राष्ट्रीय आन्दोलन
485. स्वतंत्रता की प्राप्ति
1947
14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान का निर्माण हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान
का गवर्नर जनरल और लियाकत अली प्रधानमंत्री बने। बारह बजे मध्य रात्रि 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड
माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने। नेहरू ने घोषणा की, “बरसों पहले नियति के साथ किया गया करार पूरा हुआ। आज हमारे दुर्दिन की अवधि समाप्त
हो गई। भारत ने पुनः अपने-आप को प्राप्त कर लिया है।” महात्मा गांधी की जय के
नारे लगे। परन्तु विभाजन के दुख से गांधीजी कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगे शांत करने
का प्रयास कर रहे थे।
गांधीजी जी कलकत्ता चले
आए। तीन बार भारत सरकार ने संदेशवाहक भेजकर कहलवाया कि वे स्वतंत्रता दिवस पर प्रसारण
के लिए अपना संदेश दें। उन्होंने कहा, “मेरा कोई संदेश नहीं है।” संदेशवाहक ने कहा, “आपका कोई संदेश नहीं होगा
तो अच्छा नहीं लगेगा।” गांधीजी ने रुखाई से कहा,
“अगर यह बुरा है, तो होता रहे।” बी.बी.सी. ने जब गांधीजी
के लिए संदेश के लिए आग्रह किया, तो गांधीजी ने इस आग्रह को ठुकरा दिया। बोले, “दुनिया को भूल जाना चाहिए
कि मैं अंग्रेज़ी भी जानता हूं।” गांधीजी के ऐसे वक्तव्य उनकी भारी पीड़ा को दर्शा रहा था।
ऐसा नहीं है कि अगर गांधीजी
नहीं होते तो ब्रिटिश राज सदा सदा के लिए टिका रहता। राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई
गांधीजी के 1915 से भारत में सक्रिय होने
के आधी शताब्दी पहले से चल रही थी। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधीजी ने भारतीय
स्वतंत्रता आंदोलन को तीन विशिष्ट गुणों से अनोखा बनाया था। पहला- गांधीजी ने स्वराज
को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की
तार्किक परिणीति के रूप में न सिर्फ प्रचारित किया बल्कि कठिन मौकों पर अलोकप्रिय निर्णय
लेकर अहिंसा और सत्याग्रह के मूल को गांव-गांव तक स्थापित किया। इससे जनसाधारण का स्वतंत्रता
आंदोलन में योगदान करना सहज हो गया। दूसरा- गांधीजी ने स्वराज की राजनीतिक और सामाजिक
परिभाषा के बीच के पुराने द्वंद को लगभग खत्म किया। आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वराज
को एक ही भवन के चार स्तंभ के रूप में प्रचारित किया। रचनात्मक कार्यक्रमों के ज़रिए
आम लोगों के बीच में एक जीवनशैली के रूप में और सांस्कृतिक क्रांति के रूप में स्थापित
किया। तीसरा- गांधीजी ने अपनी
कथनी और करनी में एकता, निजी और सार्वजनिक जीवन
की एकरूपता के जरिए आश्रमों से शुरू करके जनआंदोलन तक हिंदू-मुस्लिम दूरी, छुआछूत की बीमारी और औरतों को सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखने की पुरुषवादी परंपरा
का विमूलन किया। अब अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी
का नेतृत्व एक प्रकार से अहिंसक और नैतिक आधारों पर भारतीय समाज और राष्ट्रीयता के
नवनिर्माण की कोशिश थी।
भारत में ब्रिटिश सत्ता
का चरित्र अर्द्ध-लोकतांत्रिक था। वह न्याय, आधुनिकता, यूरोपीय सभ्यता की श्रेष्ठता
आदि कुछ खास विचारों के आधार पर अपना नैतिक औचित्य स्थापित करती थी। लेकिन उसका टिकाव
तो मुख्यतः पाशविक बल पर ही था। राष्ट्रीय आंदोलन ने लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं का पूरा-पूरा
लाभ उठाया। उसने ब्रिटिश सता के मानवीय दावों का पर्दाफ़ाश भी किया। अपने लक्ष्यों की
पूर्ति के लिए अहिंसक संघर्ष का सहारा लिया। औपनिवेशिक विधायिकाओं का इस्तेमाल किया
गया। संघर्ष-तैयारी-संघर्ष की अनोखी रणनीति का सहारा लिया गया। राष्ट्रवादी रणनीति
ब्रिटिश शासन की खास प्रकृति के अनुसार विकसित हुई। उनकी सत्ता संरक्षण और निरंकुशतावाद
के मिश्रण से तैयार स्तंभ पर टिकी हुई थी। इस सत्ता की स्थापना शक्ति द्वारा हुई थी।
इसका विकास और स्थायित्व भी शक्ति द्वारा ही हुआ। यहां तक शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन
करने के लिए भी शक्ति का ही सहारा लिया जाता था। कुछ नागरिक संस्थानों, जैसे स्कूल,
कॉलेज, न्यायालय, विधायिकाओं की भी उसने रचना की। जब आंदोलन स्थगित रहता तो लोगों को कुछ नागरिक अधिकार भी दे दिए जाते। दमन के समय भी कुछ नागरिक संहिताओं
का पालन किया जाता। इस तरह ब्रिटिश शासन का निरंकुशतावादी और लोकतांत्रिक चरित्र साथ-साथ
चलता रहा। भय और प्रलोभन दोनों का उसने सहारा लिया। उसने यह धारणा फैला रखी थी कि वे
भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास कर उसे आधुनिक बना रहे हैं। साथ ही यह
भी ज़ाहिर कर रखा था कि वे अपराजेय हैं और उनका विरोध करना बेकार है।
उपरोक्त वर्णित सारे पहलुओं
का ध्यान रख भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति तैयार की गई। इसी के आधार पर वर्चस्व
के दीर्घकालीन संघर्ष की योजना तैयार की गई। इस संघर्ष में आम जनता के दिलों को जीतने
का प्रयत्न किया गया। इसका प्रभाव हर संघर्ष के बाद बढ़ता गया। अधिकांश समय क़ानून सम्मत
तरीक़ों से संघर्ष किया गया, ज़रूरत पड़ने पर जनसंघर्ष के लिए क़ानून तोड़ा भी गया। इससे
राष्ट्रीय आंदोलन और मज़बूत हुआ। सक्रिय संघर्ष का लक्ष्य औपनिवेशिक शासकों के हाथ से
सत्ता छीन लेना था। गांधीजी ने जनसाधारण को सक्रिय राजनीति में लाने का काम किया, जिन्हें
अंग्रेज़ों ने बख़ूबी रणनीति बना कर जनता को सुषुप्ति की अवस्था में रखा था। इसके अलावा
गांधीजी ने इन धारणाओं का खंडन भी करने का महत्वपूर्ण काम किया कि ब्रिटिश सत्ता भारत
की शुभचिंतक है और वह अपराजेय भी है। सिविल नाफ़रमानी आंदोलन ने लोगों को निर्भीक और
साहसी बनाया। उसमें संघर्ष और त्याग करने की क्षमता पैदा हुई। लोगों में यह विश्वास
आया कि उनके सहमति के बिना यहां शासन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने अगला लक्ष्य निर्धारित
किया कि प्रशासनिक वर्ग पर ब्रिटिश शासन की पकड़ कमज़ोर हो। इसकी पूर्ति के लिए नौकरशाहों
और फौज के लोगों को राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में लाया गया। 1945 के बाद पुलिस, सेना और नौकरशाहों में ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफ़ादारी लगभग ख़त्म
हो चुकी थी। जनता के बीच भारत का पक्ष रखकर औपनिवेशिक विचारधारा के वर्चस्व को कमज़ोर
करने का लगातार प्रयास किया जाता रहा। इसके अलावा अर्द्ध-लोकतांत्रिक स्वाधीनता के
नाम पर जो भी रियायतें मिली, उसके विस्तार के लिए लगातार कोशिश की गई। इसमें जनमत का
भी भरपूर सहयोग मिला।
राष्ट्रवादियों द्वारा
ब्रिटिश वर्चस्व को समाप्त करने के लिए दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति
को अंजाम देने के लिए संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के मार्ग पर चला गया। पहले संवैधानिक तरीक़ों
से सशक्त आंदोलन चलाए जाते, फिर खुली मुठभेड़ का रास्ता छोड़ दिया जाता। फिर दी गई रियायतों
को अपर्याप्त बता कर कुछ और रियायतें हासिल की जातीं। शांति के दौर में उपलब्ध अधिकारों
का उपयोग करते हुए गहन राजनीतिक-वैचारिक काम किया जाता। पहले ज़्यादा प्रभावशाली आंदोलन
छेड़ने के लिए ताकत संजोयी जाती। इस रणनीति की पराकाष्ठा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप
में हुई, जब सत्ता हस्तांतरण का समझौता हुआ। इस तरह हर दौर का इस्तेमाल औपनिवेशिक वर्चस्व
को ख़त्म करने, राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने और उन्हें राजनीतिक रूप से
प्रशिक्षित करने एवं लोगों में संघर्ष की क्षमता पैदा करने के लिए किया गया। इस रणनीति
से स्वतंत्रता आंदोलन लगातार ऊपर की ओर उठता रहा। आंदोलन को सुधारों तक ही सीमित नहीं
रखा गया। संवैधानिक सुधारों को भी औपनिवेशिक व्यवस्था का ही अंग मानकर देखा गया। जब
तक आज़ादी पूरी नहीं मिली तबतक यह मानकर चला गया कि वह मिली ही नहीं है। जब जनआंदोलन
नहीं होते तब भी उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक संघर्ष ज़ारी रहता। सिर्फ़ संघर्ष का रूप
बदल जाता। जनजागरण और रचनात्मक काम ज़ारी रहता। गांधीजी ने कहा था, “सिविल नाफ़रमानी रोकने का
मतलब यह नहीं है कि युद्ध थम गया है। युद्ध तो तभी थमेगा, जब भारत में उसका अपना बनाया
हुआ संविधान लागू होगा।”
एक प्रश्न उठना स्वाभाविक
है कि क्या राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्त होने तक लगातार नहीं
चल सकता था? क्या अगर ऐसा होता, तो स्वतंत्रता जल्द नहीं प्राप्त कर ली जाती? गांधीजी
के नेतृत्व के दौर में यह मानकर चला जा रहा था कि जनांदोलन का चरित्र ही ऐसा होता है
कि उसे अनिश्चित काल तक लगातार नहीं चलाया जा सकता। दो आंदोलनों के बीच विश्राम और
तैयारी का समय होना ही चाहिए। आंदोलन जनता से चलते थे। कुछ समय के बाद जनता थक जाती
थी। जनता में दमन को सहने की क्षमता असीमित नहीं थी। कष्ट सहने के बाद लोग विश्रांति
चाहते हैं, ताकि नए जोश के साथ फिर आगे बढ़ सकें। इसलिए नेतृत्व ने ज़रूरत से ज़्यादा
उन पर दबाव नहीं डाला। औपनिवेशिक सत्ता के पास आंदोलनों को नष्ट करने की प्रचंड क्षमता
थी। उस पर आघात करने की क्षमता तो जनता के बीच से ही आनी थी। इसलिए राजनीतिक कौशल इसी
में थी कि औपनिवेशिक राज्य से टकराने के बाद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संघर्ष का दौर चलाया
जाए। इस प्रकार गांधीजी ने अपनी रणनीति में जनता और सरकार दोनों की सीमाओं को समझा
और उसी के अनुसार संघर्ष का कार्यक्रम बनाया। 1938 में गांधीजी ने लिखा था, “चतुर सेनापति अपने पांव
उखड़ने तक इंतज़ार नहीं करता, जब वह समझ जाता है कि किसी खास मोरचे पर वह और अधिक देर
तक नहीं टिक सकता, तो वह वहां से सामान्य तरीक़े से हट जाता है।” आंदोलन कब शुरू करना है
और कब उसे वापस लेना है, इस अति महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय गांधीजी और कुछ प्रमुख
नेता इस विषय पर मूल्यांकन करने के बाद लेते थे कि आंदोलन की ताक़त और कमज़ोरी क्या-क्या
है। लोग कितने देर तक साथ देंगे। सरकार की तैयारी कैसी है। इसी तरह वे यह देखते थे
कि सरकार से बातचीत करने का उचित समय है या नहीं। अतः कांग्रेस की नीति रही कि जब संभव
हो, तब बातचीत और समझौता और जब ज़रूरी हो, तब असहयोग और सीधी कार्रवाई। इन सबके बीच
रचनात्मक कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खादी, कताई, ग्रामोद्योग का प्रसार, राष्ट्रीय
शिक्षा, हिन्दू-मुसलिम एकता, अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ संघर्ष, हरिजनों की सामाजिक स्थिति
में सुधार, विदेशी वस्त्र और शराब का बहिष्कार, आदि महत्वपूर्ण कार्य थे। इन कामों
के सुचारू रूप से चलाने के लिए आश्रम मुख्यतः गांवों में बनाए जाते थे। आंदोलन की वापसी
के बाद जो शून्य पैदा होता था, उसे भरने में इन रचनात्मक कार्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई। सक्रिय जन-आंदोलन के दौर में जो सक्रिय और उत्साहित कार्यकर्ता होते थे, उन्हें
ये रचनात्मक कार्य हतोत्साहित और अवसाद ग्रस्त होने से बचाते थे। रचनात्मक कार्य में
लाखों लोगों को समाहित किया जा सकता था। जो रचनात्मक कार्य से जुड़ जाते, वे ही आगे
चलकर सिविल नाफ़रमानी के आंदोलन में शरीक होते।
राष्ट्रीय आंदोलन की चुनौती
का सामना करने के लिए औपनिवेशिक सत्ता ने संवैधानिक सुधार और विधायिकाओं का सहारा लिया।
उन्हें आशा थी कि संसदीय प्रक्रिया राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा
करेगी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता इसका लाभ भी उठाया और इसका विरोध भी किया। संवैधानिक
सुधारों को हर तरह की कसौटी पर कसा जाता। जब भी उपनिवेशवाद थोड़ी-सी भी राजनीतिक ज़मीन
छोड़ने के लिए बाध्य होता था, तो राष्ट्रवादी उस पर तुरंत क़ब्ज़ा जमा लेते, ताकि उनके
विरोध के संघर्ष को और तेज़ किया जा सके। सुधारों को इस तरह लागू किया जाता कि उपनिवेशवादियों
के मंसूबे पूरे न हो पाएं। चुनी गई सरकारों का उपयोग इस तरह किया जाता कि कठिनाइयों
से घिरी जनता को राहत पहुंचे। लोगों में स्वशासन की क्षमता पर विश्वास पैदा हुआ। राष्ट्रीय
आंदोलन की प्रतिष्ठा बढ़ी। जो लोग विधायिकाओं और नगरपालिकाओं के माध्यम से काम कर रहे
थे, उन लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का अंग होने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज़ी हुक़ूमत
की चालों को उन्होंने उजागर किया। जब भी जनांदोलन में उभार आता वे विधायिकाओं का परित्याग
भी कर देते और औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध संघर्ष करते।
गांधीजी ने अहिंसा का सिद्धांत
अपनाया। इस समय के अधिकांश नेताओं ने इस नीति का अनुपालन किया। अहिंसा कांग्रेस की
समग्र रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग थी। राष्ट्रीय आंदोलन को अहिंसा सूट भी बहुत हुई।
अहिंसक संघर्षों के कारण अधिक-से-अधिक जनता इसमें शामिल हुई। स्त्रियों का इसमें शामिल
होना बहुत बड़ी मिसाल थी। अहिंसा संघर्ष को एक नैतिक आधार देती थी। जब अंग्रेज़ शांतिपूर्ण
सत्याग्रहियों पर हिंसक हथियारों का प्रयोग किया जाता तो ब्रिटिश सत्ता की वास्तविकता
सामने आ जाती। यह शासकों के लिए समस्या का कारण बनती। और अगर शासक कोई कार्रवाई न करता
तो इससे यह साबित होता कि ब्रिटिश सरकार में शासन चलाने की क्षमता ही नहीं है। अतः
औपनिवेशिक शासकों के लिए एक तरफ कुंआ तो दूसरी तरफ़ खाई वाली स्थिति बनी रहती। दो विकल्पों
के बीच वे दमन का सहारा लेते और इसमें उनकी नैतिक हार होती। प्रतिष्ठा के इस युद्ध
में अहिंसा ने भारतीयों को राजनीतिक शक्ति दी, जिससे वे सशस्त्र औपनिवेशिक सत्ता का
मुक़ाबला कर सके। इस तरह इस अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम ने विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण
जगह दर्ज़ कर लिया। यह राजनीतिक लड़ाई लंबी, ज़रूर थी, पर थी अनोखी।
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन
सिर्फ़ ब्रिटेन की राजनीतिक ग़ुलामी से छुटकारा पाने का संघर्ष नहीं था, इसके पीछे सामाजिक
और आर्थिक परिवर्तन की आकांक्षाएं भी थीं। ब्रिटिश सत्ता भारत पर अपने राजनीतिक प्रभुत्व
का प्रयोग ब्रिटिश समाज और अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था
का शोषण करने के लिए कर रही थी। आर्थिक दृष्टि से देश पिछड़ रहा था। औपनिवेशिक शोषण
प्रणालियों की राष्ट्रीय नेताओं को समझ थी। वे इस बात की आलोचना करने लगे कि भारत का
सारा धन विदेश जा रहा है। इस बात की सच्चाई ओ उन्होंने जान लिया था कि भारत का उपनिवेश
बनना न तो इतिहास की कोई दुर्घटना है और न ही ब्रिटिश सत्ता की राजनीति का नतीजा। यह
तो ब्रिटिश समाज के चरित्र और भारत की ग़ुलामी का स्वाभाविक फल है। जब समझ विकसित हुई
तो उपनिवेश विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता उपनिवेशवाद का विश्लेषण
कर लोगों के सामने रखते। गांधीजी ने जन-राजनीति के द्वारा इस दृष्टिकोण को गांव-गांव
तक फैलाया। इस बात पर ख़ूब ज़ोर दी कि भारत की संपदा को लूटा जा रहा है। भारत को ब्रिटेन
के तैयार माल का बाज़ार बनाया जा रहा है। इससे औपनिवेशिक शासन की बुनियाद कमज़ोर हुई।
ब्रिटेन भारतवासियों के हित के लिए काम कर रहा, यह मिथक को टूटा। इससे सुदृढ़ और लगातार
चलने वाले आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतंत्र
के लिए प्रतिबद्धता थी। लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया गया। गांधीजी ने व्यस्क मताधिकार
पद्धति की मांग की। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी। विषयों पर बहस होती और अंत में मतदान होता। ऐतिहासिक
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय ‘करो या मरो’ वाले भाषण की शुरुआत में ही गांधीजी ने कहा
था, “मैं उन 13 मित्रों को बधाई देता
हूं, जिन्होंने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। ऐसा कर उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं
किया है, जिसके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना पड़े।” राष्ट्रीय आंदोलन नागरिक
अधिकारों का पक्षधर रहा। प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इसने संघर्ष किया। गांधीजी
भी नागरिक अधिकारों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध थे। गांधीजी ने यंग इंडिया में जनवरी
1922 में लिखा था, “सरकार ने देश के सामने
जो मुद्दा पैदा कर दिया है, उसकी तुलना में स्वराज, ख़िलाफ़त और पंजाब सवाल गौण सवाल
हैं। हम अपने लक्ष्य की तरफ़ एक कदम भी बढ़ा सकें, इसके पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति और
संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना ही होगा ... हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर
भी करनी चाहिए।” नेहरू भी इसके सबसे बड़े
हिमायती थे। धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रवादी विचारधारा का बुनियादी तत्व माना गया। हिन्दू-मुस्लिम
एकता पर ज़ोर दिया गया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
ने आधुनिक उद्योगों और कृषि विकास के आधार पर समाज के पूर्ण आर्थिक रूपांतरण का लक्ष्य
स्वीकार किया। गांधीजी सिर्फ़ उन मशीनों के विरोधी थे जो बेरोज़गार फैलाती या बहुसंख्यक
लोगों को ग़रीब कर कुछ लोगों को अमीर बनाती थीं। देश आर्थिक विकास के मामले में आत्मनिर्भर
बने इसके प्रति वे प्रतिबद्ध थे। विदेशी पूंजी के विनियोग का वे विरोध करते थे। उनका
कहना था कि विदेशी पूंजी देश का विकास नहीं करेगी, बल्कि पिछड़ापन लाएगी। राष्ट्रीय
आंदोलन शुरू से ही ग़रीबों का पक्षधर रहा। इससे आंदोलन को समाजवादी आधार मिला। 1919 के बाद गांधीजी ने किसानों और दस्तकारों पर आधारित आर्थिक दृष्टि विकसित की और
उसका प्रचार किया। गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की सामाजिक दृष्टि भी विकसित की। वे
ग़रीबों के हितों की रक्षा के लिए भी हिंसा के प्रयोग के विरुद्ध थे। लेकिन उनकी बुनियादी
दृष्टि समाज के परिवर्तन की थी। वे क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा में भी आगे बढ़ते हैं,
खासकर 1930 और 40 के दशकों में, जब वे कहते हैं, “निहित स्वार्थों में ठोस
तबदीली लाये बिना जनसाधारण की स्थिति में सुधार नहीं लाया जा सकता”। वे निजी संपत्ति का विरोध
करने लगते हैं। वे बार-बार उद्योग-धंधों के
राष्ट्रीयकरण की वकालत करते हैं। उन्होंने पूंजीवाद और ज़मींदारी प्रथा की भर्त्सना
की। जाति के आधार पर विषमता और जुल्म का विरोध करते थे। इन सब चीज़ों ने राष्ट्रीय आंदोलन
को क्रांतिकारी बनाने में मदद पहुंचाई।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर