मंगलवार, 5 मई 2026

480. विभाजन के काम में तेज़ी आई

राष्ट्रीय आन्दोलन

480. विभाजन के काम में तेज़ी आई

1947

जिस बात का गांधीजी को भय था, वह हो ही गई। भारत का बंटवारा होने को था, लेकिन विभाजन ऊपर से लादा नहीं जा रहा था। इसे नेहरू, पटेल और कांग्रेस के अधिकतर नेताओं ने स्वीकार कर लिया था। गांधीजी को इस निर्णय की बुद्धिमत्ता में गंभीर संशय था। जिन उत्पातों के डर के कारण कांग्रेसी नेताओं और ब्रिटिश सरकार के लिए विभाजन नितान्त आवश्यक हो गया था, उन्हीं उत्पातों और हिंसा के कारण गांधीजी विभाजन का दृढ़ता से विरोध कर रहे थे। उन्होंने कहा, देश में गृह-युद्ध के खतरे की वजह से विभाजन स्वीकार करने का अर्थ होगा, इस बात को मान लेना कि यदि उन्मत्त होकर हिंसा और उत्पात का यथेष्ट मात्रा में सहारा लिया जाए तो हर चीज प्राप्त की जा सकती है।

कई विद्वानों द्वारा गांधीजी की नाराज़गी और बेबसी की ओर अक्सर इशारा किया गया है। उनकी निष्क्रियता की व्याख्या इस रूप में की गई है कि उन्हें कांग्रेस की फ़ैसला लेने वाली परिषदों से ज़बरदस्ती अलग कर दिया गया था। कुछ विचारकों ने मानना है कि वे अपने शिष्यों, नेहरू और पटेल, की निंदा नहीं कर पाए जिन्होंने सत्ता के लालच के आगे घुटने टेक दिए थे। इन शिष्यों ने कई वर्षों तक, भारी निजी त्याग करके, पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण किया था। अगर सही आकलन करें तो गांधीजी की बेबसी की जड़ न तो जिन्ना की ज़िद थी, और न ही उनके शिष्यों की सत्ता की कथित लालसा। बल्कि उनके लोगों का सांप्रदायिकरण था। जून 1947 में अपनी प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा भी था कि कांग्रेस ने विभाजन इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि लोग यही चाहते थे: ‘यह मांग इसलिए मान ली गई, क्योंकि अपनों ने ही इसकी मांग की थी। कांग्रेस ने कभी इसकी मांग नहीं की थी... लेकिन कांग्रेस लोगों की नब्ज़ पहचान सकती है। उसे एहसास हो गया था कि खालसा और हिंदू, दोनों ही यही चाहते थे।’ हिंदुओं और सिखों की विभाजन की इसी चाहत ने उन्हें बेअसर, असहाय और शक्तिहीन बना दिया था। मुसलमान तो उन्हें पहले से ही अपना दुश्मन मानते थे। एक जन नेता, बिना उन लोगों के क्या कर सकता था, जो उसकी पुकार पर उसके पीछे चलने को तैयार हों? वह सांप्रदायिक लोगों के सहारे, सांप्रदायिकता से लड़ने का कोई आंदोलन कैसे खड़ा कर सकते थे? ऐसी कोई ‘सकारात्मक शक्तियां’ मौजूद नहीं थीं, जिनका सहारा लेकर गांधीजी कोई ‘कार्यक्रम तैयार कर सकते। 14 जून, 1947 को वे पूरी हिम्मत के साथ AICC की बैठक में गए और कांग्रेसियों से कहा कि वे मौजूदा हालात में बँटवारे को एक ऐसी ज़रूरत मानकर स्वीकार कर लें जिससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन लंबे समय में इसे अपने दिल से स्वीकार न करके इसका विरोध करें। उन्होंने इसे अपने दिल से कभी स्वीकार नहीं किया और अपने लोगों पर अपना भरोसा बनाए रखा। उन्होंने अकेले ही आगे बढ़ने का रास्ता चुना—नोआखली के गाँवों में नंगे पाँव घूमते हुए, बिहार के मुसलमानों को अपनी मौजूदगी से हिम्मत देते हुए, और कलकत्ता में अपनी बातों से समझाकर और अनशन की धमकी देकर दंगों को रोकते हुए। 'एकला चलो' लंबे समय से उनका पसंदीदा गीत रहा था—'अगर कोई तुम्हारी पुकार न सुने, तो अकेले चलो, अकेले चलो।' उन्होंने ठीक वैसा ही किया।

लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का काम पूरा करने के लिए अपने लिए तीन महीने का समय तय किया। यह कोई आसान काम नहीं था। विभाजन के काम में तेज़ी लाई गयी और लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने इस काम को तीन महीने से भी कम समय में सभी समस्याओं का हल निकाला, और अगस्त 1947 में भारत दो राष्ट्रों में विभाजित हो गया।

बंगाल में हिंदुओं की मांग थी कि वे भारत में रहें। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने जब देखा कि बंगाल के हिंदू विभाजन चाह रहे हैं तो उसे बहुत ईर्ष्या हुई। उसने सांप्रदायिकता पर अंकुश लगाने की कोशिश की लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। 20 जून को बंगाल विधान-सभा के हिन्दू बहुमत वाले प्रदेशों के सदस्यों ने बंगाल विभाजन का निर्णय किया। पूर्वी बंगाल का हिन्दू कलकत्ता में आ चुका था। लीग ने सुहरावर्दी की जगह ख़्वाजा नज़ीमुद्दीन को पूर्वी पाकिस्तान का मुख्यमंत्री मनोनीत कर दिया। कांग्रेस ने प्रफुल्ल चंद्र सेन को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। बंगाल का भी विभाजन हो गया।

मुसलमान तो चाहते थे कि आसाम भी हड़प लिया जाए, लेकिन गोपीनाथ बारदोलाई की सरकार ने स्थिति पर सख्ती से नियंत्रण रखा। इसलिए सारा आसाम तो बच गया लेकिन सिलहट ज़िले को पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाक़े के साथ जोड़ा गया।

पंजाब के सिख पाकिस्तान में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे। लीग ने दगाबाज़ी कर पंजाब के मुख्यमंत्री मलिक ख़िज्र हयात ख़ान की सरकार गिरा दी थी, लेकिन अपनी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई थी। लीग ने नेशनल गार्ड नामक संस्था चला कर वहां ख़ूब दंगे कराए। 4 मार्च को हिंदू सिखों ने मिलकर लाहौर में पाकिस्तान विरोधी दिवस मनाया था। पंजाब के गवर्नर ने गोली चलवा दी। कई लोग मारे गए। 5 मार्च को गवर्नर सर ईवांस जेकिंग ने विधान सभा स्थगित कर दी और शासन अपने हाथ में ले लिया। अब पंजाब में लीग को सुविधा हो गई। पंजाब के विभाजन का रास्ता खुल गया। मार्च के पहले सप्ताह में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बिना गांधीजी से सलाह मशवरा किए पंजाब को मुस्लिम बहुमत वाले और हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्रों में बांट देने का अपना प्रस्ताव पास किया। गांधीजी ने जब पटेल को पत्र लिखा कि आप अपना पंजाब संबंधी प्रस्ताव मुझे समझाने की कोशिश कीजिए। तो पटेल का जवाब आया, पंजाब संबंधी प्रस्ताव आपको समझाना कठिन है। स्थिति तेज़ी से बदल रही थी। कांग्रेसी नेता बिना गांधीजी की सलाह के महत्त्वपूर्ण निश्चय करने लगे थे। 23 जून को पंजाब बंटवारे का निर्णय कर दिया गया।

सिंध विधान सभा ने विशेष बैठक करके पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का बहुमत निर्णय किया। हालाकि AICC की बैठक में, सिंध के सदस्यों ने प्रस्ताव का ज़ोरदार विरोध किया था। बलूचिस्तान ने 29 जून को एक विशेष बैठक में पाकिस्तान में मिलने का निर्णय किया। ग़ैर मुसलिम सदस्यों की कोई राय नहीं ली गई।

पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में सरहद के पठान शुरू से गांधीजी की अहिंसा की नीति अपनाई थी और कांग्रेस का साथ दिया था। हालाँकि मौजूदा N.W.F.P. विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत था और उसने संविधान सभा में शामिल होने के पक्ष में मतदान भी किया था, फिर भी इस प्रांत पर भारत या पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के प्रश्न पर एक जनमत संग्रह (plebiscite) थोप दिया गया। यह जिन्ना के लिए चिंता का विषय था। उसे लगा कि अगर मतदान हुआ, तो यहां के लोग भारत के साथ रहने के प्रति वोट देंगे। इसलिए डॉ. ख़ान साहेब के नेतृत्व वाली वहां की कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने के लिए उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी।  सरहद के पठानों को पाकिस्तान की सांप्रदायिक मांग पसंद नहीं थी। डॉ. ख़ान साहेब के नेतृत्व में वहां कांग्रेस की सरकार थी। वायसराय के निजी कर्मचारी-मंडल के मुख्य अधिकारी लॉर्ड इस्मे ने इस स्थिति को वर्णसंकर स्थिति का नाम दिया था। इस प्रांत में द्विविध शासन प्रणाली थी। गवर्नर प्रांतीय सरकार का वैधानिक अध्यक्ष था। लेकिन क़बायली इलाक़ों में वह सम्राट के एजेण्ट का काम करता था। गवर्नर के रूप में तो उसे मंत्रियों की सलाह पर चलना पड़ता था, लेकिन सम्राट के प्रतिनिधि के तौर पर वह स्वतंत्र था। लेकिन वस्तुस्थिति यह थी कि वह मंत्रियों की परवाह किए बिना अपनी मनमानी चलाता था। इस कारण से गवर्नर और मंत्रिमंडल के बीच संबंध अच्छे नहीं थे। ऊपर से लीग के लोग हर काम में बाधा पहुंचाते ही रहते थे। गवर्नर उनको शह देता था। गवर्नर चाहता था कि लीगियों को मंत्रिमंडल में शामिल कर वहां मिश्र सरकार बनाई जाए। यदि उसकी बात न मानी गई तो वह मंत्रिमंडल बरख़ास्त कर देने की धमकी भी देता था।

लॉर्ड इस्मे के लिए, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत एक "अजीबोगरीब स्थिति" थी — एक ऐसा प्रांत जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी, लेकिन सत्ता में कांग्रेस की सरकार थी। खान साहब की सरकार के पास न केवल पूर्ण बहुमत था, बल्कि सीमांत विधानसभा में मौजूद ज़्यादातर मुस्लिम सदस्यों का समर्थन भी उसे हासिल था। एक साल पहले हुए वहां चुनाव हुए थे और 50 में से 32 सीटें कांग्रेस ने जीती थी। यहां की 38 सीटें मुस्लिम, 9 हिन्दू और 3 सिक्ख सीटें थीं। कांग्रेस को 21 मुस्लिम, 9 हिन्दू और 2 सिक्ख सीटें हासिल हुई थी। इस तरह ख़ान साहब के मंत्रिमंडल को मुसलिम सदस्यों के बहुमत का समर्थन भी प्राप्त था। सीमाप्रांत के नेताओं को लगता था कि जनमत के द्वारा लोगों का अन्तिम निर्णय लेना ग़लत है। इससे मुस्लिम लीग को सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का मौक़ा मिलेगा। स्थानीय कांग्रेस का विचार था कि इस प्रांत को लीग द्वारा पाकिस्तान में मिलाने के प्रयास को विफल करने का एकमात्र उपाय यह है कि एक स्वतंत्र पठान राज्य पठानिस्तान की मांग की जाए। गांधीजी ख़ान बन्धुओं से पूरी तरह सहमत थे। गांधीजी ने कहा, कांग्रेस और मुसलिम लीग दोनों फिलहाल पठानों को न छेड़ें। पठानों की भावना का दोनों आदर करें इससे पठानों की एकता बढ़ेगी। कांग्रेस ने तो अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। जिन्ना को आगे आना चाहिए। लेकिन दिल्ली के नेताओं ने पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के राजनीतिक गतिविधियों में विशेष रुचि नहीं दिखाई। न उन्होंने वायसराय पर दबाव बनाया और न ही गवर्नर पर। मुसलिम लीग को वहां खुला खेल करनी की छूट मिल गई। उसने आतंक का तांडव मचाया। गवर्नर सर ओलाफ़ कैरो ने तो ठान ही ली थी कि वहां लीग की सरकार बनवा देगा। चुनी गई सरकार को समर्थन देने के बजाए उसने उत्पात मचाने वालों को साथ दिया। उसने वायसराय से कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए स्थानीय शासन को बर्खास्त करने और ताज़ा चुनाव की सिफ़ारिश की। पेशावर के अपने दौरे पर वायसराय माउंटबेटन ने भी इसकी बात डॉ. ख़ान साहेब से कही। जिन्ना ने कहा कि यदि ताज़ा चुनाव होते हैं, तो वह सीधी कार्रवाई वापस ले लेगा और वहां कोई हिंसा नहीं होगी। अहिंसा बंद करने की लीग के आश्वासन के बाद माउंटबेटन ने लीग के सभी गिरफ़्तार नेताओं को रिहा करने का आदेश दे दिया।

3 जून की योजना के अनुसार जनमत लेने की शर्तों में लीग की सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। 6 जून को गांधीजी माउंटबेटन से मिले और उसे सुझाया कि वह जिन्ना से बात करे और उसे जनमत न कराने के लिए सीमाप्रांत जाकर वहां के नेताओं से बातचीत के लिए राज़ी करे। जिन्ना से वायसराय ने बात की लेकिन जिन्ना ने शर्त रख दी कि वह सीमाप्रांत जाकर वहां के नेताओं से बात करने को राज़ी है, लेकिन कांग्रेस को यह आश्वासन देना होगा कि वह इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। गांधीजी ने कहा मैं कांग्रेस को आत्महत्या करने के लिए नहीं कह सकता। जिन्ना की बात मानने का मतलब था कि कांग्रेस संगठन अपने पर प्रतिबंध लगा दे। जिन्ना को यह कहने के लिए खुला मैदान छोड़ दे कि कांग्रेस ने तो आपको छोड़ दिया है, इसलिए आपके सामने मेरी शर्तें मान लेने की ही बात रह जाती है। जिन्ना के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया।

जनमत संग्रह की बातचीत हुई। गांधीजी का मानना था कि अगर ऐसा हुआ तो वहां बहुत ख़ून-ख़राबा होगा। बादशाह ख़ान ने गांधीजी से कहा, मैंने अपने सारे महत्त्वपूर्ण कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा किया है। हम सबका यह मानना है कि हम जनमत मंज़ूर नहीं कर सकते। प्रांत में इस समय ऐसे हालात हैं कि जनमत से गंभीर हिंसा भड़क उठेगी। हम पाकिस्तान के भी विरुद्ध हैं। हम चाहते हैं कि भारत के भीतर हमारा एक स्वतंत्र पठान राज्य हो। बादशाह ख़ान को यह सलाह दी गई कि वे जाकर जिन्ना से मिलकर उसे राज़ी करना चाहिए। 18 जून को बादशाह ख़ान जिन्ना से मिलने इसके घर गए। लेकिन मुस्लिम लीग के साथ सम्मान पूर्ण समझौता करने का बादशाह ख़ान का प्रयत्न असफल हुआ। जिन्ना को मालूम था कि सीमाप्रांत उसे मिलने ही वाला है। लॉर्ड माउंटबेटन किसी भी नई मांग को सुनने के लिए तैयार नहीं थे। वह अपनी योजना को जितनी जल्दी हो सके, आगे बढ़ाना चाहते थे, और एक आज़ाद पख्तूनिस्तान के सवाल पर तो विस्तार से चर्चा भी नहीं की गई। लॉर्ड माउंटबेटन ने साफ़ कर दिया कि सरहदी इलाका एक अलग और आज़ाद रियासत नहीं बन सकता, बल्कि उसे या तो भारत में या फिर पाकिस्तान में शामिल होना होगा। स्वतंत्र पठानिस्तान का प्रयत्न असफल रहा।

पाकिस्तान के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को ब्रिटिश अफ़सरों की गतिविधियों से और भी ज़्यादा मज़बूती मिली; ये अफ़सर खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन कर रहे थे और सरहदी इलाके के ज़्यादातर कबीलाई सरदारों को मुस्लिम लीग का साथ देने के लिए मना रहे थे। कांग्रेस की सरकार की व्यवस्था को तोड़ने के लिए गवर्नर ओलेफ़ कैरो ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। मुख्यमंत्री के आदेशों का अनादर शुरू हो गया। लाहौर और पेशावर से गुंडों को लाकर प्रदर्शन करवाया गया। हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी। गवर्नर की सत्ता और सेना मुख्यमंत्री को दगा दे रही थी। गवर्नर ओलेफ़ कैरो के ख़िलाफ़ वायसराय से विरोध व्यक्त करने पर इतनी रियायत मिली कि कैरो को दो महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया और लेफ़्टिनेन्ट जनरल रॉव लॉकहार्ट को उसके स्थान पर नियुक्त किया गया। लेकिन सीमाप्रांत की स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। इसका का कारण यह था कि गांधीजी की अहिंसा का सहारा लेकर जो सरकार वहां चल रही थी वह अंग्रेज़ों को बिल्कुल पसंद नहीं थी। हालांकि एसेम्बली में कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने के पक्ष में मत दिया था, लेकिन फिर भी भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के सवाल पर उस प्रांत पर एक जनमत-संग्रह थोप दिया गया। वे चाहते थे कि सीमाप्रांत के लोगों को पाकिस्तान या पठानिस्तान में से एक चुनने का स्वतंत्र अधिकार हो।

जनमत संग्रह के नाम पर वहां चुनाव हुए। कांग्रेस और ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने विरोध में चुनाव में भाग नहीं लिया। लेकिन, उनके विरोध का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। जब गिनती शुरू हुई तो पता चला कि हरेक मतदान केन्द्र पर अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक मतदान हुए है। अंग्रेज़ हुक़ूमत ने बोगस वोट डलवाए थे। नतीजा मुस्लिम लीग के पक्ष में रहा और ब्रिटिश सरकार ने तुरंत इसे मान लिया। वायसराय ने सरहद प्रांत का ख़ून कर दिया था। सरकार ने किसी भी तरह की शालीनता या न्याय की परवाह किए बिना काम किया और हर तरह के गैर-कानूनी तथा अनुचित उपायों को अपनाकर 'खुदाई खिदमतगारों' को कुचल दिया। यह प्रांत पाकिस्तान में सम्मिलित कर लिया गया। 'सीमांत गांधी' ने बाद में पूरी तरह से सही तौर पर यह घोषणा की थी कि कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें और उनके आंदोलन को 'भेड़ियों के आगे फेंक दिया' था। गांधीजी ने बादशाह ख़ान से कहा, आपका कर्तव्य सीमाप्रांत जाकर पाकिस्तान को सचमुच पाक बनाने का है।

30 जुलाई को गांधीजी काश्मीर के लिए रवाना हुए और बादशाह ख़ान अपने प्रान्त को लौट गए। इसके बाद दोनों फिर कभी नहीं मिले। 15 अगस्त को देश स्वतंत्र हो गया। 21 अगस्त को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल जिन्ना ने एक सरकारी आदेश द्वारा डॉ. ख़ान को पदच्युत कर दिया। सितम्बर में एक सभा में बादशाह ख़ान ने एक बार फिर पठानिस्तान की मांग की बात उठाई। उन्हें धमकियां दी जाने लगीं। गांधीजी को जब समाचार मिला तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने सुझाया कि वे सीमाप्रांत छोड़ दें। भारत में बैठकर अहिंसक कार्य-प्रणाली का विकास करें। बादशाह ख़ान ने जवाब दिया, आप चिंता न करें। सिर्फ़ अपना आशीर्वाद और दुआएं भेज दीजिए। बादशाह ख़ान पाकिस्तान से निष्कासित हो गए। भारत में परदेशी कहलाए जाने लगे। खान अब्दुल गफ्फार खान, डॉ. खान साहब और खुदाई खिदमतगारों के अन्य सभी नेताओं को बिना किसी कानूनी आरोप या मुकदमे के जेल में डाल दिया गया। लगभग छह साल तक वे जेल में ही सड़ते रहे। वे पाकिस्तान के कारागार में ही रहे। डॉ. ख़ान का किसी ने ख़ून कर दिया। आजादी की लड़ाई में अनेक बार जेल गए बादशाह ख़ान का शेष अधिकांश जीवन अपने घर में नज़रबंदी के रूप में बीता।

AICC की बैठक 14 जून 1947 को हुई। इस बैठक में मौलाना आज़ाद ने कहा था, वर्किंग कमेटी ने जो फ़ैसला लिया था, वह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना का नतीजा था। बँटवारा भारत के लिए एक त्रासदी थी, और इसके पक्ष में बस यही एक बात कही जा सकती थी कि हमने बँटवारे से बचने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन हम नाकाम रहे। अब हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था, और अगर हम अभी और इसी वक़्त आज़ादी चाहते थे, तो हमें भारत के बँटवारे की माँग माननी ही पड़ती। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र एक है, और उसका सांस्कृतिक जीवन एक है और हमेशा एक ही रहेगा। राजनीतिक तौर पर हम नाकाम रहे थे, और इसीलिए देश का बँटवारा कर रहे थे। हमें अपनी हार मान लेनी चाहिए, लेकिन साथ ही हमें यह भी पक्का करने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारी संस्कृति का बँटवारा न हो।

जब विभाजन का प्रस्ताव मान लिया गया, तो यह तय करना ज़रूरी हो गया था कि इन विभाजित नए प्रांतों की सीमा क्या होगी। लॉर्ड माउंटबेटन ने इस सवाल पर विचार करने के लिए एक 'सीमा आयोग' (Boundary Commission) नियुक्त किया और रैडक्लिफ़ से यह काम संभालने को कहा। उस समय रैडक्लिफ़ शिमला में था। उसने यह नियुक्ति स्वीकार कर ली, लेकिन सुझाव दिया कि वह अपना सर्वे जुलाई की शुरुआत में शुरू करेगा। उसने बताया कि जून की भीषण गर्मी में पंजाब में जाकर ज़मीनी सर्वे करना लगभग असंभव काम होगा, और वैसे भी जुलाई का मतलब सिर्फ़ तीन या चार हफ़्तों की देरी ही तो थी। लॉर्ड माउंटबेटन ने उससे कहा कि वह एक दिन की देरी के लिए भी तैयार नहीं है, और तीन-चार हफ़्तों की देरी का कोई भी सुझाव तो बिल्कुल ही नामुमकिन है। उसके आदेशों का पालन किया गया। यह इस बात का एक उदाहरण है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने कितनी तेज़ी और फुर्ती से काम किया।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

शुक्रवार, 1 मई 2026

सूफ़ीमत ...5. सूफ़ीमत का उदय-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम

5. सूफ़ीमत का उदय-2

5.3 पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’

('सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम' का अर्थ है: "अल्लाह की रहमत और सलामती हो उन पर।" यह वाक्यांश पैगम्बर मोहम्मद का नाम लेने के बाद सम्मान में कहा जाता है।)

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ ख़ुदा के पैग़ंबर दीन-ए-इस्‍लाम के नबी और रसूल माने जाते हैं। रसूल का अर्थ होता है ईश्वर का दूत या संदेशवाहकरसूल को ईश्वर ने मानव जाति के लिए अपना दूत (प्रेषित) बनाकर भेजा, ताकि वह ईश्वर के आदेशों, जिसे शरीअत (दैवी विधान) कहा जाता है, को स्थापित करे और समस्त मानव-जगत का दिशा निर्देशन करे। शरीअत का आधार पैग़म्बर का पवित्र जीवन, उनके अह्लेबैत (परिवारजन) और क़ुरआन है। इस्लामी मान्यता के अनुसार हर देश और हर काल में युग-पुरुष आकर इंसान को दुनिया में रहने का तरीक़ा बताते रहे हैं। ख़ुदा का संदेश लाने वालों को पैग़म्बर कह कर पुकारा गया है। क़ुरआन शरीफ़ में भी कहा गया है

वमा मुहम्मदुन इल्ला रसूल कदखलत मिन्‌कब्लेहिर्रोसोलो

अर्थात्‌ ख़ुदा का पैगाम लाने वाले दुनिया में लगातार आते रहे हैं, हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उनमें से एक हैं। रिसालात (रसूल का बहुवचन) को इस्लाम में मौलिक स्थिति प्राप्त है। रसूल का चुनाव अल्लाह अपनी पसंद से करते हैं, जिसे इस्तफ़ा (अनेक वस्तुओं में से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव) कहा जाता है। आदम से लेकर हज़रत मुहम्मद साहब तक एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर की संख्या बताई गई है। पृथ्वी पर जितने प्रेषित आये उनमें से सिर्फ 25 प्रेषितों के नाम क़ुरआन में लिए है जैसे के – आदम! जिनकी हम सब संतान है, तो हम अपने-आपको आदमी कहते है, इसी तरह नूह, या जिसको नोहा कहते है, इब्राहीम (अब्राहम), मूसा (मोसेस), ईसा (यशु) और प्रेषित मोहम्मद इन सबको भेजे थे उनके साथ कुछ ग्रंथ भेजे और क़ुरआन ने 3 ग्रंथो के नाम अपने अलावा अर्थात कुल 4 तौरात (धर्म-पुस्तक, अल्लाह की वाणी), या ग्रंथों के नाम लिए है, ये है

1.   तौरेत (तौरह) – यह ग्रंथ प्रेषित मूसा (अलैहि सलाम) पर अवतरण हुआ था

2.  ज़बूर – यह ग्रंथ प्रेषित दाऊद (अलैहिस्सलाम) पर अवतरण हुआ था जिन्हें डेविड कहते है, दाऊद अलैहिस्सलाम पैगंबर तालूत की सेना में एक सैनिक थे, जिन को अल्लाह ने राज्य देने के साथ नबी भी बनाया। उन्हीं के पुत्र सुलैमान अलैहिस्सलाम थे। दाऊद अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने धर्म पुस्तक ज़बूर प्रदान की। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का जीवन साहस, अल्लाह पर अटूट विश्वास, और न्याय का एक महान उदाहरण है।

3.  इंजील (बाइबिल) – प्रेषित ईसा मसी (अलैहिस्सलाम) पर अवतरित हुआ था,

4.  क़ुरआन – ये ग्रंथ ईश्वर के अंतिम प्रेषित मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर इसका अवतरण हुआ था इसका एक नाम फुरकान भी है, अर्थात कसौटी (Criteria, "सत्य और असत्य के बीच अंतर करने वाला"), फर्क करने वाली किताब, अर्थात अच्छे और बुरे को अलग करनेवाली किताब है ये क़ुरआन अपने पूर्व की धर्म पुस्तकों का केवल पुष्टिकर ही नहीं, कसौटी (परख) भी है।  यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब तौरात तथा इंजील और क़ुरआन सब एक ही सत्य लाये हैं, तो फिर इन के धर्म विधानों तथा कार्य प्रणाली में अन्तर क्यों है? क़ुरआन उस का उत्तर देता है कि एक चीज़ मूल धर्म है, अर्थात एकेश्वरवाद तथा सत्कर्म का नियम, और दूसरी चीज़ धर्म विधान तथा कार्य प्रणाली है, जिस के अनुसार जीवन व्यतीत किया जाये, तो मूल धर्म तो एक ही है, परन्तु समय और स्थितियों के अनुसार कार्य प्रणाली में अन्तर होता रहा है, क्योंकि प्रत्येक युग की स्थितियाँ एक समान नहीं थीं, और यह मूल धर्म का अन्तर नहीं, कार्य प्रणाली का अन्तर हुआ।

इस्लामी क्रांति के प्रवर्तक, मानव अधिकारों के संरक्षक और अंतिम एवं सर्वश्रेष्ठ पैग़म्बर हज़रत अबुल क़ासिम मुहम्मद मुस्तफ़ा इब्न अब्दुल्लाह का जन्म 570 ई. (अधिकांश सुन्नी परंपराओं के अनुसार 12 रबीअ-उल-अव्वल जबकि शिया परंपराओं के अनुसार 17 रबी-उल-अव्वल को (आम-अल-फ़ील (हाथी का वर्ष) में अरब के  रेगिस्तान के मक्का नामक शहर के मुहल्ला बनू हाशिम के क़ुरैश क़बीले में हुआ था। उनकी पीढ़ियों का क्रम हज़रत इब्राहिम के पुत्र हज़रत इस्माइल से जाकर मिल जाता है। अरबी रिवाज़ के मुताबिक़ उनका पूरा नाम मुहम्मद बिन-अब्दुल्लाह (अब्दुल्लाह का बेटा मुहम्मद) था। मुहम्मद का अर्थ होता है जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो' (प्रशंसनीय)। उनके पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्दुल मुत्तलिब थे और माताश्री हज़रत आमिना बिन्त वहब थीं। उनकी माता ज़ोहरा क़बीला के प्रमुख वहब फ़हरी की पुत्री थीं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पूर्वजों में से एक हज़रत कोसई, क़ुरैश क़बीला से थे। यह क़बीला बड़ा ही दबंग था। हज़रत कोसई ने ख़ुद को कभी बादशाह तो नहीं कहा, पर व्यावहारिक तौर पर वे मक्का के बादशाह ही थे। उन्हें मक्का का व्यवस्थापक बनाया गया था। उनके बाद भी इसी वंश के लोग काबा के प्रबंधक रहे। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के जन्म के समय मक्का मूर्तियों का गढ़ था। केवल काबा में 360 मूर्तियाँ थीं और उनका वंश कुरैश ही उसका पुजारी था। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के क़बीले का नाम बनू हाशिम था, जो उनके पूर्वज हज़रत हाशिम के नाम पर पड़ा था। हालाँकि उनका नाम उमरू था, पर समस्त मक्का वासियों को हशम (रोटी को चूरा कर शोरबा में भिंगाकर खिलाना) खिलाया था, इसलिए वे हाशिम कहलाए। पवित्र तीर्थ-स्थल काबा का प्रबंधन और संरक्षण मुख्य रूप से हाशिमी ख़ानदान के ही हाथ में था।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. के दादा, हज़रत हाशिम के पुत्र हज़रत मुत्तलिब एक विराट और प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके दस बेटों में से एक पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के पिताश्री हज़रत अब्दुल्लाह थे। व्यापार के सिलसिले में वे शाम गए थे और व्यापारिक यात्रा करके जब वापस आ रहे थे तो मदीना में बीमार हो गए और वहीं हज़रत अब्दुल्लाह का 25 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उस समय माताश्री आमिना गर्भवती थीं। हज़रत अब्दुल्लाह की मृत्यु के दो महीने बाद हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म हुआ। उनके जन्म के छः वर्ष बाद माता का भी निधन हो गया। माताश्री आमिना बीबी उन्हें लेकर दो सौ मील दूर मदीना (यथरिब) गयी थीं। उन दिनों सफ़र में बहुत-सी तकलीफ़ें झेलनी पड़ती थी। हज़रत आमिना बीबी जब अपने पति हज़रत अब्दुल्लाह की कब्र देखने और रिश्तेदारों से मिलने के बाद वापसी की यात्रा कर रही थीं तो उनका रास्ते में ही अल-अब्वा (Al-Abwa)  नामक स्थान पर देहांत हो गया। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पौत्र का बड़े प्यार से लालन-पालन किया। माताश्री बीबी आमिना की मृत्यु के दो वर्ष बाद, जब हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. आठ साल के थे तो दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का भी देहावसान हो गया। अब उनकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के पुत्र हज़रत अबू तालिब (अ.स.) पर आ गई।

मक्का की सरदारी और राज्य को लेकर कुरैश जनजाति के कबीलों, विशेष रूप से बनू हाशिम (हज़रत अब्दुल मुत्तलिब का परिवार) और बनू उमय्या (हरब इब्न उमय्या का परिवार) के बीच प्रतिस्पर्धा थी।  हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की मृत्यु (लगभग 578 ईस्वी) के बाद राज्य और सरदारी उन्हीं के वंशज की दूसरी शाखा उम्मैय्या के पुत्र हरब इब्न उमय्या ने हथिया ली। ये लोग हज़रत अब्दुल मुत्तलिब के परिवार के घोर शत्रु थे। हरब ने ज़मज़म, जिसको खुदाई करके हज़रत हाशिम ने बरामद किया था, और तीर्थ-यात्रियों का सेवा कार्य भी अपने सुपुत्र अब्बास को दे दिया। इस तरह हर प्रकार से हज़रत अबू तालिब को सत्ता से बाहर कर दिया गया। उन्होंने अपने भतीजे हज़रत मुहम्मद के पालन-पोषण और रक्षा को अपने जीवन का परम उद्देश्य बना लिया। मक्का में कुरैश के कड़े विरोध के बावजूद, उन्होंने अंतिम सांस तक पैगंबर मुहम्मद की रक्षा की और उन्हें कबीले की दुश्मनी से बचाए रखा। इस काम को अंजाम देने में उनकी पत्नी हज़रत फ़ातिमा-बिन्ते-असद ने उनकी भरपूर मदद की। हज़रत मुहम्मद ने भी हज़रत फ़ातिमा को अपनी माताश्री के रूप में हमेशा सम्मान दिया। यहां तक कहा जाता है कि जब चाची हज़रत फ़ातिमा का स्वर्गवास हुआ, तो जनाज़े के गहवारा (पालना, झूला, हिंडोला) के नीचे-नीचे हज़रत मुहम्मद चलते रहे। किसी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा, जितनी देर तक माताश्री की छत्रछाया सर पर बनी रहे, उचित ही है!

5.4 हज़रत ख़दीजा (रज़िअल्लाहु अन्हा)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) अपने चाचा के काम में भी हाथ बंटाने लगे। उनके चाचा हज़रत अबू तालिब व्यापार करते थे। तेरह साल की उम्र में तिजारत (वाणिज्यिक व्यापार) में अनुभव हासिल करने के सिलसिले में चाचा के साथ वे शाम (सीरिया) गए। जब वे पच्चीस साल के थे तो पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. को किसी व्यापारिक काम से मक्का की सबसे धनवान महिला हज़रत ख़दीजा-बिन्त-खुवायलद  (र.अ.)  के माल के साथ जाना पड़ा। वे एक संभ्रांत महिला थीं। उनका घर बनू हाशिम क्षेत्र में स्थित था। उन्होंने गरीबों को भोजन और वस्त्र प्रदान किए, अपने रिश्तेदारों को आर्थिक सहायता दी और गरीब रिश्तेदारों को शादी के खर्चों में मदद की। वह धनी भी थीं और ताक़तवर भी। वह 556 ईसवी में मक्का में पैदा हुईं। सुशीलता, पवित्रता और चरित्रवान होने के कारण लोग उन्हें ‘ताहिरा (पवित्र) नाम से पुकारा करते थे। उनके दादा, असद इब्न अब्द-अल-उज्जा, असद कबीले के [मक्का में कुरैश़ जनजाति के पूर्वज] थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) एक अमीर सौदागर खुवायलद इब्न असद  की बेटी थीं। इस सौदागर ने अपने पुश्तैनी काम को बढ़ा कर एक बड़े कारोबारी साम्राज्य में तब्दील कर दिया था। लेकिन एक युद्ध में पिता की मौत के बाद हज़रत खदीजा (र.अ.) ने ख़ुद आगे बढ़ कर इस कारोबारी साम्राज्य की बागडोर संभाल ली। उनकी मां फातिमा बिन्त ज़ैदह्, कुरैश़ के आमिर इब्न लुऐइ कबीले की सदस्य थी। हज़रत ख़दीजा अपना सारा कामकाज़ मक्का (सऊदी अरब) से ही करती थीं। कारोबार के सिलसिले में उन्हें मध्य-पूर्व के देशों में सामान ले जाने वाले कारवाँ रवाना करने पड़ते थे। ये कारवाँ लंबा सफ़र तय करते थे। ये दक्षिणी यमन से लेकर उत्तरी सीरिया तक की राह नापते थे। हालाँकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को काफ़ी सारा धन अपने परिवार से विरासत में मिला था लेकिन उन्होंने ख़ुद भी काफ़ी संपत्ति कमाई थी। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपनी ही तरह की विलक्षण कारोबारी थीं। वह अपने फ़ैसले ख़ुद लेती थीं। उनमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। वह ख़ुद अपने कर्मचारियों का चयन करती थीं। वे ऐसे ख़ास हुनर वाले लोगों को चुनती थीं जो उनका व्यापार बढ़ाने में मददगार साबित हों। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) निश्चित तौर पर अपनी तरह से ज़िंदगी जीना चाहती थीं। वह अपनी राह पर चलती थीं।

वह बंधन में रहना पसंद नहीं करती थीं। वह काफ़ी मज़बूत इरादों वाली महिला थीं। उन्होंने अपने रिश्तों के भाइयों (कजिन) से शादी करने से इनकार कर दिया था। उनके परिवार में यह परंपरा चली आ रही थी। लेकिन वह ख़ुद अपना जीवनसाथी चुनना चाहती थीं। उन दिनों के तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने उनके सामने शादी के प्रस्ताव रखे लेकिन उन्होंने इनमें से अधिकांश को ठुकरा दिया। आख़िरकार उन्होंने दो शादियां कीं। उनके पहले पति का निधन हो गया और माना जाता है कि दूसरे पति से उन्होंने ख़ुद अलग होने का फ़ैसला किया था। इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब फिर कभी शादी नहीं करेंगी। लेकिन थोड़े वक्त के बाद उनकी ज़िंदगी में एक तीसरा शख़्स आया। वह थे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. । उन दिनों वह किसी भागीदार के साथ साझा व्यापार किया करती थीं। अपना कारोबार का कामकाज देखने के सिलसिले में उन्हें एक ऐसे शख्स के बारे में पता चला जो बेहद ईमानदार और मेहनती माना जाता था। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से उनकी मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात से संतुष्ट ख़दीजा (र.अ.) ने उन्हें अपने एक कारवाँ की अगुआई करने के लिए चुन लिया।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) अपने व्यापारिक कारवां के साथ यात्रा नहीं करती थी।

यह कहा जाता है कि कुरैश के व्यापार कारवाँ जब गर्मियों में यात्रा करने के लिए सीरिया या सर्दियों में यात्रा पर यमन के लिए एकत्र होते, तब हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के कारवाँ को भी कुरैश के अन्य सभी व्यापारियों के कारवाँओं के साथ रखा जाता था।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) व्यापार कारवाँ के साथ यात्रा नहीं करती थी, बल्कि नौकरों को अपनी ओर से व्यापार करने के लिए कमीशन पर नियुक्त करती थीं। 595 ई. में सीरिया में एक सौदे के लिए ख़दीजा को एक एजेंट की ज़रूरत पडी। हज़रत अबू तालिब इब्न अब्द अल मुतालीब ने उनके दूर के चचेरे भाई मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला की सिफारिश की।  हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने हज़रत मुहम्मद सल्ल. को काम पर रखा, तब वे 25 साल के थे। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने न सिर्फ़ उस धनवान स्त्री हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के व्यापार में सहयोग किया बल्कि उस बार व्यापार में उन्हें दोगुना से भी ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उनमें कुछ अद्भुत गुण देखे थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) उस शख्स की दृढ़ता से बेहद प्रभावित थीं। कारोबार के सिलसिले में ख़दीजा (र.अ.) से उनका वास्ता बढ़ता गया। उस शख़्स ने हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को इतना प्रभावित किया कि आख़िरकार उन्होंने उनसे शादी करने का फ़ैसला कर लिया। इस तरह एक पति के निधन और दूसरे से अलगाव के बाद फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला करने वाली हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने अपना फिर कभी शादी न करने का फ़ैसला बदल दिया था। कई अमीर कुरैश पुरुष पहले से ही हज़रत ख़दीजा से शादी के लिए हाँ कह चुके थे, लेकिन उन्होंने सभी को मना कर दिया था।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने उस ज़माने के चलन के उलट ख़ुद उनकी उच्च विशेषताओं से प्रभावित होकर उनके पास विवाह करने का संदेश भिजवाया। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. उस समय पच्चीस के थे और एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे, जबकि हज़रत ख़दीजा (र.अ.) मक्का की सबसे धनवान महिला थीं और चालीस साल की हो चुकी थीं। पैग़म्बर मोहम्मद अनाथ थे। उनको उनके चाचा ने पाला-पोसा था। फिर भी  595 ई. में राज़ी-ख़ुशी निकाह हुआ, उनके दूसरे चाचा हज़रत हम्ज़ा ने निकाह पढ़कर उनका  विवाह सम्पन्न किया। जीवन-पर्यन्त हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने बड़े प्रेम और वफ़ादारी से पैग़म्बर का साथ निभाया। जन्म से ही हज़रत मुहम्मद सल्ल. ग़ुरबत (कंगाली, दरिद्रता) झेलते आए थे। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से शादी के बाद उनकी ज़िंदगी में अचानक 'काफ़ी निश्चिंतता और आर्थिक समृद्धि' आ गई, शादी के बाद वे दौलतमंद हो गए थे। मगर उनका रुझान दुनिया के ऐशो-आराम में न था। इसके बाद तो हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का सारा जीवन और धन-दौलत इस्लाम के प्रचार-प्रसार में व्यतीत हुआ। माना जाता है कि इस दंपति की चार संतानें हुईं। लेकिन एक बेटी को छोड़ कर बाक़ी बचपन में ही गुज़र गईं। उनकी सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (र.अ.) थीं। उनका विवाह हज़रत अली-बिन-अबूतालिब से हुआ था। इन दोनों के पुत्र इमाम हसन (शब्बर) और इमाम हुसैन (शब्बीर) थे, समूहिक रूप से इन्हें हसनैन कहा जाता है। इनकी सुपुत्रियां हज़रत ज़ैनब और हज़रत उम्मे-कुल्सूम थीं।

हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने एक युवा संगठन हल्फ़-उल-फ़ुज़ूल (फ़ाज़िलों की मंडली) बनाया। अभी उनकी उम्र 25 वर्ष की थी। यह अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना करने वाला एक ऐतिहासिक कबीलाई संघ था। बड़े आश्चर्य की बात है कि उनके इन प्रयासों, उच्चतम जीवन मूल्यों, सत्यवादिता, के कारण उस समय के समाज ने उन्हें अस्‌-सादिक़ (परम सत्यवादी) और अलअमीन (परम विश्वासी, निष्ठावान) की उपाधियों से अलंकृत किया, किन्तु जब 40 वर्ष की उम्र में उन्होंने पैग़म्बर होना घोषित किया, तो वही समाज और प्रशंसक उनके घोर शत्रु हो गए, खासकर अरब का धनवान वर्ग, जिसका नेतृत्व उमैय्या वंश कर रहा था।

ऐसा माना जाता है कि इस्लाम प्राचीन धर्मों के विकास का अंतिम पड़ाव है। क़ुरआन में कहा गया है, कोई जाति ऐसी नहीं है, जिसमें निर्देशित करने वाला (नबी या पैग़म्बर) न हुआ हो। (क़ुरआन : 35/24)। इस्लाम धर्म की यह विशेषता है कि यह किसी जनसमूह, समाज या देश तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त मानव प्राणी, देश-समाज और काल इसकी परिधि में आते हैं। इस्लाम यानी सुख-शांति मतलब यह कि जो भी सुख-शांति में विश्वास करता है, इसका अनुयायी है। इस्लाम शब्द सुलह-समझौता, कुशलता, विनम्रता, आज्ञापालन, समर्पण आदि अर्थों में भी आता है। इसका ईश्वर सिर्फ़ मुसलमानों का पूज्य नहीं है, बल्कि वह तो रब्ब-उल-आलमीन है यानी सारी दुनिया का पालनहार है, वह रहमत-उल-आलमीन यानी सारी दुनिया का दया निधान है। (क़ुरआन : 1 / 2, 21/107)। इसका संदेश सभी मानव जाति के लिए एक समान है।

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मनोज कुमार

 

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