सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5.
सूफ़ीमत का उदय-9
5.15 इस्लाम के सम्प्रदाय
5.15 (क) खारिजी
इस्लाम धर्म के आरंभिक काल से ही राजनीति और धर्म का निकटतम संबंध रहा है। पैगंबर
मुहम्मद सल्ल. केवल एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक ही नहीं थे, बल्कि वे प्रथम मुस्लिम राज्य
(मदीना) के संस्थापक और राजनीतिक नेता भी थे। इस्लामी परंपरा के अनुसार, एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए
ईश्वर (अल्लाह) के नियमों को सार्वजनिक और निजी दोनों जीवन में लागू करना आवश्यक
माना गया। इसलिए, शुरुआती इस्लामी राज्य में धार्मिक उपदेश और राजनीतिक व्यवस्था आपस में
पूरी तरह जुड़े हुए थे। राजनीतिक विचारधाराओं में भिन्नता के कारण धार्मिक मतभेद
पैदा हुए। इस्लाम के सम्प्रदायों में सबसे पहला सम्प्रदाय खारिजी थे। यह समूह
खिलाफत (राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व) को लेकर हुए विवादों के कारण अस्तित्व में
आया। यह संप्रदाय सातवीं सदी में चौथे खलीफा हजरत अली (रज़ि.) के समय में, प्रथम फितना नामक गृहयुद्ध (656-661 ईस्वी) के दौरान उभरा था। यह प्रारंभिक इस्लामी साम्राज्य का पहला प्रमुख
गृहयुद्ध था। यह तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति का परिणाम था। सिफ्फीन की
लड़ाई (657 ईस्वी) में जब हज़रत अली (रज़ि.) और सीरिया के गवर्नर मुआविया इब्न अबू सुफियान के बीच संघर्ष हुआ, तो दोनों पक्षों ने युद्ध रोकने के
लिए एक मध्यस्थता (निर्णय) स्वीकार किया।
जब हज़रत अली (रज़ि.) और मुआवियों के बीच इस बात पर समझौता हो गया कि ख़लीफ़ा कौन हो इसका निर्णय
पंचायत द्वारा किया जाएगा, तो इसका सबसे ज़्यादा विरोध खारिजियों (हज़रत अली के सैनिकों में से एक बड़े
समूह) ने किया था। उनका कहना था, “ला हुक्म
इल्ला लिल्लाही” अर्थात केवल परमात्मा ही निर्णय कर सकता है। उनका मानना
था कि मामलों को इंसानों के हवाले करना कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ है। इस
विचारधारा वाले लोग मुख्य सेना से अलग हो गए और उन्हें 'खारिजी' (अर्थात "अलग होने वाले" या "विद्रोही") कहा गया। खारिजियों
का कहना था कि हज़रत अली (रज़ि.) ने पंचायत की बात मानकर धर्म की अवहेलना की है। इस मत को मानने
वालों का सिद्धांत है कि ख़लीफ़ा की नियुक्ति मुसलमानों द्वारा चुनाव से होनी चाहिए। अतः ख़लीफ़ा
किसी भी वंश का हो सकता था। इसके अलावा उनका दूसरा सिद्धान्त यह
था कि जो रोजा नहीं रखता, नियमित रूप से नमाज़ नहीं पढ़ता वह काफिर है। जो खारिजियों
के मत नहीं मानते उसे ख़त्म कर देना चाहिए। हज़रत उमर (रज़ि.) के बाद वे किसी ख़लीफ़ा को नहीं मानते
और अपने इमामों को ही वास्तविक उत्तराधिकारी मानते हैं। उनके अनुसार
जो सर्वश्रेष्ठ मुसलमान है वही ख़लीफ़ा बन सकता है। खारिजियों के
कई दल (फिरकों) हो गए, जैसे अजारिक, इवाधिया, नज्दत, अजारिद, सूफा जुद, ज़ियादिया। कुछ लोग जाहिरियो और वहाबियों को भी खारिज मानते हैं। समय के साथ
खारिजी सूफ़ियों के विरोधी हो गए। चौथे खलीफा हज़रत अली (रज़ि.) की
हत्या अब्द अल-रहमान इब्न मुलजाम नामक एक खारिजी विद्रोही ने की थी।
5.15 (ख) मुरीजी
मुरीजी संप्रदाय कट्टरपंथी खारिजी गुटों के उग्र विचारों के विरुद्ध
प्रतिक्रिया के रूप में उभरा था, और वे खारिजियों के विरोधी थे। खारिजी वर्ग
बड़े पाप करने वाले मुसलमानों को काफिर घोषित कर देता था, जबकि मुरीजियों ने एक उदार और मध्यम
मार्ग अपनाते हुए लोगों को समुदाय से बाहर करने का विरोध किया। इस संप्रदाय
का मानना था कि गंभीर पाप करने वालों पर निर्णय को 'टाल देना' ('इर्जआ') चाहिए, क्योंकि कौन सच्चा मुसलमान है और कौन नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल ईश्वर
(अल्लाह) ही कर सकता है। इस संप्रदाय की स्थापना सातवीं शताब्दी के अंत में, खलीफा उस्मान और खलीफा अली के शासनकाल
के दौरान राजनीतिक उथल-पुथल के समय हुई थी। यह सम्प्रदाय सीरिया और
मेसोपोटामिया में अस्तित्व में आया। 'मुरजिया' शब्द अरबी के 'इरज' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "स्थगित करना" या "पीछे छोड़ना"।
मुरीजी मानते थे कि आस्था (ईमान) और कर्म (अमल) अलग-अलग हैं। अच्छे कर्म
करने या न करने से किसी के विश्वास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनका एक प्रसिद्ध
कथन था: "कोई भी पाप विश्वास (ईमान) को नुकसान नहीं पहुंचाता, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी आज्ञाकारिता
(अच्छे कर्म) नास्तिक की मदद नहीं करती।" वे इस बात में विश्वास रखते थे कि
पाप-पुण्य का विचार करने वाला परमात्मा है। वही सब कुछ जानने वाला
है। किसी मुसलमान को काफिर नहीं कहा जा सकता। परमात्मा और
धर्म पर ईमान लाना ही वास्तविक वस्तु है। धर्म को वे अंतर की
वस्तु मानते थे। सिवाय आत्मरक्षा के किसी से नहीं लड़ना चाहिए। वे उमैय्या
वंश का विरोध नहीं करते थे। वे हज़रत उस्मान, हज़रत अली और मुआविया सभी को परमात्मा
का सेवक मानते थे। उन्होंने धर्म के मामले में अधिक उदारता दिखाई।
5.15 (ग़) शिया-सुन्नी
नेतृत्व का विवाद (खिलाफत बनाम
इमामत)
हाफ़िज
अबू-उल-रबीअ सुलैमान (मृ. 1236) जैसे इतिहासकार ने अपने इतिहास में तीन ख़लीफ़ाओं की उपलब्धियां गिनायी है,
जबकि चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली रज़ि. की चर्चा ही
नहीं की। शिया मान्यता के अनुसार, पहले वैध खलीफा हज़रत अली रज़ि. थे, और इसके बाद
उनके ज्येष्ठ पुत्र इमाम हसन को पांचवां खलीफा माना जाता है। छठे खलीफ़ा के
समय तो विवाद और भी विकट हो गया। एक दल ने हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ के पुत्र (मुहम्मद साहब के नाती) हज़रत इमाम हुसैन ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ (इमाम हसन के छोटे भाई) को खलीफ़ा घोषित कर दिया। इसका
परिणाम यह हुआ कि इस्लाम शिया और सुन्नी संप्रदायों में विभक्त हो
गया। इन दोनों संप्रदायों में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के उत्तराधिकारी के चयन
को लेकर सैद्धांतिक और मौलिक मतभेद हैं। इस्लाम में नेतृत्व का विवाद 'खिलाफत' और 'इमामत' के बीच का मुख्य
अंतर यह है कि खलीफा को सुन्नी परंपरा में समुदाय द्वारा चुना गया राजनीतिक और
प्रशासनिक नेता माना जाता है, जबकि इमाम शिया परंपरा में ईश्वर द्वारा मनोनीत
आध्यात्मिक और धार्मिक मार्गदर्शक होता है।
मुस्लिम समुदाय मुख्य तौर पर दो वर्गों में बंटा हुआ है- एक वर्ग सुन्नी
मुसलमान कहलाता है तो दूसरा शिया मुसलमान कहलाया जाता है। शिया और
सुन्नी दोनों ही समुदाय के लोगों का मानना है कि अल्लाह एक है। कुरआन अल्लाह
की किताब है और मोहम्मद साहब अल्लाह के रसूल (दूत) हैं। यहां तक कि
दोनों ही समुदाय अल्लाह के भेजे गए 1 लाख 24 हज़ार नबी (ईश्वर के दूत) पर भी एकमत हैं और सबसे पवित्र स्थल के रूप में खान-ए-काबा को अल्लाह का घर भी मानते हैं, दुनिया भर के मुसलमान इसी की दिशा (किबला)
