शुक्रवार, 1 मई 2026

सूफ़ीमत ...5. सूफ़ीमत का उदय-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

5. सूफ़ीमत का उदय-2

5.3 पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’

('सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम' का अर्थ है: "अल्लाह की रहमत और सलामती हो उन पर।" यह वाक्यांश पैगम्बर मोहम्मद का नाम लेने के बाद सम्मान में कहा जाता है।)

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ ख़ुदा के पैग़ंबर दीन-ए-इस्‍लाम के नबी और रसूल माने जाते हैं। रसूल का अर्थ होता है ईश्वर का दूत या संदेशवाहकरसूल को ईश्वर ने मानव जाति के लिए अपना दूत (प्रेषित) बनाकर भेजा, ताकि वह ईश्वर के आदेशों, जिसे शरीअत (दैवी विधान) कहा जाता है, को स्थापित करे और समस्त मानव-जगत का दिशा निर्देशन करे। शरीअत का आधार पैग़म्बर का पवित्र जीवन, उनके अह्लेबैत (परिवारजन) और क़ुरआन है। इस्लामी मान्यता के अनुसार हर देश और हर काल में युग-पुरुष आकर इंसान को दुनिया में रहने का तरीक़ा बताते रहे हैं। ख़ुदा का संदेश लाने वालों को पैग़म्बर कह कर पुकारा गया है। क़ुरआन शरीफ़ में भी कहा गया है

वमा मुहम्मदुन इल्ला रसूल कदखलत मिन्‌कब्लेहिर्रोसोलो

अर्थात्‌ ख़ुदा का पैगाम लाने वाले दुनिया में लगातार आते रहे हैं, हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उनमें से एक हैं। रिसालात (रसूल का बहुवचन) को इस्लाम में मौलिक स्थिति प्राप्त है। रसूल का चुनाव अल्लाह अपनी पसंद से करते हैं, जिसे इस्तफ़ा (अनेक वस्तुओं में से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव) कहा जाता है। आदम से लेकर हज़रत मुहम्मद साहब तक एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर की संख्या बताई गई है। पृथ्वी पर जितने प्रेषित आये उनमें से सिर्फ 25 प्रेषितों के नाम क़ुरआन में लिए है जैसे के – आदम! जिनकी हम सब संतान है, तो हम अपने-आपको आदमी कहते है, इसी तरह नूह, या जिसको नोहा कहते है, इब्राहीम (अब्राहम), मूसा (मोसेस), ईसा (यशु) और प्रेषित मोहम्मद इन सबको भेजे थे उनके साथ कुछ ग्रंथ भेजे और क़ुरआन ने 3 ग्रंथो के नाम अपने अलावा अर्थात कुल 4 तौरात (धर्म-पुस्तक, अल्लाह की वाणी), या ग्रंथों के नाम लिए है, ये है

1.   तौरेत (तौरह) – यह ग्रंथ प्रेषित मूसा (अलैहि सलाम) पर अवतरण हुआ था

2.  ज़बूर – यह ग्रंथ प्रेषित दाऊद (अलैहिस्सलाम) पर अवतरण हुआ था जिन्हें डेविड कहते है, दाऊद अलैहिस्सलाम पैगंबर तालूत की सेना में एक सैनिक थे, जिन को अल्लाह ने राज्य देने के साथ नबी भी बनाया। उन्हीं के पुत्र सुलैमान अलैहिस्सलाम थे। दाऊद अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने धर्म पुस्तक ज़बूर प्रदान की। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का जीवन साहस, अल्लाह पर अटूट विश्वास, और न्याय का एक महान उदाहरण है।

3.  इंजील (बाइबिल) – प्रेषित ईसा मसी (अलैहिस्सलाम) पर अवतरित हुआ था,

4.  क़ुरआन – ये ग्रंथ ईश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर इसका अवतरण हुआ था इसका एक नाम फुरकान भी है, अर्थात कसौटी (Criteria, "सत्य और असत्य के बीच अंतर करने वाला"), फर्क करने वाली किताब, अर्थात अच्छे और बुरे को अलग करनेवाली किताब है ये क़ुरआन अपने पूर्व की धर्म पुस्तकों का केवल पुष्टिकर ही नहीं, कसौटी (परख) भी है।  यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब तौरात तथा इंजील और क़ुरआन सब एक ही सत्य लाये हैं, तो फिर इन के धर्म विधानों तथा कार्य प्रणाली में अन्तर क्यों है? क़ुरआन उस का उत्तर देता है कि एक चीज़ मूल धर्म है, अर्थात एकेश्वरवाद तथा सत्कर्म का नियम, और दूसरी चीज़ धर्म विधान तथा कार्य प्रणाली है, जिस के अनुसार जीवन व्यतीत किया जाये, तो मूल धर्म तो एक ही है, परन्तु समय और स्थितियों के अनुसार कार्य प्रणाली में अन्तर होता रहा है, क्योंकि प्रत्येक युग की स्थितियाँ एक समान नहीं थीं, और यह मूल धर्म का अन्तर नहीं, कार्य प्रणाली का अन्तर हुआ।

इस्लामी क्रांति के प्रवर्तक, मानव अधिकारों के संरक्षक और अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पैग़म्बर हज़रत अबुल क़ासिम मुहम्मद मुस्तफ़ा इब्न अब्दुल्लाह का जन्म 570 ई. (अधिकांश सुन्नी परंपराओं के अनुसार 12 रबीअ-उल-अव्वल जबकि शिया परंपराओं के अनुसार 17 रबी-उल-अव्वल को (आम-अल-फ़ील (हाथी का वर्ष) में अरब के  रेगिस्तान के मक्का नामक शहर के मुहल्ला बनू हाशिम के क़ुरैश क़बीले में हुआ था। उनकी पीढ़ियों का क्रम हज़रत इब्राहिम के पुत्र हज़रत इस्माइल से जाकर मिल जाता है। अरबी रिवाज़ के मुताबिक़ उनका पूरा नाम मुहम्मद बिन-अब्दुल्लाह (अब्दुल्लाह का बेटा मुहम्मद) था। मुहम्मद का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो' (प्रशंसनीय)। उनके पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्दुल मुत्तलिब थे और माताश्री हज़रत आमिना बिन्त वहब थीं। उनकी माता ज़ोहरा क़बीला के प्रमुख वहब फ़हरी की पुत्री थीं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पूर्वजों में से एक हज़रत कोसई, क़ुरैश क़बीला से थे। यह क़बीला बड़ा ही दबंग था। हज़रत कोसई ने ख़ुद को कभी बादशाह तो नहीं कहा, पर व्यावहारिक तौर पर वे मक्का के बादशाह ही थे। उन्हें मक्का का व्यवस्थापक बनाया गया था। उनके बाद भी इसी वंश के लोग काबा के प्रबंधक रहे। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के जन्म के समय मक्का मूर्तियों का गढ़ था। केवल काबा में 360 मूर्तियाँ थीं और उनका वंश कुरैश ही उसका पुजारी था। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के क़बीले का नाम बनू हाशिम था, जो उनके पूर्वज हज़रत हाशिम के नाम पर पड़ा था। हालाँकि उनका नाम उमरू था, पर समस्त मक्का वासियों को हशम (रोटी को चूरा कर शोरबा में भिंगाकर खिलाना) खिलाया था, इसलिए वे हाशिम कहलाए। पवित्र तीर्थ-स्थल काबा का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य रूप से हाशिमी ख़ानदान के ही हाथ में था।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के दादा, हज़रत हाशिम के पुत्र हज़रत मुत्तलिब एक विराट और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके दस बेटों में से एक पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह थे। व्यापार के सिलसिले में वे शाम गए थे और व्यापारिक यात्रा करके जब वापस आ रहे थे तो मदीना में बीमार हो गए और वहीं हज़रत अब्दुल्लाह का 25 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उस समय माताश्री आमिना गर्भवती थीं। हज़रत अब्दुल्लाह की मृत्यु के दो महीने बाद हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म हुआ। उनके जन्म के छः वर्ष बाद माता का भी निधन हो गया। माताश्री आमिना बीबी उन्हें लेकर दो सौ मील दूर मदीना (यथरिब) गयी थीं। उन दिनों सफ़र में बहुत-सी तकलीफ़ें झेलनी पड़ती थी। हज़रत आमिना बीबी जब अपने पति हज़रत अब्दुल्लाह की कब्र देखने और रिश्तेदारों से मिलने के बाद वापसी की यात्रा कर रही थीं तो उनका रास्ते में ही अल-अब्वा (Al-Abwa)  नामक स्थान पर देहांत हो गया। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पौत्र का बड़े प्यार से लालन-पालन किया। माताश्री बीबी आमिना की मृत्यु के दो वर्ष बाद, जब हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. आठ साल के थे तो दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का भी देहावसान हो गया। अब उनकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पुत्र हज़रत अबू तालिब (अ.स.) पर आ गई।

मक्का की सरदारी और राज्य को लेकर कुरैश जनजाति के कबीलों, विशेष रूप से बनू हाशिम (हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का परिवार) और बनू उमय्या (हरब इब्न उमय्या का परिवार) के बीच प्रतिस्पर्धा थी।  हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की मृत्यु (लगभग 578 ईस्वी) के बाद राज्य और सरदारी उन्हीं के वंशज की दूसरी शाखा उम्मैय्या के पुत्र हरब इब्न उमय्या ने हथिया ली। ये लोग हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के परिवार के घोर शत्रु थे। हरब ने ज़मज़म, जिसको खुदाई करके हज़रत हाशिम ने बरामद किया था, और तीर्थ-यात्रियों का सेवा कार्य भी अपने सुपुत्र अब्बास को दे दिया। इस तरह हर प्रकार से हज़रत अबू तालिब को सत्ता से बाहर कर दिया गया। उन्होंने अपने भतीजे हज़रत मुहम्मद के पालन-पोषण और रक्षा को अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लिया। मक्का में कुरैश के कड़े विरोध के बावजूद, उन्होंने अंतिम सांस तक पैगंबर मुहम्मद की रक्षा की और उन्हें कबीले की दुश्मनी से बचाए रखा। इस काम को अंजाम देने में उनकी पत्नी हज़रत फ़ातिमा-बिन्ते-असद ने उनकी भरपूर मदद की। हज़रत मुहम्मद ने भी हज़रत फ़ातिमा को अपनी माताश्री के रूप में हमेशा सम्मान दिया। यहां तक कहा जाता है कि जब चाची हज़रत फ़ातिमा का स्वर्गवास हुआ, तो जनाज़े के गहवारा (पालना, झूला, हिंडोला) के नीचे-नीचे हज़रत मुहम्मद चलते रहे। किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, जितनी देर तक माताश्री की छत्रछाया सर पर बनी रहे, उचित ही है!

5.4 हज़रत ख़दीजा (रज़िअल्लाहु अन्हा)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) अपने चाचा के काम में भी हाथ बंटाने लगे। उनके चाचा हज़रत अबू तालिब व्यापार करते थे। तेरह साल की उम्र में तिजारत (वाणिज्यिक व्यापार) में अनुभव हासिल करने के सिलसिले में चाचा के साथ वे शाम (सीरिया) गए। जब वे पच्चीस साल के थे तो पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. को किसी व्यापारिक काम से मक्का की सबसे धनवान महिला हज़रत ख़दीजा-बिन्त-खुवायलद  (र.अ.)  के माल के साथ जाना पड़ा। वे एक संभ्रांत महिला थीं। उनका घर बनू हाशिम क्षेत्र में स्थित था। उन्होंने गरीबों को भोजन और वस्त्र प्रदान किए, अपने रिश्तेदारों को आर्थिक सहायता दी और गरीब रिश्तेदारों को शादी के खर्चों में मदद की। वह धनी भी थीं और ताक़तवर भी। वह 556 ईसवी में मक्का में पैदा हुईं। सुशीलता, पवित्रता और चरित्रवान होने के कारण लोग उन्हें ‘ताहिरा (पवित्र) नाम से पुकारा करते थे। उनके दादा, असद इब्न अब्द-अल-उज्जा, असद कबीले के [मक्का में कुरैश़ जनजाति के पूर्वज] थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) एक अमीर सौदागर खुवायलद इब्न असद  की बेटी थीं। इस सौदागर ने अपने पुश्तैनी काम को बढ़ा कर एक बड़े कारोबारी साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। लेकिन एक युद्ध में पिता की मौत के बाद हज़रत खदीजा (र.अ.) ने ख़ुद आगे बढ़ कर इस कारोबारी साम्राज्य की बागडोर संभाल ली। उनकी मां फातिमा बिन्त ज़ैदह्, कुरैश़ के आमिर इब्न लुऐइ कबीले की सदस्य थी। हज़रत ख़दीजा अपना सारा कामकाज़ मक्का (सऊदी अरब) से ही करती थीं। कारोबार के सिलसिले में उन्हें मध्य-पूर्व के देशों में सामान ले जाने वाले कारवाँ रवाना करने पड़ते थे। ये कारवाँ लंबा सफ़र तय करते थे। ये दक्षिणी यमन से लेकर उत्तरी सीरिया तक की राह नापते थे। हालाँकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को काफ़ी सारा धन अपने परिवार से विरासत में मिला था लेकिन उन्होंने ख़ुद भी काफ़ी संपत्ति कमाई थी। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपनी ही तरह की विलक्षण कारोबारी थीं। वह अपने फ़ैसले ख़ुद लेती थीं। उनमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। वह ख़ुद अपने कर्मचारियों का चयन करती थीं। वे ऐसे ख़ास हुनर वाले लोगों को चुनती थीं जो उनका व्यापार बढ़ाने में मददगार साबित हों। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) निश्चित तौर पर अपनी तरह से ज़िंदगी जीना चाहती थीं। वह अपनी राह पर चलती थीं।

वह बंधन में रहना पसंद नहीं करती थीं। वह काफ़ी मज़बूत इरादों वाली महिला थीं। उन्होंने अपने रिश्तों के भाइयों (कजिन) से शादी करने से इनकार कर दिया था। उनके परिवार में यह परंपरा चली आ रही थी। लेकिन वह ख़ुद अपना जीवनसाथी चुनना चाहती थीं। उन दिनों के तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने उनके सामने शादी के प्रस्ताव रखे लेकिन उन्होंने इनमें से अधिकांश को ठुकरा दिया। आख़िरकार उन्होंने दो शादियां कीं। उनके पहले पति का निधन हो गया और माना जाता है कि दूसरे पति से उन्होंने ख़ुद अलग होने का फ़ैसला किया था। इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब फिर कभी शादी नहीं करेंगी। लेकिन थोड़े वक्त के बाद उनकी ज़िंदगी में एक तीसरा शख़्स आया। वह थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. । उन दिनों वह किसी भागीदार के साथ साझा व्यापार किया करती थीं। अपना कारोबार का कामकाज देखने के सिलसिले में उन्हें एक ऐसे शख्स के बारे में पता चला जो बेहद ईमानदार और मेहनती माना जाता था। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से उनकी मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात से संतुष्ट ख़दीजा (र.अ.) ने उन्हें अपने एक कारवाँ की अगुआई करने के लिए चुन लिया।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपने व्यापारिक कारवां के साथ यात्रा नहीं करती थी।

यह कहा जाता है कि कुरैश के व्यापार कारवाँ जब गर्मियों में यात्रा करने के लिए सीरिया या सर्दियों में यात्रा पर यमन के लिए एकत्र होते, तब हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के कारवाँ को भी कुरैश के अन्य सभी व्यापारियों के कारवाँओं के साथ रखा जाता था।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) व्यापार कारवाँ के साथ यात्रा नहीं करती थी, बल्कि नौकरों को अपनी ओर से व्यापार करने के लिए कमीशन पर नियुक्त करती थीं। 595 ई. में सीरिया में एक सौदे के लिए ख़दीजा को एक एजेंट की ज़रूरत पडी। हज़रत अबू तालिब इब्न अब्द अल मुतालीब ने उनके दूर के चचेरे भाई मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला की सिफारिश की।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने हज़रत मुहम्मद सल्ल. को काम पर रखा, तब वे 25 साल के थे। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने न सिर्फ़ उस धनवान स्त्री हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के व्यापार में सहयोग किया बल्कि उस बार व्यापार में उन्हें दोगुना से भी ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उनमें कुछ अद्भुत गुण देखे थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) उस शख्स की दृढ़ता से बेहद प्रभावित थीं। कारोबार के सिलसिले में ख़दीजा (र.अ.) से उनका वास्ता बढ़ता गया। उस शख़्स ने हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को इतना प्रभावित किया कि आख़िरकार उन्होंने उनसे शादी करने का फ़ैसला कर लिया। इस तरह एक पति के निधन और दूसरे से अलगाव के बाद फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला करने वाली हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने अपना फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला बदल दिया था। कई अमीर कुरैश पुरुष पहले से ही हज़रत ख़दीजा से शादी के लिए हाँ कह चुके थे, लेकिन उन्होंने सभी को मना कर दिया था।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उस ज़माने के चलन के उलट ख़ुद उनकी उच्च विशेषताओं से प्रभावित होकर उनके पास विवाह करने का संदेश भिजवाया। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. उस समय पच्चीस के थे और एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे, जबकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) मक्का की सबसे धनवान महिला थीं और चालीस साल की हो चुकी थीं। पैग़म्बर मोहम्मद अनाथ थे। उनको उनके चाचा ने पाला-पोसा था। फिर भी  595 ई. में राज़ी-ख़ुशी निकाह हुआ, उनके दूसरे चाचा हज़रत हम्ज़ा ने निकाह पढ़कर उनका  विवाह सम्पन्न किया। जीवन-पर्यन्त हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने बड़े प्रेम और वफ़ादारी से पैग़म्बर का साथ निभाया। जन्म से ही हज़रत मुहम्मद सल्ल. ग़ुरबत (कंगाली, दरिद्रता) झेलते आए थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में अचानक 'काफ़ी निश्चिंतता और आर्थिक समृद्धि' आ गई, शादी के बाद वे दौलतमंद हो गए थे। मगर उनका रुझान दुनिया के ऐशो-आराम में न था। इसके बाद तो हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का सारा जीवन और धन-दौलत इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ। माना जाता है कि इस दंपति की चार संतानें हुईं। लेकिन एक बेटी को छोड़ कर बाक़ी बचपन में ही गुज़र गईं। उनकी सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (र.अ.) थीं। उनका विवाह हज़रत अली-बिन-अबूतालिब से हुआ था। इन दोनों के पुत्र इमाम हसन (शब्बर) और इमाम हुसैन (शब्बीर) थे, समूहिक रूप से इन्हें हसनैन कहा जाता है। इनकी सुपुत्रियां हज़रत ज़ैनब और हज़रत उम्मे-कुल्सूम थीं।

हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने एक युवा संगठन हल्फ़-उल-फ़ुज़ूल (फ़ाज़िलों की मंडली) बनाया। अभी उनकी उम्र 25 वर्ष की थी। यह अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना करने वाला एक ऐतिहासिक कबीलाई संघ था। बड़े आश्चर्य की बात है कि उनके इन प्रयासों, उच्चतम जीवन मूल्यों, सत्यवादिता, के कारण उस समय के समाज ने उन्हें अस्‌-सादिक़ (परम सत्यवादी) और अलअमीन (परम विश्वासी, निष्ठावान) की उपाधियों से अलंकृत किया, किन्तु जब 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने पैग़म्बर होना घोषित किया, तो वही समाज और प्रशंसक उनके घोर शत्रु हो गए, खासकर अरब का धनवान वर्ग, जिसका नेतृत्व उमैय्या वंश कर रहा था।

ऐसा माना जाता है कि इस्लाम प्राचीन धर्मों के विकास का अंतिम पड़ाव है। क़ुरआन में कहा गया है, कोई जाति ऐसी नहीं है, जिसमें निर्देशित करने वाला (नबी या पैग़म्बर) न हुआ हो। (क़ुरआन : 35/24)। इस्लाम धर्म की यह विशेषता है कि यह किसी जनसमूह, समाज या देश तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त मानव प्राणी, देश-समाज और काल इसकी परिधि में आते हैं। इस्लाम यानी सुख-शांति मतलब यह कि जो भी सुख-शांति में विश्वास करता है, इसका अनुयायी है। इस्लाम शब्द सुलह-समझौता, कुशलता, विनम्रता, आज्ञापालन, समर्पण आदि अर्थों में भी आता है। इसका ईश्वर सिर्फ़ मुसलमानों का पूज्य नहीं है, बल्कि वह तो रब्ब-उल-आलमीन है यानी सारी दुनिया का पालनहार है, वह रहमत-उल-आलमीन यानी सारी दुनिया का दया निधान है। (क़ुरआन : 1 / 2, 21/107)। इसका संदेश सभी मानव जाति के लिए एक समान है।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

479. विभाजन की स्वीकारता पर मुहर

राष्ट्रीय आन्दोलन

479. विभाजन की स्वीकारता पर मुहर

1947

दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन हुआ। नेहरूजी ने उसमें भारी मन से घोषणा की कि विभाजन ही सबसे कम घातक और अंतिम उपाय बचा था। इसलिए अनिच्छा के साथ विभाजन स्वीकार करना अनिवार्य हो गया था। उस दिन भारत के विभिन्न भागों में लोगों ने जमकर खुशियाँ मनायीं। दिल्ली में जब संविधान सभा के अध्यक्ष ने मोहनदास करमचंद गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि देते हुए संविधान सभा की बैठक शुरू की तो बहुत देर तक करतल ध्वनि होती रही। एसेम्बली के बाहर भीड़ महात्मा गाँधी की जय के नारे लगा रही थी। कांग्रेस और लीग दोनों ने विभाजन स्वीकार कर लिया था। बहुत से लोगों को विभाजन के विरुद्ध प्रचंड और उग्र आंदोलन की आशा थी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। जब कांग्रेस और लीग ने विभाजन की योजना पर हस्ताक्षर कर दिया था, तो राजनीतिक अर्थ में विभाजन की योजना उनके लिए जीवित प्रश्न नहीं रह गई।

बुनियादी मतभेद होने के बावजूद भी, जब गांधीजी ने देखा कि कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन को अपना लिया है, तो उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस के उन प्रतिनिधियों से नेहरू और पटेल के रुख़ का समर्थन करने का और विभाजन को स्वीकार करने का अनुरोध किया। गांधीजी जानते थे कि विदेशी तंत्र के सामने सत्याग्रह सरल था, लेकिन अब किसका विरोध करें? सब तो अपने थे। अपने विश्वस्त साथियों से क्या असहयोग करना या विवाद खड़ा करना? कांग्रेस मंत्रिमंडल पहले शांति-स्थापना की मांग करती और बाद में विभाजन स्वीकार करती तो ज़्यादा सही होता। हिंसा और आतंक की धमकी से पाकिस्तान की मांग करना ग़लत था। लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल ने शांति-स्थापना का आग्रह ही नहीं किया। लीग की गतिविधियों से त्रस्त और सरकारी अफसरों की दगाबाज़ी से परेशान कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन पर सहमति ज़ाहिर कर दी। जिन्ना की तो मन की मुराद पूरी हो गई। वायसराय ने 4 जून को गांधीजी को बुलाया, और उन्हें यह समझाने की पूरी कोशिश की कि विभाजन की योजना का विरोध करना क्यों उचित नहीं है। अपनी प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, लोकतंत्र में साधारण लोग ही सच्चे मालिक हैं। उनके नेता, जो अब सरकार में चले गए हैं, उनके सेवक हैं। इसलिए भारतीयों को अपने नेताओं को कठिन निर्णय लेने के लिए अकेले छोड़ने और बाद में अपने संतोष के लायक़ काम न होने पर उन्हें दोष देने के बजाए उन्हें बताना चाहिए कि वे क्या करें। कांग्रेस की राय है कि उसे परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा। पक्ष-विपक्ष का सावधानी से विचार करके उन्होंने अनिच्छापूर्वक विभाजन को मान लिया है। वायसराय को दोष देने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने खुल्लम-खुल्ला कह दिया था कि वे संयुक्त भारत चाहते हैं, परन्तु जब कांग्रेस ने मुसलिम लीग की स्थिति को मान लिया तब वे कुछ नहीं कर सके। मैंने भरसक प्रयत्न किया कि लोग संयुक्त भारत के पक्ष में डटे रहें, परन्तु मेरी कुछ नहीं चली। ऐसी परिस्थिति में मेरा और आपका क्या कर्तव्य है? क्या हम कांग्रेस के ख़िलाफ़ विद्रोह करें? जहां तक मेरा संबंध है, मैं तो कांग्रेस का सेवक हूं, क्योंकि मैं देश का सेवक हूं। मैं कभी कांग्रेस संगठन के साथ बेवफाई नहीं कर सकता। विभाजन निश्चित वस्तु बन चुका है। वह तो हो गया सो हो गया। लेकिन उसके ज़हर को मारा जा सकता है। उसने घृणा और शत्रुता की भावना बढ़ा दी है। उसे दबा कर मिठास और सद्भाव के साथ विभाजन के ब्यौरे की बातें तय कर ली जाएं, तो दोनों भाग अभी भी एक-दूसरे के स्थायी शत्रु बनने तथा एक-दूसरे के लिए और दुनिया की शांति व सुरक्षा के लिए ख़तरा बनने के बजाए मित्रों तथा भले पड़ोसियों की तरह साथ में रह सकते हैं।

अपने इस ध्येय को आगे बढ़ाने के लिए गांधीजी ने 6 जून को माउंटबेटन से मुलाक़ात की। उससे कहा जब भी आपको मौक़ा मिले आप जिन्ना को समझाएं कि अब तो निर्णय हो चुका है। आपको अपना पाकिस्तान मिल गया। आब आप ख़ुद जाकर कांग्रेस के नेताओं से मित्रों की तरह बातचीत क्यों न कर लें और शेष बातों पर आपस में निबटारा करने की कोशिश क्यों न करें? जिन्ना को समझाएं कि वे जाकर पूर्व पंजाब और पश्चिम बंगाल के ग़ैर-मुसलिम अल्पसंख्यकों को अपना बना कर पंजाब और बंगाल के विभाजन को रोकें। 7 जून को गांधीजी ने माउंटबेटन से हुई बातचीत का सार नेहरू को पत्र लिखकर बता दिया। गांधीजी के सुझाव के अनुसार माउंटबेटन ने जिन्ना से बात की, लेकिन उसका कोई फल नहीं निकला।

जामिया मिलिया इस्लामिया से मुसलमानों की मंडली गांधीजी से मिलने आई। विभाजन के भावी परिणामों से वे आशंकित थे। गांधीजी ने उनसे कहा, अगर एक पक्ष भी हिंसा का पूरी तरह परित्याग करने और अहिंसा की शक्ति पर निर्भर रहने का निश्चय कर लेता, तो साम्प्रदायिकता की फैलती हुई आग अपने आप बुझ जाती। पंजाब से सिक्ख नेता मास्टर तारा सिंह गांधीजी से मिलने आए। पंजाब का एक-तिहाई से अधिक भाग पाकिस्तान में चला जाने वाला था। गांधीजी ने उनसे कहा, आपस की फूट के कारण ही भारत का विभाजन हुआ है। पूना से आए विद्यार्थियों के एक दल को उन्होंने कहा, भारत ने स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए सत्य और अहिंसा की पद्धति को लक्ष्य के रूप में नहीं बल्कि एक साधन के रूप में अपनाया था, इसलिए ज्यों ही वह लक्ष्य सिद्ध हुआ वे दोनों हमसे अलग पड़ गए। नतीजा हमारी आज की दुर्दशा है।

उन्हीं दिनों एक प्रस्ताव आया कि गांधी-परिवार का पैतृक मकान राष्ट्र के लिए ले लिया जाए। गांधीजी की एक संबंधी महिला वहां रहती थीं। उन्होंने इसे संपत्ति हरण समझा और उसके विरुद्ध गांधीजी से सहायता मांगी। गांधीजी ने उसे समझाया, तुम्हें यह मकान छोड़ देना चाहिए और जो भी मुआवज़ा मिले उससे संतोष करना चाहिए। मुझे स्मारकों की परवाह नहीं है। ... लेकिन यदि हमारे पैतृक घर का की अच्छा उपयोग होता है, तो तुम्हें या तुम्हारे सलाहकारों को उसमें बाधक नहीं बनना चाहिए।

इन्हीं दिनों एक वाकया हुआ। गांधीजी ने एक दिन प्रार्थना सभा में कहा, वह समय तेज़ी से आ रहा है, जब भारत को अपन पहला राष्ट्रपति चुनना होगा। यदि चक्रैया ज़िन्दा होता, तो मैं इस पद के लिए ख़ुशी से उसके नाम का प्रस्ताव रखता। उसने आपने आप को मानव-जाति की सेवा में पूरी तरह अर्पण कर दिया था। वह हरिजन था। परन्तु छूत-अछूत का, हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं रखता था उसके लिए सब मनुष्य थे और वह सच्चे अर्थ में मनुष्य था। लेकिन आज वह हमारे बीच नहीं रहा। फिर भी मुझे इस विचार से ख़ुशी होगी कि कोई भंगी की लड़की हमारा प्रथम राष्ट्रपति बने। ऐसी लड़कियां मौज़ूद हैं। ... भारतीय गणतंत्र के भावी राष्ट्रपतियों के लिए अंग्रेज़ी जानना ज़रूरी नहीं होगा। ... मैंने 1917 या 1918 में ही एक सार्वजनिक भाषण में कह दिया था कि जब तक कोई मोची या भंगी भारत का राष्ट्रपति नहीं बनेगा, तब तक मुझे संतोष नहीं होगा।

7 जून को हिन्दू महासभा का एक दल गांधीजी से मिलने आया। उसमें से एक सदस्य ने कहा, प्रार्थनाओं में क़ुरान की आयतें न पढ़वाई जाएं। ... आपको राजनीति से हट जाना चाहिए। जितनी जल्दी आप हटेंगे उतना ही भारत का भला होगा। गांधीजी ने जवाब दिया, मेरा जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित है। मेरी राजनीति सत्य और अहिंसा के आदर्शों का सामाजिक क्षेत्र में किया जाने वाला विस्तार या प्रयोग मात्र है। मैं इन आदर्शों के प्रचार में मर जाना पसंद करूंगा, परन्तु स्वाधीनता के बदले में उन्हें छोड़ना पसंद नहीं करूंगा। इसलिए आपकी सलाह न मानने के लिए आप मुझे क्षमा करें। उसके बाद समाजवादियों का एक दल गांधीजी से मिलने आया। समाजवादी कांग्रेस के नेताओं से अलग हो गए थे। दोनों समूहों के बीच सैद्धान्तिक मतभेद थे। विभाजन की योजना कांग्रेस द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के कारण समाजवादी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से नाराज़ थे। गांधीजी ने उन्हें समझाया, अब विदेशी लोग जा रहे हैं। सत्ता भारतीयों के हाथ में आने वाली है। अब अगर सहयोग-वृत्ति प्रकट करने के बजाए आप लोग अड़ंगेबाज़ी की नीति अपनाते रहेंगे तो देश की कुसेवा होगी। कांग्रेस के नेता जो कुछ कर रहे हैं, वह यदि आपको नापसंद है, तो आपको उनसे मिल कर चर्चा करनी चाहिए और मित्रतापूर्ण ढंग से आपसी भेद मिटा लेना चाहिए।

लंबे समय तक गांधीजी के सेक्रेटेरियल स्टाफ़ की सदस्य के तौर पर काम करने वाली राजकुमारी अमृत कौर उनसे मिलने आई। इन दिनों वे संविधान सभा का काम देख रही थीं। इसलिए उन्हें गांधीजी से अलग रहना पड़ता। लेकिन जब भी उन्हें समय मिलता वह गांधीजी की सहायता करने आ जातीं। 8 जून को तपती दोपहरी में वह आईं, तो गांधीजी ने उनसे कहा, इतनी तेज़ धूप में आने की क्या ज़रूरत थी। संविधान सभा में जो काम तुम कर रही हो, वह भी मेरी सेवा ही है। उन दिनों गांधीजी का रक्तचाप बढ़ा रहता था। सीमाप्रांत से जो ख़बरें आ रही थीं, उससे गांधीजी को काफी वेदना हो रही थी। किसी ने गांधीजी को तार भेजा, भारत के विभाजन को कांग्रेस ने मान लिया है, लेकिन चारों ओर उसका तीव्र विरोध है। ऐसी स्थिति में क्या आप आमरण अनशन नहीं करेंगे? गांधीजी ने जवाब दिया, ऐसे उपवासों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। कांग्रेस का मेरे विचारों से मतभेद हैं, क्या इसीलिए मैं उपवास करूं?

9 जून को सुबह की सैर के समय हिन्दू महासभा के दो युवक आए और गांधीजी से कहने लगे, आप महात्मा नहीं हैं। आप हिन्दुओं को अहिंसा का उपदेश करके दुर्बल बना रहे हैं। गांधीजी ने उनसे कहा, तुम नहीं जानते कि तुम्हारे आपत्ति करने के बहुत पहले ही मैंने महात्मा की पदवी छोड़ दी है। ... जो लोग पाकिस्तान के अत्याचार का बदला लेना चाहते हैं, तो सही तरीक़ा यह है कि वे पाकिस्तान जाकर अत्याचार करने वाले से लड़ें। भारत में रहने वाले मुसलमानों से कायरतापूर्ण बदला लेने में कोई बहादुरी नहीं हो सकतीं। उन युवकों के चले जाने के बाद उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, मेरी इच्छा सारे देश में दौरा कर के एक नया आंदोलन छेड़ने की हो रही है। मैं देश के नौजवानों को रचनात्मक कार्य में लगाना चाहता हूं। मैं देश के लिए कुछ न कुछ करने का उत्साह उनमें देख रहा हूं। उस उत्साह को कोई सहारा नहीं मिल रहा है। इससे उसके ग़लत दिशा में जाने का ख़तरा है। लगातार काम करते रहने से गांधीजी के शरीर की ऊर्जा समाप्त हो गई थी। स्नानघर में व चक्कर खा कर गिर गए। पांच मिनट बाद होश आया तो वे बाहर निकले। बाहर में राजाजी और घनश्याम दास बिरला उनका इंतज़ार कर रहे थे। गांधीजी का पीला चेहरा देखकर उन्हें चिंता हुई। उन्होंने गांधीजी को सूचना दी कि प्रयत्नपूर्वक यह समाचार फैलाया जा रहा है कि आपका अपने साथियों के साथ मतभेद हो गया है और कांग्रेस महासमिति में आप कार्यसमिति के निर्णय के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएंगे। गांधीजी ने कहा, विभाजन के बारे में मेरा कार्यसमिति से मतभेद हो सकता है। मैंने मतभेद प्रकट भी किया है। लेकिन मेरा यह भी कहना है कि समिति ने जो निर्णय किया है उसे सभी कांग्रेसियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए। संविधान के अनुसार कांग्रेस महासमिति ने अपना अधिकार कार्यसमिति को सौंप दिया था, इसलिए वह कार्यसमिति के निश्चय को गंभीर विचार के बिना नहीं ठुकरा सकती।

14 जून को नेहरू ने गांधीजी को कहा, शाम की महासमिति में आपको भाषण देना होगा। गांधीजी ने अपने भाषण में कहा, विभाजन पर कार्यसमिति के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना या उसमें संशोधन करना आप लोगों के लिए अनुचित होगा। सदन को ऐसा करने का अधिकार तो है, परन्तु सदस्यों को याद रखना चाहिए कि कार्यसमिति ने आपके प्रतिनिधि की हैसियत से योजना को स्वीकार किया है। आपका कर्तव्य है कि आप कार्यसमिति का समर्थन करें। नेहरू ने अपने वक्तव्य में कहा, लीगी सदस्यों के भीतर से तोड़-फोर करने और अंग्रेज़ों द्वारा अपने हाथ में नियंत्रण रखने के कारण अंतरिम सरकार देश में फैलती हुई अराजकता का सामना करने में इतना असमर्थ हो गई थी कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने देश के विभाजन की क़ीमत चुका कर भी इस असह्य स्थिति से बचने में सुख माना। पंजाब और बंगाल के विभाजन जो समस्या उपजी है, हमें उसे रोकने के लिए दृढ़ संकल्प होना है। अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे हैं। भारत की क़ानून व्यवस्था में उनकी अब कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। वे अधिक जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं। इन सब परिस्थितियों के कारण हमें लगा कि विभाजन को स्वीकार कर लेना ज़्यादा अच्छा है। पटेल ने नेहरू की बातों का समर्थन करते हुए कहा, हमारे सामने स्पष्ट वास्तविकताएं थीं। हमें यह चुनाव करना था कि भारत का एक ही विभाजन हो या अनेक हों। कांग्रेस के लिए तथ्यों का सामना करना ज़रूरी था। वह भावुकता में नहीं बह सकती थी। महासमिति इसे पसंद करे य न करे, असल में तो पंजाब और बंगाल दोनों में पहले से ही पाकिस्तान मौज़ूद है। ऐसी परिस्थितियों में मैं वास्तविक पाकिस्तान को अधिक पसंद करूंगा, क्योंकि तब उन लोगों को जिम्मेदारी का कुछ ख़्याल रहेगा। 9 घंटों की बहस के अंत में कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने निजी स्पष्टीकरण दिए। मैं पिछले तीस बरसों से गांधीजी के साथ रहा हूं। उनके प्रति मेरी निष्ठा कम नहीं हुई है। यह निष्ठा व्यक्तिगत नहीं, राजनीतिक है। जब मेरा उनसे मतभेद भी हुआ है, तब भी मैंने उन्हें राजनीतिक दृष्टि से अधिक सही माना है। आज भी मुझ लगता है वे और उनकी परम निर्भयता सच्ची है और मेरा रवैया दोषपूर्ण है। तब मैं उनके साथ क्यों नहीं हूं? क्योंकि मुझे लगता है कि सामुदायिक आधार पर समस्याओं का हल करने का अभी उन्हें कोई उपाय नहीं मिला है।  जब उन्होंने हमें अहिंसक असहयोग आंदोलन सिखाया, तब उनके पास एक निश्चित पद्धति थी। हमने उसका अनुसरण किया था। आज वे स्वयं अपना मार्ग खोज रहे हैं। वे नोआखाली में रहे। उनके प्रयत्न से स्थिति में सुधार हुआ। अब वे बिहार में हैं। वहां की स्थिति भी सुधरी है। परन्तु इससे पंजाब की आग नहीं बुझ रही है। वे कहते हैं कि मैं बिहार में सारे भारत के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की समस्या का हल ढूंढ रहा हूं। संभव है, ऐसा हो। परन्तु यह समझना कठिन है कि उसे हल कैसे किया जा रहा है। निश्चित कदम दिखाई नहीं दे रहे, जो हमें वांछित ध्येय तक पहुंचा सके। और फिर हमारे दुर्भाग्य से आज गांधीजी नीतियां तो निर्धारित कर सकते हैं, परन्तु वे कार्यान्वित मुख्यतः दूसरों के द्वारा की जाती हैं। और ये लोग उनकी विचारधारा के मानने वाले नहीं बने हैं। इस दुखद परिस्थिति में ही मैंने भारत के विभाजन का समर्थन किया है। मतगणना के बाद प्रस्ताव के पक्ष में 157 मत पड़े और विपक्ष में 15। विभाजन की स्वीकारता पर मुहर लग गई।

कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण से यह स्पष्ट था कि उन्होंने अहिंसा के असफलता की बात नहीं की थी। उन्होंने यह स्वीकारा था कि केवल बौद्धिक विश्वास पर आधारित अहिंसा अपर्याप्त है। अपनी आंखों के सामने हिंसा के भीषण दृश्यों को बुद्धि की आंख से देखकर वे घबरा उठे थे। गांधीजी ने उसी दृश्य को श्रद्धा की दृष्टि से देखा था। उन्होंने असुरक्षितता में भी सुरक्षितता महसूस की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विभाजन ही कांग्रेस अध्यक्ष को सबसे सुरक्षित मार्ग लगा। बाद के वर्षों में लगभग सभी बड़े नेताओं ने अपनी ग़लती स्वीकार की। 16 अक्तूबर, 1949 को न्यूयॉर्क की एक सभा में नेहरू ने स्वीकार किया, अगर हमें हत्याकांड के रूप  में होने वाले भयंकर परिणामों का ज्ञान होता, तो हम भारत के विभाजन का प्रतिकार करते। मौलाना आज़ाद ने एक वक्तव्य में 2 वर्ष बाद कहा था, उस समय बापू की बात न मान कर हमने बड़ी भूल की। राजेन्द्र प्रसाद ने दुखित हो कर कहा था, काश, हमें यह परिणाम मालूम होता! भारत के सभी बड़े नेताओं के प्रति आचार्य कृपलानी के भी विचार बदल गए थे और उन्हें वे विभाजन का जिम्मेदार मानने लगे थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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