बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-39

 

महात्मा गांधी हत्या केस-39

28 जनवरी, 1948

28 जनवरी को इंदिरा गांधी अपने चार साल के बेटे राजीव गांधी, बुआ कृष्णा हठी सिंह, नयनतारा पंडित और पद्मजा नायडू के साथ गांधीजी से मिलने बिड़ला हाउस गई थीं। उन सब को देखते ही गांधीजी खुशी से बोले थे…तो राजकुमारियाँ मुझसे मिलने आई हैं। इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रैंक के अनुसार, उनमें बात हो ही रही थी कि राजीव ने खेल खेल में आगंतुकों के लाए फूल गांधीजी के पैरों में बांधने शुरू कर दिए। गांधी ने मुस्करा कर राजीव के कान खींचे और कहा ऐसा मत करो बेटे। सिर्फ़ मरे हुए लोगों के पैर में फूल बाँधे जाते हैं। शायद गांधीजी को अपनी मौत का आभास हो चला था।

गांधीजी कुछ शांत और पुरानी यादों में खोए हुए थे। वे कस्तूरबा के बारे में, गाय का दूध न पीने के उस संकल्प के बारे में जो उन्होंने बहुत पहले लिया था, और राजा हरिश्चंद्र के बारे में बात कर रहे थे, वही राजा हरिश्चंद्र, जिनके नाटक ने उनकी जवानी के दिनों में उन्हें बहुत आनंदित किया था। राजकुमारी अमृत कौर ज़मीन पर बैठी उनकी बातें सुन रही थीं। बाद में, प्रार्थना सभा के बाद, राजकुमारी ने उनसे पूछा, “आज की प्रार्थना सभा में कोई शोर-गुल तो नहीं हुआ था?” "नहीं," उन्होंने जवाब दिया। "लेकिन तुम्हारे इस सवाल का मतलब है कि तुम मेरी चिंता कर रही हो। अगर मुझे किसी पागल इंसान की गोली से मरना ही है, तो मुझे मुसकुराते हुए मरना चाहिए। मेरे मन में कोई क्रोध नहीं होना चाहिए। मेरे दिल में और मेरे होंठों पर ईश्वर का नाम होना चाहिए। और अगर कुछ हो भी जाए, तो तुम्हें एक भी आंसू नहीं बहाना है।"

वे पाकिस्तान की ओर से किसी संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन कोई संकेत नहीं मिला। अंततः उन्होंने तय कर लिया कि जैसे ही उनकी सेहत थोड़ी बेहतर होगी, वे वर्धा स्थित अपने आश्रम चले जाएंगे। जाने की सटीक तारीख कुछ हद तक डॉक्टरों पर निर्भर थी, लेकिन यह उनकी अपनी मर्जी पर भी निर्भर था; उन्होंने फिलहाल 31 जनवरी को वर्धा के लिए रवाना होने का फैसला कर लिया था।

गांधीजी भविष्य के कांग्रेस का ब्ल्यू प्रिंट तैयार कर रहे थे। उसमें उन्होंने कुछ ज़रूरी संशोधन किया। इसके लिए गठित उप-समिति के सदस्यों आर.आर दिवाकर और आचार्य जुगल किशोर से बातचीत की। फिर नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और राजकुमारी अमृत कौर से मुलाक़ात की। शीन के इंटरव्यू को पूरा किया। शाम की सभा में उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के हालातों पर चर्चा की। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। उन्होंने उन सत्याग्रहियों की सफलता की कामना की और वहां की सरकार से अपील की कि सत्याग्रहियों के ख़िलाफ़ जुल्म न किया जाए।

हत्या की साज़िश

फ़्रंटियर मेल के तीसरे दर्ज़े के भीड़ वाले डिब्बे में बैठा करकरे दिल्ली की तरफ़ आ रहा था।

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ग्वालियर में परचुरे ने अपने बेटे नीलकंठ और बडीगार्ड रूपा को गंगाधर एस. दंडवते को बुलाने के लिए भेजा। दंडवते परचुरे वड़ा आ गया। दंडवते बंदूक बेचने वाले को जानता था। परचुरे ने दंडवते से उन दोनों का परिचय कराया और उसे एक पिस्तौल का बन्दोबस्त करने का अनुरोध किया। परचुरे के पास एक पिस्तोल था। दंडवते ने परचुरे से गोडसे को अपना पिस्तौल दे देने के लिए कहा। परचुरे ने साफ-साफ कहा, “मैं ऐसा मूर्ख नहीं हूं कि इन्हें अपना पिस्तौल दे दूं, जो बाद में जांच में साबित हो जाए कि मेरा है।” दंडवते यह कहकर चला गया कि वह शाम तक कोई न कोई इंतज़ाम करता है। अपने मेहमानों से यह कहकर कि वे उस पर पूरा भरोसा कर सकते हैं, वह पाटनकर बाज़ार स्थित अपनी डिस्पेंसरी चला गया।

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दोपहर 12.30 बजे हिन्दू महासभा का कार्यकर्ता मधुकर केशव काले परचुरे के घर आया। वह ग्वालियर के प्रशासन से संबंध रखता था। वह पांच साल से परचुरे को जानता था। वह हिन्दू राष्ट्र सेना का सदस्य था। वह दंडवते को भी जनता था। उसका परचुरे के घर आना-जाना लगा रहता था। वह जानना चाहता था कि महाराजा के कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के निर्णय के ख़िलाफ़ महासभा का अगला कार्यक्रम क्या है? जब वह परचुरे के घर पर पहुंचा तो देखा कि परचुरे दो अनजान लोगों और दंडवते से बात कर रहा है। बाद में उसे पता चला कि अन्य दो आप्टे और नाथूराम थे। अनजान लोगों के हाथ में देसी कट्टा था। उसने देखा कि वे एक पिस्तौल की ट्रिगर दबाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली, नाथूराम और आप्टे उसे ठीक से चला नहीं पा रहे थे। दंडवते ने कहा आइए आपको मैं इसके चलाने की विधि समझाता हूं। उन्हें चलाने की विधि दिखाने के लिए वह उन्हें घर के पीछे ले गया। परचुरे उधर नहीं गया। दंडवते ने एक पेड़ का निशान साध कर उसे चलाने की विधि समझाई। जब नाथूराम ने वैसा ही प्रयास किया, तो न तो ट्रिगर दबा और न ही गोली चली। नाथूराम ने दंडवते से अच्छी बन्दूक दिलाने के लिए कहा, और यह भी कहा कि वह उसकी अच्छी क़ीमत देगा। लेकिन उसने यह भी कहा कि उसे तीन बजे की गाड़ी से वापस जाना है, इसलिए जल्दी ही इंतज़ाम कर दे। दंडवते ने कहा कि वह शाम तक ही इंतज़ाम कर पाएगा, इसलिए उन्हें रात की गाड़ी से वापस जाना होगा। गोडसे इसके लिए तैयार हो गया। काले 13.30 बजे परचुरे के घर से चला गया। आप्टे-गोडसे ने अपने मेज़बान के साथ दोपहर का खाना खाया और उसके बाद 'मौजूदा राजनीतिक हालात' पर बातचीत की।

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दंडवते गन डीलर जगदीश प्रसाद गोयल के पास गया। कुछ ही दिनों पहले गोयल ने एक 9 एम.एम. बेरेट्टा सेमी औटोमैटिक पिस्तौल प्राप्त की थी। दंडवते उससे बोला, “मुझे एक पिस्तौल की ज़रूरत है। क्या तुम अपना पिस्तौल पांच सौ रुपयों में बेच सकते हो?” जगदीश प्रसाद राज़ी हो गया और उसने पांच सौ रुपए में सात गोलियों के साथ अपना पिस्तौल दंडवते को दे दिया। यह एक इटालियन पिस्तौल बरेटा M1934 संख्या -  606824 थी, जो लम्बाई में मात्र छः इंच थी। यह बेरेटा अपने नियत अंजाम तक पहुँचने के लिए दुनिया के आधे हिस्से का सफर तय करके आई थी। 1934 में इटली में बनी इस पिस्तौल को मुसोलिनी का एक अधिकारी एबिसिनिया ले गया था। इटली की रॉयल आर्मी का यह हथियार द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध (1935-37) में बहुत प्रयोग हुआ। ग्वालियर महाराज महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की ग्वालियर सेना ब्रिटिश हुकुमत के लिए द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध में भाग ले रही थी, तब एक मोर्चे पर मुसोलिनी ने ब्रिटिश टुकड़ी के समक्ष समर्पण कर दिया। वहाँ से इसे चौथी ग्वालियर इन्फैंट्री के एक अधिकारी ने 'हासिल' कर लिया; यह रेजिमेंट उस सेना का हिस्सा थी जिसे इटालियनों का आत्मसमर्पण स्वीकार करने के लिए एबिसिनिया भेजा गया था। बटालियन के भारत लौटने के बाद, यह पिस्तौल कई हाथों से गुज़री। ग्वालियर में किसी के पास पिस्तौल होना कोई बड़ी बात नहीं थी; क्योंकि भले ही ग्वालियर रियासत में 'आर्म्स रजिस्ट्रेशन एक्ट' (हथियार पंजीकरण कानून) था, लेकिन इसे कभी सख्ती से लागू नहीं किया गया था। ब्रिटिश भारत की तरह यहाँ सिर्फ हथियार पास रखना कोई गंभीर आपराधिक जुर्म नहीं माना जाता था।

सेना की कमान संभाल रहे एक ब्रिटिश अधिकारी को युद्ध में बहादुरी के इनाम में यह पिस्तौल मिली, जिसे बाद में ग्वालियर के ही एक सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल वी बी जोशी ने 1934 में बने इस इटालियन बरेटा पिस्तौल को उस ब्रिटिश अफसर से खरीद लिया था। इसके बाद ग्वालियर निवासी जगदीश गोयल ने इसे उनके परिवार के एक सदस्य से खरीद लिया था। उस पिस्तौल की मैगज़िन में नौ गोलियां पहले से ही थीं। गांधीजी की ह्त्या के बाद शुरू में गोयल भाग गया था, लेकिन बाद में अप्रैल में उसे झांसी में गिरफ़्तार कर लिया गया। गोयल ने यह नहीं बताया कि उसे यह पिस्तौल कहाँ से मिली। ज़ाहिर है, जब यह पता चला कि गांधीजी की हत्या में इसी बेरेटा का इस्तेमाल हुआ था, तो कोई भी यह नहीं मानना ​​चाहता था कि कभी यह पिस्तौल उसके पास भी रही थी। हो सकता है कि गोयल ने उस व्यक्ति का नाम बताने से इनकार कर दिया हो जिसने उसे यह पिस्तौल बेची थी, ताकि वह व्यक्ति किसी मुसीबत में न फँसे। वैसे भी, चूंकि नाथूराम ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए दंडवते के बेचने से पहले यह पिस्तौल किसके पास थी, इसका पता लगाने का कोई खास महत्व नहीं रह गया था।

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उसी शाम दंडवते फिर परचुरे के घर आया। इस बार उसके पास एक स्वचालित पिस्तौल और 10-12 राउंड गोलियां थीं। शाम से पहले दंडवते ने पिस्तौल और कारतूस गोडसे को दिया। आप्टे और गोडसे, दोनों की बाछें खिल गईं। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या की जैसी योजना बनाई थी, उसके लिए इससे बेहतर हथियार मिलना मुश्किल था। दंडवते ने 500 रुपए मांगे। उनके पास इतना पैसा नहीं था। 300 रुपए और अपनी पुरानी बंदूक उसने दी। दंडवते क्रोध से आग बबूला हो गया और या तो पूरा कैश या फिर बंदूक वापस कर देने की बात करने लगा। गोडसे बोला कि यह पेशगी है, जल्द ही वह पूरा पैसा दे देगा। परचुरे के बीच में पड़ने से दंडवते किसी तरह माना। रात का भोजन करने के बाद 10.30 की बंबई-अमृतसर एक्सप्रेस पकड़ने के लिए गोडसे और आप्टे ग्वालियर स्टेशन की ओर चले। परचुरे अपने बेडरूम में गया और सो गया। दंडवते भी अपने घर चला गया।

रात के 11 बजे तक वे दोनों वापस रेलवे स्टेशन के अहाते में आ गए, जहाँ तांगे खड़े थे। तांगों के पीछे गोबर के उपलों की आग जल रही थी, जिससे पूर्णिमा की चाँदनी में धुएं की पतली लकीरें ऊपर उठ रही थीं। बॉम्बे-अमृतसर एक्सप्रेस को वहाँ पहुँचने में अभी 30 मिनट और लगने थे। लेकिन ट्रेन लगभग 3 घंटे लेट थी, और वे ग्वालियर से रात के 2 बजे के भी काफी बाद, यानी 29 तारीख की सुबह, वहाँ से निकल पाए।

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करकरे ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही सोकर रात गुज़ारी। वहां पर सैंकड़ों शरणार्थी भी शरण लिए हुए थे।

 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 21. दरगाह

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


21. दरगाह

ये प्रकाश (अल्लाह की पुस्तक और उस का मार्ग दर्शन) उन घरों (पुण्य स्थानों) में है, अल्लाह ने जिन्हें ऊँचा करने, उसकी महिमा का गान करने और उनमें प्रातः तथा संध्या अपने नाम की चर्चा करने का आदेश दिया है। (क़ुरआन : 24:36)

दरगाह एक सूफ़ी-इस्लामी पुण्य स्थान होता है जिसे अक्सर किसी प्रतिष्ठित सूफ़ी संत, पीर, वली या दरवेश की क़ब्र पर बनाया जाता है। फारसी भाषा में 'दरगाह' का शाब्दिक अर्थ "द्वार" या "दहलीज" होता है। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। सूफीमत में दरगाह का अत्यधिक आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है।

दरगाहें सूफी संतों की अंतिम विश्राम स्थली होती हैं। स्थानीय मुस्लिम, तीर्थयात्रा, आध्यात्मिक शांति, आशीर्वाद और अपनी मनोकामनाओं (मन्नत) की पूर्ति के लिए के उद्देश्य से किसी दरगाह की यात्रा करते हैं और इस यात्रा को ज़ियारत कहा जाता है। सूफ़ी संतों की दरगाह पर की गयी ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। भारतीय उपमहाद्वीप में दरगाहों पर ज़ियारत करने की पुरानी परंपरा रही है। किसी दरगाह के साथ अक्सर सूफ़ी बैठकें और विश्राम गृह बने होते हैं जिन्हें खानक़ाह  कहा जाता है। यहाँ नियमित रूप से लंगर (मुफ्त सार्वजनिक रसोई) का आयोजन होता है, जहाँ बिना किसी भेदभाव के गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है। इसके अतिरिक्त आमतौर पर एक मस्जिद, बैठक (कमरे), इस्लामी धार्मिक विद्यालय (मदरसा), शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए घर, अस्पताल, सामुदायिक भवन आदि भी किसी दरगाह परिसर का हिस्सा होते हैं।

सूफ़ी अनुयायियों का मानना ​​है कि दरगाहें ऐसे मक़ाम हैं, जिनके द्वारा वे उसके संत के आशीर्वाद (तवस्सुल के अनुसार, जिसे दावत-ए-क़बूर  या इल्म-ए-दावत  कहा जाता है) प्राप्त कर सकते हैं। जब लोग दरगाहों की ज़ियारत करते हैं तो वे संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद यानी बरक़त की कामना करते हैं। सूफी यह मानते हैं कि संत अपनी मृत्यु के बाद भी रूहानी तौर पर मार्गदर्शन या बरकत देने में सक्षम होते हैं।

दरगाहों का सूफ़ीवाद में मौलिक भूमिका है और सूफ़ी संतों के अनुयायियों के लिए वे अत्यंत धार्मिक महत्व रखते हैं। पैगंबर साहब की एक हदीस में कहा गया है कि, "जो मेरी क़ब्र पर जाएगा, वह मेरी हिमायत का हकदार होगा"। दरगाहों पर प्रार्थना या सेवा की पेशकश के बाद उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं। भक्त दरगाहों पर फूल चढाते हैं, चिराग जलाते हैं, प्रार्थना करते हैं, मन्नत मांगते हैं और लंगर के लिए योगदान देते हैं। दरगाहों में उस संत की सेवा करने के लिए संसार त्यागी दरवेश रहते हैं। ये दरवेश स्वयं भी शेख़ या औलिया हो सकते हैं। उनके मुरीद भी होते हैं जिन्हें वे आध्यात्मिक शिक्षा देते हैं।

दरगाहें बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों, जातियों और वर्गों के लोगों के लिए खुली रहती हैं। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समान रूप से मन्नतें मांगते हैं और चादर चढ़ाते हैं। दरगाहों में होने वाली कव्वाली और रूहानी संगीत प्रेम, भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश फैलाते हैं (जैसे अमीर खुसरो की परंपरा)।

उर्स का स्थान सूफीमत में  सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र उत्सवों में से एक है। आमतौर पर किसी सूफ़ी संत की पुण्यतिथि पर उनकी दरगाह पर वार्षिक रूप से आयोजित किये जाने वाले उत्सव को उर्स कहा जाता है। 'उर्स' अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विवाह, यानी पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन। सूफी विचारधारा में ईश्वर (अल्लाह) को 'प्रियतम' और सूफी संत की आत्मा को 'प्रेमिका' माना जाता है। सामान्य तौर पर जहाँ मृत्यु को शोक का अवसर माना जाता है, वहीं सूफी परंपरा में इसे एक उत्सव (जश्न) के रूप में मनाया जाता है। सूफियों का मानना है कि मृत्यु के दिन संत की आत्मा इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक प्रियतम (ईश्वर) से जा मिलती है। इस अंतिम मिलन को 'विसाल' कहा जाता है। चूँकि यह आत्मा का परमात्मा से मिलन यानी एक 'रूहानी शादी' है, इसलिए इस दिन शोक मनाने के बजाय अत्यंत खुशी और उत्सव मनाया जाता है। पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं, इस तरह वे पहले के बजाए उनके अधिक क़रीब हो जाते हैं। लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए और उनका आशीर्वाद लेने के लिए पीर की दरगाह पर जाते हैं। लोग संत की समाधि पास फातिहा (क़ुरआन की पहली सूरत या आयत, सूफ़ी परंपरा में दिवंगत आत्माओं की शांति या बरकत के लिए उनकी कब्र पर की जाने वाली एक विशेष प्रार्थना) पढ़ते हैं। प्रत्येक दरगाह में उर्स का दिन उस दरगाह का सबसे महत्वपूर्ण आयोजन होता है। संत की समाधि-स्थल पर खूब उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है। समय के साथ, उर्स के अवसर पर दरगाहों में पर श्रद्धालुओं की उपस्थिति में दरवेशों और शेखों के संगीतमय गीतों ने क़व्वाली जैसी संगीत शैलियों को जन्म दिया, जिसमें सूफ़ी काव्यों को संगीत के साथ किसी मुर्शिद को भेंट के रूप में गाया जाता है। आज वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत और मनोरंजन का एक लोकप्रिय रूप बन गए हैं।

उर्स का उत्सव कई दिनों (आमतौर पर 3 से 6 दिन) तक चलता है और इसकी रस्में दरगाह के खादिमों या गद्दीनशीन (वंशज) द्वारा निभाई जाती हैं। उर्स की शुरुआत में संत की मज़ार (कब्र) को पवित्र केवड़े और गुलाब जल से धोया (ग़ुस्ल दिया) जाता है। इसके बाद मज़ार पर चंदन (संदल) का लेप लगाया जाता है। इसे ग़ुस्ल और संदल की रस्म कहा जाता है। सूफी संत की आत्मा की शांति, दुनिया में अमन-चैन और श्रद्धालुओं की मन्नतों के लिए पवित्र क़ुरआन का पाठ (क़ुरआन ख़्वानी) और विशेष सामूहिक प्रार्थनाएं की जाती हैं। उर्स के दौरान देश-विदेश से आने वाले जायरीन (श्रद्धालु), वीआईपी और विभिन्न संस्थाएं मज़ार पर मखमली और जरीदार सुंदर चादरें और गुलाब के फूल अर्पित करते हैं। रस्म-ए-कुल उर्स के समापन की मुख्य रस्म होती है, जिसमें आखिरी दिन विशेष दुआओं के साथ उत्सव का औपचारिक समापन होता है। उर्स की रातें संगीत और रूहानी ऊर्जा से भरपूर होती हैं। दरगाह के 'महफ़िल ख़ाने' में देश के नामी कव्वाल पूरी-पूरी रात सूफियाना कलाम और कव्वालियां पेश करते हैं। संगीत के माध्यम से भक्त भावविभोर होकर ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाते हैं। उर्स के दौरान दरगाह की रसोई में बड़े पैमाने पर शाकाहारी और पारंपरिक भोजन (जैसे मीठे चावल या देग का भोजन) पकाया जाता है। अमीर हो या गरीब, जाति और धर्म का भेद मिटाकर हजारों-लाखों लोग एक साथ बैठकर लंगर छकते हैं। दरगाह के चारों ओर एक बड़ा मेला लगता है। इसमें तरह-तरह के पारंपरिक सामान, इत्र, धार्मिक पुस्तकें, सूफी संगीत की सीडी/सामान और चादर-फूलों की दुकानें सजती हैं।

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की याद में इस्लामी महीने 'रजब' की 1 से 6 तारीख तक मनाया जाने वाला उर्स दुनिया का सबसे बड़ा उर्स माना जाता है, जहाँ लाखों हिंदू-मुस्लिम श्रद्धालु जुटते हैं। रबी-उल-आखिर महीने में दिल्ली की मशहूर दरगाह पर तीन दिवसीय हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का भव्य उर्स और कव्वाली का आयोजन होता है। अमीर खुसरो का उर्स (दिल्ली) निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह परिसर में ही ईद-उल-फितर (मीठी ईद) के ठीक 18 दिन बाद अमीर खुसरो का उर्स मनाया जाता है, जिसमें उनके लिखे सूफी ग्रंथों और गीतों का पाठ होता है।

मुंबई की बाबा हाजी अली शाह की दरगाह पूरे विश्व में आस्था का केंद्र है। इसकी स्थापना 1431 में हुई थी। बाबा हाजी अली उज़्बेकिस्तान के बुखारा प्रांत से सारी दुनिया का भ्रमण करते हुए भारत पहुंचे थे। ऐसा कहा जाता है कि वे एक बहुत ही समृद्ध परिवार से थे। मक्का की यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी सारी दौलत नेक कामों के लिए दान कर दी। उसी यात्रा के दौरान उनका देहावसान हो गया। ऐसी मान्यता है कि उनका शरीर एक ताबूत में था और वह समुद्र में बहते हुए वापस मुम्बई आ गया। यहीं उनकी दरगाह बनवाई गयी। यह दरगाह भी सूफी वास्तुकला और सांप्रदायिक एकता की एक अनूठी मिसाल है।

बादशाह अकबर द्वारा बनवाया शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह, फ़तेहपुर सीकरी में है। मुगल सम्राट अकबर इनके बहुत बड़े भक्त थे। कहते हैं कि जब अक़बर ने संतान की प्राप्ति के लिए मन्नत माँगने अजमेर शरीफ, ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गए थे तो, वहाँ उसकी मुलाक़ात शेख़ सलीम चिश्ती से हुई थी। शेख़ ने अक़बर को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। कुछ समय बाद बादशाह को संतान प्राप्ति हुई। इसी ख़ुशी में अक़बर ने फतेहपुर सीकरी में इनका सुंदर सफेद संगमरमर का मकबरा बनवाया।

सुहरावर्दी तरीके के संत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह, मुल्तान, पाकिस्तान  स्थित दरगाहें काफी मशहूर दरगाहें हैं।

महरौली में स्थित कुतबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह दिल्ली की सबसे पुरानी दरगाहों में से एक है। दिल्ली का प्रसिद्ध 'कुतुब मीनार' इन्हीं के सम्मान में समर्पित माना जाता है।

हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित है। हजरत निजामुद्दीन औलिया चिश्ती सिलसिले के चौथे सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय संत थे। इनका जन्म 1238 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था। वे महान सूफी संत बाबा फरीद के शिष्य थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में दिल्ली सल्तनत के कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन हमेशा सत्ता और अमीरों से दूरी बनाए रखी। उनका मुख्य संदेश था,  "मोहब्बत सबके लिए, नफ़रत किसी से नहीं"। उन्हें आदर से 'महबूब-ए-इलाही' (ईश्वर का प्रिय) भी कहा जाता है। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह अपनी रूहानी वास्तुकला और शांति के लिए जानी जाती है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का मक़बरा 1325 में उनकी मृत्यु के बाद बनवाया गया। दरगाह के अन्दर उनके सबसे प्रिय शिष्य और प्रसिद्ध शायर अमीर खुसरो और मुग़ल राजकुमारी जहां आरा बेगम का मकबरा भी है। यहाँ हर बृहस्पतिवार की शाम को होने वाली कव्वाली दुनिया भर में मशहूर है, जो सूफी संगीत के जरिए खुदा से जुड़ने का माध्यम मानी जाती है।

हरिद्वार में स्थित पिरान कलियर शरीफ की दरगाह हरिद्वार के पास कलियारी नामक गांव में स्थित है। यह दरगाह अलाउद्दीन अली अहमद साबिर सूफ़ी संत को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस दरगाह का निर्माण अफगान शासक इब्राहिम लोधी द्वारा तेरहवीं शताब्दी में किया गया था।

श्रीनगर (कश्मीर) में शेख़ अब्दुल कादिर जिलानी का मकबरा है। चटगाँव में बाबा फरीद के नाम से मक़बरा है। हालाकि वे पकपतन (पंजाब) में मरे और वहीं दफ़नाए गए।

भारत में सबसे अधिक पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जिन्हें ग़रीब नवाज़ भी कहा जाता है। इनका जन्म 1143 ईस्वी में फारस (वर्तमान ईरान) के सीस्तान क्षेत्र में हुआ था। वे 12वीं शताब्दी के अंत में भारत (अजमेर) आए। गरीबों और असहायों के प्रति अगाध प्रेम के कारण लोग उन्हें आदर से 'गरीब नवाज' (गरीबों के मददगार) कहने लगे। राजस्थान के अजमेर में स्थित अजमेर शरीफ दरगाह देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। इसकी नींव दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इल्तुतमिश ने रखी थी और बाद में मुगल शासकों (अकबर और शाहजहाँ) ने इसका विस्तार किया। इस दरगाह का सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है। मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1324-51) पहला सुलतान था जो इस दरगाह पर आता था। किन्तु शेख़ की मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुलतान गियासुद्दीन ख़लजी ने पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई। सोलहवीं शताब्दी तक आते-आते अजमेर की यह दरगाह बहुत ही लोकप्रिय हो गयी। इस दरगाह को जानने वाले तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अक़बर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया। अक़बर यहाँ चौदह बार आया। कभी तो साल में दो-तीन बार भी आया। वह कभी नई जीत के लिए आशीर्वाद लेने आता था, तो कभी मन्नत के पूरी हो जाने पर तो कभी पुत्र के जन्म पर आता था।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर