सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-5
11.9 पांचवा सिद्धांत - निराकार के प्रति प्रेम
सूफ़ी दर्शन का पाँचवां
सिद्धांत यह है कि सब मनुष्य एक ही ईश्वर की रचना हैं, इसलिए एक-दूसरे से घृणा
करना ईश्वर को नाराज़ करना है। यदि हम मानव जाति से प्रेम नहीं कर सकते तो हम ईश्वर
को भी नहीं पा सकते।
सूफ़ी दर्शन का
यह एक बेहद महत्वपूर्ण और केंद्रीय सिद्धांत है। सूफ़ी संत मानते हैं कि ईश्वर (अल्लाह)
को पाने का एकमात्र और सबसे सच्चा रास्ता मानव जाति से बिना किसी भेदभाव के
प्रेम करना है। सूफ़ी विचारधारा के अनुसार, इस संसार की हर
रचना में ईश्वर का ही अंश है। यदि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान या रचना हैं, तो किसी भी
मनुष्य से नफ़रत करना सीधे तौर पर ईश्वर का अपमान करने या उसे नाराज़ करने जैसा
है। सूफ़ियों का मानना है कि ईश्वर को इबादत (कर्मकांडों) से ज़्यादा प्रेम
के ज़रिए पाया जा सकता है। लेकिन ईश्वर (जो दिखाई नहीं देता) से प्रेम करने की
शुरुआत इंसानों (जो दिखाई देते हैं) से प्रेम करने से ही होती है।
दसवीं सदी (लगभग 980 ईस्वी) में इराक
के बसरा शहर में सक्रिय मुस्लिम दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का एक अत्यंत रहस्यमयी
और गुप्त संगठन था, जिसका नाम था इख़वानुस्सफ़ा (Brethren of
Purity पवित्र संघ
/बिरादरी)। यह मध्यकालीन इस्लामी दुनिया (इस्लाम के स्वर्ण
युग) का एक अनूठा और क्रांतिकारी बौद्धिक आंदोलन था, जिसने धर्म, दर्शन और
विज्ञान को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया। अरबी भाषा में 'इख़वान' का अर्थ 'भाई' या 'बिरादरी' होता है और 'सफ़ा' का अर्थ 'पवित्रता' या 'निर्मलता' है।
इन्होंने अपने ज्ञान को पुस्तक के रूप में लेखबद्ध किया, इसे “रसाइल
इख़वानुस्सफ़ा” (पवित्र-संघ-ग्रंथावली) कहते हैं। यह
कुल 52 पत्रों या निबंधों का संग्रह है, जो अपने समय के विज्ञान और दर्शन का
अद्भुत दस्तावेज़ है। इख़वानुस्सफ़ा का मानना था कि कट्टरता इंसानी रूह को प्रदूषित
करती है। इस संगठन के सदस्यों ने हमेशा अपनी पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा, ताकि उस दौर के कट्टरपंथी धार्मिक विद्वानों और शासकों के कोपभाजन से बच सकें।
वे मानते थे कि शरीयत (धार्मिक कानून) को जब तक दर्शन और वैज्ञानिक सोच के
ज़रिए साफ़ नहीं किया जाता, तब तक वह मुकम्मल नहीं होती। दर्शन को वे आत्मा को
शुद्ध करने का एक औज़ार मानते थे। वे मानते थे कि ज्ञान के अर्जन और रूहानी
(आध्यात्मिक) शुद्धता के ज़रिए ही आत्मा को मुक्ति मिल सकती है। इस संघ ने त्याग, तपस्या, आत्म-संयम के ऊपर
काफ़ी ज़ोर दिया। इनके अनुसार प्रेम का स्थान सबसे ऊपर है - प्रेम जीव की परमात्मा से मिलने की बेक़रारी है। इसी प्रेम का एक भाग वह
प्रेम है, जो कि इस जीवन
में प्राणिमात्र के प्रति क्षमा, सहानुभूति और स्नेह द्वारा प्रकाशित होता है। प्रेम इस लोक में मानसिक सांत्वना, हृदय की
स्वतंत्रता देता है और प्राणिमात्र के साथ शांति स्थापित करता है, और परलोक में उस नित्य
ज्योति का समागम कराता है। इस बिरादरी का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था
जहाँ लोग विज्ञान, कला और दर्शन के माध्यम से एक-दूसरे के करीब आ सकें, न कि धार्मिक
मतभेदों के कारण दूर जाएँ। इख़वानुस्सफ़ा मध्यकालीन इतिहास के वे 'गुमनाम वैज्ञानिक और दार्शनिक' थे, जिन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि विज्ञान, तर्क और
अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
पवित्र संघ सूफ़ियों का प्रशंसक और समर्थक था। वास्तव में, इस संघ के दर्शन
और कार्यप्रणाली पर सूफ़ी मत की गहरी छाप थी, और उन्होंने
अपनी रचनाओं में सूफ़ियों की जीवनशैली और उनके विचारों की खुलकर सराहना की है। सूफ़ी
शब्द की उत्पत्ति को लेकर भी एक बड़ा मत यही है कि यह 'सफ़ा' (पवित्रता) से
बना है। इख़वानुस्सफ़ा के विचारक सूफ़ियों की तरह ही मन, आत्मा और आचरण की आंतरिक पवित्रता को मोक्ष या मुक्ति का एकमात्र साधन मानते
थे। उन्होंने सूफ़ियों को बहुत ऊँचा स्थान दिया और उन्हें ईश्वर के करीब, आध्यात्मिक रूप से जागृत और संसार के मोह-माया से
मुक्त 'सच्चे साधक' के रूप में सराहा है।
सूफ़ी दर्शन में
जीव ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है, और भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होना, यही उसका
सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत भी ब्रह्म के गुणों का
प्रतिबिंब है। जीव को हक़ (सत्,
ब्रह्म)
से मिलने का एक
ही रास्ता है, वह है - प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम
होता है। अलहक्क़ के साथ एकत्व प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। सूफ़ी संत सरमद ने सूफ़ी
प्रेमोपासना का रहस्य इन शब्दों में बताया है –
मुमकिन न बुबद कि यार आयद बकिनार,
ख़ुदरा अज़ ख़्याले ख़ामो अन्देशा बरार,
हर चीज़ क़ि ग़ैर अस्त दर सीनए तुस्त,
बिसयार
हिजाबेस्त मियाने तो व यार!
अर्थात् जब तक
तेरे दिल में बाहरी चिंताएं भरी हैं, झूठी भावनाएं भरी हैं, तब तक यह कैसे मुमकिन
है कि तेरा यार, तेरा प्रेमास्पद – ब्रह्म तुझे मिल जाए? जब तक तेरे दिल में ये दूसरी
चीज़ें भरी हैं, तब तक यार से कैसे मिल सकेगा? तेरे और उसके बीच में परदा है।
तात्पर्य यह है कि सूफ़ी साधकों को अपने प्रेमास्पद को छोड़कर किसी और का चिंतन नहीं
करना चाहिए, उसके दिल में उसके सिवा किसी और का ख़्याल, किसी और की ख़्वाहिश, किसी
की इच्छा, कामना न पनपे। इन पंक्तियों में सूफ़ी साधक को यह समझाया जा रहा है कि ईश्वर
को पाने के लिए दिल को पूरी तरह साफ़ करना क्यों ज़रूरी है। दिल ही वह केन्द्र है, जहां प्रेम घटता है। मन तो कल्पनाओं का जाल बुनता है, तरह-तरह की माया रचता है। सूफ़ीमत में इसके रूपान्तरण की ज़रूरत को बताया गया है, कहा गया है कि साधक अपनी ऊर्जा को मन से हटाकर
दिल की ओर मोड़ दे। परमात्मा प्रेम-स्वरुप है। वह इसके रहस्यों को उन
लोगों को नहीं बतलाता जो इसे पाने के अधिकारी नहीं हैं। जिसने सांसारिक वस्तुओं का
त्याग नहीं किया वे इसे पाने के अधिकारी नहीं हैं। यह पंक्तियाँ सूफ़ी मत के 'तज़्किया-ए-नफ़्स' (आत्मा और मन की शुद्धि) के सिद्धांत को बहुत
