महात्मा गांधी हत्या केस-11
विनायक
दामोदर सावरकर-2
कुल 50 वर्ष की सज़ा
वीर सावरकर पर अदालती कार्रवाई हुई। 23 दिसंबर 1910 को देशद्रोह और भड़काऊ भाषण देने
से जुड़े मामले का फ़ैसला सुनाया गया और उन्हें दोषी मानते हुए अंडमान में काला पानी
भेजने की सज़ा सुनाई गई। इसका अर्थ था 25 साल की सज़ा। एक महीने बाद 30 जनवरी, 1911 को जैक्सन हत्याकांड (नासिक षड्यंत्र
केस) में उकसाने और
साजिश रचने के आरोप का फ़ैसला भी सुनाया गया। इस बार भी उन्हें काला पानी यानी 25 साल की सज़ा सुनाई
गई। इसका अर्थ ये था
कि वीर सावरकर पहले 25 साल की सज़ा पूरी
करेंगे और उसके बाद दूसरे 25 साल की यानी कुल मिलाकर 50 साल की सज़ा। इस फ़ैसले की पूरे यूरोप में व्यापक आलोचना
हुई। सज़ा काटने के लिए भारत से दूर पोर्ट ब्लेयर
के सेल्यूलर जेल यानी 'काला पानी' भेज दिया गया। उन्हें 4 जुलाई 1911 को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की कुख्यात सेल्यूलर जेल (काला पानी) भेजा गया, जहाँ उन्होंने लगभग 10 वर्ष अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बिताए। उन्हें
698 कमरों की सेल्यूलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया। सावरकर के लिए एकमात्र
सुकून की बात ये थी कि उन्हें जेल की उसी कोठरी में रखा गया जिसमें एक समय बाल गंगाधर
तिलक रहे थे। 2 मई 1921 को उन्हें अंडमान से भारत की मुख्य भूमि पर
लाकर रत्नागिरी और फिर यरवदा जेल में स्थानांतरित किया गया। 6 जनवरी 1924 को उन्हें कुछ शर्तों के साथ यरवदा जेल से
रिहा कर दिया गया, जिसके तहत वे राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे
और उन्हें रत्नागिरी जिले में ही रहना था। साल 1937 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी की नवनिर्वाचित सरकार
ने उन पर लगे सभी प्रतिबंध हटाकर उन्हें बिना शर्त पूरी तरह आजाद कर दिया। इस
प्रकार सावरकर ने लगभग 13 वर्ष 6 महीने जेल में बिताए और इसके बाद 13 वर्षों तक वे रत्नागिरी में नजरबंद
(प्रतिबंधों के अधीन) रहे।
अंडमान-निकोबार स्थित इस
जेल का इस्तेमाल ब्रिटिश काल में राजनीतिक क़ैदियों को रखने के लिए किया जाता था।
बहुत से लोग इसे काला पानी के नाम से भी बुलाते हैं। आज यह एक राष्ट्रीय स्मारक है।
जेल का निर्माण कार्य
1896 में शुरू हुआ और ये 1906 में बनकर पूरा हुआ। इमारत के लिए ईंटें बर्मा से लाई गई थीं। जेल
सात हिस्सों में बंटा है। आज़ादी के बाद दो खंड को ध्वस्त कर दिया गया। सेल्यूलर
जेल (काला पानी) का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक और
संघर्षपूर्ण अध्यायों में से एक है। ब्रिटिश सरकार ने इसका निर्माण मुख्य रूप से क्रांतिकारियों को समाज से पूरी तरह अलग करने और उनके हौसलों को
तोड़ने के लिए किया था। इस जेल का नाम 'सेल्यूलर' इसलिए पड़ा क्योंकि यहाँ
सामूहिक बैरक नहीं थे। इसमें कुल 698 छोटी कोठरियाँ (Cells) बनाई गई थीं, ताकि हर कैदी को पूरी तरह अकेला रखा जा सके। यह विशाल इमारत एक
केंद्रीय वॉच टावर से जुड़ी सात शाखाओं (विंग्स) के रूप में फैली थी। केंद्रीय
टावर से गार्ड सभी कोठरियों पर नज़र रख सकते थे, लेकिन
कैदी एक-दूसरे को नहीं देख पाते थे।
क़ैदियों से कोल्हू से नारियल
का तेल और सरसों का तेल
निकालने जैसे काम करवाए जाते थे और उन्हें
बाथरूम जाने के लिए भी इजाज़त लेनी होती थी। तय मात्रा में तेल न निकालने पर
उन्हें कोड़ों से बेरहमी से पीटा जाता था। ज़ंजीरों
का इस्तेमाल बहुत आम बात थी। फांसी की सज़ा पाए क़ैदियों को यहां सूली पर लटकाया
जाता था। 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस द्वीप पर जापान ने कब्ज़ा कर लिया
था और अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ा था। हालांकि 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध ख़त्म होने पर ये फिर से अंग्रेज़ों के
क़ब्ज़े में आ गया। जेल में अब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पड़ावों को समर्पित
कई गलियारे देखे जा सकते हैं। इस जेल में कुल 693 कमरे थे। सेल बहुत छोटा
था और बस छत के पास एक रोशनदान हुआ करता था। जेल को 1969 में एक राष्ट्रीय स्मारक
में तब्दील कर दिया गया। यह जेल अब भारतीयों के लिए 'स्वतंत्रता
सेनानियों के बलिदान का प्रतीक' है और पर्यटक यहां जाते हैं। कालापानी के कठोर कारावास को झेलकर
शायद ही कोई बच पाता था।
अंडमान में सरकारी अफ़सर
बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे। वहाँ ढंग की
सड़कें नहीं होती थीं और इलाक़ा भी पहाड़ी होता था। जब क़ैदी बग्घियों को नहीं
खींच पाते थे तो उनको गालियाँ दी जाती थीं और उनकी पिटाई होती थी। उन्हें जेल के
साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमि व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना
होता था। रुकने पर उनको कड़ी सज़ा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थी। उन्हें
बस जीने के लिए खाना दिया जाता था। परेशान करने वाले क़ैदियों को कई दिनों तक पनियल
सूप दिया जाता था। उनके अलावा उन्हें कुनैन पीने के लिए भी मजबूर किया जाता था।
इससे उन्हें चक्कर आते थे। कुछ लोग उल्टियाँ कर देते थे और कुछ को बहुत दर्द रहता
था। सभी क़ैदियों को शौचालय ले जाने का समय नियत रहता था और शौचालय के अंदर भी
उन्हें तय समय-सीमा तक रहना होता था। कभी-कभी क़ैदी को जेल के अपने कमरे के एक कोने
में ही मल त्यागना पड़ जाता था। जेल की कोठरी की दीवारों से मल और पेशाब की बदबू
आती थी। कभी कभी क़ैदियों को खड़े खड़े ही हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनने की सज़ा दी
जाती थी। उस दशा में उन्हें खड़े खड़े ही शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता था। उल्टी
करने के दौरान भी उन्हें बैठने की इजाज़त नहीं थी।
सेल्यूलर जेल की तीसरी
मंजिल पर स्थित विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की कोठरी (Cell) इस जेल का सबसे
महत्वपूर्ण हिस्सा था। सावरकर यहाँ 4 जुलाई 1911 से 21 मई 1921 तक (लगभग 10 वर्ष) कैद रहे थे। उनके कैदी का बिल्ला नंबर 32778 था। यह कोठरी मात्र 13.5 फीट लंबी और 7.5 फीट चौड़ी थी। इसमें रोशनी और हवा के लिए फर्श से काफी ऊपर सिर्फ एक छोटी सी
वेंटिलेटर (लोहे की ग्रिल वाली खिड़की) बनाई गई थी। कोठरी के कोने में पानी वाला घड़ा
और लोहे का गिलास रहता था। कोठरी की जमीन कंक्रीट की थी, जिस
पर चटाई बिछाकर सोना पड़ता था। इसका दरवाजा भारी लोहे की सलाखों से बना था, जिसमें बाहर से बड़ा ताला लगाया जाता था। कोठरी के एक कोने में ही
मिट्टी के दो बर्तन शौच के लिए रखे होते थे। कैदियों को दिन में केवल एक बार इसे
साफ करने की अनुमति मिलती थी। अंग्रेजों ने सावरकर को पूरी तरह से तोड़ने के लिए
इस कोठरी को विशेष रूप से चुना था। क़ैद में वीर सावरकर के हाथों में हथकड़ियां और पैरों
में बेड़ियां जकड़ी रहती थीं। वीर सावरकर की कोठरी के ठीक सामने जेल का फांसी घर था। अंग्रेजों का मकसद यह था कि वीर सावरकर हर सुबह अन्य
क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकते देखें, ताकि उनका मानसिक हौसला
टूट जाए। यह कोठरी विंग के आखिरी छोर पर थी। उन्हें किसी भी अन्य कैदी से बात करने
या देखने की सख्त मनाही थी। वीर सावरकर के बड़े भाई गणेश
(बाबाराव) सावरकर भी उसी जेल में बंद थे, लेकिन जेल प्रशासन ने
उन्हें इस तरह अलग रखा कि दोनों भाइयों को एक साल से अधिक समय तक पता ही नहीं चला कि वे दोनों एक ही छत के नीचे हैं।
इस कोठरी की सबसे
विस्मयकारी गाथा वीर सावरकर का साहित्यिक सृजन है। जेल में पेन और कागज रखने की
सख्त पाबंदी थी। वीर सावरकर ने कोठरी की चूने पुती दीवारों
को ही अपना कागज बना लिया। उन्होंने जेल के पत्थरों, कीलों
और कांटों को कलम की तरह इस्तेमाल करके दीवारों पर 6,000 से अधिक कविताएँ और महान साहित्य खुरच कर
लिखा। वे अपनी लिखी कविताओं को याद कर लेते थे और जब कोई कैदी रिहा होता, तो उसे याद करवाकर भारत भेजते थे। आज यह कोठरी भारत का एक पवित्र
ऐतिहासिक स्थल है। कोठरी के अंदर वीर सावरकर का एक आदमकद
चित्र, एक छोटा बिस्तर और उनके बर्तन स्मृति के रूप में रखे
गए हैं। उनके सम्मान में इस पूरे परिसर की सुरक्षा के लिए एक विशेष गार्ड हमेशा
तैनात रहता है और पोर्ट ब्लेयर के हवाई अड्डे का नाम भी इन्हीं के नाम पर 'वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' रखा
गया है।
‘मेरा आजीवन कारावास‘ में वीर सावरकर लिखते हैं
कि उन्हें भी कोल्हू के बैल का काम दिया गया था। उससे पहले उनसे छिलका कुटवाने का काम
लिया जाता था। अचानक एक दिन अंग्रेजों ने कहा कि ये करते-करते उनके हाथ कठोर हो गए
होंगे, इसीलिए अब उन्हें कोल्हू वाला काम दिया जा रहा है। इस काम से उनका सिर
चकराता था। लंगोटी पहन कर कोल्हू में काम लिया जाता था। वो भी दिन भर। शरीर इतना
थका होता था कि उनकी रातें करवट बदलते-बदलते कटती थी। अन्य बंदीगण वीर सावरकर से
प्रेम करने लगे थे, इसीलिए वो आकर उनकी मदद कर देते थे। उनके कपड़े तक धो देते थे और
बर्तन माँज देते थे। वीर सावरकर के रोकने के बाद वो मिन्नतें करने लगते थे, जिसके बाद वीर सावरकर ने उन्हें मना करना छोड़ दिया क्योंकि उन
बंदियों को इसमें ही ख़ुशी होती थी। धीरे-धीरे यातनाएँ और भी असह्य होती चली गईं। इतनी
भयंकर यातनाएँ दी जातीं और वहाँ से निकलने का कोई मार्ग था नहीं, भविष्य अंधकारमय लगता- जिससे वो सोचते रहते कि वो फिर देश के किसी
काम आ पाएंगे भी या नहीं। एक बार कोल्हू पेरते-पेरते उन्हें चक्कर आ गया और फिर
उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया। वीर सावरकर लिखते हैं कि उनके मन और बुद्धि में उस
दौरान तीव्र संघर्ष चल रहा था और बुद्धि इसमें हारती हुई दिख रही थी।
यहाँ से वीर सावरकर की दूसरी जिंदगी शुरू होती है। वीर सावरकर काफी देर तक उस खिड़की को देखते रहते, जहाँ से लटक कर पहले भी क़ैदियों ने आत्महत्या की थी। कई दिनों तक सोचने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि अगर मरना ही है तो एक ऐसा कार्य कर के मरें, जिससे लगे कि वो सैनिक हैं। सोच-विचार के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि कई अन्य क़ैदियों के मन से भी आत्महत्या का ख्याल निकालने में सफलता पाई। वहाँ उन्होंने कोल्हू पर ही संगठन का काम शुरू किया, बंदियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, उन्हें देशप्रेम सिखाया। अंग्रेज़ उन्हें बाकी बंदियों से दूर रखना चाहते थे। उन्हें बाद में रस्सी बाँटने का काम दे दिया गया था।
वहाँ अंडमान में कई राजबंदी रहा करते थे। वीर
सावरकर उनसे जब पहली बार मिले, तभी उन्हें उनके दुखों का अंदाज़ा हो गया था। उन्होंने अंग्रेजों के भय को दरकिनार कर के उनसे सबका परिचय लिया।
उसी समय उन्होंने उन सभी से कहा था कि देखना, एक
दिन जब भारत आज़ाद होगा तो इसी जेल में हम सबके पुतले लगे होंगे।
11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 30 अगस्त 1911 को उन्होंने अपनी पहली याचिका
लगाई, वहाँ पहुंचने के डेढ़ महीने के अंदर। ब्रिटिश
प्रशासन ने 3 सितंबर 1911 को इस पहली याचिका को खारिज कर दिया था। इसके
बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को याचिका लगाई। जेल के
रिकॉर्ड बताते हैं कि वहाँ हर महीने तीन या चार क़ैदियों
को फाँसी दी जाती थी। अपने
ऊपर दया करने की गुहार करते हुए उन्होंने वीर सरकार से ख़ुद को भारत की किसी जेल
में भेजे जाने की प्रार्थना की थी।
आलोचक इसे सावरकर द्वारा अंग्रेजों के सामने माफी
मांगना और आत्मसमर्पण करना मानते हैं। लेकिन यह जेल
से बाहर निकलने और पुनः देश सेवा में सक्रिय होने की एक कूटनीतिक रणनीति (Tactical Move) थी, जो उस समय के कैदियों के लिए एक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा थी। बाद
में वीर सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार
पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी
वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं। वीर सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, "अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का
अधिकार छीन लिया जाता।" उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो
जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे। 1921 में उन्हें कालापानी से मुक्ति मिली। उनके समर्थकों ने उनकी भव्य आगवानी की और
उन्हें ‘स्वतंत्र वीर’ कहा। मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, लेखक, कवि और नाटक व फिल्म कलाकार पीके
अत्रे ने पुणे में वीर सावरकर के लिए एक स्वागत
कार्यक्रम आयोजित किया। अत्रे ने वीर सावरकर को उपाधि दी 'स्वातंत्र्यवीर'। यही उपाधि बाद में सिर्फ 'वीर' हो गई और सावरकर के नाम के साथ जुड़ गई।
वीर सावरकर ने
जेल में रहते हुए ब्रिटिश सरकार को कई दया याचिकाएँ (मर्सी पिटीशन) भेजी थीं। इन याचिकाओं में उन्होंने भविष्य में
राजनीति से दूर रहने और संवैधानिक सुधारों के दायरे में काम करने की बात कही थी। इन याचिकाओं के आधार पर ब्रिटिश प्रशासन
ने 6 जनवरी
1924 को उन्हें अंडमान से हटाकर मुख्य भूमि की
जेलों और अंततः रत्नागिरी में नजरबंद करने का निर्णय लिया। उन्हें मुख्य भूमि पर लाया गया और रत्नागिरी
स्थानान्तरित कर दिया गया था। उन्हें रत्नागिरी की सीमाओं में कैद रखा गया। उन्हें
आदेश था कि रत्नागिरी ज़िले की हद से वह बाहर नहीं जा सकते हैं। वीर सावरकर को जेल से दो शर्तों के आधार पर छोड़ा गया था, एक यह कि वो
किसी राजनैतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे और दूसरे वो रत्नागिरि के ज़िला
कलेक्टर की अनुमति लिए बिना ज़िले से बाहर नहीं जाएंगे। अंग्रेजों ने उन्हें
रत्नागिरि के समुद्र तटीय शहर में एक घर दिया, जहाँ
वे 1937 तक रहे। अंग्रेज़ उनको नज़रबन्दी भत्ता दिया करते थे, साठ रुपए महीना। उनकी हर गतिविधि पर ब्रिटिश खुफिया तंत्र की कड़ी
नजर रहती थी। वे लगभग 13 वर्षों तक (1937 तक) रत्नागिरी में ही नजरबंद रहे। राजनीति
से प्रतिबंधित होने के कारण सावरकर ने अपना पूरा ध्यान हिंदू समाज के सुधार और संगठन पर केंद्रित
किया। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ अभियान चलाया और सभी जातियों के लिए पतित पावन मंदिर की स्थापना की। उन्होंने
जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए अंतरजातीय भोज और मेल-मिलाप के कार्यक्रम आयोजित
किए।
अंडमान से वापस आने के बाद वीर सावरकर ने एक पुस्तक लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?' जिसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक
राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया। यह आधुनिक भारतीय राजनीति और
राष्ट्रवाद का एक प्रमुख वैचारिक ग्रंथ है। इस वैचारिक पुस्तिका में उन्होंने 'हिंदू' पहचान और 'हिंदुत्व' की अवधारणा को स्पष्ट किया है। सावरकर ने इसे
रत्नागिरी जेल में कैद के दौरान लिखा था। यह पहली बार 1923 में प्रकाशित हुई थी। पुस्तक के अनुसार, हिंदू वह व्यक्ति है जो भारत भूमि को अपनी
पितृभूमि (पूर्वजों की भूमि) और पुण्यभूमि मानता है। इस परिभाषा के तहत भारत में
जन्मी परंपराएं जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म मानने वाले लोग भी हिंदू राष्ट्र की
सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माने गए हैं। वीर सावरकर का राष्ट्रवाद केवल एक
राजनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत पर आधारित था।
हिन्दू महासभा के कार्यक्रम उसकी
अखिल भारतीय समिति द्वारा तय किए जाते थे। वर्किंग कमिटी को अनिवार्य रूप से उसे
क्रियान्वयन करना होता था। हिन्दू महासभा का वार्षिक सम्मेलन दिसम्बर, 1946 में गोरखपुर
में जब हुआ था, उस सम्मेलन में सावरकर शामिल नहीं हुए थे। क्योंकि पिछले तीन-चार सालों से उनकी तबीयत
बहुत ख़राब रह रही थी। वे सक्रिय रूप से महासभा की गतिविधियों में भाग नहीं ले पा
रहे थे। वे अपने घर से बहुत कम ही निकलते थे, वह यदि कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन
हो और वह भी उनके घर के आस-पास ही। वे बहुत विद्वान व्यक्ति
थे और अंग्रेज़ी और मराठी के देश के सबसे बड़े और प्रखर वक्ता थे। वीर सावरकर की छवि को उस समय बहुत धक्का लगा जब 1948 में गांधी हत्याकांड में शामिल होने के लिए आठ लोगों के साथ उन्हें
भी गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में वो बरी हो गए।
वीर सावरकर के जीवन के आख़िरी दो दशक
राजनीतिक एकाकीपन में बीते। लाल किले में चल रहे मुक़दमें में जज ने उन्हें बरी
किया और नथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई। दुनिया में शायद
ही कोई ऐसा उदाहरण मिले जो क्रांतिकारी कवि भी हो, साहित्यकार भी
हो और अच्छा लेखक भी हो। अंडमान की जेल में रहते हुए पत्थर के टुकड़ों को कलम बना
कर जिसने 6000 कविताएं दीवार
पर लिखीं और उनको कंठस्थ किया। यही नहीं पाँच मौलिक पुस्तकें वीर सावरकर के खाते
में हैं।
विनायक दामोदर सावरकर का निधन 26 फ़रवरी 1966 को हुआ था।
महात्मा गांधी 1 मार्च 1927 को रत्नागिरी गए थे और वहां
नजरबंद विनायक दामोदर
सावरकर (वीर सावरकर) से
मिलने उनके घर पहुंचे थे। गांधीजी अपने देशव्यापी प्रवास और आंदोलन के सिलसिले में रत्नागिरी में थे, जहां उन्होंने
बीमार सावरकर से उनके आवास पर
जाकर शिष्टाचार भेंट की थी। इस मुलाकात के दौरान दोनों के बीच छुआछूत, सामाजिक सुधार
और शुद्धि आंदोलन जैसे विषयों पर बातचीत हुई थी। गांधीजी और वीर सावरकर ने स्वीकार किया
कि उनके राजनीतिक और वैचारिक रास्ते अलग-अलग हैं, फिर भी दोनों ने
एक-दूसरे के प्रति आदरभाव व्यक्त किया था।
इसी रत्नागिरी में एक दिन नाथूराम सावरकर से
मिलने उनके घर पहुंचा। नाथूराम के पिता
(जो डाक विभाग में काम करते थे) का तबादला रत्नागिरी में हुआ था। इसके बाद गोडसे
का पूरा परिवार वहां रहने चला गया। रत्नागिरी पहुंचने के महज तीन दिनों के
भीतर ही नाथूराम, वीडी सावरकर से
मिलने उनके घर पहुंच गया था। अनजाने में गोडसे परिवार रहने के लिए रत्नागिरी की
जिस गली में रुका था, वह वही जगह थी जहां वीर सावरकर पहले रहा करते थे। हालांकि, जब नाथूराम उनसे
मिलने गया, तब सावरकर उसी
गली के दूसरे छोर पर स्थित एक नए घर (बंगले) में शिफ्ट हो चुके थे, जहां वे ब्रिटिश
सरकार की नजरबंदी (हाउस अरेस्ट) में रह रहे थे। इसी घर पर दोनों की पहली मुलाकात
हुई, जिसके बाद गोडसे
वीर सावरकर के विचारों से गहराई से प्रभावित होता चला गया। उसके जीवन की धारा ही
बदल गई। वह नियमित रूप
से वीर सावरकर से मिलने लगा। मानो उसे गुरु मिल गया हो। वह जल्द ही उनका एक
उत्साही भक्त बन गया। उनके सानिध्य में नाथूराम ने धाराप्रवाह अंग्रेज़ी लिखना और
बोलना भी सीख लिया। 1931 में विनायक गोडसे की सेवानिवृत्ति हुई और गोडसे परिवार
सांगली में बस गया। परिवार का वित्तीय बोझ उठाने के लिए नाथूराम ने दर्ज़ी का काम
सीख लिया और एक दुकान भी खोल ली। पर इससे गुज़ारा नहीं चलता था, तो फल भी बेचने लगा। नाथूराम जब सांगली में था तब उसने
1932 में आरएसएस ज्वाइन किया था। ऐसा माना
जाता है कि वह जब तक ज़िंदा रहा तब तक संघ का बौद्धिक कार्यवाह रहा।
इसी समय कुछ लोगों ने नागपुर में
हिन्दू संगठन का गठन किया। जब इस संगठन की एक शाखा सांगली में खुली तो नाथूराम
इसमें शामिल हो गया। 1937 के चुनावों के बाद बंबई समेत कई प्रांतों में कांग्रेस
की सरकार ने कार्यभार संभाला। बंबई की कांग्रेस सरकार ने जो अपना पहला काम किया वह
था अंग्रेज़ों द्वारा वीर सावरकर के ऊपर लगाई पाबंदी को हटाने का। वीर सावरकर अब
स्वतंत्र थे और बंबई आ गए। हिन्दू संगठन के बैनर तले वे महाराष्ट्र के विभिन्न
हिस्सों में भाषण देने लगे। सांगली में जब उनका कार्यक्रम निश्चित हुआ तो हिन्दू
संगठन के स्थानीय शाखा के सचिव होने के नाते इसके आयोजन की सारी जिम्मेदारी
नाथूराम के कंधों पर थी। वीर सावरकर रत्नागिरी के दिनों से ही उसे जानते थे। कुछ
दिन उनके साथ बिताने के बाद नाथूराम को सांगली छोड़ देने का ख़्याल आया और उसने वीर सावरकर
के नज़दीक रहने का फैसला किया। अपनी दुकान बंद कर वह पूना आ गया।
वीर सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू
संगठन हिन्दू महासभा बन गया। उसका लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का था।
नाथूराम हिन्दू महासभा का एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया। रत्नागिरी में तो उसे
प्रशिक्षण मिल ही चुका था, वह हिंदू वर्चस्ववादी विचारधारा का एक उपदेशक बन गया।
हैदराबाद के निज़ाम के विरुद्ध चल रहे संघर्षों में से एक का उसने नेतृत्व भी किया,
जहां उसे 1938 में गिरफ़्तार कर लिया गया। उसे एक वर्ष की सज़ा हुई थी। जेल से रिहा
होने के बाद नाथूराम पूना आ गया। हिन्दू महासभा में वह सक्रिय हो गया। 1940 में
उसकी मुलाक़ात एक ऐसी शख़्स से होती है, जिससे उसका तार जीवन भर के लिए जुड़ गया। वह था नारायण डी. आप्टे।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर