महात्मा गांधी हत्या केस-28
19 जनवरी, 1948
उपवास से गांधीजी के 19 जनवरी के दैनिक कार्यक्रमों पर कोई असर नहीं पड़ा और उन्होंने अपना
सारा काम यथावत किया। वह सोमवार का दिन था, जो
उनके मौन और आराम का दिन होता था, लेकिन
उनके मन में इतनी बातें थीं कि वे चुप नहीं रह सकते थे। उन्होंने चरखा भी चलाया और
सूत काते। चूंकि डॉक्टरों ने उन्हें आराम की सलाह दी थी, इसलिए दर्शनार्थियों को दूर
से ही उन्हें दर्शन करने दिया गया। मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा को लेकर
महात्मा गांधी की भूख हड़ताल से सिख भी नाराज़ थे। सिखों को भी लग रहा था कि गांधीजी
ने हिन्दू और सिखों के लिए कुछ नहीं किया। दूसरी ओर, मुसलमानों ने प्रस्ताव पास करके कहा कि गांधीजी
ने उनकी निःस्वार्थ सेवा की है।
सुबह-सुबह दो लोग उनसे मिलने आए और कराची में
हिंदुओं और सिखों के साथ हुई भयानक घटनाओं के बारे में बताया। उनसे गांधीजी ने
कहा: "मैं पाकिस्तान जाना चाहता हूँ। जो बातें आपने मुझे बताई हैं, उन्हें लिखकर दे दीजिए। हालात ठीक करने के लिए
मैं ज़रूरी कदम उठाऊँगा।" उन्हें थोड़ी उम्मीद थी कि उपवास के दौरान जिन्ना
उन्हें कोई टेलीग्राम भेजेंगे, लेकिन
ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें उम्मीद थी कि भारत में मुसलमानों के प्रति उनकी हमदर्दी
का जवाब पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ हमदर्दी भरे बर्ताव से मिलेगा, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं मिला। शाम के समय, पाकिस्तान से आए एक प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के
बाद, उन्होंने गुस्से में कहा: "अब जिन्ना के
ज़रिए कोई समझौता नहीं हो सकता। किसी को पाकिस्तान जाने की ज़रूरत नहीं है। मुझे
भी वहाँ अपनी निजी हैसियत से नहीं जाना चाहिए।" लेकिन यह गुस्सा कुछ ही देर
के लिए था; और आने वाले दिनों में वे उस यात्रा के बारे
में कभी हिचकिचाहट के साथ, तो
कभी पूरे भरोसे के साथ बात करते रहे।
राष्ट्रवादी अख़बारों ने गांधीजी के उपवास की
समाप्ति और पाकिस्तान को रुपए लौटाए जाने वाली, इन दो ख़बरों को बोल्ड हेडलाइन के साथ हाइलाइट
किया और घोषणा की कि भारत सरकार ने आखिरकार 'गांधीजी के दबाव के कारण पाकिस्तान के सामने आत्मसमर्पण
कर दिया' पाकिस्तान के नेता 'अत्यधिक खुशी से भर गए', और हालांकि इसके खिलाफ खुले तौर पर कुछ भी नहीं
कहा गया था। जो कुछ हुआ था उस पर महात्मा गांधी के मन में दुख और आक्रोश की धारा थी।
भीड़ के साथ मिलकर प्रार्थना करने का काम
गांधीजी काफी दिनों से करते आ रहे थे। वह कहीं भी रहें खुले मैदान में प्रार्थना
करने का क्रम नहीं छोड़ते थे। सामने श्रोताओं की भीड़ होती थी। इस प्रार्थना सभा में
कुछ धर्मग्रंथों के चुने हुए छंद पढ़े जाते थे। भजन गाए जाते थे। आखिर में वह जन
सभा को चंद शब्द कहते थे। आमतौर पर उनका यह सन्देश प्रेस और रेडिओ के जारिए पूरे
देश में पहुँच जाता था। अधिकाँश समय में वह धार्मिक नहीं सामाजिक महत्त्व के विषय
पर बोलते थे। सभा में कोई भी शामिल हो सकता था। कोई रोक-टोक नहीं थी। कोई पूछताछ
नहीं की जाती थी। सबके सामने वह एक ऊंचे चबूतरे पर बैठते। ऐसे में उन्हें आसानी से
निशाना लगाया जा सकता था। लोग श्रद्धा से उनके पैर छूते। उन तक पहुँचना भी कठिन
नहीं था। देश में हिंसक भावनाएं भड़की हुईं थीं। हवा में नफ़रत की बू थी। लेकिन
गांधीजी तो प्रेम की शक्ति को छोड़कर किसी और तरीके से जी ही नहीं सकते थे। चालीस
साल पहले जोहान्सबर्ग में एक पठान ने जब उनको मारने की कोशिश की थी तो उन्होंने
कहा था, “बीमारी या किसी और ढंग से मरने के बजाए एक भाई
के हाथों मरना मेरे लिए दुःख का कारण नहीं हो सकता। अगर इस हालात में भी मैं अपने
हमलावर के खिलाफ क्रोध या घृणा के विचारों से मुक्त रहा तो मैं जानता हूँ कि वह
मेरे लिए शाश्वत कल्याण का कारण होगा।”
उपवास के बाद पहले दिन (19 जनवरी) गांधीजी को
कुर्सी पर बिठाकर प्रार्थना सभा में ले जाया गया। अपने भाषण में, जो बहुत धीमी आवाज़ में सुनाई दे रहा था, उन्होंने बताया कि हिंदू महासभा के एक अधिकारी
ने दिल्ली शांति प्रतिज्ञा को मानने से इनकार कर दिया है। गांधीजी ने इस पर खेद
व्यक्त किया।
हत्या की साज़िश
19 तारीख की सुबह-सुबह आप्टे और नाथूराम टैक्सी
से हिंदू महासभा भवन पहुँचे। उन्हें यह जानकर बहुत परेशानी हुई कि उनके तीन साथी, जो गायब थे, अभी तक नहीं आए थे। लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते
थे। नाथूराम और आप्टे पास की इमारत में सेक्रेटरी के ऑफ़िस गए और कुछ देर तक श्री
आशुतोष लाहिड़ी से बात की, या
कम से कम उनकी बातें सुनीं; वे
शांति समिति के ख़िलाफ़ गुस्से में बोल रहे थे।
हिन्दू महासभा दफ़्तर में काफी हलचल थी। पिछले
रोज़ गांधीजी के समक्ष उनके उपवास के उपरांत जिस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किया गया था
उसको लेकर बहस हो रही थी। आशुतोष लाहिड़ी की आलोचना हो रही थी कि कैसे महासभा की
तरफ़ से उस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया गया। समिति ने कहा था कि उनकी पार्टी ने
भी उस सात-सूत्रीय प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके
कारण गांधीजी ने अपना उपवास खत्म किया था। लाहिड़ी के अनुसार, महासभा ने ऐसा कुछ नहीं किया था; न ही उसने अपने किसी सदस्य को ऐसा करने के लिए
अधिकृत किया था।
निश्चय हुआ कि एक प्रेस वक्तव्य ज़ारी किया जाए
और स्पष्टीकरण दिया जाए कि हिन्दू महासभा के किसी सदस्य ने उस शपथ पत्र हस्ताक्षर
नहीं किया है। आप्टे और नाथूराम महासभा के कार्यालय में मौजूद थे। उन्हें अपने
दोनों सहयोगियों की चिंता सताए जा रही थी, जिनके बिना उनकी योजना पूरी ही नहीं हो
सकती थी। लाहिड़ी ने प्रेस विज्ञप्ति का मसौदा तैयार कर नाथूराम के हाथ में दिया।
अपनी ही धुन में खोया नाथूराम ने उस नोट को अपने जैकेट की जेब में रख दिया। आप्टे
ने लाहिड़ी से बंबई फोन करने की अनुमति मांगी। 15 रुपए, फोन करने की क़ीमत, जमा करने
के बाद आप्टे ने सावरकर सदन फोन लगाया। सुबह 9.20 बजे दिल्ली के 8024 नंबर से बंबई के 60201
नंबर पर ट्रंक कॉल किया गया था। दिल्ली का नंबर हिन्दू महासभा के सचिव के नाम था, बंबई में जिस आदमी को फोन किया गया था वह था दामले कसैया, जो सावरकर के लिए काम करता था। दामले उपलब्ध नहीं था। 11:30
बजे तक इंतज़ार करने के बाद, उसने
उस ट्रंक कॉल को कैंसिल कर दिया।
उस समय के भारत में, ट्रंक
कॉल करने में बहुत सी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती थी। कॉल को टेलीफोन एक्सचेंज में 'बुक' करना
पड़ता था, जहाँ कॉलर का नंबर, कॉल
बुक करने का समय, जिस व्यक्ति को कॉल किया गया उसका नंबर, उन विशिष्ट व्यक्तियों के नाम जिनसे कॉलर बात
करना चाहता था, कॉल को दी जाने वाली प्राथमिकता (सामान्य या, दोगुनी दरों पर, तत्काल), कॉल आने का समय, बातचीत
की अवधि और कॉल की लागत को एक रजिस्टर में सावधानीपूर्वक दर्ज किया जाता था। और चूंकि
लंबी दूरी की टेलीफोन कॉल महत्वपूर्ण लेनदेन थे, इसलिए
सब्सक्राइबर की जानकारी और अनुमति के बिना किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कॉल करने का
सवाल ही नहीं उठता था। इसलिए यह बहुत असंभव था कि लाहिड़ी या उनके संगठन में किसी
उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को यह पता न हो कि कॉल किसने बुक की थी।
यह कॉल, एक
तत्काल कॉल, सुबह 9:20 बजे बुक की गई थी। बॉम्बे में जिस
नंबर पर कॉल किया गया था, वह
सावरकर के घर का नंबर था। जिन लोगों से कॉलर बात करना चाहता था, उनके नाम जी. दामले (सावरकर के सचिव) या अप्पा
कासार (सावरकर के अंगरक्षक) बताए गए थे। बाद में जांच करने वालों ने इस कॉल का
फ़ायदा उठाने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि नाथूराम ने सावरकर के घर पर यह
पता लगाने के लिए कॉल किया था कि क्या गोपाल बॉम्बे से गुज़रा था। यह उनकी उस आम
धारणा के अनुरूप था कि दिल्ली जाने से पहले सभी साज़िशकर्ताओं को सावरकर से
निर्देश या कम से कम उनका आशीर्वाद मिला था। लेकिन, गांधीजी
की हत्या के बाद अधिकारियों और राजनेताओं में अचानक जो 'विच-हंटिंग' (दोषी ठहराने की अंधी दौड़) का जुनून सवार हुआ, उसके चलते कोई भी यह स्वीकार नहीं करना चाहता
था कि उसने सावरकर के घर फ़ोन किया था; इसलिए
यह रहस्य कभी नहीं सुलझ पाया कि फ़ोन किसने किया था। पुलिस का यह दावा कि नाथूराम
ने ही वह कॉल किया था, साबित नहीं हो सका। लेकिन, अगर यह साबित भी हो जाता, तो भी इससे उनका मकसद पूरा नहीं होता, क्योंकि कॉल कभी कनेक्ट ही नहीं हो पाया। 11:30
बजे तक इंतज़ार करने के बाद, जिसने
भी कॉल बुक किया था, उसने उसे कैंसिल कर दिया। इस कॉल का एकमात्र
मकसद जांच करने वालों के लिए एक साफ़ सुराग छोड़ना था, ताकि
सावरकर का नाम गांधी की हत्या की साज़िश से जोड़ा जा सके।
***
तभी करकरे, जो दरवाज़े पर खड़ा था, ने गोपाल
गोडसे को एक तांगे पर हिन्दू महासभा भवन में प्रवेश करते देखा। उसने कहा, गोपाल आ
गया। नाथूराम गोपाल की तरफ़ भागा और पूछा, कैसा है? सामान लाया? गोपाल ने कहा,
अच्छा हूं। सामान भी है। भवन में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई। उसके बाद, आप्टे और नाथूराम
नहाने और आराम करने के लिए गोपाल को कमरे में छोड़कर खुद फिर से बिड़ला हाउस चले
गए ताकि वहां के मैदान का एक और चक्कर लगा सकें।
करकरे और गोपाल शरीफ़ होटल, पाहवा जहां ठहरा था, चले
गए, जहां मदनलाल उन्हें देख कर ख़ुश हुआ। करकरे ने गोपाल का परिचय आम्चेकर से नहीं
कराया, बल्कि उससे (आम्चेकर से ) बोला कि मदनलाल की शादी अटेंड करने के लिए उन्हें
जालंधर के लिए निकलना है, इसलिए वह अपनी कोई और व्यवस्था कर ले। आम्चेकर का दिल्ली
का काम हो गया था और वह अब घर लौटना चाह रहा था। उसने करकरे को धन्यवाद दिया और
वहां से निकल गया। बाक़ी तीनों ने अपना सामान पैक किया और हिन्दू महासभा भवन के लिए
तांगा से चल पड़े।
आप्टे और गोडसे बिड़ला भवन गए थे यह पता करने के
लिए कि नौकरों के कमरे में कैसे घुसा जा सकता है। उन्होंने अपनी योजना को अंतिम
रूप दिया। शूटर नौकर के कमरे में घुसेगा। जैसे ही प्रार्थना मंच के दोनों ओर
बारूदों के पलीतों में आग लगेगी, शूटर गांधीजी पर गोली चलाएगा और उनकी तरफ़ ग्रेनेड
फेंकेगा। गैंग के बाक़ी सदस्य मंच के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो जाएंगे और भीड़ में
इधर-उधर ग्रेनेड फेंकेंगे। जिससे अफरा-तफरी मच जाएगी। इसका लाभ उठा कर वे भाग
जाएंगे।
इस
पूरी योजना के सूत्रधार आप्टे और नाथूराम ने बड़ी चालाक़ी से अपने-आपको
अस्त्र-शस्त्र चलाने से दूर ही रखा था!
शाम को आप्टे, नाथूराम और करकरे यह देखने
दिल्ली रेलवे स्टेशन गए कि बड़गे आया या नहीं। उसे नहीं पाकर वे हिन्दू महासभा भवन
आ गए। यह सोचकर कि शायद वे बड्गे और शंकर से वैसे ही चूक गए जैसे गोपाल से चूके थे, वे हिंदू महासभा भवन गए और पाया कि वे दोनों
सचमुच आ चुके थे। स्टेशन पर वे उनसे इसलिए चूक गए थे क्योंकि वे फ्रंटियर मेल से
नहीं, बल्कि पंजाब मेल से आए थे।
***
19 तारीख की शाम 9.30 बजे बड़गे और शंकर दिल्ली पहुंचे। तांगा से
वे हिन्दू महासभा भवन पहुंचे। वहां पर उन्होंने मदनलाल को एक आदमी के साथ हॉल में
बैठा पाया। मदनलाल ने बताया कि वह नाथूराम का छोटा भाई गोपाल गोडसे है। कुछ देर
बाद आप्टे, करकरे और नाथूराम महासभा भवन पहुंचे। वहां
उन्होंने पाया कि बड़गे और शंकर हिन्दू महासभा भवन में उसी कमरे में थे जहां पहले
से मदनलाल और गोपाल गोडसे ठहरे थे। दिल्ली में हिन्दू महासभा भवन में जब बड़गे आप्टे से मिला, उसने पैसे की मांग
नहीं की। लेकिन बड़गे ने उसे उसके द्वारा
दिए गए 350 रुपए के ख़र्चे का ब्यौरा दिया। आप्टे ने उन तीनों को उस रात हॉल में ही सो जाने को कहा। उस
रात करकरे और गोपाल एक ही कमरे में सोए। बगल के कमरे में आप्टे था। बड़गे, शंकर और
पाहवा को बाहर एंट्री हॉल में सोना पड़ा। नाथूराम होटल चला गया। वह कड़ाके की ठंड
वाली शाम थी और सर्दियों की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।
इस तरह 19 जनवरी की शाम तक सभी सात साज़िशकर्ता दिल्ली
पहुंच गए थे। उनके पास दो रिवॉल्वर, कुछ
गन-कॉटन स्लैब और कई हैंड-ग्रेनेड उपलब्ध कराए थे। दो रिवॉल्वरों में से एक सर्विस
हथियार था जो गोपाल गोडसे के पास उस समय से था जब वह विदेश में तैनात था। नाथूराम
के कहने पर वह उसे अपने साथ ले आया था। दूसरी .32 बोर की रिवॉल्वर बड़गे द्वारा
शर्मा से प्राप्त की गई थी, जो
उसका एक पुराना ग्राहक था, जिसे
उसने पहले इसे बेचा था। हैंड-ग्रेनेड और गन-कॉटन स्लैब सभी बड़गे द्वारा प्रदान किए
गए थे। विस्फोटक मदनलाल के बिस्तर के बंडल में आए थे। मुख्य साज़िशकर्ता, आप्टे और नाथूराम, बिना
किसी हथियार के आए थे।
गैंग दिल्ली में इकट्ठा था और उनकी
तैयारी पूरी हो चुकी थी!
शाम
के अख़बारों में एक और अच्छी ख़बर थी: गांधीजी, जिनकी सेहत उनके उपवास के आखिरी दो
दिनों में चिंता का विषय बनी हुई थी, अब तेज़ी से ठीक हो रहे थे। पूरी
उम्मीद थी कि वे अगले दिन प्रार्थना सभा में शामिल हो पाएंगे और वहाँ मौजूद लोगों
को संबोधित भी कर पाएंगे। इस तरह, एक
व्यावहारिक मुश्किल हल हो रही थी। वे गांधीजी की हत्या करने आए थे, लेकिन जब तक गांधीजी अपने बिस्तर
पर थे और कमरे से बाहर नहीं आते, तब तक
उनकी योजना को अंजाम देना आसान नहीं था। वे हमेशा अपने प्रिय शिष्यों से घिरे रहते
थे और केवल नियमित रूप से मिलने वाले लोग ही उनके कमरे में जा सकते थे। साज़िशकर्ताओं
को यह जानकर अच्छा लगा कि वे बाहर आने वाले थे; खुली जगह पर उनकी हत्या करना कहीं
ज़्यादा आसान होता।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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