सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-2
11.4 प्रेम मार्ग का अध्यात्म रूप
सूफियों के अनुसार प्रेम मार्ग
(इश्क़) का अध्यात्म रूप वह पवित्र साधन है जिसके द्वारा मानव आत्मा अपने
अहंकार को मिटाकर परमात्मा (अल्लाह) से मिलन प्राप्त करती है। सूफी मत का
मानना है कि ईश्वर को कठोर नियमों या डर से नहीं, बल्कि केवल
सच्चे और निश्छल प्रेम से ही पाया जा सकता है। प्रेम का विकास तीन चरणों में होता
है – भाव प्रेम, ज्ञान प्रेम और ईश प्रेम। भाव
प्रेम भावनाओं और हृदय के स्तर पर उठने वाला प्रेम (शुरुआती जुड़ाव) है। ज्ञान
प्रेम विवेक और समझ के साथ गहरा होने वाला प्रेम, जहाँ
प्रेमी अपने प्रेमास्पद के वास्तविक स्वरूप को जानने लगता है। ईश प्रेम समस्त
ब्रह्मांड और ईश्वर से एकरूप हो जाने वाला परम दिव्य प्रेम है।
प्रेम
मार्ग का अध्यात्म रूप क्या है? अध्यात्म में प्रेम केवल दो शरीरों या दो
व्यक्तियों का मिलान नहीं है, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा से
मिलान की यात्रा है। इसे 'प्रेमास्पद की खोज' भी कहा
जाता है, जहाँ साधक का अंतिम गंतव्य स्वयं ईश्वर
होते हैं। इस संसार में इंसान के अन्दर अपने प्रियतम को पाने की तीव्र अभिलाषा रहती है। इस
अभिलाषा को ‘इश्क़-क़ायनाती’ (भौतिक
प्रेम) कहते हैं। यह अभिलाषा एक इंसान को दूसरे इंसान के लिए होती है। कोई इंसान
किसी दूसरे इंसान से अनुराग रख सकता है। अनुराग धीरे-धीरे प्रेम का रूप धारण कर
लेता है। सूफ़ी साधक इस भौतिक प्रेम को ईश-वंदना में ढालने की दीक्षा देते हैं। इस
दीक्षा के फलस्वरूप भावावेश की स्थिति में भी आत्मा की पवित्र प्रेरणाओं को
आत्मसात किया जा सकता है। अध्यात्म में प्रेम मार्ग की शुरुआत सांसारिक मोह से हो
सकती है, लेकिन इसका अंत दिव्य प्रेम में होता है। जब प्रेम में 'चाहत' (इच्छा या वासना) होती है, तो वह बंधन बनता
है। जब प्रेम में केवल 'समर्पण' (निस्वार्थ भाव) बचता है, तो वही प्रेम
अध्यात्म बन जाता है। यहाँ प्रेमी अपने प्रियतम (ईश्वर) से कुछ मांगता नहीं है, बल्कि स्वयं को ही सौंप देता है।
इस तरह इश्क़ वह बौद्धिक
वस्तु है जो ‘अलसआदत-अलक़सवा’ (उच्चतम
आह्लाद) की अवस्था में शुद्ध पुण्य का भावार्थ धारण कर सके। इस्लामी दर्शन
(इस्लामी फ़लसफ़ा) और मुख्य
रूप से महान दार्शनिकों जैसे अल-फ़ाराबी और इब्न सिना ने अरबी शब्द अल-सआदत-अलक़सवा का प्रयोग 'उच्चतम आनंद या चरम सौभाग्य' के लिए किया था। मनुष्य सक्रिय बुद्धि से जुड़कर चरम
आनंद ('अल-सआदत अल-क़ुसवा') प्राप्त
करता है। इस उच्चतम आह्लाद या परम सौभाग्य की अवस्था में, जब साधक का
अपने अस्तित्व का अहंकार मिट जाता है (जिसे सूफी 'फ़ना' कहते हैं), तब वह
शुद्ध रूप से परमात्मा के गुणों को धारण कर लेता है। इस अवस्था में 'इश्क़' कोई ठंडी
बौद्धिक धारणा नहीं रह जाता, बल्कि शुद्ध पुण्य (नैतिक और
आध्यात्मिक पवित्रता) का जीवंत रूप बन जाता है। यहाँ प्रेम और ज्ञान (मआरिफ़त)
एक हो जाते हैं, जहाँ साधक का हर कर्म निःस्वार्थ और पूरी
तरह ईश्वरीय इच्छा में विलीन होता है। सूफियों के अनुसार ‘अलख़ैर-अलमहज़’ (प्रचण्ड
पुण्य या परम कल्याण) का अर्थ अल्लाह (ईश्वर) से पूर्ण मिलन और उसकी इच्छा में
विलीन हो जाना है। अरबी भाषा में 'अल-खैर' का अर्थ
अच्छाई/पुण्य होता है और 'अल-महज' का अर्थ
शुद्ध या प्रचंड होता है। सूफियों के लिए संसार का सबसे बड़ा पुण्य या सर्वोच्च
अच्छाई कोई सांसारिक कर्मकांड नहीं, बल्कि ईश्वर का साक्षात
अनुभव करना है। जब एक साधक (मुरीद) अपने अहंकार और सांसारिक अस्तित्व को पूरी
तरह मिटाकर ईश्वर के प्रेम में विलीन हो जाता है, तो उसे 'फ़ना' कहते हैं।
इसी अवस्था को 'अलख़ैर-अलमहज़' या प्रचंड
पुण्य माना गया है। सूफी संत राबिया-अल-अदविया के अनुसार, सच्चा
प्रेम वह है जिसमें न तो नरक के दण्ड का भय हो और न ही स्वर्ग या पुण्य (सद्कर्मों
के फल) की लालसा। ईश्वर की रज़ा (इच्छा) में खुद को सौंप देना ही सच्चा 'अलख़ैर-अलमहज़' है। यही ‘अलख़ैर-अलमहज़’ (प्रचण्ड
पुण्य) मनुष्य को ‘अलवाहिद-अलहक़’ (सत्य
व्यक्ति) की खोज में आगे बढ़ाता है। सूफी दार्शनिक ग्रंथ किताब कलाम फी महद
अल-खैर में ईश्वर को 'अल-खैर
अल-महज' कहा गया है। इसका अर्थ है कि ईश्वर की
प्रकृति ही शुद्ध भलाई, पवित्रता और पुण्य है। संसार
में जो भी भलाई, आत्मिक सौंदर्य या पुण्य (खैर) मौजूद है, वह इसी परम
स्रोत की एक किरण या परछाई है। जब कोई मनुष्य आंतरिक रूप से इस शुद्ध पुण्य या
कल्याण के मार्ग पर चलता है, तो उसका अंतःकरण (नफ़्स) शुद्ध
होने लगता है। इस पथ पर वह जितना आगे बढ़ता है उसे उतना ही ‘इब्तेहाज’ (अमिट
आह्लाद) हासिल होता है। वह
इसका ‘लज़्ज़त-अलमुतलक़’ (शुद्ध
रसास्वादन) अनुभव करता
है। इस तरह वह इस मार्ग के उच्चतम शिखर
अद्वैत की पराकाष्ठा पर पहुंचता है। जब साधक (सालिक) अपने भीतर 'अल-खैर' (पुण्य, निस्वार्थ
प्रेम, और भलाई) को जगाता है, तो वह
अनजाने में उसी 'परम खैर' (ईश्वर) की
ओर खिंचा चला जाता है। सूफियों के अनुसार, मनुष्य का
सांसारिक अहंकार (नफ़्स) एक पर्दा है। 'अल-खैर
अल-महज' यानी शुद्ध पुण्य और परोपकार की भावना इस
मर्म को शुद्ध करती है। जैसे-जैसे यह पर्दा हटता है, साधक को हर
चीज़ में केवल 'अल-वाहिद अल-हक' (उस एक ही
परम सत्य) का जलवा दिखाई देने लगता है, जिसे सूफी
मत में 'फना' (अहंकार का
विसर्जन) और 'बका' (सत्य में
स्थित हो जाना) कहा जाता है।
इस मार्ग में प्रेमिका तो
प्रतीक मात्र है। अध्यात्म में वासना को त्यागना पड़ता है। इसलिए प्रेममार्ग की अध्यात्म
साधना का मतलब है अध्यात्म के प्रति वैसा ही तीव्र आकर्षण जैसा कामी को नारी के प्रति
होता है। इस आकर्षण में मन-हृदय दोनों अपने प्रेमतत्व से तन्मय, एक, या अभिन्न हो जाते
हैं। दिखावटी तौबा इस रास्ते में काम नहीं करती। यहाँ तो सच्ची तौबा से प्यारे के मिलने
का दरवाज़ा खुलता है। सूफ़ी साधक मानते हैं कि इश्क़ बातों का मज़मून नहीं शुद्ध हृदय
का विषय है। हृदय शुद्धि के बाद ही तो –
दिल के आईने
में है तस्वीरें यार
जब ज़रा गर्दन
झुकायी देख ली!
यह मिलन शारीरिक सुख की तरह
क्षणिक नहीं होता। यह सदा के लिए होता है। इस सम्मिलन में अध्यात्म तत्व के
साक्षात दर्शन के आनंद को किसी प्रकार तिरोहित नहीं कर सकते। मानव के भीतर जितनी
प्रेरणा है सब उस केन्द्र के प्रति समर्पित हो जाती है। प्रेमिका और प्रेमी का
सम्मिलन परिपूर्ण प्रतीक है। वह गुह्य होता है। प्रेमिका और प्रिय के बीच में कोई
अंतर नहीं रह जाता। प्रेममार्ग में हृदय स्वाभाविक उमंग के साथ अध्यात्म तत्व की
ओर खिंचता है। अडिग सत से जो अध्यात्म साधना में लगता है वही अंत तक पहुंचता है।
जिसमें ऐसे प्रेम की चिनगारी उत्पन्न हो जाती है उसे सांसारिक विषयों की ज्वाला से
सर्वथा शांति प्राप्त हो जाती है। प्रेममार्ग की साधना नितांत विषयातीत, परिपूर्ण
और परिशुद्ध होती है। ईश्वर को प्रेमिका मानकर जीव उस केन्द्र से मिल जाना चाहता
है जिससे वह बिछड़ गया है।
मानव-जीवन की आत्मा मूलतः प्रेम
है। इसके बिना जीवन नीरस और आनन्द रहित है। ईश्वर के प्रति पाया जाने वाला प्रेम
ही सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ और पवित्रतम होता है। सूफ़ीमत
के अनुसार प्रेम का अधिकारी केवल ईश्वर है, शेष जितने
भी प्रेम इस जगत में हैं, वे सब उसके अधीन होने चाहिए।
सूफ़ी दार्शनिकों ने कल्पना की कि अंतिम सत्य का रूप पूर्ण सौंदर्य का रूप है। सूफ़ी
परमसत्य को “हुस्न-अज़ली” (शाश्वत
सौंदर्य) समझते हैं। सूफी मत के अनुसार, ईश्वर केवल
ब्रह्मांड का निर्माता ही नहीं, बल्कि परम और वास्तविक सौंदर्य
का एकमात्र स्रोत भी है। सूफी दर्शन में एक बहुत ही प्रसिद्ध 'हदीस-ए-कुदसी' (ईश्वरीय
कथन) को इस विचार का आधार माना जाता है, जिसमें
ईश्वर कहता है: "मैं एक
छुपा हुआ खजाना था, और मैंने
चाहा कि मैं जाना जाऊँ, इसलिए
मैंने इस सृष्टि का निर्माण किया ताकि मैं पहचाना जा सकूँ।" सूफियों के
अनुसार, वह "छुपा हुआ खजाना" वास्तव में 'हुस्न-ए-अज़ली' (शाश्वत
सौंदर्य) ही था। सौंदर्य की यह स्वाभाविक विशेषता होती है कि वह
स्वयं को प्रकट करना चाहता है। इसलिए, यह संपूर्ण
दृश्यमान संसार उस शाश्वत सौंदर्य का ही एक दर्पण या प्रतिबिंब है। चूँकि ईश्वर
परम सौंदर्य है, इसलिए मनुष्य की आत्मा स्वाभाविक रूप से
उसकी ओर आकर्षित होती है। सूफी मत में ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग डर या नियमों का
नहीं, बल्कि 'इश्क़' (निस्वार्थ
और तीव्र प्रेम) का है। जब कोई साधक संसार के किसी सुंदर रूप से
आकर्षित होता है, तो सूफी इसे 'इश्क़-ए-मजाज़ी' (सांसारिक
प्रेम) कहते हैं। एक सूफी की यात्रा इस सांसारिक सौंदर्य से आगे बढ़कर उस मूल
स्रोत यानी 'हुस्न-ए-अज़ली' तक पहुँचने की होती है, जिसे 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (दिव्य प्रेम) कहा जाता
है।
यह सत्य प्रच्छन्न है। इसके मूल
में है कि चेहरे को ब्रह्मांड के दर्पण में प्रतिबिम्बित कर दे। सृष्टिरूपी दर्पण
में उसका जो बिम्ब पड़ता है, वही उसकी अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति प्रेम का संकेत
देती है। प्रेम जो सौंदर्य को पहचानने की शक्ति है। प्रेम जो सौंदर्य पर न्यौछावर
होने की योग्यता है। प्रेम की शक्ति विरह की अनुभूति कराती है। सूफ़ी साधक
विरह को ही प्रेम की कसौटी मानते हैं। विरह में प्रेम की सच्चाई की परीक्षा भी
होती है। विरह में प्रेम की परिपक्वता का प्रमाण भी मिल जाता है। विरह में प्रेमी
का प्रियतम के प्रति प्रेम की अनुभूति इतनी विकलता पैदा कर देती है की प्रेम के
बाहर दुनिया का कोई अर्थ शेष नहीं रह जाता। प्रेम से ही प्रेरणा पाकर जीवात्मा उस
परम सत्ता में फिर से मिल जाने का प्रयास करता है।
‘अँसुवन जल सींचि
सींचि प्रेम बेलि बोई।’
हज़रत मौलाना सूफ़ी
अब्दुर्रहमान जामी रहमतुल्लाह अलैह ने कहा है, “अल्लाह ने इंसान को
ऐसा नहीं बनाया कि उसके पहलू में दो दिल हों। जिसने तुझे ज़िन्दगी की नेअमत दी है
उसी ने तेरे पहलू में एक दिल भी रख दिया है, ताकि उस वाहिद-अल्लाह (एक
ईश्वर) की मुहब्बत में तुझे एक वली (मक़सद) व यकसूई (एकाग्रता) हासिल
हो। उसके अलावा किसी और से तुझे कोई ग़रज़ न हो और तू अपने आप को उसी की इबादत के
लिए वक़्फ़ कर (छोड़) दे। ये दानिशमंदी (अक़लमंदी) नहीं कि एक दिल को
टुकड़े-टुकड़े करके अलग-अलग कामों में लगा दिया जाए।”
रुख़ तेरा है
किबलाए वफ़ा की जानिब।
तन परदा है
ज़हन रसा की जानिब॥
बेहतर है कि
दिल को न बहुत रोग लगे।
एक दिल है,
लगा उसको ख़ुदा की जानिब॥
हज़रत हल्लाज
की
कविताओं में कहा गया है, “जिस प्रकार शराब में शुद्ध जल मिला हुआ रहता है, उसी
प्रकार से तुम्हारे और मेरे प्राण मिले हुए हैं। कोई
चीज़ अगर तुम्हें छू रही है, तो उससे
मेरा भी स्पर्श हो जाता है। हर एक हालात में जो तू है वही मैं हूँ।” मंसूर की शायरी में द्वैत (Duality)
पूरी
तरह समाप्त हो जाता है। मंसूर ईश्वर के सौंदर्य को एक ऐसी शमा (लौ) मानते थे जिसके
आकर्षण से पतंगा (इंसान की रूह) खुद को जलाकर राख कर देता है। उनके दीवान (काव्य
संग्रह) की एक पंक्ति कहती है: "तेरा हुस्न
वह आग है जो मेरे वजूद को जलाती है, लेकिन इस जलने में जो आनंद है, वह जन्नत
के सुखों से भी बढ़कर है।" मंसूर अल-हल्लाज की साधना का स्तर यह था कि वे
महबूब के सौंदर्य को खुद से अलग नहीं देख पाते थे। उनके लिए देखने वाला (साधक) और
देखा जाने वाला (परम सौंदर्य) एक ही हो गए थे। इसी अवस्था में उन्होंने 'अनल-हक़' (मैं ही परम
सत्य हूँ) का नारा दिया था।
हज़रत जलालुद्दीन रूमी सौंदर्य
को एक उत्सव, नृत्य और विरह के रूप में देखते हैं। रूमी
के अनुसार, यह संसार ईश्वर के शाश्वत सौंदर्य का एक
विशाल दर्पण है। जब मनुष्य का दिल साफ होता है, तो उसे हर
जगह वही सौंदर्य नृत्य करता हुआ दिखाई देता है। रूमी कहते हैं कि संसार की हर
खूबसूरत चीज़ केवल उस असली हुस्न की एक परछाई है: “दुनिया की हर सुंदर चीज़ उस शाश्वत सौंदर्य की एक किरण
है, जब वह किरण वापस अपने स्रोत की ओर जाती है, तो यहाँ की
चीज़ें मुरझा जाती हैं।" उनका मानना था कि हमें परछाई से नहीं, बल्कि उस
मूल प्रकाश (ईश्वर) से प्रेम करना चाहिए। रूमी की एक प्रसिद्ध रूबैय्यात
(चतुष्पदी) का भाव है: "मैं उस
सौंदर्य का दीवाना हूँ जो कभी नहीं ढलता। मेरा महबूब वह है जिसके चेहरे की चमक से
चाँद और सूरज भी रोशनी उधार लेते हैं। जब वह मुस्कुराता है, तो रूह
अपने पिंजरे से आज़ाद हो जाती है।" यहाँ रूमी 'महबूब' शब्द का
प्रयोग किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि 'हुस्न-ए-अज़ली' के लिए कर
रहे हैं। हज़रत रूमी के लिए 'हुस्न-ए-अज़ली' एक ऐसी बांसुरी की
धुन है जो आत्मा को अपनी ओर बुलाती है, और हज़रत मंसूर के लिए वह एक ऐसा समंदर है जिसमें कूदकर आत्मा खुद समंदर बन
जाती है।
हज़रत जामी की कविताओं
में भी कहा गया है, “मैं वही
हूँ, जिसे मैं प्यार करता हूँ और जिससे मैं
प्यार करता हूँ वह मैं ही हूँ। एक ही शरीर में वास करने वाले हम दो
प्राण हैं। अगर तुम मुझे देखते हो, तो तुम
उसे देखते हो और अगर तुम उसे देखते हो तो तुम हम दोनों को देख रहे हो।”
सूफ़ी साधकों की दृष्टि में
ईश्वर (ख़ुदा) परम
सौंदर्यमय है। प्रेमालम्बन का एकमात्र वही अन्तिम स्थान है। सूफ़ी विचारकों ने ख़ुदा
को पूर्ण सौंदर्य और साधक को उस सौंदर्य का पुजारी माना। मनुष्य की मूल प्रवृत्ति
रागमयी है। मनुष्य की आत्मा पूर्णत्व की प्राप्ति के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहती
है। सौंदर्य, समता और पूर्णता की प्राप्ति ही उसका
उद्देश्य है। मनुष्य की सम्पूर्ण साधना का अंतिम लक्ष्य इसी परम रूप की उपलब्धि
है। असीम सौंदर्य-सागर ईश्वर-प्राप्ति
का एकांत आग्रह प्रेम का ही प्रतिरूप है। संसार के कण-कण में परम-प्रिय विभु
का सौंदर्य विद्यमान है। हज़रत जामी की एक कविता में कहा गया है, “धन्य है वह संसार का मालिक जिसने प्रत्येक
अणु-परमाणु को दर्पण जैसा बनाया है जिससे उसका सौन्दर्य प्रतिबिंबित होता है।” सौंदर्य की सत्ता ही संसार का आधार और सार
है। उस अखण्ड सौंदर्य-सत्ता की उपलब्धि और अनुभूति का एकमात्र
माध्यम प्रेम है। प्रेम की मात्र एक चिंगारी हृदय में अमित ज्वाला प्रज्वलित करने
में सक्षम होती है, जिसमें संपूर्ण लोक विचलित हो उठता है –
मुहमद
चिनगी अनंग की सुनि महि गगन डेराइ।
धनि बिरही
और धनि हिया जेहि सन आगि समाइ॥ (जायसी)
हज़रत इमाम
ग़ज़ाली रह. के अनुसार प्रेम वह है कि मन
उसी में लगा रहे और रसानुभूति करे। जितनी रसानुभूति होगी, प्रेम
होगा। ईश-प्रेम की कसौटी रसानुभूति ही है। हज़रत सहल तुस्तरी रह. ने कहा कि
अल्लाह की सदैव और अनवरत भक्ति और आज्ञापालन और उसके आदेशों की अवज्ञा से सदैव के
लिए परहेज़ का नाम प्रेम है। तमाम सूफ़ी इस पर सहमत हैं कि ‘प्रेम
प्रियतम के तदनुरूप होने का नाम है और तदनुरूपताओं में सब से बड़ी तदनुरूपता मन की
तदनुरूपता है।’ सामान्य रूप से सूफ़ी प्रेम की चर्चा साधन
और साध्य दोनों दृष्टि से करते हैं।
हज़रत इब्ने
तैकिया रह. कहते हैं कि अल्लाह की
मुहब्बत (ईश-प्रेम) ही धर्म का मूल है। जो जितना ईश-प्रेम में उतरेगा, वह उतना ही
धर्मपालक होगा और
इसके विपरीत ईश-प्रेम
में जितनी कमी होगी, उतना ही वह धर्म-पालन से विमुख होगा।
मनुष्य के पैदा किए जाने का मूल उद्देश्य प्रेम है। अपने पालनहार की इबादत
(भक्ति और आज्ञापालन) करो। इबादत में प्रेम का पाया जाना अनिवार्य है। प्रेम नहीं
तो इबादत नहीं हो सकती, इसलिए कि उत्कृष्ट प्रेम ही
प्रियतम को उपास्य बना सकेगा। अतः प्रेम को साध्य होने में संकोच नहीं रह जाता।
प्रेम से अधिक सुन्दर कुछ भी नहीं है। जो प्रेम की आग में जलता है, उसका
अनुभव व्यर्थ नहीं जाता। प्रेम में आत्मोपलब्धि भी संभव है,
आत्मप्रसार भी।
हज़रत
मुईनुद्दीन चिश्ती रह. का कहना है कि सूफ़ी-साधक
अक़्ल की आंख से महबूब के हुस्न को नहीं देखता बल्कि मजनूं की आंख से लैला को देखता
है। वह प्रभु को देखता ही प्रेमी (आशिक़) की दृष्टि से है। वह अपनी संपूर्ण
चाहत, उस ‘परम प्रिय’ पर उड़ेलकर
उसी का हो जाता है। प्रेम की यही एकनिष्ठा उसके आचरण को पवित्र बना देती है।
हज़रत जुन्नून
बिन इब्राहिम रह. तो यहां तक कहते हैं कि सूफ़ी वह
है, जिसने सृष्टि में केवल अल्लाह ही को पसंद किया
है। फ़क़ीर वह है जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी और वस्तु की ओर आकृष्ट न हो। उसी के लिए
उसने अपना सब कुछ त्याग दिया हो, न्यौछावर कर दिया हो। प्रेम का
यह मार्ग भारतीय उपासना में भी वैसा ही है जैसा सूफ़ी -प्रेमोपासना में। इसके लिये
सर्वस्व त्याग करके आगे बढ़ना होता है –
प्रेम न बाड़ी
नीपजै प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि
रुचौ सीस देय लै जाय।।
सूफ़ी भी कहता है –
तरीके फ़ना
में क़दम रखके पूछो,
मुहब्बत की
रस्में मुहब्बत की राहें!
हज़रत अबू
उस्मान रह. का मानना है कि तसव्वुफ़ का अर्थ
संसार-त्याग और वास्तविकताओं को पा लेना है और कौन नहीं जानता कि प्रेम सूफ़ीमत में
सबसे बड़ी वास्तविकता है। इन सबसे प्रेम का साध्य होना ही स्पष्ट होता है।
हज़रत सय्यद
अली हजवेरी रह. (मृ. 1072 ई.) का कहना है
कि ईश्वर के प्रति साधक के मन में जो प्रेम उत्पन्न होता है, वह इतना
व्यापक होता है कि प्रेमी साधक सांसारिक विषयों की ओर से अनासक्त हो जाता है और
केवल प्रेम के नियमों का पालन कर ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करता है। उनकी लिखी “कश्फ़ अलमहजूब” सूफ़ीवाद की आधारभूत पुस्तक मानी जाती है। हज़रत हजवेरी का कहना है- ‘‘सूफि़यों तथा
अध्यात्मिक महापुरुषों का मूल मिशन ही यह था कि जनसाधारण के भीतर उस वास्तविक
धार्मिकता एवं ईश्वरी उपासना की मूल आत्मा जागृत एवं प्रज्ज्वलित की जाए, जो विभिन्न
नबियों के आह्वान का मूल उद्देश्य था। परन्तु यह बात निरंकुश एवं अन्यायी शासकों
को असह्य थी। अतः सूफ़ियों ने अपनी बात ऐसी भाषा, ऐसी शब्दावली में व्यक्त की कि उनके समुदाय के लोग तो उसे भली-भांति समझ लें परन्तु यदि यह बात उनके
क्षेत्र के बाहर जाए तो दूसरे इस परम्परा के भेद को न पा सकें।”
11.5 प्रेम का साधन
होना
रहा प्रेम का साधन होना, तो इसमें
कोई संदेह नहीं कि सूफ़ियों के लिए प्रेम ही वह सीढ़ी है जो उसे ईश्वर (अल्लाह) तक
पहुंचा सकती है। प्रेम ही वह माध्यम है, जो उसे
प्रियतम की प्रसन्नता प्राप्त करने पर उभरता है। प्रेम ही वह रास्ता है जो प्रभु
से निकलता है। प्रेम ही वह पथ है जो उसके जीवन को प्रियतम के कहे अनुसार चलने पर
उभरता है। इस प्रकार वह प्रियतम का हो जाता है और प्रियतम उसका।
हज़रत
राबिया बसरी मानती हैं कि अल्लाह के
प्रेमी की चाह को उस समय तक चैन नहीं, जब तक वह
अपने प्रियतम के पास न पहुंच जाए। हज़रत अल-शिवली का कथन है
कि प्रेम हृदय में अग्नि के समान है जो परमात्मा की इच्छा के अतिरिक्त सभी
वस्तुओं को जलाकर भस्म कर देती है। प्रेम से प्रियतम के सभी गुण प्राप्त हो
जाते हैं। प्रेम से अहं की भावना दूर हो
जाती है और वह प्रियतम हो जाता है। हज़रत जामी की एक कविता में कहा गया है, “इस संसार में तुम सैंकड़ों उपाय कर लो, लेकिन
प्रेम ही एकमात्र ऐसा उपाय है जो तुम्हारे अहं से तुम्हारी रक्षा करेगा।”
मशहूर सूफी संत जलालुद्दीन रूमी
ने लिखा है कि "प्रेम वह पुल है जो आपको
ब्रह्मांड से जोड़ता है।" उनके अनुसार, ज्ञान की
सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन प्रेम असीम है और यही आत्मा को ईश्वर
से मिलाता है। सूफियों के लिए प्रेम कोई साधारण भावना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक
साधना (इबादत) है, जिसके बिना ईश्वर का साक्षात्कार असंभव
माना गया है।
सूफ़ी परमात्मा को प्रियतम मानता
है। परमात्मा उस साधक का प्रियपात्र एवं माशूक़
है, जिसके प्रेम में वह व्याकुल रहता है। प्रेम
से वह अनन्त सौन्दर्य का रसास्वादन करता है क्योंकि जहाँ सौन्दर्य नहीं है, प्रेम का
होना मुश्किल है। अतः परमात्मा की अनुभूति के लिये प्रेम ही एकमात्र साधन है। हज़रत
अबू अब्दुल्लाह अल-क़ुरैशी रह. फ़रमाते हैं कि प्रेम की वास्तविकता यह है कि तुम
अपने प्रियतम पर अपनी हर चीज़ क़ुरबान कर दो यहाँ तक कि तुम्हारे
पास तुम्हारा कुछ भी बाक़ी न रहे।
सूफी मत पूरी तरह से 'इश्क' पर ही
आधारित है। सूफियों का मानना है कि ईश्वर कोई तार्किक विषय नहीं है जिसे बुद्धि या
किताबों से समझा जा सके, वह तो केवल
प्रेम की तीव्रता से महसूस किया जाने वाला 'परम सत्य' है। जैसे एक प्रेमी अपनी सुध-बुध खोकर सिर्फ अपने
प्रियतम को चाहता है, वैसे ही
सूफी केवल ईश्वर की इच्छा और उसके प्रेम में जीता है। इसके बिना साधना अधूरी है। सूफी
साहित्य में पतंगे (परवाने) और मोमबत्ती (शमा) का उदाहरण दिया जाता
है। पतंगा शमा से इतना प्रेम करता है कि वह उसमें जलकर खुद को मिटा देता है। सूफी
भी ईश्वर के प्रेम में खुद को मिटा देने को ही वास्तविक जीवन मानते हैं। संक्षेप
में कहें तो सूफी मत में शरीयत (धार्मिक नियम), तरीकत
(आध्यात्मिक मार्ग) और हकीकत (सत्य) के चरण तो हैं, लेकिन इन सभी चरणों को जोड़ने वाली और मंजिल तक
पहुँचाने वाली एकमात्र ऊर्जा प्रेम
(इश्क) ही है।
सूफियों के लिए प्रेम के बिना की गई इबादत बेजान है। अल्लामा इक़बाल के इस बेहद
खूबसूरत और दार्शनिक शे’र में ईश्वर
(परमात्मा) और भक्त (आत्मा) के बीच के गहरे आध्यात्मिक रिश्ते को दर्शाया गया है। यह शे’र मुख्य रूप से इंसान की उस
तड़प को बयां करता है जहाँ वह ईश्वर का साक्षात दर्शन करना चाहता है।
“हुस्न भी हो हिजाब में, इश्क़ भी हो
हिजाब में,
या ख़ुद
आशकार हो, या मुझे आशकार कर।”
इस शे’र को पूरी तरह समझने के
लिए पहले इसके मुख्य शब्दों के अर्थ जानना ज़रूरी है: हिजाब: परदा या छुपा होना।, हुस्न: यहाँ इसका अर्थ 'परम
सौंदर्य' यानी स्वयं ईश्वर (खुदा) से है। इश्क़: ईश्वर के प्रति भक्त का
सच्चा प्रेम या इंसान
की रूह (आत्मा)। आशकार: प्रकट होना, सामने आना या प्रत्यक्ष होना।
"हुस्न भी हो हिजाब में, इश्क़ भी हो हिजाब में"
इक़बाल
कहते हैं कि यह कैसी अजीब स्थिति है कि हुस्न (ईश्वर) भी परदे में छुपा हुआ है (वह
हमें दिखाई नहीं देता) और इश्क़ (इंसान की आत्मा/प्रेम) भी इस हाड़-मांस के शरीर के
परदे में छुपा हुआ है। दोनों एक-दूसरे से मिलने के लिए तड़प रहे हैं, लेकिन दोनों पर ही एक परदा पड़ा हुआ है। इक़बाल को यह दूरी स्वीकार नहीं है।
"या ख़ुद आशकार हो, या मुझे आशकार कर।"
यहाँ
इक़बाल ईश्वर के सामने एक बहुत ही बेबाक और प्रेम भरी शर्त रखते हैं। वे कहते हैं
कि हे ईश्वर! इस लुका-छिपी के खेल को अब खत्म करो। या तो तुम 'ख़ुद आशकार हो' यानी अपना परदा हटाकर मेरे सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो जाओ ताकि मैं
तुम्हारा दीदार कर सकूं। या फिर 'मुझे आशकार कर'
यानी मुझे (मेरी आत्मा को) इस सांसारिक शरीर और बंधनों के परदे से
आज़ाद कर दो, मेरी चेतना को इतना ऊपर उठा दो कि मैं स्वयं को
पहचान लूं और तुम्हारे भीतर समा जाऊं।
यह
शे’र सूफी दर्शन के 'खुदी' (आत्मानुभूति) के सिद्धांत से
जुड़ा है। इक़बाल का मानना है कि ईश्वर और इंसान के बीच का परदा तब तक नहीं हट सकता
जब तक या तो ईश्वर स्वयं को प्रकट न कर दे, या
इंसान अपने भीतर की 'खुदी' (आत्मज्ञान) को इतना बुलंद न कर ले कि वह परमात्मा से सीधा संवाद कर सके। यह ईश्वर
से दूरी को मिटाकर पूरी तरह एक हो जाने की एक आशिक़ (भक्त) की परम पुकार है।
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मनोज
कुमार