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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-28

                                   महात्मा गांधी हत्या केस-28


19 जनवरी, 1948

उपवास से गांधीजी के 19 जनवरी  के दैनिक कार्यक्रमों पर कोई असर नहीं पड़ा और उन्होंने अपना सारा काम यथावत किया। वह सोमवार का दिन था, जो उनके मौन और आराम का दिन होता था, लेकिन उनके मन में इतनी बातें थीं कि वे चुप नहीं रह सकते थे। उन्होंने चरखा भी चलाया और सूत काते। चूंकि डॉक्टरों ने उन्हें आराम की सलाह दी थी, इसलिए दर्शनार्थियों को दूर से ही उन्हें दर्शन करने दिया गया। मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा को लेकर महात्मा गांधी की भूख हड़ताल से सिख भी नाराज़ थे। सिखों को भी लग रहा था कि गांधीजी ने हिन्दू और सिखों के लिए कुछ नहीं किया। दूसरी ओर, मुसलमानों ने प्रस्ताव पास करके कहा कि गांधीजी ने उनकी निःस्वार्थ सेवा की है।

सुबह-सुबह दो लोग उनसे मिलने आए और कराची में हिंदुओं और सिखों के साथ हुई भयानक घटनाओं के बारे में बताया। उनसे गांधीजी ने कहा: "मैं पाकिस्तान जाना चाहता हूँ। जो बातें आपने मुझे बताई हैं, उन्हें लिखकर दे दीजिए। हालात ठीक करने के लिए मैं ज़रूरी कदम उठाऊँगा।" उन्हें थोड़ी उम्मीद थी कि उपवास के दौरान जिन्ना उन्हें कोई टेलीग्राम भेजेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें उम्मीद थी कि भारत में मुसलमानों के प्रति उनकी हमदर्दी का जवाब पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ हमदर्दी भरे बर्ताव से मिलेगा, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं मिला। शाम के समय, पाकिस्तान से आए एक प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के बाद, उन्होंने गुस्से में कहा: "अब जिन्ना के ज़रिए कोई समझौता नहीं हो सकता। किसी को पाकिस्तान जाने की ज़रूरत नहीं है। मुझे भी वहाँ अपनी निजी हैसियत से नहीं जाना चाहिए।" लेकिन यह गुस्सा कुछ ही देर के लिए था; और आने वाले दिनों में वे उस यात्रा के बारे में कभी हिचकिचाहट के साथ, तो कभी पूरे भरोसे के साथ बात करते रहे।

राष्ट्रवादी अख़बारों ने गांधीजी के उपवास की समाप्ति और पाकिस्तान को रुपए लौटाए जाने वाली, इन दो ख़बरों को बोल्ड हेडलाइन के साथ हाइलाइट किया और घोषणा की कि भारत सरकार ने आखिरकार 'गांधीजी के दबाव के कारण पाकिस्तान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया' पाकिस्तान के नेता 'अत्यधिक खुशी से भर गए', और हालांकि इसके खिलाफ खुले तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया था। जो कुछ हुआ था उस पर महात्मा गांधी के मन में दुख और आक्रोश की धारा थी।

भीड़ के साथ मिलकर प्रार्थना करने का काम गांधीजी काफी दिनों से करते आ रहे थे। वह कहीं भी रहें खुले मैदान में प्रार्थना करने का क्रम नहीं छोड़ते थे। सामने श्रोताओं की भीड़ होती थी। इस प्रार्थना सभा में कुछ धर्मग्रंथों के चुने हुए छंद पढ़े जाते थे। भजन गाए जाते थे। आखिर में वह जन सभा को चंद शब्द कहते थे। आमतौर पर उनका यह सन्देश प्रेस और रेडिओ के जारिए पूरे देश में पहुँच जाता था। अधिकाँश समय में वह धार्मिक नहीं सामाजिक महत्त्व के विषय पर बोलते थे। सभा में कोई भी शामिल हो सकता था। कोई रोक-टोक नहीं थी। कोई पूछताछ नहीं की जाती थी। सबके सामने वह एक ऊंचे चबूतरे पर बैठते। ऐसे में उन्हें आसानी से निशाना लगाया जा सकता था। लोग श्रद्धा से उनके पैर छूते। उन तक पहुँचना भी कठिन नहीं था। देश में हिंसक भावनाएं भड़की हुईं थीं। हवा में नफ़रत की बू थी। लेकिन गांधीजी तो प्रेम की शक्ति को छोड़कर किसी और तरीके से जी ही नहीं सकते थे। चालीस साल पहले जोहान्सबर्ग में एक पठान ने जब उनको मारने की कोशिश की थी तो उन्होंने कहा था, बीमारी या किसी और ढंग से मरने के बजाए एक भाई के हाथों मरना मेरे लिए दुःख का कारण नहीं हो सकता। अगर इस हालात में भी मैं अपने हमलावर के खिलाफ क्रोध या घृणा के विचारों से मुक्त रहा तो मैं जानता हूँ कि वह मेरे लिए शाश्वत कल्याण का कारण होगा।

उपवास के बाद पहले दिन (19 जनवरी) गांधीजी को कुर्सी पर बिठाकर प्रार्थना सभा में ले जाया गया। अपने भाषण में, जो बहुत धीमी आवाज़ में सुनाई दे रहा था, उन्होंने बताया कि हिंदू महासभा के एक अधिकारी ने दिल्ली शांति प्रतिज्ञा को मानने से इनकार कर दिया है। गांधीजी ने इस पर खेद व्यक्त किया।

हत्या की साज़िश

19 तारीख की सुबह-सुबह आप्टे और नाथूराम टैक्सी से हिंदू महासभा भवन पहुँचे। उन्हें यह जानकर बहुत परेशानी हुई कि उनके तीन साथी, जो गायब थे, अभी तक नहीं आए थे। लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे। नाथूराम और आप्टे पास की इमारत में सेक्रेटरी के ऑफ़िस गए और कुछ देर तक श्री आशुतोष लाहिड़ी से बात की, या कम से कम उनकी बातें सुनीं; वे शांति समिति के ख़िलाफ़ गुस्से में बोल रहे थे।

हिन्दू महासभा दफ़्तर में काफी हलचल थी। पिछले रोज़ गांधीजी के समक्ष उनके उपवास के उपरांत जिस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किया गया था उसको लेकर बहस हो रही थी। आशुतोष लाहिड़ी की आलोचना हो रही थी कि कैसे महासभा की तरफ़ से उस शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया गया। समिति ने कहा था कि उनकी पार्टी ने भी उस सात-सूत्रीय प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके कारण गांधीजी ने अपना उपवास खत्म किया था। लाहिड़ी के अनुसार, महासभा ने ऐसा कुछ नहीं किया था; न ही उसने अपने किसी सदस्य को ऐसा करने के लिए अधिकृत किया था।

निश्चय हुआ कि एक प्रेस वक्तव्य ज़ारी किया जाए और स्पष्टीकरण दिया जाए कि हिन्दू महासभा के किसी सदस्य ने उस शपथ पत्र हस्ताक्षर नहीं किया है। आप्टे और नाथूराम महासभा के कार्यालय में मौजूद थे। उन्हें अपने दोनों सहयोगियों की चिंता सताए जा रही थी, जिनके बिना उनकी योजना पूरी ही नहीं हो सकती थी। लाहिड़ी ने प्रेस विज्ञप्ति का मसौदा तैयार कर नाथूराम के हाथ में दिया। अपनी ही धुन में खोया नाथूराम ने उस नोट को अपने जैकेट की जेब में रख दिया। आप्टे ने लाहिड़ी से बंबई फोन करने की अनुमति मांगी। 15 रुपए, फोन करने की क़ीमत, जमा करने के बाद आप्टे ने सावरकर सदन फोन लगाया। सुबह 9.20 बजे दिल्ली के 8024 नंबर से बंबई के 60201 नंबर पर ट्रंक कॉल किया गया था। दिल्ली का नंबर हिन्दू महासभा के सचिव के नाम था, बंबई में जिस आदमी को फोन किया गया था वह था दामले कसैया, जो सावरकर के लिए काम करता था। दामले उपलब्ध नहीं था। 11:30 बजे तक इंतज़ार करने के बाद, उसने उस ट्रंक कॉल को कैंसिल कर दिया।

उस समय के भारत में, ट्रंक कॉल करने में बहुत सी कागजी कार्रवाई करनी पड़ती थी। कॉल को टेलीफोन एक्सचेंज में 'बुक' करना पड़ता था, जहाँ कॉलर का नंबर, कॉल बुक करने का समय, जिस व्यक्ति को कॉल किया गया उसका नंबर, उन विशिष्ट व्यक्तियों के नाम जिनसे कॉलर बात करना चाहता था, कॉल को दी जाने वाली प्राथमिकता (सामान्य या, दोगुनी दरों पर, तत्काल), कॉल आने का समय, बातचीत की अवधि और कॉल की लागत को एक रजिस्टर में सावधानीपूर्वक दर्ज किया जाता था। और चूंकि लंबी दूरी की टेलीफोन कॉल महत्वपूर्ण लेनदेन थे, इसलिए सब्सक्राइबर की जानकारी और अनुमति के बिना किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कॉल करने का सवाल ही नहीं उठता था। इसलिए यह बहुत असंभव था कि लाहिड़ी या उनके संगठन में किसी उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को यह पता न हो कि कॉल किसने बुक की थी।

यह कॉल, एक तत्काल कॉल, सुबह 9:20 बजे बुक की गई थी। बॉम्बे में जिस नंबर पर कॉल किया गया था, वह सावरकर के घर का नंबर था। जिन लोगों से कॉलर बात करना चाहता था, उनके नाम जी. दामले (सावरकर के सचिव) या अप्पा कासार (सावरकर के अंगरक्षक) बताए गए थे। बाद में जांच करने वालों ने इस कॉल का फ़ायदा उठाने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि नाथूराम ने सावरकर के घर पर यह पता लगाने के लिए कॉल किया था कि क्या गोपाल बॉम्बे से गुज़रा था। यह उनकी उस आम धारणा के अनुरूप था कि दिल्ली जाने से पहले सभी साज़िशकर्ताओं को सावरकर से निर्देश या कम से कम उनका आशीर्वाद मिला था। लेकिन, गांधीजी की हत्या के बाद अधिकारियों और राजनेताओं में अचानक जो 'विच-हंटिंग' (दोषी ठहराने की अंधी दौड़) का जुनून सवार हुआ, उसके चलते कोई भी यह स्वीकार नहीं करना चाहता था कि उसने सावरकर के घर फ़ोन किया था; इसलिए यह रहस्य कभी नहीं सुलझ पाया कि फ़ोन किसने किया था। पुलिस का यह दावा कि नाथूराम ने ही वह कॉल किया था, साबित नहीं हो सका। लेकिन, अगर यह साबित भी हो जाता, तो भी इससे उनका मकसद पूरा नहीं होता, क्योंकि कॉल कभी कनेक्ट ही नहीं हो पाया। 11:30 बजे तक इंतज़ार करने के बाद, जिसने भी कॉल बुक किया था, उसने उसे कैंसिल कर दिया। इस कॉल का एकमात्र मकसद जांच करने वालों के लिए एक साफ़ सुराग छोड़ना था, ताकि सावरकर का नाम गांधी की हत्या की साज़िश से जोड़ा जा सके।

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तभी करकरे, जो दरवाज़े पर खड़ा था, ने गोपाल गोडसे को एक तांगे पर हिन्दू महासभा भवन में प्रवेश करते देखा। उसने कहा, गोपाल आ गया। नाथूराम गोपाल की तरफ़ भागा और पूछा, कैसा है? सामान लाया? गोपाल ने कहा, अच्छा हूं। सामान भी है। भवन में उनके ठहरने की व्यवस्था की गई। उसके बाद, आप्टे और नाथूराम नहाने और आराम करने के लिए गोपाल को कमरे में छोड़कर खुद फिर से बिड़ला हाउस चले गए ताकि वहां के मैदान का एक और चक्कर लगा सकें।

करकरे और गोपाल शरीफ़ होटल, पाहवा जहां ठहरा था,  चले गए, जहां मदनलाल उन्हें देख कर ख़ुश हुआ। करकरे ने गोपाल का परिचय आम्चेकर से नहीं कराया, बल्कि उससे (आम्चेकर से ) बोला कि मदनलाल की शादी अटेंड करने के लिए उन्हें जालंधर के लिए निकलना है, इसलिए वह अपनी कोई और व्यवस्था कर ले। आम्चेकर का दिल्ली का काम हो गया था और वह अब घर लौटना चाह रहा था। उसने करकरे को धन्यवाद दिया और वहां से निकल गया। बाक़ी तीनों ने अपना सामान पैक किया और हिन्दू महासभा भवन के लिए तांगा से चल पड़े।

 

 

आप्टे और गोडसे बिड़ला भवन गए थे यह पता करने के लिए कि नौकरों के कमरे में कैसे घुसा जा सकता है। उन्होंने अपनी योजना को अंतिम रूप दिया। शूटर नौकर के कमरे में घुसेगा। जैसे ही प्रार्थना मंच के दोनों ओर बारूदों के पलीतों में आग लगेगी, शूटर गांधीजी पर गोली चलाएगा और उनकी तरफ़ ग्रेनेड फेंकेगा। गैंग के बाक़ी सदस्य मंच के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो जाएंगे और भीड़ में इधर-उधर ग्रेनेड फेंकेंगे। जिससे अफरा-तफरी मच जाएगी। इसका लाभ उठा कर वे भाग जाएंगे।

इस पूरी योजना के सूत्रधार आप्टे और नाथूराम ने बड़ी चालाक़ी से अपने-आपको अस्त्र-शस्त्र चलाने से दूर ही रखा था!

शाम को आप्टे, नाथूराम और करकरे यह देखने दिल्ली रेलवे स्टेशन गए कि बड़गे आया या नहीं। उसे नहीं पाकर वे हिन्दू महासभा भवन आ गए। यह सोचकर कि शायद वे बड्गे और शंकर से वैसे ही चूक गए जैसे गोपाल से चूके थे, वे हिंदू महासभा भवन गए और पाया कि वे दोनों सचमुच आ चुके थे। स्टेशन पर वे उनसे इसलिए चूक गए थे क्योंकि वे फ्रंटियर मेल से नहीं, बल्कि पंजाब मेल से आए थे।

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19 तारीख की शाम 9.30 बजे बड़गे और शंकर दिल्ली पहुंचे। तांगा से वे हिन्दू महासभा भवन पहुंचे। वहां पर उन्होंने मदनलाल को एक आदमी के साथ हॉल में बैठा पाया। मदनलाल ने बताया कि वह नाथूराम का छोटा भाई गोपाल गोडसे है। कुछ देर बाद आप्टे, करकरे और नाथूराम महासभा भवन पहुंचे। वहां उन्होंने पाया कि बड़गे और शंकर हिन्दू महासभा भवन में उसी कमरे में थे जहां पहले से मदनलाल और गोपाल गोडसे ठहरे थे।  दिल्ली में हिन्दू महासभा भवन में जब बड़गे आप्टे से मिला, उसने पैसे की मांग नहीं की। लेकिन बड़गे ने उसे उसके द्वारा दिए गए 350 रुपए के ख़र्चे का ब्यौरा दिया। आप्टे ने उन तीनों को उस रात हॉल में ही सो जाने को कहा। उस रात करकरे और गोपाल एक ही कमरे में सोए। बगल के कमरे में आप्टे था। बड़गे, शंकर और पाहवा को बाहर एंट्री हॉल में सोना पड़ा। नाथूराम होटल चला गया। वह कड़ाके की ठंड वाली शाम थी और सर्दियों की हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।

इस तरह 19 जनवरी की शाम तक सभी सात साज़िशकर्ता दिल्ली पहुंच गए थे। उनके पास दो रिवॉल्वर, कुछ गन-कॉटन स्लैब और कई हैंड-ग्रेनेड उपलब्ध कराए थे। दो रिवॉल्वरों में से एक सर्विस हथियार था जो गोपाल गोडसे के पास उस समय से था जब वह विदेश में तैनात था। नाथूराम के कहने पर वह उसे अपने साथ ले आया था। दूसरी .32 बोर की रिवॉल्वर बड़गे द्वारा शर्मा से प्राप्त की गई थी, जो उसका एक पुराना ग्राहक था, जिसे उसने पहले इसे बेचा था। हैंड-ग्रेनेड और गन-कॉटन स्लैब सभी बड़गे द्वारा प्रदान किए गए थे। विस्फोटक मदनलाल के बिस्तर के बंडल में आए थे। मुख्य साज़िशकर्ता, आप्टे और नाथूराम, बिना किसी हथियार के आए थे।

गैंग दिल्ली में इकट्ठा था और उनकी तैयारी पूरी हो चुकी थी!

शाम के अख़बारों में एक और अच्छी ख़बर थी: गांधीजी, जिनकी सेहत उनके उपवास के आखिरी दो दिनों में चिंता का विषय बनी हुई थी, अब तेज़ी से ठीक हो रहे थे। पूरी उम्मीद थी कि वे अगले दिन प्रार्थना सभा में शामिल हो पाएंगे और वहाँ मौजूद लोगों को संबोधित भी कर पाएंगे। इस तरह, एक व्यावहारिक मुश्किल हल हो रही थी। वे गांधीजी की हत्या करने आए थे, लेकिन जब तक गांधीजी अपने बिस्तर पर थे और कमरे से बाहर नहीं आते, तब तक उनकी योजना को अंजाम देना आसान नहीं था। वे हमेशा अपने प्रिय शिष्यों से घिरे रहते थे और केवल नियमित रूप से मिलने वाले लोग ही उनके कमरे में जा सकते थे। साज़िशकर्ताओं को यह जानकर अच्छा लगा कि वे बाहर आने वाले थे; खुली जगह पर उनकी हत्या करना कहीं ज़्यादा आसान होता।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

रविवार, 20 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-27

 

महात्मा गांधी हत्या केस-27


18 जनवरी, 1948

18 जनवरी (उपवास का छठा दिन) को गांधीजी की हालत काफ़ी ख़राब हो गई। पेट में दर्द भी हो रहा था। वजन 107 पौंड बना हुआ था। यह बुरा लक्षण था। वे इतने थके हुए लग रहे थे कि डॉक्टर भी उनके बचने की उम्मीद खो बैठे थे। नेहरू भी निराश हो गए थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि अब उन्हें बचाना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे सुबह आगे बढ़ी, यह साफ़ हो गया कि कुछ अहम फ़ैसले लिए जा रहे थे।

शांति समिति ने गांधीजी को लिखित आश्वासन दिया कि सभी क़ौमों के लोग शांति के साथ रहना चाहते हैं। महात्मा गांधी को भरोसा दिया गया कि--महरौली में सूफ़ी संत कुतुबउद्दीन बख़्तियार काकी का उर्स हर साल की तरह मनाया जाएगा। मुसलमानों के जानमाल की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। मुसलमान दिल्ली के अपने घरों में जा सकेंगे। मस्जिदों को हिन्दुओं और सिखों के क़ब्ज़े से ख़ाली कराया जाएगा। मुसलमान इलाक़ों को अवैध कब्ज़ों से छुड़ाया जाएगा। डर से जो मुसलमान अपना घर छोड़कर भागे हैं उनके वापस आने पर हिन्दू आपत्ति नहीं जताएंगे। भागे हुए मुस्लिम शहर में वापस लौट सकते हैं। जो मस्जिद हिन्दू और सिक्खों के क़ब्ज़े में हैं, उन्हें मुसलमानों को लौटा दिया जाएगा। समिति ने गांधीजी से उपवास छोड़ देने का अनुरोध किया। इस बार के व्रत ने राजधानी में नंगा नाच दिखाने वाली पाशविकता को सचमुच वश में कर लिया था।

गांधीजी का कमरा खचाखच भरा हुआ था। पटेल, नेहरू, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र बाबू, पाकिस्तान के हाई कमिश्नर जाहिद हुसैन, दिल्ली के मौलाना, सिख नेता, आर.एस.एस. और हिंदू महासभा के नेता, सब उपस्थित थे। दिल्ली में पाकिस्तान के हाई कमिश्नर (राजदूत) जनाब ज़ाहिद हुसैन साहब भी मौजूद थे। राजेन्द्र बाबू ने सबों की ओर से गांधीजी से निवेदन किया कि गांधीजी उपवास भंग करें। गांधीजी ने कहा, आपके वायदों से मुझे आश्वासन हो गया है। यह आश्वासन मात्र दिल्ली तक सीमित नहीं होना चाहिए। जो दिल्ली में आज हुआ है वह सारे देश में कल होगा। अगर दिल्ली संभल जाएगी तो पाकिस्तान में भी स्थिति संभल जाएगी।

गांधीजी ने आगे कहा, 'दिल्ली भारतीय डोमिनियन का हृदय है और आप दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित लोग हैं। यदि आप पूरे भारत को यह एहसास नहीं करा सकते कि हिंदू, सिख और मुसलमान सभी भाई हैं, तो यह दोनों डोमिनियन के भविष्य के लिए बुरा संकेत होगा। अगर वे दोनों आपस में लड़ते हैं तो भारत का क्या होगा?' यहाँ गांधीजी भावनाओं में बहकर टूट पड़े; उनके धंसे हुए गालों पर आँसू बहने लगे। वहाँ मौजूद लोग सिसकियाँ लेने लगे; कई लोग रो पड़े। जब उन्होंने फिर से बोलना शुरू किया, तो उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सुनाई नहीं दे रही थी; इसलिए डॉ. सुशीला नय्यर ने ज़ोर से दोहराया कि उन्होंने उनसे क्या धीरे से कहा था। गांधी ने पूछा कि क्या वे उन्हें धोखा दे रहे थे। क्या वे बस उनकी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे? क्या वे दिल्ली में शांति बनाए रखने और उन्हें रिहा करने की गारंटी देंगे, ताकि वे पाकिस्तान जाकर वहाँ शांति की अपील कर सकें? मौलाना आज़ाद और दूसरे मुस्लिम विद्वानों ने गांधीजी से बात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि यह रवैया इस्लामी नहीं है। R.S.S. और हिंदू महासभा की ओर से बोलते हुए गणेश दत्त ने गांधीजी से अपना उपवास तोड़ने का आग्रह किया। पाकिस्तान के राजदूत ने भी महात्मा से कुछ दोस्ताना शब्द कहे। एक सिख प्रतिनिधि ने भी अपना वचन दिया।

विभिन्न दलों और पार्टियों के प्रतिनिधियों ने गांधीजी की उपस्थिति में एक प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किये जिसमें उन्होंने दिल्ली में शांति बनाये रखने का जिम्मा लिया। गांधीजी ने इसे मंज़ूर कर लिया और कहा: मैं उपवास तोड़ूँगा। ईश्वर की मर्ज़ी पूरी हो। आप सभी इसके गवाह बन सकते हैं।

पारसी, मुस्लिम और जापानी धर्मग्रंथ पढ़े गए और फिर हिंदू श्लोक पढ़ा गया:

मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो,

अंधकार से प्रकाश की ओर,

मृत्यु से अमरता की ओर।

गांधीजी के साथ की लड़कियों ने एक हिंदू गीत और गांधी का पसंदीदा ईसाई भजन 'व्हेन आई सर्वे द वंडरस क्रॉस' गाया।

12 बजकर 45 मिनट पर सभी सात समुदायों के लिखित आश्वासन पर कि वे न सिर्फ दिल्ली में बल्कि पूरे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र का वातावरण पुनः स्थापित करेंगे, 78 वर्ष की उम्र के गांधीजी ने 121 घंटे 30 मिनट का उपवास मौलाना आज़ाद के हाथों नारंगी का रस ग्रहण कर भंग किया। उनके लिविंग रूम में जमा हुए सौ मेहमानों को संतरे और केले बाँटे गए, और फिर एक-एक करके, उनके दर्शन करने के बाद, वे बिड़ला हाउस से बाहर चले गए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह हुई कि उपवास की समाप्ति पर गांधीजी से मिलने बुर्का ओढकर कई मुस्लिम महिलाएं आई थी। उन्होंने भी कहा था कि आपके उपवास के दौरान हमने भी अन्न नहीं खाया।

गांधीजी के छह दिनों के उपवास के टूटने पर देश और दुनिया ने राहत की सांस ली। नेहरूजी की आंखों से आंसू बह रहे थे। सभी लोगों के चले जाने के बाद गांधीजी और नेहरू जी अकेले रह गए थे। नेहरू जी भी साथ-साथ उपवास कर रहे थे। लेकिन यह बात उन्होंने किसी को नहीं बताई थी। इंदिरा गांधी ने उन्हें बताया कि उनके पिता ने भी अनशन शुरू कर दिया है। यह खबर सुनकर उन्हें हैरानी और खुशी तो हुई, लेकिन वे घबरा भी गए। उन्होंने तुरंत कांपते हाथों से एक छोटा सा पत्र लिखा और नेहरू से अनशन तुरंत खत्म करने का आग्रह किया। गांधीजी ने अपने सचिव प्यारेलाल जी को एक पत्र लिखने को कहा, चिरंजीवी जवाहर, उपवास छोड़ो, बहुत वर्ष जियो और हिंद के जवाहर बनो। बापू के आशीर्वाद। 18.1.48

उसी दोपहर, गांधीजी ने ब्रिटिश मालिकाना हक वाले दैनिक अखबार 'स्टेट्समैन' के पूर्व संपादक आर्थर मूर से बातचीत की। मूर ने लिखा, 'वे बहुत खुशमिजाज और जिंदादिल थे। मुझसे बात करते समय उनकी दिलचस्पी खुद में नहीं, बल्कि मुझमें थी; उन्होंने मुझसे कई तीखे सवाल पूछे।' गांधीजी ने आर्थर मूर को कहा, अब तुम भी उपवास छोड़ दो। उसने बताया कि आपके उपवास छोड़ने का समाचार मिला है। थोड़ी देर पहले ही एक प्याला काफी और एक सिगार पीकर मैंने भी अपना उपवास भंग कर लिया है।

उसी दिन शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी बीस मिनट तक बोले। गांधीजी ने प्रार्थना सभा में कहा कि वे इस प्रतिज्ञा का अर्थ यह समझते हैं कि 'चाहे कुछ भी हो जाए, हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और यहूदियों के बीच पूरी दोस्ती बनी रहेगी—ऐसी दोस्ती जो कभी टूटेगी नहीं।' पाकिस्तान के विदेश मंत्री सर मोहम्मद ज़फ़रुल्ला खान ने लेक सक्सेस में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि उपवास के जवाब में दोनों डोमिनियन के बीच दोस्ती की भावना और इच्छा की एक नई और ज़बरदस्त लहर पूरे उपमहाद्वीप में फैल रही है।

जिस ब्रिटिश पत्र ने उनके पिछले उपवासों की खिल्ली उड़ाई थी और उनको ब्लैकमेल करने वाली रणनीति कहकर उसकी निंदा की थी, लंदन के उसी ‘न्यूज़ क्रोनिकल’ ने लिखा था, इस आध्यात्मिक ताकत के सामने अणु बम भी क्षुद्र हो जाएगा क्योंकि वह तो मनुष्य की बुद्धि और साहस की उपज है, लेकिन मनुष्य की कृति मनुष्य से वरिष्ठ कदापि नहीं बन सकती। बापू ने अपने उपवास द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है। उनके उत्सर्ग से मानव संहार थम गया है और पाशविकता के मध्य भी दिव्यता शाश्वत है। गांधीजी ने उपवास के द्वारा साबित कर दिया कि हिंसा तथा विद्वेष के गर्त में डूबती मानवता को वे अपने आध्यात्मिक बल पर बचा सकते हैं।

इस व्रत ने दिल्ली में नंगा नाच दिखाने वाली पाशविकता को वश में कर लिया। उपवास के बाद सांप्रदायिक उपद्रवों का ज़ोर बराबर घटता गया। इसने भारतीय मुसलमानों के मन की भय की भावना को दूर किया। इस उपवास के बाद सांप्रदायिक उपद्रवों का जोर बराबर घटता गया। गांधीजी ने भविष्य की योजनाओं की ओर अपना ध्यान लगाया। उन्होंने सोचा कि दोनों देशों और दोनों संप्रदायों के बीच सद्भावना बढ़ाने के लिए उन्हें स्वयं पाकिस्तान जाना चाहिए। उन्होंने प्यारेलाल को पाकिस्तान के हाई कमिश्नर जाहिद हुसैन के पास यह पूछने के लिए भेजा कि क्या गांधीजी पाकिस्तान जा सकते हैं। जाहिद हुसैन ने कहा, अभी नहीं। परन्तु मुझे आशा है कि जल्दी ही हालात काफी सुधर जाएंगे।

हिन्दू-मुसलमानों में संघर्ष और तनाव बना रहे ऐसी राजनीति दोनों कौमों के धर्मान्धों द्वारा चलाई जा रही थी विभाजन के बाद फैले दंगों की चपेट में दिल्ली भी आ गयी थीदिल्ली तो मानो कत्लखाना ही बन गयी थी गांधीजी का आमरण अनशन 13 जनवरी, 1948 को शुरू हुआ। जैसा कि प्रचार किया गया उसके विपरीत यह अनशन पचपन करोड़ रुपयों के लिए नहीं था। दिल्ली में शान्ति स्थापित हो सके, इसके लिए था। उपवास के समय सरदार वल्लभभाई पटे ने अपने सचिवी. शंकर को गांधीजी के पास भेजकर पुछवाया था कि मैं क्या कर सकता हूँ तब गांधीजी ने कहा था कि पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपया दे दो। यद्यपि यह बात गांधीजी ने उपवासका में कही थी, पर उपवास पचपन करोड़ रुपयों के लिए नहीं था। पर झूठा प्रचार किया गया उपवास शुरू होने के दूसरे-तीसरे दिगांधीजी ने कहा था अगर दिल्ली में शान्ति स्थापित हुई तो मैं उपवास छोड दूंगा। बिड़ला हांउस के कमरे में जिस खटिया पर गांधीजी लेटे थे उसीके चारों ओर बैठकर 15 जनवरी, 1948 को मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने का निर्णय लिया गया। 18 जनवरी को दोपह12.45 बजे पर उपवास समाप्त हुआ। अगर पचपन करोड़ रुपये के लिए उपवास होता तो 15 जनवरी के मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद उसी दिन या ज़्यादा-से-ज़्यादा दूसरे दि16 जनवरी को उपवास समाप्त होना चाहिए था। तीन दिन बाद गांधीजी ने उपवास छोड़ा। स्पष्ट है कि पचपन करोड़ रुपया और गांधीजी के उपवास का आपस में कोई परस्पर सम्बन्ध नहीं था उपवास दिल्ली में शान्ति की स्थापना के लिए था शान्ति की स्थापना हो, और गांधीजी का उपवास समाप्त हो इसके लिए डॉ. राजेन्द्रप्रसाद की अध्यक्षता में सब धमों के 130 प्रमुख लोगों की शान्ति मिति गठित की गयी थी। समिति के समक्ष गांधीजी ने उपवास-समाप्ति के लिए 7 शतें रखी थीं। ये सात शतें 17 जनवरी, 1948 को स्वीकृत होने पर 18 जनवरी को गांधीजी ने उपवास समाप्त किया था स्वीकृत शतों में पचपन करोड़ रुपये देने का कहीं उल्लेख नहीं था

गांधीजी का मानना था कि जब कोई दुख आ पड़े जो दूर न किया जा सके, तब मनुष्य को उपवास और प्रार्थना करनी चाहिए। वे उपवास को सत्याग्रह का अभिन्न अंग मानते थे। वे कहते थे ‘उपवास सत्याग्रही का अन्तिम शस्त्र है।’ अपने जीवन में उन्होंने विभिन्न अवधियों के अठारह उपवास किए। इनमें सबसे लम्बा तीन सप्ताह का था। इनके अलावा गांधीजी ने आंशिक उपवास भी किए थे। दक्षिण अफ़्रीका में वे चार महीने तक रोज़ एक ही बार अल्पाहार पर रहे थे। 1946 में नोआखाली में वे केवल 600 कैलोरी का अल्पाहार लेते थे और वह भी केवल फलों और ग्लूकोज़ के रूप में।

गांधीजी के आखिरी उपवास ने एक चमत्कार कर दिखाया—न केवल दिल्ली में शांति बहाल की, बल्कि दोनों देशों में धार्मिक दंगों और हिंसा को भी खत्म कर दिया। दुनिया भर में फैली एक समस्या का वह आंशिक समाधान, एक ऐसे व्यक्ति की नैतिक शक्ति का प्रतीक है, जिसकी सेवा करने की इच्छा जीवन के मोह से कहीं ज़्यादा थी। गांधीजी को जीवन से प्यार था और वे जीना चाहते थे। लेकिन मरने के लिए तैयार होकर उन्होंने सेवा करने की क्षमता फिर से हासिल कर ली, और इसी में उन्हें खुशी मिली। उपवास के बाद के बारह दिनों में वे खुश और प्रसन्न रहे; निराशा दूर हो गई थी और वे आगे के कामों की योजनाओं में लगे हुए थे। उन्होंने मौत का सामना किया और उन्हें एक नई ज़िंदगी मिली। जब गांधीजी सांप्रदायिक हिंसा से जूझने में लगे थे, वह इस बात को नहीं भूले थे के भारत की वास्तविक समस्या यहां के लोगों का आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन है। राजनैतिक स्वाधीनता के बाद गांधीजी का ध्यान रचनात्मक कार्यों की ओर अधिक आकर्षित होने लगा। इसके अतिरिक्त वे अपनी अहिंसा-प्रविधि को नये ढंग से सुधारना भी चाहते थे। लेकिन रचनात्मक कार्यों को पुनः हाथ में लेना मानो बदा ही न था। कुछ दल और उसके नेता शायद नहीं चाहते थे कि राष्ट्र-निर्माण का कोई कार्य गांधीजी करें।

हत्या की साज़िश

उसी दिन हिन्दू महासभा के मंच तले एक बैठक हुई। इस बैठक में भारत सरकार को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने पर मजबूर करने और हिन्दू शरणार्थियों को मुसलमानों के घरों में नहीं रहने देने की तीखी आलोचना की। इस बैठक में महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया। उन्हें तानाशाह कहा गया और उनकी तुलना हिटलर से की गई। हिन्दू महासभा के सचिव आशुतोष लाहिड़ी ने हिन्दुओं को संबोधित करते हुए एक पर्चा निकाला। यह एक शपथ पत्र था। उस पर लोगों के हस्ताक्षर लिए गए।

18 जनवरी को मरीना होटल में आप्टे, नाथूराम और करकरे सुबह का नाश्ता करने के बाद तीनों एक तांगे में बैठकर बिड़ला हाउस देखने गए, जहाँ गांधीजी ठहरे हुए थे। दिल्ली में बिड़ला हाउस उस समय परिवार के मुखिया घनश्याम दास बिड़ला का घर हुआ करता था। आज बिड़ला हाउस एक राष्ट्रीय स्मारक है और जिस सड़क पर यह स्थित है - जिसे पहले अल्बुकर्क रोड कहा जाता था - उसका नाम बदलकर 'तीस जनवरी मार्ग' कर दिया गया है, ताकि गांधीजी की हत्या की तारीख को याद रखा जा सके।

हालाँकि, जो कोई भी गांधीजी की शाम पाँच बजे वाली प्रार्थना सभाओं में शामिल होना चाहता था, वह बिड़ला हाउस के परिसर में आसानी से जा सकता था, लेकिन दिन के बाकी समय में गेट पर तैनात पुलिस गार्ड को पार करना आसान नहीं था। लेकिन, बगीचे के लेआउट और उस जगह का सामान्य अंदाज़ा लगाने के लिए जहाँ प्रार्थनाएँ होती थीं, गेट के अंदर जाना ज़रूरी नहीं था। चारों तरफ़ का चक्कर लगाकर इन्होंने जायजा लिया। प्रवेश द्वार के पास नौकरों का आवास था। वहां से कम्पाउंड और प्रार्थना स्थल की तरफ़ जाया जा सकता था। घर के दोनों तरफ़ और पीछे की तरफ़ सर्विस लेन थीं, और पीछे बने कई नौकरों के क्वार्टर और गैराज तक जाने के लिए एक अलग रास्ता था। इन लेन से बगीचे का काफ़ी हिस्सा दिखाई देता था; यहाँ तक कि सुबह के समय मुख्य सड़क से भी, ईंट की नीची दीवार के पार गांधीजी को अक्सर बेंत की कुर्सी पर धूप में बैठे देखा जा सकता था—कंधे पर तौलिया डाले, वे या तो अपने कागज़ों में झुके होते थे या किसी सेक्रेटरी को कुछ लिखवा रहे होते थे।

दिल्ली में अभी तक उस गैंग का शूटर, बड़गे नहीं पहुंचा था।  उसके बिना तो काम को अंजाम दिया ही नहीं जा सकता था। उस दिन इन तीनों ने गांधीजी की 5.00 बजे शाम की प्रार्थना सभा में भाग लिया। गांधीजी वहाँ नहीं आए क्योंकि वे बिस्तर पर थे; लेकिन उन्होंने पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर पढ़कर सुनाने के लिए एक संदेश भेजा था। साज़िशकर्ताओं ने वस्तुस्थिति का भलीभाँति अपनी योजना के अनुसार मुआयना किया। यह वह दिन था जब गांधीजी ने अपना उपवास तोड़ने का फ़ैसला किया था और उनके जीवनी-लेखक डी.जी. तेंदुलकर के अनुसार, 'यह उनके और उन सभी के लिए खुशी का दिन था'। सभा में भीड़ आम दिनों से थोड़ी ज़्यादा थी और लोग ऐसे घूम-फिर रहे थे जैसे अचानक मिली छुट्टी पर उत्साहित स्कूली बच्चे हों। साज़िश रचने वाले तीनों लोग पूरे बगीचे में घूमते रहे और अपनी योजना को अंतिम रूप दिया। अब जब उपवास खत्म हो गया था, तो उन्हें पूरा भरोसा था कि गांधीजी बाहर आएंगे और एक-दो दिन में खुद प्रार्थना शुरू कर देंगे। आप्टे ने बताया कि जहां गांधीजी बैठते हैं, उनकी पीठ की तरफ़ एक 12 फुट की दूरी पर नौकरों के आवास का एक जालीदार वेंटिलेटर है। वहां से गांधीजी पर गोली चलाई जा सकती है। उस ग्रिल से हथगोला भी फेंका जा सकता है। अब उन्हें सर्वेंट क्वार्टर में पहुंचने का रास्ता खोजना था।

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सब कुछ ठीक-ठाक होता देख बिड़ला भवन से वे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ बॉम्बे से आने वाली दो तेज़ ट्रेनें—पंजाब मेल और फ्रंटियर मेल—एक घंटे के अंदर-अंदर पहुँचने वाली थीं। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गोपाल गोडसे आने वाला था। गोपाल गोडसे पंजाब मेल से आ रहा था, जबकि बड़गे और शंकर फ़्रंटियर मेल से आ रहे थे। एक घंटे के अंतराल में दोनों गाड़ियां दिल्ली रेलवे स्टेशन समय से पहुंची। उन्होंने कई बार पूरी ट्रेन का चक्कर लगाया, फिर भी उन्हें न तो बडगे और शंकर दिखे और न ही गोपाल। उन्हें तो पता ही नहीं था कि बड़गे और शंकर ने 17 तारीख को गाड़ी पकड़ी ही नहीं थी। जबकि गोपाल वहाँ नहीं उतरा। अपने तीनों में किसी साथी के नहीं मिल पाने से आप्टे-गोडसे गैंग को लगा कि योजना खटाई में पड़ती जा रही है। वे मरीना होटल वापस आ गए। पहली बार उन्हें उदासी और घबराहट महसूस हुई क्योंकि मदनलाल भले ही उनके लिए विस्फोटक ले आया था, लेकिन उनकी दोनों रिवॉल्वर नहीं आई थीं। गोडसे ने अपने लिए कॉफी मंगवाई जबकि करकरे और आप्टे व्हिस्की में डूब गए। लिकर रजिस्टर में गेस्ट का नाम लिखा जाता था।

उस रात करकरे शरीफ़ होटल वापस नहीं गए, बल्कि हिंदू महासभा भवन में उसे जो कमरा दिया गया था, वहीं सोया। उसे पता था कि अगर वे किसी तरह रेलवे स्टेशन पर गोपाल और बाकी दो लोगों से नहीं मिल पाए, तो गोपाल या बाकी दो लोग ज़रूर महासभा भवन आएँगे, और वह उनसे चूकना नहीं चाहता था। लेकिन बडगे और शंकर नहीं आए, और न ही गोपाल आया। याद होगा कि अगर वे रेलवे स्टेशन पर एक-दूसरे से नहीं मिल पाए, तो उन्होंने हिंदू महासभा भवन में मिलने का प्लान बनाया था, जहाँ करकरे और मदनलाल के ठहरने की उम्मीद थी। नाथूराम, जो पार्टी का एक जाना-माना और असरदार कार्यकर्ता था और दिल्ली में पार्टी के कई सम्मेलनों में शामिल हो चुका था, पार्टी के सेक्रेटरी आशुतोष लाहिड़ी को अच्छी तरह जानता था। उसने करकरे को लाहिड़ी के नाम एक परिचय पत्र दिया, और इसी वजह से 18 तारीख की दोपहर से करकरे को कमरा नंबर 3 दे दिया गया, जो बाद में उनकी गुप्त बातचीत की जगह बन गया, जहाँ उन्होंने तय किया कि उनमें से हर एक को क्या भूमिका निभानी है।

उसी दोपहर, मदनलाल, आमचेकर के साथ चांदनी चौक इलाके में शादी के लिए लड़कियों को देख रहा था। शेवंती को लगभग भूल चुका मदनलाल किसी और लड़की के साथ घर बसाने के सपने देखने लगा था। लेकिन उसका यह सपना भी टूट गया, क्योंकि करकरे द्वारा 19 जनवरी को उसे हिंदू महासभा के दफ़्तर में शिफ्ट होने के लिए कहा गया।

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गोपाल की ट्रेन लेट थी, और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचने के कुछ समय पहले वह गहरी नींद में था। जब ट्रेन  नई दिल्ली पहुँची तो वह अब भी सो रहा था, उसका भाई, नाथूराम, जो उसे लेने आया था, उसे नहीं देख सका। ट्रेन पुरानी दिल्ली चली गई, और वहां गोपाल उतरा और शरणार्थियों के एक समूह के साथ उसने प्लेटफार्म पर ही बिस्तर बिछा लिया। बॉम्बे से अगली ट्रेन के आने और चले जाने तक प्लेटफ़ॉर्म पर इंतज़ार करने के बाद, वह एक बेंच पर सिकुड़कर सो गया, ताकि अगर रात में उनका भाई या कोई और उसे ढूँढते हुए आए, तो वे मिल सके।

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18 जनवरी को बंबई में बड़गे और शंकर दीक्षित महाराज से मिलने गए। वहां से न कोई पैसा मिला न ही शस्त्र। वे 2.30 बजे विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन आ गए। पंजाब मेल पकड़ी और दिल्ली के लिए रवाना हुए।

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मनोज कुमार

 

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