454. अलगाववाद की राजनीति-2
प्रवेश
अलगाववादी राजनीति का विस्तार
1907 में मॉर्ले-मिंटो सुधार आया। इन सुधारों का
मूल मक़सद राष्ट्रवादी खेमे में फूट डालना और मुसलिम सांप्रदायिकता को भड़काकर
भारतीयों के बीच बढती एकता को रोकना था। इस घृणित चाल
के द्वारा अंग्रेजों ने सांप्रदायिक आधार पर मतदाता मंडल बनाने की सिफ़ारिश की थी। इससे सांप्रदायिक राजनीति को विस्तार मिला। इसके तहत मुसलमान (बाद में सिख और अन्य) मतदाताओं के लिए अलग मतदान क्षेत्र बना दिए। वहां सिर्फ़ मुसलमान उम्मीदवार खड़े हो सकते थे। मतदान का अधिकार भी सिर्फ़ मुसलमानों को ही था। चूंकि वोटर सिर्फ़ एक ही धर्म को मानने वाले थे, इसलिए उम्मीदवारों को दूसरे धर्मों के वोटरों
से अपील करने की ज़रूरत नहीं थी। इसलिए, वे खुलेआम कम्यूनल अपील कर सकते थे और वोटरों
को धीरे-धीरे कम्यूनल तरीके से सोचने और वोट देने और अपनी सामाजिक-आर्थिक शिकायतों
को कम्यूनल तरीके से बताने की ट्रेनिंग दी गई। बिपन चन्द्र
कहते हैं, “इस कुटिल नीति
के चलते यह जताने की कोशिश की गई कि हिन्दुओं और मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक और
सांस्कृतिक हित परस्पर मेल नहीं खाते। इस तरह
अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनाना एक ऐसा विषवृक्ष
साबित हुआ जिसके चलते बाद में हिन्दुस्तान में सांप्रदायिकता की फसल उग आई।” 1912 में कांग्रेस के नेता मुहम्मद अली जिन्ना को मुसलिम लीग में शामिल होने का निमंत्रण मिला। उसी वर्ष आग़ा ख़ान ने लीग से इस्तीफ़ा दे दिया था। जिन्ना जैसे कुछ लोगों को छोड़कर लीग का राष्ट्रवाद धर्मनिरपेक्ष नहीं था। इसका झुकाव इस्लामी एकतावादी सिद्धांत की तरफ़ था। आगे चलकर यह हानिकारक साबित हुआ क्योंकि लोग राजनीतिक सवालों को धार्मिक सवालों के रूप में देखने लगे।
सांप्रदायिक राजनीति की स्वीकृति
1916 के अंत में लीग और कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। इसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग का समझौता हुआ था। इसे कांग्रेस-लीग योजना या लखनऊ समझौता कहा जाता है। कई दृष्टि से यह समझौता प्रगतिशील था, लेकिन इसके द्वारा कांग्रेस ने सांप्रदायिक राजनीति को स्वीकार कर लिया था। इसमें यह तय हुआ कि हिंदुओं और मुसलमानों को भारत की आज़ादी के लिए साथ-साथ लड़ना चाहिए। इसमें अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मतदाता-मंडलों और सीटों के आरक्षण को मान्यता दी गई थी। दोनों पार्टियां मुस्लिमों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने को तैयार हो गईं। अल्पसंख्यक होने के बावजूद इंपीरियल और प्रांतीय विधानमंडलों में आबादी के अनुपात से मुस्लिमों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने पर सहमति बनी। इस
प्रकार लखनऊ में जो समझौता कर हिंदू-मुसलमानों के राजनीतिक मतभेदों का समाधान करने का प्रयास किया गया था उसके तहत कांग्रेस ने हिंदू-मुसलमानों के लिए अलग-अलग निर्वाचक मंडल की बात स्वीकार कर ली। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यह सबसे बड़ी त्रासदी रही कि आगे आने वाले घटनाक्रमों के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता और कांग्रेस-मुस्लिम सहयोग अपनी कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।
धर्मनिरपेक्ष चेतना के विकास में नाकामयाबी
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान और रॉलट क़ानून के विरोध में राष्ट्रवादी धारा को बल मिला। ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन के दौरान यह प्रक्रिया और मज़बूत होती दिखी। हिन्दू-मुसलिम एकता के नारे लगाए जाते थे। ‘हिंदू-मुसलिम की जय’ के नारे चारों तरफ़ गूंज रहे थे। ख़िलाफ़त समिति के कारण लीग का महत्त्व कम होता जा रहा था। धार्मिक आंदोलन होते हुए भी ख़िलाफ़त आंदोलन ने मुसलिम मध्य वर्ग में साम्राज्यवाद विरोधी भावना जगाया। लेकिन चूक यह हुई कि राष्ट्रवादी नेतृत्व मुसलमानों की इस धार्मिक-राजनीतिक चेतना को धर्मनिरपेक्ष चेतना में बदलने में नाकामयाब रहा। ख़िलाफ़त आंदोलन के नेता धर्म के नाम पर अपील करते थे। फ़तवा का इस्तेमाल करते थे। फलस्वरूप पुराने पंथ की पकड़ मज़बूत हुई। राजनीतिक सवालों को धार्मिक सवालों के रूप में देखने की आदत पड़ गई। सांप्रदायिक विचारधारा और राजनीति के दरवाज़े खुल गए।
निराशा के माहौल में सांप्रदायिकता का विस्तार
1922 में जब असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया, तो चारों ओर निराशा फैल गई। अवसाद के इस माहौल में सांप्रदायिकता ने अपना सिर उठाया। सांप्रदायिक दंगे होने लगे। मुसलिम लीग सक्रिय हो गई। 1923 में हिन्दू महासभा का पुनर्जन्म हुआ। उसने हिन्दू जाति की रक्षा और हिन्दू राष्ट्र की उन्नति के नाम पर मुसलिम विरोधी भावनाएं उभारने का काम किया। हिन्दू और मुसलमान दोनों के संप्रदायी डर का मनोविज्ञान फैलाने लगे। इसी दरमियान हिन्दुओं में ‘संगठन और शुद्धि’ और मुसलमानों में ‘तंजीम और तबलीग’ आंदोलन चले। इन आंदोलनों का उद्देश्य सांप्रदायिक था। राष्ट्रवादियों को अपने-अपने समुदाय का दुश्मन बताया जाने लगा। इस तरह के माहौल का असर राष्ट्रवादियों पर भी पड़ा और उनका स्वर सांप्रदायिक नहीं तो कम से कम अर्द्ध सांप्रदायिक तो ज़रूर हुआ। लाजपत राय, मदनमोहन मालवीय और एन.सी. केलकर हिन्दू महासभा में शामिल हो गए और हिन्दू एकता की वकालत करने लगे। इस ग्रुप ने धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसियों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया। मोतीलाल नेहरू को हिन्दू-विरोधी और इसलाम-प्रेमी कहा गया। ख़िलाफ़त आंदोलन के बहुत से नेता सांप्रदायिक हो गए। मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली ने कांग्रेस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया कि वह हिन्दू सरकार स्थापित करना चाहती है। अनेक शहरों में 1922 से 1927 के दौरान 112 दंगे हुए।
अनियंत्रित साम्प्रदायिक फूट
1924 में देश में अनियंत्रित साम्प्रदायिक फूट से हिंदू और मुस्लिम,
दोनों प्रकार के संप्रदायवाद में जैसी वृद्धि हुई वैसी कभी नहीं हुई। राजनीतिक
गठजोड़ों का आधार अधिकाधिक सांप्रदायिक होने लगा। पारस्परिक विश्वास का स्थान
अविश्वास ने ले लिया था। कांग्रेस वाले मानते थे कि ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलनों के
जुड़ जाने से मुसलमानों में राजनैतिक जागृति के नाम पर हानिप्रद सांप्रदायिकता पनपी
है। इस सांप्रदायिकता की आग में ब्रिटिश सरकार घी का काम कर रही थी। उधर मुस्लिम
नेता यह सोच रहे थे कि कांग्रेस से हाथ मिलाने की जल्दबाज़ी से मुसलमान असुरक्षित
ही हुए हैं। पारस्परिक संदेह और भय काफी गहरा गए थे। एक-दूसरे को दोनों कौमें फ़रेब
और बेईमान ही नज़र आती थीं। इस बीच कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में तुर्कों ने ख़ुद ही
ख़िलाफ़त को ख़त्म कर दिया था। मुसलमानों को अब हिंदुओं के समर्थन की ज़रूरत नहीं थी।
साथ ही अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उनकी चिढ़ की धार कुंद हो गई थी। अंग्रेज़ शासक वर्ग
दोनों समूहों को उकसाया करता था, जिससे दोनों समुदायों ने एक दूसरे पर अविश्वास
करना सीख लिया था। साम्प्रदायिक दंगे आम बात हो गई थी।
साम्प्रदायिक पुरस्कार (Communal Award)
अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो नीति के तहत 16 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री
रेम्जे मेकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पंचाट या ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ की घोषणा की थी।
यह अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई ‘फूट डालो और राज
करो’ की नीति का ही एक दूसरा उदाहरण था। इस
निर्णय में मुस्लिम, सिख आदि की तरह ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित
अछूत वर्ग को भी हिंदुओं से अलग समुदाय की मान्यता दी। दलित जातियों को पृथक
निर्वाचन की घोषणा की गई जिसे साम्प्रदायिक पुरस्कार (Communal Award) भी कहा गया।
दलित जातियों को आम (हिन्दू) निर्वाचन क्षेत्र में मतदान देने के साथ ही साथ अपने
पृथक निर्वाचन क्षेत्र में भी मत देने का अधिकार दिया गया। यह साफ था कि अंग्रेज़
सरकार चाहती थी कि देशवासी आपस में लड़ें और दुराव रखें। इस नीति के विरोध में गांधी जी आमरण अनशन पर बैठ गए। उनके अनशन से
देश का सोया विवेक जाग गया। दलित जातियों के प्रति स्नेह और सहानुभूति का जैसे देश
में ज्वार ही आ गया। आखिरकार, पूना समझौते पर 24 सितंबर को शाम 5 बजे 23 लोगों ने
हस्ताक्षर किए। 26, सितम्बर 1932 को सरकार ने
कम्यूनल अवार्ड रद्द कर दिया। इस तरह दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का
अधिकार खत्म हो गया।
मुहम्मद अली जिन्ना
साम्प्रदायिक समस्या ने भारतीय राजनीति को जो ग़लत मोड़ दिया
उसका मुख्य कारक मुहम्मद अली जिन्ना था। जिन्ना पूरे
हिन्दुस्तान की ज़मीन पर अपने पाँव जमाए रखना चाहता था। हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात
वह ज़रूर करता था, लेकिन सरकार हो या कांग्रेस, जो भी उससे सहयोग मांगता, वह इसकी ज़बरदस्त
क़ीमत वसूलता। वह किसी के साथ मिलकर काम करने को राज़ी नहीं होता था। गोलमेज परिषद
के बाद जिन्ना ने भारतीय राजनीति को नमस्कार किया और इंग्लैण्ड में ही बस गया।
1931 में जब इक़बाल लन्दन गए तो उन्होंने जिन्ना से भेंट की। अलग मुसलमान देश बनाने
पर दोनों में चर्चा हुई। जुलाई 1933 में जिन्ना की लियाक़त अली खां से मुलाक़ात हुई, जो बाद में पाकिस्तान का
पहला प्रधानमंत्री बना। लियाक़त अली खां ने जिन्ना को भारत वापस आने के लिए दवाब
डाला। 1934 में जैसे ही चुनावों का समय आया, जिन्ना भारत
लौट आया। अप्रैल 1934 में लीग ने सर्वसम्मति से जिन्ना को अपना आजीवन अध्यक्ष चुना।
जिन्ना ने बड़ी चालाकी से सरकार और कांग्रेस के बीच अपने पत्ते चलने शुरू किए। जो
पक्ष जीत रहा होता, वह उसके विपरीत वोट करता। कांग्रेसी प्रस्ताव
के समय वह सरकारी पक्ष को वोट देकर कांग्रेस को हरा देता। इसी तरह सरकारी प्रस्ताव
को वह कांग्रेस के साथ वोट देकर सरकार को हरा देता। मुसलमानों का मनोबल बढाने के
लिए उसके इस क़दम की काफी उपयोगिता थी।
राष्ट्रवादी नेताओं का समझौतावादी रुख़
साम्प्रदायिक समस्या ने भारतीय राजनीति को जो ग़लत मोड़ दिया उसका मुख्य कारक मुहम्मद अली जिन्ना था। लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रवक्ता मान लिया गया। वह किसी भी राजनीतिक समझौते के ख़िलाफ़ अपना ‘वीटो’ लगा सकती थी। उसे ऐसा लगने लगा कि अगर वह उग्रवादी राजनीति का सहारा नहीं लेगा, तो धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। ‘हिंदू मुसलिम एकता के राजदूत’ के रूप में जिस आदमी ने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी, उसने अब पाकिस्तान की मांग शुरू कर दी। उसने घृणा और भय पर आधारित राजनीति को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। मुसलमानों के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर वह उन्हें समझाने लगा कि कांग्रेसी अंग्रेज़ों से मिलकर हिंदू राज क़ायम करना चाहते हैं। वे भारत से इसलाम का नामोनिशान मिटा देना चाहते हैं। जब जिन्ना जैसे नेता ने ऐसी भाषा अपना ली, तो उसके समर्थकों
ने तो सारी हदें पार कर दीं। ऐसे समय
में औपनिवेशिक ताक़तों ने सांप्रदायिकता का भरपूर
इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और जिन्ना की मुसलिम सांप्रदायिकता का साथ देना आरंभ
कर दिया।
गठबंधन बनाम विलय
1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग की स्थिति
अच्छी नहीं रही। लीग को उस चुनाव में मुसलमानों के पांच प्रतिशत से ज़्यादा मत नहीं
मिले। जिस पृथक निर्वाचन पर जिन्ना ने इतनी आशाएं लगा रखी थीं, वह एक तरह से बेकार
ही साबित हुआ। न तो मुसलमान कांग्रेस में शरीक हो सके, और न उन्हें शासन में
मनचाहा हिस्सा मिला। जिन्ना की झुंझलाहट का कोई पार न रहा। मुंबई और संयुक्त
प्रान्त में साझीदारी (गठबंधन) के सवाल पर उसने कांग्रेस से बात-चीत भी की।
कांग्रेस की तरफ से यह प्रस्ताव आया कि लीग के विधायक मंत्री बनने से पहले
कांग्रेस में आ जाएँ (विलय)। जिन्ना सिर्फ साझेदारी के लिए दो पार्टियों के बीच
गठबंधन चाहता था। ‘गठबंधन बनाम विलय’ के मामले में बात नहीं बनी
और लीग की मदद के बिना सरकारों का गठन हो गया। जिन्ना ने परिस्थितियों
का फायदा उठाया और अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए सक्रिय हो गया। कांग्रेस को उसने
हिन्दुओं की संस्था कहना शुरू कर दिया। उसने कांग्रेस सरकारों के अत्याचारों के
मनगढ़न्त किस्से लोगों के बीच फैलाना शुरू कर दिया। उसके इस तरह के व्यवहार से
हिन्दू-मुस्लिम संकट अपने चरम बिन्दु पर पहुंच गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता की वकालत
करने वाला जिन्ना अब मुसलिम अलगाववाद की वकालत कर रहा था। जिन्ना ने निश्चय कर
लिया था कि अब वह शर्त मानेगा नहीं, शर्तें थोपेगा। कौम को उसके तरीक़े पसंद आ रहे
थे। साल भर के अन्दर ही लीग की सदस्य संख्या हज़ारों से बढाकर लाखों में पहुँच गई
थी।
कांग्रेस
और लीग अलग-अलग
1938 आते-आते
कांग्रेस ने जिन्ना से समझौता करने का
प्रयास किया। लेकिन
कांग्रेस को इसमें सफलता नहीं मिली। जिन्ना चाहता था कि कांग्रेस यह स्वीकार करे
कि मुस्लिम-लीग भारत के समस्त मुसलमानों की प्रामाणिक तथा प्रतिनिधि संस्था है और
कांग्रेस केवल हिन्दुओं के प्रतिनिधि हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस और लीग के रास्ते
अलग-अलग हो चुके थे। लीग अधिक से अधिक ब्रिटिशपरस्त, पृथकतावादी और कांग्रेस
विरोधी नीति अपनाने लगी।
मुस्लिम लीग द्वारा `मुक्ति दिवस’ मनाया जाना
अंग्रेजी सरकार ने विश्व
युद्ध में शामिल होने के मामले में कांग्रेस का मंतव्य जाने बिना इस ग़रीब देश को युद्ध
में झोंक दिया। इसके विरोध में 28 महीने पुरानी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने 8 नवम्बर, 1939 को इस्तीफ़ा दे दिया। जिन्ना ने ब्रिटिश शासकों को संकेत दिया कि लीग और हिन्दुस्तानी मुसलमान सिर्फ आगे बनने वाले संविधान में अपने हितों की हिफाज़त की शर्त पर जंग की कोशिशों में मदद को तैयार हैं। 22
दिसम्बर, 1939 को मुस्लिम लीग ने कांग्रेसी शासन के
अत्याचारों से मुक्ति पाने के उपलक्ष्य में `मुक्ति दिवस’ मनाया। जिन्ना ने कहा, “कांग्रेस शासन की
समाप्ति पर लीग की सभा चैन की सांस लेती है और आज के दिन को अधिनायकवाद, दमन और
अन्याय से मुक्ति का दिवस मानती है।”
पृथक
राष्ट्र की स्थापना का प्रस्ताव
जिन्ना ने कहा था, “मुझे इस मसले में कोई गलतफहमी नहीं है कि हिंदुस्तान न तो एक राष्ट्र है, न एक देश, यह अनेक राष्ट्रीयताओं वाला एक उपमहाद्वीप है।” मार्च, 1940 में लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने एक पृथक राष्ट्र की स्थापना का
प्रस्ताव पारित किया और उसे अपना
लक्ष्य घोषित कर दिया। अब राजनीतिक भू-दृश्य काफ़ी जटिल हो गया था। अब यह संघर्ष भारतीय बनाम
ब्रिटिश नहीं रह गया था। अब यह कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश शासन, तीन धूरियों के बीच का संघर्ष था। जिन्ना मुस्लिम कौम में बढ़ते अलगाववाद की प्रवृत्ति के कारण मुस्लिम राष्ट्र की वक़ालत कर रहा था।
अगस्त-प्रस्ताव
वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त, 1940 को औपनिवेशिक
स्वराज की स्थापना के लिए जो प्रस्ताव दिया था, उसमें नया विधान बनाने के भारतीय
अधिकारों को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन यह भी जोड़ दिया गया था कि अल्पसंख्यकों
की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी। लीग ने
प्रस्ताव का स्वागत किया लेकिन कांग्रेस ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। सरकार का
उद्देश्य मुस्लिम लीग को रिझाना, कांग्रेस-लीग समझौते को मुश्किल कर देना और ऐसा
वातावरण तैयार कर देना था, जिससे सत्ता के हस्तांतरण की आवश्यक शर्त, भारत के सब
दलों और जातियों का सर्वसम्मत समझौता, पूरी न हो सके।
जिन्ना, मुस्लिम
लीग और पाकिस्तान की मांग
जिन्ना और मुस्लिम लीग मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन से ही
पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ी रही। पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों की मनोवैज्ञानिक
आवश्यकता की पूर्ति का साधन था। मुस्लिम लीग एक उभरते हुए राष्ट्रवाद की संस्था का
रूप ले चुकी थी। इसकी केन्द्रीय शक्ति सत्ता-लोलुप थी और उसके व्यावसायिक हित
स्पष्ट थे। कांग्रेसी मंत्रिमंडल के इस्तीफ़े ने मुस्लिम लीग को राजनैतिक मंच
हथियाने का अवसर दे दिया। ब्रिटिश सरकार का प्रोत्साहन जिन्ना और उसके पाकिस्तान
की मांग को मिलता रहा। अगस्त प्रस्ताव ने तो स्पष्ट कर ही दिया था कि अंग्रेज़ किसी
भी ऐसी सरकार को दायित्व नहीं सौंपेंगे जिस पर अल्पसंख्यकों की स्वीकृति की मुहर न
लगी हो।
उपसंहार
इसमें कोई शक
नहीं कि राष्ट्रीय आन्दोलन की विचारधारा बुनियादी रूप से धर्मनिरपेक्ष थी। गांधीजी ने
राष्ट्रीय आन्दोलन के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को और सुदृढ़ किया। लेकिन राष्ट्रीय
आन्दोलन के नेता सांप्रदायिकता के विकास को रोकने में असफल रहे। इसके कारण
मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन में लाना कठिन हो गया। मुस्लिम
सांप्रदायिकतावादियों और ब्रिटिश सरकार ने हिंदुत्व का उपयोग मुसलमानों की एक बड़ी
संख्या को राष्ट्रीय आन्दोलन से अलग रखने और उनमें यह भावना जगाने के लिए किया कि
अगर राष्ट्रवादी आन्दोलन सफल हो गया, तो देश में हिन्दू राज कायम हो
जाएगा।
वास्तविकता से
परे कुछ लोग यह मानते हैं कि भारत में सांप्रदायिकता के विकास का मुख्य कारण
धर्मों का अस्तित्व था। सच तो यह है कि धर्म तो जीवन जीने की पद्धति है। धर्म
सांप्रदायिकता का कारण नहीं बनता। हाँ, सांप्रदायिकतावादी धार्मिक मतभेदों का इस्तेमाल ज़रूर करते थे। के.एम.
अशरफ सांप्रदायिकता को ‘मज़हब की सियासी दुकानदारी’ बतलाते हैं।
सांप्रदायिकता की प्रेरणा धर्म ने कभी नहीं दी। जो सांप्रदायिक राजनीति करते रहे
वे भी कभी भी धार्मिक उत्थान नहीं चाहते थे। उनके लिए धर्म एक औज़ार मात्र था। अपने
अनुयायियों को गोलबंद करने के लिए वे धर्म का प्रयोग करते थे। 1940 के दशक में ‘धर्म
खतरे में है’ का उत्तेजक नारा लगाया जाने लगा। धर्म के कारण
सांप्रदायिकता नहीं फैली, बल्कि धार्मिकता ने इसे बढाने में मदद की।
धार्मिकता ने वह ज़मीन ज़रूर तैयार की जिसमें सांप्रदायिकता का बीजारोपण किया गया और
उसका पौधा फूला-फला। जो अपने को धर्मनिरपेक्षता का पुरोधा मानते थे, उनसे अपेक्षा थी कि वे धार्मिकता के आवेग को कम करते, लेकिन वे असफल रहे।
बारह-तेरह सौ वर्षों से इस देश में हिन्दू-मुसलमान
साथ रहते आए थे। चाहे राजा हिन्दू हो या मुसलमान या सिख, ये सभी आपस में मिलजुल कर
रह रहे थे। सूफ़ी और हिन्दू संतों ने एक बेहतर सामाजिक सौहार्द्र की दिशा में
महत्त्वपूर्ण काम किया था। इनके बीच के आपसी भाई-चारे के बीच कटुता और वैमनस्यता
का बीज तो अंग्रेज़ों ने बोया था। उनकी कूटनीति का मूल सिद्धांत ही था, ‘फूट डालो और राज करो’। बंबई के
गवर्नर लॉर्ड एल्फिंस्टन ने 14 मई, 1859 को अपनी डायरी
में लिखा था, “फूट फैलाकर
राज्य करो, हमारा सूत्र होना चाहिए।” ब्रिटिश सेनाधिकारी
जॉन कोक ने कहा था, “विभिन्न धर्मों
के बीच जो अलगाव मौज़ूद है, उसे पूरी तरह से प्रोत्साहन देने का प्रयत्न हमें करना
चाहिए।”
बेशक, कुल मिलाकर, राष्ट्रीय आन्दोलन अपने नज़रिए और विचारधारा
में मूलभूत रूप से धर्मनिरपेक्ष रहा। इस वजह से एम.ए. जिन्ना और मौलाना अबुल कलाम
आज़ाद जैसे युवा राष्ट्रवादी मुसलमानों को इसे वैसे ही मानने और इसमें शामिल होने
में ज़्यादा मुश्किल नहीं हुई। यह धर्मनिरपेक्षता तब और मज़बूत हुआ जब गांधी, सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, डॉ. एम.ए. अंसारी, सुभाष बोस, सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता कमान
में आए। बिपन चन्द्र कहते हैं, “जब तक औपनिवेशिक सरकार साम्प्रदायिकता का
भरण-पोषण करती रही, तब तक साम्प्रदायिक समस्या का हल आसानी से
मुमकिन नहीं था; हालांकि, औपनिवेशिक सरकार को हटाना साम्प्रदायिकता के
खिलाफ़ सफल लड़ाई के लिए सिर्फ़ ज़रूरी शर्त थी, लेकिन काफ़ी नहीं थी।”
यह
भी सच नहीं है कि साम्प्रदायिकता को लेकर कांग्रेस की नाकामी 1947 में हुई जब उसने
देश का बंटवारा मान लिया। शायद, उस समय कोई और रास्ता नहीं था। साम्प्रदायिकता पहले ही बहुत
आगे बढ़ चुका था। यह कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिक समस्या का कोई और हल नहीं बचा
था,
जब तक कि नेशनल लीडरशिप देश को सिविल वॉर में डूबा हुआ
देखने को तैयार न हो,
जब सेना और पुलिस विदेशी शासकों के कंट्रोल में हों और वे
खुद सिविल वॉर में शामिल होने के लिए तैयार हों।
सच
तो यह है कि सभी ऐतिहासिक हालात का तुरंत हल नहीं होता। पक्का, 1947 में ऐसा कोई हल नहीं था। साम्प्रदायिकता
जैसी सामाजिक-राजनीतिक समस्या का कभी भी तुरंत हल नहीं होता। हल के लिए हालात और
ताकतें कई सालों और दशकों में तैयार करनी पड़ती हैं। कांग्रेस और राष्ट्रीय
आन्दोलन ऐसा करने में फेल रहे। धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के
बावजूद,
गांधीजी के हिंदू-मुस्लिम एकता पर लगातार ज़ोर देने और इसे
बढ़ावा देने के लिए अपनी जान देने को तैयार रहने के बावजूद, और नेहरू के साम्प्रदायिकता की सामाजिक-आर्थिक
जड़ों के शानदार विश्लेषण के बावजूद, भारतीय राष्ट्रवादी साम्प्रदायिकता के सभी रूपों के खिलाफ़
उसके वैचारिक सामग्री,
सामाजिक-आर्थिक जड़ों और राजनीतिक नतीजों को सब्र और वैज्ञानिक
तरीके से सामने लाने के आधार पर एक बड़ा वैचारिक-राजनीतिक संघर्ष करने में फेल
रहे। असल में,
कांग्रेस साम्प्रदायिक नेताओं के साथ बातचीत पर बहुत
ज़्यादा निर्भर रही और राजनीतिक, वैचारिक और सांस्कृतिक स्तर पर साम्प्रदायिकता से लड़ने के
लिए एक काम की और असरदार लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी बनाने में असफल रही।
सांप्रदायिकता एक विचारधारा थी, इससे लड़ा जाना
चाहिए था, समझौता नहीं किया जाना चाहिए था। सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरुद्ध और
उसके वैचारिक आधार पर विचारधारात्मक-राजनीतिक संघर्ष चलाना चाहिए था। लेकिन उसके
साथ समझौता करके उसे फलने-फूलने का अवसर प्रदान किया गया। कांग्रेस ने सांप्रदायिक
नेताओं से बातचीत पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा किया। नरमपंथी सांप्रदायिकता के साथ
राष्ट्रवादी नेताओं ने समझौतावादी रुख़ अपनाया, जिसका नतीज़ा यह हुआ कि मौक़ा मिलते
ही सांप्रदायिकता उग्र हो गई। सांप्रदायिकता को तो एक ऐसे ज़िद्दी नेता ने हवा दी थी,
जो किसी भी क़ीमत पर अपना अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध था। जिन्ना
की राजनीतिक शुरुआत एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में हुई थी, लेकिन एक बार जब उसने सांप्रदायिकतावादी रास्ता पकड़ा, तो वह अलगाववाद का प्रमुख वक्ता बन गया और देश के
दो टुकड़े करके ही माना।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर