सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5.
सूफ़ीमत का उदय-11
5.19 तसव्वुफ़ - इस्लाम का रहस्यवाद या सूफ़ियों का दर्शन
तसव्वुफ़, जिसे आमतौर पर सूफ़ीवाद
के नाम से जाना जाता है, इस्लाम धर्म का एक आध्यात्मिक और रहस्यवादी आयाम है। इसका मुख्य उद्देश्य हृदय
की शुद्धि, अहंकार का त्याग और ईश्वर
(अल्लाह) के प्रति सच्चा ईश्वर-प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) पैदा करना है। हर काल में मगरूर
(घमंडी, अहंकारी, या अभिमानी) धर्मावलंबी रहे हैं- चाहे किसी भी
धर्म की बात करें। इन कट्टरपंथियों का मिज़ाज एक-दूसरे से कुछ सीखने के सख्त खि़लाफ़
रहा है। लेकिन हर काल तथा हर धर्म में इन कट्टरपंथियों के रहते हुए उदारमना लोग भी
रहे हैं। पैग़ंबर
हज़रत
मुहम्मद
साहब
सल्ल. के जन्म (569 ई.) के पहले उत्तरी अरब के लोग यहूदी और ईसाई धर्मों के सम्पर्क में आ चुके थे। ऊन के लम्बे चोगे पहने हुए ईसाई संतों को वे देख चुके थे। बौद्ध भिक्षुओं से
भी उनका परिचय हो चुका था। भारत के योगियों से भी उनका साक्षात्कार हो चुका था। एक
तरफ़ उनका जीवन आपसी कलह और मारकाट का जीवन बना हुआ था, तो दूसरी तरफ़ दूर-दूर तक
फैली, धूप से झुलसती रेत में, कबायली जीवन बिताने वाले लोगों के पास न तो खाने की
पर्याप्त सामग्री ही थी, न रहने के लिए समुचित सुविधाएं। ऐसी अवस्था में जिनकी
आत्मा जाग्रत थी उन्होंने मारकाट, लड़ाई-झगड़े, कलह-द्वेष के वातावरण से तटस्थ होकर
एकांत जीवन जीना शुरु किया। स्वेच्छा से उन्होंने सांसारिक प्रलोभनों को नकार
दिया। जब इन लोगों ने संसार से ही मन हटा लिया तो इनका लड़ाई-झगड़ों से कोई सरोकार न
रहा।
इन विरक्तों को इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के
व्यक्तित्व ने अपनी ओर आकृष्ट किया। आखिर हज़रत मुहम्मद साहब ने भी तो ख़ुद एकांतवास
और ध्यान के मार्ग का अनुसरण किया था। उन्होंने खुद बहुत ही सादा और तपस्वी जीवन जीना जारी
रखा। वे 'फ़क़्र' यानी गरीबी और ईश्वर की इच्छा
के प्रति समर्पण वाले जीवन को अपने लिए गर्व का विषय मानते थे। हो सकता है क्रूर, नृशंस और ऐश्वर्य-लोलुप लोगों ने उपहास के लिए इन्हें “सूफ़ी” कहना शुरु कर दिया होगा। सूफ़ी संन्यासवाद भी मूल रूप से इस्लामी है, इसकी पहली झलक पैगंबर के ऐसे साथियों, अबु-धर
अल-गिफारी, हुदैफा इब्न अल-यमन (या हुदैफा), और इमरान इब्न हुसैन के रूप में मिलती है,
जो पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) के अत्यंत प्रतिष्ठित और महान सहाबी (साथी) थे।
सूफ़ीवाद की जड़ें पैगंबर मुहम्मद सल्ल. और उनके साथियों के सादे जीवन में मिलती
हैं। अबू ज़र अल-ग़िफ़ारी (मृत्यु 652 या 653) को उनकी क्रांतिकारी और बेबाक बातों की वजह से उस्मान (र.अ.) (644-56) के शासनकाल में दरबार से निर्वासित कर दिया गया।
इन विरक्तों के इस्लाम की ओर आने का एक और कारण यह भी हो सकता है कि जब
इन्होंने देखा कि अरब लोग, उस आदमी के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं, जो सत्य की स्थापना के लिए दृढ़ संकल्प है, तो ये हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की सक्रिय
सहायता पर आमादा हो गए। यही वे लोग थे जिन्होंने हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के प्रेम
वश और उनके आदर्शों की स्वीकृति में उस समय उनका साथ दिया जब उन्हें मक्का छोड़ने
पर विवश होना पड़ा था।
इस्लाम के साथ उनका संबंध प्रगाढ़ होता गया। सूफीवाद इस्लाम से अलग या कोई
नया धर्म नहीं है। इस्लाम का रहस्यवाद या सूफ़ियों का दर्शन ही तसव्वुफ़
है। इस्लामी अध्यात्म और रहस्यवाद में सूफ़ी, वली, दरवेश, और फ़क़ीर बहुत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक
पद हैं। सूफ़ी, वली उल्लाह, दरवेश और फ़क़ीर शब्दों से उन मुस्लिम
रहस्यवादियों को पुकारा जाने लगा जो तप,
ध्यान, संन्यास और आत्म-निषेध द्वारा अंतरात्मा के विकास का प्रयास करते थे। वली का अर्थ होता है
मित्र या संरक्षक, और 'वली उल्लाह' का अर्थ है "अल्लाह का दोस्त"।
यह एक आध्यात्मिक पदवी है। सूफ़ी साधना में जब कोई साधक उच्च आध्यात्मिक अवस्था और
ईश्वर की पूर्ण निकटता प्राप्त कर लेता है, तो उसे 'वली' माना जाता है। दरवेश एक फ़ारसी शब्द है जिसका
अर्थ है "दरवाज़े पर रहने वाला" या भिक्षु। यह उस सूफ़ी या साधक को
कहा जाता है जो सांसारिक सुखों का पूरी तरह से त्याग कर चुका हो और ईश्वर की भक्ति
में दर-दर भटकता हो या फक्कड़ जीवन जीता हो। फ़क़ीर अरबी शब्द 'फ़क्र' (गरीबी/मोहताजी) से निकला है। फ़क़ीर वह व्यक्ति है जो हर ज़रुरत के लिए केवल
अल्लाह पर निर्भर रहता है (आध्यात्मिक अर्थों में) और सांसारिक रूप से कुछ भी
संग्रह नहीं करता।
तसव्वुफ़ या सूफ़ीमत का मूल उद्गम व स्रोत इस्लाम है। तसव्वुफ़ ख़ुदा के लिए मरना
और जीना है। हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की तरह ही फ़क़ीर भी दिव्य-दृष्टि
संपन्न होते हैं। फ़र्क़ यह है कि मुहम्मद साहब ‘अम्बिया’ में से थे और फ़क़ीर ‘औलिया’ होते हैं। इस्लामी धर्म और
इतिहास में ‘अम्बिया’ और ‘औलिया’ दो अलग-अलग आध्यात्मिक पदों और श्रेणियों को दर्शाते हैं। अम्बिया
(नबी/पैगंबर) वे चुने हुए लोग होते हैं जिन्हें अल्लाह की तरफ से सीधा संदेश
प्राप्त होता है, जबकि औलिया (वली) वे सच्चे
और नेक भक्त होते हैं जो अम्बिया के बताए रास्ते पर चलकर आध्यात्मिक बुलंदियों को
छूते हैं। हज़रत अबू हमजा बग़दादी रह. ने कहा है ''सच्चे सूफ़ी की ये पहचान है
- मालदार होने के बावजूद वो फ़क़ीर रहे और इज्ज़तदार होने के बावजूद हक़ीर रहे (ख़ुद
को छोटा समझे)।''
इस तरह हम कह सकते हैं कि सूफ़ीवाद आंदोलन की शुरुआत इस्लाम के उदय के साथ ही
हुई। तथ्यों पर ग़ौर करें तो हम पाते हैं कि सूफ़ीमत का स्रोत क़ुरआन व हदीस है। सूफ़ी पवित्र क़ुरान को अपनी
उम्मीद और भरोसे का आधार मानते थे। सूफ़ीमत का आविर्भाव पैग़म्बर
साहब और क़ुरआन के वचनों के पीछे जो अर्थ छुपा हुआ है उसी से हुआ है। सूफ़ीवाद या तसव्वुफ़ द्वारा पेश की गई क़ुरान की व्याख्या इंसानी समझ
(अक़्लियत) और मानवतावाद पर आधारित है, और इसमें उदारता भी है। सूफ़ी संत शेख़ शिहाबुद्दीन सुहरवर्दी तो अपनी पुस्तक ‘अवारीफुल मारीफ’
में “सूफ़ी” को क़ुरआन में प्रयुक्त “मुकर्रिब” शब्द का पर्याय मानते हैं। उनके अनुसार मुकर्रिब वह है, जो न सिर्फ परमात्मा
के एकत्व में ही विश्वास करता बल्कि स्रष्टा (हक़) और सृष्टि (ख़ल्क़)
के भेद को भी भलीभाँति समझता है। वे परमात्मा के सिवा और किसी को नहीं जानते। एक मात्र उसी को अपना सहारा मानते हैं। वे अपने तथा अपने सृजनहार के बीच के संबंध से पूरी तरह अवगत रहते हैं। हदीसों में भी कहा गया ई, “जो अपने को जान लेते हैं, वह अपने परमात्मा को जान लेते हैं”।
सूफ़ीवाद का उदय इस सोच से भी
प्रेरित था कि इंसान का ईश्वर के साथ सीधा रिश्ता हो सकता है; ईश्वर को इंसानों की किस्मत तय करने वाले किसी अनिच्छुक और सर्वशक्तिमान शासक
के तौर पर नहीं, बल्कि उनकी आत्माओं के दोस्त और प्रियतम के तौर पर देखा
जाना चाहिए। सूफ़ियों या रहस्यवादियों की इच्छा ईश्वर को जानने की रही है ताकि वे
उनसे प्रेम कर सकें, और उन्हें विश्वास है कि आत्मा इंद्रियों या बुद्धि के
माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे धार्मिक अनुभव से अल्लाह (ईश्वर) से सफलता
प्राप्त कर सकती है।
सूफ़ीमत या तसव्वुफ़ इस्लाम से संबंधित एक जीवन-पद्धति है, जो बाहरी औपचारिकता
या दिखावे में विश्वास नहीं रखती। यह क़ौल (वचन), फ़िअल (कर्म) और हाल
(मनोदशा) के तीन नियम पर चलती है। सूफ़ी के आचरण में पाई जाने वाली विशेषता है ख़ुदा
(सिमरन), ज़िक्र इलाही (भजन), सिदक-ओ-सफ़ा (सत्य और पवित्रता), सलूक-ओ-एहसान
(नेकी और भलाई), दूसरे शब्दों में कहें तो इस जीवन-पद्धति के प्रधान गुण हैं
ईश-प्रेम, जन-सेवा, सांसारिकता के प्रति उदासीनता, पारलौकिक जीवन को सफल बनाने की
चाह, निष्ठा, प्रायश्चित, धैर्य और सहनशीलता। समय बीतने के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय
समृद्धि और सुख-वैभव की ओर बढ़ने लगा।
शुरु में उन्हीं लोगों को सूफ़ी कहा गया, जो संसार से विरक्त, ईश्वर के ध्यान में हर वक़्त मग्न रहते थे। उनकी
आत्मा में ईश-प्रेम की प्रबल अनुभूति
विद्यमान थी। इस्लाम धर्म की ओर ये लोग इसलिए आकृष्ट हुए क्योंकि इन्हें हज़रत
मुहम्मद साहब सल्ल. के व्यक्तित्व में अपनी संस्कारगत साधना की झलक दिखाई दी। हज़रत
मुहम्मद साहब सल्ल. का लंबा एकांतवास, मौन-साधना, समाधि की अवस्था में दिव्य-वाणी का अवतरण, सदाचार पूर्ण व्यवहार और मोह माया के प्रति
उदासीनता ने इन लोगों को काफ़ी आकर्षित किया। उनके इन गुणों में उन्हें एक आदर्श
फ़क़ीर का रूप दिखाई दिया था। वे उनके अनुयायी बन गए। इस्लाम में उन्हें अपनी साधना
के अनुकूल संकेत उपलब्ध हो रहे थे। हालाँकि अभी सूफ़ीमत अपनी नवजात स्थिति में था
और इस दौर में सूफ़ियों की कोई निश्चित दार्शनिक दृष्टि भी नहीं थी। क़ुरआन और हदीस का
पूरी तरह से अनुसरण करना ही इसका आधार था। हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल.
की हिजरत तक ऐसे विरक्तों का कोई समुदाय नहीं था। उस समय पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.)
के साथियों में कई ऐसे लोग थे जो मदीना की मस्जिद में रहते थे और गरीबी और
आत्म-संयम का जीवन बिताते थे। इन सूफ़धारी विरक्तों ने एक
साथ हिजरत में उनका साथ दिया था। ऐसे विरक्तों को 'अहल-अल-सुफ़्फ़ा' या “असहाबे-सुफ़्फ़ा” (बरामदे वाले पैगंबर के साथी) कहा गया। असहाब-अस-सुफ्फा
पैगंबर मुहम्मद के वे अनुयायी थे, जो मदीना की 'मस्जिद-ए-नबवी' में बने एक ऊंचे छायादार चबूतरे (सुफ्फा) पर
रहते थे। वे अत्यधिक गरीबी में रहते थे। इस तरह एक साथ रहते हुए वे एक दूसरे से
जुड़े भी और उनकी एक अलग पहचान भी कायम हुई। जैसे-जैसे आसपास के क्षेत्र में इस्लाम का प्रभाव
बढ़ता गया, इन विरक्तों की संख्या में
भी वृद्धि होती गई। हालाँकि, इस्लाम में 'तसव्वुफ़' शब्द बाद में आया; शुरुआती दौर में, 'तक़वा' और 'ज़ुहद' शब्द उन पवित्र लोगों के लिए
इस्तेमाल किए जाते थे जिन्होंने दुनिया का मोह-माया छोड़ दिया था। हिजरी की दूसरी
सदी से ही 'सूफ़ी' और 'तसव्वुफ़' शब्द आम लोगों के बीच मशहूर हुए।
हज़रत साहब की मृत्यु के बाद शिया के एक उग्र सम्प्रदाय ने “हुलूल” (मनुष्य ईश्वर-कोटि तक पहुंच सकता है) और “तकसीर” (ईश्वर भी चाहे तो
मनुष्य-रूप में प्रकट हो सकता है) सिद्धांतों की घोषणा कर डाली। इस आधार पर यह कहा
जाता है कि शिया सम्प्रदाय के लोगों ने सबसे पहले हज़रत अली में देवत्व का आरोप
किया था। मुख्यधारा के शिया समुदाय ने कभी भी हज़रत अली में देवत्व का आरोप
नहीं लगाया और न ही उन्हें ईश्वर माना। हज़रत अली को ईश्वर मानने वाले अतिवादी समूह
इतिहास में अवश्य पैदा हुए थे, जिन्हें इस्लाम में 'गुलत' कहा जाता है। हालाँकि, वे शिया धर्म के मुख्यधारा का हिस्सा नहीं थे। हज़रत
अली (अ.स.) ने स्वयं ऐसे विचारों का कड़ा विरोध किया था। उनकी पुस्तक नहजुल
बलाघा में उनके स्पष्ट उपदेश हैं, जहाँ उन्होंने चेतावनी दी है कि जो लोग उन्हें ईश्वर के समकक्ष मानते हैं, वे वास्तव में सच्चे ईश्वर के प्रति काफिर
(अविश्वासी) हैं। सूफीवाद और कुछ अन्य संप्रदायों में, हुलूल का अर्थ ईश्वर (अल्लाह) का किसी मानव या
सृष्टि के भीतर अवतरित होना (अवतार) है। मुख्यधारा के इस्लामिक धर्मशास्त्र में
इसे गलत माना जाता है क्योंकि ईश्वर किसी भी रूप में अपनी सृष्टि में प्रवेश नहीं
करता।
सूफ़ीपंथ के मानने वालों
ने इस्लाम मज़हब को इस्लाम की सरज़मीं यानी मध्य पूर्व से लेकर भारत, अफ़्रीक़ा और सुदूर पूर्व तक फैलाया। हज़रत मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद राजनैतिक, सामाजिक और बौद्धिक परिस्थितियों
ने तत्कालीन वातावरण पर ऐसा प्रभाव डाला कि मानव, रहस्य-तत्त्व के चिंतन की ओर उन्मुख
हो गया। इन चिंतकों के मन को अनेक प्रकार के प्रश्न मथ रहे थे। ईश्वर क्या है? सृष्टि
और मानव की आत्मा के साथ उसका क्या संबंध है? आत्मा का रूप क्या है? ईश्वरीय ज्ञान
किसे कहते हैं? सृष्टि संबंधी इन जिज्ञासाओं को दूर करने के लिए दर्शन की खोज शुरू
हो गई। इन परिस्थितियों के मूल कारण उमय्या शासक वर्ग के गृह-युद्ध, निरंकुशता और उलेमा
वर्ग की कटु जातीयता आदि में खोजे जा सकते हैं। आपसी झगड़े, वैमनस्य और शासक वर्ग की
विलासिता ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि मानव को विवश होकर ईश्वर की शरण में जाना पड़ा।
सृष्टि संबंधी इन विशिष्ट प्रश्नों के समाधान के लिए मोतज़ली (मोतज़ेला) संप्रदाय आगे आया। ये बुद्धिवादी विद्वान थे। इमाम हसन बसरी से किसी
ने पूछा कि उमय्या शासक, जो घोर अपराध कर
रहा है, मुस्लिम है अथवा नास्तिक। इमाम हसन बसरी कोई उत्तर देते उससे पहले
उनका एक शिष्य वासिल बिन अता बोल उठा कि ऐसा व्यक्ति न मुस्लिम है और न इस्लाम
के विरुद्ध है। यह कहकर वह मस्जिद के एक दूसरे भाग में जा बैठा और अपने विचार की व्याख्या
करने लगा जिसपर गुरु ने लोगों को बताया कि शिष्य ने 'हमें छोड़ दिया है' (एतज़ि ला अन्ना)। इस वाक्य पर इस विचारशाखा
की स्थापना हुई। वासिल बिन अता को मुअतज़िला संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है। युवावस्था में वे बसरा में प्रसिद्ध विद्वान हसन
अल-बसरी के शिष्य बने। हालाँकि, पाप (विशेष रूप से गंभीर पाप) की स्थिति में एक मुसलमान की स्थिति पर अपने
गुरु से असहमति के कारण, उन्होंने अपनी अलग विचारधारा अपनाई।
चूँकि उमय्या शासक घोर
पाप कर रहे थे और अपने आपको यह कहकर कि हम कुछ नहीं करते, सब कुछ खुदा करता है, निर्दोष बताते थे, इससे स्वच्छंदता का
प्रश्न इस्लाम में बड़े वेग से उठा। हेतुवादियों (rationalists) या बुद्धिवादियों ने इस प्रश्न तथा इसी प्रश्न की सन्निकट
शाखाओं का विशेष अनुसंधान किया।
*** *** ***
मनोज
कुमार