गुरुवार, 3 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-18

                                   महात्मा गांधी हत्या केस-18

मदनलाल पाहवा

1947 के भारत-विभाजन के दौरान एक शरणार्थी के रूप में मदनलाल पाहवा पश्चिम पंजाब के मोन्टोगमेरी ज़िला के पकपत्तन गांव (अब पाकिस्तान में) से शरणार्थी के रूप में भारत आया था। उसका पुश्तैनी गाँव व ज़िला दोनों ही भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया था। उसने अत्याचारों का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। मदनलाल हिन्दू महासभा का एक सदस्य था। उसके पिता का नाम किशनलाल पाहवा था। वह निष्ठावान कांग्रेसी थे।

उसके पिता एक सख्त मिजाज के व्यक्ति थे और जब मदनलाल ने बचपन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में जाना शुरू किया था, तो उसके पिता इस बात से नाराज होकर अक्सर उसकी बेरहमी से पिटाई कर देते थे क्योंकि वे इसे सरकार-विरोधी गतिविधि मानते थे।  पिता के कड़े अनुशासन को झेल न पाने के कारण मैट्रिक की परीक्षा के पश्चात वह घर से भागकर रावलपिंडी आ गया। रावलपिंडी आने के बाद उसने खुद को ब्रिटिश भारतीय सशस्त्र बलों में भर्ती करा लिया और रॉयल इंडियन नेवी (शाही भारतीय नौसेना) में एक वायरलेस ऑपरेटर के रूप में काम करना शुरू किया। उसने इस पद पर रावलपिंडी के अलावा लाहौर, झेलम और बंबई में नौकरी की थी। 1946 में जब बंबई में कार्यरत था, वह अपनी परीक्षा पास करने में असफल रहा तो वह पूना चला गया और सेना में भर्ती हो गया। प्रशिक्षण की एक संक्षिप्त अवधि के बाद उसने रिहाई आदेश मांगा, और उसे एक रिहाई आदेश मिल गया। वह अपने घर लौट गया।

कुछ महीनों बाद, जब 1947 में बड़े पैमाने पर दंगे शुरू हुए, पंजाब के उसके इलाके से हिंदुओं को खदेड़ दिया गया, तो वह रिफ्यूजी लोगों के एक जत्थे का हिस्सा बन गया। उसे फिरोजपुर ले जाया गया। उसने पाकिस्तान छोड़ने से पहले अपने पिता और चाची को मुस्लिम भीड़ द्वारा हत्या करते देखा था। उसने इसका बदला लेने की शपथ खाई थी। उसने रोजगार हासिल करने के लिए अनेक प्रयास किए, लेकिन उसकी निरंतर विफलताओं ने उसके अन्दर नाराजगी की भावना को भर दिया।

फिरोजपुर में अपने परिवार से मिलने के बाद, वह अपनी मौसी के साथ रहने के लिए ग्वालियर चला गया। विभाजन के दौरान उसने जो सांप्रदायिक हिंसा और नरसंहार देखा था, उसके कारण उसके मन में अत्यधिक गुस्सा और बदले की भावना भरी हुई थी। जब पाहवा ग्वालियर में अपनी मौसी के पास रह रहा था, तब ग्वालियर में वह कुछ ऐसे कट्टरपंथी तत्वों के समूह में शामिल हुआ जो विभाजन का बदला लेने के लिए हिंसक गतिविधियों में शामिल थे। ग्वालियर में रहते हुए पाहवा का समूह सड़कों पर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने और ग्वालियर से भोपाल जाने वाली एक ट्रेन पर हमला करने जैसी गतिविधियों में लिप्त था। इस दौरान उसने हथगोले और पिस्तौल का इस्तेमाल करना भी शुरू कर दिया था।

ग्वालियर से उसका मन ऊब गया तो वह नौकरी की तलाश में दिल्ली और फिर वहाँ से बंबई आ गया और चेम्बुर के शरणार्थी कैम्प में रहने लगा। The Men Who Killed Gandhi में  मनोहर मलगोनकर लिखते हैं, मदनलाल अब बीस साल का हो चुका था। वह मज़बूत और गठीले बदन का आदमी था, जिसके बाल गहरे भूरे रंग के थे और मूँछें गहरे लाल रंग की थीं; वह गुज़ारा करने के लिए मेहनत करने और अपना हक़ पाने के लिए मुक्का चलाने से पीछे नहीं हटता था। उसके चेहरे पर हमेशा एक आक्रामक तेवर रहता था, जैसे वह दुनिया से नाराज़ हो। संक्षेप में कहें तो, वह एक ऐसा दबंग नौजवान था जिसे कोई भी कमांडो कैप्टन अपनी यूनिट में शामिल करके खुश होता।

बॉम्बे में मदनलाल को चेंबूर रिफ्यूजी कैंप में भेज दिया गया। यह कैंप उन लोगों की भीड़ का एक बड़ा ढेर जैसा था जिन्हें कोई नहीं चाहता था और जिन्हें शालीनता के नाते नज़रों से दूर रखा जाता था। वह एक अच्छा और आज्ञाकारी रिफ्यूजी नहीं बन पाया। हर सुबह वह शहर जाता और नौकरी की तलाश में उमस भरी सड़कों पर घूमता। नौकरी की तलाश में भटकते हुए मदनलाल को उसके एक मित्र ने रामनारायण रुइया कॉलेज बम्बई के हिन्दी अध्यापक डॉ. जगदीश चंद्र जैन (डॉ. जे.सी. जैन) से मिलवाया। अक्टूबर 1947 की शुरुआत में पाहवा प्रोफेसर डॉ. जे.सी. जैन के संपर्क में आया। पाहवा ने उनसे मदद की गुहार लगाते हुए कहा कि वह एक शरणार्थी था जिसने पाकिस्तान में अपना सब कुछ खो दिया था और हर संभव तरीके से अपना जीवन यापन करना चाहता था।  मदनलाल ने प्रो. जैन से कोई काम दिलाने के लिए कहा। प्रोफेसर जैन स्वभाव से बहुत दयालु थे और विभाजन के शरणार्थियों की मदद किया करते थे। जैन ने उसके लिए कई जगह बात भी की थी। डॉ. जैन, हिंदी के प्रोफेसर होने के साथ-साथ कई पुस्तकों के लेखक थे। उन्होंने उसे अपनी पुस्तकों की बिक्री के लिए एक एजेंट के रूप में नियुक्त किया और बिक्री की आय का पच्चीस प्रतिशत कमीशन पर उसे अपनी किताबों को बेचने के काम पर रख लिया। किताबें बेचना आसान नहीं था — और सच तो यह है कि मदनलाल ने उन्हें बेचने की बहुत कोशिश भी नहीं की। डॉ. जैन के सेल्समैन के तौर पर काम करने के दो महीनों में उसका कमीशन 50 रुपये से ज़्यादा नहीं हुआ।

चूंकि इस काम से उसका पेट भरने वाला नहीं था इसलिए उसने बम्बई में एक पटाखे की फैक्टरी 'मेसर्स वासेन पुष्पसेन' में भी काम करना शुरू कर दिया। जब मदनलाल डॉ. जैन की किताबें बेच रहा था, तब बॉम्बे की एक सोशल वर्कर, श्रीमती मोदक — जो रिफ्यूजी लोगों के लिए मुफ़्त मनोरंजन का इंतज़ाम करने के मकसद से शौकिया कलाकारों का एक ड्रामा ग्रुप शुरू करने के बारे में सोच रही थीं — ने उसे अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनने का प्रस्ताव दिया। लेकिन मदनलाल ने मना कर दिया, उसने श्रीमती मोदक को बताया, वह 'पटाखों के बिज़नेस' से जुड़ गया था।

इस नौकरी का उसके जीवन और आगे की साजिश पर बहुत गहरा असर पड़ा। वास्तव में यह फैक्टरी अवैध रूप से हैंड ग्रेनेड बनाती थी। पहले से ही नौसेना में रहने के कारण मदनलाल को तकनीकी समझ थी। इस फैक्ट्री में काम करते हुए उसने विभिन्न रसायनों, बारूद और विस्फोटकों को मिलाने तथा हथगोले (Hand Grenades) या घरेलू बम बनाने की तकनीक को बहुत करीब से सीख लिया। वह न सिर्फ़ फैक्ट्री की ग्रेनेड बनाने वाली मशीन पर काम करता था, बल्कि बने हुए ग्रेनेड के लिए सेल्समैन का काम भी करता था—एक ऐसा काम जिसके लिए प्रोफ़ेसर जैन की न बिकने वाली किताबें एक बेहतरीन आड़ का काम करती थीं।

जिन लोगों को मदनलाल किताब बेच पाया, उनमें से एक था दीक्षितजी महाराज, जो दादा महाराज का छोटा भाई था; दादा महाराज आप्टे की योजनाओं से बहुत प्रभावित था। किताब की कीमत 5 रुपये थी। क्या दीक्षितजी ने कुछ ग्रेनेड भी खरीदे थे, जिन्हें मदनलाल अक्सर अपनी किताबों वाले बैग में रखता था, यह बात दोनों में से किसी ने कभी नहीं बताई। ऐसा कोई लेन-देन नहीं हुआ, यह बात कम ही लगती है। आख़िरकार, अपने भाई की ओर से विस्फोटक और हथियार खरीदना दीक्षितजी का ही काम था, और ठीक इसी समय (अगस्त 1947 के आख़िर में) उसके भाई ने आप्टे को इशारा किया था कि वह उसे कुछ 'हैंड ग्रेनेड और डायनामाइट' दे सकता है। मदनलाल ने इन चीज़ों को उसे सप्लाई भी की।

इस फैक्ट्री में काम करने के दौरान ही एक दिन मशीन की गरारी (Gear) के बीच आ जाने से उसके हाथ की उँगलियाँ कट गई थीं। लेकिन उसने बिना किसी को शिकायत किए इस भयंकर दर्द को चुपचाप सहन किया, जिसने उसके अत्यधिक मानसिक जिद्दीपन को दर्शाया। मदनलाल ने कई साल बाद The Men Who Killed Gandhi  के लेखक मनोहर मलगोनकर को बताया, ‘वहां हर तरफ आधे-अधूरे बम पड़े थे। डॉक्टर को बुलाना खुदकुशी करने जैसा होता। इसलिए मैंने चाकू उठाया और उंगली काट दी।’

बम्बई में डॉ. जे.सी. जैन के यहाँ किताबें बेचने और पटाखा फैक्ट्री की नौकरी से मदनलाल संतुष्ट नहीं था। उसने खुद का फलों का स्टॉल (दुकान) लगाने की सोची। इस बीच ग्रेनेड हासिल करने के सिलसिले में मदनलाल पाहवा की हिन्दू महासभा के विष्णु करकरे से भेंट हुई। बडगे ने ग्रेनेड का दाम बढ़ा दिया था। करकरे ने सुना था कि बॉम्बे में सस्ते दाम पर ग्रेनेड खरीदना आसान है, क्योंकि वहाँ कई लोग उन्हें बनाते थे। वह पता लगाने के लिए बॉम्बे गया और वहाँ चेंबूर के रिफ्यूजी कैंप में उसे वह आदमी मिल गया — जो असल में हैंड ग्रेनेड बनाता था। उसका नाम मदनलाल पाहवा था।

मदनलाल से मिलकर करकरे बहुत प्रभावित हुआ और उसे अहमदनगर आ जाने के लिए कहा। उसने बताया कि अहमदनगर में भी शरणार्थी थे - 10,000 से ज़्यादा - और उनमें से कई पंजाब के उसी इलाके से थे जहाँ से मदनलाल था। उसने अहमदनगर को मौकों की जगह के तौर पर पेश किया; बॉम्बे में मदनलाल अपना समय बर्बाद कर रहा था। वैसे भी, उंगली ठीक होने तक मदनलाल को नई नौकरी की ज़रूरत थी। उसने यह भी कहा कि वह उसके रहने-खाने का बन्दोबस्त कर देगा और वहां उसे काफी व्यापार भी मिलेगा। मदनलाल को यह ऑफर बहुत अच्छा लगा। अहमदनगर में फलों की थोक आपूर्ति (सप्लाई सोर्स) और व्यापार की संभावनाओं को तलाशने में हर्ज़ ही क्या था? वह करकरे के साथ चला गया और अपने साथ एक स्टील का ट्रंक ले गया जिसमें मदनलाल के बनाए बम, कुछ विस्फोटक स्लैब और कुछ फ़्यूज़ वायर भरे थे। मदनलाल के लिए यह एक अहम फ़ैसला साबित हुआ। मदनलाल के जाने के कुछ ही घंटों बाद उस पटाखा फैक्टरी में पुलिस की रेड हुई और मालिक और मज़दूर सब पकड़े गए। मदनलाल बाल-बाल बचा! जैन से तो उसने हिसाब-किताब भी नहीं किया। बोला अगली बार आएगा, तो कर लेगा। अगर मदनलाल भी फ़ैक्ट्री में पकड़ा जाता, तो उसे पक्का कम से कम एक साल की जेल होती।

करकरे सेठ ने मदनलाल को फलों की दुकान खुलवा दी। वहाँ पहुँचने के दो हफ़्ते के अंदर ही उसने अहमदनगर में ही रहने का फ़ैसला कर लिया क्योंकि, उसका बिज़नेस बहुत अच्छा चल रहा था। इसके अलावा, उन दो हफ़्तों में उसकी दोस्ती एक स्थानीय लड़की से भी हो गई थी। विभाजन के समय पाकिस्तान से आए हिंदू और सिख शरणार्थियों के लिए अहमदनगर में एक बहुत बड़ा शरणार्थी शिविर बनाया गया था। मदनलाल भी एक पीड़ित शरणार्थी था, इसलिए इस शिविर के माहौल और वहाँ रहने वाले अपने जैसे अन्य लोगों के प्रति उसकी सहानुभूति थी। विभाजन की त्रासदी के कारण मदनलाल के मन में मुस्लिमों के प्रति बहुत गुस्सा था। विष्णु करकरे ने पाहवा के इसी गुस्से का इस्तेमाल अहमदनगर के स्थानीय मुस्लिम फल व्यापारियों के एकाधिकार को चुनौती देने और उन्हें डराने के लिए किया। मदनलाल वहाँ आक्रामक गतिविधियों का नेतृत्व करने लगा और उसने अहमदनगर में कुछ मुस्लिम विरोधी रैलियों और दुकानों पर देसी बमों से हमले भी किए।

अहमदनगर में मदनलाल ने इंतकामियों का एक दल का गठन किया। करकरे के मार्गदर्शन में इस दल ने अहमदनगर के मुसलमानों में आतंक फैलाना शुरू कर दिया। करकरे सेठ ने मदनलाल को व्यापार करने के लिए धन भी दिया था। करकरे के एहसान तले दबा मदनलाल मुसलमान व्यापारियों को भगा कर अपना फलों का व्यापार बढ़ाता गया। उसके मातहत न सिर्फ़ कई कर्मचारी थे, बल्कि कई मैनेजर भी काम करने लगे।

दिसंबर महीने में मदनलाल बंबई गया। वह दादर के शिवाजी पार्क में जैन के घर, मंगल निवास गया और उनसे मिला। जैन से मिलकर न सिर्फ़ उसका हिसाब-किताब चुकता किया बल्कि अपनी और करकरे की राम कहानी भी सुनाई। पाहवा ने अपनी भावनाओं और आकांक्षाओं के बारे में बातें की। मुसलमानों को भगाने में उसने क्या-क्या किया इसे भी बढ़ा-चढ़ा कर सुनाया। उसने उनसे यह भी कहा था कि वह ‘उन्हें अपने पिता के समान मानता था’।

दिसंबर 1947 के मध्य में पूना की अपनी नियमित यात्राओं में से एक के दौरान, करकरे मदनलाल को अपने साथ ले गया और उसे आप्टे और नाथूराम से मिलवाया। करकरे ने उन्हें मदनलाल के हैंड ग्रेनेड चलाने की दक्षता के बारे में भी बताया। आप्टे इस बात से बहुत खुश था कि उसे आखिरकार कोई ऐसा व्यक्ति मिल गया था जिसे विस्फोटक पदार्थों की जानकारी थी। चलो एक ऐसा आदमी तो मिला जो आगे चलकर उसके काम आ सकता है। वह उनसे बोला कि वे एक मिशन के लिए तैयार रहें, जिसकी सूचना जल्द ही दी जाएगी।

6 नवंबर 1947 को अहमदनगर ज़िले के ज़्यादातर हिस्सों में लोगों के हथियार ले जाने पर रोक लगाने का आदेश लागू किया गया था। और पुलिस को उम्मीद थी कि इससे सांप्रदायिक दंगों की सारी संभावना खत्म हो जाएगी। लेकिन जल्द ही पता चला कि अहमदनगर में किसी के पास हैंड ग्रेनेड का स्टॉक था, और 24 नवंबर से 26 दिसंबर के बीच उनमें से कम से कम चार ग्रेनेड फेंके गए थे। इनमें से एक बम खचाखच भरे सिनेमा हॉल, वसंत टॉकीज़ में फटा और दूसरा मुहर्रम के त्योहार पर निकल रहे मुसलमानों के जुलूस के बीच। हैरानी की बात यह है कि इनमें से किसी भी बम से कोई गंभीर नुकसान नहीं हुआ और न ही कोई मारा गया। मुहर्रम के जुलूस में फेंका गया बम तब फेंका गया जब जुलूस कपड़ा बाज़ार से गुज़र रहा था, जो अहमदनगर का सबसे भीड़-भाड़ वाला रास्ता है। इसी सड़क पर करकरे का डेक्कन गेस्ट हाउस भी था।

शुरू में, किसी ने भी इन बमों का संबंध करकरे या मदनलाल से नहीं जोड़ा। हालाँकि, शरणार्थियों द्वारा आयोजित कई प्रदर्शनों में दोनों की अहम भूमिका के कारण पुलिस उनके नामों से अच्छी तरह वाकिफ़ थी, लेकिन वे उन्हें हिंसक लोगों के बजाय आंदोलनकारी और नारेबाज़ ही मानते थे। एक बात यह भी थी कि ज़्यादातर पुलिस अधिकारी हिंदू थे। उन्हें शरणार्थियों के लिए सहानुभूति थी और साथ ही स्थानीय मुसलमानों के एक वर्ग के प्रति नाराज़गी भी थी, जिनके बारे में उनका मानना ​​था कि वे गुप्त रूप से कासिम रिज़वी और उनके रज़ाकारों के समर्थक हैं और जो अपने घरों और मस्जिदों पर पाकिस्तानी झंडा लगाकर शरणार्थियों को उकसाने में मज़ा लेते थे। कुछ पुलिसकर्मी तो मदनलाल और करकरे जैसे लोगों के प्रति सहानुभूति भी रखते थे, क्योंकि उनका मानना ​​था कि वे सिर्फ़ शरणार्थियों के लिए लड़ रहे थे।

यह महज़ एक संयोग था कि पुलिस करकरे का नाम बमों से जोड़ पाई। पुणे में कई महीने पहले हुए एक मर्डर की जाँच के दौरान, पुलिस को उस घर की तलाशी लेने की ज़रूरत महसूस हुई जहाँ करकरे का मैनेजर, एस.वी. केतकर रहता था। तलाशी में उन्हें केतकर का उस मर्डर से कोई संबंध नहीं मिला, लेकिन तलाशी के दौरान उन्हें एक स्टील का ट्रंक मिला जिसमें 'देसी हैंड ग्रेनेड, एक रिवॉल्वर, खंजर, विस्फोटक, फ़्यूज़ और पिस्तौल व राइफ़ल दोनों के लिए लगभग सौ राउंड कारतूस' थे। इसके अलावा, विशेषज्ञों ने ग्रेनेड की पहचान उसी तरह के ग्रेनेड के रूप में की, जैसे सिनेमा हॉल और मुहर्रम के जुलूस में फेंके गए थे। केतकर ने पुलिस को बताया कि वह ट्रंक उसके मालिक, करकरे ने उसके घर में रखा था। यह खोज 1 जनवरी को हुई और ज़ाहिर है, इसके बाद पुलिस ने करकरे के घर और होटल की तलाशी ली, लेकिन दोनों ही जगहों पर कोई आपत्तिजनक चीज़ नहीं मिली। इस घटना के बाद, करकरे को 'लगातार निगरानी में रखने का आदेश' दिया गया। करकरे और मदनलाल का समय बहुत ही मुश्किलों भरा हो गया था। फिर भी, ऐसा लगता है कि पुलिस ने करकरे के साथ कुछ ज़्यादा ही नरमी बरती।

1947 के दिसंबर के अंतिम सप्ताह में आप्टे बडगे के शस्त्र भंडार पहुंचा। उसने पूछा कि क्या उसका माल अभी भी है, बडगे ने बताया कि है, तो उसने कहा कि मेरा आदमी विष्णु करकरे दो-तीन दिनों में आकर ले जाएगा। लेकिन आप्टे ने अपना आदमी 9 जनवरी, 1948 को शस्त्र भंडार भेजा।

इसी बीच 5 जनवरी 1948  को अहमदनगर में कांग्रेस की एक सभा हो रही थी, जिसमें मदनलाल ने काफ़ी उत्पात मचाया और सभा नहीं होने दी। अहमदनगर की उस सभा में पाहवा ने कांग्रेसी नेता और प्रमुख वक्ता रावसाहेब पटवर्धन (अच्युतराव पटवर्धन के भाई) के हाथ से माइक छीन ली और धक्का देकर मंच से बाहर गिरा दिया। रावसाहब पटवर्धन जनसभा में विभाजन के बाद पैदा हुए सांप्रदायिक माहौल को शांत करने और हिंदू-मुस्लिम एकता पर भाषण दे रहे थे। पाकिस्तान से आए विस्थापित शरणार्थियों की दुर्दशा और मुस्लिम विरोध की भावना से भरे मदनलाल पाहवा को पटवर्धन की बातें रास नहीं आईं। वह गुस्से में अचानक दौड़कर मंच (व्यासपीठ) पर चढ़ गया और रावसाहब पटवर्धन के हाथ से जबरन माइक छीन लिया। माइक छीनकर पाहवा ने शरणार्थियों की पीड़ा और कांग्रेस सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाज़ी शुरू कर दी। इस उपद्रव के तुरंत बाद पुलिस ने मदनलाल पाहवा को हिरासत में ले लिया। लोकल पुलिस इंस्पेक्टर रज्जाक के नेतृत्व में पुलिस आई और मदनलाल को डांट डपट कर छोड दिया। बाद में गांधी हत्या केस की सुनवाई के दौरान उसने बताया कि पुलिस की उससे सहानुभूति थी क्योंकि वह मुसलिम विरोधी नारे लगा रहा था, इसलिए उसे गिरफ़्तार नहीं किया गया। आप्टे ने करकरे-मदनलाल को शीघ्र पूना बुलाया। 9 जनवरी को, अहमदनगर पुलिस के इंस्पेक्टर रज़ाक ने अपने सीनियर अधिकारियों को सिफारिश की कि मदनलाल और करकरे दोनों को हिरासत में रखा जाए। इस सिफारिश पर कार्रवाई होने और अंतिम आदेश जारी होने में तीन दिन लग गए। तब तक करकरे और मदनलाल दोनों भाग चुके थे—असल में, वे उसी दिन भाग गए थे जिस दिन रज़ाक ने उनकी गिरफ़्तारी की सिफारिश की थी। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिस विभाग में किसी दोस्त ने, जिसकी गुप्त फाइलों तक पहुँच थी, उन्हें इसकी खबर दे दी थी।

आप्टे के बुलाने पर करकरे-मदनलाल, दोनों 9 जनवरी को पूना के लिए रवाना हो गए। 9 जनवरी, 1948 को शाम 6.30 बजे आप्टे बडगे की दुकान पर आया और बोला कि कुछ देर में करकरे आएगा और सामान की जांच करेगा। 8.30 बजे अपने तीन साथियों मदनलाल, ओमप्रकाश और चोपड़ा के साथ करकरे आया। वह सामान देखना चाहता था। बडगे ने शंकर को उन्हें सामान दिखाने के लिए कहा। उस सामान में पलीते, हथगोले, बुलेट, पिस्टौल, प्राइमर और फ़्यूज़ थे। सामान की जांच कर वे चले गए।

नाथूराम के कार्यालय में गैंग की मीटिंग हुई। योजना पर चर्चा हुई। निश्चय हुआ कि चूंकि बडगे ने शस्त्रों के दाम बढ़ा दिए हैं, इसलिए किसी सस्ते स्रोत की खोज की जाए। मदनलाल की पुरानी फ़ैक्टरी बंद हो चुकी थी, लेकिन मदनलाल ने कहा कि वह चेम्बुर की किसी अन्य फैक्टरी से इसका इंतज़ाम करेगा। आप्टे ने करकरे और मदनलाल को फौरन बंबई जाकर जितना हो सके हैंडग्रेनेड और शस्त्र का बंदोबस्त करने के लिए कहा। वहां पर महात्मा गांधी के मारने की योजना बन रही थी।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

 

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