मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

469. पुन्नाप्रा-वायलार संघर्ष

राष्ट्रीय आन्दोलन

469. पुन्नाप्रा-वायलार संघर्ष

1946-47

पुन्नाप्रा-वायलार संघर्ष (अक्टूबर 1946) त्रावणकोर रियासत (आधुनिक केरल) में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मजदूरों और किसानों का एक ऐतिहासिक सशस्त्र विद्रोह था। पुन्नप्रा और वायलर, अलप्पुझा जिले के दो गाँव हैं। त्रावणकोर के पुन्नाप्रा-वायलार के किसानों ने प्रशासन (दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर के निरंकुश शासन) के साथ खूनी लड़ाइयाँ लड़ीं। यहाँ सशस्त्र बलों और उन जुझारू श्रमिकों के बीच भीषण झड़पें हुईं जिनके पास लकड़ी के साधारण भालों के अलावा कोई हथियार नहीं थे। उत्तर-पश्चिमी त्रावणकोर राज्य के शेरतलाई-अल्लेप्पी-अम्बलपुझा क्षेत्र में, 1946 तक कम्युनिस्टों ने नारियल-रेशा (coir) फ़ैक्टरियों के मज़दूरों, मछुआरों, ताड़ी निकालने वालों और खेतिहर मज़दूरों के बीच एक बहुत ही मज़बूत आधार बना लिया था। इस क्षेत्र से छोटे शहर काफी नज़दीक थे। इन शहरों के उद्योगों और पास के गांवों के खेती-बाड़ी के कामों का एक-दूसरे के बहुत करीब होना, किसानों के लिए काफी फायदेमंद था। परिणामस्वरूप यहाँ मज़दूर-किसान गठबंधन मज़बूत होने लगा था। इस क्षेत्र में ट्रेड यूनियन इतनी ताक़तवर हो गई थीं कि वे नारियल-रेशा फ़ैक्टरियों में भर्ती को नियंत्रित करने लगे थे। इन्होंने अनौपचारिक लेकिन बहुत लोकप्रिय मध्यस्थता अदालतें स्थापित कर लिया था। यहाँ तक कि वे अपनी खुद की राशन की दुकानें चलाने का अधिकार भी हथिया लिया था। उन्होंने दीवान की दमनकारी नीतियां, जमींदारों द्वारा शोषण, और त्रावणकोर को भारत से अलग स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का जमकर विरोध किया। इस विद्रोह का नाम उन दो स्थानों के नाम पर रखा गया है जहाँ यह हुआ थापुन्नप्रा से शुरू होकर वायलर में समाप्त हुआ 

इस क्षेत्र में खाने की चीज़ों की भारी कमी हो गयी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान त्रावणकोर साम्राज्य में भीषण अकाल की स्थिति ने किसानों को कम्युनिस्टों की ओर धकेल दिया था। इसका कारण यह था कि अनाज, संसाधन और कच्चा माल भारत की जनता में वितरित करने के बजाय युद्ध मोर्चों पर निर्यात किया जा रहा था। चेरथला तालुक में अकाल (1939-43) के दौरान 21,000 से अधिक किसान मारे गए, जिससे चेरथला और अंबलपुझा तालुकों में सत्ता के विरुद्ध असंतोष बढ़ता गया।

इस क्षेत्र में किराएदारों और कृषि श्रमिकों को अक्सर पीटा और प्रताड़ित किया जाता था, महिलाओं का बलात्कार किया जाता था और जमींदारों द्वारा उनके घर ध्वस्त कर दिए जाते थे। उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता था। उस पर से त्रावणकोर के शासक और उनके दीवान ने न केवल जनता की मांगों को मानने से इनकार कर दिया, बल्कि उन्होंने त्रावणकोर राज्य को भारत से अलग करने का भी प्रयास किया। जनवरी 1946 में दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर द्वारा घोषित एक योजना से एक विस्फोटक राजनीतिक स्थिति पैदा हो गई। सीपी रामास्वामी अय्यर ने त्रावणकोर को भारतीय संघ में शामिल करने के बजाय एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव रखा था। इस योजना के तहत एक 'अमेरिकी-तर्ज़ का संविधान' बनाने का प्रस्ताव था। इस योजना में विधानसभाएँ तो वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी जानी थीं, लेकिन कार्यपालिका पर महाराजा द्वारा नियुक्त दीवान का नियंत्रण होना था। महत्वाकांक्षी दीवान स्पष्ट रूप से एक स्वतंत्र त्रावणकोर के लिए काम कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र त्रावणकोर उसके अपने नियंत्रण में होता। जून 1947 में उसने इसे अपने इरादे के तौर पर घोषित भी कर दिया था।

स्टेट कांग्रेस टालमटोल कर रही थी। पट्टम थानु पिल्लई जैसे कुछ नेता स्पष्ट रूप से रामास्वामी अय्यर के साथ किसी समझौते के खिलाफ नहीं थे। वहीं दूसरी ओर कम्युनिस्टों ने एक ज़ोरदार अभियान छेड़ दिया, जिसका नारा था: "अमेरिकन मॉडल को अरब सागर में फेंक दो।" एटीटीसी (ऑल त्रावणकोर ट्रेड यूनियन कांग्रेस) ने अकाल के दौरान गरीबों की मदद न करने के लिए दीवान के खिलाफ अहिंसक विरोध प्रदर्शन किया था। दीवान अलाप्पुझा क्षेत्र के श्रमिकों पर कठोर और क्रूर भूमि कानून भी लागू कर रहे थे।  ब्रिटिश अधीन होने के कारण, दीवान ने जमींदारों को निजी और सार्वजनिक संपत्ति पर दावा करने, मजदूरी देने से इनकार करने और श्रमिकों को प्रताड़ित करने की अनुमति दे दी थी। परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में कम्युनिस्ट दलों के नेतृत्व में नियमित रूप से विरोध प्रदर्शन होते रहे। नेतृत्व और नागरिकों के बीच संबंध तनावपूर्ण और अस्थिर हो गए।

मछुआरे, किसान और नारियल के रेशे से बने कपड़े पर काम करने वाले सभी लोग संगठित होकर सशस्त्र संघर्ष के लिए उतर आए। सितंबर 1946 से, राज्य सरकार ने कम्युनिस्टों और अलप्पुझा (Alleppey) क्षेत्र की ट्रेड यूनियनों के खिलाफ एक चौतरफा अभियान शुरू कर दिया था। पुलिस कैंप बना दिए गए थे। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं। गिरफ्तार लोगों को जेलों में क्रूर यातनाएँ दी गईं। ऐसे कैंप स्थापित किए गए थे जहाँ सताए हुए मज़दूर अपनी आत्मरक्षा के लिए शरण ले सकें। इन मज़दूरों की सुरक्षा उन स्वयंसेवकों द्वारा की जाती थी जिन्हें कुछ बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया गया था। ये कैम्प किसी विद्रोह की योजना के तहत नहीं स्थापित किए गए थे।

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था। 22 अक्टूबर से अलप्पुझा-शेरतलाई क्षेत्र में एक राजनीतिक आम हड़ताल शुरू हो गई। दो दिन बाद 2,000 से अधिक कम्युनिस्टों ने अलप्पुझा से चार मील दक्षिण में स्थित पुन्नाप्रा पुलिस कैंप पर एक आंशिक रूप से सफल हमला किया गया। इस हमले में पुलिस द्वारा भारी गोलीबारी के बावजूद, लकड़ी के भालों से लैस स्वयंसेवक, रेंगते हुए आगे बढ़े ताकि पुलिस के साथ आमने-सामने की लड़ाई (हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट) कर सकें। यहाँ नौ राइफलें कब्ज़े में ली गईं। शास्त्र चलाने के प्रशिक्षण के अभाव में उनका कोई उपयोग नहीं हो सका।

25 अक्टूबर 1946 (महाराजा के जन्मदिन) को, त्रावणकोर का नया संविधान लागू होना था, जिससे त्रावणकोर एक स्वतंत्र देश बन जाता (अमेरिकी मॉडल पर आधारित)।  वायलर में 1000 से अधिक कम्युनिस्टों ने इस कदम का कड़ा विरोध किया और विद्रोह कर त्रावणकोर पुलिस अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों की हत्या कर दी। दीवान ने 25 अक्टूबर को इलाके में मार्शल लॉ घोषित कर दिया। त्रावणकोर सेना अपने शिविर से निकली और 27 तारीख को वायलार (शेरतलाई के पास) स्थित स्वयंसेवकों के मुख्यालय पर सेना ने धावा बोल दिया। गोलीबारी में भीषण रक्तपात हुआ। पुन्नाप्रा-वायलार के इस अत्यंत खूनी विद्रोह में लगभग 800 लोग मारे गए थे। कम्युनिस्ट पराजित हुए और कुछ ही मिनटों में आत्मसमर्पण कर दिया। इस नरसंहार के बाद दीवान पूरी तरह से अपनी साख खो चुका था। अब उसके और कांग्रेस के बीच किसी भी संभावित गठबंधन की रही सही संभावना भी जाती रही।

जब 3 जून 1947 को यूनाइटेड किंगडम ने विभाजन की मांगों को स्वीकार कर लिया और थोड़े ही समय में भारत छोड़ने की घोषणा कर दी, तो त्रावणकोर के महाराजा ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने की इच्छा व्यक्त की। दीवान सी.पी. रामस्वामी अय्यर के समर्थन से, महाराजा चिथिरा थिरुनल बलराम वर्मा ने 18 जून 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा जारी की। कांग्रेस ने त्रावणकोर का भारत में विलय करवाने के लिए दबाव की रणनीति का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल किया। यह रणनीति सफल रही। दीवान रामास्वामी अय्यर को यह एहसास हो गया था कि शांतिपूर्ण समर्पण का एकमात्र विकल्प शायद एक हिंसक क्रांति ही होगी। यह पुन्नाप्रा-वायलार ही वह घटना थी जिसने वास्तव में त्रावणकोर को भारत में एकीकृत किया और इस तरह देश के बाल्कनीकरण (विखंडन) की राह को रोक दिया। कम्युनिस्टों के लिए पुन्नाप्रा-वायलार का अर्थ था—वीरतापूर्ण शहादत का संपूर्ण गौरव। यह आंदोलन केरल के राजनीतिक इतिहास में वामपंथी राजनीति के उदय का मुख्य आधार बना। पुन्नप्रा-वायलर विद्रोह के एक साल बाद, पट्टोम थानु पिल्लई केरल के पहले मुख्यमंत्री बने। यह संघर्ष भारत की स्वतंत्रता के समय रियासतों में चल रहे उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का एक प्रमुख उदाहरण है।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

468. तेभागा आन्दोलन

राष्ट्रीय आन्दोलन

468. तेभागा आन्दोलन



1946-47

1946-47 में एक नया घटनाक्रम सामने आया—देश के कई हिस्सों, विशेषकर बंगाल, केरल के कुछ भागों और हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में उग्र परिवर्तनकारी आंदोलन के रूप में एक ज़ोरदार उभार देखने को मिला। 1939 में जो संघर्ष बीच में ही रुक गए थे, वे फिर से शुरू हो गए। ज़मींदारी प्रथा को खत्म करने की माँग को अब और भी ज़्यादा तत्परता के साथ उठाया गया। हर जगह, कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली 'किसान सभा' ​​संघर्ष के अधिक उग्र रूपों की ओर बढ़ रही थी। वह लगान या किराया चुकाने वाले जमींदार किसानों के दायरे से बाहर निकलकर, बटाईदारों, भूमिहीन मज़दूरों और आदिवासियों तक अपनी पहुँच बना रही थी। 1945 से, शामराव और गोदावरी पारुलेकर जैसे कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, बंबई के पास स्थित ठाणे ज़िले के उमरगाँव और दहानू तालुकों के, बुरी तरह से शोषित और पिछड़े वारली आदिवासियों के बीच रहने लगे थे। उन्होंने वन-ठेकेदारों, व्यापारी-साहूकारों और बाहरी ज़मींदारों के ख़िलाफ़, कर्ज़-गुलामी, 'वेठ' या 'वेठी' (ज़बरदस्ती मज़दूरी), और फ़सल काटने, पेड़ व घास काटने के लिए कम मज़दूरी जैसे मुद्दों पर, कई सफल आंदोलन संगठित किए। ब्रिटिश भारत में, बंगाल का 'तेभागा संघर्ष' ही सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा।

तेभागा आन्दोलन- किसान विद्रोह

1946-1947

तेभागा आंदोलन 1940 के दशक के उत्तरार्ध में बंगाल में हुआ एक किसान विद्रोह था। इसका उद्देश्य जमींदारों को फसलों के रूप में किराए पर दिए जाने वाले हिस्से को कम करना था। बंगाल के बटाईदारों ने यह माँग उठानी शुरू कर दी कि वे अब अपनी फ़सल का आधा हिस्सा जोतदारों को नहीं देंगे, बल्कि सिर्फ़ एक-तिहाई हिस्सा देंगे; और यह भी कि बँटवारे से पहले फ़सल को जोतदारों के नहीं, बल्कि उनके अपने 'खामारों' (गोदामों) में रखा जाएगा। सितंबर 1946 में, बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने एक जन-संघर्ष के माध्यम से 'फ्लौड कमीशन' की 'तेभागा' सिफ़ारिश को लागू करने का आह्वान किया। 1940 में बंगाल भूमि राजस्व आयोग ने बंगाल सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें बार्गादारों के अधिकारों को स्वीकार किया गया था। हालांकि, सरकार ने इन सिफारिशों को लागू नहीं किया। तेभागा  शब्द  का अर्थ है  "फसल के तीन हिस्से"। जोतदारों से किराए पर ली गई ज़मीन पर काम करने वाले बटाईदारों को 'बरगादार', 'भागेहासी' या 'अध्यार' भी कहा जाता था। इस सिफ़ारिश के तहत बरगादार को फ़सल का आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलने के बजाय, दो-तिहाई हिस्सा मिलना था। उनकी इस मांग के परिणामस्वरूप जमींदारों और औपनिवेशिक सरकार के साथ तीव्र टकराव हुए। 1946 के उत्तरार्ध में, बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने तेभागा की मांग के आधार पर आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन में कृषि व्यवस्था अत्यधिक शोषणकारी थी। कृषि प्रणाली बटाईदारी पर आधारित थी, जिसमें किरायेदार  जमींदारों की भूमि पर खेती करते थे  और अपनी उपज का एक हिस्सा उनके साथ साझा करते थे।

क्षेत्र के भूस्वामी वर्गों (जमींदार, तालुकदार और जोतदार) ने संथाल और अन्य आदिवासियों की सेवाओं का उपयोग करके प्रारंभ में इन जमीनों को पुनः प्राप्त किया था। हालांकि, इन आदिवासियों को, जो बाद में किसान बन गए, जल्द ही अपनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। बाद में यह जमीन जोतदारों को पट्टे पर दे दी गई, जिन्होंने जमींदारों को भारी किराया दिया। जोतदारों ने बदले में, मूल भूमि धारकों, जो अब बरगादार बन गए थे, को पचास-पचास के अनुपात में खेती के लिए जमीन दे दी। उपज के निश्चित हिस्से को 'अधी' या 'भाग' कहा जाता था। इस व्यवस्था के अनुसार, सभी आवश्यक सामग्री (जैसे बीज, पशु, कृषि उपकरण और खाद) आमतौर पर बरगादार की जिम्मेदारी होती थी। यदि जोतदार इनमें से कोई भी सामग्री उपलब्ध कराता था या बटाईदार को कोई नकद अग्रिम देता था, तो उपज के आधे से अधिक हिस्सा समायोजन के रूप में जोतदार द्वारा ले लिया जाता था।

फसल कटाई के बाद, किसानों को धान को जोतदारों के खमार (खनन स्थल) या उनके निर्देशानुसार किसी अन्य स्थान पर जमा करना पड़ता था। इस प्रथा ने जोतदारों को फसल की मात्रा में हेरफेर करने का भरपूर अवसर दिया, जिसे अंततः फसल बंटवारे में शामिल किया जाता था। इसके अलावा, यह बरगादारों के लिए नुकसानदेह था क्योंकि जोतदार अक्सर फसल में अधिक हिस्सा पाने के लिए वजन में हेराफेरी करते थे। बरगादारों को कोई वैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं था और इसलिए, उनके पास भूमि स्वामित्व की कोई सुरक्षा नहीं थी। जबकि जोतदारों के पास भूमि पर अधिक स्थायी और श्रेष्ठ अधिकार थे, बरगादारों के लिए बटाईदारी अनुबंध आमतौर पर एक वर्ष के लिए होते थे; इसलिए उन्हें हर मौसम में खेती करने के लिए भूमि बदलनी पड़ती थी।

किसानों के बीच असंतोष

बंगाल में बटाईदारी प्रणाली के तहत बटाईदारों को फसल का 50% हिस्सा जमींदारों को किराए पर देना पड़ता था। किसानों के पास जीवनयापन के लिए मुश्किल से ही पर्याप्त संसाधन बचते थे, खासकर खराब फसल वाले वर्षों में। 1943 के अकाल ने किसानों के बीच असंतोष को और भी बढ़ा दिया। बटाईदारों ने बटाईदारी प्रथा के तहत व्याप्त निर्मम शोषण पर सवाल उठाए। सीपीआई ने किसानों के बीच बढ़ते असंतोष को पहचाना और जमींदारों की शोषणकारी प्रथाओं के खिलाफ उन्हें संगठित करने का फैसला किया। तेभागा आंदोलन बंगाल में  कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के किसान मोर्चे बंगीय प्रादेशिक किसान सभा (बीपीकेएस) द्वारा शुरू किया गया एक महत्वपूर्ण किसान आंदोलन था। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं में शहरों के कई जुझारू छात्र भी शामिल थे। वे गाँवों की ओर निकल पड़े ताकि वे बटाईदारों को संगठित कर सकें। बटाईदार ग्रामीण आबादी का एक बहुत बड़ा तबका बन चुके थे। आर्थिक मंदी और अकाल के कारण ग़रीब किसानों की ज़मीनें छिन गई थीं। फलतः वे बटाईदार बनने पर मजबूर हो गए थे। कई इलाक़ों में, इन बटाईदारों की संख्या गाँव वालों की कुल आबादी का 60% तक पहुँच गई थी। नवंबर में फ़सल कटाई के समय से ही इस आंदोलन ने अचानक ज़ोर पकड़ लिया। तेभागा आंदोलन की शुरुआत सीपीआई द्वारा किसानों को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करने के लिए बैठकों और रैलियों के आयोजन से हुई, जिसमें  "अधी नोय, तेभागा चाई"  (हमें दो तिहाई चाहिए) का नारा इस्तेमाल किया गया। इस आंदोलन का मुख्य नारा था—'निज-खामारे धान तोलो' (अपनी खलिहान में धान ले जाओ)। इस नारे का मतलब था कि बटाईदार धान को पहले की तरह जोतदार के घर ले जाने के बजाय, सीधे अपने ही खलिहान में ले जाएंगे। ऐसा करके वे 'तेभागा' व्यवस्था को लागू करवाना चाहते थे। आंदोलन बढ़ने के साथ-साथ, बटाईदारों ने जमींदारों का हिस्सा लेने से इनकार कर दिया, जिससे टकराव उत्पन्न हुए। औपनिवेशिक सरकार ने जमींदारों का साथ दिया और आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस तैनात कर दी, जिसके परिणामस्वरूप हिंसक झड़पें और गिरफ्तारियां हुईं।

आंदोलन का मुख्य केंद्र

उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर का ठाकुरगाँव उप-मंडल और उससे सटे हुए जलपाईगुड़ी, रंगपुर तथा मालदा के इलाक़े इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गए। इसके अलावा, मैमनसिंह (किशोरगंज), मिदनापुर (महिषादल, सुताहाटा और नंदीग्राम) और 24 परगना (काकद्वीप) जैसे इलाक़ों में भी 'तेभागा' आंदोलन के केंद्र उभर आए थे। उत्तरी मैमनसिंह के 'हाजोंग' समुदाय के लोगों ने यह माँग रखी कि इस किराए को फ़सल के बजाय नकद (पैसे) के रूप में लिया जाए, ताकि वे फ़सल की बढ़ती हुई क़ीमतों का लाभ स्वयं उठा सकें। 'हाजोंग' समुदाय ने इसके पहले भी 1937-38 में अपने 'टंका' (फ़सल के रूप में दिए जाने वाले किराए) में कमी करवाने में सफलता पाई थी। उत्तरी बंगाल में इस आंदोलन का मुख्य आधार राजबंशी लोग थे। राजबंशी जनजातीय मूल की एक निचली जाति थी; इनमें ज़्यादातर 'अधियार' (बटाईदार) और गरीब किसान थे, लेकिन कुछ 'बिग्यो' (बड़े किसान) भी शामिल थे। इन लोगों के बीच वर्ग-आधारित संगठन ने पहले से चल रहे उस 'संस्कृतिकरण' आंदोलन को कमज़ोर कर दिया था, जिसमें क्षत्रिय दर्जे का दावा किया जा रहा था। बंगाल प्रांतीय किसान सभा' ​​के नेतृत्व में शुरू हुआ 'तेभागा आंदोलन' जल्द ही जोतदारों और बटाईदारों के बीच एक टकराव में बदल गया, जिसमें बटाईदार फ़सल को अपने ही खामारों में रखने की बात पर अड़े हुए थे। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि 'तेभागा' आंदोलन के मुख्य क्षेत्रों में मुसलमानों ने भी काफी बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। हाजी मुहम्मद दानेश, नियामत अली, और यहाँ तक कि कुछ मौलवी भी नेता बनकर उभरे, जिन्होंने जोतदारों के ज़ुल्म की निंदा करने के लिए कुरान का हवाला दिया।

लाठी का सहारा

यह आंदोलन नवंबर 1946 से फरवरी 1947 तक फसल कटाई के पूरे समय तक चला। कुछ क्षेत्रों में यह मार्च 1947 तक भी जारी रहा।  जनवरी 1947 के आखिर में इस आंदोलन को तब ज़बरदस्त बढ़ावा मिला, जब सुहरावर्दी के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग सरकार ने 22 जनवरी 1947 को 'कलकत्ता गज़ट' में 'बंगाल बरगादार्स टेम्पररी रेगुलेशन बिल' प्रकाशित किया। इस बात से उत्साहित होकर कि अब 'तेभागा' की माँग को गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता, उन गाँवों और इलाकों के किसानों ने भी इस संघर्ष में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, जहाँ यह आंदोलन अब तक नहीं पहुँचा था। कई जगहों पर किसानों ने जोतदारों के खलिहानों में पहले से जमा धान को उठाकर अपने खलिहानों में ले जाने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप अनगिनत झड़पें हुईं। जोतदारों और पुलिस के हिंसक रवैये का मुकाबला करने के लिए आन्दोलनकारी स्वयंसेवकों ने लाठियों का सहारा लिया। पिछली कई सदियों से मूक रहने वाले बटाईदार अपने साथियों के साथ खेतों में मार्च करते थे। हर आदमी अपनी लाठी को राइफल की तरह कंधे पर रखे रहते। जुलूस के सबसे आगे एक लाल झंडा लहरा जाता।

दमन तेज़ हुआ

आन्दोलनकारियों को समझना चाहिए थी कि लाठियाँ राइफलें नहीं होतीं। मुस्लिम लीग सरकार ने 'बरगादार बिल' के नाम पर दिखावटी वादे किए। बिल तो पास नहीं हुआ, बदले में सरकार ने फरवरी 1947 से दमन भी तेज़ कर दिया। इस परिस्थिति में आंदोलन एक ऐसे संकट में फँस गया जो जानलेवा साबित हुआ। बालुरघाट के पास पुलिस के साथ हुई झड़प में 20 संथाल और 49 किसान शहीद हो गए। संघर्षरत किसानों ने कभी हार नहीं मानी और न्यायसंगत मांग पर अटूट विश्वास रखते हुए दमन का बहादुरी से सामना किया। इस दमन का मुकाबला करने के लिए उग्र आन्दोलनकारी हथियार चाहते थे। लेकिन कम्युनिस्टों के पास हथियार नहीं थे। सच तो यह था कि उन्होंने वास्तव में एक पूर्ण सशस्त्र संघर्ष की कल्पना नहीं की थी। सामाजिक रूप से भी, इस आन्दोलन की सीमाएँ थीं। आदिवासी तत्वों ने अधिक उग्रता पर ज़ोर दिया। वहीँ दूसरी ओर मध्यम और गरीब किसानों का समर्थन कम हो गया। उत्तरी बंगाल के कस्बों में वे पेशेवर समूह, जो राष्ट्रीय आंदोलन के मुख्य आधार थे, ने इस उग्रवाद का तगडा विरोध किया। दमन जारी रहा और फरवरी के आखिर तक यह आंदोलन लगभग खत्म हो चुका था। मार्च में भी कुछ घटनाएँ हुईं, लेकिन ये एक खत्म होते हुए संघर्ष की आखिरी हिचकियाँ मात्र थीं। कम्युनिस्टों ने 28 मार्च को आम हड़ताल की योजना बनाई। इस बीच बंगाल के विभाजन के लिए हिंदू महासभा का अभियान ज़ोर पकड़ रहा था। 27 मार्च से कलकत्ता में फिर से भड़के दंगों ने शहरी क्षेत्रों में सहानुभूतिपूर्ण कार्रवाई की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन के महत्वपूर्ण नेताओं में कृष्णबिनोद राय, अवनी लाहिड़ी, सुनील सेन, भवानी सेन, मोनी सिंह, अनंत सिंह, विभूति गुहा, अजीत राय, सुशील सेन, समर गांगुली और गुरुदास तालुकदार शामिल थे।

आंदोलन की विशेषताएं

तेभागा आंदोलन बंगाल में चला, बटाईदारों द्वारा चलाया गया एक महत्वपूर्ण कृषि विद्रोह था, जिसमें उन्होंने अपनी खेती की उपज में अधिक हिस्सेदारी की मांग की थी। इस आंदोलन की जड़ें बटाईदारों की आर्थिक शिकायतों में निहित थीं। यह एक  जन आंदोलन था  जिसमें ग्रामीण आबादी, विशेषकर समाज के गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों की व्यापक भागीदारी थी। महिलाओं ने भी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विरोध प्रदर्शनों, सभाओं और यहां तक ​​कि पुलिस के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध में भी भाग लिया। तेभागा आंदोलन देश के अन्य हिस्सों में हुए किसान आंदोलनों से अलग था। अन्य सभी प्रांतों में किसान आंदोलन कुछ खास क्षेत्रों तक ही सीमित था, जबकि बंगाल में यह आंदोलन पूरे प्रांत में फैला हुआ था। यह बंगाल के 28 में से 15 ज़िलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। 'किसान सभा' के आह्वान पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मज़दूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इसने वर्ग संघर्ष पर आधारित हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रकाश फैलाया, जिसने नोआखली सहित बंगाल के बड़े हिस्से में सभी समुदायों के लाखों किसानों को प्रेरित किया और उन्हें अपने दायरे में खींच लिया। बंगाल और बिहार में सांप्रदायिक दंगों का मुकाबला करने में तेभागा आंदोलन और किसान सभा ने एक अनूठी भूमिका निभाई। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि बंगाल के नोआखली-टिप्परा जिलों के उन क्षेत्रों में दंगे नहीं भड़के, जहां किसान सभा का काफी प्रभाव था। इन क्षेत्रों में किसान सभा और तेभागा आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने दंगा प्रभावित पड़ोसी क्षेत्रों से आए शरणार्थियों के लिए राहत शिविरों का आयोजन किया।

आंदोलन के परिणाम

यद्यपि तेभागा आंदोलन अपने तात्कालिक लक्ष्यों में पूरी तरह सफल नहीं रहा, फिर भी इसने भूमि सुधारों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया, किसानों के बीच राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई, महिलाओं को सशक्त बनाया, स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव डाला और भारत में भविष्य के कृषि आंदोलनों को प्रेरित किया। इस आन्दोलन ने भविष्य के भूमि सुधारों की नींव रखी, जिनमें जमींदारी प्रथा का उन्मूलन और भूमि का पुनर्वितरण शामिल है। इस आंदोलन ने बंगाल के किसानों में राजनीतिक चेतना को बढ़ाने में योगदान दिया। इसने संगठित किसान प्रतिरोध की क्षमता और कृषि हितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को प्रदर्शित किया। तेभागा आंदोलन 1940 के दशक में पूरे भारत में फैले कृषि संघर्षों की व्यापक लहर का हिस्सा था। इन आंदोलनों ने  औपनिवेशिक शासन की वैधता को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई  और भारत की स्वतंत्रता की गति को गति प्रदान करने में योगदान दिया। इस आंदोलन में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बटाईदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए ' नारी वाहिनी' जैसे समूह बनाए, जिससे भारत में महिला आंदोलन का आधार व्यापक हुआ। तेभागा आंदोलन ने भारत में बाद के कृषि आंदोलनों को प्रभावित किया, जिनमें तेलंगाना विद्रोह और नक्सल वादी आंदोलन शामिल हैं। यह आर्थिक शोषण और अन्याय के खिलाफ किसान प्रतिरोध का प्रतीक बना हुआ है। तेभागा किसान आंदोलनों का शायद सबसे अहम योगदान यह था कि भले ही उन्हें तुरंत सफलता न मिली हो, लेकिन उन्होंने ऐसा माहौल ज़रूर बना दिया था, जिसकी वजह से आज़ादी के बाद कृषि सुधारों की ज़रूरत महसूस हुई। उदाहरण के लिए, ज़मींदारी प्रथा का खात्मा में तेभागा आन्दोलनकारियों द्वारा इस मांग को लोकप्रिय बनाने में निभाई गई भूमिका ने निश्चित तौर पर इसे हासिल करने में योगदान दिया।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर