गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-37

 

महात्मा गांधी हत्या केस-37


26 जनवरी, 1948

सोमवार, 26 जनवरी, 1948 को गांधीजी के मौन व्रत का दिन था। शाम की प्रार्थना सभा में प्यारेलाल ने उनका लिखा हुआ भाषण पढ़ा, "आज, 26 जनवरी, स्वतंत्रता दिवस है। जब हम उस आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जिसे हमने न तो देखा था और न ही जिसका अनुभव किया था, तब इसे मनाना बिल्कुल उचित था। लेकिन अब! हमने इसे पा लिया है, और ऐसा लगता है कि हमारा मोहभंग हो गया है। कम से कम मेरा तो हो ही गया है, भले ही आपका न हुआ हो। आइए हम यह उम्मीद रखें कि भले ही भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भारत दो हिस्सों में बंट गया हो, लेकिन दिल से हम हमेशा दोस्त और भाई बने रहेंगे; एक-दूसरे की मदद करेंगे, एक-दूसरे का सम्मान करेंगे और बाहरी दुनिया के सामने एक होकर रहेंगे।"

गांधीजी को विश्वास था कि बुरी घड़ी बीत चुकी है। भारत के लोग अब सभी वर्गों और धर्मों की समानता के लिए काम करेंगे। अल्पसंख्यक समुदाय पर बहुल समुदाय का वर्चस्व व श्रेष्ठता स्थापित नहीं होगी, भले ही अल्पसंख्यक समुदाय संख्या या प्रभाव की दृष्टि से कितना भी छोटा क्यों न हो। उन्होंने यह आशा भी जतायी कि यद्यपि भौगोलिक और राजनीतिक रूप से भारत दो भागों में बँट चुका है, लेकिन हृदय में हम सभी सदैव मित्र एवं भाई रहेंगे, एक-दूसरे को मदद व सम्मान देते रहेंगे और शेष विश्व के लिए हम एक ही होंगे।

हत्या की साज़िश

सोमवार, 26 जनवरी 1948 के दिन की शुरुआत धुंध और पहाड़ी इलाकों जैसी ठंडी हवा के साथ हुई, ऐसा मौसम मुंबई में शायद ही कभी देखने को मिलता है। आप्टे और नाथूराम ने एक भरोसेमंद रिवॉल्वर पाने के लिए अपनी पहचान छिपाने का जोखिम उठाने का फैसला किया। उन्हें पता था कि भूलेश्वर मंदिर के दोनों भाइयों के पास लाइसेंसी रिवॉल्वर हैं, जिनमें से कोई भी नाथूराम के काम के लिए एकदम सही रहती। उन दोनों भाइयों के पास कहीं और से भी ऐसा हथियार जुटाने के साधन थे। दरअसल, बड़े भाई, दादा महाराज ने एक बार आप्टे से वादा किया था कि वह उसे एक अच्छी रिवॉल्वर देगा, जिसके बदले में आप्टे ने उसे पूना में एक पिस्तौल दी थी। उन्होंने जल्दी से नाश्ता किया और टैक्सी लेकर भूलेश्वर मंदिर पहुँच गए।

वे दादा महाराज के पास गए। वे एक अच्छी प्रभावकारी रिवाल्वर की मांग कर रहे थे। दीक्षित ने पूछा, “इसकी क्या ज़रूरत है?” तो उन्होंने जवाब दिया, कश्मीर में क़बायलियों से लड़ने के जो सामान जा रहा है, उसके साथ हम भी जाएंगे और यह हमारी सुरक्षा के लिए चाहिए क्योंकि दिल्ली के आगे की यात्रा रिवाल्वर के बिना करना ख़तरनाक है।”  दीक्षित को इन दोनों के इरादे कुछ ठीक नहीं लगे। उसने पूछा, “पिछली बार तुमने तीस हज़ार रुपयों के शस्त्रास्त्र जमा किए थे और बोले कि तुम कश्मीर जा रहे हो। वहां के क़बायली आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ तुम उसका इस्तेमाल करने वाले थे। कश्मीर से तुम इतनी जल्दी कैसे लौट गए।” उन्होंने उत्तर दिया, “आधी सामग्री हमने दिल्ली से आगे भेज दिया और आधी भेजने का प्रबंध करके लौट आए हैं।” दादा महाराज ने कहा, “रिवाल्वर के मामले में मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकता।” उन्होंने फिर आग्रह किया, “आप शाम तक हमें एक रिवाल्वर जुटा दीजिए। देखिए हमारे पास एक है, हमें एक और रिवाल्वर की ज़रूरत है।” उन्होंने अपना रिवाल्वर दादा महाराज को दिखाया। परन्तु दादा महाराज ने उन्हें मना कर दिया। बाद में कमीशन को उसने बताया, “26 जनवरी 1948 को आप्टे और गोडसे मेरे पास आए और मुझसे वह रिवॉल्वर मांगी जिसका मैंने उनसे वादा किया था, या फिर उसके बदले में उतनी ही रकम मांगी। मैंने खुद को नैतिक रूप से बाध्य माना कि या तो मैं आप्टे की पिस्तौल वापस कर दूं, या उसके बदले में कोई दूसरी रिवॉल्वर दे दूं, या फिर पिस्तौल की कीमत चुका दूं... ऐसा लगा कि उन्हें पिस्तौल की कीमत से कहीं ज़्यादा उस रिवॉल्वर को पाने की जल्दी थी।”

उस समय उनके लिए पैसों का कोई खास महत्व नहीं था, उनके लिए तो बस वह रिवॉल्वर मायने रखती थी जिसका वादा किया गया था; असल में, दादा महाराज ने उन्हें न तो कोई काम की रिवॉल्वर दी और न ही आप्टे की पिस्तौल के बदले कोई रकम। वे उन्हें छोड़कर मंदिर के आंगन के ठंडे संगमरमरी फर्श से होते हुए उस जगह गए, जहाँ दीक्षितजी महाराज रहते थे। लेकिन छोटा भाई भी बिल्कुल असहयोगी निकला। सुबह का पूरा समय बेकार चला गया। वे बस इतना ही कर पाए कि दो ऐसे गवाह जुटा लिए, जो इस बात की गवाही देने को तैयार थे कि 26 जनवरी को वे बॉम्बे में थे और किसी भी तरह एक रिवॉल्वर हासिल करने के लिए बेताब थे।

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आप्टे और गोडसे के लिए दोपहर का समय कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद रहा। वे परांजपे के दफ़्तर गए, जहाँ अपने वादे के मुताबिक, उसने उनके लिए 10,000 रुपये तैयार रखे थे। अचानक उन्हें लगने लगा कि अब वे आसानी से एक रिवॉल्वर हासिल कर सकते हैं। इतनी रकम हाथ में होने से, यह काम काफ़ी आसान हो गया था।

शाम में नौ बजे करकरे से मिलने का समय तय था। अभी उनके पास काफी वक़्त था और जेब में नोट भरे हुए थे। उन्होंने कुछ आनन्द उठाने की ठानी। आप्टे ने मनोरमा को बुला लिया। मनोरमा साल्वी उसके साथ गई। वह दो दिनों में ज़्यादातर समय उनके साथ रही, जबकि नाथूराम फ़िल्में देखता रहा और उसने कोशिश की कि उन दोनों को जितना हो सके, एक-दूसरे के साथ अकेले रहने का मौका मिले। शायद ये आप्टे और मनोरमा के साथ बिताए गए आख़िरी कुछ घंटे थे। बाद में मनोरमा ने कहा कि आप्टे ने उसे यह नहीं बताया था कि वह और नाथूराम क्या करने की योजना बना रहे हैं। लेकिन इस बात पर यकीन करना मुश्किल है, खासकर इसलिए क्योंकि उसे पता था कि वे दिल्ली जा रहे हैं, और आप्टे ने खुद को बचाने के लिए (एक झूठा सबूत तैयार करने के मकसद से) उससे कहा था कि वह दिल्ली एक टेलीग्राम भेज दे। दरअसल आप्टे को चाल सूझी। वह मनोरमा का इस्तेमाल ऐलिबी के रूप में करना चाहता था। उसने मनोरमा से कहा, जैसे ही तुम्हें दिल्ली में नाथूराम के द्वारा किए गए काम का अंजाम मालूम हो, तुम दिल्ली के हिन्दू महासभा के दफ़्तर में एक टेलीग्राम कर देना – “Arriving in Delhi to arrange Godse’s defence. Narayan D. Apte’’ मनोरमा के अनुसार, नाथूराम ने उसे यह नहीं बताया कि वह ऐसा क्या करने वाला था जिसके लिए उसे अपने बचाव की व्यवस्था करने के लिए किसी और की ज़रूरत पड़ सकती थी, या आप्टे के लिए यह साबित करना क्यों इतना ज़रूरी था कि जब नाथूराम वह काम कर रहा था, तब आप्टे बंबई में मौजूद था।

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पाहवा की गिरफ्तारी और उनकी योजना की विफलता ने साज़िशकर्ताओं को निराश तो किया लेकिन उन्हें अपने उद्देश्य से विचलित नहीं किया। उन्हें लग रहा था कि जल्द ही उन्हें अपनी योजना को अंजाम दे देना चाहिए, क्योंकि उन्हें डर था कि पुलिस पूछताछ के दौरान पाहवा अपनी चुप्पी बनाए रखने में सक्षम नहीं होगा, और उन्हें पता लगाने और हिरासत में लेने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। शाम में जल्दी खाना खा लेने के बाद नाथूराम और आप्टे ने ठाणे के लिए ट्रेन पकड़ी। करकरे प्लेटफॉर्म पर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। वे तीनों रेल की पटरियों को पार करके गुड्स यार्ड (माल गोदाम) के एक सुनसान हिस्से में, एक लैंप के नीचे बैठ गए। यह पूरी तरह से सुनसान जगह थी। रात के करीब 9.45 बजे थे। और वह एक चांदनी रात थी। करकरे ने आप्टे और गोडसे से पूछा कि वे 20 जनवरी के विस्फोट के बाद दिल्ली से कैसे वापस आए थे। गोडसे शांत मूड में था और उसने करकरे से इस मामले के बारे में कुछ भी चर्चा नहीं करने के लिए कहा। उसने कहा कि बात वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की योजनाओं के बारे में की जाए। यह बहुत ज़रूरी है, क्योंकि मदन लाल को गिरफ्तार कर लिया गया है और वह हमारे नामों का खुलासा करेगा। गोडसे ने यह भी कहा कि हमें पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाएगा और गांधीजी की हत्या की हमारी योजना विफल हो जाएगी। उसके विचार में अब 9-10 के ग्रुप में चलने की मूल योजना ग़लत थी। अतः गोडसे अब बार-बार कहने लगा कि गाँधीजी की हत्या वही करेगा। लेकिन उसे किसी की मदद की भी ज़रूरत है। शायद इतने बड़े महामानव का सामना करने के लिए, नैतिक बल चाहता हो। नाथूराम असफलता से बहुत ही हताश था। वह गुम-सुम रहने लगा। लेकिन उसके मन में दृढ़ निश्चय पल रहा था। उसने प्रण लिया वह ख़ुद उस काम को अंजाम देगा जो उस दिन असफल हो गया था। अब वह ख़ुद गैंग का लीडर था। अब तक तो आप्टे लीडर था और वह सब कुछ देखता और पालन करता आया था। अब गोडसे निर्णय लेने वाला था और आप्टे उसका सहयोगी।

गोडसे ने करकरे को अहमदनगर जाने के लिए कहा, और बोला अगर वह चाहे तो हिंदू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाए। उसने करकरे से हिंदू राष्ट्र प्रकाशन के शेयरों की बिक्री को आगे बढ़ाने और आप्टे के स्थान पर एक अच्छे लेखक की तलाश करने का भी अनुरोध किया। करकरे इस सुझाव से दंग रह गया और आप्टे चुप था। करकरे को लगा कि गोडसे और आप्टे ने इस मामले पर चर्चा की होगी; और आप्टे गोडसे की मंशा से पूरी तरह वाकिफ था। शायद आप्टे ने नाथूराम के साथ खड़े होने का मन बना लिया है। करकरे ने गोडसे से पूछा कि क्या 20 तारीख की विफलता से तुम्हें महाराष्ट्र में अपना चेहरा दिखाने में शर्म आती है, और क्या उसके लिए खुद को मारने के लिए तैयार करने का यही कारण है। यह प्रश्न सुन गोडसे स्तब्ध हो गया और बोला, ऐसी बातें मत कहो और तुम्हें जो काम सौंपा गया है उसे पूरा करो। करकरे ने ज़ोर देकर पूछा कि तुम लोग गांधीजी की हत्या कैसे करने जा रहे हो।

गोडसे ने कहा वह और आप्टे अगली सुबह दिल्ली के लिए उड़ान भरने वाले थे, जहाँ से वे सीधे ग्वालियर जाने वाले थे। ग्वालियर में नाथूराम एक ऐसे व्यक्ति को जानता था, जिसके बारे में उसे पूरा यकीन था कि वह उसे एक भरोसेमंद हथियार दिला सकता है। उसे उम्मीद थी कि वह 29 तारीख की सुबह, जो कि गुरुवार था, दिल्ली वापस आ जाएगा। करकरे को लगा कि उसे भी उनके साथ रहना चाहिए, उसने गोडसे से कहा कि मैं भी तुम्हारे अभियान में शामिल होना चाहता हूँ।

गोडसे ने करकरे को बताया कि बड़गे और शंकर सुरक्षित पूना पहुंच गए हैं और अपना काम कर रहे हैं। गोडसे ने यह भी बताया कि आप्टे पूना गए था और अपने निजी मामलों को सुलझा लिया है। यह सुनकर करकरे बहुत उत्साहित हो गया, और उसने अपना इरादा घोषित कहा कि मैं भी तुम लोगों के साथ अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हूँ।

गोडसे ने बताया अगर करकरे 27 तारीख को ट्रेन से बंबई से निकलता, तो वह 28 तारीख की रात तक दिल्ली पहुँच जाता। 29 तारीख को उसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर, क्वींस गार्डन के बीचों-बीच बने पत्थर के फव्वारे के पास उनका इंतज़ार करना था।

यहीं पर, नाथूराम गोडसे ने इस योजना से अपने भाई गोपाल गोडसे को भी बाहर रखने का निर्णय लिया। इस प्रकार अब यही तीनों हत्या की योजना में शामिल थे। नाथूराम ने करकरे को जो योजना समझाई थी, उस पर करकरे ने हामी भरी। आप्टे ने उसे तीन सौ रुपए दिए। उसके बाद तीनों ने चाय पी। आप्टे और नाथूराम लोकल ट्रेन बंबई चले गए। करकरे जोशी के घर के लिए रवाना हुआ। गोडसे और आप्टे उस समय बंबई के एक होटल में वी. विनायकराव और डी. विनायकराव के नाम से ठहरे थे।

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यू.एच. राणा, जिसके पास संजीवी द्वारा दिया गया मदनलाल का इकबालिया बयान का अनुवाद था, इलाहाबाद से बंबई के लिए 36 घंटे के सफर में अब भी ट्रेन में ही था।

 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-5

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

 


19. सूफ़ी रहस्यवाद-5

19.12 प्रेमी और प्रियतमा का संबंध

रहस्यवाद की प्रवृत्ति, धर्म से जुड़ी होकर भी धर्म के सांस्थानिक रूप से थोड़ी अलग होती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की आध्यात्मिक, दार्शनिक जिज्ञासा के स्वाभाविक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों को बनाये रखने की दृष्टि से जुड़ी होती है। एक साधारण इंसान तो अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, अपनी सांसारिक क्रियाओं में व्यस्त रहता है। लेकिन जब उसके अंदर ईश की सुध जग जाती है तो वह उस पर आसक्त हो जाता है, जिसे इश्क़ कहते हैं। सूफ़ी अपने को प्रेमी ('आशिक') और ईश्वर को प्रियतमा ('माशूक') मानते हैं। पारंपरिक धार्मिक दृष्टिकोणों के विपरीत, जहाँ ईश्वर को अक्सर पिता या स्वामी के रूप में देखा जाता है, सूफी संतों ने ईश्वर की कल्पना एक अत्यंत सुंदर प्रियतमा के रूप में की है। साधक (इंसान) स्वयं को उस प्रियतमा के वियोग में तड़पने वाला प्रेमी मानता है। प्रियतमा को आकर्षित करने के लिए उन्होंने नृत्य, भजन-कीर्तन एवं सात्विक तथा पवित्र आचरण पर बल दिया। इस दिव्य प्रेम को व्यक्त करने के लिए सूफियों ने शायरी, ग़ज़ल और संगीत (कव्वाली) का सहारा लिया। अमीर खुसरो, जलालुद्दीन रूमी, हाफ़िज़ शिराज़ी और बुल्ले शाह जैसे सूफी संतों की रचनाओं में मिलने वाले 'मदिरा' (शराब), 'साकी' (बुलबुला/मार्गदर्शक) और 'ज़ुल्फ़' जैसे शब्द वास्तव में ईश्वर के प्रति उनके गहरे और दीवाने प्रेम के प्रतीक हैं।

कहा गया है, “क़ल्बुल मोमीने अर्श अल्लाह ताला” अर्थात्‌ "एक सच्चे आस्तिक (मोमिन) का हृदय (क़ल्ब) ही अल्लाह का सिंहासन (अर्श) है।", अगर मन पवित्र है तो परमात्मा का साक्षात्कार संभव है। “इश्क़े हक़ीक़ी” के लिए पवित्र आचरण बहुत ज़रूरी है। जब तक आशिक़ (साधक) को महबूब प्राप्त नहीं हो जाता, वह सांसारिक सुख-भोग से अलग रहने का संकल्प लेता है जिसे सूफ़ी जुहद कहते हैं। सूफ़ी इस सांसारिक प्रेम को इतना उदात्त और दिव्य बना देते हैं कि वह अलौकिक प्रेम में बदल जाता है। सूफ़ीमत की शब्दावली में यह “इश्क़े मज़ाजी” से “इश्क़े हक़ीक़ी” में रूपान्तरण है। गुरु की कृपा से उसे प्रियतम के वास्तविक सौंदर्य का ज्ञान होता है, जिसे मारिफ़त कहते हैं। ईश्वर के प्रेम में आकंठ डूबा हुआ और विरह में रत होकर सूफ़ी संसार से अलग हो जाता है। वह उसके वियोग में उसका नाम पुकारते हुए इधर-उधर भटकता है जिसे वज्द कहते हैं। प्रेम और “प्रेम पियाला” के लिए सूफ़ी हमेशा लालायित रहते हैं। प्रियतम के प्रत्यक्ष दर्शन पर उसे मूर्च्छा आ जाती है। प्रेम के द्वारा ईश्वर या सत्य का आभास करके वह उन्माद की दशा में पहुंचता है और वह ईश्वर से एकाकार हो जाता है। उस पर निजानुभूत सत्य उद्घाटित होता है। उसके जमाल (सौन्दर्य) और जलाल (तेज़ या प्रताप) से वह अभिभूत होता है। वह कण-कण में उसी प्रियतम का दर्शन करता है, जिसे हक़ीक़त कहते हैं। इस हक़ीक़त के फलस्वरूप उसे ईश्वर से मिलन का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है जिसे वस्ल कहते हैं। इश्क़े हक़ीक़ी तक पहुंचने के लिए वह इश्क़े मज़ाजी का सहारा लेता है। वह स्वयं को जीवात्मा या आशिक़ मानते है और परमात्मा को माशूक। माशूक हमेशा सौंदर्यपुंज होता है जो ख़ुदा के जमाल का सूचक है। सूफ़ी ब्रह्म का दर्शन उसके ज्योति-रूप में करते हैं। वे ब्रह्म को ज्योति-स्वरूप कहते हैं और मनुष्य को उस परम ज्योति की एक रश्मि स्वीकार करते हैं।

19.13 उद्देश्य परमेश्वर में अपनी आत्मा का विलय

सूफ़ी साधना का उद्देश्य परमेश्वर में अपनी आत्मा का विलय है। सूफी परंपरा में इस आध्यात्मिक अवस्था को 'फ़ना' (Fana) कहा जाता है, जिसका अर्थ है अहंकार या स्वयं के अस्तित्व को मिटाकर ईश्वर की सत्ता में पूरी तरह लीन हो जाना। रहस्यवादी मानते हैं कि संपूर्ण सांसारिक गतिविधियां परम सत्ता से पैदा होकर उसी में विलीन हो जाती हैं। रहस्यवादी परम सत्ता को सांसारिक बुद्धि से नहीं, आंतरिक साधना से जानना चाहता है। सूफ़ी साधक ईश्वर को अपनी इच्छा से समर्पित कर देता है। वह अपने पापों के लिए प्रायश्चित करता है। वह स्वच्छता, प्रार्थना, व्रत, उपवास, दान और तीर्थयात्रा के नियमों का पालन करता है। शारीरिक यातनाओं और एकान्तवास व मौन से क्रोध, गर्व, ईर्ष्या आदि दुर्गुणों का दमन करता है। इस प्रकार उसे आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। सांसारिक वस्तुओं के प्रति उसमें विरक्ति की भावना हो जाती है।

इसके बाद सूफ़ी साधक अन्तरात्मा के प्रकाश और अनन्त प्रेम से ईश्वर में विलीन होने का प्रयास करता है। सूफी संत मानते हैं कि ईश्वर और मनुष्य की आत्मा के बीच का यह मिलन ज्ञान या केवल नियमों से नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) और भक्ति के जरिए ही संभव है। वे सबसे ज़्यादा प्रेम की अनुभूति पर बल देते हैं। प्रेम साधना ही रहस्यवादी साधक की सच्ची साधना होती है। उसमें ‘मैं’ का पूर्ण विसर्जन करना पड़ता है। इससे परमात्मा से जो अंतरंगता स्थापित होती है, उससे कोई अलग या पराया नहीं रह जाता। हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती ने बड़े सरल ढंग से समझाते हुए कहा है कि “सूफ़ी-साधक अक़्ल की आंख से महबूब के हुस्न को नहीं देखता बल्कि मजनूं की आंख से लैला को देखता है।” यानी यदि वह बुद्धि के द्वारा प्रभु के रूप को जानने का प्रयास करेगा तो उसके मन-मस्तिष्क पर प्रभु का वही रूप अंकित होगा जिसे धर्मशास्त्रियों ने प्रस्तुत किया है। बुद्धि हमेशा नफ़ा-नुकसान, रूप-रंग, और कमियों को खोजती है। यदि कोई सामान्य व्यक्ति अक़्ल की आँख से देखेगा, तो उसे ईश्वर की बनाई दुनिया या स्वयं ईश्वर में भी केवल नियम और तर्क ही नज़र आएँगे। लेकिन जब वह प्रभु को आशिक की दृष्टि से देखता है, तो उसे प्रस्तुत अन्य रूप गौण हो जाता है और वह अपनी पूरी चाहत पूरा प्रेम उस “परम प्रिय” पर न्यौछावर कर उसी का हो जाता है। इश्क़ (प्रेम) तर्क से परे होता है। सूफ़ी साधक ईश्वर को किसी वैज्ञानिक या दार्शनिक कसौटी पर नहीं परखता, बल्कि वह अपनी आत्मा की गहराई से उस परम सत्ता से जुड़ता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सूफ़ी अनेक विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाते हैं। अमीर खुसरो के निम्नलिखित दोहे में आत्मा तथा ब्रह्म साक्षात्कार की उत्तम अभिव्यक्ति देखा जा सकता है :

खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग।

तन मेरो मन पीव को दोउ भये इक रंग।

अमीर खुसरो की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ आत्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय (एक्य) और सूफी मत के परम उद्देश्य को बेहद खूबसूरती से बयां करती हैं। ऊपर से देखने पर यह किसी नवविवाहित दुल्हन का अपने पति (प्रियतम) के प्रति प्रेम गीत लगता है, लेकिन आध्यात्मिक स्तर पर यह जीवात्मा (इंसान की आत्मा) और परमात्मा (ईश्वर) के मिलन का उत्सव है। सूफ़ी ईश्वर से प्रेम करता है और यह विश्वास रखता है कि ईश्वर उससे प्रेम करता है और यह भी कि ईश्वर का हरेक काम हिकमत (तत्त्व-ज्ञान, तत्वदर्शिता) से भरा होता है। जब लोग केवल परंपराओं का पालन कर रहे होते हैं, तब सूफ़ी उस परंपरा के मूल का निर्वाह भी कर रहा होता है।

मिसाल के तौर पर नमाज़ को लिया जाए तो जब आम आदमी नमाज़ में खड़े होने और झुकने की क्रियाएं कर रहा होगा तब सूफ़ी इन क्रियाओं के मूल को भी आत्मसात कर रहा होता है। जब वह सज्दे में अपना सिर रखता है, तब वह अपने अहंकार को भी त्याग देता है। सूफ़ी केवल बाह्याचार का रस्मी पालन नहीं करता बल्कि उस तत्व को भी ग्रहण करता है जो कि उससे वांछित होता है। यह सब करने के लिए वह प्रेम से ऊर्जा लेता है और इससे उसका प्रेम और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। 

‘सूफ़ी’ साधक साधना में इस विश्वास को तरजीह देते हैं कि यह बाह्याचार का नहीं, आंतरिक अनुभूति का मामला है। सूफ़ी साधकों की सारी क्रियाएं अंतः साधना के ही विविध रूप हैं। अंतः साधना से उनकी एकांतवृत्ति के एकांतनिष्ठ होने में मदद मिलती है। जैसे-जैसे इसमें दृढ़ता आती जाती है, साधक और उसके साध्य (परमेश्वर) के बीच का व्यवधान क्रमशः क्षीणतर होता चला जाता है। परिणामस्वरूप उसके हृदय रूपी दर्पण का मैल दूर होता चला जाता है। उस मैल के कारण वह अपने प्रियतम के अलौकिक नूर को ठीक से देख नहीं पाता था। हृदय के मैल या विकार सांसारिक बंधनों के कारण उत्पन्न आसक्तियों के रूप में रहता है। वही उस दर्पण को मलिन बना देते हैं। अंतः साधना के कारण साधक की अंत:वृत्ति केवल “उसकी” ओर केन्द्रित हो जाती है। आसक्तियों के बंधन से वह मुक्त हो जाता है। उसका हृदय-पटल आलोकित हो उठता है। इस तरह साधना की सारी विधियां (तिलवत, समाअ, ज़िक्र, फ़िक्र, आदि) सूफ़ी साधक को उसकी प्रेम-साधना में सहयोग प्रदान करती हैं।

सूफ़ी साधक परमेश्वर को प्रेम स्वरूप मानते हैं। वे परमात्मा के प्रति प्रेम की कसौटी धार्मिक आचरण को मानते हैं । सूफ़ी साधक के अनुसार सूफ़ीवाद में - ‘प्रेम प्रज्ज्वलित अग्नि के समान है जो परम प्रियतम की इच्छा के सिवा हृदय की समस्त चीज़ों को जला कर ख़ाक कर डालता है।’ ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ प्रेम पवित्र और अकलुष होता है। लौकिक इश्क़ में वासना का प्रभाव रहता है। जबकि सूफ़ियाना इश्क़ पूरी तरह रूहानी होता है। सूफ़ी शब्दों में कहें तो लौकिक इश्क़ नफ़्स से संचालित है और सूफ़ियाना इश्क़ रूह से। आम आदमी तो इश्क़ को नफ़्स के या वासनाओं के दायरे से आज़ाद कर ही नहीं पाता। जबकि इश्क़ करने वाले हर सूफ़ी साधक अपने नफ़्स (मूलाधार की हैवानी ऊर्जा) को दिल और दिल से ऊपर की ओर ले जाता है, ताकि हैवान से उन फ़रिश्ते की ओर यात्रा की जा सके, जिनके भीतर कोई दैहिक वासना नहीं होती। अंतरंगता की चाह और समर्पण की माँग दोनों तरह के इश्क़ में होती है। नफ़्स से संचालित सम्बन्धों में इसकी कभी-कभार अभिव्यक्ति होती है, जबकि रूह से चालित इश्क़ में उनकी प्रबल अभिव्यक्ति होती है।

वाह्य-जगत के संदर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि ज्ञान सदा ही शक्ति का कारण होता है। जिसे जितना ज्ञान होता है, उसकी शक्ति भी उतनी ही होती है। ज्ञान के बल पर ही आदमी चीज़ों को इस्तेमाल करता है और ज्ञान के बल पर ही सही-ग़लत का फ़ैसला करता है। वाह्य-जगत का आंतरिक-जगत से संबंध होता है। ये दोनों एक दूसरे पर प्रभाव डालते रहते हैं। बाहर की दुनिया का ज्ञान रखने वालों को वैज्ञानिक कहा गया और अंदर की दुनिया का ज्ञान रखने वालों को सूफ़ी संत। कोई भी आदमी वैज्ञानिक या सूफ़ी संत बन सकता है। जिसकी जैसी शक्ति और साधना होगी, वह उसी स्तर का वैज्ञानिक या सूफ़ी संत बन सकता है।

इस्लाम के अनुसार एक इंसान जिसे अक़्ल समझता है वह कुल बुद्धि (अक़्ले कुल्ली) का अंश भर है। हालांकि हर इंसान अक़्ले कुल्ली से जुड़ा होता है, लेकिन अपने नफ़्स (अहं) के कारण उसकी बुद्धि पर परदा पड़ा रहता है, और अपनी आंशिक बुद्धि पर ही घमंड करता रहता है। संत, महात्मा, पीर, रसूल में यह नफ़्स का परदा हट जाता है, और उनका सीधा संबंध अक़्ले कुल्ली से हो जाता है। इससे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति (इल्हाम) हो जाती है। एक सूफ़ी साधक को जब इल्हाम होता है तो वह त्यागपूर्ण जीवन जीने लगता है। अपनी सुध-बुध भूलकर उसी के नाम का रट लगाने लगता है। फ़ना की अवस्था को प्राप्त कर उसे वस्ल (महामिलन) प्राप्त होता है। जिसके बाद बक़ा की स्थिति का आना अनिवार्य है। इस मक़ाम को पाकर वह इन्सानुल कामिल (पूर्ण मनुष्य) को प्राप्त करता है। शरीर के रहते हुए आत्मा का ब्रह्म से साक्षात्कार आत्मा का ब्रह्म में विलीन होकर ‘जो था’, वही बन जाना नहीं है, बल्कि इस साक्षात्कार के बाद आत्मा फिर से पंचभूत में लौट आती है ताकि वह अपने कर्तव्य को पूरी तरह अदा कर सके जिसके लिए उसे इस दुनिया में पैदा किया गया है। यही बक़ा है।

19.14 मौन रहकर एकांत में ध्यान

सूफ़ीमत के अनुसार रूहानी हक़ीक़त को देखने के लिए आंखें खुली रखने की नहीं बल्कि बंद रखने की ज़रूरत होती है। जब आदमी मौन रहकर एकांत में ध्यान करता है तभी वह रूहानी हक़ीक़त को देख पाता है। तब वह जान पाता है कि हरेक आदमी की रूहानी हक़ीक़त एक ही है। एक ही रूह का नूर हरेक इंसान में व्याप्त है। इन्हें साधक को अपनी अक़ल से समझना पड़ता है। कई साधक इस रूह को ख़ुदा समझने की ग़लती कर जाते हैं। इस तरह की ग़लतियां न हों इसीलिए मुस्लिम सूफ़ियों ने कहा है कि कोई भी मुकाशिफ़ा (आत्म-दर्शन संबंधी अनुभूति) तब तक मान्य नहीं है जब तक कि उसे दो गवाहों की सहमति न मिल जाए। इसका अर्थ यह है कि उसके पक्ष में क़ुरआन व सुन्नत से दलील भी मिले। पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि ‘दो चीज़ें ऐसी हैं कि जब तक तुम इन्हें थामे रखोगे हरगिज़ गुमराह नहीं हो सकते, एक क़ुरआन और दूसरी मेरी सुन्नत (यानि मेरा तरीक़ा)।’ (भावार्थ हदीस)।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक साधक को आत्मज्ञान के साथ-साथ वाह्य-ज्ञान (पुस्तकों में उपल्ब्ध ज्ञान) की भी ज़रूरत है। विचारकों का मानना है कि चिंतन बाहरी हो या भीतरी, साधक को बहुत कुछ हासिल कर लेने के बाद भी उसे अपने चिंतन से यह कभी पता नहीं चल सकता कि ख़ुदा और बंदों के हक़ उस पर क्या हैं और वह उन्हें किस तरह अदा करे ? 

यह बात किसी भी मुराक़बे (ईश-ध्यान और समाधि) से नहीं मिलती। यह बात सिर्फ़ पैग़ंबर स. पर विश्वास रखने से और उनके तरीक़े पर चलने से हासिल होती है। यही कारण है कि रूहानी इल्म रखने वाले श्रेष्ठ मुस्लिम सूफ़ी इस्लामी शरीअत के भी पाबंद रहे। सभी सूफ़ी सिलसिलों के इमाम उलूम-ए-मुकाशिफ़ा हासिल करने से पहले अक्ली उलूम हासिल कर चुके थे और अपने मुरीदों को भी वे यही निर्देश दिया करते थे। 

सूफ़ी सिलसिलों में संगीत का रिवाज़ नहीं था क्योंकि सूफ़ी ज़ाहिर के बजाय भीतर की अनुभूतियों पर अपना ध्यान केंद्रित रखते थे। बाद में एक-दो सिलसिलों में क़व्वाली का रिवाज़ हुआ तो उसकी भी कड़ी शर्तें थीं और उनका रूप यह न था जो कि आजकल प्रचलित है। जिस बाजे को बजाना शरीअत में वर्जित ठहराया गया है, उसे बजाना तरीक़त के सभी इमामों के नज़दीक नाजायज़ है। दिल को इश्क़ की गर्मी से गरमाने की जब कभी उन्हें ज़रूरत होती तो वे उसी बाजे को पर्याप्त समझते थे जिसकी इजाज़त शरीअत में है, यानि कि दफ़। सूफ़ियों का मत था कि भक्ति संगीत सुनने से हमारा हृदय पवित्र होता है। इसे ‘सिमाअ’ कहा जाता है। ‘सिमाअ’ की कड़ी शर्तें हैं। जैसे कि क़व्वाली या सिमाअ में कलाम किसी कामिल शैख़ का हो, उसे गाने वाला भी कामिल हो, मजलिस में सुनने वाले भी कामिल हों ताकि उसके ज़ाहिरी अल्फ़ाज़ से धोखा न खा जाएं आदि आदि। सूफ़ी लोग ग़ज़ल और रूबाई वग़ैरह के ज़रिये अपनी रूह को इश्क़े हक़ीक़ी से गरमाया करते हैं। ग़ज़ल प्रेम-काव्य है। सूफ़ी ईश्वर को प्रियतम मानते हैं। हज़रत इब्नुल अरबी रह., जिन्हें पहला सूफ़ी माना जाता है, ने स्त्री के चेहरे, और उसके सौन्दर्य को लेकर काव्य रचा। उनका मानना था कि औरत की ख़ूबसूरती में उसके रचयिता के सौंदर्य की उत्कृष्ट झलक मिलती है।

भोग-विलास, कोलाहल, आडंबरपूर्ण जीवन का सूफ़ियों के यहां कोई स्थान नहीं था। ग़रीबों की सेवा, त्याग, आत्म-संयम और तपस्या एवं समर्पण द्वारा अपनी आत्मा को पवित्र कर ईश्वर के प्रति समर्पण उनके जीवन का लक्ष्य था। इसके लिए वे स्वच्छता, प्रार्थना, व्रत, उपवास, दान और तीर्थयात्रा के पालन पर बल देते थे। सूफ़ी अत्यंत विपन्नता की स्थिति में रहकर ईश-आराधना में लीन रहते थे। सूफ़ी संत हज़रत मलिक इब्ने दीनार रह. ने कई वर्षों तक अपने प्रिय फल खजूर का सेवन छोड़ दिया था। उन्हें आशंका थी कि कहीं यह आसक्ति का रूप न ले ले। सूफ़ी संत हज़रत मुहम्मद वासी रह. पानी में रोटी भिगो कर खाते थे, और कोई व्यंजन नहीं लेते थे। संत हज़रत सिर्री सुक्ती रह. ने पानी का घड़ा फोड़ दिया। उन्हें लगा कि घड़ा को संभाल कर रखने और उसमें पानी भरने के कारण ईश्वर की आराधना में व्यवधान उत्पन्न होता है। सूफ़ी संत मानते थे विपन्नता की स्थिति में रहकर और ऐसे उपायों से मन अपवित्रता से मुक्त और राग-द्वेष से दूर होता है, तथा पाक-साफ़ हो जाता है, बिल्कुल आइने की तरह। अब इसमें उसे अपने महबूब की तस्वीर दिखाई देती है।

दिल के आइने में है तस्वीरे यार

जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली

हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. का कहना था, “यह दुनिया है ही नहीं जो तू देख रहा है।” यह तो झूठा अस्तित्व है। इस झूठे अस्तित्व को नकार कर एक ईश्वर के अस्तित्व के सत्य को स्वीकार कर उस दिशा में जो यात्रा है उसे लामकान की यात्रा कहते हैं। आध्यात्मिक जीवन को सूफ़ी एक यात्रा (सफ़र) कहते हैं। परमात्मा को पाने की इच्छा रखने वाले साधक को सालिक कहा जाता है। साधक परमात्मा का ज्ञान (मारिफ़) को प्राप्त करता हुआ एक-एक कर अपने लक्ष्य (परमात्मा के साथ एकत्व) तक पहुंचता है। इस साधना के पथ पर आगे बढ़ने को सूफ़ी-मार्ग (तरीक़ा) कहते हैं। साधक अपनी बुराइयों का त्याग करते हुए अपनी आत्मा का कलुष मिटाता हुआ जब इस मार्ग पर अग्रसर होता है तो वह परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करता है। इस यात्रा में नासूत, मलकूत, जबरूत और लाहूत के साधना-सोपानों से गुज़रते हुए हर सूफ़ी तौबा, जुहद, सब्र, शुक्र, रिआज़, ख़ौफ़, तवक्क़ुल, रज़ा, फ़िक्र और मोहब्बत को आचरण में लाते हुए माशूक़ अर्थात्‌ ब्रह्म में लीन होकर ईश्वर से तदाकार हो जाता है, बक़ा की अवस्था में आ जाता है। इस दरमियान वह काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि चित्तवृत्तियों और मनोविकारों से मुक्त होकर फ़ना की अवस्था को प्राप्त करता है। अब प्रियतम के सिवाए उसे कुछ भी नज़र नहीं आता है। वस्ल यानी मिलन के बाद आशिक और माशूक़ अर्थात्‌ जीवात्मा और परमात्मा में कोई फ़र्क़ नहीं रहता। वह ब्रह्ममय हो जाता है।

19.15 सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया

बशीर अहमद मयूख के शब्दों में कहें तो, “रहस्यवाद एक ऐसा दर्शन है, जिसने सारी दुनिया के इंसानों को बड़ी उदारता के बराबरी के साथ एक आध्यात्मिक रिश्ते में जुड़ने की पृष्ठभूमि तैयार कर भक्ति-धारा का एक संगम प्रवाहित करने में अपना क्रांतिकारी और महत्वपूर्ण योगदान दिया।” दूसरे शब्दों में कहें तो, सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया!

सूफ़ियों द्वारा प्रतिपादित रहस्यवाद पर जब हम नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि सूफ़ीमत का इस्लाम के साथ अनेक मुद्दों पर मतभेद रहा है। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी सूफ़ी मुसलमान थे। इसलिए जब वे अपने सिद्धांत का प्रतिपादन कर रहे थे, तो उनकी आंखों के सामने हर समय इस्लाम था। हां जब उन्हें यह लगता था कि उनका सिद्धांत या आचरण इस्लाम से मेल नहीं खा रहा वहां वे क़ुरआन और हदीस का सहारा लेते थे। हालांकि कई सूफ़ी विचारकों को अपने आज़ाद ख़्यालात के इज़हार के कारण यातनाएं झेलनी पड़ी, यहां तक कि कइयों को मौत का भी सामना करना पड़ा, फिर भी वे अपने मकसद  से पीछे नहीं हटे। इस्लामी क़ानून अपने आप में स्पष्ट है। सूफ़ियों में बहुत से ऐसे भी हुए जो राह में ही थे और अपनी रूहानी कैफ़ियत को न तो समझ पाए और न ही आम लोगों को समझा पाए। ऐसे कई सूफ़ियों को क़ानून की सख्ती झेलनी पड़ी और यही वह ख़ास बात है जिसने इस्लामी शरीअत की हिफ़ाज़त में अहम रोल अदा किया। इन विराधाभासों के रहते हुए भी सूफ़ीमत इस्लाम-धर्म की ओर उन्मुख रहा और इस्लाम ने भी सूफ़ीमत को उदारता के साथ स्वीकार भी किया। दिव्य क़ुरआन द्वारा निर्देशित इस्लामी रहस्यवाद के दर्शन में दुनिया भर में मौज़ूद भक्ति-धारा को एक संगम पर पहुंचाने की बुनियाद दिखती है।

 सूफ़ीमत के कुछ विद्वान इसे रहस्यवाद या मिस्टीसिज़्म से भिन्न विचारधारा के रूप में स्वीकार करते हैं और “रमज़ियत” (ख़्यालात को असली रंग में पेश करने के बजाय इशारात और निशानात से काम लिया जाता है) शब्द का प्रयोग करते हैं। शाब्दिक रूप में इसका भी अर्थ रहस्यवाद ही होगा, लेकिन वे इसे प्राचीन भारतीय रहस्यवाद और मुस्लिम अध्यात्म का मिलाजुला रूप मानते हैं। हालांकि सूफ़ीमत में अद्वैतवाद से प्रभावित “वहदतुलवुजूद” का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन इसके साथ ही और भी कई विचारधाराएं सूफ़ीमत का अंग हैं। चूंकि सूफ़ीमत के स्रोत और संदर्भ क़ुरआन, इस्लामी पैग़म्बर और उनके अह्लबैत (परिवारजन) पर आधारित हैं, इसलिए यह पश्चिम के “मिस्टीसिज़्म” और प्राचीन भारत के “रहस्यवाद” से भिन्न विचारधारा है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

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