सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
16. मुरीद
निःसंदेह तुम सभी का पूज्य, बस
अल्लाह है, उसके सिवा और कोई पूज्य नहीं है। वह
अपने ज्ञान में प्रत्येक वस्तु को समाये हुए
है। (क़ुरआन - 20:98)
जो लोग ईमान लाये और सदाचार किये,
हम अवश्य दूर कर देंगे उनसे उनकी बुराइयाँ तथा उन्हें
प्रतिफल देंगे उनके उत्तम कर्मों का। (क़ुरआन - 29:7)
सूफीमत में मुरीदी
का अर्थ गुरु (मुर्शिद या पीर) के प्रति पूर्ण समर्पण और आध्यात्मिक
शिष्यत्व से है। सूफीवाद में ईश्वर (अल्लाह) को पाने के मार्ग में मुरीदी को एक
अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य सीढ़ी माना गया है। 'मुरीद' शब्द का अरबी अर्थ
होता है "इच्छा करने वाला" या "चाहने वाला"।
आध्यात्मिक संदर्भ में, मुरीद वह व्यक्ति है जो अपनी इच्छाओं को त्यागकर
केवल ईश्वर की इच्छा और उसकी प्राप्ति की चाह रखता है। मुरीदी की शुरुआत 'बैअत' की रस्म से होती
है। इसमें मुरीद अपने पीर के हाथ में हाथ रखकर यह प्रतिज्ञा करता है कि वह पीर के
मार्गदर्शन में अल्लाह के बताए रास्ते पर चलेगा और गुनाहों से तौबा करेगा। मुरीदी
की धारणा यह है कि जिसका ‘मुर्शिद-कामिल’ से लगाव हो जाए,
जो उसके आदेश का पालन करे और दिल से उसकी ख़िदमत में जुट जाए वही मुरीद है। ‘मुर्शिद-कामिल’ अपने विशेष ‘मुरीद’ (अनुयायी) को ख़िर्क़ा
प्रदान करते हैं। यह ऊन का एक विशेष वस्त्र होता है। सूफ़ीमत के अनुसार ऐसे मुरीद (ख़िर्क़ा
पहनने वाले) को सांसारिकता से विरक्त रहना चाहिए और उसे अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर
की सेवा में समर्पित कर देना चाहिए।
सूफीमत में माना
जाता है कि बिना मार्गदर्शक (पीर या मुर्शिद) के आध्यात्मिक मार्ग पर चलना असंभव
और भटकाव भरा है। पीर को एक आध्यात्मिक चिकित्सक माना जाता है जो मुरीद के मन की
बुराइयों (नफ्स) को दूर करता है। सूफ़ी साधक के लिए सबसे पहले किसी का मुरीद
होना पड़ता है। एक सैयद को सूफ़ी बनने के लिए पहले अपनी पुरानी पहचान का
परित्याग करना पड़ता है। अपनी पहचान त्याग कर ही वह किसी का मुरीद होता है। हज़रत
बुल्ले शाह रह. जब ‘शाह इनायत’ के मुरीद हुए तो
उन्हें काफ़ी ताने और व्यंग्य सुनने पड़े। हज़रत बुल्ले शाह रह. जब लाहौर के प्रसिद्ध सूफी संत शाह इनायत कादरी के मुरीद (शिष्य)
बने, तो उन्हें समाज, कट्टरपंथियों और विशेष रूप से अपने खुद के
परिवार से बहुत अधिक ताने, विरोध और व्यंग्य का सामना करना पड़ा था। इस
तीखे विरोध के पीछे मुख्य रूप से तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और जातिगत अहंकार था।
बाबा बुल्ले शाह एक उच्च कुलीन 'सैयद' घराने से ताल्लुक
रखते थे, जिन्हें समाज में धार्मिक और सामाजिक रूप से सर्वोच्च स्थान प्राप्त
था. उनके पिता एक मस्जिद के इमाम थे। इसके विपरीत, उनके गुरु शाह
इनायत कादरी जाति से 'अराई' (बागवान/माली) थे, जो निम्न या मध्यम
श्रमजीवी वर्ग में आते थे। वे लाहौर में बागों और खेतों की देखरेख करते थे। जब
बुल्ले शाह के परिवार और रिश्तेदारों को पता चला कि उन्होंने एक 'माली' को अपना गुरु चुन
लिया है, तो वे भड़क उठे। उन्होंने बुल्ले शाह को ताना मारते हुए कहा कि "एक सैयद होकर तुम
एक अराई के पैरों में झुक गए? तुमने खानदान की नाक कटवा दी।" उनके परिवार
की महिलाओं और रिश्तेदारों ने उन्हें वापस लाने और मुरीदी छुड़ाने के लिए काफी
दबाव डाला। इस पर बुल्ले शाह ने समाज और परिवार के तानों का जवाब अपनी प्रसिद्ध
शायरी (काफ़ियों) के ज़रिए दिया। उन्होंने जातिवाद पर करारी चोट करते हुए लिखा,
"कुल्लों (वंश) दे विचों शुबहा (संदेह) छड्ड,
तू बुल्लिहआ
राही हो जा अराईं दा।"
यानी, वंश और कुल के अहंकार को छोड़ो बुल्ला, और उस अराई (शाह
इनायत) के रास्ते पर चल पड़ो। उन्होंने आगे और भी तीखा प्रहार करते हुए कहा,
"जेहड़ा सानूं सैयद आखे, ओहनूं दोज़ख़ (नरक)
मिलण सज़ाईं,
जेहड़ा सानूं अराईं
आखे, ओ रूह विच पींग पायी।"
अर्थात, जो मुझे
सैयद कहकर अहंकार की याद दिलाएगा, वह मानो खुद को नरक की तरफ धकेल रहा है; और जो मुझे मेरे मुर्शिद की अराई जाति से जोड़कर देखता है, वही असली आध्यात्मिक आनंद पाता है। बुल्ले शाह के लिए पीर की धारणा
जात-पात से कहीं ऊपर थी। उन्होंने साबित किया कि रूहानियत (आध्यात्मिकता)
में इंसान की जाति नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और अल्लाह के प्रति प्रेम को
देखा जाता है।
सूफ़ीवाद में
मुर्शिद और मुरीद का रिश्ता अटूट और अमर होता है। साधक को मुर्शीद (गुरु) का बराबर
चिंतन करते रहना चाहिए। सभी बुरे विचारों से गुरू उसकी रक्षा करता है। वह हमेशा
गुरु का ध्यान करते रहता है। ध्यान करते-करते वह इतनी दूर तक पहुँच जाता है कि उसे
हर चीज़, हर मनुष्य में गुरु ही दिखता है। इस स्थिति को ‘गुरु में लय कर
देना’ कहते हैं। मुर्शीद अपनी दिव्य शक्ति से यह जान जाता है कि साधक (सालिक)
अपनी साधना में कहाँ तक सफल हो पाया है। गुरु में लय कर देने वाली अवस्था में
पहुँच जाने के बाद मुर्शीद उस साधक को अपने सम्प्रदाय के संस्थापक दिवंगत पीर की
दिव्य शक्ति के अधीन कर देता है। साधक अपने पीर की आध्यात्मिक शक्ति के सहारे उस
पीर को प्रत्यक्ष करता है। तीसरी अवस्था में पीर उसको पैग़म्बर के निकट पहुंचा देता
है। साधक सभी वस्तुओं में पैग़म्बर को देखने लगता है। चौथी अवस्था में साधक
परमात्मा तक पहुँच जाता है। सभी वस्तुओं में वह परमात्मा के दर्शन करने लगता है।
इस प्रकार से वह परमात्मा के साथ एकत्व को प्राप्त करता है। इसके बाद पीर उसे फिर
से पहली अवस्था में पहुंचा देता है और साधक साधारण मनुष्य की तरह जीवन जीने लगता
है।
मुरीदी की एक उच्च अवस्था 'फना-फी-शेख' है। इसका
अर्थ है कि मुरीद अपने अहंकार और अस्तित्व को अपने गुरु के विचारों और उनके स्वरूप
में पूरी तरह विलीन कर देता है। माना जाता है कि गुरु में विलीन होने के बाद ही वह
'फना-फी-अल्लाह' (ईश्वर में
विलीन होना) की अंतिम अवस्था तक पहुँच सकता है। सूफीवाद मानता है कि जब तक इंसान
के भीतर 'मैं' (नफ्स या
अहंकार) मौजूद है, वह ईश्वर को नहीं पा सकता। गुरु के प्रति
पूर्ण समर्पण से मुरीद का यह अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
सूफ़ी साधना पद्धति में इश्क़ का
मुख्य स्थान है। एक तरफ़ इश्क़ मुरीद को मुर्शिद से जोड़ने पर ‘इश्क़े
मजाजी’ कहलाता है। वही दूसरी तरफ़ शरीर से
पारलौकिक होकर रूहानी मंज़िलें तय करते-करते हक़ीक़त के शिखर तक पहुंच कर यह ‘इश्क़े
हक़ीक़ी’ बन जाता है। इश्क़ आशिक़ (मुरीद) को माशूक
(ईश्वर) तक ले जाने वाला साधन-मात्र है। यह वह ज्वाला है जिसमें वह सारे वसफ़
(गुण) जल कर राख़ हो जाते हैं, जो अल्लाह की ओर मुरीद के रुझान को रोकने वाले होते
हैं। ईश्वर से सीधा प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) करना आम इंसान के लिए कठिन होता है।
इसलिए, मुरीद पहले अपने गुरु से गहरा रूहानी प्रेम
करता है। गुरु के प्रति इस गहरे प्रेम और जुड़ाव को ही 'फना-फी-शेख' का आधार
माना जाता है। इस अवस्था में मुरीद खुद को एक खाली बर्तन की तरह गुरु के सामने रख
देता है, ताकि गुरु उसमें आध्यात्मिक ज्ञान भर सकें।
मुरीद अपने गुरु के हर काम, सोच और स्वभाव को खुद में ढाल
लेता है। सूफीमत में फना-फी-शेख अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि यह
एक सीढ़ी है। जब मुरीद अपने गुरु में विलीन (फना-फी-शेख) हो जाता है, तब गुरु
उसे 'फना-फी-रसूल' (पैगंबर में
विलीन होना) और अंततः 'फना-फी-अल्लाह' (ईश्वर में
विलीन होकर परम सत्य को पा लेना) की अंतिम अवस्था तक पहुँचाते हैं।
मुरीद ईश-प्रेम में मदमस्त हो
जाता है। नम्रता, कठोर तप, जुहद और मस्ती उसकी कैफ़ियत होती है। इस पथ की यात्रा
में उसके भावों में परिवर्तन आता जाता है, लेकिन उसकी मस्ती भरी रहस्यमयी कैफ़ियत और आत्मिक
दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता। मुरीद तो मूलतः मस्ती का नमाज़ी होता है। तप,
साधना, रियाज़त, बन्दगी और इबादत से वह आनंदमयी मस्ती की ओर अग्रसर होता जाता है।
वह सांसारिक ऐशो-आराम से ऊपर उठकर रूहानी आलम के शिखर की ओर बढ़ता है। बाहरी
चमक-दमक को छोड़कर वह अंतःआत्मा में डूब जाता है। वह क़ुरआन मज़ीद को सिर्फ़ कंठस्थ
करने के बजाए आयतों के आंतरिक भावों और अर्थों को ग्रहण करने लगता है। उसे यह समझ
हासिल होती है कि संसार के रीति-रिवाज़ों से ऊपर उठना ही असल में ऊंचा मकाम हासिल करना है –
बाहर आक अंदरि
आलूदा किया तू शेख़ कहावहि।
कहै हुसैन जे
फारिग थीवहि, तां खास मरातब पावहिं॥
यह
प्रसिद्ध पंक्तियाँ 16वीं शताब्दी के महान सूफी संत शाह हुसैन (जिन्हें माधो लाल हुसैन भी
कहा जाता है) की हैं। इन पंक्तियों में बाहरी दिखावे (पाखंड) की कड़ी निंदा की गई
है और मन की आंतरिक शुद्धता को रूहानियत (आध्यात्मिकता) की असली शर्त बताया गया
है। शाह हुसैन को कोई हुसैन कहे या शाह, शेख़ कहे या लाल हुसैन – इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि स्वयं हुसैन को अपने नाम के साथ फ़क़ीर शब्द का प्रयोग करने में आनंद
मिलता है। शाह हुसैन उन लोगों पर कटाक्ष कर रहे हैं जो बाहर से तो साफ-सुथरे, कीमती या
सूफियाना लिबास (जैसे जुब्बा या पगड़ी) पहन लेते हैं और खुद को समाज में 'शेख' (धार्मिक गुरु
या सिद्ध पुरुष) कहलवाते हैं, लेकिन उनका 'अंदर' (मन और आत्मा) लालच, अहंकार, ईर्ष्या और वासना जैसी सामाजिक बुराइयों से मैला (आलूदा) है। सूफीवाद में
बाहरी दिखावे का कोई मूल्य नहीं है, यदि दिल साफ न हो। शाह हुसैन कहते हैं कि यदि
तुम इस बाहरी दुनिया के पाखंड, मान-सम्मान की भूख और अपने अहंकार (नफ्स) से 'फारिग' (मुक्त) हो
जाओगे, तभी तुम ईश्वर (अल्लाह) की नजरों में एक विशेष आध्यात्मिक दर्जा (खास मरातब)
प्राप्त कर सकोगे। असली सूफी वही है जो दुनियावी दिखावे से पूरी तरह आजाद होकर
केवल अपने दिल को साफ रखता है। ईश्वर कपड़ों या उपाधियों से नहीं, बल्कि आंतरिक
पवित्रता और अहंकार-मुक्ति से मिलता है। मस्त मलंग, ग़रीब, बेचारा कहलवाने
में उन्हें गर्व महसूस होता है। सूफ़ीमत में फ़क़ीर का दर्ज़ा वही है जो आध्यात्मिक
मुकाम में ब्रह्मज्ञानी को प्राप्त होता है।
फ़क़ीर तो वह है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष को, ज़ाहिर और अप्रकट को एक समान
समझता है। वह हर प्रकार की कठिनाई को आसान मानता है। मुरीद से यह अपेक्षा की जाती
है कि वह अपने पीर के आदेशों का पालन बिना किसी तर्क या संदेह के करे। सूफी
साहित्य में कहा गया है कि मुरीद को अपने गुरु के सामने वैसा ही शांत होना चाहिए
जैसे एक शव नहलाने वाले के हाथों में होता है।
मुरीद
ईश्वर को किसी देवी-देवता, पीर-पैग़म्बर, वली-औलिया तक सीमित करके नहीं देखता। वह
उसकी सिर्फ़ एक ही हस्ती को स्वीकार करता है।
इक्के दिलवर सम
छटि रविया, दूजा नहीं कदाईं।
कहै हुसैन फ़क़ीर
निमाणा, सतिगुरु तो बलि जाईं।
शाह
हुसैन यहाँ सूफीवाद के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत वहदत-उल-वजूद (कि सब कुछ
ईश्वर ही है) को बयां कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इस पूरी सृष्टि के कण-कण में, हर जीव में
केवल वही एक सच्चा प्रियतम (अल्लाह) समाया हुआ है। उसके अलावा ब्रह्मांड में किसी
दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है। हर रूप और हर रंग में वही एक परमात्मा दिखाई देता
है। शाह हुसैन खुद को एक अत्यंत विनम्र और अहंकार-रहित फकीर (निमाणा) कहते हुए
घोषणा करते हैं कि वे अपने 'सतगुरु' (मुर्शिद/पीर) पर पूरी तरह कुर्बान जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि गुरु ने
ही उनकी आँखों से अज्ञानता का परदा हटाया और उन्हें यह दिव्य ज्ञान दिया कि हर तरफ
केवल वही एक ईश्वर व्याप्त है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के इस सत्य को पहचानना
असंभव था। मुरीद ईश्वर के आगे स्वयं को पूर्ण समर्पित कर, अपने आपको उसके रंग में
रंगा हुआ मानता है। अपनी
साधना का रहस्य जानने,
उसका अभ्यास करने और उसकी
सफलता के लिए साधक को किसी पीर की शरण लेनी ही पड़ती है। मुरीद पहले अपने पीर के
सामने आत्मसमर्पण करता है, जब
साधक को मुर्शीद का आशीर्वाद मिल जाता है, तब उसका आध्यात्मिक जीवन शुरू हो
जाता है। उसे मुर्शीद के द्वारा दिए गए आदेशों और उस सम्प्रदाय के
नियम-कानूनों और पाबंदियों का सख्ती से पालन करना होता है। इस तरह उसकी आध्यात्मिक यात्रा
(तरीक़ा) शुरू हो जाती है। अब मुरीद से सालिक (यात्री) हो जाता है। फिर वह पीर के
द्वारा रसूल अर्थात् हज़रत मोहम्मद स. के प्रभाव से आगे बढ़ता हुए परमेश्वर तक पहुंच जाता
है और इसे वस्ल (मिलन) कहते हैं। उसका काम होता है परमात्मा का स्मरण (ज़िक्र)
करते रहना। ज़िक्र के द्वारा वज्द (भावोल्लास) की अवस्था की प्राप्ति
होती है। वज्द के बाद हाल (भावाविष्टा) की अवस्था आती है। हाल की अवस्था में साधक के मन में
अल्लाह के सिवा और किसी प्रकार का ख्याल नहीं रहता। साधक पीरों के अलावा औलिया
(वली व फ़कीरों) की भी इबादत करते हैं और उनकी मज़ारों (समाधियों) की ज़ियारत
(तीर्थयात्रा) भी करते हैं। सृष्टि में केवल एक ही परम सत्य (अल्लाह) है और इस रहस्य को समझने का एकमात्र
माध्यम सच्चा गुरु (मुर्शिद) है, जिसके प्रति शिष्य को हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए।
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मनोज
कुमार