शनिवार, 26 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 16. मुरीद

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


16. मुरीद

निःसंदेह तुम सभी का पूज्य, बस अल्लाह है, उसके सिवा और कोई पूज्य नहीं है। वह अपने ज्ञान में प्रत्येक वस्तु को समाये हुए है। (क़ुरआन - 20:98)

जो लोग ईमान लाये और सदाचार किये, हम अवश्य दूर कर देंगे उनसे उनकी बुराइयाँ तथा उन्हें प्रतिफल देंगे उनके उत्तम कर्मों का। (क़ुरआन - 29:7)

सूफीमत में मुरीदी का अर्थ गुरु (मुर्शिद या पीर) के प्रति पूर्ण समर्पण और आध्यात्मिक शिष्यत्व से है। सूफीवाद में ईश्वर (अल्लाह) को पाने के मार्ग में मुरीदी को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य सीढ़ी माना गया है। 'मुरीद' शब्द का अरबी अर्थ होता है "इच्छा करने वाला" या "चाहने वाला"। आध्यात्मिक संदर्भ में, मुरीद वह व्यक्ति है जो अपनी इच्छाओं को त्यागकर केवल ईश्वर की इच्छा और उसकी प्राप्ति की चाह रखता है। मुरीदी की शुरुआत 'बैअत' की रस्म से होती है। इसमें मुरीद अपने पीर के हाथ में हाथ रखकर यह प्रतिज्ञा करता है कि वह पीर के मार्गदर्शन में अल्लाह के बताए रास्ते पर चलेगा और गुनाहों से तौबा करेगा। मुरीदी की धारणा यह है कि जिसका ‘मुर्शिद-कामिल’ से लगाव हो जाए, जो उसके आदेश का पालन करे और दिल से उसकी ख़िदमत में जुट जाए वही मुरीद है। ‘मुर्शिद-कामिल’ अपने विशेष ‘मुरीद’ (अनुयायी) को ख़िर्क़ा प्रदान करते हैं। यह ऊन का एक विशेष वस्त्र होता है। सूफ़ीमत के अनुसार ऐसे मुरीद (ख़िर्क़ा पहनने वाले) को सांसारिकता से विरक्त रहना चाहिए और उसे अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर देना चाहिए।

सूफीमत में माना जाता है कि बिना मार्गदर्शक (पीर या मुर्शिद) के आध्यात्मिक मार्ग पर चलना असंभव और भटकाव भरा है। पीर को एक आध्यात्मिक चिकित्सक माना जाता है जो मुरीद के मन की बुराइयों (नफ्स) को दूर करता है। सूफ़ी साधक के लिए सबसे पहले किसी का मुरीद होना पड़ता है। एक सैयद को सूफ़ी बनने के लिए पहले अपनी पुरानी पहचान का परित्याग करना पड़ता है। अपनी पहचान त्याग कर ही वह किसी का मुरीद होता है। हज़रत बुल्ले शाह रह.  जब ‘शाह इनायत’ के मुरीद हुए तो उन्हें काफ़ी ताने और व्यंग्य सुनने पड़े। हज़रत बुल्ले शाह रह. जब लाहौर के प्रसिद्ध सूफी संत शाह इनायत कादरी के मुरीद (शिष्य) बने, तो उन्हें समाज, कट्टरपंथियों और विशेष रूप से अपने खुद के परिवार से बहुत अधिक ताने, विरोध और व्यंग्य का सामना करना पड़ा था। इस तीखे विरोध के पीछे मुख्य रूप से तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और जातिगत अहंकार था। बाबा बुल्ले शाह एक उच्च कुलीन 'सैयद' घराने से ताल्लुक रखते थे, जिन्हें समाज में धार्मिक और सामाजिक रूप से सर्वोच्च स्थान प्राप्त था. उनके पिता एक मस्जिद के इमाम थे। इसके विपरीत, उनके गुरु शाह इनायत कादरी जाति से 'अराई' (बागवान/माली) थे, जो निम्न या मध्यम श्रमजीवी वर्ग में आते थे। वे लाहौर में बागों और खेतों की देखरेख करते थे। जब बुल्ले शाह के परिवार और रिश्तेदारों को पता चला कि उन्होंने एक 'माली' को अपना गुरु चुन लिया है, तो वे भड़क उठे। उन्होंने बुल्ले शाह को ताना मारते हुए कहा कि "एक सैयद होकर तुम एक अराई के पैरों में झुक गए? तुमने खानदान की नाक कटवा दी।" उनके परिवार की महिलाओं और रिश्तेदारों ने उन्हें वापस लाने और मुरीदी छुड़ाने के लिए काफी दबाव डाला। इस पर बुल्ले शाह ने समाज और परिवार के तानों का जवाब अपनी प्रसिद्ध शायरी (काफ़ियों) के ज़रिए दिया। उन्होंने जातिवाद पर करारी चोट करते हुए लिखा,

"कुल्लों (वंश) दे विचों शुबहा (संदेह) छड्ड,

तू बुल्लिहआ राही हो जा अराईं दा।"


यानी, वंश और कुल के अहंकार को छोड़ो बुल्ला, और उस अराई (शाह इनायत) के रास्ते पर चल पड़ो। उन्होंने आगे और भी तीखा प्रहार करते हुए कहा,

"जेहड़ा सानूं सैयद आखे, ओहनूं दोज़ख़ (नरक) मिलण सज़ाईं,

जेहड़ा सानूं अराईं आखे, ओ रूह विच पींग पायी।"

अर्थात, जो मुझे सैयद कहकर अहंकार की याद दिलाएगा, वह मानो खुद को नरक की तरफ धकेल रहा है; और जो मुझे मेरे मुर्शिद की अराई जाति से जोड़कर देखता है, वही असली आध्यात्मिक आनंद पाता है। बुल्ले शाह के लिए पीर की धारणा जात-पात से कहीं ऊपर थी। उन्होंने साबित किया कि रूहानियत (आध्यात्मिकता) में इंसान की जाति नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और अल्लाह के प्रति प्रेम को देखा जाता है।

सूफ़ीवाद में मुर्शिद और मुरीद का रिश्ता अटूट और अमर होता है। साधक को मुर्शीद (गुरु) का बराबर चिंतन करते रहना चाहिए। सभी बुरे विचारों से गुरू उसकी रक्षा करता है। वह हमेशा गुरु का ध्यान करते रहता है। ध्यान करते-करते वह इतनी दूर तक पहुँच जाता है कि उसे हर चीज़, हर मनुष्य में गुरु ही दिखता है। इस स्थिति को ‘गुरु में लय कर देना’ कहते हैं। मुर्शीद अपनी दिव्य शक्ति से यह जान जाता है कि साधक (सालिक) अपनी साधना में कहाँ तक सफल हो पाया है। गुरु में लय कर देने वाली अवस्था में पहुँच जाने के बाद मुर्शीद उस साधक को अपने सम्प्रदाय के संस्थापक दिवंगत पीर की दिव्य शक्ति के अधीन कर देता है। साधक अपने पीर की आध्यात्मिक शक्ति के सहारे उस पीर को प्रत्यक्ष करता है। तीसरी अवस्था में पीर उसको पैग़म्बर के निकट पहुंचा देता है। साधक सभी वस्तुओं में पैग़म्बर को देखने लगता है। चौथी अवस्था में साधक परमात्मा तक पहुँच जाता है। सभी वस्तुओं में वह परमात्मा के दर्शन करने लगता है। इस प्रकार से वह परमात्मा के साथ एकत्व को प्राप्त करता है। इसके बाद पीर उसे फिर से पहली अवस्था में पहुंचा देता है और साधक साधारण मनुष्य की तरह जीवन जीने लगता है।

मुरीदी की एक उच्च अवस्था 'फना-फी-शेख' है। इसका अर्थ है कि मुरीद अपने अहंकार और अस्तित्व को अपने गुरु के विचारों और उनके स्वरूप में पूरी तरह विलीन कर देता है। माना जाता है कि गुरु में विलीन होने के बाद ही वह 'फना-फी-अल्लाह' (ईश्वर में विलीन होना) की अंतिम अवस्था तक पहुँच सकता है। सूफीवाद मानता है कि जब तक इंसान के भीतर 'मैं' (नफ्स या अहंकार) मौजूद है, वह ईश्वर को नहीं पा सकता। गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण से मुरीद का यह अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

सूफ़ी साधना पद्धति में इश्क़ का मुख्य स्थान है। एक तरफ़ इश्क़ मुरीद को मुर्शिद से जोड़ने पर ‘इश्क़े मजाजी’ कहलाता है। वही दूसरी तरफ़ शरीर से पारलौकिक होकर रूहानी मंज़िलें तय करते-करते हक़ीक़त के शिखर तक पहुंच कर यह ‘इश्क़े हक़ीक़ी’ बन जाता है। इश्क़ आशिक़ (मुरीद) को माशूक (ईश्वर) तक ले जाने वाला साधन-मात्र है। यह वह ज्वाला है जिसमें वह सारे वसफ़ (गुण) जल कर राख़ हो जाते हैं, जो अल्लाह की ओर मुरीद के रुझान को रोकने वाले होते हैं। ईश्वर से सीधा प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) करना आम इंसान के लिए कठिन होता है। इसलिए, मुरीद पहले अपने गुरु से गहरा रूहानी प्रेम करता है। गुरु के प्रति इस गहरे प्रेम और जुड़ाव को ही 'फना-फी-शेख' का आधार माना जाता है। इस अवस्था में मुरीद खुद को एक खाली बर्तन की तरह गुरु के सामने रख देता है, ताकि गुरु उसमें आध्यात्मिक ज्ञान भर सकें। मुरीद अपने गुरु के हर काम, सोच और स्वभाव को खुद में ढाल लेता है। सूफीमत में फना-फी-शेख अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि यह एक सीढ़ी है। जब मुरीद अपने गुरु में विलीन (फना-फी-शेख) हो जाता है, तब गुरु उसे 'फना-फी-रसूल' (पैगंबर में विलीन होना) और अंततः 'फना-फी-अल्लाह' (ईश्वर में विलीन होकर परम सत्य को पा लेना) की अंतिम अवस्था तक पहुँचाते हैं।

मुरीद ईश-प्रेम में मदमस्त हो जाता है। नम्रता, कठोर तप, जुहद और मस्ती उसकी कैफ़ियत होती है। इस पथ की यात्रा में उसके भावों में परिवर्तन आता जाता है, लेकिन उसकी मस्ती भरी रहस्यमयी कैफ़ियत और आत्मिक दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता। मुरीद तो मूलतः मस्ती का नमाज़ी होता है। तप, साधना, रियाज़त, बन्दगी और इबादत से वह आनंदमयी मस्ती की ओर अग्रसर होता जाता है। वह सांसारिक ऐशो-आराम से ऊपर उठकर रूहानी आलम के शिखर की ओर बढ़ता है। बाहरी चमक-दमक को छोड़कर वह अंतःआत्मा में डूब जाता है। वह क़ुरआन मज़ीद को सिर्फ़ कंठस्थ करने के बजाए आयतों के आंतरिक भावों और अर्थों को ग्रहण करने लगता है। उसे यह समझ हासिल होती है कि संसार के रीति-रिवाज़ों से ऊपर उठना ही असल में ऊंचा मकाम हासिल करना है –

बाहर आक अंदरि आलूदा किया तू शेख़ कहावहि।

कहै हुसैन जे फारिग थीवहि, तां खास मरातब पावहिं॥

यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ 16वीं शताब्दी के महान सूफी संत शाह हुसैन (जिन्हें माधो लाल हुसैन भी कहा जाता है) की हैं। इन पंक्तियों में बाहरी दिखावे (पाखंड) की कड़ी निंदा की गई है और मन की आंतरिक शुद्धता को रूहानियत (आध्यात्मिकता) की असली शर्त बताया गया है। शाह हुसैन को कोई हुसैन कहे या शाह, शेख़ कहे या लाल हुसैन – इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि स्वयं हुसैन को अपने नाम के साथ फ़क़ीर शब्द का प्रयोग करने में आनंद मिलता है। शाह हुसैन उन लोगों पर कटाक्ष कर रहे हैं जो बाहर से तो साफ-सुथरे, कीमती या सूफियाना लिबास (जैसे जुब्बा या पगड़ी) पहन लेते हैं और खुद को समाज में 'शेख' (धार्मिक गुरु या सिद्ध पुरुष) कहलवाते हैं, लेकिन उनका 'अंदर' (मन और आत्मा) लालच, अहंकार, ईर्ष्या और वासना जैसी सामाजिक बुराइयों से मैला (आलूदा) है। सूफीवाद में बाहरी दिखावे का कोई मूल्य नहीं है, यदि दिल साफ न हो। शाह हुसैन कहते हैं कि यदि तुम इस बाहरी दुनिया के पाखंड, मान-सम्मान की भूख और अपने अहंकार (नफ्स) से 'फारिग' (मुक्त) हो जाओगे, तभी तुम ईश्वर (अल्लाह) की नजरों में एक विशेष आध्यात्मिक दर्जा (खास मरातब) प्राप्त कर सकोगे। असली सूफी वही है जो दुनियावी दिखावे से पूरी तरह आजाद होकर केवल अपने दिल को साफ रखता है। ईश्वर कपड़ों या उपाधियों से नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता और अहंकार-मुक्ति से मिलता है। मस्त मलंग, ग़रीब, बेचारा कहलवाने में उन्हें गर्व महसूस होता है। सूफ़ीमत में फ़क़ीर का दर्ज़ा वही है जो आध्यात्मिक मुकाम में ब्रह्मज्ञानी को प्राप्त होता है।  फ़क़ीर तो वह है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष को, ज़ाहिर और अप्रकट को एक समान समझता है। वह हर प्रकार की कठिनाई को आसान मानता है। मुरीद से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने पीर के आदेशों का पालन बिना किसी तर्क या संदेह के करे। सूफी साहित्य में कहा गया है कि मुरीद को अपने गुरु के सामने वैसा ही शांत होना चाहिए जैसे एक शव नहलाने वाले के हाथों में होता है।

मुरीद ईश्वर को किसी देवी-देवता, पीर-पैग़म्बर, वली-औलिया तक सीमित करके नहीं देखता। वह उसकी सिर्फ़ एक ही हस्ती को स्वीकार करता है।

इक्के दिलवर सम छटि रविया, दूजा नहीं कदाईं।

कहै हुसैन फ़क़ीर निमाणा, सतिगुरु तो बलि जाईं।

शाह हुसैन यहाँ सूफीवाद के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत वहदत-उल-वजूद (कि सब कुछ ईश्वर ही है) को बयां कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इस पूरी सृष्टि के कण-कण में, हर जीव में केवल वही एक सच्चा प्रियतम (अल्लाह) समाया हुआ है। उसके अलावा ब्रह्मांड में किसी दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं है। हर रूप और हर रंग में वही एक परमात्मा दिखाई देता है। शाह हुसैन खुद को एक अत्यंत विनम्र और अहंकार-रहित फकीर (निमाणा) कहते हुए घोषणा करते हैं कि वे अपने 'सतगुरु' (मुर्शिद/पीर) पर पूरी तरह कुर्बान जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि गुरु ने ही उनकी आँखों से अज्ञानता का परदा हटाया और उन्हें यह दिव्य ज्ञान दिया कि हर तरफ केवल वही एक ईश्वर व्याप्त है। बिना गुरु के मार्गदर्शन के इस सत्य को पहचानना असंभव था। मुरीद ईश्वर के आगे स्वयं को पूर्ण समर्पित कर, अपने आपको उसके रंग में रंगा हुआ मानता है। अपनी साधना का रहस्य जानने, उसका अभ्यास करने और उसकी सफलता के लिए साधक को किसी पीर की शरण लेनी ही पड़ती है। मुरीद पहले अपने पीर के सामने आत्मसमर्पण करता है, जब साधक को मुर्शीद का आशीर्वाद मिल जाता है, तब उसका आध्यात्मिक जीवन शुरू हो जाता है। उसे मुर्शीद के द्वारा दिए गए आदेशों और उस सम्प्रदाय के नियम-कानूनों और पाबंदियों का सख्ती से पालन करना होता है। इस तरह उसकी आध्यात्मिक यात्रा (तरीक़ा) शुरू हो जाती है। अब मुरीद से सालिक (यात्री) हो जाता है। फिर वह पीर के द्वारा रसूल अर्थात् हज़रत मोहम्मद स. के प्रभाव से आगे बढ़ता हुए परमेश्वर तक पहुंच जाता है और इसे वस्ल (मिलन) कहते हैं। उसका काम होता है परमात्मा का स्मरण (ज़िक्र) करते रहना। ज़िक्र के द्वारा वज्द (भावोल्लास) की अवस्था की प्राप्ति होती है। वज्द के बाद हाल (भावाविष्टा) की अवस्था आती है। हाल की अवस्था में साधक के मन में अल्लाह के सिवा और किसी प्रकार का ख्याल नहीं रहता। साधक पीरों के अलावा औलिया (वली व फ़कीरों) की भी इबादत करते हैं और उनकी मज़ारों (समाधियों) की ज़ियारत (तीर्थयात्रा) भी करते हैं। सृष्टि में केवल एक ही परम सत्य (अल्लाह) है और इस रहस्य को समझने का एकमात्र माध्यम सच्चा गुरु (मुर्शिद) है, जिसके प्रति शिष्य को हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-29

                                 महात्मा गांधी हत्या केस-29


20 जनवरी, 1948

दिल्ली में ठंड बढ़ चुकी थी। बिड़ला भवन की गतिविधियां सामान्य थीं। गांधीजी की खांसी बढ़ गई थी, लेकिन उन्होंने कोई दवा लेने से इंकार कर दिया था। डॉक्टरों ने तय किया था कि उन्हें सिर्फ़ तरल भोजन ही दिया जाए, जिसकी वजह से वे अपनी ताक़त वापस नहीं पा रहे थे। उन्हें एनिमा दिया गया, जिससे वे और भी थक गए। गांधीजी ने अपना अधिकांश समय पत्रों के उत्तर देने में लगाया। उस दिन की प्रार्थना सभा में थोड़ी देरी हुई, क्योंकि कमज़ोरी के कारण गांधीजी कुर्सी पर बैठकर माइक से भाषण देने वाले थे, और पब्लिक एड्रेस सिस्टम में गड़बड़ी आ गई थी, जिसे ठीक करने में थोड़ा समय लगा। जब उन्हें कुर्सी पर बिठाकर प्रार्थना सभा में ले जाया गया, तो वे बीमार और थके हुए लग रहे थे, उनके गाल पिचके हुए थे। मनुबेन के साथ, वे बगीचे के आखिर में बने पोर्टिको के बाहर चबूतरे पर बैठ गए। बगीचे में लगभग तीन सौ लोग थे। उन्होंने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया और कुछ देर तक उन्हें गौर से देखा—वे आम लोग थे, जो उनके भाषण सुनने से ज़्यादा उनके दर्शन करने आए थे। लेकिन उनमें कुछ ऐसे लोग भी थे जो आमतौर पर प्रार्थना सभा में नहीं दिखते थे। गांधीजी के बिल्कुल पास पाँच आदमी थे जिनके पास रिवॉल्वर और हैंड ग्रेनेड थे। वे पुलिस वाले नहीं थे। वे उन्हें मारने आए थे। यह भी बाकी प्रार्थना सभाओं जैसी ही एक सभा थी, जिसकी शुरुआत प्रार्थना और मंत्रों से हुई और समापन दिन भर की तैयारी के बाद तैयार किए गए प्रवचन से हुआ। उनकी बातें ऑल-इंडिया रेडियो पर प्रसारित हो रही थीं, और साथ ही एक कैमरा क्रू भविष्य के लिए उनको रिकॉर्ड कर रहा था। वे हिंदी में भारी और कर्कश आवाज़ में बोल रहे थे।

देश में हिंसक भावनाएं भड़की हुई थीं। हवा में नफ़रत की बू बसी हुई थी। पाकिस्तान की मुस्लिम कट्टरता ने भारत में भी ऐसी ही कट्टरता को जन्म दिया था। इस कट्टरता के समर्थक इस्लाम के नाम पर हिंदुओं और सिखों पर हुए अत्याचारों का बदला लेने की राह में गांधीजी को प्रमुख बाधा मानते थे। गांधीजी द्वारा दिल्ली में शांति स्थापना से ये लोग निराश हो गए थे। इन लोगों ने गांधीजी को ख़त्म करने का निश्चय किया था। उस पर से पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने की घोषणा ने आग में घी का काम किया था। ऊपर से काश्मीर से हिन्दू नागरिकों के प्रति किए जाने वाले अपराधों की कहानियां लगातार आ रही थीं। इस ग्रुप के लोगों का मानना था को पाकिस्तान को दी गई 55 करोड़ की रकम का उपयोग कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ लड़ी जा रही पाकिस्तान की लड़ाई में होगा। विभाजन के बाद लाखों विस्थापितों में हिंदू महासभा ने हथियार बांटे थे और उन्हें उकसाया था। मदनलाल भी ऐसा ही एक उत्तेजित शरणार्थी था।

काल का क्रूर चक्र तेज़ हो चुका था।

हत्या की साज़िश

मरीना होटल के कमरे में आप्टे और नाथूराम ने नाश्ता मंगवाया। धोबी आया, तो नाथूराम ने उसे अपने कपड़े धोने के लिए दिया। धोबी ने कपड़े गिने, दस थे। नाथूराम को यह ख़्याल नहीं रहा कि उसके कपड़ों पर उसके नाम के संकेताक्षर ‘N.V.G.’ लिखे हुए थे। आप्टे ने नाथूराम से बिड़ला भवन चलने के लिए कहा। गोडसे ने कहा की उसकी तबीयत ठीक नहीं है।  उसे माइग्रेन का दर्द था। आप्टे हिन्दू महासभा भवन के लिए निकल पड़ा।

रात भर हल्की बारिश होती रही, लेकिन सुबह होते-होते वह कम हो गई और 7:30 बजे तक आसमान साफ़ हो गया। तय हुआ था कि वे अगले दिन सुबह-सुबह हिंदू महासभा भवन में मिलेंगे। लेकिन, लगभग 8:30 बजे सिर्फ़ आप्टे और करकरे ही वहाँ पहुँचे। करकरे को लेकर वह हॉल में आया जहां शंकर, बड़गे और मदनलाल थे। आप्टे ने बताया कि नाथूराम को माइग्रेन का ज़बरदस्त दौरा पड़ा था, जिससे वह समय-समय पर परेशान रहता था, लेकिन उसने वादा किया था कि वह दिन में बाद में उनसे आकर मिल लेगा। उसने मदनलाल को कुछ रुपए दिए और कुछ सामान ख़रीदने के लिए कहा। वह चला गया। फिर आप्टे ने बाडगे और शंकर से कहा कि वे उसके साथ बिड़ला हाउस चलें, ताकि वह उन्हें मौके पर ही ठीक-ठीक दिखा सके कि वह उनसे क्या करवाना चाहता था।

हालांकि मदनलाल और गोपाल, जिन्हें हत्या की साज़िश में बराबर की अहम भूमिकाएँ दी गई थीं, कभी बिड़ला हाउस नहीं गए थे, फिर भी वे इस बार भी आप्टे के साथ नहीं गए क्योंकि वे नहाने के लिए पानी गर्म होने का इंतज़ार कर रहे थे। करकरे, जो पहले ही उस जगह से वाकिफ़ हो चुका था जहाँ उसे काम करना था, ने सोचा कि वहाँ दोबारा जाना समय की बर्बादी होगी और वह महासभा भवन में ही रुक गया।

अब तक बड़गे ने अपने नौकर शंकर को गांधीजी की हत्या की योजना के बारे में कुछ नहीं बताया था। एक कार से चारों बिड़ला भवन पहुंचे। उस समय जो सड़क बिड़ला हाउस तक जाती थी उसे अल्बुकर्क रोड कहा जाता था। मेन गेट पर कार खड़ी की गई। जब वे भवन के अंदर प्रवेश करने लगे, तो मुख्य द्वार पर चौकीदार ने उन्हें रोक दिया। आप्टे ने संतरी से कहा, ‘हम गांधीजी के सेक्रेटरी से मिलना चाहते हैं।’ संतरी ने एक चिट दिया और कहा कि अपना नाम और मिलने का कारण लिखो। आप्टे ने पर्ची पर अपना और अपने साथियों का नाम लिखकर दिया ताकि उनका पास बन सके। संतरी जब अन्दर की ओर जा रहा था, तभी काले कपड़ों में एक आदमी गेट से बाहर निकल रहा था। उसे देखकर आप्टे ने बड़गे से बुदबुदाते हुए कहा, यह सुहरावर्दी है। प्रार्थना सभा में यह मंच पर गांधीजी के बगल में बैठा होगा। तुझे दोनों को उड़ा देना है। तभी चौकीदार लौटा और उन्हें अन्दर जाने की इज़ाज़त मिल गई।

वे लॉन की तरफ़ बढ़े, जहां प्रार्थना सभा होती थी। आप्टे ने उस जगह की ओर इशारा किया, जहां गांधीजी और सुहरावर्दी शाम में बैठने वाले थे। उन्होंने भली-भांति गांधीजी की शाम की प्रार्थना स्थल को देखा। आप्टे उन्हें घर के पीछे नौकरों के क्वार्टर की तरफ ले गया और वे सर्विस एंट्रेंस से होते हुए परिसर में दाखिल हुए। मुख्य भवन से परे नौकरों के क्वार्टर स्थित थे। बिड़ला हाउस के बगीचे का एक हिस्सा 'धँसा हुआ' था, और मुख्य घर से एक छोटे समर हाउस तक जाने वाला चौड़ा लॉन दो स्तरों पर बना था। क्वार्टर के पीछे एक बरामदा था, और बरामदे के सामने एक बड़ा चबूतरा बनाया गया था। यहीं पर महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा हुआ करती थी। महात्मा गांधी ख़ुद बरामदे की जड़ के नीचे एक लकड़ी के दीवान पर बैठते थे, जबकि दर्शक नीचे। समझाया कि यह जगह पीछे की तरफ नौकरों के कमरों में से एक की पिछली खिड़की से 'चार या पाँच कदम' की दूरी पर थी। इस कमरे (नंबर 3) में बिड़ला परिवार का एक कार क्लीनर, छोटू राम रहता था, और उसकी खिड़की असल में दीवार में बनी एक सजावटी वेंटिलेशन-ग्रिल थी, जिसे 'चिनाई के कुछ हिस्सों को छोड़कर' बनाया गया था। गांधीजी के दीवान के पीछे की दीवार में एक जालीदार खिड़की थी जो बाहर के कमरे को हवा देती थी। घर का पिछला गेट एक सर्विस लेन पर खुलता था, और अधिकांश नियमित आगंतुक इसी द्वार से प्रार्थना सभाओं में आते थे। षड्यंत्रकारियों ने पिछले दरवाजे से घर में प्रवेश किया और कमरे के बाहर से जालीदार खिड़की का निरीक्षण किया। यह सीधी जाली का काम नहीं था ... अलग-अलग छेद एक ही आकार और शक्ल के नहीं थे ... कोई भी छेद आयताकार नहीं था ... सबसे बड़े छेदों का आकार 6 इंच x 3 इंच था। ऐसे आठ छेद थे। जाली के काम में कुल 26 छेद थे।

फिर वे बिड़ला भवन के पीछे की तरफ़ गए और बिड़ला हाउस के पीछे के हिस्से का निरीक्षण किया। आप्टे ने खिड़की की तरफ़ भी इशारा किया। एक आँख वाला आदमी इस कमरे के दरवाजे के सामने बैठा था, और उन्होंने उस समय इसमें प्रवेश करना और इस तरह से ध्यान आकर्षित करना बुद्धिमानी नहीं समझी। वे बरामदे में घूमते रहे और किसी को उस ओर न देखता पाकर, आप्टे ने जगह की दीवार पर बने नक्काशीदार लाल बलुआ पत्थर की जाली में बने छेदों का नाप लिया; यह दीवार उस मंडप के पीछे थी जहाँ गांधीजी प्रार्थना सभा में बैठते थे। आप्टे ने कहा कि इससे आसानी से गोली चलाई जा सकती है और हथगोले भी फेंके जा सकते हैं। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि एक ही बार में दोनों का काम तमाम हो जाए, यदि हम इसमें असफल होते हैं, तो कम से कम एक की मौत तो होनी ही चाहिए।

इसके बाद आप्टे बाकी दोनों को नौकरों के क्वार्टर में ले गया और उस कमरे की ओर इशारा किया जिसमें वह जाली लगी थी, जिसे उन्होंने दूसरी तरफ से देखा था। उसने बडगे से कहा कि उसे बस फ़ोटो खींचने के बहाने कमरे में जाना है, जाली के ज़रिए गांधीजी पर गोली चलानी है और उसके बाद छेद से होते हुए भीड़ के बीच ग्रेनेड फेंक देना है। न तो आप्टे और न ही बाडगे कमरे के अंदर गए थे, लेकिन दोनों को लग रहा था कि इससे उनका मकसद पूरा हो जाएगा। और जहाँ तक शंकर की बात है, क्योंकि आप्टे बाडगे को धीमी आवाज़ में मराठी में बातें समझा रहे थे—जो शंकर को शायद ही समझ आती थी—इसलिए उसे अब भी पता नहीं था कि उसे बिड़ला हाउस के बगीचे में क्यों घुमाया गया था या दिन में आगे उसे क्या करना था।

यह निर्णय लिया गया कि गोडसे और आप्टे उचित समय पर पूर्व-व्यवस्थित संकेत देकर ऑपरेशन को निर्देशित करेंगे। एक रिवॉल्वर और एक हथगोले से लैस बड़गे, महात्मा गांधी की सीट के पीछे स्थित कमरा नंबर 3, सर्वेंट क्वार्टर, बिड़ला हाउस में यह दिखाकर प्रवेश करेगा कि वह जाली खिड़की के माध्यम से प्रार्थना सभा की एक तस्वीर लेने का इरादा रखता है। प्रार्थना सभा में उपस्थित लोगों का ध्यान भटकाने और भगदड़ मचाने के लिए पाहवा पिछले गेट के पास एक पलीता लगा कर विस्फोट कर देगा। आप्टे ने बड्गे को वह जगह भी दिखाई जहाँ प्रार्थना स्थल पर जमा लोगों का ध्यान भटकाने के लिए गन-कॉटन स्लैब में धमाका किया जाना था।

उसके बाद वे प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ़ गए। उसने चबूतरे की दोनों तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि हम दोनों तरफ़ पलीता लगा कर विस्फोट करेंगे। इससे लोगों का ध्यान उस तरफ़ बंट जाएगा। अफरा-तफरी मच जाएगी और इसी का लाभ उठा कर हम किसी की नज़र में आए बिना गांधीजी की हत्या कर देंगे। उन्होंने वे सब जगह निर्धारित किए जहां से पिस्तौल चलाया जा सकता है, हथगोला फेंका जा सकता है, या लोगों का ध्यान बंटाने के लिए पलीते का विस्फोट किया जा सकता है। बड़गे को दायित्व दिया गया कि जैसे ही मंच के दोनों तरफ़ पाहवा और करकरे बारूद के पलीतों में आग लगाएगा, वह गांधीजी और सुहरावर्दी पर गोली चलाएगा और मंच पर हथगोला फेंकेगा। मंच के सामने शंकर किष्टैय्या खड़ा होगा, और सामने से गोली चलाएगा और मंच पर ग्रेनेड फेंकेगा। भगदड़ और अफरा-तफरी का लाभ उठा कर हर कोई वहाँ से भाग निकलेंगे।

गांधीजी की प्रार्थना सभा में कम से कम पांच हज़ार की भीड़ हुआ करती थी। उस भीड़-भाड़ में इस तरह की गोलाबारी से कितना भारी नुकसान हो सकता था। 8,000 वर्ग फीट के उस बगीचे में सामने की कतार में महिलाएं और बच्चे बैठते थे। आप्टे ने अपने, नाथूराम और गोपाल के खड़े होने की जगह भी निर्धारित किया जहां से वे हथगोले फेंकने वाले थे। चलने से पहले आप्टे ने बड़गे से पूछा इस दूरी से तुम गांधीजी पर निशाना साध तो लोगे? बड़गे ने उसे आश्वस्त किया। अंत में 11.30 बजे वे हिंदू महासभा भवन के लिए निकल पड़े।

वे हिन्दू महासभा भवन आ गए। कमरे में पहुंचे। कमरे में सिर्फ़ गोपाल था, जो नहा-धोकर तैयार था; बाकी दो लोग, करकरे और मदनलाल, लंच करने गए थे। आप्टे कहीं चला गया। वह बीस-पच्चीस मिनट बाद लौटा। बड़गे और गोपाल गोडसे द्वारा लाए गए रिवॉल्वर का यह देखने के लिए परीक्षण नहीं किया गया था कि वे सही तरीके से फायर करते हैं कि नहीं। आप्टे ने गोपाल से कहा कि हमें भवन के पीछे के जंगल में जाकर अस्त्रों की जांच कर लेनी चाहिए। एक बंदूक बड़गे के पास थी, एक गोपाल के पास। गोपाल के पास .38 बोर की रिवाल्वर थी और बड़गे-शंकर के पास .32  बोर की। आप्टे, बड़गे, किष्टैय्या और गोपाल हिन्दू महासभा भवन के पीछे के जंगल की तरफ़ गए। यह घटना सुबह लगभग 11 बजे की है। वास्तव में वे पिस्टॉल की टारगेट प्रैक्टिस करना चाहते थे। लगभग पंद्रह मिनट की खोज के बाद उन्हें उचित स्थल मिल गया। आप्टे ने जालीदार जगह से मंच की दूरी का अनुमान लगाया और किष्टैय्या से रिवाल्वर मांगा। उसने बंदूक लोड की और किष्टैय्या को वापस देते हुए एक पेड़ को टार्गेट बनाते हुए उसे पेड़ पर उस जगह निशाना साधने के लिए कहा जो उसने लक्ष्य के रूप में निर्धारित किया था। शंकर ने निशाना साधा, लेकिन बंदूक में कुछ गड़बड़ी थी। बुलेट सिर्फ़ दस फीट की दूरी पर स्थित टार्गेट तक नहीं पहुंचा। पेड़ से कुछेक फुट पहले ही ज़मीन पर गिर पड़ा। आप्टे ने इस रिवाल्वर को रिजेक्ट कर दिया। उन्हें पहली बार इस बात का अहसास हुआ कि बुलेट और बन्दूक की गोली के कैलिबर में अंतर है! बडगे का रिवॉल्वर .32 कैलिबर का था और बिल्कुल ठीक हालत में था। दिक्कत यह थी कि शर्मा ने जो गोलियां दी थीं, वे या तो गलत कैलिबर की थीं या खराब थीं। आप्टे ने झुंझलाकर कहा कि छोटा रिवॉल्वर 'बेकार हथियार' है।

आप्टे ने गोपाल से अपनी रिवॉल्वर निकालने को कहा। गोपाल ने अपनी थैली खोली और उसमें से .38 वेब्ले स्कॉट रिवाल्वर निकाला। रिवॉल्वर निकाली गई और जब उसका कैच दबाया गया, तो पता चला कि रिवॉल्वर का चैंबर बाहर नहीं आ रहा था। उसके गांव उकसाना में पेड़ के नीचे मिट्टी में लगभग चार साल तक दबे रहने के कारण उसमें ज़ंग लग चुकी थी और रिवाल्वर का फायरिंग तंत्र जाम हो चुका था। मतलब गोपाल की रिवॉल्वर का चेंबर खराब था और काम नहीं कर रहा था।  वेब्ले स्कॉट रिवाल्वर किसी काम के नहीं थी। गोपाल अपना रिवाल्वर वहीं ठीक करना चाह रहा था। उसने शंकर से महासभा भवन में रखे उसके बैग में से एक चाकू और तेल की बोतल लाने के लिए कहा। साथ ही बैठने के लिए एक कंबल भी मंगाया ताकि साफ किए गए पुर्जों पर दोबारा धूल न जमे। शंकर दौड़कर गया और वापस आया। उन्होंने एक पेड़ के नीचे कंबल बिछाया और गोपाल अपने रिवॉल्वर के मैकेनिज्म से जंग खुरचकर हटाने लगा, जबकि बाकी लोग बेचैनी से यह सब देख रहे थे। जब गोपाल अपने रिवाल्वर  का रिपेयर कर रहा था तभी तीन फौरेस्ट गार्ड उधर आए।

ग्यारह बजे रहे थे। फॉरेस्ट गार्ड मेहर सिंह अपने साथी कर्मियों प्यारेलाल और कप्तान के साथ गश्त लगा रहा था। तभी उसने चार लोगों को हिंदू महासभा भवन के पीछे लगभग तीन फर्लांग की दूरी पर स्थित पंचकुई पुल क्षेत्र में देखा था। उसमें से एक ने पूछा तुम सब यहां क्या कर रहे हो? गोपाल ने ज़मीन पर बिछाए चादर के नीचे रिवाल्वर छुपा दिया। बडगे को कम्बल पर ऐसे लिटाया गया मानो दर्द हो रहा हो और शंकर ने बोतल से तेल उसके टखने पर मल दिया। गोपाल, जिसने सेना में अपने समय के दौरान अच्छी तरह से पंजाबी बोलना सीखा था, ने उन्हें बताया कि वे शांत सैर के लिए बाहर आए थे और कुछ मिनटों के लिए आराम कर रहे थे क्योंकि उनमें से एक का टखना मुड़ गया था। गार्ड इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट दिखे और अपने रास्ते चले गए, लेकिन आप्टे के लिए घबराहट बहुत ज्यादा हो गई थी।

लेकिन इन लोगों को लगा यहां रहना अब ख़तरे से ख़ाली नहीं है। गोपाल ने कहा कि खुली जगह पर रिवॉल्वर ठीक करने का कोई फ़ायदा नहीं है और हमें वापस जाकर इसे कमरे के अंदर ठीक करना चाहिए। वे चारों भवन के कमरे में वापस गए और देखा कि करकरे और मदनलाल लौट आए थे। कोई परीक्षण फायरिंग नहीं हुई। दोपहर हो चुकी थी और 'ज़ीरो आवर' में बस पाँच घंटे ही बचे थे।

हॉल में करकरे और मदनलाल उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। गैंग अब फिर मुसीबत में था। उनके दोनों बंदूक काम नहीं कर रहे थे। योजना पर अमल कैसे होगा? आप्टे ने करकरे से मरीना होटल चलने के लिए कहा। उसने यह भी बताया कि वह थोड़ी देर में वहां पहुंचता है। मदनलाल अपना बेडिंग हिन्दू महासभा भवन में छोड़ आया था। वह भी वहां से चला  गया। जब वे दोनों चले गए, तो आप्टे ने बड़गे और गोपाल से मरीना होटल चलने के लिए कहा। आप्टे ने गोपाल से कहा, ‘गोपाल तुम माल वाला बैग अपने साथ ले जाना’। गोपाल ने बारूद और बेकार बंदूकों वाला बैग उठाया और आप्टे के साथ चारों एक कार में सवार होकर मरीना होटल पहुंचे। 

मरीना होटल की तीसरी मंजिल पर के एक कमरे में नाथूराम बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसके माइग्रेन का दर्द बढ़ गया था। गोपाल ने बैग कमरे में रख दिया। बडगे और किष्टैय्या नीचे खाना खाने के लिए चले गए।  गोपाल अपना बंदूक ठीक करने में लग गया। लंच करके जब बडगे और किष्टैय्या वापस आए, तो देखा कि गोपाल अब भी अपनी रिवाल्वर ठीक कर रहा था। अन्दर आकर उन्होंने दरवाज़े को अन्दर से बन्द कर दिया। बाद में बड़गे और पाहवा पलीतों के प्राइमरों और हथगोले के डेटोनेटर को ठीक करने के लिए बाथरूम में चले गए। नाथूराम और किष्टैय्या यह सब देख रहे थे।

आप्टे ने यह पता लगाने के लिए एक प्रयोग किया कि वे जो ब्लास्टिंग फ़्यूज़ साथ लाए थे, उसे जलने में कितना समय लगता है। अन्दर बाथरूम की तरफ़ जाकर आप्टे, करकरे, मदनलाल और बड़गे बारूद के पलीते और विस्फोट के लिए सामानों की आवश्यक तैयारी करने लगे जबकि नाथूराम और शंकर बाथरूम के दरवाज़े पर खड़े रहे। नाथूराम ने बड़गे से कहा, “बड़गे, यह अंतिम अवसर है, काम आज ही हो जाना चाहिए। इस बात का पुख्ता इंतजाम करो कि सभी चीजें समय पर अच्छी तरह से काम करें।” गोपाल ने इस बीच बंदूक को ठीक कर लिया था। उसका तंत्र काम कर रहा था। बडगे ने फ़्यूज़ का एक टुकड़ा जलाया। एक तेज़ चमक और फुसफुसाहट जैसी आवाज़ हुई। कमरा काले धुएँ से भर गया, जिससे उन्हें खाँसी आने लगी। करकरे ने एक बिस्तर से गद्दा उठाया और सुलगते हुए टुकड़ों को पैरों से कुचलकर बुझा दिया। होटल का एक नौकर यह जानने के लिए दौड़ता हुआ दरवाज़े पर आया कि क्या हो रहा है, लेकिन आप्टे ने उसे यह कहकर टाल दिया कि सिगरेट जलाते समय गद्दे में आग लग गई थी।

जब इन विस्फोटों की तैयारी पूरी हो गई तो सब कमरे में आ गए। गोपाल अपनी रिवॉल्वर ठीक करने में कामयाब तो हो गया था, लेकिन वह सच में गोली चला पाएगी या नहीं, यह टेस्ट नहीं किया जा सका क्योंकि अब टारगेट प्रैक्टिस के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

उन्होंने खुद को अंदर बंद कर लिया और अगले आधे घंटे में सावधानी से हैंड ग्रेनेड तैयार किए और गन-कॉटन स्लैब में फायरिंग चार्ज और फ़्यूज़ लगाए। उसके बाद, वे हमले की योजना बनाने के लिए बैठे। उनके हथियारों में अब शामिल थे: गोपाल का .38 रिवॉल्वर, जिसके बारे में उन्हें उम्मीद थी कि वह अब काम करने लायक हो गया होगा; बडगे का .32 रिवॉल्वर, जो उन्हें पता था कि बेकार था; सात-सेकंड वाले फ़्यूज़ लगे पाँच '36' हैंड ग्रेनेड; और नब्बे-सेकंड वाले फ़्यूज़ लगे गन-कॉटन के दो एक-पाउंड के स्लैब। उन्होंने, या कम से कम मदनलाल ने, पहले भी विस्फोटक इस्तेमाल किए थे, लेकिन उनमें से किसी ने भी रिवॉल्वर नहीं चलाई थी या '36' ग्रेनेड नहीं फेंका था, और उन्हें दोनों हथियारों की क्षमता या सीमाओं के बारे में बहुत कम जानकारी थी।

आप्टे लोगों के काम बांट रहा था। आप्टे ने कहा, “अब हमें यह तय कर लेना चाहिए कि कौन किस सामान को ले जाएगा। मदनलान एक बारूदी पलीता और एक हथगोला रखेगा। किष्टैय्या भी एक बारूदी पलीता और एक हथगोला रखेगा। नाथूराम, करकरे और गोपाल एक-एक हथगोले रखेंगे। बड़गे रिवाल्वर और एक हथगोला रखेगा। मैं एक रिवाल्वर रखूंगा।”

बड़गे ने योजना में थोड़ी फेर बदल की। उसने कहा, “लोगों में दहशत फैलाने के लिए एक बारूद का पलीता काफ़ी है। यह सोचना कि एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग जगह बारूद का पलीता लगाएगा और लोगों की नज़रों में आने से बच भी जाएगा, ग़लत होगा। मदनलाल को एक बारूद का पलीता और एक हथगोला दो। शंकर और मैं एक हथगोला और एक रिवाल्वर रखेंगे। और बाक़ी तुम सब एक एक हथगोला रखना।”

आप्टे ने अंतिम निर्देश दिया, “मदनलाल तुम मंच के जितने क़रीब हो सके वहां की पीछे की दीवाल के पास बारूद के पलीते में आग लगाकर विस्फोट करोगे। बड़गे तुम जैसे ही विस्फोट होगा फोटोग्राफर बनकर सर्वेंट क्वार्टर के कमरे में प्रवेश करोगे। वहां से तुम गांधीजी के ऊपर गोली चलाओगे साथ ही झरोखे से एक हथगोला भी फेंकोगे। मैं मदनलाल को सिगनल दूंगा और नाथूराम मुझे सिगनल देगा। बाक़ी सब लोग भीड़ में मिल जाएंगे।”

बारूदी पलीतों और हथगोलों को उन्होंने बांट लिया। योजना यह बनी कि नाथूराम गोडसे और आप्टे प्रार्थना के दौरान संकेत देंगे। मदनलाल पलीते में आग लगाएगा। 60 सेकेंड के बाद इसमें विस्फोट होगा। इस धमाके से सबका ध्यान आकर्षित हो जाएगा। तब बाक़ी सब अपना-अपना हथगोला गांधीजी की तरफ़ फेंकेंगे। बड़गे पीछे वाली खिड़की की जाली से गांधीजी पर गोली चलाएगा और हथगोला फेंकेगा। आप्टे मदनलाल को संकेत देगा, नाथूराम बड़गे को संकेत देगा। फिर कोलाहल में सब बिड़ला भवन से भाग जाएंगे और पूना जाने से पहले हिन्दू महासभा भवन में मिलेंगे।

दोनों नेताओं (आप्टे-गोडसे) ने खुद के लिए कोई सक्रिय भूमिका नहीं रखी थी और वे कोई हथियार भी नहीं ले जा रहे थे, लेकिन आश्चर्य यह कि यह बात गैंग के किसी सदस्य को अजीब नहीं लगी। मिशन पर निकलने से पहले उनके पास अभी भी एक घंटा बाकी था; उन्होंने यह समय अपनी बेहतरीन योजना में कुछ छोटे-मोटे सुधार करने में बिताया। इसके बाद आप्टे ने सबको कोड नाम दिया। नाथूराम को देशपांडे, करकरे को व्यास, आप्टे को कर्मारकर, बड़गे को बन्दोपन्त और शंकर को तुकाराम नाम दिया गया। आपसी बातचीत में असली नाम लेने से उनकी जानकारी सार्वजनिक हो जाने का ख़तरा था, इसलिए उन्होंने छद्म नाम रख कर साज़िश को अंजाम देने के बारे में सोचा। किसी को यह ध्यान नहीं आया कि गोपाल और मदनलाल को भी छद्म नाम दिया जाना चाहिए; किसी ने यह नहीं सोचा कि उस अफरा-तफरी के माहौल में सातों लोगों के लिए एक-दूसरे के नकली नाम याद रखना नामुमकिन होगा।

करकरे ने सुझाव दिया कि वे लोग अलग अलग पोशाक धारण करेंगे। नाथूराम ने मिलिटरी यूनिफार्म की तरह खाकी पोशाक धारण किया। आप्टे भारतीय वायु सेना के यूनिफॉर्म की तरह ब्ल्यू सूट धारण किया। करकरे ने जवाहर शर्ट, धोती और गांधी टोपी पहना। मदनलाल ने अंग्रेज़ों की तरह का पोशाक धारण किया, कोट शर्ट और पैंट साथ ही उसने आप्टे द्वारा दी गई जैकेट पहनी। गोपाल ने शर्ट और जैकेट पहना। शंकर ने शर्ट, कोट, धोती और टोपी पहनी। बडगे ने अपने गेरुए कपड़े उतार दिए और घुटनों तक लंबी सफेद 'नेहरू' शर्ट और सफेद धोती पहनी और कंधों पर स्कार्फ की तरह तौलिया डाल लिया। करकरे ने अपनी पहचान छुपाने के लिए काली मूंछ बनाई, भौंहों को काले रंग से रंगा, और लंबा तिलक लगाया। इस तरह, गाँव के किसी तमाशा दिखाने वाले दल की तरह तैयार होकर, वे महात्मा की हत्या करने निकल पड़ने वाले थे। इतनी बड़ी योजना बनाने वाले इस गैंग के सभी सदस्य अपने ही विचारों के वश में थे। वे गांधी की हत्या करने वाले थे और फिर भी ऐसे रहते जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्हें इस बात का इतना पक्का भरोसा था कि उन पर शक भी नहीं किया जाएगा कि उन्होंने किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में जल्दबाजी में दिल्ली से निकलने की कोई तैयारी नहीं की थी। उसी सुबह, नाथूराम और आप्टे दोनों ने होटल के धोबी को कपड़े धोने के लिए दिए थे, जिन्हें वे पूरे भरोसे के साथ 22 तारीख को वापस लेने की उम्मीद कर रहे थे।

अस्त्र-शस्त्र बांटे गए। आप्टे ने एक बारूदी पलीता और एक हथागोला करकरे को देते हुए बोला, “इसे मदनलाल को दे देना।” उसने बड़गे और शंकर को एक हथगोला और रिवाल्वर दिया।

नाथूराम ने कहा कि उसके सिर में दर्द हो रहा है, वह पन्द्रह-बीस मिनट के बाद निकलेगा और उनसे बिड़ला भवन में मिलेगा। सबसे पहले करकरे और मदनलाल होटल से निकले और तांगा से बिड़ला भवन के लिए चल पड़े। उसके पन्द्रह मिनट बाद आप्टे, बड़गे, किष्टैय्या और गोपाल एक टैक्सी में बिड़ला भवन के लिए निकले। अब तक बड़गे ने अपने नौकर शंकर को गांधीजी की हत्या की योजना के बारे में कुछ नहीं बताया था। जब वे मरीना होटल से निकलने लगे तो सीढ़ियों पर बड़गे ने शंकर को बताया कि मैं एक व्यक्ति के ऊपर ग्रेनेड से हमला करने जा रहा हूं, फिर उसे गोली भी मारूंगा। और जैसा मैं करूं, तुम भी करना। जिस व्यक्ति को हम मारने जा रहे हैं वह एक बूढ़ा आदमी है और उसका नाम महात्मा गांधी है। किष्टैय्या को केवल अपने मालिक के आदेश का पालन करना था, उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

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