राष्ट्रीय आन्दोलन
476. बंगाल का दौरा
1947
जब गांधीजी को बंगाल के उपद्रवों की
सूचना मिली, उन्होंने अपना सारा कार्यक्रम रद्द कर दिया और दंगा
ग्रस्त क्षेत्रों में जाने का निश्चय किया। गांधीजी मई 1947 के दूसरे हफ्ते में कलकत्ता आ गये थे। रास्ते में
पटना स्टेशन पर बिहार के मंत्री उनसे मिलने आए। सीटी बजने ही वाली थी। लेकिन,
उनकी
बात अभी पूरी नहीं हुई थी। स्टेशन मास्टर दुविधा में पड़ गया। हिचकिचाते हुए वह आया और गांधीजी
से पूछा – बापू सिगनल दे दें? गांधीजी ने उसे
चौंकाते हुए जवाब दिया, "आप किसी दूसरे
यात्री के पास आदेश लेने तो नहीं जाते।" "तो फिर यह
अपवाद क्यों? आपको अपना कर्तव्य निभाना चाहिए और मंत्रियों से डरना नहीं
चाहिए। इससे आपका और उनका, दोनों का ही भला
होगा। उन्हें नियमों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, वरना लोकतंत्र
बिखर जाएगा। मंत्री के लिए यात्री परेशान नहीं होने चाहिए।" आदरपूर्वक झुकते हुए, जब वे विदा ले
रहे थे, तो स्टेशन मास्टर ने हिम्मत करके कहा: "अपनी 44
साल की
नौकरी के दौरान, यह मेरा पहला अनुभव है कि किसी ने अपने निजी उदाहरण से,
कर्तव्य-पालन
में निडरता का ऐसा ज़बरदस्त सबक हमें दिया हो। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि हम
आपको 'राष्ट्रपिता' कहते हैं।" संकेत दिया गया। ट्रेन गांधीजी को कलकत्ता की ओर ले चली।
उन्होंने देखा
कि पूर्वी बंगाल के गांवों में भय, घृणा और हिंसा
का बोलबाला था। गांव-गांव में जाकर उन्होंने लोगों की दशा अपने आंखों से देखी।
गांधीजी ने इस बात की कोशिश की कि लोग शांति स्थापना को, राजनीति से अलग कर, शुद्ध मानवता का प्रश्न समझें। उन्होंने आग्रह
किया कि भारत का भावी नक्शा चाहे जो भी हो, सभी राजनीतिक दलों में इस बात पर पूर्ण सहमति
होनी चाहिए कि सभ्य जीवन के मानदण्डों की अवहेलना नहीं होगी।
जिस वक्त गांधी नोआखली में सांप्रदायिक सद्भाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, उस समय उनके आसपास रहने वाले तमाम बड़े राजनीतिक चेहरे दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन
के साथ बैठकर भारत की आजादी को अंजाम देने में लगे थे। गांधीजी जब तक दिल्ली लौटते
हैं, माउंटबेटन ने आजादी के
साथ-साथ देश के बंटवारे की सारी गोटियां बैठा दी थीं।
काश कि कांग्रेस के वरिष्ठ
नेताओं ने गांधीजी की तरह ही दृढ़ निश्चय दिखाया होता। लेकिन वे उतना दृढ़ नैतिक रवैया
नहीं अपना सके। नतीज़ा यह हुआ कि उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकती गई। माउंटबेटन से
तो इस तरह कि आशा रखना ही व्यर्थ था। 7 मई को गांधीजी दिल्ली से कलकत्ता के लिए चले गए। बादशाह ख़ान उन्हें रेलवे स्टेशन
पर विदा करने आए। गफ़्फ़ार खान ने रेलवे स्टेशन पर उन्हें विदा किया। दुखी मन से
उन्होंने कहा: “मैं आपका सिपाही हूँ। आपका वचन मेरे लिए कानून है। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। मैं
किसी और सहारे की ओर नहीं देखता।” बादशाह ख़ान ने कहा था,
“थोड़े ही दिनों में हम हिन्दुस्तान में पराये हो जाएंगे। हमारी आज़ादी की लम्बी लड़ाई
का अन्त यह होगा कि हम पाकिस्तान के मातहत हो जाएंगे – बापू से, भारत से और आप सब से
दूर हो जाएंगे। कौन जानता है भविष्य में हमारा क्या होगा?” गांधीजी ने जब बात सुनी
तो बोल पड़े, “सचमुच बादशाह ख़ान फ़क़ीर हैं। स्वाधीनता आएगी, लेकिन बहादुर पठानों की आज़ादी चली
जाएगी। उनके सामने भयंकर भविष्य है।”
कलकत्ता जाने के रास्ते
में गांधीजी ने माउंटबेटन के नाम 8 मई को पत्र लिखा। उसमें उन्होंने लिखा था, अंग्रेज़ों के लिए किसी भी तरह भारत
के विभाजन का समर्थन करना प्रथम श्रेणी की ग़लती होगी। विभाजन होना ही हो, तो वह ब्रिटिश
लोगों के चले जाने के बाद हो और दोनों दलों के आपसी समझौते से हो। इस बीच अंतरिम सरकार
या तो कांग्रेस की बने या लीग की। आज की तरह दोहरा नियंत्रण, जिसमें सहयोगी कार्य और
सहयोग की भावना का अभाव है, देश के लिए हानिकारक है। दोनों पक्ष अपने पद को बनाए रखने
और आपको ख़ुश करने के प्रयत्न में अपनी सारी शक्ति ख़र्च कर देते हैं। सीमाप्रांत में
जनमत-संग्रह अपने आप में ख़तरनाक चीज़ है। पंजाब और बंगाल का विभाजन हर हालत में ग़लत
है। ये और दूसरे सारे परिवर्तन अंग्रेज़ों के भारत से हट जाने के बाद हो सकते हैं, पहले
नहीं। जब तक ब्रिटिश सत्ता भारत में काम कर रही है, तब तक देश में शांति बनाए रखने
की मुख्य जिम्मेदारी उसकी मानी जानी चाहिए। अगर आपको अपने पीछे अव्यवस्था और अराजकता
की विरासत छोड़ कर नहीं जाना है, तो आपको अपना चुनाव कर लेना होगा और सारे भारत की सरकार
एक दल को सौंप देनी होगी। सार्वभौम सत्ता का हस्तांतरण न हो सकने का सिद्धांत दुष्टतापूर्ण
है। माउंटबेटन ने गांधीजी का दिखाया मार्ग नहीं अपनाया। वह ख़ुद को सम्राट का जिम्मेदार
सेवक के नाते एक आसान और सुरक्षित दिखाई देते हल की ओर बढ़ा।
पाकिस्तान हासिल करने
के लिए, बंगाल को पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच बाँटना
ज़रूरी था। अगर वे बंगाल के मुसलमानों को इस तरह के बँटवारे के दर्दनाक नतीजों से
अवगत करा पाते और बंगाल के बँटवारे के पक्ष में हिंदुओं की बढ़ती भावना को रोक
पाते, तो शायद वे पाकिस्तान बनने से रोक सकते थे। 8 मई की शाम में गांधीजी कलकता पहुंचे। वह दस दिन कलकत्ता में रहे। 'जब शीर्ष पर सब कुछ गलत हो रहा हो,' गांधी ने कलकत्ता में पूछा, 'तो क्या निचले स्तर के
लोगों की अच्छाई उस नुकसानदेह प्रभाव के विरुद्ध स्वयं को स्थापित कर सकती है?' यही उनकी आशा थी। उन्होंने तर्क दिया कि बंगाल की एक ही संस्कृति और एक ही
भाषा है। इसे एकजुट रहने दिया जाए। लॉर्ड कर्ज़न द्वारा बंगाल का विभाजन किए जाने
के बाद उन्होंने उसे फिर से एकजुट किया था; तो क्या वे जिन्ना
द्वारा उसका विभाजन किए जाने से पहले उन्हें रोक नहीं सकते थे?
कलकत्ता पहुंचकर गांधीजी
सोदपुर आश्रम में ठहरे। सोदपुर आश्रम कलकत्ता
से पूरे दस मील की दूरी पर था। शहर में कर्फ्यू लागू था। संयोग से, उस दिन रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती थी। गांधीजी ने
अपने प्रार्थना-भाषण में कवि को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की: "महान लोग
कभी नहीं मरते। हमारे देश ने संतों, द्रष्टाओं और ऋषियों
की एक शानदार श्रृंखला को जन्म दिया है। उनकी उच्च शिक्षाएँ हमारी गौरवशाली विरासत
हैं। यदि हम उनकी शिक्षाओं के अनुरूप जीवन जिएँ, तो भारत दुनिया में 'शांति की भूमि' के रूप में प्रसिद्ध हो जाएगा।"
9 मई, 1947 को सोदपुर में अपने
संबोधन में गांधीजी ने कहा कि उन्हें कलकत्ता आने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन जब उन्हें दोस्तों से कलकत्ता की घटनाओं के बारे में रिपोर्ट मिलीं, तो उन्हें लगा कि उन्हें वहाँ जाना चाहिए। वे जानते थे कि क़ायद-ए-आज़म जिन्ना
भी अहिंसा से जुड़े उस दस्तावेज़ के सह-हस्ताक्षरकर्ता थे, जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे। इस बात ने उन पर तुरंत यह कर्तव्य डाल दिया
कि यदि हिंदू या मुसलमान, दोनों में से कोई भी
बर्बर या जानवरों के स्तर तक गिर जाए, तो वे आमरण अनशन करें। बिहार के हिंदुओं और नोआखली के मुसलमानों को यह बात याद
रखनी चाहिए।
लोगों से शांति और सौहार्द्र की अपील करते हुए उन्होंने कहा, “बिहार के हिन्दुओं और नोआखाली के मुसलमानों को याद रखना चाहिए कि यदि भविष्य में उन्होंने पागलपन किया, तो उन्हें मेरे आमरण अनशन का सामना करना पड़ेगा।” उन दिनों बंगाल में बृहद बंगाल की मांग ज़ोरों पर थी। सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई
शरतचंद्र बोस ने बंगाल विभाजन के मसले पर केन्द्रीय सरकार से इस्तीफ़ा दे दिया था। वे
बंगाल विभाजन को रोकना चाहते थे। उनकी मंशा थी कि बिहार के बंगभाषी ज़िलों को जोड़कर
बृहद बंगाल का निर्माण होना चाहिए। इसमें सुहरावर्दी भी उनका साथ दे रहा था। शरतचन्द्र बोस गांधीजी से मिलने आए। उन्होंने बंगाल विभाजन का विरोध करते हुए कहा, “समान भाषा, समान संस्कृति और समान इतिहास बंगाल के हिन्दुओं और मुसलमानों को मिलाने वाला आधार है। बंगाली चाहे हिन्दू हो या मुसलमान वह बंगाली ही है। दोनों को 1000 मील दूर से पाकिस्तानियों द्वारा शासित होने के बारे
में एक-सी घृणा है।” गांधीजी को यह प्रस्ताव
पसंद आया।
बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी
एक ‘नवीन बंगाल’ का निर्माण चाहता, जिसमें बिहार के कुछ भाग शामिल थे, जहां बंगाली
भाषी लोग रहते थे। 12 मई को, गांधीजी ने उसे सलाह दी
कि वह हो चुके दंगों का उत्तरदायित्व लेते हुए पश्चाताप करे और जहां कहीं भी दंगा हो
रहा है वहां जाकर शरारती तत्त्वों को रोके जिससे बंगाल के हिन्दुओं में उसके प्रति
विश्वास जगे। उन्होंने बिहार के हिन्दुओं को भी सलाह दी कि वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार
करे और उसके लिए पश्चाताप करे। उन्होंने सुहरावर्दी से कहा, आप हिंदू बहुमत को शब्दों
से ही नहीं आचरण से भी प्रसन्न कीजिए तो सारे देश का भला होगा। जैसे मैं मुसलमानों
को आशान्वित करता हूं, वैसे ही आप नोआखाली के हिंदुओं को विश्वास दिलाइए तो मैं आपके
साथ कलकत्ता में घूम-घूम कर हिंदुओं को बृहद बंगाल के लिए समझाऊंगा। सुहरावर्दी ने
कहा, “कोई हिन्दू मुझ पर भरोसा नहीं करता, धीरज से मेरी बात भी नहीं सुनी जाती। तब मैं
अपनी सच्चाई का विश्वास उन्हें कैसे दिलाऊं?” उत्तर में गांधीजी ने
कहा, “यदि आप बंगाल के हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अहिंसक उपायों द्वारा सदा अखंड बनाए
रखना चाहते हों, तो मैं आपका अवैतनिक निजी सचिव बनकर उस समय तक आपके ही घर में रहने
को तैयार हूं, जब तक हिन्दू और मुसलमान भाई-भाई की तरह न रहने लगे।” यह सुनकर सुहरवर्दी क्रोधित
हो गया। उसने कहा, कलकत्ता में अमन-चैन है और सारे दंगे-फ़साद की जड़ गांधी ही है। कैसा
पागल प्रस्ताव है। दस बार सोचने पर भी मुझे इस बुढ़ऊ के इरादे समझ में नहीं आने वाले।
कलकत्ता में गांधीजी से सबने शिकायत की। कोई बंगाल के दो हिस्से स्वीकारने में उन्हें दोष देता
था तो कोई मुस्लिम लीग को छूट देने के लिए। गांधीजी भी बहुत दुखी थे। कहते - मेरी भी अब न नेता सुनते हैं और न जनता। इस दौरान
उन्होंने सबकी खबर ली। ईसाई धर्म गुरुओं को लालच से धर्मांतरण पर लताडा और कम्युनिस्टों को भारत में रूस की नकल करने के लिए। गांधीजी मानते थे कि भारत की गरीबी खादी और ग्रामोधोग से मिटेगी।
गांधीजी आजादी के बाद नए भारत के लिए कुछ ऐसा ही सपना दख रहे थे।
13 मई को हिन्दू महासभा के नेता डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी गांधीजी से मिलने आए। डॉ.
श्यामाप्रसाद मुखर्जी बृहद बंगाल प्रस्ताव के कट्टर विरोधी थे। उनके अनुसार यह प्रस्ताव
जूट-मिल वाले रईसों के दिमाग की उपज थी। जूट मिलें पश्चिम बंगाल में थे, जबकि उनका
उत्पादन पूर्वी बंगाल में होता था। विभाजन से इसके व्यापार पर असर पड़ता। उन्होंने गांधीजी
से कहा, “अखंड भारत में भी बंगाल के विभाजन की मांग थी। सर्व सत्ताधारी बंगाल का आंदोलन
यूरोपियन स्थापित स्वार्थों की प्रेरणा से हो रहा है।” गांधीजी ने पूछा, “तो आपकी आपत्ति इस आंदोलन
के जन्म के कारण है?” डॉ. मुखर्जी ने कहा, “अगर सर्व सत्ताधारी बंगाल
राज्य बनने दिया जाएगा, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि सुहरावर्दी विधान-सभा में
उपलब्ध मुसलिम बहुमत के बल पर बाद में उसे पाकिस्तान में मिलाने के लिए चालबाज़ी नहीं
करेगा।” गांधीजी ने उन्हें समझाया, “सर्व सत्ताधारी बंगाल की
रचना में पारस्परिक अनुमति का सिद्धांत अपनाया जाएगा, यानी सामान्य बहुमत से न होकर
दोनों क़ौमों की स्वीकृति से होगा।” डॉ. मुखर्जी ने पूछा,
“मान लीजिए अधिकांश हिन्दू हिन्दुस्तान के साथ मिलना चाहें और अधिकांश मुसलमान पाकिस्तान
के पक्ष में हों, तो क्या होगा?” गांधीजी ने जवाब दिया,
“तब बंगाल का विभाजन होगा। लेकिन वह विभाजन बंगाल के हिन्दू और मुसलमान निवासियों
के आपसी समझौते से होगा। वह जिन्ना के दो राष्ट्र वाले सिद्धान्त के आधार पर किसी तीसरे
पक्ष का किया हुआ विभाजन नहीं होगा।” उसी दिन शाम की प्रार्थना
सभा में गांधीजी ने कहा था, “हमारी संस्कृति की रक्षा
दूसरा कोई हमारे लिए नहीं कर सकता। हम अपनी ही बुद्धिमानी से उसकी रक्षा कर सकते हैं
अथवा अपनी ही मूर्खता से उसका नाश कर सकते हैं। बंगाल की जो संस्कृति है उसकी रक्षा
करने काम बंगाल के लोगों का है।”
इस बीच माउंटबेटन की योजना
में भी परिवर्तन आया और विकल्प का अधिकार प्रांतों से छीन लिया गया था। उधर जिन्ना
भी सर्व सत्ताधारी बंगाल की रचना पर ध्यान देने को तैयार था, बशर्ते कि उसके बदले में
उसे पूरा पंजाब मिल जाता। लेकिन यदि माउंटबेटन योजना के अनुसार पंजाब का विभाजन होता,
तो फिर वह इसके लिए तैयार नहीं था। 28 मई को बंगाल की प्रांतीय मुसलिम लीग ने घोषणा कर दी कि मुसलिम लीग पाकिस्तान की
मांग का समर्थन करती है। उसी दिन कांग्रेस महासमिति के सचिव ने भी एक वक्तव्य ज़ारी
कर सर्व सत्ताधारी बंगाल की स्थापना के प्रस्ताव से इंकार कर दिया। बृहद बंगाल की मांग
अब व्यर्थ थी। शरतचंद्र बोस बंगाल के लिए लड़ते रहे लेकिन उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी
और वे भी गांधीजी से नाराज़ हो गए।
गांधीजी
उपस्थिति से पूर्वी बंगाल के संतप्त गांवों में कुछ शांति आयी। तनाव ढीले पड़ गये, क्रोध शांत हुआ और मनःस्थिति में सुधार हुआ। 13 मई को गांधीजी बीमार हो गए। दूसरी सुबह डॉ. विधानचन्द्र राय उन्हें देखने आए।
उन्होंने गांधीजी की बेहद ख़राब तबीयत देख चिन्ता प्रकट की और कहा, सब मुलाक़ातें बंद
कर दीजिए और सप्ताह में एक के बजाए दो दिन मौन रखिए। गांधीजी ने कहा, “जब चारों ओर आग धधक रही
हो तब आराम लेकर अपनी आयु बढ़ाने की मेरी इच्छा नहीं है।” डॉ. राय ने कहा, “बापू, आपके अपने लिए नहीं।
लोगों को आपकी सेवा की आज सबसे अधिक आवश्यकता है।” गांधीजी ने कहा, “न तो लोगों के लिए और न
सत्ताधारियों के लिए अब मेरा कोई उपयोग है।” तभी नेहरू का तार आया,
“लॉर्ड माउंटबेटन 17 मई को दिल्ली में विभिन्न
दलों के नेताओं का जो सम्मेलन रखना चाहते हैं, उसके संबंध में सलाह-मशविरा करने के
लिए दिल्ली में आपकी आवश्यकता है।” तार पढ़कर गांधीजी ने कहा,
“मेरे भाग्य में भारत के इस सिरे से उस सिरे तक भटकना ही लिखा है। मैं तो एक जगह
तभी रह सकूंगा जब या तो भारत स्वतंत्र हो जाएगा या मैं मर जाऊंगा।” शाम को उन्होंने पटना
के लिए गाड़ी पकड़ी।
पटना पहुंचे
मार्च, 1947 में जब वह बिहार गए जहां हिन्दू किसानों ने
पूर्वी बंगाल में मुसलमान बहुसंख्यकों द्वारा किए गए अत्याचारों का भयंकर बदला
लिया था। बिहार को भी गांधीजी ने वही संदेश दिया, जो पूर्वी बंगाल को दिया था। बहुसंख्यकों को
कृत्यों के लिए पश्चाताप कर, अपनी भूल सुधार
कर, क्षति की पूर्ति करनी चाहिए, और अल्पसंख्यकों को क्षमा-दान द्वारा नया जीवन
शुरू करना चाहिए। दुर्घटनाओं के लिए वह कोई भी बहाना सुनने को तैयार न थे। लेकिन
उन्होंने उन लोगों को फटकारा, जो बिहार में
हुए दंगे का इस आधार पर समर्थन करते थे, कि वे पूर्वी
बंगाल की घटनाओं की प्रतिक्रिया थे। दूसरे चाहे जो भी करें, सभ्य व्यवहार हर व्यक्ति और समुदाय का अपना
कर्तव्य है।
कलकत्ता में छह दिन
बिताने के बाद गांधीजी 14 मई को पटना पहुंचे। भीषण
गर्मी के बावजूद, उन्होंने गाँवों का दौरा किया। उनकी बात वही थी: 'यदि हिंदू भाईचारे की भावना दिखाते, तो यह बिहार, भारत और दुनिया के लिए अच्छा होता।' मनु को तेज़ बुखार के साथ
एपेंडिक्स में दर्द शुरू हुआ। दरअसल एपेंडिक्स का दर्द तो मनु को दिल्ली में ही शुरू
हो गया, लेकिन गांधीजी ने उसका उपचार प्राकृतिक चिकित्सा के आधार पर शुरू कर दिया था।
उससे मनु को कोई लाभ नहीं हुआ। डॉक्टर ने तुरंत ऑपरेशन की सलाह दी। साढ़े नौ बजे रात
में पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसका ऑपरेशन किया गया। पूरे ऑपरेशन के दौरान गांधीजी
नाक पर मास्क लगाकर वहीं बैठे रहे। ग्यारह बजे ऑपरेशन समाप्त हुआ और उसे अलग कमरे में
सुरक्षा के दृष्टिकोण से रखा गया, क्योंकि जनरल वार्ड में गांधीजी को देखने वालों की
भीड़ लग जाती। लेकिन मरीज़ भी कहां मानने वाले थे। वे सब अपने बेड छोड पहुंच गए गांधीजी
के दर्शन करने। गांधीजी ने कहा मैं आप सबके वार्डों का चक्कर लगा लूंगा, आप सब अपने-अपने
वार्ड में चले जाएं। मरीज़ प्रसन्न हुए। आठवें दिन मनु को अस्पताल से छुट्टी मिली। गांधीजी
ने कहा, “ईश्वर ने मेरे अहंकार को उतार दिया। मैंने यह आशा रखी थी कि वह मिट्टी के उपचार
से ठीक हो जाएगी।”
कुछ दिनों से गांधीजी को
यह भय सता रहा था कि अगर लोगों ने सावधानी नहीं रखी, तो स्वयं स्वाधीनता का स्वरूप
ही बदल सकता है। यह संकट का समय हमसे उत्कृष्ट उदारता, सहिष्णुता, एकता और आत्मत्याग
की भावना की मांग करता है। मंत्री और विधान-सभाओं के सदस्य जन-साधारण ले बीच उनके साथ
कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़े रहें। लोगों को उन्होंने सादगी से रहने की सलाह दी। डॉ. महमूद
से उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने लगभग विभाजन को स्वीकार करने का निर्णय कर लिया है। परन्तु मैं आजीवन योद्धा रहा हूं। मैं पराजय की
लड़ाई लड़ने के लिए दिल्ली जा रहा हूं।” 24 मई को सुबह उन्होंने पटना छोड़ दिया। रास्ते में कानपुर स्टेशन पर किसी दर्शनार्थी
ने उनके तकिए के नीचे से उनकी घड़ी निकाल ली। यह घड़ी उन्हें इन्दिरा जी ने 20 साल पहले दी थी, जब गांधीजी उनके दादा मोतीलाल से मिलने इलाहाबाद गए थे।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर