सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
7. सूफ़ीमत का विकास प्रथम चरण-1
“हे अली, मैं एक वृक्ष से उत्पन्न किया
गया हूं और तुम भी उसी वृक्ष में उत्पन्न किए गए हो। मैं उस वृक्ष का मूल हूं और
तुम उसका तना हो। हसन और हुसनैन उसकी शाखाएं हैं तथा हमारे मित्रगण उसके पत्ते
हैं। अतः जो व्यक्ति इस पेड़ के किसी अंग से सम्बद्ध हो जाए, ईश्वर उसे जन्नत में
प्रवेश प्रदान करेगा।” (हदीस)
विद्वानों का मानना है कि सूफ़ी आन्दोलन का प्रारम्भ इस्लाम धर्म और समाज को
अधिक उदार बनाने तथा उन्हें बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के उद्देश्य
से ही हुआ था। आरंभिक इस्लाम में तेजी से फैलते भौतिकवाद और खिलाफत के कठोर
राजनीतिक ढांचे के खिलाफ कुछ आध्यात्मिक संतों ने वैराग्य और रहस्यवाद की ओर कदम
बढ़ाए। प्रो. निजामी के अनुसार इस्लाम
धर्म और समाज को परिवर्तित, परिस्थितियों के
अनुकूल बनाने के लिए सूफ़ी आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ। उनका कहना है कि मंगोल
नेता हलाकू द्वारा बगदाद पर आक्रमण के परिणामस्वरूप मुस्लिम सामाजिक जीवन का विनाश
तथा नैतिकता का पतन होने लगा। ऐसी परिस्थितियों में सूफ़ीमत का विकास मानव संस्कृति, मुस्लिम समाज, नैतिकता तथा आध्यात्मिक सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिये हुआ। सूफियों ने रूढ़िवादी उलेमाओं के शुष्क और कर्मकांडीय दृष्टिकोण के विपरीत, ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग 'प्रेम और भक्ति' (इश्क) को माना। इस आन्दोलन ने जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर इस्लामिक भाईचारे और सामाजिक समता पर जोर दिया।
इतिहासकार प्रो. हबीब के अनुसार, जब इस्लामी संस्कृति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, तब सूफी रहस्यवादी विचारों ने इस्लाम को शक्ति
दी और मानव समाज व नैतिकता की रक्षा करते हुए इसे परिस्थितियों के अनुकूल बनाया।
उस समय मुसलमानों
की राजनैतिक शक्ति कमज़ोर हो चुकी थी, चारों ओर अव्यवस्था, अराजकता तथा आतंक
का वातावरण था, ऐसी परिस्थिति में मुस्लिम समाज में
नवजीवन का उदय करने के लिए सूफ़ी सन्तों ने संगठित
होकर प्रयास करने का निश्चय किया। सूफ़ी सन्तों के विचार से उनका मत उतना ही प्राचीन है जितना इस्लाम धर्म। सूफ़ी सन्तों के मतानुसार हज़रत मुहम्मद सल. ने ईश्वर से जो अलौकिक ज्ञान प्राप्त किया था, उसे दो रूपों में
प्रकट किया, इल्म-ए-ज़हीर (किताबी ज्ञान) और इल्म-ए-बातिन
(आध्यात्मिक या हृदय का ज्ञान)। प्रथम रूप में तो उसे क़ुरआन में संगृहीत किया तथा कुछ ऐसा ज्ञान जो जनसाधारण के लिये आवश्यक नहीं
था तथा केवल ईश्वर के चुने हुए प्रतिनिधियों के ही योग्य समझा, उसे गुप्त रखा गया
तथा उसे एक रहस्यमय ढंग से मुहम्मद साहब ने अपने चुनिन्दा शिष्यों कुछ विशेष सहाबा, जैसे हजरत अबू बक्र (आरए)
और हजरत अली (आरए) जैसे योगी को ही प्रदान किया।
7.1 सूफ़ीमत के विकास में ईरान का हाथ
इतना तो तय है कि
सूफ़ीवाद इस्लाम धर्म से ही प्रस्फुटित हुआ। आरबेरी ने लिखा है कि सूफ़ीवाद
का उद्भव इस्लाम की राजनैतिक सफलता का प्रत्यक्ष परिणाम था। यहाँ एक बात स्पष्ट है
कि सूफ़ीमत के विकास में ईरान का बड़ा हाथ था। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक मानना है
कि “इस्लाम का जो पौधा
ईरान में लगा था, वास्तव में वही सूफ़ीमत के रूप में विकसित और फलित हुआ।” ईरान सूफीवाद के
सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक रहा है, जहाँ से यह विचार
पूरी दुनिया और विशेषकर दक्षिण एशिया (भारत) तक पहुँचा।
किंतु सच्चाई यह है
कि इस्लाम का उदय अरब में हुआ। तथ्यों की छानबीन से यह पता चलता है कि सूफ़ीवाद के
विकास का रास्ता विभिन्न पड़ावों से होकर गुज़रा है और समय-समय पर विभिन्न आस्थाओं से प्रभावित भी होता रहा है।
इस्लामी राज्यों की विस्तारवादी प्रवृत्ति के कारण समय के साथ इस्लामी देशों की
भौगोलिक सीमाओं में अनेक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण
देश सम्मिलित कर लिए गए। इस क्रम में मुसलमानों का सम्पर्क, बौद्धिक और
वैचारिक स्तर पर यूनानी, ईरानी और भारतीय विद्वानों से हुआ। जब मुस्लिम अरब से
बाहर निकले तो वे ईरान पहुंचे, जहां वे स्थानीय आर्य संस्कृति पर पूरी तरह से छा
गए। इस्लामी सभ्यता और संस्कृति में ईरान का बहुत बड़ा महत्त्व है। वहाँ के साहित्य, विचारधारा और
परम्परा ने इस्लामी विचारधारा को बहुत अधिक प्रभावित किया। ईरानी साम्राज्य विस्तृत था और उसकी संस्कृति
विशाल। सासानी वंश
वालों के शासनकाल में इस्लाम धर्म का प्रवेश ईरान में हुआ। ईरान पर विजय के साथ ही इस्लाम का वहां की
स्थानीय संस्कृति से संपर्क हुआ। फारसी भाषा सूफी साहित्य की मुख्य भाषा बन गई। मौलाना
जलालुद्दीन रूमी, शेख सादी, अत्तार, और हाफिज जैसे
महान सूफी कवि और दार्शनिक ईरान से ही थे। इनकी रचनाओं (जैसे रूमी की मसनवी) ने सूफी विचारों, प्रेम और
ईश्वर-भक्ति को दुनियाभर में फैलाया। सूफियों के कई प्रमुख मार्ग या सिलसिले ईरान
में ही स्थापित हुए या फले-फूले। उदाहरण के लिए, सुहरावर्दी, नक्शबंदी, और कुब्राविया
सिलसिले ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में ही शुरू होकर अन्य देशों में विस्तृत हुए। ईरान
ने पूर्व-इस्लामी रहस्यवादी विचारों और इस्लामी शिक्षाओं का एक सुंदर मिश्रण तैयार
किया। सूफीवाद में जो 'इश्क-ए-हकीकी' (ईश्वर से प्रेम) की
अवधारणा है, उसे ईरानी विचारकों ने बहुत गहराई दी। भारत में सूफी मत का प्रसार
करने वाले अधिकांश सूफी संत फारसी संस्कृति और साहित्य से गहरे जुड़े थे। भारत के
प्रसिद्ध चिश्तिया सिलसिले के संत भी फारसी भाषा और ईरानी सूफी साहित्य से अत्यधिक
प्रभावित थे।
एक मत के अनुसार राजनैतिक
परिप्रेक्ष्य में भले ही अरबों ने इस्लाम के प्रदेश (ईरान) पर विजय प्राप्त की,
किन्तु सांस्कृतिक भूमि पर यह ईरानी संस्कृति की अरबी संस्कृति पर जीत थी। ईरान
ने अरबी भाषा को अपना लिया। ईरानी साहित्य, कला, दर्शन आदि
इस्लामी दुनिया की अपनी वस्तु बन गए। ज़रथुस्त्र वहाँ के
धर्म-प्रधान थे और जेंदावेस्ता वहाँ का प्रमुख धर्म-ग्रन्थ। इस्लाम के पहले ज़रस्थुस्त्रवाद (628-521 ई.पू.) ईरानी धार्मिक-आस्था
के रूप में प्रचलित था। इससे पहले मज़दकवद (651-224 ई.पू.) और मानी (275-216 ई.पू.) ने भी धर्म
और विश्वास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। ईरान में लोगों ने इस्लाम
धर्म-ग्रहण तो किया था, लेकिन साथ ही वे प्राचीन धार्मिक विश्वासों का भी संरक्षण
करते रहे। इसलिए ईरान का तसव्वुफ़ अरबी तसव्वुफ़ से कुछ मामलों में भिन्न था। इस तरह
वह सूफ़ीवाद जो सबसे पहले इराक़ और जज़ीरा में अस्तित्व में आया वह ईरान तथा भारत तक फैला
और फिर मिस्र तथा उन्दूलुस तक पहुंचा।
7.2 ‘फ़ि़क्ह’ और ‘तसव्वुफ़’
आर्य, अध्यात्मवाद
एवं रहस्यवाद में विश्वास रखते थे। इसका प्रभाव इस्लाम पर पड़ा। वे लोग जो वास्तविक
रूप से तो इस्लाम धर्म ग्रहण कर चुके थे, लेकिन अंतस में अपने मूल धर्म को बसाए
हुए थे, धर्म के इन दोनों स्वरूपों का तुलनात्मक अध्ययन करते रहते थे। इन मुशक्कीन
(द्विधावादी या संदेहवादियों)
की आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान, सूफ़ियों ने सुझाया। मुशक्कीन वे विचारक थे जो
ईश्वर के अस्तित्व, धर्म और सत्य के बारे में तर्क-वितर्क करते थे और किसी भी बात को
आसानी से स्वीकार नहीं करते थे। सूफ़ियों ने माना कि सिर्फ बौद्धिक तर्क (Rationality)
से ईश्वर और
परम सत्य को नहीं समझा जा सकता। दिमाग में उठने वाले संदेह (Skepticism)
को सिर्फ
बड़े तर्कों से नहीं मिटाया जा सकता। सूफी परंपरा यह कहती है कि सत्य केवल किताबों
या बहसों में नहीं है, बल्कि यह आंतरिक अनुभूति (धौक) और ईश्वर के
साक्षात्कार (कश्फ़) का विषय है। सूफ़ियों ने सुझाया कि हृदय में उठने वाले संदेहों का कारण
आत्मा पर पड़े पर्चे या सांसारिक बुराइयाँ हैं। ध्यान (ज़िक्र), प्रेम और प्रार्थना
के माध्यम से हृदय को शुद्ध करके ही पूर्ण विश्वास (यकीन) प्राप्त किया जा सकता
है। इमाम अल-ग़ज़ाली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'अल-मुनकिज़ मिन
अल-दलाल' (Deliverance from Error) में लिखा है कि कैसे उन्होंने संदेहवाद
(द्विधावाद) से निकलकर सूफीवाद के माध्यम से सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया।
कुछ समय बाद इस्लाम
की दो शाखाएं हो गईं। एक ‘फ़ि़क्ह’ और दूसरी ‘तसव्वुफ़’। इस्लाम का क़ानूनी
पक्ष ‘फ़िक़्ह’ में आता है, इन्हें ‘शरीअतपंथी’ भी कहा जा सकता है। 'शरीअतपंथी'
(Shariat-panthi) उन व्यक्तियों, समूहों या विचारधाराओं को कहा जाता है जो इस्लाम
के धार्मिक और कानूनी नियमों, यानी 'शरीअत' (Shariah) का सख्ती से पालन
करते हैं। इसका संबंध इस बात से है कि इबादत (जैसे नमाज, रोजा) और सांसारिक
लेनदेन (जैसे निकाह, व्यापार) सही तरीके से कैसे किए जाएं। इसे प्राप्त करने के लिए कुरान, हदीस, इज्मा और क़ियास का
उपयोग किया जाता है। क़ुरआन इस्लाम का सर्वोच्च और प्राथमिक स्रोत है। इसे
ईश्वर (अल्लाह) की सीधी वाणी माना जाता है, जो पैगंबर मुहम्मद
(सल्ल.) पर अवतरित हुई। इसमें जीवन के मूल सिद्धांत, आस्था, नैतिकता और कानून
के बुनियादी नियम मौजूद हैं। हदीस शरीयत का दूसरा सबसे बड़ा आधार है। इसमें
पैगंबर मुहम्मद के कथन, कार्य और उनके द्वारा किसी बात को देखकर चुप रहकर
दी गई स्वीकृति दर्ज हैं। यह कुरआन के निर्देशों को विस्तार से समझाता है कि
उन्हें व्यवहार में कैसे लागू करना है। इज्मा: जब कोई नया सामाजिक
या धार्मिक मुद्दा उठता है जिस पर कुरआन या हदीस में कोई सीधा उल्लेख नहीं होता, तब उस काल के
प्रमुख इस्लामी विद्वान मिलकर विचार-विमर्श करते हैं और सर्वसम्मति (consensus) से कोई निर्णय लेते
हैं। विद्वानों की इसी आम सहमति को 'इज्मा' कहा जाता है। क़ियास
शरीयत का चौथा स्रोत है। जब किसी स्थिति पर शुरुआती तीन स्रोतों से सीधे कोई
हल न मिले, तो विद्वान तर्क और सादृश्य (analogy) का इस्तेमाल करते
हैं। पुराने स्थापित सिद्धांतों (कुरआन या हदीस) से तुलना करके नए मुद्दे पर फैसला
निकालना ही 'क़ियास' है।
तसव्वुफ़ का संबंध ईश प्रेम जैसे गुणों से है जो
कि फ़ि़क्ह की परिधि में नहीं आते। इसे
आमतौर पर आध्यात्मिकता या सूफीवाद कहा जाता है। इसका संबंध आंतरिक
शुद्धि, नीयत और अल्लाह के प्रेम से है। तसव्वुफ़ में साधक (सूफी) का
अंतिम लक्ष्य अपनी आत्मा को सांसारिक मोह-माया से मुक्त करके सीधे अल्लाह
(ईश्वर) से प्रेम करना और उनके साथ आध्यात्मिक मिलन (वस्ल) प्राप्त करना होता
है। यह सिखाता है कि दिल से अहंकार, लालच और नफरत
को कैसे मिटाया जाए और इखलास (सच्ची लगन) कैसे पैदा की जाए। इन गुणों पर ज़ोर देने वालों
को ही ‘तरीक़तपंथी’ कहा गया है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है
कि ये दो भिन्न मार्ग हैं और न ही इसका अर्थ यह निकाला जाए कि ‘फ़िक्ह’ पर ज़ोर देने वाले ईशप्रेम से रिक्त थे या ‘तरीक़तपंथी’ ‘फ़िक्ह’ को नहीं मानते थे। सूफी परंपरा में
शरीयत (कानून), तरीक़त (आध्यात्मिक मार्ग), और हक़ीक़त (परम सत्य) एक-दूसरे के पूरक
हैं। सूफी विचारकों का मानना था कि शरीयत (जिसका आधार फ़िक्ह है) बाहरी
आचरण को सुधारती है और तरीक़त आंतरिक शुद्धि का मार्ग है। महानतम सूफी संतों
में से एक, जैसे हसन बसरी और जाफ़र
सादिक, इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक्ह) के भी प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। सूफियों
का एक बहुत प्रसिद्ध कथन है: "बिना शरीयत
के तरीक़त (सूफीवाद) तक पहुँचना असंभव है।" यानी फ़िक्ह के नियमों
(नमाज़, रोज़ा आदि) का पालन किए बिना
आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती। चूंकि एक सूफ़ी अक्सर औसत से काफी अलग व्यक्ति
होते थे, इसलिए यह स्वाभाविक था कि सूफ़ियों में
से कुछ अपने समाज और समुदायों के आम तौर पर स्वीकृत मानदंडों से इतने दूर चले गए
कि उन्होंने वैधता के बारे में अपने अनुयायियों के मन में संदेह पैदा किया। कुछ
सूफी समूह (जैसे कलंदरिया) ने बाहरी कर्मकांडों और फ़िक्ह को अनदेखा किया, लेकिन उन्हें मुख्यधारा के
तरीक़तपंथियों (जैसे चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया आदि) ने कभी स्वीकार नहीं
किया और उनकी निंदा की।
जाफ़र रज़ा ने इस्लामी आध्यात्म : सूफ़ीवाद में बताया है कि उस समय इस्लाम
को अनेक सैद्धांतिक आंदोलनों का सामना करना पड़ा। विभिन्न विद्याओं (शास्त्रों) की पुस्तकों के अरबी अनुवादों के कारण उपजी
परिस्थितियों ने अह्ले-कलाम (शास्त्रार्थवादी) को जन्म दिया। इन्हें मुतकाल्लिमून भी कहा जाता
था। ये वे धर्मशास्त्री थे जो धार्मिक मुद्दों को समझने के लिए तर्क और दर्शन (Dialectical Reasoning) का इस्तेमाल करते थे। अनुवाद
के लिए दारुल-हिकमत नामक संस्था सक्रिय थी। इन अनुवादों ने इस्लामी
विश्वासों को पुनर्विवेचना के लिए प्रेरित किया जिससे वासिल-बिन-अता (मृ..748 ई.) और उमर-बिन-उबैद (मृ. 763 ई.) के नेतृत्व में मुअतज़ला (मोतज़ेला)
आंदोलन शुरू हुआ। ये सिद्धांतवादी ईश्वर के गुणों से अलग अस्तित्व से इंकार करते
थे। वे मानते थे कि ईश्वर के गुण (जैसे ज्ञान, शक्ति, जीवन) ईश्वर के सार से अलग या बाहर कोई वास्तविक वस्तुएं नहीं हैं। वे ईश्वर
के सार के साथ पूर्ण रूप से अभिन्न हैं। वे मानते थे कि सभी गुण ईश्वर से उत्पन्न
हैं। मुअतज़िला का तर्क था कि यदि ईश्वर के गुण उसके सार से अलग और अनंत (eternal) मान लिए जाएं, तो इससे कई शाश्वत अस्तित्व (multiplicity of eternals) सिद्ध हो जाएंगे, जो एकेश्वरवाद के खिलाफ होगा। इसलिए, ईश्वर ज्ञान या शक्ति जैसे गुणों के माध्यम से
नहीं, बल्कि अपने सार से ही सब
कुछ जानता और देखता है।
इब्न-अशरस और अलजाहिज़ के नेतृत्व में सिद्धांत वादियों का तीसरा वर्ग
द्वन्द्वात्मक कार्य पद्धति पर आधारित था। इस वर्ग ने इस्लाम को ग्रहण तो कर लिया
था, पर इस दुविधा में था कि कहीं उन्होंने भूल तो
नहीं की है। इनका मानना था कि सभी प्रकार के सत्य को केवल तर्क (Reason) और बुद्धि के माध्यम से ही जाना जा सकता है। यह धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या में तर्क
को सर्वोच्च स्थान देते थे। वे यह भी मानते थे कि ईश्वर पूर्णतः न्यायप्रिय है और
मनुष्य को अपने कर्मों को चुनने की स्वतंत्रता (क़दर) प्राप्त है।
चौथा वर्ग “अहिया-ए-सनद” उदारवादिता के सिद्धांत पर आधारित था। एक
उदारवादी और सुधारवादी पंथ था। इस सिद्धांत के मानने वालों (विचारकों) का मुख्य
झुकाव इस्लाम की मूल उदारवादी, तार्किक और रहस्यवादी व्याख्या की ओर था। ये कट्टरपंथी और रूढ़िवादी विचारों
के विरोधी थे। क्योंकि यह पंथ काफ़ी उदार था, इसलिए उस समय के कट्टरपंथी धर्मशास्त्रियों ने
इसका कड़ा विरोध भी किया था, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर 'अशाअरा आंदोलन' की उत्पत्ति हुई। उदारवादियों
के विरुद्ध अबुल हसन अलअशअरी (872-934 ई.) के नेतृत्व में ‘अशाअरा आंदोलन’ शुरू हुआ। आशारिया दर्शनशास्त्र के विषय
को क़ुरआन और हदीस के आधार पर व्याख्यायित करते थे। कट्टरवादियों को इनके विचार
भाते थे। यह आंदोलन मुख्य रूप से दो विरोधी विचारधाराओं—अत्यधिक रूढ़िवादी
पारंपरिक दृष्टिकोण (अथारी) और अत्यधिक बुद्धिवादी/तार्किक दृष्टिकोण
(मुअतज़िला)—के बीच एक मध्यम मार्ग (Middle Path) स्थापित करने के लिए उपजा
था। अल-अशारी ने महसूस किया कि केवल बुद्धि पर
निर्भर रहने से धर्मग्रंथों (कुरान और हदीस) की पवित्रता और ईश्वर की संप्रभुता
कमजोर हो रही है। इनका मानना था कि मानवीय
बुद्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन वह सर्वोच्च नहीं है। अंतिम सत्य केवल ईश्वरीय ज्ञान (कुरान और पैगंबर की शिक्षाओं) से ही प्राप्त
हो सकता है। बुद्धि का काम इस ज्ञान को समझना और उसका बचाव
करना है, न कि उसे चुनौती देना। अशअरा आंदोलन को मध्यकाल में महान मुस्लिम
दार्शनिक इमाम अल-ग़ज़ाली ने बहुत बढ़ावा दिया।
‘रहस्यवाद’ और ‘वैराग्य’ शायद रूढ़िवादी परमार्थविद्या
(Theology) के दो विकल्प थे।
सूफ़ीवाद मूलतः दार्शनिक व्यवस्था पर टिका था। हुक़ूमत और सल्तनत के
विस्तार के साथ ही मुस्लिम समाज में कट्टरता भी सिर उठाने लगी थी। कट्टरता का
सूफ़ियों में अभाव था। तरीक़त में भी कट्टरवाद का अभाव था। तरीक़तपंथियों और
सूफ़ी मतावलंबिओं की उदारता आम लोगों को अपनी तरफ़ आकर्षित करती थी। लेकिन उनके चारों तरफ़ जमा भीड़ हुक्मरानों के कान भी खड़ा किये दे रही
थी। उनकी आलंकारिक और रहस्यवादी भाषा की समझ न रखने वाले कुछ मुस्लिम विद्वान
उन्हें संदेह की नज़र से भी देखते थे और उन्हें इस्लाम विरोधी क़रार देते थे।
रहस्यवादी भावना आध्यात्मिकता को जानने के लिए इन्सान को सदा प्रेरित करती है।
रहस्यवाद वस्तुतः वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार अव्यक्त अथवा अज्ञात को विषय बनाकर
उसके प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव व्यक्त किये जाते हैं। इसीलिए जिनकी समझ सिर्फ़ ज़ाहिरी
उसूलों (बाहरी सिद्धांतों) तक ही सीमित थी, उन्होंने उन्हें विधर्मी कहना शुरु कर दिया। चूंकि समाज में ऐसे ही लोगों की बहुतायत है और इन्हीं
का बोलबाला रहा है, इसलिए सूफ़ी गोपनीय
ढंग से ऐकांतिक जीवन व्यतीत करने लगे। उनके आध्यात्मिक अनुभवों की प्रकृति और
तत्कालीन धार्मिक-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम था! ईश्वर-प्रेम (इश्क-हकीकी)
और रहस्यमयी अवस्थाओं को सीधे शब्दों में व्यक्त करना असंभव होता है, इसी कारण उनकी
भाषा भी काफ़ी कूटपरक एवं अति रहस्यमयी होती गई। ईश्वर-प्रेम (इश्क-हकीकी) और रहस्यमयी अवस्थाओं
को सीधे शब्दों में व्यक्त करना असंभव होता है। अलौकिक ईश्वर और आत्मा के मिलन
(फना) की अनुभूति शब्दों से परे होती है। अतः उस अनिर्वचनीय रहस्य (ineffable mystery) को केवल रूपकों और कूटभाषा
के जरिए ही समझा जा सकता था। राजनीतिक और धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भी
कूटभाषा का सहारा लिया गया ताकि आम लोग समझ न सकें।
इस तरह सूफ़ी दर्शन अस्तित्व में आया तथा एक आंदोलन के रूप में उभरा। सूफ़ीमत के विकास के प्रथम चरण में सूफ़ी संतों में फ़क़ीर के रूप में जीवन
व्यतीत करने की प्रवृत्ति मुख्य थी। सूफ़ी साधक सांसारिक
भोग-विलास की वस्तुओं से अलग रहकर ग़रीबी में अपना जीवन
व्यतीत करते थे। इस काल में सूफ़ी मत का आधार
व्यक्तिगत था। सूफ़ी सन्त एकान्त में प्रायश्चित करते थे। उनमें
प्रेम साधना की भावना का अभाव था।
वास्तव में सूफ़ी दार्शनिक अपने लक्ष्य के प्रति बेहद सजग थे। उन्हें भान था कि
वे किसी नए धर्म को स्थापित नहीं कर रहे बल्कि एक नए आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर
रहे हैं। वे
इस बात के प्रति बहुत सजग थे कि लोगों में मानवीय गुणों की अभिवृद्धि के लिए
इस्लाम के दायरे में रहते हुए ही उन्हें सब कुछ करना है। उन्होंने अपने इस
लक्ष्य की सिद्धि के लिए क़ुरआन की नए ढंग से व्याख्या की और ऐसे अनेक आधारों को
पाया जिनसे उनके रहस्यपरक विश्वास को बल मिलता था। वास्तव में रहस्यवाद के बीज
क़ुरआन में पहले से ही मौज़ूद थे। क़ुरआन में दो तरह की आयतें पाई जाती हैं।
1. मोहकम आयतें (मुहकम = मोहकम
= दृढ़, मज़बूत, पक्का, पुख्ता) ये कुरान की वे स्पष्ट और निर्णायक आयतें हैं जिनका
अर्थ बिल्कुल सीधा और स्पष्ट होता है। इनके अर्थ में कोई संदेह या भ्रम नहीं होता। इन्हें कोई भी साधारण व्यक्ति
आसानी से समझ सकता है। ये कुरान की मूल नींव हैं। इनमें अधिकतर शरीअत के नियम, आज्ञाएं (जैसे नमाज, रोज़ा), निषेध (हराम और हलाल की बातें) शामिल हैं।
2. मुतशाबह आयतें (मुतशाबेह =
समान आकृतिवाला, मिलता-जुलता) ये वे प्रतीकात्मक या लाक्षणिक आयतें हैं जिनके एक
से अधिक अर्थ हो सकते हैं और जिनका वास्तविक ज्ञान केवल ईश्वर को ही है। ये छिपे
हुए अर्थ (ग़ैब) या परलोक की बातों से संबंधित होती हैं। इनका उद्देश्य मनुष्य की
बुद्धि का परीक्षण और आस्था को मज़बूत करना है।
इन आयतों का
स्पष्ट उल्लेख कुरआन के सूरह आले-इमरान (3:7) में किया गया
है। इस आयत के अनुसार, विद्वान और सच्चे आस्तिक मुतशाबेह आयतों पर बहस करने के बजाय उन पर ईमान लाते
हैं। इसके विपरीत, गलत इरादे वाले लोग फसाद (अशांति) फैलाने के लिए मुतशाबेह आयतों को अपने
मनमाने अर्थों में ढालने की कोशिश करते हैं। रूह से मुताल्लिक़ जितनी भी आयतें
क़ुरआन में पाई जाती हैं, वे सब मुतशाबह आयतें हैं। ऐसी आयतों की व्याख्या
में ‘फ़िक्ह’ के जानकारों ने हमेशा ही खुद को बेबस पाया है जबकि तरीक़तपंथी सूफ़ियों ने इन पर
खुलकर कलाम किया है। इस तरह क़ुरआन के एक ऐसे पक्ष को अच्छी तरह इन्होंने स्पष्ट कर
दिया जो हमेशा से ही एक रहस्य रहा। यही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द पूरा सूफीवाद
घूमता है।
पैग़म्बर हज़रत
मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन के अध्ययन
से यह ज्ञात होता है कि वे विरक्त होकर प्रायः गहन चिंतन में निमग्न हो जाया करते
थे। सूफ़ीमत के इतिहास से हमें इस बात की जानकारी मिलती है कि इसके विकास काल से ही
एकांतवास और पवित्र जीवन की भावना का इसमें समावेश हुआ। आरंभिक सूफ़ी ईश्वर-प्रेम
में मग्न रहते थे। सूफ़ियों ने हमेशा ऐसे नमाज़-रोज़े को इंसान के कल्याण के लिए नाकाफ़ी बताया जिसके
पीछे ईश-प्रेम न होकर दिखावा हो। इनकी बातों को आलिमों (विद्वानों) ने भी
स्वीकार किया क्योंकि इनकी धार्मिक व्याख्या हमेशा तर्क सम्मत
होती थी और एक समय आया जब बसरा महत्वपूर्ण सूफ़ी केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ।
ऐसे में दूर-दूर से सूफ़ी संत आकर यहां सत्संग करते तथा अपने रहस्यों की चर्चा करते थे।
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मनोज कुमार