गुरुवार, 27 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-14

 

महात्मा गांधी हत्या केस-14


दिगम्बर रामचन्द्र बडगे

पूर्वी खानदेश के चालीस गाँव का एक मराठा दिगम्बर रामचन्द्र बडगे बड़ा ही बेढ़ब सा दिखने वाला शख्स था। चालीस गाँव वर्तमान समय में महाराष्ट्र के जलगाँव जिले के अंतर्गत आता है (उस समय यह क्षेत्र पूर्वी खानदेश कहलाता था)। बडगे का जन्म एक मराठा परिवार में हुआ था। वह लंबी दाढ़ी और कंधे तक झूलता बाल रखता था। तरह-तरह के परिधान पहन कर कभी वह साधु, तो कभी सिख आदि का वेश धारण कर लेता था। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी टेढ़े-मेढ़े शीशे में दिख रहा हो; बडगे कद में छोटा, लगभग बौना जैसा था, लेकिन उसका शरीर गठीला और मज़बूत था, जिससे वह किसी कमज़ोर या अविकसित पहलवान जैसा लगता था। बचपन की किसी चोट के कारण उसकी एक आँख दूसरी आँख से काफ़ी छोटी थी, जिससे ऐसा लगता था जैसे वह तिरछी हो। कम कद और बेमेल आँखों की वजह से भीड़ में भी उसे आसानी से पहचाना जा सकता था। फिर भी, उसे लगता था कि वह अजीबोगरीब भेष बदलकर पकड़े जाने से बच सकता है। अपनी इस काबिलियत के सबूत के तौर पर वह अपने उन फ़ोटो का एक एल्बम रखता था जिनमें उसने नाटकीय अंदाज़ में अलग-अलग भेष धारण किए होते थे, ऐसे भेष जो उसने कथित तौर पर किसी बेहद खतरनाक मिशन को अंजाम देते समय अपनाया था। उसमें किसी छाया-नाटक (शैडो-प्ले) के योद्धा जैसा अकड़ भरा अंदाज़ था। वह बड़े-बड़े नाम लेकर अपनी पहुँच दिखाने और डींगें हाँकने का आदी था। उसे आसानी से टाला नहीं जा सकता था। लोग अक्सर उससे पीछा छुड़ाने के लिए ही उसके चाकू और खंजर खरीद लेते थे।

उसने बहुत थोड़ी सी स्कूली शिक्षा पाई थी। उसने अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत भी चालीस गाँव से ही की थी। लेकिन मैट्रिक के स्तर तक पहुँचने से बहुत पहले उसने पढ़ाई छोड़ दी और अपनी आजीविका कमाने के लिए पूना चला गया।

दिगम्बर रामचंद्र बडगे को अपने शुरुआती जीवन में स्थायी रोजगार प्राप्त करने के लिए तीव्र आर्थिक तंगी, कम शैक्षणिक योग्यता और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसी कई गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चालीस गाँव से स्कूल छोड़ने के बाद, पुणे में एक स्थायी और सम्मानजनक काम खोजने के लिए उसे काफी संघर्ष करना पड़ा। किसी डिग्री या तकनीकी कौशल के न होने के कारण उसे शुरुआत में कोई अच्छी या स्थायी नौकरी नहीं मिल सकी और उसे विभिन्न प्रकार की अस्थायी नौकरियों से संतोष करना पड़ा। उसने शुरुआत में एक घरेलू नौकर के रूप में काम किया और जीविका चलाने के लिए कड़ा शारीरिक श्रम (मैनुअल लेबर) भी किया। नौकरी पाने के लिए एक बार उसने पूना नगर पालिका के अध्यक्ष के आवास के सामने सत्याग्रह का सहारा लिया, लेकिन जिस पद की उसे पेशकश की गई उससे उसे संतुष्टि नहीं हुई और उसने उसे छोड़ दिया। कुछ समय के लिए उसने एक धर्मार्थ संस्था के लिए धन एकत्र किया और घर-घर जाकर पैसे की पेटी लेकर पैसा इकट्ठा किया करता था। उसका पारिश्रमिक उसके द्वारा किए गए संग्रह का एक चौथाई था।

कुछ समय बाद उसने पुणे के सदाशिव पेठ इलाके में चाकू-छुरियां तेज करने और साइकिल की मरम्मत करने का एक छोटा सा काम शुरू किया। उसने एक दुकान से कम मात्रा में चाकू, खंजर और पोर-डस्टर (हाथ में पहनने वाला हथियार) खरीदे और उसने एक ठेला लगा दिया। इसके बाद वह फुटपाथ पर पुरानी किताबें और बर्तन भी बेचने लगे, लेकिन इन कामों से भी उन्हें कोई निश्चित या स्थायी आय नहीं हो पाती थी। 

इस व्यवसाय से उसे अब तक जो कमा रहा था, उससे थोड़ी अधिक आमदनी हुई। लेकिन कम उम्र में शादी हो जाने और परिवार की जिम्मेदारी आ जाने के कारण उस पर लगातार कमाने का दबाव था। गरीबी और कर्ज के चलते वह हमेशा एक ऐसे काम की तलाश में रहता था जिससे अधिक मुनाफा हो सके। धीरे-धीरे उसने अपनी गतिविधियों के दायरे का विस्तार किया, और अंत में शुरू किया खुद की एक दुकान! कानूनी और सामान्य व्यापारों में लगातार मिल रही विफलता और कम कमाई के कारण, वह धीरे-धीरे हथियारों की अवैध खरीद-बिक्री की ओर आकर्षित हुआ। उसने पुणे में एक शस्त्र भण्डार खोला, जहाँ शुरुआत में वह कानूनी तौर पर चाकुओं का व्यापार करता था, लेकिन बाद में अधिक पैसे कमाने और राजनीतिक झुकाव के कारण वह अवैध हथियारों और विस्फोटकों की तस्करी में पूरी तरह शामिल हो गया।

इस तरह वह अवैध शस्त्र व्यापारी बन गया, पूना में ‘शस्त्र भंडार’ नाम से एक आग्नेय अस्त्रों-शस्त्रों की दुकान चलाने लगा और उसके ग्राहक शायद ही कभी ख़ाली हाथ लौटते हों। दिगम्बर रामचंद्र बडगे का हथियार व्यापार साधारण दुकानों जैसा नहीं था; बल्कि वह राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और भूमिगत गतिविधियों से पूरी तरह जुड़ा हुआ था। 1942 में उसने अपने कुछ फ़र्निचर और पैतृक संपत्ति को बेचकर 75-100 रुपए इकट्ठा कर शस्त्र भंडार की स्थापना की थी। ‘शस्त्र भंडार’ नाम से जिस दुकान का वह मालिक था, उसमें चाकू-छूरे, तलवार और ख़ंज़र आदि बिकते थे, जिसके लिए किसी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह धातुओं का बना ऐसा जैकेट भी बेचता जिससे चाकू घोंपे जाने पर सुरक्षा मिलती थी। यही बडगे वह व्यक्ति था जिसने करकरे के ग्रुप को नोआखली यात्रा के लिए छह चेनमेल जैकेट सप्लाई किए थे। चूंकि साधारण चाकुओं में अधिक मुनाफा नहीं था, इसलिए बडगे ने अधिक पैसे कमाने और अपने हिन्दू महासभा के संपर्कों का लाभ उठाते हुए आग्नेयास्त्रों और विस्फोटकों की अवैध ब्लैक-मार्केटिंग शुरू कर दी। पूना कंटोनमेन्ट डिपो में उसकी पहुंच थी, और हथगोला तो कभी भी आसानी से प्राप्त कर सकता था। जिन शस्त्रों की ख़रीद-बिक्री वह किया करता था उसकी उस समय राजनीतिक आंदोलनकारियों और मुस्लिम विरोधी संघों के सदस्यों द्वारा बहुत मांग की जाती थी।

मुस्लिम राज्य हैदराबाद की सीमा के पास रहने वाले हिंदू विशेष रूप से उसके अच्छे ग्राहक थे। उसके अधिकतर ग्राहक इसी संगठन के थे, जो हैदराबाद के निजाम के रजाकारों के खिलाफ हिंदुओं को हथियार मुहैया कराते थे। उसके इस काम में हिन्दू भंडार नाम से दुकान चलाने वाला शस्त्र व्यापारी एम.टी. कुलकर्णी मदद करता था। वह देश के विभिन्न हिस्सों से अवैध हथियार और गोला-बारूद इकट्ठा करता था और उन्हें हैदराबाद सीमा पर रजाकारों के खिलाफ लड़ रहे हिंदू लड़ाकों और कार्यकर्ताओं को भारी मुनाफे पर बेचता था। इसी वजह से वह राजनीतिक हलकों में एक 'विश्वसनीय हथियार आपूर्तिकर्ता' के रूप में जाना जाने लगा। बडगे केवल साधारण बंदूकें ही नहीं बेचता था, बल्कि वह अत्याधुनिक सैन्य सामग्री की तस्करी भी करता था। वह विभिन्न प्रकार की अवैध और चोरी की हुई पिस्तौलें भी रखता था। उसके पास गन-कॉटन स्लैब, डेटोनेटर और हैंड ग्रेनेड (हथगोले) भी उपलब्ध रहते थे, जिन्हें वह भूमिगत गुटों को सप्लाई करता था।

1940 में वह हिन्दू महासभा के संपर्क में आया। उसने नामजोशी से रिक्वेस्ट किया था कि वह जी.वी. केतकर को उसे हिन्दू महासभा में कोई काम दिलाने के लिए कहें। केतकर ने बाद में उसे हिन्दू संगठन निधि और हिन्दू अनाथ आश्रम के लिए दान इकट्ठा करने का काम दिया था। वह हिंदू महासभा के सम्मेलनों में भाग लिया करता था। वहाँ वह एक किताबों की दुकान लगाया करता था जिसमें न केवल किताबें बल्कि चाकू, खंजर और पोर-डस्टर का स्टॉक भी होता था। वहीं उसने दामोदर विनायक सावरकर के भाषण सुने। उसकी उनसे मुलाक़ात 1944-45 में हुई। उनके अंगरक्षक अप्पा कसार से उसकी दोस्ती हो गई थी। गोडसे-आप्टे को वह 1940-41 से जानता था। सावरकर के सचिव दामले से भी वह मिलता रहता था। पिछले दो-तीन साल से वह करकरे को भी जानता था। वह वाढगांवकर को भी जानता था। 1947 से वह दादर स्थित महासभा के दफ़्तर में महीने में कम से कम दो बार ज़रूर जाता रहा था। 1947 में उसने पूने में वीर सावरकर वाचनालय की स्थापना की थी। महासभा के विचारों से प्रभावित मराठी प्रकाशनों को यहां  रखा जाता था। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे पुणे से 'अग्रणी' नाम का अखबार चलाते थे। बडगे की दुकान और उसके राजनीतिक झुकाव के कारण गोडसे-आप्टे उससे अच्छी तरह परिचित हो गए थे। महासभा के विचारों को दैनिक अग्रणी भी अपने अखबार द्वारा आगे बढ़ाता था। इसमें विभाजन का विरोध होता था। ऐसा माना जाता था कि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण और अहिंसावादी नीतियां ही इस देश के लिए घातक हैं।

बडगे ने आप्टे को कई बार शस्त्रों की सप्लाई की थी। जुलाई 1947 के अंत में एक दोपहर, जब पुणे में तेज बारिश हो रही थी, नारायण आप्टे पहली बार बडगे की दुकान 'शस्त्र भण्डार' (300 नारायण पेठ, पुणे) पहुंचा था। आप्टे अकेला नहीं था; वह अपने सहयोगी विष्णु करकरे के साथ एक उधार ली गई कार में बडगे की दुकान पर आया था। आप्टे ने बडगे को बताया कि वह कुछ "प्रभावशाली लोगों" की तरफ से काम कर रहा है और उसने बडगे से एक स्टेन गन खरीदने की इच्छा जताई थी। यही वह पहली मुलाकात थी जिसने बडगे को नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे के उस गुट से जोड़ा, जिसने आगे चलकर जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या की अंतिम साजिश रची।

इस पहली मुलाकात में बडगे ने नारायण आप्टे को स्टेन गन नहीं दी थी। उस समय बडगे के पास स्टेन गन उपलब्ध नहीं थी। जब आप्टे और विष्णु करकरे ने स्टेन गन मांगी, तो बडगे ने कहा कि उसके पास अभी स्टेन गन स्टॉक में नहीं है। स्टेन गन न होने पर बडगे ने उन्हें विकल्प के तौर पर एक ब्रिटिश सर्विस रिवॉल्वर (.38 बोर) और एक छोटी ऑटोमैटिक पिस्तौल दिखाई। आप्टे को वे हथियार पसंद आ गए। उसने स्टेन गन के बदले बडगे से वह ब्रिटिश रिवॉल्वर और ऑटोमैटिक पिस्तौल तुरंत खरीद ली। आप्टे ने इन हथियारों के लिए बडगे को 300 रुपये नगद दिए और बचे हुए पैसों का भुगतान बाद में करने का वादा किया। इस तरह, भले ही आप्टे को स्टेन गन नहीं मिली, लेकिन वह बडगे से दो कीमती आग्नेयास्त्र खरीदने में कामयाब रहा। इसी सौदे के बाद बडगे पर आप्टे का भरोसा बढ़ गया और वे आगे चलकर बड़े हथियारों और विस्फोटकों के सौदे करने लगे।

बाद में बडगे ने शंकर को दुकान संभालने के लिए कहा और कार में बैठ गया। उसने गुरदयाल सिंह नाम के एक सिख को साथ लिया और उस सड़क पर चल पड़े जो विशाल यरवदा सेंट्रल जेल की पिछली दीवार के किनारे-किनारे जाती थी। यहाँ गुरदयाल ने उन्हें रुकने के लिए कहा और कार से बाहर निकल गया। वह कुछ ही मिनटों में वापस आ गया। उसकी बाहों में एक स्टेन गन थी। बडगे, जिसे उन्होंने पहले कभी गंभीरता से नहीं लिया था, ने अपनी काबिलियत साबित कर दी थी; वह सामान का इंतज़ाम कर सकता था। उन्होंने गुरदयाल सिंह को उतारा और 'शास्त्र भंडार' वापस आकर, आप्टे ने खुशी-खुशी बडगे को उसकी माँगी हुई कीमत, 1200 रुपये दे दी। फिर वह और करकरे बडगे के काम से खुश होकर हिंदू राष्ट्र के दफ़्तर लौट आए।

दिसम्बर 1947 तक बडगे ने आप्टे को तकरीबन 3000 रुपयों के विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र दिए थे। दिसम्बर में आप्टे ने उसे कुछ सामानों की लिस्ट दी (जिनमें गन-कॉटन स्लैब और डेटोनेटर, हैण्ड ग्रेनेड (हथगोले) और पिस्तौलें, कारतूस, डेटोनेटर और फ्यूज वायर शामिल थे)  और उसका इंतजाम करने के लिए कहा। उसने उसके सामानों की व्यवस्था कर ली और इसकी उसको जानकारी दी तो उसने कहा कि वह करकरे को भेजेगा।

1945 में जब बडगे अपने व्यापार के सिलसिले में  शोलापुर गया था, तो वहां उसकी मुलाक़ात शंकर किष्टैय्या से हुई थी।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांमहात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

बुधवार, 26 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-8

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम



10. सूफ़ी दर्शन-8

10.13 शेख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी (1154-1191)

प्रकाशवाद दर्शन के प्रवर्तक शेख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी (मृ. 1191  .) थे। उनका पूरा नाम शिहाब अल-दीन अबू अल-फुतुह याह्या इब्न हबश सुहरावर्दी। उनका जन्म उत्तर-पश्चिमी ईरान के पास सुहरावर्द गाँव में सन 1154 ई. में हुआ था। उन्होंने पहले मजद अल-दीन जिली से और बाद में ज़हीर अल-दीन कारी से शिक्षा ग्रहण की। मजद अल-दीन अल-जीली ने उन्हें दर्शन और धर्मशास्त्र की शिक्षा दी। इसके बाद वे इस्फहान (ईरान) गए, जो उस समय इस्लामी ज्ञान का एक बड़ा केंद्र था। वहाँ उन्होंने तर्कशास्त्र और इब्न सीना के दर्शन का गहराई से अध्ययन किया। अपनी औपचारिक पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने ईरान, अनातोलिया और सीरिया की यात्रा करना शुरू किया और विभिन्न सूफ़ी आचार्यों से मिले और उनकी शिक्षाओं से लाभान्वित हुए। इस अवधि के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक एकांतवास में ध्यान और वंदना में अधिक समय बिताया।

अपनी एक यात्रा पर, वह दमिश्क से अलेप्पो आए और प्रसिद्ध मुस्लिम शासक साहिब अल-दीन अय्यिबी के पुत्र मलिक ज़हीर से मिले। मलिक अल-ज़ाहिर गाज़ी उनके ज्ञान और विचारों से बेहद प्रभावित हुए और उन्हें अपने दरबार में ऊंचा स्थान दिया। मलिक ज़हीर शिहाब अल-दीन सुहरवर्द के प्रति समर्पित हो गए। यहाँ सुहरवर्दी  शहर के धार्मिक अधिकारियों के साथ उलझ गए। उनके क्रांतिकारी सूफी विचारों, प्राचीन दार्शनिक सिद्धांतों और बढ़ती लोकप्रियता से वहाँ के रूढ़िवादी उलेमा (धार्मिक गुरु) ईर्ष्या करने लगे। धार्मिक अधिकारियों ने उनके कुछ बयानों को इस्लाम के लिए खतरनाक माना। उन्होंने उनकी मृत्यु के लिए मलिक ज़हीर से कहा, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उलेमाओं ने शासक साहिब अल-दीन के पास याचिका दायर की, जिन्होंने धार्मिक नेताओं के आदेशों का पालन करने तक अपने बेटे को पद छोड़ने की धमकी दी। इस प्रकार शिहाब अल-दीन सुहरवर्दी को क़ैद कर लिया गया और वर्ष 1191 में, 38 वर्ष की आयु में, उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बाद उन्हें 'अल-मक्तूल' (हत्या किया हुआ/शहीद) कहा जाने लगा।

उन्हें 'शेख-ए-इशराक' (ज्ञान या प्रकाश का स्वामी) भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने प्राचीन ईरानी और इस्लामी रहस्यवाद का अनूठा समन्वय किया था। उनके दर्शन का केंद्रबिंदु 'प्रकाश' है। उन्होंने ईश्वर को "नूर अल-अनवार" (प्रकाशों का प्रकाश) के रूप में परिभाषित किया। अरबी शब्द इशराक़ का अर्थ है रोशनी और मशरिक़ का अर्थ पूर्व है, दोनों व्युत्पत्ति रूप से मूल शर्क से व्युत्पन्न हैं जिसका अर्थ है सूर्य का उदय। सभी प्राणी सर्वोच्च प्रकाश की रोशनी (इशराक़) हैं। मनुष्य की आत्मा निश्चित रूप से प्रकाश से बनी है; इसलिए मनुष्य सूर्य या अग्नि के प्रकाश को देखकर हर्षित हो जाता है और अंधकार से डरता है। ब्रह्मांड के सभी कण अंततः प्रकाश में लौट आते हैं। सर्वोच्च प्रकाश और शरीर के अन्धकार के बीच विभिन्न चरण होते हैं जिनमें सर्वोच्च प्रकाश इस दुनिया के अंधेरे तक पहुंचने के लिए धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाता है। इस सर्वोच्च प्रकाश को नूर अल-अनवर या नूर अल-आज़म कहा जाता है। चूंकि बीच में कोई पर्दा नहीं है, इसलिए इससे साधक को प्रत्यक्ष रोशनी प्राप्त होती है। इस रोशनी के माध्यम से, एक नया विजयी प्रकाश (नूर अल-क़ाहिर) अस्तित्व में आता है जो दो रोशनी प्राप्त करता है, एक सीधे सर्वोच्च प्रकाश से और दूसरा पहली रोशनी से।

सुहरवर्दी 'मक्तूल' का सबसे बड़ा योगदान उनका 'हिकमत अल-इशराक' (The Philosophy of Illumination) ग्रंथ है। उन्होंने ग्रीक दर्शन (विशेषकर प्लेटो), प्राचीन ईरानी/जरथुस्त्र हिकमत और सूफी अध्यात्म का एक अनूठा समन्वय तैयार किया। उनके अनुसार ईश्वर का अस्तित्व ब्रह्मांड के हर कण में है। वे भी अद्वैतवाद के समर्थक थे। चूंकि प्रत्येक वस्तु जो दिख रही है, उसका मूल कारण प्रकाश में निहित है, इसलिए उसका अंतिम सत्य ईश-प्रकाश है। इसमें दीप्ति है। प्रकाश नहीं दिखता लेकिन किसी वस्तु के माध्यम से दृश्य दिखने लगता है। उच्च प्रकाश उन वस्तुओं को प्रकाशित करता है, जो प्रकाश रहित है। इस सिद्धांत में ब्रह्मांड को ला-नूर (प्रकाश रहित) कहते हैं। प्रकाश सत्य से और अंधकार असत्य से संबद्ध है। सत्य ही प्रकाश स्रोत है। उसकी दीप्ति प्राप्त करने की इच्छा समस्त दृश्य जगत के मूल में निहित है। सूफ़ी प्रकाश के मूल स्रोत से संपर्क स्थापित करने के लिए साधना के विभिन्न आयामों से गुज़रते हैं। हालाकि यह यात्रा एक बिंदु के रूप में शुरू होती है, लेकिन वर्चस्व (क़हर) और प्रेम (मुहब्बत), स्वतंत्रता और निर्भरता, रोशनी (इशराक़) और चिंतन (शुहुद) जैसे कई अन्य "आयाम" जुड़ जाते हैं। इसके लिए एक माध्यम की ज़रूरत होती है, जिसे वली कहते हैं।  प्रकाश की ओर बढ़ना मनुष्य की प्रकृति का अंग है। वह अपने व्यक्तित्व को अधिक से अधिक प्रकाशमान करना चाहता है। ज्ञान और पुण्य के माध्यम से आत्मा अंधकारमय जगत से स्वतंत्रता प्राप्त करती है।

उनके विचारों का बाद के इस्लामी दर्शन, विशेषकर ईरान और भारत के रहस्यवादी चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने तर्क के साथ-साथ 'कश्फ़' (आंतरिक अनुभूति) को वास्तविक ज्ञान का जरिया माना। उनका मानना था कि आत्मा पवित्र होकर सीधे दिव्य प्रकाश से ज्ञान प्राप्त कर सकती है। प्रसिद्ध सूफ़ी साधकों के अनुसार आत्मा में ऐसी शक्ति है कि वह भौतिक जगत से परे होकर परमात्मा से साक्षात्कार कर सकता हैउसके साथ एकैक हो सकता है। इस भौतिक जगत से अध्यात्मिक जगत में पहुंच जाना सच्चे साधक के लिए बहुत सहज है। उस पर परमात्मा की बराबर दया बनी रहती है और उसी के सहारे बिना किसी अभ्यास के इस स्थूल जगत के बंधनों को छिन्न-भिन्न कर वह उस जगत में पहुंच जाता है। विभिन्न उपायों से साधक इस शक्ति को प्राप्त करता हैक्रमशः वह अग्रसर होता है और उसके सामने के पर्दे धीरे-धीरे हटते जाते हैं और वह परमात्मा की विभूतियों के दर्शन कर पाता है। साधक का लक्ष्य इससे भी आगे बढ़ने का होता है। वह उस अवस्था को प्राप्त करना चाहता हैजिसमें वह परमात्मा के साथ एकैक हो सके। यह एक ऐसी कैफ़ियत है जिसका बयान शब्दों के द्वारा संभव नहीं है। अतएव आत्मा के रहस्यों को जानना और उस पर नियंत्रण करना सूफ़ी साधना का महत्वपूर्ण अंग है। उन्होंने भौतिक दुनिया और आध्यात्मिक दुनिया के बीच एक मध्यवर्ती सूक्ष्म दुनिया का सिद्धांत दिया।

शेख सुहरवर्दी ने अरबी और फारसी भाषा में लगभग 50 से अधिक लघु और वृहद ग्रंथ लिखे। हिकमत अल-इशराक (प्रबुद्धता का दर्शन) उनका सबसे मुख्य दार्शनिक ग्रंथ है। हायाकिल अल-नूर (प्रकाश के मंदिर) और क़िसा अल-ग़ुर्बात अल-ग़रबीय्या (पश्चिमी निर्वासन की कहानी - एक आध्यात्मिक रूपक कथा) उनके अन्य प्रमुख ग्रन्थ हैं। ध्यान दें कि चिश्ती और सुहरावर्दी सूफी संतों द्वारा पढ़ी जाने वाली प्रसिद्ध किताब 'अवारिफ़-उल-मआरिफ़' के लेखक 'शेख शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी' (1144-1234) थे, जो इनके समकालीन थे, लेकिन दोनों अलग-अलग शख्सियतें हैं।‌

महान फारसी सूफी संत हज़रत शेख शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी (1145–1234 ई.) सुहरवर्दी सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध संस्थापक और महान संत थे। मूल नाम अबू हफ़स शहाबुद्दीन उमर था। वे अपने समय में 'शेख-उल-शायख' (शेखों के शेख) की उपाधि से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म ईरान के जंजान शहर के पास सोहरवर्द कस्बे में (539 हिजरी) हुआ था। उनका निधन 1234 ईस्वी में बगदाद (इराक) में, जहाँ उनका मजार स्थित है।

वे अपने चाचा अबू नजीब सुहरावर्दी के मुख्य शिष्य (मुरीद) थे, जिन्होंने सुहरावर्दी सिलसिले की शुरुआती नींव रखी थी। अपने चाचा से आध्यात्मिक मार्ग (तसव्वुफ) की पूरी शिक्षा लेकर उन्होंने खिलाफत (उत्तराधिकार) प्राप्त की। उन्होंने ही सुहरवर्दी सूफी सिलसिले को औपचारिक रूप दिया और इसका विस्तार किया। शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी द्वारा लिखित 'अवारिफ अल-माआरिफ' सूफी मत और अध्यात्म का एक कालजयी ग्रंथ माना जाता है। यह पुस्तक दुनिया भर के सूफी खानकाहों (मठों) में एक गाइडबुक और पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। उनके प्रसिद्ध खलीफाओं और शिष्यों में हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया मुल्तानी (भारत में इस सिलसिले का प्रसार करने वाले) और शेख सादी शिराजी शामिल हैं। शेख बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) को केंद्र बनाकर उत्तर-पश्चिम भारत में सुहरावर्दी सिलसिले को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। जलालुद्दीन तबरेजी इनके एक अन्य प्रसिद्ध शिष्य थे जिन्होंने बंगाल और भारत के पूर्वी हिस्सों में सूफी सिद्धांतों का प्रचार किया।

10.14 वहदतुल-शुहूद’ (एकत्व प्रतिभास)

वहदतुल-शुहूद का मतलब है कि देखी जाने वाली चीज़ का एक होना यानी वाह्याकृति / आविर्भाव का एकत्व ('दृष्टि की एकता')। हालांकि ईश्वर और उसकी कृति (मनुष्य) अलग हैं फिर भी कभी-कभी वे एक ही लगते हैं। यह एक रहस्यवादी विवेचना है। यह स्थिति ईश्वर से सम्मिलन की स्थिति है। इस सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर (अल्लाह) और उसकी बनाई हुई सृष्टि (ब्रह्मांड) वास्तविक रूप में एक नहीं हैं, बल्कि दोनों बिल्कुल अलग हैं। ईश्वर और सृष्टि की एकता का अनुभव केवल एक साधक (सूफी) के मन और उसकी आध्यात्मिक दृष्टि में होता है, वास्तविक दुनिया में उनका अस्तित्व अलग-अलग ही रहता है। सूफी साधकों के लिए समस्त वास्तविकता एक हैअर्थात्‌ हमें पृथ्वी पर जो भी दिखाई देता है वह एक सत्ता का विकास है। सभी वस्तुओं का उद्गम एक है और उसी तत्व में उनका लौटना भी निश्चित है। यह सिद्धांत मानता है कि संसार अल्लाह का रूप या उसका हिस्सा नहीं है, बल्कि संसार केवल अल्लाह के गुणों और उसकी रोशनी की एक परछाई या प्रतिबिंब मात्र है। जब कोई सूफी संत गहन ध्यान या साधना (तपस्या) करता है, तो उसे अपनी चेतना में ऐसा अनुभव होता है कि सब कुछ एक ही है। लेकिन यह अनुभव केवल उसकी आत्मिक दृष्टि (शुहूद) तक सीमित होता है।

सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर एक व्यापक शक्ति है और यह शक्ति सारी सृष्टि में फैली हुई है। इसलिए धर्म के आधार पर भेद-भाव व्यर्थ है। प्रेम ही ईश्वर का सच्चा रूप है। हज़रत शेख़ अलाउद्दौला समनानी रह. (मृ. 1336 ई.) ने वहदतुश्शुहूद (Unity of Witness / गवाही की एकता) का प्रतिपादन करते हुए कहा कि परमात्मा की छवि इतनी महान है कि इसके सामने संसार की अन्य वस्तुएं नहीं के बराबर हैं। उसका वह स्वरूप ही दृश्यमान रहता है। उसका गुण बराबर अव्यक्त रहता है। जैसे हित पहुंचाने वाले में छिपे हुए अहित नाम के गुण को कोई देख नहीं सकता और हितकारी ही प्रकट रहता है। हज़रत अलाउद्दौला समनानी ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि सृष्टिकर्ता (अल्लाह) और उसकी रचना (संसार) एक नहीं हैं, बल्कि दोनों में बुनियादी अंतर है। हज़रत समनानी के अनुसार परमार्थ और अपरमार्थ दो सत्ता है – एक परमात्मा की सत्ता हैदूसरा जीव की। परन्तु जीव की सत्ता शून्य जैसी है। उसे अपने अस्तित्व के लिए परमार्थ सत्ता की अपेक्षा है। जब व्यक्ति में छिपे गुण अभिव्यक्त होते हैंतब उनको नाम दिए जाते हैं। इसलिए ये मात्र दर्पण के सदृश हैं जो परम सत्ता के सभी रहस्यों को प्रकट करते हैं। समनानी द्वारा रखे गए इन विचारों को बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में हज़रत मुजद्दिद अलिफ़ सानी (शेख अहमद सरहिंदी) ने 'वहदतुश्‌शुहूद' के रूप में पूरी तरह से विकसित और लोकप्रिय किया।

अगर वहदतुल वुजूद के अनुसार केवल ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। साधक ईश्वर के अस्तित्व के अलावा सृष्टि की अन्य रचनाओं को नहीं होने के समान समझता है, तो वहदतुश्शुहूद के अनुसार साधक ईश्वर के अलावा किसी और वस्तु को देख ही नहीं पाता। वहदतुल वुजूद सिद्धांत समुद्र और लहर जैसा है। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं होती, वैसे ही यह संसार और हम सब ईश्वर से अलग नहीं हैं। जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है, वह ईश्वर का ही रूप है। मतलब रचयिता और रचना में कोई भेद नहीं है। वहदतुश्शुहूद सिद्धांत सूरज और परछाई जैसा है। परछाई सूरज के होने से ही बनती है, लेकिन परछाई कभी भी सूरज नहीं बन सकती। इसी तरह, संसार ईश्वर की बनाई हुई एक परछाई है, वह स्वयं ईश्वर नहीं है। दोनों में एकता केवल साधक को अपनी साधना के दौरान महसूस होती है, असलियत में नहीं। मतलब रचयिता श्रेष्ठ है, रचना उसकी परछाई है। इस प्रकार सूफ़ियों ने बताया कि ईश्वर ही एक मात्र सत्ता है जो भक्ति और उपासना का अधिकारी है। चूंकि सृष्टि की एक-एक वस्तु उसकी उपासना में लगी हुई हैउसकी प्रसन्नता ही सबकी मंजिल हैइसलिए मनुष्य का दिल उसी में रमना चाहिएमनुष्य का हृदय उसी में अटका रहना चाहिए। ईश्वर ही है जो प्रेम का पात्र हैइसका अधिकारी है।

उस समय के घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि वहदतुश्शुहूद का सिद्धांत वहदतुलवजूद की प्रतिस्पर्धा में सामने आया। शीआ सम्प्रदाय के विस्तार को रोकने के लिए शेख़ समनानी ने इस सिद्धांत को पेश किया था। शेख़ अहमद सरहिन्दी रह. ने इस सिद्धांत को भारत में प्रचारित किया। अपने विवादास्पद विचारों के कारण उन्हें मुग़ल बादशाह जहांगीर के शासन काल (1605-27 ई.) में अनेक वर्षों तक ग्वालियर की जेल में गुज़ारना पड़ा। शैख़ अहमद सरहिन्दी रह. ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. से अपनी बराबरी का दावा पेश कर दिया था। वहदतुश्शुहूद का सिद्धांत नक़्शबंदिया परंपरा तक सीमित रहा, अधिकांश सूफ़ियों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

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मनोज कुमार

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