राष्ट्रीय आन्दोलन
473. गांधी-माउंटबेटन वार्ता
1947
31 मार्च, 1947 को गांधीजी दोपहर तीन बजे वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन
से पहली बार मिले। गांधीजी और माउंटबेटन में कई बातों में समानता थी। दोनों दिन-रात
काम करने में विश्वास रखते थे। दोनों के जीवन में काम का महत्त्व सर्वोपरि था। दोनों
स्पष्ट-वक्ता थे। दोनों ही किसी भी समस्या की जड़ों तक सीधे पहुंच जाते थे। किंतु कुछ
बातों में दोनों में बहुत अन्तर भी था। माउंटबेटन खेलों का शौकीन था, वहीं गांधीजी
का खेलों से दूर तक कोई नाता नहीं था। माउंटबेटन प्रत्येक मुलाक़ात के बाद बातचीत के
नोट्स बनवा लिया करता था और उसकी प्रतियां बनवाकर सभी संबंधित स्टाफ़ सदस्यों में वितरित
करवा दिया करता था। जबकि गांधीजी की तरफ़ से उनका एक सचिव होता था, जो उनका सहायक, रसोइया,
जूतों की पॉलिश करने वाला सब कुछ था। और बातचीत की महत्त्वपूर्ण चर्चा के दौरान यदि
गांधीजी को यह सूचना मिलती कि उनका कोई साथी या आश्रित बीमार है, तो उस सचिव को मिट्टी
की पट्टी लगाने के लिए भेज देते। राजनीतिक प्रयत्नों के अवसर पर भी वे इन मानवीय मूल्यों
को अधिक महत्त्व देते थे। गांधीजी को अपने चंद साथियों के साथ मिट्टी के झोंपड़े में
रहना रास आता था। माउंटबेटन को महलों की आदत थी। वह महल जिसमें 340 कमरे थे, डेढ़ मील
लंबे भीतरी रास्ते थे, लाल वर्दी वाले नौकर-चाकर भरे हुए थे, सशस्त्र पहरेदारों की
सेना थी और उस वायसरीगल एस्टेट की 7,000 की आबादी थी।
माउंटबेटन की कार्य-पद्धति बड़ी नियोजित होती
थी, जिसमें एक-एक पल का हिसाब होता था। किसी भी महत्त्वपूर्ण बैठक के पहले वह हर एक
पहलू का अभ्यास कर लिया करता था। इधर गांधीजी “पहले से चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, समय पर जो सूझ जाए वही करो” वाले सिद्धांत
में विश्वास रखते थे। वे कहा करते थे, “मेरे लिए एक क़दम काफ़ी
है। अगला क़दम ईश्वर मुझे ठीक समय पर बता देगा, उससे एक क्षण भी पहले नहीं।” माउंटबेटन से चर्चा
के दिनों में भी चर्चा की तैयारी के रूप में गांधीजी रोज़ बंगाली लिपि का अभ्यास किया
करते थे। मनु को 10 मिनट का गीता का पाठ पढ़ाया करते थे। बादशाहख़ान और अन्य के साथ उनकी बीमारी
की चर्चा करते और जड़ी-बूटी या अन्य उपाय बताते। अपने चार बरस के पोते के साथ खूब खेलते,
उसकी नकल उतारते। शाम की प्रार्थना सभा में साम्प्रदायिक एकता के लिए प्रवचन देते और
क़ुरान की आयतों का पाठ करवाते। गांधीजी की नज़र में इन चीज़ों का उतना ही महत्त्व था
जितना कि माउंटबेटन के साथ चर्चा। सत्य अहिंसा के पालन के लिए ये चीज़ें उनके जीवन का
अविभाज्य अंग थीं।
माउंटबेटन अपने साथ अपनी पसंद के कुछ और ब्रिटिश
अधिकारी भी लाया था, जिसमें लॉर्ड इस्मे और सर एरिक मीएविले जैसे अनुभवी भी शामिल थे।
इस्मे तो दूसरे विश्व युद्ध के समय चर्चिल का दाहिना हाथ था। मीएविले पूर्व वायसराय
विलिंगडन का निजी सचिव रह चुका था, तब इस्मे उनके सैनिक सचिव का काम करता था। उसने
लॉर्ड वेवेल के निजी सचिव जॉर्ज एवेल को अपने पद पर बने रहने दिया ताकि काम करने में
निरंतरता बनी रहे। इसके अलावा उसने एलन कैमबेल जॉन्सन को अपना प्रेस अधिकारी बनाकर
लाया था। इसी जॉन्सन ने बाद में ’मिशन विथ माउंटबेटन’ नामक की महत्त्वपूर्ण पुस्तक
लिखी। ... और सबसे महत्त्वपूर्ण कूटनीतिज्ञ, जो माउंटबेटन की योजना में थीं, वह थी
उसकी पत्नी, लेडी माउंटबेटन! वह एक समाज सेविका थी। अपने कौशल, स्त्री-सुलभ हार्दिक
सहानुभूति और सूक्ष्म विवेक के द्वारा उसने अनेक अवसरों पर देवदूत की तरह माउंटबेटन
की रक्षा की।
गांधीजी और माउंटबेटन के बीच पहले दिन शुरू में
औपचारिक बातें हुईं। राजनीति पर कम, व्यक्तिगत विषयों पर अधिक चर्चा हुई। अपनी
तरफ़ से, गांधीजी भी वायसराय में छिपे पूरे इंसान से मिलने के लिए उतने ही उत्सुक
थे। दोनों यह जानते थे कि ब्रिटेन संबंधी प्रश्न के शांतिपूर्ण निपटारे का यह अंतिम
मौक़ा है, जब सुलह-शांति से समझौता हो सकता है। पहले दिन की बातचीत के बाद गांधीजी माउंटबेटन
की सच्चाई, सज्जनता और उदात्त चरित्र से बहुत प्रभावित होकर लौटे।
दूसरे दिन सुबह पांच बजे राजकुमारी अमृत कौर
मिलने आईं। फिर साढ़े छह बजे मौलाना आज़ाद आए। फिर सात बजे के बाद पंडित नेहरू भी आ गए।
गांधीजी के मालिश का समय था। कुर्सी पर बैठे गांधीजी की मालिश होती रही और नेहरूजी
से बातचीत भी। जब गांधीजी नहाने के लिए उठे तो राजाजी आ गए। स्नान के टब में गांधीजी
लेटे थे, और राजाजी से बातचीत ज़ारी रही। साथ ही समय बचाने के लिए मनु उनकी दाढ़ी बनाती
रही। राजाजी खुद को कुछ मज़ाक करने से रोक नहीं पाए। उन्होंने मनु से कहा, "तो तुम अपने
महान दादाजी के 'मानद नाई' बन गई हो!" नहाकर गांधीजी निकले तो राजेन्द्र प्रसाद को इंतज़ार करते देखा।
दोनों की बातचीत नाश्ते के टेबुल पर हुई। 9 बजे सरदार पटेल उन्हें लेने आ गए। दोनों को
वायसराय से मुलाक़ात के लिए जाना था।
गांधीजी ने
वायसराय के दफ़्तर में इस अंदाज़ में प्रवेश किया, मानो वे ऐसे व्यक्ति हों जिन्हें वायसरायों
से मिलने की पुरानी आदत हो। इस बार वायसराय के साथ चर्चा उसके बाग में बनी अटारी पर
खुले में हुई। वसंत ऋतु का सुहाना मौसम था। मुग़ल गार्डन की फूलों की क्यारियों में
रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। गांधीजी के साथ उनके एक सचिव बृजकृष्ण चंडीवाला और मनु
भी थे। माउंटबेटन ने मनु से कहा, “तुम बहुत भाग्यशाली लड़की हो। मेरी लड़की कहती है कि मि. गांधी के साथ तुम्हारे
फोटो देखकर उसे ईर्ष्या होती है। मैं उसे तुम्हारी प्रार्थना सभा में भेजूंगा।” गांधीजी ने वायसराय से पूछा कि क्या इस बीच
मनु बगीचे में घूम सकती है, ताकि वे अपनी बातचीत बिना किसी रुकावट के जारी रख सकें। "ज़रूर," वायसराय ने
जवाब दिया। फिर मनु को संबोधित करते हुए उन्होंने आगे कहा: "यह सब आपका है; हम तो बस इसके
ट्रस्टी हैं। हम इसे आपको सौंपने आए हैं।" "आप इनके शरीर की तलाशी ले
सकते हैं, कहीं कोई छिपा हुआ हथियार तो नहीं है," गांधीजी ने हंसते हुए कहा। "मुझे पूरा
भरोसा है कि आपके किसी शिष्य के मामले में इसकी कोई ज़रूरत नहीं हो सकती," वायसराय ने मुसकुराते
हुए जवाब दिया। मनु को बगीचे में घूमने की इज़ाजत मिल गई। गांधीजी और माउंटबेटन चर्चा
में जुट गए।
वायसराय ने कहा, “ब्रिटेन की यह नीति है कि किसी भी दवाब में कोई
रियायत नहीं दी जाएगी, लेकिन आपकी अहिंसा जीत गई। ब्रिटेन की सरकार ने आपके अहिंसक
आंदोलन के कारण भारत छोड़ने का फैसला किया है।” गांधीजी के सब्र का बांध टूट रहा था; नोआखली और
बिहार की लंबी यात्राओं से वे पूरी तरह थक चुके थे; और भविष्य भी उन्हें उतना ही अंधकारमय लग
रहा था, जितना कि हाल का अतीत। जिन्ना अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ था। उसने भारत के
विभाजन की मांग की, और साथ ही यह भी चाहा कि भारत के जीवित शरीर को काटकर जो नया देश, पाकिस्तान,
बनाया जाएगा, उसके पहले गवर्नर जनरल वे स्वयं बनेगा। रियासतें भी अपनी आज़ादी का दावा कर
रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो भारत अपने अलग-अलग हिस्सों में बिखरने ही वाला हो। गांधीजी
ने पाकिस्तान के निर्माण को रोकने की आखिरी कोशिश की, उन्होंने वायसराय
से कहा, “अंग्रेज़ चाहते हैं, तो मुस्लिम लीग को सत्ता
दे सकते हैं। कांग्रेस जिन्ना की राह में कोई बाधा नहीं खड़ी करेगी। साथ ही, चूंकि अब
मुस्लिम लीग ही सरकार होगी, इसलिए उसके पास उन संगठित अराजकता वाले
आंदोलनों को जारी रखने का कोई और बहाना नहीं बचेगा, जिन्हें उसने
कुछ प्रांतों में शुरू किया था। इन आंदोलनों को अब वापस ले लेना चाहिए। लेकिन दंगे-फसाद
के डर-धमकी से उन्हें सत्ता नहीं दी जा सकती। अगर लीग सत्ता का उत्तरदायित्व संभालने
की स्थिति में नहीं है, तो कांग्रेस को सत्ता देना आवश्यक है। लेकिन दोनों पक्षों को
प्रसन्न रखने का प्रयास ग़लत बात है।”
गांधीजी वार्ताओं में अनेक बार दुत्कारे गए
थे, लेकिन जब भी उनको पुकारा जाता वह कभी भी हाज़िर होने से नहीं चूकते, भले ही देश के
हीनतम व्यक्ति ने पुकारा हो या महानतम व्यक्ति ने। माउंटबेटन तो वायसराय था। उसने
सत्ता के हस्तांतरण के सवाल पर गांधीजी को सलाह देने के लिए बुलाया था। लेकिन जो
सलाह उन्होंने माउंटबेटन को दी वह उस निर्भीक वायसराय के लिए ज़रुरत से ज़्यादा
दिलेर थी जिसने भारत में अपनी सबसे दुस्साहसी रणनीति खेली। गांधीजी की सलाह थी कि
वायसराय नेहरू सरकार को भंग करके जिन्ना को निमंत्रण दे कि वह केंद्र में अपनी
पसंद की सरकार बनाए। गांधीजी ने विश्वास दिलाया कि कांग्रेस जिन्ना की राह में कोई
बाधा खड़ी नहीं करेगी। साथ ही उन्होंने यह शर्त भी रखी कि अगर जिन्ना इस प्रस्ताव
को स्वीकार नहीं करता तो यही प्रस्ताव कांग्रेस को दिया जाए। इसके द्वारा गांधीजी
कांग्रेस और हिन्दुओं के बारे में
जिन्ना के संदेहों को एकबारगी मिटा देना चाहते थे।
वायसराय भौचक्का रह गया। ब्रिटिश सरकार को यह सुझाव उपयुक्त नहीं लगा। उसके सलाहकारों को लगा कि दाल में कुछ काला
है। उन्हें लगा कि यह गांधीजी द्वारा फैलाया गया कोई जाल है। उन्होंने वायसराय को
गांधीजी के जाल से दूर रहने की सलाह दी। सच तो यह है कि देश में सांप्रदायिक हिंसा
की जो तूफानी लहरें उठ रही थीं, उनको रोकने के लिए और देश की एकता को बचाने के
लिए, यह गांधीजी की एक आखिरी कोशिश थी। वायसराय के लिए ऐसा सरल उपाय अपनाना कठिन था।
फिर भी उसे यह प्रस्ताव आकर्षक लगा। उसने गांधीजी से कहा कि वे चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़, लॉर्ड इस्मे से
बात करें, ताकि वह इसे एक उचित रूप-रेखा दे सके। गांधीजी को यह लगा था कि वायसराय
इस योजना को एक औपचारिक समझौते का रूप देना चाहते हैं। वायसराय और उसके सलाहकारों
ने इस बीच कोई दूसरा ही फ़ैसला कर लिया था।
वायसराय के कर्मचारी-मंडल में गांधीजी द्वारा दी गई योजना की चर्चा हुई। कहा
गया, “यह तो पुराना ही पतंग बिना किसी दुराव-छिपाव
के उड़ा दिया गया है।” गांधी जी ने जो सुझाव दिया था, वह
देश की एकता को बचाने की गांधीजी की आख़िरी कोशिश थी। दिल्ली में बैठे अंग्रेज़ राजनीतिक गांधी-इरविन वार्ता
को सबसे बड़ी भूल मानते थे। वे अब इस तरह की किसी ग़लती को दुहराना नहीं चाहते थे। आम
राय यह थी कि "माउंटबेटन को महात्मा के साथ बातचीत में खुद को शामिल नहीं
होने देना चाहिए, बल्कि सिर्फ़ उनकी सलाह सुननी
चाहिए।" इसलिए निर्णय यह हुआ कि
महात्मा गांधी से संधि-वार्ता में न फंस कर अन्य दलों से बातचीत की जाएगी। वे
जानते थे कि सरदार इसके खिलाफ थे। लेकिन उन्हें डर था कि जवाहरलाल गांधीजी के साथ
सहमत हो सकते हैं और उनके संयुक्त प्रभाव में आकर कार्यसमिति इसे स्वीकार कर सकती
है। इसके पहले कि गांधीजी कांग्रेस पर बहुत असर डालें, नेहरू को बता देना चाहिए
कि माउंटबेटन ने गांधीजी की योजना को स्वीकार नहीं किया
है। कांग्रेसी नेता सारे सूत्र लीग के हाथों सौंपने को तैयार नहीं थे। अंतरिम
सरकार में वे अपने लीगी साथियों के रुख और रवैये से खूब परिचित हो चुके थे। सद्भावना-संकेतों
का ज़माना भी अब नहीं रह गया था। पटेल को गांधीजी की योजना स्वीकार्य नहीं थी। इण्डिया
विन्स फ्रीडम में मौलाना आज़ाद लिखते हैं, “शायद
एकदम आखिर तक, जिन्ना
के लिए पाकिस्तान सिर्फ़ मोल-भाव का एक ज़रिया था; लेकिन पाकिस्तान के लिए लड़ते-लड़ते, वह अपनी हद से आगे निकल गया था। उसके इस रवैये से
सरदार पटेल इतने नाराज़ और चिढ़ गए थे कि अब सरदार भी बँटवारे के पक्ष में हो गए
थे। उन्हें पूरा यकीन था कि वह मुस्लिम लीग के साथ मिलकर काम नहीं कर सकते।
उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था कि अगर उन्हें मुस्लिम लीग से छुटकारा मिल जाए, तो वह
भारत का एक हिस्सा छोड़ने के लिए भी तैयार हैं।” पंडित नेहरू को वायसराय के बदले हुए विचारों से
मज़बूती मिली। नेहरू ने भी गांधीजी की सलाह का विरोध किया था। जब जवाहरलाल गांधीजी
से मिले, तो
उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें इस योजना में कई कठिनाइयाँ नज़र आती हैं और वे इसे
स्वीकार नहीं करेंगे। जिन्ना ने भी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
जिन्ना
ने गांधीजी पर जीत हासिल कर ली थी, लेकिन यह जीत बहुत महंगी पड़ी थी, और इसकी
कीमत अभी चुकानी बाकी थी। नोआखाली और बिहार के दंगों के दौरान गांव-गांव घूम-घूम कर गांधीजी
ने बंटवारे के बाद होने वाले विनाशकारी परिणामों को भांप लिया था। जल्द ही, भारत के
इतिहास में याद रखे जाने वाले किसी भी कत्लेआम से कहीं ज़्यादा भयानक पैमाने पर
कत्लेआम होने वाला था। यह बात दिल्ली में बैठे राजनीतिज्ञों के समझ में नहीं आ रही
थी। उन्होंने नोआखाली की झुग्गी-झोंपड़ियों में साम्प्रदायिक फ़साद के कारण हुए विनाश का
तांडव देखा था। दिल्ली प्रवास में गांधीजी
भंगी बस्ती में ठहरे थे। वहां की प्रार्थना सभा में क़ुरान के पाठ भी वे करते-कराते।
कुछ दिनों के बाद इसका विरोध होने लगा। कई दिनों तक प्रार्थना नहीं हुई। गांधीजी ने
कहा, “कोई यह न
समझे कि कुछ दिनों से यहां प्रार्थना नहीं हुई। हमारे हृदय में तो निरंतर प्रार्थना
चल रही थी। आप लोग यह न सोचें कि वायसराय के साथ देश के भविष्य के बारे में चर्चा करने
के बदले मैं यहां व्यर्थ बातों में समय गंवा रहा हूं। मेरे लिए कुछ भी छोटा बड़ा नहीं
है। पंजाब, बिहार, नोआखाली, दिल्ली यहां तक कि इस प्रार्थना भूमि पर देश के विभाजन
की लड़ाई रोज़ हारी-जीती जा रही है। इस अनुभव ने मुझे उन्नत और समर्थ बनाया है।”
गांधीजी
से वायसराय सहमत नहीं
लॉर्ड माउंटबेटन बेहद
बुद्धिमान था और अपने सभी भारतीय सहयोगियों के मन की बात भांप लेता था। जैसे ही उसे
लगा कि पटेल उसके विचार से सहमत हो सकते हैं, उसने सरदार को अपने
पक्ष में करने के लिए अपनी शख्सियत के पूरे आकर्षण और प्रभाव का इस्तेमाल किया।
अपनी निजी बातचीत में, वह पटेल को हमेशा 'अखरोट' कहकर संबोधित करते थे—बाहर से बेहद सख्त, लेकिन एक बार ऊपरी परत
टूट जाए तो अंदर से नरम। जब सरदार पटेल मान गए, तो लॉर्ड माउंटबेटन ने
अपना ध्यान जवाहरलाल की ओर मोड़ा। 5 अप्रैल को माउंटबेटन के
कार्यालय में इस विषय पर फिर एक बार चर्चा हुई और अंग्रेज़ अधिकारियों ने निर्णय लिया
कि इससे पहले कि गांधीजी कांग्रेस पर कोई दबाव बनाए, नेहरू को यह बता दिया जाना चाहिए
कि वायसराय गांधीजी के प्रस्ताव से सहमत नहीं है। वायसराय के ऑफिस से नेहरूजी को यह सूचना मिली कि
गांधीजी के ऐलान से वायसराय सहमत नहीं हैं। गांधीजी को विश्वास था कि वायसराय उनके
साथ हैं। लेकिन 7 अप्रैल को वायसराय ने घोषणा
कर दी कि पक्का निर्णय लेने के पूर्व भारत की समस्या को समझने में उसे समय लगेगा। गांधीजी
को धक्का लगा।
गांधीजी ने नेहरू और कांग्रेस
कार्यसमिति को बहुत समझाने की कोशिश की कि उन्होंने वायसराय को जो योजना की रूपरेखा
दी है उसे स्वीकार कर लिया जाए। गांधीजी ब्रिटिश शासन के तहत विभाजन की किसी कोशिश
के ख़िलाफ़ थे। गांधीजी की नज़र में, कांग्रेस का ब्रिटिश
सरकार से पंजाब और बंगाल के विभाजन की मांग करना, एक तरह से हताशा में
उठाया गया कदम था। विभाजन से उनकी कोई भी मुश्किल हल नहीं होने वाली थी। वे कार्यसमिति
को नहीं समझा सके। बादशाह ख़ान के सिवा कोई भी उनकी बात समझने को तैयार नहीं था। हां,
कांग्रेस कार्यसमिति भी गांधीजी को नहीं समझा सकी। दुख भरे स्वर में गांधीजी ने
कहा: "मेरे प्रयासों की पवित्रता की असली परीक्षा तो अब होगी। मैं ईश्वर
से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे वह दिन देखने के लिए जीवित न रखे। ताकि चारों ओर से
हो रहे विरोध के बावजूद अडिग रहने और पूरी सच्चाई को ज़ाहिर करने के लिए ईश्वर
मुझे शक्ति और विवेक प्रदान करे, मुझे उस सारी शक्ति की
ज़रूरत है जो पवित्रता से मिल सकती है।"
जब कांग्रेस ने विभाजन
के प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी, तो गांधीजी ने कहा:
"अपने नेताओं का साथ दो।" वे विभाजन को एक बड़ी विपत्ति मानते थे, लेकिन अब इसे रोकना उनके बस में नहीं था। यहाँ तक कि उनका सबसे शक्तिशाली
हथियार, आमरण अनशन—भी जिन्ना को एक नए राष्ट्र के निर्माण के उनके पक्के इरादे से
डिगाने में सफल नहीं हो पाता। गांधीजी ने माउंटबेटन को पत्र लिख कर बता दिया कि आगे
किसी भी समझौते की चर्चा में उन्हें शामिल न किया जाए। वह कार्यसमिति को अपने साथ
लाने में असफल रहे हैं। अब उनके और उनके साथियों के रास्ते अलग हो चुके थे। जो कांग्रेसजन
अंतरिम सरकार में हैं वे अनुभवी हैं, कांग्रेस के सही सलाहकार वे ही होंगे। 12 अप्रैल को गांधीजी पटना के लिए रवाना हो गए। उन्होंने पटेल को लिखा, “देखता हूं कि मेरे और कांग्रेस
के दृष्टिकोण में बड़ा अंतर है। इस हालत में व्यक्तिगत रूप में भी मेरा वायसराय से बातचीत
करना कहां तक उचित रहेगा?”
गांधीजी के सचिव
प्यारेलाल लिखते हैं, “और इस तरह वे
सभी—माउंटबेटन, कांग्रेस कार्यसमिति
और मुस्लिम लीग—अलग-अलग कारणों से और एक-दूसरे से मतभेद रखते हुए भी, एक ही सुर में बोलने लगे; और उनकी जन्मभूमि की
उच्च-स्तरीय राजनीति के अखाड़े में "राष्ट्र की आवाज़" एक
"अरण्य-रोदन" (जंगल में गूंजने वाली अकेली आवाज़) बनकर रह गई।”
घोर आध्यात्मिक
एकाकीपन की अवस्था अठहत्तर वर्ष की आयु में, उन्हें एक बार फिर
बिहार की ओर भेज रही थी—जहाँ उन्हें अपनी अकेली राह पर चलना था; बिहार—जो उजड़े हुए गाँवों और टूटे हुए मानवीय रिश्तों की धरती थी, जहाँ पच्चीस वर्ष से भी अधिक समय पहले उन्होंने भारतीय राजनीति में अपना पहला
कदम रखा था और एक ऐसे सफ़र की शुरुआत की थी जिसने, महज़ एक ही पीढ़ी के अंतराल में, उनकी आँखों के सामने
ही इस देश का चेहरा पूरी तरह बदल दिया था।
जिन्ना
माउंटबेटन भेंट
6 अप्रैल को जिन्ना ने जब माउंटबेटन
से भेंट की, तो उसने बंटवारे की अपनी मांग पर ज़ोर दिया। जिन्ना अखंड हिन्दुस्तान
को सहन करने के लिए तैयार नहीं था। उसके लिए भारत का प्रधानमंत्री बनना अखंड भारत को
स्वीकारना हो जाता। उसने कहा, “यदि आप पाकिस्तान की मेरी योजना की हिमायत करेंगे,
तो मैं पाकिस्तान को राष्ट्र-मंडल में ले आऊंगा।” जिन्ना ने एक त्वरित समाधान की मांग करते हुए
कहा: "एक सर्जिकल ऑपरेशन (शल्य-क्रिया) ज़रूर होना चाहिए।" माउंटबेटन, उसकी आवाज़ की ठंडी तीव्रता से हतप्रभ होकर बोला:
"ऑपरेशन से पहले एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) की ज़रूरत होगी।"
लेकिन कोई एनेस्थीसिया उपलब्ध नहीं था।
31 मार्च से 12 अप्रैल
के बीच गांधी ने माउंटबेटन से छह बार बातचीत की। जिन्ना ने भी इस कर्मठ वायसराय से
उतनी ही बार बातचीत की। माउंटबेटन बस उनसे बात करके उन्हें जानना चाहता था, एक साथ बैठकर गपशप करना चाहता था। इस तरह गांधीजी ने उसे दक्षिण अफ्रीका में
अपने शुरुआती जीवन के बारे में बताया, जिन्ना ने लंदन में अपने शुरुआती जीवन के बारे में, और माउंटबेटन ने उन्हें अपने शुरुआती जीवन के बारे में थोड़ा-बहुत बताया। फिर, जब माउंटबेटन को लगा कि जिन लोगों के साथ वह काम कर रहा है, उनके साथ उसकी कुछ हद तक समझ बन गई है, तब उसने उनसे उनके सामने मौजूद समस्या के बारे में बात करना शुरू किया। समस्या
40 करोड़ लोगों की किस्मत की थी, भारत की किस्मत, और शायद पूरे एशिया की
किस्मत।
माउंटबेटन को मालूम था
कि असल मुसीबत 16 अगस्त 1946 को शुरू हुई थी, जिस दिन जिन्ना ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' मनाया था। इसके बाद नोआखली में हिंदुओं का बड़े
पैमाने पर कत्लेआम हुआ, और फिर बिहार में हिंदुओं ने उसका बदला लिया; फिर रावलपिंडी (पंजाब) में मुसलमानों ने सिखों का कत्लेआम किया और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में भी विद्रोह भड़क उठा। माउंटबेटन जब भारत पहुँचा, तो उसने देखा कि कत्लेआम का यह भयानक सिलसिला लगातार और भी ज़्यादा विकराल रूप
लेता जा रहा था; अगर इसे वहीं न रोका जाता, तो कोई नहीं कह सकता था कि भारत का क्या हश्र होता। समस्या का सही हल यही होता
कि वे 16 मई, 1946 की ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की योजना के तहत 'एक संयुक्त भारत' बनाए रखते। लेकिन यह योजना तभी कामयाब हो पाती जब सभी
दलों का सहयोग और सद्भावना मिलता। लेकिन जिन्ना बिल्कुल साफ कर दिया था कि जब तक वह
जीवित है, वह कभी भी एक संयुक्त भारत को स्वीकार नहीं करेगा।
कांग्रेस एक अविभाजित भारत के पक्ष में थी।
जब माउंटबेटन ने जिन्ना से कहा कि उसके पास
विभाजन के लिए उसकी अस्थायी सहमति है, तो जिन्ना बहुत खुश हुआ। जब माउंटबेटन ने कहा
कि इसका तार्किक परिणाम यह होगा कि इसमें पंजाब और बंगाल का विभाजन भी शामिल होगा, तो वह यह सुनकर
घबरा गया। उसने इस बात के पक्ष में बहुत ही ज़ोरदार तर्क दिया कि इन प्रांतों का
विभाजन क्यों नहीं होना चाहिए। उसने कहा कि इन प्रांतों की अपनी राष्ट्रीय
विशेषताएं हैं और इनका विभाजन विनाशकारी साबित होगा। माउंटबेटन उसकी बात से सहमत
था, लेकिन उसने कहा कि
अब उसे यह बात और भी ज़्यादा शिद्दत से महसूस हो रही है कि यही तर्क पूरे भारत के
विभाजन पर भी लागू होते हैं। उसे माउंटबेटन की यह बात पसंद नहीं आई और उसने यह
समझाना शुरू कर दिया कि भारत का विभाजन क्यों ज़रूरी है; और इस तरह वे दोनों एक ही बात पर बार-बार घूमते
रहे, जब तक कि आखिरकार
उसे यह एहसास नहीं हो गया कि उसके पास दो ही विकल्प हैं: या तो वह एक ऐसा अखंड
भारत चुने जिसमें पंजाब और बंगाल का विभाजन न हो, या फिर एक ऐसा विभाजित भारत चुने जिसमें पंजाब
और बंगाल का भी विभाजन हो; और अंत में उसने दूसरे विकल्प को ही स्वीकार कर
लिया। गांधीजी ने अप्रैल 1947 में किसी भी प्रकार के विभाजन को मंज़ूरी नहीं दी और
अपनी मृत्यु तक इसे मंज़ूरी देने से इनकार करते रहे।
बड़ी मुश्किल से
माउंटबेटन, गांधीजी और जिन्ना से, शांतिपूर्ण तरीके से
इस विभाजन को स्वीकार करने के पक्ष में एक संयुक्त घोषणा-पत्र जारी करवाने में सफल
हो पाए। 14 अप्रैल वाली शांति की
सम्मिलित अपील पर गांधी-जिन्ना के हस्ताक्षर कराना और कांग्रेस अध्यक्ष को उससे अलग
रखना उसकी ‘शल्यक्रिया से पहले बेहोशी लाने की क्रिया’ थी। बिहार जाने से पहले
गांधीजी ने वायसराय के निवेदन पर साम्प्रदायिक शान्ति के लिए एक सम्मिलित अपील पर हस्ताक्षर
कर आए थे। अक्तूबर, 1946 में भी लॉर्ड वेवेल ने
इसी तरह का प्रस्ताव दिया था, लेकिन गांधीजी ने तब कहा था कि यह ग़लत व्यक्ति को कहा
जा रहा है। लेकिन इस बार माउंटबेटन ने उनसे कहा कि अगर वे हस्ताक्षर नहीं करते हैं,
तो जिन्ना भी नहीं करेगा। उस अपील पर दूसरा हस्ताक्षर जिन्ना का था। इस अपील में हिंसा
के कृत्यों की निन्दा की गई थी और लोगों से अपील की गई थी कि वे हिंसा के कृत्यों से
दूर रहकर समाज में शान्ति फैलाएं। गांधीजी ने अपील पर देवनागरी, फारसी और रोमन तीनों
में हस्ताक्षर किए थे, जबकि जिन्ना ने केवल अंग्रेज़ी में। गांधीजी चाहते थे कि अपील
पर कांग्रेस के अध्यक्ष कृपलानी का भी हस्ताक्षर हो। जिस तरह से मुस्लिम लीग की तरफ़
से अधिकारिक तौर पर जिन्ना को बोलने का अधिकार था उसी तरह कांग्रेस की तरफ़ से अध्यक्ष
होने के नाते कृपलानी का। गांधीजी और नेहरू दोनों ने माउंटबेटन के ऊपर यह निर्णय छोड़
दिया। माउंटबेटन ने बिना कृपलानी के हस्ताक्षर के अपील ज़ारी कर दी। यह बयान उस
पखवाड़े के अंत में आया, जिसके दौरान जिन्ना ने माउंटबेटन को यह विश्वास दिला
दिया था कि यदि उनके राजनीतिक लक्ष्य पूरे नहीं हुए, तो भारत गृहयुद्ध की
चपेट में आ जाएगा। इस अपील ने निश्चित रूप से लॉर्ड माउंटबेटन की प्रतिष्ठा बढ़ाई; लेकिन यह सांप्रदायिक तनाव को कम करने का वांछित प्रभाव उत्पन्न करने में असफल
रही। जैसा कि होना था, इस अपील पर अमल होने की न तो संभावना थी और न ही हुई भी। हां,
मुस्लिम लीग को कूटनीति के शतरंज पर एक और चाल चलने का मौक़ा मिला। उसने यह प्रचारित
किया कि हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं – गांधीजी एक के प्रवक्ता हैं और जिन्ना
दूसरे के। मुस्लिम लीग के मुख पत्र ‘डॉन’ ने लिखा, “इस तरह की अपील के लिए गांधीजी और जिन्ना को चुनना ही यह साबित करता है कि भारत
में दो जातियां हैं, दो राष्ट्र हैं, जो अपने-अपने नेता की बात मानते हैं।” शान्ति की यह अपील क़ाग़ज़
पर ही धरी रह गई।
गांधीजी का मत था कि
लीग से बाज़ी मार ले जाने के लिए कांग्रेस को अंग्रेज़ों के साथ कूटनीति का खेल नहीं
खेलना चाहिए। उन्होंने साफ-साफ कहा कि अंग्रेज़ों से कोई रियायत लेने के लिए हमें भारत
की एकता को बेचना नहीं चाहिए। हमें यह मांग करनी चाहिए कि अंग्रेज़ दुरंगी नीति छोड़कर
सीधा-सच्चा व्यवहार करें। सत्ता हस्तांतरण तक देश भर में सख्ती से क़ानून का शासन हो।
गांधीजी का सुझाव था कि सरकार देश में फैली अराजकता के लिए जिन्ना को दोषी घोषित करे।
लेकिन माउंटबेटन जिन्ना के ऊपर कोई आरोप स्वीकार करने को तैयार नहीं था। उल्टे वह गांधीजी का कोई सुझाव नहीं मानता था। कांग्रेस मंत्री
मंडल के सांप-छछूंदर वाली स्थिति थी।
सीमाप्रांत में लीग का
‘सीधी कार्रवाई’ का आंदोलन ज़ारी रहा। उधर पंजाब में आग लगी हुई थी। मुसलिम लीग ने आतंक
का राज क़ायम कर रखा था। पश्चिम पंजाब से घर-बार छोड़कर हिन्दुओं का पलायन हो रहा था
और दिल्ली में शरणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही थी। हिन्दू संगठन साम्प्रदायिकता
की बात कर बदला लेने का आह्वान कर रहे थे। कश्मीर में, जहाँ ज़्यादातर आबादी मुसलमानों की थी, वहाँ के शासक महाराजा
ने मुस्लिम नेता शेख अब्दुल्ला को गिरफ़्तार कर लिया था। बिहार और नोआखली में और
भी दंगे हुए, और भी लोग मारे गए। नेता उधर विभाजन विवाद में उलझे हुए
थे। किसी को इसकी चिन्ता नहीं थी, केवल गांधीजी को छोड़कर, लेकिन वे बिलकुल अकेले पड़
गए थे। गांधीजी जानते थे कि उनसे क्या अपेक्षा की जा रही है: उन्हें शांति के
सिद्धांत का प्रचार करना था और ज़ख्मों को भरने में मदद करनी थी। इसपर माउंटबेटन की
जिन्ना से झड़प भी हुई, लेकिन जिन्ना ने हिंसा को बंद करने का सिर्फ़ वचन दिया, कोई कार्रवाई
नहीं की। डॉ. ख़ान से कहा गया कि वे त्यागपत्र दे दें, ताकि हिंसा थमे, लेकिन उसने त्यागपत्र
देने से इंकार कर दिया। माउंटबेटन ने सीमाप्रांत में आम चुनाव कराकर निर्णय लेना कि
वे किस भाग में सम्मिलित होना चाहते हैं, का आश्रय लिया। इस काम को अंजाम देने के लिए
1 मई को लॉर्ड इस्मे माउंटबेटन का मसौदा लेकर जॉर्ज एबेल के साथ लंदन गया ताकि सम्राट
की सरकार के साथ सलाह-मशविरा कर सके।
गांधीजी बिहार लौटे, जहाँ खतरा सबसे ज़्यादा लग रहा था, और फिर अपनी दो
पोतियों, मनुबेन और आभाबेन, के साथ वे कश्मीर चले गए। उनकी अंतिम यात्राएँ शुरू हो
चुकी थीं। इससे पहले 23 अप्रैल को नेहरू ने गांधीजी
को पत्र लिखकर कहा, “1 मई को कांग्रेस कार्यसमिति की दिल्ली में बैठक हो रही है। मेरी बड़ी इच्छा है कि
उस समय आप यहां रहें। मई के पहले सप्ताह में माउंटबेटन की योजना तैयार हो जाएगी। हम
सब चाहते हैं आप सलाह और मार्गदर्शन के लिए हमारे पास रहें।” अप्रैल के तीसरे सप्ताह
में पटेल जब अंग्रेज़ों और मुसलिम लीग के षडयंत्रों को भांपकर चिंतित थे, उन्हें किसी
ने कहा, “अगर कांग्रेस अन्तरिम व्यवस्था के रूप में औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्ज़ा स्वीकार
कर ले, तो अंग्रेज़ के भारत से हटने की तारीख़ घोषित की जा सकती है।” सरदार पटेल को यह प्रस्ताव
स्वीकार्य था, इस बात की सूचना वायसराय को दे दी गई।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर