रविवार, 13 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-23

                                 महात्मा गांधी हत्या केस-23

14 जनवरी, 1948

14 जनवरी को सारे देश में मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जा रहा था। प्रेमा कंटक ने गांधीजी के लिए तिल-गुड़ भेजा। बिड़ला भवन के लोगों में इसे बांटा गया। गांधीजी सुबह जल्दी उठ गए। आठ बजे पत्रों के टेबुल पर बैठ कर पत्रों का निपटारा किया। 'हरिजन' के लिए लेख लिखवाए। नौ बजे स्नान किया। 

बिड़ला भवन के मैदान में, गांधीजी की उपवास-शय्या के आसपास नेहरूजी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई, जिसमें गांधीजी के मुद्दों पर त्वरित कार्यवाही का निर्णय किया गया था। गांधीजी के इस व्रत का पहला असर यह हुआ कि संघीय मंत्रिमंडल ने अपना फैसला उलट दिया और पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपए देने का निर्णय लिया गया। हालांकि गांधीजी ने अपने उपवास को तोड़ने की शर्तों में कभी भी इस बात का उल्लेख नहीं किया था, फिर भी इन सब घटनाक्रम से कुछ हिंदू यही समझ रहे थे कि गांधीजी मुसलमानों के पक्षपाती हैं। वे सोच रहे थे कि बुड्ढा निपट जाए तो आफत टले। गांधीजी ने गर्म पानी के कुछ घूँट लिए और आराम किया।

जब कुछ मौलाना उनसे मिलने आए, तो गांधीजी ने उनका स्वागत इन शब्दों के साथ किया: "क्या अब आप संतुष्ट हैं?" फिर, उस व्यक्ति की ओर मुड़कर जिसने कुछ दिन पहले उनसे कहा था कि उन्हें भारत सरकार से कहकर इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम करवाना चाहिए, गांधीजी ने कहा: "तब मेरे पास आपको देने के लिए कोई जवाब नहीं था। अब मैं आपका सामना कर सकता हूँ। क्या मैं सरकार से आपके इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम करने के लिए कहूँ? मैं उनसे कहूँगा: ये वे मुसलमान हैं जो वफ़ादार नहीं हैं और भारत छोड़कर जाना चाहते हैं। उन्हें वह सुविधा दी जाए जो वे चाहते हैं।" मौलाना ने कहा कि अगर उनकी बातों से उन्हें दुख पहुँचा है, तो उन्हें अफ़सोस है। गांधीजी ने जवाब दिया: "यह तो बिल्कुल उस अंग्रेज़ की तरह है जो आपको लात भी मारता है और साथ ही कहता भी रहता है कि 'मुझे माफ़ कीजिए'। क्या आपको इंग्लैंड भेजे जाने की मांग करते हुए शर्म नहीं आती? और फिर आपने कहा कि ब्रिटिश राज की गुलामी, भारत संघ की आज़ादी से बेहतर थी। देशभक्त और राष्ट्रवादी होने का दावा करने वाले आप लोग ऐसी बातें कहने की हिम्मत कैसे करते हैं?"

शरणार्थियों का एक समूह रात के समय बिड़ला भवन के समक्ष इकट्ठा हुआ और नारा लगाने लगा, ‘ख़ून का बदला ख़ून से’, ‘हम बदला चाहते हैं’, ‘गांधी को मरने दो’गाँधीजी अविचलित थे। वह रामनाम जपने लगे। उसी समय नेहरूजी वहां से जाने के लिए मोटर से निकल रहे थे। गुस्से में वह अपनी गाड़ी से उतरे और बोले, कौन कह रहा है कि गांधी को मरने दो? वह मेरे सामने आए। गांधी के मरने के पहले मुझे मार डालना पड़ेगा। उत्पाती वहां से भाग गए। गांधीजी की किडनी में कुछ समस्या आ रही थी और उनके पेट में दर्द भी हो रहा था। उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना था की सेहत का ध्यान कर गांधीजी को उपवास तोड़ देना चाहिए। गांधीजी ने कहा, केवल ईश्वर ही निर्णय ले सकता है की उपवास कब समाप्त होगा।

इस उपवास के दौरान गांधीजी नहीं चाहते थे कि डॉक्टर उनकी जांच करें। उन्होंने डॉक्टरों से कहा, "मैंने खुद को ईश्वर पर छोड़ दिया है।" लेकिन बॉम्बे के हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. गिल्डर ने कहा कि डॉक्टर रोज़ाना हेल्थ बुलेटिन जारी करना चाहते हैं और बिना जांच किए वे सही जानकारी नहीं दे पाएंगे। इस बात ने महात्मा को मना लिया और वे मान गए।

डॉक्टर सुशीला नायर गांधीजी का ख्याल रख रही थीं। उन्होंने कितना पानी पीया और कितना मूत्र का उत्सर्जन हुआ, यह रेकॉर्ड रखा जा रहा था। उनका वज़न 107 पाउंड और ब्लड प्रेशर 98/100 था। उस दिन उन्होंने 68 औंस पानी पिया और 28 औंस पेशाब किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके शरीर में पानी जमा हो रहा था। वह पानी नहीं पी पा रहे थे; इससे उन्हें मतली (जी मिचलाना) महसूस होती थी। मतली से बचने के लिए पानी में नींबू या संतरे जैसे खट्टे फलों का रस या शहद की कुछ बूंदें मिलाने से उन्होंने मना कर दिया। उनकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही थीं। उनकी काफी ताकत खत्म हो गई थी; उनका वज़न हर दिन दो पाउंड कम हो रहा था। शाम को डॉक्टरों ने मेडिकल बुलेटिन जारी किया: उनका वज़न स्वाभाविक रूप से कम हो रहा है। कमज़ोरी बढ़ गई है। आवाज़ कमज़ोर है। पेशाब में एसीटोन बॉडीज़ पाई गई हैं।उपवास ख़तरे के दायरे में पहुँच चुका था।

डॉक्टरों ने गांधीजी को प्रार्थना सभा में न जाने की सलाह दी, इसलिए उन्होंने सभा में पढ़कर सुनाए जाने के लिए एक संदेश लिखवाया। लेकिन बाद में उन्होंने सभा में शामिल होने का फ़ैसला किया और भजन-कीर्तन व धार्मिक ग्रंथों के पाठ के बाद लोगों को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि उन्हें बहुत सारे संदेश मिल रहे थे। सबसे सुखद संदेश लाहौर, पाकिस्तान से मृदुला साराभाई का था। पाकिस्तान से मृदुला साराभाई, जो वहां भगाई हुई स्त्रियों को बचाने और वापस लाने के पवित्र काम में लगी थीं, तार भेजकर बताया कि उनके मुस्लिम दोस्त - जिनमें मुस्लिम लीग और पाकिस्तान सरकार के कुछ लोग भी शामिल थे - उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे और जानना चाहते थे कि उन्हें क्या करना चाहिए। गांधीजी का जवाब था: उपवास आत्म-शुद्धि की एक प्रक्रिया है और इसका मकसद उन सभी लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए आमंत्रित करना है जो उपवास के मकसद से सहमत हैं... मान लीजिए कि भारत के दोनों हिस्सों में आत्म-शुद्धि की लहर दौड़ जाए। तो पाकिस्तान 'पाक' यानी पवित्र हो जाएगा... ऐसा पाकिस्तान कभी खत्म नहीं हो सकता। तब, और केवल तभी, मुझे इस बात का पछतावा होगा कि मैंने कभी बंटवारे को पाप कहा था—जैसा कि मुझे डर है कि आज भी मुझे यही मानना ​​पड़ रहा है...

उपवास से पाकिस्तान में नई विचारधारा शुरू हुई। पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब की विधान सभा में कहा गया, संसार के किसी देश ने महात्मा गांधी से बड़ा आदमी पैदा नहीं किया। भारत में कम से कम एक आदमी तो ऐसा है, जो हिन्दू-मुसलिम एकता के लिए अपनी जान तक क़ुर्बान करने को तैयार है। ... मैं इस सदन के प्रांगण से महात्मा गांधीजी को यह विश्वास दिलाता हूं कि अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए उनकी जो भावनाएं हैं उनमें हम पूरी तरह उनके साथ हैं। भारत के लोगों को भी इसने झकझोर दिया। जिस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने प्राणों की बाजी लगा दी थी, उस पर नये सिरे से सोचने के लिए लोग बाध्य हुए। सारी दुनिया से संदेशों की, प्रार्थनाओं की और शुभकामनाओं की झड़ी-सी लग गई थी।

माउंटबेटन का प्रेस अटैची दिल्ली में था। पत्रकार होने के नाते उसने जनता की प्रतिक्रिया को बहुत ही क़रीब से देखा था। उसने अपनी डायरी में लिखा था, आपको गांधीजी के व्रत की आकर्षण शक्ति को समझने के लिए उनके आसपास रहना होगा। गांधीजी का पूरा जीवन जनता को प्रभावित करने की एक कला का एक रोमांचक अध्ययन है, और इस रहस्यमय क्षेत्र में उन्होंने जो सफलता पाई है उसके आधार पर देखें तो वे नेतृत्व के क्षेत्र में आज तक के महानतम कलाकारों में एक कहे जाएंगे। उनमें ऐसे प्रतीकों के माध्यम से कर्म करने की प्रतिभा है, जिनको सभी समझ सकते हैं।

नेतृत्व के क्षेत्र में महानतम कलाकारों में शामिल उस कलाकार को आज तक के महानतम प्रतीक (आमरण अनशन) के माध्यम से अपना कर्म करना पडा कि दिल्ली में व्याप्त पागलपन की आग को बुझाया जा सके जो पूरे देश को निगल लेने की क्षमता रखती थी।

हत्या की साज़िश

पूना में नाथूराम ने 3,000 रुपए के अपने जीवन बीमा की दूसरी पौलिसी को  अपने छोटे भाई गोपाल गोडसे की पत्नी सिन्धुताई के पक्ष में नामांकन बदला। आप्टे ने साक्षी के नाते हस्ताक्षर किया। दोपहर बाद 4.30 बजे आप्टे और गोडसे डेक्कन एक्सप्रेस से बंबई के लिए रवाना हुए। वे एक खाली सेकंड-क्लास डिब्बे में सफर कर रहे थे। उन्हें आमने-सामने खिड़की वाली सीटें मिल गई थीं।

उसी ट्रेन से बड़गे साधु के वेश में अपने नौकर शंकर किष्टैय्या के साथ भीड़-भाड़ वाले तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहा था। चालीसगांव के अपने पैतृक निवास की बिक्री करने के बाद बड़गे पूना लौटा और 14 की शाम को शंकर के साथ पलीते, हथगोले, प्राइमर और फ़्यूज़ लेकर बंबई के लिए निकला था। शंकर के पास खाकी कपड़े का एक कंधे पर लटकाने वाला बैग था, जिसमें पाँच हैंड ग्रेनेड, गन-कॉटन की दो स्लैब, छह डेटोनेटर और काले फ़्यूज़ की एक कुंडली थी। ये चीज़ें बडगे ने बॉम्बे में आप्टे और गोडसे को पहुँचाने का वादा किया था। बडगे को अंदाज़ा था कि पुलिस उसकी गतिविधियों पर बहुत ज़्यादा नज़र रख रही है, इसलिए वह बहुत सावधानी बरत रहा था। उसने यह सुनिश्चित कर लिया था कि अगर तलाशी ली गई, तो सामान के साथ शंकर पकड़ा जाएगा। उसने भेष भी बदल लिया था। पिछले कुछ हफ़्तों से उसने अपनी दाढ़ी बढ़ा रखी थी और उस दिन उसने केसरिया धोती और घुटनों तक लंबा केसरिया चोगा पहन रखा था। उसने गले में सूखे बेरों की मालाएँ पहनी थीं और माथे पर लकड़ी की राख का लेप लगाया था।

उसी ट्रेन के एक अन्य डब्बे में बैठा आप्टे ने ऊपर देखा और पाया कि एक बहुत सुंदर महिला कॉरिडोर में आ-जा रही थी और साफ़ तौर पर खिड़की वाली सीट ढूंढ रही थी। वह शांता भास्कर मोदक नाम की एक सिने तारिका थी। उसे बिम्बा भी कहा जाता था। वह पूना में रहती थी और उस ट्रेन के द्वितीय श्रेणी से बंबई जा रही थी। उसे खिड़की वाली सीट चाहिए थी। नाथूराम ने अपनी सीट छोड़ कर उसे दे दी। आप्टे सामने वाली खिड़की वाली सीट पर बैठा था। नाथूराम आप्टे की बगल में आकर बैठ गया।

जैसे ही ट्रेन चली, आप्टे ने उस महिला से पूछा कि क्या वह मशहूर फ़िल्मी एक्ट्रेस बिम्बा हैं। उसने कहा कि सच में उसका स्क्रीन नाम यही था। रास्ते भर आप्टे उससे बात करता रहा। उसने बिम्बा को बताया कि वह दादर में उतरेगा और वहां से शिवाजी पार्क जाएगा। उसने बिम्बा को उसके गंतव्य तक छोड़ देने की पेशकश भी की। बिम्बा ने बताया कि उसे लेने उसका भाई दादर आएगा। उलटे उसी ने आप्टे और गोडसे को लिफ़्ट देने की बात कही। जब बिम्बा को यह मालूम हुआ कि वे सावरकर सदन जा रहे हैं, तो उसने कहा कि उसका घर तो वहीं पर है। आप्टे और गोडसे असल में हिंदू महासभा के ऑफ़िस जा रहे थे, जो वीर सावरकर के घर से लगभग आधा मील दूर था, लेकिन आप्टे ने बिम्बा की पेशकश तुरंत मान ली।

शंकर किष्टैय्या, जो बड़े शहर की यात्रा को लेकर बहुत उत्साहित था, तब बहुत निराश हुआ जब बडगे ने उसे बताया कि वे दादर में उतर रहे हैं। उसने पूछा, 'क्यों?' बडगे बोला, 'क्योंकि यहीं पर हमें 'माल' पहुँचाना है।' ऐसा लगता है कि उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आप्टे और नाथूराम ने भी उसी ट्रेन से यात्रा की थी, और न ही दादर के प्लेटफ़ॉर्म पर उनकी उनसे कोई मुलाक़ात हुई। एक साधु-संत की तरह, बडगे ने हिंदू महासभा के ऑफ़िस तक पैदल जाने का फ़ैसला किया। दादर स्टेशन पर बड़गे और शंकर उतर कर सीधे हिन्दू महासभा के दफ़्तर पहुंच गए।

आप्टे और गोडसे बिम्बा की कार से सावरकर सदन के लिए निकले। बिम्बा ने उन्हें सावरकर के घर के सामने छोड़ दिया, लेकिन यह नहीं देखा कि वे अंदर गए या नहीं। महिलाओं को लुभाने वाले अपने घमंड के कारण, आप्टे न केवल अपने ख़िलाफ़ सबूत बना रहा था, बल्कि सावरकर के चारों ओर भी शिकंजा कस रहा था, जिन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि वे क्या करने की योजना बना रहे थे।

जब बड़गे और शंकर दादर स्थित सभा के दफ़्तर पहुंचे तो न तो आप्टे था और न ही गोडसे। बिम्बा की कार में घूमने की वजह से आप्टे-गोडसे हिंदू महासभा के उस ऑफ़िस से दूर चले गए थे जहाँ उन्होंने बडगे को मिलने के लिए कहा था, और वहाँ पहुँचते-पहुँचते 8:30 से ज़्यादा समय हो चुका था। हिन्दू महासभा का ऑफ़िस तीन मंज़िला इमारत में था। मुख्य हॉल पहली मंज़िल पर था, जहाँ सदस्य आकर बैठते थे, अख़बार पढ़ते थे और बातचीत करते थे (और, जैसा कि आगे पता चलेगा, कभी-कभी फ़र्श पर लेटकर रात भी बिताते थे)। वहाँ तक जाने के लिए एक सीढ़ी थी जो इमारत की सभी मंज़िलों के लिए एक ही थी।

आप्टे अपनी आदत के मुताबिक, बडगे और शंकर के साथ जुड़ने के बाद भी एक मशहूर फ़िल्म एक्ट्रेस से हुई अपनी अचानक मुलाक़ात के बारे में बातें करता रहा, जिसका नतीजा यह हुआ कि बडगे को भी उस मुलाक़ात के बारे में पता चल गया। आप्टे ने बडगे से किसी सुरक्षित जगह पर इन सामानों को रखने के लिए चलने को कहा। चारों शिवाजी पार्क स्थित सावरकर के घर पहुंचे। आप्टे ने बड़गे से सामानों का बैग लिया और उन्हें बाहर प्रतीक्षा करने के लिए कहा। बडगे और शंकर बाहर में प्रतीक्षा करते रहे और आप्टे गोडसे अस्त्र-शस्त्र के थैले के साथ अंदर गए और दस मिनट में बाहर आ गए। आप्टे के हाथ में अस्त्र-शस्त्र का बैग अभी भी था। वे फिर हिन्दू महासभा के दफ़्तर वापस आ गए।

बैग को किसी सुरक्षित जगह पर रखने के लिए एक कार लिया गया। वहां से वे भुलेश्वर स्थित दीक्षित महाराज के घर के घर के लिए चल पड़े। आप्टे और गोडसे को आशा थी कि इस अंतिम काम के लिए उन्हें महाराज से पैसा मिलेगा। दीक्षित बड़गे को भी जानता था और उसे बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने का ऑर्डर दे चुका था। रात के 10.30 बजे वे दीक्षित महाराज के घर में प्रवेश किए। दीक्षित महाराज सो रहा था। उसके नौकर को सामानों का बैग दिया गया और उससे कहा कि किसी सुरक्षित जगह उसे रख दिया जाए। सुबह में वे उसे लेने आएंगे। वहां से फिर वे हिन्दू महासभा के दफ़्तर आ गए। गोडसे ने बड़गे को 50 रुपए दिया और वहीं ठहरने के लिए कहा। यह भी कहा कि कल सुबह फिर मिलेंगे, रात में यहीं कहीं सो जाना। आप्टे और गोडसे मरीन ड्राइव के सी गार्डेन होटल में ठहरे।

जब बड़गे और शंकर मुख्य हॉल में गए, जहाँ ज़्यादातर बत्तियाँ बुझा दी गई थीं, तो उन्होंने देखा कि तीन-चार और लोग फ़र्श पर सो रहे थे। उनमें से एक आदमी उठकर बैठा और बोला, "बडगे, कब आए?" बडगे का इतना बढ़िया भेष बदलने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उसने पूछने वाले को गुस्से से देखा और अकड़कर कहा कि उसे ग़लतफ़हमी हो रही है, लेकिन कुछ ही सेकंड बाद उसने उसे मदनलाल पाहवा के तौर पर पहचान लिया, जिसे करकरे कुछ दिन पहले ही उसकी दुकान पर लाया था। अपनी पहचान पक्की करने के बाद, उन्होंने दोस्ताना बातचीत की और मदनलाल, जिसके पास काफ़ी बिस्तर मौजूद था, ने बाकी दोनों को सोने के लिए एक कंबल और एक चादर दे दी। बड़गे ने मदनलाल से करकरे के बारे में पूछा। पाहवा ने बताया कि करकरे सेठ अपने एक रिश्तेदार से मिलने ठाने गया है, रात को या कल सुबह लौटेगा। इस तरह मिशन को पूरा करने के लिए दिल्ली जाते समय, टीम के सभी सदस्य बॉम्बे में इकट्ठा हुए, जहाँ हिंदू महासभा का ऑफ़िस उनका आम मिलन-स्थल बना।

पाहवा इस बीच डॉ. जैन से मिलने गया और उसे अपने और अपने दल की अहमदनगर की गतिविधियों की जानकारी दी। उसने बताया कि करकरे सेठ के कहने पर कैसे उसने एक कांग्रेसी नेता रावसाहब पटवर्धन की अहमदनगर की रैली को तहस-नहस कर दिया। पटवर्धन हिन्दू-मुस्लिम एकता पर भाषण दे रहा था। पुलिस को भी हिन्दुओं से हमदर्दी थी, इसलिए उन्होंने उसका कुछ नहीं किया, सिर्फ़ उसका खंजर ले लिया। मदनलाल ने यह भी बताया कि अहमदनगर में उन्होंने एक हिन्दू कमांडो ग्रुप बनाया है। हम हिन्दुओं की रक्षा करते हैं। इसके लिए हम अस्त्र-शस्त्र इकट्ठा करते हैं।

पाहवा जैन से पैसे माँगने लगा। जैन ने कहा, ‘अभी तो पैसे दिये थे। अब फिर पैसे कि लिए चाहिए?” पाहवा ने कहा, 'मुझे दिल्ली जाना है' दिल्ली क्यों जाना है? इस प्रश्न का उत्तर वह टाल रहा था। उसकी टालमटोल देखकर जैन उसे शिवाजी पार्क के समुद्र-किनारे ले गये। खिर उसने बताया कि एक नेता की त्या करने जा रहा हूँ वह नेता का नाम बताने से इनकार करता रहा तब जैन कुछ नेताओं के नाम लेकर पूछते गये। पाहवा र बार इनकार करता रहा। आखिर जैन ने गांधीजी का नाम लिया। तब पाहवा ने कबूल किया कि गांधी-त्या की योजना बनी है

उसने बताया करकरे सेठ मुझे सावरकर से मिलवाने ले गए थे। मेरी गतिविधियों को सुनकर सावरकर ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा ऐसे ही मन लगाकर काम करते रहो। अपनी हेंकड़ी दिखाते हुए पाहवा ने बताया कि दिल्ली मिशन का वह एक अहम सदस्य है और दिल्ली जा रहा है। ज़ोर देकर पूछे जाने पर पाहवा ने बताया कि एक बडे नेता की हत्या की योजना बनी है, और उसके लिए बम और शस्त्र ख़रीद लिए गए हैं। उसने यह भी बताया कि करकरे सेठ ही इस योजना को फिनान्स कर रहे हैं। और भी खुलते हुए उसने कहा कि गांधीजी की प्रार्थना सभा में बम फोड़ने का काम उसे दिया गया है, ताकि इससे लोगों का ध्यान भटके। इस अफरा-तफरी में दल के अन्य सदस्य गांधीजी का काम तमाम कर देंगे। डॉ. जैन ने सोचा कि युवक केवल आक्रोश से उबल रहा था, और उन्हें विश्वास नहीं था कि उसकी बातों में कोई सच्चाई है। डॉ. जैन ने इसको अधिक महत्व नहीं दिया, क्योंकि उन्हें मालूम था कि पाहवा बड़ी-बड़ी फेंकने में माहिर था। डॉ. जैन ने दूसरे दिन अपने मित्र अंगद सिंह से इस विषय पर चर्चा की, और दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पाहवा डिंग हांक रहा था।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

शनिवार, 12 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-5

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-5


11.9 पांचवा सिद्धांत - निराकार के प्रति प्रेम

सूफ़ी दर्शन का पाँचवां सिद्धांत यह है कि सब मनुष्य एक ही ईश्वर की रचना हैं, इसलिए एक-दूसरे से घृणा करना ईश्वर को नाराज़ करना है। यदि हम मानव जाति से प्रेम नहीं कर सकते तो हम ईश्वर को भी नहीं पा सकते।

सूफ़ी दर्शन का यह एक बेहद महत्वपूर्ण और केंद्रीय सिद्धांत है। सूफ़ी संत मानते हैं कि ईश्वर (अल्लाह) को पाने का एकमात्र और सबसे सच्चा रास्ता मानव जाति से बिना किसी भेदभाव के प्रेम करना है। सूफ़ी विचारधारा के अनुसार, इस संसार की हर रचना में ईश्वर का ही अंश है। यदि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान या रचना हैं, तो किसी भी मनुष्य से नफ़रत करना सीधे तौर पर ईश्वर का अपमान करने या उसे नाराज़ करने जैसा है। सूफ़ियों का मानना है कि ईश्वर को इबादत (कर्मकांडों) से ज़्यादा प्रेम के ज़रिए पाया जा सकता है। लेकिन ईश्वर (जो दिखाई नहीं देता) से प्रेम करने की शुरुआत इंसानों (जो दिखाई देते हैं) से प्रेम करने से ही होती है।

दसवीं सदी (लगभग 980 ईस्वी) में इराक के बसरा शहर में सक्रिय मुस्लिम दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का एक अत्यंत रहस्यमयी और गुप्त संगठन था, जिसका नाम था इख़वानुस्सफ़ा (Brethren of Purity पवित्र संघ /बिरादरी)। यह मध्यकालीन इस्लामी दुनिया (इस्लाम के स्वर्ण युग) का एक अनूठा और क्रांतिकारी बौद्धिक आंदोलन था, जिसने धर्म, दर्शन और विज्ञान को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया। अरबी भाषा में 'इख़वान' का अर्थ 'भाई' या 'बिरादरी' होता है और 'सफ़ा' का अर्थ 'पवित्रता' या 'निर्मलता' है।

इन्होंने अपने ज्ञान को पुस्तक के रूप में लेखबद्ध किया, इसे  रसाइल इख़वानुस्सफ़ा (पवित्र-संघ-ग्रंथावली) कहते हैं। यह कुल 52 पत्रों या निबंधों का संग्रह है, जो अपने समय के विज्ञान और दर्शन का अद्भुत दस्तावेज़ है। इख़वानुस्सफ़ा का मानना था कि कट्टरता इंसानी रूह को प्रदूषित करती है। इस संगठन के सदस्यों ने हमेशा अपनी पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा, ताकि उस दौर के कट्टरपंथी धार्मिक विद्वानों और शासकों के कोपभाजन से बच सकें। वे मानते थे कि शरीयत (धार्मिक कानून) को जब तक दर्शन और वैज्ञानिक सोच के ज़रिए साफ़ नहीं किया जाता, तब तक वह मुकम्मल नहीं होती। दर्शन को वे आत्मा को शुद्ध करने का एक औज़ार मानते थे। वे मानते थे कि ज्ञान के अर्जन और रूहानी (आध्यात्मिक) शुद्धता के ज़रिए ही आत्मा को मुक्ति मिल सकती है।  इस संघ ने त्याग, तपस्या, आत्म-संयम के ऊपर काफ़ी ज़ोर दिया। इनके अनुसार प्रेम का स्थान सबसे ऊपर है - प्रेम जीव की परमात्मा से मिलने की बेक़रारी है। इसी प्रेम का एक भाग वह प्रेम है, जो कि इस जीवन में प्राणिमात्र के प्रति क्षमा, सहानुभूति और स्नेह द्वारा प्रकाशित होता है। प्रेम इस लोक में मानसिक सांत्वना, हृदय की स्वतंत्रता देता है और प्राणिमात्र के साथ शांति स्थापित करता है, और परलोक  में उस नित्य ज्योति का समागम कराता है। इस बिरादरी का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ लोग विज्ञान, कला और दर्शन के माध्यम से एक-दूसरे के करीब आ सकें, न कि धार्मिक मतभेदों के कारण दूर जाएँ। इख़वानुस्सफ़ा मध्यकालीन इतिहास के वे 'गुमनाम वैज्ञानिक और दार्शनिक' थे, जिन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि विज्ञान, तर्क और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

पवित्र संघ  सूफ़ियों का प्रशंसक और समर्थक था। वास्तव में, इस संघ के दर्शन और कार्यप्रणाली पर सूफ़ी मत की गहरी छाप थी, और उन्होंने अपनी रचनाओं में सूफ़ियों की जीवनशैली और उनके विचारों की खुलकर सराहना की है। सूफ़ी शब्द की उत्पत्ति को लेकर भी एक बड़ा मत यही है कि यह 'सफ़ा' (पवित्रता) से बना है। इख़वानुस्सफ़ा के विचारक सूफ़ियों की तरह ही मन, आत्मा और आचरण की आंतरिक पवित्रता को मोक्ष या मुक्ति का एकमात्र साधन मानते थे। उन्होंने सूफ़ियों को बहुत ऊँचा स्थान दिया और उन्हें ईश्वर के करीब, आध्यात्मिक रूप से जागृत और संसार के मोह-माया से मुक्त 'सच्चे साधक' के रूप में सराहा है।

सूफ़ी दर्शन में जीव ब्रह्म  के  गुणों का प्रतिबिंब है, और भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होना, यही उसका सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत भी  ब्रह्म  के  गुणों का प्रतिबिंब है। जीव को  हक़  (सत्‌,  ब्रह्म) से मिलने का एक ही रास्ता है, वह है -  प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम होता है। अलहक्क़ के साथ एकत्व प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है।  सूफ़ी संत सरमद ने सूफ़ी प्रेमोपासना का रहस्य इन शब्दों में बताया है

मुमकिन न बुबद कि यार आयद बकिनार,

ख़ुदरा अज़ ख़्याले ख़ामो अन्देशा बरार,

हर चीज़ क़ि ग़ैर अस्त दर सीनए तुस्त,

बिसयार हिजाबेस्त मियाने तो व यार!

अर्थात्‌ जब तक तेरे दिल में बाहरी चिंताएं भरी हैं, झूठी भावनाएं भरी हैं, तब तक यह कैसे मुमकिन है कि तेरा यार, तेरा प्रेमास्पद ब्रह्म तुझे मिल जाए? जब तक तेरे दिल में ये दूसरी चीज़ें भरी हैं, तब तक यार से कैसे मिल सकेगा? तेरे और उसके बीच में परदा है। तात्पर्य यह है कि सूफ़ी साधकों को अपने प्रेमास्पद को छोड़कर किसी और का चिंतन नहीं करना चाहिए, उसके दिल में उसके सिवा किसी और का ख़्याल, किसी और की ख़्वाहिश, किसी की इच्छा, कामना न पनपे। इन पंक्तियों में सूफ़ी साधक को यह समझाया जा रहा है कि ईश्वर को पाने के लिए दिल को पूरी तरह साफ़ करना क्यों ज़रूरी है। दिल ही वह केन्द्र है, जहां प्रेम घटता है। मन तो कल्पनाओं का जाल बुनता है, तरह-तरह की माया रचता है। सूफ़ीमत में इसके रूपान्तरण की ज़रूरत को बताया गया है, कहा गया है कि साधक अपनी ऊर्जा को मन से हटाकर दिल की ओर मोड़ दे। परमात्मा प्रेम-स्वरुप है वह इसके रहस्यों को उन लोगों को नहीं बतलाता जो इसे पाने के अधिकारी नहीं हैं जिसने सांसारिक वस्तुओं का त्याग नहीं किया वे इसे पाने के अधिकारी नहीं हैं यह पंक्तियाँ सूफ़ी मत के 'तज़्किया-ए-नफ़्स' (आत्मा और मन की शुद्धि) के सिद्धांत को बहुत खूबसूरती से दर्शाती हैं।

सूफ़ी प्रेम में स्वरूप तो लौकिक प्रेम का ही है, भावावेश और सुखानुभूति श्रृंगार जैसी ही है, किन्तु है वह निराकार के प्रति। प्रेम प्रत्यक्ष के प्रति न होकर प्रच्छन्न के प्रति होता है,  इसलिए उसमें तीव्रता भी अधिक होती है और उसमें रहस्य की अनिवार्यता भी हो जाती है। इसमें लौकिकता और अलौकिकता का योग होता है। सूफ़ी प्रेम में  इश्क़ ए मजाज़ी  (लौकिक प्रेम)  इश्क़ ए हक़ीक़ी  (आध्यात्मिक प्रेम) की सीढ़ी माना जाता है। साधना के उत्तरोत्तर विकास के बाद ही साधक परमेश्वर तक पहुंचेगा। सूफ़ियों का कहना है कि सांसारिक प्रेम में स्त्री-पुरुष का प्रेम तो साधारण सी बात है,  लेकिन अहं पर विजय पाने के लिए, युवा के प्रति प्रेम अधिक उपयुक्त है। सूफ़ी दर्शन के इतिहास में इस विशेष अवधारणा को 'अमरदपरस्ती' या फ़ारसी में 'शाहिद-बाज़ी' कहा गया है। सूफ़ी संतों के अनुसार, जब तक कोई व्यक्ति इस संसार में किसी रूप (चाहे वह स्त्री हो या पुरुष) से सच्चा प्रेम करना नहीं सीखता, तब तक वह निराकार ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता। सूफ़ी साधना के कुछ विशेष संप्रदायों या विचारों में सुंदर युवाओं (अमरद) के प्रति आकर्षण या निष्काम प्रेम को साधना का एक हिस्सा माना गया। स्त्री के प्रति जो प्रेम होता है, उसमें स्वार्थ होता है और सुन्दर युवा के प्रति जो प्रेम होता, उसमें स्वार्थ नहीं होता, उसमें विकार नहीं होता। लेकिन एक सुंदर युवा (पुरुष) के प्रति ऐसा प्रेम रखना जो समाज की रूढ़ियों से परे हो, साधक के सामाजिक अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर देता है। मध्यकालीन फारसी सूफ़ी परंपरा के कुछ विचारकों (जैसे अवहद अल-दीन किरमानी) का मानना था कि ईश्वर सुंदर है और वह अपनी सुंदरता की झलक इंसानी रूपों में दिखाता है। एक पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षित होना या प्रेम करना एक स्वाभाविक और जैविक (साधारण) बात है, जिसमें कहीं न कहीं वंश आगे बढ़ाने या सांसारिक सुख की छिपी हुई आकांक्षा (स्वार्थ) हो सकती है। इसके विपरीत, एक सुंदर युवा (जिसकी दाढ़ी-मूछें न आई हों - अमरद) के प्रति ऐसा प्रेम जिसमें कोई भौतिक या सामाजिक स्वार्थ न हो, वह केवल सुंदरता की सराहना और रूहानी तौर पर 'अहं' को मिटाने के लिए अधिक उपयुक्त माना गया। इसे 'इश्क़-ए-मजाज़ी' (सांसारिक/सांकेतिक प्रेम) से 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वरीय प्रेम) तक पहुँचने का एक जरिया माना जाता था। यहाँ सुंदर युवा को ईश्वर की सुंदरता का गवाह (शाहिद) माना जाता था। सूफ़ियों की इस धारणा को 'शाहिदबाज़ी' भी कहा जाता है, जहाँ 'शाहिद' का अर्थ होता है 'गवाह' या 'साक्षी'। उनका मानना था कि ईश्वर ने इंसान को अपने रूप में बनाया है, इसलिए ईश्वर के परम सौंदर्य की सबसे शुद्ध झलक एक सुंदर युवा या बालक के चेहरे में देखी जा सकती है। इस सौंदर्य को निहारना ईश्वर की कारीगरी की प्रशंसा करने जैसा था।

विकारहीन होने के कारण यह प्रेम स्वार्थ और बुद्धि पर विजय पाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होता है। संसार को छोड़कर भी वह प्रेमिका के सौन्दर्य को ही दृष्टि में रखता है और साधना के मार्ग पर चढ़ता हुआ भी वह नर-नारी के  संयोग  (वस्ल)  में ही साधना की चरम परिणति मानता है। शाहिद-बाज़ी या अमरदपरस्ती को मुख्यधारा के अधिकांश सूफ़ी संतों और इस्लामी विद्वानों ने कभी स्वीकार नहीं किया और इसे भटकाव माना। उनका मानना था कि यह साधना साधक को दिव्य मार्ग से भटकाकर शारीरिक वासना की ओर ले जा सकती है। अधिकांश मुख्यधारा के सूफ़ी दर्शन में ईश्वर को 'प्रियतमा' (स्त्री) और साधक को 'प्रेमी' (पुरुष) के रूप में मानकर साधना की गई है। महान सूफ़ी विचारक इमाम अल-ग़ज़ाली ने अमरदपरस्ती का कड़ा विरोध किया था। उनका कहना था कि जब कोई साधक किसी युवा के प्रति आकर्षित होने लगता है, तो सूफ़ी मत का वास्तविक आध्यात्मिक चरित्र समाप्त हो जाता है और वहाँ वासना के हावी होने का खतरा बढ़ जाता है।

प्रेम जीवन को अर्थ देता है। वह (साधक) नाचता है, गाता है, जीवन का उत्सव मनाता है। उसके (प्रेमास्पद के) प्रेम में व्यक्ति विह्वल हो जाता है,  आसक्त हो जाता है। आसक्त व्यक्ति मूर्छित हो जाता है। उसकी आसक्ति इतनी चरम सीमा की होती है कि प्रेमास्पद के अतिरिक्त सारी सृष्टि उसे सूनी प्रतीत होती है। यहां प्रेम वैराग्य का साधन बनता है। जब वह नाच रहा होता है, उत्सव मना रहा होता है, तब यदि वह अपने अंदर झांकता है तो वहां कोई नहीं होता। एक शून्यता होती है,  इसे ही सूफ़ी  फ़ना  होना कहते हैं। यह,  कोई नहीं होने वाली स्थिति, ऐसी स्थिति है जब अहंकार विसर्जित हो जाता है -  फ़ना,  अनात्म। यहां प्रेम एक कृत्य न होकर स्थिति है। प्रसिद्ध सूफ़ी कवि वली दकनी ने कहा है,

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे, उसे ज़िंदगी जग में भारी लगे।

न छोड़े मुहब्बत दमे मर्ग तक, जिसे यार जानी सूं यारी लगे॥

न होवे उसे जग में हर्गिज़ क़रार, जिसे इश्क़ की बेक़रारी लगे।

हर इक वक़्त मुझ आशिक़े ज़ार कूं, पियारे, तेरी बात प्यारी लगे॥

वली कूं कहे तू अगर एक वचन, रक़ीबों के दिल में कटारी लगे॥

अर्थात जिस व्यक्ति के दिल पर प्रेम (इश्क) का तीर 'कारी' (यानी गहरा या जानलेवा) लग जाता है, उसे इस संसार में अपनी सामान्य जिंदगी एक भारी बोझ की तरह लगने लगती है। प्रेम की चोट खाने के बाद इंसान दुनिया के रोजमर्रा के कामों और सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह कट जाता है। जिस व्यक्ति को अपने 'यार जानी' (यानी प्राणों से प्यारे महबूब) से सच्ची यारी (प्रेम) हो जाती है, वह 'दमे मर्ग' (मृत्यु के अंतिम क्षण) तक भी मोहब्बत का साथ नहीं छोड़ता। उसका प्रेम जीवन के साथ शुरू होता है और मौत के बाद ही खत्म होता है। जिसे एक बार प्रेम की 'बेकरारी' (बेचैनी या तड़प) का चस्का लग जाए, उसे इस दुनिया में फिर कभी 'करार' (चैन या सुकून) नहीं मिलता। प्रेमी अपने महबूब की याद में हर पल तड़पता रहता है और यही बेचैनी ही उसका सुकून बन जाती है। कवि कहते हैं कि मुझ जैसे 'आशिके जार' (यानी रोने वाले, दुखी और तड़पते हुए प्रेमी) को हर समय, हर पल, हे मेरे प्यारे महबूब! सिर्फ तुम्हारी ही बातें सबसे प्यारी और मीठी लगती हैं। तुम्हारे अलावा मुझे किसी और की बात सुनना पसंद नहीं। आखिरी शेर में कवि अपना नाम (तख़ल्लुस) 'वली' इस्तेमाल करते हुए अपने महबूब से कहते हैं कि—हे प्रिय! अगर तुम मुझसे (वली से) प्यार का सिर्फ एक मीठा बोल या वचन भी कह दोगे, तो जो हमारे 'रकीब' (यानी दुश्मन या प्रेम में प्रतिद्वंदी) हैं, उनके दिलों पर ईर्ष्या (जलन) की कटारी चल जाएगी। वे हमारी नजदीकी देखकर तड़प उठेंगे।

वली दकनी ने इन पंक्तियों में इश्क़ की उस पराकाष्ठा को दर्शाया है जहाँ इंसान खुद को भूल जाता है। जब कोई साधक ईश्वर के प्रेम में पड़ता है, तो वह दुनियावी बंधनों से आज़ाद हो जाता है। संसार के लोग जिसे सुख समझते हैं (जैसे धन, पद, आराम), सूफ़ी साधक के लिए वह सब एक बोझ ('ज़िंदगी भारी लगे') बन जाता है। सूफ़ियों के लिए महबूब की याद में तड़पना और बेचैन रहना ही सबसे बड़ा सुकून है। वे दुनिया के झूठे चैन को ठुकराकर इस रूहानी बेक़रारी को चुनते हैं। सच्चा प्रेम आख़िरी साँस तक निभाया जाता है। ईश्वर का प्रेमी दुनिया के लिए बेचैन और पागल लग सकता है, लेकिन उसके लिए ईश्वर की बातें और उसका नाम ही ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आनंद है। जब किसी साधक को ईश्वर से सच्चा प्रेम हो जाता है, तो उसे दुनिया की भौतिक चीजें (जिंदगी) भारी लगने लगती हैं, वह दुनिया से बेखबर हो जाता है और हर पल ईश्वर की इबादत और उनकी याद में ही खोया रहता है।

वली दकनी की सबसे प्रसिद्ध और कालजयी रचनाओं में से एक ग़ज़ल है: "याद करना हर घड़ी उस यार का..."। यह रचना उर्दू-दकनी शायरी के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है, क्योंकि इसमें उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में प्रेम और अध्यात्म का अद्भुत मिश्रण पेश किया है।

याद करना हर घड़ी उस यार का,

है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का।

आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नईं,
तिश्ना-लब हूँ शर्बत-ए-दीदार का।

क्या कहे तारीफ़ दिल है बे-नज़ीर,
हर्फ़ हर्फ़ उस मख़्ज़न-ए-असरार का।


 

'वली' होना स्रिजन पर निसार,
मुद्द'आ है चश्म-ए-गौहर बार का।

प्रेम में तड़प रहे मेरे इस बीमार दिल का एकमात्र 'वज़ीफ़ा' (यानी रोज़ का नियम, जाप या मंत्र) हर समय अपने उस यार (प्रियतम) को याद करना ही बन गया है। जैसे कोई भक्त हर समय मंत्र जपता है, वैसे ही मेरा दिल हर पल महबूब की यादों का जाप करता रहता है। मुझे स्वर्ग के पवित्र झरने के पानी की कोई इच्छा (आरज़ू) नहीं है। मेरे प्यासे होंठों को तो बस अपने महबूब के 'दीदार' (दर्शन) का शर्बत चाहिए। सूफ़ी मत के अनुसार, साधक के लिए जन्नत की सुख-सुविधाओं से कहीं बढ़कर ईश्वर के दर्शन का आनंद है। प्रेम में डूबे हुए इस दिल की तारीफ़ क्या की जाए, यह तो अपने आप में अनोखा है। इस दिल का एक-एक अक्षर ('हर्फ़-हर्फ़') ईश्वरीय रहस्यों का ख़ज़ाना बन चुका है। वली कहते हैं कि अपने प्रियतम पर पूरी तरह से न्योछावर (निसार) हो जाना ही, महबूब के विरह में मोती जैसे अनमोल आँसू बहाने वाली इन आँखों का एकमात्र उद्देश्य है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर