मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 21. दरगाह

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


21. दरगाह

ये प्रकाश (अल्लाह की पुस्तक और उस का मार्ग दर्शन) उन घरों (पुण्य स्थानों) में है, अल्लाह ने जिन्हें ऊँचा करने, उसकी महिमा का गान करने और उनमें प्रातः तथा संध्या अपने नाम की चर्चा करने का आदेश दिया है। (क़ुरआन : 24:36)

दरगाह एक सूफ़ी-इस्लामी पुण्य स्थान होता है जिसे अक्सर किसी प्रतिष्ठित सूफ़ी संत, पीर, वली या दरवेश की क़ब्र पर बनाया जाता है। फारसी भाषा में 'दरगाह' का शाब्दिक अर्थ "द्वार" या "दहलीज" होता है। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। सूफीमत में दरगाह का अत्यधिक आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है।

दरगाहें सूफी संतों की अंतिम विश्राम स्थली होती हैं। स्थानीय मुस्लिम, तीर्थयात्रा, आध्यात्मिक शांति, आशीर्वाद और अपनी मनोकामनाओं (मन्नत) की पूर्ति के लिए के उद्देश्य से किसी दरगाह की यात्रा करते हैं और इस यात्रा को ज़ियारत कहा जाता है। सूफ़ी संतों की दरगाह पर की गयी ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। भारतीय उपमहाद्वीप में दरगाहों पर ज़ियारत करने की पुरानी परंपरा रही है। किसी दरगाह के साथ अक्सर सूफ़ी बैठकें और विश्राम गृह बने होते हैं जिन्हें खानक़ाह  कहा जाता है। यहाँ नियमित रूप से लंगर (मुफ्त सार्वजनिक रसोई) का आयोजन होता है, जहाँ बिना किसी भेदभाव के गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है। इसके अतिरिक्त आमतौर पर एक मस्जिद, बैठक (कमरे), इस्लामी धार्मिक विद्यालय (मदरसा), शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए घर, अस्पताल, सामुदायिक भवन आदि भी किसी दरगाह परिसर का हिस्सा होते हैं।

सूफ़ी अनुयायियों का मानना ​​है कि दरगाहें ऐसे मक़ाम हैं, जिनके द्वारा वे उसके संत के आशीर्वाद (तवस्सुल के अनुसार, जिसे दावत-ए-क़बूर  या इल्म-ए-दावत  कहा जाता है) प्राप्त कर सकते हैं। जब लोग दरगाहों की ज़ियारत करते हैं तो वे संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद यानी बरक़त की कामना करते हैं। सूफी यह मानते हैं कि संत अपनी मृत्यु के बाद भी रूहानी तौर पर मार्गदर्शन या बरकत देने में सक्षम होते हैं।

दरगाहों का सूफ़ीवाद में मौलिक भूमिका है और सूफ़ी संतों के अनुयायियों के लिए वे अत्यंत धार्मिक महत्व रखते हैं। पैगंबर साहब की एक हदीस में कहा गया है कि, "जो मेरी क़ब्र पर जाएगा, वह मेरी हिमायत का हकदार होगा"। दरगाहों पर प्रार्थना या सेवा की पेशकश के बाद उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं। भक्त दरगाहों पर फूल चढाते हैं, चिराग जलाते हैं, प्रार्थना करते हैं, मन्नत मांगते हैं और लंगर के लिए योगदान देते हैं। दरगाहों में उस संत की सेवा करने के लिए संसार त्यागी दरवेश रहते हैं। ये दरवेश स्वयं भी शेख़ या औलिया हो सकते हैं। उनके मुरीद भी होते हैं जिन्हें वे आध्यात्मिक शिक्षा देते हैं।

दरगाहें बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों के लिए खुली रहती हैं। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समान रूप से मन्नतें मांगते हैं और चादर चढ़ाते हैं। दरगाहों में होने वाली कव्वाली और रूहानी संगीत प्रेम, भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश फैलाते हैं (जैसे अमीर खुसरो की परंपरा)।

उर्स का स्थान सूफीमत में  सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र उत्सवों में से एक है। आमतौर पर किसी सूफ़ी संत की पुण्यतिथि पर उनकी दरगाह पर वार्षिक रूप से आयोजित किये जाने वाले उत्सव को उर्स कहा जाता है। 'उर्स' अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विवाह, यानी पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन। सूफी विचारधारा में ईश्वर (अल्लाह) को 'प्रियतम' और सूफी संत की आत्मा को 'प्रेमिका' माना जाता है। सामान्य तौर पर जहाँ मृत्यु को शोक का अवसर माना जाता है, वहीं सूफी परंपरा में इसे एक उत्सव (जश्न) के रूप में मनाया जाता है। सूफियों का मानना है कि मृत्यु के दिन संत की आत्मा इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक प्रियतम (ईश्वर) से जा मिलती है। इस अंतिम मिलन को 'विसाल' कहा जाता है। चूँकि यह आत्मा का परमात्मा से मिलन यानी एक 'रूहानी शादी' है, इसलिए इस दिन शोक मनाने के बजाय अत्यंत खुशी और उत्सव मनाया जाता है। पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं, इस तरह वे पहले के बजाए उनके अधिक क़रीब हो जाते हैं। लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए और उनका आशीर्वाद लेने के लिए पीर की दरगाह पर जाते हैं। लोग संत की समाधि पास फातिहा (क़ुरआन की पहली सूरत या आयत, सूफ़ी परंपरा में दिवंगत आत्माओं की शांति या बरकत के लिए उनकी कब्र पर की जाने वाली एक विशेष प्रार्थना) पढ़ते हैं। प्रत्येक दरगाह में उर्स का दिन उस दरगाह का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन होता है। संत की समाधि-स्थल पर खूब उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है। समय के साथ, उर्स के अवसर पर दरगाहों में पर श्रद्धालुओं की उपस्थिति में दरवेशों और शेखों के संगीतमय गीतों ने क़व्वाली जैसी संगीत शैलियों को जन्म दिया, जिसमें सूफ़ी काव्यों को संगीत के साथ किसी मुर्शिद को भेंट के रूप में गाया जाता है। आज वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत और मनोरंजन का एक लोकप्रिय रूप बन गए हैं।

उर्स का उत्सव कई दिनों (आमतौर पर 3 से 6 दिन) तक चलता है और इसकी रस्में दरगाह के खादिमों या गद्दीनशीन (वंशज) द्वारा निभाई जाती हैं। उर्स की शुरुआत में संत की मज़ार (कब्र) को पवित्र केवड़े और गुलाब जल से धोया (ग़ुस्ल दिया) जाता है। इसके बाद मज़ार पर चंदन (संदल) का लेप लगाया जाता है। इसे ग़ुस्ल और संदल की रस्म कहा जाता है। सूफी संत की आत्मा की शांति, दुनिया में अमन-चैन और श्रद्धालुओं की मन्नतों के लिए पवित्र क़ुरआन का पाठ (क़ुरआन ख़्वानी) और विशेष सामूहिक प्रार्थनाएं की जाती हैं। उर्स के दौरान देश-विदेश से आने वाले जायरीन (श्रद्धालु), वीआईपी और विभिन्न संस्थाएं मज़ार पर मखमली और जरीदार सुंदर चादरें और गुलाब के फूल अर्पित करते हैं। रस्म-ए-कुल उर्स के समापन की मुख्य रस्म होती है, जिसमें आखिरी दिन विशेष दुआओं के साथ उत्सव का औपचारिक समापन होता है। उर्स की रातें संगीत और रूहानी ऊर्जा से भरपूर होती हैं। दरगाह के 'महफ़िल ख़ाने' में देश के नामी कव्वाल पूरी-पूरी रात सूफियाना कलाम और कव्वालियां पेश करते हैं। संगीत के माध्यम से भक्त भावविभोर होकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाते हैं। उर्स के दौरान दरगाह की रसोई में बड़े पैमाने पर शाकाहारी और पारंपरिक भोजन (जैसे मीठे चावल या देग का भोजन) पकाया जाता है। अमीर हो या गरीब, जाति और धर्म का भेद मिटाकर हजारों-लाखों लोग एक साथ बैठकर लंगर छकते हैं। दरगाह के चारों ओर एक बड़ा मेला लगता है। इसमें तरह-तरह के पारंपरिक सामान, इत्र, धार्मिक पुस्तकें, सूफी संगीत की सीडी/सामान और चादर-फूलों की दुकानें सजती हैं।

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की याद में इस्लामी महीने 'रजब' की 1 से 6 तारीख तक मनाया जाने वाला उर्स दुनिया का सबसे बड़ा उर्स माना जाता है, जहाँ लाखों हिंदू-मुस्लिम श्रद्धालु जुटते हैं। रबी-उल-आखिर महीने में दिल्ली की मशहूर दरगाह पर तीन दिवसीय हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का भव्य उर्स और कव्वाली का आयोजन होता है। अमीर खुसरो का उर्स (दिल्ली) निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह परिसर में ही ईद-उल-फितर (मीठी ईद) के ठीक 18 दिन बाद अमीर खुसरो का उर्स मनाया जाता है, जिसमें उनके लिखे सूफी ग्रंथों और गीतों का पाठ होता है।

मुंबई की बाबा हाजी अली शाह की दरगाह पूरे विश्व में आस्था का केंद्र है। इसकी स्थापना 1431 में हुई थी। बाबा हाजी अली उज़्बेकिस्तान के बुखारा प्रांत से सारी दुनिया का भ्रमण करते हुए भारत पहुंचे थे। ऐसा कहा जाता है कि वे एक बहुत ही समृद्ध परिवार से थे। मक्का की यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी सारी दौलत नेक कामों के लिए दान कर दी। उसी यात्रा के दौरान उनका देहावसान हो गया। ऐसी मान्यता है कि उनका शरीर एक ताबूत में था और वह समुद्र में बहते हुए वापस मुम्बई आ गया। यहीं उनकी दरगाह बनवाई गयी। यह दरगाह भी सूफी वास्तुकला और सांप्रदायिक एकता की एक अनूठी मिसाल है।

बादशाह अकबर द्वारा बनवाया शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह, फ़तेहपुर सीकरी में है। मुगल सम्राट अकबर इनके बहुत बड़े भक्त थे। कहते हैं कि जब अक़बर ने संतान की प्राप्ति के लिए मन्नत माँगने अजमेर शरीफ, ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गए थे तो, वहाँ उसकी मुलाक़ात शेख़ सलीम चिश्ती से हुई थी। शेख़ ने अक़बर को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। कुछ समय बाद बादशाह को संतान प्राप्ति हुई। इसी ख़ुशी में अक़बर ने फतेहपुर सीकरी में इनका सुंदर सफेद संगमरमर का मकबरा बनवाया।

सुहरावर्दी तरीके के संत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह, मुल्तान, पाकिस्तान  स्थित दरगाहें काफी मशहूर दरगाहें हैं।

महरौली में स्थित कुतबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह दिल्ली की सबसे पुरानी दरगाहों में से एक है। दिल्ली का प्रसिद्ध 'कुतुब मीनार' इन्हीं के सम्मान में समर्पित माना जाता है।

हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित है। हजरत निजामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के चौथे सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय संत थे। इनका जन्म 1238 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। वे महान सूफी संत बाबा फरीद के शिष्य थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में दिल्ली सल्तनत के कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन हमेशा सत्ता और अमीरों से दूरी बनाए रखी। उनका मुख्य संदेश था,  "मोहब्बत सबके लिए, नफ़रत किसी से नहीं"। उन्हें आदर से 'महबूब-ए-इलाही' (ईश्वर का प्रिय) भी कहा जाता है। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह अपनी रूहानी वास्तुकला और शांति के लिए जानी जाती है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का मक़बरा 1325 में उनकी मृत्यु के बाद बनवाया गया। दरगाह के अन्दर उनके सबसे प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध शायर अमीर खुसरो और मुग़ल राजकुमारी जहां आरा बेगम का मकबरा भी है। यहाँ हर बृहस्पतिवार की शाम को होने वाली कव्वाली दुनिया भर में मशहूर है, जो सूफी संगीत के जरिए खुदा से जुड़ने का माध्यम मानी जाती है।

हरिद्वार में स्थित पिरान कलियर शरीफ की दरगाह हरिद्वार के पास कलियारी नामक गांव में स्थित है। यह दरगाह अलाउद्दीन अली अहमद साबिर सूफ़ी संत को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस दरगाह का निर्माण अफगान शासक इब्राहिम लोधी द्वारा तेरहवीं शताब्दी में किया गया था।

श्रीनगर (कश्मीर) में शेख़ अब्दुल कादिर जिलानी का मकबरा है। चटगाँव में बाबा फरीद के नाम से मक़बरा है। हालाकि वे पकपतन (पंजाब) में मरे और वहीं दफ़नाए गए।

भारत में सबसे अधिक पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जिन्हें ग़रीब नवाज़ भी कहा जाता है। इनका जन्म 1143 ईस्वी में फारस (वर्तमान ईरान) के सीस्तान क्षेत्र में हुआ था। वे 12वीं शताब्दी के अंत में भारत (अजमेर) आए। गरीबों और असहायों के प्रति अगाध प्रेम के कारण लोग उन्हें आदर से 'गरीब नवाज' (गरीबों के मददगार) कहने लगे। राजस्थान के अजमेर में स्थित अजमेर शरीफ दरगाह देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। इसकी नींव दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इल्तुतमिश ने रखी थी और बाद में मुगल शासकों (अकबर और शाहजहाँ) ने इसका विस्तार किया। इस दरगाह का सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है। मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1324-51) पहला सुलतान था जो इस दरगाह पर आता था। किन्तु शेख़ की मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुलतान गियासुद्दीन ख़लजी ने पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई। सोलहवीं शताब्दी तक आते-आते अजमेर की यह दरगाह बहुत ही लोकप्रिय हो गयी। इस दरगाह को जानने वाले तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अक़बर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया। अक़बर यहाँ चौदह बार आया। कभी तो साल में दो-तीन बार भी आया। वह कभी नई जीत के लिए आशीर्वाद लेने आता था, तो कभी मन्नत के पूरी हो जाने पर तो कभी पुत्र के जन्म पर आता था।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-38

                                   महात्मा गांधी हत्या केस-38

27 जनवरी, 1948

27 जनवरी को गांधीजी फूलवालों की सैर में मेहरौली के पास सूफ़ी संत ख़्वाजा सैयद क़ुबुद्दीन बख़्तियार काकी की दरगाह पर गए। दिल्ली से सात मील दक्षिण में, बहुत ही सुंदर माहौल के बीच महरौली बसा है, जो इतिहास में पृथ्वीराज की प्राचीन राजधानी के रूप में मशहूर है। ख्वाजा सैयद कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह का पवित्रता और सम्मान के मामले में, अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विश्व प्रसिद्ध दरगाह के बाद, इसी दरगाह का स्थान आता है।

दरअसल इस दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी। इससे गांधीजी आहत थे। हालाँकि वहाँ अभी भी काफी नुकसान के निशान दिखाई दे रहे थे, खासकर संगमरमर की जालियों पर तोड़फोड़ के निशान थे, फिर भी, यह दरगाह एक बार फिर अपने असली मालिकों के पास आ गई थी। दिल्ली प्रशासन ने दरगाह परिसर और उसके आसपास के इलाकों की सफाई करवाई, और दंगों के दौरान दरगाह को जो नुकसान पहुँचा था, उसे जहाँ तक संभव हो सका, ठीक करवाया।

गांधीजी ने अपना उपवास तोड़ने के लिए जो शर्तें रखी थीं, उनमें से एक यह थी कि दरगाह पर लगने वाला सालाना मेला शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित होने दिया जाए। उस दिन के क़ौमी मेल-जोल को देख कर गांधीजी काफ़ी प्रसन्न थे। हिंदू, सिख, मुसलमान स्वयंसेवक के कंधे से कंधा मिलाकर लोगों का स्वागत कर रहे थे। हिंदू-सिख स्त्रियां मेले में निरापद घूम रहे थे। गांधीजी अपनी महिला शिष्याओं के एक छोटे से समूह के साथ वहाँ पहुँचे। चूंकि आमतौर पर महिलाओं को दरगाह के भीतरी हिस्से में जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए गांधीजी ने मौलवियों से पूछा कि महिलाओं को कहाँ तक रुक जाना चाहिए। वे मुसकुराए, उन्हें मिठाइयाँ दीं और कहा: "वे यहाँ महिलाओं के रूप में नहीं, बल्कि महात्मा की बेटियों के रूप में आ रही हैं, इसलिए वे दरगाह के भीतरी हिस्से में जा सकती हैं।" इस तरह, मौके की गंभीरता के अनुरूप बहुत धीरे-धीरे चलते हुए, महिलाएं दरगाह के अंदर गईं। वहां उन्होंने क्षतिग्रस्त पर्दे देखे और कुरान की कुछ आयतें पढ़ीं। कोई विश्वास नहीं कर सकता था कि एक हफ़्ते पहले की यह वही दिल्ली थी। वहाँ का माहौल हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे सुनहरे दिनों की याद दिला रहा था।

मुसलमानों के इस धर्मस्थल के मंच से उन्हें भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। गांधीजी ने मेले में इकट्ठा हुए हजारों लोगों को संबोधित किया। गांधीजी ने कहा कि वे यहां तीर्थयात्रा पर आए थे, भाषण देने नहीं। मेले में आए हिंदुओं से कहा गया कि वे मुसलमानों के साथ भाईचारे से रहें, क्योंकि "हम सब एक ही पेड़ के पत्ते हैं।" वहीं, मुसलमानों से कहा गया कि वे पाकिस्तान में अपने भाइयों को पत्र लिखें और उनसे आग्रह करें कि वे अपने दिलों से नफरत निकाल दें और हिंदुओं का कत्लेआम न करें। हमारे इस विशाल देश में रहने वाले सभी वर्गों और समुदायों को एकजुट करना मेरे बचपन से ही सपना रहा है, और जब तक यह सपना पूरा नहीं हो जाता, मेरी आत्मा को चैन नहीं मिल सकता।

सुबह ही उन्होंने एक प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया था, जिसमें कांग्रेस से खुद को भंग करने का आह्वान किया गया था। उन्हें जिस बात का सबसे ज़्यादा डर था, वही सच हो गई थी: कांग्रेस एक ऐसी पार्टी बन गई थी जिसे विशेष अधिकार प्राप्त थे, और जो धांधली भरे चुनावों के ज़रिए अपना अस्तित्व बनाए रखती थी। भ्रष्टाचार हर तरफ फैला हुआ था; कांग्रेस के पदाधिकारी खुद को भारी-भरकम वेतन दे रहे थे, जबकि आधा भारत भूखा मर रहा था। यह शहर में रहने वालों की पार्टी बन गई थी, जो 7,00000 गांवों को पूरी तरह भूल चुकी थी। वे चाहते थे कि पार्टी में आमूल-चूल बदलाव हो और विशेषाधिकार व सत्ता पाने की होड़ हमेशा के लिए खत्म हो जाए। "कांग्रेस को अब खुद से और पूरी दुनिया से यह घोषित कर देना चाहिए कि वह केवल ईश्वर की सेवक है। अगर वह सत्ता पाने की इस भद्दी खींचतान में उलझी रही, तो एक दिन अचानक उसे पता चलेगा कि उसका अस्तित्व ही मिट चुका है।"

यू.एन.ओ. में जिस तरह से कश्मीर मामले में भारत का पक्ष रखा जाना चाहिए था, वैसा नहीं हो रहा था और उलटे भारत को कश्मीर से सेना हटाने के लिए कहा जा रहा था। लौटते वक़्त इससे गांधीजी काफी क्षुब्ध थे। गांधीजी ने अपने सहयोगी से कहा, “यू.एन.ओ. पं. नेहरू की सरकार के लिए समस्याएं खड़ी कर रही है।”

दोपहर में एक ब्रिटिश पत्रकार किन्गसले मार्टिन ने गांधीजी का इंटरव्यू लिया। गांधीजी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अहिंसात्मक स्वरूप पर अपने विचार रखे और यह भी कहा कि लोग दिल से पूरी तरह से अहिंसा का पालन नहीं कर सके, इसी का परिणाम है कि जगह-जगह हिंसा हो रही है। अगर यह 'शक्तिशाली लोगों की अहिंसा' होती, तो हाल ही में हुई जैसी भीषण हिंसा या कत्लेआम कभी न हो पाता। उन्हें इस बात का अहसास नोआखाली में अपनी पदयात्रा के दौरान हुआ था, और तब से वे लगातार सभी को यही बात समझा रहे थे। उनका मानना ​​था कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अहिंसा केवल एक रणनीति (उपाय) थी; अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक तरीके से विरोध इसलिए किया गया, क्योंकि हमारे पास उनसे लड़ने के लिए कोई सैन्य शक्ति नहीं थी।

शाम की प्रार्थना सभा में उन्होंने कश्मीर में स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों की चर्चा की और कहा कि कोई धर्म नहीं सिखाता कि स्त्रियों पर इस तरह के अत्याचार किए जाएं। इसके बाद उन्होंने अमेरिकी लेखक विन्सेंट शीन को इंटरव्यू दिया। वे गांधीजी के साथ अहिंसा के विषय पर चर्चा करना चाहते थे। उन्होंने धर्म के प्रभाव और लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के साधनों के दर्शन पर चर्चा की। खासकर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बल के प्रयोग के विरोध में उन्होंने अपना मत दिया। उनका कहना था कि यदि बुराई कभी-कभी अच्छे परिणाम देती लगती हो, तब भी मेरा अनुमान यह होगा कि नियोजित साधन शायद ग़लत थे। अच्छे परिणाम उत्पन्न करने के लिए अच्छी कार्रवाई का साधन शुद्ध होना चाहिए। काफी देर हो चुकी थी। इंटरव्यू को दूसरे दिन के लिए मुलतवी कर दिया गया।

हत्या की साज़िश

दोपहर में करकरे ने जोशी के घर को छोड़ दिया। वह बंबई सेन्ट्रल स्टेशन आया। उसने फ़्रंटियर मेल के तृतीय श्रेणी का टिकट लिया। गाड़ी छूटने में अभी तीन घंटे की देरी थी। वह प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षा करने लगा।

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27 तारीख को नाथूराम और आप्टे हवाई जहाज़ से दिल्ली के लिए निकले। मुख्य षड्यंत्रकारियों ने अपने आप को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। हमेशा की तरह नाथूराम गोडसे अनगिनत लोगों से अपनी योजना की चर्चा कर रहा था। यहाँ तक कि बम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा के लिए उसने अपना नाम एन विनायकराव लिखवाया, उसका पूरा नाम था नाथूराम विनायक गोडसे। इसी प्रकार आप्टे ने डी नारायण के नाम से यात्रा की, उसका पूरा नाम था नारायण दत्तात्रेय आप्टे।  आप्टे और नाथूराम ने दिल्ली जाने के विमान पर सबसे पिछली सीट पर जगह ली। आदत से लाचार आप्टे एयरहोस्टेस लोर्ना वुडब्रिज से फ़्लर्ट करने लगा। दिल्ली पहुंचने से पहले रास्ते भर वह उस सुन्दर युवती से पीने के लिए कॉफी और खाने के लिए मीठा मांगता रहा । उस एयरहोस्टेस को आप्टे का चेहरा भलीभाँति याद रहा। दिल्ली की इस यात्रा के तीन हफ़्ते बाद, उस एयर होस्टेस मिस लोर्ना वुडब्रिज ने शपथ लेकर बताया कि उसे वे दोनों यात्री याद हैं, जिन्होंने अपना नाम 'डी. नारायण राव' और 'एन. विनायक राव' बताया था। उसने बताया कि वे पीछे की तरफ़ डबल सीटों वाली कतारों में बैठे थे, और यह भी कि नाथूराम खिड़की के पास बैठा था, जबकि आप्टे खिड़की से दूर बैठा था। उसने बताया कि उसे उन दोनों में से एक, आप्टे—इसलिए ख़ास तौर पर याद रहा, क्योंकि उसने उनसे 'आम यात्रियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बार कॉफ़ी या मिठाइयाँ' माँगी थीं। फ़रवरी 1948 के आख़िर में बॉम्बे में हुई एक पहचान परेड (आइडेंटिटी परेड) के दौरान, मिस वुडब्रिज ने बिना किसी हिचकिचाहट के न सिर्फ़ उस यात्री को, बल्कि उसके बगल में बैठे व्यक्ति को भी पहचान लिया। लोर्ना वुडब्रिज को हर बात को पूरी तरह याद रखने की अद्भुत क्षमता थी। इस वजह से आप्टे की वह सोची-समझी योजना पूरी तरह नाकाम हो गई, जिसके ज़रिए वह ख़ुद को किसी दूसरी जगह पर साबित करने (एलिबाई बनाने) की कोशिश कर रहा था। अगर आप्टे और नाथूराम ने भूलेश्वर मंदिर के उन दो भाइयों से मुलाक़ात न की होती और मिस वुडब्रिज ने उन्हें न देखा होता, तो अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) के लिए यह साबित करना थोड़ा और मुश्किल हो जाता कि आप्टे, नाथूराम के साथ दिल्ली गया था और जब नाथूराम ने गांधीजी की गोली मारकर हत्या की, तब वह उसके ठीक बगल में खड़ा था।

गोडसे और आप्टे दोपहर 12.40 बजे विमान से दिल्ली पहुंचे। हवाई अड्डे से, आप्टे और नाथूराम सीधे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ वे 'दिल्ली-बॉम्बे एक्सप्रेस' पकड़ने के लिए काफ़ी समय रहते पहुँच गए थे। वहां से वे ग्वालियर चले गए। इस रियासत का भारत में सम्मिलन की प्रक्रिया चल रही थी। ट्रेन रात 10.38 बजे ग्वालियर स्टेशन पर रुकी। उस समय, फर्स्ट और सेकंड क्लास के निकास द्वार से बाहर निकलने वाले कुछ गिने-चुने यात्रियों में वे दोनों भी शामिल थे। बाहर यार्ड में, चाँदनी रात में जल रही गोबर के उपलों की आग के पीछे, लगभग एक दर्जन ताँगे सवारियों के इंतज़ार में खड़े थे; ताँगे वाले ठंड से बचने के लिए कई परतों वाले कंबल ओढ़े हुए थे। वे ताँगे वालों के पास गए और पूछा कि क्या उनमें से कोई डॉ. परचुरे का घर जानता है।

ग़रीबा नाम का तांगावाला एक रुपए के भाड़ा पर उन्हें ले जाने के लिए तैयार हो गया। रास्ते में तांगे का लगाम टूट गया , जिसके कारण तांगा आगे जाने की स्थिति में नहीं था। गरीबा ने ही आगे की यात्रा के लिए जुम्मा नाम के एक दूसरे तांगेवाले का इंतजाम किया। डॉक्टर परचुरे के घर तक पहुँचने की आगे की यात्रा उन्हें जुम्मा के तांगे से करनी पड़ी। गांधीजी की हत्या की जांच के दौरान पुलिस ने इन दोनों तांगेवालों को मुख्य गवाह बनाया था। अप्रैल 1948 में शिनाख्त परेड (Identification Parade) के लिए गरीबा और जुम्मा दोनों को बॉम्बे (मुंबई) ले जाया गया था। वहां गरीबा ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे दोनों की सही-सही पहचान की थी, जबकि जुम्मा ने केवल गोडसे को पहचाना था और आप्टे की जगह किसी अन्य व्यक्ति पर उंगली रख दी थी। यह गवाही अदालत में आरोपियों की ग्वालियर मौजूदगी को साबित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण कड़ी बनी थी।

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साज़िशकर्ताओं के  छोटे से दल का तीसरा सदस्य, करकरे, उस समय बॉम्बे-दिल्ली फ्रंटियर मेल के खचाखच भरे थर्ड-क्लास डिब्बे में बैठा था। उसने सुबह का समय जोशी के घर पर कुछ पत्र लिखने में बिताया था। दोपहर से ठीक पहले, वह अपना सामान लेकर सेंट्रल स्टेशन पहुँच गया था, अपनी ट्रेन छूटने से कम से कम तीन घंटे पहले। हत्या के समय उसकी भूमिका केवल एक दर्शक की थी, एक ऐसी भूमिका जिसके लिए वह खुद आगे आया था। और, गांधीजी की हत्या होते हुए देखने के इस 'मौके' के लिए, यह शांत स्वभाव वाला, मूल रूप से दयालु और उदार व्यक्ति मानो अपनी जान ही दांव पर लगा रहा था।

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डॉ. दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे

ग्वालियर का रहने वाला डॉ. दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे एक डॉक्टर था। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ-साथ अपने कई भाइयों के परिवारों के सदस्यों के साथ ग्वालियर के लश्कर (छावनी क्षेत्र) में स्टेशन रोड पर स्थित एक बहुत बड़ी हवेली में रहता था। वह 47 साल का था। एक डॉक्टर के तौर पर बस ठीक-ठाक ही सफल था। ग्वालियर की राजनीति में वह सबसे विवादित व्यक्ति था। उसके कई ताकतवर दोस्त थे, तो कुछ कट्टर दुश्मन भी। उसके पिता राज्य के शिक्षा विभाग में एक उच्च पद पर थे और एक बहुत सम्मानित व्यक्ति थे। उसका परिवार पूना का रहने वाला शिक्षकों का परिवार था। बाद में उसका परिवार ग्वालियर की रियासत में आकर बस गया। उसने स्कूल और स्नातक की पढ़ाई पूना से की थी और बंबई से मेडिकल की डिग्री हासिल करने के बाद ग्वालियर आ गया था। परचुरे ने बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड सर्जरी के रूप में योग्यता प्राप्त की, और राज्य चिकित्सा सेवा में शामिल हो गया। 1934 में उसे बर्खास्त कर दिया गया और निजी तौर पर अभ्यास करना शुरू कर दिया। वह एक शिक्षाप्राप्त एलोपैथिक डॉक्टर था, फिर भी आयुर्वेदिक और होम्योपैथी की प्रैक्टिस किया करता था। उसकी डिस्पेन्सरी पाटन्कार बाज़ार में थी। वह रक्त को शुद्ध करने और श्वसन रोगों के लोगों को ठीक करने के लिए घर-निर्मित दवा बेचा करता था। परचुरे  ग्वालियर में हिन्दू महासभा का संस्थापक था और हिन्दू राष्ट्र सेना के मुखिया के रूप में उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाया करता था। वह हर सुबह हिन्दू महासभा के द्वारा आयोजित परेड में भाग लेता था।

उसका चेहरा गोल था, जिसमें चश्मे के पीछे से उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें कुछ बेजान सी नज़र आती थीं। उसका चश्मा इतना मोटा था कि उसके पार देखना मुश्किल था। वह बड़े-बड़े बाल और काफी लंबी दाढ़ी रखता था जिससे वह साधु की तरह दिखता था। वह एक साथ संत और खतरनाक, दोनों तरह का लगता था, किसी असली गुरु से भी कहीं ज़्यादा 'गुरु' जैसे दिखने वाला, लेकिन साथ ही ऐसा इंसान जिसमें गुस्सा, ज़हर और कट्टरता कूट-कूट कर भरी थी। वह काफी बदमाश था। वह गुस्सैल भी था।

ग्वालियर की राजनीति में वह काफी सक्रिय रहता था। ब्रिटिश राज के दौरान, हैदराबाद और कश्मीर की तरह ग्वालियर भी एक बड़ी रियासत थी। सत्ता हस्तांतरण के बाद, यह अपने आप कांग्रेस के शासन में नहीं आ गई थी। महाराजा ही इसके शासक बने रहे, और उन्होंने नेहरू सरकार के साथ केवल एक 'स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट' (यथास्थिति समझौता) पर हस्ताक्षर किए थे। कांग्रेस, जो रियासतों को भारत में मिलाने के लिए बहुत बेताब थी, इन रियासतों में लोकतांत्रिक आंदोलनों को बढ़ावा देने और समर्थन देने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही थी, जिसे कई राजा-महाराजा अपने शासन को खत्म करने की एक चाल मानते थे। और, चूंकि कांग्रेस के लिए 'लोकतांत्रिक शासन' का मतलब 'कांग्रेस पार्टी का शासन' था, इसलिए वह ग्वालियर रियासत में भी अपनी सरकार (मंत्रिमंडल) बनाना चाहती थी। ग्वालियर में जनमत का प्रतिनिधित्व करने के कांग्रेस के दावे को हिंदू महासभा ने कड़ी चुनौती दी। चूंकि उस समय कोई आम चुनाव नहीं हुए थे, इसलिए यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं था कि किसका दावा ज़्यादा ठोस या सही है। हिंदू महासभा के पास यह मानने के लिए ठोस आधार था कि वह राज्य में बहुसंख्यक पक्ष का प्रतिनिधित्व करती है।

ग्वालियर हिंदू महासभा को लगभग पूरी तरह से डॉ. परचुरे ने ही शून्य से खड़ा किया था। वह इसका सचिव होने के साथ-साथ मुख्य आयोजक भी था। वह महासभा की ग्वालियर इकाई के उग्र विंग का प्रमुख भी था, जो खुद को 'हिंदू राष्ट्र सेना' (इंडियन नेशनल आर्मी) कहती थी। सेना का दावा था कि उसके पास तीन हजार लोगों की ताकत है। जब देश स्वतंत्र हुआ तो परचुरे को मालूम था कि ग्वालियर के महाराज जियाजीराव सिंधिया के दिन गिने चुने हैं। उसे लग रहा था कि महाराज हिन्दू महासभा को सरकार बनाने के लिए निमंत्रित करेंगे, लेकिन सिंधिया ने कांग्रेस को निमंत्रित किया। कांग्रेस ने महासभा के साथ संयुक्त मंत्रिमंडल बनाने से मना कर दिया। यह 24 जनवरी की बात थी। ग्वालियर रियासत में कांग्रेस का मंत्रिमंडल बन गया। परचुरे ने तो ग्वालियर का मुख्यमंत्री बनने का सपना पाल रखा था। यह सब देखकर उसे बहुत ही निराशा हाथ लगी। उसने लाल कोठी पर एक प्रदर्शन भी किया था। कांग्रेस के प्रति उसके दिल में नफ़रत भरी हुई थी। परचुरे बहुत गुस्से में था।

महासभा के महाराष्ट्र के पदाधिकारी के रूप में गोडसे से उसकी मुलाक़ात होती रहती थी। पिछली बार उन्होंने सावरकर के ‘हिन्दू राष्ट्र दल’ और परचुरे की ‘सेना’ को मिलाकर एक नए दल के गठन की संभावनाओं पर विचार किया था, लेकिन नेतृत्व के सवाल पर बात नहीं बनी। लेकिन इस दौरान यह बात सामने आई कि जीवन के अपने मिशन के कई पहलुओं को लेकर दोनों की सोच और भावनाएं बिल्कुल एक जैसी थीं। दिसंबर 1947 में महासभा-आर.एस.एस. की अलवर में एक संगोष्ठी हुई थी, जिसमें दोनों मिले थे और यहां गोडसे ने अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण लिया था। जब गोडसे ने उसे गांधीजी की हत्या की योजना के बारे में बताया तो उसका गांधीजी के प्रति गुस्सा और नफ़रत बाहर आ गया। जीवन के अपने मिशन के कई पहलुओं को लेकर दोनों की सोच और भावनाएं बिल्कुल एक जैसी थीं। नाथूराम ने इसी व्यक्ति के पास जाने का फैसला किया, ताकि वह गांधीजी की हत्या के लिए उससे कोई हथियार मांग सके।

दत्तात्रेय परचुरे ने ही गांधीजी के हत्यारों, आप्टे एवं गोडसे को इटली में बनी 9mm बेरेटा स्वचालित पिस्टल मुहैया कराई थी।

जब परचुरे के घर के दरवाज़े पर नाथूराम ने दस्तक दी उस समय रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह नाथूराम गोडसे के बारे में 1939 से सुनता आया था, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उससे 1941 में मिला था। दरवाज़ा परचुरे के बेटे नीलकंठ ने खोला। जब नीलकंठ ने अपने पिता को बताया कि कोई नाथूराम मिलने आया है, तो आधी नींद से जगता हुआ और गुस्से से झुंझलाता हुआ परचुरे अपने कमरे से बाहर आया। परचुरे ने उन्हें चाय की पेशकश की, जिसे आप्टे ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया, लेकिन नाथूराम ने - जो कॉफी पीने का शौकीन था - मना कर दिया।

उसने नाथूराम से बिना बुलाए आने का कारण पूछा। बिना किसी लाग-लपेट के नाथूराम ने साफ-साफ स्वरों में कहा कि वह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मिशन पर आया है।  वह गांधीजी की हत्या करने आया है और उसे एक पिस्तौल की ज़रूरत है। हालाकि उसके पास एक रिवाल्वर था, लेकिन वह अपने काम को अंजाम देने के लिए उससे बेहतर रिवाल्वर ख़रीदना चाहता था। बंदूक उपलब्ध कराने में वह परचुरे की सहायता  चाहता था। परचुरे ने उसे अपना रिवाल्वर देने से मना कर दिया, लेकिन उसने भरोसा दिलाया कि अगली सुबह उसके लिए कुछ इंतज़ाम कर देगा। उसने दोनों को उसके घर में रात बिताने के लिए कहा। वे डॉक्टर परचुरे के यहां रातभर ठहरे।

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27 जनवरी को दोपहर बाद अंततः राणा एक लंबी यात्रा पूरी कर बंबई में पहुंचा। जब बंबई पहुंचा, तब तक गैंग के तीन सदस्य बंबई छोड़ चुके थे। राणा सीधे नागरवाला के घर गया। असल में, वे नागरवाला के मेहमान बनकर रहे और उन्हें मदनलाल से हुई पूछताछ की पूरी रिपोर्ट दी, जिसमें 'हिंदू राष्ट्र' के संपादक के साज़िश में शामिल होने का ज़िक्र था। लेकिन नागरवाला अभी भी अपनी इस थ्योरी पर अड़े हुए थे कि साज़िश गांधी की हत्या की नहीं, बल्कि उन्हें अगवा करने की थी, और उन्होंने अपने मेहमान को भी इस बात के लिए मना लिया कि दिल्ली पुलिस ग़लत रास्ते पर चल रही है। नागरवाला ने दिल्ली में संजीवी से फोन पर बात की और बताया कि वे जांच कर रहे हैं, और किसी भी प्रगति की जानकारी उन्हें देते रहेंगे। नागरवाला ने अपनी थ्योरी परोसते हुए संजीवी को बताया कि असल साज़िश अपहरण की थी। बीस लोगों का एक कोर ग्रुप है। इस ग्रुप के हरेक सदस्यों को बीस-बीस समर्पित स्वयं-सेवक मदद करते हैं। उसने यह भी डींग हांकी कि वह जल्द ही पूरी साज़िश का पर्दाफ़ाश कर देगा और नागरवाला ने यह भी कहा कि उसे उस इकबालिया बयान पर कोई काम करने की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि जल्द ही वह प्रमुख साज़िशकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लेगा। उसने संजीवी को गांधीजी की सुरक्षा के लिए अधिक सावधानी बरतने की चेतावनी दी। नागरवाला पारेल स्थित हिन्दू महासभा के ऑफिस की निगरानी करवा रहा था, जबकि अपराधी दादर स्थित कार्यालय का उपयोग कर रहे थे। संजीवी ने भी नागरवाला पर ज़्यादा दवाब न डालते हुए उसके रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना ज़्यादा उचित समझा। हो सकता है कि तथाकथित साज़िश की हिम्मत और उसमें शामिल लोगों की संख्या देखकर संजीवी हैरान रह गए हों, लेकिन ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने अपहरण की थ्योरी में कोई कमी निकाली हो, उसे खारिज किया हो, या उसके खिलाफ़ कोई तीखी प्रतिक्रिया दी हो। संजीवी ने बस इतना किया कि नागरवाला से अगले दिन रिपोर्ट भेजने को कहा। ‘नागरवाला ने तीन दिन बाद रिपोर्ट भेजी, और संजीवी को नागरवाला की रिपोर्ट 31 तारीख़ की सुबह में मिली, गांधीजी की हत्या के अगले दिन। तब तक गांधीजी की हत्या हुए बारह घंटे से अधिक का समय बीत चुका था। वैसे भी, इस रिपोर्ट में ‘हत्यारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।’

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आज़ादी मिलने के बाद से ही, देश की राजधानी में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 144 लागू कर दी गई थी। इस धारा के तहत अधिकारियों को यह अधिकार मिल जाता है कि वे ऐसी किसी भी सार्वजनिक सभा पर रोक लगा सकें, जो उनकी राय में शांति भंग कर सकती हो। उस समय के तनावपूर्ण माहौल में, इसका सीधा मतलब यह था कि सभी तरह की सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी, गांधीजी के उपवास वाले व्यस्त सप्ताह के दौरान, दिल्ली पुलिस ने धारा 144 को उतनी सख्ती से लागू नहीं किया, जितनी वे आमतौर पर करते थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नागरिकों के कई समूह सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति अपना उत्साह दिखाने के लिए आगे आए थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी थी। अगर पुलिस उनकी सभाओं पर भी रोक लगा देती, तो ऐसा लगता मानो पुलिस गांधी-विरोधी या मुस्लिम-विरोधी गुटों के साथ मिली हुई है।

चूंकि एक तरह की सार्वजनिक सभाओं को होने दिया गया था, इसलिए हिंदू महासभा की दिल्ली इकाई ने अधिकारियों की इस ढील का फायदा उठाने का सोचा। उन्होंने अपनी एक सभा आयोजित करने की योजना बनाई, ताकि दिल्ली की जनता को यह बताया जा सके कि उनका संगठन उस 'सात-सूत्रीय शांति संकल्प' (seven-point Peace Pledge) का समर्थन नहीं करता, जिसे गांधीजी का उपवास तुड़वाने के लिए तैयार किया गया था।

27 जनवरी की दोपहर चार बजे, राजधानी के शॉपिंग सेंटर, कनॉट प्लेस के बीचों-बीच मौजूद एक बड़े खुले मैदान में भारी भीड़ जमा हो गई। सभा के दौरान महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के खिलाफ अत्यंत आक्रामक और तीखे भाषण दिए गए थे। इस बैठक में हिंदू महासभा के प्रमुख नेता महंत दिग्विजयनाथ ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया था। महंत दिग्विजयनाथ ने अपने भाषण में महात्मा गांधी को "हिंदू-विरोधी तत्व" बताते हुए उन्हें पाकिस्तान चले जाने की बात कही थी। वहां मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों को यह समझने में भी देर लग गई कि यह कोई ऐसी-वैसी सभा नहीं है, जिसे किसी सामाजिक समूह ने सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देने के लिए बुलाया हो। एक के बाद एक वक्ता खड़े हुए और गांधीजी की कड़ी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधीजी ने सरकार पर दबाव डालकर उसे एक ऐसे देश को 55 करोड़ रुपये देने के लिए मजबूर किया, जो भारत के साथ युद्ध कर रहा था। उन्होंने सरकार की भी आलोचना की कि उसने गांधीजी को अपनी शर्तें थोपने दीं। एक वक्ता ने तो गांधीजी की तुलना हिटलर से कर दी और भविष्यवाणी की कि उनका अंजाम भी हिटलर जैसा ही होगा। सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें 'शांति संकल्प' (पीस प्लेज) को खारिज कर दिया गया और पाकिस्तान को नकद राशि देने के लिए सरकार की निंदा की गई। सभा का समापन इन नारों के साथ हुआ: 'हिंदू एकता जिंदाबाद! मुसलमानों को बाहर निकालो! मदनलाल जिंदाबाद!'

सरकार इस घटना से स्तब्ध थी। धारा 144 लागू होने के बावजूद ऐसी सभा कैसे हो सकती थी? कांग्रेस नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया, अधिकारी घबरा गए और किसी न किसी को बलि का बकरा खोजने लगे; जवाब-तलब किए गए और फटकार लगाई गई। प्रशासन की ओर से दबी जुबान में यह स्वीकार किया गया कि उनसे एक 'बेहद खेदजनक चूक' हो गई है। इस विवादित सभा और उसमें लगाए गए आपत्तिजनक नारों की सूचना मिलने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उसी दिन (27 जनवरी, 1948 को) दिल्ली के खुफिया/पुलिस प्रमुख टी.जी. संजीव को पत्र लिखकर चिंता व्यक्त की थी और हिंदू महासभा की इन बढ़ती आक्रामक गतिविधियों पर जानकारी व कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी थी। इसके ठीक तीन दिन बाद, 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

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