शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-3

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

 


19. सूफ़ी रहस्यवाद-3

19.5 आत्म-ज्ञान से मुक्ति

सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है। ईश्वर का वास मस्जिदों व मंदिरों में नहीं बल्कि मनुष्य के दिल में होता है और आत्मा ईश्वर का ही एक अंश है। हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. ने “कीमिया-ए-सादात” और अपनी शाहकार रचना 'इह्या उलूमुद्दीन' दोनों में कहा है, मानव हृदय एक सरोवर की तरह है। उन्होंने इस रूपक का उपयोग इंसान के दिल की रूहानी हालत और इल्म (ज्ञान) हासिल करने के तरीकों को समझाने के लिए किया है। वे फरमाते हैं कि हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां (देखना, सुनना, सूंघना, चखना और छूना) पांच नहरों की तरह हैं, जो बाहर से पानी (दुनियावी मालूमात और विचार) लाकर इस सरोवर में डालती हैं। सरोवर में पानी दो तरह से आ सकता है, या तो बाहर की नदियों से या फिर सरोवर के नीचे मौजूद किसी प्राकृतिक अदृश्य चश्मे (Spiritual Spring) से। लेकिन यदि इस सरोवर के तल से सोता को फूटना है तो पहले इसमें भरे पानी को उलीचना होगा। फिर इसमें जल भरने वाली नहरों को भी मूंद देना होगा, ताकि बाहर से आने वाला पानी रुक जाए। फिर इस सरोवर के तल की खुदाई करनी होगी जिससे स्वच्छ जल का सोता फूटे और सरोवर को भर दे। जब तक बाहरी पानी रहेगा इसका जल स्वच्छ हो ही नहीं सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक बाहर की नदियों से गंदा या मटमैला पानी (दुनियावी ख्वाहिशात और गुनाह) आता रहेगा, तो दिल का सरोवर गंदा रहेगा। यदि इंसान बाहरी इंद्रियों के इस पानी को कुछ समय के लिए रोक दे (यानी एकांत, ध्यान और ज़िक्र अपनाए) और दिल को साफ़ करे, तो दिल के नीचे छुपा हुआ ज्ञान का असली और पाक चश्मा उबल पड़ता है, जिससे इंसान को रूहानी ज्ञान (इल्हाम और मआरिफत) हासिल होता है। मतलब जब तक हृदय के अंतस्तल में आत्म-ज्ञान नहीं उपजेगा हम बाहरी ज्ञान (इंद्रिय-जनित ज्ञान) से मुक्ति नहीं पा सकते।

एक छोटी सी सूफ़ी कथा है।

हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी (रह.) नदी के किनारे इंतज़ार कर रहे थे। उन्हें दजला (Tigris) नदी के पार किसी स्थान पर जाना था। जब वे किनारे पहुंचे, तो नाव वहां मौजूद नहीं थी और वे किनारे पर खड़े होकर नाव का इंतज़ार करने लगे। हज़रत हबीब अजमी (रह.) नामक उनके शिष्य (मुरीद) आए और बोले, “उस्ताद! आप किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं?”

वे बोले, “नाव का।”

तो शिष्य बोले, “क्यों?”

वे बोले, “नदी पार करनी है।”

शिष्य ने कहा, “ इसमें क्या बड़ी बात है? अपने दिल से जलन, बैर और सांसारिकता निकाल फेंकें, अंतःकरण को पवित्र कर लें और ख़ुदा पर यक़ीन कर नंगे पांव चलें, आसानी से नदी पार कर लेंगे।”

संत ने सोचा, ‘मेरा चेला मुझे ही सीख दे रहा है।’ बोले, “तू कहीं पगला तो नहीं गया है?”

हबीब कुछ नहीं बोले, नदी में पांव रखे व चलते चले गए। यह देखकर हज़रत हसन बसरी हैरान रह गए और कुछ पल के लिए अचेत (बेहोश) हो गए। जब हज़रत हसन बसरी होश में आए और बाद में उनकी मुलाकात हबीब अजमी से हुई, तो उन्होंने पूछा, “हबीब! तुम्हें यह मकाम और यह रूहानी ताक़त कैसे हासिल हुई कि तुम पानी पर चल पड़े, जबकि मैं वहीं खड़ा रह गया? मुझसे से ही इल्म लेने वाले, आज तूने मुझे इल्म दे दिया। कैसे हुआ यह सब?”

हबीब अजमी ने बहुत ही विनम्रता और सच्चाई से जवाब दिया, “उस्ताद! इसका कारण यह है कि मैं अपने दिल को (अल्लाह की मोहब्बत में) पूरी तरह साफ़ और सफेद करने में लगा रहा, जबकि आप किताबी इल्म के ज़रिए कागज़ को काला करने (लिखने-पढ़ने) में मसरूफ रहे।” यह सुनकर हसन बसरी (रह.) ने फरमाया, “मेरा किताबी इल्म दूसरों के काम तो आया, लेकिन खुद मेरे अपने काम (उस ऊंचे रूहानी स्तर पर) नहीं आ सका।”

तसव्वुफ़ में इस कथा को बहुत अहम माना जाता है क्योंकि यह दो ज़रूरी चीज़ों के अंतर को समझाती है, ज़ाहिरी इल्म (बाहरी ज्ञान) और बातिनी इल्म (आंतरिक शुद्धता)। यह कहानी सिखाती है कि ईश्वर के यहाँ इंसान की डिग्रियां या बाहरी तौर-तरीके नहीं, बल्कि उसके दिल का अख़लास (सच्चाई) और तवक्कुल मायने रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हृदय के अंतस्तल में आत्म-ज्ञान नहीं उपजेगा हम बाहरी ज्ञान (इंद्रिय-जनित ज्ञान) से मुक्ति नहीं पा सकते। रहस्यवाद के अनुसार इबादत की हक़ीक़त को महत्व दिए बिना कर्मकांड व्यर्थ है। रहस्यवाद का पूरा दर्शन ही इस बात पर टिका है कि धर्म का केवल एक बाहरी ढांचा (शरीयत) नहीं होता, बल्कि एक आंतरिक आत्मा (तरीक़त और हक़ीक़त) भी होती है। यदि बाहरी कर्मकांडों में आंतरिक निष्ठा (इख़लास) और ईश्वर के प्रति प्रेम न हो, तो वे केवल शारीरिक कसरत बनकर रह जाते हैं। चूंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में ही निवास करता है इसलिए हमें अपना हृदय पवित्र रखना चाहिए। रहस्यवादी कहते हैं कि कर्मकांड (जैसे नमाज़, रोज़ा, या कोई भी पूजा) एक जिस्म (शारीरिक ढांचा) की तरह है, और इबादत की हक़ीक़त (ईश्वर का ध्यान और प्रेम) उसकी रूह (आत्मा) है। जिस तरह रूह के बिना जिस्म एक मुर्दा लाश है, उसी तरह बिना हक़ीक़त और दिल की मौजूदगी के की गई इबादत भी आध्यात्मिक रूप से मृत है। रहस्यवाद कर्मकांडों का विरोध नहीं करता, बल्कि उन्हें एक सीढ़ी मानता है। लेकिन अगर कोई सीढ़ी पर ही रुक जाए और मंज़िल (ईश्वर की मोहब्बत और हक़ीक़त) की तरफ न बढ़े, तो रहस्यवाद के अनुसार उसकी वह मेहनत बेकार चली जाती है।

जब हज़रत हसन रह. ने हज़रत आज़मी रह. से पूछा, “आप अपने वर्तमान आध्यात्मिक उपलब्धियों के शिखर पर कैसे पहुंचे?” तो हज़रत आज़मी ने जवाब दिया, “ध्यान में हृदय को शुद्ध और धवल बनाकर ... लिख-लिखकर, क़ाग़ज़ों को काला बनाकर नहीं।”

हज़रत हसन रह. को सद्गुरु बनने में बहुत समय लगा। वे बहुत से सद्गुरुओं के पास गए। वे उनके पास जाकर सत्य को खोज रहे थे। उनकी दिलचस्पी सत्य को जानने की अपेक्षा ज्ञान को बटोरने में अधिक थी। इसीलिए अंतिम सत्य को उपलब्ध होने में उन्हें अधिक समय लगा। आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए कहीं जाना नहीं होता। वह तो हृदय में है। इसलिए वापस आना होता है, अपने भीतर, अपने हृदय में।

19.6 अहंकार का नाश ज़रूरी

वह ख़जाना हृदय में होता है, लेकिन साधक मन और मस्तिष्क में होता है, यानी अहंकार का परदा पड़ा है बीच में। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। यह इस मार्ग की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। सूफ़ी संतों के अनुसार, इंसान और ईश्वर के बीच कोई सात आसमानों की दूरी नहीं है; बल्कि सबसे बड़ा पर्दा इंसान का अपना अहंकार (नफ़्स या 'मैं'-पन) है। जब तक यह 'मैं' जीवित है, तब तक इंसान 'तू' (ईश्वर) को नहीं पा सकता। सूफ़ियों का मानना है कि दिल एक बर्तन की तरह है, जब तक इसमें अहंकार भरा रहेगा, तब तक इसमें ईश्वर का प्रेम नहीं समा सकता। सूफ़ीमत स्पष्ट करता है कि जब तक इंसान अपनी विद्वता, धन, पद या अपनी धार्मिकता का घमंड (अहंकार) नहीं छोड़ता, वह ईश्वर के प्रेम का स्वाद नहीं चख सकता। ईश्वर को पाने के लिए खुद को 'शून्य' (मिटाना) करना ही पड़ता है।

19.7 चार स्थितियों से गुज़रना

हज़रत राबिया रह. से किसी ने पूछा, “सत्य और असत्य के बीच में कितना अंतर है?” हज़रत राबिया ने कहा, “चार इंच का।” उसने कहा, “मैं कुछ समझा नहीं।” हज़रत राबिया ने समझाया, “जितना अंतर कान और आंख के बीच है, उतना ही अंतर सत्य और असत्य के बीच है। वह सब जो तुम कान से सुनते हो ... वह असत्य है और जो अपनी आंख से देखते हो, वही सत्य है।”

किसी भी सुनी-सुनाई बात (कान) पर तब तक भरोसा न करें जब तक कि उसकी हकीकत और गवाही आपके सामने साफ़ (आँख) न हो जाए। सूफी परंपरा में हज़रत राबिया ने भी हमेशा इसी बात पर ज़ोर दिया कि इंसान को सुनी-सुनाई बातों या दुनिया के दिखावे से बचकर सीधे दिल की आँख (बातिन) से सत्य का अनुभव करना चाहिए।

सत्य हर किसी का अपना अनुभव है। यह एक व्यक्तिगत अनुभव है। सत्य एक दृष्टि है, एक अन्तर्दृष्टि है। उसे ख़ुद देखना और समझना होता है। उसे बाहर खोजने के बजाए अंदर खोजना है। उसके लिए कहीं जाना नहीं लौटकर आना है। बाहर की यात्रा रोक देना है, ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाना चाहिए, ताकि व्यक्ति वहां होने का अनुभव करे जहां उसे होना चाहिए। इसके लिए साधक को चार स्थितियों से गुज़रना होता है – शरीयत, तरीक़त, हक़ीक़त और मारिफ़त।

19.7 (क) पहली स्थिति (शरीयत) में साधक ख़ुदा की सत्ता से प्रभावित होता है। इस्लाम की सबसे बुनियादी मान्यता है कि अल्लाह एक है। मुख्यधारा के इस्लामी अक़ीदे (मान्यता) और सूफ़ीमत दोनों के अनुसार अल्लाह ने इस संसार की रचना "कुछ नहीं" से की है। दर्शन और धर्मशास्त्र की भाषा में इस अवधारणा को 'क्रिएशन एक्स निहिलो' (Creatio ex nihilo) या 'अदम से वजूद में लाना' कहा जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अल्लाह को सृष्टि बनाने के लिए पहले से मौजूद किसी पदार्थ (Matter), ऊर्जा (Energy) या परमाणु की आवश्यकता नहीं थी। उसने शून्य या परम शून्यता (Non-existence) से पूरे ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। पवित्र क़ुरआन में कई स्थानों पर स्पष्ट किया गया है कि जब अल्लाह किसी चीज़ को बनाने का इरादा करता है, तो वह किसी सामग्री का उपयोग नहीं करता, बल्कि केवल अपना शब्द या हुक्म देता है, “वह आकाशों और पृथ्वी का मौलिक आविष्कारक (Originator) है। जब वह किसी बात का निर्णय करता है, तो उसके लिए बस यही कहता है: 'हो जा' (कुन), और वह हो जाती है (फ़-यकून)।” — (सूरह अल-बक़रह, 2:117) सूफ़ी संतों और इस्लामी दार्शनिकों ने "कुछ नहीं" से रचना के इस नियम को और अधिक गहराई से समझाया है। इमाम अल-ग़ज़ाली (रह.) ने यूनानी दार्शनिकों के उस विचार का कड़ा खंडन किया जो कहते थे कि संसार हमेशा से (Eternal) मौजूद था। इमाम ग़ज़ाली ने तर्क दिया कि अल्लाह एक स्वतंत्र इच्छा रखने वाला मुतलक़ ख़ालिक़ (Absolute Creator) है, जिसने समय (Time) और अंतरिक्ष (Space) दोनों को शून्य से पैदा किया है। सूफ़ी दार्शनिक इब्न अरबी (रह.) के अनुसार, सृष्टि बनने से पहले सभी चीज़ें अल्लाह के इल्म (ज्ञान/विचार) में छिपी हुई थीं। वे केवल विचार के रूप में थीं, जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं था। जब अल्लाह ने "कुन" (हो जा) फ़रमाया, तो वे विचार के 'शून्य' से निकलकर भौतिक रूप में प्रकट हो गईं। यदि ईश्वर को संसार बनाने के लिए किसी कच्चे माल या पहले से मौजूद पदार्थ की ज़रूरत होती, तो वह पदार्थ भी ईश्वर की तरह ही अनादि (हमेशा से रहने वाला) मान लिया जाता। ईश्वर की सर्वोच्च संप्रभुता और पूर्ण सर्वशक्तिमानता को बनाए रखने के लिए यह बुनियादी नियम है कि अल्लाह ने सब कुछ शून्यता से केवल अपनी इच्छा और आवाज़ से रचा है।

क़ुरआन में कहा गया है, “ला इलाह इल्लल्लाह” यानी अल्लाह के सिवा दूसरा ईश्वर नहीं है। रहस्यवाद में “वहदतुल वुजूद” पर ज़ोर दिया गया है, अर्थात्‌ हक़ीक़ी वुजूद सिर्फ़ ख़ुदा है। दूसरा मत है “वहदतुल शुहूद” जो मानता है कि वुजूद चाहे क्षणिक और छायामात्र ही क्यों न हों लेकिन दूसरे वुजूद भी हैं और ये तब भी होते हैं जबकि रूहानी आंख से दर्शन केवल एक हक़ीक़ी वुजूद का ही हो रहा हो।

अल्लाह के अलावा किसी अन्य स्रष्टा-शक्ति की कल्पना ही नहीं की गई है। और तुम्हारा पूज्य एक ही पूज्य है, उस अत्यंत दयालु, दयावान के सिवा कोई पूज्य नहीं। - अर्थात जो अपने अस्तित्व तथा नामों और गुणों तथा कर्मों में अकेला है। कुरआन -2:163  वह तो “ला इब्तिदा ला इंतिहा” है। न उसका कोई आदि है, न अंत ही। यह इस्लामी अक़ीदे (मान्यता) और सूफ़ीमत का एक बुनियादी स्तंभ है। पवित्र क़ुरआन के सूरह अल-हदीद (57:3) में अल्लाह के इन पवित्र नामों का वर्णन है, जो सीधे "ला इब्तिदा ला इंतिहा" को परिभाषित करते हैं। "वहुवल अव्वलु वल आख़िरु...""वही अव्वल (सबसे पहला) है और वही आख़िर (सबसे अंत तक रहने वाला) है..." इसी तरह सूरह इख़लास (112:3) में कहा गया है: "न वह किसी का जना है, न वह किसी से जना गया है।" यानी उसकी न कोई शुरुआत है, न वंश।

ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) और बातिन (अप्रत्यक्ष) दोनों जगत का वही स्वामी है। वही सर्जक है, वही पालक है, वही संचालक है। “वहदतुल वज़ूद ख़ालिकुस्समावाते फ़िल अर्दे” – सारा जड़-चेतन जगत उसी से उपजा है, सब में उसी के नूर का ज़हूर है। एक तरफ़ तो वह इतना विराट है कि वही सारी कायनात में है, दूसरी तरफ़ वह इतना सूक्ष्म है कि वह व्यक्ति की आत्मा में समा जाता है। रूह में बस जाता है। क़ुरआन शरीफ़ में इबादत दर्ज़ है –

सब्बहा लिल्लाहि मा फ़िस्समावाति वल अर्ज़ि व हुवल अज़ीज़ुल हकीम. 
लहु मुल्कुस्समावाति वल अर्ज़ि युहयी व युमीत व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर.
 
हुवल अव्वलु वल आखि़रू वज़्ज़ाहिरू वल बातिनु व हुवा बिकुल्लि शैइन अलीम.
-अलक़ुरआन 57
, 1-3

अल्लाह की तसबीह की हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है। वही प्रभुत्वशाली, तत्वशाली है, आकाशों और धरती की बादशाही उसी की है। वही जीवन प्रदान करता है और मृत्यु देता है, और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है, वही आदि है और अन्त भी और वही व्यक्त है और अव्यक्त भी। और वह हर चीज़ को जानता है।

सूफ़ियों के अनुसार, रूह कोई आम भौतिक चीज़ नहीं है, बल्कि यह सीधे परमात्मा (अल्लाह) की अमर सत्ता से जुड़ी हुई है। पवित्र क़ुरआन के सूरह अल-हिज्र (15:29) में अल्लाह फ़रमाता है कि जब उसने हज़रत आदम (यानी इंसान) के मिट्टी के पुतले को तैयार किया, तो, "फिर जब मैं उसे पूरा बना लूँ (आकार दे दूँ) और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँक दूँ, तो तुम सब उसके आगे सजदे में गिर जाना।" यह आयत मानव इतिहास, तसव्वुफ़ (रहस्यवाद) और इस्लामी ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि यह इंसान की रचना और उसके भीतर मौजूद रूहानी तत्व की असलियत को बयां करती है। सूफ़ियों के अनुसार, इंसान दो चीज़ों का मिश्रण है, एक उसका शरीर जो ज़मीन (मिट्टी) से आया है और नीचे की तरफ (दुनियावी इच्छाओं की तरफ) खींचता है, और दूसरा उसकी रूह जो सीधे अल्लाह के 'अम्र' (Divine Command) से आई है और वापस ऊपर (ईश्वर की तरफ) जाना चाहती है। चूंकि अल्लाह "ला इब्तिदा ला इंतिहा" (अनादि और अनंत) है, इसलिए जो रूह उसने इंसान के भीतर फूँकी है, वह भी मूल रूप से अमर है। शरीर तो मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन रूह कभी नहीं मरती, वह अपने स्रोत (अल्लाह) की तरफ लौट जाती है। मशहूर सूफ़ी दार्शनिक इब्न अरबी (रह.) और मौलाना रूमी (रह.) ने समझाया है कि अल्लाह अपनी 'ला इब्तिदा ला इंतिहा' सिफ़ात (गुणों) को देखना चाहता था, इसलिए उसने इंसान को बनाया। इंसान का दिल एक आईने (दर्पण) की तरह है। जब इंसान इबादत, ज़िक्र और प्रेम के ज़रिए अपने दिल के आईने से दुनियावी गंदगी को साफ़ कर लेता है, तो उस आईने में अल्लाह का नूर (Spiritual Light) चमकने लगता है।

क़ुरआन (11:26) के अनुसार इबादत (वंदना) केवल अल्लाह ही की करो। सूफ़ी संत इस आयत के गहरे अर्थ को समझाते हुए कहते हैं कि "अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करना" केवल मूर्तियों के आगे न झुकना नहीं है। यदि इंसान का दिल अल्लाह को छोड़कर अपने अहंकार, धन, पद या दुनियावी ख्वाहिशों के पीछे भागता है, तो वह भी एक तरह का 'बातिनी शिर्क' (आंतरिक भटकाव) है। दिल को हर उस चीज़ की गुलामी से आज़ाद रखना जो इंसान को अल्लाह से दूर करती है, वही इस आयत की असली रूह है। यह सृष्टि, आकाश, धरती, चर-अचर सब उसी की मिल्कियत है। वही जिलाता है, वही मारता है, न उसके पहले कोई था, न उसके बाद कोई है। वो अज़ीम (महान) है। अल्लाह एक वुजूद है और सारी कायनात उसी वुजूद की छाया और अक्स  है। तभी आत्मा के अंदर उपस्थित अल्लाह पुकार उठता है -“इन्नी अनल्लाह ला इलाहा इल्ला अना” – मेरे सिवा कोई दूसरा अल्लाह नहीं। यह पवित्र क़ुरआन के सूरह ता-हा (सूरह संख्या 20), आयत 14 का एक हिस्सा है। तसव्वुफ़ (रहस्यवाद) में इस घटना और आयत को बहुत गहरा माना जाता है। जहाँ पूरी दुनिया में इबादत इशारों या किताबों के ज़रिए समझाई जाती है, वहीं तूर पर्वत पर अल्लाह ने सीधे शब्दों में 'अना' (मैं) कहकर अपने वजूद का परिचय दिया। सूफ़ी कहते हैं कि ब्रह्मांड में केवल अल्लाह को ही यह हक़ है कि वह खुद को "अना" (मैं) कहे। जब इंसान अल्लाह की इस 'अना' (परम सत्ता) के सामने झुकता है, तो उसका अपना झूठा अहंकार (नफ़्स) पूरी तरह मिट जाता है।

क़ुरआन (41:37) में भी कहा गया है सच्चा वंदनीय (पूज्य) अल्लाह के सिवा कोई नहीं है। यह सूर्य, चन्द्रमा और अन्य आकाशीय ग्रहें अल्लाह के बनाये हुये हैं। और उसी के अधीन हैं। इस लिये इन को सजदा करना व्यर्थ है। और जो ऐसा करता है वह अल्लाह के साथ उस की बनाई हुई चीज़ को उस का साझी बनाता है जो शिर्क और अक्षम्य पाप तथा अन्याय है। सजदा करना इबादत है। जो अल्लाह ही के लिये विशेष है। इसी लिये कहा है कि यदि अल्लाह ही की इबादत करते हो तो सजदा भी उसी के लिये करो। उस के सिवा कोई ऐसा नहीं जिसे सजदा करना उचित हो। क्यों कि सब अल्लाह के बनाये हुये हैं सूर्य हो या कोई मनुष्य। सजदा आदर के लिये हो या इबादत (वंदना) के लिये। अल्लाह के सिवा किसी को भी सजदा करना अवैध तथा शिर्क है जिसका परिणाम सदैव के लिये नरक है। कलिमा तय्यिबा (पवित्र शब्द) - से अभिप्राय "ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" है। जो इस्लाम का धर्म सूत्र है। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। सूफी संत कहते हैं कि जब इंसान सच्चे दिल से कहता है कि "अल्लाह के सिवा कोई पूजनीय नहीं", तो वह दुनिया के किसी राजा, धन-दौलत, डर या लालच के आगे झुकना बंद कर देता है। उसका दिल पूरी तरह से आज़ाद हो जाता है।

19.7 (ख) दूसरी स्थिति तरीक़त  की स्थिति में साधक उस ज्ञान को प्राप्त कर अपने कर्तव्य का निर्धारण करता है। यह ईश्वरीय ज्ञान की जिज्ञासा है, इसे इंद्रियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहां बुद्धि या तर्क से काम नहीं चलता। इसके लिए पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए। सब मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं। अतः किसी भी मनुष्य से घृणा नहीं, सबसे प्रेम करना चाहिए। क्योंकि प्रेम से ही ईश्वर को पाया जा सकता है। कहा भी गया है, “क़ल्बुल इन्साने बैतुल रहमाने” यानी इंसान का दिल ख़ुदा का घर है। इसी बात को सूफी और इस्लामिक परंपराओं में “क़ल्बुल मोमिने बैतुल्लाह” (मोमिन का दिल अल्लाह का घर है) के रूप में भी कहा जाता है। सूफी रहस्यवाद (तसव्वुफ़) में यह एक अत्यंत प्रसिद्ध और गहरा रूहानी कथन (महान सूफियों का वचन) है, जो इंसान के भीतर छिपे आध्यात्मिक मकाम को बयां करता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि ईश्वर भौतिक रूप से इंसान के दिल के भीतर रहता है (क्योंकि ईश्वर स्थान और आकार से परे है)। बल्कि इसका अर्थ यह है कि इंसान का पवित्र हृदय वह स्थान है जहाँ अल्लाह की रहमत, उसका नूर (Spiritual Light), मआरिफ़त (ईश्वरीय ज्ञान) और उसका ज़िक्र (स्मरण) उतरता है।

सूफ़ीमत “वहदतुल वजूद” यानी सर्वव्यापी ईश्वर में विश्वास रखता है। उसका सबसे प्रिय आवास मनुष्य का हृदय है। इसलिए सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर आराधना की सबसे पहली कड़ी है कि किसी का दिल न दुखाया जाए। सूफ़ी संत हज़रत नज़ीरी रह. ने कहा है,

ज़ ख़ुद हरगिज़ नै आराज़म दिली रा,

कि मी तरसम दरे ऊ जाए तू बाशद।

अर्थात्‌ मैं किसी के दिल को कष्ट नहीं देता क्योंकि मैं जानता हूं कि वहां तू रहता है। “बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो बुल्लेशाह है कहता, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, जिस दिल में दिलवर रहता।”

हज़रत हाफ़िज ने भी कहा है,

मबाश दर पै आज़ार व हर चे ख़्वाही कुन,

कि दर, शरीयते माग़ीर अज ईन गुनाही नीस्त।

तू जो करना चाहे कर, बस दूसरों को कष्ट न दे क्योंकि इससे बढ़कर और कोई पाप नहीं है। ऐसा हमारे आचार-शास्त्र में कहा गया है।

19.7 (ग) तीसरी स्थिति हक़ीक़त की स्थिति में वह परमात्मा की शक्ति और उसके विराट रूप को जान लेता है। अब वह बेखुदी के आलम में दाखिल होता है। उसकी आत्मा पर “उसके” नूर की बारिश होती है। उसे इरफ़ान (आत्म-ज्ञान) होता है। इस प्रकार उसकी रूह (आत्मा) ज़मानी और मकानी (दिक्‌काल) की हद से ऊपर उठकर लामकां (बिना देश का) की स्थिति में आ जाता है। वह आध्यात्मिक प्रेम की मदिरा में डूब जाता है। इस तरह इश्क़े हक़ीक़ी की अवस्था में उसे प्रियतम का प्रतिबिंब हर शै में नज़र आता है।

19.7 (घ) चौथी स्थिति मारिफ़त  की स्थिति में वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। साधक के आगे से सारे परदे उठ जाते हैं। ईश्वर की दिव्य ज्योति (दीदार-ए-इलाही) की उसे अनुभूति होती है। कुछ भी शेष नहीं रह जाता, जिसे “फ़नाफ़िल्लाह” कहते है। इस तरह फ़नाफ़िश्शेख (पीर या गुरु की शरण में जाने) से शुरू हुई यात्रा फ़नाफ़िर्रसूल के रास्ते फ़नाफ़िल्लाह तक पहुंचती है।  ईश्वर में लय हो जाने के इस मकामे लाहूती को सूफ़ी चिंतन की चरम स्थिति कहा जा सकता है। यह अनुभूति व्यक्ति की अपनी निजी आध्यात्मिक अनुभूति होती है। इसीलिए कहा गया है कि इस्लामी रहस्यवाद का संबंध अहले हाल यानी दृश्य से है, अहले क़ाल यानी प्रवचन से नहीं। सूफ़ी साधक व्यक्तिगत साधना पर ज़ोर देते थे। उनकी नज़र में परमात्मा और साधक का संबंध व्यक्तिगत और पारस्परिक है। “हाल” की स्थिति से ही सूफ़ी साधक ईश्वरीय-सौंदर्य का आनंद उठाना शुरू कर देते हैं। वह तो उसके नैसर्गिक सौंदर्य में मगन रहता है। सभी जगह वह अपने आराध्य की छवि ही पाता है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर