शनिवार, 7 मार्च 2026

452. संविधान सभा

राष्ट्रीय आन्दोलन

452. संविधान सभा

1946

1946 के आरम्भ में मजदूर-सरकार ने ब्रिटिश संसद सदस्यों का एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल भारत भेजा। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं से मिल कर उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना था कि सरकार संवैधानिक मामले पर शीघ्र ही समझौता करने को उत्सुक है। लेकिन ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनैतिक नेताओं के बीच निर्णायक चरण मार्च, 1946 में आया, जब मंत्रिमण्डल के तीन सदस्य लार्ड पैथिक लारेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और श्री ए.वी. अलेकजाण्डर कैबिनेट मिशन के रूप में भारत आए। कांग्रेस की ओर से बातचीत अबुल कलाम आजाद ने की। इस काम में नेहरू और पटेल ने उनकी सहायता की। गांधीजी से ये लोग सलाह लेते रहते थे। लेकिन इस मूल प्रश्न पर बातचीत में गतिरोध पैदा हो गया कि भारत की एकता बनी रहेगी अथवा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को पूरा करने के लिए देश का विभाजन होगा। कांग्रेस विभाजन का विरोध कर रही थी और विभिन्न प्रांतों को जितनी भी अधिक-से-अधिक आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय स्वायत्तता दे सकना संभव था, देने को तैयार थी।

शिमला में आयोजित एक सम्मेलन में कांग्रेस और लीग के मतभेद दूर नहीं हो सके। तब कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 को अपनी समझौता योजना एक वक्तव्य में पेश की। उन्होंने भारत के लिए तीन स्तरीय संवैधानिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की। संविधान संघ के ढंग का होगा, जिसमें रियासतें भी सम्मिलित होंगी। संघ सरकार पर केवल विदेशी मामले, सुरक्षा और यातायात संभालने का भार होगा। नीचे के स्तर पर प्रांत और रियासतें होंगी और सारे अवशिष्ट अधिकार इनको मिलेंगे। बीच के स्तर पर प्रांतों द्वारा स्वेच्छा से बनाये ऐसे समूह होंगे जो समान विषयों पर विचार करेंगे। मुस्लिम लीग ने ऊपर से तो इस योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन यह स्वीकृति वास्तविक न होकर दिखावा मात्र थी। 5 जून, 1946 को, जिन्ना ने मुस्लिम लीग कौंसिल में भाषण देते हुए कहा था : मैं आपको बता देना चाहता हूं कि जब तक हम अपने सारे क्षेत्र को मिला कर पूर्ण और प्रभुसत्तासंप़न्न पाकिस्तान की स्थापना नहीं कर लेंगे तब तक हम संतुष्ट होकर नहीं बैठेंगे। लीग की इस विसंगति के कारण ही गांधीजी और कांग्रेस में उनके साथी, “प्रांतों के वर्ग बंधनकी योजना के विषय में अशांत और आशंकित हो गए। लीग इस योजना को अनिवार्य करके इसे पाकिस्तान की स्थापना का साधन बनाना चाहती थी। इस बात पर मतभेद से कैबिनेट मिशन-योजना विफल हो गई।

 

तीन स्तरीय संविधान योजना बड़ी सूक्ष्म व्यवस्था थी, जिसमें रोकथाम और संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए थे। बड़े-बड़े दलों के बीच पूर्ण सहयोग के बिना संविधान बनाना असंभव था, उसे कार्यरूप देना तो दूर की बात थी। ऐसे सहयोग का अभाव था। कैबिनेट मिशन-योजना में समझौते का प्रयास था, लेकिन यह कांग्रेस और लीग को एकमत नहीं कर सकी। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन मामलों को यह समझा जाता था कि इस योजना से तय हो चुके हैं, वे ही मिशन के तीनों सदस्यों के इंग्लैंड लौटने पर तुरंत फिर उठाए गए। किन प्रांतों के वर्गबनाये जाएं और अंतरिम सरकार में किस दल के कितने लोग होंगे इन दो महत्वपूर्ण प्रश्नों पर वाद-विवाद की उत्तेजना चरम सीमा पर पहुंच गई।

जब तनाव बढ़ रहा था तो केंद्र में स्थिर और दृढ़ सरकार का होना बहुत जरूरी था। कैबिनेट मिशन अंतरिम राष्ट्रीय सरकार बनाने में असफल रहा। जुलाई, 1946 में लॉर्ड वेवेल ने पुनः इस दिशा में प्रयत्न आरंभ किया और जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। नेहरू ने जिन्ना को अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा लेकिन उन्होंने न केवल सहयोग देने से इनकार कर दिया, बल्कि बड़ी ही कटु आलोचना की और यह भी घोषणा की कि मुस्लिम लीग 16 अगस्त को सीधी कार्रवाई दिवसमनाएगी। उस दिन कलकत्ता में ऐसा भीषण दंगा, खून-खराबा और मारकाट हुई जिसकी मिसाल नहीं मिल सकती। कलकत्ता के भयंकर नरमेधकी प्रतिक्रिया हुई और पूर्व बंगाल, बिहार और पंजाब में सांप्रदायिक ज्वाला की लपटें उठने लगी।

 

देशव्यापी अराजकता से बुरी तरह घबरा कर, लॉर्ड वेवेल ने लीग को भी अंतरिम सरकार में सम्मिलित कर लिया। लेकिन इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वाद विवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा। 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान सभा की बैठक होने वाली थी। मुस्लिम लीग ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। वैधानिक संकट इतना गहरा हो गया कि नवम्बर, 1946 के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश सरकार ने दोनों दलों में समझौता कराने के लिए वायसराय, नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खां और सरकार बलदेव सिंह को बातचीत के लिए लंदन बुलाया। वहां की बातचीत भी निष्फल रही लेकिन सरकार ने विवादास्पद बातों पर अपने दृष्टिकोण या स्पष्टीकरण करते हुए एक वक्तव्य निकाला। इससे लीग की बहुत सी आपत्तियों का निराकरण हो गया, लेकिन फिर भी वह संविधान सभा में भाग लेने को राजी न हुई।

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना के लिए 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया। भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली के कंस्टिट्यूशन हॉल, जिसे अब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष के रूप में जाना जाता है, में हुई, जिसमें भारतीय नेताओं के साथ कैबिनेट मिशन ने भाग लिया। इसकी अध्यक्षता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा ने की थी। 11 दिसंबर 1946 की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष और डॉ. एच.सी. मुखर्जी को उपाध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के अन्य प्रमुख सदस्य थे डॉ. बी.आर. आंबेदकर, टी.टी. कृष्णमाचारी और डॉ. एस. राधाकृष्णन। डॉ. बी.आर. आंबेदकर ड्राफ़्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे। पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में इसमें शामिल हुए। सभा के सदस्यों का चयन 1946 के प्रांतीय चुनावों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से किया गया था। संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे (292 प्रांतों से, 93 रियासतों से और 4 मुख्य आयुक्त प्रांतों से)। विभाजन के बाद यह 299 रह गए। जिनमें कुल महिला सदस्यों की संख्या 15 , अनुसूचित जाति के 26, अनुसूचित जनजाति के 33 सदस्य थे। मुस्लिम लीग द्वारा अलग देश की मांग के कारण पहली बैठक का बहिष्कार किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के लिए दो अलग-अलग संविधान सभाएं बनीं। 9 दिसंबर, 1946 को जब संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो मुस्लिम लीग से कोई भी उस बैठक में शामिल नहीं हुआ। स्वतन्त्र होने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने।

मसौदा समिति के अध्यक्ष बाबासाहेब आंबेडकर थे। कैबिनेट मिशन की सिफारिशों पर संविधान सभा की 385 सीटों के लिए जुलाई-अगस्त 1946 में चुनाव हो गए थे। उस चुनाव में अंबेडकर भी एक उम्मीदवार, जो बंबई से शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के उम्मीदवार थे, लेकिन वो चुनाव हार गए। महात्मा गांधी से लेकर कांग्रेस और यहां तक कि मुस्लिम लीग के लोग भी चाहते थे कि अंबेडकर को तो संविधान सभा का सदस्य होना ही चाहिए। तब बंगाल से बी.आर. अबेडकर को उम्मीदवार बनाया गया। मुस्लिम लीग के वोटों के जरिए अंबेडकर चुनाव जीत गए और संविधान सभा के सदस्य बन गए। 24 मार्च 1947 को नए गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन भारत आ गए थे और चंद दिनों में ही तय कर दिया था कि भारत का बंटवारा होगा। भारत और पाकिस्तान दो देश होंगे। इस वजह से संविधान सभा में फिर बदलाव होना था। जिस सीट, जयसुरकुलना से अबेडकर संविधान सभा के सदस्य चुने गए थे, वह सीट पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। इस तरह अंबेडकर एक बार फिर से संविधान सभा से बाहर हो गए। लेकिन तब तक संविधान सभा के लोगों ने ये तय कर लिया था कि अंबेडकर का संविधान सभा में रहना ज़रूरी है। तब बंबई प्रेसिडेंसी के प्रधानमंत्री हुआ करते थे बी.जी. खेर। उन्होंने संविधान सभा के एक और सदस्य कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता एम.आर. जयकर को इस्तीफा देने के लिए राजी किया। एम.आर. जयकर ने इस्तीफा दिया और उनकी जगह पर अंबेडकर फिर से संविधान सभा में शामिल हो गए। 29 अगस्त1947 को संविधान सभा ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का सर्वसम्मति से पास कर दिया। प्रारूप समिति में और 6 सदस्य थे।

केन्द्रीय ऊर्जा समिति और केन्द्रीय घटना समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। प्रान्तीय घटना समिति, मुलभूत अधिकार, अल्पसंख्यक, आदिवासी और अपवर्जित क्षेत्रों की सलाहकार समिति के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल थे

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद प्रक्रिया संबंधी नियम समिति, संचालन समिति, और
वित्त और कर्मचारी समिति के अध्यक्ष थे। अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यारी क्रेडेंशियल समिति के, बी पट्टाभि सीतारामय्या हाउस कमेटी के, के.एम. मुंशी व्यापार समिति का आदेश के, राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय ध्वज पर तदर्थ समिति के, और जी.वी. मावलंकर संविधान सभा के कार्यों पर समिति के अध्यक्ष थे।

संविधान सभा की बैठक के पाँचवें दिन 13 दिसंबर को जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा में लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पेश किया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम दास टंडन ने इसका अनुमोदन किया। भारत को एक संविधान देने के विषय में कई चर्चाएं, सिफ़ारिशें और वाद-विवाद किया गया। कई बार संशोधन के बाद भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया। भारत का संविधान तैयार करने में इस सभा को तीन वर्ष (दो वर्ष, ग्यारह माह और सत्रह दिन) लगे। इसकी बैठकें 11 सत्रों में 165 दिन हुईं। इनमें से 114 दिन संविधान के प्रारूप पर विचार करने में व्यतीत हुए। 21 फरवरी, 1948 को संविधान का प्रारूप तैयार हुआ और अध्यक्ष की हैसियत से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को इस पर हस्ताक्षर किए। 26 जनवरी, 1950 से यह संविधान लागू किया गया। इसके अनुसार भारत एक सर्वप्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बन गया। संविधान के अनुसार नए चुनाव 1952 में हुए। इसके पहले अंतरिम सरकार ही कार्यरत रही। आज भी हम गर्व से कहते हैं कि हमारा संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान, जिसको बनाने में डॉक्टर अंबेडकर का वो योगदान अहम है, जिसकी वजह से उन्हें भारत के संविधान निर्माता की उपाधि मिली हुई है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

451. नोआखाली में शान्ति यात्रा-5

गांधी और गांधीवाद

451. नोआखाली में शान्ति यात्रा-5

1946

श्रीरामपुर में मुख्यालय बनाया गया

20 नवंबर को अपने दुभाषिए सचिव निर्मल कुमार बोस के साथ गांधीजी बाँस से बनी डोंगी में बैठ कर अगले पड़ाव की ओर प्रस्थान कर दिए। ढाई घंटे की यात्रा के बाद नाव श्रीरामपुर के रामगंज गांव पहुंची। गांव में गांधीजी के ठहरने की व्यवस्था दंगे में खंडहर हो चुके एक घर में की गई थी। आस-पास आगजनी और तबाही का भयानक मंज़र था। आते ही, गांधीजी ने अपनी किताबें और कागज़ात ठीक से रखे, चीज़ें जमाईं और अपना बिस्तर खुद लगाया। उन्होंने खुद अपने शरीर पर थोड़ा तेल लगाया और गर्म पानी की बाल्टी से मग में नहाया। खाना बनाना बहुत ज़रूरी हो गया था। आधा पाउंड बकरी के दूध में उतनी ही मात्रा में वेजिटेबल सूप मिलाकर दोपहर का खाना बनाया जाता था। और शाम को भी यही मेन्यू परोसा जाता था, जिसमें अंगूर भी होते थे।

इस गांव के 582 परिवारों में 382 परिवार मुसलमान और 200 परिवार हिन्दू थे। गांव के दो सौ हिन्दू परिवारों में से दंगों के बाद सिर्फ़ तीन परिवार बचे थे। बाक़ी सब डर के मारे भाग गए थे। श्रीरामपुर में गांधीजी लगभग छह सप्ताह ठहरे। पहले तो गांधीजी के दल में सात लोग थे, लेकिन उन्होंने अपने दल के सदस्यों को आस-पास के एक-एक गांव में भेज दिया था। प्यारेलाल, सुशीला नैयर, आभा, कनु गांधी और सुचेता कृपलानी अलग-अलग एक-एक गाँव में जा बसे। अब उनके साथ उनका स्टेनोग्राफर परशुराम और दुभाषिए का काम करने वाले प्रोफ़ेसर निर्मल कुमार बोस रह गए। बाद में मनु भी आ गईं। वह गांधीजी के भाई की पौत्री थीं, जिन्हें गांधीजी अपनी पौत्री कहते थे। वह 19 दिसंबर को पहुंची और तुरंत काम पर लग गई।

निर्मल कुमार बोस कलकत्ता यूनिवर्सिटी में साइंस के प्रोफेसर थे। उनकी खास दिलचस्पी अहिंसक काम के मैकेनिक्स की स्टडी में थी, और उन्होंने इस चीज़ को खुद स्टडी करने के लिए अपनी यूनिवर्सिटी से छुट्टी ली थी। वह गांधीजी को कुछ सालों से जानते थे, और सच में उन्हें पसंद करते थे और उनकी तारीफ़ करते थे, साथ ही एक तरह की दूरी बनाए रखते थे। गांधीजी के मन की गहरी बातों और उनके आस-पास की कहानियों के बीच फ़र्क करते थे। गांधीजी उनके साथ बिल्कुल भी सहज नहीं थे, और कभी-कभी वह बेसब्री दिखाते थे। प्रोफेसर बोस एक इंटरप्रेटर से कहीं ज़्यादा बन गए। उन्होंने चिट्ठियां लिखने, इंटरव्यू अरेंज करने, यहां तक ​​कि खाना बनाने में भी मदद की। कभी-कभी वह गांधीजी के पैर भी मसाज करते थे, जो बहुत नरम हो गए थे। वह गांधीजी के दिमाग की हरकतों, लॉजिक को न मानने की उनकी आदत, सही शब्द के लिए उनकी पक्की समझ से बहुत प्रभावित थे।

अगले छः सप्ताह तक चटाई बिछा लकडी का तख्त दिन में उनके कार्यालय का और रात में बिस्तरे का काम देता रहा। वह रोज़ सोलह-सोलह और कभी-कभी तो चौबीस घंटे काम करते थे। वह सुबह 3 बजे उठते और 4 बजे प्रार्थना करते। 8 औंस गर्म पानी में 1 औंस शहद और 5 दाने बेकिंग सोडा मिलाकर पीते हुए, वह केरोसिन लालटेन की रोशनी में पढ़ना या लिखना शुरू करते। फिर वह बंगाली में अपना लेसन लेने बैठते, जिसे वह कभी नहीं छोड़ते थे। 6:30 बजे, अपने करीबी साथियों के साथ, वह लगभग एक घंटे तक गांव की संकरी, ओस से भीगी सड़कों पर टहलते। वहां एक पतला लकड़ी का पुल था जिस पर वह बिना किसी सहारे के चलने की कोशिश करते थे। अब उन्होंने अपने चलने के घंटे और स्पीड भी बढ़ा दी, ताकि वह अपने सोचे हुए टूर के लिए खुद को तैयार कर सकें। न उन्हें खाने की सुध थी, न सोने की। थोडा-बहुत पेट में डाल लेते और बहुत थोडी-सी देर के लिए सो लेते थे। अपने सारे काम स्वयं करते, खुद अपने कपडों की मरम्मत करते, अपने हाथ से खाना पकाते और अकेले हाथों भारी-भरकम डाक से निपटते थे। लोगों से मिलना-जुलना और गाँव के मुसलमानों के घर मिलने जाना आदि तो लगा ही हुआ था।

22 नवंबर को दोनों क़ौमों के प्रतिनिधियों और सरकारी प्रवक्ताओं की एक बैठक रामगंज डाकबंगला में हुई। इसमें शांति-स्थापना के लिए एक योजना बनाई गई। जिसके अनुसार गांधीजी ने शांति समिति बनाई। यह हर थाने में हिन्दू-मुस्लिम की एक सम्मिलित समिति थी जो उस थाने के सारे मामलों का निपटारा करेगी। उस समिति का अध्यक्ष सरकारी अफसर होता। इस समिति के मुसलमान सदस्य को हिन्दू मनोनीत करता और हिन्दू सदस्य को मुसलमान। इससे काफ़ी हद तक वैमनस्य कम होने लगा। लोगों का गुस्सा और तनाव कम होने लगा। नोआखाली सही मायने में गांधीजी की प्रयोग भूमि थी। दोनों संप्रदायों में पारस्परिक विश्वास फिर से पैदा करना बडा ही मुश्किल और देर से होनेवाला काम था। फिर भी नोआखाली में उनकी उपस्थिति ने पूर्वी बंगाल के गाँवों को ढांढस देने और हिम्मत बंधाने का काम किया।

24 नवंबर की सुबह शरतचंद्र बोस अपने कुछ मित्रों के साथ श्रीरामपुर में गांधीजी से मिले। उनके मन में बंगाल के मुख्य मंत्री और अन्य मंत्रियों के प्रति शांति बहाली के उनकी इच्छा के प्रति शंका थी। गांधीजी को भी यही लग रहा था कि वहां के मंत्रियों का रवैया निम्नतम स्तर तक जा पहुंचा है।

नोआखाली में गांधीजी के किए गए प्रयासों और उनके ध्येय के प्रति चारों ओर सहानुभूति पैदा होने लगी। भारत के विभिन्न भागों से लोग सहायता देने को उत्सुक थे। नोआखाली की समस्याओं से राहत के लिए कई लोग आर्थिक सहायता भेजते, लेकिन गांधीजी नहीं चाहते कि सहायता लेते-लेते लोग असहाय बन जाएं और उनका पुरुषार्थ मर जाए। उनका मानना था कि पैसों के प्रलोभन से लोगों को बचना चाहिए। नोआखाली में लगभग 30 कष्ट-निवारण संस्थाएं काम कर रही थीं। इसके अलावा 6 डॉक्टरी मिशन भी सेवाएं प्रदान कर रहे थे। एक गांव में एक कार्यकर्ता वाली गांधीजी की योजना के तहत 20 केन्द्र थे। सरदार पटेल ने गांधीजी की सहायता के लिए आज़ाद हिन्द फौज के नायक सरदार निरंजन सिंह गिल को नोआखाली में काम करने के लिए भेजा। उनके साथ करीब सौ सहयोगी भी आए। कर्नल जीवन सिंह के नेतृत्व में सौ लोगों का यह दल गांधीजी के साथ गांव-गांव की यात्रा करता था। जब मार्च 1947 में गांधीजी बिहार चले गए तब इन लोगों को भी वापस भेज दिया गया।

वहां रहते हुए उन लोगों ने उस गांव के लोगों को हिम्मत देने और मदद करने का काम संभाल लिया। सात दिनों में उन्होंने 116 मील की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 47 गांवों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावना जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा। गांधी जी भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है। एक बार तो क्रुद्ध मुसलमानों ने उनके मार्ग में कूड़ा फेंक दिया जिसे उन्होंने अपने हाथों से हटाया।

इसी दौरान चंडीपुर पहुंचकर गांधीजी ने चप्पल पहनना भी छोड़ दिया था। उन्हें लगा कि यह भूमि हज़ारों लोगों के ख़ून से सनी है। यहां उन मृतकों की आत्मा तड़प रही है। ऐसे स्थान में चप्पल पहनना उन मृतक आत्माओं के प्रति अनादर है। यह स्थान तो मज़ार जैसा है। मज़ार में लोग जूते-चप्पल पहनकर नहीं चल सकते। वह नंगे पांव गांव-गांव घूमने लगे। सब जगह प्रार्थना सभा होती। प्रश्न पूछे जाते। महिलाओं को हिम्मत देते। मुसलमानों के घर जाते। मज़बूर, गरीब लोगों से मिलते। लोगों को शिक्षित करने का प्रयास करते।

महीना भर पूरा होते-होते गांधीजी वहां की दोनों क़ौमों के मित्र बन गए थे। वे अपना अधिकांश समय ग़रीबों और बीमारों के देखभाल में बिताते। गांव-गांव भ्रमण का उनका सिला ज़ारी रहा। एक गांव में जब गांधीजी गए तो उन्हें मालूम हुआ कि वहां 1,400 की कुल आबादी में से केवल एक आदमी मैट्रिक पास है। लिखना-पढ़ना जानने वाले की संख्या 40 थी। उन्होंने प्रण कर लिया था कि ता-उम्र इसी इलाक़े में रहकर वे इन लोगों की ग़रीबी और अशिक्षा दूर करने का प्रयास करेंगे। इसके लिए उन्हें बंगाली आनी चाहिए थी। उन्होंने 21 दिसंबर, 1946 से बंगाली लिखना-पढ़ना सीखना शुरू कर दिया। यह उनके रोज़ का क्रम बन गया। जिस दिन उनकी मृत्यु हुई उस दिन भी उन्होंने उस दिन का अपना बंगाली पाठ पूरा किया था।

दिल्ली में बड़े-बड़े लोग अभी भी कॉन्फ्रेंस टेबल के चारों ओर मिल रहे थे, अंतरिम सरकार का सेशन चल रहा था, लॉर्ड वेवेल को अब भी विश्वास था कि संवैधानिक सरकार के व्यवस्थित प्रोसेस को बनाए रखा जा सकता है। उधर दिल्ली में पटेल और नेहरू के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। पटेल मुस्लिम लीग को मुंह-तोड़ जवाब देना चाहते थे। वायसराय ने अपनी चालों से नेहरूजी को पस्त कर रखा था। पंजाब के सिखों और असम के ग़ैर मुसलिमों को कांग्रेस छोड़ कर मुसलिम का साथ देने का खतरा पैदा होता जा रहा था। गांधीजी की राय मांगी गयीगांधीजी ने पटेल को अपने विश्वास के आधार पर काम करने की सलाह दी। दिसंबर, 1946 के अंतिम सप्ताह में जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य कृपलानी गांधीजी से मिलने श्रीरामपुर आए। नेहरूजी ने गांधीजी को बताया कि उनके दिल्ली छोड़ने के बाद कांग्रेस और लीग के बीच की खाई बढ़ती गई है। लीग अंतरिम सरकार के कामकाज में तरह-तरह की रुकावटें पैदा करती रहती है। मंत्रिमंडल में लगभग गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गई है। दूसरी ओर लॉर्ड वेवेल इस गतिरोध का उपयोग मुस्लिम लीग को अधिक छूट देने के लिए कर रहा है। गांधीजी की समझ में आ गया कि कान्ग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार का बड़ा त्रिकोण ही कांटों का सेज नहीं बना हुआ था बल्कि खुद कांग्रेस हाईकमान के अन्दर खींचतान, झगड़े और गलतफहमियाँ मौजूद थींसंविधान सभा की बैठक 9 दिसंबर को हुई थी। मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार का निर्णय लिया था। गांधीजी को वापस दिल्ली आने के लिए पंडित नेहरू ने विनती की। गांधीजी तैयार नहीं हुए। जून 1946 में गांधीजी की अंतः-प्रेरणा को अस्वीकार करके कांग्रेसी नेताओं ने कैबिनेट मिशन की जो योजना स्वीकार की थी, उससे भारत को बहुत लाभ नहीं हुआ था। एक तरफ़ तो कांग्रेसी नेता अपने कर्णधार से दूर हुए, दूसरी तरफ़ सर्वथा निराश होकर उन्होंने भारत के विभाजन को स्वीकार करके उससे अपना पिंड छुड़ाने में प्रसन्नता मानी। 30 दिसंबर को पंडित नेहरू श्रीरामपुर से वापस लौट गए।

31 दिसंबर को कुछ अतिवादी मुसलमानों ने गांधीजी से कहा, यदि हिंदू लोग मुसलमानों के विरुद्ध दाखिल केस वापस ले लें तो वे ख़ुशी से अपने घर लौट सकते हैं। गांधीजी ने कहा, इस परिस्थिति में दो उपाय हैं – एक तो ये कि मुसलमान स्वीकार कर लें कि उनकी सारी हरकतें दूसरों के मार्गदर्शन पर पाकिस्तान स्थापित करने के लिए थीं, उनके दिलों में कोई द्वेष या वैर भाव नहीं है। या फिर वे मजिस्ट्रेट के सामने समर्पण कर दें। बाद में जो सज़ा मिले नम्रता पूर्वक स्वीकार कर लें। केस को वापस लेकर समझौता करना ग़लत होगा। सज़ा से बचने के लिए किया हुआ समझौता ही नहीं है, यह तो सौदेबाज़ी है। ऐसी सौदेबाज़ी से दोनों में से किसी क़ौम का हित नहीं है। सत्याग्रही का कर्त्तव्य है कि वह दोनों कौमों को बहादुर और निडर बनाए, न कि उन्हें बुज़दिल बनाए।

छुआछूत के भेदभाव को मिटाने के लिए हिंदू-मुसलमानों का एक साथ भोजन का आयोजन किया जाने लगा। भटियालपुर गांव में जो मंदिर तरह-नस हो गया था, उसे कुछ मुस्लिम सेवकों ने ठीक किया। मुसलमानों ने गांधीजी को आश्वासन दिया कि वे मंदिर की रक्षा करेंगे। एक जगह परदे की प्रथा के कारण कुछ महिलाओं ने गांधीजी को घर में बुलाया। गांधीजी उनसे मिले। बाद में प्रार्थना सभा में उन्होंने इस कुरीति का वर्णन भी किया। इस प्रथा को हटाने का सुझाव दिया। इस पर कुछ मुल्ला-मौलवियों ने गांधीजी पर इसलाम को भ्रष्ट करने का आरोप लगाया।

आर्थर हेंडरसन ने 4 नवंबर, 1946 को हाउस ऑफ़ कॉमन्स को बताया कि नोआखाली और आस-पास के टिप्पेरा ज़िलों में मरने वालों की गिनती अभी तक नहीं हुई है, लेकिन अंदाज़े के मुताबिक, 'वे तीन अंकों की कैटेगरी में कम होंगे।' बंगाल सरकार ने मरने वालों की संख्या 218 बताई; हालाँकि, कुछ परिवारों ने डर के मारे अपने शिकारों को छिपा लिया। दोनों ज़िलों में दस हज़ार से ज़्यादा घरों को लूटा गया। टिप्पेरा में 9895 लोगों को ज़बरदस्ती इस्लाम में बदला गया; नोआखाली में सही डेटा न होने से पता चलता है कि धर्म बदलने वालों की संख्या ज़्यादा थी। हज़ारों हिंदू औरतों को किडनैप करके उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ मुसलमानों से शादी कर दी गई। गांधीजी धर्म बदलने और किडनैपिंग से बहुत दुखी थे। हिंदू औरतों को मुसलमान बनाने के लिए उनकी चूड़ियाँ तोड़ दी गईं और उनके माथे से 'खुशी का निशान' हटा दिया गया, जिससे पता चलता था कि वे विधवा नहीं हैं। हिंदू मर्दों को दाढ़ी बढ़ाने, हिंदू तरीके के बजाय मुस्लिम तरीके से लंगोटी मोड़ने और कुरान पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। पत्थर की मूर्तियों को तोड़ा गया और हिंदू मंदिरों को अपवित्र किया गया। सबसे बुरी बात यह थी कि हिंदुओं को अपनी गायों को काटने के लिए मजबूर किया गया, अगर उनके पास कोई गाय थी या, किसी भी हालत में, उनका मांस खाने के लिए। ऐसा महसूस किया गया कि हिंदू समुदाय किसी ऐसे व्यक्ति को अपने साथ वापस नहीं लेगा जिसने किसी पवित्र जानवर को मारा हो या उसका मांस खाया हो।

उस अंधेरे में गांधी जी के उत्साह दिलाने वाले संदेश की रोशनी ने शोक से भरे हुए अनगिनत लोगों को ताक़त और तसल्ली दी। गांधीजी की उपस्थिति से पूर्वी बंगाल के संतप्त गांवों में कुछ शांति आयी। तनाव ढीले पड़ गये, क्रोध शांत हुआ और मनःस्थिति में सुधार हुआ। गांधी जी कहा करते थे, यदि मैं हिन्दू भाइयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा। जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी। बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया। गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यात्मिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी। नोआखाली में उनके सतत बने रहने का मधुर परिणाम आ रहा था। धीरे-धीरे परन्तु स्थायी रूप से उपद्रव पीड़ित लोगों में फिर से विश्वास आ रहा था। लोग अपने घर को लौट रहे थे। एक समाचार पत्र ने लिखा था, जब आत्मा से अपील की जाती है, तो देर भले लगती है, परन्तु उपाय अधिक विश्वस्त और स्थायी होता है। नोआखाली में स्थापित शांति कोई ऊपर से थोपी हुई शांति नहीं है, बल्कि हृदय में उत्पन्न की हुई शांति है।

नोआखाली के मुद्दे ने पूरी दुनिया में हमदर्दी जगाई। पूरे भारत में लोग पैसे और सामान से मदद करने के लिए तैयार थे। पंजाब के मुसलमानों के अहमदिया ग्रुप ने पाँच हज़ार रुपये का डोनेशन भेजा। रकम भेजते हुए अपने लेटर में, एसोसिएशन के सेक्रेटरी ने गांधीजी को लिखा: "मुझे इस बारे में यह बताना है कि इस्लाम, एक सिद्धांत के तौर पर, सभी परेशान और दबे-कुचले लोगों की मदद और आज़ादी के लिए खड़ा है, चाहे वे किसी भी वर्ग या धर्म के हों और हम... परेशान लोगों की राहत के लिए हर मुमकिन मदद और सहयोग करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते हैं, चाहे वे कोई भी हों।" दंगों के दौरान पीड़ित हिंदू महिलाओं में बांटने के लिए 650 रुपये का एक और चेक आया, जिसमें दो सौ जोड़ी शंख की चूड़ियाँ और एक पाउंड सिंदूर था। डोनर में ग्यारह मुसलमान और एक यूरोपियन शामिल थे।

नोआखाली में करीब 30 राहत संगठन और आधा दर्जन मेडिकल मिशन चल रहे थे, इसके अलावा गांधीजी के एक गांव एक वर्कर प्लान के तहत करीब 20 सेंटर काम कर रहे थे। गांधीजी की सभी को पक्की हिदायत थी कि उन्हें हमेशा सच्चाई और अहिंसा को सबसे आगे रखना चाहिए। उनकी सभी गतिविधियां सच्ची, खुली और साफ-सुथरी होनी चाहिए। कुछ भी सीक्रेट नहीं होना चाहिए ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए जिससे ज़्यादातर समुदाय के लोग घबरा जाएं या अधिकारियों को शक का कोई सही कारण मिले।

गांधीजी की खास व्यक्तिगत खूबियां और असली महानता उनकी ज़िंदगी के आखिरी महीनों में सबसे ज़्यादा साफ़ दिखी नोआखाली में गांधीजी की मौजूदगी सच में काम करती दिखी। गांधीजी का तरीका बहुत दिल को छूने वाला और बहादुरी भरा था। यह एक निजी कोशिश से ज़्यादा कुछ नहीं था। श्रीरामपुर में अपने छह हफ़्ते के प्रवास के आखिर तक, गांधीजी ने कई लोगों का दिल जीत लिया था। जब वह सुबह और शाम की सैर के लिए निकलते थे, तो मुस्लिम मर्दों, औरतों और बच्चों के ग्रुप फलों के तोहफ़े लेकर अपनी झोपड़ियों के सामने जमा हो जाते थे। उन्हें अंदर से एहसास हो गया था कि वह उन्हीं में से हैं, और जाति-धर्म की सभी रुकावटों से ऊपर उठकर इंसानियत के बंधनों से उनसे जुड़े हुए हैं। और यह बदलाव सिर्फ़ मुसलमानों तक ही सीमित नहीं था। हिंदू भी प्यार के संदेश के तहत फिर से जागने लगे। गांधीजी आस्था और प्रार्थना में विश्वास रखने वाले इंसान थे। ये उनके काम करने के तरीके थे, सच की खोज में उनके औज़ार थे। उन्होंने एक बार कहा था, "ज़िंदगी बहुत मुश्किल चीज़ है, और सच और अहिंसा ऐसी समस्याएँ खड़ी करते हैं, जिनका एनालिसिस और फ़ैसला अक्सर मुश्किल होता है। सच और उसे लागू करने का तरीका, यानी सत्याग्रह या आत्मा की शक्ति, सब्र से कोशिश और चुपचाप प्रार्थना करके पता चलता है।"

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

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