की ओर मुख करके अपनी नमाज़ अदा करते हैं। फिर ऐसे क्या कारण हैं
जो दोनों ही समुदायों को एक दूसरे से अलग करते हैं। शिया-सुन्नी विवाद इस्लाम की सबसे पुरानी लड़ाइयों में से एक है। इसकी शुरुआत इस्लामी पैग़म्बर मुहम्मद के दुनिया से जाने के बाद, सन 632 में, इस्लाम के उत्तराधिकारी पद को लेकर हुई।
मुसलमानों के एक वर्ग का मानना था कि पैगंबर मुहम्मद ने अपने बाद किसी को
उत्तराधिकारी नहीं चुना था। इसलिए, समुदाय के वरिष्ठ नेताओं को आपस में सलाह करके सबसे योग्य व्यक्ति को आम
सहमति (शूरा) से चुनना चाहिए। उन्होंने पैगंबर के करीबी साथी हज़रत अबू बक्र
रज़ि. को पहला खलीफा
चुना। खलीफा एक राजनीतिक और प्रशासनिक प्रमुख होता है जिसका कर्तव्य इस्लामी
कानूनों (शरिया) का पालन करना और राज्य की रक्षा करना है, लेकिन वह पैगंबर नहीं होता और न ही
उसे कोई दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है। दूसरी तरफ मुसलमानों के दूसरे वर्ग का मानना
था कि नेतृत्व केवल पैगंबर के परिवार (अह्ल अल-बैत) के पास होना चाहिए। उनका दावा
था कि पैगंबर ने अपने जीवनकाल में ही अपने दामाद और चचेरे भाई अली इब्न अबी
तालिब रज़ि.को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
इस तरह जो लोग हज़रत अली के उत्तराधिकार के समर्थक थे उन्हें शिया कहा गया ('शिया' शब्द का अर्थ ही "अली के अनुयायी" (शिया-ए-अली) है) जबकि हज़रत अबू
बकर के नेता बनाने के समर्थकों को सुन्नी कहा गया। सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैग़म्बर
मोहम्मद सल्ल. (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं। वास्तव
में हज़रत अबु बकर रज़ि. को ख़लीफ़ा
बनाया गया और इनके दो ख़लीफ़ाओं के बाद ही हज़रत अली रज़ि. को ख़लीफ़ा बनाया गया।
इससे दोनों पक्षों में लड़ाई ज़ारी रही। दूसरे, तीसरे और चौथे ख़लीफ़ाओं की हत्या कर
दी गई थी - इन खलीफ़ाओं के नाम हैं उमर, उस्मान और अली। सुन्नी मुसलमान पहले चार खलीफाओं (अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली) को समान रूप से
स्वीकार करते हैं।
शिया, हज़रत अली रज़ि. से अपने
नेताओं की गिनती करते हैं और अपने नेता को खलीफ़ा के बदले इमाम कहते हैं। आज दुनिया में, सुन्नी बहुमत में हैं पर शिया विश्वास
ईरान, इराक़ और अज़रबैजान समेत कई देशों में प्रधान है। दुनिया भर के अधिकांश
मुस्लिम देश—जैसे कि सऊदी अरब, मिस्र, और इंडोनेशिया—सुन्नी बहुल हैं। लेबनान, पाकिस्तान और भारत सहित अन्य देशों
में दोनों समुदायों के लोग रहते हैं।
इस तरह मुसलमानों के दो समुदाय हो गए। मोहम्मद साहब सल्ल. के इंतकाल के बाद जिन
लोगों ने उनके ससुर हज़रत अबु बक्र रज़ि. (632-634 ईसवी) को अपना नेता माना,
और जिन्हें ख़लीफ़ा कहा, वह सुन्नी समुदाय कहलाए गए। जिन लोगों ने
हज़रत अली रज़ि. को अपना नेता
माना वह शियाने अली यानी कि अली के चाहने वाले शिया कहलाए गए। सुन्नी
समुदाय ने हज़रत अबु बक्र रज़ि. (632-634 ईस्वी) के बाद हज़रत उमर रज़ि. (634-644 ईसवी), हज़रत उमर के बाद हज़रत उस्मान रज़ि. (644-656 ईसवी) और हज़रत उस्मान के बाद हज़रत
अली रज़ि. (656-661 ईसवी) को अपना ख़लीफ़ा
चुना। इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में चलने वाला कहा जाता
है। जबकि शिया मुसलमानों ने ख़लीफ़ा के बजाय हज़रत अली रज़ि. को अपना इमाम माना और
हज़रत अली के बाद ग्यारह अन्य इमामों को मोहम्मद साहब का उत्तराधिकारी माना। शिया
चुनाव द्वारा ख़लीफ़ा का निर्वाचन सही नहीं मानते। उनके अनुसार ख़लीफ़ा की नियुक्ति
वंश परंपरा से होनी चाहिए। उमैय्या वंश वालों के शासन के काल में ख़लीफ़ा चयन का विवाद बहुत गहराया। लोग हज़रत अली
या मुआविया के समर्थन में दो दलों में बंट गए।
सुन्नी इस्लाम की शाखाएं
सुन्नी इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम समुदाय है। सुन्नी इस्लाम स्वयं
में कोई अलग संप्रदाय नहीं है, बल्कि यह न्यायशास्त्र के चार प्रमुख स्कूलों (मदहब) और विचारधाराओं में
विभाजित है। पहली शाखा है हनफ़ी।
इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी) को मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं। यह सबसे बड़ा और सबसे उदार मत माना
जाता है, जिसके अनुयायी मुख्य रूप से दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, तुर्की और बाल्कन क्षेत्रों में रहते
हैं। इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे
हुए हैं। एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं। दोनों ही नाम उत्तर
प्रदेश के दो ज़िलों देवबंद और बरेली के नाम पर हैं। इस विचारधारा के मानने वालों
का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरीअत का मूल स्रोत है लेकिन इस पर अमल करने
के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है। इसलिए शरीअत के तमाम क़ानून इमाम अबू
हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं। बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां
सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की
बहुत अहमियत नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं।
इमाम मालिक इब्न अनस (711-795 ईसवी) को मानने वाले मालिकी कहलाते हैं। उनकी एक महत्वपूर्ण किताब 'इमाम मोत्ता' के नाम से प्रसिद्ध है। इस विचारधारा
का पालन मुख्य रूप से उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम अफ्रीका और कुछ अरब देशों में किया जाता है।
इमाम मुहम्मद इब्न इदरीस अल-शाफ़िई (767-820 ईसवी) को मानने वाले शाफ़िई कहलाते हैं। इस्लामी
तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी फ़िक़ह से अलग है। यह शाखा मध्य पूर्व (मिस्र, यमन), पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया
(इंडोनेशिया, मलेशिया) में काफी प्रचलित है।
इमाम अहमद इब्न हनबल (780-855 ईसवी) को मानने वाले हनबली
(हंबली) कहलाते हैं। सऊदी अरब की सरकारी शरीअत इमाम हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर
आधारित है। यह सबसे अधिक रूढ़िवादी विचारधारा है और इसे मुख्य रूप से सऊदी अरब और
खाड़ी के कुछ देशों में माना जाता है।
पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है। सुन्नियों में एक
समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है
कि शरीअत को समझने और उसके सही ढंग से पालन के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर
मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए। इसी समुदाय को सल्फ़ी और
अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है। 'सल्फ़ी' शब्द इस्लाम की पहली तीन पीढ़ियों (जिन्हें 'सलाफ़-उस-सालिह' कहा जाता है) से आया है। 'सल्फ़ी' शब्द 'सलाफ़' से आया है। इसका अर्थ पैगंबर मुहम्मद के समय के आरंभिक मुसलमान (पैगंबर के
साथी, उनके बाद की पीढ़ी और उनके अनुयायी) हैं। सल्फ़ी मानते हैं कि इस्लाम का
वास्तविक और शुद्ध रूप वही था जो इन आरंभिक पीढ़ियों द्वारा अभ्यास किया जाता था। यह समुदाय पैगंबर मुहम्मद तथा उनकी तीन
धर्मनिष्ठ पीढ़ियों (अल-सलफ अल-सालिह) की जीवनशैली व शिक्षाओं का अक्षरशः पालन
करने पर जोर देता है। 'सलाफ़-उस-सालिह' में सहाबा: पैगंबर मुहम्मद के साथी (जिन्होंने पैगंबर को देखा और उन पर विश्वास किया),
ताबिईन: सहाबा के अनुयायी (जिन्होंने सहाबा से शिक्षा प्राप्त की) और तबे
ताबिईन: ताबिईन के अनुयायी शामिल है।
अहले हदीस सुन्नी इस्लाम का एक प्रमुख संप्रदाय है, जो किसी भी
विशेष इस्लामी न्यायशास्त्र या चार प्रमुख विचारधाराओं (मज़हब) की 'अंधभक्ति' (तकलीद) करने
के बजाय सीधे क़ुरआन और हदीस के अध्ययन को
सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। यह संप्रदाय किसी विशेष इमाम की बजाय सीधे पैगंबर
मुहम्मद के कथनों (हदीस) और सुन्नत का अनुसरण करता है। यदि किसी इमाम की राय हदीस
के विपरीत होती है, तो वे हदीस को ही सर्वोपरि मानते हैं। उनके अनुसार, पैगंबर
मुहम्मद को छोड़कर कोई भी व्यक्ति त्रुटिहीन नहीं है और किसी की भी बात का प्रमाण
के साथ मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यह समूह खुद को किसी नए पंथ या फिरके के रूप
में नहीं देखता, बल्कि इस्लाम के प्रारंभिक युग (सलफ) की विचारधारा
से जोड़ने का प्रयास करता है।
हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय अपने आप
को अहमदिया कहता है। इस समुदाय की स्थापना भारतीय पंजाब के क़ादियान में
मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी।
शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग हैं। वे पैग़म्बर मोहम्मद के
बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं। शिया मुसलमानों की
धार्मिक आस्था पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के दामाद, हज़रत अली रजि. और उनके वंशजों
(अह्लुल-बैत) के नेतृत्व में अटूट विश्वास पर केंद्रित है। उनका मानना है कि
पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तराधिकारी (खलीफा) उनके दामाद हज़रत अली रजि. थे।
वे मानते हैं कि केवल पैगंबर के परिवार के सदस्य ही मुस्लिम समुदाय के आध्यात्मिक
और राजनीतिक नेता हो सकते हैं। उनके अनुसार पैग़म्बर मोहम्मद सल्ल. भी हज़रत अली रजि.
को ही अपना वारिस घोषित कर चुके थे लेकिन
धोखे से उनकी जगह हज़रत अबू-बकर को नेता चुन लिया गया।
शिया मुसलमान पैग़म्बर मोहम्मद के बाद बने पहले तीन ख़लीफ़ा को अपना नेता
नहीं मानते बल्कि उन्हें ग़ासिब कहते हैं। ग़ासिब अरबी का शब्द है जिसका
अर्थ हड़पने वाला होता है। उनका विश्वास है कि जिस तरह अल्लाह ने मोहम्मद साहब सल्ल.
को अपना पैग़म्बर बनाकर भेजा था उसी तरह से उनके दामाद अली को भी अल्लाह ने ही
इमाम या नबी नियुक्त किया था और फिर इस तरह से उन्हीं की संतानों से इमाम होते रहे।
शिया धर्म में पाँच उसूल-ए-दीन (आस्था के मूल सिद्धांत) हैं : तौहीद :
ईश्वर (अल्लाह) एक और अद्वितीय है, अदल:
ईश्वर न्यायपूर्ण है, नबुव्वत:
ईश्वर द्वारा भेजे गए पैगंबरों पर विश्वास, जिनमें मुहम्मद अंतिम
पैगंबर हैं, इमामत: पैगंबर के बाद उनके
वंशजों (इमामों) के दैवीय नेतृत्व और मार्गदर्शन में अटूट विश्वास। शिया बारह
इमामों को मानते हैं और क़ियामत: मरने के बाद पुनरुत्थान
और न्याय के दिन (फैसले के दिन) पर विश्वास। शिया धर्म के फुरू-ए-दीन (धार्मिक
कर्तव्य) 10 हैं: नमाज़:
प्रतिदिन की अनिवार्य प्रार्थना, रोज़ा: रमजान के महीने में उपवास रखना, ज़कात: गरीबों को अनिवार्य दान, हज: मक्का की पवित्र
तीर्थयात्रा, जिहाद:
धर्म की रक्षा और भले के लिए संघर्ष, अम्र-बिल-मारूफ: अच्छे कार्यों का प्रसार
करना, नही-अनिल-मुनकर:
बुराइयों को रोकना, तवाल्ला: पैगंबर मुहम्मद और उनके
परिवार (अह्लुल-बैत) के प्रति प्रेम रखना, तबर्रा: अह्लुल-बैत के दुश्मनों
और अत्याचारियों से खुद को अलग और दूर रखना, और खुम्स: अपनी वार्षिक बचत का
पांचवां हिस्सा धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों के लिए दान करना।
शिया की तीन शाखाएं इस्ना अशअरी, इस्माइली और जैदी हैं। शियाओं का सबसे
बड़ा समूह इस्ना अशरी
यानी बारह इमामों को मानने वाला समूह है। दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत शिया इसी समूह से संबंध रखते
हैं। इस पंथ के अनुयायी मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद सल्ल. के बाद आध्यात्मिक और
राजनीतिक नेतृत्व उनके परिवार (अहले-बैत) के पास था। वे बारह विशेष इमामों को अपना
मार्गदर्शक मानते हैं। इस्ना अशरी समुदाय का कलमा सुन्नियों के कलमे से भी अलग है।
उनके पहले इमाम हज़रत अली रजि. हैं और अंतिम यानी बारहवें इमाम ज़माना यानी इमाम मुहम्मद
अल-महदी हैं। इनकी मान्यता है कि अंतिम इमाम 9वीं सदी में अंतर्ध्यान हो गए थे और
न्याय की स्थापना के लिए वे अंततः वापस लौटेंगे (जिन्हें 'महदी' कहा जाता है)।
शियाओं का दूसरा बड़ा सांप्रदायिक समूह ज़ैदिया है जो बारह के बजाय केवल पांच इमामों
में ही विश्वास रखता है। इसके चार पहले इमाम तो इस्ना अशरी शियाओं के ही हैं लेकिन
पांचवें और अंतिम इमाम हुसैन रजि. (हज़रत अली के बेटे) के पोते ज़ैद बिन अली हैं
जिसकी वजह से वे ज़ैदिया कहलाते हैं। यह मुख्य रूप से यमन में केंद्रित है।
इस्माइली शिया समुदाय केवल सात इमामों को मानता है और उनके अंतिम इमाम मोहम्मद बिन
इस्माइल हैं और इसी वजह से उन्हें इस्माइली कहा जाता है। इस्ना अशरी शिया समुदाय
से इनका विवाद इस बात पर हुआ कि इमाम जाफ़र सादिक़ के बाद उनके बड़े बेटे इस्माइल
बिन जाफ़र इमाम होंगे या फिर दूसरे बेटे। इस्ना अशरी समूह ने उनके दूसरे बेटे मूसा
काज़िम को इमाम माना और यहीं से दो समूह बन गए। इस तरह इस्माइलियों ने अपना सातवां
इमाम इस्माइल बिन जाफ़र को माना। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनिया के लगभग 80 से 85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं।
5.15 (घ) मुतज़िलका
इस्लाम का मुतज़िलका (मुअज़िला) समुदाय
प्रारंभिक इस्लामी इतिहास का एक प्रमुख तर्कवादी (rationalist) और दार्शनिक विचारधारा था। 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच बसरा और बगदाद में
फली-फूली इस विचारधारा की स्थापना वासिल इब्न अता ने दूसरी शताब्दी हिजरी (आठवीं शताब्दी ई.) में की थी। इस मत के विचार अभूतपूर्व थे। मुतज़िला
सिद्धांत का आधार धार्मिक ग्रंथों और आस्था की तुलना में मानव बुद्धि और तर्क है। वे
एकेश्वरवाद के कट्टर समर्थक थे। उनके अनुसार, ईश्वर अद्वितीय और निराकार है। वे
परमात्मा में किसी सिफत (गुण) का आरोप करने के लिए तैयार नहीं होते। इसके अनुसार, ईश्वर के कोई मानव-समान गुण या
विशेषताएँ नहीं हैं और कुरान 'अनादि' नहीं बल्कि ईश्वर द्वारा 'सृजित' (created) है। यह परमात्मा के एकत्व को खंडित करता है। दोनों को
शाश्वत मानना एकेश्वरवाद के सिद्धांत का विरोध करना है। जो परमात्मा के ज़ात और सिफत को अलग मानते हैं, उसे मुतज़िला
सिद्धांत के मानने वाले नहीं मानते। उन्होंने कुरान में ईश्वर के मानवीय
गुणों (जैसे- हाथ, आँख) का वर्णन करने वाली आयतों को लाक्षणिक (Metaphorical) माना, न कि शाब्दिक। उनके अनुसार परमात्मा उन कर्मों के लिए किसी को दण्ड का भागी
नहीं बनाता जिन पर प्राणियों का कोई वश न हो। मुतज़िला का
मानना था कि ईश्वर हमेशा न्यायपूर्ण कार्य करता है। ईश्वर इंसान को बुरे काम करने
के लिए मजबूर नहीं करता, इसलिए मनुष्य के पास अपने अच्छे और बुरे कर्म चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता
(Free Will) है। वे अपने को “अहलुल अदल वात तौहीद” कहते हैं, जिसका मतलब होता है “वे परमात्मा की न्यायप्रियता और उसके
एकत्व पर ईमान लाते हैं”। उन्होंने
नियतिवाद को तिलांजलि दी। उनके अनुसार परमात्मा अनादि और अनंत है। उसके ज़ात और
सिफत अभिन्न हैं। वे अल्लाह के गुणों (Attributes) को उसकी सत्ता से अलग नहीं मानते, बल्कि उनका मानना है कि ईश्वर के गुण उसकी सत्ता का ही सार हैं। क़ुरआन का
वक्तव्य ही प्रधान है। परमात्मा न्यायी है। मनुष्य के भले-बुरे कर्मों का दोष
मनुष्य पर है। ज्ञान और बुद्धि द्वारा ही परमात्मा को जाना जा सकता है। वे यह नहीं
मानते कि कयामत के दिन ही परमात्मा के दर्शन होंगे। मनुष्य को
अपने किए कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। परमात्मा और मनुष्य के बीच किसी
मध्यस्थ की ज़रुरत नहीं पड़ती। वे क़ुरआन को मनुष्यकृत मानते हैं। मुतज़िलों के
दर्शन और शास्त्रीय तर्क आम मुसलिम जनता को आकर्षित नहीं कर सके। इसका मुख्य
कारण उनका दर्शन को धर्म से ऊपर रखना था, जो जनमानस की आस्था और भावनाओं से मेल नहीं खाता था। अब्बासी खलीफा
अल-मअमून के समय इसे राज्य का समर्थन प्राप्त था, लेकिन बाद में शासकों ने मुतजिलों से
दूरी बना ली, जिसके कारण यह आम लोगों में कभी जड़ें नहीं जमा सकी। धार्मिक और राजनीतिक
क्षेत्र में तो उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं रह गया लेकिन विचार के क्षेत्र में
उसने अपना व्यापक प्रभाव डाला।
5.15 (च) इख्व़ानुल सफ़ा
मुतज़िलों के विचार ने कई लोगों को प्रभावित किया। इसने लोगों को नए ढंग से सोचने के लिए प्रेरित किया। विचारों की स्वतन्त्रता के लिए इसने एक वातावरण तैयार कर दिया। इख्व़ानुल सफ़ा (पवित्र आत्माओं की बिरादरी) भी एक ऐसा ही संगठन था। यह दसवीं शताब्दी में इराक (बसरा और बगदाद) के मुस्लिम विचारकों और दार्शनिकों का एक गुप्त समूह था। इनका उद्देश्य मानव तर्क और पैगंबर की शिक्षाओं में सामंजस्य स्थापित करना था। दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में धार्मिक आचरण अपनाने वाले लोग इस काम में लग गए कि धर्म और विज्ञान में सामंजस्य स्थापित किया जाए। इस संगठन का उद्देश्य था कि वे धार्मिकता, पवित्र जीवन, सत्य आदि के रास्ते पर चलकर परमात्मा का अनुग्रह प्राप्त कर सकें। इस्लाम के सिद्धांतों को तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टि से उचित ठहराया जाए। उनका मानना था कि धर्म के नियमों में बहुत सी बुराइयाँ इसलिए पैदा हो जाती हैं कि लोगों को सही बातों का पता ही नहीं होता। अज्ञानवश वे बहुत सी गलतियाँ करते हैं। इस समूह ने 52 ग्रंथों का एक प्रसिद्ध विश्वकोश संकलित किया, जिसे रसाइल इख्वान अल-सफा कहा जाता है।
*** *** ***
मनोज
कुमार