महात्मा
गांधी हत्या केस-14
दिगम्बर रामचन्द्र बडगे
पूर्वी खानदेश के चालीस गाँव का एक मराठा
दिगम्बर रामचन्द्र बडगे बड़ा ही बेढ़ब सा दिखने वाला शख्स था। चालीस गाँव वर्तमान समय में महाराष्ट्र के जलगाँव जिले के अंतर्गत आता है (उस समय यह क्षेत्र
पूर्वी खानदेश कहलाता था)। बडगे का जन्म एक मराठा परिवार में हुआ था। वह लंबी दाढ़ी और कंधे तक झूलता बाल रखता
था। तरह-तरह के परिधान पहन कर कभी वह साधु, तो कभी सिख आदि का वेश धारण कर लेता
था। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी टेढ़े-मेढ़े शीशे में दिख रहा हो; बडगे कद में छोटा, लगभग बौना जैसा था, लेकिन उसका शरीर गठीला और मज़बूत था, जिससे वह किसी कमज़ोर या अविकसित पहलवान जैसा
लगता था। बचपन की किसी चोट के कारण उसकी एक आँख दूसरी आँख से काफ़ी छोटी थी, जिससे ऐसा लगता था जैसे वह तिरछी हो। कम कद
और बेमेल आँखों की वजह से भीड़ में भी उसे आसानी से पहचाना जा सकता था। फिर भी, उसे लगता था कि वह अजीबोगरीब भेष बदलकर
पकड़े जाने से बच सकता है। अपनी इस काबिलियत के सबूत के तौर पर वह अपने उन फ़ोटो
का एक एल्बम रखता था जिनमें उसने नाटकीय अंदाज़ में अलग-अलग भेष धारण किए होते थे,
ऐसे भेष जो उसने कथित तौर पर किसी बेहद खतरनाक मिशन को अंजाम देते समय अपनाया था। उसमें
किसी छाया-नाटक (शैडो-प्ले) के योद्धा जैसा अकड़ भरा अंदाज़ था। वह बड़े-बड़े नाम लेकर अपनी पहुँच दिखाने
और डींगें हाँकने का आदी था। उसे आसानी से टाला नहीं जा सकता था। लोग अक्सर उससे पीछा छुड़ाने के लिए ही उसके
चाकू और खंजर खरीद लेते थे।
उसने बहुत थोड़ी सी स्कूली शिक्षा पाई थी। उसने
अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत भी चालीस गाँव से ही की थी। लेकिन मैट्रिक के स्तर तक पहुँचने से बहुत
पहले उसने पढ़ाई छोड़ दी और अपनी आजीविका कमाने के लिए पूना चला गया।
दिगम्बर रामचंद्र बडगे को अपने शुरुआती जीवन में स्थायी रोजगार
प्राप्त करने के लिए तीव्र आर्थिक तंगी, कम शैक्षणिक योग्यता और पारिवारिक
जिम्मेदारियों जैसी कई गंभीर कठिनाइयों का सामना करना
पड़ा। चालीस गाँव से स्कूल छोड़ने के बाद, पुणे
में एक स्थायी और सम्मानजनक काम खोजने के लिए उसे काफी संघर्ष करना
पड़ा। किसी डिग्री या तकनीकी कौशल के न होने के कारण उसे शुरुआत में कोई अच्छी या
स्थायी नौकरी नहीं मिल सकी और उसे विभिन्न प्रकार की अस्थायी नौकरियों से संतोष
करना पड़ा। उसने शुरुआत में एक घरेलू नौकर के रूप में काम किया और जीविका चलाने के लिए कड़ा शारीरिक श्रम (मैनुअल लेबर) भी किया। नौकरी पाने के लिए एक
बार उसने पूना नगर पालिका के अध्यक्ष के आवास के सामने सत्याग्रह का सहारा लिया, लेकिन जिस पद की उसे पेशकश की गई उससे उसे
संतुष्टि नहीं हुई और उसने उसे छोड़ दिया। कुछ समय के लिए उसने एक धर्मार्थ संस्था
के लिए धन एकत्र किया और घर-घर जाकर पैसे की पेटी लेकर पैसा इकट्ठा किया करता था। उसका पारिश्रमिक उसके द्वारा किए गए संग्रह
का एक चौथाई था।
कुछ समय बाद उसने पुणे के सदाशिव पेठ इलाके
में चाकू-छुरियां तेज करने और साइकिल की मरम्मत करने का एक छोटा सा काम शुरू किया।
उसने एक दुकान से कम मात्रा में चाकू, खंजर और पोर-डस्टर (हाथ में पहनने वाला हथियार) खरीदे
और उसने एक ठेला लगा दिया। इसके बाद वह फुटपाथ पर पुरानी किताबें और बर्तन भी बेचने
लगे, लेकिन इन कामों से भी उन्हें कोई निश्चित या
स्थायी आय नहीं हो पाती थी।
इस व्यवसाय से उसे अब तक जो कमा रहा था, उससे थोड़ी अधिक आमदनी हुई। लेकिन कम उम्र
में शादी हो जाने और परिवार की जिम्मेदारी आ जाने के कारण उस पर लगातार कमाने का
दबाव था। गरीबी और कर्ज के चलते वह हमेशा एक ऐसे काम की तलाश में रहता था जिससे
अधिक मुनाफा हो सके। धीरे-धीरे उसने अपनी गतिविधियों के दायरे का विस्तार किया, और अंत में शुरू किया खुद की एक दुकान! कानूनी
और सामान्य व्यापारों में लगातार मिल रही विफलता और कम कमाई के कारण, वह धीरे-धीरे हथियारों की अवैध खरीद-बिक्री
की ओर आकर्षित हुआ। उसने पुणे में एक शस्त्र भण्डार खोला, जहाँ शुरुआत में वह कानूनी तौर पर चाकुओं
का व्यापार करता था, लेकिन बाद में अधिक पैसे कमाने और राजनीतिक झुकाव के
कारण वह अवैध हथियारों और विस्फोटकों की तस्करी में पूरी तरह शामिल हो गया।
इस तरह वह अवैध शस्त्र व्यापारी बन गया, पूना में ‘शस्त्र भंडार’ नाम से एक
आग्नेय अस्त्रों-शस्त्रों की दुकान चलाने लगा और उसके ग्राहक शायद
ही कभी ख़ाली
हाथ लौटते हों। दिगम्बर रामचंद्र बडगे का हथियार व्यापार साधारण दुकानों जैसा नहीं था; बल्कि वह राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और भूमिगत गतिविधियों से पूरी तरह जुड़ा हुआ था। 1942 में उसने अपने कुछ फ़र्निचर और पैतृक
संपत्ति को बेचकर 75-100 रुपए इकट्ठा कर शस्त्र भंडार की स्थापना की थी। ‘शस्त्र भंडार’ नाम
से जिस दुकान का वह मालिक था, उसमें चाकू-छूरे, तलवार और ख़ंज़र आदि बिकते थे, जिसके
लिए किसी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह धातुओं का बना ऐसा जैकेट भी बेचता
जिससे चाकू घोंपे जाने पर सुरक्षा मिलती थी। यही बडगे वह व्यक्ति था जिसने करकरे
के ग्रुप को नोआखली यात्रा के लिए छह चेनमेल जैकेट सप्लाई किए थे। चूंकि साधारण
चाकुओं में अधिक मुनाफा नहीं था, इसलिए बडगे ने अधिक पैसे कमाने
और अपने हिन्दू महासभा के संपर्कों का
लाभ उठाते हुए आग्नेयास्त्रों और विस्फोटकों की अवैध ब्लैक-मार्केटिंग शुरू कर दी।
पूना कंटोनमेन्ट डिपो में उसकी पहुंच थी, और हथगोला तो कभी भी आसानी से प्राप्त कर
सकता था। जिन शस्त्रों की ख़रीद-बिक्री वह किया करता था उसकी उस समय राजनीतिक आंदोलनकारियों
और मुस्लिम विरोधी संघों के सदस्यों द्वारा बहुत मांग की जाती थी।
मुस्लिम राज्य हैदराबाद
की सीमा के पास रहने वाले हिंदू विशेष रूप से उसके अच्छे ग्राहक थे। उसके अधिकतर
ग्राहक इसी संगठन के थे, जो हैदराबाद के निजाम के
रजाकारों के खिलाफ हिंदुओं को हथियार मुहैया कराते थे। उसके इस काम में हिन्दू भंडार नाम से दुकान चलाने
वाला शस्त्र व्यापारी एम.टी. कुलकर्णी मदद करता था। वह देश के विभिन्न
हिस्सों से अवैध हथियार और गोला-बारूद इकट्ठा करता था और उन्हें हैदराबाद सीमा पर
रजाकारों के खिलाफ लड़ रहे हिंदू लड़ाकों और कार्यकर्ताओं को भारी मुनाफे पर बेचता
था। इसी वजह से वह राजनीतिक हलकों में एक 'विश्वसनीय हथियार
आपूर्तिकर्ता' के रूप में जाना
जाने लगा। बडगे केवल साधारण बंदूकें ही नहीं बेचता था, बल्कि वह
अत्याधुनिक सैन्य सामग्री की तस्करी भी करता था। वह विभिन्न प्रकार की अवैध और
चोरी की हुई पिस्तौलें भी रखता था। उसके पास गन-कॉटन स्लैब, डेटोनेटर और हैंड
ग्रेनेड (हथगोले) भी उपलब्ध रहते थे, जिन्हें वह भूमिगत गुटों को
सप्लाई करता था।
1940 में वह हिन्दू
महासभा के संपर्क में आया। उसने नामजोशी से रिक्वेस्ट किया था कि वह जी.वी.
केतकर को उसे हिन्दू महासभा में कोई काम दिलाने के लिए कहें। केतकर ने बाद में
उसे हिन्दू संगठन निधि और हिन्दू अनाथ आश्रम के लिए दान इकट्ठा करने का काम दिया
था। वह हिंदू महासभा के सम्मेलनों में भाग लिया करता था। वहाँ वह एक किताबों की दुकान
लगाया करता था जिसमें न केवल किताबें बल्कि चाकू, खंजर और पोर-डस्टर का स्टॉक भी होता था।
वहीं उसने दामोदर विनायक सावरकर के भाषण सुने। उसकी उनसे मुलाक़ात 1944-45 में हुई। उनके अंगरक्षक अप्पा कसार
से उसकी दोस्ती हो गई थी। गोडसे-आप्टे को वह 1940-41 से जानता था। सावरकर के सचिव दामले से भी वह
मिलता रहता था। पिछले दो-तीन साल से वह करकरे को भी जानता था। वह वाढगांवकर
को भी जानता था। 1947 से वह दादर स्थित महासभा के दफ़्तर में महीने में कम से कम दो
बार ज़रूर जाता रहा था। 1947 में उसने पूने में वीर सावरकर वाचनालय की
स्थापना की थी। महासभा के विचारों से प्रभावित मराठी प्रकाशनों को यहां रखा जाता था। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे
पुणे से 'अग्रणी' नाम का अखबार चलाते थे। बडगे की दुकान और उसके राजनीतिक
झुकाव के कारण गोडसे-आप्टे उससे अच्छी तरह परिचित हो गए थे। महासभा के विचारों को दैनिक
अग्रणी भी अपने अखबार द्वारा आगे बढ़ाता था। इसमें विभाजन का विरोध होता था।
ऐसा माना जाता था कि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण और अहिंसावादी नीतियां ही इस
देश के लिए घातक हैं।
बडगे ने आप्टे को कई
बार शस्त्रों की सप्लाई की थी। जुलाई 1947 के अंत में एक दोपहर, जब पुणे में तेज बारिश हो रही थी, नारायण आप्टे पहली बार बडगे की दुकान 'शस्त्र भण्डार' (300 नारायण पेठ, पुणे) पहुंचा था। आप्टे अकेला नहीं था; वह अपने सहयोगी विष्णु करकरे के
साथ एक उधार ली गई कार में बडगे की दुकान पर आया था। आप्टे ने बडगे को बताया कि वह
कुछ "प्रभावशाली लोगों" की तरफ से काम कर रहा है और उसने बडगे से एक स्टेन गन खरीदने की इच्छा जताई थी। यही वह पहली
मुलाकात थी जिसने बडगे को नाथूराम गोडसे, नारायण
आप्टे और विष्णु करकरे के उस गुट से जोड़ा, जिसने आगे चलकर जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या की अंतिम
साजिश रची।
इस पहली मुलाकात में
बडगे ने नारायण आप्टे को स्टेन गन नहीं दी थी। उस समय बडगे के पास स्टेन गन उपलब्ध नहीं
थी। जब
आप्टे और विष्णु करकरे ने स्टेन गन मांगी, तो बडगे ने कहा कि उसके पास अभी स्टेन गन
स्टॉक में नहीं है। स्टेन गन न होने पर बडगे ने उन्हें विकल्प के तौर पर एक ब्रिटिश सर्विस रिवॉल्वर (.38 बोर) और एक छोटी ऑटोमैटिक पिस्तौल दिखाई। आप्टे को वे हथियार पसंद आ गए। उसने
स्टेन गन के बदले बडगे से वह ब्रिटिश रिवॉल्वर और ऑटोमैटिक पिस्तौल तुरंत खरीद ली। आप्टे ने इन हथियारों के लिए बडगे को 300 रुपये नगद दिए और बचे हुए पैसों का भुगतान बाद में
करने का वादा किया। इस तरह, भले
ही आप्टे को स्टेन गन नहीं मिली, लेकिन
वह बडगे से दो कीमती आग्नेयास्त्र खरीदने में कामयाब रहा। इसी सौदे के बाद बडगे पर
आप्टे का भरोसा बढ़ गया और वे आगे चलकर बड़े हथियारों और विस्फोटकों के सौदे करने
लगे।
बाद में बडगे ने शंकर
को दुकान संभालने के लिए कहा और कार में बैठ गया। उसने गुरदयाल सिंह नाम के एक सिख
को साथ लिया और उस सड़क पर चल पड़े जो विशाल यरवदा सेंट्रल जेल की पिछली दीवार के
किनारे-किनारे जाती थी। यहाँ गुरदयाल ने उन्हें रुकने के लिए कहा और कार से बाहर
निकल गया। वह कुछ ही मिनटों में वापस आ गया। उसकी बाहों में एक स्टेन गन थी। बडगे, जिसे उन्होंने पहले कभी गंभीरता से नहीं
लिया था, ने अपनी काबिलियत साबित कर दी थी; वह सामान का इंतज़ाम कर सकता था। उन्होंने
गुरदयाल सिंह को उतारा और 'शास्त्र भंडार' वापस आकर, आप्टे ने खुशी-खुशी बडगे को उसकी माँगी हुई कीमत, 1200 रुपये दे दी। फिर वह और करकरे बडगे
के काम से खुश होकर हिंदू राष्ट्र के दफ़्तर लौट आए।
दिसम्बर 1947 तक बडगे ने
आप्टे को तकरीबन 3000 रुपयों के विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र दिए थे। दिसम्बर
में आप्टे ने उसे कुछ सामानों की लिस्ट दी (जिनमें गन-कॉटन स्लैब और डेटोनेटर,
हैण्ड ग्रेनेड (हथगोले) और पिस्तौलें, कारतूस, डेटोनेटर और फ्यूज वायर शामिल थे) और उसका इंतजाम करने के लिए कहा। उसने उसके सामानों की
व्यवस्था कर ली और इसकी उसको जानकारी दी तो उसने कहा कि वह करकरे को भेजेगा।
1945 में जब बडगे अपने
व्यापार के सिलसिले में शोलापुर गया था,
तो वहां उसकी मुलाक़ात शंकर किष्टैय्या से हुई थी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
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