शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

495. हैदराबाद रियासत का भारत में विलय

 

राष्ट्रीय आन्दोलन

495. हैदराबाद रियासत का भारत में विलय

ऐतिहासिक तस्वीर : सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान और सरदार पटेल

भारत आज़ाद हो चुका था, एक नया देश पाकिस्तान अस्तित्व में आ चुका था, लेकिन क्षेत्र की तीन बड़ी रियासतों- कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ का भविष्य स्पष्ट नहीं था। इन तीनों रियासतों ने आज़ाद रहने का फ़ैसला किया, जबकि भारत और पाकिस्तान इनको अपने साथ मिलाना चाहते थे। भारत के अंतिम वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल और क़ाइद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना को एक नवंबर सन 1947 को एक लिखित प्रस्ताव भेजा। सुझाव में उन रियासतों में रहने वाले आम लोगों से राय लेने की बात कही गयी थी जहाँ के हुक्मरान रियासत की बहुसंख्यक आबादी की जगह अल्पसंख्यक आबादी से आते थे। मोहम्मद अली जिन्ना ने विवाद को शांति के साथ हल करने का मौक़ा गंवा दिया और उसके हाथ कुछ भी नहीं आया। मोहम्मद अली जिन्ना ने माउन्टबेटन की पेशकश मान ली होती तो उसे काश्मीर हाथों-हाथ मिल गया होता और हैदराबाद में ख़ून ख़राबा नहीं होता। मोहम्मद अली जिन्ना का ख़्याल था कि अगर भारत के दोनों हाथ कट जाएँ तो वह ज़िंदा रह सकता है लेकिन अगर उसका दिल निकाल दो तो वह जी नहीं पाएगा। उसके अनुसार हैदराबाद 'भारत का दिल' था। दूसरी तरफ़ हैदराबाद को भारत में शामिल करने वाले नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल ने हैदराबाद को 'भारत के दिल का नासूर' कहा और इसके ऑपरेशन को ज़रूरी बताते हुए फ़ौजी कार्रवाई कराई।

आसफ़ जाही वंश का राज

आकार और आबादी, दोनों ही लिहाज़ से हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी रियासत थी। हैदराबाद रियासत लगभग 82,698 वर्ग मील (लगभग 2.14 लाख वर्ग किलोमीटर) में फैली हुई थी, जो इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था1941 की जनगणना के अनुसार, यहाँ की जनसंख्या करीब 1.63 करोड़ थी। हैदराबाद उस ज़माने में भारत की सबसे ख़ुशहाल रियासत था। इसका अपना अलग रेलवे, डाक, मुद्रा (सिक्के) और सेना थी।

हैदराबाद रियासत के 1948 में भारत में विलय होने से पहले यहां क़रीब दो सदियों से आसफ़ जाही वंश (जिन्हें हैदराबाद के निज़ाम भी कहा जाता है) का राज था।  इस वंश की स्थापना 1724 में मीर क़मर-उद-दीन सिद्दीकी (निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह) ने की थी। इस राजवंश के कुल 7 मुख्य निज़ामों ने हैदराबाद पर लगभग 224 वर्षों तक शासन किया था।

हैदराबाद रियासत विभिन्न सभ्यताओं का संगम था। यहाँ के निवासी विभिन्न भाषाएं बोलने वाले थे। निज़ाम के इलाके में तीन अलग-अलग भाषा बोलने वाले क्षेत्र शामिल थे: पांच मराठी बोलने वाले (28%) ज़िले, तीन कन्नड़ बोलने वाले (22%) ज़िले और आठ तेलुगु बोलने वाले (50%) ज़िलेइन सब को उर्दू ज़बान जोड़ती थी, जिसे 19वीं सदी के अन्त में शाही रियासत की सरकारी ज़बान बना दिया गया। यह उपमहाद्वीप का वो क्षेत्र था जहाँ अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े के बाद भी उर्दू ज़बान फल फूल रही थी और शायरों व साहित्यकारों की सराहना की जा रही थी। इस रियासत की कुल आबादी में 84 फीसद हिस्सा हिंदुओं का था, जबकि 11 प्रतिशत मुसलमान और बाक़ी के जैन धर्म के अनुयायी थे। सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक नज़रिए से हैदराबाद रियासत विविधता में एकता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का शानदार नमूना थी।

1713 में मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने अपने सिपहसालार निजाम-उल्ल-मुल्क मीर कमरुद्दीन को हैदराबाद का गवर्नर बनाया था। मीर कमरुद्दीन को 'निज़ाम-उल-मुल्क' की उपाधि दी गयी। उसी के नाम पर निज़ाम वंश का आरंभ हुआ। हैदराबाद के निज़ाम हमेशा मुग़लों के मातहत रहे। दिल्ली दरबार का उस पर नियंत्रण था और वे प्रतिवर्ष राजस्व का एक हिस्सा उन्हें देते थे। 1724 में, मुगल दरबार की राजनीति से अलग होकर उसने शकर खेड़ा की लड़ाई लड़ी और स्वतंत्र हैदराबाद राज्य की नींव रखी। 1748 में मीर कमरुद्दीन की मृत्यु पर सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से छोटे भाई निज़ाम अली ख़ान को गद्दी मिली। 1765 से हैदराबाद के निजाम अली ख़ान (आसफ जाह द्वितीय) ने अंग्रेज़ी हुकूमत को स्वीकार कर लिया। मराठा युद्ध में इन्होंने अंग्रेज़ों की मदद भी की थी। 1795 में खार्दा के युद्ध में मराठों से बुरी तरह हारने के बाद निज़ाम अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। इसके अलावा मैसूर की बढ़ती ताकत और टीपू सुल्तान से सुरक्षा के लिए निज़ाम को एक मजबूत सैन्य साथी की जरूरत थी। निज़ाम ने अपनी सेना में शामिल फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाकर अंग्रेजों पर भरोसा जताया। 1 सितंबर 1798 को, अली ख़ान ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत हैदराबाद अंग्रेज़ों का संरक्षित राज्य (Protectorate) बन गया। इस प्रकार, हैदराबाद लॉर्ड वेलेसली द्वारा शुरू की गई सहायक संधि को स्वीकार करने वाली पहली बड़ी भारतीय रियासत बन गया था। इस संधि के माध्यम से निज़ाम को अपने राज्य में एक स्थायी ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी रखनी पड़ी, इस सेना का खर्च स्वयं निज़ाम को उठाना पड़ता था, और निज़ाम अंग्रेज़ों की अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य से युद्ध या संधि नहीं कर सकते थे। निज़ाम अली खान के इस फैसले के बाद हैदराबाद ब्रिटिश शासन का एक वफादार सहयोगी (Client State) बना रहा, जो 1948 में भारत के स्वतंत्र होने तक जारी रहा।

29 अगस्त 1911 को अपने पिता मीर महबूब अली खान की मृत्यु के बाद मीर उस्मान अली खान सिद्दीक़ी उर्फ़ आसिफ़ जाह सप्तम, हैदराबाद का निज़ाम बना और 1948 तक इस पद पर रहा 1938 तक उसने 37 साल तक बिना किसी जातिगत और धार्मिक भेदभाव के रियासत पर हुकूमत की। उनके शासन के दौरान हैदराबाद ने औद्योगिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भारी प्रगति की। उन्होंने कई प्रसिद्ध सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना की, जिनमें उस्मानिया विश्वविद्यालय, उस्मानिया जनरल अस्पताल, उच्च न्यायालय, और विधानसभा भवन शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने उस्मान सागर और निज़ाम सागर जैसी बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का भी निर्माण कराया। अपनी व्यक्तिगत मितव्ययिता (सादगी) के बावजूद, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, और शांतिनिकेतन (रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित) को भारी दान दिए। उन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और कई मंदिरों को भी नियमित अनुदान जारी किए।

सबसे ख़ुशहाल रियासत

हैदराबाद उस ज़माने में भारत की सबसे ख़ुशहाल रियासत थी। उसके खज़ाने भरे हुए थे। निज़ाम हैदराबाद के नाम से मशहूर उस्मान अली ख़ान अपने समय के दुनिया के सबसे अमीर शख्स थे। टाइम मैगज़ीन ने 1937 में उन्हें कवर पेज पर जगह दी थी। उनकी दौलत का अनुमान लगभग 250 अरब अमरीकी डॉलर लगाया जाता है। उनके पास सोने और आभूषणों का व्यापक खज़ाना और बड़ा भंडार था जिसमें 20 करोड़ अमरीकी डॉलर की क़ीमत का एक 185 कैरट का जैकब हीरा भी था जिसे वो पेपर वेट (कागज़ को दबाने वाले वज़न) के तौर पर इस्तेमाल करते थे।

'सर्फ़-ए-ख़ास'

'सर्फ़-ए-ख़ास'निज़ाम की अपनी निजी जागीर, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 10% थी — से होने वाली आय सीधे शाही खर्चों को पूरा करने में इस्तेमाल होती थी। इसके अलावा रियासत का 30% क्षेत्र बड़े ज़मींदारों के क़ब्ज़े में था। गांवों की जनता से ऊंची दरों पर लगान वसूला जाता था। उन पर कई तरह के गैर-कानूनी कर, जबरन वसूली और बेगार (या 'वेठी') का भारी बोझ था। राज्य की ज़्यादातर हिंदू आबादी को सबसे ज़्यादा बुरा निज़ाम द्वारा किया जा रहा सांस्कृतिक और धार्मिक दमन लगा।

ऑपरेशन पोलो

हैदराबाद में चौरासी प्रतिशत प्रजा हिन्दू थी। लेकिन शासन में उनका कोई स्थान नहीं था। उनका सांस्कृतिक और धार्मिक दमन किया जाता था। उर्दू को दरबारी भाषा बनाया गया और इसे बढ़ावा देने के लिए हर संभव कोशिश की गई, जिसमें उस्मानिया यूनिवर्सिटी की स्थापना भी शामिल थी। राज्य की दूसरी भाषाओं — तेलुगु, मराठी और कन्नड़ — को नज़रअंदाज़ किया गया और यहाँ तक कि इन भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने की निजी कोशिशों में भी रुकावटें डाली गईं।

प्रशासन में, खासकर ऊँचे ओहदों पर, मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा नौकरियाँ दी गईं। हैदराबाद रियासत में राजनीतिक आज़ादी न मिलने के ख़िलाफ़ कई सांस्कृतिक आंदोलन शुरू हुए, जो बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान पर केंद्रित थे। बीसवीं सदी की शुरुआत में आर्य समाज, यहां के बहुसंख्यकों यानी हिंदुओं की आवाज़ बन कर उभरा था। 1920 के दशक में तेज़ी से बढ़े आर्य समाज आंदोलन को सख्ती से दबाया गया और आर्य समाज की धार्मिक रस्मों के लिए हवन कुंड बनाने के वास्ते भी सरकारी मंज़ूरी लेनी पड़ती थी। निज़ाम के प्रशासन ने हैदराबाद को एक मुस्लिम राज्य के तौर पर पेश करने की कोशिशें तेज़ कर दीं, और 1927 में 'इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन' के उभरने के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ हो गई; यह संगठन इस सोच पर आधारित था कि निज़ाम 'दक्कन में मुस्लिम संप्रभुता का शाही प्रतीक' है। बहुसंख्यक हिंदू आबादी और हैदराबाद कांग्रेस के समर्थक भारत में शामिल होना चाहते थे। दूसरी ओर कम्युनिस्टों का तेलंगाना आंदोलन जारी था।

1947 में हैदराबाद के स्वेच्छाचारी और निरंकुश निज़ाम का मानना था कि जब अंग्रेज़ों के शासन का अंत होगा तो हैदराबाद एक आज़ाद देश बन जाएगा। 4 जून 1947 को वायसराय माउंटबेटन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि अंग्रेज़ जल्द ही, यानी 15 अगस्त को, हमेशा के लिए भारत छोड़ देंगे। 12 जून को निज़ाम ने घोषणा की कि ब्रिटिश सत्ता खत्म होने पर वह एक स्वतंत्र शासक बन जाएंगे। उनका इरादा साफ़ था: वह भारतीय संघ में शामिल नहीं होंगे। हैदराबाद स्टेट कांग्रेस का पहला खुला अधिवेशन 16 से 18 जून के बीच हुआ, जिसमें भारतीय संघ में शामिल होने और ज़िम्मेदार सरकार बनाने की मांग की गई थी।

निज़ाम के अपने सिक्के और नोट भी छपते थे। उसके पास 35,000 सेना थी। नवंबर 1947 में निज़ाम ने भारत सरकार के साथ एक वर्ष के लिए 'यथास्थिति समझौता' (स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट) किया। इसके तहत तय हुआ कि भारत और हैदराबाद के बीच जो संबंध अंग्रेजों के समय थे, वे वैसे ही रहेंगे। लेकिन निज़ाम ने समझौते का पूरी तरह से उल्लंघन किया। वो बहुत तेज़ी से हैदराबाद में हथियार जमा कर रहा था। वह पाकिस्तान के साथ लगातार संपर्क में था। उसने पाकिस्तान को ₹20 करोड़ का गुप्त ऋण दिया। यहां तक कि वह इस ख़्याल को भी पाल रहा था कि हैदराबाद पाकिस्तान का हिस्सा हो सकता है। भारत के लिए यह बड़ी चिंता की बात थी कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान में शामिल हो जाता है तो ये भारत के बीचोबीच होने के कारण देश के लिए हमेशा परेशानी का कारण बनेगा। यह किसी भी तरह से व्यावहारिक नहीं था।

सरदार पटेल ने हैदराबाद को, भारत के पेट में अल्सर के रूप में वर्णित किया था। एक तरफ़ पूरे देश में देशी रियासतें एक के बाद एक भारत में विलीन होने की घोषणा कर रहे थे, उस समय  हैदराबाद के निज़ाम ने, जहां की अधिकांश जनता हिन्दू थी इसलिए उसे भारत में सम्मिलित होना स्वीकार कर लेना चाहिए था, की इच्छाओं की खुली अवहेलना करते हुए भारतीय संघ में मिलने से इंकार कर दिया। निज़ाम का कहना था कि हैदराबाद एक देश है और उसका संगठन एक देश के तौर पर हुआ है। भारत सरकार ने निज़ाम के इस दावे को अस्वीकार कर दिया।

निज़ाम अंग्रेज़ों से बस्तर के खनिज प्रदेश को सौ साल के लीज पर खरीदना चाहता था ताकि पाकिस्तान का मुस्लिम इलाका बड़ा किया जा सके। इसके अलावा निज़ाम गोवा का समुद्री किनारा भी पुर्तगाली सरकार से ख़रीदने का इरादा रखता था जिससे पाकिस्तान को विस्तार मिल सके। इस साजिश की भनक सरदार पटेल को लगी। उन्होंने भारत सरकार के पॉलिटिकल महकमे के अंग्रेज़ सचिवों के शिकंजे से इस फाइल को निकलवाया। इसमें साजिश की पूरी कथा थी। पटेल ने बस्तर का सौदा रोक दिया। निज़ाम भारत में शामिल नहीं होना चहता था। 12 अगस्त को माउंटबेटन ने उसे दो महीने की मोहलत दी थी कि वह प्रजातांत्रिक रूप से भारत में शामिल हो जाए। ऊपर से तो उसने वायसराय को आश्वासन दिया कि वह भारत में सम्मिलित होने वाला है लेकिन भीतर से वह पाकिस्तान के साथ मंत्रणा कर रहा था। चेकोस्लोवाकिया से उसने हथियार ख़रीदने का सौदा भी किया।

हैदराबाद में एक मुसलिम सैनिक संगठन ‘इत्तेहादी-ए मुसलमीन’ नामक संस्था और उसका अर्ध फौजी अंग ‘रज़ाकार’ काफी सक्रिय हो गई थी, जो सेना के समान वर्दी पहनकर बंदूक, पिस्तौल से ट्रेनिंग ले रहे थे। उसका नेता कासिम रिज़वी था। रजाकारों को निज़ाम का पूरा समर्थन प्राप्त था। उन्होंने हैदराबाद को एक स्वतंत्र मुस्लिम राज्य बनाए रखने के लिए स्थानीय हिंदू आबादी, भारत के समर्थकों और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं पर भयानक अत्याचार, लूटपाट, आगजनी और नरसंहार शुरू कर दिया। वे डकैती और लूटमार भी करते। हिन्दुओं को काफ़िर कहते। उन्हें हैदराबाद से निकाल देने की धमकी भी देते। सारे राज्य में अराजकता और दहशत का माहौल था। इस हिंसा के कारण लाखों शरणार्थियों को जान बचाकर पड़ोसी भारतीय राज्यों में भागना पड़ा। ये निज़ाम पर दबाव डाल रहे थे कि वह भारत सरकार के साथ कोई समझौता न करे। इसी बीच पाकिस्तान से दो प्रतिनिधि निज़ाम से मिले और निज़ाम ने उन्हें बीस करोड़ रुपए दे दिए। यह देश के प्रति धोखा था।

22 अक्तूबर को हैदराबाद के प्रतिनिधि-मंडल और भारत सरकार के बीच एक वर्ष के लिए यथावत स्थिति के लिए अस्थायी करार तैयार किया गया। 25 अक्तूबर को निजाम की सलाहकार समिति ने इसे तीन के विरुद्ध छह के बहुमत से स्वीकार किया। लेकिन निजाम ने करारनामे पर हस्ताक्षर नहीं किया। जो प्रतिनिधि मंडल इस करार को लेकर दिल्ली जानेवाला था उसे 20,000 इत्तेहादी मुसलमीन के सदस्यों ने घेर लिया और दिल्ली जाने से रोक दिया। यह वही समय था जब जिन्ना ने कबाइली  हमलावरों को कश्मीर पर आक्रमण करने के लिए भेजा था और उसे क़ाबू में करने के लिए भारत सरकार ने वायुयान द्वारा अपनी सेनाएं काश्मीर भेजी थी। लायकअली निजाम का प्रधानमंत्री था। लायकअली दिल्ली जाता और कोई न कोई बहाना बनाकर हस्ताक्षर नहीं करता। पटेल के सचिव वी.पी. मेनन को निजाम ने आश्वासन दिया कि वह इत्तेहादी-ए मुसलमीन को अंकुश कर लेगा और करार मंजूर हो जाएगा। लेकिन कासिम रिज़वी ने निजाम को कहा था कि जबतक भारत सरकार कश्मीर में उलझी है तब तक हैदराबाद की आज़ादी की व्यवस्था हो जाएगी, इसलिए करार पर हस्ताक्षर नहीं करना है।

इस तरह की खटपट वाली स्थिति चल ही रही थी कि 29 नवंबर को निज़ाम ने यथावत स्थिति करार पर हस्ताक्षर कर दिया। यह करार एक वर्ष के लिए था, इस बीच कोई स्थाई समझौता होनेवाला था। इस बीच 26 नवंबर को क़ासिम रज़वी दिल्ली में गांधीजी से मिला। लेकिन इस मुलाक़ात से कोई फायदा नहीं हुआ। बल्कि बाद में उसके दुस्साहस और बढ़ता ही गया। क़ासिम रिज़वी के तेज तर्रार भाषणों ने निज़ाम हैदराबाद को इतनी झूठी उम्मीदें बंधा रखी थी कि वो यह सोचने लगे थे कि एक दिन निज़ाम का झंडा दिल्ली के लाल क़िले पर लहराएगा। उसने तो यहां तक कह दिया था कि वह तब तक चैन से नहीं बैठेगा जब तक कि वह दिल्ली के लालक़िले में अपने को स्थापित नहीं कर देगा। लेकिन ज़्यादा अहंकार कभी-कभी बहुत भारी पड़ जाता है, आठ महीने बाद वह लालक़िले में स्थापित तो हुआ लेकिन एक विजेता के रूप में नहीं एक क़ैदी के रूप में!

निज़ाम शासन के खिलाफ केवल भारत समर्थक ही नहीं, बल्कि तेलंगाना के किसान भी उठ खड़े हुए थे। कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेतृत्व में किसानों ने सामंती जमींदारों और निज़ाम के अधिकारियों के खिलाफ एक बड़ा सशस्त्र विद्रोह छेड़ दिया था, जिससे राज्य की आंतरिक कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी।

रियासत की स्थिति बिगड़ती ही जा रही थी। 17 दिसम्बर को हैदराबाद में दंगा हुआ। लगभग 25,000 ग़ैर-मुसलिमों को भारी कष्ट उठाने पड़े। पूजा स्थानों को ज़बरन निराश्रित शिविर बना दिए गए। शिक्षण संस्थानों का भी यही इस्तेमाल किया जाने लगा। हैदराबाद में भारत सरकार के सिक्कों और नोटों का उपयोग ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया। ग़ैर-मुसलिमों की सम्पत्ति की बिक्री, हस्तान्तरण और ख़रीद पर रोक लगा दी गई। जिनके रिश्तेदार भारत सरकार के मुलाजिम थे, ऐसे सरकारी नौकरों को धमकी दी जाने लगी कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा। जनवरी 1948 तक हैदराबाद के मुसलिमों की संख्या एक तिहाई रह गई, जो पहले 14 लाख थी। निजाम और उसके समर्थकों का मानना था कि सांप्रदायिक दंगों के कारण भारत सरकार दो वर्ष भी नहीं टिक पाएगी और इन दो वर्षों में वे हैदराबाद को सेनाओं से भर देंगे। भारत सरकार का धीरज चुक रहा था। 17 अप्रैल को सरदार पटेल ने निजाम को अंतिम बार चार शर्तें दी,

1.    कासिम रिज़वी को अंकुश में रखना और इत्तेहादी-ए मुसलमीन को प्रतिबंधित करना,

2.    राज्य के प्रमुख कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रिहा करना,

3.    सरकार की पुनर्रचना करना ताकि दोनों कौमों को उचित प्रतिनिधित्व मिले, और

4.    जल्दी से प्रजातंत्र लागू करना।

निजाम ने इन शर्तों को नहीं स्वीकारा और हस्ताक्षर भी नहीं किया। निजाम तो इस प्रतीक्षा में था कि देखें कश्मीर किस करवट बैठता है। जून, 1948 के अंत में माउंटबेटन इंगलैंड चला गया। बंगाल के गवर्नर राजगोपालाचारी भारत के प्रथम गवर्नर जनरल मनोनीत किए गए। निजाम ने इंग्लैंड के राजा जार्ज पंचम से अपील की कि हैदराबाद को कॉमनवेल्थ की सदस्यता दे दी जाए। लेकिन ऐसा करने में जार्ज पंचम असमर्थ था। अब पटेल के धैर्य की सीमा टूट चुकी थी। उन्होंने ऑपरेशन पोलो नाम का सैन्य अभियान चलाया। तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व और मेजर जनरल जे. एन. चौधरी के निर्देशन में 13 सितंबर, 1948 को मध्य प्रदेश की पुलिस हैदराबाद राज्य में घुसी और शासन हाथ में ले लिया। भारत ने हैदराबाद को अपना राज्य बनाने के लिए 36,000 सशस्त्र बलों को भेजा, जबकि दूसरी तरफ़, निज़ाम हैदराबाद के पास केवल 24,000 सैनिक थे और पूरी तरह से प्रशिक्षित सैनिकों की संख्या केवल छह हज़ार थी, जिसमें अरब, रोहिल्ला,पठान, हिंदू और अन्य मुस्लिम शामिल थे। रियासत के पास लगभग दो लाख रज़ाकार (स्वयंसेवक) थे जिनकी कमान क़ासिम रिज़वी के हाथ में थी। इनकी सटीक संख्या के बारे में ठीक-ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये सभी अप्रशिक्षित लोग थे जो निज़ाम हैदराबाद से वफ़ादारी दिखा रहे थे। भारतीय सेना ने दक्षिणी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल एन. गोडार्ड की कमान में हैदराबाद के ख़िलाफ़ विभिन्न दिशाओं से मोर्चे खोल दिए। पश्चिम में उनका रुख़ विजयवाड़ा की ओर था तो पूर्व में वो शोलापुर पर केंद्रित थे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज़ हुई

इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारी राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला था। निज़ाम और उनके वफ़ादारों ने इस मामले को वैश्विक मंच पर उठाकर भारत को घेरने की पूरी कोशिश की थी। भारतीय सैन्य कार्रवाई से ठीक पहले, अगस्त 1948 में हैदराबाद के निज़ाम ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। निज़ाम ने आरोप लगाया कि भारत उनके "स्वतंत्र देश" पर हमला करने और उसे हड़पने की कोशिश कर रहा है। निज़ाम ने पेरिस (जहाँ उस समय UN का सत्र चल रहा था) में अपने विदेश मंत्री नवाब मोइन नवाज जंग के नेतृत्व में एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा, ताकि वे संयुक्त राष्ट्र में हैदराबाद का पक्ष रख सकें।  पाकिस्तान ने इस पूरे विवाद में निज़ाम का खुलकर साथ दिया। उसने न केवल निज़ाम को गुप्त रूप से हथियार और वित्तीय मदद दी, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भी हैदराबाद के मामले को जोरदार तरीके से उठाया।  पाकिस्तान के विदेश मंत्री सर ज़फ़रुल्लाह ख़ान ने सुरक्षा परिषद में भारत की सैन्य कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की और इसे एक संप्रभु राष्ट्र पर "आक्रमण" करार दिया। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को संभालने की जिम्मेदारी सर रामास्वामी मुदलियार को सौंपी गई थी। भारत ने UN में बहुत स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया: भारत ने तर्क दिया कि हैदराबाद कभी भी एक स्वतंत्र संप्रभु देश नहीं रहा है, वह हमेशा ब्रिटिश संप्रभुता के अधीन था। भारत ने "यथास्थिति समझौते" के उल्लंघन और रजाकारों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों के सबूत पेश किए। भारत ने UN को बताया कि यह कोई दो देशों के बीच का युद्ध नहीं है, बल्कि भारत के अपने ही क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जनता की रक्षा के लिए की गई एक "पुलिस कार्रवाई" (Police Action) है। इसलिए यह भारत का आंतरिक मामला है और UN को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। सरदार पटेल जानते थे कि अगर संयुक्त राष्ट्र ने युद्धविराम (Ceasefire) का आदेश दे दिया, तो हैदराबाद का मामला भी कश्मीर की तरह उलझ सकता है। इसलिए भारतीय सेना को यह अभियान जल्द से जल्द खत्म करने का निर्देश था।

जब 16 सितंबर 1948 को पेरिस में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हैदराबाद के मामले पर चर्चा शुरू हुई, तब तक भारतीय सेना हैदराबाद के करीब पहुंच चुकी थी। अगले ही दिन, 17 सितंबर को निज़ाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। सैन्य कार्रवाई केवल 109 घंटे में समाप्त हो गई, जिससे UN को हस्तक्षेप करने का मौका ही नहीं मिला। 18 सितंबर को निज़ाम के कमांडर इन-चीफ़ सैयद अहमद अल-ईद्रूस ने औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया। हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लाइक़ पाकिस्तान के साथ लगातार संपर्क में था और उसे उम्मीद थी कि अगर ऐसी स्थिति पैदा होती है, तो उसे पाकिस्तान से मदद मिलेगी। पाकिस्तान उन दिनों शोक की स्थिति में था। 11 सितंबर को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु हो गई थी, इसलिए वहां से कोई मदद नहीं आ सकी। प्रजा तो पहले से ही इत्तेहादी-ए मुसलमीन के क्रिया कलापों से त्रस्त थी। इसलिए किसी ने भी मध्य प्रदेश की पुलिस का विरोध नहीं किया। शायद निजाम भी उनसे परेशान थे, इसलिए उन्होंने भी अपना राज्य छोड़ दिया।

हैदराबाद का भारत में विलय

मात्र 109 घंटे (5 दिनों) के भीतर 17 सितंबर 1948 की शाम को हैदराबाद के निज़ाम उस्मान अली ख़ाँ की सेना के कमांडर मेजर जनरल अल अड्रूज ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के बाद, 22 सितंबर 1948 को निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान ने रेडियो पर एक और घोषणा की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र भेजी गई उनकी शिकायत उनके मंत्रियों (विशेषकर रजाकार समर्थकों) के दबाव में की गई थी। निज़ाम ने UN को आधिकारिक पत्र भेजकर अपनी शिकायत वापस ले ली और अपने प्रतिनिधिमंडल को भंग कर दिया। निज़ाम के पीछे हटने के बावजूद, उनके विदेश मंत्री मोइन नवाज जंग ने पेरिस में दावा किया कि निज़ाम ने यह पत्र भारत के दबाव में लिखा है, इसलिए वे चर्चा जारी रखेंगे। हालांकि, सुरक्षा परिषद ने जमीन पर बदल चुके हालातों को देखते हुए इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। धीरे-धीरे हैदराबाद पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा हमेशा के लिए समाप्त हो गई।

विलय के तुरंत बाद मेजर जनरल जे. एन. चौधरी को हैदराबाद का सैन्य गवर्नर नियुक्त किया गया, जिन्होंने रजाकारों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राज्य में शांति स्थापित की। लाल किले पर पर क़ब्ज़ा करने का इरादा रखने वाला कासिम रिज़वी 19 सितंबर 1948 को गिरफ़्तार हुआ। उस पर देशद्रोह, दंगों को भड़काने, और हत्या व लूटपाट की साजिश रचने के गंभीर आरोप लगाए गए।  जिस क़ासिम रिज़वी ने उम्मीदें बंधा रखी थी कि एक दिन निज़ाम का झंडा दिल्ली के लाल क़िले पर लहराएगा, उसे उसी लाल क़िले के तहखाने में बंद कर दिया गया। रज़वी पर प्रसिद्ध 'बीबीनगर डकैती मामले' सहित कई मुकदमों की सुनवाई हुई। अदालत ने उसे दोषी पाते हुए 7 साल के कड़े कारावास की सज़ा सुनाई। अपनी सज़ा पूरी करने के बाद, कासिम रज़वी को 1957 में जेल से रिहा किया गया। भारत सरकार ने उसे केवल इसी शर्त पर रिहा किया कि वह तुरंत भारत छोड़ देगा और पाकिस्तान चला जाएगा। भारत छोड़ने से ठीक पहले, रज़वी ने 'मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन' (MIM) की कमान प्रसिद्ध वकील अब्दुल वाहिद ओवैसी  को सौंप दी। इसके बाद अब्दुल वाहिद ओवैसी ने संगठन का नाम बदलकर 'ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन' (AIMIM) कर दिया और इसे एक राजनीतिक दल के रूप में पुनर्जीवित किया।  पाकिस्तान जाने के बाद रज़वी को वहां कोई खास तवज्जो या राजनीतिक महत्व नहीं मिला। वह कराची में शरणार्थी के रूप में बेहद गुमनामी और तंगहाली के जीवन में रहा और 1970 में उसकी मृत्यु हो गई। कासिम रज़वी के कई शीर्ष सहयोगी और रजाकार कमांडर कार्रवाई के डर से गुप्त रास्तों से पाकिस्तान भाग गए।

सैन्य अभियानों की जांच करने के लिए सुंदर लाल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इसमें काजी अब्दुल गफ्फार और मौलाना अब्दुल्ला मिसरी भी शामिल थे। इस समिति ने नवंबर-दिसंबर 1948 में हैदराबाद के दर्जनों कस्बों और गांवों का दौरा करके 1949 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे दशकों तक गोपनीय रखा गया और साल 2012-2013 में सार्वजनिक (Declassified) किया गया।

हैदराबाद पर आक्रमण को 'पुलिस एक्शन' या 'ऑपरेशन पोलो'  भी कहा जाता है। इस अभियान का नाम "ऑपरेशन पोलो" इसलिए रखा गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में दुनिया के सबसे ज़्यादा (17) पोलो मैदान थे।

हैदराबाद को भारत में विलय करने के बाद निज़ाम हैदराबाद के ख़िलाफ़ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि भारत सरकार ने उदारता दिखाते हुए निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान को उनके पद से पूरी तरह हटाने के बजाय 1950 से 1956 तक हैदराबाद राज्य का 'राजप्रमुख' (प्रशासक/गवर्नर) बनाए रखा। दिसंबर 1949 में, निज़ाम हैदराबाद ने एक दस्तावेज़ जारी किया जिसमें कहा गया कि भारत का बनने वाला संविधान ही हैदराबाद का संविधान होगा और फिर 26 जनवरी 1950 को हैदराबाद राज्य नियमित तौर पर भारत का हिस्सा बन गया। यह वह दिन है जब भारत में संविधान लागू किया गया था। विलय के बाद 1956 तक हैदराबाद एक अलग राज्य रहा। बाद में, राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत इसके तेलुगु, मराठी और कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को क्रमशः आंध्र प्रदेश, बॉम्बे (महाराष्ट्र) और मैसूर (कर्नाटक) राज्यों में मिला दिया गया

कुछ लोग कहते हैं कि इस हमले से बचा जा सकता था, लेकिन एक बार जब हैदराबाद और भारत के बीच स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट हो गया तो उसके तहत हैदराबाद को अपनी विदेश नीति भारत के हवाले करनी थी और उन्हें किसी दूसरे देश से सीधे तौर पर सम्बन्ध नहीं रखना था। लेकिन निज़ाम ने समझौते का पूरी तरह से उल्लंघन किया। वह बहुत तेज़ी से हैदराबाद में हथियार जमा कर रहा था और पाकिस्तान के साथ लगातार संपर्क में था। यहां तक कि वह इस ख़्याल को भी पाल रहा था कि हैदराबाद पाकिस्तान का हिस्सा हो सकता है। भारत के लिए यह बड़ी चिंता की बात थी कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान में शामिल हो जाता है तो ये भारत के बीचोबीच होने के कारण देश के लिए हमेशा परेशानी का कारण बनेगा। यह किसी भी तरह से व्यावहारिक नहीं था। जब पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान ज़्यादा दिनों तक एक साथ नहीं रह सके तो हैदराबाद कैसे रह सकता था। क्योंकि वह तो भारत के बिलकुल बीच में था। इस लिए सरदार पटेल ने हैदराबाद को, भारत के पेट में अल्सर के रूप में वर्णित किया था। बंटवारे के बाद हैदराबाद भारतीय संघ के घेरे में आ चुका था इसलिए न बाहर से कोई बड़ी मदद उसको मिल सकती थी और न ही अंदर से इसकी कोई संभावना थी। इस स्थिति में कोई समझदार व्यक्ति यह उम्मीद नहीं कर सकता था कि वहां 85 प्रतिशत ग़ैर मुस्लिम बहुसंख्यक पर 15 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यक का वो वर्चस्व और प्रभुत्व बनाए रखा जा सकता है। हैदराबाद भारतीय संघ से लड़ कर अपनी स्वतंत्रता क़ायम नहीं रख सकता था।  

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मनोज कुमार

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