सोमवार, 13 जुलाई 2026

494. जूनागढ़ भारत में विलय

राष्ट्रीय आन्दोलन

494. जूनागढ़ भारत में विलय

जूनागढ़ 'जूना' ('पुराना') और 'गढ़' ('किला') से मिलकर बना है। जिसका अर्थ होता है पुराना किला यह भारत के गुजरात राज्य में स्थित एक ऐतिहासिक और प्रमुख शहर है, जो अपनी प्राचीन दीवारों, महलों और गिरनार पहाड़ियों के कारण प्रसिद्ध है। यह गिरनार पर्वत की तलहटी में बसा और 8,831 वर्ग किलोमीटर में फैला एक राज्य था।  इस पर मुस्लिम बाबी वंश का राज था, जिसे 1654 में मुहम्मद शेर खान बाबी ने शुरू किया था। इसके  पहले, इस इलाके पर चुडासमा राजपूतों और बाद में गुजरात के सुल्तान मुहम्मद बेगड़ा का राज था। नवाब तो मुसलमान था, लेकिन उसके 7,00,000 निवासियों में से 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। नवाब यहाँ का शासन मुस्लिम सलाहकारों की मदद से चलाते थे। नवाब को मोटरों का काफिला रखने, पोलो खेलने और घोड़े और कुत्ते रखने का शौक था। जूनागढ़ का आखिरी शासक, नवाब महाबत खान, राज करने से ज़्यादा कुत्तों के लिए अपने अजीब प्यार के लिए जान जाता था। उसने अलग-अलग नस्लों के 300 से ज़्यादा कुत्ते पाल रखे थे। उसके ख़जाने का अधिकतर पैसा इन्हीं मदों में ख़र्च होता था। जब भारत की सत्ता का हस्तांतरण हुआ, उस समय जूनागढ़ उन तीन राज्यों में से एक था, जिसने अभी तक इस बात का निर्णय नहीं लिया था कि वे भारत में रहेंगे या पाकिस्तान में। इस रियासत के चारों तरफ़ काठियावाड़ के राज्य थे, जिसने भारत में मिलने का निर्णय लिया था। जूनागढ़ के छोटे-छोटे टुकड़े दूसरी रियासतों के प्रदेशों में टापुओं की तरह बिखरे हुए थे। उनके बीच आपस में सीधे संपर्क का कोई ज़रिया नहीं  हालांकि जूनागढ़ का पाकिस्तान के साथ ज़मीनी बॉर्डर नहीं था, लेकिन समुद्र के रास्ते यह कराची के पास था, जो वेरावल पोर्ट के ज़रिए लगभग 300 मील दूर था।

मई, 1947 में नवाब ने जिन्ना के कहने पर मुसलिम लीगी कराची के शाहनवाज भुट्टो को अपना दीवान नियुक्त कर लिया था। ये बाद के दिनों में पाकिस्तान के प्रधान मंत्री जुल्फ़िकार अली भुट्टो के पिता थे। नवाब उन दिनों विदेश में था और उसने भुट्टो को राज्य का दीवान (प्राइम मिनिस्टर) बनाकर छोड़ गया था। शाहनवाज़ भुट्टो, मुस्लिम लीग का एक जाना-माना नेता होने के नाते, खुले तौर पर पाकिस्तान की तरफ़ झुका हुआ था। जल्द ही शाहनवाज ने जूनागढ़ की सत्ता हथिया ली और जिन्ना से मिलकर पाकिस्तान में सम्मिलित होने की योजना बनाने लगा। भारी हिंदू बहुसंख्यकों को नज़रअंदाज़ करते हुए, भुट्टो से प्रभावित नवाब महाबत खान ने 15 अगस्त, 1947 को, जिस दिन भारत आज़ाद हुआ, पाकिस्तान के साथ विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। सत्ता हस्तांतरण के दो दिन बाद ही, 17 अगस्त, 1947 को अचानक समाचार आया कि मोहम्मद महाबत खान, नवाब जूनागढ़ पाकिस्तान में मिल गया है। नवाब और उसके दीवान ने प्रजा की इच्छा जानने की कोई ज़रूरत ही नहीं समझी। यह एक तरफ़ा निर्णय था। वहां की जनता भारी बहुमत में भारतीय संघ में सम्मिलित होने के पक्ष में थी। पाकिस्तान में मिलने के इस निर्णय ने भौगोलिक सामीप्य के सिद्धांत को भी ठुकरा दिया था, जिसे पाकिस्तान और भारतीय संघ, दोनों के नेताओं ने स्वीकार किया था।

नवाब ने काठियावाड़ के दूसरे राजाओं की सलाह के विरुद्ध काम किया था। इस फ़ैसले से पड़ोसी काठियावाड़ राज्यों को झटका लगा। जूनागढ़ की काउंसिल के इकलौते हिंदू सदस्य, राय बहादुर धर्मदास हीरानंदानी ने इस कदम का कड़ा विरोध किया और उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। नवाब को भारत में शामिल होने की सलाह देने के कारण कैप्टन डॉ. प्रेम राय मजूमदार जैसे वफ़ादार अफ़सरों को भी नौकरी से निकाल दिया गया। इस घोषणा के बाद जूनागढ़ की हिंदू आबादी में डर फैल गया। मुस्लिम लीग का असर बढ़ने के साथ, “एक्शन काउंसिल नाम के एक सीक्रेट ग्रुप ने हिंदुओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया।  जल्द ही, हज़ारों हिंदू जूनागढ़ छोड़कर आस-पास के इलाकों में सुरक्षा की तलाश में चले गए। इलाके में कानून व्यवस्था का नामो-निशान नहीं था।

सरदार पटेल ने पाकिस्तान सरकार को लिखा कि वह अपना रवैया स्पष्ट करे। एक महीने के बाद 13 सितंबर, 1947 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली ख़ान का जवाब आया कि पाकिस्तान ने जूनागढ़ का पाकिस्तान में मिलने का विलयीकरण स्वीकार कर लिया है। जूनागढ़ भौगोलिक रूप से भारत से घिरा हुआ था और इसकी सीमा पाकिस्तान से नहीं लगती थी। फिर भी, नवाब ने पाकिस्तान के साथ को विलय के समझौते (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए, और पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्ना ने इस विलय को औपचारिक मंजूरी भी दे दी।

जब नवाब ने अपनी पकड़ मज़बूत की, तो काठियावाड़ के पड़ोसी राज्यों जैसे मंगरोल और बाबरियावाड़, जहाँ हिंदू आबादी ज़्यादा थी, ने मामले अपने हाथ में ले लिए। उन्होंने जूनागढ़ से अपनी आज़ादी का ऐलान किया और 19 सितंबर, 1947 को भारत में शामिल हो गए थे। नवाब जूनागढ़ ने इन राज्यों को डराना धमकाना शुरू कर दिया। मांगरोल के शेख ने तो ऐलान भी कर दिया कि वह भारत का आधिपत्य स्वीकार नहीं करेगा। 21 सितंबर को नवाब जूनागढ़ ने बाबरियावाड पर हमला बोल दिया। जूनागढ़ में आक्रमण पाकिस्तान की शह पर हो रहा था। हालांकि इसके लिए पाकिस्तान का कोई औचित्य नहीं था। पाकिस्तान का यहां कोई सामरिक या आर्थिक स्वार्थ नहीं था, क्योंकि वह भारतीय प्रदेश के भीतर स्थित था। किन्तु जिन्ना तो ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी’ वाली अपनी आदत से बाज़ नहीं आने वाला था। लेकिन यहां उसका जुआ कामयाब नहीं हुआ। भारत सरकार से संरक्षण मांगने पर, बाबरियावाड को सहायता भेजने के पहले सरदार पटेल ने पाकिस्तान सरकार को लिखा कि जूनागढ़ ने भारत की भूमि पर आक्रमण किया है और भारत की धरती से फौरन सेना हटा ली जाए। लेकिन जूनागढ़ की सेना नहीं हटाई गई। जब शाहनवाज़ भुट्टो ने मना कर दिया, तो पटेल ने कड़े कदम उठाए और शांति बहाल करने के लिए सेना भेजने की तैयारी की। हालांकि, उस समय जवाहरलाल नेहरू ने कूटनीतिक हल का इंतज़ार करना बेहतर समझा।

इस दौरान जूनागढ़ में हालात काफ़ी ख़राब हो गए थे। अशांति बढ़ने लगी। नवाब की तरफ से न्याय का कोई संकेत न मिलने पर, लोगों ने मोर्चा संभाला। जनता द्वारा विलय का तीव्र विरोध किया गया। 25 सितंबर, 1947 को मुंबई के माधवबाग हॉल में शामलदास गांधी (महात्मा गांधी के भतीजे) के नेतृत्व में हुई एक मीटिंग में, काठियावाड़ में जूनागढ़ के लोगों की ओर से एक "अंतरिम सरकार" ('अर्जी हुकूमत'), अर्ज़ी हुकूमत बनाई गई। रतुभाई अडानी जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के नेतृत्व में, अर्ज़ी सेना ने जूनागढ़ को आज़ाद कराने के लिए ऑपरेशन शुरू किए। उनकी हिम्मत ने काठियावाड़ के सभी लड़ाकों को प्रेरित किया। 30 सितंबर को, अर्ज़ी सेना ने राजकोट में जूनागढ़ हाउस पर कब्ज़ा कर लिया और जल्द ही जूनागढ़ की सीमाओं की ओर बढ़ गई।

नवाब के खिलाफ आंतरिक विद्रोह भड़क गया और राज्य की आर्थिक नाकाबंदी कर दी गई। काठियावाड़ के कांग्रेसी कार्यकर्ता गांधीजी से दिल्ली आकर मिले। गांधीजी ने उन लोगों से कहा कि आप अहिंसक सत्याग्रह करें, जूनागढ़ के नवाब को झुकना पड़ेगा। गांधीजी ने कहा कि उन्हें ज़रा भी शक नहीं था कि अगर जूनागढ़ के लोग अहिंसक तरीके से एकजुट हो जाएं और यह तय कर लें कि वे किसी भी ऐसी सत्ता को नहीं मानेंगे जो उनकी इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करती, तो शासक को उनके फ़ैसले के आगे झुकना ही होगा। "इतना ही नहीं, इस तरह जूनागढ़ कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए रास्ता बना सकता है और इस तरह कश्मीर के मुद्दे का भी अपने-आप समाधान निकल सकता है।"

सरदार पटेल के कहने पर, काठियावाड़ डिफेंस फोर्स ने नवानगर, भावनगर और पोरबंदर की सेनाओं के साथ मिलकर प्रोविजनल गवर्नमेंट के साथ सहयोग करना शुरू कर दिया। 22 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना ने मानावदर में प्रवेश किया। सवा महीने की प्रतीक्षा के बाद 1 नवंबर, 1947 को भारत सरकार के सैनिकों ने मांगरोल और बाबरियावाड जाकर वहां से जूनागढ़ के सैनिकों को बाहर किया। जनआंदोलन चल रहे थे। दुकानदारों ने हड़ताल कर दी थी। आवश्यक चीज़ों की कमी हो गई थी। लोगों ने नवाब से असहयोग कर दिया था। जूनागढ़ के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने वहां अस्थायी सरकार की घोषणा कर दी थी। अस्थायी सरकार की सेना एक के बाद दूसरे स्थान पर क़ब्ज़ा करती हुई आगे बढ़ रही थी।

राज्य की 80% हिंदू आबादी और 'अर्जी हुकूमत' (विद्रोहियों की अंतरिम सरकार) के भारी विरोध के कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर देख, जूनागढ़ का नवाब अपनी बेगम के साथ राज्य का बेहिसाब धन लेकर, शाही खजाने के साथ, अपने प्यारे कुत्तों को भी साथ लेकर 26 अक्टूबर 1947 को कराची भाग गया।

नवाब के जाने के बाद, शाहनवाज़ भुट्टो के पास कोई चारा नहीं बचा था।  नवाब के दीवान (प्रधानमंत्री) ने राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारत सरकार से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। उसे एहसास हो गया था कि पाकिस्तान जूनागढ़ की रक्षा नहीं कर सकता और भारतीय सेना के समर्थन से जनता का विद्रोह सफल हो गया है। उसने जल्द ही मुहम्मद अली जिन्ना को हार मानते हुए एक संदेश भेजा और जूनागढ़ को भारत को सौंपने की अपनी तैयारी बताई। अपनी जान को खतरे में देख जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो ने 8 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ भारत में शामिल होने का ऐलान कर दिया। इसके बाद भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर नियंत्रण कर लिया। जूनागढ़ का भारत में विलय 9 नवंबर, 1947 को हुआ था। 9 नवंबर, 1947 की शाम को ब्रिगेडियर गुरदयाल सिंह की लीडरशिप में इंडियन आर्मी मजेवाड़ी गेट से जूनागढ़ में घुसी। ऐतिहासिक ऊपरकोट किले पर शान से तिरंगा फहराया गया। रीजनल कमिश्नर नीलम बुच ने जूनागढ़ गजट के ज़रिए ऐलान किया कि उस शाम 7 बजे से, भारत सरकार राज्य पर पूरा कंट्रोल कर लेगी। राजकोट के क्षेत्रीय आयुक्त ने जूनागढ़ के शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। शाहनवाज भुट्टो भी किसी तरह से जान छुड़ाकर पाकिस्तान भाग गया। इसके साथ ही नवाब का राज खत्म हो गया और अर्ज़ी हुकूमत ने अपना मिशन पूरा करने के बाद अपनी मर्ज़ी से खुद को खत्म कर लिया। पूरे काठियावाड़ में लोगों ने जश्न मनाया, राष्ट्रीय झंडा लहराया और देशभक्ति के गाने गाए।

भारत सरकार ने राजकोट में अपने क्षेत्रीय आयुक्त (Regional Commissioner) से राज्य के प्रशासन का कामकाज संभालने को कहा। लेकिन क्षेत्रीय आयुक्त के कामकाज संभालने से पहले ही, भुट्टो कराची में नवाब से जा मिला और वहाँ से भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ प्रशासन को अपने नियंत्रण में लेने की कार्रवाई को "गैर-कानूनी" बताते हुए उसकी निंदा करने लगा!

पाकिस्तान सरकार ने जूनागढ़ को भारत में शामिल करने का विरोध शुरू कर दिया। जब नवाब ने अपनी जनता की इच्छा के खिलाफ काम किया था, तो पाकिस्तान सरकार ने उसे सही ठहराया था, लेकिन जब उन्हें जनता की इच्छा का सम्मान करना पड़ा, तो सरकार ने उनके उस कदम को मानने से इनकार कर दिया। सरकार ने कहा कि जूनागढ़ के पाकिस्तान में शामिल होने के बाद, न तो वहां के शासक और न ही दीवान को भारत के साथ किसी भी तरह का समझौता (चाहे वह अस्थायी हो या स्थायी) करने का कानूनी अधिकार था। उसने भारत सरकार के इस कदम को "पाकिस्तान के इलाके का साफ़ उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय कानून को तोड़ने वाला काम" बताया।

तब गांधीजी ने कहा था, समस्त देश प्रजा का है। कोई राजा या नवाब उसका लेन-देन करने का अधिकारी नहीं है। जूनागढ़ कहां जाएगा यह निर्णय वहां की प्रजा लेगी।

फरवरी, 1948 में जनमत संग्रह हुआ और 1,90,779 मतों में से केवल 91 मत पाकिस्तान में सम्मिलित होने के पक्ष में पड़े। वहां की जनता भारत में सम्मिलित होना चाहती थी। जनमत संग्रह के बाद जूनागढ़ को आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बना लिया गया। पाकिस्तान ने जनमत संग्रह की वैधता को मानने से इनकार कर दिया और इसे भारत सरकार के खिलाफ एक शिकायत के तौर पर बनाए रखा।

गांधीजी के सचिव प्यारेलाल लिखते हैं, भारत में ब्रिटिश शासन के अंत तक, जिन्ना और मुस्लिम लीग ने "हेड्स आई विन, टेल्स यू लूज़" (यानी हर हाल में अपनी जीत) वाले सिद्धांत का फ़ायदा उठाया। उन्हें यह फ़ायदा ब्रिटिश सत्ता की मौजूदगी के कारण राजनीतिक प्रगति पर वीटो (रोक लगाने) के अधिकार से मिला था। इस अधिकार की वजह से वे बहुमत को अपनी हर मांग मानने के लिए मजबूर कर पाते थे। लीग के 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' का पूरा विचार, उसका उदय और उसका अंत—सब ब्रिटिश मौजूदगी से पैदा हुए अस्वाभाविक हालात का नतीजा था। जूनागढ़ की घटना एक अहम मोड़ साबित हुई।

20 जनवरी, 1949 को जूनागढ़ को नए बने सौराष्ट्र राज्य में आधिकारिक तौर पर  मिला दिया गया। बाद में, जब सौराष्ट्र गुजरात में शामिल हो गया, तो जूनागढ़ राज्य का एक अहम हिस्सा बन गया। आज, यह भारत की एकता, मज़बूती और लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसे की निशानी है। जूनागढ़ के विलय की कहानी सिर्फ़ राजनीतिक सीमाओं के बारे में नहीं है। यह आम लोगों की हिम्मत, सरदार पटेल की दूर की सोच और काठियावाड़ राज्यों की एकजुट ताकत के बारे में है। एकता, हिम्मत और देशभक्ति ने एक रियासत के संघर्ष को भारतीय इतिहास का एक गर्व भरा अध्याय बना दिया।

जूनागढ़ में पाकिस्तान के घुसने का कोई भी जायज़ कारण नहीं था। जूनागढ़ भारतीय इलाके के अंदर था और उसमें पाकिस्तान का कोई रणनीतिक या आर्थिक हित नहीं था। वास्तव में जिन्ना को न तो जूनागढ़ पाने में कोई रुचि थी, न ही उससे पाकिस्तान को कोई आर्थिक लाभ था। कांग्रेस का विरोध करना जिन्ना की आदत बन चुकी थी। वह तो जूनागढ़ के बहाने भारत को परेशान करना चाहता था। लेकिन जिन्ना की कूटनीतिक पैंतरेबाज़ी फेल हो गई। जिन्ना को बड़ी निराशा हाथ लगी। उसका यह दाव नाकाम रहा। जब उसने यही खेल कश्मीर में — जो उसका अगला निशाना था — खेलने की कोशिश की, तो वह खुद ही अपनी चाल में फंस गया।

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

रविवार, 12 जुलाई 2026

सूफ़ीमत... 7. सूफ़ीमत का विकास प्रथम चरण -2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

7. सूफ़ीमत का विकास प्रथम चरण -2

अधिकांश सूफी और विद्वान सूफ़ीमत या तसव्वुफ़ को इस्लाम का आंतरिक और आध्यात्मिक भाग मानते हैं, जो शरीयत के साथ मिलकर धर्म को पूर्ण करता है, लेकिन फ़क़ीह (धर्मशास्त्री) इसे इस्लाम से अलग मानते रहे। उनके ऐसा मानने का कारण यह था कि प्रारंभिक सूफ़ियों ने इस्लाम की प्रवृत्ति मूलक भावना के विपरीत उसमें भक्ति का समावेश किया और आत्मा के शुद्धिकरण पर बल दिया। पारंपरिक फ़क़ीह शरिया (इस्लामी कानून और बाहरी कर्मकांडों) के पालन को ही सच्चा धर्म मानते थे। इसके विपरीत, सूफी आंतरिक आस्था और ईश्वर से प्रेम (एहसान) को सर्वोच्च मानते थे और कई बार बाहरी नियमों की तुलना में आध्यात्मिक अनुभव को अधिक महत्व देते थे। सूफियों की कई प्रथाओं को रूढ़िवादी विद्वान बिदअत (धर्म में अनुचित बदलाव) मानते थे। सूफी संतों का मानना है कि तसव्वुफ़ कोई अलग धर्म नहीं, बल्कि कुरान और सुन्नत (पैगंबर की शिक्षाओं) का आध्यात्मिक पहलू है (जैसे हदीस-ए-जिब्रईल में 'एहसान' की अवधारणा)। इमाम गजाली (Imam Ghazali) और हज़रत मुजद्दिद अलिफ़ सानी जैसे महान विद्वानों ने तसव्वुफ़ को शरीअत का रूह (आत्मा) कहा है। उनके अनुसार, जिस तरह फ़िक़्ह (न्यायशास्त्र) बाहरी अंगों के नियमों की व्याख्या करता है, उसी तरह तसव्वुफ़ आंतरिक हृदय (दिल) को शुद्ध करता है। इब्न तैमियाह जैसे विद्वानों ने तसव्वुफ़ के उन रूपों की कड़ी आलोचना की, जिनमें गैर-इस्लामी रहस्यवाद, संतों की पूजा या संगीत और नृत्य (समां) जैसी बातें शामिल थीं। वे इन्हें सुन्नत से बाहर और एक नई परंपरा (बिदअत) मानते थे। हालाँकि, उन्होंने प्रामाणिक सूफियों और उनके आध्यात्मिक लक्ष्यों का सम्मान भी किया।

आरम्भिक सूफ़ीमत में दार्शनिक सिद्धांतों और जटिल बौद्धिक तर्कों का अभाव था, क्योंकि यह कोई अकादमिक दर्शन (Philosophy) नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक और अनुभवात्मक रहस्यवादी मार्ग था। यह चरण शुष्क और औपचारिक धार्मिक कर्मकांडों के विरुद्ध एक व्यावहारिक और भावनात्मक रहस्यवादी आंदोलन था। आरम्भिक सूफियों का जोर तार्किक बहस और बौद्धिक चिंतन के बजाय 'ईश्वरीय प्रेम' (इश्क), वैराग्य, 'रहस्यवादी अनुभूति' (मारेफत) और कुरान की शिक्षाओं के आंतरिक मर्म पर केंद्रित था (जैसे 'हज़रत हसन अल-बसरी' और ' हज़रत राबिया' के उपदेश)। सातवीं से नवीं शताब्दी के बीच सूफियों का मुख्य ध्यान अत्यधिक सांसारिक विलासिता का विरोध, पश्चाताप, ईश्वर का भय और निरंतर प्रार्थना (ज़िक्र) पर था। आरम्भिक सूफ़ियों का ध्यान सिद्धांतों को गढ़ने पर नहीं था। उनका सारा ध्यान कुरआन के गूढ़ और आध्यात्मिक अर्थों को समझने पर केंद्रित था, न कि नए दर्शन बनाने पर। हज़रत अलहसन, हज़रत इब्राहीम बिन अधम और हज़रत अयाज के विचारों से सूफ़ीमत अपना आधार ग्रहण करने लगा। इस काल के प्रमुख साधकों में इमाम हसन बसरीइब्राहीम बिन आहज़रत अबू हाशिम तथा हज़रत रबिया बसरी के नाम प्रमुख हैं। धीरे-धीरे सूफ़ीमत का प्रारंभिक रूप हज़रत हसन बसरी रह. और हज़रत राबिआ बसरी रह. के विचारों में दिखाई दिया। इस काल में रिज़ा (संतोष) को प्रधानता देकर एकान्त जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया जाता था। वे मानते थे ईश्वर के समक्ष सभी समान है। मानव की सेवा करना ईश्वर की सेवा करना है। उनके अनुसार भूखों को भोजन कराना, गरीबों के कष्टों को दूर करना, सेवा भाव से समाज से जुड़ना ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा है।

7.3 हज़रत हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह (642-728)

बसरा के हज़रत हसन उन लोगों के वर्ग के थे जिन्होंने पैगंबर को तो नहीं लेकिन उनके साथियों (सहाबा) और उनके साथियों के साथियों (ताबिईन) को देखा था जो मान्यता हज़रत हसन बसरी रह. और हज़रत राबिआ बसरी रह. को मिली, वो प्रारंभिक सूफ़ियों में किसी को हासिल न थी। उन्हें आरम्भिक सूफीमत का प्रवर्तक माना जाता है। प्राय: सभी सूफ़ी उन्हें अपनी परंपरा से मानते हैं हज़रत हसन बसरी रह. का जन्म मदीना मुनव्वरा में 642 . में एक निर्धन परिवार में हुआ। उनका जन्म पैगंबर मुहम्मद साहब के निधन के लगभग नौ वर्ष बाद हुआ। उनके जन्म पर खलीफा-ए-राशिन हज़रत उमर फारूक (रज़ि.) ने दुआ फरमाई थी, "हे अल्लाह! इसे धर्म (दीन) का गहरा ज्ञान दे और इसे लोगों का प्रिय बना।" उनकी माँ का नाम ख़ैरा और पिता का नाम यासर था। कहा जाता है कि उनकी मां हज़रत मुहम्मद स. की पत्नी आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की परिचारिका थीं, जिस वजह से बचपन में उन्हें कई महान सहाबा इकराम की संगति और आशीर्वाद मिला चौदह-पंद्रह वर्ष की अवस्था तक हज़रत हसन बसरी रह. मदीने में ही रहे। चिश्तिया और सुहरवर्दिया सूफ़ियों की अवधारणा है कि इल्मे बातिन, जिसे ख़िरक़ा पहनाने की रस्म के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, हज़रत हसन बसरी रह. को हज़रत अली ज़ियल्लाहु अन्हु से प्राप्त हुआ। 14 वर्ष की आयु में वे हज़रत अली इब्न अबी तालिब (रज़ि.) के मुरीद बने और उनसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। सूफी मत में ज्ञान का सिलसिला हज़रत अली के माध्यम से उन तक पहुँचता है।

वे त्यागी, गुणवान और भगवत्प्रेमी थे तसव्वुफ़ की ओर पूरी तरह आने से पूर्व हज़रत हसन बसरी के जीवन पर कुछ घटनाओं का गहरा प्रभाव पड़ा।

एक बार एक शराबी लड़खड़ाती चाल से चला आ रहा था। हज़रत हसन बसरी ने देखा कि सामने गड्ढा है और वह उसमें गिर सकता है। उन्होंने उसे सतर्क करते हुए कहा कि सावधानी से चलो नहीं तो गड्ढ़े में गिर जाओगे। उस शराबी ने हज़रत हसन बसरी को जवाब दिया हसन यदि मैं गिरूंगा तो केवल मेरे शरीर को चोट पहुंचेगी। तुम अपना विशेष ख़याल रखो, इसलिए कि यदि तुम गिर गये तो तुम्हारी सारी इबादत ख़ाक में मिल जायेगी।

इसी तरह की एक और घटना है जिसने हज़रत हसन बसरी के जीवन को बहुत प्रभावित किया।

एक सुन्दर महिला गली से गुज़र रही थी। उसका सिर खुला हुआ था और वह अपने पति को याद करते हुए कुछ बड़बड़ा रही थी। हज़रत हसन बसरी ने उससे सिर ढकने के लिए कहा। उस महिला ने पहले तो आभार व्यक्त किया फिर कहा, हसन ये बताओ कि मैं तो अपने पति की मुहब्बत में ऐसी दिवानी हूं कि मुझे ये भी होश नहीं कि मेरा सिर खुला हुआ है या ढंका हुआ, यदि तुम न बताते तो मुझे इसका ख़याल भी न रहता। पर मुझे आश्चर्य है कि तुम अल्लाह से मुहब्बत के दावे करते हो फिर भी तुम्हें इतना होश रहता है कि तुम हर वो चीज़ जो तुम्हारे रास्ते में आती है उसके प्रति चौकन्ने रहते हो। यह अल्लाह से तुम्हारी किस प्रकार की मुहब्बत है ?

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, हज़रत हसन बसरी का प्रारंभिक जीवन एक सफल जौहरी के रूप में बीता। एक घटना में बैजेंटाइन (रोमन) साम्राज्य के दरबार में एक युवा राजकुमार की मृत्यु पर हुए शोक ने उनके हृदय में दुनिया की नश्वरता का अहसास कराया। उनका मन दुनिया से उचट गया। इसके बाद उन्होंने सांसारिक मोह-माया त्याग दी और अपना जीवन पूरी तरह से अल्लाह की इबादत और ज्ञान के प्रचार में लगा दिया सादगी और संन्यास को अपने जीवन का आधार बनाया। उनकी शिक्षाओं में आत्म-चिंतन, सांसारिक लालच से दूरी और परलोक की तैयारी पर अत्यधिक बल दिया गया

बसरा को सूफ़ी मतावलंबी विरक्तों का केन्द्र बनाने का सबसे पहला प्रयास हज़रत हसन बसरी  रह. ने किया। हज़रत अली (रज़ि.) के खिलाफत काल के दौरान सिफ्फीन की जंग के बाद पैदा हुए राजनीतिक हालातों के कारण, हज़रत हसन बसरी रह. 656-657 ई. में सपरिवार मदीने से बसरा आकर बस गये, जहां उन्होंने ज्ञान (इल्म) और सूफी मत (तसव्वुफ़) का उपदेश फैलाना शुरू किया। धीरे-धीरे वह इस शहर की सबसे बड़ी धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान बन गए। इसी वजह से उनके नाम के साथ 'बसरी' यानी "बसरा वाले हसन" जुड़ा उस समय बसरा इस्लामी ज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र माना जाता था। वहाँ की मुख्य मस्जिद सहाबा तथा ताबिईन (वे लोग जिन्होंने सहाबा से इस्लाम की शिक्षा हासिल की थी, लेकिन वे पैगंबर मुहम्मद से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल सके थे) से भरी रहती थी। हज़रत हसन बसरी रह. के व्याख्यानों में बड़ी संख्या में विद्वजन एकत्र होते थे। हज़रत  राबिआ  बसरी रह. भी नियमित रूप से इन व्याख्यानों से लाभान्वित होती थीं।

वे बेहद निडर थे और उमय्यद खलीफाओं व गवर्नरों (जैसे हज्जाज बिन यूसुफ) की गलत नीतियों और पाखंड की खुलकर आलोचना करते थे। उमय्यद खलीफाओं के काल में जब इस्लामी साम्राज्य में विलासिता और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ बढ़ रही थीं, तब उन्होंने इसके विरोध में वैराग्य का मार्ग चुना। हालाँकि उन्होंने राजनीति में कोई सक्रिय भाग नहीं लिया, फिर भी उमय्यदों के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में, उन्हें इमाम हुसैन के प्रति सहानुभूति थी। मुस्लिम जगत की तत्कालीन कलह पूर्ण, अशांत स्थिति ने सहृदय लोगों की एक बड़ी संख्या को अंतर्मुखी बना दिया। ये लोग सूफ़ के वस्त्र पहनते थे। उन दिनों उन्होंने दुनियादारी, धर्मपरायणता और तपस्या की ओर एक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व किया जिसमें ईश्वर के भय का तत्व प्रमुख था। हज़रत हसन बसरी रह. ने अन्तर्जगत और बाह्यजगत के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया। सूफ़ीधारियों को सदाचार पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए आत्मिक शक्ति को जाग्रत करने की ओर प्रवृत्त किया। उन्होंने सिखाया कि ईमान केवल बाहरी दिखावे या उम्मीदों का नाम नहीं है, बल्कि यह वह सच्चाई है जो दिल में बैठ जाए और कर्मों से साबित हो। उनकी शिक्षाओं का मुख्य आधार 'ज़ुहद' (वैराग्य) और 'ख़ौफ़' (ईश्वर का भय) था। वे मानते थे कि संसार एक धोखा है और मनुष्य को अपने पापों के लिए हमेशा सचेत रहना चाहिए। उनका मानना था कि संसार एक पुल है जिस पर से होकर आत्मा को परमात्मा की ओर जाना है और बुद्धिमान लोग पुल पर मकान नहीं बनाते हैं। सांसारिकता और आख़िरत (परलोक) के ऊपर अपने विचार रखते हुए हज़रत हसन बसरी रह. का मानना था कि दुनिया और आख़िरत की मिसाल पूर्व और पश्चिम जैसी है। यदि इंसान एक की दिशा में बढता जाएगा तो दूसरे से सहज ही दूर हो जाएगा। उनका कहना था, "इस दुनिया से सावधान रहो, क्योंकि यह सांप के समान है, स्पर्श करने में चिकना है, लेकिन इसका जहर घातक है ... इस दुनिया से सावधान रहें, क्योंकि इसकी आशाएं झूठ हैं, इसकी अपेक्षाएं झूठी हैं।" उनका एक बहुत प्रसिद्ध कथन (अकवाल, अरबी शब्द 'क़ौल' का बहुवचन है,) है: "जब दुनिया की मोहब्बत इंसान के दिल में दाखिल होती है, तो आख़िरत (परलोक) का खौफ उससे निकल जाता है।"

वे अक्सर उदास रहते थे और रोते थे। उनका मानना था कि नरक के भय और ईश्वर के न्याय के सामने हंसना मूर्खता है हज़रत हसन बसरी रह. अक्सर कहा करते थे कि लोग उस सांसारिकता के पक्षधर क्यों हैं जिसका अन्त क़ब्र है। वे उपदेश देते थे कि व्यक्ति को दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने मन की शुद्धि (तज़किया-ए-नफ़्स) पर ध्यान देना चाहिएउनका मानना था कि आत्मशुद्धि के द्वारा ही परमात्मा को पाया जा सकता है उनकी सीख थी, अपने दिल की फिक्र करो, क्योंकि अल्लाह की नजर तुम्हारे चेहरों पर नहीं बल्कि तुम्हारे दिलों पर होती है। वह कहते थे, जो इंसान अपनी गलतियों पर शर्मिंदा नहीं होता, उसका दिल धीरे-धीरे आध्यात्मिक रूप से मर जाता है। सांसारिक बंधनों के मायाजाल को काटने के बाद ही मनुष्य परमात्मा को पाने की आशा रख सकता है इस संसार में नफ़्स (अहं) से अधिक सरकश कोई जानवर नहीं जो सख़्ती से लगाम के लायक़ हो। वे यह ही मानते थे कि अहंकार के रहते कोई प्रेम नहीं कर सकता। अहंकार प्रेम की संभावनाओं को नष्ट कर देता है और अहंकार के विसर्जन से व्यक्ति के अंदर प्रेम प्रवाहित होने लगता है। ऐसे में उसका हृदय जागृत अवस्था में आ जाता है। हज़रत हसन बसरी की अवधारणा थी कि बुद्धिमान बोलने से पहले सोचता है और मूर्ख बोलने के बाद उनका दृढ़ विश्वास था कि झूठा व्यक्ति सबसे अधिक नुक़सान ख़ुद को पहुंचाता है उनका कहना था कि इस संसार को अपनी सवारी समझो और उसपर नियंत्रण रखो। यदि तुम इस पर सवार हुए तो ये तुम्हें मंजिल तक ले जायेगी और यदि तुमने इसे ख़ुद पर सवार कर लिया तो समझो तुम्हारे हिस्से में केवल ज़िल्लत है वह कहा करते थे, आदम के बेटे! तू और कुछ नहीं बल्कि दिनों का एक मजमुआ है, जब एक दिन गुजरता है तो तेरा एक हिस्सा कम हो जाता है।

हज़रत हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह के जीवन का शमऊन आतिश परस्त (अग्नि पूजक) के साथ का वाकया इस्लामी सूफी इतिहास में अल्लाह की रहमत और इंसान के तौबा (प्रायश्चित) का एक बेहद भावुक और प्रसिद्ध उदाहरण है। शमऊन नाम का एक व्यक्ति हज़रत हसन बसरी का पड़ोसी था। वह एक "आतिश परस्त" (यानी आग की पूजा करने वाला / पारसी) था। उसने लगभग 70 साल तक आग की इबादत की थी। जब वह बूढ़ा हुआ और मरने के करीब पहुंचा, तो हज़रत हसन बसरी उसके पास गए। हज़रत हसन बसरी ने शमऊन को मरणासन्न स्थिति में देखकर कहा: "शमऊन! तुमने पूरी जिंदगी आग की पूजा की, जो कि अल्लाह की बनाई हुई एक मखलूक (चीज) है। तुमने 70 साल तक इसे पूजा, लेकिन अगर तुम आज इसमें हाथ डालो, तो यह तुम्हें भी जला देगी। यह वफादार नहीं है। लेकिन मेरा अल्लाह ऐसा है कि अगर मैं 70 साल तक गुनाह भी करूं और एक बार सच्चे दिल से तौबा कर लूं, तो वह मुझे जहन्नुम (नरक) की आग से बचा लेगा। इसलिए, तुम अब भी इस्लाम स्वीकार कर लो ताकि तुम्हारी आख़िरत सुधर जाए।" शमऊन ने रोते हुए कहा, "हसन! मैं जानता हूं कि तुम्हारा दीन (धर्म) सच्चा है। लेकिन मेरे दिल में तीन डर हैं जो मुझे रुकने पर मजबूर कर रहे हैं: पहला तो मुझे यह डर है कि मेरे कौम के लोग मुझे ताना मारेंगे। दूसरा मुझे डर है कि अल्लाह मेरे 70 साल के गुनाहों को माफ नहीं करेगा। और तीसरा सबसे बड़ा डर यह है कि मेरे पास कोई लिखित गारंटी नहीं है कि इस्लाम लाने के बाद मुझे सीधे जन्नत मिलेगी।" हज़रत हसन बसरी ने तुरंत कहा, "मैं तुम्हें इस बात की लिखित गारंटी (दस्तावेज़) देता हूं कि अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाते हो, तो तुम्हारी मगफिरत (मुक्ति) की जिम्मेदारी मेरी होगी।" उन्होंने एक कागज पर यह बात लिख कर शमऊन को दे दी। हज़रत हसन बसरी की इस बात और दस्तावेज़ से शमऊन का दिल पिघल गया। उसने तुरंत सच्चे दिल से कलमा पढ़ा और इस्लाम कुबूल कर लिया। उसने वसीयत की: "जब मैं मर जाऊं, तो मुझे मुसलमानों के तरीके से गुस्ल (स्नान) और कफन देना, और हसन बसरी का लिखा हुआ यह कागज मेरे हाथ में रख कर मुझे दफना देना।" कुछ ही देर बाद शमऊन का इंतकाल (निधन) हो गया। शमऊन को दफनाने के बाद हज़रत हसन बसरी बहुत चिंतित हो गए। वे रात भर सो नहीं पाए और खुद से कहने लगे, "हसन! तूने यह क्या किया? तू तो खुद अल्लाह के रहमो-करम पर है, फिर तूने किसी दूसरे की जन्नत की गारंटी कैसे लिख कर दे दी?" वे इसी पछतावे और डर में डूबे थे। उसी रात उन्हें एक रूहानी ख्वाब आया। उन्होंने ख्वाब में देखा कि शमऊन एक बेहद खूबसूरत बाग (जन्नत) में सोने का ताज पहने हुए टहल रहा है। हज़रत हसन बसरी ने ख्वाब में उससे पूछा, "शमऊन! सुनाओ, तुम्हारे साथ क्या मामला हुआ?" शमऊन ने मुसकुराते हुए जवाब दिया: "ऐ हसन! अल्लाह ने मुझ पर बहुत बड़ा करम किया। जैसे ही मैंने कलमा पढ़ा, मेरे 70 साल के गुनाह माफ हो गए। और सुनो, तुम्हारा वह कागज अब मुझे वापस चाहिए, क्योंकि अल्लाह ने मुझे बिना किसी सिफारिश के ही अपनी रहमत से जन्नत अता कर दी है।" जब हज़रत हसन बसरी सुबह सोकर उठे, तो वह लिखित कागज (दस्तावेज़) उनके तकिए के नीचे रखा हुआ था, जबकि उसे कब्र के अंदर शमऊन के हाथ में रखा गया था। यह देखकर हज़रत हसन बसरी रो पड़े और अल्लाह का शुक्र अदा किया। इस वाकये से यह सीख मिलती है कि इंसान चाहे पूरी जिंदगी गुमराह रहा हो, लेकिन अगर मौत से पहले वह सच्चे दिल से तौबा कर ले, तो अल्लाह उसे माफ कर देता है।

हज़रत हसन बसरी इमाम अली (र.अ.) के समय के बहुत बड़े आलिम थे। वे उच्च कोटि के हदीस कथावाचक थे। नौ प्रसिद्ध इस्लामी किताबों में 1400 से अधिक हदीसें उनके माध्यम से संकलित हैं। वे अपनी धर्मपरायणता, उत्कृष्ट वक्तृत्व कला और वैराग्य के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उन्होंने न केवल कुरान की संक्षिप्त व्याख्याएं कीं, बल्कि लोगों को पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) द्वारा बताए गए रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी। सूफी मत के चिश्ती, कादिरी, सुहरावर्दी और नक्शबंदी सिलसिलों की आध्यात्मिक कड़ियां (शजरा) हज़रत हसन बसरी के माध्यम से ही हज़रत अली (रज़ि.) और पैगंबर साहब तक पहुंचती हैं।

उनका निधन छियासी वर्ष की अवस्था में 11 अक्टूबर, 728 ई. को बसरा, इराक में हुआ। उनकी जनाजे की नमाज में बसरा के इतने लोग शामिल हुए थे कि उस दिन इतिहास में पहली बार इतिहास के अनुसार वहां की मुख्य मस्जिद में असर की नमाज जमात के साथ नहीं हो सकी थी क्योंकि पूरी जनता जनाजे में शामिल होने कब्रिस्तान चली गई थी। इराक के बसरा में स्थित उनका मज़ार आज भी श्रद्धा का केंद्र है।

7.4 हज़रत राबिया बसरिया रह. (मृ. 717-801 ई.)

हज़रत हसन बसरी  रह. की समकालीन हज़रत राबिया अल अदाविया अल बसरी रह. स्वार्थ-रहित ईश-प्रेम में मतवाली एक  प्रसिद्ध महिला फ़क़ीर साधिका और कवयित्री थीं। उन्होंने सूफीवाद (तसव्वुफ़) में "बिना किसी स्वार्थ के केवल अल्लाह से सच्ची मोहब्बत" (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) की बुनियाद रखी। सूफी परंपरा में उन्हें उनके बेमिसाल त्याग और इबादत के कारण बहुत ऊंचा मकाम हासिल है। उनका जन्म 717 ई. में इराक के बसरा शहर में हुआ था। हज़रत राबिया को सूफीवाद की पहली महिला संत माना जाता है। मशहूर सूफ़ी और 114 किताबों के लेखक हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. ने अपनी किताब तज़किरत उल औलिया में हज़रत राबिया रह. की जीवनी विस्तार से लिखी है। वह एक निर्धन माता-पिता की पुत्री थीं। फरीद अल-दीन अत्तार के अनुसार, जिस रात उनका जन्म हुआ उस रात घर में दीपक जलाने के लिए भी तेल नहीं था। उनकी मां ने उनके पिता से किसी पड़ोसी से तेल मांगकर लाने के लिए कहा वे बाहर निकले लेकिन यह काम उन्हें उचित नहीं लगा वह ख़ुदा के अलावा किसी से कुछ नहीं मांगते यहां तक कि पड़ोसियों से भी कुछ न लेते। वे ख़ाली हाथ लौट आए दुखी होकर सो गए कहा जाता है कि उसी रात पिता को स्वप्न आया। कोई कह रहा था दुखी न हो यह बच्ची परमात्मा की प्रिय है। आगे चलकर वह बड़ी संत बनेगी। कालान्तर में उन्होंने ईश्वर से 'निःस्वार्थ प्रेम' का अनूठा आध्यात्मिक संदेश दिया।

वे अपने माता-पिता की चौथी बेटी थीं, उनकी तीन बहनें उनसे बड़ी थीं उनका नाम राबिया (जिसका अर्थ अरबी में 'चौथी' होता है) रखा गया क्योंकि वह तीन बहनों के बाद पैदा हुईं थीं। कुछ साल बाद ही हज़रत राबिया रह. पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके माता-पिता का देहांत हो गया। बसरा में भयानक अकाल पड़ा, जिसमें उनकी तीनों बहनें उनसे बिछड़ गईं। वह बिलकुल अनाथ और अकेली रह गईं कहा जाता है कि उन्हें किसी व्यक्ति ने पकड़कर केवल छह दरहम में दासी के रूप में बेच दिया था। इसके बाद तो ऐसा लगता था कि उन पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। दासता के भीषण-से-भीषण कष्टप्रद क्षणों में भी उन्होंने ईश्वर के साथ अपना संबंध बनाए रखा। हर कष्ट में उन्होंने ईश्वर को पुकारा।  हज़रत राबिया दिनभर उपवास करतीं, और अपने मालिक का काम करतीं और रात-भर परमात्मा का ध्यान लगाए पैरों पर खड़ी रहतीं कहा जाता है कि कष्टों की आग में तपकर ईश्वर की प्रार्थना में लीन हज़रत राबिया रह. के चेहरे पर प्रकाश आ गया था एक रात उनके मालिक की नींद खुल गयी उसने घर की खिड़की से हरत राबिया को देखा वह उस समय माथा झुकाए प्रार्थना कर रही थीं, हे खुदाबन्द, तुम तो मेरे दिल की बात जानते हो कि मैं बराबर तुम्हारी सेवा में लगे रहना चाहती हूँ, लेकिन तुमने तो मुझे एक दूसरे व्यक्ति का गुलाम बना रखा है जब वह प्रार्थना में लीन थीं तब उनके माथे के पास बिना किसी सहारे के एक दीपक लटक रहा था जिससे सारा घर प्रकाशित था यह अलौकिक मंजर देखकर मालिक डर गया और उसे अहसास हुआ कि यह कोई आम दासी नहीं बल्कि अल्लाह की वली (संत) हैं। दूसरे दिन उस आदमी ने हज़रत राबिया से नरमी से बात की  और उन्हें छोड़ दिया।

आज़ादी के बाद उन्होंने दुनियावी सुख-सुविधाओं और लालच को पूरी तरह त्याग दिया और एक छोटी सी झोपड़ी में एकांतवास चुनकर सादगी से जीवन बिताया। हज़रत राबिया रेगिस्तान में अपने आध्यात्मिक सफ़र पर निकल पड़ीं। उन्होंने हज़रत हसन बसरी रह. को अपना मुर्शीद (गुरु) बनाया। वह परमेश्वर के प्रति एकांतनिष्ठता का भाव रखती थीं। उन्होंने अपने अपार सन्तोष, अद्भुत सहनशीलता और नितान्त दरिद्रतापूर्ण जीवन-यापन द्वारा विरक्तों के लिए जीवन-व्यवहार का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके विचारों में प्रेम का उदात्त रूप दिखाई पड़ा फिर भी वह तवक्क़ुल (आत्मसमर्पण) के भाव को बनाए रखना अपना कर्तव्य समझती थीं। उन्होंने सांसारिक त्याग पर बल  दिया और यह बताया कि आध्यात्मिक उपलब्धि ईश्वर को अपने भीतर खोज लेने में है। उनके पास सामान के नाम पर एक टूटा घड़ा, एक चटाई और एक ईंट थी। चटाई पर वे साधना करती थीं और ईंट उनका तकिया थी। उन्हें सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह नहीं था गुनाहों के लिए पश्चाताप की भावना को वह परमात्मा की देन समझती थीं वह ख़ुदा के प्रेम में इस तरह तदाकार हो गई थीं कि शेष सृष्टि के प्रति न तो उन्हें प्रेम रहा और न घृणा ही। हज़रत राबिया बसरी ने सूफीवाद को एक बिल्कुल नया दृष्टिकोण दिया। उनसे पहले लोग जहन्नुम (नरक) के डर या जन्नत (स्वर्ग) के लालच में इबादत करते थे, लेकिन राबिया ने निस्वार्थ प्रेम सिखाया।

वे पूरी उम्र अविवाहित रहीं और मानवता की शिक्षा देती रहीं। उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध मनीषियों द्वारा शादी के कई प्रस्तावों के बावजूद ब्रह्मचर्य का जीवन अपनाने का फैसला किया। परमात्मा के प्रति उनका प्रेम इतना अधिक था कि उन्हें किसी दूसरी चीज़ की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी उनका मानना था कि प्रेम द्वारा ही परमात्मा की प्राप्ति संभव है किसी समय सूफ़ी हज़रत अबू हसन रह. ने उनसे पूछा, क्या तुम्हें विवाह करने की इच्छा है? हज़रत राबिया बसरिया रह. ने जवाब दिया, क्या शरीर संबंधी विवाह? मेरा शरीर ही कहां रह गया है? मैंने तो उसे ईश्वर के प्रति पूरी तरह से उत्सर्ग कर दिया है। अब तो वह उसी के अधीन है। वह एक मात्र उसी के काम में व्यस्त रहा करता है।

एक बार हज़रत हसन बसरी ने राबिया बसरी के पास शादी का पैग़ाम भेजा। राबिया बसरी ने कहा, "मैं शादी के लिए तैयार हूँ, बशर्ते आप मेरे चार सवालों के सही जवाब दे दें:" "जब मेरी मौत होगी, तो मेरा अंत ईमान (विश्वास) पर होगा या बिना ईमान के?" "जब मुझे कब्र में रखा जाएगा, तो मुनकर-नकीर (फ़रिश्ते) के सवालों के जवाब मैं दे पाऊँगी या नहीं?" "क़यामत के दिन जब लोगों को सीधे और उल्टे हाथ में कर्मों की किताब (नामा-ए-अमाल) दी जाएगी, तो मुझे किस हाथ में मिलेगी?" उस दिन जब एक समूह जन्नत में और दूसरा जहन्नुम में जाएगा, तो मैं किस समूह में होऊँगी?" हज़रत हसन बसरी ने रोते हुए कहा, "राबिया! इन छिपे हुए रहस्यों को अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। मैं इनके जवाब कैसे दे सकता हूँ?" राबिया बसरी ने फरमाया, "जब मुझे इन चार पहाड़ों जैसे संकटों का सामना करना है, तो मैं शादी और दुनिया के झंझटों में अपना दिल कैसे लगा सकती हूँ? मुझे सिर्फ अल्लाह की इबादत की फिक्र है।"

इसी तरह यह भी कहा जाता है कि एक बार सपने में स्वयं पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ने उनसे पूछा, क्या तुम मेरे प्रति किसी प्रकार का प्रेम भाव रखती हो? तो हज़रत राबिया बसरिया ने कहा, हे अल्लाह के रसूल, ऐसा कौन होगा जो आपसे प्रेम न करता हो? किंतु अल्लाह के प्रेम ने मुझपर इस प्रकार अधिकार कर लिया है कि मेरे हृदय में उसके अलावा किसी अन्य से प्रेम या घृणा तक करने के लिए स्थान नहीं है। ये बातें साबित करती हैं कि हज़रत राबिया बसरिया को प्रेम-भक्ति में पूरी अनन्यता का भाव था और वह पूर्ण आत्मसमर्पण कर चुकी थीं।

एक बार हज़रत राबिया अपने परमात्मा के चिन्तन में डूबी हुई थी, तभी एक सुबह उकी एक परिचारिका ने उसे कहा बाहर आकर परमात्मा की सुन्दर कृति को देखो। उन्होंने कोठरी में से ही जवाब दिया, तु भीतर आकर उन वस्तुओं को बनाने वाले को देखो। निर्माता के चिंतन ने मुझे उस के चिंतन से दूर कर दिया है जो उसने बनाया है?

सूफी परंपरा में हज़रत राबिया रह. को बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है, जहां उन्होंने ईश्वर से सिर्फ जन्नत की चाहत या जहन्नुम के डर से नहीं, बल्कि खालिस (सच्ची) मोहब्बत से इबादत करना सिखाया। ऐसा कहा जाता है कि सूफ़ी हज़रत अबू हसन रह. एक दिन हज़रत राबिया बसरिया रह. की कुटिया में इस उद्देश्य से छुप गए कि इबादत के समय हज़रत राबिया बसरिया रह. प्रभु से क्या मांगती है, यह जान सकें। कुछ समय के बाद हज़रत राबिया बसरिया रह. की प्रभू से प्रार्थना शुरू हुई। वह प्रार्थना करने लगीं, हे प्रभू! यदि मैं नरक के भय से आपकी पूजा-प्रार्थना करती होऊं, तो तू मुझे नरक की आग में जला दें। यदि स्वर्ग के लोभ से मैं आपकी सेवा-प्रार्थना करती होऊं, तो स्वर्ग का द्वार मेरे लिए हमेशा के लिए बंद कर दें। परंतु हे परमेश्वर अगर मैंने आपकी उपासना केवल आपको पाने के लिए की हो, तो आप मुझे अपनी कृपादृष्टि से कभी महरूम न करें। हज़रत राबिया बसरिया रह. की प्रार्थना सुनकर हज़रत अबू हसन रह. की आंखें खुल गईं।

रहस्यवाद में हज़रत राबिया बसरिया रह. का मुख्य योगदान ईश्वर के प्रति स्वार्थ-रहित प्रेम का उनका सिद्धांत था जो उनके लिए एक मकसद और लक्ष्य दोनों के रूप में कार्य करता था। उनके तप और अन्य सांसारिकता का मार्गदर्शक उद्देश्य नरक का भय या स्वर्ग का प्रतिफल नहीं था। बल्कि उन्होंने इस बात पर ज़ोर देने की कोशिश की कि एक व्यक्ति जो ईश्वर के साथ मिलन का दावा करता है, उसे दोनों से बेख़बर होना चाहिए।

हज़रत हसन बसरी और राबिया बसरी एक ही दौर में बसरा में थे। हज़रत हसन बसरी अक्सर राबिया बसरी की आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता का सम्मान करते थे। एक दिन हज़रत हसन बसरी एक नदी के किनारे बैठे थे। उन्होंने राबिया बसरी को आते देखा। अपनी आध्यात्मिक शक्ति (करामात) दिखाने के लिए हसन बसरी ने अपना मुसल्ला (नमाज़ की चटाई) पानी की सतह पर बिछा दिया और उस पर खड़े होकर कहा, "राबिया! आओ, यहाँ पानी पर नमाज़ पढ़ते हैं।"  हज़रत राबिया बसरी ने मुसकुराते हुए अपना मुसल्ला हवा में उड़ा दिया और उस पर बैठ कर कहा, "हसन! पानी के ऊपर तो सूखी लकड़ियां और तिनके भी तैर लेते हैं, और हवा में मक्खियां और परिंदे भी उड़ लेते हैं। यह कोई बड़ी बात नहीं है। असली कमाल तो वह है जो इन सब दिखावों से ऊपर उठकर अल्लाह की रज़ा हासिल करे।" हज़रत हसन बसरी को अपनी इस चूक का अहसास हुआ और उन्होंने स्वीकार किया कि आध्यात्मिक ऊंचाइयों में दिखावे या करामात की कोई जगह नहीं है, केवल अल्लाह के प्रति निश्छल प्रेम ही सब कुछ है।

एक बार कुछ फ़क़ीर हज़रत राबिया के पास आए। उन्होंने पूछा: तुम भगवान की पूजा क्यों करते हो? एक ने कहा: नरक में सात चरण होते हैं, और सभी को उनसे गुजरना पड़ता है; इसलिए मैं उनके भय से पूजा करता हूं। एक अन्य ने उत्तर दिया: स्वर्ग के आठ चरण हैं, जो बहुत प्रसन्नता के स्थान हैं और एक उपासक को वहां पूर्ण विश्राम का वादा किया जाता है। हज़रत राबिया ने उत्तर दिया: वह एक बुरा साधक है जो दंड या इनाम की इच्छा के डर से ईश्वर की पूजा करता है। उन्होंने हज़रत राबिया से पूछा: जब जन्नत की इच्छा नहीं है तो आप पूजा क्यों करते हैं? हज़रत राबिया ने उत्तर दिया: मैं पड़ोसी के घर (यानी, स्वर्ग) के लिए पड़ोसी को पसंद करती हूं। उन्होंने कहा कि डर या इनाम का कोई मकसद न होने पर भी भगवान पूजा के योग्य हैं। कहा जाता है कि एक दिन हज़रत राबिया एक हाथ में आग और दूसरे हाथ में पानी लेकर दौड़ रही थीं। लोगों ने उनसे उनकी इस हरकत का मतलब पूछा। उन्होंने उत्तर दिया: मैं स्वर्ग में आग जलाने और नरक में पानी डालने जा रही हूं ताकि तीर्थ-यात्रियों से दोनों परदे पूरी तरह से ग़ायब हो जाएं और उनका उद्देश्य सुनिश्चित हो सके, और भगवान के सेवक उन्हें बिना किसी आशा या मकसद के देख सकते हैं। हज़रत राबिया के अनुसार, उनके ईश्वर से इस निःस्वार्थ प्रेम का उद्देश्य ईश्वर के साथ एकता थी।

उन्होंने अपना पूरा जीवन अल्लाह की इबादत में गुजार दिया। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं और चमत्कार आज भी लोगों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। हज़रत राबिया बसरी ने लगभग 80 वर्ष से अधिक की आयु पाई। 801 ई. में उनका देहांत हुआ। उनकी दरगाह येरूशलम के क़रीब है, जहां इस राह के मुसाफ़िर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। सूफी जगत में आज भी उन्हें अदब और सम्मान से "दूसरी मरियम" कहकर याद किया जाता है।

***       ***       ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर