सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-6
10.10 शेख़ अहमद सरहिंदी (1564-1624)
उनका पूरा नाम इमाम
रब्बानी मुजदीद अलिफ़ सानी शेख़ अहमद अल-फारूक़ी अल-सरहिंदी था। वे ख़्वाजा बक़ी बिल्लाह के
सबसे प्रतिष्ठित शिष्य थे। वह मुग़ल काल के एक अत्यंत प्रभावशाली इस्लामी
विद्वान, धर्मशास्त्री, समाज सुधारक और नक़्शबन्दिया सिलसिले के सूफी संत थे। शेख़ अहमद सरहिंदी को 'मुजद्दिद-ए-अलफ़-ए-सानी' (दूसरी सहस्राब्दी का
नवप्रवर्तक) के नाम से जाना जाता था, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम पंचांग की दूसरी सहस्राब्दी की
शुरुआत में इस्लाम के पुनरुत्थान के लिए काम किया था। वह शेख़ अब्द अल-अबद मखदूम के
पुत्र थे। उनके पिता सूफ़ी थे। उनके पिता
ने ही उनको सूफ़ीमत में दीक्षित किया था।
उनका जन्म 26 जून, 1564 को पंजाब के सरहिंद के
पास एक गाँव के एक प्रतिष्ठित और धार्मिक अशरफ परिवार में में हुआ था। उनका परिवार
इस्लाम के दूसरे खलीफा हज़रत उमर फ़ारूक का वंशज माना जाता है। बचपन में ही
उन्होंने पवित्र क़ुरआन को कंठस्थ कर लिया। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने पिता
शेख अब्दुल अहद से ली। बाद में वे सियालकोट गए और वहां कमल कश्मीरी के मार्गदर्शन
में कुछ आगे की शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने उस समय के एक महान विद्वान याकूब
कश्मीरी से कुरान, हदीस और इस्लामी न्यायशास्त्र (फिक्ह) की उच्च शिक्षा प्राप्त की। सत्रह साल
की छोटी उम्र तक उन्होंने इस्लामी विज्ञानों में महारत हासिल कर ली थी और उन्होंने
दूसरों को पढ़ाना शुरू कर दिया था। उन्होंने आगरा का दौरा किया जहां उन्होंने अबू अल-फदल और फैदी
सहित कुछ महान लोगों से मुलाक़ात की। सरहिंद लौटने पर वह अपने पिता के साथ रहे और उनकी मदद से रहस्यवाद के क़ादिरिया
और चिश्तिया सिलसिलों के साथ आध्यात्मिक संबंध स्थापित किए।
1598 में अपने पिता की मृत्यु
के बाद उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने की शुरुआत की। दिल्ली पहुंचने पर, उन्होंने ख़्वाजा बाकी
बिल्लाह की प्रतिष्ठा के बारे में सुना। वह तुरंत उनके पास गए जहां उनका
दिल से स्वागत किया गया। ख़्वाजा ने उनसे उनकी तीर्थयात्रा के बारे में पूछा और फिर कहा कि वह उनके साथ
रहे। जब वे हज़रत बकी बिल्लाह के
संपर्क में आए तो उनपर उनका बहुत प्रभाव पडा। ख़्वाजा की आध्यात्मिक उपलब्धियों से
वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनका शिष्य बनने का मन बना लिया। ख़्वाजा आसानी से किसी को भी
अपना शिष्य नहीं बनाते थे, लेकिन उन्होंने तुरंत उनको अपना अनुयायी स्वीकार कर लिया और
अपना पूरा ध्यान उन पर केंद्रित कर दिया। उनका दिल अल्लाह की स्तुति का आसन बन गया और उन्होंने
आध्यात्मिक ज्ञान में तेजी से प्रगति की। ख़्वाजा के मार्गदर्शन में उन्होंने कुछ ही महीनों में अपना
नक्शबंदी प्रशिक्षण पूरा कर लिया। उन्हें गर्मजोशी से बधाई दी गई और उनके प्रशिक्षण के पूरा होने के प्रतीक के
रूप में उन्हें खिरका प्रदान किया गया। वह वापस सरहिंद चले गए और लोगों को शिक्षा
देने लगे। ख़्वाजा की मृत्यु के बाद वह अपने दिवंगत मुर्शिद के 'उर्स' में दिल्ली जाया करते थे।
शेख अहमद सरहिंदी का मुख्य
जीवन उद्देश्य इस्लाम को उसके मूल स्वरूप में वापस लाना और उसमें शामिल हो रही नई
प्रथाओं (बिदअत) को रोकना था। सम्राट अकबर ने सभी धर्मों को मिलाकर एक नए
पंथ 'दीन-ए-इलाही' और 'सुलह-ए-कुल' (सार्वभौमिक शांति) की नीति शुरू की थी। उन्होंने मुग़ल
सम्राट अकबर (शासनकाल 1556 से 1605 ईस्वी) की उदारवादी धार्मिक नीतियों और 'दीन-ए-इलाही' आंदोलन का कड़ा विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि यह
इस्लाम के मूल सिद्धांतों के खिलाफ था। शेख सरहिन्दी सीधे तौर पर सम्राट से लड़ने
के बजाय उनके प्रभावशाली मंत्रियों और सेनापतियों को प्रभावित करने की रणनीति
अपनाई। उन्होंने मुगल दरबार के शक्तिशाली अमीरों (जैसे शेख फरीद बुखारी और
खान-ए-जहाँ) को सैकड़ों पत्र (जिन्हें मकतूबात-ए-इमाम रब्बानी कहा जाता है)
लिखे। इन पत्रों में उन्होंने सरदारों से मुगल नीतियों को शरीयत के अनुसार ढालने
के लिए राजा पर दबाव बनाने का आग्रह किया।
जहांगीर के शासनकाल में जब
सरहिन्दी के कट्टरपंथी विचार बहुत तेजी से फैलने लगे, तो जहांगीर ने उन्हें
कानून-व्यवस्था और साम्राज्य की स्थिरता के लिए खतरा माना। 1618 से 1622 के बीच का
समय उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण काल था, जिस अवधि में से एक वर्ष वे ग्वालियर की जेल में थे और अन्य
तीन वर्ष सम्राट जहांगीर और उसकी सेना के साथ बिताए। यह समय की मांग थी कि एक ऐसा
व्यक्ति सामने आए जो सम्राट की पूजा का विरोध करने के लिए उसके सामने झुकने से
इनकार करने का साहस कर सके, और इस्लाम की सच्ची भावना को पुनर्जीवित कर सके और विधर्म
को मिटा सके। उनका दृढ़ विश्वास था कि
इस्लाम अपने आप में पूर्ण है और किसी भी प्रकार का विधर्म (बिदअत या
नवीनता) या गैर-इस्लामी प्रभाव धर्म के लिए एक व्यर्थ या हानिकारक अंग (उपांग) के
समान है। उनका मानना था कि भले ही यह सही प्रतीत होता हो, लेकिन वास्तव में यह इस्लाम
के निष्पक्ष चेहरे पर एक धब्बा है। विधर्म का कोई भी अनुमोदन इस्लाम की पूर्णता का
खंडन है। समय के साथ, सुन्नत ग़ायब हो जाएगी, और विधर्म समृद्ध होगा। वे मानते थे कि कुरान और सुन्नत की
शिक्षाएं मुसलमानों के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं।
उन्होंने निडर होकर एक शक्तिशाली
सम्राट की नाराजगी का सामना किया और अपने स्वयं के विश्वासों और सिद्धांतों को
त्यागने के बजाय कारावास में जाने का फैसला किया। उन्हें मुजद्दीद कहा
जाता है क्योंकि उन्होंने इस्लाम को शुद्ध करने का आंदोलन शुरू किया और इसकी
पारंपरिक रूढ़िवादिता को बहाल किया। ‘मुजद्दिद’ उसे
कहा जाता है जो कि दीन को उसकी अस्ल शक्ल में ले आए, जैसा कि वह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद
साहब सल्ल. के ज़माने में था। इस्लाम विरोधी प्रथाओं के ख़िलाफ़ उनके साहसी रुख के
परिणामस्वरूप भारत में एक धार्मिक पुनर्जागरण हुआ। उन्होंने पवित्र पैगंबर
द्वारा स्वीकृत धार्मिक प्रथाओं का सख्ती से पालन किया और उन लोगों पर बहुत कठोर रहे
जो उनका उल्लंघन करने के बहाने गढ़ते थे। वे फ़िक़्ह (इस्लाम का क़ानूनी पक्ष) और परंपरा के अच्छे जानकार थे। वह शरीअत और तरीक़त, दोनों का गहरा इल्म रखते थे। उन्होंने
मौलबियों, क़ाज़ियों और सूफ़ियों को उनके विश्वास और आचरण की तरफ़ ध्यान दिलाया। उन्होंने
मुस्लिम अवाम को मनमानी की राह पर चलने के बजाय दीन पर चलने की शिक्षा दी।
उनके प्रयासों के कारण आलिम, सूफ़ी और अवाम सभी उनकी
ख़ानक़ाह में आने लगे। उनके ख़लीफ़ाओं ने भी अपने-अपने इलाक़े में यही काम किया। इससे उन
लोगों में खलबली मच गई जिन्होंने दीन को दुनिया कमाने का ज़रिया बना रखा था। शेख़ अहमद सरहिंदी के शिष्यों
और समर्थकों की संख्या मुग़ल सेना और दरबार के बड़े सरदारों (जैसे खान-ए-जहान लोधी)
के बीच तेजी से बढ़ रही थी। बादशाह
के क़रीबी लोग उन्हें छोड़कर शैख़ अहमद सरहिन्दी रह. के मुरीद बनते जा रहे थे। शक्ति उनके
पास से शैख़ सरहिन्दी रह. की तरफ़ हस्तान्तरित हो रही थी। उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने
उनके प्रतिद्वंद्वियों की ईर्ष्या को जगाया जिन्होंने सम्राट के कानों में ज़हर घोल
दिया और उन्हें सम्राट और राज्य दोनों के लिए खतरनाक बताया। उन्होंने जहांगीर को भड़काया कि शेख़ के लिखे कुछ पत्रों
(मक्तूबात) में ऐसी बातें हैं जो पारंपरिक इस्लाम और सम्राट की संप्रभुता के खिलाफ
हैं। ऐसे तत्वों ने मुग़ल बादशाह
जहांगीर को बरग़लाया कि शैख़ अहमद सरहिन्दी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत कर सकता है। जहांगीर को डर था कि यह बढ़ता
प्रभाव मुग़ल सल्तनत के लिए एक विद्रोह या चुनौती बन सकता है। सम्राट को केवल
तपस्वियों और साधुओं पर ही विश्वास था। वह अपने देश में व्यापक रूप से लोकप्रिय
सूफ़ी को बर्दाश्त नहीं कर सका।
बादशाह जहांगीर ने शैख़ अहमद सरहिन्दी
रह. को अपने दरबार में बुलाया। वह उसके दरबार में आए तो उन्होंने उसे परम्परा के अनुसार
झुककर सलाम ('सजदा') नहीं किया। पूछने पर उन्होंने
बताया कि ‘अल्लाह के अलावा किसी और के सामने सिर झुकाना इसलाम में जायज़ नहीं है।’ मामला और भी बिगड़ गया। इसे
सम्राट ने अपना अपमान माना। जहांगीर
उनसे नाराज़ हो गया। परिणामस्वरूप सन् 1619 में उन्हें ग्वालियर के क़िले में क़ैद कर दिया। ग्वालियर का किला उस समय
राजनीतिक कैदियों और शाही दुश्मनों को रखने की सबसे सुरक्षित जगह माना जाता था।
शेख़ अहमद सरहिंदी ने इस कैद
को भी अल्लाह की मर्जी माना। उन्होंने किले के अंदर ही अपना धार्मिक प्रचार शुरू
कर दिया। उनके प्रभाव से वहां कैद कई अन्य कैदियों और सुरक्षाकर्मियों का जीवन बदल
गया। सूफ़ियों के नेतृत्व में कुछ उलेमा ने जहांगीर के इस क़दम का विरोध किया था। जनाक्रोश को देखते हुए जहांगीर को उन्हें रिहा करना पड़ा। इस बीच धीरे-धीरे
जहांगीर की ग़लतफ़हमी दूर हो गई। जहांगीर को जल्द ही अहसास
हुआ कि शेख़ कोई विद्रोही या राजनीतिक षड्यंत्रकारी नहीं हैं, बल्कि एक सच्चे धार्मिक संत
हैं। बाद में वह ख़ुद भी उनका शिष्य हो गया। जहांगीर ने
उनके सामने दरबार में सिजदा करने की प्रथा को खत्म कर दिया और इस्लामी कानूनों को
तरजीह दी। आधुनिक इतिहासकारों (जैसे इरफान हबीब) के अनुसार, उनके प्रभाव के कारण जहांगीर
ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में अकबर की कई अत्यधिक उदारवादी नीतियों को वापस लेना
शुरू कर दिया था।
इतिहासकारों का मानना है कि
सरहिंदी के विचारों ने आगे चलकर औरंगज़ेब की कट्टर धार्मिक नीतियों की वैचारिक
जमीन तैयार की। जहांगीर ने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया और उन्हें सम्मान सहित
अपने दरबार में आमंत्रित किया। शेख़ ने जहांगीर के सामने कुछ धार्मिक शर्तें रखीं
(जैसे गोहत्या पर प्रतिबंध हटाना और शरीयत का सम्मान), जिन्हें जहांगीर ने आंशिक रूप
से स्वीकार किया। सरहिन्दी का सबसे बड़ा राजनैतिक प्रभाव उनके जीवनकाल के बाद
दिखा। शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में रूढ़िवादी इस्लाम की तरफ झुकाव दिखाया और अकबर
की कई उदारवादी प्रथाओं को बंद कर दिया। शेख सरहिन्दी के पुत्र ख्वाजा मोहम्मद
मासूम युवा राजकुमार औरंगज़ेब के आध्यात्मिक गुरु (ट्यूटर) बने। औरंगज़ेब ने गद्दी
पर बैठने के बाद जिन कट्टरपंथी नीतियों को लागू किया (जैसे जज़िया कर को फिर से
लगाना, दरबार से संगीत-नृत्य हटाना, और शरीयत कानून को सख्ती से लागू करना), वे काफी हद तक शेख सरहिन्दी
की विचारधारा से ही प्रेरित थीं।
एक साल की क़ैद के बाद उन्हें रिहा
तो कर दिया था, लेकिन वे स्वतंत्र नहीं हुए बल्कि उन्हें सेना के साथ एक बंदी के रूप में और
तीन साल की अवधि के लिए रहना पड़ा। 1622 में उन्हें सरहिंद स्थित अपने घर जाने की
अनुमति दी गई थी। वहाँ 10 दिसंबर 1624 की सुबह उनकी मृत्यु हो गई। सरहिंद में बनी
उनकी मजार को 'रौज़ा शरीफ़' के नाम से जाना जाता है। आज भी यह स्थान भारत और मध्य एशिया के मुसलमानों के
लिए एक बहुत बड़ा पवित्र तीर्थस्थल (ज़ियारतगाह) है, जहाँ हर साल उर्स के मौके पर
हजारों लोग आते हैं।
शेख़
अहमद सरहिंदी ने प्रसिद्ध सूफी इब्न अरबी के सिद्धांत वह्दत अल-वुजूद (ईश्वर और
संसार की पूर्ण एकता) का पुरजोर खंडन किया। उन्होंने जो विचारधारा प्रतिपादित की वह
ईश्वर के साथ एकत्व यानी वहदत-उल-वुजूद के विपरीत थी। उन्होंने जो सबसे पहली पुस्तिका
लिखी वह रद्द-ए-रवाफ़िद के नाम से जाना जाता है। उन्होंने सूफ़ियों के सर्वेश्वरवादी
दर्शन की आलोचना की और “घटना की एकता” (unity of the
phenomena) के नाम से अपना एक सिद्धांत प्रतिपादित किया और
प्रत्यक्षवादी दर्शन ( वजहद – उल – शुहूद (दृष्टि की
एकता)) का प्रतिपादन किया। शैख़ अहमद सरहिन्दी रह. का मानना
था कि ईश्वर का व्यक्तित्व वस्तुओं से अलग है। सरहिंदी ने इब्न अरबी के सिद्धांत
का खंडन करते हुए कहा कि ईश्वर (स्रष्टा) और संसार (सृष्टि) कभी एक नहीं हो सकते। मनुष्य
को साधना के दौरान जो एकता महसूस होती है, वह केवल एक
मानसिक या व्यक्तिपरक अनुभव (दृष्टि) है, वस्तुनिष्ठ
सच्चाई नहीं। इस सिद्धांत ने सूफीवाद को कट्टरपंथी सुन्नी शरिया नियमों के दायरे
में लाने का काम किया।
हज़रत
सरहिन्दी के अनुसार ईश्वर और उसकी बनाई सृष्टि दो अलग चीजें हैं। मनुष्य और ईश्वर
की एकता का अनुभव केवल एक व्यक्तिगत और आंतरिक एहसास है, वास्तविक
दुनिया में ईश्वर और जीव एक नहीं हो सकते। शेख़ अहमद सरहिन्दी ने कहा कि मनुष्य और परमात्मा
का संबंध दास और मालिक का संबंध है। आन्तरिक ज्ञान को ऊपर की ओर ले जाने के क्रम में
पहले शिखर पर मन में समर्पण का ज्ञान प्राप्त होता है। दूसरे शिखर से अद्वैत का चिंतन
समाप्त हो जात है और दास या बन्दा और सृष्टिकर्ता के अंतर का अनुभव होने लगता है। अंतिम शिखर, समर्पण पर पहुंचने
के बाद सृष्टिकर्ता और सृष्टि के अंतर का अनुभव विश्वास में बदल जाता है कि ईश्वर और
उसके बंदे का अस्तित्व अलग-अलग है। शैख़ सरहिन्दी ब्रह्मांड को ईश्वर की छाया नहीं मानते
थे।
शेख
अहमद सरहिन्दी (जिन्हें इमाम रब्बानी या मुजद्दिद अल्फ़-ए
सानी भी कहा जाता है) ने जीवन के हर क्षेत्र में आंतरिक अभ्यास और आत्मिक शुद्धि
के साथ-साथ शरीयत के नियमों के कठोर और दृढ़ पालन की पुरजोर वकालत की थी। शेख
सरहिन्दी का मानना था कि आत्मिक विकास, रहस्यवाद
(सूफीवाद) या आंतरिक अनुभूति कभी भी शरीयत (इस्लामी
धार्मिक कानून) की सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकती। उनके अनुसार, आंतरिक साधना
(तरीक़त) और अभ्यास का एकमात्र उद्देश्य शरीयत के
आदेशों को पूरी ईमानदारी व सच्चे दिल से मानना और आत्मा को पवित्र करना है। वे यह मानते
थे कि शरीअत का आदेश मनुष्य के बाहरी जीवन से संबंधित है, जिसे उन्होंने इल्म-अलअहमकाम
(ज्ञान) कहा। इल्म-अल-अहमकाम वह धार्मिक ज्ञान है जो शरीयत (शरीयत) के नियमों, कर्तव्यों, और हलाल-हराम
की स्पष्ट व्याख्या से संबंधित है। दीन (धर्म) की बातें उसकी आन्तरिकता से संबंध रखता
है, जिसे उन्होंने इल्म-अलअसरार (रहस्य-ज्ञान) कहा। अगर बाहरी रूप में ईश्वर
के आदेशों का अनुपालन नहीं है, तो भीतरी रूप में उसकी सिद्धि को हासिल कर लेने का दावा
करना सही नहीं होगा। इल्म-अलअसरार (आध्यात्मिक
और गूढ़ वास्तविकताओं का ज्ञान) सामान्य धार्मिक कानूनों से अलग, ईश्वर की
आंतरिक और रूहानी सच्चाइयों का ज्ञान है। इसे मूल रूप से पैगंबरों और उच्च कोटि के
औलिया (आध्यात्मिक संतों) द्वारा प्राप्त और अनुभव किया जाता है। सच्चे आलिम और
सूफी संत पैगंबरों के सच्चे वारिस वही हैं जो इन दोनों आयामों को समझते हैं। शेख
सरहिन्दी इस बात पर जोर देते हैं कि आंतरिक रहस्यों का यह ज्ञान (इल्म-अलअसरार) कभी भी बाहरी
शरिया (इल्म-अलअहकाम) के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता, बल्कि दोनों
का समन्वय ही पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग है।
इस्लामिक सूफीवाद
(विशेषकर मुजद्दिदी या नक़्शबंदी सिलसिला) के आध्यात्मिक और
दार्शनिक सिद्धांतों के मूल तत्व हैं – इलहाम (उत्प्रेरणा, मन में ईश्वर की तरफ़ से कोई बात प्रकट
होना, देववाणी, आकाशवाणी) और क़य्यूमियत (स्थायित्ववाद)। ये ईश्वरीय मार्गदर्शन और जगत
के निरंतर स्थायित्व को समझाते हैं। इल्हाम वह आंतरिक आध्यात्मिक प्रेरणा
या दिव्य ज्ञान है जो ईश्वर की ओर से संतों (औलिया) या सत्पुरुषों के हृदय में
डाली जाती है। क़य्यूमियत वह सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति या दायित्व है
जिसके तहत कोई महापुरुष ब्रह्मांड की व्यवस्था और उसके स्थायित्व को बनाए रखने में
ईश्वरीय माध्यम बनता है।
शेख अहमद सरहिन्दी मानते थे कि उचित
या अनुचित दैवज्ञान के लिए तर्क नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए। वे चिश्तियों की इस धारणा के ख़िलाफ़
थे कि संतों को दरबार और सम्राट से अलग-थलग रहना चाहिए। बल्कि वे इस निकटता को इस्लाम
के प्रचार का साधन मानते थे। उन्होंने मुगल बादशाहों (अकबर और जहांगीर) और दरबार के प्रभावशाली
अमीरों को पत्र लिखकर शरिया के पालन और इस्लामी उसूलों को लागू करने का आग्रह
किया। वे मानते थे कि जिस तरह शरीर में दिल का स्थान है उसी तरह संसार में सम्राट का
स्थान है। यदि दिल शुद्ध रहता है तो शरीर भी शुद्ध रहता है, उसी तरह इसके विपरीत वाली
स्थिति है। किसी राज्य की शुद्धता-अशुद्धता इसके शासक पर निर्भर करती है। उन्होंने
अपने को ‘कयूम’ कहा। ‘अल-कयूम’ परमात्मा का नाम है। ‘कयूम’ का अर्थ है ‘अविनाशी’। सूफीवाद (विशेषकर
नक्शबंदी-मुजद्दिदी परंपरा) के इतिहास और मान्यताओं के अनुसार उन्हें 'कयूम-ए-ज़मानी' या प्रथम कयूम के रूप
में जाना व स्वीकारा गया है। सूफी शब्दावली में 'कयूम' उस महान आध्यात्मिक
व्यक्तित्व को कहा जाता है, जिस पर ब्रह्मांड और अस्तित्व की व्यवस्था का एक बड़ा
हिस्सा निर्भर माना जाता है। उनकी शिक्षाओं और उनके अनुयायियों के वृत्तांतों
(जैसे फारसी ग्रंथ रौदत-उल-कयूमिया) में इस बात का उल्लेख मिलता है कि शेख अहमद सरहिन्दी ने
स्वयं को इस विशेष सर्वोच्च आध्यात्मिक पद (कयूमियत) पर होना बताया था, जिसके माध्यम से दुनिया में
दैवीय कृपा और व्यवस्था संचालित होती है।
सूफ़ियों के सिद्धांत को वह रूढ़िवादी
इस्लाम के नज़दीक ले आए। संगीत को उन्होंने धर्म विरुद्ध बताया। भावाविष्टावस्था
में नाच उठने को भी वे धर्म-विरुद्ध मानते थे। बादशाह या पीर के सामने साष्टांग
होने को वो अनुचित मानते थे। संतों की मज़ार पर दीप जलाने या पूजा करने को भी
इस्लाम के प्रतिकूल कहा। शुहूदिया विचारधारा को उन्होंने अंतिम मार्गदर्शक कहा। यह
भी कहा कि सूफ़ीवाद का अंतिम लक्ष्य तब प्राप्त होता है जब तर्कसंगत ज्ञान
रहस्योद्घाटन हो जाता है और निराकार साकार हो जाता है। उनके अनुसार सूफ़ीवादी
संस्था का असली उद्देश्य है दृढ़ विश्वास प्राप्त करना। ऐसा विश्वास आध्यात्मिक
शांति पर निर्भर करता है। इस शान्ति के बिना मोक्ष असंभव है। जब यह शांति प्राप्त
हो जाती है, तो हृदय ईश्वर के अलावा हर चीज़ से बेसुध हो जाता है। ईश्वरीय नियम (शरीयत) आत्मा
से जुड़ा हुआ है और आत्मा का आध्यात्मिककरण केवल उसके प्रति आज्ञाकारिता पर निर्भर
करता है। सूफ़ी अपनी पूर्णता के बाद इसे सीखते हैं। सूफ़ीवादी पूर्णता के रास्ते पर
रहते हुए, कई सूफ़ी इस रहस्यमय सड़क पर भटकते हैं। किसी को भी ईश्वरीय क़ानून की दृष्टि से
विचलित नहीं होना चाहिए।
उनके अनुसार ईश्वर
के साथ मिलन केवल अनुभवात्मक है और अस्तित्वगत नहीं है। ईश्वर किसी चीज़ से
एक नहीं है और न हो सकता है। ईश्वर ईश्वर है और संसार संसार है। यह संसार अपने
रचयिता के अस्तित्व का प्रतीक मात्र है, और यह केवल ईश्वर के विभिन्न गुणों को
दर्शाता है। केवल क़ुरआन और
सुन्नत पर भरोसा किया जाना चाहिए। धर्मशास्त्रियों का कर्तव्य केवल इन मूलभूत स्रोतों की
व्याख्या करना है, न कि उनमें कुछ
जोड़ना। सूफ़ियों के
रहस्यवाद और उनके रहस्योद्घाटन को तभी स्वीकार किया जाना चाहिए जब वे उनके अनुरूप
हों; अन्यथा उन्हें
खारिज कर दिया जाना चाहिए। परमेश्वर अपने अच्छे लोगों के सामने अपने आप को परलोक में
प्रकट करता है, न कि यहाँ। रहस्योद्घाटन और
"रोशनी" जिन पर सूफ़ियों को इतना गर्व है, वे ख़ुद को सांत्वना देने के लिए उनके ख़ुद
के मानसिक अनुमानों और कल्पनाओं के अलावा और कुछ नहीं हैं। उनके अनुसार, धार्मिक क़ानून के
तीन पहलू हैं: ज्ञान, कार्य और निष्ठा।
व्यवस्था के इन पहलुओं को प्राप्त करने के लिए ईश्वर का आनंद प्राप्त करना आवश्यक
है। सूफ़ीवाद और
ज्ञानवाद निष्ठा के महत्वपूर्ण पहलू को पूरा करके किसी की आत्मा को शुद्ध करने में
मदद करते हैं। परमानंद, "नशा" और "रोशनी" सूफ़ीवाद के उप-उत्पाद हैं।
वे इसके अंतिम लक्ष्य नहीं हैं। शुरुआती लोगों को खुश करने के लिए वे केवल
कल्पनाएं और अनुमान हैं। साधना के रास्ते से गुजरने के बाद, सूफ़ी को ईश्वरीय
इच्छा के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ता है, जो कि उनकी वास्तविक मंजिल है। हजारों
में से एक व्यक्ति शुद्ध निष्ठा प्राप्त करता है। अंधे लोग उप-उत्पादों को मुख्य
वस्तु मान लेते हैं और इसलिए, सत्य से वंचित रह जाते हैं। परमानंद, ज्ञान, और
"रोशनी" की स्थितियाँ अच्छी हैं यदि साधक दैवीय नियम पर चलें तो, अन्यथा वे गुमराह
कर देते हैं। सूफ़ीवादी आचरण
ईश्वरीय क़ानून का पालन करने में मदद करता है। ईश्वरीय क़ानून लोगों
की वासना को नियंत्रित करता है और उनके प्रभाव को कम करता है। जो लोग एक संत (वली)
को पैगंबर से श्रेष्ठ मानते हैं, वे मूर्ख हैं और प्रवर्तक के गुणों से पूरी तरह वाकिफ नहीं
हैं।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना 'मक्तूबात' (पत्रों का संकलन) है। यह फारसी भाषा में लिखे
गए उन पत्रों का संग्रह है, जो उन्होंने अपने शिष्यों, मित्रों और मुग़ल दरबार के
प्रभावशाली रईसों को इस्लामी विचारों के प्रचार के लिए भेजे थे। शेख़ सरहिन्दी एक
महान धार्मिक उत्साही थे। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में जो आंदोलन शुरू किया था, वह आज भी मुस्लिम दुनिया के विभिन्न हिस्सों में
उनके अनुयायियों द्वारा ज़ारी है। इस्लाम में धार्मिक विचारों के आधुनिक
पुनर्निर्माण के लिए उनकी विरासत अपरिहार्य है। वह एक सूफ़ी थे लेकिन उन्होंने
सूफ़ीवाद को जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना। उनके लिए यह केवल अंतिम लक्ष्य को
प्राप्त करने का एक साधन था। उनमें क़ुरआन और सुन्नत के प्रति निष्ठा थी। उनकी
शिक्षाओं के उचित अनुमान के लिए उनके समय के संदर्भ में उन पर विचार करना चाहिए। उनके
द्वारा चलाए गए सम्प्रदाय का दृष्टिकोण
बुद्धिवादी होने के कारण यह सम्प्रदाय जन साधारण को अपनी ओर बड़ी संख्या में आकर्षित
न कर सका। जाफ़र रज़ा ने लिखा है, “शेख़ अहमद सरहिन्दी को सूफ़ी के
बजाय अतिवादी धर्मप्रचारक कहना ही उचित होगा। साधारणतया सूफ़ियों का प्रेम एवं सहिष्णुता
पर आधारित सिद्धांत मुसलमान और हिंदू में भेद नहीं करता। परन्तु शेख़ सरहिन्दी ने प्रेम
पर घृणा को प्राथमिकता दी। ... स्पष्ट है कि इस प्रकार की तीव्र साम्प्रदायिकता में
सूफ़ीवाद का अस्तित्व खड़ा नहीं रह सकता। परिणाम स्पष्ट है। नक़्शबंदी ख़ानक़ाहें सूनसान
एवं विनष्ट होती गईं। यदि उनमें से कुछेक शेष रह गई हैं, तो इसलिए कि उन्होंने दूसरी
परम्पराओं से भी अपना नाता जोड़ रखा है। इस परम्परा में अबुलउलाइया परम्परा विशेष है।” अबुलउलाइया परंपरा (सिल्सिला-ए-अबुलउलाई) के
संस्थापक भारतीय सूफी संत सैय्यद
अमीर अबुल उला (मृत्यु 1651 ई.) थे, जिनका
केंद्र मुख्य रूप से भारत रहा है। इसकी शुरुआत अमीर अबुल उला द्वारा 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में की गई। यह परंपरा मुख्य रूप
से नक्शबंदी और चिश्तिया दोनों धाराओं के तत्वों के अनूठे समन्वय के लिए जानी जाती
है। इसके अनुयायी पैगंबर मोहम्मद के परिवार (अहले बैत) से संत के आध्यात्मिक
जुड़ाव और वंश को मानते हैं। समय के साथ यह परंपरा भारत के विभिन्न हिस्सों जैसे
राजस्थान (झुंझुनू आदि) और तेलंगाना (हैदराबाद) क्षेत्र में काफी फली-फूल और इसके
उर्स व आध्यात्मिक केंद्र आज भी सक्रिय हैं।
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मनोज
कुमार