सोमवार, 29 जून 2026

491. गांधीजी का अंतिम जन्म दिवस

राष्ट्रीय आन्दोलन

491. गांधीजी का अंतिम जन्म दिवस

1947

गांधीजी के निरंतर प्रयास से, कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, दिल्ली में शांति स्थापित हुई। लेकिन इस प्रयास में गांधीजी ख़ुद बीमार पड़ गए। 26 सितम्बर से वे जुकाम, कुक्कुर खांसी और ज्वर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने आराम करने के लिए कहा, तो कहने लगे, आराम लेकर क्या करना? लोग इतने कष्ट में हो तो मैं कैसे काम रोक सकता हूं? 2 अक्तूबर को उनका 78वां, उनके जीवन का अन्तिम और आज़ाद भारत में पहला, जन्मदिन था।

मीराबहन ने उनके बैठने की जगह को सजा कर रखा था। फूलों के द्वारा उन्होंने ‘राम’ और ‘ओम’ बनाया था। पटेल, नेहरू और घनश्यामदास बिरला मौज़ूद थे। लेडी माउंट्बेटन भी आ गईं। उनके हाथ में बधाइयों वाले तार और पत्र थे। दुनिया भर से बधाई के संदेश आ रहे थे। गांधीजी ने पूछा, क्या शोक-संदेश भेजना अधिक उपयुक्त नहीं होता? सब जगह यही शोर मचा हुआ है कि हम मुसलमानों को भारतीय संघ में नहीं रहने देंगे। इसलिए मैं आपकी कोई भी बधाई स्वीकार करने में सर्वथा समर्थ हूं। बधाई किसलिए? क्या संवेदना प्रकट करना अधिक उपयुक्त नहीं होगा?

उस दिन उन्होंने उपवास रखा था। उनके अंदर न कोई उमंग, न उल्लास था। मन दुखी, और उनके बोल थे, भगवान से प्रार्थना करें कि बंटवारे की क़ौमी आग सदा के लिए बुझ जाए। अन्यथा दूसरा जन्म दिवस देखने की इच्छा नहीं है। अपने शुभचिंतकों को उन्होंने कहा, आप सब ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस मौजूदा तबाही का ख़ात्मा हो या वह मुझे उठा ले। मैं नहीं चाहता कि भारत जब जल रहा हो, तो मेरा एक और जन्मदिन आए। ईश्वर की ऐसी लीला हुई कि वे दूसरा जन्म दिवस देख भी नहीं पाए। उन्होंने स्वीकार किया, इस निरंतर मातृघात के फलस्वरूप मेरी 125 साल जीने की इच्छा पूरी तरह मर चुकी है। मैं इसका असहाय साक्षी नहीं बनना चाहता। यह असहनीय पीड़ा उनकी नैतिक संवेदना की, अपनी जनता के प्रति उनके प्रेम की और उनकी आध्यात्मिक धरोहर के प्रति उनके गर्व की भावना की सूचक थी। सभी पिछली लड़ाइयों को जीतने के बाद वे इस आखिरी लड़ाई को हार रहे थे। इसने उनकी पीड़ा को और बढाया था।

आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक चीज निकलती तो करोडो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगेऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”

जीवन भर हर विषम परिस्थितियों में जीतने वाले गांधीजी अपनी इस  आख़िरी लड़ाई को हार रहे थे। उन्होंने कहा था, मेरी सत्य और अहिंसा की धारणा और व्यवहार में कोई सूक्ष्म दोष अवश्य है, जिसका यह नतीजा है। मैंने कमज़ोरों की अहिंसा को, जो किसी भी तरह अहिंसा नहीं है, सच्ची अहिंसा समझा। मैं अंधा था। मैं देख नहीं सकता था। सरदार से उन्होंने कहा, मैंने ऐसा कौन सा पाप किया होगा कि ईश्वर ने मुझे ये तमाम भयंकर घटनाएं देखने के लिए ज़िन्दा रखा है? आकाशवाणी ने गांधीजी  की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम रखा था। किसी ने पूछा आप रेडियो नहीं सुनेंगे? गांधीजी ने कहा, नहीं, मुझे ‘रेडियो’ से ‘रेंटियो’ अधिक पसंद है। चरखे की गूंज मुझे अधिक मीठी लगती है। उसमें मुझे मानवता का शान्त और करुणापूर्ण संगीत सुनाई देता है। गुजराती में चरखे को रेंटियो कहते हैं। गांधीजी ने जन्मदिन का कोई संदेश देने से इंकार कर दिया।

आगे बढ़ने से पहले एक मज़ेदार वाकए पर एक नज़र डाल ली जाए। हिन्दू पंचांग के अनुसार गांधीजी का जन्म दिन 11 अक्तूबर को पड़ रहा था। दिल्ली के गुजरातियों ने इस दिन गांधीजी का न सिर्फ़ जन्मदिन मनाने की ठानी बल्कि उन्हें उनके स्वागत समारोह में थैली भेंट करने का भी आयोजन किया था। हालांकि गांधीजी अभी भी खांसी और ज्वर से पीड़ित थे, फिरभी उन्होंने उस आयोजन में जाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। सरदार उन्हें सभा में ले जाने के लिए आए। उस समय गांधीजी पर खांसी का दौरा आ रहा था। सरदार ने विनोद किया, आपके लोभ का कोई अन्त नहीं है! थैली लेने के लिए आप मृत्युशय्या भी छोड़कर चले जाएंगे! आप अपनी खांसी ठीक कर लेंगे, तो सब बातें अपने आप ठीक हो जाएंगी। लेकिन आप सुनते कहां हैं? सभा में सरदार से भाषण देने के लिए कहा गया, तो उन्होंने फिर विनोद किया। यह क्या मेरा जन्मदिन है जो मैं बोलूं? आपकी थैली गांधीजी लें और बोलने का काम मैं करूं – यह बड़े अन्याय की बात है! देखिए इस बूढ़े में बीमारी के बावज़ूद आपका रुपया छीनने के लिए फिर से शक्ति आ गई है। अब आप इन पर दया कीजिए और इन्हें आराम करने दीजिए। गांधीजी भी कहां चुप रहने वाले थे, बोले, सरदार फांसी के तख़्ते पर चढ़ते समय भी हंसी से बाज़ नहीं आएंगे।

कलकत्ता से गांधीजी की मदद करने के लिए सुहरावर्दी आए थे। लेकिन दिल्ली में उनका कोई खास प्रभाव नहीं था। गांधीजी ने उससे कहा, अगर तुम भारतीय नागरिक हो, तो पाकिस्तान जाकर जिन्ना से कहो हिन्दुओं के दुखों का प्रतिकार करे। ऐसे अत्याचारों का सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू सिंधियों के ऊपर आतंक मचा था। वे वहां से पलायन कर रहे हैं। सुहरावर्दी कराची गए। 21 सितंबर को पाकिस्तान के नेताओं से लाहौर में चर्चा की। दूसरी वार वे अक्तूबर में भी पाकिस्तान गए और जिन्ना से बातचीत की। बहुत कुछ लाभ तो नहीं हुआ, फिर भी कोशिश तो ज़रूर की गई। वस्तुस्थिति तो यह थी कि नवजात पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना के वायदे कि ‘पाकिस्तान मुसलमानों की मातृभूमि होगी’ के विपरीत वहां के प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की कि ‘पूर्व पंजाब  के सिवा भारत के किसी भाग के मुसलमानों को पाकिस्तान में घुसने नहीं दिया जाएगा।’ जिन्ना अब अवसरवादियों की दया पर निर्भर रहने लगा था। उदार और प्रगतिशील विचारों वाला जिन्ना शरीअत पर आधारित धार्मिक राज्य का जनक बना। वह धर्मान्ध मुल्लाओं के हाथ की कठपुतली बन गया था। गवर्नर जनरल जिन्ना बीमार रहने लगा था।

एक दिन तो प्रार्थना सभा में गांधीजी ने यहां तक कह दिया, अगर ऐसा चलता रहा तो दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाएगा। लोगों को गांधीजी के मुंह से युद्ध की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। किसी विदेशी पत्रकार ने गांधीजी से कहा, आपको मज़ाक़ में भी युद्ध का उल्लेख नहीं करना चाहिए था। गांधीजी ने कहा, युद्ध गंभीर विषय है। मैंने मज़ाक़ किया ही नहीं था। ऐसी गंभीर स्थिति में युद्ध की संभावना को अनदेखा करना अपराध हो जाएगा। मैं अहिंसा का पुजारी हूं, लेकिन हिंसा में भी सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, औचित्य-अनौचित्य के पक्ष होते ही हैं। और अन्याय का विरोध करना मेरा कर्त्तव्य है।

शरणार्थियों की सेवा करना इन दिनों उनका प्रमुख उद्देश्य था। उन्होंने डॉ. सुशीला नय्यर को कुरुक्षेत्र भेज दिया जहां वे लोगों को चिकित्सीय सुविधा देतीं। सर्दियों के दिन आ रहे थे। शरणार्थियों को खुले आकाश के नीचे या तंबुओं में क्या दशा होगी उससे गांधीजी काफी चिन्तित थे। उन्होंने समाज से अपील की कि कंबल, गरम कपड़े और अन्य चीज़ों का दान करे। लोगों ने दिल खोलकर दान किए। गांधीजी की उचित व्यवस्था से दान की वस्तुएं सही हाथों में पहुंची। पानीपत के शरणार्थी शिविर की कुव्यवस्था देखकर उन्हें काफी धक्का पहुंचा। उन्होंने इसे सरकारी निकम्मेपन की निशानी कहा और वहां की सरकार को खूब फटकार लगाई।

लॉर्ड माउंटबेटन कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर जाने वाला था। लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन को राजकुमारी एलिजाबेथ की शादी, जो उनके भतीजे से होने वाली थी, में भाग लेने लंदन जाना था। जाने से पहले वे 9 नवंबर, 1947 को गांधीजी से मिले। गांधीजी को लगा कि नवदंपती के लिए उन्हें कुछ सौगात भेजनी चाहिए। उन्होंने अपने हाथ के कते सूत से एक टेबुल क्लॉथ बनवाया और माउंटबेटन को दिया। माउंटबेटन दंपत्ति ने बकिंघम पैलेस में जाकर गांधीजी की भेंट उन्हें दी। महारानी एलिजाबेथ ने उस मेजपोश को सहेजकर रखा। उन्होंने माउंटबेटन के द्वारा कहलवाया, गांधीजी द्वारा दिए गए इस सम्मान से मैं कृतज्ञ हूं। यह उनका मेरे प्रति हार्दिक स्नेह है। मैं इसे सदा सुरक्षित स्थान पर रखूंगी। चाय के मेज़पोश की तरह इसका इस्तेमाल नहीं करूंगी। यह एक मूल्यवान भेंट है। उससे भी ज़्यादा बहुमूल्य इसका ऐतिहासिक संदर्भ है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह कितना अच्छा चरमोत्कर्ष था! इसने कटुता और ज़हर नहीं फैलाया बल्कि मित्रता और सद्भावना की सुगंध फैलाई।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

रविवार, 28 जून 2026

सूफ़ीमत... 6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था-2

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था-2

6.4 हज़रत अली रज़ि.

अली इब्न अबी तालिब जिनका असली नाम था, पवित्र काबा में 17 मार्च 600 को में जन्मे हज़रत अली रज़ि. के पिता हज़रत अबूतालिब रज़ि. ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. का लालन-पालन किया था। स्वाभाविक रूप से हज़रत अली रज़ि. पैग़म्बर साहब की देख-रेख में ही बड़े हुए थे। जब पैगंबर मुहम्मद (स.) ने इस्लाम का संदेश दिया, तो बच्चों में सबसे पहले (लगभग 10 वर्ष की आयु में) हज़रत अली ने ही इस्लाम स्वीकार किया था। पैग़म्बर मुहम्मद ने उन्हें अली नाम दिया, जिसका अर्थ है "महान", "उच्च" या "श्रेष्ठ" 'ज़ुल्फ़िकार' हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की मशहूर दो-धारी (दो मुंह वाली) तलवार का नाम है, जिसे पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) द्वारा उन्हें जंग के मैदान में अता किया गया था। इस तलवार को अपनी अद्वितीय ताकत, न्याय और बहादुरी के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। अरबी शब्द 'ज़ुल्फ़िकार' का शाब्दिक अर्थ "रीढ़ की हड्डी" या "खांचे वाली" है। इसकी बनावट और धार के कारण इसे यह नाम दिया गया था। युद्धों में हज़रत अली के पराक्रम और इस तलवार की ताकत को देखते हुए एक प्रसिद्ध नारा गढ़ा गया: "ला फताह इल्ला अली, ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िकार" (अर्थात: हज़रत अली से बेहतर कोई योद्धा नहीं और ज़ुल्फ़िकार से बेहतर कोई तलवार नहीं)।

वे धर्मात्मा थे, वे वीर शासक भी थे। जब वे इक्कीस वर्ष के हुए तो पैग़म्बर साहब ने अपनी इकलौती पुत्री हज़रत फ़ातमा ज़हरा रज़ि. से, जो उस समय पंद्रह वर्ष की थी, उनका विवाह (621 ई. में) कर दिया। उनके दो पुत्र थे, हसन और हुसैन। चौथे ख़लीफ़ा के रूप में हज़रत अली ने 23 जून 655 ई. को सत्ता हासिल की। उन्होंने 656 से 661 तक राशिदून ख़िलाफ़त के चौथे ख़लीफ़ा के रूप में शासन किया, और शिया इस्लाम के अनुसार वे 632 से 661 तक पहले इमाम थे। उनका शासनकाल न्याय और इस्लामी सिद्धांतों को बनाए रखने पर केंद्रित था। उनकी बेमिसाल बहादुरी और युद्ध कौशल के कारण उन्हें असदुल्लाह (अल्लाह का शेर) उपाधि मिली। खंदक और खैबर जैसे महत्वपूर्ण युद्धों में उनकी बहादुरी ने निर्णायक भूमिका निभाई थी, जिसके बाद उन्हें यह उपाधि और सम्मान प्राप्त हुआ। हज़रत अली केवल एक महान योद्धा ही नहीं बल्कि एक उच्च कोटि के विद्वान, दार्शनिक, न्यायविद और वक्ता भी थे। पैगम्बर साहब ने कहा था, "मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली उसका ‘बाब-ए-इल्म’ (ज्ञान का दरवाज़ा) हैं।" उनकी अद्वितीय बुद्धिमत्ता, आध्यात्मिक समझ और पैगंबर की शिक्षाओं की गहरी जानकारी के कारण उन्हें यह उपाधि दी गई। पैगंबर मुहम्मद सल्ल. को प्राप्त ईश्वरीय ज्ञान के रहस्य हज़रत अली तक सीधे पहुंचते थे, इसलिए ज्ञान के शहर (पैगंबर) तक पहुंचने के लिए उन्हें ही एकमात्र प्रामाणिक माध्यम माना गया। पैगंबर ने स्वयं कहा था कि उनके बाद अली ही उनके द्वारा लाए गए सभी संदेशों और शिक्षाओं की सबसे सटीक व्याख्या करेंगे। उन्ोंने वैज्ञानिक जानकारियों को बहुत ही रोचक ढंग से आम आदमी तक पहुँचाया था। उनके उपदेशों, पत्रों और कथनों का संग्रह 'नहजुल बलाग़ा' (The Peak of Eloquence) के नाम से प्रसिद्ध है, जो अरबी साहित्य और दर्शन की एक अनमोल धरोहर है।

वह सुन्नी मुसलमानों के लिए चार राशिदून खलीफाओं में से एक और शियाओं के पहले इमाम थे ख़लीफ़ा इस्लामी दीन और इस्लामी सल्तनत, दोनों के प्रधान हुआ करते थे। जब चौथे ख़लीफ़ा के रूप में हज़रत अली रज़ि. ने इस्लाम की बागडोर संभाली तो अरब में इस्लामी राज्य के राजनैतिक, सामाजिक और बौद्धिक परिवेश में परिवर्तन आया। विरोध और षडयंत्रों के युग का सूत्रपात हो गया। अपने प्रशासनिक सुधारों और न्याय के प्रति कठोर दृष्टिकोण के कारण उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। इस्लाम की बढ़ती हुई शक्ति ने ख़लीफ़ा पद को इतना महत्वपूर्ण बना दिया कि यह पद वास्तविक सत्ता का प्रतीक बन गया। अतः हज़रत अली रज़ि.  (656-660 ई.) की ख़िलाफ़त को लेकर उनके साथियों ने भी, उनके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस्लामी राज्य के उमय्या शासक स्थिति संभाल न सके। परिणामस्वरूप गृह-युद्ध आरंभ हो गया। हज़रत अली रज़ि. के ख़िलाफ़त (655-661) के समय अधिकांशतः आपसी संघर्ष ही होते रहे। सबसे पहले तो हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने हज़रत अली रज़ि. के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी। हज़रत उस्मान के विरोध में लोगों को भड़काने वालों में से हज़रत अली के दो साथी भी थे। उनका नाम था ताल्हा और जुबैर। हज़रत अली जब ख़लीफ़ा चुन लिए गए तो इन दोनों ने उनसे विद्रोह शुरू कर दिया। मुहम्मद साहब की पत्नी हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इन दोनों का साथ दिया। हज़रत आयशा (रज़ि.), हज़रत तलहा (रज़ि.) और हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) ने मदीना पहुंचकर कातिलों को सजा देने की मांग की और हज़रत अली रज़ि. के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया, जिसके परिणामस्वरूप जंग-ए-जमल (ऊँट की लड़ाई) 656 ईस्वी में बसरा, इराक के बाहर लड़ा गया प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इसे 'जमल' (ऊँट) कहा गया क्योंकि हज़रत आयशा लड़ाई के दौरान ऊँट पर सवार थीं। इस युद्ध की मुख्य वजह तीसरे खलीफा हज़रत उस्मान की हत्या का बदला लेना था। हज़रत अली पर आरोपियों को तुरंत सजा न देने का आरोप लगाया। यह युद्ध हज़रत अली की सेना की जीत के साथ समाप्त हुआ। ताल्हा और जुबैर मारे गए और हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा को हज़रत अली ने स-सम्मान मदीना पहुंचवा दिया। हज़रत अली खून-खराबा नहीं चाहते थे।

उसके बाद उमय्या वंशज ने हज़रत अली रज़ि. के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी कर दी। अपने सबसे बड़े शत्रु सीरिया के गवर्नर मुआविया इब्न अबी सुफयान से भी उन्हें निपटना पडा मुआविया ने हज़रत अली को खलीफा मानने से इनकार कर दिया। वह पहले खलीफा उस्मान के हत्यारों को सजा दिलाना चाहते थे। हज़रत अली बहुत से अधिकारियों को उनके खराब काम-काज के चलते हटाना चाहते थे, लेकिन मुआविया ने उनके आदेश मानने से इनकार कर दिया हज़रत अली साम्राज्य में शांति चाहते थे, जबकि मुआविया अपनी शर्तों पर अड़े थे। इस वजह से दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं। इसे जंग-ए-सिफीन (सिफिन की लड़ाई) कहते हैं जो इस्लामी इतिहास की एक बहुत बड़ी और अहम लड़ाई थी। यह युद्ध 657 ईस्वी (37 हिजरी) में लड़ा गया था। यह युद्ध फरात नदी के किनारे 'सिफिन' नाम की जगह पर हुआ था, इसलिए इसे जंग-ए-सिफीन कहते हैं। दोनों सेनाएं 110 दिनों तक आमने-सामने डटी रहीं और कई झड़पें हुईं। जब मुआविया की सेना हारने लगी, तो उन्होंने चाल चली। उन्होंने अपने नेजों (भाला) पर कुरान के पन्ने बांध दिए। इसका मतलब था कि वे अल्लाह की किताब से फैसला चाहते हैं। हज़रत अली की सेना के कुछ लोग कुरान देखकर पीछे हट गए। हज़रत अली न चाहते हुए भी बातचीत (मध्यस्थता) के लिए राजी हो गए। यह युद्ध बिना किसी ठोस नतीजे (अनिर्णायक) के खत्म हुआ। इसके बाद हज़रत अली की सेना में फूट पड़ गई और एक नया ग्रुप 'खारिजी' बन गया। खारिजी हज़रत अली (रज़ि.) और हज़रत मुआविया (रज़ि.) दोनों के विरोधी बन गए। ख्वारिज गुट को मध्यस्थता का फैसला मंजूर नहीं था और उन्होंने हज़रत अली (रज़ि.) को ही गलत ठहराना शुरू कर दिया। इसी फूट के कारण 661 ईस्वी में अली की हत्या हो गई और उमय्यद खिलाफत की शुरुआत हुई।

शहादत: हज़रत अली ने मदीना छोड़ दिया और कूफा में अपनी राजधानी बनाई ख्वारिज के बागी मक्का में गुप्त रूप से मिले और उन्होंने इस्लामी दुनिया में अशांति फैलाने के लिए हज़रत अली (रज़ि.), हज़रत मुआविया (रज़ि.) और अम्र इब्न अल-आस (रज़ि.) को मुस्लिम समाज की समस्याओं का जड़ मानकर उनकी हत्या की साज़िश रची। हज़रत अली रज़ि. को 28 जनवरी 661 ई. को (19 रमजान को), कुफा की जामा मस्जिद में फज्र (सुबह) की नमाज़ के लिए जाते समय, खारजी अब्दुर्रहमान इब्न मुलजिम ने ज़हरीली तलवार से उनके सिर पर पीछे से हमला किया और इसके कुछ दिन बाद (21 रमजान) वे शहीद हो गए। उनकी मज़ार (मकबरा) इराक के नजफ़ अशरफ़  शहर में स्थित है, जो दुनिया भर के मुसलमानों के लिए एक अत्यंत पवित्र स्थान है। बाद में ख़िलाफ़त-पद को लेकर ही हज़रत अली रज़ि. के दोनों पुत्रों को प्राणों से हाथ धोना पडा, जिसके परिणामस्वरूप मुसलमान कई मतों में बंट गए। जिनमें से शिया और सुन्नी ही सबसे बड़े मत हैं।

6.5 हज़रत इमाम हसन, हज़रत इमाम हुसैन और क़र्बला का धर्मयुद्ध

हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ की मृत्यु के बाद उनके सुपुत्र हज़रत इमाम हसन रज़ि. (पैग़म्बर के बड़े नाती) ख़लीफ़ा की गद्दी पर आसीन हुए। वह इस्लामी पैगंबर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बड़े नवासे और हज़रत अली व हज़रत फातिमा के ज्येष्ठ पुत्र थे। शिया इस्लाम में उन्हें दूसरा इमाम माना जाता है उनका जन्म रमज़ान के महीने में हिजरत के तीसरे वर्ष (लगभग 624 ईस्वी) में मदीना में हुआ था। उनका नाम खुद पैगंबर मुहम्मद ने अल्लाह के हुक्म से 'हसन' रखा था हसन शब्द का मतलब "अच्छा" या "सुंदर" होता है उन्हें 'अल-मुजतबा' (चुना हुआ) भी कहा जाता है पैगंबर उन्हें "जन्नत के युवाओं के सरदार" कहते थे अपने पिता हज़रत अली की शहादत के बाद वे कुछ समय के लिए खलीफा बने पिता हज़रत अली की शहादत के बाद, सन 661 में लोगों ने इमाम हसन के हाथ पर खिलाफत की बैअत (वफादारी की शपथ) ली। उन्होंने केवल छह या सात महीने तक शासन किया

उमैय्या वालों ने उनका विरोध ज़ारी रखा मुसलमानों के बीच गृहयुद्ध (आपसी लड़ाई) को रोकने के लिए उन्होंने बड़ा फैसला लिया उस समय मुस्लिम समाज में गृहयुद्ध (आपसी लड़ाई) का खतरा था। लोगों की जान बचाने और शांति बनाए रखने के लिए उन्होंने मुआविया के साथ एक शांति समझौता किया और मुआविया की शर्तें मानकर उन्होंने 10 अगस्त 661 को ख़लीफ़ा पद त्याग दिया हज़रत इमाम हसन ने ख़िलाफ़त की बागडोर अमीर मुआविवा को सौंप दी और ख़ुद एकांतवास ग्रहण कर लिया हज़रत इमाम हसन बहुत दयालु और दानी इंसान थे वे गरीबों और बेसहारा लोगों की हमेशा मदद करते थे उनका मानना था, "दो चीज़ें सबसे बेहतरीन हैं—अल्लाह पर अटूट विश्वास रखना और मानवता की सेवा करना।" वे किसी भी मांगने वाले को अपने दरवाजे से खाली हाथ नहीं लौटाते थे उन्होंने अपने जीवन में दो बार अपनी पूरी संपत्ति और तीन बार अपनी आधी संपत्ति गरीबों और बेसहारों में दान कर दी थी। वह कहा करते थे, "गुप्त रूप से दिया गया दान (सदक़ा) ईश्वर के क्रोध को शांत करता है।"

हज़रत इमाम हसन बहुत दिनों तक ज़िंदा नहीं रह सके कहा जाता है कि कुछ ही दिनों के बाद ज़हर देकर उन्हें मार डाला गया (लगभग 670 ईस्वी) उन्हें मदीना के प्रसिद्ध जन्नत अल-बाकी कब्रिस्तान में दफनाया गया

हज़रत इमाम हुसैन (रजि.) इस्लाम के आखिरी पैगंबर हज़रत मोहम्मद के नवासे (बेटी के बेटे) और हज़रत अली (रजि.) एवं हज़रत फातिमा (रजि.) के छोटे बेटे थे। उनका जन्म सन 626 ईस्वी में मदीना शहर में हुआ था। उन्हें शिया इस्लाम में तीसरा इमाम माना जाता है। उन्होंने पूरी दुनिया को सच्चाई, न्याय और मानवता का पाठ पढ़ाया। इमाम हुसैन का जीवन न्याय और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित था। पैगंबर मोहम्मद अपने नवासे हुसैन से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने कहा था कि "हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ"। उन्हें 'सैय्यिदुश शोहदा' यानी शहीदों के नेता के नाम से भी जाना जाता है।

मुआविया के साथ हुई समझौतों की शर्तों में एक शर्त यह थी कि मुआविया अपनी मृत्यु के बाद अगले ख़लीफ़ा का चुनाव मुसलमानों पर छोड़ देगा और कोई उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं करेगा मुआविया ने लालच, दमन और रिश्वत जैसे तरीक़ों को अपनाकर अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बना दिया अभी तक चुनाव के द्वारा ख़लीफ़ा पद पर नियुक्ति होती थी

यज़ीद जब अपने पिता की गद्दी पर बैठा उसे सल्तनत संभालने का कोई तज़ुरबा नहीं था तश्तरी में रखकर उपहार के रूप में मिली राजगद्दी के नशे में चूर होकर वह अय्याशी करने लगा लोगों के दिलों में बादशाह यजीद का इतना खौफ था कि लोग यजीद के नाम से ही कांप उठते थे अपना अधिकाँश समय वह शराब और शबाब के बीच गुज़ारता

हज़रत इमाम हुसैन ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ की पत्नी हज़रत रबाब थीं। हज़रत इमाम हुसैन मानवता की रक्षा और अधर्म के ख़िलाफ़ धर्मयुद्ध करते हुए, भूखे-प्यासे क़र्बला में अपने सहयोगियों के साथ शहीद हुए। पैगंबर मोहम्मद की वफात (मृत्यु, निधन,) के बाद यजीद इस्लाम को अपने तरीके से चलाना चाहता था उसने आदेश दिया कि हज़रत हुसैन और उनके अन्य क़रीबियों को बैयत (वफादारी का प्रण) कराया जाए यजीद को लगता था कि अगर इमाम हुसैन उसे अपना ख़लीफ़ा मान लेंगे तो इस्लाम और इस्लाम के मानने वालों पर वह राज कर सकेगा हज़रत हुसैन को ये बिल्कुल मंजूर नहीं था और  उन्होंने इनकार कर दिया और मदीना छोड़कर मक्का आ गए उमय्यद खलीफा यज़ीद के क्रूर और भ्रष्ट शासन के खिलाफ हज़रत इमाम हुसैन ने बगावत की। उन्होंने यज़ीद की तानाशाही के सामने झुकने से इनकार कर दिया। यजीद से हुसैन का इंकार करना सहन नहीं हुआ और वह हुसैन को खत्म करने की साजिश करने लगा

उमैयों का जुल्म बढ़ रहा था इस बीच कूफा से उनके समर्थकों ने उन्हें यज़ीद के ख़िलाफ़ नेतृत्व करने के लिए कूफा आने का निमंत्रण भेजा हज़रत हुसैन परिवार के सभी सदस्यों के साथ कूफा की और चल पड़े मुहर्रम की दूसरी तारीख को जब हुसैन कर्बला पहुंचे तो उस समय उनके साथ एक छोटा सा लश्कर था, जिसमें औरतों से लेकर छोटे बच्चों तक कुल मिलाकर 72 लोग शामिल थे रास्ते में उन्हें मालूम हुआ कि कूफा में उनके निजी दूत और भरोसेमंद सूबेदार मुसलिम बिन अक़ील को मार दिया गया है कूफा के लोगों को डरा-धमाका कर हज़रत हुसैन की मदद नहीं करने की आज्ञा दी गयी हज़रत हुसैन के लिए वापस लौटने का वक़्त निकल चुका था मज़ीद की फ़ौज के दस्तों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था यजीद ने इमाम हुसैन से ख़ुद को ख़लीफ़ा मानने के लिए उन्हें मजबूर किया लेकिन हज़रत इमाम हुसैन ने यजीद को ख़लीफ़ा मानने से  इंकार कर दिया  हज़रत हुसैन के साथ उनके समर्पित अनुयायिओं का 72 लोगों का दस्ता था वे अपने परिवार और दुधमुंहों बच्चों के साथ जाल में फँस चुके थे फिरभी हज़रत हुसैन ने दीनभाव से समर्पण नहीं किया वे सिद्धांतहीन राजनीति नहीं चाहते थे हुसैन के कर्बला पहुंचने के बाद मुहर्रम की 7 तारीख को  इमाम हुसैन के पास खाने पीने की जितनी भी चीज़ें थीं वे सभी खत्म हो चुकीं थीं ये देखकर यजीद ने हुसैन के लश्कर का पानी भी बंद कर दिया मुहर्रम की 7 तारीख से 10 तारीख तक इमाम हुसैन और उनके काफिले के लोग भूखे प्यासे रहे लेकिन इमाम हुसैन सब्र से काम लेते रहे और जंग को टालते रहे  हर ढलते दिन के साथ यजीद के जुल्म बढ़ते ही जा रहे थे ये देखने के बाद इमाम हुसैन ने अपने काफिले में मौजूद लोगों को वहां से चले जाने के लिए कहा लेकिन कोई भी हुसैन को छोड़कर वहां से नहीं गया उनके और यज़ीद की फ़ौजों के बीच 10 अक्टूबर, 680 ई. को टकराव हुआ यजीद बहुत ताकतवर था यजीद के पास हथियार, खंजर, तलवारें थीं जबकि हज़रत हुसैन के काफिले में सिर्फ 72 लोग ही थे इसी जंग के दौरान मुहर्रम की 10 तारीख को (जिसे 'यौम-ए-आशूरा' कहा जाता है) यजीद की फौज ने इमाम हुसैन और उनके साथियों का बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया (680 ईस्वी) उनमें हुसैन के 6 महीने के बेटे अली असगर, 18 साल के अली अकबर और 7 साल के उनके भतीजे कासिम (हसन के बेटे) भी शहीद हो गए थे यही वजह है कि मुहर्रम की 10 तारीख सबसे अहम होती है, जिसे रोज-ए-आ शुरा कहते हैं इसे क़र्बला का दिन कहा गया हुसैन का कत्ल करने के बाद यजीद ने पहले बैत समर्थकों के घरों में आग लगा दी इसके बाद काफिले में मौजूद लोगों के घरवालों को अपना कैदी बना लिया कर्बला में इस्लाम के हित में जंग करते हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोग मुहर्रम की 10 तारीख को शहीद हुए थे हुसैन की उसी कुर्बानी को याद करते हुए मुहर्रम की 10 तारीख को मुसलमान अलग-अलग तरीकों से ग़म जाहिर करते हैं  शिया लोग अपना ग़म जाहिर करने के लिए मातम करते हैं, मजलिस पढ़ते हैं  इसने ‘हुसैन का इन्तक़ाम’ का नारा दिया उनकी शहादत ने उमैयों की सलतनत को हिलाकर रख दिया उनके बलिदान ने इस्लामी इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ी। उनकी क्रूर मृत्यु और उसके बाद उनके परिवारों के साथ हुए दुर्व्यवहार ने मुस्लिम जगत को स्तब्ध कर दिया और न्याय के लिए एक आंदोलन को जन्म दिया। शहादत के समय इमाम हुसैन की उम्र 56 वर्ष, 5 महीने और 5 दिन थी। इमाम हुसैन का मकबरा कर्बला में स्थित है। मुहर्रम की 10 तारीख को आशूरा कहा जाता है, जो उनकी शहादत का मुख्य दिन है।

क़र्बला तभी से बलिदान और शहादत का प्रतीक माना जाता है। उनकी शहादत हमें हक़, इंसाफ़, सब्र और ज़ुल्म के खिलाफ डटे रहने का पैगाम देती है। उन्हें आज भी सत्य के प्रकाश स्तंभ के रूप में याद किया जाता है। वहीं, उनके विरोधी यज़ीद झूठ के पर्याय बन गए हैं। इस घटना के बाद मुसलमानों में दो दल [फ़िर्क़ {फ़िरक़ा (संप्रदाय) का बहुवचन}] हो गए। एक दल जिसमें हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ के पक्षपाती थे शिया कहलाने लगे। मुसलमानों का शिया संप्रदाय अपनी पहचान अह्लबैत और अह्लबैत में जन्मे इमामों से स्थापित करता है। उनका विश्वास है कि पैग़म्बर साहब ने अपने जीवनकाल में ही अपने चचेरे भाई और दामाद हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। हज़रत अली रज़ि. ने अपने बाद इमाम हसन को और इमाम हसन ने इमाम हुसैन को और इमाम हुसैन ने इमाम ज़ैनुल आबिदीन को उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। मुहर्रम का शोकोत्सव हज़रत इमाम हुसैन की याद में ही मनाया जाता है। कालान्तर में शिया के भी अनेक पंथ हुए जैसे इमामिया, इस्माईलिया, ज़ैदीया, कीसानी और गुलात।

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मनोज कुमार

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