सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
20. ख़ानक़ाह
“वे (फ़रिश्ते) जो अपने ऊपर उठाये हुए हैं अर्श (सिंहासन) को तथा जो उसके आस-पास हैं, वे पवित्रता गान करते रहते हैं अपने
पालनहार की प्रशंसा के साथ तथा उसपर ईमान रखते हैं और क्षमा याचना करते रहते हैं
उनके लिए, जो ईमान लाये हैं। हे हमारे पालनहार! तूने घेर रखा है
प्रत्येक वस्तु को (अपनी) दया तथा ज्ञान से। अतः, क्षमा कर दे उनको जो क्षमा माँगें तथा
चलें तेरे मार्ग पर तथा बचा ले उन्हें, नरक की यातना से।” (क़ुरआन : 40/7)
ग्यारहवीं
शताब्दी तक आते-आते सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकासित आन्दोलन था। इसका सूफ़ी और
क़ुरआन से जुडा अपना साहित्य था। सूफ़ियों की गतिविधियों का केन्द्र ख़ानक़ाह कहलाता है। यह मठ
की तरह सूफ़ियों, साधुओं, अथवा धर्म-प्रचारकों के ठहरने या
रहने का स्थान होता है। यहाँ सूफी संत (पीर या मुर्शिद) अपने शिष्यों (मुरीदों) और
आम लोगों के साथ रहते थे, इबादत (प्रार्थना) करते थे और
आध्यात्मिक शिक्षा देते थे। भारत में सूफ़ीमत का अधिक प्रचार-प्रसार होने का एक कारण ख़ानक़ाह की स्थापना था। एक प्रकार से
यह रहस्यवादी साधकों के लिए छात्रावास की तरह देखा जा सकता है। खानक़ाह का नियंत्रण
शेख़, पीर या मुर्शीद के हाथ में होता था। वे अनुयायियों
(मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (ख़लीफ़ा) की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक
व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा खानक़ाह में रहने वालों के बीच संबंध और
शेख़ व जन-सामान्य के बीच रिश्तों की भी नियत करते थे। खानकाह में एक
सामुदायिक रसोई होती थी जिसे लंगर कहा जाता था, जहाँ हर धर्म
और वर्ग के लोगों को मुफ्त भोजन मिलता था।
दिल्ली
यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर और मध्यकालीन इतिहास के प्रमुख इतिहासकार
प्रोफ़ेसर सैयद ज़हीर हुसैन जाफ़री का कहना है कि 'द ग्रेव्स ऑफ तरीम' नाम
की पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद यह बात सामने आई कि यमन और हदरमौत के लोग
जहां-जहां पहुंचे, वहां
मस्जिदें, मकबरे
और खानकाहें स्थापित हुईं। ये केंद्र राजनीतिक इस्लाम के आगमन से पहले ही
शांतिपूर्ण धार्मिक और सामाजिक केंद्रों के रूप में मौजूद थे, जहां से इस्लाम का
प्रचार-प्रसार हुआ।
भारत के तटीय इलाक़े सूफी संतों के महत्वपूर्ण केंद्र थे।
यहां से वे न केवल व्यापार करते थे, बल्कि इस्लाम का संदेश लेकर मलेशिया और
इंडोनेशिया तक भी पहुंचे।
11वीं सदी के बाद चिश्ती, सुहरावर्दी और अन्य सूफी
सिलसिलों से जुड़े संत भारत के विभिन्न हिस्सों में बस गए।
सूफी खानकाहें और दरगाहें ऐसे आध्यात्मिक केंद्र बनकर उभरीं, जहां हर धर्म के लोग आते थे। अजमेर
में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां हिंदू और मुसलमान दोनों
श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। इस तरह सूफी आंदोलन ने भारत में इस्लाम के
प्रसार में अहम भूमिका निभाई। प्रोफ़ेसर जाफ़री के मुताबिक़ इस्लाम के समानता, भाईचारे और न्याय के
सिद्धांतों ने उन्हें बेहतर सामाजिक पहचान और सम्मान पाने का अवसर दिया। हालांकि, आधुनिक शोधकर्ता इस सिद्धांत
की कुछ सीमाओं की भी ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि जहां इस्लाम तेजी से
फैला, वहां
जाति व्यवस्था उतनी कठोर नहीं थी जितनी देश के बाकी हिस्सों में थी।
ख़ानक़ाहों को जमात खाना, बड़े सभा हॉल के रूप में भी जाना जाता
है। संरचनात्मक रूप से, एक खानक़ाह एक बड़ा कमरा या अतिरिक्त आवास स्थान होता था। यहां साधक के जीवन
को एक कठोर दैनिक क्रियाकलापों में बांधा जाता है। कई लोग इसे मठ की तरह भी
मानते हैं। जाफ़र रज़ा का मानना है कि “सूफ़ियों में इस तरह की कल्पना (मठवाद) ईरान
की मानी विचारधारा से आयी है। समरकंद में मानियों की ऐसी ख़ानगाहें (अरबी :
ख़ानक़ाहें) विद्यमान हैं, जिनको स्थानीय भाषा में ‘नफ़ोशाक’ कहते हैं।” तेरहवीं शताब्दी तक सूफ़ियों की अनेक ख़ानक़ाहें
(आश्रम)
भारत
में स्थापित हो चुकी थीं। उन दिनों मुलतान, पंजाब, बंगाल, दक्षिण भारत, कश्मीर और देश
के कई अन्य हिस्सों की सामाजिक और
आर्थिक स्थिति काफ़ी अच्छी थी। इसलिए ये जगहें लोगों के आकर्षण का केन्द्र थीं।
अफ़गानिस्तान के रास्ते अनेक सूफ़ी सिलसिलों से संबंध रखने वाले लोगों ने भारत में
प्रवेश किया। ये लोग अपनी इच्छा से भारत आए थे। उन्हें किसी संस्था ने न ही आदेश
दिया और न ही ज़ोर डाला था। ईश्वर-प्रेम और मानव-सेवा इनका लक्ष्य था। ये पवित्र जीवन
जीते थे और जगह-जगह घूमते रहते थे। उनके पवित्र जीवन ने भारत
के लोगों को शीघ्र ही अपनी ओर आकृष्ट किया।
20.1 ख़ानक़ाह के प्रकार
मठ तीन प्रकार के होते हैं,
पहला ख़ानक़ाह, यह आकार में विशाल हुआ करता है, जहां रहस्यवादी साधक और
आगन्तुक को अलग-अलग कमरे दिए जाते हैं। दूसरा जमातख़ाना, जहां पर शिष्य समूह
में रहते हैं, और तीसरा छोटे घर, जिसे ज़ाविया कहा जाता है। यहां रहस्यवादी
साधक सांसारिकता से बिल्कुल अलग रहकर जीवनयापन करते हैं। इसके अलावा रबात जो
शुरुआत में यह मुस्लिम सीमाओं पर सैनिकों के ठहरने के ठिकाने (किलो) होते थे। बाद
में, इन्हें सूफ़ियों ने अपने आध्यात्मिक एकांतवास और इबादत के केंद्र के रूप में
अपना लिया। ओटोमन साम्राज्य (वर्तमान तुर्की) में सूफ़ी केंद्रों को 'तकिया' या 'तेके' कहा जाता था।
आर्थिक रूप से ख़ानक़ाहें दो
प्रकार की व्यवस्थाओं पर चलती थीं। शाही या राज्य-पोषित ख़ानक़ाहें वह होती
थीं जिन्हें सुल्तानों या राजाओं द्वारा ज़मीन (लख़ीराज या वक़्फ़) और भारी दान
मिलता था। जैसे सुहरावर्दी सिलसिले की खानकाहें। यहाँ सुख-सुविधाएँ अधिक होती थीं
और राजसी मुसाफ़िर भी आते थे। स्वतंत्र या जन-पोषित ख़ानक़ाहें राज्य की मदद
को ठुकरा देती थीं और केवल आम जनता द्वारा स्वेच्छा से दिए गए दान (फ़ुतूह) पर
चलती थीं। दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की चिश्ती ख़ानक़ाह इसका सबसे बड़ा
उदाहरण थी।
ख़ानक़ाह के सहवासी तीन
श्रेणियों के होते थे – एक चयनित, दूसरे साथी और तीसरे परिचर। आगन्तुकों का ख़ानक़ाह में स्वागत था,
किन्तु उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे सिर्फ़ तीन दिन ही ठहरें, यदि वे इससे
अधिक दिन ठहरना चाहते थे तो उनसे परिचारकों की तरह काम करना पड़ता था।
20.2 ख़ानक़ाह के नियम
ख़ानक़ाह के जीवन में बेहद कड़े
और विस्तृत नियम लागू होते थे। इन नियमों और शिष्टाचार को सूफ़ी साहित्य में 'अदब' कहा जाता था। प्रसिद्ध सूफ़ी
संत अबू सईद इब्न अबी अल-खैर ने ख़ानक़ाहों के संचालन के लिए बुनियादी नियम
निर्धारित किए थे। सुबह से लेकर देर रात तक जीवन का हर पहलू नियंत्रित था। ख़ानक़ाह
में रहने वाले सभी शिष्यों और निवासियों के लिए हमेशा वज़ू (परम पवित्रता
की स्थिति) में रहना अनिवार्य था। दिन की सभी पाँचों वक्त की नमाज़ें सामूहिक रूप
से केंद्रीय हॉल (जमात-ख़ाना) में पढ़ना अनिवार्य था। सुबह
और रात के समय जागकर कुरान का पाठ करना, अल्लाह का नाम जपना (ज़िक्र) और ध्यान लगाना हर साधक के
लिए जरूरी था। ख़ानक़ाह में अमीर हो या गरीब, राजा हो या फकीर, सबके लिए समान नियम थे। यदि
कोई धनी व्यक्ति आता, तो उसे अहंकार तोड़ने के लिए जमीन पर बैठने या लंगर में सेवा करने को कहा जाता
था।
सहवासियों की पोशाक भी
निर्धारित थी। भोजन करने और परोसने का एक विशेष तरीका होता था जिसे 'सुफ़रा' कहते थे। सभी लोग एक बड़े
दस्तरख्वान पर एक साथ बैठकर भोजन करते थे। आगन्तुकों का स्वागत करने का तरीक़ा भी
निश्चित था। शेख़ से बात करने, उनके सामने बैठने, यहाँ तक कि उनके सामने चलने और सोने के भी कड़े नियम थे।
बिना अनुमति के शेख़ की उपस्थिति में बोलना मना था। प्रार्थना और तपस्या का समय
निश्चित था। सुबह की इबादत के बाद सूर्योदय तक किसी से भी बात न करने का नियम था।
सामान्य दिनों में भी अनावश्यक बातचीत और हँसने-मजाक से दूर रहने की हिदायत दी
जाती थी। किसी भी अनियमितता के लिए दंड निर्धारित किए हुए थे। आध्यात्मिक और
उन्मादपूर्ण प्रेरणा के लिए संगीत का आयोजन, स्वर्गवासी
संतों की वार्षिकी पर उर्स का अनुष्ठान होता था।
लंगर के रूप में सहभोज का प्रतिदिन आयोजन किया जाता था।
लंगर में जो भी भोजन बनता था, वह पहले आने वाले मेहमानों और गरीबों को परोसा जाता था, उसके बाद ही ख़ानक़ाह के स्थायी
निवासी भोजन करते थे। ख़ानक़ाह के द्वार सभी धर्मों और जातियों के यात्रियों के लिए
खुले रहते थे। मेहमानों को बिना किसी भेदभाव के तीन दिनों तक मुफ्त भोजन और आश्रय
दिया जाता था। जो सूफ़ी साधक विवाहित होते थे, वे दिन के समय ख़ानक़ाह की
गतिविधियों और इबादत में हिस्सा लेते थे, लेकिन रात को उन्हें अपने परिवार के पास (ख़ानक़ाह के बाहर)
जाना होता था। केवल अविवाहित या पूर्ण संन्यासी साधक ही स्थायी रूप से वहाँ के
कमरों (हुजरा) में सोते थे। इन कड़े नियमों का उद्देश्य केवल अनुशासन नहीं था, बल्कि साधकों के भीतर से अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ जैसी
बुराइयों को मिटाकर उन्हें एक बेहतर इंसान और सच्चा आध्यात्मिक साधक बनाना था।
20.3 ख़ानक़ाह में रहने वाले लोगों की
श्रेणियाँ
एक बड़ी ख़ानक़ाह के भीतर रहने
वाले लोगों की आध्यात्मिक स्थिति के आधार पर उन्हें तीन श्रेणियों में
बांटा जाता था। पहली श्रेणी को अहले खिदमत कहा जाता था। वे सेवा धर्म का पालन करते। वे सेवादार जो ख़ानक़ाह की
व्यवस्था, लंगर (रसोई) और मुसाफ़िरों की देखभाल संभालते थे, उन्हें अहल-ए-ख़िदमत कहा
जाता था। इस प्रकार से जीवन यापन करते-करते वे अपने आपको ऐसा बना लेते कि वे
आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ाते रहें और अपनो को दूसरी श्रेणी का बना लें।
दूसरी श्रेणी है अहले
सुहबत। वे शिष्य जो शेख़ (गुरु) की संगति में रहकर
सूफ़ी सिद्धांतों को सीखते और आध्यात्मिक चर्चाओं में भाग लेते थे, अहल-ए-सुहबत
कहलाते थे। नयी उम्र के लोगों को ‘सुहबत’ की ज़रुरत होती है, जिससे वह आध्यात्मिक मार्ग
पर चलने के लिए संपर्क में आए लोगों से आवश्यक चीज़ें सीख सकें।
तीसरी श्रेणी है अहले
खिलावत। वे वरिष्ठ सूफ़ी साधक जो
अत्यधिक एकांतवास, कठिन ध्यान और कठोर तपस्या (ज़िक्र और मुराक़बा) में लीन रहते थे, अहल-ए-ख़लवत
कहलाते थे। बूढों के लिए ‘खिलवत’ (एकांत वास) की ज़रुरत होती है।
20.4 ख़ानक़ाह का मुखिया
हालांकि कुछ ख़ानक़ाह शाही फंडिंग या संरक्षण से
स्वतंत्र थे, लेकिन कई ने राजकोषीय अनुदान (वक़्फ़) प्राप्त किया और निरंतर सेवाओं के लिए लाभार्थियों से
दान लिया। सूफ़ी ख़ानक़ाह में रहकर
अपना प्रचार कार्य करते थे। इसका मुखिया शेख़, पीर या मुर्शीद कहलाता था। पीर या शेख़ को हिंदू धर्म के गुरु के समान माना जा सकता है। ख़ानक़ाह का जीवन पीर के इर्दगिर्द घूमता था। सूफ़ी
परंपरा में ख़ानक़ाह के मुखिया का पद अत्यंत सम्मानित और महत्वपूर्ण माना जाता था। वह
यहां के आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन को संचालित करता था। वे न केवल ख़ानक़ाह के
प्रशासनिक प्रमुख होते थे, बल्कि वहाँ रहने वाले सभी शिष्यों (मुरीदों) के आध्यात्मिक गुरु और
मार्गदर्शक भी होते थे। वे अपने शिष्यों को सूफ़ी मार्ग (तरीक़त) की शिक्षा देते
थे और उनके आध्यात्मिक विकास की देखरेख करते थे। आमतौर पर हर सिलसिले के मुख्य
सूफी संत ही अपनी ख़ानक़ाह के मुखिया (वली/ख्वाजा) होते थे। अपने जीवनकाल के अंतिम
समय में, शेख़ अपने सबसे योग्य और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व शिष्य को अपना
उत्तराधिकारी चुनते थे, जिसे 'ख़लीफ़ा' कहा जाता था। शेख़ की मृत्यु के बाद यही ख़लीफ़ा ख़ानक़ाह का नया
मुखिया बनता था। ख़ानक़ाह के नियम तय करना, लंगर (रसोई) की व्यवस्था देखना और आने वाले मेहमानों व
राजा-महाराजाओं से मिलने का अंतिम निर्णय मुखिया का ही होता था। भारत में अक्सर
उन्हें 'ख़्वाजा' या 'बाबा' भी कहकर
पुकारा जाता था।
सिलसिला के सदस्यों को फ़क़ीर कहा जाता था। फ़क़ीर के बारे में
एक दोहा प्रसिद्ध है –
हद
को जाने मौलवी बेहद जाने पीर।
हद-बेहद
अतीत है वाको नाम फ़क़ीर॥
शेख़ में बहुत सी ऐसी
विशेषताएं होती हैं जिसका उल्लेख
“सियर-उल-औलिया” (औलिया का चरित्र) में मिलता है। वे फटे और रफ़्फ़ू किए (गुदड़ी) कपड़े पहनते थे। सिर मुंड़वा कर रखते
थे। शेख़ का वस्त्र, प्रार्थना का गलीचा, चप्पल, चलने की लाठी और माला को पवित्रता
का प्रतीक-चिह्न माना जाता था। जब शेख़ की मृत्यु हो जाती थी, तो ये चीज़ें उनके
उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) को विरासत में प्राप्त होती थीं। शेख़ अपने पीछे ख़िलाफ़तनामा
छोड़ जाते थे जिसमें वे अपने उत्तराधिकारी का नाम प्रस्तावित कर जाते थे। इस
उत्तराधिकारी का यह दायित्व होता था कि वह अपने गुरु के विशेष काम (मिशन) को आगे
बढ़ाए और उनकी मान्यताओं का प्रचार-प्रसार करे। इस तरह सिलसिला बरकरार रहता था।
अपने व्यक्तित्व और अनुकरणीय जीवन से शेख़ ख़ानक़ाह से सूफ़ीमत का प्रचार-प्रसार करते
थे। लोगों में भक्ति की भावना को जगाकर वे आध्यात्मिक वातावरण का सृजन करते थे,
जिससे लोग सांसारिक जीवन का त्याग कर आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होते थे।
ख़ानक़ाह में
हिंदू-मुस्लिम दोनों
बड़े ही श्रद्धा और विश्वास से पीरों के दर्शन करने जाते थे। वे यहां के ज़िक्र-सुमिरन में भी शामिल
होते थे। लोग पीर से मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में
यहां आते थे। पीरों के अलौकिक चमत्कारों का प्रभाव भी लोगों पर पड़ता था। इन
चमत्कारों को देखकर ऐसा लगता था मानों करामात के द्वारा एक पीर ख़ुदा के क़रीब होने
के नाते कुछ भी पा सकता है। लेकिन यह कोई महत्वपूर्ण चीज़ नहीं थी जिसके कारण लोग
इनके क़रीब जाते थे। सूफ़ीमत के साधक जो ख़ानक़ाह में रहते थे, समाज के प्रति
सहानुभूति और प्यार प्रकट करते हुए दोनों धर्म के लोगों को इस्लाम के काफ़ी क़रीब लाने में सफल हुए। हज़ारों-लाखों की संख्या में दोनों वर्गों के लोग दुख तथा दरिद्रता
को दूर करने के लिए शेख़ों के पास जाते थे। धीरे-धीरे प्रतिष्ठित व्यक्ति भी इनकी शरण
में आने लगे। यहां तक कि दूसरे पंथों के योगी और संत यहां आकर धार्मिक समस्याओं पर विवेचना
करते थे।
सूफ़ी धर्म पूरी
तरह से सद्गुरु की धारणा पर निर्भर है। यह मत ग्रंथों में विश्वास तो करता है
लेकिन उसे समझने के लिए अपने पीर की सहायता लेता है। ग्रंथ पढ़कर हम
परमात्मा के बारे में जान सकते हैं, हम सत्य के बारे में जान सकते हैं, परमात्मा को
नहीं, सत्य को नहीं।
इसका कारण यह है कि हममें वह क्षमता ही नहीं विकसित हुई है कि हम उस अलौकिक का
अनुभव कर सकें। केवल एक सद्गुरु के द्वारा ही परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है। उस
तक पहुंचने का माध्यम सद्गुरु ही बन सकता है। वह उसे जानता है, उसने उसका
अनुभव किया है। वह इस संसार में भी है, परमात्मा में भी। इसलिए पहला क़दम सद्गुरु के
प्रेम में गिरना है। सद्गुरु के सान्निध्य में जाना ही इस मार्ग पर जाने का पहला
क़दम है।
दूसरा क़दम है
समर्पण। जब एक मुरीद ऐसे व्यक्ति (पीर) को पा लेता है जो परमात्मा के साथ सम्पर्क में है, तो उसे उस सद्गुरु के प्रति
पूर्ण समर्पण कर देना चाहिए। सूफ़ी बड़े साधारण व्यक्ति होते थे। एक साधारण के प्रति
पूर्ण समर्पण से अहंकार का विसर्जन हो जाता है। जब समर्पण होता है, तो सद्गुरु ख़ुद ही मुरीद को अपना
लेते हैं, फिर
मुरीद को कुछ नहीं करना होता। अब तो वह मुरीद की सारी जिम्मेदारी ले लेता है। वह उसके लिए
सारे दरवाज़े खोल देता है। वह सब कुछ दे देता है जो उसके पास है।
चूंकि ख़ानक़ाह
की दिनचर्या पीर पर ही निर्भर थी, ऐसी स्थिति में वे ही सिलसिलों के संस्थापक होते थे। अपने
बाद या अपने समक्ष भी वे ही उत्तराधिकारी नियुक्त करते थे। ये नए शिष्यों को
दीक्षित भी करते थे। सूफ़ियों का जीवनयापन दो प्रकार से होता था, एक या तो वे
अनुत्पादक ज़मीन पर खेती कर उपजी चीज़ों का सेवन करते थे, या फिर वे दूसरों के
द्वारा दिए गए अप्रार्थित दान पर निर्भर करते थे।
शिष्य या मुरीद दो प्रकार के
होते थे। एक जो जगह-जगह जाकर लोगों से वस्त्र-भोजन एकत्र करते थे और उसे सहवासियों
के साथ-साथ ग़रीब,
दीन-दुखियों में
बांटते थे। उपहारों और दानों को संग्रह करके नहीं रखा जाता था। दूसरी तरह के शिष्य
एकांत में बैठकर रूहानी साधना करते थे। किंतु शेख़ का प्यारा मुरीद वही होता था जो तौबा करके
सांसारिकता का त्याग कर देता था। ये मुरीद उपवास एवं आध्यात्मिक चिंतन में लीन
रहते थे। स्थायी भाव से टिकने वाला साधक अपनी साधना में लगा हुआ रहता तो उसे काम खोजने
की ज़रुरत नहीं होती। लेकिन खानक़ाह में उन लोगों
के लिए जगह नहीं होती जिनका भीख मांगना ही रोज़गार था। चाहे किसी भी तरीक़े से
प्रशिक्षण दिया जा रहा हो, सूफ़ीमत के साधकों का अंतिम लक्ष्य होता था ईश्वर से
मिलन/एकत्व (वस्ल)।
साधकों को सांसों को रोकने
के, संवेदनशील अंगों पर नियंत्रण के, सांसारिकता से पूरी तरह अलग कर लेने के और मन
की एकाग्रता के अभ्यास सिखाए जाते थे। गहरी
एकाग्रता आध्यात्मिक जीवन की दहलीज है, जहां सांसारिकता के प्रति चेतना समाप्त हो
जाती है। लेकिन ध्यान इससे भी आगे की अवस्था है, जहां भूत, भविष्य और वर्तमान
तीनों समाप्त हो जाते हैं, यानी साधक समय से परे चला जाता है और परिमित और अनंत एक
हो जाता है। यानी होना और हो जाना एक हो जाता है। अब एक व्यक्ति एक व्यक्ति न
रहता, वह सार्वभौम सत्ता का एक अंश हो जाता है। इसके परिणाम स्वरूप उसे शाश्वत
शांति की प्राप्ति होती है। उसके मस्तिष्क पर एक प्रकार के प्रकाश की व्याप्ति
होती जिससे सभी भय, चिंताएं, कष्ट, प्रतिबंधों से उसे मुक्ति मिल जाती है। यह एक
ऐसा आध्यात्मिक अस्तित्व है जिसे हर रहस्यवादी प्राप्त करना चाहता है।
20.5 जमात ख़ानक़ाह
खानक़ाह सामाजिक जीवन का
केंद्र बिन्दु था। चिश्तियों की ख़ानक़ाह या दरगाह को जमात ख़ानक़ाह कहा जाता था। यह
एक लम्बा हॉल होता है। जहां सहवासी और अतिथि रहते, और उपासना करते थे।
सहवासियों में शेख़ का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी हुआ करते थे। इस हॉल की छत कई खम्भों पर टिकी होती है। हरेक खम्भे के आधार-स्थल पर एक मुरीद (शिष्य) अपने सारे सामान के साथ रहते
थे। शेख़ एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे जहां मेहमानों से सुबह-शाम मिला करते थे। आँगन एक गलियारे से घिरा
होता था और खानक़ाह को चारों और से दीवार घेरे रहती थी। एक वरिष्ठ सदस्य को पूरी
ख़ानक़ाह की व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। प्रत्येक ख़ानक़ाह में एक खुला हुआ
सामुदायिक रसोईघर होता था,
जिसे लंगर भी कह सकते
हैं। एक चिश्ती ख़ानक़ाह में भोज्य पदार्थ पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ करते थे। यह
रसोई फुतूह (बिना मांगे खैर) पर चलती थी। जो भी वहां आते, जो कुछ भी होता, मिलकर बनाते,
परोसते और मिल-बांट कर खाते। बाक़ी के समय
में वे या तो प्रार्थना-ध्यान में समय व्यतीत करते या
शेख़, जो वहां का प्रमुख होता, की सेवा करते। प्रार्थना और ध्यान के अलावे शेख़ को
रोज़ सैंकड़ों आगन्तुकों से भी मिलना होता था। अपनी आध्यात्मिक या सांसारिक समस्याओं के समाधान के
उद्देश्य से आगन्तुकों के रूप में दरवेश, रईस, विद्वान, राजनीतिज्ञ आदि आया करते थे। उन्हें यहां आकर आत्मिक शांति मिलती थी। कई बार तो ऐसा भी
देखा गया कि चिश्ती संत राजाओं से लोगों की शिकायतों का निपटारा करने का निवेदन भी
करते थे। सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग- सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिन्दू योगी और कलंदर यहाँ
अनुयायी बनाने, इबादत करने, ताबीज़ लेने या विभिन्न मसलों पर शेख़ की मध्यस्थता के लिए आते थे।
20.6 दिल्ली में ख़ानक़ाह
दिल्ली का इतिहास सूफ़ीवाद और
ख़ानक़ाह संस्कृति से बहुत गहरा जुड़ा हुआ है। दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल के दौरान, दिल्ली पूरे भारतीय
उपमहाद्वीप में सूफ़ी गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र बन गई थी। यहाँ कई महान
सूफ़ी संतों ने अपनी ख़ानक़ाहें स्थापित कीं, जहाँ से उन्होंने प्रेम, मानवता और शांति का संदेश
फैलाया। दिल्ली में सबसे पहली बार शेख़ अबूबकर तूसी की ख़ानक़ाह की चर्चा
सुनने को मिलती है। यह पुराने क़िले के नज़दीक टीले पर स्थित है। सय्यद नूर उद्दीन
मलकयार पर्रां (मृ. 1210) शैख़ दानियाल जंजी के मुरीद थे। वे लाहौर से आए और वहीं निवास करना चाहते थे।
पर उन्हें शेख़ अबू बकर ने वहां रहने से मना कर दिया। उन्होंने अपने धर्मगुरु की
चिट्ठी दिखाई। पर शेख़ अबूबकर के लिए वह पर्याप्त न था। उन्होंने शाही फ़रमान दिखाने
को कहा। यह उनके पास नहीं था। कहा जाता है कि सय्यद नूर उद्दीन ने 130 मील का सफर एक दिन में करके
सुल्तान बलबन का फ़रमान शेख़ अबू बकर को प्रस्तुत कर दिया। उस समय में इतनी लंबी
दूरी एक दिन में तय करना असम्भव था। इसलिए उनकी इस यात्रा को एक लीला ही माना गया।
और उनको “मलिकयार पर्रां” (देवदूत-मित्र, परोंवाला) की
उपाधि से नवाजा गया। इसके बाद वे सारा जीवन वहीं रहे और धर्म-सेवा करते रहे। जब
उन्होंने शरीर त्यागा तो उन्हें वहीं टीले पर दफ़न कर दिया गया। शेख़ अबू बकर तूसी
की ख़ानक़ाह दिल्ली काफ़ी प्रसिद्ध ख़ानक़ाह है। इनकी समाओं में विभिन्न सूफ़ी संत शिरकत
करते थे।
ग़ियासपुर
की ख़ानक़ाह (हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया) दिल्ली के इतिहास की सबसे
प्रसिद्ध और प्रभावशाली ख़ानक़ाहों में से एक थी। 13वीं शताब्दी में चिश्ती
सिलसिले के महान संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने तत्कालीन दिल्ली के बाहरी इलाके 'ग़ियासपुर' (जिसे आज हम हज़रत
निज़ामुद्दीन पश्चिम के नाम से जानते हैं) में इसकी स्थापना की थी। यह एक जन-पोषित
ख़ानक़ाह थी जो सुल्तानों के दान को स्वीकार नहीं करती थी, बल्कि आम जनता के स्वैच्छिक
दान पर चलती थी। यहाँ चौबीसों घंटे एक विशाल लंगर चलता था जहाँ भूखों को भोजन
कराया जाता था। सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी इस ख़ानक़ाह में आना चाहता था, लेकिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने यह कहकर इनकार कर दिया,
"मेरे घर के दो दरवाज़े हैं, अगर सुल्तान एक से अंदर आएगा तो मैं दूसरे से बाहर चला
जाऊँगा"। आज इस परिसर में प्रसिद्ध जमात-ख़ाना मस्जिद मौजूद है।
मेहरौली
की ख़ानक़ाह (ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी) कुतुब मीनार के
पास मेहरौली में चिश्ती सिलसिले के भारत के पहले मुख्य संत ख़्वाजा
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की ख़ानक़ाह थी। यह ख़ानक़ाह अपनी सादगी और घोर वैराग्य
के लिए जानी जाती थी। यहाँ के साधक रूखी-सूखी रोटी खाकर केवल इबादत और ध्यान में
लीन रहते थे। इतिहास के अनुसार, इसी ख़ानक़ाह ने दिल्ली की सूफ़ी
संस्कृति की बुनियाद रखी थी।
हिजड़ों
की ख़ानक़ाह (मेहरौली) मेहरौली के मुख्य बाज़ार की संकरी गलियों
(चट्टा वाली गली) में स्थित 'हिजड़ों की ख़ानक़ाह' पूरे
भारत की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक ख़ानक़ाह है। इसका निर्माण पूर्व-मुग़ल यानी लोदी
वंश के दौरान 15वीं शताब्दी में हुआ था। मान्यता
है कि यह स्थान सूफ़ी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने ट्रांसजेंडर (किन्नर)
समुदाय को दिया था, जिसके बाद उनके गुरु सत्तोमाई ने इसे एक आध्यात्मिक
केंद्र के रूप में विकसित किया। यहाँ लगभग 49-50 पुरानी
पुख्ता कब्रें (कब्रिस्तान) हैं, जो लोदी काल की मानी जाती हैं। आज
भी किन्नर समुदाय के लोग यहाँ आकर इबादत करते हैं और विशेष अवसरों पर लंगर बांटते
हैं।
ख़ानक़ाह-ए-चिरग़
दिल्ली (हज़रत नसीरुद्दीन महमूद) हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुख्य ख़लीफ़ा
(उत्तराधिकारी) हज़रत नसीरुद्दीन महमूद, जिन्हें
'चिराग-ए-देहली' (दिल्ली
का दीपक) कहा जाता है, की ख़ानक़ाह दक्षिण दिल्ली के 'चिराग
दिल्ली' इलाके में थी। दिल्ली सल्तनत के पतन के दौर में भी इस
ख़ानक़ाह ने दिल्ली में सूफ़ीवाद की लौ को जलाए रखा।
20.7 सुहरवर्दी ख़ानक़ाह
सुहरावर्दी
ख़ानक़ाह चिश्तियों के ख़ानक़ाह से थोड़ा अलग हुआ करती थी। सुहरवर्दी व्यवस्था के शेख़
सुल्तान और रईसों से मिलते-जुलते रहते थे। यहां तक कि वे उनसे नौकरी, जागीर और काफ़ी
धन-दौलत भी ग्रहण
किया करते थे। इस कारण उनके पास उन जागीरों से नियमित रूप से आमदनी होती रहती थी
जो ख़ानक़ाह को सुचारु रूप से चलाने के लिए मददगार साबित होता था। वे इधर-उधर के कामों
में धन ख़र्च करने के बजाए उसका इस्तेमाल बड़ी सोच-समझ कर करते थे। इसके अलावा
सुहरावर्दी ख़ानक़ाह सबके लिए खुली
भी नहीं रहती थी। कुछ ख़ास चुने हुए लोग ही शेख़ के अशीर्वाद ग्रहण कर पाते
थे। ख़ानक़ाह दिखने में काफ़ी आकर्षक होती थी और इसकी बनावट भी काफ़ी उत्कृष्ट होती
थी। हां ध्यान और प्रार्थना के लिए यहां का वातावरण बड़ा सौहार्द्रपूर्ण होता था।
बगदाद के महान सूफ़ी संत शेख शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के शिष्य शेख बहाउद्दीन
जकारिया ने 13वीं शताब्दी में मुल्तान (अब पाकिस्तान में) भारत की पहली मुख्य
सुहरावर्दी ख़ानक़ाह स्थापित की थी। मुल्तान और सिंध इस सिलसिले की गतिविधियों के
सबसे बड़े केंद्र बने। मुल्तान के अलावा, शेख जलालुद्दीन तबरीजी ने बंगाल में सुहरावर्दी
ख़ानक़ाह की स्थापना की और वहाँ एक विशाल मुफ़्त लंगर की शुरुआत की। बाद में सैयद
जलालुद्दीन बुखारी ने उच्छ (सिंध) में इस सिलसिले को फैलाया, और 14वीं शताब्दी में बुलबुल
शाह के माध्यम से कश्मीर में भी पहली सुहरावर्दी ख़ानक़ाह की नींव रखी गई।
20.8 ख़ानक़ाहों का योगदान
मध्यकालीन इतिहास और भारतीय
समाज के निर्माण में ख़ानक़ाहों का योगदान अत्यंत क्रांतिकारी और बहुआयामी रहा है।
ये केवल धार्मिक पूजा-स्थल नहीं थे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय गतिविधियों के जीवंत केंद्र थे। भारत
में विभिन्न सूफ़ी सिलसिलों की ख़ानक़ाह थीं। पर एक ख़ास बात यह रही कि इनमें आपस में
कोई ईर्ष्या या आपसी प्रतियोगिता देखने को नहीं मिलती है। विभिन्न ख़ानक़ाह के सदस्य
एक दूसरे के प्रति आदर का भाव रखते थे। एक और खास बात यह थी कि उन दिनों के हिंदू
समाज में जाति-प्रथा के कारण कई तबके के लोग
कुछ सुविधाओं से वंचित थे,
जबकि सूफ़ी ख़ानक़ाहों
में इस तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था और कोई भी मुसलमान किसी भी सिलसिले
में दीक्षित हो सकता था। ख़ानक़ाह के केंद्रीय हॉल (जमात-ख़ाना) में एक राजा और एक
गरीब भिखारी दोनों एक साथ फर्श पर बैठते थे। इसने मध्यकाल के ऊँच-नीच से ग्रस्त
समाज में समानता की एक नई लहर पैदा की। इसलिए न सिर्फ़ आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक
तौर पर भी पीरों का प्रभाव समान रूप में रहा। भारत में ख़ानक़ाहों का उदार वातावरण
हिंदू और मुसलमान दोनों को ही प्यार देने में सफल रहा। ख़ानक़ाहों में हिंदू योगियों, सिद्धों और मुस्लिम सूफ़ियों
के बीच आध्यात्मिक विचारों का गहरा आदान-प्रदान हुआ। इसके अलावा इन ख़ानक़ाहों की
गतिविधियों द्वारा सूफ़ियों ने अहिंसा और शांति से समस्याएं सुलझाने के लिए जनता को
प्रेरित किया। आम जनता से जुड़ने के लिए सूफ़ियों ने स्थानीय भाषाओं (जैसे अवधी, हिंदवी, ब्रज और पंजाबी) को अपनाया।
इसी समन्वय से उर्दू और खड़ी बोली (हिंदी) का जन्म हुआ। अमीर ख़ुसरो जैसे
दिग्गजों ने ख़ानक़ाहों के भीतर भारतीय और पारसी संगीत शैलियों को मिलाकर 'कव्वाली' और 'समा' की नींव रखी, जो आज भी भारतीय उपमहाद्वीप
की पहचान है। लगभग हर ख़ानक़ाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) चलती थी, जहाँ भूखों, अनाथों और यात्रियों को
मुफ़्त भोजन मिलता था। दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के ठहरने और बीमारों के
इलाज की व्यवस्था भी ख़ानक़ाहों द्वारा की जाती थी, जिससे यह संकट के समय समाज का
सबसे बड़ा सहारा बनीं। सूफ़ियों ने तलवार या डर के बजाय 'सुलह-ए-कुल' (सबके साथ शांति) और ईश्वरीय प्रेम का संदेश
दिया। उन्होंने रूढ़िवादिता और धार्मिक कट्टरता का कड़ा विरोध किया, जिससे विभिन्न समुदायों के
बीच आपसी नफ़रत कम हुई और भाईचारा बढ़ा। बड़ी ख़ानक़ाहों (विशेषकर सुहरावर्दी
सिलसिले की) में समृद्ध पुस्तकालय होते थे, जहाँ दर्शन, धर्म, इतिहास और विज्ञान की शिक्षा
दी जाती थी। ख़ानक़ाहों के भीतर ही महान दार्शनिक ग्रंथों, कविताओं और 'मल्फ़ूज़ात' (संतों के कथनों का संकलन) की
रचना हुई, जिसने मध्यकालीन भारतीय इतिहास को समझने में इतिहासकारों की बड़ी मदद की है।
उन दिनों शहरों के अधिक से अधिक निर्माण के कारण कई
सामाजिक बुराइयाँ लोगों के जीवन में प्रवेश कर चुकी थीं। अमीर खुसरो ने “क़िरान-उस-सादैन” में
और बरनी ने “तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही” में
जमाखोरी, दास-प्रथा, काला-बाज़ारी, शराबखोरी, वेश्या-वृत्ति, आदि
अनेक सामाजिक अभिशापों का ज़िक्र किया है। इनका प्रमुख कारण अमीर वर्गों के पास
अपार धन-संपत्ति का आ जाना था। सूफ़ी संतों ने
ख़ानक़ाहों के माध्यम से मनुष्य की कमज़ोरियों और सांसारिक आकर्षणों की निंदा करते
हुए समाज-सुधार का प्रयत्न किया।
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मनोज
कुमार
