शुक्रवार, 19 जून 2026

489. शांति के लिए उपवास

राष्ट्रीय आन्दोलन

489. शांति के लिए उपवास

1947

आज़ादी के दूसरे दिन और उसके बाद

अगले दिन यानि 16 अगस्त को गांधी ने 'हरिजन' के अंक में लिखा, 'कलकत्ता के लोगों के दिलों में हुए परिवर्तन का हर जगह श्रेय मुझे दिया जा रहा है, जिसके कि मैं लायक नहीं हूँ, न ही शहीद सुहरावर्दी इसके हकदार हैं। ये बदलाव एक या दो व्यक्तियों की कोशिश से नहीं आ सकता। हम लोग ईश्वर के हाथ के खिलौने हैं. वो हमें अपनी धुन पर नचाता है।'

17 अगस्त को प्रार्थना सभा में एक लाख लोगों ने भाग लिया। जनसमूह में अपार उत्साह था। गांधीजी ने कहा, मैं आपके अपार स्नेह की कदर करता हूं, परन्तु मुझे आशा है कि यह एक क्षणिक उबाल सिद्ध नहीं होगा।

18 अगस्त को ईद थी। सुहरावर्दी ने ईद मिलन में भाग लेने के लिए हिन्दू भाइयों को आमंत्रित किया। दोनों क़ौमों के लोगों ने एक साथ बैठकर मस्जिद में भोजन किया। भोजन हिंदू घरों से आया था। शाम की प्रार्थना मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के मैदान में हुई। इस सभा में पांच लाख लोग थे। सभा शान्तिपूर्वक हुई। हर दिन उनकी सभाओं में भीड़ बढ़ती जा रही थी।

19 अगस्त को बैरकपुर में एक जुलूस को लेकर विवाद हो गए और दोनों कौमों के बीच झड़पें हुईं। गांधीजी बैरकपुर गए और लोगों को समझाया। विवाद शांत हुआ। दोनों क़ौमों के लोग गले मिले। उसी दिन कांचरापाड़ा में भी मस्जिद के आगे ज़ोर-ज़ोर से लाउडस्पीकर बजाने को लेकर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। गांधीजी कांचरापाड़ा गए। मामला शांत हुआ। समय के साथ प्रार्थना सभा में लोगों की भीड़ बढ़ती गई।

20 अगस्त को प्रार्थना में चार लाख लोग एकत्रित हुए। बिहार से ख़बर आई कि कलकत्ते के चमत्कार ने बिहार को बचा लिया।

21 अगस्त को पार्क सर्कस में प्रार्थना सभा हुई। सात लाख लोग आए थे। गांधीजी ने कहा, कलकत्ता शांत है। अब वे नोआखाली जाना पसंद करेंगे।

24 अगस्त को संविधान सभा की बैठक में मुस्लिम लीग ने एक प्रस्ताव पास कर कलकत्ता में शांति बहाल करने और दोनों देशों के बीच भाईचारा बढ़ाने के गाँधीजी के प्रयासों की तारीफ़ करते हुए कहा कि इससे ह़ज़ारों मासूम लोगों की जान बच गई है। लॉर्ड माउंटबेटन ने भी महात्मा गाँधी को पत्र लिख कर कहा, 'पंजाब में हमारे पास 55000 सैनिक हैं तब भी वहाँ दंगे जारी हैं। बंगाल में हमारे पास सिर्फ़ एक शख़्स है, आप और वहाँ दंगे पूरी तरह से रुक गए हैं। एक प्रशासक के तौर पर क्या मुझे एक सदस्यीय सीमा बल और उसके नंबर 2 सुहरावर्दी को अपना सम्मान प्रकट करने की अनुमति है? आपको 15 अगस्त को संविधान सभा में गूँजी तालियों की आवाज़ सुननी चाहिए थी जो आपका नाम आने के बाद वहाँ गूँजी थी। उस समय हम सब आपके बारे में सोच रहे थे।'

इस बीच लाहौर की भयानक स्थिति की ख़बर कलकत्ते पहुंची। हिन्दुओं का भयंकर हत्याकांड हो रहा था। सैंकड़ों मुर्दे सड़क पर बिखरे पड़े थे। लाहौर में हिंदू मोहल्लों का पानी बंद कर लोगों ने गोलियां चलाई। हिन्दू बस्तियां जला दी गई थीं। जो लोग बच के निकलना चाह रहे थे उन्हें पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा। लोगों ने गांधीजी से निवेदन किया था कि पंजाब में आपकी उपस्थिति आवश्यक है। लेकिन गांधीजी कलकत्ता, नोआखाली और बिहार छोड़कर जाने की स्थिति में नहीं थे। नेहरूजी ने गांधीजी को आश्वासन दिया, लाहौर हम संभाल लेंगे, आप कलकत्ता देखिए। लाहौर और अमृतसर में भयंकर रक्तपात हुआ था। 17 अगस्त को नेहरूजी पीड़ित क्षेत्रों का दौरा कर आए थे। हिंसा की लपटें होशियारपुर और जालंधर को अपनी गिरफ़्त में ले चुकी थी। मारकाट पागलपन की स्थिति तक पहुंच चुकी थी। लोग पश्चिम और पूर्वी पंजाब से पलायन कर रहे थे। अमृतसर में यदि सिक्ख मुसलमानों पर प्रहार करते तो बदले में लाहौर में मुसलमान हिन्दुओं का ख़ून बहाते। गांधीजी को पत्र लिखकर नेहरूजी ने बताया, कैसा भयंकर उत्तराधिकार है! पंजाब – पूर्वी और पश्चिमी – एक बरबाद प्रांत हो गया है और हज़ारों-लाखों मानव-प्राणी निराश्रित हो गए हैं। 24 अगस्त को नेहरूजी ने पूर्व पंजाब का दूसरा दौरा किया। विशाल पैमाने पर सामूहिक स्थानान्तरण हो रहा था। पूर्व पंजाब में 10,000 से अधिक लोग मारे जा चुके थे। सीमा के दोनों ओर स्त्रियों पर भयंकर अत्याचार और बलात्कार हो रहे थे। लोगों को ज़बरन मुसलमान बनाया जा रहा था। रावलपिंडी के पास के एक गांव के सभी स्त्री-पुरुषों को बंदी बना लिया गया। वे सिक्ख थे। पुरुषों को मुसलमान बनने के लिए कहा गया और आई भीड़ कैंची लिए तैयार थी। स्त्रियों को हवस का शिकार बनाने के लिए भीड़ ने सरेंडर करने के लिए कहा। स्त्रियों ने कहा आत्म-समर्पण और धर्म परिवर्तन से पहले हम कुएं का पानी पीकर अपनी अन्तिम प्रार्थना करना चाहते हैं। उन्हें इज़ाजत मिल गई।  74 स्त्रियों ने एक के बाद एक कुंए में कूद कर अपनी लाज बचाई। यह बात सुशीला नायर ने गांधीजी को पत्र द्वारा बताई। जो पुरुष और एक बच्ची बच गई थी, वह ‘वाह’ शिविर में आ गए थे। उस समय सुशीला नायर वहीं थीं। गांधीजी जब काश्मीर यात्रा के बाद कलकत्ता के लिए रवाना हुए तो सुशीला नायर को रावलपिंडी के पास वाह के एक ग़ैर-मुसलिम शिविर में छोड़ आए थे, ताकि शिविर के निराश्रितों को सांत्वना मिले। शिविर पर भी आक्रमण होने की आशंका बढ़ गई थी। सुशीला की जान को ख़तरा था। सरदार पटेल ने गांधीजी को लिखा कि सुशीला मौत के मुंह में है, उसको वापस बुला लिया जाना चाहिए। 26 अगस्त को गांधीजी ने जवाब दिया, मैं सुशीला को मौत के मुंह में छोड़ आया था। अब वह तभी लौटेगी जब वाह के निराश्रित निश्चिन्त हो जाएंगे, या उनके साथ वह मर मिटेगी। जिन्हें गांधीजी चाहते थे उनके प्रति उनका प्रेम कितना कठोर होता था! उसी दिन राजकुमारी अमृत कौर श्रीमती माउंटबेटन के साथ पंजाब के दौरे के दरमियान सुशीला से मिलीं। वे सुशीला से दिल्ली चलने के लिए बोलीं। सुशीला तैयार हो गईं। लेकिन शिविर के लोग रोने-चिल्लाने लगे। इसलिए वह वहीं ठहर गईं। इधर नेहरूजी और सरदार पंजाब पर नज़र रखे हुए थे। बीच-बीच में वहां का दौरा भी कर आते थे।

31 अगस्त को नेहरूजी ने गांधीजी को तार दिया, पंजाब की समस्या विस्तार और तीव्रता दोनों में ज़बरदस्त है। अब मुझे लगता है कि आपका पंजाब में होना वांछनीय है। महात्मा गाँधी सुहरावर्दी के साथ नोआखाली जाने की योजना बना रहे थे लेकिन उनपर नेहरू और पटेल का दबाव था कि वो वहाँ के पंजाब जाएं जहाँ दिनोंदिन हालत ख़राब होती जा रही थी, लेकिन विधाता ने गांधीजी के लिए कुछ और ही सोच रखा था।

मार्च 1947 के प्रथम सप्ताह में ही गांधीजी नोआखाली से चले आए थे, लेकिन वहां के साथियों के साथ उनका संपर्क लगातार बना हुआ था। दिल्ली से उन्होंने कनु गांधी को लिखा भी था, मेरा शरीर यहां है, लेकिन मेरा हृदय नोआखाली में है। विभाजन की योजना स्वीकार कर लेने और सुहरावर्दी के पतन के बाद से नोआखाली की स्थिति फिर से बिगड़ने लगी थी। स्थानीय लोग फिर से आक्रमण करने लगे थे। मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं का उत्पीड़न ज़ोर पकड़ रहा था। पुलिस और प्रशासन मूक दर्शक बनी हुई थी। जुलाई में ग़ुलाम सरवर ज़मानत पर छूट गया था। श्यामपुर में उसने अपना केन्द्र बना लिया था। प्यारेलाल का शिविर वहां से चंद मिनटों की दूरी पर था। क़ासिम अली के भी छोड़ दिए जाने की बात आ रही थी। इन दोनों का तंत्र सक्रिय हो रहा था। जो अधिकारी शांति मिशन में सहयोग दे रहे थे, उसका नोआखाली से तबादला कर दिया गया था। 30 अगस्त को प्यारेलाल और चारू चौधरी, जो नोआखाली में काम देख रहे थे, गांधीजी से मिलने कलकत्ता आए। दूसरे दिन 31 अगस्त को प्यारेलाल और चारू चौधरी से चर्चा के बाद गांधीजी ने घोषणा की कि वे 2 सितम्बर को नोआखाली के लिए रवाना होंगे।

लेकिन उसी दिन कलकता की शांति को ग्रहण लग गया। एक घायल युवक को लेकर हिंदू समाज का चित्त भ्रम हो गया। पागलपन को कोई खास कारण की आवश्यकता नहीं होती। दिल की दरारों में छिपी हिंसा निकल कर बाहर आने लगी। दस बजे रात को उत्तेजित भीड़ ने हैदरी मैंशन पर हमला बोल दिया। भीड़ के साथ एक आदमी था जिसके शरीर पर बहुत सी पट्टियां बंधी थीं। प्रदर्शनकारी ज़ोर से चिल्ला रहे थे। खिड़कियों के कांच पत्थर से तोड़ दिए गए। आभा और मनु को गांधीजी को नींद से जगाना उचित नहीं लगा इसलिए भीड़ के बीच जाकर उसे शांत करने का निवेदन करने लगीं। लेकिन इस अनुनय-विनय का हुल्लड़ बाज़ों पर कोई असर नहीं हुआ। पत्थर बाज़ी और तेज़ हो गई थी। इस दौरान गांधीजी की नींद टूटती और वे बाहर आए। आभा और मनु ने गाँधी का साथ नहीं छोड़ा। गांधीजी के मौन का दिन था वह। लेकिन वर्षों से चले आ रहे नियम को तोड़ कर उन्होंने उत्तेजित भीड़ से कहा, यह पागलपन है! मुझे क्यों नहीं मारते? मैं यहां नतमस्तक हूं, मुझे मारो। भीड़ सुहरावर्दी को ढूंढ़ रही थी। कुछ ही देर पहले सुहरावर्दी अपने घर सामान लाने गया था, क्योंकि अगले दिन सुबह वह गांधीजी के साथ नोआखाली जाने वाला था। भीड़ लाठी और पत्थर से गांधीजी को भी निशाना बना रही थी। लेकिन किसी तरह निशाना चूक जाने से गांधीजी बच गए थे।

गांधी ने हाथ जोड़ कर उपद्रवियों से चले जाने के लिए कहा लेकिन वो तभी वहाँ से हटे जब पुलिस अधीक्षक वहाँ पहुंचे। भर्राई आवाज़ में गांधीजी बोले, मेरा ईश्वर मुझसे पूछता है कि ‘तू कहां है?’ मुझे गहरी पीड़ा हुई है। 15 अगस्त को जो शांति स्थापित हुई थी, उसके असलियत यही है? पुलिस का मुखिया और उसके अधिकारी पहुंच गए। गांधीजी ने उनसे कहा, बल का प्रयोग न किया जाए। कुछ देर में वे हुल्लड़बाज़ों को मकान से निकालने में सफल हुए। वे बाहर गलियों में घूमते रहे। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। किसी तरह शांति स्थापित हुई। तब तक रात के दो बज गए थे। मुख्यमंत्री प्रफुल्लचन्द्र घोष ने गांधीजी से पूछा, क्या हम हिन्दू महासभा के नेताओं को पकड़ लें? गांधीजी ने जवाब दिया, नहीं। इसके बजाए आपको शांति कायम रखने का भार और जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल देनी चाहिए। उनसे पूछिए वे शांति चाहते हैं या लड़ाई। उनसे कहिए आप उनका सहयोग चाहते हैं, और उनके उत्तर की प्रतीक्षा कीजिए। गाँधीजी रात साढ़े बारह बजे सोने गए लेकिन तीन घंटों के अंदर फिर जाग गए। उन्होंने सरदार पटेल को पत्र लिख कर घटना का ब्योरा दिया.

1 सितम्बर: कलकत्ता में 73 घंटे का उपवास

सुबह जब कलकत्ता में हुई हिंसा में करीब 50 लोगों के मरने की ख़बर गांधी के पास पहुंची तो उन्होंने तय किया कि वो न तो नोआखाली जाएंगे और न ही पंजाब वो तब तक हैदरी मंज़िल में ही रहकर उपवास रखेंगे जब तक कलकत्ता में शाँति फिर नहीं बहाल हो जाती'

नोआखाली जाने का प्रोग्राम रद्द हुआ। पागल भीड़ बाहर मंडरा रही थी। चारू चौधरी और प्यारेलाल ने हिन्दू महासभा के नेताओं से मिलने की योजना बनाई। वे डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिले। उन्हें स्थिति से अवगत कराया। श्यामाप्रसाद ने अख़बार के द्वारा कलकता के हिन्दुओं से शांति और सौहार्द्र बनाए रखने की अपील की। लेकिन दोपहर के बाद दो बजे ख़बर आई कि मुसलमानों से भरे एक ट्रक पर दस्ती बम फेंके गए थे और दो की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई थी। गांधीजी ने इस घटना के शिकार लोगों को जाकर देखा। इस अकारण हत्या को देखकर वे स्तब्ध थे। निर्मलकुमार बोस गांधीजी के साथ ठहरे हुए थे। वह उनके सचिव के रूप में उनकी सहायता करते थे। वह एक घटना का ज़िक्र करते हैं, जो अहिंसा के बारे में गांधीजी की अहिंसा के सिद्धांत पर रोशनी डालती है। युवकों के एक दल को लगता था कि उन्होंने कुछ दिन पहले गांधीजी को वचन दिया था और इसलिए मुसलमानों की रक्षा करना उनका कर्तव्य था। वे उनसे यह पूछने आए थे कि क्या वे इस काम के लिए स्टेनगनों का इस्तेमाल कर सकते हैं? गांधीजी ने कहा, अगर कांग्रेसी मुख्यमंत्री अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में असफल रहता है और आप आग्नेयास्त्रों की सहायता से ऐसा कर पाते हैं, तो आप मेरे समर्थन के अधिकारी हैं। मैं आपके साथ हूं।

लेकिन संकट का सामना गांधीजी ने अपने ढंग से किया। संकट इतना गहरा हो तो वह किसी बाहरी संगठन पर विश्वास कर ही नहीं सकते थे। इसलिए शांति और सद्भाव की बहाली के लिए गांधी जी ने अपनी 78 वर्षीय काया को आमरण अनशन के हवाले कर दिया (1 से 4 सितम्बर तक)। राजाजी, जो उनसे मिलने आए थे, को उन्होंने अपना निर्णय सुनाया और आभा और मनु को बोले, रात 8.30 बजे से मेरा उपवास शुरू हो गया है। यह तभी समाप्त होगा, जब दंगे बंद हो जाएंगे। वह ‘करो या मरो’ का प्रतीक होगा। या तो शांति होगी या मेरी मौत। पटेल को उन्होंने लिखा, यदि मैं लोगों को पागल बनने से नहीं रोक सकता, तो मेरे लिए करने को और काम ही क्या रह जाता है?

2 सितम्बर को कलकता में दंगों की आग कम होने के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे। डॉ. दिनशा मेहता ने आकर गांधीजी की जांच की। 19 सेकेंड में दिल की चार धड़कनें कम हो रही थी। डॉक्टर ने कम से कम दो सेर पानी पीने की सलाह दी। बहुत मुश्किल से एक घंटा में उन्होंने आठ औंस गरम पानी पिया। भारी बारिश के बावज़ूद शहर में दंगे होते रहे। पुलिस कार्रवाई होती रही। शहर में शांतिदल घूमता रहा। शाम तक गांधीजी की आवाज़ बन्द होने लगी, शरीर कमज़ोर होता गया। गांधीजी से मिलने शरतचन्द्र बोस आए। सर्वसत्ताधारी बंगाल के उनके प्रस्ताव का गांधीजी ने समर्थन नहीं किया था, तब से वे गांधीजी से नाराज़ चल रहे थे। उन्हें देखते ही गांधीजी बोले, तो आपको मेरे पास आने के लिए उपवास की ज़रूरत थी? हिन्दू महासभा के लोग आरोप लगाया करते थे कि हो रहे महाविनाश के पीछे फारवर्ड ब्लॉक का हाथ है। शरतबोस ने गांधीजी को बताया कि इससे फारवर्ड ब्लॉक का कोई संबंध नहीं है, बल्कि हिन्दू महासभा के कुछ लोग सिक्खों को दंगे के लिए भड़का रहे हैं। गांधीजी ने कहा, एक-दूसरे की निन्दा करने से कोई नतीज़ा नहीं निकलेगा। आपको लोगों के बीच जाकर शांति स्थापना के लिए काम करना चाहिए। शरत बोस बोले, शांति-स्थापना के लिए मैं आपके मार्गदर्शन का पालन करूंगा।

मुख्यमंत्री डॉ. प्रफुल्ल घोष मिलने आए। उन्होंने कहा, आपने अपना उपवास ऐसे समय आरम्भ किया है जब हिन्दुओं का एक वर्ग आपको अपना शत्रु समझने लगा है। वे सोचते हैं कि जब दूसरे पक्ष ने विवेक की तिलांजलि दे दी है, आपका हिन्दुओं से कहना कि वे अहिंसा का पालन करें, उनके साथ अन्याय है। गांधीजी ने कहा, मेरा उपवास दोनों क़ौमों की सेवा करने की हेतु से हुआ है। डॉ. घोष ने बताया, कल हिन्दुओं, मुसलमानों और सिक्खों के प्रतिनिधियों को मिलने बुलाया है। इसके बाद डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी मिलने आए। गांधीजी ने मुखर्जी के स्वास्थ्य के बारे में पूछा। वे पित्ताशय की तीव्र व्याधि से पीड़ित थे। मुखर्जी प्रभावित हुए। उन्होंने गांधीजी को आश्वासन दिया, कल से हिन्दू महासभा के हिन्दुस्तान नेशनल गार्ड मुसलिम नेशनल गार्ड के साथ रास्तों पर गश्त लगाएंगे। आप उपवास तोड़ दीजिए। गांधीजी ने कहा, मैं उपवास तभी तोड़ूंगा जब आप यह ख़बर देंगे कि कलकत्ते में सम्पूर्ण शांति है।

3 सितम्बर को डॉ. दिनशा मेहता ने गांधीजी की जांच की। रक्तचाप नियंत्रण में था। आधी रात तक लूटपाट ज़ारी रही लेकिन उसके बाद शांति थी। गांधीजी ने उत्साह से कहा, उपद्रवकारियों का हृदय ज़रूर पिघलेगा। खबर आई कि सचिन मित्र की मुसलिम गुण्डों ने छुरा भोंक कर हत्या कर दी। सचिन नोआखाली में ठक्करबापा के साथ सहयोगी के रूप में काम किया था। कुछ मुसलिम मित्रों के बुलावे पर वे कैनिंग स्ट्रीट के मस्जिद की तरफ़ जा रहे थे। उसी दिन एक और कार्यकर्ता स्मृतीश बनर्जी को भी कुछ लड़कियों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। शहर में शांति स्थापना के जुलूस भी निकल रहे थे। लेकिन इसी बीच एक अस्पताल में गोलीबारी हुई और पांच मुसलमान मारे गए। मुसलमान के प्रतिनिधि ने गांधीजी से आकर कहा, आप अपना उपवास तोड़ दीजिए। ख़ुदा न करे, कहीं आपको कुछ हो गया, तो हम मुसलमानों का तो ख़ात्मा ही हुआ समझिए। गांधीजी ने जवाब दिया, मुझे इस तरह से अपना उपवास तोड़ने के लिए मनाने का प्रयत्न मत कीजिए।

बेलियाघाटा से हिन्दुओं और मुसलमानों का एक मिश्र जुलूस निकला। उसके प्रतिनिधि गांधीजी से आकर मिले। दोनों वर्गों ने गांधीजी को वचन दिया, हम  अपने पड़ोसियों के साथ शांति से रहेंगे। उपवास छोड़ दीजिए। गांधीजी ने कहा, उपवास का प्रभाव काम करने लगा है। परन्तु इतना काफी नहीं है। मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब शहर में दावानल बुझ जाएगा। वे लोग भारी मन से वापस चले गए।

‘जबतक कलकत्ता में शांति स्थापित नहीं होती, तब तक मैं अपना उपवास नहीं तोड़ूंगा’ के उद्घोष के साथ शुरू हुए गांधीजी के अनशन ने हमेशा की तरह वांछित नाटकीय प्रभाव डाला। गुरुवार, 4 सितंबर को जैसे ही यह खबर फैली कि गांधी जी आख़िरी घड़ियां गिन रहे हैं, दोनों सम्प्रदायों के लोग शांति-व्यवस्था बहाली के लिए जत्थे में निकल पड़े और उन तंग गलियों मुहल्लों में घुस गए जो साम्प्रदायिक हिंसा से सबसे ज़्यादा प्रभावित था। इससे कलकत्ते के लोगों में हृदय परिवर्तन हुआ। इसके सबसे बड़े सबूत के तौर पर एक अति नाटकीय घटना हुई।

तीसरे पहर दो बजे सेंट्रल कलकत्ता से 27 व्यक्तियों का एक समूह हैदरी भवन के दरवाज़े पर प्रकट हुए। बड़ा बाज़ार के उपद्रवों का कर्ता-धर्ता वही थी। उसने सारी बातें गांधीजी से साफ-साफ कही। उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया कि उन्होंने ही लोगों का क़त्ल करवाया था। उन्होंने गांधीजी से क्षमा मांगी। साथ ही उनसे प्रार्थना किए कि वे अपना उपवास भंग कर दें। उनका मुखिया बोला, मैं और मेरे लोग अपनी इच्छा से समर्पण के लिए तैयार हैं। अगर आप अपना उपवास भंग करते हैं तो हम किसी भी सज़ा को भुगतने के लिए राज़ी हैं। उन्होंने अपनी पिस्टल, चाकू और अन्य हथियार गांधी जी के चरणों में रख दिए। उसने अपने दो आदमियों को उस इलाक़े के सभी मुसलिम दुकान की रक्षा के लिए लगा दिया। गांधीजी ने हथियारों को देख कर कहा, 'मैं अपने जीवन में पहली बार स्टेन गन देख रहा हूँ.'

बाद में एक और टोली आई। उसने रविवार की रात को उत्पात मचाया था। पश्चाताप के साथ उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके नेता ने कहा, आप अपना उपवास तोड़ दीजिए। आप जो भी दंड देंगे उसे मैं और मेरा दल ख़ुशी से स्वीकार कर लेगा। क्षीण स्वर में गांधी जी बोले, आपको मैं एक ही सज़ा देता हूं, आप अपने पड़ोस के उन मुसलमानों के घर जाइए जो आपके शिकार हुए हैं, और उनसे कहिए कि हम आपकी सुरक्षा की शपथ लेते हैं। जिस क्षण मुझे विश्वास हो जाएगा कि सच्चा हृदय परिवर्तन हो गया है, मैं उपवास तोड़ दूंगा।

शाम को राजाजी का पत्र आया, शहर में तनाव मिट गया है। अब पूरी शांति है। छ बजे सुहरावर्दी, एन.सी. चटर्जी और सरदार निरंजन सिंह तालिब का शिष्टमंडल आया। उन्होंने बताया, हम शहर के तमाम उपद्रव-ग्रस्त हिस्सों में होकर आए हैं। सब जगह शांति है। यह उपद्रव सांप्रदायिक नहीं था, गुण्डों का काम था। हमें विश्वास है कि अब यह फिर से शुरू नहीं होगा। आप अपना उपवास तोड़ दीजिए। गांधीजी ने कहा, गुंडों को हम ही बनाते हैं और हम ही मिटाते हैं। गुंडों के नेता भी मुझसे मिलकर और माफ़ी मांग कर गए हैं। आप मुझे लिखित वचन दें कि अब फिर ये उपद्रव नहीं होंगे, तभी मैं अपन उपवास तोड़ूंगा।

सलाह-मशविरा के लिए नेतागण दूसरे कमरे में चले गए। तब तक राजाजी और कृपलानी भी पहुंच गए थे। राजाजी ने प्रतिज्ञा पत्र का मसौदा लिखवाया। उस पर सबसे पहले हिन्दू महासभा के एन.सी. चटर्जी और डी.एन. मुखर्जी ने हस्ताक्षर किए। उसके बाद बंगाल मुसलिम लीग की तरफ़ से सुहरावर्दी ने हस्ताक्षर किया। पंजाबी नेता आर.के. जैद और सिक्ख नेता निरंजन सिंह तालिब ने भी दस्तख़त किए। वह पत्र गांधीजी के पास लाया गया। प्रतिज्ञा पत्र में लिखा था, हम नीचे हस्ताक्षर करने वाले गांधीजी को वचन देते हैं कि चूंकि अब फिर से कलकत्ते में अमन और शांति की स्थापना हो गई है, इसलिए हम भविष्य में कभी इस शहर में साम्प्रदायिक लड़ाई-झगड़ा नहीं होने देंगे और उसे रोकने के लिए मरते दम तक कोशिश करेंगे। गांधीजी ने कहा, मैं उपवास तोड़ता हूं। अब मैं पंजाब के लिए कुछ कर सकूंगा।

अंततोगत्वा 4 सितम्बर की रात के नौ बजकर पन्द्रह मिनट पर गांधी जी ने अपना 73 घंटे का उपवास सुहरावर्दी के हाथों दिए गए नींबू-पानी पीकर तोड़ा।  उनके उपवास ने सारे कलकत्ते को इस तरह हिला दिया मानों बिजली छू गई हो। मुसलमान विचलित हो उठे और हिन्दू लज्जा से नतमस्तक। सभी संप्रदायों के नेताओं ने शांति का प्रण लिया और गांधीजी से उपवास तोड़ने की प्रार्थना की थी। कलकत्ते के अनशन को चमत्कार कह कर लोगों ने उसके प्रभाव को स्वीकार किया । पश्चिम बंगाल के राज्यपाल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने शहर के रोटरी क्लब में दिए गए भाषण में कहा, 'गांधीजी ने अपने जीवनकाल में बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन मैं नहीं समझता कि वो उपलब्धियाँ उतनी महान हैं जितनी कलकत्ता की उनकी शांति बहाल करवाने की यह उपलब्धि'लंदन टाइम्स ने इसके विषय में जो कहा था उसे बार-बार उद्धृत किया गया है। इस पत्र ने लिखा था, एक उपवास ने वह कर दिखाया जो सेना की कई डिवीजनें भी नहीं कर पाती। गांधी जी ने कलकत्ता में साम्प्रदायिक घृणा का जिस तरह से अकेले ही मुक़ाबला किया था उस प्रयास की प्रशंसा में लॉर्ड माउंटबेटन ने लिखा था, पचपन हज़ार सैनिक पंजाब में तैनात हैं, लेकिन वह जल रहा है। बंगाल में हमारे पास एक शांति सैनिक है और वहां दंगे बंद हैं। एक आदमी के इस सरहदी सुरक्षा दल (One man Boundary Force) को दुहाई है!

6 सितम्बर को गांधीजी ने सार्वजनिक प्रार्थना सभा में भाग लिया। उन्होंने लोगों से हर-हाल में शांति बहाल रखने की गुजारिश की। उन्होंने लोगों से कहा कि कल मैं शांति स्थापना के मिशन पर पंजाब जाने का कार्यक्रम बना रहा हूं। सुहरावर्दी ने भी घोषणा की कि वह भी गांधीजी के पुनीत कार्य में जा रहा है।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।