गुरुवार, 10 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-4

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-4

सूफी मत (तसव्वुफ़) में जब एक साधक (सालिक) प्रेम-पथ की यात्रा करते हुए आध्यात्मिक विकास के विभिन्न चरणों और सात घाटियों को पार कर लेता है, तो आत्मा और परमात्मा के बीच का भ्रम या पर्दा हमेशा के लिए मिट जाता है। इस सर्वोच्च अवस्था को सूफी दर्शन में फ़ना और बक़ा कहा जाता है, जहाँ जीवात्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय हो जाता है। इस घाटी यात्रा को पूरा कर साधक इश्क़े हक़ीक़ी को प्राप्त हो जाता है। सूफ़ी साधक की इस यात्रा को सूफ़ी-साधना में शरीअत, तरीक़त, मारिफ़त और हक़ीक़त नाम से भी समझाया गया है। सभी सूफ़ी साधक इश्क़ के पोषक रहे हैं। इश्क़ को दो भागों में बांटा गया है। एक इश्क़े मज़ाज़ी और दूसरा इश्क़े हक़ीक़ी 

11.7 इश्क़े मजाज़ी

इश्क़े मजाज़ी को हम कृत्रिम इश्क़, असत्य इश्क़, कामुक प्रेम, सांसारिक, भौतिक या इंसानी प्रेम यानी किसी व्यक्ति से किया गया प्रेम या माया कह सकते हैं। यह वह प्रेम है जो एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति होता है, जैसे किसी पुरुष का स्त्री के प्रति या स्त्री का पुरुष के प्रति आकर्षण और गहरा लगाव। इसे 'अधूरा या नश्वर प्रेम' भी माना जाता है क्योंकि यह रूप, रंग और भौतिक शरीर से जुड़ा होता है, जो समय के साथ नष्ट हो जाता है।

'मजाज़ी' शब्द 'मिजाज़' से बना है, जिसका अर्थ है जो भ्रमकारी, भौतिक या बाहरी रूप से दिखाई दे। इसलिए, किसी इंसान के चेहरे, रूप-रंग और व्यवहार से होने वाला प्रेम इश्क-ए-मजाज़ी है। इसमें साधक या प्रेमी अपनी आंखों, कानों और दिल के जरिए किसी भौतिक स्वरूप (इन्सान) के आकर्षण में बंधता है। क्योंकि यह इंसानी रूप से जुड़ा होता है, इसलिए इसमें विरह, ईर्ष्या, शिकायतें और बदलाव शामिल होते हैं। सूफीमत में इसे केवल एक शारीरिक या सांसारिक भावना नहीं माना जाता, बल्कि इसे दैवीय प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) तक पहुँचने की पहली सीढ़ी या माध्यम स्वीकार किया गया है। यह वह सांसारिक प्रेम है, जो प्रियतम तक पहुंचने का साधन बनता है। सूफ़ी मानवीय प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं।

सूफी संतों का मानना है कि जो इंसान किसी हाड़-मांस के पुतले (इंसान) से बिना किसी शर्त के बेपनाह मोहब्बत नहीं कर सकता, वह उस निराकार और अनदेखे ईश्वर (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) से प्रेम कैसे कर पाएगा? जबतक मनुष्य सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता, उनके लिए आदर्श प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं। जब कोई व्यक्ति किसी अन्य इंसान से बेपनाह मोहब्बत करता है, तो वह उसके लिए अपनी खुशियों और अपने 'अहंकार' की कुर्बानी देना सीखता है। यही समर्पण आगे चलकर उसे परमात्मा के प्रति समर्पित होना सिखाता है। साधक सांसारिक सौंदर्य का आनन्द अवश्य ही उठाता है, लेकिन वह (साधक) वहीं नहीं रुक जाता, उसे इश्क़-ए-हक़ीक़ी तक की यात्रा पर आगे बढ़ना पड़ता है। साधक सांसारिक प्रेम के उद्दाम वेग को संयमित कर उसे आध्यात्मिक प्रेम में नियोजित करने की चेष्टा करता है। इश्क़-ए-मजाज़ी इंसान के भीतर के अहंकार को तोड़ता है। जब कोई किसी के प्रेम में पड़ता है, तो वह 'मैं' छोड़कर सामने वाले की खुशी चाहने लगता है। इस प्रेम में प्रेमी रोना, तड़पना, सब्र (धैर्य) रखना और खुद को मिटाना सीखता है। धीरे-धीरे, जब प्रेमी को यह अहसास होता है कि दुनिया का हर इंसान अधूरा और नश्वर है, तो उसका यह गहरा प्रेम इंसानी चेहरे से हटकर उस परम सत्ता (ईश्वर) की ओर मुड़ जाता है जिसने उस खूबसूरत चेहरे को बनाया है। सूफियों के अनुसार, इस दुनिया की हर खूबसूरत चीज़ या इंसान में उस खुदा (परमात्मा) का ही अक्स (परछाई) नज़र आता है। इसलिए, किसी इंसान की खूबसूरती या उसकी रूह से प्रेम करना, असल में खुदा की कारीगरी से प्रेम करना है। इसीलिए सूफी परंपरा में एक मशहूर कहावत है: "अल-मजाज कंतरातुल हकीकत" अर्थात 'सांसारिक प्रेम, वास्तविक (दैवीय) प्रेम तक पहुँचने का पुल है। मशहूर सूफी कथाएं जैसे लैला-मजनू, हीर-रांझा और सोहनी-महिवाल शुरुआत में इश्क-ए-मजाजी (इंसानी प्रेम) के उदाहरण हैं, लेकिन अंत तक आते-आते मजनू या रांझा का प्रेम इतना पवित्र हो जाता है कि उन्हें अपने प्रियतम में ही ईश्वर नजर आने लगता है।

बाबा बुल्ले शाह की पंक्तियाँ हैं,

"रांझा-रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई,

सद्दो नी मैनो धीदो-रांझा, हीर न आखो कोई।"

इसका अर्थ है रांझा का नाम जपते-जपते मैं खुद ही रांझा बन गई हूँ। अब मुझे कोई हीर न कहे, बल्कि मुझे रांझा ही कहकर पुकारे। हीर (आत्मा) रांझा (ईश्वर) के प्रेम में इस कदर खो चुकी है कि वह खुद को ही रांझा कहने लगी है।

मशहूर सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रति अमीर खुसरो का प्रेम इश्क़-ए-मजाज़ी (गुरु-शिष्य का भौतिक प्रेम) का चरम था, जो ईश्वर के प्रेम में बदल गया। जब निज़ामुद्दीन औलिया का निधन हुआ, तब खुसरो ने रोते हुए यह दोहा कहा था:

"गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस,

चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुं देस।"

इसका अर्थ है मेरा प्यारा (यहाँ गुरु के संदर्भ में) अपनी सेज पर चेहरे पर जुल्फें बिखराकर सो गया है (दुनिया छोड़ चुका है)। हे खुसरो! अब चारों तरफ अंधेरा छा गया है, तुम भी अपने असली घर (परमात्मा के पास) लौट चलो।

उर्दू के महान सूफी शायर मीर दर्द ने बताया है कि इस दुनिया की हर खूबसूरत चीज़ या इंसान में असल में उसी एक परमात्मा की झलक दिखाई देती है:

"जग में आकर इधर-उधर देखा,
तू ही आया नज़र जिधर देखा।"

इसका अर्थ है मैंने इस संसार में आकर जहाँ भी अपनी नज़र दौड़ाई (चाहे वह प्रकृति हो या कोई खूबसूरत इंसान), मुझे हर रूप में सिर्फ तेरी ही कारीगरी और तेरी ही झलक दिखाई दी।

इन सभी उदाहरणों में हम पाते हैं कि शुरुआत भले ही एक इंसान के रूप, उसके नाम या उसकी जुदाई के दर्द से होती है, लेकिन उसका अंत हमेशा आत्मा के परमात्मा से मिलन पर जाकर होता है। सूफ़ी अनन्त सौंदर्य का दर्शन करना चाहता है। अनन्त सौंदर्य तो परमात्मा की ही एक मात्र सत्ता है। वह परम सत्य और परम मंगल है। उसी की  प्रतिछवि के रूप में समस्त जगत और उसके प्राणी अभिव्यक्त हो रहे हैं, इसलिए सांसारिक सौंदर्य दर्शन उसी परम सत्ता के गुणों के सौंदर्य का दर्शन है। हज़रत जामी की एक कविता में कहा गया है, सांसारिक प्रेम से तुम मुख मत मोड़ो परम सत्य तक पहुँचाने में वह तुम्हारी मदद करेगा सांसारिक प्रेम-पथ का यात्री प्रिय पात्र की याद में अपने को खो देता है। उसके संसार में वही एकमात्र सत्य रह जाता है। जब उसे यह ज्ञान होता है कि जिसके लिए वह पागल बना हुआ है, उसका सौन्दर्य अनंत सौन्दर्य का प्रतिबिम्ब मात्र है, और जिस रूप पर वह लुभा हुआ है, वह क्षणभंगुर है, तब धीरे-धीरे उसका मोह कम हो जाता है, और वह उस परम प्रियतम का प्रेम पाने के लिए  व्याकुल हो उठता है। चूंकि वह इस सांसारिक प्रेम को पाने के लिए पहले से ही संसार की अन्य वस्तुओं का त्याग किए हुए रहता है, इसलिए उसे आध्यात्मिक प्रेम के रास्ते पर चलने के लिए किसी कठिनाई का अनुभव नहीं होता।

11.8 इश्क़े हक़ीक़ी

सूफी दर्शन में 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' का अर्थ है परम सत्य, निराकार ईश्वर या अल्लाह से किया जाने वाला सच्चा और सर्वोच्च प्रेम। 'हकीकी' शब्द 'हकीकत' से आया है, जिसका मतलब है वास्तविक या शाश्वत सत्य। इश्क़े-हक़ीक़ी ईश्वर का इश्क़ है। यह प्रेम का सत्य स्वरूप है। सूफ़ियों के लिए ईश-प्रेम ही मूल धर्म है। इसे सूफ़ी  इश्क़े हक़ीक़ी (वास्तविक प्रेम/आध्यात्मिक प्रेम) का नाम देते हैं। यह वह अवस्था है जहाँ इंसान का मन और आत्मा केवल अपने सृष्टिकर्ता यानी ईश्वर से जुड़ जाती है। इसमें कोई स्वार्थ नहीं होता और यह कभी खत्म नहीं होता। इश्क-ए-मजाज़ी (सांसारिक प्रेम) जहाँ इस मार्ग का शुरुआती पुल है, वहीं इश्क़े हक़ीक़ी इस यात्रा की अंतिम मंजिल और रूहानी पूर्णता है। इसमें साधक ईश्वर को किसी डर (जैसे नरक का भय) या लालच (जैसे स्वर्ग का लालच) के लिए नहीं पूजता, बल्कि केवल उसकी असीम सुंदरता और अस्तित्व से बेपनाह मोहब्बत करता है। यह वह प्रेम है जो किसी भौतिक रूप, चेहरे या सांसारिक वस्तु से परे होता है। इसमें प्रेमी (साधक या आशिक) अपने महबूब (ईश्वर या अल्लाह) के ध्यान में इस कदर खो जाता है कि उसे अपने अस्तित्व का भी होश नहीं रहता।

इसकी पहचान यह है कि प्रियतम ईश्वर का प्रेम प्रेमी में हर उस गुण के लिए लगाव पैदा करता है, जो प्रियतम को प्रिय हो, अतएव ऐसा प्रेम प्रेमी में विनम्रता पैदा करता है और वह हर उस वस्तु से भी प्रेम करना सीखता है जिसमें वास्तविक प्रियतम प्रतिबिम्बित होता है। उर्दू के महान शायर अमीर मीनाई ने लिखा है,

आशिक़ों को इम्तियाज़े दैरो क़ाबा कुछ नहीं।

उसका नक़्शे पा जहाँ देखा वहीं सर पर रख दिया।।

इस शेर का सरल और गहरा अर्थ सच्ची मोहब्बत (इश्क़) की पराकाष्ठा को दर्शाता है। सच्चे प्रेमियों (आशिक़ों) के लिए मंदिर (दैर) और मस्जिद या काबा (क़ाबा) में कोई अंतर या भेद (इम्तियाज़) नहीं होता। उनके लिए धर्म, जाति या इबादतगाहों की सीमाएं मायने नहीं रखतीं। उन्हें तो बस अपने महबूब (प्रियतम या ईश्वर) के पैरों के निशान (नक़्शे पा) दिखने चाहिए। वे निशान जहाँ भी दिखते हैं, आशिक़ अपना सिर श्रद्धा और सम्मान से वहीं झुका देते हैं। सूफ़ीवाद और शायरी के संदर्भ में यहाँ 'महबूब' का अर्थ ईश्वर (खुदा) से भी है। शायर कहना चाहते हैं कि जो लोग ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, वे मंदिर-मस्जिद के चक्कर में नहीं पड़ते। उन्हें पूरी कायनात (सृष्टि) में जहाँ भी ईश्वर की सत्ता या उसकी सुंदरता का अहसास होता है, वे वहीं सजदा कर लेते हैं। उनके लिए प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।

सूफ़ी उपासना में प्रेम ही मूल मन्त्र है। उस प्रेम की प्राप्ति के लिये हृदय को शुद्ध बनाना पड़ता है। तौबा से शुरुआत होती है। इसमें इंसान का 'मैं' या अहंकार पूरी तरह मिट जाता है और केवल ईश्वर ही शेष रहता है। यह प्रेम किसी सांसारिक इच्छा या बदले की भावना से मुक्त होता है। यह प्रेम किसी नश्वर इंसान या वस्तु से नहीं होता, इसलिए यह समय और सीमाओं से परे है। यह कभी खत्म नहीं होता। इसमें खुदा से कोई सांसारिक मांग नहीं होती। सूफी संत राबिया अल-अदविया का एक प्रसिद्ध कथन है: "हे खुदा! अगर मैं नरक के डर से तेरी इबादत करूँ तो मुझे नरक में जला दे, और अगर स्वर्ग की चाह में करूँ तो मुझे स्वर्ग से महरूम कर दे। मैं तो बस तेरी जात (अस्तित्व) के लिए तुझसे मोहब्बत करती हूँ।" साधक अपनी मर्जी, इच्छा और बुद्धि को पूरी तरह से ईश्वर की इच्छा के हवाले (तवक्कुल/ पूर्ण आत्मसमर्पण) कर देता है। सूफीमत में आत्मा को 'प्रेमिका' और परमात्मा को 'प्रियतम' (माशूक) माना गया है। आत्मा सांसारिक जीवन में अपने प्रियतम से अलग है, इसलिए इश्क-ए-हकीकी में इस अलगाव की गहरी तड़प और मिलन की तीव्र व्याकुलता होती है। अमीर खुसरो गाते हैं,

"छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके...

प्रेम भटी का मदवा पिलाइके,

मतवारी कर दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।",

अमीर खुसरो द्वारा रचित यह प्रसिद्ध कलाम उनके आध्यात्मिक गुरु हज़रत निजामुद्दीन औलिया के प्रति अगाध प्रेम और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। इस पंक्ति का मूल भाव अहंकार का विसर्जन और ईश्वरीय प्रेम में पूरी तरह से मदहोश हो जाना है। जहाँ 'छाप तिलक' बाहरी पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा के नष्ट होने का प्रतीक है, वहीं 'प्रेम भटी का मदवा' गुरु की कृपा से मिलने वाली भक्ति की उस मदिरा को दर्शाता है जो भक्त को दुनिया से बेखबर कर देती है। यहाँ 'नैन मिलाना' ईश्वर के साक्षात्कार को दर्शाता है, जिसके बाद साधक का अपना अहंकार, नाम, पहचान (तिलक/धार्मिक प्रतीक) सब कुछ मिट जाता है और वह पूरी तरह ईश्वर के रंग में रंग जाता है।

या जब बाबा बुल्ले शाह कहते हैं, "रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई", तब वे इंसानी प्रेम के शब्दों का उपयोग करके वास्तव में इश्क-ए-हकीकी को ही व्यक्त कर रहे होते हैं। यहाँ आँखें मिलाने या एक हो जाने का अर्थ स्वयं के अहंकार को मिटाकर ईश्वर में विलीन (फ़ना) हो जाना है। नुसरत फतेह अली खान की प्रसिद्ध कव्वाली, जिसे मूल रूप से मशहूर शायर अनवर फ़्रुख़ाबादी ने लिखा था, "हल्का हल्का सुरूर है, ये तेरी नजर का कसूर है, कि शराब पीना सिखा दिया"यहाँ सुरूर (नशा) ईश्वर के नूर (प्रकाश) को देखकर होने वाली आत्मिक मस्ती है। सूफ़ीवाद के चश्मे से देखने पर इसका अर्थ परमेश्वर (ईश्वर/अल्लाह) के प्रति आत्मा के असीम प्रेम और समर्पण में बदल जाता है। यहाँ 'तेरी नज़र' (महबूब की आँखें) का मतलब ईश्वर की कृपा (रहमत) या गुरु (मुर्शिद) की आध्यात्मिक दृष्टि है। सूफ़ियों का मानना है कि जब ईश्वर या गुरु अपने भक्त पर कृपा दृष्टि डालते हैं, तो भक्त के भीतर की दुनिया पूरी तरह बदल जाती है। वह सांसारिक मोह-माया से मुक्त होने लगता है। "हल्का हल्का सुरूर" साधारण अर्थ है हल्का सा नशा या खुमारी। सूफीमत के अनुसार यह वह आध्यात्मिक आनंद (वज्द) है जो ईश्वर के ध्यान या इबादत से मिलता है। यह कोई भौतिक नशा नहीं है, बल्कि ईश्वर के प्रेम में आत्मा को मिलने वाला परम सुकून और आनंद है, जो भक्त को धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में ले लेता है। "शराब पीना सिखा दिया" का साधारण अर्थ है मदिरापान करना। सूफ़ी मत में 'शराब' अंगूर का रस नहीं, बल्कि 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वरीय प्रेम) की मदिरा है। 'शराब पीना सिखा दिया' का अर्थ है कि ईश्वर की उस एक दिव्य नज़र ने भक्त को अपने प्रेम के ऐसे गहरे नशे में डुबो दिया है कि अब उसे दुनिया की किसी और चीज़ की परवाह या होश नहीं रहा। वह पूरी तरह ईश्वर के रंग में रंग चुका है। इस कव्वाली का मूल संदेश यह है कि जब किसी इंसान को ईश्वर के प्रेम का असली स्वाद (सुरूर) मिल जाता है, तो वह सांसारिक बंधनों और होश-ओ-हवास से परे हो जाता है। यह पंक्ति भक्त की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ वह ईश्वर की महत्ता और उसकी कृपा के सामने खुद को पूरी तरह समर्पित कर देता है।

महान सूफी संतों और कवियों के दर्शन में 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (दैवीय प्रेम) केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवंत अनुभव था जिसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। 10वीं सदी के महान सूफी संत मंसूर अल-हल्लाज का दैवीय प्रेम इतना उग्र और चरम पर था कि उन्होंने प्रेमी और प्रियतम के बीच की हर दूरी को मिटा दिया। मंसूर का मानना था कि जब इश्क़-ए-हक़ीक़ी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तो इंसान का अपना अहंकार और अस्तित्व पूरी तरह मिट जाता है। फिर जो बचता है, वह केवल ईश्वर होता है। इसलिए, जब वे 'अनलहक' कह रहे थे, तो वह मंसूर का अहंकार नहीं, बल्कि उनके भीतर बोल रहा साक्षात ईश्वर था। तत्कालीन कट्टरपंथियों ने इसे ईश-निंदा (Blasphemy) माना। उन्हें जेल में डाला गया, कोड़े मारे गए और अंततः क्रूरता से फांसी दे दी गई। लेकिन फांसी के तख्ते पर भी मंसूर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा था, "मेरे हाथ-पैर काट देने से तुम मुझे ईश्वर से अलग नहीं कर सकते, क्योंकि मैं उस परम प्रियतम के प्रेम में फना हो चुका हूँ।" मंसूर के लिए प्रेम का मतलब है पूर्ण रूप से मिट जाना (फ़ना)। उनके अनुसार, सच्चा प्रेमी वही है जो सूली पर चढ़ने के लिए हमेशा तैयार रहे।

13वीं सदी के विश्व प्रसिद्ध सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी का दैवीय प्रेम उत्सव, संगीत, शायरी और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से ओत-प्रोत था। रूमी एक पारंपरिक इस्लामिक विद्वान थे, लेकिन जब उनकी मुलाकात फकीर शम्स तबरेजी से हुई, तो वे पूरी तरह बदल गए और प्रेम के महासागर में डूब गए। शम्स तबरेजी के अचानक गायब हो जाने के बाद, रूमी विरह के असीम दर्द से गुजरे। इसी दर्द से उनकी महान रचना 'मसनवी' का जन्म हुआ। रूमी ने लिखा कि इंसान की आत्मा उस बांसुरी (नेय) की तरह है जिसे उसके मूल स्थान (बांस के जंगल यानी ईश्वर) से काट दिया गया है। इसलिए बांसुरी से निकलने वाली हर धुन वास्तव में अपने मूल घर लौटने का विलाप और तड़प है। रूमी के अनुसार, यह पूरी सृष्टि प्रेम की शक्ति से ही चल रही है। सूर्य, पृथ्वी, सितारे—सब ईश्वर के प्रेम में घूम रहे हैं। इसी विचार से सूफियों के प्रसिद्ध 'दरवेश नृत्य' (Whirling Dervishes) की शुरुआत हुई, जिसमें एक हाथ आकाश की ओर (ईश्वर से कृपा लेने) और एक हाथ धरती की ओर (संसार को प्रेम बांटने) करके गोल-गोल घूमा जाता है। रूमी कहते हैं, "बुद्धि और तर्क ईश्वर के घर तक ले जाने में असमर्थ हैं। वहाँ केवल प्रेम के पंखों से ही उड़ा जा सकता है।" रूमी यहाँ बुद्धि और प्रेम (Divine Love) के बीच के बुनियादी अंतर को समझा रहे हैं। बुद्धि और तर्क का काम है चीज़ों को मापना, तौलना और उनके पीछे के कारण को खोजना। बुद्धि केवल उसी चीज़ को सच मानती है जिसे वह देख, छू या साबित कर सकती है। लेकिन ईश्वर या परम सत्य असीम है, और एक सीमित इंसानी दिमाग कभी भी उस असीम सत्ता को पूरी तरह नहीं समझ सकता। तर्क आपको ईश्वर के दरवाजे (खोज) तक तो ला सकता है, लेकिन उसके भीतर प्रवेश नहीं करा सकता। रूमी कहते हैं कि ईश्वर को 'सोच' कर नहीं, बल्कि 'महसूस' करके पाया जा सकता है। प्रेम में कोई हिसाब-किताब नहीं होता। जब कोई भक्त ईश्वर से प्रेम करता है, तो वह अपने अहंकार को पूरी तरह मिटा देता है। सूफ़ी मत में इसे 'फ़ना' (खुद को मिटा देना) कहते हैं। जब तक 'मैं' (तर्क करने वाला अहंकार) ज़िंदा है, तब तक 'वह' (ईश्वर) नहीं मिल सकता। प्रेम के पंख व्यक्ति को उस अहंकार से ऊपर उठा देते हैं। तर्क उस व्यक्ति की तरह है जो किनारे पर खड़े होकर नदी की गहराई नाप रहा है और तैरने के नियम सीख रहा है। जबकि प्रेम उस आशिक़ की तरह है जो बिना सोचे-समझे नदी में कूद जाता है। ईश्वर को जानने के लिए उस दिव्य प्रेम के सागर में डूबना पड़ता है, किनारे पर बैठकर बहस करने से कुछ हासिल नहीं होता। रूमी का यह कथन याद दिलाता है कि जीवन में सब कुछ दिमाग से तय नहीं होता; कुछ चीज़ों के लिए दिल का खुला होना भी ज़रूरी है। बुद्धि केवल रास्ते का नक्शा दे सकती है, लेकिन उस रास्ते पर चलने और मंज़िल को पा लेने का हौसला और पंख केवल इश्क़ (प्रेम) ही दे सकता है।

रूमी का एक बहुत प्रसिद्ध उद्धरण है: "तुम्हारा काम प्रेम की खोज करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर उन सभी बाधाओं को खोजना और नष्ट करना है जो तुमने प्रेम के रास्ते में खड़ी कर रखी हैं।"

मौलाना जलालुद्दीन रूमी का यह उद्धरण आत्म-खोज और आध्यात्मिक मनोविज्ञान का एक बेजोड़ रत्न है। यह हमारे सोचने के पूरे नजरिए को ही बदल देता है। आमतौर पर हम प्रेम (चाहे वह ईश्वरीय प्रेम हो या मानवीय प्रेम) को बाहर ढूंढते हैं, लेकिन रूमी कहते हैं कि प्रेम कहीं बाहर खोया ही नहीं है, वह तो पहले से ही हमारे भीतर मौजूद है। समस्या प्रेम की कमी नहीं, बल्कि हमारे भीतर की वे रुकावटें हैं जो उसे खुलकर बहने नहीं देतीं। रूमी के अनुसार, हमारी आत्मा का असली रूप ही प्रेम और आनंद है। एक नवजात शिशु को देखिए—उसके भीतर कोई नफ़रत या पूर्वाग्रह नहीं होता, वह शुद्ध प्रेम होता है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, दुनिया के कड़वे अनुभवों, चोटों और सामाजिक कंडीशनिंग के कारण हम अपने दिल के चारों ओर एक सुरक्षात्मक दीवार खड़ी कर लेते हैं। रूमी का कहना है कि हमें प्रेम को नया पैदा करने की ज़रूरत नहीं है, बस उस मलबे को हटाना है जिसने इस झरने को ढक रखा है। रूमी जिन बाधाओं या दीवारों को नष्ट करने की बात करते हैं, वे हमारे अपने ही विचार और विकार हैं: जैसे अहंकार: 'मैं सबसे बेहतर हूँ' या 'मेरी बात ही सही है' का भाव। भय और असुरक्षा: दोबारा चोट खाने का डर, जो हमें दूसरों पर भरोसा करने और दिल खोलने से रोकता है। निर्णय और पूर्वाग्रह: लोगों को श्रेणियों में बांटना और उनसे बिना शर्त न जुड़ पाना। अतीत के घाव: पुरानी कड़वाहट और शिकायतें, जिन्हें हम पकड़कर बैठे रहते हैं। यह उद्धरण हमें जिम्मेदारी लेना सिखाता है। जब हम कहते हैं कि "मुझे कोई प्यार नहीं करता" या "दुनिया में प्यार नहीं बचा," तब हम बाहर दोष मढ़ रहे होते हैं। रूमी कहते हैं कि मुड़कर अपने भीतर देखो। अपने गुस्से, अपनी ईर्ष्या और अपनी असुरक्षा का सामना करो। इन बाधाओं को पहचानना और इन्हें सजगता से नष्ट करना ही वास्तविक साधना है। सूफी दर्शन में माना जाता है कि ईश्वर (जो कि परम प्रेम है) इंसान के दिल में बसता है। लेकिन इंसान का दिल दुनियादारी के मेल और अहंकार से भरा हुआ है। जब एक साधक अपने भीतर के इस 'अंधेरे' और 'विकारों' को साफ करता है (जिसकी प्रक्रिया को सूफी मत में तज़किया-ए-नफ़्स या आत्म-शुद्धि कहते हैं), तो ईश्वर का प्रेम स्वतः ही उसके भीतर चमकने लगता है। दीपक को जलने के लिए रोशनी कहीं बाहर से नहीं लानी पड़ती, बस उसकी चिमनी पर जमी कालिख को साफ करना होता है। रूमी हमसे उसी कालिख को साफ करने के लिए कह रहे हैं।

जहाँ मंसूर अल-हल्लाज इश्क-ए-हकीकी की उस आग की तरह हैं जो प्रेमी को जलाकर भस्म कर देती है, वहीं रूमी उस दिव्य प्रकाश की तरह हैं जो पूरी दुनिया को प्रेम के संगीत से सराबोर कर देता है। मंसूर का इश्क़ एक ज्वालामुखी की तरह था, जिसमें केवल पूर्ण आहुति की गुंजाइश थी। जब मंसूर अल-हल्लाज इश्क़-ए-हक़ीक़ी की चरम सीमा पर पहुँचे, तो उनका अपना अस्तित्व पूरी तरह मिट गया। वे उस आग में जलकर भस्म हो गए जहाँ आत्मा और परमात्मा का भेद ही खत्म हो गया। उनका प्रेम यह मांग करता था कि 'मैं' (Ego) का नामोनिशान भी न बचे। सूफ़ियों के अनुसार, मंसूर ने साबित किया कि सच्चे प्रेम की अंतिम परिणति अपने महबूब में विलीन (फ़ना) हो जाना है, चाहे उसके लिए सूली पर ही क्यों न चढ़ना पड़े। वे इश्क़ की उस असहनीय तीव्रता के प्रतीक हैं जो प्रेमी को ज़िंदा नहीं छोड़ती, उसे राख कर देती है। रूमी भी उसी इश्क़ की आग से गुज़रे (विशेषकर शम्स तबरेज़ी के जाने के बाद), लेकिन वे उस आग में भस्म होने के बजाय एक दिव्य प्रकाश और ब्रह्मांडीय संगीत में बदल गए। रूमी का इश्क़ केवल एकांत की तड़प नहीं था, वह एक उत्सव बन गया। उन्होंने अपने दर्द और विरह को 'समा' (Whirling Dervishes का सूफी नृत्य) और शायरी के संगीत में ढाल दिया। रूमी ने ईश्वर के प्रेम को एक ऐसी भाषा दी जिसने केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि सदियों से पूरी दुनिया को सुकून पहुँचाया है। जहाँ मंसूर का प्रेम अंदर की ओर सिमटकर आत्मा को जला देता है, वहीं रूमी का प्रेम बाहर की ओर बहकर पूरी मानवता को गले लगाता है। वे उस दीपक की तरह हैं जो खुद जलकर पूरे कमरे को रोशन कर देता है। सूफ़ी मत में इन दोनों को गलत या सही नहीं माना जाता, बल्कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मंसूर इश्क़ की उस अवस्था (हाल) के प्रतीक हैं जहाँ होश पूरी तरह खो जाता है और प्रेमी महबूब की सत्ता में विलीन हो जाता है। रूमी इश्क़ की उस परिपक्व अवस्था (मकाम) के प्रतीक हैं जहाँ परमात्मा से मिला ज्ञान और प्रेम, संसार के कल्याण के लिए करुणा, शायरी और संगीत बनकर बहने लगता है। मंसूर जहाँ प्रेमी को मिटाने वाली आग हैं, वहीं रूमी संसार को राह दिखाने वाला प्रकाश और संगीत हैं। इश्क़-ए-हक़ीक़ी के ये दोनों अलग-अलग रंग (मंसूर की दीवानगी या रूमी का संगीत) इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) की अपनी चरम सीमाओं पर हैं और दोनों का अपना एक अनूठा सम्मोहन है। यदि मानव चेतना और दुनिया की ज़रूरत के लिहाज़ से देखा जाए, तो रूमी का संगीत और उनका प्रकाश लोगों को अधिक आकर्षित करता है, क्योंकि वह समाज को जोड़ता है, घावों को भरता है और जीवन को एक उत्सव (समा) बनाता है। वहीं मंसूर की दीवानगी एक ऐसी तीक्ष्ण बिजली है, जिसे सह पाना हर किसी के बस की बात नहीं। मंसूर का रास्ता अध्यात्म का शिखर है, तो रूमी का रास्ता अध्यात्म की बहती हुई पावन नदी है।

***  ***  ***

 

मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर