महात्मा
गांधी हत्या केस-37
26 जनवरी,
1948
सोमवार, 26 जनवरी, 1948
को गांधीजी के मौन व्रत का दिन था। शाम की प्रार्थना सभा में
प्यारेलाल ने उनका लिखा हुआ भाषण पढ़ा, "आज, 26 जनवरी, स्वतंत्रता दिवस
है। जब हम उस आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जिसे हमने न तो देखा था और न ही जिसका
अनुभव किया था, तब
इसे मनाना बिल्कुल उचित था। लेकिन अब! हमने इसे पा लिया है, और ऐसा लगता है कि
हमारा मोहभंग हो गया है। कम से कम मेरा तो हो ही गया है, भले ही आपका न हुआ
हो। आइए हम यह उम्मीद
रखें कि भले ही भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भारत दो हिस्सों में बंट गया हो, लेकिन दिल से हम
हमेशा दोस्त और भाई बने रहेंगे;
एक-दूसरे की मदद करेंगे, एक-दूसरे का सम्मान
करेंगे और बाहरी दुनिया के सामने एक होकर रहेंगे।"
गांधीजी
को विश्वास था कि बुरी घड़ी बीत चुकी है। भारत
के लोग अब सभी वर्गों और धर्मों की समानता के लिए काम करेंगे। अल्पसंख्यक समुदाय
पर बहुल समुदाय का वर्चस्व व श्रेष्ठता स्थापित नहीं होगी, भले ही अल्पसंख्यक
समुदाय संख्या या प्रभाव की दृष्टि से कितना भी छोटा क्यों न हो। उन्होंने यह आशा
भी जतायी कि यद्यपि भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भारत दो भागों में बँट चुका है,
लेकिन हृदय में हम सभी सदैव मित्र एवं भाई रहेंगे, एक-दूसरे को मदद व सम्मान देते रहेंगे
और शेष विश्व के लिए हम एक ही होंगे।
हत्या की साज़िश
सोमवार, 26 जनवरी 1948 के
दिन की शुरुआत धुंध और पहाड़ी इलाकों जैसी ठंडी हवा के साथ हुई, ऐसा मौसम मुंबई
में शायद ही कभी देखने को मिलता है। आप्टे और नाथूराम ने एक भरोसेमंद रिवॉल्वर
पाने के लिए अपनी पहचान छिपाने का जोखिम उठाने का फैसला किया। उन्हें पता था कि
भूलेश्वर मंदिर के दोनों भाइयों के पास लाइसेंसी रिवॉल्वर हैं, जिनमें से कोई भी
नाथूराम के काम के लिए एकदम सही रहती। उन दोनों भाइयों के पास कहीं और से भी ऐसा
हथियार जुटाने के साधन थे। दरअसल, बड़े
भाई, दादा महाराज ने एक
बार आप्टे से वादा किया था कि वह उसे एक अच्छी रिवॉल्वर देगा, जिसके बदले में
आप्टे ने उसे पूना में एक पिस्तौल दी थी। उन्होंने जल्दी से नाश्ता किया और टैक्सी
लेकर भूलेश्वर मंदिर पहुँच गए।
वे
दादा महाराज के पास गए। वे एक अच्छी
प्रभावकारी रिवाल्वर की मांग कर रहे थे। दीक्षित ने पूछा, “इसकी क्या ज़रूरत है?” तो उन्होंने जवाब दिया, कश्मीर में क़बायलियों
से लड़ने के जो सामान जा रहा है, उसके साथ हम भी जाएंगे और यह हमारी सुरक्षा के लिए
चाहिए क्योंकि दिल्ली के आगे की यात्रा रिवाल्वर के बिना करना ख़तरनाक है।”
दीक्षित को इन दोनों के इरादे कुछ ठीक नहीं लगे। उसने पूछा, “पिछली बार तुमने तीस हज़ार रुपयों के
शस्त्रास्त्र जमा किए थे और बोले कि तुम कश्मीर जा रहे हो। वहां के क़बायली
आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ तुम उसका इस्तेमाल करने वाले थे। कश्मीर से तुम इतनी जल्दी
कैसे लौट गए।”
उन्होंने उत्तर दिया, “आधी
सामग्री हमने दिल्ली से आगे भेज दिया और आधी भेजने का प्रबंध करके लौट आए हैं।” दादा महाराज ने कहा, “रिवाल्वर के मामले में मैं तुम्हारी
मदद नहीं कर सकता।”
उन्होंने फिर आग्रह किया, “आप
शाम तक हमें एक रिवाल्वर जुटा दीजिए। देखिए हमारे पास एक है, हमें एक और रिवाल्वर
की ज़रूरत है।”
उन्होंने अपना रिवाल्वर दादा महाराज को दिखाया। परन्तु दादा महाराज ने उन्हें मना
कर दिया। बाद में कमीशन को उसने बताया, “26
जनवरी 1948 को आप्टे और गोडसे मेरे पास आए और मुझसे वह रिवॉल्वर मांगी जिसका मैंने
उनसे वादा किया था, या फिर
उसके बदले में उतनी ही रकम मांगी। मैंने खुद को नैतिक रूप से बाध्य माना कि या तो
मैं आप्टे की पिस्तौल वापस कर दूं, या उसके
बदले में कोई दूसरी रिवॉल्वर दे दूं,
या
फिर पिस्तौल की कीमत चुका दूं... ऐसा लगा कि उन्हें पिस्तौल की कीमत से कहीं
ज़्यादा उस रिवॉल्वर को पाने की जल्दी थी।”
उस
समय उनके लिए पैसों का कोई खास महत्व नहीं था, उनके लिए तो बस वह रिवॉल्वर मायने रखती
थी जिसका वादा किया गया था; असल
में, दादा महाराज ने
उन्हें न तो कोई काम की रिवॉल्वर दी और न ही आप्टे की पिस्तौल के बदले कोई रकम। वे
उन्हें छोड़कर मंदिर के आंगन के ठंडे संगमरमरी फर्श से होते हुए उस जगह गए, जहाँ दीक्षितजी
महाराज रहते थे। लेकिन छोटा भाई भी बिल्कुल असहयोगी निकला। सुबह का पूरा समय बेकार
चला गया। वे बस इतना ही कर पाए कि दो ऐसे गवाह जुटा लिए, जो इस बात की गवाही देने को तैयार थे
कि 26 जनवरी को वे बॉम्बे में थे और किसी भी तरह एक रिवॉल्वर हासिल करने के लिए
बेताब थे।
***
आप्टे और गोडसे के लिए दोपहर का समय कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद रहा। वे परांजपे के दफ़्तर गए, जहाँ अपने वादे के मुताबिक, उसने उनके लिए 10,000 रुपये तैयार रखे थे। अचानक उन्हें लगने लगा कि अब वे आसानी से एक रिवॉल्वर हासिल
कर सकते हैं। इतनी रकम हाथ में होने से,
यह काम काफ़ी आसान हो गया था।
शाम में नौ बजे करकरे से मिलने का समय तय था। अभी उनके पास
काफी वक़्त था और जेब में नोट भरे हुए थे। उन्होंने कुछ आनन्द उठाने की ठानी। आप्टे
ने मनोरमा को बुला लिया। मनोरमा
साल्वी उसके साथ गई। वह दो दिनों में ज़्यादातर समय उनके साथ रही, जबकि नाथूराम फ़िल्में देखता रहा
और उसने कोशिश की कि उन दोनों को जितना हो सके, एक-दूसरे के साथ अकेले रहने का
मौका मिले। शायद ये आप्टे और मनोरमा के साथ बिताए गए आख़िरी कुछ घंटे थे। बाद में
मनोरमा ने कहा कि आप्टे ने उसे यह नहीं बताया था कि वह और नाथूराम क्या करने की
योजना बना रहे हैं। लेकिन इस बात पर यकीन करना मुश्किल है, खासकर इसलिए क्योंकि
उसे पता था कि वे दिल्ली जा रहे हैं, और आप्टे ने खुद को बचाने के लिए
(एक झूठा सबूत तैयार करने के मकसद से) उससे कहा था कि वह दिल्ली एक टेलीग्राम भेज
दे। दरअसल आप्टे को चाल सूझी। वह मनोरमा का
इस्तेमाल ऐलिबी के रूप में करना चाहता था। उसने मनोरमा से कहा, जैसे ही तुम्हें
दिल्ली में नाथूराम के द्वारा किए गए काम का अंजाम मालूम हो, तुम दिल्ली के हिन्दू
महासभा के दफ़्तर में एक टेलीग्राम कर देना – “Arriving in Delhi to
arrange Godse’s defence. Narayan D. Apte’’ मनोरमा के अनुसार, नाथूराम ने उसे यह नहीं बताया कि
वह ऐसा क्या करने वाला था जिसके लिए उसे अपने बचाव की व्यवस्था करने के लिए किसी
और की ज़रूरत पड़ सकती थी, या आप्टे के लिए यह साबित करना
क्यों इतना ज़रूरी था कि जब नाथूराम वह काम कर रहा था, तब आप्टे बंबई में मौजूद था।
***
पाहवा की गिरफ्तारी और उनकी योजना की विफलता ने साज़िशकर्ताओं
को निराश तो किया लेकिन उन्हें अपने उद्देश्य से विचलित नहीं किया। उन्हें लग रहा
था कि जल्द ही उन्हें अपनी योजना को अंजाम दे देना चाहिए, क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस पूछताछ के दौरान पाहवा अपनी चुप्पी बनाए
रखने में सक्षम नहीं होगा, और उन्हें पता लगाने और हिरासत में लेने में ज्यादा समय
नहीं लगेगा। शाम में जल्दी खाना खा लेने के बाद नाथूराम और आप्टे ने ठाणे के लिए
ट्रेन पकड़ी। करकरे प्लेटफॉर्म पर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। वे तीनों रेल की
पटरियों को पार करके गुड्स यार्ड (माल गोदाम) के एक सुनसान हिस्से में, एक लैंप के नीचे बैठ गए। यह पूरी तरह से सुनसान जगह थी। रात के करीब 9.45
बजे थे। और वह एक चांदनी रात थी। करकरे ने आप्टे और गोडसे से पूछा कि वे 20 जनवरी
के विस्फोट के बाद दिल्ली से कैसे वापस आए थे। गोडसे शांत मूड में था और उसने करकरे
से इस मामले के बारे में कुछ भी चर्चा नहीं करने के लिए कहा। उसने कहा कि बात वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की योजनाओं के बारे में की
जाए। यह बहुत ज़रूरी है, क्योंकि मदन लाल को गिरफ्तार कर लिया गया है और वह
हमारे नामों का खुलासा करेगा। गोडसे ने यह भी कहा कि हमें पुलिस द्वारा गिरफ्तार
कर लिया जाएगा और गांधीजी की हत्या की हमारी योजना विफल हो जाएगी। उसके विचार में
अब 9-10 के ग्रुप में चलने की मूल योजना ग़लत थी। अतः गोडसे अब बार-बार कहने लगा कि
गाँधीजी की हत्या वही करेगा। लेकिन उसे किसी की मदद की भी ज़रूरत है। शायद इतने
बड़े महामानव का सामना करने के लिए, नैतिक बल चाहता हो। नाथूराम असफलता से बहुत ही हताश था। वह गुम-सुम रहने लगा।
लेकिन उसके मन में दृढ़ निश्चय पल रहा था। उसने प्रण लिया वह ख़ुद उस काम को अंजाम देगा
जो उस दिन असफल हो गया था। अब वह ख़ुद गैंग का लीडर था। अब तक तो आप्टे लीडर था और वह
सब कुछ देखता और पालन करता आया था। अब गोडसे निर्णय लेने वाला था और आप्टे उसका सहयोगी।
गोडसे ने करकरे
को अहमदनगर जाने के लिए कहा, और बोला अगर
वह चाहे तो हिंदू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाए। उसने करकरे से हिंदू राष्ट्र
प्रकाशन के शेयरों की बिक्री को आगे बढ़ाने और आप्टे के स्थान पर एक अच्छे लेखक की
तलाश करने का भी अनुरोध किया। करकरे इस सुझाव से दंग रह गया और आप्टे चुप था।
करकरे को लगा कि गोडसे और आप्टे ने इस मामले पर चर्चा की होगी; और आप्टे गोडसे की मंशा से पूरी तरह वाकिफ था। शायद आप्टे ने नाथूराम के
साथ खड़े होने का मन बना लिया है। करकरे ने गोडसे से पूछा कि क्या 20 तारीख की
विफलता से तुम्हें महाराष्ट्र में अपना चेहरा दिखाने में शर्म आती है, और क्या उसके
लिए खुद को मारने के लिए तैयार करने का यही कारण है। यह प्रश्न सुन गोडसे स्तब्ध हो
गया और बोला, ऐसी बातें मत कहो और तुम्हें जो काम सौंपा गया है उसे पूरा करो।
करकरे ने ज़ोर देकर पूछा कि तुम लोग गांधीजी की हत्या कैसे करने जा रहे हो।
गोडसे ने कहा वह
और आप्टे अगली सुबह दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाले थे, जहाँ से वे सीधे ग्वालियर जाने वाले थे। ग्वालियर में नाथूराम एक ऐसे
व्यक्ति को जानता था, जिसके बारे में उसे पूरा यकीन था कि वह उसे एक भरोसेमंद
हथियार दिला सकता है। उसे उम्मीद थी कि वह 29 तारीख की सुबह, जो कि गुरुवार था, दिल्ली वापस आ जाएगा। करकरे को लगा कि उसे भी उनके साथ
रहना चाहिए, उसने गोडसे से कहा कि मैं भी तुम्हारे अभियान में शामिल होना चाहता
हूँ।
गोडसे ने
करकरे को बताया कि बड़गे और शंकर सुरक्षित पूना पहुंच गए हैं और अपना काम कर रहे
हैं। गोडसे ने यह भी बताया कि आप्टे पूना गए था और अपने निजी मामलों को सुलझा लिया
है। यह सुनकर करकरे बहुत उत्साहित हो गया, और उसने अपना इरादा घोषित कहा कि मैं भी तुम लोगों के साथ अपनी जान जोखिम में
डालने को तैयार हूँ।
गोडसे ने
बताया अगर करकरे 27 तारीख को ट्रेन से बंबई से निकलता, तो वह 28 तारीख की रात तक दिल्ली पहुँच जाता। 29 तारीख को उसे पुरानी
दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर, क्वींस गार्डन
के बीचों-बीच बने पत्थर के फव्वारे के पास उनका इंतज़ार करना था।
यहीं पर, नाथूराम गोडसे ने इस योजना से अपने भाई गोपाल गोडसे को भी बाहर रखने का
निर्णय लिया। इस प्रकार अब यही तीनों हत्या की योजना में शामिल थे। नाथूराम ने
करकरे को जो योजना समझाई थी, उस पर करकरे
ने हामी भरी। आप्टे ने उसे तीन सौ रुपए दिए। उसके बाद तीनों ने चाय पी। आप्टे और
नाथूराम लोकल ट्रेन बंबई चले गए। करकरे जोशी के घर के लिए रवाना हुआ। गोडसे और आप्टे
उस समय बंबई के एक होटल में वी. विनायकराव और डी. विनायकराव के नाम से ठहरे थे।
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यू.एच. राणा, जिसके पास संजीवी द्वारा दिया गया मदनलाल
का इकबालिया बयान का अनुवाद था, इलाहाबाद से बंबई के लिए 36 घंटे के सफर में अब भी ट्रेन में ही था।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
