राष्ट्रीय आन्दोलन
456. मुस्लिम लीग-2
1946 का चुनाव
1946 के चुनाव में ग्यारह में से बंगाल, सिंध और
पंजाब को छोड़कर आठ प्रांतों में कांग्रेस को बहुमत मिला और उसने अपनी सरकार बनाई।
लीग के नेतृत्व में बंगाल और सिंध में मिली-जुली सरकारें बनी। सामान्य श्रेणी में कांग्रेस को भारी सफ़लता मिली जबकि मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। राजनीतिक ध्रुवीकरण पूरा हो चुका था। मुस्लिम
सीटों पर लीग की विजय हुई। केन्द्र की (सेन्ट्रल एसेम्बली) आरक्षित सभी 30 मुस्लिम
सीट लीग को मिली। प्रांतों में 509 मुस्लिम सीटों में से लीग को 472 सीटें मिलीं।
9 साल पहले बुरी तरह पिटी लीग ने इस चुनाव में अपने-आपको मुसलमानों की प्रमुख
पार्टी के रूप में स्थापित कर लिया था। केवल एक ही जगह थी जहाँ मुसलमानों ने लीग
को नहीं चुना, वह थी पश्चिमोत्तर प्रान्त। अन्यथा अन्य सभी
जगहों पर जिन्ना और पाकिस्तान के आह्वान को मुसलमानों का वोट मिला। सिंध और बंगाल
में लीग को बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन वह वहां
सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसने वहां मिली-जुली सरकार बनाई।
कैबिनेट-मिशन
भारतीयों को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से शासन सौंपने की शर्तों और भारत के
भावी संविधान की रूपरेखा बनाने के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं पर भारतीय नेताओं और
वायसराय से विचार करने के लिए कैबिनेट मिशन दिल्ली पहुंचा। 24 मार्च से जून 1946
तक शिमला में मिशन भारतीय नेताओं से बातचीत करता रहा। ‘मिशन’ के समक्ष मुख्य
प्रश्न भारत की एकता अथवा विभाजन से संबंधित था। लीग की तरफ़ से सुझाव आया कि संविधान
सभा के तीन भाग होने चाहिए – एक हिन्दुओं के बहुमत वाले राज्य, दूसरे मुस्लिमों के
बहुमत वाले राज्य और तीसरा रियासतों के लिए। जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर अड़ा हुआ
था। कांग्रेस ने मुसलिम लीग से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। कांग्रेस का मानना था
कि असम और पश्चिमोत्तर प्रान्त को ‘पाकिस्तान समूह’ में न जाने का
हक़ मिलना चाहिए। लीग इसके ख़िलाफ़ थी। दुर्भाग्य से अपनी बेहतरीन इच्छाओं और अपनी
समस्त राजनीतिक कुशलताओं के बावजूद कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य कांग्रेस और लीग को
एक मंच पर नहीं ला सके। इस मूल प्रश्न पर बातचीत में गतिरोध पैदा हो गया कि भारत
की एकता बनी रहेगी अथवा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को पूरा करने के लिए देश
का विभाजन होगा। कांग्रेस विभाजन का विरोध कर रही थी। लीग की तरफ से जिन्ना अक्खड़
और अनुदार बना हुआ था। उसने मिशन पर ‘लीग की उपेक्षा’ का आरोप लगाया। उसने मिशन के
प्रयत्न को ‘घोर विश्वासघात’ कहकर उसकी निन्दा की। कांग्रेस और लीग के आपसी मतभेद
दूर नहीं हो सके। जिन्ना की पाकिस्तान की मांग पर वार्ता अटक गई। जो बातें
कांग्रेस की तरफ़ से प्रस्तुत की गई जिन्ना ने उसे ठुकरा दिया और जिन्ना जो
प्रस्ताव दे रहा था, वह किसी को मंज़ूर नहीं था। 12 मई को घोषणा कर दी गई कि
कैबिनेट मिशन कांग्रेस और लीग के बीच सहमति नहीं ला सका। अपनी असफलता स्वीकार करते
हुए मिशन दिल्ली लौट आया।
समझौता योजना
इस गतिरोध की
अवस्था में कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 को एक वक्तव्य में अपनी समझौता योजना
पेश की। उन्होंने भारत के लिए तीन स्तरीय संवैधानिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की।
जिन्ना संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान की मांग कर रहा था। मिशन का कहना था कि संप्रभुता
सम्पन्न पाकिस्तान का बनाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें ग़ैर-मुस्लिमों की
बहुत बड़ी संख्या रहेगी। सांप्रदायिक आत्मनिर्णय के जिस सिद्धांत की बात लीग कर रही
थी उसके अंतर्गत पश्चिमी बंगाल के कलकत्ता जैसे हिन्दू बहुल क्षेत्रों और पंजाब से
अंबाला और जलंधर को अलग करना पड़ता। बंगाल और पंजाब का विभाजन अनेक प्रशासनिक और
सैन्य समस्याएं उत्पन्न करता। इस योजना की जिन्ना ने पहले तो आलोचना की, पर बाद
में मुस्लिम लीग ने ऊपर से तो इस योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन यह स्वीकृति
वास्तविक न होकर दिखावा मात्र थी। लीग इस योजना को अनिवार्य करके इसे पाकिस्तान की
स्थापना का साधन बनाना चाहती थी। जिन्ना का तर्क था कि मुसलमान कोई जाति नहीं है,
एक ‘राष्ट्र’ है और एक राष्ट्र के नाते उनका संख्याबल चाहे जितना हो, तो भी किसी
रची जाने वाली सरकार में बहुमत वाले समुदाय के साथ उन्हें समान प्रतिनिधित्व मिलना
चाहिए। इस सिद्धान्त को कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया। कैबिनेट मिशन-योजना में समझौते
का प्रयास था, लेकिन यह कांग्रेस और लीग को एकमत
नहीं कर सकी। जिन्ना को मनाने की पुरज़ोर कोशिश की गई, लेकिन सब असफल रहे। कैबिनेट
मिशन ने एक वक्तव्य निकाल कर जहां एक ओर बातचीत बन्द करने का ऐलान कर दिया वहीं
दूसरी ओर अन्तरिम सरकार बनाने के लिए अपना प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया।
मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त को ‘सीधी कार्रवाई’ का दिन
जिन्ना यह आस लगाए बैठा था कि अंग्रेज़ कांग्रेस के बिना उसे सरकार बनाने का
निमंत्रण देंगे। लेकिन हुआ इसके विपरीत। मिशन ने उसे सूचना दी कि कांग्रेस ने 16
मई की योजना को स्वीकार कर लिया है, इसलिए कांग्रेस और लीग दोनों मिलकर सरकार
बनाने के योग्य हैं। लेकिन कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार बनाने में असमर्थता प्रकट कर
दी है। जिन्ना को आशा थी कि वायसराय कांग्रेस के बिना सरकार बनाने के लिए
कर्तव्यबद्ध है। लेकिन मिशन ने अपनी राय रखते हुए कहा कि यदि कांग्रेस मिश्र सरकार
में आने के लिए तैयार नहीं होती तो मिश्र सरकार की योजना का अन्त हो जाता है।
मुस्लिम लीग के जिन्ना को इससे गुस्सा आया। जिन्ना को लगा कि उसे उसकी ही चाल से
छकाया गया है। उसके साथ धोखा हुआ है। उसने मांग की कि चूंकि अन्तरिम सरकार का
मामला अभी स्थगित कर दिया गया है, इसलिए संविधान सभा का चुनाव भी स्थगित कर दिया
जाना चाहिए। मिशन ने उसकी इस मांग को ठुकरा दिया। इससे क्रोधित जिन्ना ने कांग्रेस
पर ‘बेईमानी’, वेवेल पर ‘दगाबाजी’ और मिशन पर
घोर ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाया। अब मुस्लिम लीग ने सार्वजनिक तौर पर वैधानिक
तरीक़ों को तिलांजलि दे दी। 29 जुलाई को मुस्लिम लीग की केन्द्रीय समिति ने कैबिनेट
मिशन की योजना का अपना समर्थन वापस ले लिया। उसने विधान-परिषद के बहिष्कार की
घोषणा कर दी। उसने 16 अगस्त, 1946 को
पाकिस्तान के लिए सीधी कार्रवाई करने का
निश्चय किया। पाकिस्तान हासिल करने के लिए जिन्ना ने घोषणा की, “मुसलमानों को
आगामी संग्राम के लिए संगठित किया जाए और वह संग्राम जैसे और जब ज़रूरी हो छेड़ा जाए।” लीगियों ने
नारा दिया, ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’।
साम्प्रदायिक दंगे - डायरेक्ट एक्शन डे
जिन्ना ने अपने भाषणों में ऐलान किया कि पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए हर तरह
का संघर्ष किया जाएगा। मुसलिम लीग की हिंसा की साफ घोषणा के कारण एक के बाद एक
बारूद की ऐसी ढेरियां सुलगती गईं कि देश के कोने-कोने में ज्वाला भभक पड़ी और उससे
अपार धन-जन की हानि हुई। सीधी कार्रवाई के लिए लीग का आह्वान, धर्म के नाम पर और
पूरी सरकार के तत्वावधान में कलकत्ता में ऐसा भीषण दंगा, खून-खराबा और
मारकाट हुई जिसकी मिसाल नहीं मिल सकती। 16 अगस्त से 19 अगस्त तक, चार दिनों तक शहर
पर गुंडों का आतंक छाया रहा और भीषण नर-संहार हुआ। पूरा नगर दोतरफ़े पागलपन के
थपेड़ों की चपेट में आ गया। समूचे कलकत्ता की सड़कें लाशों से अटी पड़ी थीं। कलकत्ता
के इस महा-नरसंहार में 5,000 से अधिक लोग मारे गए, 15,000 से अधिक
लोग घायल हुए और लाखों लोग बेघर हो गए। कलकत्ता प्रतिशोध का आक्रोश सारे देश में
फैल गया।
अंतरिम सरकार में लीग का प्रवेश
कांग्रेस और लीग, दोनों कैबिनेट मिशन की योजना तकरीबन
कबूल कर चुकी थी। कांग्रेस और लीग दोनों अपने हिसाब से कैबिनेट मिशन की योजना का
मतलब निकाल रहे थे। नेहरू ने लीग को अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा लेकिन उसने
सहयोग देने से इनकार कर दिया। महात्मा गांधी की अनुमति से 2 सितंबर को कांग्रेसी मंत्रियों ने अपने पद
ग्रहण किए। मुस्लिम लीग ने 2 सितंबर को विरोध दिवस के रूप में मनाया। काले झंडे
लेकर जगह-जगह प्रदर्शन किया। कैबिनेट मिशन देश को वैधानिक चक्रव्यूह में फंसाकर
चला गया था। वायसराय वेवेल अब भी लीग को अंतरिम सरकार में शामिल हो जाने के लिए
मनाने का प्रयत्न कर रहा था। लीग ने अपनी नीति बदल ली। अब वह सरकार में प्रवेश कर
पाकिस्तान लेने की योजना बनाने लगी। लीग ने 15 अक्तूबर को अन्तरिम सरकार में आने
की घोषणा की। अंततः 26 अक्तूबर, 1946 को लीग अंतरिम सरकार में शामिल हो गई। लेकिन
यहां कांग्रेस का विरोध करना उसका एकमात्र उद्देश्य रह गया था। लीग सरकार में केवल
उसे अंदर से तोड़ने के लिए ही शामिल हुई थी। अड़ंगावादी नीति अपना कर लीग ने सरकार
चलना मुश्किल कर दिया। लीग के प्रतिनिधियों ने अपने अधीन विभागों के सभी
महत्वपूर्ण पदों पर अपनी पसंद के मुसलमान रखने का काम शुरू कर दिया। मंत्रिमंडल के
सचिवालय में भीतर की खबर लाने वाले जासूस बिठा दिए। वे प्रशासन के कार्य में बाधा
डालने लगे। लीग के सदस्यों ने, जिन विषयों में कोई मतभेद नहीं था, उनमें भी
कांग्रेसी मंत्रियों के साथ सहयोग करने से इंकार कर दिया। इस संयुक्त मंत्रिमंडल
से राजनीतिक वाद विवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा।
एटली की घोषणा
मुस्लिम लीग कैबिनेट
मिशन की योजना से मुकर गई थी। फरवरी में उसने संविधान सभा में सम्मिलित होने से और
मंत्रिमंडल की कार्रवाही में सहयोग करने से इंकार कर दिया था। फलस्वरूप एक बड़ा संवैधानिक
संकट उत्पन्न हो गया। कांग्रेस भी लीगी मंत्रियों के इस्तीफ़े की मांग कर रही थी। कांग्रेस
ने तो यहां तक कह दिया था कि यदि उसकी मांगे पूरी नहीं हुईं, तो वह भी अंतरिम सरकार
से अपने सदस्यों को वापस बुला लेगी। एटली ने लंदन में कांग्रेसी और लीगी नेताओं से
बातचीत की आख़िरी कोशिश के तहत एक सम्मेलन बुलाया। दिसंबर, 1946 में लंदन में हुए सम्मेलन में प्रधानमंत्री एटली
के प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और लीग के मतभेद दूर नहीं हुए। राजनीतिक शतरंज
के चतुर खिलाड़ी जिन्ना ने अपने दुराग्रह से सबको छका कर रखा हुआ था। स्थिति को अराजकता
की ओर बढ़ते देख कर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेण्ट एटली इस नतीजे पर पहुंचे कि एक
नई नीति की जरूरत है और एक नया वायसराय ही उसे कार्य रूप दे सकेगा। 20 फरवरी, 1947 को, उन्होंने हाउस ऑफ
कामंस में घोषणा की कि “ब्रिटिश सरकार ने
जून, 1948 तक भारत छोड़ने
का पक्का इरादा कर लिया है और यदि उस समय तक भारतीय राजनैतिक दल अखिल भारतीय संविधान
के विषय में एकमत न हो सके तो ब्रिटिश भारत में किसी तरह की केंद्रीय सरकार को या कुछ
क्षेत्रों की तत्कालीन प्रांतीय सरकारों को सत्ता हस्तांतरित कर दी जाएगी।” एटली ने यह घोषणा की कि लॉर्ड वेवल के स्थान पर बर्मा में तैनात
लॉर्ड माउण्टबेटेन भारत के वायसराय होंगे।
माउंटबेटन योजना
लॉर्ड वेवल के स्थान
पर 22 मार्च को लॉर्ड माउण्टबेटेन भारत का वायसराय बनकर भारत पहुंचा। वी.पी. मेनन माउंटबेटन
के सलाहकार बने। 20 फरवरी की घोषणा के अनुसार अंग्रेज़ जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण
कर देने की बात कर चुके थे। कांग्रेस ने इसका स्वागत किया था। लेकिन इस घोषणा में लीग
की ‘विभाजन करो और चले जाओ’ की मांग को मान लिया गया था। इस आधार पर मुस्लिम लीग ने
भी इसका स्वागत किया। इधर लीग जगह-जगह हिंसा का सहारा लेकर साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने
में लगी रही। इससे विभिन्न राज्यों में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। भारत पहुंचते
ही लॉर्ड माउंटबेटन ने पहला काम यह किया कि जिन्ना और गांधीजी को पत्र लिखकर मिलने
के लिए उन्हें दिल्ली बुलाया।
माउंटबेटन की वार्ता
कांग्रेस
विभाजन का प्रस्ताव मान कर पाकिस्तान को मान्यता दे रही थी। लेकिन यह वह पाकिस्तान
नहीं था जिसकी जिन्ना मांग कर रहा था। उसने पंजाब और बंगाल के विभाजन का जोरदार
विरोध किया था। 6 अप्रैल को जिन्ना ने जब माउंटबेटन से भेंट की, तो उसने बंटवारे की
अपनी मांग पर ज़ोर दिया। 14 अप्रैल को गांधीजी ने वायसराय के निवेदन पर साम्प्रदायिक
शान्ति के लिए एक सम्मिलित अपील पर हस्ताक्षर कर दिया। उस अपील पर दूसरा हस्ताक्षर
जिन्ना का था। इस अपील में हिंसा के कृत्यों की निन्दा की गई थी और लोगों से अपील की
गई थी कि वे हिंसा के कृत्यों से दूर रहकर समाज में शान्ति फैलाएं। माउंटबेटन ने अपील
ज़ारी कर दी। जैसा कि होना था, इस अपील पर अमल होने की न तो संभावना थी और न ही हुई
भी। हां, मुस्लिम लीग को कूटनीति के शतरंज पर एक और चाल चलने का मौक़ा मिला। उसने यह
प्रचारित किया कि हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं – गांधीजी एक के प्रवक्ता हैं और
जिन्ना दूसरे के। मुस्लिम लीग के मुख पत्र ‘डॉन’ ने लिखा, “इस तरह की अपील
के लिए गांधीजी और जिन्ना को चुनना ही यह साबित करता है कि भारत में दो जातियां हैं,
दो राष्ट्र हैं, जो अपने-अपने नेता की बात मानते हैं।” शान्ति की यह अपील
क़ाग़ज़ पर ही धरी रह गई। सीमाप्रांत में लीग का ‘सीधी कार्रवाई’ का आंदोलन ज़ारी रहा।
उधर पंजाब में आग लगी हुई थी। मुसलिम लीग ने आतंक का राज क़ायम कर रखा था। पश्चिम पंजाब
से घर-बार छोड़कर हिन्दुओं का पलायन हो रहा था और दिल्ली में शरणार्थियों की संख्या
बढ़ती जा रही थी। बुरी होती परिस्थिति में माउंटबेटन ने 15 अगस्त, 1947 के दिवस को भारत
की स्वतंत्रता की घड़ी घोषित करने का फैसला लिया। इसके बाद 6 मई तक माउंटबेटन ने सभी
प्रमुख दलों के भारतीय नेताओं के साथ 133 मुलाक़ातें की। माउंटबेटन, कांग्रेस और मुस्लिम
लीग सब एक दूसरे से अलग-अलग कारणों से मतभेद रहते हुए भी चर्चा करते रहे।
मुस्लिम लीग के साथ मेल-मिलाप की आशा ख़त्म
अंतरिम सरकार में
कुछ महीने मुस्लिम लीग के साथ काम करके और उसके विचारों को बदलने की जी तोड़ कोशिश
को बेकार जाते देख चुकने के बाद कांग्रेसी नेता मुस्लिम लीग के साथ किसी तरह के गहरे
मेल-मिलाप या एकता की आशा छोड़ चुके थे। हालत यह हो गई कि उनके सामने एक ही विकल्प
था – अराजकता या विभाजन।
जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग पाकिस्तान
की अपनी मांग पर अड़ी रही। यह स्पष्ट हो गया कि भारत के विभाजन द्वारा ही राजनैतिक गतिरोध
दूर किया जाएगा। वायसराय इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि देश को विभाजित किए बिना
लीग और कांग्रेस की परस्पर-विरोधी आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता। अराजकता की
जो विभीषिका पूरे देश का संहार करने जा रही थी, उससे तीन चौथाई देश को बचाने के लिए कांग्रेस के नेताओं ने कलेजे
पर पत्थर रख कर विभाजन स्वीकार कर लिया।
माउंटबेटन का लंदन दौरा और जिन्ना की चाल
ब्रिटिश पार्लियामेंट
ने सलाह-मशविरे के लिए वायसराय को लंदन आने के लिए कहा। 18 मई को माउंटबेटन चला गया
और 28 मई को अपनी अन्तिम योजना के साथ दिल्ली लौट आया। मुसलिम लीग की
तरफ से जिन्ना ने एक और मांग पेश कर दी। उसे हज़ार मील का एक कॉरीडोर चाहिए था जो पश्चिम
बंगाल को पूर्व पाकिस्तान से जोड़ता। वायसराय की तरफ से इस पर विशेष ध्यान नहीं
दिया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बंटवारे की सहमति बन गयी, जिसपर कांग्रेस की ओर से मौलाना, लीग की ओर से जिन्ना और अंग्रेजों की ओर से माउंटबेटन ने साइन
किया था।
भारत के भाग्य का निर्णय
2 जून 1947 को 10 बजे वायसराय भवन में भारत के भाग्य का निर्णय लेने के लिए
नेताओं का सम्मेलन हुआ। कांग्रेस की ओर से नेहरू, पटेल और कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी
थे। लीग की तरफ़ से जिन्ना, लियाक़त अली ख़ां और रब निश्तर थे। सरदार बलदेव सिंह सिक्खों
के प्रतिनिधि थे। वायसराय ने कैबिनेट मिशन की योजना को मनवाने का आख़िरी प्रयत्न किया,
जिसे जिन्ना ने ठुकरा दिया। इसके बाद लॉर्ड
माउंटबेटन ने उनके सामने अपनी विभाजन की योजना पेश की।
माउंटबेटन की सत्ता हस्तांतरण योजना
3 जून को माउंटबेटन
की सत्ता हस्तांतरण योजना की घोषणा हुई, जिसके अनुसार 15 अगस्त, 1947 को दो उत्तराधिकारी राज्यों को सत्ता सौंपने की बात तय हुई।
कांग्रेसी नेताओं द्वारा इसे स्वीकार कर लिया गया। जिन्ना ने कटे-छंटे पाकिस्तान
की निंदा तो की थी, लेकिन यह कहते
हुए इसे स्वीकार कर लिया कि “नहीं पाकिस्तान
से, तो बेहतर है काना पाकिस्तान।” उसे सारे
मुस्लिम बहुल इलाक़े मिल रहे थे, पश्चिमोत्तर
प्रान्त भी, वहां जनमत
संग्रह का परिणाम उसके पाकिस्तान के पक्ष में आया था। लीग की काउंसिल की बैठक जिन्ना
की अध्यक्षता में 9 जून को दिल्ली में हुई। उसमें पंजाब और बंगाल के विभाजन पर खेद
प्रकट किया गया, लेकिन एक प्रस्ताव द्वारा ‘अमन और शांति’ (!) के हित में समझौते
के रूप में ब्रिटिश सरकार की योजना को स्वीकार कर लिया गया।
विभाजन स्वीकार कर लिया
गया
लीग की गतिविधियों से त्रस्त
और सरकारी अफसरों की दगाबाज़ी से परेशान कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन पर सहमति ज़ाहिर
कर दी। जिन्ना की तो मन की मुराद पूरी हो गई। पंजाब के सिख
पाकिस्तान में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे। लीग ने दगाबाज़ी कर पंजाब के मुख्यमंत्री
मलिक ख़िज्र हयात ख़ान की सरकार गिरा दी थी, लेकिन अपनी सरकार बनाने में कामयाब नहीं
हो पाई थी। लीग ने नेशनल गार्ड नामक संस्था चला कर वहां ख़ूब दंगे कराए। 4 मार्च को
हिंदू सिखों ने मिलकर लाहौर में पाकिस्तान विरोधी दिवस मनाया था। 5 मार्च को गवर्नर
सर ईवांस जेकिंग ने कानून-व्यवस्था के नाम पर विधान सभा स्थगित कर दी और शासन अपने
हाथ में ले लिया। अब पंजाब में लीग को सुविधा हो गई। पंजाब के विभाजन का रास्ता खुल
गया। 23 जून को पंजाब बंटवारे का निर्णय कर दिया गया। सिंध विधान सभा ने विशेष बैठक
करके पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का बहुमत निर्णय किया। बलूचिस्तान ने
29 जून को एक विशेष बैठक में पाकिस्तान में मिलने का निर्णय किया। ग़ैर मुसलिम सदस्यों
की कोई राय नहीं ली गई।
पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में
पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत
में सरहद के पठान की बढ़ती लोकप्रियता जिन्ना के लिए चिंता का विषय था। उसे लगा
कि अगर मतदान हुआ, तो यहां के लोग भारत के साथ रहने के प्रति वोट देंगे। इसलिए डॉ.
ख़ान साहेब के नेतृत्व वाली वहां की कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने के लिए उसने अपनी
सारी ताकत झोंक दी। मुसलिम लीग ने वहां आतंक का तांडव मचाया। गवर्नर सर ओलाफ़ कैरो ने
उत्पात मचाने वालों को साथ दिया। जनमत संग्रह के नाम पर वहां चुनाव हुए। कांग्रेस और
ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने विरोध में चुनाव में भाग नहीं लिया। जब गिनती शुरू हुई तो पता
चला कि हरेक मतदान केन्द्र पर अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक मतदान हुए है। अंग्रेज़ हुक़ूमत
ने बोगस वोट डलवाए थे। यह प्रांत पाकिस्तान में सम्मिलित कर लिया गया।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम
19 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारत की स्वतंत्रता से संबद्ध
अधिनियम भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पास कर दिया। अंग्रेज़ों ने ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी लेकिन उसका
विभाजन भी होगा। औपचारिक सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त का दिन नियत किया गया। वायसराय
ने अन्तरिम सरकार की पुनर्रचना कर दी। दो कामचलाऊ प्रशासन बनाए गए। एक भारतीय संघ के
लिए दूसरा पाकिस्तान के लिए। मुसलिम लीग का जो पहले नारा
था, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’, अब बदल कर ‘हंस के लिया है पकिस्तान, लड़ के
लेंगे हिन्दुस्तान’ में बदल गया था। उनकी नज़र मुसलिम संस्कृति के केन्द्र दिल्ली,
आगरा, अजमेर और अलीगढ़ पर थी। 7 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना ने डकोटा विमान से दिल्ली से
पाकिस्तान के कराची शहर के लिए उड़न भरा। जब विमान टेक-ऑफ कर रहा था तो उसने कहा, “मुझे लगता है
मैं आखिरी बार दिल्ली को देख रहा हूँ। अब लगता है यह अध्याय समाप्त हुआ।” कराची
एयरपोर्ट पर दस हज़ार लोग उसके स्वागत के लिए खड़े थे।
उपसंहार
मुसलिम लीग और जिन्ना की नए राष्ट्र की लालसा और कांग्रेस
के द्वारा भारत को शीघ्र अंग्रेज़ी राज से मुक्त कराने की प्रबल उत्कंठा ने अंततः 14-15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और भारत का निर्माण कर दिया। भारत
दो हिस्सों में बंट गया। ऐसा
माना जाता है कि भारतीय जनता का नेतृत्व करने की जिन्ना की शुरू से ही आकांक्षा थी। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता के आन्दोलन के क्षितिज पर गांधीजी
के उदय के बाद इस आन्दोलन का नेतृत्व
गांधीजी की
ओर मुड़ गया। जिन्ना का मानना था कि आम
लोगों की धार्मिंक
भावना जगाकर महात्मा
गांधी ने अपना नेतृत्व स्थापित
किया है। जिन्ना की महत्वाकांक्षा थी कि सारे
राष्ट्रीय आन्दोलन का
नेता न बने तो कम-से-कम गांधीजी की ही श्रेणी का मुस्लिम समाज का नेता वह बने। इसलिए गांधीजी का उदय और उनके
नेतृत्व को बढावा मिलना उसे अखरता रहा। मुसलिम लीग से निमंत्रण मिलते ही जिन्ना ने कांग्रेस का साथ
छोड़ दिया और मुसलिम लीग की राजनीति की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उसके नेतृत्व में मुसलिम लीग ने नफ़रत
और अराजकता की ऐसी राजनीति छेडी कि पूरा देश साम्प्रदायिकता की आग में झुलसने लगा। स्थिति ऐसी विकट हो गई थी कि दोनों पक्ष
ऐसी योजना मानने के लिए तैयार हो गए, जिसे वे नापसंद करते थे, मुसलिम लीग को ‘कीड़ों
का खाया हुआ, विकलांग पाकिस्तान’ मिला, तो कांग्रेस को ‘विभाजित भारत’। फिर भी कांग्रेस और मुसलिम लीग, दोनों ही पक्ष इसका प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं थे। 14
अगस्त, 1947 को पाकिस्तान का निर्माण हुआ। मुसलिम लीग का मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान
का गवर्नर जनरल और लियाकत अली प्रधानमंत्री बना।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर