महात्मा
गांधी हत्या केस-17
दीक्षित महाराज
दीक्षित महाराज पुष्टिमार्ग संप्रदाय
के प्रमुख 'दादा महाराज' का भाई था। दीक्षित
महाराज का असली नाम महन्त श्रीकृष्ण जीवनजी महाराज था। वह पुष्टिमार्ग वैष्णव
संप्रदाय का एक धनी और
प्रभावशाली धार्मिक गुरु था। उसका मुख्य ठिकाना मुम्बई के भुलेश्वर मंदिर के पास
स्थित परिसर में था, जिसे 'दीक्षित महाराज का
महाराज बाड़ी' या 'दीक्षितजी महाराज का
मंदिर परिसर' कहा जाता था।
दीक्षित महाराज 1939 से सामाजिक कार्यों में लगा था। 1942 से वह राजनीति में सक्रिय हो गया था। दोनों भाई हिन्दू क्रांतिकारियों को मुसलमानों के विरुद्ध
हमला करने के लिए फंड प्रदान किया करते थे। हिंदुओं
को लड़ाकू बनाने में मदद करने के लिए उन्होंने गुप्त रूप से हथियार और विस्फोटक
जमा करना शुरू कर दिया था। ये हथियार उन हिंदुओं में मुफ्त बांटे जाने थे जो
निज़ाम के इलाके की सीमा से सटे क्षेत्रों में रहते थे, और विस्फोटक निज़ाम
के इलाके के भीतर ही ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए थे। अपने काम के इस पहलू की
जिम्मेदारी दादा महाराज ने अपने छोटे भाई, दीक्षितजी महाराज को सौंपी, जो मंदिर की संपत्ति
पर बने एक अपार्टमेंट में पास ही रहते थे। दोनों भाई एक-दूसरे के करीबी थे और एक
टीम के तौर पर काम करते थे; दादा महाराज आयोजक, फाइनेंसर और फैसले
लेने वाला व्यक्ति था, जबकि दीक्षितजी
बारीकियों का ध्यान रखता था। दीक्षित को 'अनुमत' हथियार (यानी ऐसे
हथियार जिन्हें खरीदने या बेचने के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती थी) सप्लाई
करने वालों में दिगंबर बडगे नाम का एक व्यक्ति शामिल था, जो पूना में रहता था
और 'शस्त्र भंडार' (हथियारों का गोदाम)
नाम के एक छोटे से व्यवसाय को चलाता था।
इन्होंने आप्टे को भी कई ऐसे कामों
को अंजाम देने के लिए धन दिए थे। दीक्षित बडगे को भी जानता था और उसे बुलेट प्रुफ
जैकेट बनाने का ऑर्डर दे चुका था। दिगम्बर बडगे अस्त्र-शस्त्र आपूर्ति करने वाले
व्यापारियों में से एक था। बंबई में जब भी
हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुआ करते थे, दीक्षित महाराज बडगे को अस्त्र-शस्त्रों का भारी
मात्रा में ऑर्डर दिया करता था। बडगे उसे लाइसेंसधारी,
यहां तक कि बिना लाइसेंसधारी पिस्टल, रिवाल्वर,
बन्दूक और अन्य विस्फोटक सप्लाई किया करता था। 1946 के अन्त में उसने बडगे
से छुरे ख़रीदे थे। इसका उसने अपनी रक्षा के लिए उन हिन्दुओं में वितरण किया था जो
बंबई राज्य के मुस्लिम प्रिन्सली स्टेट्स की सीमा के पास रहते थे। उन दिनों छड़ी भी
ले जाना निषेध था, इसलिए तबला आदि में छुपाकर बडगे ख़ंज़र लाया करता था।
इधर दीक्षित और दादा महाराज आप्टे की
चालाकियों से तंग आ चुके थे। इसका कारण यह था कि उसने पैसे तो बहुत लिए महाराज बंधुओं
से लेकिन किसी काम को वह अंजाम नहीं दे पाया था। उधर आप्टे को पारिवारिक स्तर पर काफी परेशानियों का सामना
करना पड़ रहा था। बेटे की मानसिक स्थिति काफी बिगड़ जाने के कारण उसे पुनर्वास
केन्द्र भेज देना पड़ा। इससे उसकी पत्नी चंपा काफी बीमार हो गई। उसका प्रेम प्रसंग
एक लड़की से चल रहा, जो गर्भवती हो गई थी। और अब दादा
महाराज ने किसी भी आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया था।
दूसरी तरफ़ नाथूराम अख़बार, जिसका नाम अब हिन्दू राष्ट्र
रख दिया था, को आगे बढ़ाने में लगा था। आप्टे की
परेशानी कमने का नाम नहीं ले रही थी। जिन लोगों ने उसकी योजनाओं में पैसे लगाए थे, अब परिणाम की अपेक्षा रख रहे थे। आप्टे को अपनी जीवन शैली को
बरकरार रखने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। नाथूराम को भी अपना प्रकाशन ज़ारी रखने के
लिए धन की ज़रूरत थी। दोनों एक दिन अपनी-अपनी किस्मत को चाय पीते हुए कोस रहे थे कि यकायक आप्टे बोला, “क्यों न हम गांधी की हत्या कर दें!” गोडसे की आंखें चमक उठीं। दोनों ने पहले भी गांधीजी
पर जानलेवा हमला किया था, पर सफल नहीं हुए थे। दोनों को लगा कि गांधीजी की हत्या कर दोनों का काफी नाम
हो जाएगा और ढेर सारे फंड देने वाले मिल जाएंगे।
आप्टे
को अपने काम के लिए अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता पड़ती थी, ताकि वह मुसलमानों पर हमला
कर सके। आप्टे ने करकरे को सूचना दी कि मिशन पर काम करने का समय आ गया है। उन
दिनों करकरे आप्टे के लिए अस्त्र-शस्त्र इकट्ठा करता था। इस काम के लिए ग्रेनेड की
भी ज़रूरत थी। बडगे ने अपने ग्रेनेड की क़ीमत बढ़ाकर 200 रुपए प्रति
ग्रेनेड कर दी थी। करकरे को मालूम हुआ कि बंबई में काफी सस्ते दर पर ग्रेनेड मिल
जाएगा। ग्रेनेड हासिल करने के सिलसिले में वह चेम्बुर के रिफ्यूजी कैम्प में गया।
वहां उसकी मुलाक़ात मदनलाल पाहवा से हुई।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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