सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
9. सूफ़ीवाद के विकास का तृतीय चरण-1
सूफ़ीवाद के विकास का तृतीय चरण 12वीं तथा 13वीं शताब्दी
की देन है। उस समय मुस्लिम समाज अराजकता, अव्यवस्था तथा नैतिक पतन का सामना करने लगा तब उसमें नवीन जीवन
प्रदान करने के लिये सूफ़ी संतों ने संगठित होने का निश्चय किया। सूफ़ी साधकों की
प्रसिद्धि से आकर्षित होकर लोग उनके शिष्य बनकर संगठित होने लगे। इस प्रकार साधकों
तथा संतों ने अपनी-अपनी शिष्य परम्परा आरम्भ की। प्रारम्भिक काल में प्रमुखतः दो
सम्प्रदाय थे-(i) इलहामिया, (ii) इत्तिहादिया। इलहामिया सूफी मत का
वह सिद्धांत है जो 'इलहाम' (दैवीय प्रेरणा, ईश्वर की ओर से साधक
के हृदय में आने वाली गुप्त प्रेरणा या ज्ञान) पर जोर देता है। इसके मानने वाले संतों का विचार था
कि साधना और आंतरिक शुद्धि के जरिए ईश्वर का सीधा ज्ञान या संदेश उनके दिल में
उतरता है। यह पवित्र चेतना या प्रकाश है जो शुद्ध हृदय वाले संतों को प्राप्त होता
है। इत्तिहादिया सूफी
मत का वह सिद्धांत है जो 'इत्तिहाद' (परमात्मा के साथ एक हो जाने) पर
आधारित है। इसके अनुयायी इस बात में विश्वास रखते थे कि साधना की पराकाष्ठा पर
साधक अपनी अलग पहचान (अहं) को पूरी तरह मिटाकर परम सत्ता (ईश्वर) के साथ एक हो
जाता है। यह गहन साधना और प्रेम की वह चरम अवस्था है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता
है। इसमें साधक को अपनी और ईश्वर की सत्ता में कोई भेद महसूस नहीं होता।
इस काल में निम्नलिखित 6 बातों पर विशेष ज़ोर दिया जाता
था-
(i) क़ुरआन
में पूर्ण आस्था रखना।
(ii) हज़रत
मुहम्मद सल्ल. के जीवन को आदर्श बनाना।
(iii) धर्म
सम्मत भोजन ग्रहण करना।
(iv) हराम
की वस्तुओं का त्याग करना।
(v) दूसरों
द्वारा कष्ट पहुँचाने पर कष्ट का अनुभव न करना।
(vi) नियम
का निष्ठापूर्वक पालन करना।
खानक़ाह
की स्थापना भी क़ुरआन के आधार पर हुई थी। इसके नियम निम्नलिखित है-
(i) खानक़ाह
से अच्छे संबंध की स्थापना करना।
(ii) प्रार्थना
तथा ध्यान के माध्यम से ईश्वर का चिन्तन करना।
(iii) जीविकोपार्जन
के साधनों का त्याग करके परमात्मा में लीन होना।
(iv) आन्तरिक
शुद्धता पर ज़ोर देना।
(v) बुराइयों
से उत्पन्न वस्तुओं का त्याग करना।
(vi) समय की
उपयोगिता का महत्त्व प्राप्त करना।
(vii) आलस्य
का त्याग करना।
दूसरे चरण में सूफ़ीमत में ऐसे नियमों और सिद्धांतों का
समावेश हुआ था जो रूढ़िवादी इस्लाम के प्रचालित सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था जिसके
कारण इस्लाम धर्म के दार्शनिकों ने सूफ़ीमत को इस्लाम इतर दर्शन कहना शुरू कर दिया।
इस विवाद का निवारण सूफ़ीमत के विकास के तीसरे चरण में किया गया। हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह सूफ़ीमत के प्रकाण्ड विद्वान थे।
उन्होंने इस्लाम धर्म का गहन अध्ययन कर अनेक ग्रन्थों की रचना की तथा इस्लाम के
सिद्धान्तों का विवेचन कर सूफ़ीमत के सिद्धान्तों से उनका सुन्दर सामंजस्य स्थापित
किया। उन्होंने कहा कि सूफ़ीमत किसी भी प्रकार से इस्लाम से भिन्न नहीं है, बल्कि उसी का पोषक है। इसके अतिरिक्त उमर ख़य्याम, तनाई, निज़ामी, फ़रीदुद्दीन अत्तार, जलालुद्दीन रूमी, शेख़ सादी आदि कवियों ने सूफ़ी मत के प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान
दिया। इस समय सूफ़ी साहित्य में प्रेम और विरह की प्रधानता हो गई।
9.1 हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह
ग्यारहवीं शताब्दी में हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह (1058-1111 ई.) ने सूफ़ीमत को मुस्लिम जगत में
सम्माननीय स्थान प्राप्त कराया। वह एक महान फारसी मुस्लिम विद्वान, न्यायविद, और प्रसिद्ध सूफी संत थे। उन्होंने
सूफ़ीमत को एक दार्शनिक रूप दिया। इस्लाम के साथ उसका सामंजस्य बिठाया। उन्हें “हुज्जत-उल-इस्लाम” (इस्लाम का संरक्षक), ज़ैन-अल-दीन
(आस्था के आभूषण) और मुजद्दीद
(धर्म और आस्था का पुनरुत्थानकर्ता या सुधारक) कहा जाता है। वे एक बहुत बड़े
दार्शनिक, तार्किक और विचारक थे। फ्रांसीसी
लेखक रेनां ने उन्हें अरब के दार्शनिकों में सबसे मौलिक माना है।
उनका जन्म 1058 ई. में खुरासन प्रांत के तूस नामक शहर में हुआ था। उनके पिता एक धर्मपरायण
दरवेश थे। उनके पिता ऊन कातते थे और उसे बाज़ार में बेचते थे। उनके पिता ने अनाथ के
रूप में उन्हें जल्दी छोड़ दिया। अल-ग़ज़ाली का पालन-पोषण और शिक्षा उसके पिता के एक
पवित्र सूफ़ी मित्र ने की। उन्होंने यनसुफ अल-नसज से सूफ़ीवाद का अध्ययन किया और कुछ
सूफ़ी अभ्यास भी किए। लगभग बीस वर्ष की आयु में वे अध्ययन
के लिए निज़ामिया अकादमी निशापुर चले गए। उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध विद्वान इमाम अल-हरमैन
अल-जुवैनी से निशापुर में इस्लामी कानून और तर्कशास्त्र सीखा। निशापुर में रहने के दौरान, वह सूफ़ी अबू अल-तुसी के शिष्य बन गए।
इमाम अल-ग़ज़ाली का आध्यात्मिक सफर इस्लामी इतिहास की सबसे
प्रभावशाली और प्रेरणादायक घटनाओं में से एक है। यह सफर बौद्धिक शोहरत के शिखर से
सूफीवाद (अध्यात्म) और आत्म-साक्षात्कार की ओर मुड़ने की कहानी है। उन्होंने अपना जीवन एक धर्म-शास्त्री
और भाष्याकार की हैसियत से शुरू किया था। बाद में उनका झुकाव दर्शन की तरफ़ हुआ। उनकी
विद्वत्ता को देखते हुए 1091 में
सेल्जुक वज़ीर निज़ामुलमुल्क ने उनको बगदाद के प्रतिष्ठित निज़ामिया मदरसा का
प्रमुख नियुक्त किया। उस समय उन्हें इस्लामी दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता
था। उनके व्याख्यानों में सैकड़ों बड़े-बड़े विद्वान और अमीर शामिल होते थे।
सफलता के शिखर पर रहते हुए, 1095 में उनको एक गहरा आंतरिक आध्यात्मिक
संकट हुआ। उनकी आत्मा में उथल-पुथल शुरू
हुई। उन्हें लगा कि उनका ज्ञान और शोहरत अल्लाह के लिए नहीं, बल्कि दुनियावी नाम के लिए है। इस मानसिक
और आध्यात्मिक तनाव के कारण उनकी आवाज बंद हो गई और वे बोल नहीं पाते थे। दर्शन की तरफ़ से भी उनका विश्वास उठ गया
और वे नास्तिक हो गए। उन्होंने अपनी नौकरी, धन-दौलत और परिवार को छोड़ दिया और
बगदाद से चुपचाप निकल गए। इस्तीफ़ा देकर उन्होंने तपस्या शुरू कर दी और सूफी का
जीवन अपना लिया। तब कहीं जाकर उनके मन को शांति प्राप्त हुई। आलोकित मनोदशा में
उन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया। वे दमिश्क, यरूशलेम (बैतुल मुकद्दस), मक्का और मदीना गए। फिर उन्होंने ध्यान
में अपना मन लगाया। दमिश्क की जामा मस्जिद के मीनार में बैठकर वे कई-कई दिनों तक
केवल अल्लाह की इबादत (ध्यान) करते थे। इस दौरान उन्होंने सूफीवाद के व्यावहारिक
रास्तों को आज़माया और दिल की सफाई (तज़किया-ए-नफ़्स) पर काम किया। उन्होंने पाया कि अल्लाह का
असली ज्ञान केवल किताबों या तर्कों से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव और दिल की रोशनी से मिलता है। जब उनकी आत्मा को शांति
मिली तो वे एक बदले हुए इंसान के रूप में समाज में वापस लौटे निशापुर वापस आ गए। वहां
वे कॉलेज में पढ़ाने लगे। कुछ दिनों के बाद वे अपने मूल स्थान तूस वापस लौट आए। वहीं
19 दिसंबर, 1111 ई. को उनका देहांत हो गया।
इसी आध्यात्मिक सफर के अनुभवों के आधार पर उन्होंने “अहिया-अलउलूम-अलदीन” (धार्मिक विज्ञानों का पुनरुद्धार), 'तहफुत अल-फलासिला' (दार्शनिकों की असंगति) और “अलमुनक़द-मिन-अलज़लाल” नामक ग्रंथ की रचना की। इन पुस्तकों
में उन्होंने धर्म और दर्शन पर विचार किया है। ‘अलमुनक़द’ उनकी आत्मकथा है। इसमें उन्होंने
कहा है सूफ़ीवाद का जीवन सबसे अच्छा जीवन है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'तहाफ़ुत अल-फ़लासिफ़ा' में यूनानी दर्शन की सीमाओं और उसकी
कमियों को उजागर किया। इह्या उलम अल-दीन उनकी सबसे महान कृति मानी जाती है, जो धर्म, नैतिकता और सूफीवाद का एक व्यापक
संकलन है। कीमिया-ए-सआदत मानव आत्मा और परमात्मा के संबंध पर लिखी गई एक
अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक है।
हज़रत अल ग़ज़ाली को परंपरावादियों की दलीलें प्रभावित नहीं
कर पाती थीं। दर्शन, बुद्धि और तर्क की राह उन्हें अधूरी लगती थी। उनका मानना था
कि बुद्धि और तर्क दैनिक जीवन और विज्ञान के लिए उपयोगी हैं, लेकिन वे ईश्वर के परम सत्य को नहीं
पा सकते। उनका कहना था कि तर्क की राह पर चलकर हम उसे हासिल कर सकते हैं जो
सापेक्ष (बुद्धिगम्य) हैं, उसे नहीं, जो निरपेक्ष (ज्ञानातीत) है। ईश्वर से
साक्षात्कार सोच-विचार, तर्क, और बुद्धि-ज्ञान से नहीं, ध्यान (ज़िक्र), प्रेम और
हृदय से हो सकता है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर को केवल किताबों, दर्शन या शब्दों से नहीं समझा जा
सकता। उसे केवल 'ज़ौक़' (प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव) के
माध्यम से महसूस किया जा सकता है। सत्य को सोच-विचार की ज़रूरत नहीं है। उसे चेतना की ज़रूरत
है। सजग बने रहकर विचार के विसर्जन से हृदय में डूबा जा सकता है, तभी ईश्वर से
लयबद्धता हो सकती है। अल-ग़ज़ाली के अनुसार, इंसान का दिल एक आईने की तरह है। जब इंसान गुनाहों और सांसारिक
इच्छाओं को छोड़ देता है, तो दिल साफ हो जाता है और उसमें ईश्वर का नूर (प्रकाश) चमकने लगता है।
उन्होंने इंसानी समझ और ज्ञान को तीन श्रेणियों में बांटा,
पहला अवाम (आम
लोग) जो केवल अंधानुकरण (तक्लीद) और ऊपरी बातों पर विश्वास करते हैं।
दूसरा उलेमा और दार्शनिक, जो तर्क, बहस और सबूतों के आधार पर ज्ञान
प्राप्त करते हैं। और तीसरा आरिफ़ (सूफी संत), जो सीधे ईश्वरीय प्रेरणा (इल्हाम) और आत्मिक अनुभव
से सत्य को देखते हैं।
हज़रत ग़ज़ाली ने कहा कि इल्म (ज्ञान) दो तरह का है। एक अक़्ली-सानी (बुद्धि से
संबंध रखने वाला) और दूसरा इल्मे-मुकाशिफ़ा
(आत्मा से साक्षात्कार)। अक़्ली-सानी एक वैज्ञानिक इल्म है। इसको हासिल करने
के साधन प्रत्यक्ष,
प्रमाण, तर्क और अध्ययन हैं। जैसे गणित, रसायन शास्त्र, औषधि शास्त्र आदि। इल्मे-मकाशिफ़ा
दीनी यानी आत्मा से संबंध रखने वाला ज्ञान है। इसका मकसद ईश्वर की प्राप्ति है। यह
मनुष्य को सारे फंदों से निजात दिलाता है और सत् से साक्षात्कार कराता है। उनका मानना
था कि वास्तविक आनंद और सुख आत्मज्ञान तथा मन की शुद्धता से ही प्राप्त किया जा
सकता है। पर इसके लिए तजकिया-ए-नफ़्स (हृदय की शुद्धि) और मुराक़बा (ध्यान) और मुकाशफ़ा (आत्मशक्ति द्वारा वह कुछ देखना, जो दूसरे नहीं देख सकते, गूढ़ तत्वों पर चिंतन) ज़रूरी है। पहली तरह का इल्म दुनियाई इल्म
है और इसकी सच्चाई अनिश्चित है, जबकि आत्मिक
ज्ञान की सच्चाई निश्चित है। यह ईश्वर का सामना करा देता है।
इमाम अल-ग़ज़ाली का कारण और कार्य का सिद्धांत
उनके दर्शन का सबसे प्रसिद्ध और क्रांतिकारी हिस्सा है। उन्होंने
इस सिद्धांत को अपनी पुस्तक 'तहाफ़ुत अल-फ़लासिफ़ा' में समझाया है। इसे समझने के लिए उन्होंने 'आग और कपास (रूई)' का एक बहुत ही सुंदर और सरल
उदाहरण दिया है। आम तौर पर जब हम जलती हुई आग के पास रूई ले जाते हैं, तो रूई जल जाती है। सामान्य सोच (दार्शनिकों का मत) के अनुसार आग के भीतर
एक प्राकृतिक शक्ति है, जिसके कारण रूई का जलना अनिवार्य है।
यानी आग 'कारण' है और रूई का जलना 'कार्य' है। अल-ग़ज़ाली का मत था कि आग में रूई को
जलाने की अपनी कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है। आग और रूई का साथ आना केवल एक संयोग या
आदत है। अल-ग़ज़ाली के अनुसार, रूई को जलाने वाला असली 'कारण' आग नहीं, बल्कि ईश्वर है।
जब आग रूई को छूती है, तो ठीक उसी क्षण ईश्वर रूई के भीतर 'जलने की क्रिया' को पैदा करता है। दो घटनाओं के बीच
कोई ऐसा प्राकृतिक संबंध नहीं है जिसे बदला न जा सके। आग रूई को छूने के बाद भी न
जले, ऐसा होना तार्किक रूप से बिल्कुल संभव है। अल-ग़ज़ाली ने
इस सिद्धांत से यह साबित किया कि चमत्कार वैज्ञानिक रूप से भी संभव हैं। उदाहरण के
लिए, जब हज़रत इब्राहीम (अब्राहम) को आग में डाला गया, तो
वे नहीं जले। ऐसा इसलिए
हुआ क्योंकि ईश्वर ने उस समय आग को जलाने का आदेश नहीं दिया, या आग के स्वभाव को बदल दिया।
इस समय तक साधकों द्वारा क़ुरआन शरीफ की व्याख्या भी अपने-अपने
तरीके से की जाने लगी। जिससे उनमें भी अलग-अलग मत और सम्प्रदाय बन गए। धीरे-धीरे प्रमुख
साधकों के शिष्य इकट्ठा होने लगे और इस प्रकार गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होने लगी।
सूफ़ीमत और सिद्धान्तों का परिचय देने वाले अनेक ग्रन्थ लिखे गये, जिससे दसवीं शताब्दी तक सूफ़ीमत की एक
निश्चित धारा बन गई। इस्लाम से विभेद के कारण
हज़रत ग़ज़ाली जैसे साधकों ने दोनों के बीच सामन्जस्य स्थापित करने की कोशिश की।
हज़रत ग़ज़ाली एक समन्वयवादी सूफ़ी दार्शनिक थे। उन्होंने प्रसिद्ध पुस्तक “तुहफतुल-फिलासफा” की रचना की। उन पर यूनानी
दार्शनिकों के साथ-साथ क़ुरआन और हज़रत हसन अल बसरी, हज़रत राबिया और हज़रत जुनैद के
मतों का प्रभाव था। उन्होंने सूफ़ियों के प्रति सद्भाव एवं सौहार्द्र उत्पन्न करने
की दृष्टि से तथा मुसलमानों के विरोध को शांत करने के उद्देश्य से शरीयत (इस्लामी
कानून) एवं तरीक़त (सूफीमत का आध्यात्मिक मार्ग) के समन्वय का मार्ग निकाला। उन्होंने सूफ़ीमत की व्याख्या
इस प्रकार से की,
कि इसे इस्लामी दर्शन का अंग
बना दिया। उन्होंने कहा कि शरीयत एवं तरीक़त दोनों एक ही चीज़ हैं, सिर्फ़ उनकी व्याख्या अलग-अलग की गयी
है। तरीक़त शरीयत से बाहर नहीं है। यह इस्लाम का विरोध या खंडन नहीं करता। उन्होंने
यह साबित किया कि आध्यात्मिक अनुभूति और सूफ़ी विचार इस्लामी कानून (शरीयत) के
विरोधी नहीं बल्कि उसके पूरक हैं। उनकी वजह से लोगों को सूफ़ियों की मंशा और मक़सद
को समझना आसान हो गया। उनके समन्वयवादी विचारों से इस्लाम और सूफ़ीमत का विरोध
समाप्त हो गया और उससे सूफीवाद को मुख्यधारा के रूढ़िवादी इस्लाम में स्वीकार्यता
मिली।
हज़रत ग़ज़ाली रह. के प्रयासों से सूफ़ीमत को एक क्रमबद्ध दार्शनिक रूप मिला। उन्होंने सूफ़ीमत में क़ुरआन
के अनुरूप प्रभु की सार्वभौमिकता और सर्वशक्तिमत्ता स्थापित करते हुए ज्ञान की
महत्ता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने ध्यान द्वारा किए जाने वाले ईश से साक्षात्कार
की संभावना को भी को भी पुष्ट कर दिया। ग़ज़ाली ने इस्लामी विधि-विधान के साथ सूफ़ीमत
का सामंजस्य भी बिठा दिया। इस प्रकार उन्होंने सूफ़ी दर्शन को इस्लाम पंथ के रूप
में मान्यता दिलायी। सन् 1045 में
हज़रत अबू अल-कासिम अल-कुशैरी का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘रिसाल–फी-इल्म–अल–तसव्वुफ़’
प्रकाश में आया। इसमें यह दिखाने की चेष्टा की गई कि सूफ़ीमत और इस्लाम में विरोध नहीं
है, बल्कि सूफीवाद इस्लाम का ही एक वैध
और आंतरिक आध्यात्मिक हिस्सा है।
ईसा की बारहवीं शताब्दी में भिन्न-भिन्न दरवेशों के सम्प्रदायों
का आविर्भाव हुआ। अदवी सम्प्रदाय के संस्थापक हज़रत अल हक्कारी थे और
इसकी स्थापना सन् 1163
में की। प्रसिद्ध क़ादरी सम्प्रदाय
की स्थापना हज़रत अब्दुल क़ादिर अल जीली ने की। हज़रत शहाबुद्दीन शुहरावर्दी
ने सोहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना की। इसके बाद का काल सूफ़ीमत का स्वर्णिम
युग है। इब्नुल अरबी, जीली जैसे विचारक इसी युग की देन हैं। फारसी
के तीन प्रसिद्ध कवि - फ़रीदुद्दीन अत्तार, जलालुद्दीन रूमी और शेख़ सादी ने भी इसी काल में दुनिया को प्रभावित किया।
इनके साहित्य ने भी सूफ़ीमत के विकास में मह्त्त्वपूर्ण योगदान दिया।
9.2 शेख़ अब्द अल-क़ादिर
जिलानी (1077-1166)
शेख़ अब्द अल-क़ादिर जिलानी (1077-1166) का जन्म उस अवधि में हुआ था जब मलिकशाह सल्जूक
(1072-1091) ने एक विशाल मुस्लिम साम्राज्य कायम कर लिया था। वह इस्लामी इतिहास के एक महान सूफ़ी संत, हनबली विद्वान और न्यायविद थे। उन्हें दुनिया भर में 'ग़ौस-ए-आज़म' (महान सहायक) के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने सूफ़ी परंपरा के सबसे पुराने और सबसे बड़े सिलसिलों (संप्रदायों) में से
एक, कादिरिया सिलसिले की नींव रखी थी।
उनका जन्म 1077 ईस्वी में फारस (वर्तमान ईरान) के जीलान
(या गिलान) प्रांत में हुआ था। वे अपने पिता की ओर से इमाम हसन और माता की ओर
से इमाम हुसैन के वंशज थे, जिस कारण उन्हें हसमी-हुसैनी सैयद कहा जाता है। 18 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा के
लिए इस्लामी ज्ञान के तत्कालीन केंद्र बगदाद चले गए। उन्होंने इस्लामी
न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह), हदीस और कुरान की गहरी शिक्षा ली। वे इस्लामी कानून के हनबली
स्कूल से संबद्ध थे। उनका काल विद्या के महान संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन
1092 में, मलिकशाह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई जिसने देश में
अराजकता और अव्यवस्था को जन्म दिया। उनके चार पुत्रों (महमूद प्रथम, बर्क-यारूक, मुहम्मद प्रथम, और अहमद संजर) तथा उनके भाई तुतुश प्रथम ने
सिंहासन पर दावा किया, जिससे गृह युद्ध छिड़ गया। सल्जूक
के विभिन्न गुटों के बीच लगातार युद्धों ने साम्राज्य की शांति और सुरक्षा को नष्ट
कर दिया। इसने
इस अवधि के मुसलमानों के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे के विघटन में बहुत योगदान
दिया। वहाँ का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया और राज्य में कोई शांति या सुरक्षा नहीं
थी। ऐसी परिस्थितियों में शेख़ अब्द अल-क़ादिर बगदाद में रहते थे, जो वहां सुदूर
प्रदेश जिलान से आए थे। वो एक सूफ़ी संत हज़रत हम्माद के शिष्य बन गए, जिनकी आध्यात्मिक देखभाल के तहत
उन्होंने रहस्यवादी विद्या में बड़ी दक्षता हासिल की। सांसारिकता से दूर रहकर ग्यारह
वर्षों तक उन्होंने अपना जीवन पूर्ण एकांत में बिताया। इस दौरान वे कई-कई दिनों तक बिना खाए-पिए इबादत करते थे और नींद पर
काबू पाने के लिए रात भर एक पैर पर खड़े होकर कुरान पढ़ते थे। आध्यात्मिक अनुशासन की इस अवधि के बाद वे 1127 में बगदाद वापस आ गए और एक उपदेशक के
रूप में अपना जीवन बिताने लगे। बड़ी
संख्या में लोग उनके पास इकट्ठा होने लगे और कुछ ही समय में जिस परिसर में
उन्होंने व्याख्यान देना शुरू किया था, उसे बड़ा और विस्तारित करना पड़ा। 51 वर्ष की आयु में उन्होंने विवाह किया
और 91 वर्ष की आयु में उनका निधन 1166 ईस्वी (561 हिजरी) में बगदाद में हुआ। उनकी पुण्यतिथि को पारंपरिक रूप से ग्यारहवीं
शरीफ़ के रूप में मनाया जाता है। इराक की
राजधानी बगदाद में उनकी भव्य दरगाह (मकबरा) स्थित है, जहाँ आज भी पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु
आते हैं।
उन्हें सभी सूफ़ियों और संतों का
राजा (सुल्तान-उल-औलिया) माना जाता है। सूफ़ी परंपरा में उनका एक प्रसिद्ध कथन है: "मेरा यह पैर हर अल्लाह के वली (संत)
की गर्दन पर है।" वे आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे
और उनकी वाक्पटुता से लोग काफी प्रभावित हुआ करते थे। उन्होंने सूफ़ी रहस्यवाद
(आध्यात्मिकता) का इस्लामी कानून (शरिया) के साथ बेहतरीन समन्वय किया। उनका मानना
था कि बिना बाहरी धार्मिक नियमों के पालन के आंतरिक शुद्धि अधूरी है। उनका स्पष्ट
विचार था कि जो सूफ़ी मार्ग (तरीक़त) इस्लामी कानून (शरिया) का उल्लंघन करता है, वह भटकाव है। हर आध्यात्मिक अनुभव को
कुरान और हदीस की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। फ़ुतुह अल-ग़ैब (अनदेखे
रहस्योद्घाटन), उनके अस्सी उपदेशों का एक संग्रह है जो उन्होंने विभिन्न अवसरों पर
दिया था। यह उस समय की अस्थिर स्थिति को दर्शाता है। वह लगभग हर धर्मोपदेश में ज़ोर देते
हैं कि सामाजिक बर्बादी और अस्थिरता अत्यधिक भौतिकवादी दृष्टिकोण का परिणाम है। वे
लोगों को सलाह देते हैं कि सभी प्रकार की इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को मार कर दुनिया
के प्रति पूर्ण उदासीनता का रवैया अपनाएं। वे आंतरिक
बुराइयों, घमंड, और लालच को मारने को सबसे बड़ा जिहाद (जिहाद-ए-अकबर) मानते थे। जब तक
इंसान खुद को शून्य नहीं कर लेता, वह ईश्वर को नहीं पा सकता। एक
व्यक्ति के लिए यह उचित है कि वह अपने दिल से सभी चीज़ों को हटा दे और विनाश, ग़रीबी और अभाव में सुख पैदा करे। स्वतंत्र इच्छा के प्रश्न के संबंध
में वह नियतत्ववाद का दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे कहते हैं, "मानव प्रयासों की स्थिति को मत भूलना
ताकि नियतात्मक (जबरिया) के पंथ का शिकार न हो जाएं। उनका विश्वास था कि
कोई भी कार्य अपनी परिणति प्राप्त नहीं करता, सिवाय ईश्वर की इच्छा के। अच्छाई और बुराई एक पेड़ के जुड़वां
फल हैं। सब कुछ ईश्वर की रचना है। हमें सभी बुराइयों को अपने ऊपर ही लेना चाहिए। शेख़ जिलानी का मानना है कि
आध्यात्मिक शांति जो एक फ़क़ीर के लिए अनिवार्य है, उसे तब तक पूर्ण नहीं कहा जा सकता जब
तक कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रशिक्षित न हो। उनके अनुसार कष्ट की मात्रा ही उनके
आध्यात्मिक पद को निर्धारित करती है। बुराई पर अच्छाई की अंतिम जीत के लिए जो आवश्यक है वह है विश्वास पर
दृढ़ रहना। यह जीत न केवल परलोक में बल्कि इस दुनिया में भी संभव है। यदि मनुष्य श्रद्धा और कृतज्ञ हो तो
ये बातें इस जीवन में विपत्ति की आग को बुझा देंगी।
शेख़ के अनुसार इंसान को चार
श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जिनके पास न तो ज़ुबान है और न ही
दिल। वे
बहुसंख्यक सामान्य लोग हैं, जो सत्य और सद्गुण की परवाह नहीं करते हैं और इंद्रियों के अधीन जीवन
जीते हैं। ऐसे
लोगों से बचना चाहिए, सिवाय इसके कि तब उनसे संपर्क किया जाए जब उन्हें धार्मिकता और भक्ति
के मार्ग पर आमंत्रित किया जाए। दूसरी
श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जिनके पास जीभ है लेकिन दिल नहीं है। वे महान विद्या और ज्ञान के लोग हैं
और उनके पास वाक्पटु जीभ है जिसके साथ वे लोगों को धर्मपरायणता और धार्मिकता का
जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन, वे स्वयं कामुकता और विद्रोह का जीवन जीते हैं। इनकी वाणी मनमोहक होती है लेकिन इनके
हृदय काले होते हैं। तीसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनके पास दिल तो होता है
लेकिन ज़ुबान नहीं होती। वे विश्वसनीय
और सच्चे आस्तिक हैं। वे
अपनी कमियों और दोषों से अवगत हैं और लगातार अपने आप को सभी अशुद्धियों को शुद्ध
करने में लगे हुए रहते हैं। उनके
आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए लोगों से बात करने और मिलने-जुलने से कहीं अधिक
सुरक्षित मौन और एकांत है। अंतिम
श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनके पास दिल के साथ-साथ जीभ भी होती है। उनके अधिकार में ईश्वर का सच्चा
ज्ञान और उसके गुण होते हैं और वे उस परम
सत्य तक पहुंचने और समझने में सक्षम हैं। इस ज्ञान और सच्चाई से लैस होकर वे लोगों को सद्गुण और धार्मिकता के
मार्ग पर आमंत्रित करते हैं और इस तरह पैगम्बरों के सच्चे प्रतिनिधि बन जाते हैं। वे मानव जाति की आध्यात्मिक प्रगति
में उच्चतम स्तर पर होते हैं।
रहस्यमय अवस्थाओं के संदर्भ में, वह हमें आध्यात्मिक विकास के चार चरण
बताते हैं। पहला धर्मपरायणता
की स्थिति है जब मनुष्य धार्मिक क़ानून का पालन करने वाला जीवन व्यतीत करता है, और अन्य लोगों की मदद के बग़ैर पूरी
तरह से ईश्वर पर निर्भर होता है। दूसरी स्थिति
संतत्व की स्थिति है। इस
अवस्था में मनुष्य ईश्वर की आज्ञा (अम्र) का पालन करता है। यह आज्ञाकारिता दो प्रकार की होती
है। पहला
यह है कि एक व्यक्ति अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने का प्रयास करता है, लेकिन जीवन में किसी भी तरह के भोग-विलास
से पूरी तरह से दूर रहता है और सभी खुले और छिपे हुए पापों से ख़ुद को बचाता है। दूसरी आज्ञाकारिता आंतरिक आवाज़ के
प्रति है, जो सीधे उसके सामने प्रकट होती है। उसकी सारी हरकतें और यहां तक कि उसका
आराम भी भगवान को समर्पित हो जाता है। तीसरा त्याग की अवस्था है जब व्यक्ति पूरी तरह से ईश्वर के
प्रति समर्पित हो जाता है। चौथा और अंतिम निर्वाण या मोक्ष (फ़ना) की स्थिति
है। यह वह एकात्मक अवस्था है जिसमें व्यक्ति ईश्वर की निकटता प्राप्त करता है, जिसका अर्थ है अपनी इच्छाओं और
उद्देश्यों को त्यागना और ईश्वर के ब्रह्मांडीय उद्देश्य के साथ स्वयं की पहचान
करना। इस
अवस्था में मनुष्य को यह अनुभव हो जाता है कि ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ भी
अस्तित्व में नहीं है। उनकी दृष्टि में आदर्श फ़क़ीर वह नहीं है जो वैरागी या साधु
बन जाता है, बल्कि दुनिया का आदमी है जो अपने व्यक्तिगत उदाहरण और अपने शब्दों से
अज्ञानी और पथभ्रष्ट को धार्मिकता के रास्ते में मदद करता है। उनका मानना था कि
इंसान को अपनी चिंताओं को पूरी तरह अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। संसार की वस्तुओं
से दिल लगाने के बजाय, केवल उनके निर्माता से दिल लगाना चाहिए।
शेख़ जिलानी का मानना है कि रहस्यवादी
अंतर्ज्ञान प्राप्तकर्ता को वास्तविकता का ज्ञान देता है जिसे तर्क के माध्यम से
हासिल करना संभव नहीं है। इतना
ही नहीं ; दृष्टि (क़श्फ़) और अनुभव (मुशहिदा) मनुष्य की तर्क
शक्ति को अभिभूत करते हैं। कश्फ़ सूफ़ीवाद में वह विशेष आंतरिक ज्ञान है, जो रहस्यवादी व्यक्तिगत अनुभव व
ख़ुदा की प्रत्यक्ष अनुभूति के द्वारा प्राप्त करते हैं। इस 'अनावृत्ति' या 'प्रकट करना' द्वारा प्रकट हुए सत्य उन तक
संप्रेषित नहीं किए जा सकते, जिन्होंने वही अनुभव प्राप्त न किया हो। यह अभिव्यक्ति ईश्वर के दो
पहलुओं को प्रकट करती है: एक उनकी महिमा (जलाल) और दूसरा उनकी सुंदरता (जमाल), दोनों अलग-अलग समय पर एक व्यक्ति के
सामने प्रकट होते हैं। उनका
कहना है कि वास्तविकता को जानने का एकमात्र तरीक़ा स्वयं (नफ़्स) को देखना
और साथ ही प्रकृति (अफाक) का निरीक्षण करना है। सब कुछ भगवान के एक या दूसरे गुणों
को दर्शाता है और हर नाम उनके नामों में से एक का प्रतीक है। तो निश्चय ही तुम
उसके नाम, उसके गुणों और उसके कार्यों से घिरे हुए हो। वह अपने गुणों में प्रकट
होता है और अपने व्यक्तित्व में छिपा होता है। उसका व्यक्तित्व उसके गुणों में
छिपा है और उसके गुण उसके कर्मों में छिपे हैं। उसने अपनी इच्छा के माध्यम से अपने
ज्ञान को प्रकट किया है और उसकी इच्छा उसकी निरंतर रचनात्मक गतिविधि में प्रकट
होती है। उसने अपने कौशल या कारीगरी को छुपाया है और इसे तभी व्यक्त किया है जब
उसने ऐसा चाहा हो। तो वह छिपा हुआ है ग़ैब (अनदेखा) का उसका पहलू है और वह
अपनी बुद्धि और शक्ति में प्रकट है।
शेख़ के अनुसार रहस्यवाद चर्चा और
बातचीत का नहीं बल्कि भूख और अभाव का परिणाम है। इसमें उदारता, हंसमुख समर्पण, धैर्य, प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के साथ
निरंतर संवाद, एकांत, ऊनी पोशाक पहनना, विश्व-भ्रमण, और फ़क़्र (दरिद्रता, दरवेशी, साधुता) और विनम्रता, ईमानदारी और सच्चाई भी शामिल है। वे कहते थे कि भूखे को खाना खिलाना
और गरीबों की मदद करना, रातों की नफ़्ल नमाज़ों और रोज़ों से भी अधिक मूल्यवान है। उनके लंगर
में हर रोज़ हजारों गरीब बिना भेदभाव के भोजन करते थे।
9.3 हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. (1136-1230)
अल-ग़ज़ाली रह. के बताए सिद्धांतों पर चलकर हज़रत मजदूद सनाई रह., हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. और हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में
सूफ़ीमत को ख़ास और आम सबके दरम्यान लोकप्रिय बनाया। हज़रत फरीदुद्दीन अत्तार ईरान
के निशापुर के एक महान फ़ारसी सूफी कवि, विचारक और लेखक थे। उनका जन्म ईरान के निशापुर शहर में हुआ था
और सूफ़ी मत व फारसी साहित्य में इनका स्थान बेहद ऊंचा है। फारसी में 'अत्तार' का मतलब इत्र बेचने वाला, जड़ी-बूटी विशेषज्ञ या पंसारी होता
है। दवाएं और इत्र बनाना इनका खानदानी पेशा था, जिसे उन्होंने सूफ़ी संत बनने से पहले
कई वर्षों तक निभाया। हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. (1136-1230) ने अनुभवजन्य ज्ञान पर बल
देकर सूफ़ी-साधना को फ़ना (निर्वाण) के साथ आबद्ध किया। उन्होंने सूफ़ीमत के ऊपर 114 पुस्तकों की रचना की। उन्हें उनकी
प्रसिद्ध आध्यात्मिक रचना 'मंतिक़-उत-तैर' (The Conference of the
Birds) और
सूफी संतों की जीवन पर आधारित पुस्तक 'तजकिरातुल औलिया' के लिए
जाना जाता है। “तज़्किरतुल-औलिया” नामक पुस्तक में उन्होंने मुस्लिम
संतों की जीवनी और उनके उपदेशों का संकलन किया है, जो कि प्रारंभिक सूफ़ीमत के
अध्ययन के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है। उनकी कविताओं और दार्शनिक विचारों का प्रसिद्ध
सूफी कवि मौलाना रूमी पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। अत्तार का दर्शन ईश्वरीय प्रेम
(इश्क) और अहंकार के पूर्ण विनाश (फ़ना) पर आधारित था। उनका मानना था कि केवल
बुद्धि के बल पर ईश्वर को नहीं पाया जा सकता; इसके लिए दिल का समर्पण और रूहानी
सफ़र ज़रूरी है। माना जाता है कि सन 1221 (या कुछ स्रोतों के अनुसार 1229-1230) में निशापुर पर हुए मंगोलों के भीषण हमले के दौरान उनकी शहादत हुई। ईरान
के निशापुर में आज भी उनका मज़ार स्थित है, जहाँ दुनिया भर से लोग अपनी अक़ीदत
पेश करने आते हैं।
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मनोज
कुमार
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