सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
13.ज़िक्र (स्मरण करना)
क्या तुम नहीं जानते कि आकाश और धरती का राज्य केवल ईश्वर
के लिए है और उसके अतिरिक्त न कोई संरक्षक है और न कोई सहयोगी है। (क़ुरआन : 2/107)
पवित्र क़ुरआन की शुरुआत 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' से होती है , जिसका अर्थ है – “शुरू अल्लाह का
नाम लेकर, जो बड़ा कृपालु , अत्यंत दयालु है।” इस्लाम में किसी भी अच्छे काम की शुरुआत करने से पहले 'बिस्मिल्लाह' कहना बेहद बरकत (शुभ) माना जाता है। इसका उद्देश्य
कार्य में बरकत (आशीर्वाद) और अल्लाह की मदद प्राप्त करना है।
सूफ़ीमत में ज़िक्र के
मायने है अल्लाह के नामों, गुणों या
पवित्र वाक्यों को बार-बार दोहराकर ईश्वर को स्मरण करना है। 'ज़िक्र' अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ
है 'याद करना', 'स्मरण करना' या 'चर्चा करना'। सूफ़ियों के अनुसार जाने-अनजाने प्रत्येक आदमी अपनी साँसों के भीतर आने और बाहर जाने के साथ अल्लाह शब्द का उच्चारण करता है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है और साँसों के आने-जाने के साथ-साथ इन शब्दों का उच्चारण होता रहता
है। इसे ज़िक्र कहते हैं। यह सूफ़ी मत की सबसे महत्वपूर्ण
और बुनियादी साधनाओं में से एक है। इसमें ईश्वर के पवित्र नामों या वचनों का
लयबद्ध और लगातार उच्चारण किया जाता है। सूफ़ियों के सारे
सिलसिलों में ज़िक्र पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि रूहानियत के आला से आला
मुकाम व मरतबा हासिल करने के लिए ज़िक्र ज़रूरी है। रब की राह में सारा दारोमदार
ज़िक्र पर है, इसके बग़ैर कोई उस तक नहीं पहुंच
सकता। इसका उद्देश्य मन को सांसारिक मोह-माया से हटाकर पूरी तरह
से परमात्मा की याद में लीन करना है। ज़िक्र मकामे क़ल्ब से मकामे रूह तक
पहुंच जाता है। रूह सही हालत में रहे इसका
सबसे अच्छा इलाज ज़िक्र है। ज़िक्र का
मुख्य उद्देश्य इंसान के दिल (क़ल्ब) को दुनिया की चीज़ों से हटाकर सीधे
ईश्वर की याद में लगाना है, ताकि आत्मा शुद्ध हो सके। ज़िक्र
का मतलब सिर्फ ज़बानी
शोरगुल नहीं है बल्कि दिलो दिमाग बदन में एक कैफ़ियत तारी होना चाहिए। ज़िक्र से ख़ुद के कुछ न होने का और ख़ुदा का सबकुछ होने का एहसास होता है। इसे सूफी साधना या ध्यान का सबसे
महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिससे ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और आत्मिक शांति मिलती
है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ज़िक्र से मतलब यह है कि परमात्मा के
स्मरण द्वारा एक ऐसी अवस्था की प्राप्ति हो, जिसमें
साधक का मन समस्त जागतिक व्यापारों से हट कर परमात्मा की याद में लग जाए और उसके
सिवा उसे और किसी वस्तु का ज्ञान न रह जाए।
शौक़ है गर, हक़ परस्ती का, तो
सुन, ऐ
बेखबर!
कर परस्तिश ज़ाते मौला, देख
सूरत पीर की।
एक बार
हज़रत अली ने
पैगंबर सल्ल. से पूछा
कि परमात्मा को पाने का सहज रास्ता क्या है तथा किस प्रकार से सहज ही उसकी उपासना की
जा सकती है। तब पैगंबर ने बताया कि ‘उसके’ नाम का स्मरण और ज़िक्र ही उपासना का सहज रास्ता है। पैगंबर साहब ने फरमाया: "ऐ अली!
तुम्हारे लिए सबसे उत्तम और सहज रास्ता यह है कि तुम उठते-बैठते, हर हाल में
निरंतर (गुप्त और प्रकट रूप से) अल्लाह का ज़िक्र यानी उसका स्मरण करते रहो।" इस पर हज़रत अली ने कहा कि अल्लाह का ज़िक्र तो सभी लोग करते
हैं, आप मुझे कुछ ऐसा विशेष (खास) बताइए जो केवल मेरे लिए हो। तब
पैगंबर साहब ने हज़रत अली से अपनी आँखें बंद करने को कहा। पैगंबर साहब ने स्वयं
अपनी आँखें बंद कीं और बुलंद आवाज़ में तीन बार "ला इलाहा इल्लल्लाह" (अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है) का जाप किया, जिसे हज़रत अली ने ध्यान से सुना। इसके बाद हज़रत अली ने भी
ठीक इसी तरह आँखें बंद करके तीन बार इस पवित्र वाक्य को दोहराया और पैगंबर साहब ने
उसे सुना। सूफ़ी साधना (तसव्वुफ़) में इस घटना को बहुत ही ऐतिहासिक और बुनियादी
माना जाता है। इसे सूफ़ी संतों द्वारा गुरु-शिष्य परंपरा (मुरशिद-मुरीद) के तहत
मिलने वाली पहली 'दीक्षा' या गुप्त आध्यात्मिक ज्ञान (ज़िक्र की तल्क़ीन) माना जाता है।
इसी संवाद के बाद से सूफ़ी मत में ज़िक्र के दो मुख्य प्रकार प्रसिद्ध हुए, जिसका
ज़िक्र हम आगे करने जा रहे हैं।
सूफ़ियों के विभिन्न संप्रदायों में ज़िक्र के अलग-अलग नियम हैं और सूफ़ियों की उपासना का ताना-बाना इसी पर निर्भर है। इस्लामी अहकामात में ज़िक्र-ए-ज़ली (ज़ाहिर) और ज़िक्र-ए-ख़फी (पोशीदा) दोनों हैं। बुलंद आवाज़ में नाम लेना ‘ज़िक्र ए जली या जहरी’ कहलाता है। ‘जली’ शब्द का अर्थ ही होता है—"प्रकट, स्पष्ट या जो साफ़-साफ़ सुनाई दे।" साधक
ज़ोर-ज़ोर से अल्लाह के नाम का उच्चारण करता
है, और अपने दिल
और दिमाग को पूरी तरह ईश्वर की तरफ केंद्रित करता है, ताकि
परमात्मा के नाम के सिवाय अन्य कोई ख्याल ही उसके मन में न आए,
इसे
ज़िक्रे जली कहते हैं। कई सूफ़ी सिलसिले इसे सामूहिक रूप
से करते हैं। सामूहिक साधना (हल्क़ा) अक्सर एक घेरा या मंडली बनाकर (जिसे 'हल्क़ा-ए-ज़िक्र' कहते हैं) किया जाता है, जहाँ एक
आध्यात्मिक गुरु (पीर या मुरशिद) की देखरेख में सभी मुरीद एक साथ मिलकर आवाज़ (जैसे 'अल्लाह', 'हू', या 'ला इलाहा इल्लल्लाह') मिलाते हैं। इस
ज़िक्र के दौरान शरीर में एक विशेष लयबद्ध हलचल (जैसे सिर को दाएँ-बाएँ या
ऊपर-नीचे हिलाना) भी शामिल होती है, जो साधक को एकाग्र करने में मदद करती है। चिश्तिया सिलसिले
के सूफ़ियों का यही तरीक़ा है। चिश्ती जैसे
कुछ सूफ़ी सिलसिलों में इस प्रकट ज़िक्र को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कव्वाली
या आध्यात्मिक संगीत ('समा') का सहारा लिया जाता है, जिससे साधक 'वज्द' (परमानंद या दिव्य चेतना) की
स्थिति में पहुँच जाता है। क़ादरिया
सिलसिले वाले सूफ़ी ‘अल्लाह अल्लाह’ की हल्की सी पुकार करते हैं।
इसे ‘सिर्री ज़िक्र’ कहते हैं। नक़्शबंदी संप्रदाय के फ़क़ीरों में ज़िक्र-ए-ख़फ़ी का प्रचार
है और चिश्ती या क़ादिरी संप्रदायों में ‘ज़िक्र-ए-ज़ली’ का। ‘ला
इलाहा इल्लल्लाह’ को ज़िक्र नफ़ी व असबात कहते हैं। 'ज़िक्र नफ़ी व असबात' का अर्थ है नकारात्मकता का खंडन और एकमात्र
सत्य को स्वीकार करना। यह सूफी पद्धति में किया जाने
वाला एक बेहद गहरा आध्यात्मिक अभ्यास है, जिसमें
इस्लाम के मूल मंत्र "ला इलाहा इल्लल्लाह" का मानसिक या मौखिक जाप किया जाता है। मंत्र का पहला भाग है "ला इलाहा" (कोई पूज्य या
ईश्वर नहीं है). इसे 'नफ़ी' कहा जाता है। इसका उद्देश्य
साधक के दिल से सभी झूठे देवताओं, दुनिया के
भौतिक मोह, अहंकार (नफ़्स) और
अल्लाह के अलावा अन्य सभी सांसारिक इच्छाओं को पूरी तरह मिटाना या नकारना है।
मन्त्र का दूसरा भाग है "इल्लल्लाह" (सिवाय अल्लाह के). इसे 'असबात' कहा जाता है। जब दिल से
बाकी सब चीजें मिट जाती हैं, तब दिल में
केवल एक ही परम सत्य (अल्लाह) की मौजूदगी को स्थापित और स्वीकार किया जाता है। इसे
दिल को साफ करने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है। सूफ़ी संतों के अनुसार, ज़ोर-ज़ोर से
अल्लाह का नाम लेने से इंसान के आसपास का वातावरण शुद्ध होता है और उसके दिल पर
जमी हुई दुनियावी बुराइयों की परत (ज़ंग) कटती है, जिससे मन
शांत और पवित्र हो जाता है। इस ज़िक्र को करते समय सूफी साधक अक्सर सांसों की गति
को नियंत्रित करते हैं (जैसे योग में प्राणायाम किया जाता है)। 'ला इलाहा' कहते समय सांस को नाभि से ऊपर की ओर खींचते हैं और 'इल्लल्लाह' कहते हुए उस परम सत्य की चोट सीधे अपने दिल (क़ल्ब) पर
मारते हैं। प्रसिद्ध सूफी सुल्तान बाहू ने इस स्थिति को अपनी एक रबाई में बयां
किया है: "नफ़ी असबात दा पानी मिलया, हर रगें हरजाई हू" (अर्थात नफ़ी और असबात के पानी ने मेरी रूह की हर नस को सींच
दिया है)।
नक्शबंदी सिलसिले का तरीक़ा ‘दिल में नाम का ध्यान’ करना है। ‘दिल अल्लाह अल्लाह’ कह रहा है, वे ऐसा ध्यान रखते हैं। इस प्रकार
के जिक्र में साधक चुपचाप शांत भाव से मन ही मन परमात्मा का स्मरण करता रहता है, इसे ‘ज़िक्र-ए-ख़फ़ी’ कहते हैं। 'ख़फ़ी' शब्द का अर्थ ही होता
है—"गुप्त, छुपा हुआ या मौन।" इसे
अक्सर सबसे गहरी साधना माना जाता है। आँखें और होंठ बंद करके दिल से अल्लाह का नाम लेना, शांति से दिल ही दिल में अल्लाह को याद करना, ऐसा जप जो मन में किया जाए को ‘ज़िक्र ए ख़फ़ी’ कहते
हैं। इस साधना का मुख्य उद्देश्य बाहरी
दुनिया से पूरी तरह कटकर, अपने भीतर (दिल की गहराइयों में) ईश्वर की उपस्थिति को
महसूस करना है। साधक आंखें बंद किए, बिना
किसी प्रकार की आवाज़ किए
अपने श्वास-प्रश्वास पर ध्यान लगाए रहते हैं। इस विधि में जब सांस बाहर आती है तो
साधक 'ला इल्लाह'
कहता
है और जब सांस भीतर जाती है, तब
वह 'इल अल्लाह'
कहता
है। इसमें जीभ या होंठों को हिलाए
बिना, पूरी तरह चुप रहकर ज़िक्र किया जाता है। साधक के पास बैठे
व्यक्ति को भी पता नहीं चलता कि वह ज़िक्र कर रहा है। इसे सूफ़ियत में बेहद असरदार
माना जाता है। साधक अपना पूरा ध्यान अपने दिल (क़ल्ब) पर केंद्रित करता है।
माना जाता है कि निरंतर अभ्यास से एक समय ऐसा आता है जब साधक का दिल खुद-ब-खुद
(बिना किसी प्रयास के) हर धड़कन के साथ अल्लाह-अल्लाह पुकारने लगता है। यह साधना नक़्शबंदिया
सूफ़ी सिलसिले की मुख्य पहचान है। इस सिलसिले के सूफ़ियों का मानना है कि मौन
साधना से अहंकार (नफ़्स) बहुत जल्दी ख़त्म होता है और दिखावे (रिया)
की कोई गुंजाइश नहीं रहती। सूफ़ी संतों के अनुसार, ज़िक्र-ए-ख़फ़ी इंसान के अंतर्मन को साफ़ करता है। यह साधक को बहुत गहरे
मानसिक सुकून और दिव्य शांति (सकीना) की ओर ले जाता है, जहाँ वह सीधे
ईश्वर से जुड़ाव महसूस करता है।
सूफीमत में साँसों के नियंत्रण और उनके साथ की जाने वाली
साधना को हब्से-दम कहा जाता है। इसे सूफी परंपरा में "प्राणायाम"
का सूफी रूप भी माना जा सकता है, जिसमें सांस
को रोककर या एक निश्चित गति से लेकर अल्लाह का ध्यान किया जाता है। हब्से-दम का
शाब्दिक अर्थ है "सांस को रोकना" या "सांस पर नियंत्रण रखना"।
इसमें साधक अपनी सांसों की गति को नियंत्रित करना सीखता है ताकि मन को पूरी तरह
एकाग्र किया जा सके। पास-ए-अन्फ़ास का अर्थ है "सांसों की
रखवाली"। इस साधना में हर आती और जाती सांस के साथ ईश्वर का स्मरण (ज़िक्र)
किया जाता है। आमतौर पर सांस अंदर लेते समय 'ला इलाह' और सांस बाहर छोड़ते समय 'इल्लल्लाह' या अंदर लेते समय 'अल्लाह' और बाहर छोड़ते समय 'हू' का मानसिक जाप किया जाता है। इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य
चंचल मन (नफ़्स) को शांत करना, दिल को पवित्र करना और हर सांस के साथ अल्लाह की उपस्थिति
का अनुभव करना है।
सूफ़ी इतिहास (तसव्वुफ़) के अनुसार, जब मक्का से मदीना हिजरत (यात्रा) के दौरान पैगंबर
साहब और उनके साथी हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ के साथ दुश्मनों से बचने के लिए मक्का
के पास स्थित 'तौर' नाम की पहाड़ी की एक गुफा (ग़ारे तौर) में तीन दिनों तक शरण ली। जब दुश्मन ढूंढते हुए गुफा के
ठीक मुहाने (द्वार) तक पहुँच गए, तो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ अत्यंत चिंतित हो गए। पैगंबर
साहब ने हज़रत अबू बक्र को ढाढस बंधाया, जिसका ज़िक्र क़ुरआन (सूरह अत-तौबा, आयत 40) में भी है: "ला तहज़न
इन्नल्लाहा मअना" यानी "चिंता मत करो, बेशक अल्लाह
हमारे साथ है।" दुश्मनों के
इतने करीब होने के कारण वे ज़ोर से बोलकर या आवाज़ निकालकर अल्लाह को याद नहीं कर
सकते थे, क्योंकि ऐसा करने पर पकड़े जाने का ख़तरा था। इसी घोर संकट
के क्षण में, पैगंबर साहब ने हज़रत अबू बक्र को अपनी आँखें बंद करने को
कहा और बिना होंठ और जीभ हिलाए, दिल की धड़कनों और सांसों के माध्यम से मन ही मन अल्लाह को
याद करने का गुप्त तरीक़ा सिखाया। इस
गुप्त दीक्षा को सूफ़ी शब्दावली में 'तल्क़ीन' कहा जाता है। सूफ़ियों का मानना है कि इस गुफा के भीतर
पैगंबर साहब ने अपने सीने से आध्यात्मिक ज्ञान और 'नूर' (ईश्वरीय प्रकाश) को सीधे हज़रत अबू बक्र के सीने में
स्थानांतरित कर दिया था। सूफ़ीमत का 'नक़्शबंदिया' सिलसिला सीधे हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ से अपनी रूहानी कड़ियों (शजरा)
को जोड़ता है। इस सिलसिले में सामूहिक या ज़ोर-ज़ोर से ज़िक्र (ज़िक्र-ए-जली)
नहीं होता; बल्कि इसी ऐतिहासिक घटना का अनुसरण करते हुए केवल 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (मौन ध्यान) का अभ्यास किया जाता है। इसे नक़्शबंदिया
सिलसिले में 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' की
व्यावहारिक शुरुआत माना जाता है।
सूफ़ी परंपरा में 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (मौन या गुप्त स्मरण) की उत्पत्ति मुख्य रूप से पैगंबर
मुहम्मद (सल्ल.) के इस प्रसिद्ध वचन (हदीस) से मानी जाती है: "खैरुल-ज़िक्रिल-ख़फ़ी
व खैरुर-रिज़क़ि मा यकफ़ी" जिसका अर्थ
है "सबसे बेहतरीन ज़िक्र (स्मरण) वह है जो गुप्त (ख़फ़ी) हो, और सबसे
बेहतरीन आजीविका वह है जो पर्याप्त हो।" इस हदीस में पैगंबर साहब ने स्पष्ट
रूप से 'ख़फ़ी' (छुपे हुए या
मौन) तरीक़े से ईश्वर को याद करने को सबसे उत्तम दर्जा दिया है। हज़रत
आयशा (रज़ि.) से वर्णित हदीस के अनुसार, पैगंबर साहब
ने फ़रमाया कि "वह ज़िक्र-ए-क़ल्बी (दिल का गुप्त ज़िक्र) जिसे इंसान के
कर्म लिखने वाले फ़रिश्ते (किरामन कातिबीन) भी न सुन सकें, आम ज़िक्र से
सत्तर गुना अधिक श्रेष्ठ है।" क़ुरआन
की सूरह अल-अराफ़ (आयत 205) में भी मौन रहकर ईश्वर को याद करने का आदेश दिया गया है: "और अपने रब को अपने दिल में आज़ीज़ी (विनम्रता) और डर के
साथ याद करो, और बिना आवाज़ निकाले (मौन रहकर) सुबह और शाम..."
जिन सूफ़ी साधकों द्वारा “ज़िक्र-ए-ख़फ़ी” (पोशीदा या गुप्त जप) को भी महत्व दिया जाता है, उनके लिए जीभ द्वारा किसी
मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करना ज़रूरी नहीं है। न ही किसी आसन-विशेष पर बैठने की
ज़रूरत पड़ती है। यह ज़िक्र (स्मरण) एक अन्य साधना फ़िक्र (चिंतन) जैसा है। सूफ़ीमत में 'फ़िक्र' ( या तफ़क्कुर) साधना का अर्थ है—"गहन चिंतन, ध्यान या ईश्वरीय रहस्यों पर विचार करना"। जहाँ 'ज़िक्र' का संबंध जीभ और दिल से ईश्वर को याद करने से है, वहीं 'फ़िक्र' का संबंध बुद्धि, चेतना और मन
को अल्लाह की कारीगरी में लगाने से है। फ़िक्र साधना में साधक का चित्त
हमेशा अपने इष्ट की ओर लगा रहता है। ज़िक्र-ए-ख़फ़ी साधना का साधक अपने पवित्र
मंत्र को ही सब कुछ समझकर उसकी ओर ध्यान दिए रहता है। वह उसकी विधिवत आवृत्ति भी
करता रहता है। फ़िक्र की साधना में किसी मंत्र की ज़रूरत नहीं पड़ती। साधक
अपने चित्त को ईश्वर के नूर या दिव्य-ज्योति की ओर लगाए रहता है। यह क्रिया
उसके दैनिक जीवन में निरन्तर चलती रहती है। साधक
इस क्रिया को दोहराता हुआ अपने दैनिक जीवन
के सभी काम भी करता रहता है। फ़िक्र साधना का एक बड़ा हिस्सा खुद को जानना है।
साधक अपने विचारों, अपनी कमियों, अहंकार (नफ़्स) और अपने कर्मों पर गहराई से विचार करता है, ताकि वह अपने भीतर सुधार कर सके। फ़िक्र साधना आगे चलकर 'मुरक़बा' (गहरे ध्यान) का रूप ले लेती है। इसमें साधक बाहरी दुनिया से पूरी तरह आँखें
मूंदकर बैठ जाता है और इस बात पर विचार व अनुभव करता है कि ईश्वर उसे हर क्षण देख
रहा है। फ़िक्र गुप्त रूप से चलता रहता है। मलिक मुहम्मद जायसी ने
पद्मावत में कहा है,
परगट लोकाचार कहु बाता, गुपुत लाउ मन जासों राता।
इस पंक्ति
में सूफ़ीमत के 'ज़िक्र-ए-जली' (प्रकट स्मरण) और 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (गुप्त ध्यान) के अद्भुत समन्वय को बहुत ही सरल और लोक-भाषा (अवधी) में समझाया गया है। साधक
को संसार में रहते हुए सभी सांसारिक नियमों, सामाजिक दायित्वों और लोक-व्यवहार का पालन इस तरह करना चाहिए कि वह बाहरी रूप
से एक सामान्य इंसान दिखाई दे ("परगट लोकाचार कहु बाता")। वह दुनिया के
सामने किसी विशेष वैराग्य या साधना का दिखावा न करे। लेकिन भीतर ही भीतर, उसका मन, उसकी आत्मा और उसकी चेतना
हर क्षण अपने उस परम प्रियतम (अल्लाह/ईश्वर) में पूरी तरह लीन रहनी चाहिए जिससे
उसका सच्चा प्रेम है ("गुपुत लाउ मन जासों राता")। यह पंक्ति सीधे तौर
पर सूफ़ीमत के उस सिद्धांत को पुष्ट करती है जिसमें कहा जाता है कि "हाथ कार वल, दिल यार
वल" (यानी हाथ दुनिया के काम में
रहें, लेकिन दिल हमेशा यार यानी
ईश्वर के साथ रहे)। यह 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (मौन सुमिरन) का सबसे उत्तम व्यावहारिक उदाहरण है, जहाँ साधक दुनिया की बातें करते हुए भी भीतर से ईश्वर से जुड़ा रहता है।
सूफ़ी साधक नूर
मुहम्मद ने “अनुराग बांसुरी” में इस तरह की साधना को “मन की माला फेरने” का नाम दिया है। उन्होंने कहा है कि हृदय द्वारा अपने प्रियतम के नित्य चिंतन
या उसके स्मरण से साधना पूरी हो जाती है। वे प्रेमी धन्य हैं, जो ऐसी साधना किया
करते हैं।
मन के मालै
सुमिरें नेही लोग;
ध्यान और
सुमिरन सौं पूरन जोग!
धनि सनेह के
लोभें, जेहि दिन रात;
सुमिरन बिना
न दूसर कछू सुहात!
जो सच्चे प्रेमी (सूफ़ी साधक) होते हैं, वे हाथ में काठ या मोतियों की माला लेकर दिखावा नहीं करते। वे अपने 'मन रूपी माला' के मणकों को फेरते हैं, यानी दिल ही
दिल में (मौन रहकर) अपने प्रियतम (ईश्वर) को याद करते हैं। जब उनका ध्यान (फ़िक्र)
और यह आंतरिक सुमिरन (ज़िक्र) एक हो जाते हैं, तब उनका योग (अल्लाह से मिलन या विलीनीकरण) पूर्ण हो जाता है। वे साधक उस
दिव्य और अनमोल प्रेम के लोभ में इस कदर दीवाने होते हैं कि उन्हें दिन-रात सिर्फ
अपने प्रियतम की ही याद सताती है। उनके जीवन की ऐसी अवस्था हो जाती है कि उस परम
सत्ता के सुमिरन (याद) के बिना
उन्हें संसार की कोई भी दूसरी चीज़ अच्छी नहीं लगती। सांसारिक सुख-सुविधाएँ और महफ़िलें उनके लिए बेमानी हो जाती हैं। यह
पंक्तियाँ सूफ़ीमत के 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वरीय प्रेम) और 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (गुप्त
सुमिरन) का बेहतरीन उदाहरण हैं।
सूफ़ी मानते हैं कि जब प्रेम अपनी चरम सीमा पर होता है, तो साधक का रोम-रोम खुद-ब-खुद 'यार' (ईश्वर) के नाम का ज़िक्र करने लगता है, और यही अवस्था इंसान को परमात्मा से मिलाती है।
इसी तरह भक्त संत कबीरदास ने भी कहा है :
माला फेरत
युग गया, गया न मन का फेर।
माया मुई न
मन मुआ, मरि-मरि गया शरीर॥
फ़िक्र साधना मुराक़बा (ध्यान) से अलग होती है। मुराक़बा के लिए ख़िलवत
(एकांत-सेवन) ज़रूरी है। इन क्रियाओं का एकमात्र उद्देश्य यही समझा गया कि
उनके द्वारा भावोल्लास (वज्द) की अवस्था उत्पन्न हो। बहुत से सूफ़ी इसे ही भावाविष्टावस्था
कहते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि वज्द
के बाद ‘हाल’ की अवस्था आती है।
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मनोज
कुमार
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