शुक्रवार, 6 मार्च 2026

450. नोआखाली में शान्ति यात्रा-4

गांधी और गांधीवाद

450. नोआखाली में शान्ति यात्रा-4

1946

सहायता कार्य

चारु चौधरी और बंगाल विधान सभा के सदस्य हरेन घोष चौधरी के नेतृत्व में नोआखाली उद्धार, कष्ट-निवारण तथा पुनर्वास समिति के कार्यकर्ताओं के साथ सहायता कार्य शुरू हो गया। चारू चौधरी एक समर्पित गांधीवादी थे नोआखाली के दंगा पीड़ितों के लिए उन्होंने काफ़ी काम किया था यहां तक कि गांधीजी के शांति अभियान का सारा ज़िम्मा उन्हीं पर था। गांधीजी ने अपने निजी अमले के सदस्यों, घनिष्ठ सहयोगियों और शिष्यों को विभिन्न गांवों में फैला दिया। प्यारेलाल मलेरिया से बीमार थे। उन्होंने गांधीजी को एक नोट भेजा जिसमें पूछा गया था कि क्या सुशीला उनकी देखभाल करने नहीं आ सकतीं। गांधीजी ने जवाब दिया, 'जो लोग गांवों में जाते हैं, उन्हें यह पक्का इरादा करके जाना होता है कि वे वहीं जीएंगे या मरेंगे।' 'अगर उन्हें बीमार पड़ना ही है, तो उन्हें वहीं ठीक होना होगा या वहीं मरना होगा। तभी उनके जाने का कोई मतलब हो सकता है। असल में इसका मतलब है कि उन्हें घरेलू नुस्खों या कुदरत के "पांच तत्वों" की थेरेपी से खुश रहना होगा। डॉ. सुशीला का अपना गांव है, जिस पर उन्हें ध्यान देना है। उनकी सेवाएं अभी हमारी पार्टी के सदस्यों के लिए नहीं हैं। वे पूर्वी बंगाल के गांव के लोगों के पास पहले से गिरवी रखी हुई हैं।' वह खुद को उसी बेरहम, पक्के अनुशासन में रख रहे थे।

पीड़ित लोगों को हिम्मत देना, उनके अंदर साहस का संचार करना, उनके जले घरों को ठीक करना, चारों तरफ साफ-सफाई करना, मलवा उठाना आदि काम हाथ में ले लिए गए। धीरे-धीरे लोगों में हिम्मत का संचार होने लगा। एक बड़े से मैदान को साफ कर सभा स्थल बनाया गया। प्रार्थना सभा का आयोजन हुआ। चौमुहानी की जनसंख्या पांच हज़ार थी, लेकिन सभा में पन्द्रह हज़ार लोग इकट्ठे हो गए। और उनमें से अस्सी प्रतिशत मुसलमान थे। गांधीजी ने हिन्दुओं को ‘हिम्मत और श्रद्धा’ रखने को कहा। मुसलमानों को कहा कि ‘आपके आश्वासन पर ही हिन्दू सुख चैन से अपने घर में लौट सकते हैं’। इससे इलाके के प्रभावित लोगों का हौसला भी बढ़ा था और उस जगह के घुटन भरे माहौल में ज़िंदगी देने वाली ताज़ी हवा का झोंका आया था। धीरे-धीरे इस उलझन के ढेर से व्यवस्था बनने लगी।

गांधीजी अपनी नोआखाली तीर्थयात्रा के दौरान 49 गांवों में रहे। वह सुबह चार बजे उठते, नंगे पैर तीन या चार मील चलकर एक गांव में जाते, वहां एक या दो या तीन दिन रुकते, वहां के लोगों से लगातार बातें करते और प्रार्थना करते, और फिर अगले गांव तक पैदल जाते। किसी जगह पहुंचकर, वह किसी किसान की झोपड़ी में जाते, खासकर किसी मुस्लिम की झोपड़ी में, और अपने साथियों के साथ रहने के लिए कहते। अगर मना कर दिया जाता, तो वह अगली झोपड़ी में जाने की कोशिश करते। वह वहां के फल, सब्जियां और अगर बकरी का दूध मिल जाता, तो उसी पर गुज़ारा करते थे। 7 नवंबर, 1946 से 2 मार्च, 1947 तक उनकी यही ज़िंदगी थी। यह प्रायश्चित की तीर्थयात्रा थी।

कभी-कभी दुश्मन लोग उनके रास्ते में टूटे हुए कांच, झाड़ियाँ और गंदगी फैला देते थे। वह उन्हें दोष नहीं देते थे; उन्हें उनके नेताओं ने गुमराह किया था। कई जगहों पर, चलने में नीची, दलदली ज़मीन पर बने पुलों को पार करना शामिल था। पुल बांस के खंभों पर बने होते थे जो अक्सर दस या पंद्रह फीट ऊँचे होते थे और उनमें चार या पाँच बांस के खंभे होते थे जिनका डायमीटर लगभग चार इंच होता था और उन्हें जूट की रस्सी या बेलों से बाँधा जाता था। इन कच्चे हिलते हुए ढांचों में कभी-कभी सहारे के लिए एक साइड-रेल होती थी, अक्सर नहीं। एक बार गांधीजी का पैर फिसल गया और वह बहुत नीचे कीचड़ वाली ज़मीन पर गिर सकते थे, लेकिन उन्होंने फुर्ती से अपना बैलेंस बना लिया। ऐसे क्रॉसिंग में माहिर और निडर बनने के लिए, वह जहाँ भी हो सके, ज़मीन से कुछ इंच ऊपर बने पुलों पर प्रैक्टिस करते थे।

7 नवंबर को गांधीजी सबसे पहले बेगमगंज थाना स्थित रामगंज गए, जहां हिंदुओं के ख़िलाफ़ अधिक हिंसा हुई थी9 नवंबर को गांधीजी चौमुहानी से भीतरी भाग में प्रवेश करने के लिए निकले। उनके साथ दो संसदीय सचिव, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और एस.पी. थे। पहला गांव गोपाइरबाग था। यहां सबसे भयंकर हत्याकांड हुआ था। यहां सुपारी और नारियल के पेड़ों के घने पेड़ों के बीच पांच झोपड़ियां बिखरी हुई थीं, जिनमें हिंदू परिवार रहते थे और मुस्लिम परिवारों की संख्या उनसे लगभग पचास गुना ज़्यादा थी। वहां हत्या और आगजनी हुई थी। पूजा की जगह को अपवित्र कर दिया गया था। गांव के पटवारी के घर के 23 में 21 पुरुष क्रूरतापूर्वक मार डाले गए थे। दो किसी तरह जान बचाकर भाग गए थे। चौक पर पुरुषों की लाशों का ढेर बनाकर उसे जला दिया गया था। जो कभी मांस और खून था, उसके जले हुए अवशेष उस भयानक त्रासदी के गवाह थे। कुछ घरों के दरवाजों पर खून के धब्बे थे। कई घरों के फर्श छिपे हुए कैश या गहनों की तलाश में खोद दिए गए थे। मौत की बदबू अभी भी उस जगह पर छाई हुई थी। यह वीरानी की तस्वीर थी। घर से तीन लड़कियों को किडनैप कर लिया गया था, जिनमें से दो अभी भी लापता थीं। चारों तरफ़ भयंकर दुर्घटना का मंज़र था। इस घटना को अंजाम देने वाले दल का लीडर कासिम अली जो रॉयल एयर फोर्स में काम कर चुका था और एक यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट था, वह फरार था।

वापसी में गांधीजी दत्तापाड़ा में रुके। वहां कष्ट-निवारण केन्द्र था, जहां 5,000 से अधिक शरणार्थी थे। विस्थापितों को वापस घर भेजने के लिए विचार-विमर्श चल रहा था। कुछ स्थानीय मुस्लिम लीग सदस्यों को भी बुलाया गया था और उन्होंने चर्चा में हिस्सा लिया। चर्चा का सूत्र गांधीजी ने अपने हाथ में लिया। ऐसे भयावह विनाश में गांधीजी ने एक नया तरीक़ा अपनाया। उन्होंने हर गांव में एक निडर हिंदू और एक मुसलमान को मिलकर अपने घरों को लौट रहे शरणार्थियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने की सलाह दी। लोगों को तो इस प्रयोग पर विश्वास ही नहीं था। उन्हें लग रहा था कि फौज आएगी और उनकी रक्षा करेगी। लेकिन गांधीजी का स्वावलंबन सुरक्षा में विश्वास था। गांधीजी का सुझाव अधिकारियों को पसंद नहीं आया। वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि केवल दो व्यक्ति समूचे गांव की सुरक्षा कर सकते हैं। गांधीजी ने कहा, ऐसे दोनों व्यक्ति यह प्रतिज्ञा करें कि वापस आने वाले शरणार्थियों के साथ हम कोई बुरा व्यवहार नहीं होने देंगे, इसके बदले हम अपना बलिदान करने को तैयार हैं। वे आप मुझे आवश्यक मुसलमान ढूंढ़ कर दीजिए, हिन्दू मैं प्राप्त कर लूंगा।

शाम की प्रार्थना सभा, जिसमें 10,000 हिन्दू-मुसलमानों ने भाग लिया था, गांधीजी ने कहा, यह हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए शर्म की बात है कि हिन्दुओं को इस ढंग से घर से भाग जाना पड़ा। लेकिन जो कुछ हुआ हमें उसे भूल जाना चाहिए। दोषियों को क्षमा कर देना चाहिए। हां, यदि आवश्यक आश्वासन मिल जाए, तो हृदयों में साहस रखकर हिन्दुओं को अपने घर लौट जाना चाहिए। एक मुसलमान व्यक्ति ने कहा, हमने तो पहले ही आश्वासन दे दिया है कि हम हिन्दुओं की देखभाल करेंगे, परन्तु हिन्दू हमारा विश्वास नहीं करते। गांधीजी ने कहा, आपको हिन्दुओं के अविश्वास का कारण समझ कर उसकी कद्र करनी चाहिए और उनका डर दूर करना चाहिए। एक हिन्दू ने कहा, हम मुसलमानों के आश्वासन पर भरोसा कैसे कर सकते हैं? जब 50 मुसलमान हमारी रक्षा नहीं कर सके, तो अब एक मुसलमान हमें कैसे बचा सकेगा? ... और अब घर भी कहां है? हमारा तो सब कुछ लुट चुका है। गांधीजी बोले, सरकार ने वचन दिया है कि जब आप लौट जाएंगे, तो आपका घर बनवा दिया जाएगा। आपको अन्न-वस्त्र भी दिया जाएगा। भूतकाल में जो हुआ उसे भूल जाइए। अब अगर एक भला मुसलमान और एक भला हिन्दू प्रत्येक गांव में आपकी हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी लेते हैं, तो आप उनके वचन पर भरोसा कर सकते हैं, क्योंकि इसके पीछे गांव के सारे मुसलमानों का सामूहिक निमंत्रण और उनके सद्भाव का आश्वासन होगा अगर आपको अब भी डर है तो आप कायर हैं, ... और कायरों की सहायता तो ईश्वर भी नहीं कर सकता।

1946 के सांप्रदायिक हिंसा में लक्ष्मीपुर गांव में भीषण क़त्लेआम हुआ था कई लोग मारे गए गांव में कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गयाविवाहित महिलाओं का जबरन निकाह कराया गया हिंदू मंदिरों को क्षति पहुंचाई गई सेना के जवानों ने कई परिवार को बचाया और उस क्षेत्र से बाहर ले गएगांधीजी के प्रयासों से दंगा शांत हुआजब महात्मा गांधी लक्ष्मीपुर आए थे तो उनके साथ निर्मल कुमार बसु, सरोजनी नायडू, सुशीला नायर भी थेआठ-दस गांव में उन्होंने शांति रखने का अपना नया तरीक़ा बताया। इस प्रयोग से डरे हिंदुओं में हिम्मत आई। गांधीजी लगातार गांव-गांव घूमते रहे और प्यार से मनुष्य के स्वभाव में निहित साधुता को जगाते रहे। उनकी वाणी से लोगों की अंतरात्मा जागृत होने लगी। लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं थीं। एक तरफ़ बंगाल सरकार उनसे असहयोग कर रही थी, दूसरी तरफ़ मुस्लिम लीग उनका विरोध कर रही थी। तीसरी समस्या थी कि स्थानीय लोग शरारती मुस्लिम लोगों के डर से प्रार्थना सभा में नहीं आते। ये शरारती मुस्लिम गांधीजी की यत्रा को कठिन बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे थे। रास्ते में कांच के टुकड़े, कांटे और मैला बिखेर देते। लेकिन इन सब विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गांधीजी सतत अफसरों, मुसलमानों और पीड़ितों के हृदय परिवर्तन का काम करते रहे। गांधीजी का यह शांति-प्रचार मुस्लिम लीग की विभाजन नीति के विपरीत था। कई सभाओं में ऐसे लोग मिले, जिन्होंने कई लोगों की हत्याएं की थीं। गांधीजी उन्हें समझाने की चेष्टा करते। जब-जब गांधीजी को लगा कि मुसलमानों को उनकी बातों में कोई श्रद्धा नहीं है, तब-तब वे इसे अपनी अहिंसा और शुद्धता में त्रुटि देखते। उसके लिए प्रायश्चित करते। उनकी शिष्या अमतुस्सलाम ने इस यात्रा में एक मुसलमान गांव में प्रायश्चितस्वरूप पचीस दिनों का उपवास कर के गांव वालों का दिल फेर दिया।

10 नवंबर को गांधीजी ने चौमुहानी को छोड़ दत्तापाड़ा को अपना ठिकाना बनाया। वहां की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, आप मुझ पर विश्वास करें या न करें, मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मैं हिन्दू और मुसलमान दोनों का सेवक हूं। मैं यहां पाकिस्तान से लड़ने नहीं आया हूं। यदि भारत के भाग्य में बंटवारा लिखा है, तो मैं उसे रोक नहीं सकता। परन्तु ताक़त से पाकिस्तान क़ायम नहीं किया जा सकता। मैं अपने मुसलमान भाइयों से कहना चाहता हूं कि यदि वे हिन्दुओं के साथ मित्र बन कर नहीं रहना चाहते, तो खुले तौर पर ऐसा कह दें। उस सूरत में हिन्दुओं को पूर्व बंगाल छोड़ कर कहीं जाना होगा। लेकिन यदि पूर्व बंगाल का प्रत्येक हिन्दू चला जाता है, तो भी मैं पूर्व बंगाल के मुसलमानों के बीच ही रहूंगा। मैं बाहर से कोई खुराक नहीं मंगवाऊंगा। वे जो कुछ मुझे देंगे और जिसे लेना मैं उचित समझूंगा, उसी से मैं अपना निर्वाह कर लूंगा। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि हिन्दू आपके बीच रहें, तो आपको उनसे कहना चाहिए कि उन्हें रक्षा के लिए सेना की ओर देखने की ज़रूरत नहीं है। उनका मुसलमान भाई उनके साथ है। उनकी रक्षा आपको अपने प्राणों से करनी चाहिए। आप बताएं कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं?

गांधीजी का आंशिक उपवास चल रहा था वे एक ही समय का भोजन ले रहे थे। इससे उनकी सतहत्तर वर्षीय काया पर बुरा असर हो रहा था। प्रतिदिन वे सिर्फ़ छह सौ कैलोरी का भोज्य पदार्थ ग्रहण कर रहे थे। प्रार्थना सभा से उनको कुर्सी की बनी डोली पर उठा कर दो व्यक्तियों द्वारा ले जाया जाता था। उनकी आवाज़ काफी धीमी हो गई थी।

11 नवंबर को गांधीजी ने रामगंज पुलिस स्टेशन के नोआखोला, सोनाचक और खीलपाड़ा गांवों का दौरा किया। नोआखोला में एक हिन्दू परिवार के 8 पुरुषों की हत्या कर दी गई थी। सभी घर जला दिए गए थे। 15 साल के एक लड़के का वध किया गया था। कई लोगों का धर्म परिवर्तन कर दिया गया था। जिसमें एक बहरा-गूंगा भी शामिल था, जिसने दयनीय इशारों से, एक कपड़े में बंधा हुआ, बालों का गुच्छा (हिंदू धर्म का पारंपरिक प्रतीक) दिखाया, जिसे उसके सिर से ज़बरदस्ती हटाया गया था और जिससे वह अब भी चिपका हुआ था। जो कुछ औरतें बची थीं, वे सब रो रही थीं और चीख रही थीं। उस गांव का दृश्य दिल दहला देने वाला था। सोनाचक में 100 से अधिक मकानों को जला दिया गया था। मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया था।

गांधीजी अपने इंस्पेक्शन के डरावने दौरे के बाद टूटी-फूटी बिल्डिंग से बाहर निकले, तो एक तिब्बती स्पैनियल कुत्ता, जो हमेशा उस जगह पर उदास चुप्पी में घूमता हुआ दिखता था, आया और हल्की फुसफुसाहट के साथ उनका ध्यान खींचने की कोशिश करने लगा। अगर उसका पीछा नहीं किया जाता, तो वह कुछ कदम दौड़ता, वापस मुड़ता और फिर इशारा करता। गांधीजी के साथी जानवर के अजीब बर्ताव से हैरान थे और उसे भगाना चाहते थे। गांधीजी ने उन्हें रोका और कहा: "क्या तुम नहीं देख रहे हो कि जानवर हमसे कुछ कहना चाहता है?" उन्होंने कुत्ते को आगे बढ़ने दिया। वह उन्हें एक के बाद एक तीन इंसानी कंकाल और कई खोपड़ियों और हड्डियों के पास ले गया जो ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं! उसने दंगों के दौरान अपने मालिक और परिवार के सात दूसरे सदस्यों को मरते हुए देखा था। तब से वह उस जगह पर मंडरा रहा था और उस काले काम को सामने लाने की कोशिश कर रहा था जिसका वह गवाह था। हर कोई जानवर की अद्भुत समझदारी और अपने मरे हुए मालिक के प्रति उसकी खामोश वफादारी देखकर हैरान था।

अकेलेपन की यात्रा

12 नवंबर को गांधीजी ने सोच लिया था कि अगर कोई उनका साथ नहीं देगा तो वे अकेले ही निकल पड़ेंगे ... ताकि वे वहां आतंक और घृणा से प्रदूषित वातावरण को साहस और करुणा की स्वच्छ हवा दे सकें।  77 वर्ष की आयु में, गिरते स्वास्थ्य और अपर्याप्त भोजन के सहारे नंगे पांव एक दुर्गम और अनजानी जगह से होते हुए, बांस के नाज़ुक पुलों पर से होकर गांव-गांव भटक रहे थे। 77 वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना ‘एकला चलो रे ... ’ गाते हुए उन्होंने ठान लिया था कि पैदल चलकर वह एक-एक गांव जाएंगे। यह उनकी अहिंसा की अंतिम परीक्षा थी। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढ़ता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।

12 और 13 नवंबर को गांधीजी ने आस-पास के अन्य गांवों का निरीक्षण किया। गोमाटोली और नंदीग्राम गांवों के निरीक्षण के साथ ही उनकी नोआखाली के प्रथम चरण की यात्रा सम्पन्न हुई। अकेले नंदीग्राम में करीब 600 घर जला दिए गए थे। नालीदार चादरों के मुड़े हुए और काले हो चुके टुकड़े, जो कभी छत का काम करते थे, राख और मलबे के ढेर के बीच ज़मीन पर बिखरे पड़े थे।

14 नवंबर को अपनी छावनी दत्तपाड़ा से काजिरखिल ले गए। रास्ते में वे शाहपुर में रुके। शाहपुर हिंसा का केन्द्र था। यह मियां ग़ुलाम सरवर का गढ़ था। गांधीजी के आने के पहले उसने अफ़वाह फैला रखी थी कि गांधीजी के साथ सादे कपड़ों में पुलिस है, और वे मुसलमानों को गिरफ़्तार कर लेगी। इस कारण से उनकी प्रार्थना सभा में मुसलमानों को उपस्थिति काफी कम हो गई। काजिरखिल में एक हिन्दू के नष्ट कर दिए घर में कैम्प का डेरा डाला गया। यहां से चार मील की दूरी पर गांधीजी के आश्रम की सहयोगी बीबी अमतुस इस्लाम ने सहायता केन्द्र खोल लिया था। गांधीजी के आ जाने के बाद और बीबी अमतुस इस्लाम के प्रयासों से इन इलाक़ों में कई गांवों की हिन्दू स्त्रियां, जो उपद्रव के दौरान मुसलमान बना दी गई थीं, अपने मूल धर्म में फिर से वापस आ गई थीं। कुछ ही दिनों में समूचे नोआखाली ज़िले में ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया हुआ कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं रहा, जो अपने मूल धर्म में वापस न आ गया हो।

19 नवंबर को गांधीजी ने घोषणा के साथ श्रीरामपुर के लिए प्रस्थान किया कि अब से वे किसी मुस्लिम परिवार के यहां रहेंगे। उनके मुस्लिम होस्ट ने गांधीजी से पूछा कि इतनी मुश्किल तीर्थयात्रा करने के बजाय उन्होंने जिन्ना के साथ समझौता क्यों नहीं किया। उन्होंने जवाब दिया कि लीडर उनके फॉलोअर्स बनाते हैं। लोगों को आपस में शांति बनानी चाहिए और 'तब पड़ोसियों के बीच शांति की उनकी इच्छा उनके लीडर्स में दिखेगी... अगर कोई पड़ोसी बीमार होता तो क्या वे कांग्रेस या लीग के पास यह पूछने जाते कि क्या किया जाना चाहिए?'

गांधीजी के पोते की बहू आभा गांधी, जो पिछले कुछ सालों से उनकी देखभाल किया करती थीं,   नोआखाली तक तो उनके साथ आई थी। श्रीरामपुर के लिए प्रस्थान के समय गांधीजी ने उसे ठक्करबापा के अधीन काम करने के लिए चार मंडल नामक एक गांव में छोड़ दिया था। प्यारेलाल, सुशीला नैयर, कनु गांधी और सुचेता कृपलानी अलग-अलग गांव में जा बसे। अम्तुस्सलाम, जो गांधीजी के आश्रम की एक मुसलमान बहन थीं, और गांधीजी की दत्तक पुत्री बन गई थीं। उन्हें सिरंदी गांव में नियुक्त किया गया था। डॉ. सुशीला पै बंबई विश्वविद्यालय की स्नातक और गांधीजी के सचिव मंडली की एक सहायिका थीं। उन्हें कारपाड़ा गांव में नियुक्त किया गया था। उनके प्रयासों से वहां की स्त्रियों में साहस का संचार हुआ। उन्होंने लोगों में शिक्षा फैलाने का काम भी किया। स्थानीय पाठशाला शुरू हो सकी। प्रभुदास गांधीजी के दल में कार्यालय सहायक का काम करने वाला एक नवयुवक था। उन्हें पारकोट का भार सौंपा गया था। प्यारेलाल उनके सचिव थे। उन्हें भटियालपुर का काम देखने का भार था और प्यारेलाल की बहन डॉ. सुशीला नायर जिन्होंने सभी जातियों के ग़रीबों के ईलाज़ के लिए चांगीरगांव में एक मुफ़्त दवाख़ाना खोल लिया था। कनु गांधी गांधीजी के पोते उन्हें रामदेवपुर का काम संभालने को कहा गया था और उनकी पत्नी आभा गांधी को हैमचर का। यहां पर ठक्करबापा ने अपना शिविर लगाया हुआ था।

ये लोग उन गांवों में उपद्रव पीड़ित परिवार के मेहमान बनकर रहते थे। इन गांवों के अधिकांश हिन्दू गांव छोड़कर चले गए थे। जो नहीं गए थे, उन्हें ज़बरन मुसलमान बना दिया गया था। हिन्दू स्त्रियां सुहाग का चिह्न सिंदूर भी लगाने से डरती थीं। पुरुषों का साहस भी भय से टूट चुका था। इन लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में सामूहिक श्रमदान से साफ-सफाई का काम आरंभ किया। मुसलमानों से मित्रता की। लोगों में वापस लौट आने का विश्वास जगाया। उनके लिए राशन-पानी, दवा-दारू का इंतज़ाम किया। सड़कों, पुलों का पुनर्निर्माण कराया। इस तरह गांधीजी के मार्गदर्शन, निर्देशन और नियंत्रण में जगह-जगह गांधी-शिविर चलाए जा रहे थे। इन शिविरों में अहिंसा की शक्ति का अनोखा प्रयोग सफलतापूर्वक चल रहा था। इन शिविरों के कार्यकर्ताओं की गांधीजी के प्रति गहरी निष्ठा थी। उनके आदर्शों में इनकी श्रद्धा थी। इन प्रयोगों के आश्चर्यजनक परिणाम आए।

20 नवंबर, 1946 को नोआखाली में उन्होंने अंतिम प्रार्थना की और छावनी भंग कर दी। फिर अपने स्टेनोग्राफर और बंगाली दुभाषिया प्रोफेसर निर्मलकुमार बोस को ले कर श्रीरामपुर की दिशा में चल पड़े।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

गुरुवार, 5 मार्च 2026

449. नोआखाली में शान्ति यात्रा-3

गांधी और गांधीवाद

449. नोआखाली में शान्ति यात्रा-3

1946

नोआखाली के लिए प्रस्थान

आधा अनशन करते हुए और दिल में चिंता लिए 6 नवंबर 1946 को गांधीजी, शांतिदल के सदस्य और बंगाल सरकार के प्रतिनिधियों के साथ सोदपुर से नोआखाली के लिए स्पेशल ट्रेन से प्रस्थान किए। उनके साथ बंगाल सरकार का वाणिज्य मंत्री शमसुद्दीन अहमद और दो संसदीय सचिव नसरुल्लाख़ान और अब्दुर रशीद भी थे। उनकी सुविधा का ध्यान रखने और ज़रूरत पड़ने पर सरकारी मदद पक्का करने के लिए, चीफ मिनिस्टर खुद उनके साथ जाने वाले थे, लेकिन वे कलकत्ता में ही रुक गए। इस बार गांधीजी ईस्ट बंगाल एक कांग्रेसी के तौर पर नहीं जा रहे थे। वह वहां भगवान के सेवक के तौर पर जा रहे थे। अगर वह नोआखाली की नाराज़ औरतों के आंसू पोंछ सकें, तो उन्हें बहुत खुशी होगी।

रेल के रास्ते में गोआलंदो अंतिम स्टेशन था। गोवालैंडो से नदी का सफ़र शुरू हुआ। वहां से पद्मा नदी की 100 मील की यात्रा स्टीमर से शुरू हुई। जिनमें प्रो. निर्मल कुमार बसु और परशुराम और मनु गांधी भी थीं। रात को देर से वह चांदीपुर पहुंचे। वहाँ सरदार पटेल का एक ज़रूरी तार उनका इंतज़ार कर रहा था। वह चाहते थे कि ट्रंक टेलीफ़ोन से तुरंत दिल्ली जवाब भेजा जाए, लेकिन कोई भी टेलीफ़ोन सर्किट काम नहीं कर रहा था। किनारे पर मिलिट्री से बात करने की कोशिश की गई। वे भी मदद नहीं कर सके। ज़ाहिर है, हालात बहुत खराब थे। उन्होंने रात स्टीमर पर ही गुज़ारी।

स्टीमर एस.एस. कीवी पर दो शिष्टमंडल गांधीजी से मिलने आया। पहले शिष्टमंडल में मुस्लिम लीग का दल उनसे मिला। वे गुस्से और गुस्से वाले मूड में लग रहे थे। उनमें से एक ने कहा, ‘यहां कुछ भी नहीं हुआ है। यह सब अख़बार वालों का ग़लत प्रचार है। मुश्किल से पन्द्रह हिन्दू मारे गए हैं।’ दूसरे ने कहा, ‘नाहक में हिन्दू भाग गए हैं। मुसलमानों को बदनाम करने के लिए झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। सेना और पुलिस के आने से क्षेत्र में अशांति फैली। सेना की गोलियों से तीस से अधिक मुस्लिम मारे गए हैं। सेना में अधिकांश हिन्दू थे।’ गांधीजी ने धैर्यपूर्वक उन्हें सुना। फिर बोले, अगर नोआखाली में दंगे नहीं हुए हैं, तो मिलिट्री को क्यों बुलाना पड़ा? अगर एक भी महिला के साथ बलात्कार हुआ है, या अनिच्छा से धर्म परिवर्तन हुआ है, तो सज्जनों के लिए यह शर्म की बात है। पुलिस और फौज से अमन-चैन स्थापित नहीं हो सकता। ऐसे जबरन धर्म परिवर्तन से धर्म का क्षय ही होना है। किसी ने कहा, हम गांवों में जाकर शांति स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन हिंदू भरोसा नहीं करते। गांधीजी ने कहा, कोई बात नहीं, मैं और आप मिलकर दूर के गांव-गांव जाकर लोगों में श्रद्धा जगाएंगे। हमें न पुलिस और न ही फौज की ज़रूरत है।

दूसरे शिष्टमंडल में बीस कांग्रेसी हिंदू गांधीजी से भी मिले। वे बहुत डरे हुए थे। गांधीजी ने उनसे कहा, कितनी ही बड़ी सैन्य शक्ति क्यों न हो पर कायरों की कोई रक्षा नहीं कर सकता। जबरन धर्म परिवर्तन और औरतों के साथ बलात्कार कैसे सहन कर लिया आपने? आप लोग असहाय बन गए हैं, क्योंकि आप बाहरी सहायता के आदी हो गए हैं। मैं नहीं चाहता कि आप लोग यहां से कहीं जाएं। कई हिन्दुओं ने कहा, हमारी संख्या बहुत कम है और हमारे पास हथियार भी नहीं है। गांधीजी ने उन्हें समझाया, सल्तनत के पास बंदूक और तोपों की कमी नहीं थी और हमारे देशवासियों के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं थे। लेकिन लोगों ने अहिंसा और सत्याग्रह को हथियार बना लिया। आज वो देश छोड़कर जाने की सोच रहे हैं। इसलिए हथियार से रक्षण होगा, यह सोचना भी ग़लत है। देश की आज़ादी का प्रश्न है। यह मात्र नोआखाली का प्रश्न नहीं है। यह देश की आज़ादी का सवाल है और नोआखाली में इसका निर्णय होने वाला है।

जब वे चांदीपुर पहुँचे, तो गांधीजी तुरंत एक गाँव में गए जहाँ हिंदुओं का कत्लेआम हुआ था। जली हुई लाशें एक आँगन में पड़ी थीं, दरवाज़ों पर अभी भी खून के धब्बे थे, और छिपे हुए गहनों की तलाश में फ़र्श खोद दिए गए थे। उन्होंने हिंदू औरतों के ज़बरदस्ती धर्म बदलने, किडनैप करने और मुसलमानों से ज़बरदस्ती शादी की कहानियाँ सुनी थीं। मुसलमान अपने घरों से चुपचाप झाँक रहे थे, और साफ़ नीले आसमान के सामने ताड़ के पेड़ लहरा रहे थे।

दूसरे दिन सुबह रेल द्वारा नोआखाली में अपने गंतव्य चौमुहानी के लिए रवाना हुए। नोआखाली में डरे हुए हिंदू मुस्लिम हिंसा से डरकर भाग रहे थे। डर आज़ादी और डेमोक्रेसी का दुश्मन है। अहिंसक बहादुरी हिंसा का इलाज है। वह नोआखाली के हिंदुओं के साथ बहादुरी से पेश आकर उन्हें बहादुर बनना सिखाएंगे। उतना ही ज़रूरी, गांधीजी यह जानना चाहते थे कि क्या वह मुसलमानों पर असर डाल सकते हैं। अगर वे अहिंसा, बदला न लेने और भाईचारे की भावना तक नहीं पहुँच पाते, तो एक आज़ाद, एकजुट भारत कैसे बन सकता था?

7 नवंबर, 1946 को वे चौमुहानी पहुंचे, जहाँ गांधीजी ने कुछ समय के लिए अपना हेडक्वार्टर बनाया। सांप्रदायिकता की आग में नोआखाली झुलस रहा था। जब महात्मा गांधी यहां आए थे, तब दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की कवायद जारी थी। उस वक्त महात्मा गांधी दिल्ली से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर सांप्रदायिकता की आग में जल रहे पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में अमन बहाली की कोशिशों में जुटे थे। कांग्रेस अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी की पत्नी सुचेता कृपलानी अपने दल के साथ पहले से ही वहां थीं। उन्होंने गांधीजी को बताया कि हालात कितने बदतर हो गए हैं। यह अफ़वाह फैलाया जा रहा है कि बदला लेने के लिए 15,000 हिन्दू अपराधियों को लाया जा रहा है। गांधीजी के साथ चल रही पुलिस और सेना स्थानीय निर्दोष मुसलमानों को सताने आए हैं। लेकिन यह सब अफ़वाह काम नहीं किया।

चौमुहानी में शहर तो किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचा हुआ था, लेकिन उसके आस-पास का पूरा इलाका आग की लपटों में घिरा हुआ था। सभी वर्गों में घबराहट, गुस्सा और निराशा थी। कोई भी आगे आकर मदद करने को तैयार नहीं था; हर कोई डर से भरा हुआ था। स्टेशन के बाहर गांधीजी ने एक जनसभा की थी। गांधीजी की प्रार्थना सभा में पन्द्रह हज़ार से अधिक की भीड़ जुटी, जिसमें अधिकांश मुसलमान ही थे। जनसभा में गांधीजी ने मुसलमानों और हिंदुओं से आपसी भाईचारे बनाए रखने की अपील की थी। ये घटनाएँ इस्लाम के अच्छे नाम पर एक धब्बा हैं। "मैंने कुरान पढ़ी है। इस्लाम शब्द का मतलब ही शांति है। मुसलमानों का सलाम, 'सलाम अलैकुम', सबके लिए एक जैसा है, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, या कोई और। इस्लाम कहीं भी ऐसी चीज़ों को मंज़ूरी नहीं देता जो नोआखाली और टिप्पेरा में हुईं।" शहीद साहब और कलकत्ता में उनसे मिलने वाले सभी मंत्रियों और लीग के नेताओं ने ऐसे कामों की साफ़ तौर पर बुराई की थी। उन्होंने आखिर में कहा, "ईस्ट बंगाल में मुसलमान इतने ज़्यादा हैं कि मैं उनसे उम्मीद करता हूँ कि वे खुद को छोटी हिंदू माइनॉरिटी का गार्डियन बना लें। उन्हें हिंदू औरतों से कहना चाहिए कि जब तक वे वहाँ हैं, कोई भी उन पर बुरी नज़र डालने की हिम्मत न करे।"

सोनाईमुरी रेलवे स्टेशन से बीस किलोमीटर की दूरी पर  स्थित जायग बाज़ार में गांधी आश्रम की स्थापना की गयी। 1946 से पहले वह संपत्ति नोआखाली के पहले बैरिस्टर हेमंत कुमार घोष की थी, और उसे घोष विला के नाम से जाना जाता था। मैट्रिक करने के बाद घोष बाबू कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज ग्रैजुएशन करने चले गए। जतिंद्र मोहन सेनगुप्ता और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद उनके अच्छे मित्र थे। साल 1910 में लंदन से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। इस दौरान कई वर्षों तक उन्हें जेल में रहना पड़ा और काला-पानी की सज़ा झेलनी पड़ी। जिस समय नोआखाली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, उस समय उनका परिवार लखनऊ में था। वहां वे स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के मुक़दमे मुफ़्त में लड़ते थे। वे महात्मा गांधी के विचारों से काफ़ी प्रभावित थे। नोआखाली में शांति स्थापना को लेकर गांधीजी के प्रयासों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी तमाम संपत्ति 2,671 एकड़ ज़मीन महात्मा गांधी के नाम कर दी। गांधीजी ने यहां अंबिका कलिंग चेरिटेबल ट्रस्ट बनाकर हिंसा प्रभावित गांवों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू करवाईं। नोआखाली सांप्रदायिक हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने चार महीनों तक नोआखाली के हिंसा प्रभावित गांवों का भ्रमण कर शांति समितियां गठित की थी।

नोआखाली पहुँच कर सबसे पहले गांधीजी ने वहां के प्रशासनिक अमले से मुलाकात की। अँग्रेज़ कलक्टर ने गांधीजी को आश्वासन दिया कि सबको सुरक्षा दी जाएगी। वहां के मुस्लिम पुलिस अधीक्षक अब्दुल्ला ने भी गांधीजी को आश्वस्त किया कि उसके रहते किसी की हत्या नहीं होगी। इस पर गांधीजी ने कहा कि यदि अब किसी की हत्या हुई तो मैं आपके दरवाजे पर मरूंगा। पुलिस अधीक्षक ने कहा ऐसा होने से पहले मैं मर जाऊँगा। अधिकारियों ने यह दिखाने की कोशिश की कि हर जगह सिक्योरिटी है; कोई नई घटना नहीं हो रही थी, और न ही तबाही उतनी गंभीर थी जितनी अखबारों में बताई जा रही थी। कंपनी में से एक ने बताया कि कुछ दिन पहले ही गांधीजी की प्रार्थना सभा से घर लौटते समय दो वॉलंटियर लापता पाए गए थे। क्या पुलिस सुपरिटेंडेंट और दूसरे अधिकारी उन लड़कों का पता लगाएंगे? वे चुप थे। तीन दिन बाद एक लड़के की लाश खाल में तैरती हुई मिली। पुलिस के खिलाफ भी शिकायतें थीं। आरोप था कि पुलिस ने गुंडों को पकड़ने में कम जोश दिखाया, जिनके साथ वे अक्सर मिलते-जुलते देखे जाते थे। कई हिंदुओं पर मस्जिदों और मुस्लिम घरों में आग लगाने का आरोप लगाया गया था, जो मौजूदा हालात में, पहली नज़र में ही बेतुका था। कुछ लोगों ने पुलिस सुपरिटेंडेंट पर दंगों से पहले और उसके दौरान उनके बर्ताव के बारे में खुलेआम आरोप लगाए, लेकिन उन्होंने आरोपों पर सिर्फ़ हल्के में मुस्कुराया; उनके कंधे पर कोई असर नहीं हुआ। जब अपराधियों को पकड़ने का सवाल उठाया गया तो पुलिस सुपरिटेंडेंट ने अपने पास मौजूद टास्क-फोर्स की कमी के बारे में बताया।

2 मार्च 1947 तक नोआखाली की यात्रा में सतहत्तर वर्षीय गांधीजी 49 गांवों में घूमे। गांवों में पहुंचकर वे किसी ग्रामीण की झोंपड़ी में और खासकर किसी मुसलमान के यहां जाते और कहते कि वह उनको और उनके साथियों को अपने यहां ठहरा लें। यदि दुत्कार मिलती तो अगली झोंपड़ी में कोशिश करते। गांधीजी ने देखा कि पूर्वी बंगाल के गांवों में भय, घृणा और हिंसा का बोलबाला था। गांव-गांव में जाकर उन्होंने लोगों की दशा अपने आंखों से देखी। गांधीजी ने इस बात की कोशिश की कि लोग शांति स्थापना को, राजनीति से अलग कर, शुद्ध मानवता का प्रश्न समझें। उन्होंने आग्रह किया कि भारत का भावी नक्शा चाहे जो भी हो, सभी राजनीतिक दलों में इस बात पर पूर्ण सहमति होनी चाहिए कि सभ्य जीवन के मानदंडों की अवहेलना नहीं होगी। गांधीजी ने लोगों को निडरता का सबक सिखाया था। हज़ारों मुसलमानों का अपने बीच मुट्ठी भर हिंदुओं को मारना कोई हिम्मत की बात नहीं है, लेकिन हिंदुओं का अपनी औरतों के अपहरण और रेप, ज़बरदस्ती धर्म बदलने और ज़बरदस्ती शादी के गवाह बनकर इतनी कायरता से खुद को गिराना दिल दहला देने वाला है।

शुरुआत में, गांधी के कई साथियों ने सुझाव दिया कि उन्हें हिंदुओं से अपील करनी चाहिए कि वे प्रभावित इलाकों को छोड़कर दूसरे प्रांतों में बस जाएं। उन्होंने इस तरह की हार मानने की बात को पूरी तरह से मना कर दिया। आबादी की अदला-बदली करना भारत को एक रखने के नामुमकिन होने की पहचान होगी। इसके अलावा, यह गांधीजी के विश्वास की एक बुनियादी बात को नकारना होगा: कि जो लोग अलग हैं या खुद को अलग समझते हैं, उनके बीच एक अपनापन होता है या आसानी से बन सकता है।

उन्होंने दोनों धार्मिक समुदायों के लोगों से बात की। एक बार वह मुसलमानों के एक ग्रुप के बीच एक झोपड़ी के फ़र्श पर बैठे थे और अहिंसा की खूबसूरती पर बात कर रहे थे। सुचेता कृपलानी ने महात्मा को एक नोट दिया जिसमें लिखा था कि उनकी दाईं ओर बैठे आदमी ने हाल के दंगों में कई हिंदुओं को मार डाला है। गांधीजी हल्के से मुसकुराए और बोलते रहे। जब तक आप कातिल को फांसी नहीं देते—और गांधीजी फांसी में विश्वास नहीं करते थे—आपको उसे अच्छाई से ठीक करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर आप उसे जेल में डालेंगे तो दूसरे लोग भी होंगे। गांधीजी जानते थे कि वह एक सामाजिक बीमारी से जूझ रहे हैं; एक या कई लोगों को खत्म करने से वह खत्म नहीं हो सकती। जिन अपराधियों को बदले की कार्रवाई का डर था, वे हाईवे पर ही रहेंगे और अपने जुर्म दोहराते रहेंगे। इसलिए गांधीजी ने उन्हें माफ़ कर दिया और ऐसा कहा, और हिंदुओं से भी कहा कि वे उन्हें माफ़ कर दें; असल में उन्होंने उनसे कहा कि वह भी उनकी गलती समझते हैं क्योंकि वह हिंदू-मुस्लिम दुश्मनी को दूर करने में नाकाम रहे थे।

एक गाँव में गांधीजी ने एक युवा मुस्लिम शिष्या, मिस अम्तुल सलाम को भेजा था। उसने पाया कि मुसलमान अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ बुरा बर्ताव करते रहते हैं। फिलिप्स टैलबोट की रिपोर्ट के अनुसार, 'गांधीवादी परंपरा के अनुसार, उसने तब तक खाना नहीं खाने का फैसला किया जब तक मुसलमान बलि की तलवार वापस नहीं कर देते, जो अक्टूबर की उथल-पुथल के दौरान एक हिंदू घर से लूट ली गई थी। अब, एक उपवास अपने मकसद पर बहुत ज़्यादा सामाजिक दबाव डालता है, जैसा कि भारतीयों ने बहुत पहले सीख लिया है। तलवार कभी नहीं मिली। शायद उसे किसी तालाब में गिरा दिया गया था। जो भी हुआ हो, घबराए हुए मुस्लिम निवासी लगभग किसी भी बात के लिए तैयार थे जब मिस सलाम के उपवास के पच्चीसवें दिन गांधीजी उस गाँव में पहुँचे। उनके डॉक्टर ने बताया कि उनकी ज़िंदगी कमज़ोर पड़ रही थी। घंटों की बातचीत के बाद (जिसे... गांधीजी ने कैबिनेट डेलीगेशन की बातचीत जितनी ही गंभीरता से लिया) गांधीजी ने गांव के नेताओं को एक कसम पर साइन करने के लिए मनाया कि वे फिर कभी हिंदुओं को परेशान नहीं करेंगे।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

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