रविवार, 4 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-32

महात्मा गांधी हत्या केस-32

21 जनवरी, 1948

21 जनवरी को हमले से अविचलित गाँधी जी अपना काम करते रहे। गांधीजी को चेतावनी दी गई थी। लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का हथियारबंद संरक्षण लेने से मना कर दिया था। लेडी माउंटबेटन ने गांधीजी को सलामत बच जाने पर और विस्फोट के समय उनकी शांतिपूर्ण नि:संगतता पर बधाई दी, तो उन्होंने बताया कि वे साहस के लिए किसी प्रशंसा के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने समझा कि वह शोर सेना की रोज़मर्रा की चांदमारी के कारण हुआ था। कुछ लोगों ने जब उन्हें विस्फोट के समय जरा भी न घबराने के लिए बधाइयां दी तो उन्होंने कहा : “सच्ची बधाई के योग्य तो मैं तब होऊंगा जब विस्फोट का शिकार होकर भी मैं मुस्कराता रहूं और हमला करने वाले के प्रति मेरे मन में जरा भी विद्वेष न हो।” गांधीजी ने निवेदन किया कि बम फेंकने वाले के प्रति नफ़रत का रवैया अख़्तियार न किया जाए। उसे समझा-बुझाकर सही रास्ते पर लाया जाए। शायद वह मुझे हिंदू धर्म का दुश्मन मानता है। गांधीजी ने आगे कहा कि नौजवानों को यह समझना चाहिए कि 'जो लोग उनसे अलग राय रखते हैं, वे ज़रूरी नहीं कि बुरे ही हों'। उन्होंने ऐसे नौजवानों के समर्थकों से कहा कि वे अपनी ऐसी हरकतें बंद करें। 'हिंदू धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है। हिंदू धर्म को सिर्फ़ मेरे तरीके से ही बचाया जा सकता है।' सिखों ने गांधीजी से मुलाक़ात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि हमला करने वाला व्यक्ति सिख नहीं था। गांधीजी ने पूछा, "इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि वह सिख था, हिंदू था या मुसलमान? मैं तो सभी हमलावरों का भला ही चाहता हूँ।"

20 जनवरी, 1948 को बिड़ला हाउस में बम धमाके के बाद, बॉम्बे के रामनारायण रुइया कॉलेज के प्रोफ़ेसर जगदीश चंद्र जैन ने बॉम्बे के मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया और उन्हें बताया कि वह मदनलाल की, जो एक ज़रूरतमंद शरणार्थी था, कई तरह से मदद कर रहे थे। उन्हें मदनलाल से ही पता चला था कि गांधीजी की हत्या की साज़िश रची जा रही थी। उन्होंने बी.जी. खेर को कुछ साज़िशकर्ताओं के नाम और कुछ अन्य जानकारियाँ भी दीं। बॉम्बे सरकार ने यह जानकारी सरदार पटेल को दी, जो केंद्र सरकार में गृह मंत्री थे, और साथ ही गांधीजी को भी इसकी सूचना दी।

बॉम्बे से मिली जानकारी के आधार पर, सरदार पटेल सुरक्षा इंतज़ाम कड़े करना चाहते थे। उन्होंने गांधीजी से कहा कि वे चाहते हैं कि पुलिस उनकी प्रार्थना सभाओं में आने वाले हर व्यक्ति की तलाशी ले। लेकिन गांधीजी ने इसके लिए, या प्रार्थना सभाओं में पुलिस की मौजूदगी के लिए, बिल्कुल भी सहमति नहीं दी। उनका मानना ​​था कि जब उन्होंने खुद को पूरी तरह ईश्वर की शरण में सौंप दिया है, तो प्रार्थना के समय किसी भी तरह की इंसानी सुरक्षा लेना उनके विश्वास के खिलाफ़ होगा। अगर वे सरदार के बताए सुरक्षा प्रस्ताव को मान लेते, तो यह उनके विश्वास का मज़ाक उड़ाने जैसा होता। उन्हें अपनी बात पर अड़ा देखकर, सरदार ने जो कुछ भी किस्मत में लिखा था, उसे स्वीकार कर लिया।

हत्या की साज़िश

20 जनवरी को बम फेंकने की ख़बर अगले दिन अख़बारों में छपी। टाइम्स ऑफ इंडिया, द स्टेट्समैन, बॉम्बे क्रॉनिकल में यह ख़बर बैनर शीर्षक से छपी। तब टाइम्स ऑफ इंडिया से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा था, "बम शक्तिशाली था और इससे कई लोगों की जान जा सकती थी। हैंड ग्रेनेड महात्मा गांधी को मारने के लिए था"। बॉम्बे क्रॉनिकल में रिपोर्ट छपी कि मदनलाल पाहवा ने बम फेंकने का गुनाह क़बूल लिया है और कहा कि वह महात्मा गांधी के शांति अभियान से ख़फ़ा था इसलिए उसने हमला किया था। 20 जनवरी, 1948 की बम घटना को गोडसे-आप्टे की अख़बार हिंदू राष्ट्र में प्रमुख स्थान दिया गया और शीर्षक था: गांधीजी की तुष्टिकरण नीति के खिलाफ नाराज हिंदू शरणार्थियों द्वारा दिखाई गई प्रतिनिधि कार्रवाई।

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नाथूराम गोडसे का भाई गोपाल गोडसे पिछली रात दिल्ली के फ़्रंटियर हिन्दू होटल में रुका। 21 जनवरी की सुबह फ़्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिए निकलने का उसने प्लान बनाया था।

सुबह में पुलिस मदनलाल को लेकर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गई। सुबह के समय दो गाड़ियां बंबई के लिए छूटती थीं। आठ बजे फ्रंटियर मेल और नौ बजे पंजाब मेल। गोपाल गोडसे अपनी रिवाल्वर ग्रेनेड के साथ नौ बजे छूटने वाली पंजाब मेल में बंबई जाने के लिए बैठ चुका था। करकरे उसे विदा करने के लिए स्टेशन तक आया था। तृतीय श्रेणी के उस डिब्बे में अपना कपड़े का बैग - जिसमें दोनों रिवॉल्वर और इस्तेमाल न किया गया हैंड ग्रेनेड था - अपनी सीट के नीचे रख दिया था। गाड़ी छूटने में अभी देरी थी, तो वह करकरे के साथ रेलवे कैंटीन में नाश्ता करने चला गया। जब वे चाय पी रहे थे, तो उन्होंने देखा कि दो पुलिस वाले एक आदमी को लेकर आ रहे हैं, जिसने अपना चेहरा भूरे रंग के कंबल में छुपा रखा था, सिर्फ़ उसकी आंखें दिख रही थीं। कंबल हटाए जाने से पहले ही उन्हें पता चल गया था कि वह आदमी मदनलाल है। उन्हें पूरा यकीन था कि उसने उनके नाम बता दिए हैं और उसे उन्हें पहचानने के लिए स्टेशन लाया गया है। वे छिप गए। चाय का कमरा बड़ा था, शायद चालीस फ़ीट लंबा और तीस फ़ीट चौड़ा, और वहाँ ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मदनलाल को चारों ओर अच्छी तरह देखने के लिए कहा गया, जबकि दो पुलिसवाले उसकी आँखों में पहचान के संकेत ढूँढ़ रहे थे। पूरा चक्कर लगाने के बाद, उसने अपना सिर हिलाया। उसे साथ ले जाने वाले पुलिसवालों ने फिर से उसके सिर पर भूरा कंबल डाल दिया और उसे बाहर ले गए। गोपाल ने करकरे से कहा, "यह हमारी किस्मत ही थी कि उसने हमारी तरफ़ नहीं देखा।" लेकिन गोपाल गलत था। जैसे ही मदनलाल के सिर से कंबल हटाया गया, उसने गोपाल और उसके अच्छे दोस्त करकरा सेठ को देख लिया था, लेकिन उसने ऐसा दिखाया जैसे उसने उन्हें देखा ही न हो और वह सीधे देखता रहा। अपनी जाँच पूरी करने के बाद ही उसने सिर हिलाया। वे उसे बाहर ले गए और ट्रेन की बोगियों की तलाशी लेने लगे। पुलिस ने प्लेटफार्म का चक्कर लगाया और मदनलाल को लेकर चली गई। गोपाल ने चैन की सांस ली और ट्रेन में बैठ गया। गाड़ी चल पड़ी। ट्रेन में गोपाल गोडसे के पास सोचने के लिए काफ़ी समय था।

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करकरे होटल गया और वहां से चेक आउट कर गया। वह रेलवे के वेटिंग रूम में दोपहर बाद जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। पुलिस को दिए बयान में करकरे ने कहा था कि वह 20 तारीख की शाम को ही गोपाल से अलग हो गया था। बिड़ला धर्मशाला के बाहर फुटपाथ पर उसने रात गुज़ारी। दूसरे दिन वह हिन्दू महासभा भवन गया और वहां के लोगों से मदनलाल के लिए मदद की गुहार की। पर कोई सामने नहीं आया। फिर वह मदनलाल के रिश्तेदारों के यहां भी गया। दो दिनों तक इधर-उधर भटकने के बाद भी वह कोई मदद नहीं प्राप्त कर सका।

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मदनलाल की गिरफ़्तारी से जो लोग बहुत परेशान हुए थे, उनमें बॉम्बे में उसके प्रोफ़ेसर दोस्त डॉ. जे.सी. जैन भी शामिल थे। रामनारायण रूइया कॉलेज के प्राध्यापक जगदीश चन्द्र जैन ने गांधीजी पर हुए बम हमले की ख़बर सुबह के अख़बार में पढ़ी। तब उन्हें महसूस हुआ कि कुछ दिनों पहले मदनलाल ने खुद को एक गैंग में शामिल होने की जो बात कही थी, जो गांधीजी को मारना चाहता है, वह सच थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक दुर्घटना के कारण डॉ. जैन पाहवा की मुलाक़ात जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए। जैन के कई दोस्तों को पता था कि वे मदनलाल को जानते हैं, और कम से कम एक दोस्त, अंगद सिंह को यह भी पता था कि मदनलाल ने उनसे इशारा किया था कि वे गांधीजी की हत्या की साज़िश में शामिल हैं। जैन ने इस जानकारी के बारे में पुलिस को कोई सूचना नहीं दी थी, और उन्हें यह एहसास ज़रूर हुआ होगा कि अगर मदनलाल ने अपने बयान में इस बारे में कुछ भी कहा, तो उनकी अपनी चुप्पी उन्हें मुश्किल में डाल सकती है। जैन चालीस साल के थे। उनके पास हिंदी में Ph.D. की डिग्री थी और वे एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। इस तरह, वे पढ़े-लिखे और अच्छे सामाजिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति थे, जो एक नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते थे। शुरू में मदनलाल की बातों को किसी शरणार्थी की डींगें मानकर नज़रअंदाज़ कर देना पूरी तरह से समझ में आने वाली बात है। लेकिन अब, मदनलाल के पकड़े जाने के बाद, जैन जानते थे कि जो कुछ उन्होंने सुना था, उसके बारे में किसी ज़िम्मेदार अधिकारी को बताना उनका साफ़ फ़र्ज़ है। फिर उन्हें यह डर भी लगा कि शिवाजी पार्क हिन्दू महासभा का गढ़ है, बाद में उनकी जान को खतरा भी हो सकता है।

आमतौर पर उन्हें रिपोर्ट करने के लिए सबसे पास के पुलिस स्टेशन जाना चाहिए था, लेकिन डॉ. जैन एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कान्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। उन्होंने बंबई के  मुख्यमंत्री बी.जी. खेर से संपर्क किया। मुख्यमंत्री कहीं बाहर जा रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वे उनके गृह मंत्री मोरारजी देसाई से संपर्क करें। जैन साहब शाम के 4.00 बजे मोरारजी देसाई के कार्यालय में गए और उनको मदनलाल से 11 और 14 जनवरी को हुई बातचीत के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि मदनलाल उनका परिचित था और वह गांधीजी की हत्या के षडयंत्र की बात करता था। उन्होंने मदनलाल के साथियों के नाम खासकर करकरे सेठ के बारे में भी बताया। यह भी कहा कि करकरे सेठ और मदनलाल की सावरकर से मीटिंग भी हुई थी। उसने अपना नाम गुप्त रखने का निवेदन भी किया। जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद अँग्रेज सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई  उनसे संतुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे। मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया। मोरारजी के पास पुलिस विभाग भी था, और अपने विभाग के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए उन्हें जैन से अपनी बात पुलिस को बताने के लिए कहना चाहिए था; कम से कम उन्हें यह सावधानी तो बरतनी ही चाहिए थी कि जैन जो कह रहे थे, उसका कोई रिकॉर्ड बनवा लें। इसके बजाय, उन्होंने जैन की बात गुप्त रूप से सुनी और हैरानी की बात है कि वे जैन की इस बात पर भी सहमत हो गए कि जानकारी का स्रोत 'पुलिस को भी न बताया जाए'। इसका एक नतीजा यह हुआ कि बाद में जैन और मोरारजी दोनों को इस बातचीत में कही गई बातों को याद करने के लिए पूरी तरह से अपनी याददाश्त पर निर्भर रहना पड़ा।

फिर भी  शाम के करीब 5 बजे जैन के चले जाने के बाद गृह मंत्री मोरारजी देसाई ने बॉम्बे के इंटेलिजेंस ब्रांच के इंचार्ज डिप्टी कमिश्नर, जमशेद डोराबजी नागरवाला (जिम्मी) को गुजरात मेल में बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर शाम 8.30 बजे गुजरात मेल में आकर मिलने के लिए कहा। वे अहमदाबाद जा रहे थे। जमशेद दोराब नागरवाला को उनके दोस्त 'जिमी' कहते थे। उनमें अपनी नौकरी से जुड़े अच्छे गुण भी थे और कमियाँ भी। वे 34 साल के थे, लंबे-चौड़े और मज़बूत शरीर वाले थे; गोल चेहरे पर बड़ी-बड़ी गोल आँखें थीं, जिससे उनका चेहरा ऐसा नहीं लगता था कि वे सख़्ती दिखा सकें या अपराधियों को डरा सकें। वे पूरी तरह से अपने काम के प्रति समर्पित थे और उससे मिलने वाली ताक़त का आनंद लेते थे। उनके नीचे काम करने वाले लोग उन्हें बहुत मानते थे और उनके ऊपर के अधिकारी उन पर भरोसा करते थे। वे मोरारजी देसाई के प्रति भी पूरी तरह वफ़ादार थे, जो उन्हें अपना खास चहेता मानते थे, या कम से कम उन्हें अपना सबसे बेहतरीन पुलिसवाला समझते थे।

बंबई सेंट्रल पर जिम्मी नागरवाला आए तो देसाई ने उन्हें जैन का बिना नाम लिए सारी बातें बताई और जांचकर करकरे को गिरफ़्तार करने का हुक्म दिया साथ ही सावरकर पर नज़र रखने के लिए कहा तथा साज़िश रचने वालों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी इकट्ठा करें। उन्होंने यह भी कहा कि अहमदाबाद में वे देश के गृहमंत्री सरदार पटेल से मिलेंगे और उन्हें सारी बातों की जानकारी देंगे।

नागरवाला ने उस इन्फोर्मेशन के स्रोत के बारे में जानने की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बस उसने शिवाजी पार्क स्थित सावरकर सदन के बाहर दो सादी वर्दी वाले पुलिस तैनात कर दिए। उसने अगर एक नज़र अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र अख़बार पर डाल ली होती, या पूना पुलिस से जानकारी हासिल कर ली होती, तो उसे उसके संपादक और प्रकाशक का नाम मालूम हो गया होता। करकरे सेठ का नाम दो-दो स्रोतों से आ रहा था, लेकिन उसने उसके बारे में भी अधिक तहकीक़ात नहीं की। अहमदनगर पुलिस से संपर्क न करके नागरवाला ने अपने भाई से संपर्क किया, जो वहां का मानद मजिस्ट्रेट था। दूसरे दिन उसके भाई ने बताया कि करकरे अहमदनगर में नहीं था। पता नहीं क्यों षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न मोरारजी देसाई को थी और न पुलिस को।  पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई ही न हो। गाँधीजी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधीजी से कोई मतलब ही न हो। अगर 21 जनवरी को बॉम्बे के गृह मंत्री मोरारजी देसाई को डॉ. जैन ने जो बातें बताई थीं, उन पर सही समय पर ध्यान दिया गया होता, तो शायद 30 जनवरी को होने वाली त्रासदी टाली जा सकती थी। 21 जनवरी को, जैन ने बॉम्बे के गृह मंत्री को बताया कि गांधीजी की हत्या की साज़िश रची जा रही थी और इसमें मदनलाल के अलावा, अहमदनगर में रहने वाला करकरे नाम का एक व्यक्ति भी शामिल था।

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मदनलाल पाहवा को 21 जनवरी को 15 दिन के रिमांड पर लिया गया। संसद मार्ग पुलिस थाना से पाहवा को सिविल लाइंस लाया गया और 24 जनवरी तक पूछताछ चली।

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सुबह में आप्टे और नाथूराम कानपुर स्टेशन पहुंचे और विश्रामालय में चेक इन किया। रजिस्टर में नाथूराम ने अपना असली नाम लिखा। उसने अख़बार पर नज़र दौड़ाई और राहत की सांस ली कि पुलिस को मदनलाल के किसी अन्य साथी नाम बम कांड में नहीं आया है। 11.30 बजे की लखनऊ-झांसी ट्रेन से वे झांसी आए और वहां से दिल्ली-बंबई पंजाब मेल पकड़ा।

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इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और आई.जी. पुलिस टी.जी. संजीवी, जिन्हें जांच का प्रभार दिया गया था, ने दिल्ली पुलिस के दो अधिकारी जसवंत सिंह, डी.एस.पी. और बालकिशन, इंस्पेक्टर, को 21 तारीख की शाम में विमान से बंबई के लिए प्रस्थान के आदेश दिए। इन अधिकारियों को बंबई के डी.सी.पी. जे.डी. नागरवाला को मदनलाल के इकबालिया बयान से अवगत कराना था। उसके बाद उन्हें पूना जाकर डी.आई.जी. पुलिस, सी.आई.डी., रावसाहेब गुर्टू को मदनलाल के इकबालिया बयान की कॉपी सौंपनी थी।

 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 


शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 18. सूफ़ी साधना की स्थितियां

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

18. सूफ़ी साधना की स्थितियां 

“हे मनुष्यों! हमने तुमको एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और फिर तुममें शाखाएं और सम्प्रदाय (जातियाँ तथा प्रजातियाँ ) निश्चित किए ताकि तुम आपस में एक-दूसरे को पहचान सको। निश्चय ही तुममें से वह व्यक्ति ईश्वर को प्रिय है जो अधिक सदाचारी है।” (क़ुरआन : 49/13)

सूफ़ी मत के अनुसार इंसान के अंदर फ़रिश्ते और हैवान, दोनों तरह की प्रवृत्तियां हैं। आदमी के पीछे हैवान हैं और उसके आगे फ़रिश्ते। जो पाशविक वृत्ति इंसान को हैवानियत की तरफ़ खींचती है उसे नफ़्स (वासनामय आत्मा, काम वासना) कहा जाता है। सूफ़ी संत और तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) के विद्वान यह मानते हैं कि नफ़्स (अहंकार या निचले स्तर की प्रवृत्तियों) को शारीरिक रूप से मारना या समाप्त करना नहीं चाहिए, बल्कि उसे अनुशासित करके उस पर क़ाबू पाना और उसका शुद्धिकरण (तज़्कीया) करना चाहिए। सूफ़ी परंपरा के अनुसार नफ़्स कोई बाहरी राक्षस या ऐसी चीज़ नहीं है जिसे ख़त्म कर दिया जाए, बल्कि यह इंसान के वजूद का हिस्सा है जिसमें सुधार की गुंजाइश होती है। असली बहादुरी अपनी इच्छाओं को पूरी तरह नष्ट करने में नहीं, बल्कि गुस्से, लालच और अहंकार जैसे विकारों पर नियंत्रण पाने में है। नफ़्स की सिफ़तों (विशेषता) की वजह से ही इंसान का जीवन चलता है और वह तरक्क़ी करता है। वह अपनी आत्मा को शुद्ध करने से, परिष्कार करने से, क़ाबू में आ सकता है। आत्म-परिष्कार के लिए साधना करनी होती है। इस साधना में कई मकाम से गुज़रना होता है।

आर. ए. निकोलसन ने “मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम” में ‘नफ़्स’ की भौतिकता और उसकी प्रकृति को समझाने के लिए हज़रत मुहम्मद बिन इल्यान रह. नाम के एक सूफ़ी की बड़ी ही रोचक कहानी का ज़िक्र किया है। इस किताब के 'द पाथ' (The Path) अध्याय में नफ़्स का ज़िक्र करते हुए निकोलसन ने इस घटना को लिखा है।

एक दिन हज़रत मुहम्मद बिन इल्यान रह. के गले से लोमड़ी के बच्चे जैसा एक जानवर बाहर कूद गया। ईश्वर (अल्लाह) ने उन्हें आत्मज्ञान दिया कि यह कोई और नहीं बल्कि उनका अपना 'नफ़्स' है। हज़रत इल्यान रह. ने उस जानवर को ठोकर मारी। जानवर की आकृति का वह जीव बड़ा हो गया। उन्होंने फिर ठोकर मारी वह और बड़ा हो गया। यह बार-बार होता रहा। हर ठोकर के साथ वह जानवर और बड़ा होता गया। हैरानी से हज़रत इल्यान  ने उससे पूछा, “दुनिया की सारी चीज़ें तो पीटने से दबती हैं, तुम बढ़ते कैसे जाते हो?”

नफ़्स ने जवाब दिया, “क्योंकि मुझे पैदा ही उल्टा (Perverse) किया गया है।  दूसरों के लिए जो दर्द है, मेरे लिए वह मज़ा है। इसी तरह जो दूसरों के लिए मज़ा है, मेरे लिए वह दर्द है।” 

निकोलसन इस कहानी के ज़रिए यह समझाते हैं कि नफ़्स को सीधे तौर पर दबाने या उस पर हिंसक रूप से प्रहार करने से वह और अधिक विद्रोही और मज़बूत हो जाता है। यह कहानी इस बात का सटीक उदाहरण है कि सूफ़ी परंपरा में नफ़्स को नष्ट करने के बजाय आध्यात्मिक साधना और आत्म-नियंत्रण से साधने पर क्यों ज़ोर दिया जाता है। इसी अध्याय में वे आगे बताते हैं कि कई अन्य सूफ़ियों ने भी अपने नफ़्स को सांप, कुत्ते या चूहे के रूप में देखा है। यह भी कहा गया है कि हज़रत मंसूर हल्लाज रह. का नफ़्स उनके पीछे कुत्ते के रूप में दौड़ता था। आर. ए. निकोलसन ने अपनी किताब The Mystics of Islam में इस घटना का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है: “हल्लाज का नफ़्स उनके पीछे एक कुत्ते के रूप में दौड़ता हुआ देखा गया था”। सूफ़ी साहित्य (जैसे फ़रीदुद्दीन अत्तार की तज़्किरातुल औलिया) में इस घटना और इसके पीछे के गहरे रूहानी संदेश को एक बेहद दिलचस्प प्रसंग के ज़रिए समझाया गया है। एक बार लोगों ने हज़रत मंसूर हल्लाज रह. को देखा कि वे कहीं जा रहे हैं और एक कुत्ता उनके पीछे-पीछे चल रहा है। सूफ़ी संतों ने अपनी आत्मिक दृष्टि (बसीरत) से पहचान लिया कि वह कोई आम कुत्ता नहीं, बल्कि मंसूर का 'नफ़्स' है जो उनके नियंत्रण में आ चुका है। जब लोगों ने इस पर हैरानी जताई, तो सूफ़ियों ने इसकी गहराई समझाते हुए कहा, "मंसूर हल्लाज का कुत्ता (नफ़्स) उनके वश में है, इसलिए वह उनके बाहर आ चुका है और उनके पीछे-पीछे गुलाम की तरह दौड़ता है। जबकि आम दुनियावी लोगों का कुत्ता (नफ़्स) उनके अंदर छिपा बैठा है और इंसान खुद उस कुत्ते के पीछे-पीछे भागता है।" मंसूर हल्लाज की यह कहानी इसी बात का प्रमाण है कि उन्होंने कड़ी आध्यात्मिक साधना (मुजाहिदा) के ज़रिए अपने नफ़्स को इस हद तक काबू और वश में कर लिया था कि वह उनके अधीन एक आज्ञाकारी जानवर की तरह दिखने लगा था। सूफ़ियों को ये अनुभूतियां उन्हें अपनी रूहानी आंख से नज़र आती हैं। इनका कोई भी संबंध प्रत्यक्ष जगत से नहीं होता। 

कहने का मतलब यह है कि अल्लाह की ओर सफ़र के दौरान नफ़्स को क़ाबू में करना होता है और इसके दौरान साधकों को कई मकामात तय करने होते हैं। सूफ़ी विचारक हज़रत अत्तार रह. ने सूफ़ी साधना के सात मक़ामात (अवस्थाएं) बताए हैं।

15.1. उबूदियत – यानी दास्य-भाव। इसमें साधक अपने ह्रदय को पवित्र करने में लगा रहता है, जिससे कि वह साधना के मार्ग पर आगे बढ़ सके।  जब साधक को तलब यानी ईश-अन्वेषण की त्वरा होती है तो वह ख़ुद को प्रभु का दास मानकर उसकी खोज की यात्रा शुरु करता है। फ़क़्र (ग़रीबी) व दास्य-भाव उसके हृदय के कलुष को धो देता है। उसका मन अकलुष हो जाता है। इससे उसका मन अपने प्रिय की छवि का ज़िक्र (स्मरण, शाब्दिक मौन जाप)  करने के योग्य हो जाता है।

15.2. इश्क़ – परम प्रिय की छवि का फ़िक्र (ध्यान) कर उसके भीतर प्रेम भाव उदित होता है।  मारिफ़त (ज्ञान) के रास्ते जब सालिक चल पड़ता है, तो उसे गहरी अनुभूति का ज्ञान हासिल होता है और उसका भावावेगमय रूप इश्क़ है। फिर वह प्रभु के इश्क़ (प्रेम) के मार्ग पर चल देता है। इस स्थिति में आकर सालिक अपने आपको क्रमश: विस्मृत करने लगता है. इस तरह साधना के द्वारा वह ‘हाल’ (तन्मयता) की स्थिति में पहुंच जाता है। उसे अपने तन-बदन की सुध-बुध नहीं रहती।

15.3 जुहद – अर्थात इंद्रिय-निग्रह, विरक्ति। ईश-प्रेम के मार्ग पर बढ़ने के लिए विषय-वासना का त्याग ज़रूरी है। यह संयम और इच्छा-कामनाओं के त्याग द्वारा ही संभव है। इसमें सांसारिक इच्छाओं का अवसान हो जाता है.

15.4 मारिफ़त – अर्थात दिव्यज्ञान। जुहद के द्वारा वह दिव्यज्ञान प्राप्त करता है और परमात्मा के गुणों, स्वभाव और कर्म पर पूर्ण ध्यान लगाता है।

15.5 वज्द – मारिफ़त के द्वारा साधक वज्द अर्थात भावाविष्टावस्था को प्राप्त करता है। यह उन्माद की स्थिति है. उसमें इस्तिग़ना यानी स्वतंत्र-चिंतन का विकास होता है। फिर वह उसके साथ एकत्व को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

15.6 हक़ीक़त – सत्य का वास्तविक ज्ञान होना। तौहीद (एकेश्वरवाद) की इस अवस्था में जब उसे सत्य का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है तो तवक्कुल (उस पर पूरी तरह निर्भरता) और रिज़ा (संतुष्टि) की प्राप्ति होती है।

15.7 वस्ल – अर्थात ईश-मिलन। अध्यात्म मार्ग की यात्रा का अंतिम चरण है जब वह ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल होता है। तब वह हैरत या ईश्वरीय सौंदर्य से अभिभूत हो जाता है। फिर तो वह फ़करो-फ़ना यानी पूर्ण अपरिग्रह व्रत द्वारा ईश्वर के प्रति पूर्ण-रूपेण समर्पित हो जाता है।

15.8 फ़ना व बक़ा की स्थिति

इसके बाद फ़ना (अहं की समाप्ति) व बक़ा (तद्‌रूप होने की स्थिति) की स्थिति आती है जहां सालिक (साधक) का व्यक्तित्व भाव रूप में परमात्मा में विलीन हो जाता है। महामिलन के इस क्षण में आत्मा अपने मूल, अपने उद्गम, अपने स्वामी,  अपने परम-प्रिय में विलीन होकर अपना व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त कर देती है। सूफ़ियों ने इसी अवस्था को फ़ना (विलय) कहा है। इस हालत में उसे ज़र्रे-ज़र्रे में ख़ुदा के नूर का ज़हूर दिखता है। अब तो वह ईश्वर के हक़ (सत्य), जमाल (सौंदर्य), जलाल (गौरव) और कमाल (पूर्णता) से मंडित हो जाता है।

परम तत्व में विलय के बाद आत्मा को एक नया जन्म प्राप्त होता है अर्थात्‌ अब वह अभिन्न रूप से अपने स्रष्टा में निवास करती है। इस अवस्था को ‘बक़ा’ (अनश्वरता, नित्यता) कहा जाता है।  जो इस मक़ाम पर पहुंच जाता है उसे इन्सानुल कामिल (पूर्ण मनुष्य) कहा जाता है। अब तो उसे इस जामे शराब में यार का अक्स नज़र आता है। इसका नशा हमेशा उस पर छाया रहता है। उसे अपने महबूब के अलावा कुछ नहीं दिखता। उसके अंदर एक ज्वाला प्रस्फुटित होती है, इश्क़ (प्रेम) वह आग है, जो महबूब (प्रियतम/ईश्वर) के अलावा बाकी सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है। – “अल इश्क़ु नारुन् यह्रिक़ु मा सिवा अल महबूब” सूफी मत में दिव्य प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) को एक तीव्र आग माना गया है। जब यह आग किसी साधक (सालिक) के दिल में भड़कती है, तो यह भीतर की तमाम परतों को प्रभावित करती है। वह सब कुछ जो ईश्वर नहीं है—जैसे कि इंसान का अहंकार (अना), सांसारिक इच्छाएं, लोभ, मोह, धन-दौलत का लालच और यहाँ तक कि खुद का अस्तित्व भी। यह आग इन सभी सांसारिक बंधनों को जला डालती है। जब आग सब कुछ जला देती है, तो अंत में केवल वही बचता है जो जल नहीं सकता। सूफी साधना में वह तत्व केवल 'महबूब' (परमात्मा) है। इसका अर्थ यह है कि इस अवस्था में साधक के दिल में ईश्वर के अलावा किसी और की जगह नहीं रह जाती।

सूफ़ी साहित्य में मैख़ाना, शराब, रिंद और साक़ी शब्दों का ख़ूब प्रयोग किया गया है। ये शब्द प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति अपने अगाध प्रेम और आध्यात्मिक अनुभवों को व्यक्त करने के लिए इन रूपकों का सहारा लिया, जिन्हें बाहरी तौर पर देखने पर सांसारिक वासना या नशा समझा जा सकता है, लेकिन इनका आंतरिक अर्थ बेहद पवित्र और अलौकिक है। मय यानी शराब का प्रयोग प्रगाढ़ प्रेम के प्रतीक के रूप में किया गया है। यह अंगूर के रस से बनने वाली नशीली शराब नहीं है, बल्कि ईश्वरीय प्रेम का रस (इश्क़-ए-हक़ीक़ी का नशा) है। यह वह रूहानी ज़हर या अमृत है जिसे पीकर साधक दुनियावी सुध-बुध भूल जाता है।

मयख़ाना यानी शराब पीने की जगह का प्रयोग प्रेम-स्थल के रूप में हुआ है। यह शराब पीने का अड्डा नहीं है, बल्कि 'इबादतगाह' (प्रार्थना स्थल), गुरु का आश्रम, या साधक का अपना दिल है, जहाँ रूहानी महफ़िल जमती है और ईश्वरीय ज्ञान की चर्चा होती है।

साक़ी यानी शराब पिलाने वाला का मार्गदर्शक के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। आम तौर पर साक़ी का मतलब शराब परोसने वाला होता है, लेकिन सूफ़ी साहित्य में साक़ी 'मुरशद' (आध्यात्मिक गुरु) या स्वयं 'ईश्वर' (परमात्मा) को कहा जाता है, जो साधक के दिल के प्याले में ईश्वरीय प्रेम की शराब भरता है।

रिंद का अर्थ है वह 'सच्चा साधक' या प्रेमी (सालिक) जो ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह डूब चुका है। दुनिया की नज़रों में वह मतवाला या पागल (मस्त) हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से वह सबसे जागृत व्यक्ति होता है। आशिक़ यानी प्रेमी सूफ़ी साधक के प्रतीक के रूप में और प्रियतम ईश्वर के रूप में। आशिक़ सूफ़ी काशिफुल हिजाबात (अज्ञान के परदे का उठ जाना) को प्राप्त करता है। और उसे ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने “नफ़्स—अम्मारा” (अहं‌ को नष्ट कर देना) किया था।

पैमाना (या जाम/प्याला) शराब पीने का पात्र नहीं, बल्कि साधक का दिल (हृदय) है, जिसकी पवित्रता और क्षमता के अनुसार साक़ी उसमें प्रेम का रस ढालता है।

सूफ़ियों ने इन प्रतीकों को क्यों चुना? चूँकि ईश्वर से मिलन के आनंद और उस परम शांति को सांसारिक या किताबी शब्दों में समझाना असंभव था, इसलिए सूफ़ी संतों ने दुनिया के सबसे तीव्र अनुभवों—जैसे प्रेम, नशा और दीवानगी—के शब्दों को चुना ताकि वे रूहानी मस्ती की उस अवस्था को आम इंसानों को समझा सकें। प्रसिद्ध सूफ़ी संत उमर ख़ैयाम, हाफ़िज़ शिराज़ी और अमीर ख़ुसरो की रचनाओं में ये प्रतीक प्रमुखता से दिखाई देते हैं।

सूफ़ी साहित्य के इन प्रतीकों को और गहराई से समझने के लिए आइए अमीर ख़ुसरो और बाबा बुल्ले शाह दोनों की एक-एक बेहद प्रसिद्ध रचना को देखते हैं, जहाँ इन शब्दों का जीवंत आध्यात्मिक उपयोग हुआ है। हज़रत अमीर ख़ुसरो की कालजयी रचना "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके" उनके गुरु (मुरशिद) हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रति समर्पित है। इस कलाम की दो पंक्तियाँ इन प्रतीकों को बहुत सुंदर ढंग से स्पष्ट करती हैं,

"प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।
हरी-हरी चूड़ियाँ गोरी-गोरी बइयाँ, कलाई पकड़ लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।"

यहाँ 'मदवा' (शराब/मदिरा) किसी अंगूर का रस नहीं है, बल्कि गुरु के दिव्य प्रेम और ज्ञान का रस है। 'प्रेम भटी' वह आध्यात्मिक पाठशाला या गुरु का सानिध्य है जहाँ यह प्रेम रूपी मदिरा तैयार होती है। ख़ुसरो कहते हैं कि गुरु ने उन्हें अपने ज्ञान और प्रेम की ऐसी शराब पिलाई है कि वे दुनियावी मान-सम्मान, अहंकार और होश-ओ-हवास खोकर पूरी तरह ईश्वर के रंग में रंग गए हैं (फ़ना हो गए हैं)। यहाँ गुरु स्वयं साक़ी की भूमिका में हैं।

बाबा बुल्ले शाह पंजाब के एक ऐसे बेबाक सूफ़ी संत थे जिन्होंने रूढ़िवादी मुल्ला-मौलवियों की परवाह न करते हुए रूहानी मस्ती को खुलकर गाया। उनकी प्रसिद्ध कृति "इक रांझा मैनु लोड़िंदा" की पंक्ति को देखिए

"पी शराब ते खा कबाब, बाळ बालन दे विच अग्ग

चोरी कर ते भन्न घर रब्ब दा, उस ठगबाज़ नूं ठग्ग।"

यदि कोई इसका शाब्दिक अर्थ निकाले तो लगेगा कि बुल्ले शाह शराब पीने, कबाब खाने, आग लगाने और चोरी करने के लिए कह रहे हैं। यही कारण था कि उस दौर के कट्टरपंथी उनसे नाराज़ रहते थे। जब इसका आंतरिक और वास्तविक सूफ़ी अर्थ देखते हैं, तो हम पाते हैं कि अपने भीतर ईश्वरीय प्रेम का ऐसा नशा पैदा करो कि तुम्हें दुनिया की कोई और चीज़ दिखाई न दे। अपने अहंकार (नफ़्स) और बुरी इच्छाओं के मांस को भूनकर नष्ट कर दो। अपने भीतर के सारे सांसारिक मोह-माया, पाखंड और झूठी पवित्रता की लकड़ियों में ईश्वरीय विरह की आग लगा दो। उस परमात्मा को, जो स्वयं सब कुछ जानने वाला परम चतुर (ठगबाज़) है, अपने निश्छल और बेइंतहा प्रेम से जीत लो (यानी उसे अपने दिल में चुरा लो)। दोनों ही संतों की रचनाओं से यह साफ़ होता है कि सूफ़ी मत में 'मस्ती' साधना का मुख्य अंग है। जब एक सूफ़ी कहता है कि वह मैख़ाने में बैठा है, तो इसका अर्थ है कि वह अपने गुरु की महफ़िल में ईश्वरीय चर्चा में लीन है, जहाँ गुरु रूपी साक़ी अपनी नज़रों से प्रेम की शराब परोस रहा है।

“तसव्वुफ़” या सूफ़ी मत प्रेमोपासना द्वारा अद्वैत-स्थिति की प्राप्ति के सिद्धांत का प्रतिपादक है। ईश्वर के प्रति अपने चित्त में प्रगाढ़ प्रेम जागृत कर ब्रह्म-स्वरूप हो जाना सूफ़ी साधकों (सालिक) का लक्ष्य होता है। सूफ़ीमत के अनुसार इंसान के जीवन का उद्देश्य यही यात्रा है। इस रूहानी सफ़र में इंसान के जिस्म में जितने भी लतीफ़े अर्थात चक्र हैं, जैसे कि नफ़्स, क़ल्ब, रूह, सिर्र, ख़फ़ी, अख़्फ़ा,  वे सभी अल्लाह के ज़िक्र से ज़ारी हो जाते हैं। ये लतीफ़े सोने की हालत में भी ज़िक्र करते रहते हैं और सूफ़ी के मरने के बाद भी। इनकी गतिशीलता देखकर नब्ज़ देखने वालों को यही गुमान होता है कि सूफ़ी ज़िन्दा है। सूफ़ी की मौत की तसदीक उसके ख़लीफ़ा या उसके स्तर के दीगर सूफ़ी करते हैं। तभी उसे दफ़नाया जाता है।

ईश्वर को पाना आसान है, बस एक इंसान को ख़ुद को उसे पाने लायक बनाना मुश्किल होता है। आध्यात्मिकता कोई धार्मिक कर्मकांड, रीति-रिवाज़ नहीं है, यह तो एक अहसास है कि ईश्वर हर कण में मौज़ूद है। हमारे अंदर है। हमारे पास है। सूफ़ीमत उस परम सत्ता का गुणगान करता है और इश्क़ के ज़रिए उसे पाने का रास्ता बताता है। इस तरह हम पाते हैं कि सूफ़ीमार्ग का लक्ष्य ईश्वर की ओर बढ़ना और उसके गुणों को आत्मसात करना है। सूफ़ी साधक परमात्मा को प्रेम और सौंदर्य का रूप मानता है, इसलिए इश्क़े-मजाज़ी को इश्क़े-हक़ीक़ी का साधन समझता है। मतलब वह लौकिक प्रेम भी करता है। सूफ़ी विचारकों के अनुसार लौकिक या शरीरी प्रेम अलौकिक या अशरीरी प्रेम की साधना की सीढ़ी का पहला पायदान है।

मा ताब अज़ इश्क़ रूए गरचे मजाज़ी सत

कि आन बहर हक़ीक़त कारसाज़ी सत। (ज़ामी)

अर्थात्‌ "प्रेम के मार्ग से कभी अपना चेहरा मत मोड़ो, चाहे वह सांसारिक (मानवीय) प्रेम ही क्यों न हो; क्योंकि यही प्रेम आगे चलकर उस परम सत्य (ईश्वरीय प्रेम) के समुद्र तक पहुँचने का जरिया और माध्यम बनता है।" सूफ़ी संतों का मानना है कि एक साधारण इंसान के लिए सीधे निराकार ईश्वर से लौ लगाना या दिव्य प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) को समझना बहुत कठिन है। इसलिए, इश्क़-ए-मजाज़ी (किसी इंसान से किया गया प्रेम) पहली सीढ़ी है। जब कोई व्यक्ति किसी इंसान से सच्चा प्रेम करता है, तो उसके भीतर से अहंकार, स्वार्थ और 'मैं' की भावना खत्म होने लगती है। वह किसी दूसरे के लिए झुकना और त्याग करना सीखता है। जब साधक का दिल सांसारिक प्रेम में पूरी तरह तड़पकर शुद्ध हो जाता है, तो सूफ़ियों के अनुसार, उसका यही लौकिक प्रेम धीरे-धीरे अलौकिक यानी ईश्वरीय प्रेम में तब्दील हो जाता है। बशीर अहमद मयूख ने अपने आलेख “इस्लामी रहस्यवाद और भक्ति-धारा का संगम” में कहा है कि “आधुनिक भारतीय रहस्यदर्शी ओशो रजनीश भी इसी पक्ष के प्रवक्ता हैं।” वे इस आलेख में समझाते हैं कि जिस प्रकार सूफ़ी संत सांसारिक प्रेम से ईश्वरीय प्रेम (इश्क़-ए-मजाज़ी से इश्क़-ए-हक़ीक़ी) की यात्रा को सही ठहराते हैं और जीवन के हर रंग को उत्सव के रूप में देखते हैं, आधुनिक काल में ओशो रजनीश भी ठीक इसी दर्शन और दृष्टिकोण के बड़े पुरोधा रहे हैं।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

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