब्बत) की बारीकियाँ समझाने वाले सबसे शुरुआती बुज़ुर्गों में से एक हैं। उनके अनुसार, अल्लाह से मोहब्बत कोई केवल ज़ुबानी दावा नहीं है, बल्कि यह रूह की एक ऐसी हालत है जो इंसान को पूरी तरह बदल देती है। उन्होंने ही पहली बार साधक की प्रेम-पिपासा को शराब और प्याले के प्रतीक प्रदान किए। वह फ़रमाते हैं: "सच्ची मोहब्बत यह है कि तुम अपनी पूरी हस्ती (अस्तित्व) को महबूब (अल्लाह) के लिए मिटा दो, अपनी सभी इच्छाओं को उसकी इच्छा में शामिल कर दो, और तुम्हारे दिल में उसके अलावा किसी और की जगह न बचे।" प्रेमी को अल्लाह की तरफ से मिलने वाले दुखों और सुखों में कोई फ़र्क महसूस नहीं होता। आज़माइश (मुसीबत) में भी उसके दिल से 'अल्हम्दुलिल्लाह' (अल्लाह का शुक्र) ही निकलता है। सच्चा आशिक़ वह है जिसका दिल एक पल के लिए भी अपने महबूब (अल्लाह) की याद से ग़ाफ़िल (दूर) न हो। इश्क़-ए-हक़ीक़ी की गहराई को समझाते हुए उन्होंने कहा था: "जिसने अल्लाह से सच्ची मोहब्बत की, उसने दुनिया और आख़िरत (परलोक) की हर चीज़ को तुच्छ (छोटा) पाया। जो अल्लाह का हो गया, पूरी कायनात उसकी ख़िदमत में लगा दी जाती है।"

हज़रत जुल-नून मिश्री के मुताबिक, रूहानी मंज़िल पाने के लिए चार चीजें अनिवार्य हैं: पहला मुहासिबा (आत्म-निरीक्षण): हर रात सोने से पहले अपने दिनभर के कामों का हिसाब करना। दूसरा मुजाहिदा (नफ़्स से जंग): अपनी बुरी आदतों और इच्छाओं पर काबू पाना। तीसरा ज़ुहद (वैराग्य): दुनिया की चीज़ों से दिल न लगाना, चाहे वे पास हों या न हों। और चौथा तवक्कुल (पूर्ण भरोसा) : हर हाल में केवल अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहना।

स्वतंत्र विचारों के लिए उन्हें बहुत कष्ट झेलने पड़े मिस्र में वह जीवन भर अपमान ही झेलते रहे इस्लामी समाज उनकी रहस्यवादी व्याख्याओं को सहन नहीं कर सका। उनके समकालीनों ने उन्हें कुछ नए आध्यात्मिक सिद्धांत सिखाने के आरोप में अब्बासिद खलीफा अल-मुतावक्किल के दरबार में बुलाया था। उन्हें 829 ई. में बन्दी बनाकर बग़दाद भेज दिया गया, हालाँकि, उनकी विद्वत्ता और चरित्र से प्रभावित होकर खलीफा ने उन्हें सम्मान के साथ मिस्र वापस भेज दिया। 860 में गीजा में उनकी मृत्यु हो गयीउनकी मज़ार आज भी काहिरा, मिस्र में स्थित है। इतिहासकार लिखते हैं कि जब उनका जनाजा ले जाया जा रहा था, तब हरे रंग के अनगिनत परिंदों (पक्षियों) ने उनके जनाजे पर साया (छाया) कर रखा था, जो उनके दफन होने के बाद ही गायब हुए।

हज़रत जुल-नून मिस्री के कथनों में अध्यात्म, तौबा (क्षमा) और अल्लाह से मोहब्बत की गहराई मिलती है। वह कहते थे, "आम लोगों की तौबा उनके गुनाहों से होती है, जबकि ख़ास (अल्लाह के करीब) लोगों की तौबा अपनी इबादत पर गर्व करने या अल्लाह की याद से एक पल के लिए भी ग़ाफ़िल (दूर) होने से होती है।" वे मानते थे कि सांसारिक वस्तुओं के मोह में फंसे रहने से सभी प्रकार की बुराइयां उत्पन्न हो जाती हैं व्यक्ति को अपनी सभी बुराइयों को दूर करके परमात्मा की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए नफ़्स सभी बुराइयों की जड़ है नफ़्स पर विजय प्राप्त करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है इस शरीर में आने पहले आत्मा परमात्मा के निकट वास करता था परम ज्ञान की प्राप्ति विशुद्ध प्रेम से ही हो सकती है उनके ह्रदय में सबके लिए दया और प्रेम का भाव था उनका कहना था, "अल्लाह के बारे में तुम अपने दिमाग में जो कुछ भी सोच सकते हो, अल्लाह उससे पूरी तरह अलग और पाक है।" उनका मानना था, "आरिफ़ (ईश्वरीय ज्ञान रखने वाले) वह है जो बिना मरे ही जी रहा है, और जिसकी रूह ज़मीन पर रहते हुए भी अर्श (आसमान) की सैर करती है।" सच्ची इबादत के बारे में उनका कहना था, "इबादत केवल अंगों को हिलाना नहीं है, बल्कि दिल को दुनिया के ख्यालों से खाली करके अल्लाह के सामने झुकना है।"

एक बार वह अपने कुछ शिष्यों के साथ नील नदी में नौका विहार कर रहे थे एक दूसरी नाव सामने से आ रही थी उसमें कुछ लोग रास-विलास में लगे हुए थे उनके शिष्यों को बुरा लगा उन लोगों ने हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह से प्रार्थना की कि वे परमात्मा से निवेदन करें कि सामने वाली नौका को डुबो दें हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर प्रार्थना की हे प्रभो, तुमने अनुग्रह करके जैसे आनंद की ज़िन्दगी इन लोगों को इस संसार में बख्शी है वैसी ही आनंदमयी ज़िन्दगी उन्हें दूसरी दुनिया में भी बख्शो

हज़रत अबुल क़ासिम जुन्नैद रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि फ़ना (मृत्यु) और बक़ा (जीवन) पर्यायावची शब्द हैं क्योंकि न फ़ना का अर्थ है शरीर का अवसान और न बक़ा का अर्थ श्वास का चलते रहना है। सूफी परंपरा के अनुसार, फ़ना का अर्थ अपनी इच्छाओं और अहंकार (नफ़्स) को मिटाना है, जबकि बक़ा का अर्थ उस अवस्था के बाद अल्लाह की जात में जीवित और स्थिर रहना है। हज़रत जुनैद का मानना था कि बक़ा की प्राप्ति फ़ना के बिना संभव नहीं है, लेकिन दोनों के अर्थ अलग हैं।

8.4 हज़रत अबू याकूब बिन इसहाक अलकिंदी (801-873 ई.)

नवीं शताब्दी तक आते-आते अरब में दार्शनिक युग का आरंभ हो गया था हज़रत अबू याकूब बिन इसहाक अलकिंदी को सर्वोत्तम अरब दार्शनिक माना गया है। उनके दादा अल-अशथ इब्न क़ैस ने इस्लाम अपनाया और उन्हें पैगंबर के साथियों (सहाबा) में से एक माना जाता था। आठवीं और नौवीं शताब्दी में अल-कन्फा (कूफा) और अल-बसरा इस्लामी संस्कृति के दो अलग-अलग विचारधाराओं के केंद्र थे।

कूफा स्कूल अधिक लचीला और अनुभवजन्य था। कूफा के व्याकरणविद नियमों को स्थापित करने के लिए अधिक संख्या में मौखिक परंपराओं, कुरान, हदीस और पूर्व-इस्लामी कविताओं पर भरोसा करते थे, भले ही वे व्याकरण के सामान्य नियमों से भिन्न हों। बसरा स्कूल अधिक दार्शनिक, तार्किक और नियम-आधारित था। बसरा के विद्वान नियमों को बनाने के लिए सख्त तार्किक विश्लेषण पर जोर देते थे। अल-कन्फा के बौद्धिक माहौल में, अलकिंदी ने अपना प्रारंभिक जीवन बिताया। पहले तो उन्होंने क़ुरआन की शिक्षा ग्रहण की। लेकिन वे विज्ञान और दर्शनशास्त्र में अधिक रुचि रखते थे, जिसके लिए उन्होंने अपना शेष जीवन समर्पित कर दिया, ख़ासकर बगदाद जाने के बाद। उन्होंने अनेकों पुस्तकें लिखीं। अलकिंदी के प्रयासों के कारण ही दर्शनशास्त्र को इस्लामी संस्कृति के एक भाग के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। इसी कारण से प्रारंभिक अरब इतिहासकारों ने उन्हें "अरब दर्शन का जनक" और "अरबों का दार्शनिक" कहा। उन्होंने यूनानी ज्ञान (जैसे अरस्तू के दर्शन) को इस्लामी दुनिया में पहुँचाने और लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने बगदाद के ('बैत अल-हिकमा' House of Wisdom) में बैठकर अरस्तू और अन्य ग्रीक दार्शनिकों के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद करवाया और उनकी व्याख्या की। उन्होंने ही पहली बार अरबी भाषा को दार्शनिक शब्दावली दी। दर्शन सत्य का ज्ञान है। उस समय के मुस्लिम दार्शनिकों का मानना था कि सत्य अनुभव से ऊपर की चीज़ है। यह अलौकिक दुनिया की वस्तु है जो दृढ़ और शाश्वत है। अलकिंदी ने दर्शनशास्त्र को परिभाषित करते हुए कहा, "दर्शन मनुष्य की संभावनाओं के भीतर चीज़ों की वास्तविकता का ज्ञान है, क्योंकि दार्शनिक का लक्ष्य अपने सैद्धांतिक ज्ञान में सत्य को प्राप्त करना है और व्यावहारिक ज्ञान में सत्य के अनुसार व्यवहार करना है।" ईश्वर को "सत्य" शब्द से दर्शाया जाता है, जो दर्शन का उद्देश्य है। वह अल-वाहिद अल-हक़ (सत्य व्यक्ति) है, सबसे पहला, निर्माता, वह सब कुछ जो उसने बनाया है। उन्होंने तर्क, अध्यात्म और नीतिशास्त्र पर लगभग 22 महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अरबी भाषा में दार्शनिक शब्दावली विकसित की।

अलकिंदी ने मुस्लिम दर्शन को दर्शनशास्त्र और धर्म के बीच एक सहमति की ओर लाने का प्रयास किया। अल-किंदी का मानना था कि धार्मिक सत्य (कुरान का ज्ञान) और दार्शनिक सत्य (तर्क और बुद्धि) में कोई टकराव नहीं है। दोनों एक ही परम सत्य (ईश्वर) तक पहुँचने के दो अलग रास्ते हैं।  दर्शन तर्क पर निर्भर करता है, और धर्म रहस्योद्घाटन पर। दर्शन की विधि तर्क है जबकि विश्वास धर्म का मार्ग है। यह क़ुरआन में वर्णित वास्तविकताओं में विश्वास है, जो ईश्वर द्वारा अपने पैगंबर को प्रकट किया गया था। शुरू से ही धर्मशास्त्रियों ने दर्शनशास्त्र और दार्शनिकों पर अविश्वास किया। दार्शनिकों पर विधर्मी होने के कारण हमला किया गया था। अलकिंदी ने धार्मिक प्रवक्ताओं के आरोपों के ख़िलाफ़ ख़ुद का बचाव करते हुए कहा, "चीज़ों की वास्तविकता (सत्य) के ज्ञान का अर्जन नास्तिकता (कुफ्र) है। बल्कि अलकिंदी ने उन धार्मिक प्रवक्ताओं पर अधार्मिक और धर्म के व्यापारी होने का आरोप लगाया। उन्होंने 'सत्य की खोज' को दर्शन का सर्वोच्च लक्ष्य बताया। उनके अनुसार, "प्रथम दर्शन" ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करना है, क्योंकि ईश्वर ही सभी कारणों का परम कारण (Ultimate Cause) है।  

उन्होंने दर्शन और धर्म के बीच सहमति को तीन तर्कों के आधार पर निर्धारित किया; एक कि धर्मशास्त्र दर्शन का हिस्सा है, दूसरे कि पैगंबर का रहस्योद्घाटन और दार्शनिक सत्य एक दूसरे के अनुरूप हैं, और तीसरा कि धर्मशास्त्र की खोज तार्किक रूप से निर्धारित है। उनका मानना था कि दर्शन चीज़ों की वास्तविकता का ज्ञान है, और इस ज्ञान में धर्मशास्त्र (अल-रुबुबिया), एकेश्वरवाद का विज्ञान, नैतिकता और सभी उपयोगी विज्ञान शामिल हैं। इस तरह अल-किंदी ने क़ुरआन की दार्शनिक व्याख्या के लिए द्वार खोल दिया, और धर्म और दर्शन के बीच एक सहमति तैयार किया।

उनके नुसार सभी धर्म एक पारमार्थिक सत्ता को स्वीकार करते हैं जो सृष्टि का मूल कारण है और सभी धर्मज्ञाताओं ने उसी को पूज्य तथा माननीय बताया है। सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य एक ही पारमार्थिक सत्ता (ईश्वर) की खोज है ईश्वर ही इस सृष्टि का एकमात्र मूल कारण और अंतिम सत्य है सृष्टिकर्ता होने के कारण अल्लाह का प्रभाव संसार में व्याप्त है अल्लाह (ईश्वर) तथा प्रकृति के मध्य में विश्वात्मा है जिससे जीवात्मा निर्गत हुआ है। प्राणियों को ईश्वर की निरंतर आवश्यकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर, जो कुछ उसने बनाया है, उसका पालनकर्ता है, ताकि अगर किसी चीज़ में उसकी स्थिरता और शक्ति की कमी हो, तो वह नाश हो जाए। अलकिंदी ने कहा कि दुनिया शाश्वत नहीं है। प्रत्येक शरीर, पदार्थ और रूप से बना है, अंतरिक्ष में सीमित है, और समय में गतिमान है, भले ही वह दुनिया का शरीर हो। और, सीमित होने के कारण यह शाश्वत नहीं है। ईश्वर ही शाश्वत है। दर्शन और धर्म का उद्देश्य एक ही है—सत्य की खोज और शाश्वत सत्ता का ज्ञान। सभी पैगंबरों और धर्म ज्ञाताओं (धार्मिक विद्वानों) ने उसी परम सत्य की ओर इशारा किया है। सृष्टि की हर चीज़ का एक कारण होता है। इस श्रृंखला का जो अंतिम और सर्वोपरि कारण है, वही 'परमेश्वर'  है। ईश्वर सभी बहुलता और एकता का मूल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईश्वर ने इस संसार को किसी पूर्व-पदार्थ से नहीं, बल्कि 'शून्य से' उत्पन्न किया है। उनके अनुसार धर्म और दर्शन में कोई विरोधाभास नहीं है। दार्शनिक अपनी बुद्धि और तर्क से उस सर्वोच्च सत्ता को समझने का प्रयास करते हैं जबकि पैगंबरों को उसी परमेश्वर का ज्ञान सीधे ईश्वरीय प्रेरणा द्वारा प्राप्त होता है।

उनके दार्शनिक कार्यों, जैसे कि "आत्मा की अमूर्त प्रकृति" पर उनके विचारों का, बाद के कई सूफी संतों और रहस्यवादियों के दर्शन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। अल-किंदी के अनुसार, आत्मा एक सरल, अमूर्त और आध्यात्मिक पदार्थ है। यह शरीर के भीतर रहकर भी नाशवान नहीं होती। आत्मा का भौतिक शरीर से कोई भौतिक मिश्रण नहीं होता, बल्कि यह शरीर का उपयोग अपने एक साधन के रूप में करती है। इसका पदार्थ निर्माता से उसी तरह निकलता है जैसे सूर्य से किरणें निकलती हैं। यह आध्यात्मिक और दिव्य पदार्थ है और शरीर से अलग है। जब वह शरीर से अलग हो जाती है, तो उसे दुनिया की हर चीज़ का ज्ञान हो जाता है और उसे अलौकिक का दर्शन होता है। आत्मा को समझने के लिए उन्होंने प्लेटो और अरस्तु के विचारों को मिलाया। उनके अनुसार आत्मा तीन भागों या शक्तियों में बंटी होती है: पहला तार्किक, यह आत्मा का उच्चतम और दिव्य हिस्सा है, जो सत्य को जानने का प्रयास करता है। दूसरा भावनात्मक जो क्रोध या आवेग से जुड़ी शक्ति है। तीसरा वामनीय जो इच्छाओं और वासनाओं से जुड़ी शक्ति है, और मुख्य रूप से शरीर से संचालित होती है। चूंकि आत्मा की प्रकृति उच्च और आध्यात्मिक है, अल-किंदी का मानना था कि इसका अंतिम लक्ष्य भौतिक दुनिया (मोह-माया) की सीमाओं से मुक्त होकर उस आध्यात्मिक जगत में वापस लौटना है, जहाँ इसका निर्माण हुआ था। शरीर से अलग होने के बाद, यह बुद्धि की दुनिया में जाती है, निर्माता के प्रकाश में लौटती है, और उसे देखती है। आत्मा कभी सोती नहीं; केवल जब शरीर सो रहा होता है, वह इंद्रियों का उपयोग नहीं करती है। और, शुद्ध होने पर, आत्मा नींद में अद्भुत सपने देख सकती है और अन्य आत्माओं से बात कर सकती है जो उनके शरीर से अलग हो गई हैं। जो शरीर के सुखों से दूर हो जाता है और अपना अधिकांश जीवन चीज़ों की वास्तविकता को प्राप्त करने के लिए चिंतन में व्यतीत करता है, वह एक अच्छा व्यक्ति है जो निर्माता के समान है। वह विचार-धारा जो इस्लाम में अलकिंदी से आरंभ हुई और फ़राबी द्वारा इब्नेसिना तक पहुँची थी को तार्किक परिणति तक ले जाने का काम इमाम ग़ज़ाली ने किया।

अल-किंदी का कार्य-क्षेत्र दर्शन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे एक साथ कई विषयों के विशेषज्ञ थे। उन्हें गणित, भौतिकी, खगोल विज्ञान और चिकित्सा का गहरा ज्ञान था। उन्होंने इन विषयों पर दर्जनों मौलिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने संगीत के सिद्धांत और स्वरों के गणितीय अनुपात पर भी काम किया, और अरबी संगीत पर उनके ग्रंथ अत्यधिक प्रसिद्ध रहे हैं। वह कोड-ब्रेकिंग और गुप्त संदेशों को डिकोड करने के तरीकों पर काम करने वाले वे दुनिया के शुरुआती विद्वानों में से एक थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

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