बुधवार, 29 जुलाई 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-3

       महात्मा गांधी हत्या केस-3

गांधीजी को मारने के सात प्रयास

गांधीजी को मारने के सात प्रयास किए गए। उन सात प्रयासों में से तीन में नारायण आप्टे और नाथूराम गोडसे सीधे-सीधे तौर पर संलिप्त थे। उनके हत्यारों का कहना था कि उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि वे मुसलमानों के प्रति पक्षपाती थे, क्योंकि वे भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार थे, क्योंकि उन्होंने भारत सरकार को पाकिस्तान को 50 करोड़ रुपए देने के लिए बाध्य किया। लेकिन पहले जब गोडसे-आप्टे ने गांधीजी को मारने का प्रयास किया तब तो देश का विभाजन भी नहीं हुआ था, तब तो कोई रुपया देने की बात भी नहीं थी और तब तो उनपर मुसलमानों के प्रति पक्षपाती होने का आरोप भी नहीं था। क्या उस समय हत्यारे उनके अस्पृश्यता निवारण के काम चिढ़े हुए थे?

पहला  प्रयास 

गांधीजी पर हमले के पहले दो प्रयास बहुत रोचक हैं, और दोनों के दोनों चंपारण में हुए। साल 1917 में महात्मा गांधी मोतिहारी में थे। मोतिहारी में सबसे बड़ी नील मिल के मैनेजर इरविन ने गांधीजी को बातचीत के लिए बुलाया। इरविन मोतिहारी की सभी नील फैक्टरियों के मैनेजरों के नेता थे। इरविन ने सोचा कि जिस आदमी ने उनकी नाक में दम कर रखा है, अगर इस बातचीत के दौरान उन्हें खाने-पीने की किसी चीज़ में ज़हर दे दिया जाए, तो उससे छुटकारा  मिल सकता है। ऐसा ज़हर जिसका असर थोड़ी देर बाद होता हो तो न उनके ऊपर आंच आएगी और गांधीजी की जान भी चली जाएगी। ये बात इरविन ने अपने खानसामे बत्तख मियां अंसारी को बताई। बत्तख मियां से कहा गया कि वो ट्रे लेकर गांधी के पास जाएंगे। बत्तख मियां का छोटा सा परिवार था, वे छोटी जोत के किसान थे। नौकरी करते थे। उससे काम चलता था। उन्होंने मना नहीं किया। वे ट्रे लेकर गांधीजी के पास चले गए। लेकिन जब वे गांधी जी के पास पहुंचे तो बत्तख मियां की हिम्मत नहीं हुई कि वे ट्रे गांधीजी के सामने रख देते। वो ट्रे लेकर खड़े रहे, गांधीजी ने उन्हें सिर उठाकर देखा, तो बत्तख मियां रोने लगे और सारी बात खुल गई। 

दूसरा एक और रोचक किस्सा है कि जब ये कोशिश नाकाम हो गई। पहले हमले से जब गांधीजी बच गए, तो एक दूसरे अंग्रेज़ मिल मालिक को बहुत गुस्सा आया। उसने कहा कि अगर गांधीजी अकेले मिल जाए तो मैं उन्हें गोली मार दूंगा। ये बात गांधीजी तक पहुंची। अगली सुबह महात्मा उसी के इलाक़े में थे। गांधीजी सुबह-सुबह उठकर अपनी सोंटी लिए हुए उस अंग्रेज़ की नील कोठी पर पहुंच गए और उन्होंने वहां जो चौकीदार था, उससे कहा कि बता दो कि मैं आ गया हूं और अकेला हूं। कोठी का दरवाज़ा नहीं खुला और वह अंग्रेज़ बाहर नहीं आया।

दूसरा जानलेवा हमला

लेकिन ये दोनों वाकया एक तरह की साज़िश थे। दरअसल में उन पर पहला जानलेवा हमला पुणे में हुआ था और अंतिम जानलेवा हमला करने वाले का भी संबंध पूना से था। 25 जून, 1934 को हुए इस जानलेवा हमले में वे बाल-बाल बचे। तब गांधीजी अस्पृश्यता के विरोध में सारे देश में दौरा कर रहे थे और  अपनी ‘हरिजन यात्रा’ में थे। पुणे के नगरपालिका के एक समारोह में गांधीजी भाषण देने के लिए जा रहे थे।  पुणे महापालिका की ओर से गांधीजी को मानपत्र देने का कार्यक्रम था।  दो गाड़ियां थीं, लगभग एक जैसी दिखने वाली। एक में आयोजक थे और दूसरे में कस्तूरबा और महात्मा गांधी। जो आयोजक थे, जो लेने आए थे, उनकी कार निकल गई और बीच में रेलवे फाटक पड़ता था। महात्मा गांधी की कार वहां रुक गई। तभी एक धमाका हुआ, जो कार आगे निकली, उसके परखच्चे उड़ गए। इस विस्फोट में नगरपालिका के मुख्याधिकारी और दो पुलिस समेत सात लोग गम्भीर रूप से घायल हुए थे।  महात्मा गांधी उस हमले से बच गए, क्योंकि ट्रेन आने में देरी हुई। फाटक के इस ओर ही उनकी गाड़ी थी। अपने भाषण में गांधीजी ने कहा था, “मैं हरिजन कार्य के लिए आया था। ऐसे समय इस तरह की घटना होना दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं शहीद बनना नहीं चाहता। पर अगर समय की वही माँग हो तो उसके लिए भी मैं तैयार हूँ। मेरी हत्या करना आसान है, पर उस प्रयास में निष्पाप लोगों की हत्या क्यों करते हो? मेरी गाड़ी में मेरी पत्नी और मेरी बेटी समान तीन लड़कियाँ थीं। उन्होंने आपका क्या बिगाड़ा है?”

तीसरा जानलेवा हमला

जुलाई 1944 में पंचगनी में गांधीजी पर जानलेवा हमला हुआ था। साल 1944 में आग़ा ख़ां पैलेस से रिहाई के बाद गांधीजी पंचगनी जाकर रुके थे, वहां कुछ लोग उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे। उन्हें मलेरिया हो गया था। डॉक्टरी सलाह पर वे आराम करने के लिए पंचगनी गये थे। पूना से 19-20 लोगों का एक दल पंचगनी पहुँचा। उसने दिन भर गांधी-विरोधी नारे लगाये। गांधीजी ने कोशिश की कि उनसे बात की जाए, उनको समझाया जाए, उनकी नाराज़गी समझी जाए कि वो क्यों ग़ुस्सा हैं? लेकिन उनमें से कोई बात करने को राज़ी नहीं था और आख़िर में नेहरू शर्ट, पाजामा और जैकेट पहना हुआ एक युवक गांधी-विरोधी नारे लगाता हुआ  जैकेट की जेब से छुरा निकाल कर गांधीजी की ओर लपका। तब राष्ट्र सेवा दल के तालुका प्रमुख भीकू दाजी भिलारे (भिलारे गुरुजी) और सुरती लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और एक युवक ने उसे पकड़ा। भिलारे गुरुजी ने उस युवक के हाथ को मरोड़कर उससे चाकू छीन लिया और उसे परिसर से बाहर कर दिया। वह नाथूराम गोडसे था। उसके साथ का दूसरा युवक भाग गया। पुरोहित ने पुलिस को दिए गए अपने बयान में गोडसे के अलावा आपटे और थत्ते के भी नाम लिये थे।

चौथा जानलेवा हमला

सितम्बर 1944 में गांधीजी जिन्ना से वार्तालाप करने की योजना बना रहे थे। लेकिन निहित स्वार्थ वाले कुछ ऐसे भी लोग थे जो कुछ और ही सोच रहे थे। उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया था। वे इसलिए नाराज़ थे कि गांधीजी और जिन्ना की मुलाक़ात का कोई मतलब नहीं है और उनका कहना था कि ये मुलाक़ात नहीं होनी चाहिए। नाथूराम गोडसे और एल.जी. थात्ते ने घोषणा कर रखी थी कि चाहे जो करना पड़े, वे उन दोनों को कभी मिलने नहीं देंगे। पूरा पखवाड़ा उन्होंने सेवाग्राम में धरना-प्रदर्शन किया। जिन्ना से वार्ता के लिए गांधीजी सेवाग्राम से बंबई के लिए जब निकलने लगे, तो गोडसे-थात्ते गैंग के सदस्यों ने गांधीजी को रोक दिया। उनके साथ बंगाल से आए कुछ और सदस्य भी थे। सेवाग्राम के सामने वाले गेट पर वे लेट गए। गोडसे नारे लगा रहा था और बार-बार गांधीजी को आगे नहीं बढ़ने देने पर उतारू था। आश्रम के लोगों ने उसे पकड़ लिया और एक कमरे में ले गए। नाथूराम की जेब में छूरा था।

पांचवां जानलेवा हमला

28 जून 1946 को गांधीजी दिल्ली से पूना के लिए रवाना हुए। 28-29 जून की रात को वह विशेष ट्रेन जिससे गांधी जी पूना जा रहे थे, अचानक ज़ोर से उछली। पता चला कि किसी ने पटरियों पर बोल्डर रख दिए थे। ऐसा लगता था कि किसी ने जान बूझ कर ऐसा किया था और वह ट्रेन को दुर्घटनाग्रस्त करना चाहता था। इंजिन को क्षति पहुंची। किन्तु ड्राइवर पेरेरा ने अपनी सूझ-बूझ से गाड़ी को सुरक्षित रोक लिया और उसे किसी बड़े हादसे का शिकार होने से बचा लिया। अगले दिन पूना की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा, शायद यह सातवीं बार है (दो बार दक्षिण अफ्रीका में)  जब ईश्वर ने मुझे मौत के मुंह से बचा लिया। मैंने आज तक किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति या कष्ट नहीं पहुंचाया, न ही किसी से शत्रुता की है। फिर भी कोई मेरी जान लेने पर क्यों उतारू है यह मेरी समझ से परे है। पर ऐसा हुआ है। ऐसा सभी देश में होता आया है। फिर भारत में क्यों नहीं? लेकिन मैं ऐसे मरने वाला नहीं। मैं 125 सालों तक जीऊंगा। कपूर कमीशन में किसी ने कहा था कि वह उस दिन उस प्रार्थना सभा में था, वहां मौजूद नाथूराम ने कहा था, लेकिन आपको लंबे समय तक रहने की अनुमति कौन देगा

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मनोज कुमार

 

 

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

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