राष्ट्रीय आन्दोलन
469. पुन्नाप्रा-वायलार संघर्ष
1946-47
पुन्नाप्रा-वायलार संघर्ष (अक्टूबर 1946) त्रावणकोर रियासत
(आधुनिक केरल) में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मजदूरों और किसानों का एक ऐतिहासिक
सशस्त्र विद्रोह था। पुन्नप्रा और वायलर, अलप्पुझा जिले के दो गाँव हैं। त्रावणकोर के
पुन्नाप्रा-वायलार के किसानों ने प्रशासन (दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर के
निरंकुश शासन) के साथ खूनी लड़ाइयाँ लड़ीं। यहाँ सशस्त्र बलों और उन जुझारू
श्रमिकों के बीच भीषण झड़पें हुईं जिनके पास लकड़ी के साधारण भालों के अलावा कोई
हथियार नहीं थे। उत्तर-पश्चिमी त्रावणकोर राज्य के शेरतलाई-अल्लेप्पी-अम्बलपुझा क्षेत्र में, 1946 तक कम्युनिस्टों ने नारियल-रेशा (coir) फ़ैक्टरियों के मज़दूरों, मछुआरों, ताड़ी निकालने वालों और खेतिहर मज़दूरों के बीच
एक बहुत ही मज़बूत आधार बना लिया था। इस क्षेत्र से छोटे शहर काफी नज़दीक थे। इन
शहरों के उद्योगों और पास के गांवों के खेती-बाड़ी के कामों का एक-दूसरे के बहुत
करीब होना, किसानों के लिए
काफी फायदेमंद था। परिणामस्वरूप यहाँ मज़दूर-किसान गठबंधन मज़बूत होने लगा था। इस
क्षेत्र में ट्रेड यूनियन इतनी ताक़तवर हो गई थीं कि वे नारियल-रेशा फ़ैक्टरियों
में भर्ती को नियंत्रित करने लगे थे। इन्होंने अनौपचारिक लेकिन बहुत लोकप्रिय
मध्यस्थता अदालतें स्थापित कर लिया था। यहाँ तक कि वे अपनी खुद की राशन की दुकानें
चलाने का अधिकार भी हथिया लिया था। उन्होंने दीवान की दमनकारी नीतियां, जमींदारों द्वारा
शोषण, और त्रावणकोर को
भारत से अलग स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का जमकर विरोध किया। इस विद्रोह का नाम उन दो
स्थानों के नाम पर रखा गया है जहाँ यह हुआ था; पुन्नप्रा से शुरू होकर वायलर में समाप्त हुआ ।
इस क्षेत्र में खाने की चीज़ों की भारी कमी हो
गयी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान त्रावणकोर साम्राज्य में भीषण अकाल की
स्थिति ने किसानों को कम्युनिस्टों की ओर धकेल दिया था। इसका कारण यह था कि अनाज, संसाधन और कच्चा
माल भारत की जनता में वितरित करने के बजाय युद्ध मोर्चों पर निर्यात किया जा रहा
था। चेरथला तालुक में अकाल (1939-43) के दौरान 21,000 से अधिक किसान मारे गए, जिससे चेरथला और अंबलपुझा तालुकों में सत्ता
के विरुद्ध असंतोष बढ़ता गया।
इस क्षेत्र में किराएदारों और कृषि श्रमिकों को
अक्सर पीटा और प्रताड़ित किया जाता था, महिलाओं का बलात्कार किया जाता था और जमींदारों
द्वारा उनके घर ध्वस्त कर दिए जाते थे। उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया
जाता था। उस पर से त्रावणकोर के शासक और उनके दीवान ने न केवल जनता की मांगों को मानने
से इनकार कर दिया, बल्कि उन्होंने
त्रावणकोर राज्य को भारत से अलग करने का भी प्रयास किया। जनवरी 1946 में दीवान
सी.पी. रामास्वामी अय्यर द्वारा घोषित एक योजना से एक विस्फोटक राजनीतिक स्थिति
पैदा हो गई। सीपी रामास्वामी अय्यर ने त्रावणकोर को भारतीय संघ में शामिल करने के
बजाय एक स्वतंत्र देश बनाने के लिए संवैधानिक सुधारों का प्रस्ताव रखा था। इस योजना के तहत
एक 'अमेरिकी-तर्ज़ का
संविधान' बनाने का प्रस्ताव
था। इस योजना में विधानसभाएँ तो वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी जानी थीं, लेकिन कार्यपालिका पर महाराजा द्वारा नियुक्त
दीवान का नियंत्रण होना था। महत्वाकांक्षी दीवान स्पष्ट रूप से एक स्वतंत्र
त्रावणकोर के लिए काम कर रहा था। उसे उम्मीद थी कि अंग्रेजों के जाने के बाद
स्वतंत्र त्रावणकोर उसके अपने नियंत्रण में होता। जून 1947 में उसने इसे अपने
इरादे के तौर पर घोषित भी कर दिया था।
स्टेट कांग्रेस टालमटोल कर रही थी। पट्टम थानु
पिल्लई जैसे कुछ नेता स्पष्ट रूप से रामास्वामी अय्यर के साथ किसी समझौते के खिलाफ
नहीं थे। वहीं दूसरी ओर कम्युनिस्टों ने एक ज़ोरदार अभियान छेड़ दिया, जिसका नारा था: "अमेरिकन मॉडल को अरब सागर
में फेंक दो।" एटीटीसी (ऑल त्रावणकोर ट्रेड यूनियन कांग्रेस) ने अकाल के दौरान
गरीबों की मदद न करने के लिए दीवान के खिलाफ अहिंसक विरोध प्रदर्शन किया था। दीवान
अलाप्पुझा क्षेत्र के श्रमिकों पर कठोर और क्रूर भूमि कानून भी लागू कर रहे थे। ब्रिटिश अधीन होने
के कारण, दीवान ने
जमींदारों को निजी और सार्वजनिक संपत्ति पर दावा करने, मजदूरी देने से
इनकार करने और श्रमिकों को प्रताड़ित करने की अनुमति दे दी थी। परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में
कम्युनिस्ट दलों के नेतृत्व में नियमित रूप से विरोध प्रदर्शन होते रहे। नेतृत्व
और नागरिकों के बीच संबंध तनावपूर्ण और अस्थिर हो गए।
मछुआरे, किसान और नारियल के रेशे से बने कपड़े पर काम
करने वाले सभी लोग संगठित होकर सशस्त्र संघर्ष के लिए उतर आए। सितंबर 1946 से, राज्य सरकार ने
कम्युनिस्टों और अलप्पुझा (Alleppey) क्षेत्र की ट्रेड यूनियनों के खिलाफ एक चौतरफा
अभियान शुरू कर दिया था। पुलिस कैंप बना
दिए गए थे। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं। गिरफ्तार लोगों को जेलों में क्रूर
यातनाएँ दी गईं। ऐसे कैंप स्थापित किए गए थे जहाँ सताए हुए मज़दूर अपनी आत्मरक्षा
के लिए शरण ले सकें। इन मज़दूरों की सुरक्षा उन स्वयंसेवकों द्वारा की जाती थी
जिन्हें कुछ बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया गया था। ये कैम्प किसी विद्रोह की
योजना के तहत नहीं स्थापित किए गए थे।
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने
देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था। 22 अक्टूबर से अलप्पुझा-शेरतलाई क्षेत्र में एक
राजनीतिक आम हड़ताल शुरू हो गई। दो दिन बाद 2,000 से अधिक कम्युनिस्टों ने अलप्पुझा से चार
मील दक्षिण में स्थित पुन्नाप्रा पुलिस कैंप पर एक आंशिक रूप से सफल हमला किया
गया। इस हमले में पुलिस द्वारा भारी गोलीबारी के बावजूद, लकड़ी के भालों से लैस स्वयंसेवक, रेंगते हुए आगे बढ़े ताकि पुलिस के साथ
आमने-सामने की लड़ाई (हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट) कर सकें। यहाँ नौ राइफलें कब्ज़े में
ली गईं। शास्त्र चलाने के प्रशिक्षण के अभाव में उनका कोई उपयोग नहीं हो सका।
25 अक्टूबर 1946 (महाराजा के
जन्मदिन) को, त्रावणकोर का नया
संविधान लागू होना था, जिससे त्रावणकोर
एक स्वतंत्र देश बन जाता (अमेरिकी मॉडल पर आधारित)। वायलर में 1000 से अधिक कम्युनिस्टों ने इस कदम का कड़ा विरोध
किया और विद्रोह कर त्रावणकोर पुलिस अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों की हत्या कर
दी। दीवान ने 25 अक्टूबर को इलाके में मार्शल लॉ घोषित कर दिया। त्रावणकोर सेना
अपने शिविर से निकली और 27 तारीख को वायलार (शेरतलाई के पास) स्थित स्वयंसेवकों के
मुख्यालय पर सेना ने धावा बोल दिया। गोलीबारी में भीषण रक्तपात हुआ। पुन्नाप्रा-वायलार
के इस अत्यंत खूनी विद्रोह में लगभग 800 लोग मारे गए थे। कम्युनिस्ट पराजित
हुए और कुछ ही मिनटों में आत्मसमर्पण कर दिया। इस नरसंहार के बाद दीवान पूरी तरह से अपनी साख
खो चुका था। अब उसके और कांग्रेस के बीच किसी भी संभावित गठबंधन की रही सही
संभावना भी जाती रही।
जब 3 जून 1947 को यूनाइटेड किंगडम ने विभाजन की मांगों को
स्वीकार कर लिया और थोड़े ही समय में भारत छोड़ने की घोषणा कर दी, तो त्रावणकोर के महाराजा ने स्वयं को स्वतंत्र
घोषित करने की इच्छा व्यक्त की। दीवान सी.पी. रामस्वामी अय्यर के समर्थन से, महाराजा चिथिरा थिरुनल
बलराम वर्मा ने 18 जून 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा जारी की। कांग्रेस ने
त्रावणकोर का भारत में विलय करवाने के लिए दबाव की रणनीति का सावधानीपूर्वक
इस्तेमाल किया। यह रणनीति सफल रही। दीवान रामास्वामी अय्यर को यह एहसास हो गया था
कि शांतिपूर्ण समर्पण का एकमात्र विकल्प शायद एक हिंसक क्रांति ही होगी। यह
पुन्नाप्रा-वायलार ही वह घटना थी जिसने वास्तव में त्रावणकोर को भारत में एकीकृत
किया और इस तरह देश के बाल्कनीकरण (विखंडन) की राह को रोक दिया। कम्युनिस्टों के
लिए पुन्नाप्रा-वायलार
का अर्थ था—वीरतापूर्ण शहादत का संपूर्ण गौरव। यह आंदोलन केरल के राजनीतिक इतिहास
में वामपंथी राजनीति के उदय का मुख्य आधार बना। पुन्नप्रा-वायलर विद्रोह के एक साल
बाद, पट्टोम थानु
पिल्लई केरल के पहले मुख्यमंत्री बने। यह संघर्ष भारत की स्वतंत्रता के समय
रियासतों में चल रहे उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का एक प्रमुख उदाहरण है।
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मनोज कुमार
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