सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
19. सूफ़ी रहस्यवाद-4
19.8 सर्वस्व निछावर करने के लिए तत्पर होना
आगे
की चर्चा हम हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. रचित “मसनवी” के पाँचवें खंड (दफ़्तर-ए-पंजुम) के एक रोचक आख्यान से करते हैं। यह कहानी इंसानी पाखंड,
झूठी हमदर्दी और ज्ञान के बिना केवल बातों के दिखावे पर करारा प्रहार करती
है।
एक
अरब ने एक कुत्ता पाल रखा था। वह उसे बहुत प्यार करता था। उसे पुचकारता था,
दुलारता था, लेकिन खाने को कुछ भी नहीं देता था। कुत्ता इधर-उधर से कुछ प्राप्त कर
अपना पेट भर लेता था।
एक
बार अरब यात्री रेगिस्तान के रास्ते से गुज़र रहा था। रास्ते में भीषण गर्मी और
दाने-दाने की कमी के कारण कुत्ता भूख से तड़प-तड़प कर मरने की कगार पर पहुँच गया।
कुत्ते का मालिक, अरब, ज़ोर-ज़ोर से रोने-चिल्लाने लगा। वह छाती पीट रहा था, विलाप कर रहा था और कुत्ते की वफादारी की तारीफ में दर्द भरी कविताएं पढ़
रहा था। तभी वहाँ से एक राहगीर (दरवेश) गुज़रा। उसने उस अरब को इस तरह विलाप करते
देखा तो पूछा, "भाई! तुम किस बात पर इतना शोक मना रहे हो? तुम्हारे इस रोने और चीखने का कारण क्या है?"
अरब
ने रोते हुए जवाब दिया, "यह मेरा बेहद वफादार कुत्ता है। इसने दिन में मेरे लिए शिकार किए और रातों
को मेरे घर की रखवाली की। आज यह भयानक भूख के कारण तड़प रहा है और मेरी आँखों के
सामने दम तोड़ रहा है।"
राहगीर
ने सहानुभूति जताते हुए पूछा, "क्या तुम्हारे पास इसे खिलाने के लिए कुछ भी नहीं है?"
अरब
ने कहा, "नहीं, मेरे
पास कुछ नहीं है।"
तभी
राहगीर की नज़र उस अरब के कंधे पर लटके हुए एक भारी चमड़े के थैले (वॉलेट) पर पड़ी। राहगीर ने पूछा, "इस थैले में क्या भरा हुआ है जो इतना भारी लग रहा है?"
अरब
ने बहुत सहजता से जवाब दिया, "इसमें मेरे रास्ते के खर्च के लिए रोटियाँ और भरपूर भोजन भरा हुआ है।"
राहगीर
हैरान रह गया! उसने गुस्से और अचरज से पूछा, "अरे मूर्ख! अगर तेरे थैले में रोटियाँ भरी हुई हैं, तो तू इस मरते हुए वफादार कुत्ते को एक टुकड़ा देकर इसकी जान क्यों नहीं
बचा लेता? तू
इसके लिए रो क्यों रहा है?"
अरब
ने जो जवाब दिया, वही
इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ है। अरब ने कहा, "मैं इस कुत्ते से प्रेम तो बहुत करता हूँ, लेकिन रोटियाँ मुफ़्त में नहीं आतीं। रोटी के लिए मुझे पैसे खर्च करने पड़े
हैं, जबकि आँसू तो मुफ़्त में बहते हैं! मैं इसके लिए अपने मुफ़्त के आँसू और खून बहा सकता हूँ, लेकिन अपने थैले की एक रोटी भी इसे मुफ़्त में नहीं दे सकता।"
यह
सुनकर राहगीर ने मिट्टी उठाई और उस अरब के सिर पर फेंक दी और कहा, "धिक्कार है तेरी ऐसी झूठी मोहब्बत और दिखावे पर!" कुत्ते ने आखिरकार दम तोड़ दिया, लेकिन उसके मालिक ने थैले से एक टुकड़ा भी उसे नहीं दिया।
मौलाना
रूमी इस आख्यान के माध्यम से मानव स्वभाव की एक बहुत गहरी सच्चाई को उजागर करते
हैं। इस कथा से स्पष्ट है कि अरब का कुत्ते के प्रति प्रेम मात्र एक छलावा था। एक
धोखा था। वह प्रेम नहीं था। वह तो दिखावा था। इसी तरह बहुत से लोग ईश्वर-भक्ति और
ईश्वर-प्रेम का ढोंग रचते हैं। जब तक अपने प्रियतम के लिए भक्त अपना सर्वस्व
निछावर करने के लिए तत्पर न हो उसके हृदय में प्रेम नहीं उपज सकता। बहुत से लोग
केवल बातों से, आंसुओं से और शायरी से ईश्वर (अल्लाह) या
इंसानों से मोहब्बत का दावा करते हैं, लेकिन जब वास्तव में त्याग करने या अपना कुछ निछावर करने (समय, धन या अहंकार) का समय आता है, तो वे पीछे हट जाते हैं। ईश्वर के मार्ग में या
सच्चे प्रेम में केवल ज़ुबानी सहानुभूति या मुफ़्त के आंसुओं की कोई कीमत नहीं है।
सच्चा प्रेम वह है जहाँ आप अपनी सबसे प्रिय चीज़ (जैसे उस अरब के लिए उसकी रोटियाँ
थीं) को भी अपने महबूब पर निछावर करने के लिए तत्पर रहें।
19.9 प्रेम ही भक्ति का साधन है
सूफ़ीमत
एक दर्शन है, जिसमें प्रेम ही भक्ति का साधन है। सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर को
प्राप्त करने के लिए उसके प्रति प्रेम की भावना आवश्यक थी। वे कहते थे कि सभी
धार्मिकता का आधार प्रेम ही है और प्रेम से ही मुक्ति का मार्ग मिलेगा। सूफी संतों
के अनुसार, रूढ़िवादी धार्मिक कर्मकांडों या केवल किताबों
के ज्ञान से ईश्वर को नहीं पाया जा सकता; उसे केवल निश्छल और नि:स्वार्थ प्रेम के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता
है। धार्मिक अनुभूति प्रेम है, और प्रेम से सत्य का ज्ञान
होता है। मौलाना रूमी ने मसनवी में ठीक ही लिखा है, "प्रेम के बिना जीवन एक भार है, और प्रेम ही वह कीमिया (पारस) है जो मिट्टी को सोना बना देता है।" साधक के जीवन का लक्ष्य धार्मिक साधनाओं द्वारा सत्य का साक्षात्कार करना
है। हज़रत मौलाना जलालुद्दीन रूमी रह. ने "मसनवी" में कहा है,
“मिल्लते
इश्क़ अज़ हमां मिल्लत जुदास्त।
आशिक़ान रा मज़हबो मिल्लत ख़ुदास्त।”
अर्थात्
प्रेम का मार्ग अन्य संप्रदायों से अलग है। प्रेमियों का पंथ और संप्रदाय स्वयं
ईश्वर है। दुनिया में इंसानों ने अपनी समझ के हिसाब से कई मजहब, नियम और संप्रदाय (मिल्लत) बना लिए हैं। लेकिन रूमी कहते हैं कि जो 'इश्क़' (ईश्वरीय प्रेम) का रास्ता है, वह इन पारंपरिक और बाहरी रास्तों से बिल्कुल अलग है। प्रेम का अपना एक अलग
ही संसार है। इस मत की ध्वनि हमें भक्ति-मार्ग के कवियों में भी दिखाई देती है – ‘हरि को भजै सो हरि का होई’। ईश्वर भक्तों के हृदय में निवास करता है। उसे वहीं पाया जा सकता है,
कहीं और खोजना व्यर्थ है।
हज़रत
रूमी कहते हैं,
गोफ़्त पैग़म्बर कि हक़ फ़रमूदा अस्त,
मन ना गंजम हेच दर बाला-ओ-पस्त।
दर दिले मोमिन बगंजम इन अजब,
गर मरा ख़्वाही अज़ आन दिल हा तलब।
अर्थात्
पैग़म्बर के अनुसार ईश्वर ने कहा है, पैग़म्बर साहब ने फ़रमाया कि अल्लाह का यह
फ़रमान (हदीस-ए-कुदसी) है कि मैं न तो ऊपर (आसमानों/अर्श) में समा सकता हूँ और न ही
नीचे (ज़मीन/धरती) पर। यह कितनी अचरज की बात है कि मैं (केवल) एक सच्चे मोमिन के
दिल में समा जाता हूँ।
इसलिए, अगर तुम मुझे पाना चाहते हो, तो मुझे उन (सच्चे प्रेमियों के) दिलों में तलाश करो।" यह सूफी दर्शन (तसव्वुफ़) की सबसे बुनियादी और गहरी हक़ीक़त को बयां
करता है, जिसका संदेश यह है कि ईश्वर (अल्लाह) पूरी कायनात में सबसे पवित्र स्थान—एक सच्चे मोमिन
(भक्त) के दिल—में निवास करता है। भक्त कवियों ने भी इसी तरह की बात कही है, “मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में... ना में देवल ना में मस्जिद, ना काबे कैलास में”, या कस्तूरि कुंडलि बसे, जित देखौं तित श्याम, सियाराम
मय सब जग जानी, आदि।
सूफ़ियों ने साधना को सहज और सरल बनाने की कोशिश
की। इसलिए उन्होंने ईश्वर भक्ति के लिए प्रेम को अर्थात् मधुरा भक्ति को चुना।
उन्होंने योग और ज्ञान को नहीं, प्रेम और उससे उत्पन्न विरह को महत्व दिया। उन्होंने प्रेम (सांसारिक प्रेम) को ईश्वरीय
प्रेम माना। प्रेम से स्व की भावना से मुक्ति मिल जाती है। प्रेम सौंदर्य से
उत्पन्न होता है। इसलिए सूफ़ियों ने ईश्वरीय सौंदर्य को अपने माशूक़ में ही देखा। यह
सूफ़ी दर्शन है। जायसी ने 'पद्मावत' के 'मानसरोदक खंड' में लिखा है :
जब लगि विरह न होइ तन, हिये न उपजै पेम।
तब लगि हाथ न आव तप, करम धरम सत नेम॥
इस दोहे में उन्होंने सूफी दर्शन (तसव्वुफ़) और
भारतीय साधना पद्धति का मेल कराते हुए यह समझाया है कि ईश्वरीय
प्रेम और वैराग्य (विरह) के बिना जीवन में किए जाने वाले तमाम धार्मिक कर्मकांड, नियम और तपस्या पूरी तरह व्यर्थ हैं। सूफी दर्शन में 'विरह' (इश्क़ की तड़प) को ईश्वर प्राप्ति की सबसे पहली
और अनिवार्य सीढ़ी माना गया है। जायसी कहते हैं कि आत्मा जब तक परमात्मा से अलग
होने के दर्द (विरह) को महसूस नहीं करेगी और दिल में प्रेम नहीं उमड़ेगा, तब तक भक्ति की शुरुआत ही नहीं हो सकती। समाज में लोग अक्सर ईश्वर को पाने
के लिए बड़े-बड़े व्रत रखते हैं, तपस्या करते हैं, कड़े
नियमों (सत नेम) का पालन करते हैं और धार्मिक कर्म करते हैं। लेकिन यदि इन सब
क्रियाओं के पीछे दिल में तड़प और निश्छल प्रेम नहीं है, तो
वे सब केवल बाहरी दिखावा मात्र हैं। उनसे कभी भी 'परमात्मा' रूपी फल प्राप्त नहीं हो सकता। इस दोहे का भाव ठीक वैसा ही है जैसा कबीरदास
जी ने कहा था— "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होइ॥"
यह प्रेम नितान्त लौकिक है। प्रेम जो लौकिक
दिखाई देता है, पर उसका आधार आध्यात्मिक होता है। मानव-शरीर में मन उसका चेतन अंश
है। प्रेम मनुष्य के मन की नैसर्गिक क्षुधा है। इसका कोई नियम नहीं होता। इसके लिए
कोई कोड ऑफ कंडक्ट या आचार संहिता नहीं बनाई जा सकती। यह जिस मनुष्य के दिल में
फूटता है, उसे ही इसकी अनुभूति होती है। इसलिए सूफ़ी-साधक जिन नियमों का पालन करते
हैं वे उनके नितांत वैयक्तिक नियम होते हैं। यह सूफ़ी साधना का सबसे बड़ा रहस्य है। हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. का कहना था, “प्रेम-धर्म
सभी धर्मों से अलग है। ईश्वरानुरागियों के लिए ईश्वर के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं
है।” सूफ़ी साधक अपने ब्रह्म के साथ संबंध को नितांत
वैयक्तिक प्रेम-संबंध मानते हैं।
19.10 गुरु की अनुकंपा से ब्रह्म को पाने का संकल्प
गुरु की प्रेरणा से जब परम सौंदर्य-रूप ब्रह्म
को पाने का संकल्प जाग्रत होता है, तब शरीर साधना में प्रवृत्त होता है। योग-साधना
द्वारा कुंडलिनी जागृत करके साधक इस यात्रा की शुरूआत करता है। फिर उसे इस संसार
का प्रपंच, माया और शैतान प्रेम-मार्ग से विचलित करने का प्रयास करते हैं।
साधना-पथ में अनेक प्रकार की बाधाएं उत्पन्न होती हैं। लेकिन गुरु की कृपा उस पर
बनी रहती है। साधक सत्य के बल पर सभी बाधाओं को पार कर जाता है। वह ब्रह्म-लोक
पहुंच कर अमरत्व को प्राप्त करता है। इस स्थिति, यानी सर्वोत्कृष्ट सिद्धि को सूफ़ी
भाषा में “फ़ना” कहते हैं। “फ़ना” के बाद साधक फिर से अपने सांसारिक कर्मों को
पूरा करने के लिए प्रस्तुत होता है, जिसे “बक़ा” की स्थिति कहते हैं। साधक अपने कर्मों का
लेखा-जोखा चुकाकर, अपना भौतिक शरीर त्याग, ब्रह्म-चेतना सहित ब्रह्मलीन हो जाता
है। इस मार्ग पर गुरु की कृपा और उनकी सहायता के बिना चल पाना संभव नहीं है। गुरु
की प्रेरणा से साधारण-से-साधारण व्यक्ति साधना के पथ पर आगे बढ़ता जाता है। गुरु
अपनी प्रार्थना द्वारा ब्रह्म का ध्यान साधक की ओर आकर्षित कर उसकी अनुकंपा साधक
को प्राप्त कराता है।
गुरु के महत्व को बताते हुए हज़रत रूमी
कहते हैं,
“चून
कि कर दी ज़ात मुरशिद रा क़बूल।
हम ख़ुदा दर ज़ात आमद हम रसूल॥”
अर्थात्
यदि तुम किसी को अपना आध्यात्मिक गुरु मान लो तो उसमें तुम ईश्वर एवं पैग़ंबर दोनों
को पा जाओगे। यह सूफी दर्शन (तसव्वुफ़) में 'मुरशिद'
(आध्यात्मिक गुरु/पीर) के सर्वोच्च स्थान और उनके प्रति पूर्ण
समर्पण के महत्व को बयां करता है। सूफी दर्शन के अनुसार, आम इंसान का दिल सीधे ईश्वर के नूर (प्रकाश) को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
मुरशिद वह माध्यम या आईना होता है जो ईश्वर के उस दिव्य प्रकाश को शिष्यों तक
पहुँचाता है। इसलिए, जब एक सच्चा शिष्य अपने गुरु के प्रति पूरी तरह
समर्पित हो जाता है, तो उसे गुरु के भीतर ही ईश्वर और पैग़म्बर की
झलक दिखाई देने लगती है। यह विचार भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा से हुबहू मेल खाता है, जहाँ गुरु को भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया गया है। जैसा कि संत कबीरदास जी
ने भी कहा है:
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥”
19.11 आत्मा से संबंध रखने वाला ज्ञान
ग्यारहवीं
शताब्दी में जन्मे दार्शनिक और धर्मशास्त्रज्ञ हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह जिन्होंने सूफ़ीमत को आध्यात्मिक आधार प्रदान किया था ने अपनी कालजयी रचना 'इह्या उलूम उद-दीन' में लिखा है अक़्ले-सानी
(बुद्धि से संबंध रखने वाला) को साधन प्रत्यक्ष, प्रमाण, तर्क और अध्ययन से हासिल किया जा सकता
है, लेकिन इल्मे-मकाशिफ़ा (आत्मा से साक्षात्कार) दीनी यानी आत्मा से संबंध रखने
वाला ज्ञान है और इसका मकसद ईश्वर की प्राप्ति है। जहाँ अक़्ले-सानी इंसान को बाहरी
दुनिया का 'आलिम' (विद्वान) बनाती है, वहीं इल्मे-मकाशिफ़ा इंसान की रूह को जगाकर उसे अल्लाह का 'आरिफ़' (सच्चा आध्यात्मिक ज्ञानी/सूफी) बना
देता है। यही वह ज्ञान है जो मनुष्य को सारे फंदों से निजात दिलाता है और सत् से साक्षात्कार कराता है। पर इसके
लिए तज़किया-ए-नफ़्स (हृदय की शुद्धि) और मराक़बा और मकाशफ़ा (गूढ तत्वों पर चिंतन) ज़रूरी है। पहली तरह का इल्म दुनियाई
इल्म है और इसकी सच्चाई अनिश्चित है, जबकि आत्मिक ज्ञान की सच्चाई निश्चित है। यह ईश्वर का सामना करा देता
है। अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हज़रत ग़ज़ाली ने दो उदाहरण दिए हैं।
पहला उदाहरण :
एक खेत में कुंआ खोदा गया। इसमें पानी भरा जाना था। इसके लिए दो उपाय
थे। पहला, ज़मीन की सतह पर नालियां खोदकर किसी दूसरे कुंए से नालियों द्वारा इसमें
पानी लाया जाए। दूसरा, उसी कुएं को इतना गहरा कर दिया जाए कि अंदर से पानी का सोता फूटे और पानी
ऊपर आ जाए। इस तरह से आया पानी पहले उपाय से अधिक निर्मल, और स्थाई होगा।
इसी तरह मनुष्य का क़ल्ब (हृदय) एक कुंआ है, नालियां पांच इंद्रियां
और उनके द्वारा लाया गया पानी, तज़ुरबे (अनुभव) पर आधारित ज्ञान की तरह है। लेकिन
दूसरे प्रकार से लाया गया पानी वह ज्ञान है जो कुंए के भीतर से अपने आप निकलता है।
यह वह सीधा ज्ञान है जो ईश्वर की दया खोजने वाले की आत्मा में प्रकाशित होता है।
दूसरा
उदाहरण :
रोमन और चीनी बहुत अच्छे चित्रकार होते हैं। उनके कला की तुलना करने
के लिए राजा ने चीनी कलाकारों को एक कमरे की एक दीवाल पर और रोमन कलाकारों को
दूसरी दीवाल पर चित्रकारी करने के लिए कहा। दोनों के बीच एक परदा डाल दिया गया।
रोमन ने विभिन्न प्रकार के रंग इकट्ठे किए। चीनी ने बिना किसी रंग के
काम शुरू किया। जब उनका काम खतम हुआ तो राजा को कहा गया कि चलकर देखिए और तय कीजिए
कि किसका काम बेहतर है। राजा मुआयना करने गया। रोमन कलाकारों द्वारा बनाई गई
तस्वीर बहुत सुंदर थी। राजा बहुत ख़ुश हुआ। फिर वह चीनी कलाकारों द्वारा बनाई गई
दीवार की तरफ़ मुड़ा। वहां तो किसी रंग का इस्तेमाल ही नहीं किया गया था। राजा ने
कलाकारों से पूछा, “चित्र कहां है?” चीनी कलाकारों ने बीच का परदा हटा दिया। रोमन कलाकारों द्वारा बनाए गए
चित्र की परछाई चीनी कलाकारों की दीवार पर पड़ी। चीनियों ने दीवार पर ऐसी पॉलिश लगाई
थी कि परछाई असली चित्रों से भी अधिक सुंदर लगी। उसकी जगमगाहट के सामने असली तस्वीर
भी फीकी लगने लगी।
ईश्वर के भक्त चीनियों की तरह के होते हैं। वे अपने दिल के आईने को इस तरह
शुद्ध और निर्मल कर लेते हैं कि सनातन सत्य उसमें अपने पूरे प्रकाश के साथ चमकने
लगता है। लेकिन जो पोथी पढ़-पढ़ कर ज्ञान अर्जित करते हैं वे तो रोमन कलाकारों
की तरह सिर्फ़ बाहरी दुनिया की चकाचौंध में ही सीमित होकर रह जाते हैं। रहस्यवादी
परमेश्वर को एक प्रकाश पुंज मानते हैं। हज़रत ग़ज़ाली के अनुसार, “अल्लाह सत्तर हजार
परदों के भीतर है,
जिनमें से कुछ
प्रकाशमय है अन्य अंधकारमय। यदि वह किसी प्रकार उन परदों को हटाकर अपने को
अनावृत्त कर ले तो जिस किसी की भी दृष्टि उस पर पड़ेगी, वह उसके प्रखर प्रकाश से जल जाएगा। मनुष्य अपना
जन्म ग्रहण करते ही उन प्रकाशमय परदों की ओर से क्रमशः अंधकारमय परदों की ओर बढ़ना
आरंभ कर देता है। लेकिन यदि कभी वह संभल जाता है तो फिर वह उस दिव्य आलोक की ओर
अग्रसर होने लगता है और उसे परमात्मतत्व की उपलब्धि हो जाती है।”
*** *** ***
मनोज
कुमार
