गुरुवार, 26 मार्च 2026

460. 26 जनवरी को

गांधी और गांधीवाद

460. 26 जनवरी को

1947

अट्ठारह वर्ष पहले देशवासियों ने 26 जनवरी, 1929 के दिन स्वातंत्र्य की प्रतिज्ञा ली थी। तब से हर साल 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाई जाती थी। आगा ख़ां जेल में, अपनी नज़रबंदी के दौरान, भी गांधीजी ने इस दिन को तिरंगा फहरा कर और वंदे मातरम्‌ गा कर मनाया था। 26 जनवरी, 1947 में, जब स्वतंत्रता कुछ ही महीने दूर थी, गांधीजी नोआखाली के बांसा गांव में थे। गांव वालों ने चाहा कि गांधीजी झंडावंदन में शामिल हों। नज़रबंदी से रिहा होने के बाद, जब दमन अपने चरम पर था, तब भी उन्होंने सरकार के निषेधाज्ञाओं के बावजूद इस दिन को मनाने पर ज़ोर दिया था। लेकिन नोआखाली में गांधीजी में उस दिन ज़रा भी उत्साह नहीं था। वेदना के साथ उन्होंने कहा, जब हिंदू और मुसलमानों के दिल में ऐसा द्रोह भरा है, तब आज़ादी का जश्न क्या करना? मैं तो अंग्रेज़ों के साथ लड़ता रहा हूं। पर यहां किसके साथ लड़ूं? सब अपने ही है। अपने ही भाई के साथ कैसी लड़ाई? कैसी स्पर्धा? कैसा विवाद? कैसा मनमुटाव? हम लोग आज़ादी की पूर्व-संध्या पर इस प्रकार बर्बरतापूर्वक आपस में लड़ रहे हैं। अगर हम देशवासी नहीं संभले, तो यह आज़ादी खोखली रह जाएगी। उन्होंने उदासी से कहा। "मैं अंदर से जानता हूँ कि वे मन ही मन कुढ़ेंगे। मैं ऐसा नहीं चाहता। तिरंगा मैंने ही बनाया था ताकि वह भारत के सभी धर्मों, सभी समुदायों और सभी लोगों — हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों और सिखों का प्रतीक बन सके। सच तो यह है कि एक समय वे सभी इसे अपना ही झंडा मानते थे। कई लोगों ने इसके लिए अपनी जान तक दे दी थी। लेकिन आज हम बुरे दौर से गुज़र रहे हैं। जब तक हम जागेंगे नहीं, तब तक जब स्वतंत्रता आएगी, तो वह एक खाली सपने में बदल जाएगी।" और इस तरह, झंडा फहराने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।

अगले दिन (27 जनवरी) गांधीजी पल्ला पहुंचे। कड़ाके की ठंड थी और उनके पैर लगभग जम चुके थे। "मुझे बंगाल की झोपड़ियों से प्यार हो गया है," उन्होंने एक गहरी साँस लेते हुए कहा। "ये कितनी हवादार और हल्की हैं। यहाँ प्रकृति की इतनी प्रचुरता चारों ओर बिखरी हुई है, फिर भी हिंदू और मुसलमान भाइयों की तरह एक साथ क्यों नहीं रह सकते? ज़रा इस मूर्खता को तो देखो। एक तरफ अकाल और भुखमरी का खतरा है; दूसरी तरफ, वे हिंदू किसानों का बहिष्कार करके खेती में बाधा डाल रहे हैं और इस तरह, अपनी अज्ञानता में, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं... इसीलिए मैं रोज़ प्रार्थना करता हूँ, 'हे ईश्वर, सभी मनुष्यों को सही समझ प्रदान करो।'"

पल्ला में रात गुज़ारकर वे पांचगांव (28 जनवरी) के लिए निकले। रास्ते में मनु मुस्लिम महिलाओं से उनके घरों में मिलने गई, लेकिन उन्होंने हड़बड़ी में उसके मुंह पर ही दरवाज़े बंद कर दिए। थोड़ी देर बाद एक बुज़ुर्ग मुस्लिम महिला बाहर आई और उसने उस मेहमान बच्ची को बड़े प्यार से मछली के साथ रोटी का एक टुकड़ा खाने के लिए दिया! मनु ने कहा मैं शाकाहारी हूं। उस बुज़ुर्ग महिला ने उसकी बात पर यक़ीन नहीं किया। बंगाल में कोई भी—चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम—मछली के बिना कैसे रह सकता है! महिला ने कहा, हिन्दू तो आखिर हिन्दू ही हैं। इसके बाद हम कैसे विश्वास कर सकते हैं कि गांधीजी यहां हिन्दू-मुस्लिम एकता कराने आए हैं? उस महिला को विश्वास दिलाने के लिए मनु ने रोटी का एक टुकड़ा खा लिया। लेकिन इस घटना ने यह तो उजागर कर ही दिया था कि मुसलमान औरतों में भी हिन्दुओं के बारे में कितना गहरा अविश्वास पैठा हुआ था। इस घटना से गांधीजी को गहरा सदमा लगा।

अगला पड़ाव 29 जनवरी को जयाग में था। वहां मुस्लिम लीग के कुछ नेता गांधीजी से मिले। उन्होंने गांधीजी से कहा, आपको प्रार्थना सभाएं बंद कर देनी चाहिए। मुसलमान उन्हें (प्रार्थना सभा को) नापसंद करते हैं। इस ज़िले में भी आपका रहना ज़रूरी नहीं है। और अगर आप नोआखाली में रहने का निश्चय कर ही चुके हैं तो आपको एक ही स्थान पर रहना चाहिए और गांव-गांव नहीं घूमना चाहिए।

गांधीजी ने कहा, मैं अवश्य ही नहीं चाहता कि मुसलमान या हिन्दू भी मेरी प्रार्थना सभा में आएं। लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए कि उनका आना मुझे पसन्द होगा या नहीं, तो मैं निश्चित रूप से ‘हां’ कहूंगा। जो इसे नापसंद करते हैं वे नहीं आने के लिए स्वतंत्र हैं। रही बात मेरे नोआखाली में ठहरने की, तो यह निर्णय करने की छूट मेरी है।

उस दिन भी प्रार्थना सभा में राम धुन गाई गई और उसमें इस बार दो पद और जोड़ दिए गए थे।

रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम,

ईश्वर अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान!

कृष्ण  करीम  हैं  तेरे  नाम,

राम  रहीम  हैं  तेरे   नाम,

सबको सन्मति दे भगवान!

 

मुसलमानों के एक वर्ग ने इस पर भी आपत्ति की। आरोप यह लगाया गया कि उन्होंने रहीम और करीम के साथ राम और कृष्ण के नाम जोड़ दिए हैं। यह तो कुफ़्र है। मुसलमानों के कानों को यह बुरा लगता है। गांधीजी को दुख और आश्चर्य दोनों हुआ। उन्होंने कहा, इससे कितनी असहिष्णुता और संकुचितता प्रकट होती है। यह तो बिल्कुल ही असत्य है कि मैं राम और कृष्ण के हिन्दू अवतारों को इस्लाम के एक ईश्वर के साथ जोड़ कर इस्लाम को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहा हूं। मैंने किसी को अपना धर्म-परिवर्तन करने का निमंत्रण कभी नहीं दिया है। मेरा उद्देश्य हमेशा यही रहा है कि मुसलमानों को अधिक अच्छा मुसलमान बनाया जाए, हिन्दुओं को अधिक अच्छा हिन्दू बनाया जाए और ईसाइयों को अधिक अच्छा ईसाई बनाया जाए। मेरा धर्म किसी का बहिष्कार नहीं करता। वह व्यापक है। सबको अपने भीतर समावेश करने वाला। मेरे लिए राम, अल्ला और गॉड एक ही अर्थ के द्योतक हैं।

30 जनवरी को गांधीजी अमकी पहुंचे। बकरी का दूध उपलब्ध नहीं था, इसलिए गांधीजी ने नारियल का दूध पिया। शाम तक उनका पेट खराब हो चुका था। कमज़ोरी से वे चक्कर खाकर गिर पड़े। निर्मल बोस ने अन्य साथियों की मदद से उन्हें उठा कर बिस्तर पर सुलाया। मनु डॉ. सुशीला नय्यर को बुलाना चाहती थी, लेकिन गांधीजी ने मना कर दिया। "मुझे तुम्हारा निर्मल बाबू को बुलाना अच्छा नहीं लगा," उन्होंने उससे कहा। "तुम अभी बच्ची हो। इसलिए, मैं तुम्हें माफ़ कर सकता हूँ। लेकिन मुझे तुमसे असल में यह उम्मीद थी कि ऐसे मौके पर, तुम पूरे दिल से रामनाम जपने के अलावा और कुछ नहीं करोगी। मैं तो, बेशक, हर समय यही कर रहा था... अब, इसके बारे में किसी को मत बताना, यहाँ तक कि सुशीला को भी नहीं। राम ही मेरे सच्चे डॉक्टर हैं। वे मुझे तब तक ज़िंदा रखेंगे जब तक वे मुझसे काम लेना चाहते हैं, वरना वे मुझे अपने पास बुला लेंगे।"

31 जनवरी को अगला पड़ाव आमिशपाड़ा था। एक बड़ी भीड़ ने उनका वहां स्वागत किया। उनमें से एक 100 साल की महिला भी थी। गांधीजी ने बुढ़ापे का पूरा सम्मान करते हुए उसे अपने पास बिठाया और अपने गले से माला उतारकर उसके गले में पहना दी। चेहरे पर मुस्कान लिए वह अपने उस महान 'बेटे' के सामने से धीरे-धीरे बाहर निकली; —हाथ में ली हुई छड़ी से ज़मीन टटोलती हुई और सिर हिलाकर अपनी खुशी ज़ाहिर करती हुई!

3 फरवरी को गांधीजी शादुरखिल पहुंचे। गांधीजी की धर्म यात्रा का एक महीना पूरा हो गया था। उनकी उपस्थिति के परिणामस्वरूप दंगों के शिकार लोगों में बहुत हद तक साहस आ गया था। उनका डर दूर हो गया था। लोगों के बीच सद्भाव का विकास हुआ था। आगे की यात्रा में पहले गांधीजी धर्मपुर गए फिर प्रसादपुर8 फरवरी को वे नन्दीग्राम पहुंचे। जगह-जगह उनका भव्य स्वागत-सत्कार किया गया। "हम आपकी क्या मेहमाननवाज़ी कर सकते हैं?" एक मुसलमान ने, जिसके घर गांधीजी गए थे, उनसे पूछा। "आपकी मेहमाननवाज़ी यह होगी कि आप मुझे अपने प्यार और स्नेह में जगह दें," गांधीजी ने जवाब दिया। दूसरे दिन वे विजयनगर पहुंचे। यहाँ नोआखाली में गाँव के काम में लगे कार्यकर्ताओं की समस्याओं पर चर्चा हुई। उनके सामने यह बात रखी गई कि कुछ समय बाद कुछ कार्यकर्ता सत्ता-लोभी हो जाते हैं। उन्हें रोकने और संगठन के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए उनके साथी कार्यकर्ता क्या कर सकते हैं? ज़ाहिर है, इसका जवाब 'असहयोग' ही था।

आगे की यात्रा टिपरा ज़िले की सीमा की तरफ़ थी। इधर विनाश के भयंकर दृश्य देखने को मिले। तोड़-फोड़ काफी हुई थी। पुलों के मरम्मत करने पड़े। 14 फरवरी को केरवा गए। वहां का भी वही हाल था। रायपुर पहुंचने पर उन्होंने पाया कि यहां तो सबसे ज़्यादा बरबादी हुई है। उत्पात अभी तक अपना सिर उठाए था। एक मंदिर को मुसलमानों ने क़ब्ज़ा कर उसे पाकिस्तान क्लब बना दिया था। गांधीजी जब वहां पहुंचे तो लोगों ने उन्हें आश्वस्त कराया कि जल्द ही इसे मंदिर का रूप दे दिया जाएगा। अब उनकी यात्रा नोआखाली के आख़िरी गांव देवीपुर तक पहुंच चुकी थी। लोगों ने गांधीजी के स्वागत के लिए काफी सजावट कर रखी थी। यह देखकर गांधीजी आग-बबूला हो गए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को बुलाकर काफी फटकार लगायी। मेरे लिए इस प्रदर्शन का कोई अर्थ नहीं है। यह वैमनस्य की एक विरासत छोड़ जाएगा। इस तरह का प्रदर्शन साम्प्रदायिक संबंधों को विषाक्त करेगा।

18 फरवरी को गांधीजी टिपरा ज़िले के आलूनिया पहुंचे। अब लोग काम का तनाव और थकान महसूस करने लगे थे। 19 फरवरी को गांधीजी बिरामपुर में थे। यह दिन शिवरात्रि का था। शिवरात्रि के दिन ही 1944 में कस्तूरबा का निधन हुआ था। गांधीजी ने इस दिन उपवास रखकर इसे मनाया। किसी ने गांधीजी के लिए नारंगी भेट स्वरूप भिजवाए थे। गांधीजी ने उसे बच्चों में बांट दिया और बोले, बा को खाने की अपेक्षा दूसरों को खिलाने में अधिक आनंद आता था। बिरामपुर मछुआरों का गांव था। गांधीजी एक मछुआरे की झोंपड़ी में ठहराए गए थे। इस जगह पर मेघना नदी बहती थी। रात को काफी ठंड थी। ठंडी हवा चल रही थी। उनका सारा शरीर कांप रहा था। मनु ने सारे कपड़े ओढ़ा दिए। फिर भी उनकी कंपकंपी दूर नहीं हुई। तो मनु ने उनके शरीर को दबाना और हाथ-पैर को मलना शुरू किए इससे थोड़ी उष्मा का संचार हुआ। फिर न जाने कब मनु को झपकी लग गई और वे दोनों सुबह तक सक साथ सटकर सोते रहे। इस घटना को लेकर कई लेखकों ने तरह-तरह की बातें लिखीं हैं। लेकिन गांधीजी यह मानते थे कि ब्रह्मचर्य के आदर्श को जिस प्रकार उन्होंने समझा है और अपने आचरण में उतारा है, उसके अनुसार कर्त्तव्य का तकाज़ा होने पर स्त्री-पुरुष का सट कर सोने की स्थिति को टालना उस आदर्श के साथ सुसंगत नहीं है।

सत्य और अहिंसा के लिए अपनी तपस्या में वह कहाँ खड़े थे? नोआखली में उन्होंने बार-बार खुद से यही सवाल पूछा था। इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता था कि अपने ब्रह्मचर्य के संबंध में वह कहाँ खड़े थे। उनकी सारी ऊर्जा इसी सवाल का सही जवाब खोजने में लगी हुई थी।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

बुधवार, 25 मार्च 2026

459. जगतपुर गांव में

गांधी और गांधीवाद

459. जगतपुर गांव में

1947

10 जनवरी को गांधीजी जगतपुर गांव में थे। निर्मलकुमार बोस तो उनके साथ थे ही। यहां पर दोपहर में स्त्रियों की एक सभा को संबोधित किया। महिलाओं में से एक अपने मारे गए पति की आधी जली हुई जांघ की हड्डी लेकर आई थी, जिसे वह एक पवित्र अवशेष के रूप में अपने साथ रखती थी। गांधीजी ने उससे कहा कि उन्हें गुज़र चुके लोगों की पहचान उनके नश्वर अवशेषों से करना पसंद नहीं है, और उन्होंने उसे वह हड्डी फेंक देने के लिए राज़ी कर लिया। कुछ महिलाओं ने अपनी दुख भरी कहानियाँ सुनाते हुए आँसू बहाए। गांधीजी ने उन्हें यह समझाकर सांत्वना दी कि शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि कितना भी दुख मनाने से मरे हुए लोग वापस जीवित नहीं हो सकते। उन्होंने उन्हें सभी कष्टों और दुखों के एकमात्र अचूक उपाय के रूप में 'रामनाम' जपने की सलाह दी। उनके अलौकिक धैर्य और अविचल शांति में कुछ ऐसा था जो लोगों को अपनी ओर खींचता था। इसका उन शोकाकुल महिलाओं पर एक अजीब-सा सुकून देने वाला और नई ऊर्जा भरने वाला प्रभाव पड़ा, जो दया या सहानुभूति के किसी भी शब्द से संभव नहीं था।

सभा के बाद गांधीजी ने बोस से उन स्त्रियों का, जिनका अपहरण और बलात्कार हुआ था, बयान दर्ज़ करने के लिए कहा। स्त्रियां भयभीत थीं। उनसे कुछ कहलवाना आसान नहीं था। लेकिन एक बहादुर लड़की सामने आयी और उसने सब कुछ कह सुनाया। अगले रोज़ बोस उस लड़की की मां से मिलने गए। एक पड़ोसी बहादुर लड़के ने उन्हें आश्रय दिया। वह उस लड़की से प्यार करता था और उससे विवाह करना चाहता था।  लड़की ने बोस को अपना उजड़ा हुआ घर दिखाया। घर को आग के हवाले कर दिया गया था। उसके दो भाइयों का क़त्ल कर आग के हवाले कर दिया गया था। जब बोस ने उससे पूछा कि क्या वह फिर वहां रह सकती है, तो उस लड़की ने कहा, हां, रह सकती हूं। वे अब मेरा क्या कर सकते हैं? जो कुछ उनके बस में था, वे कर चुके हैं। अगर वे फिर आते हैं, तो शायद मैं मर कर अपनी रक्षा करना सीख जाऊं।

मुसलमानों के एक समूह ने उनसे बहस करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार करने से मना कर दिया; उनका कहना था कि नोआखली में उनका उद्देश्य शब्दों के बजाय अपने कामों के माध्यम से बात करना है। वहां का परिवेश शत्रुतापूर्ण था। गांधीजी को बहुत ही सावधानी से अपने कदम उठाने पड़ते थे। मुसलमान शंकित और क्रूर थे। गांधीजी उनको उनके दोष गिनाकर और उत्तेजित नहीं करना चाहते थे। उन्होंने उन्हें समझाया कि वे उनके आचरण का फैसला करने नहीं आए हैं। यहां पर हिंदू डरे-सहमे हुए थे। खुलकर कुछ भी बोलने से डरते थे। गांधीजी उनको बहादुर बनने की प्रेरणा देते।

11 जनवरी को वे लामचर आए। स्थानीय मुसलमानों ने नारियल भेंट करके उनका स्वागत किया। गांधीजी के पहुंचने से स्थानीय लोगों में साहस आया। हार गांव में गांधीजी शाम में प्रार्थना सभा करते। निराश्रितों के समक्ष भाषण देते। उनमें साहस का संचार करते। लोगों को प्रेम और सौहार्द्र से रहने की प्रेरणा देते। शाम की प्रार्थना के लिए जाते समय, गांधीजी का ध्यान सड़ी-गली लाशों के एक ढेर की ओर गया, जिन्हें एक तालाब से निकाला गया था। ये लाशें ज़्यादातर उन लोगों की थीं, जो करपारा में हुए दंगों के दौरान मारे गए थे। उन्होंने पुलिस को जानकारी दी, जिसके बाद वे लाशें बरामद की गईं। ये लोग बहादुरी से मरे थे—जिन्होंने कायरता या धर्म-परिवर्तन के बजाय मौत को चुना था। दो लोग लड़ते हुए गोली लगने से मारे गए थे। बाकी दो वैष्णव थे, जिनके पास दुनियावी तौर पर कुछ भी नहीं था। उनमें से एक से जब जान बचाने के बदले इस्लाम अपनाने को कहा गया, तो उसने यह कहकर मना कर दिया: "मेरी इस ज़बान ने कभी हरिनाम व्यर्थ नहीं लिया है।" जिस मंदिर में वह पुजारी का काम करता था, उसमें आग लगा दी गई। वह बाहर निकलने की कोई कोशिश किए बिना ही जलकर मर गया। दूसरे को तब एक धारदार हथियार से मार डाला गया, जब उसने अपना धर्म बदलने से मना कर दिया।

दूसरे दिन (12 जनवरी) कारपाड़ा पहुंचे। वह सुशीला पाई का केन्द्र था। यहां पर गांधीजी ने लोगों को पीने के स्वच्छ पानी जुटाने के प्रश्न के महत्व को लोगों को बताया। उन्होंने तीन आसान और सस्ते तरीके सुझाए जिनसे गाँव वालों को साफ़ पानी मिल सके: पहला, तालाबों से कुछ दूरी पर, लेकिन तालाबों के स्तर से नीचे, पानी के गड्ढे खोदकर। तालाबों का पानी मिट्टी की परत से छनकर इन गड्ढों में आता और साफ़ हो जाता — यहाँ मिट्टी की परत एक प्राकृतिक फ़िल्टर का काम करती; दूसरा, हर घर में रेत और कोयले से बने कृत्रिम फ़िल्टर लगाकर; और तीसरा, जहाँ भी संभव हो, ट्यूबवेल लगाकर।

गांधीजी का अगला पड़ाव (13 जनवरी) शाहपुर में था। वहां काफ़ी बड़ी संख्या में मुसलमान उनसे मिलने आए। प्रार्थना सभा में हिन्दू भी आए। कई हिंदुओं ने भी प्रार्थना में हिस्सा लेने से परहेज़ किया, हालाँकि वे प्रार्थना सभा में मौजूद थे। ऐसा मुसलमानों के डर की वजह से था, जिसे गांधीजी की मौजूदगी भी दूर नहीं कर पाई। गांधीजी ने यहां शिक्षा के अभाव को रेखांकित किया और सामूहिक पैमाने पर सच्ची शिक्षा देने के विशाल प्रयत्न की आवश्यकता बताई।

अगले दिन (14 जनवरी) भटियालपुर पहुंचे। वहां मुसलमानों और हिन्दुओं की शांति-समिति बनाई गई। उस 'बाड़ी' में स्थित मंदिर, जहाँ गांधीजी को ठहरना था, दंगों के दौरान नष्ट कर दिया गया था; साथ ही, परिवार के दिवंगत सदस्यों की अस्थियों पर बनी समाधियाँ भी तोड़कर इस तरह बदल दी गई थीं कि वे मुस्लिम कब्रों जैसी दिखाई देने लगें। गांधीजी के आगमन की प्रत्याशा में, समिति के कुछ सदस्यों ने इन समाधियों के जीर्णोद्धार में सहायता करने के लिए स्वेच्छा से आगे कदम बढ़ाया। लोगों ने गांधीजी के समक्ष प्रतिज्ञा ली कि वे प्राण देकर भी हिन्दू भाइयों की रक्षा करेंगे। दंगों के बाद से नोआखली में अपनी तरह की यह पहली घटना थी।

दूसरे दिन (15 जनवरी) वे नारायण पुर के लिए निकले। वहां स्थानीय मुसलमान ने गांधीजी को अपने यहां ठहराया।

गांधीजी एक खास पत्थर से अपना पैर साफ करते थे। रास्ते में वे एक बुनकर की झोपड़ी में रुके थे, जहाँ उन्होंने अपने पैरों को गर्म पानी से धोया था, क्योंकि ठंड के कारण उनके नंगे पैर सुन्न हो गए थे। वह पत्थर शायद मनु से वहीं छूट गया था। गांधीजी को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने मनु से कहा कि वह वापस जाकर वह पत्थर लाए। मनु को अकेले जाते हुए भय हो रहा था, सो उसने स्वयं सेवक को साथ ले जाने का अनुरोध किया। गांधीजी बोले भूल तू ने की है, इसीलिए तुझे अकेले जाना होगा। मनु उस बीहड़ जंगल वाले रास्ते अकेले गई और ढूंढकर उस पत्थर को वापस लाया। आने-जाने में वह काफ़ी थक चुकी थी। उसे निढाल होकर पड़े देख गांधीजी ने कहा, तू जिस दिन मेरे पास आई थी, उसी दिन मैंने तुझे सावधान कर दिया था कि इस यज्ञ में मेरा साथ देना कोई हंसी-खेल नहीं है। तू अब भी वापस जा सकती है। शाम की प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा, आज की घटना से तुझे कल्पना हो जाना चाहिए कि मैं जिन्हें सबसे अधिक प्रेम करता हूं उनकी परीक्षा लेने में मैं कितना कठोर हो जाता हूं। गांधीजी की अहिंसा कोई कोरी भावुकता नहीं थी। जब उनके संरक्षण में रहने वालों की भलाई के लिए उन्हें सख़्त होने की ज़रूरत पड़ती थी, तो वे किसी भी "ज़ालिम" से ज़्यादा निष्ठुर बन सकते थे।

गांधीजी ने नारायणपुर में अपने मुस्लिम मेज़बान को मुस्लिम अंदाज़ में 'खुदा हाफ़िज़' ("ईश्वर आपकी रक्षा करे") कहकर विदा किया। वहाँ के स्थानीय मुसलमानों ने उन्हें 'नमस्कार' (हिंदुओं का अभिवादन का तरीका) कहकर विदा किया, जिसका जवाब उन्होंने 'सलाम' (मुस्लिम अभिवादन) से दिया।

अगला पड़ाव (16 जनवरी) रामदेवपुर था। वहां कनुगांधी का शिविर था। रास्ते में जगह-जगह मुसलमानों की टोलियों ने गांधीजी का स्वागत किया। कुछ स्थानों पर लोगों ने हरे पत्तों के स्वागत द्वार तैयार कर रखे थे। स्त्रियों ने आरती उतार कर और लाल टीका लगा कर गांधीजी का स्वागत किया। मुसलमानों ने फलों से गांधीजी का स्वागत किया। सुरेंद्र नाथ बसु (एक अमीर हिंदू ज़मींदार, जिनकी दंगों के दौरान हत्या कर दी गई थी) के मुस्लिम एस्टेट मैनेजर ने फलों के साथ उनका स्वागत किया। गांधीजी ने दोनों समुदायों के बच्चों को वे फल बाँटते हुए कहा, "मुझे सबसे ज़्यादा ज़रूरत आपके प्यार की है।"

नारायणपुर के एक घर के मुस्लिम बुज़ुर्गों ने गांधीजी से ज़नाना में रहने वाली औरतों से मिलने को कहा था, लेकिन वे औरतें अपनी एकांत जगह से बाहर नहीं आना चाहती थीं। इस पर गांधीजी ने उस इलाके की हिंदू औरतों से कहा कि चूंकि मुस्लिम औरतें अपनी सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन की वजह से सबके सामने आने से हिचकिचाती हैं, इसलिए यह हिंदू औरतों का फ़र्ज़ है—जो इस मामले में ज़्यादा आगे हैं—कि वे उन तक पहुंचें और उनसे घुलें-मिलें। हिंदू औरतें मुसलमानों से डरती थीं। गांधीजी ने उनसे कहा कि अगर वे सचमुच मुस्लिम औरतों के लिए हमदर्दी रखती हैं, तो उन्हें मुस्लिम औरतों की झिझक को दूर करना चाहिए और अपना डर ​​भी छोड़ देना चाहिए; प्यार और डर एक साथ नहीं रह सकते।

रामदेवपुर के मुसलमान ग़ुलाम सरवर की रिहाई की मांग कर रहे थे। वह स्वयं जेल में था लेकिन उसका संगठन ज़ोरों से काम कर रहा था। दंगों के दौरान उसने ज़बरदस्त उत्पात मचाए थे। 12 मुसलमानों का एक दल गांधीजी से मिला। उन लोगों ने गांधीजी से कहा कि नोआखाली में बहुत अधिक बरबादी नहीं हुई है। अगर गुलाम सरवर को छोड़ दिया गया तो वे आसपास के इलाक़े में ‘सच्ची शांति’ क़ायम कर देंगे। गांधीजी ने कहा, मुझे इस बात पर भरोसा नहीं होगा, क्योंकि मेरे पास गुलाम सरवर के रवैये के बारे में अधिकृत रिपोर्टें हैं। मैं इस बात से भी सहमत नहीं हूं कि नोआखाली में अधिक बरबादी नहीं हुई है, क्योंकि मुझे तो जो भयंकर बरबादी की गई है उसके प्रमाण रोज़ मिल रहे हैं।

19 जनवरी को गांधीजी बादलकोट से आताकोरा के लिए रवाना हुए। जाने वाला रास्ता, कुछ स्थानीय लोगों की मदद से कामगारों ने पूरी तरह साफ़ कर दिया था। लेकिन कुछ मुसलमानों ने रात ही रात में उस पर गोबर और मल-मूत्र फैलाकर उसे गंदा कर दिया था! जब गांधीजी का ध्यान इस ओर दिलाया गया, तो उन्होंने कहा: "मुझे यह अच्छा लगा। इससे मेरा कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि उन्हें अपने मन की भड़ास निकालने में मदद मिलती है!" अपनी इस तीर्थयात्रा के दौरान, इस तरह का "स्वागत" उन्हें अक्सर ही झेलना पड़ता था।

गांधीजी ने अपने हाथों से मल को साफ किया और आगे बढ़े। दूसरे दिन जब जाने का समय आया तो मनु देखने गई कि क्या आज भी वह पगडंडी गंदी है। मनु ने अपने हाथों से गंदगी साफ की। गांधीजी ने कहा: "तो, आज तुमने मुझसे पुण्य कमाने का मौका छीन लिया! काश, मैं यह काम खुद कर पाता!"

अगले दिन (20 जनवरी को) गांधीजी शिरंडी पहुंचे। वहां अम्तुस्सलाम बहन शिविर चला रही थीं। वह एक धर्मनिष्ठ मुसलमान थीं, जो न तो अपना सालाना रमज़ान का रोज़ा कभी छोड़ती थीं और न ही कुरान को अपने पास रखे बिना सोती थीं; वह हर रोज़ कुरान का कुछ हिस्सा ज़रूर पढ़ती थीं। हिंदू-मुस्लिम एकता उनके बचपन से ही उनके जीवन का जुनून रही थी, और इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्होंने अपनी जान की भी कोई परवाह नहीं की। वह पिछले पच्चीस दिनों से कुछ स्थानीय मुसलमानों के विरुद्ध उपवास कर रही थीं। दंगों के दौरान कुछ मुसलमानों ने एक हिन्दू परिवार के खड्ग (बलि देने वाली तलवारें) चुरा लिए थे। बार-बार निवेदन करने पर भी वे नहीं दे रहे थे। गांधीजी जब पहुंचे तो मुसलमानों का एक बड़ा दल उनसे मिलने आया। उसने कहा, हमने खड्ग का पता लगाने की पूरी कोशिश की, परन्तु हम सफल नहीं हुए। हम अपनी ओर से क्या आश्वासन दें कि अम्तुस्सलाम को संतोष हो जाए और वे उपवास छोड़ दें। गांधीजी ने कहा कि खड्ग तो उनके उपवास के कारण का एक प्रतीक है। वह तो चाहती हैं कि दोनों समुदायों के बीच की एकता और शांति कायम हो। मुसलमान इस बात का आश्वासन उन्हें दे दें। इस आशय का एक मसौदा गांधीजी ने तैयार किया जिस पर चार गांवों के ग्यारह प्रमुख मुसलमानों ने हस्ताक्षर किए। इस तरह गांधीजी के हाथों से संतरे का रस पीकर अम्तुस्सलाम ने उपवास तोड़ा। इसके बाद शिरंडी और उसके आसपास की स्थिति बिल्कुल बदल गई।

22 जनवरी को गांधीजी केथुरी गए। 23 जनवरी को, अगला पड़ाव पनियाला था। उसके बाद वे मुरायम गांव 24 जनवरी को पहुंचे। वहां वे एक मौलवी के घर में ठहरे थे। मौलवी साहब उन्हें अपने घर के अंदर ले गए और ज़नाना की महिलाओं से उनका परिचय करवाया। उन महिलाओं ने बड़े आदर-भाव से उनका स्वागत किया। यह देखकर कि उनमें से कुछ महिलाएं उनकी मौजूदगी में संकोच कर रही थीं और यहाँ तक कि पर्दा भी कर रही थीं, मौलवी साहब ने उन्हें प्यार से डांटते हुए कहा: "आज हम धन्य हैं कि हमारे बीच ईश्वर का ऐसा नेक बंदा मौजूद है। आज हमारा समुदाय अपने हिंदू भाइयों का खून बहाने के कलंक से जूझ रहा है। महात्माजी हमें उस दाग से मुक्त कराने आए हैं। उनकी पवित्र मौजूदगी में पर्दा करना बिल्कुल बेतुकी बात है।" शाम की प्रार्थना सभा में हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर रामधुन गाई। "इसका सारा श्रेय मौलवी साहब को जाता है," गांधीजी ने कहा। "यह मेरे इस सिद्धांत को सही साबित करता है कि अपने आस-पास के माहौल को बदलने के लिए एक ही व्यक्ति काफी है—बशर्ते वह सच्चा और ईमानदार हो।" अगर यह बात उस गाँव के लिए सच थी, तो पूरे नोआखली और यहाँ तक कि पूरे भारत के लिए सच क्यों नहीं हो सकती?

दूसरे दिन (25 जनवरी को) वे हीरापुर के लिए रवाना हुए। हीरापुर में केवल दो हिन्दू परिवार थे। लेकिन यहां की प्रार्थना सभा में भारी भीड़ इकट्ठा हुई। स तीर्थयात्रा के दौरान, प्रार्थना-सभा में जुटी यह अब तक की सबसे बड़ी भीड़ थी। नोआखली में गांधीजी की मौजूदगी ने इसे एक ऐसे गूंजते मंच में बदल दिया, जिसने पूरे भारत में उठने वाली हर राजनीतिक हलचल या गूंज को पकड़ा और उसे और भी ज़ोरदार बना दिया।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांगांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर