महात्मा गांधी हत्या केस-2
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी उसका
अहिंसात्मक रूप। अगर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अहिंसात्मक सत्याग्रह न अपनाया
होता, तो गांधीजी शायद ही उसमें भाग लेते। गांधीजी सदैव हिंसा का विरोध करते थे। गांधीजी
के लिए अहिंसा कोई राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि एक अटल नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांत था। वह किसी भी
कीमत पर स्वतंत्रता के लिए हिंसा का समर्थन नहीं कर सकते थे। गांधीजी का मानना था
कि अंत और साधन दोनों पवित्र होने चाहिए। उन्होंने बार-बार दोहराया था कि वे
अहिंसा की कीमत पर अपने देश की स्वतंत्रता नहीं खरीदेंगे। चूंकि उनके लिए साधन की
शुद्धता ही सबसे महत्वपूर्ण थी, एक हिंसक संघर्ष में उनकी भागीदारी का कोई सवाल ही नहीं
उठता था।
यह मान्यता है कि निहत्थे लोग सशस्त्र विद्रोह में सफल नहीं
हो सकते। फिर भी गांधीजी हिंसा का सहारा लेने वालों में से नहीं थे। वह हिंसा को ऐसा भोंडा अस्त्र समझते थे, जिससे उतनी कठिनाइयां हल नहीं होती जितनी
पैदा हो जाती हैं। उनका कहना था कि इससे विद्वेष तथा कटुता का ऐसा वातावरण बन जाता
है कि पुनः सच्चा मेल-मिलाप क़रीब-क़रीब असंभव ही हो जाता है। उनका मानना था कि यदि कांग्रेस उनके अहिंसा
के मूल सिद्धांत को स्वीकार नहीं करती, तो वे स्वतंत्रता संग्राम से पूरी तरह दूर रहते। गांधीजी का
सोचना था कि हिंसा से मिलने वाली स्वतंत्रता नफरत और कड़वाहट की विरासत छोड़ जाएगी, जो स्थायी शांति और मेल मिलाप के लिए घातक
होगी। लेकिन अहिंसा, सत्याग्रह और असहयोग को जिसने लड़ाई के हथियार बनाये थे, 30, जनवरी 1948 को एक हत्यारे की गोलियों से बिंधा एक युगपुरुष का शरीर
खून से लथपथ हो धरती पर गिरा पड़ा था।
उनकी ह्त्या के पीछे की विचारधारा
तथा प्रवृत्ति
की पड़ताल करना बहुत ज़रूरी है। गांधीजी की हत्या के पीछे की मुख्य विचारधारा कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद, सांप्रदायिक असंतोष और विभाजन का विरोध थी। गांधीजी के हत्यारे का मानना था कि महात्मा
गांधी की नीतियां हिंदुओं के हितों के खिलाफ थीं। 'गांधी
वध क्यों' किताब में नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे ने नाथूराम के विचारों को लिखा
है, ''अगर देशभक्ति पाप है तो मैं मानता हूं मैंने पाप किया है। अगर
प्रशंसनीय है तो मैं अपने आपको उस प्रशंसा का अधिकारी समझता हूं। मुझे भरोसा है कि
मनुष्यों के ऊपर कोई अदालत हो, तो उसमें मेरे काम को
अपराध नहीं समझा जाएगा। मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया। मैंने उस
व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीति से हिन्दुओं पर घोर संकट आए, हिन्दू नष्ट हुए।''
8 नवंबर 1948 को विशेष अदालत में
सुनवाई पर पैरवी करते हुए मुख्य अभियोजक (Chief Public Prosecutor) बॉम्बे के तत्कालीन एडवोकेट जनरल चंद्र किशन दफ्तरी ने
कहा कि अब वो कोई और गवाह पेश नहीं करना चाहेंगे। इसके बाद अदालत ने नाथूराम गोडसे
से कहा कि क्या वो कुछ कहना चाहेगा? नाथूराम ने जवाब दिया कि वह 93 पन्नों का लंबा बयान
पढ़ना चाहता है। बयान पढ़ने से पहले उसने कहा कि वो 6 हिस्सों में पढ़ेगा। उसने
कहा कि उसका आख़िरी बयान तुष्टीकरण की राष्ट्र विरोधी नीति पर होगा। मुख्य अभियोजक
चंद्र किशन दफ्तरी ने नाथूराम के बयान को कोर्ट के रिकॉर्ड में नहीं रखने का आग्रह
किया। उन्होंने कहा कि इन बयानों का केस से कोई लेना-देना नहीं है।
उस दिन अदालत पूरी तरह से भरी हुई थी।
नाथूराम ने सवा दस बजे दिन में अपना बयान पढ़ना शुरू किया। नाथूराम
के बयान से ऐसा झलकता है कि वह गांधीजी का सम्मान करता था। उसने कहा था, "वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है। मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और
कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने
नहीं। ... इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यक़ीन इस बात में हुआ कि एक देशभक्त और विश्व
नागरिक होने के नाते मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है। 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत
की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है। इस सोच ने मुझे
हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया। मेरे विचार से यही
विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है। ... 32 साल तक विचारों में
उत्तेजना भरने वाले गांधीजी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो
मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधीजी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा।” नाथूराम
बयान पढ़ रहा था और समय दिन का 11 बज गया। कुछ देर आराम
करने के बाद उसने फिर पढ़ना शुरू किया।
“गांधीजी
ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार
काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या
सही है और क्या ग़लत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे। अगर देश को
उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था। अगर देश उनके
नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता तो वे कांग्रेस से अलग राह पर चलने लगते। ... इस सोच
के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते। या तो कांग्रेस को गांधीजी के लिए अपना रास्ता
छोड़ना होता और गांधीजी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नज़रिए को अपनाना होता या फिर गांधीजी के बिना आगे बढ़ना
होता। ... जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधीजी की सहमति से देश
के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते
रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था। व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति
मेरी कोई दुर्भावना नहीं है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का
सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं। लेकिन उसी वक्त
मैं ये साफ़ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधीजी की मौजूदगी के चलते थीं।”
अदालत में गोडसे ने स्वीकार किया कि उसने
ही गांधीजी को मारा है। अपना पक्ष रखते हुए गोडसे ने कहा, ''गांधीजी ने देश की जो सेवा की है, उसका मैं आदर करता हूँ। उनपर गोली चलाने से पूर्व मैं उनके
सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था, किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के
विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को भी नहीं है। गाँधीजी
ने देश को छल कर देश के टुकड़े किए। क्योंकि ऐसा न्यायालय और क़ानून नहीं
था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता, इसीलिए मैंने गाँधीजी को गोली मारी।'' नाथूराम ने क़रीब पाँच घंटों में अपना पूरा बयान पढ़ा। अपने बयान
के अंत में उसने चिल्लाकर नारा लगाया – ‘अखंड भारत अमर रहे, वंदे मातरम।'
नाथूराम के तर्कों के साथ समस्याएं थीं। मसलन, उसकी सोच थी कि गांधीजी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था। वे भारत के विभाजन
के घोर विरोधी थे और उन्होंने इसे टालने के लिए हर संभव प्रयास किया था। महात्मा
गांधी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि देश का विभाजन उनकी "लाश के ऊपर से"
होगा और जब तक वे जीवित हैं, वे
भारत के बंटवारे की अनुमति नहीं देंगे। देश की एकता बनाए रखने के लिए उन्होंने
लॉर्ड माउंटबेटन और कांग्रेस के नेताओं के सामने प्रस्ताव रखा था कि मोहम्मद अली
जिन्ना को पूरे देश की सरकार बनाने या मंत्रिमंडल चुनने दिया जाए, ताकि बंटवारा टाला जा सके। 15 अगस्त
1947 को जब देश आजाद हुआ और उसका विभाजन हुआ, तब
गांधीजी दिल्ली में किसी जश्न में शामिल नहीं हुए, बल्कि
वे बंगाल के नोआखली में दंगे रोकने और शांति स्थापित करने में जुटे हुए थे।
गोडसे ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी के भीतर गांधीजी "अखंड
तानाशाह" (undisputed
dictatorship) थे, लेकिन उसने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए
गांधीजी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी। किसी तानाशाह को आदेश देने के सिवा कुछ करने
की ज़रूरत क्यों होगी? कई
महत्वपूर्ण मुद्दों पर गांधीजी की अपनी बात मनवाने की जिद को इतिहासकार और
राजनीतिक विश्लेषक गांधीजी की अपार नैतिक शक्ति और जन-स्वीकार्यता के रूप में
देखते हैं, न कि औपचारिक तानाशाही के रूप में। गांधीजी के पास कोई संवैधानिक
पद नहीं था, लेकिन उनके सत्य, अहिंसा और जन-आंदोलनों
के विचारों के कारण पार्टी में उनका नैतिक दबदबा सर्वोच्च था। कांग्रेस के भीतर
सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, और सुभाष चंद्र बोस जैसे
बड़े नेताओं के साथ कई बार वैचारिक मतभेद हुए, जिसे
लोकतांत्रिक तरीके से हल किया जाता था। भारत के विभाजन या अन्य बड़े राजनीतिक
फैसले कांग्रेस की कार्य समिति और खुले सत्रों में मतदान व चर्चा के बाद ही लिए गए
थे।
नाथूराम ने गांधीजी की अंतिम भूख हड़ताल (जो उन्होंने पाकिस्तान को
फंड जारी करने से भारत के इनकार करने पर की थी) पर सवाल उठाए, लेकिन यह उन्होंने तब किया जब भारत अपने ही वायदे से पीछे हट रहा
था। गांधीजी ने इस मौक़े पर देश को सही एवं उपयुक्त रास्ता दिखाया था।
नाथूराम ने अदालत में जो भी कहा, तर्क
के आधार पर उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। केवल राजनीति के चलते उसने गांधीजी की
हत्या नहीं की थी। वह गांधीजी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से नफ़रत करता था। यह
वास्तविक हिंदू धर्म भाव के बिलकुल उलट था। वास्तविकता यही है कि गांधीजी का कोई
भी रास्ता या तरीक़ा ऐसा नहीं है, जिस पर सवाल उठाए जा
सकें। यही वजह है कि दशकों बाद भी एक राजनेता के तौर पर उनकी वैश्विक साख कायम है।
1949 में गांधीजी के बारे में जॉर्ज ऑरवैल ने लिखा था, "सौंदर्य बोध के लिहाज़ से कोई गांधीजी के प्रति वैमनस्य रख सकता है,
जैसा कि मैं महसूस कर रहा हूँ। कोई उनके महात्मा होने के दावे को भी ख़ारिज कर सकता
है (हालांकि महात्मा होने का दावा उन्होंने ख़ुद कभी नहीं किया)। कोई साधुता को
आदर्श के तौर पर ही ख़ारिज कर सकता है और इसलिए ये मान सकता है कि गांधीजी का मूल
भाव मानव विरोधी और प्रतिक्रियावादी था। लेकिन एक राजनेता के तौर पर देखने पर और
मौजूदा समय के दूसरे तमाम राजनेताओं से तुलना करने पर हम पाते हैं- वे अपने पीछे
कितना सुगंधित एहसास छोड़कर गए हैं।"
जब
भारत के बंटवारे की बात चली तो यह भी तय हुआ था कि जो कैश भारत में उपलब्ध है उसका
भी बंटवारा होगा। अखंडित भारत के कोष में 375 करोड़ रुपए थे। बंटवारा परिषद के
फ़ैसले के तहत जो द्विपक्षीय संधि हुई उसके अनुसार
पाकिस्तान को कुल 75 करोड़ रुपए देने थे। यह निश्चय किया गया कि जिस दिन (14 अगस्त) पाकिस्तान अस्तित्व में आएगा उस दिन उसे 20
करोड़ रुपए दे दिया जाएगा। जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया तो उसे 20 करोड़ रुपए दे
दिए गए। अतः 20 करोड़ दे देने के बाद 55 करोड़ रुपयों का बक़ाया था। संधि के अनुसार यह तय हुआ था कि बाद के दिनों
में जब पाकिस्तान यह मांग करेगा, उसे यह बक़ाया रक़म दे दिया जाएगा। इस संधि के
हस्ताक्षरकर्ताओं में पटेल और नेहरू भी थे।
उस
समय हमलावरों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण ज़ोरों पर था। इसके अलावा, कई अन्य मुद्दे भी थे, जिनमें से कुछ में भारत और पाकिस्तान के बीच
वित्तीय समायोजन शामिल था, जिसमें
पलड़ा भारत के पक्ष में भारी था। इन मुद्दों पर पाकिस्तान अभी भी टाल-मटोल कर रहा
था। आज़ादी या देश विभाजन के बाद कांग्रेस के
नेताओं ने जन-साधारण को बताया कि शेष राशि का भुगतान तब
किया जाएगा जब भारत और पाकिस्तान के बीच सभी अनसुलझे मुद्दों को सुलझा लिया जाएगा।
न तो इस शर्त को मुसलिम लीग ने कभी माना और न ही यह संधि की शर्तों में शामिल थी। बातचीत
के दौरान पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने चतुराई से कश्मीर के मुद्दे को दबाए रखा और
भारतीय प्रतिनिधियों को उनकी चुप्पी को सहमति समझने दिया। लेकिन जैसे ही वित्तीय
हिस्से पर समझौता दर्ज हुआ, उन्होंने
कश्मीर को अन्य मुद्दों से अलग करना शुरू कर दिया। साथ ही, कश्मीर पर उनका रुख़ भी सख़्त हो गया।
पाकिस्तानियों
ने बड़े ज़ोर-शोर से पचपन करोड़ की मांग शुरू कर दी थी। कश्मीर का विवाद ज़ोरों पर था।
कश्मीर का विवाद जब बढा तो भारत सरकार की कैबिनेट ने यह निर्णय लिया कि जब तक
पाकिस्तान से विवाद का हल नहीं होता इस बक़ाए का भुगतान रोक दिया जाएगा। भारत सरकार
इसे इसलिए भुगतान करने के लिए अनिच्छुक थी क्योंकि यह डर था कि पाकिस्तान सरकार द्वारा
पैसे का इस्तेमाल कश्मीर में भारत के खिलाफ इस्तेमाल के लिए हथियार खरीदने के लिए किया
जाएगा जहां शत्रुता की स्थिति बनी हुई है। गृह मंत्री सरदार पटेल ने इस आशय का एक वक्तव्य
दिया। बात गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंट बेटन तक पहुंची। तकनीकी रूप से वह सरकार का मुखिया था और सरकार
के किसी निर्णय की जिम्मेदारी उसकी बनती थी।
यह
सर्व विदित था कि महात्मा गांधी किसी भी ऐसे निर्णय का कड़ा विरोध करते थे जो भारत
की ओर से विश्वास भंग करने का कारण हो सकता है। मंत्रिमंडल के इस फैसले की क़ानूनी
वैधता चाहे जो हो, गांधीजी को नैतिक रूप से यह उचित नहीं लगता था। 6 जनवरी, 1948
को गांधीजी माउंटबेटन से मिलने गए थे। माउंटबेटन ने इस विषय पर भी गांधीजी से
चर्चा की। गांधीजी ने लॉर्ड माउंटबेटन से पूछा था, “आप इस बारे में क्या सोचते हैं?” उसने कहा, “रुपया न देना भारत सरकार का प्रथम अकीर्तिकर
कार्य हो जाएगा।”
गांधीजी का भी मानना था, “इससे नैतिक स्तर पर सरकार की बदनामी होनी थी। अगर कठिनाई
में नैतिकता छूट जाए तो उस नैतिकता का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए भारत सरकार इस
नैतिक जिम्मेदारी का पालन करे।”
दिल्ली
के कुछ मौलाना जनवरी में गांधीजी से मिलने आए। वे राष्ट्रवादी मुसलमान थे और
उन्होंने भारत छोड़कर जाने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वे इसे गर्व से अपनी मातृभूमि मानते थे। उन्होंने
बहुत हिम्मत और दृढ़ता के साथ सबसे बुरे समय में भी दिल्ली में रहना जारी रखा था।
लेकिन उन्होंने गांधीजी से शिकायत की कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। उनमें से एक
ने उनसे कहा: "आप कब तक उम्मीद करते हैं कि मुसलमान ये छोटी-मोटी परेशानियां
और अपमान सहते रहेंगे? अगर कांग्रेस उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे
सकती, तो उसे साफ-साफ कह देना चाहिए। तब मुसलमान
चले जाएंगे और कम से कम रोज़ के अपमान और संभावित शारीरिक हिंसा से तो बच जाएंगे।
हम खुद पाकिस्तान नहीं जा सकते, क्योंकि
राष्ट्रवादी मुसलमान होने के नाते हम उसके बनने के ही खिलाफ थे। दूसरी ओर, हिंदू हमें राजधानी में रहने नहीं देंगे।
इसलिए, हम भारतीय संघ में भी नहीं रह सकते। अगर आप
यहां हमारी सुरक्षा और सम्मान की गारंटी नहीं दे सकते, तो हमारे लिए इंग्लैंड जाने का इंतज़ाम क्यों नहीं कर देते?"
"आप
खुद को राष्ट्रवादी मुसलमान कहते हैं और ऐसी बातें करते हैं?" गांधीजी ने नाराज़गी भरे लहजे में कहा। लेकिन
उस तीखी बात ने उनके दिल पर गहरी चोट की। यह बर्दाश्त से बाहर की बात थी। उन्होंने
एक दोस्त से कहा, "दिल्ली पर हमारी पकड़ लगातार कमज़ोर होती जा रही है। अगर
दिल्ली हाथ से निकल गई, तो भारत भी हाथ से निकल जाएगा और उसके साथ ही दुनिया में
शांति की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी।"
12
जनवरी की दोपहर को गांधीजी हमेशा की तरह बिड़ला हाउस के बड़े से लॉन में धूप
सेंकते हुए बैठे थे। सोमवार का दिन होने के कारण, जो उनके मौन व्रत का दिन होता था, वे अपनी प्रार्थना सभा का भाषण लिख रहे थे।
जब सुशीला नैयर ने उन पन्नों को देखा जिनका अनुवाद करके उसे शाम की प्रार्थना सभा
में पढ़कर सुनाना था, तो वह हैरान रह गई। वह दौड़ती हुई गांधीजी के सचिव और अपने
भाई प्यारेलाल के पास यह खबर लेकर आई—गांधीजी ने आमरण अनशन शुरू करने का फ़ैसला
किया था, जब तक कि दिल्ली में फैली पागलपन भरी हिंसा
बंद न हो जाए। उन्हें बेबसी महसूस हो रही थी; एक नैतिक चुनौती के सामने ऐसी बेबसी उन्हें
बर्दाश्त नहीं थी। उनकी गहरी पीड़ा से ही उपवास करने का फ़ैसला निकला। इस फ़ैसले
पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी। सरदार पटेल और पंडित नेहरू कुछ ही घंटे पहले उनके
साथ थे। तब उन्होंने उन्हें ज़रा भी भनक नहीं लगने दी थी कि उनके मन में क्या चल
रहा था।
उसी
दिन शाम को उन्होंने आमरण उपवास की घोषणा कर दी।
सरकार
दुविधा में पड़ गई। उसे जब लगा कि बकाया रकम न देने वाला निर्णय ग़लत है, तो इसे
वापस लेना पड़ा और पाकिस्तान को बकाया रकम देने की घोषणा करनी पड़ी। इस घोषणा को इस
तरह पेश किया गया कि सरकार ने गांधीजी के उपवास के कारण अपना निर्णय बदला है।
हिन्दू महासभा ने इस बात को ख़ूब हवा दी। कैबिनेट ने अपना निर्णय गांधीजी के उपवास
के पहले दिन ही ले लिया था, जबकि उसके बाद भी पांच दिनों तक गांधीजी का उपवास चला।
कुछ अतिवादियों के मन में गांधीजी के प्रति नफ़रत भर गया। गांधीजी जब एक ओर देश के
साम्प्रदायिक सौहार्द्र के लिए प्राणों की बाज़ी लगाकर ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहे
थे, उस समय दूसरी तरफ़ हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले लोगों को लग रहा था कि
उनके और उनके सपने के बीच एक व्यक्ति दीवार बनकर खड़ा है – वह है गांधी।
उन्होंने
गांधीजी को जान से मार देने का संकल्प लिया।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर