गांधी और गांधीवाद
460. 26
जनवरी को
1947
अट्ठारह वर्ष पहले
देशवासियों ने 26 जनवरी, 1929 के दिन स्वातंत्र्य की प्रतिज्ञा ली थी। तब से हर साल 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाई जाती थी। आगा ख़ां जेल में, अपनी नज़रबंदी के दौरान, भी गांधीजी ने इस दिन को तिरंगा फहरा कर और वंदे मातरम्
गा कर मनाया था। 26 जनवरी, 1947 में, जब स्वतंत्रता कुछ ही महीने दूर थी, गांधीजी नोआखाली के बांसा
गांव में थे। गांव वालों ने चाहा कि गांधीजी झंडावंदन में शामिल हों। नज़रबंदी से
रिहा होने के बाद, जब दमन अपने चरम पर था, तब भी उन्होंने सरकार के निषेधाज्ञाओं के बावजूद इस दिन को मनाने पर ज़ोर दिया
था। लेकिन नोआखाली में गांधीजी में उस दिन ज़रा भी उत्साह नहीं था। वेदना के साथ उन्होंने
कहा, “जब हिंदू और मुसलमानों के दिल में ऐसा द्रोह भरा है, तब आज़ादी का जश्न क्या करना?
मैं तो अंग्रेज़ों के साथ लड़ता रहा हूं। पर यहां किसके साथ लड़ूं? सब अपने ही है। अपने
ही भाई के साथ कैसी लड़ाई? कैसी स्पर्धा? कैसा विवाद? कैसा मनमुटाव? हम लोग आज़ादी की
पूर्व-संध्या पर इस प्रकार बर्बरतापूर्वक आपस में लड़ रहे हैं। अगर हम देशवासी नहीं
संभले, तो यह आज़ादी खोखली रह जाएगी।” उन्होंने उदासी से
कहा। "मैं अंदर से जानता हूँ कि वे मन ही मन कुढ़ेंगे। मैं ऐसा नहीं
चाहता। तिरंगा मैंने ही बनाया था ताकि वह भारत के सभी धर्मों, सभी समुदायों और सभी लोगों — हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों और सिखों का प्रतीक बन सके। सच तो यह है कि एक समय वे सभी इसे अपना ही
झंडा मानते थे। कई लोगों ने इसके लिए अपनी जान तक दे दी थी। लेकिन आज हम बुरे दौर
से गुज़र रहे हैं। जब तक हम जागेंगे नहीं, तब तक जब स्वतंत्रता
आएगी, तो वह एक खाली सपने में बदल जाएगी।" और इस तरह, झंडा फहराने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।
अगले दिन (27 जनवरी) गांधीजी पल्ला पहुंचे। कड़ाके की ठंड
थी और उनके पैर लगभग जम चुके थे। "मुझे बंगाल की झोपड़ियों से प्यार हो गया है," उन्होंने एक गहरी साँस लेते हुए कहा। "ये कितनी हवादार और हल्की हैं।
यहाँ प्रकृति की इतनी प्रचुरता चारों ओर बिखरी हुई है, फिर भी हिंदू और मुसलमान भाइयों की तरह एक साथ क्यों नहीं रह सकते? ज़रा इस मूर्खता को तो देखो। एक तरफ अकाल और भुखमरी का खतरा है; दूसरी तरफ, वे हिंदू किसानों का बहिष्कार करके खेती में बाधा डाल
रहे हैं और इस तरह, अपनी अज्ञानता में, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं... इसीलिए मैं रोज़ प्रार्थना करता
हूँ, 'हे ईश्वर, सभी मनुष्यों को सही समझ प्रदान करो।'"
पल्ला में रात गुज़ारकर वे पांचगांव (28 जनवरी) के लिए निकले। रास्ते में मनु मुस्लिम महिलाओं से उनके घरों में मिलने
गई, लेकिन उन्होंने हड़बड़ी में उसके मुंह पर ही दरवाज़े बंद कर दिए। थोड़ी देर
बाद एक बुज़ुर्ग मुस्लिम महिला बाहर आई और उसने उस मेहमान बच्ची को बड़े प्यार से
मछली के साथ रोटी का एक टुकड़ा खाने के लिए दिया! मनु ने कहा मैं शाकाहारी हूं। उस
बुज़ुर्ग महिला ने उसकी बात पर यक़ीन नहीं किया। बंगाल में कोई भी—चाहे वह हिंदू
हो या मुस्लिम—मछली के बिना कैसे रह सकता है! महिला ने कहा, “हिन्दू तो आखिर हिन्दू ही हैं। इसके बाद हम कैसे विश्वास कर सकते हैं कि गांधीजी
यहां हिन्दू-मुस्लिम एकता कराने आए हैं?” उस महिला को विश्वास दिलाने
के लिए मनु ने रोटी का एक टुकड़ा खा लिया। लेकिन इस घटना ने यह तो उजागर कर ही दिया
था कि मुसलमान औरतों में भी हिन्दुओं के बारे में कितना गहरा अविश्वास पैठा हुआ था।
इस घटना से गांधीजी को गहरा सदमा लगा।
अगला पड़ाव 29 जनवरी को जयाग में था। वहां मुस्लिम लीग के कुछ
नेता गांधीजी से मिले। उन्होंने गांधीजी से कहा, “आपको प्रार्थना सभाएं बंद
कर देनी चाहिए। मुसलमान उन्हें (प्रार्थना सभा को) नापसंद करते हैं। इस ज़िले में भी
आपका रहना ज़रूरी नहीं है। और अगर आप नोआखाली में रहने का निश्चय कर ही चुके हैं तो
आपको एक ही स्थान पर रहना चाहिए और गांव-गांव नहीं घूमना चाहिए।”
गांधीजी ने कहा, “मैं अवश्य ही नहीं चाहता कि मुसलमान या हिन्दू भी मेरी प्रार्थना सभा में आएं।
लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए कि उनका आना मुझे पसन्द होगा या नहीं, तो मैं निश्चित रूप
से ‘हां’ कहूंगा। जो इसे नापसंद करते हैं वे नहीं आने के लिए स्वतंत्र हैं। रही बात
मेरे नोआखाली में ठहरने की, तो यह निर्णय करने की छूट मेरी है।”
उस दिन भी प्रार्थना सभा में राम धुन गाई गई और उसमें इस बार दो पद और जोड़ दिए
गए थे।
रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम,
ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान!
कृष्ण करीम हैं तेरे नाम,
राम रहीम हैं तेरे नाम,
सबको सन्मति दे भगवान!
मुसलमानों के एक वर्ग ने इस पर भी आपत्ति की। आरोप यह लगाया गया कि उन्होंने रहीम
और करीम के साथ राम और कृष्ण के नाम जोड़ दिए हैं। यह तो कुफ़्र है। मुसलमानों के कानों
को यह बुरा लगता है। गांधीजी को दुख और आश्चर्य दोनों हुआ। उन्होंने कहा, “इससे कितनी असहिष्णुता और संकुचितता प्रकट होती है। यह तो बिल्कुल ही असत्य है
कि मैं राम और कृष्ण के हिन्दू अवतारों को इस्लाम के एक ईश्वर के साथ जोड़ कर इस्लाम
को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहा हूं। मैंने किसी को अपना धर्म-परिवर्तन करने का निमंत्रण
कभी नहीं दिया है। मेरा उद्देश्य हमेशा यही रहा है कि मुसलमानों को अधिक अच्छा मुसलमान
बनाया जाए, हिन्दुओं को अधिक अच्छा हिन्दू बनाया जाए और ईसाइयों को अधिक अच्छा ईसाई
बनाया जाए। मेरा धर्म किसी का बहिष्कार नहीं करता। वह व्यापक है। सबको अपने भीतर समावेश
करने वाला। मेरे लिए राम, अल्ला और गॉड एक ही अर्थ के द्योतक हैं।”
30 जनवरी को गांधीजी अमकी पहुंचे। बकरी का दूध उपलब्ध नहीं था, इसलिए गांधीजी
ने नारियल का दूध पिया। शाम तक उनका पेट खराब हो चुका था। कमज़ोरी से वे चक्कर खाकर
गिर पड़े। निर्मल बोस ने अन्य साथियों की मदद से उन्हें उठा कर बिस्तर पर सुलाया। मनु
डॉ. सुशीला नय्यर को बुलाना चाहती थी, लेकिन गांधीजी ने मना कर दिया। "मुझे
तुम्हारा निर्मल बाबू को बुलाना अच्छा नहीं लगा," उन्होंने उससे कहा। "तुम अभी बच्ची हो। इसलिए, मैं तुम्हें माफ़ कर सकता हूँ। लेकिन मुझे तुमसे असल में यह उम्मीद थी कि ऐसे
मौके पर, तुम पूरे दिल से रामनाम जपने के अलावा और कुछ नहीं
करोगी। मैं तो, बेशक, हर समय यही कर रहा था... अब, इसके बारे में किसी को मत बताना, यहाँ तक कि सुशीला को भी नहीं। राम ही मेरे सच्चे डॉक्टर हैं। वे मुझे तब तक
ज़िंदा रखेंगे जब तक वे मुझसे काम लेना चाहते हैं, वरना वे मुझे अपने पास बुला लेंगे।"
31 जनवरी को अगला पड़ाव आमिशपाड़ा था। एक बड़ी भीड़ ने उनका वहां स्वागत किया।
उनमें से एक 100 साल की महिला भी थी। गांधीजी ने बुढ़ापे का पूरा
सम्मान करते हुए उसे अपने पास बिठाया और अपने गले से माला उतारकर उसके गले में
पहना दी। चेहरे पर मुस्कान लिए वह अपने उस महान 'बेटे' के सामने से धीरे-धीरे बाहर निकली; —हाथ में ली हुई छड़ी
से ज़मीन टटोलती हुई और सिर हिलाकर अपनी खुशी ज़ाहिर करती हुई!
3 फरवरी को गांधीजी शादुरखिल पहुंचे। गांधीजी की धर्म यात्रा का एक महीना
पूरा हो गया था। उनकी उपस्थिति के परिणामस्वरूप दंगों के शिकार लोगों में बहुत हद तक
साहस आ गया था। उनका डर दूर हो गया था। लोगों के बीच सद्भाव का विकास हुआ था। आगे की
यात्रा में पहले गांधीजी धर्मपुर गए फिर प्रसादपुर। 8 फरवरी को वे नन्दीग्राम पहुंचे। जगह-जगह उनका भव्य स्वागत-सत्कार किया
गया। "हम आपकी क्या मेहमाननवाज़ी कर सकते हैं?" एक मुसलमान ने, जिसके घर गांधीजी गए थे, उनसे पूछा। "आपकी मेहमाननवाज़ी यह होगी कि आप मुझे अपने प्यार और
स्नेह में जगह दें," गांधीजी ने जवाब दिया। दूसरे दिन वे विजयनगर पहुंचे।
यहाँ नोआखाली में गाँव के काम में लगे कार्यकर्ताओं की समस्याओं पर चर्चा हुई।
उनके सामने यह बात रखी गई कि कुछ समय बाद कुछ कार्यकर्ता सत्ता-लोभी हो जाते हैं।
उन्हें रोकने और संगठन के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए उनके साथी
कार्यकर्ता क्या कर सकते हैं? ज़ाहिर है, इसका जवाब 'असहयोग' ही था।
आगे की यात्रा टिपरा ज़िले की सीमा की तरफ़ थी। इधर विनाश के भयंकर दृश्य
देखने को मिले। तोड़-फोड़ काफी हुई थी। पुलों के मरम्मत करने पड़े। 14 फरवरी को केरवा गए। वहां का भी वही हाल था। रायपुर पहुंचने पर उन्होंने
पाया कि यहां तो सबसे ज़्यादा बरबादी हुई है। उत्पात अभी तक अपना सिर उठाए था। एक मंदिर
को मुसलमानों ने क़ब्ज़ा कर उसे पाकिस्तान क्लब बना दिया था। गांधीजी जब वहां पहुंचे
तो लोगों ने उन्हें आश्वस्त कराया कि जल्द ही इसे मंदिर का रूप दे दिया जाएगा। अब उनकी
यात्रा नोआखाली के आख़िरी गांव देवीपुर तक पहुंच चुकी थी। लोगों ने गांधीजी के
स्वागत के लिए काफी सजावट कर रखी थी। यह देखकर गांधीजी आग-बबूला हो गए। उन्होंने कार्यकर्ताओं
को बुलाकर काफी फटकार लगायी। “मेरे लिए इस प्रदर्शन का कोई अर्थ नहीं है। यह वैमनस्य
की एक विरासत छोड़ जाएगा। इस तरह का प्रदर्शन साम्प्रदायिक संबंधों को विषाक्त करेगा।”
18 फरवरी को गांधीजी टिपरा ज़िले के आलूनिया पहुंचे। अब लोग काम का
तनाव और थकान महसूस करने लगे थे। 19 फरवरी को गांधीजी बिरामपुर में थे। यह दिन शिवरात्रि का था। शिवरात्रि
के दिन ही 1944 में कस्तूरबा का निधन हुआ था। गांधीजी ने इस दिन
उपवास रखकर इसे मनाया। किसी ने गांधीजी के लिए नारंगी भेट स्वरूप भिजवाए थे। गांधीजी
ने उसे बच्चों में बांट दिया और बोले, “बा को खाने की अपेक्षा
दूसरों को खिलाने में अधिक आनंद आता था।” बिरामपुर मछुआरों का गांव
था। गांधीजी एक मछुआरे की झोंपड़ी में ठहराए गए थे। इस जगह पर मेघना नदी बहती थी। रात
को काफी ठंड थी। ठंडी हवा चल रही थी। उनका सारा शरीर कांप रहा था। मनु ने सारे कपड़े
ओढ़ा दिए। फिर भी उनकी कंपकंपी दूर नहीं हुई। तो मनु ने उनके शरीर को दबाना और
हाथ-पैर को मलना शुरू किए इससे थोड़ी उष्मा का संचार हुआ। फिर न जाने कब मनु को झपकी
लग गई और वे दोनों सुबह तक सक साथ सटकर सोते रहे। इस घटना को लेकर कई लेखकों ने तरह-तरह
की बातें लिखीं हैं। लेकिन गांधीजी यह मानते थे कि ब्रह्मचर्य के आदर्श को जिस प्रकार
उन्होंने समझा है और अपने आचरण में उतारा है, उसके अनुसार कर्त्तव्य का तकाज़ा होने
पर स्त्री-पुरुष का सट कर सोने की स्थिति को टालना उस आदर्श के साथ सुसंगत नहीं है।
सत्य और अहिंसा के लिए अपनी तपस्या में वह कहाँ खड़े थे? नोआखली में उन्होंने बार-बार खुद से यही सवाल पूछा था। इसका जवाब इस बात पर
निर्भर करता था कि अपने ब्रह्मचर्य के संबंध में वह कहाँ खड़े थे। उनकी सारी ऊर्जा
इसी सवाल का सही जवाब खोजने में लगी हुई थी।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर