सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

446. अंतरिम सरकार-1946

राष्ट्रीय आन्दोलन

446. अंतरिम सरकार-1946

1946

जुलाई, 1946 में लॉर्ड वेवेल ने पुनः केन्द्र में मज़बूत और ताकतवर सरकार हो, इस दिशा में प्रयत्न आरंभ किया। जिन्ना चाहता था कि इसमें पांच कांग्रेसी हिंदू, पांच लीगी मुसलमान, एक सिख और एक अनुसूचित जाति के सदस्य हों। कांग्रेस ने इसे शिमला सम्मेलन से भी एक क़दम पीछे कहकर अस्वीकार कर दिया। जिन्ना के अक्खड़पन से तंग आकर वायसराय लॉर्ड वेवल ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के बजाय एक अन्तरिम राष्ट्रीय सरकार की रचना की घोषणा की और 6 अगस्त को कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण दिया।

आज़ाद के बाद नेहरूजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने

इस बीच मौलाना आज़ाद के बाद नेहरूजी कांग्रेस के अध्यक्ष हो गए थे। तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा। उस वक्त के कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पिछले छह साल से इस पद पर थे। वह 1939 में कांग्रेस का प्रेसिडेंट चुने गए थे। कांग्रेस के कंस्टीट्यूशन के अनुसार, उनका ऑफिस सिर्फ़ एक साल के लिए था। सामान्य हालात में, 1940 में एक नया प्रेसिडेंट चुना जाता। युद्ध बीच में आ गया और उसके तुरंत बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन शुरू हो गया। कांग्रेस के नेताओं को 1940 में और फिर 1942 में अरेस्ट कर लिया गया। कांग्रेस को भी एक गैर-कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। इसलिए उनके बाद किसी अध्यक्ष के चुनाव का कोई सवाल ही नहीं उठता था और वह इस पूरे समय प्रेसिडेंट बने रहे।

अब उनके जाने का वक्त हो गया था। आम तौर पर यह मांग उठी कि मौलाना को एक और टर्म के लिए प्रेसिडेंट चुना जाना चाहिए। अभी वह कैबिनेट मिशन के साथ बातचीत का इंचार्ज थे। कांग्रेस में आम राय थी कि चूंकि उन्होंने अब तक बातचीत की थी, इसलिए उन्हें सफलतापूर्वक खत्म करने और लागू करने का काम भी मौलाना को ही सौंपा जाना चाहिए। सरदार पटेल और उनके दोस्त चाहते थे कि उन्हें प्रेसिडेंट चुना जाए। तब तक गाँधीजी, नेहरू के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे। 20 अप्रैल 1946 को उन्होंने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्‍यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं।' गाँधीजी ने बिना लागलपेट के ये भी साफ़ कर दिया कि 'अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं। उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता।' (कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315) इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में ख़बर फैल गई कि गाँधीजी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। 26 अप्रैल 1946 को, मौलाना आज़ाद ने प्रेसिडेंट के लिए नेहरू के नाम का प्रस्ताव देते हुए एक बयान जारी किया और कांग्रेसियों से अपील की कि वे जवाहरलाल को एकमत से चुनें। ‘इण्डिया विन्स फ्रीडम में आज़ाद कहते हैं, मैंने अपने सबसे अच्छे फैसले के हिसाब से काम किया, लेकिन उसके बाद से जिस तरह से चीजें बदली हैं, उससे मुझे एहसास हुआ है कि यह शायद मेरी राजनीतिक ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। मुझे अपनी किसी भी गलती पर इतना अफसोस नहीं हुआ जितना इस नाजुक मोड़ पर कांग्रेस के प्रेसिडेंट पद से हटने के फैसले पर हुआ। यह एक ऐसी गलती थी जिसे मैं गांधीजी के शब्दों में हिमालयी डायमेंशन की गलती कह सकता हूँ।

उस समय की रोचक घटना का कृपलानी ने ‌अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में विस्तार से ज़िक्र किया है। 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना था जिसे कुछ महीने बाद ही अंतरिम सरकार में भारत का प्रधानमंत्री बनना था। इस बैठक में महात्मा गाँधी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के साथ कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे। कमरे में बैठा हर शख़्स जानता था कि गाँधीजी नेहरू को अध्यक्ष देखना चाहते हैं। परंपरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था। बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था। किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था जबकि सारी कमेटियाँ अच्छी तरह जानती थी कि गाँधी नेहरू को चौथी बार अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। पार्टी के महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गाँधी की तरफ बढ़ा दी। गाँधीजी ने कृपलानी की तरफ देखा। कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं। उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया। उस पर सबने दस्तख़त किए। पटेल ने भी दस्तख़त किए। अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे। एक नेहरू और दूसरे पटेल।

नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें। कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी। मतलब साफ था-चूंकि गाँधीजी चाहते हैं नेहरू अध्यक्ष बनें इसलिए आप अपना नाम वापस लेने के कागज पर साइन कर दें लेकिन आहत पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गाँधीजी की तरफ बढ़ा दिया। गाँधीजी ने नेहरू की तरफ़ देखा और कहा, ''जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नहीं सुझाया है। तुम्हारा क्या कहना है?'' नेहरू ख़ामोश रहे। वहां बैठे सारे लोग ख़ामोश थे। गाँधीजी को शायद उम्मीद थी कि नेहरू कहेंगे, तो ठीक है आप पटेल को ही मौका दें। लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं कहा। अब अंतिम फैसला गाँधीजी को करना था। गाँधीजी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया। इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए। कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं।'' कृपलानी ने ‌अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में लिखा है, ''मेरा इस तरह हस्तक्षेप करना पटेल को अच्छा नहीं लगा। पार्टी का महासचिव होने के नाते में गाँधीजी की मर्ज़ी का काम यंत्रवत कर रहा था और उस वक्त मुझे ये बहुत बड़ी चीज नहीं लगी। आख़िर ये एक अध्यक्ष का ही तो चुनाव था। मुझे लगा अभी बहुत सी लड़ाइयाँ सामने हैं। लेकिन भविष्य कौन जानता है? मालूम होता है ऐसी तुच्छ घटनाओं से ही किसी व्यक्ति या राष्ट्र की किस्मत पर निर्भर होती है। साल 1929, 1936, 1939 के बाद ये चौथा मौका था जब पटेल ने गाँधीजी के कहने पर अध्यक्ष पद से अपना नामांकन वापस लिया था। जब पत्रकार दुर्गादास ने गांधीजी से पटेल के नहीं चयन किए जाने पर सवाल पूछा. तो उन्होंने कहा, ''जवाहर दूसरे नम्बर पर आने के लिए कभी तैयार नहीं होंगे। वो अंतरराष्ट्रीय विषयों को पटेल के मुकाबले अच्छे से समझते हैं। वो इसमें अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। ये दोनों सरकारी बैलगाड़ी को खींचने के लिए दो बैल हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कामों के लिए नेहरू और राष्ट्र के कामों के लिए पटेल होंगे। दोनों गाड़ी अच्छी खींचेंगे।" गाँधीजी को भरोसा था कि पटेल को नम्बर 2 होने में कोई एतराज़ नहीं होगा और वाकई ऐसा ही हुआ क्योंकि पटेल मुंह फुलाने की बजाए एक हफ्ते के अंदर फिर न केवल सामान्य हो गए बल्कि हंसी-मज़ाक करने लगे।

इससे महत्त्वपूर्ण यह है कि गाँधीजी को लगता था कि अपनी अंग्रेज़ियत के कारण सत्ता हस्तांतरण को नेहरू पटेल के मुकाबले ज्यादा बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं। महात्मा गाँधी ने एक और मौके पर भी यही बात कही थी कि 'जिस समय हुकूमत अंग्रेजों के हाथ से ली जा रही हो, उस समय कोई दूसरा आदमी नेहरू की जगह नहीं ले सकता। वे हैरो के विद्यार्थी, केम्ब्रिज के स्नातक और लंदन के बैरिस्टर होने के नाते अंग्रेज़ों को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं।' (महात्मा, तेंदुलकर खंड 8 पेज 3) बाहर की दुनिया में नेहरू का नाम आजादी की लड़ाई में गाँधीजी के बाद दूसरे नम्बर पर था। न केवल यूरोपीय लोग बल्कि अमरीकी भी नेहरू को महात्मा गाँधी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते थे जबकि पटेल के बारे ऐसा बिल्कुल नहीं था। पटेल को शायद ही कोई विदेशी गाँधीजी का उत्तराधिकारी मानता हो। लंदन के कहवा घरों में बुद्धिजीवियों के बीच नेहरू की चर्चा होती थी। तमाम वायसराय और क्रिप्स समेत कई अंग्रेज अफसर नेहरू के दोस्त थे। उनसे नेहरू की निजी बातचीत होती थी। नेहरू एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्हें अंग्रेज़ी और हिन्दी में बोलने और लिखने की कमाल की महारत हासिल थी। नेहरू उदार थे और उनका खुलापन उन्हें लोकप्रिय बनाता था। वो भावुक और सौंदर्य प्रेमी थे जो किसी को भी रिझा सकते थे। इसके उलट पटेल सख़्त और थोड़े रुखे थे। वो व्यवहार कुशल थे लेकिन उतने ही मुंहफट भी। दिल के ठंडे लेकिन हिसाब-किताब में माहिर। नेहरू जोड़तोड़ में बिलकुल माहिर नहीं थे। वे कांग्रेस में भी अलग-थलग रहने वाले नेता थे। जेल में बंद रहकर वे अपने साथी कांग्रेसियों से गपशप करने की जगह अपनी कोठरी में अकेले बैठ कर 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' जैसी किताबें लिखते थे। उनकी अभिजात्य वर्ग की अपनी एक अलग दुनिया थी। पटेल राजनीतिक तंत्र का हर पुर्जा पहचानते थे। जोड़-तोड़ करने में माहिर थे। यही वजह थी कि प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी में उन्हें 15 में से 2 कमेटियों का समर्थन मिला। नेहरू कमाल के वक्ता थे जबकि पटेल को भाषण बाजी से चिढ़ थी। वे दिल से और साफ साफ बोलते थे। ऐसा नहीं था कि मुसलमानों को लेकर उनके मन में कोई वितृष्णा या पूर्वाग्रह था लेकिन खरा-खरा बोलने के कारण वह देश के मुसलमानों में नापसंद किए जाने लगे। नेहरू समाजवाद के मसीहा थे तो पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा करने वाले पटेल पूंजीवादियों के संरक्षक। नेहरू आधुनिक हिन्दुस्तान और धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखते थे तो पटेल राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते थे। हिंदू और हिंदू परम्परा को लेकर उनके मन में कोमल भावनाएं थीं जो वक्त-बेवक्त उन्हें उत्तेजित कर देती थीं। नेहरू में एक पैनी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि थी, बावजूद इसके वे स्वाभाविक रूप से भावुक और जरूरत से ज्यादा कल्पनाशील थे।

कांग्रेस का संविधान सभा में शामिल होने का फैसला

कांग्रेस और लीग, दोनों कैबिनेट मिशन की योजना तकरीबन कबूल कर चुकी थी। कांग्रेस और लीग दोनों अपने हिसाब से कैबिनेट मिशन की योजना का मतलब निकाल रहे थे। ऐसे माहौल में नेहरू ने सात जुलाई 1946 को कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने साफ़ कर दिया कि कांग्रेस के हिसाब से इस योजना में क्या है। कांग्रेस मानती थी कि चूंकि प्रांतों को किसी समूह में रहने या न रहने की आज़ादी होगी, इसलिए ज़ाहिर है कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और असम, जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं, वो पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान वाले समूह से जुड़ना चाहेंगे। जिन्ना कांग्रेस की इस व्याख्या से कतई सहमत नहीं था। उसके अनुसार कैबिनेट मिशन योजना के तहत पश्चिम के चार और पूर्व के दो राज्यों का दो मुस्लिम-बहुल समूह का हिस्सा बनना बाध्यकारी था। बस यहीं सोच का अंतर था।

10 जुलाई 1946 को नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके कहा कि कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला तो कर लिया है लेकिन अगर उसे ज़रूरी लगा तो वह कैबिनेट मिशन योजना में फेरबदल भी कर सकती है। जिन्ना नाराज़ हो गया। उसे मौका मिल गया। उसने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और साफ़ कह दिया कि कांग्रेस के इरादे नेक नहीं। अब अगर ब्रिटिश राज के रहते मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो बहुत बुरा होगा। उसका मानना ​​था कि जवाहरलाल के ऐलान का मतलब था कि कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन प्लान को रिजेक्ट कर दिया है और इसलिए वायसराय को मुस्लिम लीग को, जिसने प्लान को स्वीकार कर लिया था, सरकार बनाने के लिए बुलाना चाहिए। मुस्लिम लीग काउंसिल की मीटिंग 27 जुलाई को बॉम्बे में हुई। जिन्ना ने अपनी शुरुआती स्पीच में पाकिस्तान की मांग दोहराई, क्योंकि मुस्लिम लीग के लिए यही एकमात्र रास्ता बचा था। तीन दिन की चर्चा के बाद, काउंसिल ने कैबिनेट मिशन प्लान को खारिज करते हुए एक प्रस्ताव पास किया। इसने पाकिस्तान बनाने के लिए डायरेक्ट एक्शन का भी फैसला किया।

AICC को उम्मीद थी कि मुस्लिम लीग और बाकी सभी संबंधित लोग, देश और अपने हित में, इस बड़े काम में शामिल होंगे। वायसराय ने 12 अगस्त को, जवाहरलाल नेहरू को केंद्र में अंतरिम सरकार बनाने के लिए बुलाया। नेहरू ने जिन्ना को अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा लेकिन उसने न केवल सहयोग देने से इनकार कर दिया, बल्कि बड़ी ही कटु आलोचना करते हुए कहा, सवर्ण हिन्दुओं की फासिस्ट कांग्रेस और उसके पिट्ठू अंग्रेज़ी संगीनों की मदद से मुसलमानों और अल्पसंख्यकों पर हावी होकर उन्हें दबाना और उनपर हुक़ूमत करना चाहते हैं। 15 अगस्त को जवाहरलाल जिन्ना से उसके घर पर मिले। हालांकि, उनकी बातचीत से कुछ नहीं निकला और हालात तेज़ी से बिगड़ते गए।

वायसराय को कैबिनेट सदस्यों की अपनी लिस्ट देने से पहले, पंडित नेहरू ने एक बार फिर जिन्ना को अंतरिम सरकार बनाने में कांग्रेस के साथ सहयोग करने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने न्योता ठुकरा दिया और मुस्लिम लीग ने नई दिल्ली में सेक्रेट्रिएट के सामने काले झंडे दिखाकर यह दिन मनाया। महात्मा गांधी की अनुमति से 2 सितंबर को कांग्रेसी मंत्रियों ने अपने पद ग्रहण किए। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू इस सरकार के उपाध्यक्ष, वायसराय की कार्यकारी परिषद, बनाए गए। मौलाना आज़ाद कैबिनेट से बाहर रहे। उन्होंने सलाह दी कि आसफ अली को कैबिनेट में ले लिया जाए। पारसी कम्युनिटी की तरफ से सी.एच. भाभा थे। यह भी तय किया कि सरकार को पहले इंडियन फाइनेंस मेंबर के तौर पर एक अनुभवी इकोनॉमिस्ट को शामिल करना चाहिए। कमिटी ने डॉ. जॉन मथाई को चुना, हालांकि वह किसी भी तरह से कांग्रेसी नहीं थे। सरकार के ये लोग थे: पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, असफ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरत चंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेव सिंह, सर शफ्फात अहमद खान, जगजीवन राम, सैयद अली ज़हीर, कूवरजी होरमुसजी भाभा।

शपथ ग्रहण के पूर्व वे भंगी बस्ती में गांधीजी के आशीर्वाद लेने गए। वह गांधीजी के मौन का दिन सोमवार था। उनका लिखित संदेश मंत्रियों को पढ़कर सुनाया गया, नमक-कर हटा दीजिए। दांडी-कूच को याद रखिए। हिंदू-मुसलमानों की एकता सिद्ध कीजिए। छुआछूत मिटा दीजिए। खादी को अपनाइए। शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा था, यह पुराने अन्यायों को याद करने या कटु स्मृतियों को ताज़ा करने का अवसर नहीं है। मुस्लिम लीग सरकार में नहीं आई है। मुसलमान आज शोक दिवस मना रहे हैं। इसलिए हिंदुओं का काम है कि वे आज आनंद न मनाएं। उपवास और प्रार्थना के द्वारा मुसलमानों के ज़्यादा से ज़्यादा नज़दीक आने का प्रयास करें। इस अवसर का उपयोग वे आत्म-निरीक्षण करने में और यह पता लगाने में करें कि सचमुच तो उन्होंने अपने मुसलमान भाइयों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है। इसी तरह मुसलमान के लिए यह अनुचित होगा कि वे हिंदुओं को अपना शत्रु समझें। हम सब भाई-भाई हैं।

मुस्लिम लीग ने 2 सितंबर को विरोध दिवस के रूप में मनाया। काले झंडे लेकर जगह-जगह प्रदर्शन किया। जिन्ना जिन राष्ट्रीय मुसलमानों को गद्दार कहता था उनपर हमला किया गया। सर शफ़त अहमद ख़ान ने नेहरूजी का निमंत्रण स्वीकार किया था और अंतरिम सरकार में शामिल हुए थे। मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने छूरा मारकर उनकी हत्या कर दी। उनका शव शिमला में सड़क किनारे पड़ा पाया गया। मसूरी में रफ़ी अहमद क़िदवई के भाई शफ़ी अहमद क़िदवई की हत्या कर दी गई।

अंतरिम सरकार में लीग का प्रवेश

कैबिनेट मिशन देश को वैधानिक चक्रव्यूह में फंसाकर चला गया था। वायसराय वेवेल अपनी कुटिल चालों से देश को साम्प्रदायिकता के दलदल में धकेल कर पस्त कर रहा था ताकि या तो आज़ादी अटक जाए या फिर देश टुकड़ों में बंट जाए। हालाकि अंग्रेज़ देश छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन कैबिनेट मिशन की घोषणा के बाद आज़ादी देना ज़रूरी हो गया था। इसलिए वायसराय देश को बिखरा देना चाहता था, ताकि देश कभी पनप न सके। अंग्रेज़ी सत्ता ने देश की सामाजिक, राजनीतिक एकता को खंडित कर कटुता, सांप्रदायिकता और संकीर्णता के विषाक्त बीज बो दिए थे। नव गठित मंत्रिमंडल को अपने काम करने में उपनिवेशवादी प्रशासकों द्वारा उत्पन्न किए गए हज़ारों रुकावटों का सामना कर पड़ रहा था। वेवेल अब भी जिन्ना को अंतरिम सरकार में शामिल हो जाने के लिए मनाने का प्रयत्न कर रहा था। मुस्लिम लीग न सिर्फ़ निराश थी बल्कि गुस्से में भी थी। उसे लगा कि अंग्रेज़ों ने उसे धोखा दिया है।

देशव्यापी अराजकता से बुरी तरह घबरा कर, लॉर्ड वेवेल ने लीग को भी अंतरिम सरकार में सम्मिलित कर लिया। लेकिन इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वाद विवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा। 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान सभा की बैठक होने वाली थी। देशव्यापी अराजकता से बुरी तरह घबरा कर वायसराय लॉर्ड वेवेल ने लीग को समझाया।  उन्होंने जिन्ना को बुलाया जो दिल्ली आया और उनके साथ कई मीटिंग कीं। कैबिनेट मिशन का कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली  वाला प्रोपोज़ल ने मुस्लिम लीग के सभी जायज़ डर को दूर कर दिया है। इसने मुस्लिम लीग को कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली में काम करने और अपना नज़रिया रखने की पूरी आज़ादी दी। लीग के पास कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली का बॉयकॉट करने का कोई भी कारण नहीं था। इस आधार पर कि लीग अपने कोटे के पांच सदस्यों में से एक कांग्रेसी मुसलमान लिए जाने के बदले अनुसूचित जाति का एक लीगी सदस्य (जोगेन्द्रनाथ मंडल) रख ले, उसने जिन्ना को सरकार में शामिल होने के लिए मना लिया। जब जिन्ना ने लॉर्ड वेवेल को अपनी लिस्ट दी, तो उसने लियाकत अली, आई.आई. चुंदरीगर, अब्दुर रब निश्तर, ग़ज़नफ़र अली और जोगेंद्र नाथ मंडल के नाम शामिल किए। जब सुहरावर्दी ने बंगाल में मुस्लिम लीग मिनिस्ट्री बनाई, तो उसकी मिनिस्ट्री में शामिल एकमात्र गैर-मुस्लिम जोगेंद्र नाथ मंडल थे। तब बंगाल में उन्हें लगभग कोई नहीं जानता था और पूरे भारत की पॉलिटिक्स में उनकी कोई जगह नहीं थी। कांग्रेस ने एग्जीक्यूटिव काउंसिल में हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी, शेड्यूल्ड कास्ट और ईसाई सदस्यों को नॉमिनेट किया था, लेकिन जिन लिमिटेशन में वह काम करती थी, उसमें वह शेड्यूल्ड कास्ट का सिर्फ़ एक रिप्रेजेंटेटिव शामिल कर सकती थी। मुस्लिम लीग ने सोचा कि शेड्यूल्ड कास्ट का दूसरा रिप्रेजेंटेटिव नॉमिनेट करके वह कांग्रेस को शर्मिंदा कर देगी और इस तरह यह साबित कर देगी कि वह कांग्रेस से ज़्यादा शेड्यूल्ड कास्ट की दोस्त है। जिन्ना को यह बात समझ नहीं आई कि उसका यह काम उसके पहले के दावे से अलग था कि कांग्रेस को सिर्फ़ हिंदुओं को और मुस्लिम लीग को सिर्फ़ मुसलमानों को नॉमिनेट करना चाहिए। मंत्रिमंडल निम्नलिखित था, जो 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तक प्रभावी रही।

जवाहरलाल नेहरू: कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष, विदेश मामले और राष्ट्रमंडल संबंध

सरदार वल्लभभाई पटेल: गृह, सूचना और प्रसारण

डॉ. राजेंद्र प्रसाद: खाद्य और कृषि

लियाकत अली खान: वित्त

डॉ. जॉन मथाई: उद्योग और आपूर्ति

बलदेव सिंह: रक्षा

सी. राजगोपालाचारी: शिक्षा

सी. एच. भाभा: कार्य, खान एवं शक्ति

जगजीवन राम: श्रम

अब्दुल रब निस्तार: रेलवे और संचार

आसफ अली: रेलवे (शुरुआत में), परिवहन

इब्राहिम इस्माइल चनदरीगर: वाणिज्य

ग़ज़नफ़र अली खान: स्वास्थ्य

जोगेंद्र नाथ मंडल: कानून

आतंक फैलाने के बाद लीग ने अपनी नीति बदल ली। अब वह सरकार में प्रवेश कर पाकिस्तान लेने की योजना बनाने लगी। लीग ने 15 अक्तूबर को अन्तरिम सरकार में आने की घोषणा की। अंततः 26 अक्तूबर, 1946 को जिन्ना अंतरिम सरकार में शामिल हो गया। लेकिन यहां कांग्रेस का विरोध करना उसका एकमात्र उद्देश्य रह गया था। लियाकत अली खान को छोड़कर, लीग के सभी उम्मीदवार दूसरे दर्जे के थे, जिससे पता चलता है कि दांव पर सत्ता थी, देश चलाने की ज़िम्मेदारी नहीं। यह सच है कि लीग ने कभी भी राजनीतिक संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया था और इसलिए उसके पास राष्ट्रीय महत्व के बहुत कम नेता थे। जिन्ना को एहसास हो गया था कि प्रशासन कांग्रेस के हाथों में छोड़ना खतरनाक है और उसने पाकिस्तान के लिए लड़ने के लिए सरकार में जगह बनाने की कोशिश की। उसके लिए, अंतरिम सरकार दूसरे तरीकों से गृहयुद्ध को जारी रखना था।

जब लीग सरकार में शामिल होने के लिए मान गई थी, तो कांग्रेस को सरकार को फिर से बनाना था और लीग के प्रतिनिधियों को जगह देनी थी। लीग के उम्मीदवारों के लिए जगह बनाने के लिए शरत चंद्र बोस, सर सफ़त अहमद खान और सैयद अली ज़हीर को इस्तीफ़ा देना पडा। लॉर्ड वेवेल ने सुझाव दिया था कि एक बड़ा विभाग लीग के प्रतिनिधि को मिलना चाहिए। कांग्रेस की तरफ से वायसराय को बताया गया कि कांग्रेस मुस्लिम लीग के किसी नॉमिनी को फाइनेंस का ऑफर देगी। जिन्ना ने प्रपोजल मान लिया और इसके मुताबिक लियाकत अली फाइनेंस का मेंबर बन गया। कांग्रेस को जल्द ही एहसास हो गया कि उसने मुस्लिम लीग को फाइनेंस सौंपकर बहुत बड़ी गलती की है। फाइनेंस मेंबर हर डिपार्टमेंट में दखल दे सकता था, और पॉलिसी तय कर सकता था। लियाकत अली को सरकार की चाबी मिल गई। हर डिपार्टमेंट का हर प्रपोज़ल उसके डिपार्टमेंट द्वारा जांचा जाता था। इसके अलावा, उसके पास वीटो की पावर भी थी। उसके डिपार्टमेंट की मंज़ूरी के बिना किसी भी डिपार्टमेंट में कोई भी चपरासी अपॉइंट नहीं किया जा सकता था। उसके लगातार दखल देने से किसी भी कांग्रेस मेंबर के लिए ठीक से काम करना मुश्किल हो गया। सरकार के अंदर अंदरूनी झगड़े शुरू हो गए और बढ़ते गए।

सच तो यह है कि अंतरिम सरकार कांग्रेस और लीग के बीच शक और भरोसे के माहौल में बनी थी। लीग के सरकार में शामिल होने से पहले ही, कांग्रेस पर उसके भरोसे के न होने का असर नई एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बनावट पर पड़ा था। जब सितंबर 1946 में काउंसिल बनी, तो यह सवाल उठा कि डिफेंस का इंचार्ज कौन होगा। बलदेव सिंह उस समय पंजाब में मंत्री थे और लॉर्ड वेवेल के सुझाव पर कांग्रेस इस बात पर सहमत हुई कि उन्हें डिफेंस का चार्ज दिया जाना चाहिए।

नवाबज़ादा लियाकत अली खान, जो फाइनेंस मेंबर और सरकार में लीग का सबसे बड़ा स्पोक्सपर्सन था, ने ऐलान किया कि वह और उसके साथी सरकार को कोएलिशन के तौर पर नहीं मानते और नेहरू और दूसरे कांग्रेसी मिनिस्टर्स के साथ कोऑपरेट करने की कोई ज़िम्मेदारी महसूस नहीं करते। सरकार धर्म के आधार पर बंटी हुई थी। लीग के मंत्रियों का रवैया सहयोग का न होकर कांग्रेस की नीतियों और कामों में अड़ंगेबाज़ी का ही रहा। लीग सरकार में केवल उसे अंदर से तोड़ने के लिए ही शामिल हुई थी।

गांधीजी ने कहा था, मेरे जैसे आदमी को प्रसन्न होना चाहिए कि एक और जगह किसी हरिजन को मिल गई। परन्तु यदि मैं ऐसा कहूं, तो अपने आपको धोखा दूंगा। जिन्ना ने कहा है कि मुसलमान और हिन्दू दो राष्ट्र हैं और लीग एक शुद्ध मुस्लिम साम्प्रदायिक संस्था है। तब वह किसी हरिजन को अपना प्रतिनिधि कैसे मनोनीत कर सकती है? मुझे भय है कि मंत्रिमंडल में आने का लीग का सारा तरीक़ा सीधा नहीं रहा। गांधीजी और कांग्रेस का अखंड भारत को आजादी दिलाने का सपना लीग के हर स्तर पर विरोध के चलते लगातार क्षीण होता दिख रहा था। गांधीजी के सचिव प्यारेलाल लिखते हैं, जिस दिन लीग वायसराय की प्रेरणा और आमंत्रण पर अन्तरिम सरकार में प्रविष्ट हुई, उसी दिन अखंड भारत की लड़ाई हमेशा के लिए हाथों से निकल गई। सम्राट की सरकार ने पंडित नेहरू को सरकार बनाने के लिए कहा था। इसलिए मंत्रिमंडल प्रणाली के अनुसार लीग को सरकार में शामिल करने के लिए आगे की कार्रवाई भी नेहरूजी पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए था। लेकिन लीग तो वायसराय के द्वारा अन्तरिम सरकार में लाई गई। यह कैसे हुआ? उस समय कांग्रेस चुपचाप सहमत कैसे हो गई? ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं। लीग जोगेन्द्रनाथ मंडल का कांग्रेस के विरुद्ध और बाद में गांधीजी की नोआखाली की शांति-यात्रा के विरुद्ध उपयोग करती रही। अड़ंगावादी नीति अपना कर लीग ने सरकार चलना मुश्किल कर दिया।

लीग के प्रतिनिधियों ने अपने अधीन विभागों के सभी महत्वपूर्ण पदों पर अपनी पसंद के मुसलमान रखने का काम शुरू कर दिया। मंत्रिमंडल के सचिवालय में भीतर की खबर लाने वाले जासूस बिठा दिए। वे प्रशासन के कार्य में बाधा डालने लगे।

लीग के सदस्यों ने, जिन विषयों में कोई मतभेद नहीं था, उनमें भी कांग्रेसी मंत्रियों के साथ सहयोग करने से इंकार कर दिया। इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वाद विवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा। जिन्ना ने मिशन के साथ सदा के लिए अपना संबंध तोड़ लिया। 21 नवंबर को उसने एक आदेश निकाला कि मुस्लिम लीग का कोई प्रतिनिधि संविधान सभा में भाग नहीं लेगा। 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान सभा की बैठक होने वाली थी। मुस्लिम लीग ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। वैधानिक संकट इतना गहरा हो गया कि नवम्बर, 1946 के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश सरकार ने दोनों दलों में समझौता कराने के लिए वायसराय, नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खां और सरदार बलदेव सिंह को बातचीत के लिए लंदन बुलाया। वहां की बातचीत भी निष्फल रही लेकिन सरकार ने विवादास्पद बातों पर अपने दृष्टिकोण या स्पष्टीकरण करते हुए एक वक्तव्य निकाला। इससे लीग की बहुत सी आपत्तियों का निराकरण हो गया, लेकिन फिर भी वह संविधान सभा में भाग लेने को राजी न हुई। ब्रिटिश सरकार ने फैसला दिया कि प्रान्तों को अपने समूहों में जाना ही होगा और समूह द्वारा बनाए संविधान को मानना होगा। जवाहरलाल नेहरू एकदम टूटा दिल लेकर लन्दन से लौटे। पटेल ने क्रिप्स को लिखा, एक विश्वासघात हुआ है। ब्रिटिश सरकार की व्याख्या का मतलब तो यह होता है कि बंगाल के मुसलमान असम के लिए संविधान बना सकते हैं ... क्या आपको लगता है कि ऐसे राक्षसी प्रावधान को असम के हिन्दू मान लेंगे।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में एकरसता के अभाव के कारण प्रांतों में शांति और व्यवस्था ख़तरे में पड़ गई। ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस के जो नेता सरकार में थे उन्होंने अनुभव किया कि शासन चलाना असंभव है। जगह जगह सुनियोजित ढंग से दंगे आयोजित किये जा रहे थे उससे यह लगने लगा था कि देश की अधिकांश मुस्लिम आबादी का नेतृत्व कांग्रेस के उदारवादी मुस्लिम नेताओं के हाथ से फिसलकर लीग के कट्टरपंथी दल के पास चला गया है। यह भी लगने लगा था कि आजादी के बाद भी हमारी ऊर्जा और संसाधनों का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक दंगों के जख्म भरने में जाया होगा। उन्हें लगा कि ऐसी परिस्थिति में मुस्लिम लीग को पाकिस्तान मिलता हो तो भले मिल जाए, विभाजन के बाद जो प्रदेश भारत में रह जाएंगे, कम से कम उनमें तो वे सक्रिय और सक्षम रूप में शासन चला सकेंगे।

दरारें और चौड़ी होती जा रही थीं। भारत सिविल वॉर की कगार पर लग रहा था। गांधीजी ने इसे आधे-अधूरे मन से स्वीकार किया, क्योंकि यह एक काम करने लायक सरकार बनाने की कभी न खत्म होने वाली परेशानियों का एक विकल्प था। कैबिनेट मिशन स्टाफ के एक युवा सदस्य वुडरो वायट ने उनसे पूछा कि जब अंग्रेज भारत छोड़ देंगे तो क्या होगा। उन्होंने जवाब दिया, "खून-खराबा हो सकता है।" उन्हें लगता था कि ब्रिटिश राज से बेहतर कुछ भी होगा, यहां तक ​​कि खून-खराबा भी। जिन्ना की तरह, वह चाहते थे कि भारतीय बिना किसी बाहरी दखल के अपनी समस्याएं खुद सुलझाएं।

उन दिनों ‘भारत की स्वाधीनता’ एक ऐसा शब्द-प्रयोग था जिसका तीनों पक्षों के लिए अर्थ अलग-अलग था। अंग्रेज़ों के लिए इसका अर्थ था कि क़ानूनी स्वाधीनता उनकी लगाई हुई कुछ शर्तों के पूरा होने के बाद आएगी। तब तक ब्रिटिश सेनाएं भारत पर अधिकार जमाए रहेगी और दोनों दलों पर अंग्रेज़ों की इच्छा लादी जाती रहेंगी। मुस्लिम लीग के लिए इसका अर्थ था कि देश का विभाजन पहले हो और दोनों भागों की स्वाधीनता बाद में। कांग्रेस के लिए स्वाधीनता का मतलब यह था कि पूरे भारत के लिए बिना किसी शर्त के स्वाधीनता हो।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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