खूबसूरती से दर्शाती हैं।
सूफ़ी प्रेम में
स्वरूप तो लौकिक प्रेम का ही है, भावावेश और सुखानुभूति श्रृंगार जैसी ही है, किन्तु है वह
निराकार के प्रति। प्रेम प्रत्यक्ष के प्रति न होकर प्रच्छन्न के प्रति होता है, इसलिए उसमें तीव्रता भी अधिक होती है और उसमें
रहस्य की अनिवार्यता भी हो जाती है। इसमें लौकिकता और अलौकिकता का योग होता है।
सूफ़ी प्रेम में इश्क़ ए मजाज़ी (लौकिक प्रेम) इश्क़ ए हक़ीक़ी (आध्यात्मिक
प्रेम)
की सीढ़ी माना
जाता है। साधना के उत्तरोत्तर विकास के बाद ही साधक परमेश्वर तक पहुंचेगा। सूफ़ियों
का कहना है कि सांसारिक प्रेम में स्त्री-पुरुष का प्रेम तो साधारण सी बात है,
लेकिन अहं पर विजय पाने के लिए, युवा के प्रति प्रेम अधिक उपयुक्त है। सूफ़ी दर्शन के इतिहास में इस विशेष
अवधारणा को 'अमरदपरस्ती' या फ़ारसी में 'शाहिद-बाज़ी' कहा गया है। सूफ़ी संतों के अनुसार, जब तक कोई व्यक्ति इस संसार में किसी रूप
(चाहे वह स्त्री हो या पुरुष) से सच्चा प्रेम करना नहीं सीखता, तब तक वह
निराकार ईश्वर से प्रेम नहीं कर सकता। सूफ़ी साधना के कुछ विशेष संप्रदायों या
विचारों में सुंदर युवाओं (अमरद) के प्रति आकर्षण या निष्काम प्रेम को साधना का एक
हिस्सा माना गया। स्त्री के प्रति जो प्रेम होता है, उसमें स्वार्थ
होता है और सुन्दर युवा के प्रति जो प्रेम होता, उसमें स्वार्थ
नहीं होता, उसमें विकार
नहीं होता। लेकिन एक सुंदर युवा (पुरुष) के प्रति ऐसा प्रेम रखना जो समाज की
रूढ़ियों से परे हो, साधक के सामाजिक अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
मध्यकालीन फारसी सूफ़ी परंपरा के कुछ विचारकों (जैसे अवहद अल-दीन किरमानी) का
मानना था कि ईश्वर सुंदर है और वह अपनी सुंदरता की झलक इंसानी रूपों में दिखाता
है। एक पुरुष का स्त्री के प्रति आकर्षित होना या प्रेम करना एक स्वाभाविक और
जैविक (साधारण) बात है, जिसमें कहीं न कहीं वंश आगे बढ़ाने या सांसारिक सुख
की छिपी हुई आकांक्षा (स्वार्थ) हो सकती है। इसके विपरीत, एक सुंदर युवा (जिसकी दाढ़ी-मूछें न आई हों - अमरद) के प्रति ऐसा प्रेम जिसमें
कोई भौतिक या सामाजिक स्वार्थ न हो, वह केवल सुंदरता
की सराहना और रूहानी तौर पर 'अहं' को मिटाने के लिए अधिक उपयुक्त माना गया। इसे 'इश्क़-ए-मजाज़ी' (सांसारिक/सांकेतिक प्रेम) से 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वरीय प्रेम) तक पहुँचने का एक जरिया माना जाता था। यहाँ सुंदर
युवा को ईश्वर की सुंदरता का गवाह (शाहिद) माना जाता था। सूफ़ियों की इस धारणा को 'शाहिदबाज़ी' भी कहा जाता है, जहाँ 'शाहिद' का अर्थ होता है 'गवाह' या 'साक्षी'। उनका मानना था कि ईश्वर ने इंसान को अपने रूप में बनाया है, इसलिए ईश्वर के परम सौंदर्य की सबसे शुद्ध झलक एक सुंदर युवा या बालक के चेहरे
में देखी जा सकती है। इस सौंदर्य को निहारना ईश्वर की कारीगरी की प्रशंसा करने
जैसा था।
विकारहीन होने
के कारण यह प्रेम स्वार्थ और बुद्धि पर विजय पाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होता
है। संसार को छोड़कर भी वह प्रेमिका के सौन्दर्य को ही
दृष्टि में रखता है और साधना के मार्ग पर चढ़ता हुआ भी वह नर-नारी के संयोग (वस्ल)
में ही साधना की चरम परिणति मानता है। शाहिद-बाज़ी या अमरदपरस्ती को
मुख्यधारा के अधिकांश सूफ़ी संतों और इस्लामी विद्वानों ने कभी स्वीकार नहीं किया और
इसे भटकाव माना। उनका मानना था कि यह साधना साधक को दिव्य मार्ग से भटकाकर शारीरिक
वासना की ओर ले जा सकती है। अधिकांश मुख्यधारा के सूफ़ी दर्शन में ईश्वर को 'प्रियतमा' (स्त्री) और साधक को 'प्रेमी' (पुरुष) के रूप
में मानकर साधना की गई है। महान सूफ़ी विचारक इमाम अल-ग़ज़ाली ने अमरदपरस्ती का कड़ा विरोध किया था। उनका
कहना था कि जब कोई साधक किसी युवा के प्रति आकर्षित होने लगता है, तो सूफ़ी मत का वास्तविक आध्यात्मिक चरित्र समाप्त हो जाता है और वहाँ वासना
के हावी होने का खतरा बढ़ जाता है।
प्रेम जीवन को
अर्थ देता है। वह (साधक) नाचता है, गाता है, जीवन का उत्सव
मनाता है। उसके (प्रेमास्पद के)
प्रेम में व्यक्ति
विह्वल हो जाता है, आसक्त हो जाता है। आसक्त व्यक्ति मूर्छित हो जाता है।
उसकी आसक्ति इतनी चरम सीमा की होती है कि प्रेमास्पद के अतिरिक्त सारी सृष्टि उसे
सूनी प्रतीत होती है। यहां प्रेम वैराग्य का साधन बनता है। जब वह नाच रहा होता है, उत्सव मना रहा
होता है, तब यदि वह अपने
अंदर झांकता है तो वहां कोई नहीं होता। एक शून्यता होती है,
इसे ही सूफ़ी फ़ना होना कहते हैं। यह, “कोई नहीं होने
वाली” स्थिति, ऐसी
स्थिति है जब अहंकार विसर्जित हो जाता है - फ़ना, अनात्म। यहां प्रेम एक
कृत्य न होकर स्थिति है। प्रसिद्ध सूफ़ी कवि वली दकनी ने कहा है,
जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे, उसे ज़िंदगी जग में भारी लगे।
न छोड़े मुहब्बत दमे मर्ग तक, जिसे यार जानी सूं यारी लगे॥
न होवे उसे जग में हर्गिज़ क़रार, जिसे इश्क़ की बेक़रारी लगे।
हर इक वक़्त मुझ आशिक़े ज़ार कूं, पियारे, तेरी बात प्यारी लगे॥
‘वली’ कूं कहे तू अगर एक वचन, रक़ीबों के दिल में
कटारी लगे॥
अर्थात जिस व्यक्ति के दिल पर प्रेम (इश्क) का तीर 'कारी' (यानी गहरा या जानलेवा) लग जाता है, उसे इस संसार में अपनी सामान्य जिंदगी एक भारी बोझ की तरह लगने लगती है। प्रेम
की चोट खाने के बाद इंसान दुनिया के रोजमर्रा के कामों और सांसारिक मोह-माया से
पूरी तरह कट जाता है। जिस व्यक्ति को अपने 'यार जानी' (यानी प्राणों से प्यारे महबूब) से सच्ची यारी
(प्रेम) हो जाती है, वह 'दमे मर्ग' (मृत्यु के अंतिम क्षण) तक भी मोहब्बत का साथ
नहीं छोड़ता। उसका प्रेम जीवन के साथ शुरू होता है और मौत के बाद ही खत्म होता है।
जिसे एक बार प्रेम की 'बेकरारी' (बेचैनी या तड़प) का चस्का
लग जाए, उसे इस दुनिया में फिर कभी 'करार' (चैन या सुकून) नहीं मिलता। प्रेमी अपने महबूब की याद में हर पल तड़पता रहता है
और यही बेचैनी ही उसका सुकून बन जाती है। कवि कहते हैं कि मुझ जैसे 'आशिके जार' (यानी रोने वाले, दुखी और तड़पते हुए प्रेमी) को हर समय, हर पल, हे मेरे प्यारे महबूब! सिर्फ तुम्हारी ही बातें सबसे प्यारी और मीठी लगती हैं।
तुम्हारे अलावा मुझे किसी और की बात सुनना पसंद नहीं। आखिरी शेर में कवि अपना नाम
(तख़ल्लुस) 'वली' इस्तेमाल करते हुए अपने महबूब से कहते हैं कि—हे
प्रिय! अगर तुम मुझसे (वली से) प्यार का सिर्फ एक मीठा बोल या वचन भी कह दोगे, तो जो हमारे 'रकीब' (यानी दुश्मन या प्रेम में प्रतिद्वंदी) हैं, उनके दिलों पर ईर्ष्या (जलन) की कटारी चल जाएगी।
वे हमारी नजदीकी देखकर तड़प उठेंगे।
वली दकनी ने इन पंक्तियों में इश्क़ की उस पराकाष्ठा को दर्शाया है जहाँ
इंसान खुद को भूल जाता है। जब कोई साधक ईश्वर के प्रेम में पड़ता है, तो वह दुनियावी
बंधनों से आज़ाद हो जाता है। संसार के लोग जिसे सुख समझते हैं (जैसे धन, पद, आराम), सूफ़ी साधक के
लिए वह सब एक बोझ ('ज़िंदगी भारी लगे') बन जाता है। सूफ़ियों के लिए महबूब की याद में तड़पना और बेचैन रहना ही सबसे
बड़ा सुकून है। वे दुनिया के झूठे चैन को ठुकराकर इस रूहानी बेक़रारी को चुनते
हैं। सच्चा प्रेम आख़िरी साँस तक निभाया जाता है। ईश्वर का प्रेमी दुनिया के लिए
बेचैन और पागल लग सकता है, लेकिन उसके लिए ईश्वर की बातें और उसका नाम ही
ब्रह्मांड का सबसे बड़ा आनंद है। जब किसी साधक को ईश्वर से सच्चा प्रेम हो जाता है, तो उसे दुनिया की भौतिक चीजें (जिंदगी) भारी लगने लगती हैं, वह दुनिया से बेखबर हो जाता है और हर पल ईश्वर की इबादत और उनकी याद में ही
खोया रहता है।
वली दकनी की सबसे प्रसिद्ध और कालजयी रचनाओं में से एक ग़ज़ल है: "याद करना हर घड़ी उस यार का..."। यह रचना उर्दू-दकनी शायरी के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है,
क्योंकि इसमें उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में प्रेम और अध्यात्म
का अद्भुत मिश्रण पेश किया है।
याद करना हर
घड़ी उस यार का,
है वज़ीफ़ा मुझ
दिल-ए-बीमार का।
आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नईं,
तिश्ना-लब हूँ शर्बत-ए-दीदार का।
क्या कहे तारीफ़ दिल है बे-नज़ीर,
हर्फ़ हर्फ़ उस मख़्ज़न-ए-असरार का।
ऐ 'वली' होना स्रिजन पर निसार,
मुद्द'आ है चश्म-ए-गौहर बार का।
प्रेम में तड़प रहे मेरे इस बीमार दिल का एकमात्र 'वज़ीफ़ा' (यानी रोज़ का
नियम, जाप या मंत्र) हर समय अपने उस यार (प्रियतम) को याद करना ही बन गया है।
जैसे कोई भक्त हर समय मंत्र जपता है, वैसे ही मेरा दिल हर पल महबूब की यादों का
जाप करता रहता है। मुझे स्वर्ग के पवित्र झरने के पानी की कोई इच्छा (आरज़ू)
नहीं है। मेरे प्यासे होंठों को तो बस अपने महबूब के 'दीदार' (दर्शन) का शर्बत
चाहिए। सूफ़ी मत के अनुसार, साधक के लिए जन्नत की सुख-सुविधाओं से कहीं बढ़कर
ईश्वर के दर्शन का आनंद है। प्रेम में डूबे हुए इस दिल की तारीफ़ क्या की जाए, यह तो अपने आप
में अनोखा है। इस दिल का एक-एक अक्षर ('हर्फ़-हर्फ़') ईश्वरीय रहस्यों
का ख़ज़ाना बन चुका है। वली कहते हैं कि अपने प्रियतम पर पूरी तरह से न्योछावर (निसार)
हो जाना ही, महबूब के विरह में मोती जैसे अनमोल आँसू बहाने वाली इन आँखों का एकमात्र
उद्देश्य है।
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मनोज
कुमार