महात्मा
गांधी हत्या केस-32
21 जनवरी,
1948
21 जनवरी को हमले से अविचलित गाँधी जी अपना काम करते रहे।
गांधीजी को चेतावनी दी गई थी। लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का हथियारबंद संरक्षण
लेने से मना कर दिया था। लेडी माउंटबेटन ने गांधीजी को सलामत बच जाने पर और
विस्फोट के समय उनकी शांतिपूर्ण नि:संगतता पर बधाई दी, तो उन्होंने बताया कि वे
साहस के लिए किसी प्रशंसा के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने समझा कि वह शोर सेना की
रोज़मर्रा की चांदमारी के कारण हुआ था। कुछ लोगों ने जब उन्हें विस्फोट के समय जरा
भी न घबराने के लिए बधाइयां दी तो उन्होंने कहा : “सच्ची बधाई के योग्य तो मैं तब होऊंगा जब
विस्फोट का शिकार होकर भी मैं मुस्कराता रहूं और हमला करने वाले के प्रति मेरे मन
में जरा भी विद्वेष न हो।” गांधीजी ने निवेदन किया कि बम फेंकने वाले के प्रति नफ़रत
का रवैया अख़्तियार न किया जाए। उसे समझा-बुझाकर सही रास्ते पर लाया जाए। शायद वह
मुझे हिंदू धर्म का दुश्मन मानता है। गांधीजी ने आगे कहा कि नौजवानों को यह समझना
चाहिए कि 'जो लोग उनसे अलग राय रखते हैं, वे ज़रूरी नहीं कि बुरे ही हों'। उन्होंने ऐसे नौजवानों के समर्थकों से कहा कि
वे अपनी ऐसी हरकतें बंद करें। 'हिंदू
धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है। हिंदू धर्म को सिर्फ़ मेरे तरीके से ही बचाया
जा सकता है।' सिखों ने गांधीजी से मुलाक़ात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि
हमला करने वाला व्यक्ति सिख नहीं था। गांधीजी ने पूछा, "इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वह सिख था, हिंदू था या मुसलमान? मैं
तो सभी हमलावरों का भला ही चाहता हूँ।"
20 जनवरी, 1948 को बिड़ला हाउस में बम धमाके के बाद, बॉम्बे के रामनारायण रुइया कॉलेज के प्रोफ़ेसर
जगदीश चंद्र जैन ने बॉम्बे के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया और उन्हें
बताया कि वह मदनलाल की, जो एक ज़रूरतमंद शरणार्थी था, कई तरह से मदद कर रहे थे। उन्हें मदनलाल से ही
पता चला था कि गांधीजी की हत्या की साज़िश रची जा रही थी। उन्होंने बी.जी. खेर को
कुछ साज़िशकर्ताओं के नाम और कुछ अन्य जानकारियाँ भी दीं। बॉम्बे सरकार ने यह
जानकारी सरदार पटेल को दी, जो केंद्र सरकार में गृह मंत्री थे, और साथ ही गांधीजी को भी इसकी सूचना दी।
बॉम्बे से मिली जानकारी के आधार पर, सरदार पटेल सुरक्षा इंतज़ाम कड़े करना चाहते
थे। उन्होंने गांधीजी से कहा कि वे चाहते हैं कि पुलिस उनकी प्रार्थना सभाओं में
आने वाले हर व्यक्ति की तलाशी ले। लेकिन गांधीजी ने इसके लिए, या प्रार्थना सभाओं में पुलिस की मौजूदगी के
लिए, बिल्कुल भी सहमति नहीं दी। उनका मानना था कि
जब उन्होंने खुद को पूरी तरह ईश्वर की शरण में सौंप दिया है, तो प्रार्थना के समय किसी भी तरह की इंसानी
सुरक्षा लेना उनके विश्वास के खिलाफ़ होगा। अगर वे सरदार के बताए सुरक्षा प्रस्ताव
को मान लेते, तो यह उनके विश्वास का मज़ाक उड़ाने जैसा होता।
उन्हें अपनी बात पर अड़ा देखकर, सरदार
ने जो कुछ भी किस्मत में लिखा था, उसे
स्वीकार कर लिया।
हत्या की साज़िश
20 जनवरी को बम फेंकने की ख़बर अगले दिन अख़बारों
में छपी। टाइम्स ऑफ इंडिया, द स्टेट्समैन, बॉम्बे क्रॉनिकल में यह ख़बर बैनर शीर्षक से छपी। तब टाइम्स
ऑफ इंडिया से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा था, "बम शक्तिशाली था और इससे कई लोगों की जान जा
सकती थी। हैंड ग्रेनेड महात्मा गांधी को मारने के लिए था"। बॉम्बे
क्रॉनिकल में रिपोर्ट छपी कि मदनलाल पाहवा ने बम फेंकने का गुनाह क़बूल लिया है और
कहा कि वह महात्मा गांधी के शांति अभियान से ख़फ़ा था इसलिए उसने हमला किया था। 20
जनवरी, 1948 की बम घटना को गोडसे-आप्टे की अख़बार हिंदू
राष्ट्र में प्रमुख स्थान दिया गया और शीर्षक था: गांधीजी की तुष्टिकरण नीति के
खिलाफ नाराज हिंदू शरणार्थियों द्वारा दिखाई गई प्रतिनिधि कार्रवाई।
***
नाथूराम गोडसे का भाई गोपाल गोडसे पिछली रात
दिल्ली के फ़्रंटियर हिन्दू होटल में रुका। 21 जनवरी की सुबह फ़्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिए
निकलने का उसने प्लान बनाया था।
सुबह में पुलिस मदनलाल को लेकर पुरानी दिल्ली
रेलवे स्टेशन गई। सुबह के समय दो गाड़ियां बंबई के लिए छूटती थीं। आठ बजे फ्रंटियर
मेल और नौ बजे पंजाब मेल। गोपाल गोडसे अपनी रिवाल्वर ग्रेनेड के साथ नौ बजे छूटने
वाली पंजाब मेल में बंबई जाने के लिए बैठ चुका था। करकरे उसे विदा करने के लिए
स्टेशन तक आया था। तृतीय श्रेणी के उस डिब्बे में अपना कपड़े का बैग - जिसमें
दोनों रिवॉल्वर और इस्तेमाल न किया गया हैंड ग्रेनेड था - अपनी सीट के नीचे रख
दिया था। गाड़ी छूटने में अभी देरी थी, तो वह करकरे के साथ रेलवे कैंटीन में नाश्ता
करने चला गया। जब वे चाय पी रहे थे, तो उन्होंने देखा कि दो पुलिस वाले एक आदमी को
लेकर आ रहे हैं, जिसने अपना चेहरा भूरे रंग के कंबल में छुपा रखा था, सिर्फ़ उसकी
आंखें दिख रही थीं। कंबल हटाए जाने से पहले ही उन्हें पता चल गया था कि वह आदमी
मदनलाल है। उन्हें पूरा यकीन था कि उसने उनके नाम बता दिए हैं और उसे उन्हें
पहचानने के लिए स्टेशन लाया गया है। वे छिप गए। चाय का कमरा बड़ा था, शायद चालीस फ़ीट लंबा और तीस फ़ीट चौड़ा, और वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मदनलाल को चारों
ओर अच्छी तरह देखने के लिए कहा गया, जबकि
दो पुलिसवाले उसकी आँखों में पहचान के संकेत ढूँढ़ रहे थे। पूरा चक्कर लगाने के
बाद, उसने अपना सिर हिलाया। उसे साथ ले जाने वाले
पुलिसवालों ने फिर से उसके सिर पर भूरा कंबल डाल दिया और उसे बाहर ले गए। गोपाल ने
करकरे से कहा, "यह हमारी किस्मत ही थी कि उसने हमारी तरफ़ नहीं
देखा।" लेकिन गोपाल गलत था। जैसे ही मदनलाल के सिर से कंबल हटाया गया, उसने गोपाल और उसके अच्छे दोस्त करकरा सेठ को
देख लिया था, लेकिन उसने ऐसा दिखाया जैसे उसने उन्हें देखा
ही न हो और वह सीधे देखता रहा। अपनी जाँच पूरी करने के बाद ही उसने सिर हिलाया। वे
उसे बाहर ले गए और ट्रेन की बोगियों की तलाशी लेने लगे। पुलिस ने प्लेटफार्म का
चक्कर लगाया और मदनलाल को लेकर चली गई। गोपाल ने चैन की सांस ली और ट्रेन में बैठ
गया। गाड़ी चल पड़ी। ट्रेन में गोपाल गोडसे के पास सोचने के लिए काफ़ी समय था।
***
करकरे होटल गया और वहां से चेक आउट कर गया। वह
रेलवे के वेटिंग रूम में दोपहर बाद जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। पुलिस
को दिए बयान में करकरे ने कहा था कि वह 20 तारीख की शाम को ही गोपाल से अलग हो गया था। बिड़ला
धर्मशाला के बाहर फुटपाथ पर उसने रात गुज़ारी। दूसरे दिन वह हिन्दू महासभा भवन गया
और वहां के लोगों से मदनलाल के लिए मदद की गुहार की। पर कोई सामने नहीं आया। फिर
वह मदनलाल के रिश्तेदारों के यहां भी गया। दो दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद भी वह
कोई मदद नहीं प्राप्त कर सका।
***
मदनलाल
की गिरफ़्तारी से जो लोग बहुत परेशान हुए थे, उनमें
बॉम्बे में उसके प्रोफ़ेसर दोस्त डॉ. जे.सी. जैन भी शामिल थे। रामनारायण रूइया
कॉलेज के प्राध्यापक जगदीश चन्द्र जैन ने गांधीजी पर हुए बम हमले की ख़बर सुबह के
अख़बार में पढ़ी। तब उन्हें महसूस हुआ कि कुछ दिनों पहले मदनलाल ने खुद को एक गैंग
में शामिल होने की जो बात कही थी, जो गांधीजी को मारना चाहता है, वह सच थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी
षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी
नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक
दुर्घटना के कारण डॉ. जैन पाहवा की मुलाक़ात जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए। जैन के कई
दोस्तों को पता था कि वे मदनलाल को जानते हैं, और
कम से कम एक दोस्त, अंगद सिंह को यह भी पता था कि मदनलाल ने उनसे
इशारा किया था कि वे गांधीजी की हत्या की साज़िश में शामिल हैं। जैन ने इस जानकारी
के बारे में पुलिस को कोई सूचना नहीं दी थी, और
उन्हें यह एहसास ज़रूर हुआ होगा कि अगर मदनलाल ने अपने बयान में इस बारे में कुछ
भी कहा, तो उनकी अपनी चुप्पी उन्हें मुश्किल में डाल
सकती है। जैन चालीस साल के थे। उनके पास हिंदी में Ph.D. की डिग्री थी और वे एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। इस तरह, वे पढ़े-लिखे और अच्छे सामाजिक बैकग्राउंड वाले
व्यक्ति थे, जो एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों और
ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते थे। शुरू में मदनलाल की बातों को किसी शरणार्थी
की डींगें मानकर नज़रअंदाज़ कर देना पूरी तरह से समझ में आने वाली बात है। लेकिन
अब, मदनलाल के पकड़े जाने के बाद, जैन जानते थे कि जो कुछ उन्होंने सुना था, उसके बारे में किसी ज़िम्मेदार अधिकारी को
बताना उनका साफ़ फ़र्ज़ है। फिर उन्हें यह डर भी लगा कि शिवाजी पार्क हिन्दू
महासभा का गढ़ है, बाद में उनकी जान को खतरा भी हो सकता है।
आमतौर
पर उन्हें रिपोर्ट करने के लिए सबसे पास के पुलिस स्टेशन जाना चाहिए था, लेकिन डॉ.
जैन एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही
थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कान्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में
मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। उन्होंने बंबई के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया।
मुख्यमंत्री कहीं बाहर जा रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वे उनके गृह मंत्री
मोरारजी देसाई से संपर्क करें। जैन साहब शाम के 4.00 बजे मोरारजी देसाई के कार्यालय में गए और
उनको मदनलाल से 11 और 14 जनवरी को हुई बातचीत के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने बताया कि मदनलाल उनका परिचित था और वह गांधीजी की हत्या के षडयंत्र की
बात करता था। उन्होंने मदनलाल के साथियों के नाम खासकर करकरे सेठ के बारे में भी
बताया। यह भी कहा कि करकरे सेठ और मदनलाल की सावरकर से मीटिंग भी हुई थी। उसने
अपना नाम गुप्त रखने का निवेदन भी किया। जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही
नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने
षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने
उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की
कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद अँग्रेज
सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई उनसे संतुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क
स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना
चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें
दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे।
मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया। मोरारजी के पास
पुलिस विभाग भी था, और अपने विभाग के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए
उन्हें जैन से अपनी बात पुलिस को बताने के लिए कहना चाहिए था; कम से कम उन्हें यह सावधानी तो बरतनी ही चाहिए
थी कि जैन जो कह रहे थे, उसका
कोई रिकॉर्ड बनवा लें। इसके बजाय, उन्होंने
जैन की बात गुप्त रूप से सुनी और हैरानी की बात है कि वे जैन की इस बात पर भी सहमत
हो गए कि जानकारी का स्रोत 'पुलिस
को भी न बताया जाए'। इसका एक नतीजा यह हुआ कि बाद में जैन और
मोरारजी दोनों को इस बातचीत में कही गई बातों को याद करने के लिए पूरी तरह से अपनी
याददाश्त पर निर्भर रहना पड़ा।
फिर
भी शाम के करीब 5 बजे जैन के चले जाने के बाद गृह
मंत्री मोरारजी देसाई ने बॉम्बे के इंटेलिजेंस ब्रांच के इंचार्ज डिप्टी कमिश्नर, जमशेद डोराबजी नागरवाला (जिम्मी) को गुजरात
मेल में बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर शाम 8.30 बजे गुजरात मेल में आकर मिलने के लिए कहा।
वे अहमदाबाद जा रहे थे। जमशेद दोराब नागरवाला को उनके दोस्त 'जिमी' कहते
थे। उनमें अपनी नौकरी से जुड़े अच्छे गुण भी थे और कमियाँ भी। वे 34 साल के थे, लंबे-चौड़े और मज़बूत शरीर वाले थे; गोल चेहरे पर बड़ी-बड़ी गोल आँखें थीं, जिससे उनका चेहरा ऐसा नहीं लगता था कि वे
सख़्ती दिखा सकें या अपराधियों को डरा सकें। वे पूरी तरह से अपने काम के प्रति
समर्पित थे और उससे मिलने वाली ताक़त का आनंद लेते थे। उनके
नीचे काम करने वाले लोग उन्हें बहुत मानते थे और उनके ऊपर के अधिकारी उन पर भरोसा
करते थे। वे मोरारजी देसाई के प्रति भी पूरी तरह वफ़ादार थे, जो उन्हें अपना खास चहेता मानते थे, या कम से कम उन्हें अपना सबसे बेहतरीन
पुलिसवाला समझते थे।
बंबई
सेंट्रल पर जिम्मी नागरवाला आए तो देसाई ने उन्हें जैन का बिना नाम लिए सारी बातें
बताई और जांचकर करकरे को गिरफ़्तार करने का हुक्म दिया साथ ही सावरकर पर नज़र रखने
के लिए कहा तथा साज़िश रचने वालों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी इकट्ठा करें।
उन्होंने यह भी कहा कि अहमदाबाद में वे देश के गृहमंत्री सरदार पटेल से मिलेंगे और
उन्हें सारी बातों की जानकारी देंगे।
नागरवाला
ने उस इन्फोर्मेशन के स्रोत के बारे में जानने की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बस
उसने शिवाजी पार्क स्थित सावरकर सदन के बाहर दो सादी वर्दी वाले पुलिस तैनात कर
दिए। उसने अगर एक नज़र अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र अख़बार पर डाल ली होती, या पूना
पुलिस से जानकारी हासिल कर ली होती, तो उसे उसके संपादक और प्रकाशक का नाम मालूम
हो गया होता। करकरे सेठ का नाम दो-दो स्रोतों से आ रहा था,
लेकिन उसने उसके बारे में भी अधिक तहकीक़ात नहीं की। अहमदनगर पुलिस से संपर्क न
करके नागरवाला ने अपने भाई से संपर्क किया, जो वहां का मानद मजिस्ट्रेट था। दूसरे
दिन उसके भाई ने बताया कि करकरे अहमदनगर में नहीं था। पता नहीं क्यों
षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न मोरारजी देसाई को थी और न पुलिस को। पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते
हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई
ही न हो। गाँधीजी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन
हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधीजी से कोई मतलब ही न हो। अगर 21 जनवरी को बॉम्बे
के गृह मंत्री मोरारजी देसाई को डॉ. जैन ने जो बातें बताई थीं, उन पर सही समय पर ध्यान दिया गया होता, तो शायद 30 जनवरी को होने वाली त्रासदी टाली जा
सकती थी। 21 जनवरी को, जैन ने बॉम्बे के गृह मंत्री को बताया कि गांधीजी की हत्या
की साज़िश रची जा रही थी और इसमें मदनलाल के अलावा, अहमदनगर में रहने वाला करकरे नाम का एक व्यक्ति
भी शामिल था।
***
मदनलाल पाहवा को 21 जनवरी को 15 दिन के रिमांड पर लिया गया। संसद मार्ग पुलिस
थाना से पाहवा को सिविल लाइंस लाया गया और 24 जनवरी तक पूछताछ चली।
***
सुबह
में आप्टे और नाथूराम कानपुर स्टेशन पहुंचे और विश्रामालय में चेक इन किया।
रजिस्टर में नाथूराम ने अपना असली नाम लिखा। उसने अख़बार पर नज़र दौड़ाई और राहत की
सांस ली कि पुलिस को मदनलाल के किसी अन्य साथी नाम बम कांड में नहीं आया है। 11.30 बजे की लखनऊ-झांसी ट्रेन से वे झांसी आए और वहां से
दिल्ली-बंबई पंजाब मेल पकड़ा।
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इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और आई.जी.
पुलिस टी.जी. संजीवी, जिन्हें जांच का प्रभार दिया गया था, ने दिल्ली पुलिस के दो अधिकारी जसवंत सिंह, डी.एस.पी. और
बालकिशन, इंस्पेक्टर, को 21 तारीख की शाम में विमान से बंबई के लिए प्रस्थान के आदेश दिए। इन अधिकारियों को बंबई के डी.सी.पी. जे.डी. नागरवाला को मदनलाल के इकबालिया बयान से अवगत कराना था। उसके बाद उन्हें पूना जाकर
डी.आई.जी. पुलिस, सी.आई.डी., रावसाहेब गुर्टू को मदनलाल के इकबालिया बयान की कॉपी
सौंपनी थी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर