गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

भारतीय धूसर धनेश

 

भारतीय धूसर धनेश

मनोज कुमार


अंग्रेज़ी में नाम : इंडियन ग्रे हॉर्नबिल
(Indian Grey Hornbill)

वैज्ञानिक नाम : टोकस बाइरोस्ट्रिस (Tockus/Ocyceros birostris)

स्थानीय नाम : हिन्दी में इसे धनेश, धन्मार, धानेल, लामदार, बांग्ला में पुटियल धनेश, पंजाबी में धनचिड़ी, गुजराती में चिलोत्रो, उड़िया में कोचिलखाई, मराठी में भिनास, तेलुगु में कोम्मु कसिरि, तमिल में इरावक्के, और कन्नड़ में बूडु कोडुकोक्कि कहा जाता है।

 विवरण व पहचान : भूरे सलेटी रंग का धनेश सबसे आम और अधिक पाया जाने वाला पक्षी है। धनेश की पूंछ पंखे के समान लंबी होती है, जिसके छोर पर सफेदी होती है। मादा धनेश के शरीर का रंग पीलापन लिए कत्थई या भूरापन लिए हुए होता है। नर का शरीर धूसरपन लिए सलेटी होता है। नर धनेश का पेट, जांघ और दुम का निचला हिस्सा सफेदी लिए हुए होता है। इसके उड़ने वाले पंखों के सिरे भी सफेद होते हैं। इस चिड़िया की टेढ़ी चोंच काली-उजली, काफ़ी बड़ी, मज़बूत, झुकी हुई और लंबी होती है और यह दूर से दिखने में लकड़ी की बनी हुई प्रतीत होती हैं। चोंच का ऊपरी भाग सींग-सा टेढ़ा होता है। इस खास तरह की संरचना को शिरस्त्राण (कैसक्यू) कहते हैं। इसी आधार पर, यानी चोंच की बनावट सींग की सी होने के कारण ही अंग्रेज़ी में इसे – हॉर्न (सींग) बिल (चोंच) के नाम से पुकारते हैं। मादा पक्षी में यह संरचना कुछ छोटी होती है। इसका आकार चील के बराबर, लगभग 61 से.मी. का होता है। धनेश पक्षी की एक खास विशेषता है जो अन्य पक्षियों में नहीं पाई जाती, वह यह कि उसकी आंखों के ऊपर भौंहें होती हैं। डैनों के नीचे मुलायम पर, जो अन्य पक्षियों में होते हैं, धनेश में नहीं होते।

व्याप्ति : धनेश की 25 जातियां अफ़्रीका में पाई जाती हैं। इसके अलावा भारत, म्यांमार, थाईलैंड,


मलाया, सुन्डा आईलैंड, फिलीपीन्स, न्यूगिनी आदि दक्षिण-पूर्व एशिया के भागों में इसकी 20 जातियां मिलती हैं। भारत में यह जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीस गढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा और राजस्थान के कुछ भागों में पाया जाता है।

अन्य प्रजातियां : विश्व में धनेश की 45 प्रजातियां और भारत में 9/16 प्रजातियां पाई जाती हैं।

1.   भीमकाय धनेश (ग्रेट हॉर्न बिल) (Buceros bicornis) – अरुणाचल प्रदेश और केरल का राज्य पक्षी है।

2.  मालाबार का धूसर धनेश (O. griseus)

3.  भारतीय श्वेत-श्याम धनेश (Anthracoceros albirostris)

4.  मालाबार का श्वेत-श्याम धनेश (A. coronatus)

5.  नारंगी-भूरी गर्दन वाला धनेश (Aceros nipalensis)

6.  गोल झालर वाला धनेश (A. undulates)

7.  Brown Hornbill (Anorrhinus tickelli)

8.  Narcondam Hornbill (Rhyticeros narcondami)

आदत और वास : यह एक सामाजिक पक्षी है। ये खुले मैदानों, हल्के जंगलों, फल बागानों, सड़क के किनारे उगे वृक्षों, बाग-बगीचों आदि जगह जहां काफी संख्या में पीपल, बरगद आदि फाइकस कुल के पेड़ उगे होते हैं, पाए जाते हैं। फलभक्षी होते हैं।  ये समूहों में रात बिताते हैं और सुबह होते ही फलों, सूंडी, कीड़ों और छिपकलियों की खोज में चारो ओर उड़ जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले ये पक्षी दीमकों को खाने के लिए बार-बार ज़मीन पर नीचे भी आते रहते हैं। उड़ान पर जाने के लिए ये एक-एक कर उड़ते हैं। इनकी उड़ान लहरदार और शोरयुक्त होती है। यह बहुत शोर मचाने वाला पक्षी है। ये पक्षी ज़ोर-ज़ोर से ‘चीं-ईन’ और ‘कांई-ईन’ की आवाज़ करते हैं।

भोजन : ये अंजीर की नई पत्तियां, जंगली फल, बीज, बेरियां, सूंडी, कीड़ों और छिपकलियां आदि खाते हैं।


प्रजनन :
इस पक्षी का घोंसला बनाने और अंडा देने का ढंग बड़ा ही निराला है। धनेश घोंसले नहीं बनाते। मार्च से जून के बीच, जब अंडा देने का समय नज़दीक आता  है,  तब नर धनेश मादा को किसी पेड़ के तने के खोखले भाग के छिद्र (कोटर) में बिठा देता है। मादा इसी में अंडा देती है। एक बार मे 2-3 अंडे देने के बाद मादा अंडे सेने बैठ जाती है। नर मादा को उस कोटर में बिठाकर छिद्र का द्वार पेड़ की छाल के गूदे और अपने चिपचिपे थूक से बंद कर देता है, केवल एक छोटा-सा सुराख भर छोड़ता है। इस सुराख से मादा की चोंच निकली रहती है। नर बाहर से मादा के लिए भोजन ला-लाकर उसकी निकली हुई चोंच में भोजन पहुँचाता रहता है। भीतर बैठी मादा आराम से भोजन खाती और अंडे सेती रहती है। खुद को दिए गए इस कारावास के दौरान मादा के पंख झड़ जाते हैं। बाद में फिर से नए पंख निकल भी आते हैं। अंडा फूटने पर जब उसमें से बच्चा बाहर निकलता है। बच्चे तो उसी घर में रह जाते हैं, लेकिन मादा के बाहर निकलने के लिए द्वार तोड़ दिया जाता है। इसके बाद माता-पिता दोनों मिलकर द्वार पर छोड़ी गई दरार से चूजों को भोजन कराते हैं। धनेश के अंडों से चूजे एक साथ नहीं निकलते। बड़ा चूजा छोटे चूजे से 4-5 दिन बड़ा हो सकता है। इस तरह की क्रिया को ‘असिंक्रोनोअस हैचिंग’ कहते हैं। इस प्रकार चूजे उसी सुरक्षित घर में भय रहित रहते हैं। जब उसके पर निकल आते हैं और वह उड़ने लायक हो जाता है, तब वह द्वार पर बनी दरार को बड़ा करके बाहर आ जाता है। एक-दो दिन बाद छोटा चूजा भी बाहर आ जाता है।

विलुप्तता की कगार पर

समय के साथ यह पक्षी कई कठिनाइयों का सामना कर रहा है। लोगों के अंधविश्वास की मानसिकता ने आज इस पक्षी को विलुप्तता की कगार पर पहुँचा दिया है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं तथा गठिया रोग के लिये धनेश का तेल रामबाण औषधि है। ऐसी मान्यता के चलते इस अद्भुत् पक्षी की हत्या दिन ब दिन हो रही है। 

संदर्भ

1.   The Book of Indian Birds – Salim Ali

2.  Popular Handbook of Indian Birds – Hugh Whistler

3.  Birds of the Indian Subcontinent – Richard Grimmett, Carlos Inskipp, Tim Inskipp

4.  Latin Names of Indian Birds – Explained – Satish Pande

5.  Pashchimbanglar Pakhi – Pranabesh Sanyal, Biswajit Roychowdhury

6.  भारत का राष्ट्रीय पक्षी और राज्यों के राज्य पक्षी परशुराम शुक्ल

7.  हमारे पक्षी असद आर. रहमानी

8.  एन्साइक्लोपीडिया पक्षी जगत राजेन्द्र कुमार राजीव

9.  Watching Birds – Jamal Ara

10.  Net -

 

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सफलता बदला लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा है

 

‘सफलता बदला लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा है’

मनोज कुमार

1991 में रतन टाटा टाटा ग्रुप के चेयरमैन बने। तब टाटा मोटर्स की पहचान ट्रक और पैसेंजर कार (बस) बनाने की सबसे बड़ी कंपनी के तौर पर होती थी। अब तक भारतीय बाजार में जितनी भी कार थी उसकी सफलता के पीछे विदेशी कंपनियों की टेक्नोलॉजी, डिजाइन और साझेदारी थी।  रतन टाटा एक स्वदेशी कार बनाना चाहते थे। चेयरमैन बनने के बाद उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। परिणामस्वरूप 1998 में रतन टाटा द्वारा हैचबैक कार इंडिका लांच की गयी। इसमें कोई इम्पोर्टेड टेक्नोलोजी का इस्तेमाल नहीं किया गया था। जब कार मार्केट में लॉंच हुई तो उम्मीदें बहुत थीं, लेकिन कार उम्मीदों पर खडी नहीं उतरी और रतन टाटा का सपना टूटने लगा। लोगों ने इसे पसंद ही नहीं किया।


साल भर के अन्दर ही टाटा को लगा कि यह कोई फलदायी परियोजना नहीं है। दिल्ली - मुंबई की सड़कों पर बारिश के बीच अगर कोई कार सबसे ज्यादा ब्रेकडाउन हुई तो वो इंडिका थी। यह कार बिक्री कम होने के कारण कार मार्केट में अपनी छाप छोड़ने में असफल रही। रतन टाटा को काफी घाटा हो रहा था। कम बिक्री की वजह से टाटा मोटर्स ने कार डिवीजन को बेचने का फैसला किया। फोर्ड मोटर्स ने इस कार फैक्टरी को खरीदने में अपनी रूचि दिखाई

डेट्रायट शहर ऑटो मैन्युफैक्चरिंग के लिए मशहूर है। यह शहर मिशिगन झील के दक्षिण-पूर्व में अमेरिकी इंडस्ट्री का नगीना माना जाता है। यहीं फोर्ड का मुख्यालय है। रतन टाटा अपने पूरे बोर्ड मेम्बर्स के साथ  डेट्रायट गए। फोर्ड मोटर्स के चेयरमैन बिल फोर्ड से मिले। दोनों के बीच मीटिंग हुई। तीन घंटे तक चली बैठक में बिल फोर्ड ने रतन टाटा के साथ काफी अपमानजनक व्यवहार किया और कहा कि आप इस  कार निर्माण के धंधे में नौसिखिए हैं। इस बिजनेस इंडस्ट्री के बारे में कुछ नहीं जानते। आपको कारों की तकनीकी बारीकियों का ज़रा पता नहीं है। आपके पास जब पैसेंजर कार बनाने का कोई अनुभव नहीं था, तो आपने ये बचकानी हरकत क्यों की। कोई बच्चा भी इतना पैसा नहीं लगाएगा जहां उसे सफलता ना मिले। आपको कार डिवीजन शुरू ही नहीं करना चाहिए था। फोर्ड आपकी कार डिविजन खरीदकर टाटा मोटर्स पर एहसान कर रही है। 

रतन टाटा ने गरिमापूर्ण चुप्पी कायम रखी, डील कैंसिल किया, और उसी शाम डेट्रायट से न्यूयार्क लौटने का फैसला किया। 90 मिनट की फ्लाइट में रतन टाटा उदास से रहे। दूसरे दिन वे भारत लौट आए  फोर्ड कंपनी के मालिक के बेहद ही नकारात्मक कमेंट को भी इन्होंने सकारात्मक रूप में लिया। बिल की बातों को उन्होंने दिल पर नहीं लिया, बल्कि उसे दिमाग पर लिया और कंपनी बेचने की सोच को ना सिर्फ टाला बल्कि उन्होंने ठान लिया था कि वे कंपनी को ऊंचाइयों पर पहुंचाएंगे। रतन टाटा ने उस कंपनी को फिर से ऐसी खड़ी की उसने नया इतिहास रच डाला।  भारत लौटने के बाद उन्होंने अपना पूरा फोकस मोटर लाइन में लगा दिया उनके इरादे बुलंद थे। लक्ष्य बस एक था, फोर्ड को सबक सिखाना है। लेकिन चैलेंज बहुत बड़ा था। इसके लिए उन्होंने एक रिसर्च टीम तैयार की और बाजार का मन टटोला। फिर उस कार को फिर से लॉन्च किया।  कहते हैं न कि रेस्ट इज हिस्टरी, उसी तरह भारतीय बाजार के साथ-साथ विदेशों में भी टाटा इंडिका ने सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ कुछ ही समय में टाटा ने इस क्षेत्र में एक विश्वस्तरीय व्यवसाय स्थापित किया


समय का पहिया घूमा 2008 में टाटा मोटर्स के पास बेस्ट सेलिंग कारों की एक लंबी लाइन थी। 2008 में विश्वस्तरीय आर्थ‍िक मंदी हुई फोर्ड मोटर्स दिवालिएपन की कगार पर आ गयी उनकी प्रीमियम सेगमेंट कारें जगुआर और लैंड रोवर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थीं उसे अपने जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर) डिवीजन के लिए एक अच्छे खरीदार की तलाश थी। 

अवसर के महत्त्व को समझते हुए रतन टाटा ने फोर्ड की लग्जरी कार लैंड रोवर और जगुआर बनाने वाली कंपनी जेएलआर को खरीदने का प्रस्ताव रखा, जिसको फोर्ड ने स्वीकार भी कर लिया। बिल फोर्ड बातचीत के लिए मुम्बई आए और कहा कि रतन टाटा उनसे ये कारें खरीद कर उन पर बहुत बड़ा अहसान कर रहे हैं

रतन टाटा ने 2.3 बिलियन डॉलर में जेएलआर खरीद लिया। टाटा ने न केवल जेएलआर को खरीदा, बल्कि उन्होंने इसे अपने सबसे सफल उपक्रमों में से एक में बदल दिया। इस डील के कुछ ही सालों के बाद टाटा मोटर्स ने इसमें कुछ बदलाव लिए और आज जगुआर और लैंड रोवर्स टाटा मोटर्स की सबसे ज्यादा बिकने वाली कारों में से एक हैं।

रतन टाटा चाहते तो बिल फोर्ड का अपमान कर बदला ले सकते थे, लेकिन वे चुप ही रहे वे लकीर छोटी करने के बजाए बड़ी लकीर खींचने में यकीन रखते थे अगर किसी ने अपमान किया हो तो बेहतर है कि पहले से भे बेहतर मनुष्य बन जाइए यही उस व्यक्ति को सबसे अच्छा जवाब है कहते हैं, आम लोग अपमान का बदला तत्काल लेते हैं, पर महान उसे अपनी जीत का साधन बना लेते हैं। रतन टाटा के इस केस में यह कहावत चरितार्थ हुई कि ‘सफलता बदला लेने का सबसे अच्छा तरीक़ा है’

(चित्र साभार गूगल)