बुधवार, 23 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 15. साधना के चार हालात-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


15. साधना के चार हालात-2

15.2 शहादा - सबसे पहले कलमा पढ़ना पड़ता है। यह एक इस्लामी शपथ है। कलमा पढ़े बिना कोई मुसलमान हो ही नहीं सकता। कलमा तौहीद के सिद्धांत का अंग है। कलमा मुसलमान होने की घोषणा है, जो इस प्रकार है : ला इलाहा इलअल्लाह मुहम्मदन रसूल अल्लाह अर्थात् अल्लाह के सिवा कोई अल्लाह नहीं है और मुहम्मद उसके रसूल हैं। इसे शहादा  कहते हैं इस अरबी शब्द का अर्थ "गवाही देना होता है’’ इसे केवल एक शाब्दिक गवाही या बाहरी घोषणा नहीं माना जाता, बल्कि इसे आध्यात्मिक सत्य और आत्म-साक्षात्कार का सर्वोच्च मार्ग माना जाता है। यह इस बात का एलान करना होता है कि अल्लाह (ईश्वर) एक है और मुहम्मद अल्लाह (ईश्वर) के भेजे गए प्रेषित (पैगम्बर) हैं। शहादा का पहला भाग है "ला इलाहा" (कोई ईश्वर नहीं है)। सूफीमत में इसका अर्थ है अपने अहंकार (नफ्स), दुनिया के झूठे आकर्षणों और अल्लाह के अलावा हर उस चीज़ के अस्तित्व को नकार देना जो इंसान को ईश्वर से दूर करती है। शहादा का दूसरा भाग है "इल्लल्लाह" (केवल अल्लाह है)। जब इंसान का अहंकार पूरी तरह मिट जाता है, तो उसे यह अहसास होता है कि ब्रह्मांड में केवल एक ही परम सत्य (अल्लाह) का अस्तित्व है। सूफी विचारधारा में शहादा का मतलब 'फ़ना' (अहंकार को मिटाना) और 'बका' (ईश्वर के प्रेम में अमर हो जाना) है, जहाँ साधक को यह अनुभव होता है कि अल्लाह के अलावा कुछ भी वास्तविक नहीं है।

15.3 तिलावत - क़ुरआन शरीफ़ का पाठ तिलावत करना होता है। रोज़ पांच दफ़ा नमाज़ पढ़नी होती है। चुनी हुई कुछ आयतों का पाठ करना पड़ता है। इसे अवराद कहते हैं। सूफीमत में तिलावत (मुख्य रूप से पवित्र कुरान का पाठ या सस्वर गायन) केवल शब्दों को दोहराना या एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि यह ईश्वर (अल्लाह) की वाणी के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव और आत्मा की शुद्धि का एक गहरा साधन है। अरबी भाषा में 'तिलावत' का मूल अर्थ "पीछे चलना" या "अनुसरण करना" होता है। सूफी संत इस शब्द के इसी गहरे अर्थ को अपनी साधना में शामिल करते हैं। सूफीमत में केवल कुरान की आयतों को ज़ुबान से पढ़ना काफी नहीं है। साधक (सालिक) हर शब्द के छिपे हुए रहस्यमयी और आध्यात्मिक अर्थों पर गहराई से विचार (तदब्बुर) करता है। तिलावत करते समय सूफियों का मानना है कि साधक का मन पूरी तरह सांसारिक विचारों से मुक्त होना चाहिए। इसे इस भावना के साथ पढ़ा जाता है मानो स्वयं अल्लाह सीधे उस साधक से बात (हुजूर-ए-क़ल्ब) कर रहा हो। चूँकि तिलावत का अर्थ 'अनुसरण करना' है, इसलिए सच्चे सूफी के लिए तिलावत का मतलब है ईश्वर के संदेश को अपने जीवन, चरित्र और कर्मों में उतारना। सूफी साधना में तिलावत को 'ज़िक्र' (अल्लाह का स्मरण) का ही एक सर्वोच्च और पवित्र रूप माना जाता है, जो दिल के मैल को साफ करके उसे 'इश्क-ए-हकीकी' (ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम) के लिए तैयार करता है।

15.4 ज़िक्र सूफ़ीमत के अनुसार ज़िक्र अल्लाह (ईश्वर) का निरंतर स्मरण या नाम-जप करने का एक आध्यात्मिक और भक्तिपूर्ण कृत्य है। ज़िक्र का शाब्दिक अर्थ 'याद रखना' या 'स्मरण करना' है। सूफ़ी साधना में इसका अर्थ हर पल ईश्वर को अपने मन में बसाना और उसे कभी न भूलना है। इसमें अल्लाह के दिव्य नामों, पवित्र आयतों या प्रार्थनाओं को बार-बार चुपचाप या बोलकर दुहराया जाता है। इसे तस्बीह (प्रार्थना माला) या उंगलियों पर गिना जाता है। अल्लाह का स्मरण करना, जिसमें छोटे वाक्यांशों या प्रार्थनाओं को मन में धीरे-धीरे या ज़ोर से या चुपचाप बार-बार दुहराया जाता है। यूं समझें कि यह एक "जाप" है जैसे अल्लाह - अल्लाह (ईश्वर), अल्लाहु अकबर (ईश्वर सबसे बड़ा है), सुभान अल्लाह (ईश्वर की जय हो), अल्हम्दुलिल्लाह (सभी प्रशंसा ईश्वर के कारण है), ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं है), बिस्मिल्ला हिर्रहमा निर्रहीम (ईश्वर के नाम पर, कृपालु, दयालु) ज़िक्र के कई भेद हैं। ज़िक्रेजली इसमें अल्लाह शब्द का  ज़ोर से उच्चारण किया जाता है। ‘ज़िक्रे सिर्री’ – इसमें अल्लाह अल्लाह’ का उच्चारण हल्की सी आवाज़ में किया जाता है। ज़िक्रे-ख़फी मुंह बंद कर नाम लिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य साधक के हृदय को दुनिया के मोह-माया से हटाकर पूरी तरह पवित्र करना और ईश्वर के प्रतिगामी प्रेम में लीन होना है।

15.5 मुराक़बामुराक़बा सूफ़ी शब्दावली में ध्यान को संदर्भित करता है। सूफ़ीमत के अनुसार मुराक़बा का अर्थ आध्यात्मिक ध्यान या अंतरावलोकन है। यह सांसारिक विकर्षणों से दूर होकर अपने हृदय और आत्मा को पूरी तरह ईश्वर की ओर केंद्रित करने की एक उच्च साधना है। 'मुराक़बा' शब्द अरबी भाषा के मूल शब्द 'र-क़-ब' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'देखना' या 'निगरानी करना' होता है। इसके माध्यम से एक व्यक्ति अपने आध्यात्मिक दिल पर देखता है और अपने रचयिता और अपने ख़ुद के परिवेश के साथ दिल के रिश्ते में अंतर्दृष्टि प्राप्त करता है। मुराक़बा का मुख्य आधार यह भावना है कि "ईश्वर मुझे हर पल देख रहा है"। साधक अपनी आँखें बंद करके इस विचार में डूब जाता है कि अल्लाह उसके विचारों, कर्मों और हृदय की स्थिति से पूरी तरह वाकिफ है। इस साधना के माध्यम से सूफ़ी अपने दिल की सुरक्षा करते हैं ताकि उसमें ईश्वर के अलावा किसी और (काम, क्रोध, लोभ या सांसारिक माया) का विचार प्रवेश न कर सके। इसे ही मन और चरित्र को शुद्ध करना कहा जाता है। मुराक़बा की शुरुआत में साधक अक्सर अपने रूहानी गुरु या शेख का ध्यान करते हैं। माना जाता है कि गुरु के माध्यम से मिलने वाला आध्यात्मिक प्रकाश (फ़ैज़) साधक के हृदय के सूक्ष्म केंद्रों को जागृत करता है। साधक क़ुरआन की कुछ आयतों को स्मरण करता हुआ ध्यान करता है साधक अल्लाहो हाज़िरी (परमात्मा मेरे साथ मौजूद है), अल्लाहो नाज़िरी (परमात्मा मुझे देखता है), अल्लाहो शाहीदी (परमात्मा मेरा गवाह है), अल्लाहो माअई (परमात्मा जो मेरे साथ है) आदि का उच्चारण करके अल्लाह का ध्यान करता है। मुराक़बा के वक़्त साधक न केवल लगातार मनमौजी स्थिति में रहता है, बल्कि वह इस बात पर भी संज्ञान देता है कि उसका मालिक के साथ पारस्परिक संबंध है। बताया गया है, "जो अल्लाह और आखिरी दिन में विश्वास करता है उसे केवल अच्छा बोलना चाहिए या चुप रहना चाहिए", मुराक़बा का साधक इसका पालन करता है जहाँ 'ज़िक्र' में जुबान या मन से अल्लाह का नाम बार-बार दोहराया जाता है, वहीं 'मुराक़बा' सन्नाटे और पूर्ण शांति में बैठकर केवल दिव्य प्रकाश और चेतना में लीन होने की अवस्था है। मुराक़बा सूफ़ियों की वह 'समाधि' या 'योग' की अवस्था है जिसके ज़रिए आत्मा का परमात्मा से सीधा और अलौकिक मिलन संभव हो पाता है।

15.6 मुजाहिदासूफ़ीमत के अनुसार मुजाहिदा का अर्थ आध्यात्मिक संघर्ष, आत्म-अनुशासन या कठिन तपस्या है। यह अपने भीतर की बुराइयों, सांसारिक इच्छाओं और अहंकार के खिलाफ एक निरंतर चलने वाली रूहानी जंग है। 'मुजाहिदा' शब्द अरबी भाषा के 'जिहाद' (संघर्ष) से ही निकला है, जिसे सूफ़ी संत 'जिहाद-ए-अकबर' (सबसे बड़ा संघर्ष/युद्ध) कहते हैं। सूफ़ी दर्शन में इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसका अपना 'नफ़्स' (लोभ, काम, क्रोध, और अहंकार) है। मुजाहिदा का मुख्य उद्देश्य इस नफ़्स को वश में करना और इसे पवित्र बनाना है। इसमें साधक अपनी शारीरिक सुख-सुविधाओं और दुनियावी इच्छाओं को सीमित करता है। साधक चित्त की वृत्तियों को रोकता है उसे आंख रहते हुए न देखने का, कान रहते हुए न सुनने का, मुंह रहते हुए न बोलने का, जीभ रहते हुए स्वाद न लेने का अभ्यास करना पड़ता है। इसके तहत कम खाना (क़िल्लत-ए-ताम), भूख से कम भोजन करना, कम सोना (क़िल्लत-ए-मनाम), रातों को जागकर इबादत (प्रार्थना) करना, कम बोलना (क़िल्लत-ए-कलाम), मौन धारण करना या केवल ईश्वर की चर्चा करना और अकेले रहना (क़िल्लत-ए-इख़्तिलात-ए-ख़ल्क), लोगों की भीड़ से दूर रहकर एकांत में साधना करना शामिल है। थकावट या आलस्य के बावजूद निरंतर ज़िक्र, मुराक़बा और प्रार्थना में लीन रहना मुजाहिदा का हिस्सा है। मुजाहिदा का अंतिम लक्ष्य आत्मा को इतना शुद्ध करना है कि वह ईश्वर (अल्लाह) के प्रकाश को ग्रहण करने और उनसे एकाकार होने के योग्य बन सके।

15.7 फ़िक्र सूफ़ीमत के अनुसार फ़िक्र  अर्थ गहन चिंतन-मनन, आध्यात्मिक विचार या आत्म-अवलोकन है। यह केवल सांसारिक चिंता नहीं है, बल्कि ईश्वर की रचना, ब्रह्मांड के रहस्यों और अपनी आत्मा की वास्तविक स्थिति पर गहराई से विचार करने की एक बौद्धिक और रूहानी प्रक्रिया है। सूफ़ी संतों के अनुसार, फ़िक्र वह साधन है जो बुद्धि को जागृत करता है और दिल को सत्य की राह दिखाता है। इसमें अल्लाह के गुणों का चिन्तन करना पड़ता है। तसव्वुफ़ में सबको छोड़कर केवल ईश्वर से ध्यान लगाने को फ़िक्र कहते हैं। यह साधना, तपस्या, तल्लीनता और संलग्नता का दूसरा नाम है। सूफ़ी मार्ग में ज़िक्र (नाम-जप) और फ़िक्र (चिंतन) को एक पक्षी के दो पंखों की तरह माना गया है। जहाँ 'ज़िक्र' से दिल में ईश्वरीय प्रेम और उपस्थिति का अहसास होता है, वहीं 'फ़िक्र' से मन को ज्ञान (मारिफ़त) और समझ मिलती है। बिना फ़िक्र के ज़िक्र केवल एक रस्म बनकर रह सकता है, और बिना ज़िक्र के फ़िक्र केवल शुष्क बौद्धिक बहस। फ़िक्र के तहत साधक अल्लाह की बनाई इस सुंदर सृष्टि, प्रकृति और ब्रह्मांड के नियमों को देखकर विस्मित होता है और उनके पीछे छिपी दिव्य शक्ति पर विचार करता है। फ़िक्र का एक बड़ा हिस्सा अपने स्वयं के कर्मों, विचारों और भूलों पर विचार करना है। साधक यह सोचता है कि उसने अपना दिन कैसे बिताया, कहाँ उसका अहंकार (नफ़्स) उस पर हावी हुआ और वह कैसे अपने चरित्र को और बेहतर कर सकता है। इसमें इस बात पर भी गहरा चिंतन किया जाता है कि यह भौतिक संसार अस्थायी है और आत्मा का असली घर ईश्वर के पास है। यह अहसास साधक को सांसारिक मोह-माया से दूर करने में मदद करता है। सूफ़ीमत में फ़िक्र का मतलब दिमाग को भटकाने वाली चिंताओं से मुक्त करके उसे पूरी तरह से सत्य और ईश्वर की खोज में लगा देना है।

15.8 समाअ सूफ़ीमत के अनुसार समाअ (Sama/Sama'a) का अर्थ "पवित्र संगीत, कविता और आध्यात्मिक गीतों का श्रद्धापूर्वक श्रवण" है। यह ईश्वर के प्रति प्रेम और परमानंद की भावना को जगाने का एक सशक्त आध्यात्मिक माध्यम है। 'समाअ' शब्द अरबी भाषा से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ 'सुनना' या 'श्रवण करना' होता है। सूफ़ी परंपरा में इसे केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को ईश्वर से जोड़ने वाली एक गंभीर साधना माना गया है। इसमें अल्लाह के नाम का कीर्तन करना पड़ता है। हू अल्लाह हू सूफ़ियों का परम प्रिय मंत्र है। समाअ में साधक केवल कानों से संगीत नहीं सुनता, बल्कि अपने 'दिल के कान' से दिव्य संदेशों और प्रेम को महसूस करता है। समाअ के दौरान जब सूफी संत या साधक ईश्वर के प्रेम में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो वे एक अलौकिक आनंद या भावातिरेक की अवस्था में पहुंच जाते हैं, जिसे 'वज्द'या 'हाल' कहा जाता है। वज्द की अवस्था में साधक अक्सर झूमने या नृत्य करने लगते हैं। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण तुर्की के मेवलेवी सिलसिले के 'घूमते हुए दरवेश' हैं, जो मौलाना जलालुद्दीन रूमी की परंपरा से प्रेरित हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिले के संतों (जैसे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो) ने समाअ को एक विशेष स्वरूप दिया, जिसे आज हम कव्वाली के रूप में जानते हैं। समाअ के बारे में सूफ़ी संतों का मानना है कि संगीत और सुंदर ध्वनियाँ आत्मा को उसकी सांसारिक सीमाओं से मुक्त करके सीधे परमात्मा के करीब ले जाती हैं।

15.9 तरीक़त (साधनमार्ग) तरीक़त का अर्थ है वह कार्य या प्रयत्न जिससे अभीष्ट तक पहुँचा जाए। यह वह व्यावहारिक और आंतरिक रास्ता है जिस पर चलकर एक साधक (मुरीद) अपने रूहानी गुरु (शेख़ या पीर) के मार्गदर्शन में ईश्वर (अल्लाह) के करीब पहुँचता है। 'तरीक़त' अरबी भाषा के शब्द 'तरीक़' से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'रास्ता' या 'पद्धति' होता है। इसमें बाहरी क्रिया-कलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा अल्लाह का ध्यान किया जाता है। तरीक़त अन्तःपक्ष पर वार्ता करती है, यानी हृदय को कैसे शुद्ध किया जाए, मन में ईश-प्रेम को कैसे उतारा जाए। तरीक़त के बिना हक़ीक़त को नहीं जाना जा सकता। इसका अर्थ आत्मशुद्धि या ब्रह्मज्ञान है। इसे उपासना कांड के रूप में समझा जा सकता है।  तरीक़त में साधक को अहं भाव छोड़ने का और इन्द्रियों पर अधिकार करने का अभ्यास करना पड़ता है। इसके लिए उसे भूख-प्यास सहनी पड़ती है, मौन रहना पड़ता है, एकान्त में रहकर साधना करनी पड़ती है।

शरीयत के नियमों का पालन करने से साधक दीक्षा पाने का अधिकारी बनता है। इसमें उसे गुरु की आज्ञा के पालन करने की क़सम लेनी पड़ती है। जब गुरु (पीर) सूफ़ी साधक (सालिक) को  अपने संरक्षण में ले लेता है, तो वह उसे तरीक़त के पालन में, यानी साधना में लगा देता है। इस प्रकार मुर्शिद (गुरु) मुरीद (साधक) को रास्ता बताकर उसमें अल्लाह के इश्क़ की चिनगारी सुलगा देता है यानी उसके लिए वह आध्यात्मिक निदेशक की भूमिका निभाता है।

एक शाम हज़रत राबिया रह. अपनी कुटिया के आगे सड़क पर किसी चीज़ की तलाश कर रही थीं। तभी वहां कुछ लोग आ गए। उनमें से किसी ने पूछा, आप किस चीज़ की तलाश कर रही हैं?

हज़रत राबिया ने जवाब दिया, मेरी सूई खो गई है, उसे ही खोज रही हूं।

सभी लोग सूई ढूंढ़ने में उनकी मदद करने लगे। कुछ देर के बाद उनमें से दूसरे ने कहा, यह सड़क तो बहुत बड़ी है, ... फिर रात होने वाली है, तब तो रोशनी भी नहीं होगी, उस पर सूई छोटी-सी चीज़ है। इस तरह हम कहां-कहां ढूंढ़ते रहेंगे। आप ठीक-ठीक जगह बता दीजिए कि वह कहां गिरी थी, वरना उसे खोजना तो बहुत ही मुश्किल है।

हज़रत राबिया ने उसकी बात ध्यान से सुनी और मौज़ूद तमाम लोगों से कहा, यह मत पूछो अगर आप मेरी सहायता कर सकते हों, तो कीजिए, अन्यथा चले जाइए।

इस पर लोग हतप्रभ हो उनका मुंह देखने लगे। तीसरे ने हज़रत राबिया से कहा, यह भी कोई बात हुई! आप यह क्यों नहीं बतातीं कि सूई कहां गिरी थी?

हज़रत राबिया ने जवाब दिया, सूई तो मेरे घर के अंदर कहीं गिरी थी।

इस पर वह व्यक्ति आश्चर्य से बोला,फिर आप बाहर यहां क्यों ढूंढ़ रही हैं?

हज़रत राबिया ने कारण बताते हुए कहा, क्योंकि यहां कुछ रोशनी है। घर के अंदर तो घोर अंधेरा है। ज़रा भी रोशनी नहीं है।

अब तो उस व्यक्ति को बात और भी रहस्यमयी लगी। उसने प्रश्न किया, यहां रोशनी होने से भी क्या होगा? सूई यहां तो गिरी ही नहीं। सही तो यह होगा कि थोड़ी रोशनी घर के अंदर ले जाई जाए, जिससे वहां सूई ढूंढ़ी जा सके।

हज़रत राबिया ने हंसते हुए कहा, इतनी सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आती? अपने अंदरूनी और रुहानी जीवन के लिए अपनी बुद्धि का प्रयोग क्यों नहीं करते? मैंने देखा है कि तुम सभी लोग उसे बाहर ही ढूंढ़ रहे हो और मैं अपने अनुभव से अच्छी तरह जानती हूं कि जिस चीज़ को तुम ढूंढ़ रहे हो, वह तुमने अपने अंदर खो दी है। जिस अल्लाह की रहमत और नूर की खोज तुम बाहर कर रहे हो, उसे तुमने अंदर ही खोया है। उस परमानंद को बाहर खोजने में व्यर्थ जीवन नष्ट न करो।

सूफ़ीनामा के अनुसार तरीक़त का अर्थ है आत्मशुद्धि, अंतःशुद्धि, दिल की पाकीज़गी, ब्रह्मज्ञान, अध्यात्म, तसव्वुफ़। ख़्वाजा ग़रीबनवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती ने कहा था जो लोग शरीअत में साबित क़दम रहते हैं, इसके तमाम अहकाम बग़ैर किसी कमी के अदा करते हैं, तो अक्सर वो दूसरे मरतबे पर पहुंचते हैं, जिसे तरीक़त कहते हैं। जब तरीक़त पर साबित क़दम होते हैं, बिना किसी कमी के सारे अहकाम व शर्तों को अदा करते हैं, तो वो मारफ़त के मुक़ाम पर पहुंचते हैं। जहां शनासाई व शिनाख्त का मुक़ाम आ जाता है, इसमें साबित क़दम रहने से हक़ीक़त के मरतबे पर पहुंचते हैं।

15.10 मारिफ़त (पहचान, समरसता) सूफ़ीमत के अनुसार मारिफ़त का अर्थ "दिव्य ज्ञान", "रहस्यवादी बोध" या "आत्मज्ञान" है। मारिफ़त को हम सिद्धावस्था या परम ज्ञान कह सकते हैं। यह कोरा ज्ञान नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार का हृदय से निकला हुआ ज्ञान है, जिसमें साधक द्वारा अपने पवित्र हृदय से ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और उनकी उपस्थिति का सीधा, आंतरिक अनुभव करना होता है। इसमें गहरी अनुभूति का अंश प्रचुर मात्रा में रहा करता है। आम ज्ञान (इल्म) किताबों को पढ़कर या सीखकर आता है, लेकिन मारिफ़त वह विशेष ज्ञान है जो ईश्वर स्वयं साधक के दिल पर सीधे प्रकट (इल्हाम) करते हैं। सूफ़ी संत कहते हैं कि "जिसने अपने आप को पहचान लिया, उसने अपने रब (ईश्वर) को पहचान लिया।" सूफ़ीमत के अनुसार शरीयत अमल करके और तरीक़त के रास्तों को अपनाने के बाद साधक का जीवन गंदगियों से पाक-साफ़ हो जाता है। इस तरह उसके मन में ईश-प्रेम जागृत हो उठता है। उसका हृदय शुद्ध होकर परम-लक्ष्य की ओर बढ़ने लगता है। उसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने की इस स्थिति से ही मारिफ़त का आरंभ होता है। मारिफ़त की स्थिति में उसेइर्फ़ान होने लगता है। इर्फ़ान कहते हैं ब्रह्मज्ञान को। जैसे-जैसे ब्रह्मज्ञान का स्वरूप उस पर खुलता है, साधक को नूर का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। उसे अब ईश्वरोन्मुख होते रहने की प्रेरणाएं मिलने लगती हैं। उसे अपने प्रियतम को पा लेने का दृढ विश्वास हो जाता है।

इस तरह से कठिन उपवास और मौन आदि की साधना द्वारा साधक की आत्मा परमात्मा को उपलब्ध होती है। जायसी ने अखरावट में कहा है,

      वेद वचन मुख सांच जो कहा।

      सो जुग जुग अहथिर होइ रहा।

जब साधक को मारिफ़त की प्राप्ति होती है, तो उसका हृदय ईश्वर के प्रेम और शांति (सकीना) से भर जाता है। वह दुनियावी चिंताओं और भटकाव से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। मारिफ़त के लिए साधक को साधना के प्रारंभिक सात मुक़ामों से गुज़रना होता। ये सात सोपान निम्नलिखित हैं :-

15.10 (क) तौबा प्रायश्चित, अनुताप, पश्चाताप : सूफ़ीमत के अनुसार तौबा (Tawbah) का अर्थ "सच्चे मन से पश्चाताप करना" या "ईश्वर की ओर लौटना" है। हज़रत अबू बकर केतानी ने तौबा के भाव की व्याख्या करते हुए बताया है कि यह पहले किए गए पापों का खेद है तथा फिर से पाप की तरफ़ झुकाव न हो इसकी सावधानी बरती जानी चाहिए। अल्लाह के लिए किए जाने वाले कामों की कमियां दूर की जानी चाहिए। दूसरों के प्रति जो ग़लत व्यवहार हो गया हो, उसका बदला चुका देना, ग़लत आहार से बढ़े हुए शरीर का ख़ून-मांस सुखा देना, यानी उसे कम कर देना और जिस मन ने पाप का मज़ा चखा है, उसे साधना की कड़ुवाहट का भी मज़ा चखाना। यह अनुताप या तौबा भय-जनित हो, तो भी काम करता है, पर जब वह प्रेम-जनित होता है, तो ज़्यादा अच्छा ठहरता है। सूफ़ी दर्शन में तौबा का मतलब है कि साधक अपने पिछले सभी पापों, बुराइयों और सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुंह मोड़कर अपनी आत्मा को अल्लाह (ईश्वर) की तरफ मोड़ लेता है। सूफ़ीमत में तौबा को एक आध्यात्मिक पुनर्जन्म माना जाता है। इसके बाद साधक का दिल एक कोरे कागज़ की तरह साफ हो जाता है, जिस पर आगे की रूहानी इबादत लिखी जाती है। प्रसिद्ध सूफ़ी संत ज़ुनून मिस्री के अनुसार, "आम लोगों की तौबा पापों से होती है, लेकिन उच्च सूफ़ियों (आरिफ़ीन) की तौबा ईश्वर के अलावा किसी भी अन्य चीज़ के विचार (ग़फ़लत) से होती है।"

15.10 (ख) ज़हद अपनी इच्छा से दारिद्र्य को अपनाना - आत्म-संयम : सूफ़ीमत के अनुसार ग़रीबी अपनाना, और अपनी ज़रूरतों को कम से कम पर ले आना ज़हद है। सूफ़ी विचारकों का मानना है कि अपनी इच्छा से दारिद्र्य अपना लेने से साधना शीघ्र फलवती होती है। सूफ़ी मत में ज़हद का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति जंगलों में भाग जाए या अपने परिवार और समाज को छोड़ दे। सूफ़ियों के अनुसार, असली ज़हद यह है कि दुनिया आपके हाथ में तो हो, लेकिन आपके दिल में न हो। यानी आप सांसारिक धन-दौलत और सुख-सुविधाओं का उपयोग तो करें, लेकिन उनके मोह में न बंधें। ज़हद का आधार यह समझ है कि यह भौतिक संसार (दुनिया) अस्थायी और क्षणभंगुर है, जबकि परलोक (आख़िरत) और ईश्वर का प्रेम ही शाश्वत और स्थायी है। इसलिए साधक नष्ट होने वाली चीज़ों के बजाय हमेशा रहने वाले सत्य को चुनता है।

15.10 (ग़) सब्र संतोष जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान। इसलिए चाहे जिस हालत में रहना पड़े, संतोष को प्रसन्नचित्त से स्वीकार करना ही सब्र है। सूफ़ी दर्शन के अनुसार, सच्चा सब्र वह है जिसमें साधक पर चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति आ जाए, वह लोगों के सामने अपनी मुश्किलों का रोना नहीं रोता और न ही ईश्वर से कोई शिकायत करता है। वह हर परिस्थिति को ईश्वर का फैसला मानकर मुस्कुराते हुए स्वीकार करता है। सूफ़ी मानते हैं कि सब्र करने वाले साधक का दिल पवित्र हो जाता है, क्योंकि कुरान में भी कहा गया है कि "बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।" प्रसिद्ध सूफ़ी संत जुनैद बग़दादी के अनुसार, "सब्र का मतलब है चेहरे पर शिकन लाए बिना दुखों के घूंट को पीना।"

15.10 (घ) शुक्र अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते रहना ही शुक्र है। सूफ़ी साधना में शुक्र केवल जुबान से 'धन्यवाद' कहना नहीं है, बल्कि दिल की गहराइयों से ईश्वर की हर नियामत (देना) को स्वीकार करना और हर हाल में खुश रहना है। एक आम इंसान केवल सुख मिलने पर धन्यवाद करता है, लेकिन एक सच्चा सूफ़ी कठिनाइयों, गरीबी और परीक्षाओं में भी शुक्र मनाता है। वह मानता है कि यदि ईश्वर ने उसे दुःख दिया है, तो उसमें भी कोई न कोई रूहानी भलाई छिपी होगी। शुक्र करने से साधक के भीतर का अहंकार (नफ़्स) टूटता है। जब व्यक्ति हर सफलता का श्रेय खुद को देने के बजाय ईश्वर को देने लगता है, तो उसका मन पवित्र हो जाता है। सूफ़ी दर्शन का यह दृढ़ विश्वास है कि जो साधक कृतज्ञ रहता है, ईश्वर उसे और अधिक रूहानी और व्यावहारिक सुख प्रदान करते हैं। महान सूफ़ी संत शेख सादी के अनुसार, "सांस के हर आने और जाने पर ईश्वर का शुक्र बनता है, क्योंकि हर सांस जीवन देती है और जाने वाली सांस जीवन की रक्षा करती है।"

15.10 (च) रिआज़ इंद्रियों का दमन ही रिआज़ है। सूफ़ीमत के अनुसार रिआज़ या रियाज़ का अर्थ "कठिन रूहानी अभ्यास", "आध्यात्मिक साधना" या "मन और इंद्रियों का प्रशिक्षण" है। इंद्रियां बेलगाम होती हैं। इन्हें क़ाबू में रखना चाहिए नहीं तो ये इंसान को गड्ढ़े में धकेलने के लिए तैयार रहती हैं। साधक को इनसे हर पल सावधान रहने की ज़रूरत होती है। उन्हें हमेशा नियंत्रण में रखना ज़रूरी है। 'मुजाहिदा' जहाँ अपने अहंकार (नफ़्स) से लड़ने का संकल्प है, वहीं 'रियाज़' उस संकल्प को पूरा करने का दैनिक व्यावहारिक अभ्यास है। सूफ़ी मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए रियाज़ वह भट्टी है जिसमें तपकर उसका चरित्र और उसकी आत्मा सोने की तरह शुद्ध हो जाती है।

15.10 (छ) तवक्कुल अल्लाह की दया पर, उसके रहम पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। वह जो करेगा अच्छा ही करेगा। सूफ़ी आध्यात्मिक मार्ग (सुलूक) में यह एक अत्यंत उच्च और श्रेष्ठ पड़ाव (मकाम) माना जाता है, जहाँ साधक अपनी सभी चिंताओं, इच्छाओं और परिणामों को अल्लाह (अल-वकील) के सुपुर्द कर देता है। जब साधक तवक्कुल के स्तर पर पहुँचता है, तो वह मानता है कि उसके जीवन का असली रखवाला और योजनाकार केवल ईश्वर है। हदीस का एक प्रसिद्ध नियम है—"पहले ऊँट को रस्सी से बांधो, फिर अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा) करो।" तवक्कुल के मकाम पर पहुँचे सूफ़ी को कठिन से कठिन परिस्थितियाँ या पीड़ाएँ भी हतोत्साहित नहीं कर पातीं, क्योंकि वह हर परिस्थिति को ईश्वर की दिव्य योजना का हिस्सा मानता है और अपने दुखों में भी एक अलौकिक आनंद पाता है।

15.10 (ज) रज़ा अल्लाह की मर्ज़ी को अपनी मर्ज़ी बना लेना। जो मालिक की मर्ज़ी में विश्वास रखेगा, उसकी मर्ज़ी में ख़ुश रहेगा वह सुख, दुख, हर्ष, विषाद में समानता रख सकेगा। उसके विधान पर कभी कोई शिकवा-शिकायत नहीं करेगा। सूफ़ी साधना (सुलूक) के मार्ग में इसे एक अत्यंत ऊंचा मुकाम (पड़ाव) माना जाता है, जहाँ साधक का मन अल्लाह के हर फैसले से पूरी तरह संतुष्ट और खुश हो जाता है। रज़ा के मकाम पर पहुँचे सूफ़ी के लिए सुख-सुविधा और दुःख-तकलीफ दोनों बराबर हो जाते हैं। यदि अल्लाह उसे धन और प्रसिद्धि देता है, तो वह उसका शुक्र मनाता है; और यदि उसे गरीबी, बीमारी या विपत्ति मिलती है, तो भी वह उतनी ही खुशी और शांति से उसे स्वीकार करता है। उसके दिल में कभी यह विचार नहीं आता कि "मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?"

तवक्कुल और रज़ा के ऊपर एक बड़ी रोचक सूफ़ी कथा है।

एक फ़क़ीर कई दिनों से भूखा था। उसके दिल में यह इच्छा पैदा हुई कि इस समय कोई हलवा लाता। थोड़ी ही देर में एक आदमी हलवा से भरी कटोरी लेकर उसकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ।

फ़कीर ने उससे पूछा, इसे क्यों लाए हो?

उस व्यक्ति  ने कहा, आपके दिल में इच्छा हुई कि कोई हलवा लाता, इसलिए लाया हूं।

फ़कीर ने उसे वापस कर दिया। बोला, वापस ले जाओ इसे। यह हमारे काम का नहीं है।

वह आदमी चला गया। कुछ घंटे के बाद वही आदमी हलवा से भरी कटोरी लेकर फ़कीर की ख़िदमत में फिर से हाज़िर हुआ। इस बार फ़कीर ने बड़े चाव से हलवा खाया। हलवा खाकर जब वह फ़कीर वहां से चलने लगा, तो वह आदमी पूछ बैठा, हुजूर, हलवा तो वही था। पहले आपने इसे लौटा दिया। अभी आपने इसे क़बूल कर लिया। आख़िर ऐसा क्यों?

फ़कीर हंस पड़ा। बोला, बेटे! उस वक़्त मेरे मन में यह ख़्वाहिश पैदा हुई थी कि कहीं से हलवा आए तो खाऊं। नफ़्स की ख़्वाहिश से कोई चीज़ मिले तो उसे हर्गिज़ नहीं लेना चाहिए, वरना गुनहगार बनना पड़ता है। बाद में जब तूने दुबारा हलवे से भरी यह कटोरी लाई तो मेरी पहले की ख़्वाहिश मर चुकी थी। मैं समझ गया कि मालिक ने इसे भेजा है। इसको लौटाना गुनाह होता। इसलिए मैंने इसे मज़े ले-लेकर खाया।

तौबा, ज़हद, सब्र, शुक्र, रियाज़, तवक्कुल और रजा, साधक को इन सात सोपानों को पार करना होता है। जब वह इन सात सोपानों को पार कर लेता है, तो साधक को आत्मबल मिलता है और अंत में वह एक ऐसी स्थिति में आ जाता है, जहां उसमें अत्तेन्द्रीय अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता आ जाती है। वह चतुर्विध सोपानों का अधिकारी हो जाता है। इन सात सोपानों के द्वारा साधक अपने शरीर,  मन और इंद्रियों को साधता है। जब तन, मन और इंद्रियां सध जाते हैं, तब सालिक को अपने  मन के दर्पण में परमप्रिय ईश्वर की छवि दिखाई देने लगती है। इस प्रकार वह परमप्रिय के सुंदर रूप को निहारता है। उसकी सुंदर छवि को निहारते ही उसके मन में उसके प्रति प्रेम हिलोरें लेने लगता है। वह संसार से विरक्त हो एकांतप्रिय हो जाता है।

15.11 हक़ीक़त (सत्य-दर्शन, सत्य-ज्ञान) से अभिप्राय भक्ति और उपासना के प्रभाव से उत्पन्न सत्य के बोध से है। यह साधन नहीं, साधक की परम अनुभूति है। यह हिन्दू धर्म का ज्ञानकांड है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते साधक पर सत्य अनावृत्त हो जाता है। सत्य की पहचान, सत्य का दर्शन और सत्य का अनुभव ही हक़ीक़त है। यहां पहुंचकर साधक संसार के दुख-सुख से मुक्त हो जाता है। अल्लाह के सिवा उसे कुछ नहीं सुहाता। अब वह (साधक) होता है और उसका प्रियतम (परमात्मा)। हक़ीक़त की अवस्था को प्राप्त होकर साधक आत्म-भाव संक्रमण की ओर बढ़ता है। तब सम्मिलन और एकत्व भाव ज़ोर मारने लगता है। वह ख़ुद को उसमें मिटा देना चाहता है। जब आत्म-भाव सर्वथा निर्मूल हो जाता है, तब साधक के भीतर एक अद्भुत  उन्माद जाग्रत होता है।

किसकी शादी किसका ग़म,

हू अल्लाहू दम पर दम!

इस संसार में कौन उत्सव मना रहा है और कौन शोक में डूबा है—इस नश्वर और मायावी द्वंद्व से मेरा अब कोई वास्ता नहीं है। मेरी आत्मा तो अब उस परम अवस्था में पहुँच चुकी है जहाँ मेरी हर आती-जाती सांस (दम पर दम) केवल उस एक निराकार परमेश्वर (हू अल्लाहू) की गूँज और याद में डूबी हुई है। यह पूरी तरह से सांसारिक अहंकार के विसर्जन और ईश्वरीय प्रेम में डूब जाने की अभिव्यक्ति है। इस अवस्था में वह स्वयं का तो होता ही नहीं है, उसे सब तरफ़ उसीका जल्वा, ‘उसीका नूर दिखाई देता है। बेख़ुदी की इस अवस्था को सुक्र कहते हैं। सुक्र अर्थात नशा, मस्ती - ऐसी मस्ती जिसकी मिठास को रोम-रोम अनुभव कर रहा होता है। साधक रात-दिन प्रेमास्पद का चिंतन करते रहता है, उसी की लौ लगाए रहता है। प्रेमी जब प्रेमरस में डूब जाता है, तो सारी दुनिया अलग खड़ी होती है। सारे भेद भाव मिट जाते हैं। उसे न किसी की चिंता होती है, न किसी की फ़िकर। उसे न किसी का डर होता है, न किसी से वास्ता। उसे तो घट-घट में उसी प्रियतम की झांकी दीख पड़ती है।

आशिक़ों को इम्तियाज़े दैरो क़ाबा कुछ नहीं।

उसका नक़्शे पा जहां देखा वहीं सर रख दिया॥

फिर महामिलन का वह क्षण आ पहुंचता है जब आत्मा अपने मूल, अपने उद्गम, अपने स्वामी, अपने परम-प्रिय में विलीन होकर अपना व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त कर देती है। यही साक्षात्कार है जिसे सूफ़ियों ने फ़ना (विलय) कहा है।

तरीक़े फ़ना में क़दम रख के पूछो,

मुहब्बत की रस्में मुहब्बत की राहें।

परम तत्व में विलय के बाद आत्मा को एक नया जन्म प्राप्त होता है। अब वह अभिन्न रूप से अपने स्रष्टा में निवास करती है। इस अवस्था को बक़ा(अनश्वरता, नित्यता) कहा जाता है। इसी अवस्था को प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। सूफ़ी साधना पद्धति में कुन (हो जाना) से मकुन (ना होना) को ही शरीअत से फ़ना फ़ी अल्लाह की यात्रा कहते हैं जो दरअसल बक़ा बअल्लाह (अमरत्व) की अवस्था है। भाव रूप में एक होने के बाद सालिक एक नया जीवन प्राप्त करता है। यह एक नित्य जीवन व एक अनश्वर जीवन है। इस अनंत जीवन को प्राप्त करके साधक जीवन समर को जीत लेता है। यह अनुभव उसे वज्द की अवस्था में ले जाता है। वज्द की यह अवस्था बेख़ुदी की वह अवस्था है, उन्माद की स्थिति है, जिसके विषय में ग़ालिब ने कहा था, -

हम वहां हैं जहां से हमको भी

कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।

वज्द की अवस्था से सालिक को उसके अंतिम ध्येय वस्ल (ईश्वर-मिलन) की सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार इस अवस्था में आकर साधक परम आनंद का अनुभव करता है। यह आनंद अद्भुत, अपूर्व व अलौकिक होता है।  इस अपूर्व, अलौकिक, अद्भुत अनुभव की अवस्था को सह्व’ की अवस्था कहते हैं।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

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