रविवार, 25 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


22. सूफ़ी सिलसिला- भारत में सूफ़ीवाद-2

22.1 सूफ़ी सिलसिला भारत में

इतिहासकारों के अनुसार, भारत में इस्लाम का प्रसार किसी एक घटना या तरीके से नहीं, बल्कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूपों में हुआ। भारत में तीन तरीक़ों से इस्लाम आया। पहला, व्यापार के ज़रिए, जिसकी शुरुआत दक्षिण भारत से हुई। इस्लाम का भारत में सबसे पहला प्रवेश 7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के माध्यम से हुआ। इस्लाम के उदय से पहले भी अरब व्यापारियों के दक्षिण भारत (विशेषकर केरल के मालाबार तट) के साथ पुराने व्यापारिक संबंध थे। जब अरब के लोगों ने इस्लाम अपनाया, तो वे व्यापार के साथ-साथ अपनी नई आस्था भी भारत लाए। स्थानीय राजाओं (जैसे चेरा साम्राज्य के राजाओं) ने उनका स्वागत किया, क्योंकि वे व्यापार के लिए महत्वपूर्ण थे। इसी दौर में केरल में चेरामन जुमा मस्जिद का निर्माण हुआ, जिसे भारत की पहली मस्जिद माना जाता है। यह प्रसार पूरी तरह शांतिपूर्ण और सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर आधारित था।

दूसरा, सैनिक अभियानों के ज़रिए (उत्तर-पश्चिम भारत), जो महमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद ग़ौरी जैसे आक्रमणकारियों की शक्ल में सामने आया। सैन्य अभियानों की शुरुआत 8वीं शताब्दी (712 ईसवी) में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर आक्रमण से हुई थी। इसके सदियों बाद, 11वीं और 12वीं शताब्दी में उत्तर-पश्चिम (वर्तमान अफगानिस्तान/मध्य एशिया) के रास्ते महमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद ग़ौरी जैसे शासकों के आक्रमण हुए। ग़ज़नवी का मुख्य उद्देश्य लूटपाट था, लेकिन मोहम्मद ग़ौरी के अभियानों ने भारत में मुस्लिम सत्ता (दिल्ली सल्तनत) की नींव रखी। इस माध्यम से इस्लाम शासक वर्ग के धर्म के रूप में स्थापित हुआ और प्रशासनिक व राजनीतिक प्रभाव के कारण इसका प्रसार बढ़ा।

तीसरा, सूफ़ियों और वली अल्लाह (सूफ़ी संतों) के ज़रिए। भारत में आम जनता के बीच इस्लाम के गहरे सामाजिक और आध्यात्मिक प्रसार का सबसे बड़ा श्रेय सूफ़ी संतों को जाता है। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली), और बाबा फ़रीद जैसे सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति प्रेम, संगीत (कव्वाली), और जाति-पांत से परे मानवीय समानता का संदेश दिया। सूफ़ियों के विचार भारतीय दर्शन (जैसे भक्ति आंदोलन) से काफी मिलते-जुलते थे, जिससे समाज के गरीब, वंचित और निचली जातियों के लोग इनकी ओर अत्यधिक आकर्षित हुए और उन्होंने स्वेच्छा से इस्लाम अपनाया।

इस प्रकार, जहाँ व्यापार ने इस्लाम की नींव रखी, वहीं सैन्य अभियानों ने उसे राजनीतिक शक्ति दी, और सूफ़ी संतों ने इसे भारतीय समाज के ताने-बाने में आत्मसात कराया।

12वीं शताब्दी में अनेक सूफ़ी सन्त भारत आये। सूफ़ियों का भारत में आगमन ईरान, इराक़ और मध्य एशिया से हुआ। भारत में बा-शरअ सिलसिला अधिक प्रभावशाली था। सूफ़ीमत का भारत में आगमन कब हुआ, इस प्रश्न को लेकर विद्वानों में मतैक्य नहीं दिखाई पड़ता। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के सैंकड़ों वर्ष पहले से ही सूफ़ीमत भारत में प्रवेश कर चुका था। कुछ विद्वानों का मनाना है कि ईरान के इमाम ग़जाली के ज़रिये सूफ़ीवाद, तुर्की होते हुये भारत पहुंचा। बाद में सूफ़ियों का आगमन इराक़ तथा मध्य एशिया से भी हुआ। अन्य विद्वानों का मत है कि 1000 ई. के बाद ही सूफ़ीमत भारत में आया। भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से, सूफ़ीवाद तुर्की से होकर भारत नहीं आया, बल्कि मध्य एशिया (वर्तमान उज़्बेकिस्तान, अफ़गानिस्तान, ताजिकिस्तान) और ईरान से होकर सीधे भारत पहुँचा था। यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि भारत पर आक्रमण करने वाले या दिल्ली सल्तनत की स्थापना करने वाले शासक (जैसे ग़ोरी, ग़ुलाम वंश, ख़िलजी आदि) नस्ल से तुर्क या अफ़गान थे। वे अपने साथ मध्य एशिया के सूफ़ियों और विद्वानों को भारत लाए। लेकिन वे आज के 'तुर्की देश' (Anatolia) से नहीं आए थे, बल्कि मध्य एशिया के तुर्क क्षेत्रों से आए थे। इमाम ग़ज़ाली (1058–1111 ईस्वी) वर्तमान ईरान (ख़ोरासान प्रांत के तूस शहर) के रहने वाले थे। वे कभी तुर्की या भारत नहीं आए और न ही उनके ज़रिए सीधे सूफ़ीवाद इन देशों में "यात्रा" करके पहुँचा। इमाम ग़ज़ाली ने सूफ़ीवाद को जो दार्शनिक मज़बूती दी, उसी की रोशनी में आगे चलकर चिश्ती, सुहरावर्दी और नक़्शबंदी संतों ने मध्य एशिया से भारत आकर इस्लाम के आध्यात्मिक संदेश को फैलाया।

कुछ का कहना है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश मुहम्‍मद-बिन-क़ासिम के साथ हुआ। यह पूरी तरह सही नहीं है कि भारत में इस्लाम का प्रवेश मुहम्मद-बिन-क़ासिम के साथ हुआ था। मुहम्मद-बिन-क़ासिम के आक्रमण से काफी पहले ही इस्लाम भारत में दस्तक दे चुका था। उसके सिंध पहुँचने से लगभग 83 वर्ष पहले ही भारत में इस्लाम का शांतिपूर्ण प्रवेश हो चुका था और मुस्लिम समुदाय यहाँ बसना शुरू हो गया था। मुहम्मद-बिन-क़ासिम का अभियान भारत में इस्लाम के प्रवेश का नहीं, बल्कि भारत में मुस्लिम शासन (राजनीतिक सत्ता) की शुरुआत का प्रतीक है। भारत में इस्लाम 'एक धर्म और संस्कृति' के रूप में सबसे पहले अरब व्यापारियों के ज़रिए शांतिपूर्वक आया, जबकि मुहम्मद-बिन-क़ासिम के ज़रिए वह पहली बार एक राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।

उस समय उमय्यद ख़िलाफ़त (जिसका केंद्र दमिश्क, सीरिया था) अपनी सीमाओं को तेज़ी से फैला रही थी। वे उत्तर अफ्रीका और यूरोप (स्पेन) से लेकर मध्य एशिया तक अपना नियंत्रण स्थापित कर चुके थे। भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से (सिंध) पर नियंत्रण करना उनके साम्राज्य विस्तार के एजेंडे का एक स्वाभाविक हिस्सा था ताकि पूर्व की ओर बढ़ने का रास्ता साफ हो सके। मुहम्मद-बिन-क़ासिम से पहले भी अरबों ने मकरान तट और सिंध पर नियंत्रण पाने के लिए उबैदुल्लाह और बुदैल के नेतृत्व में दो सैन्य अभियान भेजे थे, लेकिन राजा दाहिर की सेना ने उन्हें हरा दिया था। अरब साम्राज्य अपनी इस सैन्य हार का बदला लेकर अपनी प्रतिष्ठा बहाल करना चाहता था।

मुहम्मद-बिन-क़ासिम अरब मूल का आक्रमणकारी था। आठवीं सदी के शुरू में (712 ई. के लगभग) उसने सिंध पर चढ़ाई कर सिंध और मुल्तान के क्षेत्रों को जीत कर  वहां के ब्राह्मण राजा को पराजित कर दिया। उसका राज-पाट सिंध और मुल्‍तान के बीच था। अरबों के लिए भारत एक बिल्कुल नया धार्मिक अनुभव था, क्योंकि यहाँ के लोग मुख्य रूप से सनातन धर्म (हिंदू) और बौद्ध धर्म को मानते थे। उन दिनों पूरा अफ़ग़ानिस्‍तान हिंदू राज्य था, प्रजा हिंदू और बौद्ध धर्म की अनुयायी थी। मुहम्मद बिन क़ासिम एक उदार शासक था और अपनी हिंदू और मुसलमान प्रजा के साथ एक समान निष्पक्ष व्यवहार करता था। आक्रमण के शुरुआती दौर में (विशेषकर देबल और मुल्तान के घेराव के दौरान) बड़े पैमाने पर मंदिरों को तोड़ा गया और मूर्तियाँ नष्ट की गईं। लेकिन सत्ता स्थापित होने के बाद, क़ासिम ने व्यावहारिक नीति अपनाई। उसने गैर-मुस्लिमों को अपने मंदिरों में पूजा करने और नए मंदिर बनाने की अनुमति दी, बशर्ते वे नियमानुसार कर (Tax) चुकाते रहें। पूजा-पाठ की अनुमति के बदले हिन्दुओं को जज़िया देना पड़ता था। क़ासिम ने सिंध के हिंदुओं और बौद्धों को 'जिम्मी' (इस्लामी कानून के तहत सुरक्षा प्राप्त गैर-मुस्लिम) का दर्जा दिया। इसके बदले उन पर पहली बार 'जिज़िया' कर लगाया गया।

सिंध में पहली बार आधिकारिक तौर पर इस्लाम ने पैर जमाए। कई स्थानीय लोगों ने (विशेषकर जाति व्यवस्था से पीड़ित तबकों और कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने, जो तत्कालीन ब्राह्मण शासक दाहिर की नीतियों से असंतुष्ट थे) स्वेच्छा से या राजनीतिक-आर्थिक दबाव (जिज़िया से बचने के लिए) के कारण इस्लाम अपनाया। सिंध वासियों के दिल में इस्लामी पैग़म्बर के अह्लबैत के प्रति भक्ति-भाव एवं श्रद्धा  बनी रही। मुहम्‍मद-बिन-क़ासिम  की ऐतिहासिक उपलब्धि ने दक्षिण एशिया को मुस्लिम साम्राज्य से जोड़ा।  भारत को भूमध्यसागरीय दुनिया और यहां तक ​​कि दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाला यह व्यापार मार्ग 900 ईस्वी  तक शांतिपूर्वक चला। इस अवधि के दौरान, अब्बासिद ख़लीफ़ा (750 - 1258) बगदाद में बैठा था। यह शहर हज़रत अली इब्न अबू तालिब, हज़रत हसन अल बसरी और हज़रत राबिया जैसे उल्लेखनीय सूफ़ी संतों के नाम के साथ जुड़े होने के अलावा सूफ़ीवाद का जन्मस्थान भी है। 

इस्लाम की रहस्यवादी परंपरा तसव्वुफ़ ने बगदाद (इराक) से फारस में फैलते हुए महत्वपूर्ण भूमि प्राप्त की, जिसे आज ईरान और अफगानिस्तान के रूप में जाना जाता है। 977 में, एक तुर्क सैनिक नेता, सबुकतिगिन ने गज़नह शहर में अफगान साम्राज्य की स्थापना की और 997 ईसवी तक शासन किया। मुहम्‍मद-बिन-क़ासिम  की ऐतिहासिक उपलब्धि के दो सौ वर्षों के बाद सबुकतिगिन के बेटे महमूद ग़ज़नवी ने सन 1000 ई. और 1026 ई. के बीच भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया। महमूद ग़ज़नवी (998–1030 ईस्वी) ने अपने पिता सबुकतिगिन से मिले एक छोटे से राज्य को मध्य एशिया, ईरान और भारतीय उपमहाद्वीप के मुहाने तक फैले एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया। इतिहास में वह पहला ऐसा शासक था जिसने औपचारिक रूप से 'सुल्तान' की उपाधि धारण की। उसके साम्राज्य में पूरा अफ़गानिस्तान, ईरान (फ़ारस का एक बड़ा हिस्सा), तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान के कुछ हिस्से (ख़्वारिज़्म का क्षेत्र) और ट्रांसऑक्सियाना तक उसकी सीमाएँ लगती थीं, इसके अलावा आधुनिक पाकिस्तान (सिंध, पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत) और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों (कश्मीर की सीमा और पंजाब) पर उसका सीधा नियंत्रण या प्रभाव था। इस साम्राज्य की राजधानी ग़ज़नी (वर्तमान अफ़गानिस्तान में) थी, जिसे महमूद ने भारत से लूटी गई अपार दौलत से दुनिया के सबसे भव्य, सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहरों में से एक बना दिया था।

वह सिंध बलुचिस्‍तान की सीमाओं को लांघते हुए भारत के भीतरी हिस्सों में घुस आया। भारत में उसके अभियानों का मुख्य उद्देश्य स्थायी साम्राज्य स्थापित करना नहीं, बल्कि यहाँ के समृद्ध मंदिरों (जैसे सोमनाथ, मथुरा, कन्नौज, थानेसर) को लूटकर अपने मध्य एशियाई साम्राज्य को आर्थिक रूप से मज़बूत करना था। प्रसिद्ध सोमनाथ के मंदिर का विध्वंस (1025 ई.) उसने ही किया था। इन दिनों सोमनाथ का मंदिर अपनी अपार संपत्ति के लिए प्रसिद्ध था। 1030 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। किंतु उसके आक्रमणों के कारण भावी आक्रमणकारियों, विशेषकर मुहम्मद गोरी का कार्य सुगम हो गया। उसने सीमावर्ती हिंदू शाही राजवंश (राजा जयपाल और उनके पुत्र आनंदपाल) को पूरी तरह समाप्त कर दिया और पंजाब (लाहौर को केंद्र बनाकर) को सीधे अपने ग़ज़नवी साम्राज्य में मिला लिया। इस विलय के कारण ग़ज़नवी साम्राज्य की सीमाएँ सीधे आधुनिक भारत के मैदानों तक पहुँच गईं, जिसने भविष्य के आक्रमणकारियों (जैसे मोहम्मद ग़ौरी) के लिए दिल्ली और गंगा के मैदानों का रास्ता खोल दिया।

महमूद ग़ज़नवी की मृत्यु (1030 ईस्वी) के समय उसका साम्राज्य कैस्पियन सागर से लेकर यमुना नदी के तट तक और अरल सागर से लेकर अरब सागर तक फैला हुआ था। हालांकि, यह विशाल साम्राज्य केवल महमूद के व्यक्तिगत सैन्य कौशल और दृढ़ता पर टिका था। उसकी मृत्यु के बाद, उसके उत्तराधिकारी इतने बड़े साम्राज्य को संभाल नहीं पाए और धीरे-धीरे सेलजुक तुर्कों और बाद में ग़ौरी राजवंश के उदय के कारण ग़ज़नवी साम्राज्य का पतन हो गया। महान खगोलशास्त्री, गणितज्ञ, दार्शनिक और भाषाविद् अल-बिरूनी उसके साथ भारत आया था और प्रसिद्ध पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' लिखी थी। इस पुस्तक में उसने भारत के समाज, धर्म और विज्ञान का जो विवरण दिया, वह आज भी प्राचीन और मध्यकालीन भारत को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। अल-बिरूनी की भारत यात्रा तलवार के साये में शुरू हुई थी, लेकिन इसका अंत ज्ञान के एक विशाल पुल के रूप में हुआ। उसकी पुस्तक 'किताब-उल-हिंद' को ग्यारहवीं शताब्दी के भारत का "दर्पण" कहा जाता है। वह दुनिया का पहला ऐसा विद्वान था जिसने तुलनात्मक धर्मशास्त्र और भारतीय विद्या की वैज्ञानिक नींव रखी।

इस काल में धार्मिक मामलों में भी बहुत बड़ा परिवर्तन हो रहा था। इस समय तक भारत के एक बहुत बड़े हिस्से में बौद्ध धर्म का पतन हो गया था। महमूद ग़ज़नवी के अभियानों के समय उत्तर-पश्चिम भारत (आज का पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान की सीमा) और पंजाब में बौद्ध धर्म लगभग गायब हो चुका था। वहाँ मुख्य रूप से हिंदू धर्म ही प्रभावी था। महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के कारण पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बचे-खुचे बौद्ध मठों को भारी क्षति पहुँची, जिसके कारण बौद्ध भिक्षु अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत और हिमालय के अन्य सुरक्षित क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। अब जो बौद्ध धर्म प्रचलित हुआ था, वह बौद्ध और शाक्त धर्मों का सम्मिश्रण था और केवल देश के एक कोने में बंगाल और बिहार तक सीमित रहा। यहाँ पाल राजवंश का शासन था, जो बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे। इस समय नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे विशाल बौद्ध विश्वविद्यालय पूरी तरह सक्रिय थे, जहाँ हज़ारों बौद्ध भिक्षु और छात्र शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इसी युग में बहुत से धार्मिक सुधारकों का उदय हुआ, जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य। अद्वैतवाद की पुनःस्थापना, जो एकेश्वरवाद के दर्शन के प्रचार प्रसार, के साथ समाज सुधार इनका लक्ष्य था।

महमूद के आक्रमण के सौ बरस बाद बारहवीं शताब्दी के मध्य में ग़ोरी वंश का उदय हुआ। इनका आधार उत्तर-पश्चिम अफ़गानिस्तान था। शहाबुद्दीन मुहम्‍मद ग़ोरी के समय में शंसबानी वंश महत्त्वशाली हो गया और उसने इस वंश को ग़ज़नी में प्रतिष्ठित किया। ग़ज़नी को अपना मुख्य स्थान बनाकर लगभग तीस वर्षों (1175-1205 ई.) में भारत पर उसने कई हमले किए और मुस्लिम सल्‍तनत की नींव डाली। इतिहास से पता चलता है कि एक बार भारतवर्ष की सीमाओं के भीतर प्रवेश करते ही इस्लाम भी भारत के असंख्य संप्रदायों में से एक गिना जाने लगा। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। भारत में सूफीमत (सूफीवाद) के प्रसार में दिल्ली सल्तनत (13वीं से 16वीं शताब्दी) का योगदान बहुत गहरा, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में था। जहाँ एक तरफ सुल्तानों के राजनीतिक संरक्षण ने सूफियों को स्थिरता दी, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विस्तार के साथ-साथ सूफी सिलसिले भी देश के कोने-कोने तक पहुँचे। 13वीं शताब्दी में मध्य एशिया और फारस (ईरान) पर मंगोलों के भीषण आक्रमणों ने इस्लामी दुनिया के महान सांस्कृतिक केंद्रों को नष्ट कर दिया था। ऐसे समय में दिल्ली सल्तनत (विशेषकर इल्तुतमिश और बलबन के काल में) एकमात्र शक्तिशाली और सुरक्षित मुस्लिम साम्राज्य था, जहाँ मंगोल नहीं पहुँच पाए। जान बचाने के लिए सैकड़ों की संख्या में सूफी संत, विद्वान और दार्शनिक भारत (दिल्ली और मुल्तान) की ओर भागे। सल्तनत ने इन्हें सुरक्षा और बसने की जगह दी, जिससे भारत सूफी मत का नया वैश्विक केंद्र बन गया।

मुस्लिम शासकों ने दिल्ली में राजधानी स्थापित की। जब एक बार दिल्ली में राजधानी स्थापित हो गई तो कई कला-कौशल के पारंगत, प्रख्यात साहित्यकार, कवि, विद्वान, बुद्धिजीवी और सूफ़ीजन दिल्ली की ओर आने लगे। कई विद्वानों ने इस बात की तरफ़ इशारा किया है कि भारतीय जनमानस में पैग़म्बर के अह्लेबैत के प्रति विशेष श्रद्धा भाव पैदा करने में ज़ैदियों और इस्माइलियों को कोई खास सफलता नहीं मिली। यदि हम व्यापक भारतीय जनमानस (यानी बहुसंख्यक आबादी और मुख्यधारा के मुस्लिम समाज) की बात करें, तो ज़ैदियों और इस्माइलियों के संगठित धार्मिक आंदोलनों को उस स्तर पर सफलता नहीं मिली, जितनी बड़ी सफलता सूफ़ी संतों और उनके सिलसिलों (जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, क़ादिरी) को मिली। इसका प्रमुख कारण यह था कि उनके धार्मिक प्रचार-प्रसार का आधार अन्य इस्लामी सम्प्रदायों के विश्वासों के खण्डन पर टिका था और दूसरे वे ग़ैर-मुस्लिम से अधिक इस्लामी सम्प्रदायों के बीच प्रचार-प्रसार करते थे। इस वातावरण में भारतीय जनता को इस्लाम धर्म की आत्मा से परिचित कराने का दायित्व सूफ़ी संतों ने निबाहा। भारतीय जनमानस ने सूफ़ियों का स्वागत खुले मन से किया, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में। लगभग सभी प्रमुख सूफ़ी सिलसिले (ग़ौस-ए-आज़म शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी से लेकर ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती तक) आध्यात्मिक रूप से अपना संबंध इमाम अली और अह्ले-बैत से जोड़ते हैं। सूफ़ियों ने बिना किसी राजनीतिक एजेंडे के अह्ले-बैत की रूहानियत और उनके त्याग को आम जनता के सामने रखा। अमीर ख़ुसरो और अन्य सूफ़ी कवियों ने 'मन कुंतो मौला फ़ हाज़ा अली मौला' जैसी कव्वालियों और कविताओं के ज़रिए इमाम अली और अह्ले-बैत के प्रति प्रेम को भारतीय लोक-संगीत और संस्कृति का हिस्सा बना दिया। इसे सुनने और अपनाने वालों में केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि भारी संख्या में हिंदू भी शामिल थे। इमाम हुसैन और करबला के शहीदों (जो अह्ले-बैत का हिस्सा हैं) के प्रति जो विशेष श्रद्धा भारत के जनमानस में दिखती है, उसे जन-जन तक पहुँचाने में सूफ़ियों और स्थानीय कवियों के मर्सियों (शोक गीतों) और ताज़ियादारी की परंपरा का बड़ा हाथ रहा। यही कारण है कि भारत में सदियों से हिंदू (जैसे हुसैनी ब्राह्मण) और सुन्नी समुदाय के लोग भी मुहर्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते आए हैं। सूफ़ी संतों के उदार, सर्व-समावेशी और प्रेम-आधारित दृष्टिकोण ने अह्ले-बैत की श्रद्धा को संप्रदायों की दीवारों से आज़ाद करके भारतीय संस्कृति के ताने-बाने में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-40

                                     महात्मा गांधी हत्या केस-40

29 जनवरी, 1948

29 जनवरी की सुबह जयप्रकाश नारायण गांधीजी से मिलने आए। समाजवादी नेता को पता था कि गांधीजी के कांग्रेस के साथ मतभेद हैं, और वे सोशलिस्ट पार्टी के भविष्य के बारे में चर्चा करना चाहते थे। अतीत में गांधीजी ने समाजवादी विचारों को कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमति दी थी। जयप्रकाश नारायण के अनुसार, अब समय आ गया है कि कांग्रेस के भ्रष्ट नौकरशाही शासन से हटकर, युवा समाजवादियों के स्वच्छ शासन की ओर एक बड़ा और अचानक बदलाव लाया जाए। क्या गांधीजी एक समाजवादी राज्य के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करने के लिए तैयार थे? क्या धन की असमानताएँ बनी रहतीं? क्या अमीरों और ताकतवर लोगों के शासन से कोई छुटकारा नहीं मिलने वाला था? बातचीत के दौरान जयप्रकाश नारायण को एहसास हुआ कि गांधीजी का समाजवाद के समर्थन में खुलकर सामने आने का कोई इरादा नहीं था। वह अब भी अमीरों को उनकी संपत्ति का ट्रस्टी मानते थे, और उनका मानना ​​था कि गरीबों के प्रति ऐसा करना कोई पाप नहीं है। एक समय समाजवादी रहे नेहरू ने अपनी पूर्व समाजवादी मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया था। जयप्रकाश नारायण इस भावना के साथ बैठक से निकले कि गांधीजी सरकार के कैदी थे।

और भी लोग आए, लोगों का मानो तांता सा लग गया। दोपहर में दृष्टिहीन लोगों का एक समूह आया, और उनके बाद गांधीजी से मिलने बन्नू से विस्थापित शरणार्थी आए थे। ये गांधीजी के उपवास से पहले गुजरात स्टेशन पर रेल में हुए हत्याकांड से बचे हुए लोग थे। उनमें से एक ने कहा, “आप आराम क्यों नहीं करते? आपने हमें एकदम बरबाद कर डाला है। अब हम लोगों पर कृपा करके आप हिमालय चले जाइए।” गांधीजी ने उत्तर दिया, “मैं किसी कहने पर रिटायर नहीं हो सकता। मैंने खुद को भगवान की एकमात्र आज्ञा के तहत रखा है।” उस दिन की प्रार्थना सभा में इस बात का उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा था, दिल्ली में इतने सारे दुखी लोगों को छोड़कर मैं कैसे हिमालय जा सकता हूं?

गांधीजी ने प्यारेलाल को कहा, जाकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिलो। उनसे कहना उनके कार्यकर्ता बड़े उत्तेजक भाषण देते हैं। वे कांग्रेसी नेताओं का नाम लेकर उनकी हत्या करने की बात करते हैं। आप उनके नेता हैं, उन लोगों को ऐसी बातें करने से रोक सकें तो ठीक रहेगा। प्यारेलाल जी ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिलने के बाद आकर गांधीजी को बताया कि उन्होंने कुछ स्पष्ट हामी नहीं भरी और बात को टाल गए। साथ ही उन्होंने गांधीजी से यह भी कहा कि वह (प्यारेलाल) नोआखाली जाना चाहते हैं। गांधीजी ने कहा, मेरे सेवाग्राम जाने के बाद जाना और जब मैं पाकिस्तान जाने लगूं तब मेरे साथ चलना। शायद 2 फरवरी को जा सकते हो।

शाम तक वे काफी थक चुके थे। उस शाम उन्हें ज़ोरों की खांसी उठी, और उन्होंने पेनिसिलिन की वे गोलियां लेने से इनकार कर दिया, जिन्हें डॉ. सुशीला नायर उनके लिए छोड़ गई थीं। वे बहुत कमज़ोर और थके हुए लग रहे थे। कांग्रेस में भ्रष्टाचार के बढ़ते सबूतों को देखकर वे बहुत परेशान थे। उन्होंने कहा, "हम दुनिया के सामने किस मुंह से जाएंगे? पूरे देश की इज़्ज़त उन लोगों पर टिकी है, जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। अगर वे भी अपनी ताक़त का गलत इस्तेमाल करेंगे, तो हमारा आधार ही डगमगा जाएगा। मैं कहाँ खड़ा हूँ और मैं क्या कर रहा हूँ?"

कांग्रेस-कार्य समिति का विधान का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ले रखी थी। उसकी ओर इशारा करते हुए उन्होंने आभा से कहा, “मेरा सिर चकरा रहा है, फिर भी मुझे इसे पूरा करना ही होगा। आज मुझे देर तक जगना होगा।” उसी रात, यानी धरती पर अपनी आख़िरी रात में उन्होंने अपनी पौत्री मनु से कहा था, “अगर मैं बीमारी से मरूं, भले ही वह फुंसी ही क्यों न हो, तो तुम दुनिया से चिल्ला-चिल्लाकर कहना कि मैं एक झूठा महात्मा था। दूसरी ओर यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।”

यह कोई भविष्यवाणी नहीं थी। वास्तव में तो उन्होंने तीन दिन बाद वर्धा आश्रम जाने का एक कार्यक्रम बनाया था। वे वहां से पाकिस्तान जाना चाहते थे। उन्हें जिन्ना की मुस्लिम लीग सरकार को यह विश्वास दिला सकने की आशा थी कि जिन्ना के और उनके देश का कल्याण आपसी सदिच्छा और विश्वास में निहित है।  लेकिन जब मनु ने सुझाया कि उनके तीन दिन बाद पहुंचने की ख़बर वर्धा भेज दी जाए, तो उन्होंने ऐसा नहीं करने दिया और बोले, “कौन जानता है, कल क्या होने वाला है?” गांधीजी कविता पढ़ने के शौकीन नहीं थे। लेकिन उस रोज़ प्रसिद्ध शायर नज़ीर अक़बरावादी का शे’र मनु को सुनाने लगे,

है बहारे-बाग़-दुनिया चंद रोज़।

देख लो इसका तमाशा चंद रोज़॥

ये बातें उन्होंने रात के लगभग दस बजे कही थीं। एक घंटे बाद वे सो गए।

हत्या की साज़िश

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर सोये करकरे की नींद खुली। वह शौच आदि से निवृत्त होकर चाय की दुकान पर नाश्ता किया। फिर, अपने एक नए बने शरणार्थी दोस्त से अपना बिस्तर-बिस्तर (बिस्तर का बंडल) संभालने को कहकर, वह क्वीन्स गार्डेन पार्क की तरफ चला गया ताकि वहाँ नज़र रख सके। वहां शरणार्थियों ने डेरा जमा रखा था। वह इधर-उधर घूमता रहा और चाय वाले से बात करता रहा। सुबह का मौसम ठंडा और बादलों से भरा था; फव्वारे के किनारे बैठे करकरे को ठंड लग रही थी और वह सिगरेट पी रहा था। कुछ घंटों बाद, वह पार्क में धीरे-धीरे टहलने लगा और हर कुछ सेकंड में मुड़कर प्रवेश द्वार की तरफ देखने लगा। वह वहाँ बिल्कुल अकेला नहीं था, क्योंकि स्टेशन से बहुत से शरणार्थी 'क्वींस गार्डन' में आ गए थे और बड़े-बड़े पेड़ों के नीचे डेरा जमा लिया था, जिससे वह पार्क किसी गंदे खानाबदोशों के पड़ाव जैसा लगने लगा था।    

अपने एक चक्कर के दौरान, करकरे ने एक आदमी को केरोसिन (मिट्टी के तेल) का स्टोव जलाकर चाय बनाते हुए देखा। फिर, उस आदमी ने एक बोरे से कुछ कप और तश्तरियाँ निकालीं और उन्हें धूल भरी ज़मीन पर रख दिया। जब करकरे दोबारा वहाँ से गुज़रा, तो उसने देखा कि वहाँ रहने वाले चार-पाँच लोग, पुरुष और महिलाएँ, इकट्ठा होकर चाय पी रहे थे। करकरे रुका और उस आदमी से पूछा कि क्या वह चाय बेच रहा है। कपों की ओर इशारा करते हुए उस आदमी ने कहा, "हाँ बाबूजी, अभी-अभी अपनी चाय की दुकान लगाई है।" करकरे ने हैरानी से पूछा, "दुकान?" उस आदमी ने जवाब दिया, "अपना गुज़ारा करने के लिए और क्या चाहिए?" फिर उसने आगे कहा, "अब मेरा कोई नहीं है, देखिए! मेरे दोनों बेटे मेरी आँखों के सामने मारे गए, और मेरी पत्नी को भी डंडों से पीट-पीटकर मार डाला गया।"

करकरे के पास करने को कुछ नहीं था। बाकी ग्राहकों के जाने के बाद, वह नीचे उकड़ू बैठ गया और एक और चाय के पैसे दिए, जबकि वह आदमी अपनी बात कहता रहा। अजीब बात यह थी कि उसकी बातों से करकरे को लगा कि वे जो करने जा रहे हैं, वह हिंदुओं और सिखों द्वारा झेली गई सारी तकलीफों का एक तरह से जवाब होगा। यह शरणार्थियों की एक और कहानी थी, जिसमें बस थोड़े-बहुत फर्क थे। इसे बिना किसी कड़वाहट या गुस्से के, बल्कि एक तरह के समझौते (कि जो होना था, हो गया) के भाव के साथ सुनाया गया था। अपने घर से खदेड़े जाना, फिर सैनिकों द्वारा बचाए जाना और वहाँ से भारत तक का सफर और उस सफ़र में पूरे दिन बिना खाने-पानी के रहना और फिर एक सूखा बिस्कुट मिलना ... वह मंजर जब हजारों लोग रोटी लिए एक आदमी पर भेड़ियों की तरह टूट पड़े थे... और आखिरकार दिल्ली पहुंचना, मानो किसी नर्क से छुटकारा मिल गया हो। दिल्ली में उसे रहने के लिए एक जगह मिल गई... बस एक झोपड़ीनुमा जगह, जिसमें एक आदमी के ठीक से पैर पसारने की भी मुश्किल से ही जगह थी। "मैंने वहां अपनी चाय की दुकान लगाई; और फिर मुझे वहां से निकाल दिया गया।" वह अपना आपा खो बैठा। उसने एक अपशब्द कहा, जिससे पहली बार उसके भीतर नफरत और गुस्से की झलक दिखी। "निकाल दिया गया?" "जी हां - हमारे अपने ही सैनिकों ने, संगीनों के जोर पर! एक 'महान' व्यक्ति ने इसलिए अनशन कर दिया था क्योंकि मैंने एक मुसलमान का घर ले लिया था। हा! तो उन्होंने मुझे वहां से बाहर फेंक दिया - जबरदस्ती उठाकर।" करकरे ने उसे शुभकामनाएं दीं और उठ खड़ा हुआ। फिर उसने कहा, "पता है, मैंने भी बिल्कुल वहीं से शुरुआत की थी, जहां आप अभी हैं। हां, मैंने भी एक चाय की दुकान ही शुरू की थी। फिर मैं तरक्की करता गया।" "बाबूजी, मुझे तरक्की नहीं करनी - बस किसी तरह अपने बाकी दिन गुजारने हैं।" करकरे वापस फव्वारे के पास अपनी जगह पर लौट आया। धूप की वजह से पत्थर अब गर्म हो गया था। वह वहां बैठकर सिगरेट पीने लगा। पांच बजने के कुछ ही देर बाद सूरज ढल गया और ठंडी हवा चलने लगी। शरणार्थियों ने शाम की रोटियां पकाने के लिए गोबर के उपलों की आग जला ली थी। तभी, धुएं के बीच उसे वे लोग दिखाई दिए।

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दिल्ली आने वाली गाड़ी काफी लेट हो चुकी थी और सुबह के बजाय वह दोपहर में दिल्ली पहुंची। नाथूराम टिकट खिड़की तक गया, अपना द्वितीय श्रेणी का टिकट दिखाया और दो बिस्तरों वाला एक रिटायरिंग रूम बुक करने के लिए कहा। ड्यूटी पर मौजूद क्लर्क सुंदरीलाल ने उसे बताया कि एक घंटे में एक कमरा खाली हो जाएगा। बुकिंग क्लर्क सुन्दरीलाल ने उसे कमरा नं. 6 दिया। कमरा एन. विनायकराव के नाम से बुक किया गया। गोडसे-आप्टे ने स्टेशन पर ही एक घंटा बिताया और एक बजे के तुरंत बाद, कमरा नंबर 6 में पहुंचे। कमरा बड़ा और ऊंची छत वाला था और उसमें बाथरूम की सुविधा भी थी। दोनों ने गर्म खाना खाया और कमरे में विश्राम किया। उन्हें करकरे से मिलने की जल्दी नहीं थी। शाम के 6.00 बजे रूम अटेन्डेन्ट हरि किशन को बुलाकर नाथूराम ने कुछ कपड़े दिए धोने के लिए। हरि किशन ने एक जूता पॉलिश करने वाले जन्नू को वे कपड़े दे दिए और बोला साफ कर रूम नं. 6 में दे देना।

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करकरे दिन भर में अनेक चाय और बीड़ी पी चुका था। वह सात घंटे से ज़्यादा समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी उसकी नज़र पास आ रहे नाथूराम और आप्टे पर पड़ी। नाथूराम और आप्टे करकरे के निकट आए; उनके चलने के अंदाज़ से ही वह समझ गया कि उन्हें रिवॉल्वर मिल गई है।

गोडसे ने उसे बताया कि पिस्तौल की व्यवस्था हो गयी है और योजना को अंतिम रूप देने के लिए सब कुछ तैयार है। नाथूराम ने कहा, "चलो!" और तीनों पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े। तीनों रिटायरिंग रूम में चले गए। जैसे ही आप्टे ने दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगाई, नाथूराम ने अपने छोटे से स्टील के बक्से को खंगाला। उसने करकरे से कहा, "देखो!" उसके हाथों में एक चमकदार नीले-काले रंग का हथियार था, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था। करकरे की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने पूछा, "लेकिन इसमें तो कोई चक्का (सिलेंडर) नहीं है?" नाथूराम ने जवाब दिया, "यह ऑटोमैटिक है। बस ट्रिगर दबाते रहो और गोलियाँ चलती रहेंगी।" "और कारतूस?" जवाब में, नाथूराम ने एक रुमाल में बँधा पैकेट दिखाया। मानो कोई जीती हुई ट्रॉफी हो, बेरेटा (पिस्तौल) एक हाथ से दूसरे हाथ में घूमती रही, और फिर नाथूराम ने उसे वापस रख दिया। उसने कहा, "हम सुबह इसे आज़माकर देखेंगे।"

गोडसे गंभीर मूड में था। उसने सारा बोझ अपने ऊपर लेने के उद्देश्य के बारे में समझाना शुरू किया। “आप्टे के ऊपर बहुत सारे जिम्मेदारियां हैं। उसकी पत्नी और बच्चा है। मेरा कोई परिवार नहीं है। इसके अलावा मैं एक लेखक और वक्ता हूँ। मैं अपने कृत्यों को न्यायोचित ठहरा सकता हूँ। मैं गांधी की हत्या में अपनी सद्भावना को सरकार और अदालत को प्रभावित करने में सक्षम होऊंगा। आप्टे दुनियादारी वाला एक आदमी है। वह लोगों से संपर्क में रह सकता है और हिंदू राष्ट्र को आगे बढ़ा सकता है। तुम को अखबार के संचालन में उसकी मदद करनी चाहिए और हिंदू महासभा के काम को आगे बढ़ाना चाहिए।”

थोड़ी देर बाद तीनों चांदनी चौक तक टहलते हुए गए। नाथूराम ने फोटो खिंचवाई। उसने फोटोग्राफर को एक घंटे में फोटो की तीन कॉपी तैयार करने का आदेश दिया। उन्होंने पास के ही एक शाकाहारी रेस्तरां में खाना खाया और फिर अलग हो गए। लौटते समय नाथूराम ने अपने फोटो लिए और रिटायरिंग रूम में आकर आराम करने लगा। भोजन के बाद दिमाग की शांति के लिए  आप्टे और करकरे फ़िल्म देखने चले गए, गोडसे वहीं विश्राम गृह में ही एक क़िताब पढ़ता रहा। सिनेमा देखने के बाद आप्टे ने ख़ुद को करकरे से अलग किया। वह दिल्ली के रेड लाइट एरिया में जा रहा था। करकरे पिछली रात की तरह प्लेटफॉर्म पर ही सो गया। नाथूराम अपनी फ़ोटो लेने चला गया।

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बाद में करकरे को फिल्म के बारे में बस इतना ही याद रहा कि वह हिंदी में थी, रवींद्रनाथ टैगोर की एक कहानी पर आधारित थी, और बहुत लंबी थी क्योंकि खत्म होने तक आधी रात बीत चुकी थी। जब वे वापस रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे थे, तो क्वींस रोड पर ट्रैफिक लगभग पूरी तरह थम चुका था। प्रवेश द्वार पर, आप्टे अचानक रुक गया और करकरे से कहा कि वह ऊपर कमरे में नहीं जा रहा है। ‘हो सकता है कि वह सो रहा हो, और एक आजाद इंसान के तौर पर उसकी आखिरी रात में अगर मैंने उनकी नींद खराब की, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।’ करकरे ने आप्टे को चांदनी चौक की ओर वापस जाते देखा; उसे कभी पता नहीं चला कि उसने वह रात कहां बिताई। वह खुद प्लेटफॉर्म पर शरणार्थियों के बीच सो गया। सुबह जब वह रिटायरिंग रूम में गया, तो देखा कि आप्टे वहां पहले ही पहुंच चुका था।

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29 तारीख़ को राणा ने मदनलाल के द्वारा दी गई जानकारियों की बात रावसाहेब गुर्टू से की। गुर्टू ने तुरंत बताया कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘अग्रणी’ का संपादक नाथूराम गोडसे है और प्रकाशक नारायण आप्टे। उसने शस्त्र भंडार के मालिक बड़गे के बारे में भी बताया। उसने आप्टे और करकरे के फोटो भी राणा को दिए। राणा ने इन जानकारियों को न तो नागरवाला और न ही संजीवी से साझा किया। कपूर कमीशन को उसने बताया कि उसे टेलीफोन सिस्टम पर भरोसा नहीं था, क्योंकि ऑपरेटर कान लगाकर बातें सुन लेते थे। जब उससे यह पूछा गया कि उसने बंबई पहुंचने में इतना वक़्त क्यों लगाया तो उसने जवाब दिया था कि संजीवी ने उसे गुपचुप तरीक़े से जाने के लिए कहा था, इसलिए उसने वाया इलाहाबाद जाना उचित समझा। वैसे तो उचित यह होता कि संजीवी ख़ुद अपनी जांच अपने लोगों से कराते। उन्हें दिल्ली पुलिस को इस काम पर लगाना चाहिए था। गांधीजी की हत्या के बाद जांच का इंचार्ज नागरवाला को बनाया गया, जिसने गांधीजी के अपहरण की थ्योरी प्रस्तुत की थी।

मरीना होटल में जो प्रेस रिलीज़ मिली थी, वह साफ-साफ बयान करती थी कि साज़िशकर्ताओं का संबंध हिन्दू महासभा से है। दिल्ली पुलिस को उस प्रेस रिलीज़ के हस्ताक्षरकर्ता आशुतोष लाहिड़ी से बात करनी चाहिए थी। बात करते ही गोडसे, आप्टे और करकरे का नाम सामने आ जाता। और कमीशन को लाहिड़ी ने बताया कि 20 से 30 के बीच में दिल्ली पुलिस ने उनसे एक बार भी इस विषय में पूछताछ नहीं की। एक और प्रमुख चूक यह रही कि बंबई, पूना या अहमदनगर पुलिस के किसी अधिकारी को जांच में सहयोग देने के लिए दिल्ली नहीं बुलाया गया। उनसे बिड़ला भवन पर निगरानी में भी सहयोग लिया जा सकता था, ताकि अपराधियों की शिनाख़्त हो सके। आप्टे और करकरे ने इसका संदेह किया भी और 30 तारीख़ को घटना का अंजाम देने के पहले उन्होंने बिड़ला भवन का एक चक्कर भी लगाया था। बंबई की पुलिस का मानना था कि सहयोग की मांग दिल्ली पुलिस की तरफ़ से आनी चाहिए थी, पुलिस सर्विस नियमों के अनुसार वे अपनी तरफ़ से दिल्ली पुलिस की जांच में अपने अधिकारी नहीं थोप सकते थे। लेकिन 1 फरवरी को पूना पुलिस द्वारा बिना दिल्ली पुलिस की मांग के चार हवलदार विमान द्वारा दिल्ली भेजे गए ताकि वे आप्टे और करकरे को खोज सकें।

नागरवाला ने  मदनलाल के बयान के आधार पर 24 जनवरी को बड़गे की गिरफ़्तारी का आदेश ज़ारी किया था। बंबई-पूना पुलिस की आपसी तालमेल के अभाव में एक सप्ताह तक यह आदेश अधर में झूलता रहा, और अंत में गांधीजी की हत्या हो जाने के बाद 31 जनवरी को बड़गे की गिरफ़्तारी हुई। पुलिस का कहना था कि वह पूना के आसपास के जंगलों में छिपा हुआ था, जबकि बड़गे का बयान था कि दिल्ली से 22 को लौटने के बाद से वह पूना में घर में ही था।

प्यारेलाल और तुषार गांधी दोनों ने ही पुलिस की तरफ़ से की गई चूकों के ऊपर अपनी-अपनी पुस्तकों में विस्तृत चर्चा की है। इंस्पेक्टर रज़क द्वारा 9 जनवरी को ही मदनलाल और करकरे की गिरफ़्तारी की संस्तुति की गई थी, लेकिन विभाग द्वारा तीन दिन बाद उसे स्वीकृत किया गया, तब तक दोनों अहमदनगर छोड़ चुके थे। न्यायाधीश आत्माचरण ने भी पुलिस की भूमिका पर सख़्त टिप्पणी की थी, खास कर 20 जनवरी से 30 जनवरी के बीच की गई जांच पर। अगर दिल्ली और बंबई पुलिस ने थोड़ी सी भी रुचि दिखाई होती, तो शायद 30 को होने वाला हादसा टल जाता। 1965 में गठित जे.एल. कपूर आयोग ने भी पुलिस की भूमिका पर कई तल्ख टिप्पणियां की थीं।

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29 तारीख को परचुरे ने अपने बड़े भाई कृष्णराव परचुरे को उस पिस्तौल के बारे में बताया जिससे गोडसे और आप्टे गांधीजी की हत्या करने वाले थे। दो लोग मेरे पास आए थे, जिनकी योजना दिल्ली में गांधीजी की हत्या करने की थी, और मैंने उनके लिए एक पिस्तौल का इंतजाम कर दिया था। उसका भाई यह सुन सदमे में आ गया। उसने परचुरे से कहा, इन करतूतों में तू ने ख़ुद को क्यों शामिल कर लिया है। 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

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