गांधी और गांधीवाद
458. गांधी जी बिल्कुल अकेले पड़
गए थे
1947
गांधीजी
के लिए जनवरी 1947 का पहला
दिन एक पूर्ण संतुष्टि का दिन होना चाहिए था। सारी ज़िन्दगी उन्होंने जिस लक्ष्य को
पाने के लिए लड़ाई लड़ी, “भारत की आज़ादी”, वह लगभग
साकार होने जा रहा था। हालाकि वह स्वर्णिम घड़ी निकट आती जा रही थी, लेकिन गांधीजी
एक असंतोष और दुख के सागर में घिरते जा रहे थे। इस दुख का कारण था साम्प्रदायिक तनाव
और हिंसा।
गांधीजी नोआखाली में थे। 1946 के अक्तूबर अंत तक गांधीजी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे। गांधीजी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधीजी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधीजी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधीजी कहा करते थे,
“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”
नोआखाली में स्थिति शत्रुतापूर्ण
थी और गांधीजी को सावधानी से अपना रास्ता चुनना पड़ता था। मुसलमान शंकित और क्रूर थे।
गांधीजी उनके दोष गिनाकर उन्हें उत्तेजित नहीं करना चाहते थे। हिंदू दबे हुए थे। वे
खुलकर बोलने से डरते थे। गांधीजी उन्हें बहादुर बनने की प्रेरणा देते। इस बीच गांधीजी
की कुटिया के आसपास मुसलमानों की असाधारण भीड़ लगी रहती। जो लोग किसी समय गांधीजी को
संदेह और अविश्वास की दृष्टि से देखते थे, वे अब उनके पास पूजा और कृतज्ञता के भाव
से आते थे। हालाकि वहां के लोग चाहते थे कि गांधीजी उनके साथ कुछ दिन और रहें, लेकिन
2 जनवरी की सुबह श्रीरामपुर का शिविर तोड़ दिया गया। गांधीजी
पैदल गांव-गांव नंगे पैर यात्रा करने लगे। सात दिनों में उन्होंने 116 मील की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने ने 47 गांवों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावना जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा। उनकी रोज़ की प्रार्थना यही थी
कि ईश्वर उन्हें जीवन के बदलते अनुभवों से समभाव के साथ गुज़रने की शक्ति दे, और
जब वे किसी जगह से विदा लें, तो लोग उनके बारे में यह कह सकें कि
उनमें उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मिला जो उनका मित्र था, शत्रु
नहीं।
उस डेल्टा क्षेत्र में रास्ता
बड़ा कठिन था। बांस के डंडों को बांधकर पुल बनाया गया था। लेकिन गांधीजी के लिए यह तीर्थयात्रा
थी। 77 साल के गांधीजी सहनशक्ति, धैर्य और समर्पण भाव से अग्नि-परीक्षा
देते रहे। जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी। बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधीजी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया। गांधीजी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यात्मिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी। 77 वर्षीय गांधीजी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”
श्रीरामपुर से चलकर गांधीजी तीन मील दूरी पर स्थित चंडीपुर
आए और वहां पांच दिन ठहरे। निराश्रित लोग वहां आने लगे थे। उनके पुनर्वास का सवाल सामने
था। जो कुछ लोगों ने गंवाया था, उसे तो गांधीजी वापस नहीं ला सकते थे, लेकिन जीवन के
उतार-चढ़ाव का सामना साहस और आशा के साथ करने का बल उन्हें अवश्य दे सकते थे। इसके लिए
पुनर्वास की समस्या के बारे में विशेष प्रयत्न और नए दृष्टिकोण की ज़रूरत थी। गांधीजी
के लिए उन लोगों का पुनर्वास केवल आर्थिक पुनर्वास नहीं था, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक
पुनर्वास भी था। वे मानते थे कि आध्यात्मिक पुनर्जन्म होना चाहिए, सिर्फ़ पीड़ितों का
ही नहीं, बल्कि उनके उत्पीड़कों का भी। वे मानते थे कि जो दंगाई हैं और यहां से वहां
भागते फिर रहे हैं उन्हें सामने आना चाहिए और अपना अपराध क़बूल करके जो भी सज़ा मिले
उसे स्वीकार करना चाहिए। वहीं वे यह भी चाहते थे कि दंगों के शिकार लोगों को भी अपराधियों
को बिल्कुल भूल जाना चाहिए और अपने घरों को लौट जाना चाहिए।
7 जनवरी को, चांदीपुर में अपनी आखिरी रात, वे रात 2 बजे जागे और अपनी खास बारीकी के साथ यह पक्का करने के
लिए पूछताछ की कि मार्च के लिए उनके सभी निर्देश पूरे कर दिए गए हैं या नहीं। सुबह
की प्रार्थना में, उन्होंने अपने पसंदीदा भजन 'वैष्णव जन' को इस बदलाव के साथ गाने को कहा कि भजन की टेक में 'वैष्णव जन' की जगह बारी-बारी से 'मुस्लिम जन', 'पारसी जन' और 'ईसाई जन' शब्दों का इस्तेमाल किया जाए—जो सभी धर्मों के मानने
वालों के साथ अपनी एकता दिखाने का एक प्रतीक था। 8 जनवरी को सुबह गांधीजी चंडीपुर से अपना प्रिय भजन ‘जोदि
तोर डाक शुने केओ न आसे’ गाते हुए प्रस्थान कर गए। मंडली माशिमपुर में आकर रुकी।
दूसरे दिन वे फतेह पुर गए। अगला गांव दासपाड़ा था।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर