महात्मा
गांधी हत्या केस-20
11 जनवरी, 1948
11 जनवरी को कुछ राष्ट्रीय स्तर के
मौलाना गांधीजी से मिले। उन्होंने शिकायत की कि उनका जीना दुष्कर हो गया है।
पाकिस्तान उन्हें आश्रय नहीं देता और भारत में उन्हें उपेक्षा और अपमान सहना पड़
रहा है। इससे तो अंग्रेज़ी हुकूमत ही ठीक थी। अगर कांग्रेस उनकी सुरक्षा नहीं कर
सकती, तो उन्हें साफ़-साफ़ कह देना चाहिए, ताकि मुसलमान कहीं और जा सकें और रोज़-रोज़ के अपमान
और संभावित शारीरिक हिंसा से बच सकें। उन्होंने गांधीजी से निवेदन किया
कि वे उनके लिए कुछ पैसों का बन्दोबस्त कर दें ताकि वे विलायत चले जाएं। गांधीजी
अवाक रह गए। बोले, आप लोग राष्ट्रीय मुसलमान होकर ऐसा कहते हैं? मौलाना के पास
इसका कोई जवाब नहीं था। वे चले गए। उनके जाने के बाद गांधीजी काफ़ी मंथन करते रहे।
उन्हें लगा मौलाना का यह कथन उनकी आत्मा पर अंतिम कुठाराघात था। ऐसे अविश्वास से
दूषित वातावरण को शुद्ध करना ही होगा। ... और इसका एक ही उपाय था – आत्मबलिदान!
हो रही दुखद घटनाओं से गांधीजी की
अंतरात्मा बहुत दुखी थी। वह बहुत ही चिड़चिड़े हो गए थे। प्यारेलाल लिखते हैं, “उनके होंठों पर एक वाक्य अकसर रहता
था कि ‘क्या तुम नहीं देखते कि मैं अपनी चिता पर बैठा हूं?’ कभी-कभी कहते, ‘तुम्हें
पता होना चाहिए कि तुमसे ये बातें एक मुर्दा कर रहा है’ गांधीजी को जब मीरा
बहन ने पूछा, “आप ऋषिकेश आकर मेरे मवेशी केन्द्र का उद्घाटन करेंगे?” गांधीजी ने जवाब दिया, “एक लाश पर भरोसा करने से क्या
फ़ायदा?”
11 जनवरी को गांधीजी ने आंध्र से आए
एक पत्र का ज़िक्र किया और उसमें से ये ज़रूरी बातें बताईं:
"मुझे किसी व्यक्ति की कमियां बताना
बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन इंडियन कांग्रेस जैसी संस्था
- जो अपनी शुरुआत में महान थी और जिसकी उपलब्धियां काबिले-तारीफ़ हैं - के लोगों
में आई बुराई और उसके भयानक नतीजों से आंखें मूंद लेना बहुत गलत होगा। कांग्रेस
में यह बुराई उन लोगों की वजह से है जो प्रांतों की विधानसभाओं में जनता के
प्रतिनिधि हैं और जो आम कार्यकर्ताओं का ही नमूना हैं। वे बड़े ज़ोर-शोर से बड़े
पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार को रोकने की बात करते हैं, लेकिन फिर खुद उससे भी ज़्यादा
भ्रष्टाचार करते हैं। मेरी राय में, किसी प्रांत में बिना किसी विरोध के जनता पर छोड़े गए
ऐसे लगभग ढाई सौ विधायक सबसे बड़ी मुसीबत हैं। क्या इसलिए इतने सारे महान लोगों ने
- जो अब हमारे बीच नहीं हैं - तकलीफ़ें झेलीं और अपनी ज़िंदगी की हर कीमती चीज़
कुर्बान कर दी, ताकि गोरों के लालच की जगह काले
लोगों का लालच आ जाए? इस दलदल से निकलने का कोई न कोई
रास्ता तो ज़रूर होना चाहिए। अगर ये विधायक इतनी बड़ी संख्या में न हों, तो बुराइयां भी कम होंगी। हर प्रांत - जो भाषाई आधार
पर छोटा होने वाला है - के लिए निचली सभा में पचास सदस्य और ऊपरी सभा में उससे आधे
सदस्य रखने से यह परेशानी कम हो जाएगी। क्या संविधान बनाने वाले हमारे देश के
संविधान में 'संख्या जितनी कम, उतना अच्छा' के इस सिद्धांत को शामिल करेंगे और हमें लालची
विधायकों और साथ ही बहुत ज़्यादा खर्च से बचाएंगे?"
आंध्र से आए पत्र पर गांधीजी ने
टिप्पणी की: "हमारे नैतिक मानदंड इतनी तेज़ी से गिर रहे हैं कि अब मुझे समझ आ
रहा है कि अतीत में हमारे सत्याग्रह आंदोलनों में असली दम क्यों नहीं था और वे
कमज़ोर लोगों के निष्क्रिय प्रतिरोध (पैसिव रेजिस्टेंस) तक ही क्यों सिमट कर रह गए
थे। कांग्रेस को बचाने का एकमात्र उपाय एक ऐसे अध्यक्ष का होना है जो बढ़ती हुई
अफरातफरी के बीच दृढ़ता और निष्पक्षता से काम करे। इसके लिए कांग्रेस संगठन को
सत्ता की राजनीति के दबावों और खींचतान से ऊपर उठना होगा। अन्यथा कांग्रेस बिखर
जाएगी। ऐसी दुर्गति होने से बेहतर है कि इसे भंग ही कर दिया जाए। आज आंध्र से आया
पत्र मेरे लिए कांग्रेस के पतन और गिरावट का पक्का संकेत है। यदि उसमें कही गई
बातें सच हैं, तो क्या यह इस बात का सबूत नहीं है
कि हम केवल गुलाम बनने के ही लायक हैं?"
अखबारों में मुख्य रूप से माउंटबेटन और भारतीय राजाओं के बीच हो रही बातचीत की
खबरें थीं।
हत्या की साज़िश
रविवार (11 तारीख) की दोपहर को, मदनलाल की मुलाक़ात बंबई के दादर में प्लाज़ा सिनेमा
के सामने अपने प्रोफ़ेसर दोस्त डॉ. जैन से हुई और उसने उनसे कहा कि वह शाम को उनसे
मिलने आएगा। मदनलाल रात आठ बजे डॉ. जे.सी. जैन
के घर पहुंचा। जैन से मदनलाल की जान-पहचान उन दिनों से थी, जब वह चेम्बुर के
रिफ़्यूजी कैंप में रहता था। जब पाहवा पहुंचा उस समय डॉ. जैन का एक और दोस्त, अंगद सिंह नाम का टेक्सटाइल ब्रोकर, जो मदनलाल से पहले भी मिल चुका था, वहाँ मौजूद था। मदनलाल अहमदनगर में अपने कारनामों के
बारे में 'बड़ी-बड़ी बातें' करने लगा। उसने डॉ. जे.सी. जैन को बताया कि कैसे उसने
अहमदनगर में मुसलमानों को खदेड़ने के मक़सद से एक पार्टी बनाई थी और उस पार्टी को
उसके अच्छे दोस्त करकरा सेठ ने फ़ंड दिया था। उसने यह भी बताया कि उसने मुसलमानों की फलों और
सब्ज़ियों की दुकानें पहले ही अपने कब्ज़े में ले ली थीं। यह भी बताया कि जब कांग्रेस नेता रावसाहेब पटवर्धन
सहनशीलता का उपदेश देने आए और उन्होंने कहा कि हिंदुओं को मुसलमानों को अपना भाई
समझना चाहिए, तो वह, 'उनके पास दौड़कर गया, चाकू निकाला, उनका कॉलर पकड़ा और उन्हें चुनौती दी कि अगर हिम्मत
हो तो अपनी बात दोहराएँ।' फिर मदनलाल ने 'अपनी जेब से कुछ मराठी अख़बार निकाले और डॉ. जैन को
देते हुए कहा कि उनमें उसकी तारीफ़ की गई थी।' इत्तेफ़ाक से, न तो जैन और न ही अंगद सिंह मराठी अच्छी तरह पढ़ सकते
थे, और वैसे भी जैन को इस बात में
ज़्यादा दिलचस्पी थी कि मदनलाल उसके पैसे के बारे में क्या कहता है, न कि इस बात में कि अख़बारों में मदनलाल के बारे में
क्या लिखा था। लगभग 8:30 बजे अंगद सिंह चला गया। मदनलाल ने डॉ. जैन को बताया कि वह
एक महत्त्वपूर्ण काम से दिल्ली जा रहा है। मदनलाल ने जैन से यह भी कहा कि वह दिल्ली
जाने के पहले कुछ दिनों में फिर आएगा और उसके बकाया पैसे चुका देगा। फिर वह चेंबूर
वापस चला गया।
उस रात उसने अहमदनगर में रहने वाली अपनी प्रेमिका शेवंती को पत्र लिखा और कहा
कि वह अपना जवाब डॉ. जैन के पते पर भेजे। लेकिन उसने सोमवार देर तक पत्र पोस्ट
नहीं किया, जिसके कारण शेवंती को वह पत्र
बुधवार, 14 जनवरी की सुबह तक नहीं मिला। और
इस तरह वीकेंड बीत गया; एक शांत वीकेंड।
25 दिसंबर, 1947 को मदनलाल का एक
दोस्त उसे एक "गायन करने वाली लड़की" से मिलवाने ले गया था। उसका नाम
था: शेवंती, एक यौनकर्मी की 19 वर्षीय बेटी । शेवंती ने अपनी माँ की यौन व्यापार में शामिल होने
की गुहार को ठुकरा दिया था, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि एक दिन कोई
"मनचाहा आदमी" उसे अपने साथ ले जाएगा और उसे सम्मानजनक जीवन जीने का
मौका देगा। उस दिन (25 दिसंबर) शेवंती घर पर नहीं थी। पाहवा दो दिन बाद अकेले ही शेवंती से मिलने
गया। उन्होंने बातें कीं। दोनों को प्यार हो गया। उसने शेवंती को उपहार दिए। उसने
शेवंती को शहर की हिंसक गतिविधियों में अपनी संलिप्तता के बारे में बताया। शेवंती
करकरे को पसंद नहीं करती थी। शेवंती ने एक बार पाहवा से कहा था: "क्या आपको
एहसास नहीं है कि लोग आपका सम्मान इसलिए करते हैं क्योंकि वे आपसे डरते हैं?" पाहवा ने उसकी ओर देखकर मुसकुराया।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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