मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

445. विभाजन की प्रस्तावना - डायरेक्ट एक्शन डे

राष्ट्रीय आन्दोलन

445. विभाजन की प्रस्तावना - डायरेक्ट एक्शन डे

1946

देश की अस्थिर और उलझी हुई राजनीतिक परिस्थिति

कैबिनेट मिशन के चले जाने के बाद देश की राजनीतिक परिस्थिति अस्थिर और उलझी हुई थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली सत्ता का हस्तांतरण शीघ्र और शांतिपूर्वक करना चाहता था। इसके लिए समझौता और विचार-विमर्श ज़रूरी था। लेकिन कांग्रेस और लीग मिलकर जो भी व्यावहारिक हल पेश करते वह एटली को स्वीकार नहीं होता। दरअसल, भारत में ब्रिटिश शासन के अंतिम दो वर्षों के दौरान ब्रिटिश, कांग्रेसी और लीगी नेताओं के बीच अत्यंत धीमी गति से बातचीत होती रही और साथ ही साथ संप्रदायिक हिंसा बढ़ती गई। इसकी चरम परिणति हुई उस स्वाधीनता में जिसके साथ दुखद विभाजन भी जुड़ा हुआ था। उस समय की इस तरह की उलझी हुई परिस्थिति को समझने के लिए जनआंदोलनों के चलते नीचे से पड़ने वाले दबावों को ध्यान में रखना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जन-आंदोलनों ने भारत में ब्रिटिश राज का चलते रहना असंभव कर दिया था। जन-आंदोलनों में होनेवाली ज़्यादतियों के भय ने कांग्रेसी नेताओं को बातचीत और समझौते की नीति पर ही चिपके रहने और अंततः स्वतंत्रता की क़ीमत के रूप में विभाजन तक को भी स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था।

पंचगनी में

लगभग तीन महीने तक लगातार काम करने के बाद, गांधीजी 13 जुलाई, 1946 को गर्मियों के दिन बिताने पंचगनी पहुंचे। पिछले कुछ वर्षों से वह यही करते आए थे। गर्मी के दिनों में पहाड़ों के बीच समय बिताने से उनका स्वास्थ्य बना रहता था। वहां वह 10-12 मील पैदल चला करते थे। जंगल से लकड़ियां बीनते और ख़ुद ही रोटी भी सेंक लेते थे। पोस्टल स्ट्राइक की वजह से, हिल-स्टेशन पर रहने के पहले हफ़्ते में रोज़ाना आने वाले मेल बैग से कुछ राहत मिली। अगस्त के दूसरे सप्ताह में उन्होंने सेवाग्राम लौट जाने का निश्चय किया।

साम्प्रदायिक दंगे - डायरेक्ट एक्शन डे

पूरब के आसमान पर भारतीय स्वतंत्रता की खून भरी सुबह का आगाज़ हुआ लीग काउंसिल की मीटिंग हुई और 29 जुलाई को उसने कैबिनेट मिशन के 16 मई के प्लान को अपनी पिछली मंज़ूरी वापस ले ली। उसने आगे पाकिस्तान बनाने के लिए "डायरेक्ट एक्शन" शुरू करने और "ज़रूरत पड़ने पर आने वाले संघर्ष के लिए मुसलमानों को इकट्ठा करने" का फ़ैसला किया। जिन्ना ने 16 अगस्त को डायरेक्ट एक्शन डे घोषित किया, लेकिन उसने यह साफ नहीं किया कि प्रोग्राम क्या होगा। आम तौर पर यह सोचा गया कि डिटेल्स पर काम करने के लिए मुस्लिम लीग काउंसिल की एक और मीटिंग होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

जिन्ना ने अपने भाषणों में ऐलान किया कि पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए हर तरह का संघर्ष किया जाएगा। "डायरेक्ट एक्शन" प्रस्ताव पास होने के तुरंत बाद, मुस्लिम लीग की काउंसिल के आखिरी सेशन में जिन्ना ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ऐलान किया: "आज हम संवैधानिक तरीकों को अलविदा कहते हैं।" और फिर: "हमने एक पिस्तौल भी बनाई है और हम उसका इस्तेमाल करने की स्थिति में हैं।" 31 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपना मतलब समझाते हुए जिन्ना ने कहा कि ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस दोनों अपने-अपने तरीके से तैयार थे, एक के पास फायर वेपन थे और दूसरे के पास बड़े पैमाने पर लड़ाई की धमकी थी, लेकिन मुस्लिम लीग को लगा कि अब समय आ गया है कि वह भी अपने प्रतिबंध बनाए और पाकिस्तान की अपनी मांग को मनवाने के लिए लड़ाई के लिए तैयार हो जाए। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर उसने प्रस्तावित "डायरेक्ट एक्शन" की डिटेल्स पर बात करने से मना कर दिया और कहा, "मैं अभी आपको यह बताने के लिए तैयार नहीं हूं।" जब उनसे पूछा गया कि यह वायलेंट होगा या नॉन-वायलेंट, तो उसने जवाब दिया, "मैं एथिक्स पर बात नहीं करने वाला हूं।"

उसके साथियों में से एक ख़्वाजा नज़ीमउद्दीन, जो बंगाल का मुस्लिम लीग का नेता था, ने घोषणा कर दी, एक सौ एक और तरीके हैं जिनसे हम मुश्किलें पैदा कर सकते हैं, खासकर जब हम अहिंसा तक सीमित नहीं हैं। बंगाल के मुसलमान जानते हैं उन्हें क्या करना है, उन्हें बताने की कोई ज़रूरत नहीं है। जिन्ना का दाहिना हाथ माना जाने वाला लियाक़त अली ख़ान ने कहा, डायरेक्ट एक्शन का मतलब गैर-संवैधानिक तरीकों का सहारा लेना है और यह कोई भी रूप धारण कर सकता है और जो भी रूप हो, वह उन परिस्थितियों के अनुकूल हो सकता है, जिनके तहत हम रहते हैं, हम किसी भी तरीके को अलग नहीं कर सकते हैं, डायरेक्ट एक्शन का मतलब है कानून के खिलाफ कार्रवाई। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त के अब्दुर्रब निश्तर ने कहा, पाकिस्तान ख़ून बहाकर ही लिया जा सकता है, और अब मौक़ा आया है तो ग़ैर-मुसलिमों का ख़ून बहाना ही पड़ेगा। मुसलमान अहिंसा में विश्वास नहीं रखते।

29 जुलाई के अपने प्रस्ताव के मुताबिक, मुस्लिम लीग ने एक काउंसिल ऑफ़ एक्शन बनाई। इसकी मीटिंग बंद दरवाज़ों के पीछे हुई, लेकिन इसका जो प्रोग्राम बनाया गया और जिसे बाद में मुस्लिम लीग प्रेस ने बताया और दिखाया, वह काफी साफ़ था। मुसलमानों को याद दिलाया गया कि रमज़ान के महीने में ही "इस्लाम और बुतपरस्ती के बीच पहली खुली लड़ाई" लड़ी गई थी और अरब में 313 मुसलमानों ने जीती थी। धर्मयुद्ध के लिए एक खास प्रार्थना वाले पर्चे में ऐलान किया गया था कि दस करोड़ भारतीय मुसलमान "जो बदकिस्मती से हिंदुओं और अंग्रेजों के गुलाम बन गए थे" रमज़ान के इसी महीने में "जेहाद" शुरू करेंगे। एक और पर्चे में हाथ में तलवार लिए जिन्ना की तस्वीर थी, जिसमें लिखा था: "हम मुसलमानों ने ताज संभाला है और राज किया है। तैयार हो जाओ और अपनी तलवारें उठाओ... ऐ काफ़र!... तुम्हारी मौत दूर नहीं है और आम कत्लेआम होगा!"

16 अगस्त भारत के इतिहास में एक काला दिन था। जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए हर तरह के संघर्ष का आह्वान किया था और उसके साथियों ने इस्लाम में हिंसा को जायज बताते हुए सीधे सीधे मुस्लिम जनता को हिंसा के लिए भड़काया था। हिंसा की ऐसी साफ घोषणा के कारण एक के बाद एक बारूद की ऐसी ढेरियां सुलगती गईं कि देश के कोने-कोने में ज्वाला भभक पड़ी और उससे अपार धन-जन की हानि हुई। अहमदाबाद, इलाहाबाद, बंबई, अलीगढ़, ढाका और अन्य कई स्थानों पर साम्प्रदायिक उपद्रवों की बाढ आ गई। मुस्लिम लीग ने बहुत सुनियोजित तरीके से हिंसा को अंजाम दिया था। बंगाल और असम में हिन्दू उसके निशाने पर थे और लाहौर में सिख निशाने पर थे।

भीड़ की हिंसा ने कलकत्ता के बड़े शहर को खून-खराबे, हत्या और आतंक के तांडव में धकेल दिया। बंगाल में मुस्लिम लीग का मंत्रिमंडल था। सुहरवर्दी उसके मुख्यमंत्री थे। इसलिए सीधी कार्रवाई करने के लिए लीग का आह्वान, धर्म के नाम पर और वह भी पूरी तरह सरकारी तत्वाधान में, मुस्लिम शरारत पसंद लोगों को बेहतरीन कामों को करने का उकसावा देने के लिए काफी थाकलकत्ते में सीधी कार्रवाई के लिए बहुत पहले ही हथियार बांटे जा चुके थे। तैयारियां पूरी हो चुकी थी। हिन्दू पुलिस अफसरों का तबादला कर दिया गया था। कलकत्ता के 24 में से 22 थाने में मुसलमान अधिकारियों की पदास्थपना कर दी गई थी, बाक़ी दो में एंग्लो-इंडियन अधिकारी थे। 16 अगस्त के दिन सरकारी छुट्टी घोषित कर दी गई थी। मुसलमानों को पहले से ही बड़ी संख्या में लाठियां, भाले, कुल्हाड़ी, खंजर और दूसरे जानलेवा हथियार, जिनमें फायरआर्म्स भी शामिल थे, बांट दिए गए थे। लीग के गुंडों के लिए सवारियों का इंतज़ाम कर दिया गया था। शरीफ़ ख़ान नामक एक विधान सभा सदस्य ने गुंडों को हथियार बांटे। उसने कलकत्ता के मेयर मोहम्मद उस्मान के साथ हावड़ा के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और स्थानीय गैन्गस्टर्स और गुंडों को उत्पात मचाने के लिए उत्तेजित किया।

15 तारीख की मध्य रात्रि से ही कलकत्ता की गलियों-सड़कों पर ‘अल्ला-हो-अक़बर’ और ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’ के नारे लगाए जा रहे थे। कलकत्ता मैदान में सामूहिक रैली का आयोजन किया गया था। शहर में क़ानून-व्यवस्था का नामोनिशान नहीं था। सड़कों पर अपराधियों का बोलबाला था। सीधी कार्रवाई के लिए लीग का आह्वान, धर्म के नाम पर और पूरी सरकार के तत्वावधान में कलकत्ता में ऐसा भीषण दंगा, खून-खराबा और मारकाट हुई जिसकी मिसाल नहीं मिल सकती। 16 अगस्त से 19 अगस्त तक, चार दिनों तक शहर पर गुंडों का आतंक छाया रहा और भीषण नर-संहार हुई। क़त्ल, लूट, तबाही, हिंदू स्त्रियों के बलात्कार से पूरे कलकत्ता दहल गया। कलकत्ता में मुस्लिम लीग की सरकार थी। डायरेक्ट एक्शन की सारी सुविधा वहां मौजूद थी। उत्पात हो सकते हैं, यह मालूम होते हुए भी उसने पहले से रोकथाम की कोई कोशिश नहीं की। जब गुंडों के संगठित ग्रुप, जो अपने खतरनाक मिशन के लिए पूरी तरह से हथियारों से लैस थे, मुस्लिम लीग के झंडे लिए हुए थे और पाकिस्तान के नारे लगा रहे थे, हत्या, आगजनी, रेप और लूटपाट का बेरोकटोक तांडव कर रहे थे, तब पुलिस, खासकर पहले दो दिनों तक, चुपचाप खड़ी रही।

सुहरावर्दी ने पुलिस को तत्परता और निष्पक्षता से अपना काम करने से जान-बूझकर रोका। सुहरावर्दी की सरकार ने सीधी कार्रवाई के दिन छुट्टी घोषित कर दी और यह कहकर दंगाइयों को बढ़ावा दिया कि पुलिस और सेना हस्तक्षेप नहीं करेगी। मुसलमानों ने हमले शुरू कर दिए। जब दंगा शुरू हो गया, तो सुहरवर्दी पुलिस के प्रधान केन्द्र के ‘लाल बाज़ार के कंट्रोल रूम में बहुत समय बिताता था, जहां अक्सर उसके कुछ समर्थक भी मौजूद रहते थे’, और ‘अपने ही समुदाय के लोगों को हो रही तकलीफ़ों को लेकर बहुत ज़्यादा परेशान रहता था’। मौलाना आज़ाद लिखते हैं, पूरे कलकत्ता में, मिलिट्री और पुलिस खड़ी थी, लेकिन जब बेगुनाह आदमी और औरतें मारे जा रहे थे, तो वे चुप रहे। पांच हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए। सड़कों पर लाशें बिछ गईं। पंद्रह हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हो गए। सैकड़ों महिलाओं का अपहरण हुआ। बलात्कार का तांडव मचा। सड़ने वाली लाशों की बदबू से कलकत्ता नगर नरक बन गया। कांग्रेस विरोधी पत्र स्टेट्समेन के पत्रकार किम क्रिस्टेन ने कहा ‘यह दंगा नहीं है. इस भयावह नरसंहार – जिसे हम भारत के इतिहास का सबसे बुरा सांप्रदायिक दंगा मानते हैं, की शुरुआत मुस्लिम लीग के राजनैतिक प्रदर्शन से हुई.’ बल्कि उसने संपादकीय में इसे ‘कलकत्ता की ज़बरदस्त ख़ूंरेज़ी’ कहा था। इन अत्याचारों पर सफाई देते हुए जिन्ना ने कहा, लीग और बंगाल के लीगी मंत्रिमंडल को बदनाम करने की यह हिंदुओं की साजिश है। इसका पूरा दोष कैबिनेट-मिशन, कांग्रेस और गांधी पर है।

तीसरे दिन मिलिट्री को बुलाया गया, जब लड़ाई का रुख पहले ही उन लोगों के खिलाफ हो चुका था जिन्होंने आग लगाई थी। 17 अगस्त की शाम को, जब उनके अंडर मिलिट्री ने शहर की कमान संभाली, एरिया कमांडर ब्रिगेडियर सिक्सस्मिथ ने हालात का जायज़ा लेते हुए कहा कि "पुलिस ने अब तक एक भी राउंड फायर नहीं किया था। एक या दो मामलों में टियर-गैस का इस्तेमाल किया गया था।"

डायरेक्ट एक्शन शुरू होने के तीन दिन बाद इस क्रिया की प्रतिक्रिया भी हुई। कलकत्त्ता के हिंदुओं ने और भी भयानकता के साथ जवाबी हमला किया। पूरा नगर दोतरफे पागलपन के थपेड़ों की चपेट में आ गया। दोनों तरफ़ के उत्पाती घर को घेर लेते, उसके पुरुष सदस्यों को घर के अन्य लोगों के सामने मार देते, स्त्रियों को इज़्ज़त लूटते, घर के क़ीमती सामानों को हथियाते और फिर घर में आग लगा देते। समूचे कलकत्ता की सड़कें लाशों से अटी पड़ी थीं। मेनहोल में लाशों के भर जाने से शहर की ड्रेनेज सिस्टम ख़राब हो गई। नालों का गन्दा पानी सडकों पर बहने लगा। सारा शहर दुर्गन्ध से भर गया। कलकत्ता के इस महा-नरसंहार में 5,000 से अधिक लोग मारे गए, 15,000 से अधिक लोग घायल हुए और लाखों लोग बेघर हो गए। जिन्ना ने इसे लीग और बंगाल की लीग मिनिस्ट्री को बदनाम करने के लिए हिंदुओं की एक सोची-समझी साज़िश बताया, और इसका सारा इल्ज़ाम कैबिनेट डेलीगेशन, कांग्रेस और गांधीजी पर लगाया!

कलकत्ता प्रतिशोध का आक्रोश सारे देश में फैल गया। मुस्लिम लीग ने जवाब में पूर्वी बंगाल के नोआखाली ज़िले में तबाही, बलात्कार और लूटपाट का तूफान मचा दिया और इसका हिंसा और अत्याचारों का पाशविक रूप नोआखाली में देखने को मिला। 300 के लगभग मौतें हुईं। नोआखाली के अलावा बिहार, पंजाब, बंबई और अन्य स्थानों में भी दंगे हुए। बंबई में 162 हिंदू और 158 मुसलमान मारे गए। पंजाब के लाहौर, अमृतसर, मुल्तान, रावलपिंडी आदि मुस्लिम-बहुल इलाक़ों में बड़े पैमाने पर दंगे हुए और इन दंगों का मुख्य लक्ष्य सिख और हिंदू व्यापारी थे। बिहार में 25 अक्तूबर को नोआखाली दिवस मनाया गया। यहां मुसलमानों के विरुद्ध हिंदू किसानों का विद्रोह हुआ और दंगों में ऐसा नरसंहार हुआ, जो नोआखाली से भी अधिक भयंकर था। कम-से-कम 7,000 लोग मारे गए। नेहरू ने कहा था, बिहार के लोगों पर पागलपन सवार है। गढ़मुक्तेश्वर में हिंदू तीर्थयात्रियों ने एक हज़ार मुसलमानों की हत्या कर दी। लीग हताशा की स्थिति में थी। वह किसी भी प्रकार से सत्ता पाना चाहती थी और विभाजन भी लागू करना चाहती थी।  

उस समय गांधीजी सेवाग्राम में थे। उन्होंने ग्रेट कलकत्ता किलिंग और उसके बाद की घटनाओं में भारत के लोगों के लिए आज़ादी की चुनौती के बारे में पढ़ा। उनकी दूर की सोच ने आने वाली चीज़ों के आकार को बहुत दूर तक देखा। उन्होंने हरिजन में कहा, "हम अभी सिविल वॉर के बीच में नहीं हैं। लेकिन हम उसके करीब पहुँच रहे हैं। अभी हम इस पर खेल रहे हैं... अगर अंग्रेज समझदार हैं, तो वे इससे दूर रहेंगे। दिखने में तो इसके उलट है।"

सुमित सरकार कहते हैं, कलकत्ता, नोआखली, बिहार और पंजाब का सामना करने पर, कांग्रेस के कई नेताओं और लीडरशिप के सेक्युलर विचार खत्म हो गए। सांप्रदायिक दंगों और केंद्र में कांग्रेस-लीग गठबंधन के साफ़ तौर पर काम न करने की वजह से, 1947 की शुरुआत में कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि अब समस्या का समाधान सिर्फ बंटवारा है। इस सर्जिकल समाधान की सबसे ज़्यादा मांग अब बंगाल और पंजाब के हिंदू और सिख सांप्रदायिक ग्रुप्स की तरफ से आने लगी थी, जो मुस्लिम-बहुल तबकों में ज़बरदस्ती ग्रुपिंग की संभावना से परेशान थे, जो बाद में पाकिस्तान बन सकते थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

444. चौथा जानलेवा हमला

गांधी और गांधीवाद

444. चौथा जानलेवा हमला

1946

28 जून 1946 को गांधीजी मुंबई से पूना के लिए रवाना हुए। 28-29 जून की रात को वह विशेष ट्रेन जिससे गांधी जी पूना जा रहे थे, अचानक ज़ोर से उछली। पता चला कि किसी ने पटरियों पर बोल्डर रख दिए थे। नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच पटरी पर डाली गयी चट्टानों से ट्रेन टकरायी।  ऐसा लगता था कि किसी ने जानबूझ कर ऐसा किया था और वह ट्रेन को दुर्घटनाग्रस्त करना चाहता था। इंजन को क्षति पहुंची। किन्तु ड्राइवर पेरेरा ने अपनी सूझ-बूझ से गाड़ी को सुरक्षित रोक लिया और उसे किसी बड़े हादसे का शिकार होने से बचा लिया।

अगले दिन पूना की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा, शायद यह सातवीं बार है जब ईश्वर ने मुझे मौत के मुंह से बचा लिया। मैंने आज तक किसी व्यक्ति को शारीरिक क्षति या कष्ट नहीं पहुंचाया, न ही किसी से शत्रुता की है। फिर भी कोई मेरी जान लेने पर क्यों उतारू है यह मेरी समझ से परे है। पर ऐसा हुआ है। ऐसा सभी देश में होता आया है। फिर भारत में क्यों नहीं?

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर