शुक्रवार, 5 जून 2026

485. स्वतंत्रता की प्राप्ति

राष्ट्रीय आन्दोलन

485. स्वतंत्रता की प्राप्ति

1947

14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान का निर्माण हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान का गवर्नर जनरल और लियाकत अली प्रधानमंत्री बने। बारह बजे मध्य रात्रि 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने। नेहरू ने घोषणा की, बरसों पहले नियति के साथ किया गया करार पूरा हुआ। आज हमारे दुर्दिन की अवधि समाप्त हो गई। भारत ने पुनः अपने-आप को प्राप्त कर लिया है। महात्मा गांधी की जय के नारे लगे। परन्तु विभाजन के दुख से गांधीजी कलकत्ता में साम्प्रदायिक दंगे शांत करने का प्रयास कर रहे थे।

गांधीजी जी कलकत्ता चले आए। तीन बार भारत सरकार ने संदेशवाहक भेजकर कहलवाया कि वे स्वतंत्रता दिवस पर प्रसारण के लिए अपना संदेश दें। उन्होंने कहा, मेरा कोई संदेश नहीं है। संदेशवाहक ने कहा, आपका कोई संदेश नहीं होगा तो अच्छा नहीं लगेगा। गांधीजी ने रुखाई से कहा, अगर यह बुरा है, तो होता रहे। बी.बी.सी. ने जब गांधीजी के लिए संदेश के लिए आग्रह किया, तो गांधीजी ने इस आग्रह को ठुकरा दिया। बोले, दुनिया को भूल जाना चाहिए कि मैं अंग्रेज़ी भी जानता हूं। गांधीजी के ऐसे वक्तव्य उनकी भारी पीड़ा को दर्शा रहा था।

ऐसा नहीं है कि अगर गांधीजी नहीं होते तो ब्रिटिश राज सदा सदा के लिए टिका रहता। राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई गांधीजी के 1915 से भारत में सक्रिय होने के आधी शताब्दी पहले से चल रही थी। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधीजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को तीन विशिष्ट गुणों से अनोखा बनाया था। पहला- गांधीजी ने स्वराज को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की तार्किक परिणीति के रूप में न सिर्फ प्रचारित किया बल्कि कठिन मौकों पर अलोकप्रिय निर्णय लेकर अहिंसा और सत्याग्रह के मूल को गांव-गांव तक स्थापित किया। इससे जनसाधारण का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करना सहज हो गया। दूसरा- गांधीजी ने स्वराज की राजनीतिक और सामाजिक परिभाषा के बीच के पुराने द्वंद को लगभग खत्म किया। आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वराज को एक ही भवन के चार स्तंभ के रूप में प्रचारित किया। रचनात्मक कार्यक्रमों के ज़रिए आम लोगों के बीच में एक जीवनशैली के रूप में और सांस्कृतिक क्रांति के रूप में स्थापित किया। तीसरा- गांधीजी ने अपनी कथनी और करनी में एकता, निजी और सार्वजनिक जीवन की एकरूपता के जरिए आश्रमों से शुरू करके जनआंदोलन तक हिंदू-मुस्लिम दूरी, छुआछूत की बीमारी और औरतों को सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखने की पुरुषवादी परंपरा का विमूलन किया। अब अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी का नेतृत्व एक प्रकार से अहिंसक और नैतिक आधारों पर भारतीय समाज और राष्ट्रीयता के नवनिर्माण की कोशिश थी। 

भारत में ब्रिटिश सत्ता का चरित्र अर्द्ध-लोकतांत्रिक था। वह न्याय, आधुनिकता, यूरोपीय सभ्यता की श्रेष्ठता आदि कुछ खास विचारों के आधार पर अपना नैतिक औचित्य स्थापित करती थी। लेकिन उसका टिकाव तो मुख्यतः पाशविक बल पर ही था। राष्ट्रीय आंदोलन ने लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाया। उसने ब्रिटिश सता के मानवीय दावों का पर्दाफ़ाश भी किया। अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अहिंसक संघर्ष का सहारा लिया। औपनिवेशिक विधायिकाओं का इस्तेमाल किया गया। संघर्ष-तैयारी-संघर्ष की अनोखी रणनीति का सहारा लिया गया। राष्ट्रवादी रणनीति ब्रिटिश शासन की खास प्रकृति के अनुसार विकसित हुई। उनकी सत्ता संरक्षण और निरंकुशतावाद के मिश्रण से तैयार स्तंभ पर टिकी हुई थी। इस सत्ता की स्थापना शक्ति द्वारा हुई थी। इसका विकास और स्थायित्व भी शक्ति द्वारा ही हुआ। यहां तक शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन करने के लिए भी शक्ति का ही सहारा लिया जाता था। कुछ नागरिक संस्थानों, जैसे स्कूल, कॉलेज, न्यायालय, विधायिकाओं की भी उसने रचना की। जब आंदोलन स्थगित रहता तो लोगों को कुछ नागरिक अधिकार भी दे दिए जाते। दमन के समय भी कुछ नागरिक संहिताओं का पालन किया जाता। इस तरह ब्रिटिश शासन का निरंकुशतावादी और लोकतांत्रिक चरित्र साथ-साथ चलता रहा। भय और प्रलोभन दोनों का उसने सहारा लिया। उसने यह धारणा फैला रखी थी कि वे भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास कर उसे आधुनिक बना रहे हैं। साथ ही यह भी ज़ाहिर कर रखा था कि वे अपराजेय हैं और उनका विरोध करना बेकार है।

उपरोक्त वर्णित सारे पहलुओं का ध्यान रख भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति तैयार की गई। इसी के आधार पर वर्चस्व के दीर्घकालीन संघर्ष की योजना तैयार की गई। इस संघर्ष में आम जनता के दिलों को जीतने का प्रयत्न किया गया। इसका प्रभाव हर संघर्ष के बाद बढ़ता गया। अधिकांश समय क़ानून सम्मत तरीक़ों से संघर्ष किया गया, ज़रूरत पड़ने पर जनसंघर्ष के लिए क़ानून तोड़ा भी गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन और मज़बूत हुआ। सक्रिय संघर्ष का लक्ष्य औपनिवेशिक शासकों के हाथ से सत्ता छीन लेना था। गांधीजी ने जनसाधारण को सक्रिय राजनीति में लाने का काम किया, जिन्हें अंग्रेज़ों ने बख़ूबी रणनीति बना कर जनता को सुषुप्ति की अवस्था में रखा था। इसके अलावा गांधीजी ने इन धारणाओं का खंडन भी करने का महत्वपूर्ण काम किया कि ब्रिटिश सत्ता भारत की शुभचिंतक है और वह अपराजेय भी है। सिविल नाफ़रमानी आंदोलन ने लोगों को निर्भीक और साहसी बनाया। उसमें संघर्ष और त्याग करने की क्षमता पैदा हुई। लोगों में यह विश्वास आया कि उनके सहमति के बिना यहां शासन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने अगला लक्ष्य निर्धारित किया कि प्रशासनिक वर्ग पर ब्रिटिश शासन की पकड़ कमज़ोर हो। इसकी पूर्ति के लिए नौकरशाहों और फौज के लोगों को राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में लाया गया। 1945 के बाद पुलिस, सेना और नौकरशाहों में ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफ़ादारी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। जनता के बीच भारत का पक्ष रखकर औपनिवेशिक विचारधारा के वर्चस्व को कमज़ोर करने का लगातार प्रयास किया जाता रहा। इसके अलावा अर्द्ध-लोकतांत्रिक स्वाधीनता के नाम पर जो भी रियायतें मिली, उसके विस्तार के लिए लगातार कोशिश की गई। इसमें जनमत का भी भरपूर सहयोग मिला।

राष्ट्रवादियों द्वारा ब्रिटिश वर्चस्व को समाप्त करने के लिए दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति को अंजाम देने के लिए संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के मार्ग पर चला गया। पहले संवैधानिक तरीक़ों से सशक्त आंदोलन चलाए जाते, फिर खुली मुठभेड़ का रास्ता छोड़ दिया जाता। फिर दी गई रियायतों को अपर्याप्त बता कर कुछ और रियायतें हासिल की जातीं। शांति के दौर में उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करते हुए गहन राजनीतिक-वैचारिक काम किया जाता। पहले ज़्यादा प्रभावशाली आंदोलन छेड़ने के लिए ताकत संजोयी जाती। इस रणनीति की पराकाष्ठा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में हुई, जब सत्ता हस्तांतरण का समझौता हुआ। इस तरह हर दौर का इस्तेमाल औपनिवेशिक वर्चस्व को ख़त्म करने, राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने और उन्हें राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने एवं लोगों में संघर्ष की क्षमता पैदा करने के लिए किया गया। इस रणनीति से स्वतंत्रता आंदोलन लगातार ऊपर की ओर उठता रहा। आंदोलन को सुधारों तक ही सीमित नहीं रखा गया। संवैधानिक सुधारों को भी औपनिवेशिक व्यवस्था का ही अंग मानकर देखा गया। जब तक आज़ादी पूरी नहीं मिली तबतक यह मानकर चला गया कि वह मिली ही नहीं है। जब जनआंदोलन नहीं होते तब भी उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक संघर्ष ज़ारी रहता। सिर्फ़ संघर्ष का रूप बदल जाता। जनजागरण और रचनात्मक काम ज़ारी रहता। गांधीजी ने कहा था, सिविल नाफ़रमानी रोकने का मतलब यह नहीं है कि युद्ध थम गया है। युद्ध तो तभी थमेगा, जब भारत में उसका अपना बनाया हुआ संविधान लागू होगा।

एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्त होने तक लगातार नहीं चल सकता था? क्या अगर ऐसा होता, तो स्वतंत्रता जल्द नहीं प्राप्त कर ली जाती? गांधीजी के नेतृत्व के दौर में यह मानकर चला जा रहा था कि जनांदोलन का चरित्र ही ऐसा होता है कि उसे अनिश्चित काल तक लगातार नहीं चलाया जा सकता। दो आंदोलनों के बीच विश्राम और तैयारी का समय होना ही चाहिए। आंदोलन जनता से चलते थे। कुछ समय के बाद जनता थक जाती थी। जनता में दमन को सहने की क्षमता असीमित नहीं थी। कष्ट सहने के बाद लोग विश्रांति चाहते हैं, ताकि नए जोश के साथ फिर आगे बढ़ सकें। इसलिए नेतृत्व ने ज़रूरत से ज़्यादा उन पर दबाव नहीं डाला। औपनिवेशिक सत्ता के पास आंदोलनों को नष्ट करने की प्रचंड क्षमता थी। उस पर आघात करने की क्षमता तो जनता के बीच से ही आनी थी। इसलिए राजनीतिक कौशल इसी में थी कि औपनिवेशिक राज्य से टकराने के बाद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संघर्ष का दौर चलाया जाए। इस प्रकार गांधीजी ने अपनी रणनीति में जनता और सरकार दोनों की सीमाओं को समझा और उसी के अनुसार संघर्ष का कार्यक्रम बनाया। 1938 में गांधीजी ने लिखा था, चतुर सेनापति अपने पांव उखड़ने तक इंतज़ार नहीं करता, जब वह समझ जाता है कि किसी खास मोरचे पर वह और अधिक देर तक नहीं टिक सकता, तो वह वहां से सामान्य तरीक़े से हट जाता है। आंदोलन कब शुरू करना है और कब उसे वापस लेना है, इस अति महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय गांधीजी और कुछ प्रमुख नेता इस विषय पर मूल्यांकन करने के बाद लेते थे कि आंदोलन की ताक़त और कमज़ोरी क्या-क्या है। लोग कितने देर तक साथ देंगे। सरकार की तैयारी कैसी है। इसी तरह वे यह देखते थे कि सरकार से बातचीत करने का उचित समय है या नहीं। अतः कांग्रेस की नीति रही कि जब संभव हो, तब बातचीत और समझौता और जब ज़रूरी हो, तब असहयोग और सीधी कार्रवाई। इन सबके बीच रचनात्मक कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खादी, कताई, ग्रामोद्योग का प्रसार, राष्ट्रीय शिक्षा, हिन्दू-मुसलिम एकता, अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ संघर्ष, हरिजनों की सामाजिक स्थिति में सुधार, विदेशी वस्त्र और शराब का बहिष्कार, आदि महत्वपूर्ण कार्य थे। इन कामों के सुचारू रूप से चलाने के लिए आश्रम मुख्यतः गांवों में बनाए जाते थे। आंदोलन की वापसी के बाद जो शून्य पैदा होता था, उसे भरने में इन रचनात्मक कार्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सक्रिय जन-आंदोलन के दौर में जो सक्रिय और उत्साहित कार्यकर्ता होते थे, उन्हें ये रचनात्मक कार्य हतोत्साहित और अवसाद ग्रस्त होने से बचाते थे। रचनात्मक कार्य में लाखों लोगों को समाहित किया जा सकता था। जो रचनात्मक कार्य से जुड़ जाते, वे ही आगे चलकर सिविल नाफ़रमानी के आंदोलन में शरीक होते।

राष्ट्रीय आंदोलन की चुनौती का सामना करने के लिए औपनिवेशिक सत्ता ने संवैधानिक सुधार और विधायिकाओं का सहारा लिया। उन्हें आशा थी कि संसदीय प्रक्रिया राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा करेगी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता इसका लाभ भी उठाया और इसका विरोध भी किया। संवैधानिक सुधारों को हर तरह की कसौटी पर कसा जाता। जब भी उपनिवेशवाद थोड़ी-सी भी राजनीतिक ज़मीन छोड़ने के लिए बाध्य होता था, तो राष्ट्रवादी उस पर तुरंत क़ब्ज़ा जमा लेते, ताकि उनके विरोध के संघर्ष को और तेज़ किया जा सके। सुधारों को इस तरह लागू किया जाता कि उपनिवेशवादियों के मंसूबे पूरे न हो पाएं। चुनी गई सरकारों का उपयोग इस तरह किया जाता कि कठिनाइयों से घिरी जनता को राहत पहुंचे। लोगों में स्वशासन की क्षमता पर विश्वास पैदा हुआ। राष्ट्रीय आंदोलन की प्रतिष्ठा बढ़ी। जो लोग विधायिकाओं और नगरपालिकाओं के माध्यम से काम कर रहे थे, उन लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का अंग होने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज़ी हुक़ूमत की चालों को उन्होंने उजागर किया। जब भी जनांदोलन में उभार आता वे विधायिकाओं का परित्याग भी कर देते और औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध संघर्ष करते।

गांधीजी ने अहिंसा का सिद्धांत अपनाया। इस समय के अधिकांश नेताओं ने इस नीति का अनुपालन किया। अहिंसा कांग्रेस की समग्र रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग थी। राष्ट्रीय आंदोलन को अहिंसा सूट भी बहुत हुई। अहिंसक संघर्षों के कारण अधिक-से-अधिक जनता इसमें शामिल हुई। स्त्रियों का इसमें शामिल होना बहुत बड़ी मिसाल थी। अहिंसा संघर्ष को एक नैतिक आधार देती थी। जब अंग्रेज़ शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हिंसक हथियारों का प्रयोग किया जाता तो ब्रिटिश सत्ता की वास्तविकता सामने आ जाती। यह शासकों के लिए समस्या का कारण बनती। और अगर शासक कोई कार्रवाई न करता तो इससे यह साबित होता कि ब्रिटिश सरकार में शासन चलाने की क्षमता ही नहीं है। अतः औपनिवेशिक शासकों के लिए एक तरफ कुंआ तो दूसरी तरफ़ खाई वाली स्थिति बनी रहती। दो विकल्पों के बीच वे दमन का सहारा लेते और इसमें उनकी नैतिक हार होती। प्रतिष्ठा के इस युद्ध में अहिंसा ने भारतीयों को राजनीतिक शक्ति दी, जिससे वे सशस्त्र औपनिवेशिक सत्ता का मुक़ाबला कर सके। इस तरह इस अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम ने विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण जगह दर्ज़ कर लिया। यह राजनीतिक लड़ाई लंबी, ज़रूर थी, पर थी अनोखी।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ़ ब्रिटेन की राजनीतिक ग़ुलामी से छुटकारा पाने का संघर्ष नहीं था, इसके पीछे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की आकांक्षाएं भी थीं। ब्रिटिश सत्ता भारत पर अपने राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयोग ब्रिटिश समाज और अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था का शोषण करने के लिए कर रही थी। आर्थिक दृष्टि से देश पिछड़ रहा था। औपनिवेशिक शोषण प्रणालियों की राष्ट्रीय नेताओं को समझ थी। वे इस बात की आलोचना करने लगे कि भारत का सारा धन विदेश जा रहा है। इस बात की सच्चाई ओ उन्होंने जान लिया था कि भारत का उपनिवेश बनना न तो इतिहास की कोई दुर्घटना है और न ही ब्रिटिश सत्ता की राजनीति का नतीजा। यह तो ब्रिटिश समाज के चरित्र और भारत की ग़ुलामी का स्वाभाविक फल है। जब समझ विकसित हुई तो उपनिवेश विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता उपनिवेशवाद का विश्लेषण कर लोगों के सामने रखते। गांधीजी ने जन-राजनीति के द्वारा इस दृष्टिकोण को गांव-गांव तक फैलाया। इस बात पर ख़ूब ज़ोर दी कि भारत की संपदा को लूटा जा रहा है। भारत को ब्रिटेन के तैयार माल का बाज़ार बनाया जा रहा है। इससे औपनिवेशिक शासन की बुनियाद कमज़ोर हुई। ब्रिटेन भारतवासियों के हित के लिए काम कर रहा, यह मिथक को टूटा। इससे सुदृढ़ और लगातार चलने वाले आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता थी। लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया गया। गांधीजी ने व्यस्क मताधिकार पद्धति की मांग की। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी।  विषयों पर बहस होती और अंत में मतदान होता। ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय ‘करो या मरो’ वाले भाषण की शुरुआत में ही गांधीजी ने कहा था, मैं उन 13 मित्रों को बधाई देता हूं, जिन्होंने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। ऐसा कर उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिसके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना पड़े। राष्ट्रीय आंदोलन नागरिक अधिकारों का पक्षधर रहा। प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इसने संघर्ष किया। गांधीजी भी नागरिक अधिकारों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध थे। गांधीजी ने यंग इंडिया में जनवरी 1922 में लिखा था, सरकार ने देश के सामने जो मुद्दा पैदा कर दिया है, उसकी तुलना में स्वराज, ख़िलाफ़त और पंजाब सवाल गौण सवाल हैं। हम अपने लक्ष्य की तरफ़ एक कदम भी बढ़ा सकें, इसके पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति और संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना ही होगा ... हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए। नेहरू भी इसके सबसे बड़े हिमायती थे। धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रवादी विचारधारा का बुनियादी तत्व माना गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने आधुनिक उद्योगों और कृषि विकास के आधार पर समाज के पूर्ण आर्थिक रूपांतरण का लक्ष्य स्वीकार किया। गांधीजी सिर्फ़ उन मशीनों के विरोधी थे जो बेरोज़गार फैलाती या बहुसंख्यक लोगों को ग़रीब कर कुछ लोगों को अमीर बनाती थीं। देश आर्थिक विकास के मामले में आत्मनिर्भर बने इसके प्रति वे प्रतिबद्ध थे। विदेशी पूंजी के विनियोग का वे विरोध करते थे। उनका कहना था कि विदेशी पूंजी देश का विकास नहीं करेगी, बल्कि पिछड़ापन लाएगी। राष्ट्रीय आंदोलन शुरू से ही ग़रीबों का पक्षधर रहा। इससे आंदोलन को समाजवादी आधार मिला। 1919 के बाद गांधीजी ने किसानों और दस्तकारों पर आधारित आर्थिक दृष्टि विकसित की और उसका प्रचार किया। गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की सामाजिक दृष्टि भी विकसित की। वे ग़रीबों के हितों की रक्षा के लिए भी हिंसा के प्रयोग के विरुद्ध थे। लेकिन उनकी बुनियादी दृष्टि समाज के परिवर्तन की थी। वे क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा में भी आगे बढ़ते हैं, खासकर 1930 और 40 के दशकों में, जब वे कहते हैं, निहित स्वार्थों में ठोस तबदीली लाये बिना जनसाधारण की स्थिति में सुधार नहीं लाया जा सकता वे निजी संपत्ति का विरोध करने  लगते हैं। वे बार-बार उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की वकालत करते हैं। उन्होंने पूंजीवाद और ज़मींदारी प्रथा की भर्त्सना की। जाति के आधार पर विषमता और जुल्म का विरोध करते थे। इन सब चीज़ों ने राष्ट्रीय आंदोलन को क्रांतिकारी बनाने में मदद पहुंचाई।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 1 जून 2026

सूफ़ीमत ...5. सूफ़ीमत का उदय-7

 5. सूफ़ीमत का उदय-7


5.12 (छ) क़ुरआन का संदेश

क़ुरआन इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और सर्वोच्च ग्रंथ है क़ुरआन का अर्थ उच्चरित या पठित वस्तु है। 'क़ुरआन' शब्द अरबी भाषा के 'क़राअ' से बना है, जिसका अर्थ है "पढ़ना" या "पाठ करना"। हालाकि क़ुरआन एक धार्मिक किताब है, दार्शनिक नहीं, लेकिन यह उन सभी समस्याओं के बारे में बताता है, जो धर्म और दर्शन में समान हैं। कुरान का मुख्य संदेश मानवता को एक सच्चे ईश्वर (अल्लाह) की एकेश्वरवाद (तौहीद) की राह दिखाना, अच्छे कर्मों के प्रति प्रेरित करना और न्याय (इंसाफ) तथा शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग प्रशस्त करना है। क़ुरआन का संदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए है। इसमें मानव जीवन के सभी पक्ष समाहित हैं, - उसका विश्वास, मान्यता, आराधना की विधि, आचार-संहिता, सामाजिक क़ानून-क़ायदे, शासन के सिद्धान्त, आर्थिक प्रविधि।  क़ुरआन द्वारा तौहीद यानी एकेश्वरवाद को सामने लाया गया है। तौहीद का अर्थ होता है  अल्लाह को एक सत्य ईश्वर माने, उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करें और उसी की आराधना, उपासना और पूजा करें,.. क्योंकि वो निराकार एक सत्य ईश्वर अल्लाह ही है जिसने सारे जगत का निर्माण किया, वही उसका रचयिता, मालिक और उसका रब है। पूरी सृष्टि का केवल एक ही रचयिता और पालनहार है, जिसका कोई साझीदार (बेटा या परिवार) नहीं है। वह अद्वितीय और सर्वशक्तिमान है।

इस्लाम धर्म में धार्मिक शिक्षाओं और कानूनों के सारे सिद्धांतों को दो विभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। एक को उसूल (जड़ या मूल) कहते हैं और दूसरे को फ़रू (शाखा)। ये दोनों मिलकर इस्लाम की पूरी रूपरेखा तैयार करते हैं। क़ुरआन में ईमान और अमल की बात की गई है। ईमान असल में उसूल ही है और अमल फ़रू है। 'उसूल' का अर्थ है मूल या नींव। उसूल वे धार्मिक सिद्धांत (ईमान) हैं जिन्हें नबी ने बताया है। ये इस्लाम के वे आधारभूत विश्वास और आस्थाएँ हैं जो अपरिवर्तनीय हैं। फ़रू उन सिद्धांतों के अनुसार आचरण (अमल) को कहते हैं। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि हज़रत मुहम्मद साहब के उपदेश उसूल हैं, और उन पर अमल करने का नाम फ़रू है। ईमान उस सत्य की स्वीकृति है जिसे नबी साहब ने उद्घोषित किया था। कुफ़्र (अविश्वास, इनकार) उसी सत्य की अस्वीकृति है। ईमान का सर्वोच्च शिखर तौहीद है। तौहीद यह सिखाती है कि ईश्वर को छोड़कर किसी और को  मत पूजो। कुफ़्र का सबसे बुरा रूप शिर्क है। क़ुरआन कहता है कि सभी पाप क्षमा किये जा सकते हैं, परन्तु शिर्क के लिये क्षमा नहीं, क्योंकि इससे मूल धर्म की नींव ही हिल जाती है। और मार्गदर्शन का केंद्र ही बदल जाता है (क़ुरआन - 4:48)। शिर्क के कारण ही मनुष्य ईश्वर के अलावा और देवताओं को भी ईश्वर मान लेता है या उसमें ईश्वरीय गुण देखता है। शिर्क का एक रूप मूर्तिपूजा को मान लिया गया है। रसूल को अपनी ओर से क़ुरआन में संशोधन-परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि क़ुरआन ईश्वर द्वारा पारित विधान है। रसूल क़ुरआन द्वारा निर्धारित सीमा तक आदेश देता है। वह वही उपदेश देता है जो ईश्वर का आदेश होता है।

अल् फातिहा क़ुरआनशरीफ़ का पहला अध्याय है। उसमें मंत्र है –

बिस्मिल्लाहिर् रहमानिर् रहीम (अल्लाह के नाम से, (आरम्भ में भगवान का नाम) जो परम कृपालु तथा दयावान्  है)।

अल् हम्दु लिल्लाहि रब्बिल् आलमीन (सब प्रकार की प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं, जो सारे संसारों का पालनहार है)।

र्रहमानिर् रहीम (जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अर्थात वह विश्व की व्यवस्था एवं रक्षा अपनी अपार दया से कर रहा है, अतः प्रशंसा एवं पूजा के योग्य भी मात्र वही है।)

मालिकि यौमिद्दीन (जो प्रतिकार (आख़िरी/  प्रलय का दिन/ क़्यामत) के दिन का मालिक है)

इय्याक नअबुदु व इयाक नअस्तईन (हे अल्लाह! हम केवल तुझी को पूजते (इबादत) हैं और केवल तुझी से सहायता मांगते हैं।)  इस्लाम की परिभाषा में इसी का नाम ‘तौह़ीद’ (एकेश्वरवाद) है, जो सत्य धर्म का आधार है।

इहदि नस् सिरातल मुस्तक़ीम (सीधा रास्ता {सुपथ} दिखा तू हमें)

सिराताल् लजीन अन्अम्त अलैहिम। (उन लोगों की राह जिन पर तूने अपना इनाम फरमाया।)

ग़ैरिल मग्दूबि अलैहिम व लद्दाल्लीन। (न कि उनका जिन पर प्रकोप उतारते हो, न उनका जो भ्रमित हैं)

क़ुरआन में यह संदेश दिया गया है कि हमें सीधी राह पर चलनी चाहिए। ग़लत राह से हम सही मुक़ाम पर नहीं पहुंच सकते मार्गदर्शन के लिए ईश्वर ने आदम, नूह, इब्राहिम, मूसा और ईसा सहित कई पैगंबर भेजे पैगंबर मुहम्मद उनके अंतिम संदेशवाहक हैं, और कुरान मानवता के लिए अंतिम ईश्वरीय मार्गदर्शन है

क़ुरआन में यह संदेश दिया गया है कि सारी सृष्टि का ईश्वर एक है और सभी इंसान उसी ईश्वर की एकता का रूप है। इस्लाम में ईश्वर को अल्लाह कहते हैं और इसके साथ तआला शब्द का प्रयोग होता है, यह अरबी क्रिया 'ताला' से निकला है, जिसका अर्थ है 'सबसे ऊंचा', 'महानतम', या 'जो हर चीज़ और हर सोच से परे और बुलंद है', यानी जिसका अर्थ होता है सर्वश्रेष्ठ या महान। इस्लामी परंपरा में जब भी अल्लाह का नाम लिया जाता है, तो उनकी महिमा और सर्वोच्चता को व्यक्त करने के लिए उनके साथ सम्मान सूचक शब्द के रूप में 'तआला' जोड़ा जाता है। अल्लाह तआला ('सर्वशक्तिमान ईश्वर') सदैव से था, सदैव रहेगा। ईश्वर सिर्फ़ एक है, इसलिए वह सर्वोच्च है। उसके नियम और क़ायदे अंतिम है। उसका आदेश अंतिम है। वह ख़ालिक़ (सृजनहार) है, वह रब (पालनहार) है, वह मालिकहाकिम (अधिकारी व शासक) है, वह आलिम (ज्ञानी) है, वह अज़ीज़ (सर्वशक्तिमान) है, वह आदिल (न्यायी) है, वह मअबूद (वंदनीय) है। इंसान अपनी बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति से इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ सकता है। इसलिए वह अपने उस मालिक के सामने, जिसने उसे पैदा किया है और सारी नियामतें दी हैं, सर झुकाए और यह भी हिदायत दी गई है कि उसके सिवा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। सब उसका आदेश माने। रूहानी ज़िन्दगी का यह पहला उसूल है।

मनुष्य को एक उद्देश्य के साथ बनाया गया है। इस दुनिया के बाद 'न्याय का दिन' (प्रलय) आएगा, जहाँ हर इंसान को अपने अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देना होगा।  इस्लाम में स्रष्टा और सृष्टि में भिन्नता स्पष्ट है। दोनों का मक़ाम (पद) अलग है। मृत्यु के बाद  मनुष्य स्वर्ग या  नर्क का अधिकारी बनता है। दोनों का मिलन या एकत्व की कोई अवधारणा नहीं है। यानी आत्मा का परमात्मा से मिलन या सूक्ष्म का विराट से मिलन जैसी बात नहीं कही गई है। क़ुरआन में ईश्वर के द्वारा उतरे वे संदेश हैं जो समय-समय पर ईश्वर ने पैग़म्बर मुहम्मद पर उतारे थे। चूंकि यह संदेश सीधे ईश्वर से आए हैं इसलिए यह सर्वोच्च है और सबको इसका पालन करना ज़रूरी है। क़ुरआन में इंसान के लिए दो तरह के कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं एक हुकूक़ अल्लाह (ईश्वर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य) और दूसरा हुकूक़-उल-इबाद (मनुष्य के प्रति मनुष्य का कर्तव्य)। हुकूक़ अल्लाह को इंसान का फ़र्ज़ कहा गया है, जिसमें उसे नमाज़, रोज़ा, हज्ज, ज़कात, आख़रत और फ़रिश्तों (देवदूतों) पर विश्वास शामिल है। इसे ही इबादत (पूजा) कहा जाता है। इन फ़र्ज़ों को पूरा करने से इंसान में रूहानी ताक़त आती है। हुकूक़-उल-इबाद यानी इंसान के लिए इंसान का कर्तव्य। क़ुरआन का पहला उसूल है कि हुकूक़ अल्लाह के पूरा करने में यदि कोई कमी रह जाए तो ख़ुदा माफ़ कर सकता है, लेकिन हुकूक़-उल-इबाद के पूरा करने में अगर थोड़ी सी भी कमी रह जाए तो ख़ुदा उसे हरगिज माफ़ नहीं करेगा। ऐसे आदमी को न सिर्फ़ इस दुनिया में बल्कि दोनों में, ख़सारा (घाटा) उठाना पड़ेगा।

क़ुरआन का दूसरा उसूल है कि नमाज़, रोज़ा, हज्ज, और ज़कात (हकूक अल्लाह) इंसान के रूहानी (आध्यात्मिक) जीवन और आत्मिक जीवन से संबंध रखते हैं। इसलिए इन्हें ईमान (श्रद्धा), ख़ुलूसे कल्ब (शुद्ध हृदय) और बेग़र्ज़ी (निःस्वार्थ भाव) से पूरा करना चाहिए। कोई निजी फ़ायदे की बात नहीं करनी चाहिए। यह केवल अल्लाह के नज़दीक पहुंचने के लिए रूहानी शक्ति हासिल करने का ज़रिया है। ख़ुदग़र्ज़ी से इनका सही उद्देश्य जाता रहेगा। क़ुरआन प्रेम, दया, सच्चाई, न्याय, और बड़ों के सम्मान पर जोर देती है। यह गरीबों की मदद करने, महिलाओं के अधिकारों और एक स्वस्थ, अपराध-मुक्त समाज की स्थापना करने की शिक्षा देती है।

क़ुरआन का तीसरा उसूल है कि हर इंसान को चाहिए कि जो रूहानी शक्ति ईश्वर की तरफ़ अपने कर्तव्यों के अदा करने से हासिल हो उसे मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने में लगा दे। क़ुरआन में पहला फ़र्ज़ यह बताया गया है कि ग़रीबों, लाचारों, दुखियों और पीड़ितों की सहायता की जानी चाहिए। समाज में लोग एकता और भाईचारे के साथ रहें। लोगों के सामने मानवता की बेहतरी और कल्याण का ध्येय हो। यह बुनियादी सच्चाई सब धर्म ग्रंथों में मौज़ूद है। क़ुरआन (41:34) में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को तथा उनके माध्यम से सर्वसाधारण मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया है कि बुराई का बदला अच्छाई से तथा अपकार का बदला उपकार से दें। जिसका प्रभाव यह होगा कि अपना शत्रु भी हार्दिक मित्र बन जायेगा। इस तरह क़ुरआन में यह आदेश मिलता है कि ‘पाप का प्रतिकार पुण्य से ही होना चाहिए’। बताया गया है ‘बुराई रफा करनी है तो वह अच्छाई से ही हो सकती है’

इन्नहू लफी जुबूरिल इल अव्वलीन

लि कुल्ले कौमिनहाद।

व इम्मिन उम्मतिन इल्ला खलाफीहा नजीर।

ला नुफ़र्रिको बैना अहदिम मिन रूसुलिह।

व मा अरसलना मिन कब्लेका मिर्रसूलिन।

ला इलाहा इला अना फ़ाबुदून। (क़ुरआन शरीफ़, 14-4)

अर्थात्‌: जो कुछ मैंने तुमसे कहा है वह सब पहले के लोगों के पवित्र ग्रंथों में मौज़ूद है। सब क़ौमों में अल्लाह ने पैग़म्बर (ईश्वरीय संदेश वाहक) भेजे हैं। उन पैग़म्बरों में हम एक दूसरे के साथ किसी तरह का फ़र्क़ नहीं करते। सबको एक बराबर मानते हैं और सबकी एक ही शिक्षा है। सबने एक ही सच्चाई की घोषणा की है। सबक़ा मैं ही एक ईश्वर हूं। मेरे अलावा कोई दूसरा उपासना योग्य नहीं है। ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलल्लाह इस्लाम का मूल-मंत्र है। इसका अर्थ होता हैअल्लाह के सिवा कोई और पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं। यह इस्लाम का धर्म सूत्र है और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। सिर्फ़ अल्लाह को मानने से ही कोई इंसान पक्का मुसलमान नहीं हो सकता। उसे यह भी मानना पड़ता है कि हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. अल्लाह के नबी, रसूल और पैग़म्बर हैं। इसके बाद उसे पांच धार्मिक कृत्य करने होने हैं।

कलमा पढ़ना ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदर्रसूलल्लाह मंत्र का पारायण करना। यह एक पवित्र वाक्य है, जो तौह़ीद का शब्द है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर एक है और हज़रत मुहम्मद साहब उसके रसूल हैं। इस्लाम का तौहीद (एकेश्वरवाद) इसी मंत्र पर आधारित है।

नमाज़ पढ़ना प्रतिदिन पांच बार ईश्वर से प्रार्थना करना। इसे सलात भी कहते हैं।

रोज़ा रखना रमज़ान के महीने भर केवल एक शाम खाना खाना और वह भी सूर्यास्त के बाद। रमज़ान के महीने में ही पहले-पहल क़ुरआन उतरा था।

ज़कात अपनी वार्षिक आय का चालीसवां हिस्सा (ढाई प्रतिशत) दान में दे देना।

हज्ज तीर्थों में जाना। पहले ये तीर्थ मक्का और मदीना थे, अब संतों की समाधियों  को भी तीर्थ माना जाता है। क़ुरआन में कहा गया है, निःसंदेह पहला घर, जो मानव के लिए (अल्लाह की वंदना का केंद्र) बनाया गया, वह वही है, जो मक्का में है, जो शुभ तथा संसार वासियों के लिए मार्गदर्शन है। (3:96).

ये हैं क़ुरआन के धार्मिक सिद्धांत। क़ुरआन की आयतें लोगों को संदेश देती हैं कि वे नेकी की राह पर चलें और गुमराह न हों। क़ुरआन के मुताबिक मुहम्मद ख़ुदा के आखिरी पैगंबर थे। इसलिए वह्य (ईश्‍वर प्रेषित ज्ञान) और ग़ैब (रहस्‍य) की बातें जान लेने का और कोई ज़रिया नहीं है। क़ुरआन अपने से पहले के सब धर्म ग्रंथों को अपनी तरह ही ठीक मानता है। दुनिया के सब धर्मों की शिक्षा एक ही है। जो रसूल जिस क़ौम में भेजा गया है उसे उस क़ौम की ज़बान (भाषा) में ईश्वरीय संदेश देकर भेजा गया है ताकि वे उन्हें साफ-साफ समझ सकें। पैग़म्बर मुहम्‍मद साहब सल्ल. के मानने वालों के सम्प्रदाय (उम्‍मते मुहम्‍मदिया) के अनुसार क़ुरआन और नबी श्री की बताई सारी बातें अंतिम हैं और इन पर मुसलमानों को ईमान रखना और अडिग रहना है।

इस्लाम, धर्म के नाम पर बल प्रयोग के विरुद्ध है। पाक कुरआन का कलाम है- ‘’लकुम दीनुकुम वलि-य-दीन’’ तुम अपने दीन (धर्म) पर, मैं अपने दीन पर। जो लोग एक रसूल (पैग़म्बर, अवतार) और दूसरे रसूल में फ़र्क़ करते हैं और कहते हैं कि हम किसी को मानते हैं और किसी को नहीं मानते हैं, वही लोग काफ़ेरूना हक्का (असली काफ़िर) हैं। क़ुरआन मूर्ति पूजा का और ईश्वर को छोड़कर किसी और की पूजा का बहिष्कार करता है। चूंकि क़ुरआन का कहना है कि ईश्वर ने सभी जातियों में पैग़म्बर और रसूल (धर्मोपदेशक) भेजे हैं। लेकिन ये पैग़म्बर ईश्वर के पुत्र नहीं माने जा सकते। यदि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुणों को जोड़ दिया गया तो यह कृत्य उन्हें मनुष्यों की श्रेणी में ले आएगा। इसके कारण की व्याख्या करते हुए दिनकर जी कहते हैं, इस्लाम विश्व के उस भाग में जनमा, जहां वर्षा कम होती थी। निर्जन उजाड़ में आंख खोलने के कारण, उसने विचारों को स्वच्छता से देखा, सजावट में नहीं। चित्र, मूर्ति और संगीत के प्रति इस्लाम में निषेध का भी यही कारण था।

क़ुरआन में कहा गया है कि सृष्टि की रचना करने वालों में ईश्वर (ख़ुदा) सर्वश्रेष्ठ है। ख़ुदा हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को जो पैग़ाम भेजते थे, वे पैग़ाम कभी-कभी देवदूत ज़िबरील ले आते थे। मलायका (देवदूतों) को हम देख नहीं सकते। हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. उन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से देखते थे। शैतान जिन्न-योनि का है। शैतान में विश्वास रखने से क़ुरआन मना करता है। क़ुरआन का कहना है कि, धर्म यह है कि मनुष्य अल्लाह, मलायक, क़यामत, किताब और नबी में विश्वास करे।

क़ुरआन के अनुसार इंसान में उच्च और नीच, दोनों तरह की वासनाएं होती हैं। नीच वासनाएं प्राण-धारण के लिए हैं, जबकि उच्च वासनाएं आध्यात्मिक उत्कर्ष के लिए। यदि नीच वासनाओं को नियंत्रण में नहीं रखा जा सका तो इंसान का पतन हो जाएगा। नीच वासनाओं को उभारने का काम जिन्न करते हैं। जिन्न से बचने के लिए आदमी को हमेशा सावधान रहने की ज़रूरत है। जिन्न आदमी को गुमराह करता है।

नबी मुहम्‍मद की अजीम दुआ थी व कुर्रब्‍बी जि़दनी इल्‍मन’’  ऐ परवरदिगार मेरा इल्‍म (ज्ञान) और बढ़ा। इसी तरह केनोपनिषद् में कहा गया है-

नाहं मन्ये सुवेदेति नो वेदेति वेद च।

यो नस्तद्वेद तद्वेद नो वेदेति वेद

शिष्य अपने गुरु को उत्तर देते हुए कहता है: "मैं यह नहीं मानता कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह (पूरी तरह) जानता हूँ। परंतु मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं उसे बिल्कुल नहीं जानता। हममें से जो व्यक्ति 'मैं ब्रह्म को पूरी तरह से नहीं जानता, लेकिन मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं उसे बिल्कुल नहीं जानता' इस गूढ़ सत्य को समझता है, असल में वही ब्रह्म को सही अर्थों में जानता है।" यह श्लोक अज्ञेय (जिसका पूरा ज्ञान संभव न हो) ईश्वर या ब्रह्म के स्वरूप को दर्शाता है। यह बताता है कि ज्ञान केवल अहंकार नहीं है, बल्कि इस बात को स्वीकार करना है कि असीम को सीमित बुद्धि से पूरी तरह जान पाना संभव नहीं है।

इल्‍म की फि़तरत है जुस्‍तज़ू, खोज। ज्ञान पिपासु लोगों के मन में यह बात हमेशा से रही कि जो हम जानते हैं वह तो सत् है ही, जिसे दूसरों ने जाना है, वे भी सत् होंगे। बौद्धिक दुराग्रह से मुक् मानसिकता वाले ऐसे लोग अन् मतों के अध्ात्म, दर्शन, विज्ञान या चिंतन-अन्‍वेषण से प्रेरणा लेते रहे और सभी के मंगल के लिए पाठ पढ़ाते रहे। ऐसे लोग नमनशील विचार वाले थे, और उनकी इस धार्मिक विशेषता ने उन्ें इतना समर्थ बनाया कि वे अपने से सर्वथा विपरीत विचारधारा को भी आत्सात कर सके। सूफ़ी कहते हैं ख़ुद क़ुरान में भी कहा गया है कि ख़ुदा का ज़िक्र करने से दिल को सुकून मिलता है बहुत सारे सूफ़ियों ने आशिक़ों की मिसाल देकर अल्लाह से मोहब्बत में उस हालत को बयान करने के लिए किया है, जो जिक्र के दौरान उन पर तारी हो जाती है सूफ़ी संत कहते हैं कि शरीअत को मानने का मतलब मज़हब के जिस्म से ताल्लुक़ है वहीं ज़िक्र के ज़रिए वो अल्लाह की रूह से रूबरू होते हैं इस तरह से वो ऊपरी तौर पर तो वो सामान्य दिखते हैं, मगर दिल ही दिल में वो अल्लाह की इबादत के नशे में डूबे होते हैं

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर