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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-36

 

महात्मा गांधी हत्या केस-36

 

25 जनवरी, 1948

रविवार, 25 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी दिल्ली में विभिन्न बैठकों, लेखन कार्यों और उस दौरान प्रकाशित अपने विचारों में व्यस्त थे। अपना आमरण अनशन समाप्त करने के बाद उन्होंने राहत व पुनर्वास के कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया था। 25 जनवरी को गांधीजी ने दिल्ली छोड़ने की बात अपने मौलाना मित्रों से की। वह सेवाग्राम जाना चाहते थे। बजाज घराने के लोग इस बात को उत्सुक थे कि गांधीजी अपने ‘पांचवें पुत्र’ सेठ जमनालाल बजाज के आगामी श्राद्ध-दिवस पर वर्धा में रहें। लेकिन उन्होंने मित्रों से कहा कि मुसलमानों की इजाज़त के बिना वे सेवाग्राम नहीं जाएंगे। मौलाना मित्रों ने कहा कि वे सोच कर बताएंगे।

गांधीजी ने ग्रामीण उत्थान विषय पर सेवाग्राम आश्रम में रह रहे प्रभुदयाल विद्यार्थी को पत्र लिखा। दोपहर में वे कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेते हैं। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के प्रस्ताव का उन्होंने समर्थन किया।

पिछले दो दिनों से प्रार्थना सभा में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी और रविवार, 25 जनवरी को गांधीजी की प्रार्थना सभा में उम्मीद से कहीं ज़्यादा लोग आए थे। गांधीजी इससे खुश थे। उन्होंने लोगों से कहा कि वे बैठने के लिए फूस की चटाई या मोटा खादी का कपड़ा साथ लाएं, क्योंकि सर्दियों में ज़मीन ठंडी और सीलन भरी होती है। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें यह सुनकर बहुत खुशी हुई कि हिंदू और मुस्लिम दोस्तों का कहना है कि दिल्ली में 'दिलों का मिलन' हुआ है। इस सुधार को देखते हुए, क्या प्रार्थना में आने वाला हर हिंदू और सिख अपने साथ 'कम से कम एक मुसलमान' को नहीं ला सकता? गांधीजी के लिए यह भाईचारे का पक्का सबूत होता। लेकिन मदन लाल और गोडसे जैसे हिंदू और उनके वैचारिक समर्थक, हिंदू प्रार्थना सभाओं में मुसलमानों की मौजूदगी और कुरान के अंशों के पाठ से बहुत नाराज़ थे। इसके अलावा, उन्हें शायद यह उम्मीद थी कि गांधीजी की मौत भारत के हिंसक एकीकरण की दिशा में पहला कदम हो सकती है।

प्रार्थना सभा में उन्होंने यह भी कहा कि ख़्वाजा सैयद क़ुतुब-उद-दीन बख़्तियार काकी की मेहरौली में उर्स कल से शुरू होने जा रही है। इस वर्ष के शुरुआत में इस पवित्र स्थल को थोड़ी क्षति पहुंचाई गई थी। अब उसका पुनर्निर्माण कर दिया गया है। यहां पर लाखों हिन्दू-मुसलिम श्रद्धालु आते हैं। हिन्दू श्रद्धालु अपने दिलों में शांति और श्रद्धा लिए वहां जाएं। उन्हें उम्मीद थी कि अब उन्हें वर्धा जाने दिया जाएगा। मैं 2 फरवरी को राजेन्द्र बाबू के साथ सेवाग्राम जाऊंगा। लेकिन मैं दिल्ली जल्द-से-जल्द आ जाने की कोशिश करूंगा। लेकिन मैं तभी जाऊंगा जब आप शांति और सौहार्द्र के साथ यहां रहने का विश्वास मुझे दिला सकें। मैं पाकिस्तान भी जाना चाहता हूं, यदि वहां की सरकार मुझे इजाज़त दे तो।

उपवास के बाद मिली राहत के बावजूद, गांधीजी नई और अनुभवहीन सरकार के सामने आने वाली बड़ी मुश्किलों से वाकिफ़ थे। उन्हें कांग्रेस की काबिलियत पर भरोसा नहीं रहा था। अब बहुत कुछ सरकार के दो बड़े नेताओं - प्रधानमंत्री नेहरू और उप-प्रधानमंत्री पटेल - पर निर्भर था। उनकी सोच हमेशा एक जैसी नहीं होती थी। उनके स्वभाव बिल्कुल अलग-अलग थे। उनके बीच मतभेद भी रहे थे। इस बात से गांधीजी को चिंता होती थी। हालात यहाँ तक पहुँच गए थे कि गांधीजी सोचने लगे थे कि क्या नेहरू और पटेल सरकार में साथ काम कर पाएंगे।

हत्या की साज़िश

25 जनवरी को दिल्ली पुलिस मुख्यालय में इस बात को रेखांकित किया जा रहा था कि साज़िशकर्ता बंबई से ताल्लुक़ात रखते हैं, इसलिए बंबई पुलिस का सहयोग बहुत ज़रूरी है। जब उनके दो दूतों की रिपोर्ट इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर और इंस्पेक्टर-जनरल, मिस्टर टी.जी. संजीव के पास पहुँची, तो वे बॉम्बे पुलिस के खिलाफ़ उनकी शिकायतों को कोई बड़ा मुद्दा बनाने के मूड में नहीं थे। माना जा रहा था कि साज़िश रचने वाले बॉम्बे प्रांत के थे, और उन्हें ढूँढ़ने के लिए बॉम्बे पुलिस का पूरा सहयोग मिलना उनके लिए बहुत ज़रूरी था।

उन दिनों सी.आई.डी. बंबई के डेप्यूटी इंस्पेक्टर यू.एच. राणा किसी ज़रूरी काम से दिल्ली में थे। संजीव ने राणा को बुलाया, उन्हें मदनलाल के पूरे बयान की एक कॉपी और उसका अंग्रेज़ी अनुवाद दिया, और कहा कि वे इसे खुद बॉम्बे पुलिस तक पहुँचाएँ और उनसे कहें कि वे इसमें बताए गए लोगों को ढूँढ़ने और गिरफ़्तार करने पर काम शुरू करें। राणा को यह आदेश पच्चीस तारीख़ को मिला, ताकि वे बॉम्बे जाने वाली दोपहर की फ़्लाइट पकड़ सकें, जिससे वे रात 9 बजे वहाँ पहुँच जाते। उसमें सीट न मिलने का कोई सवाल ही नहीं था, क्योंकि भारत में हर हवाई जहाज़ में सरकारी कर्मचारियों के लिए कम से कम चार सीटें आरक्षित होती हैं, और वे दूसरे यात्रियों को आखिरी मिनट में तभी दी जाती हैं जब ड्यूटी पर यात्रा कर रहे सरकारी अधिकारी उन पर दावा न करें।

दोपहर में बंबई के फ्लाइट रहने के बावज़ूद राणा बंबई के लिए वाया इलाहाबाद ट्रेन से रवाना हुए। यह ट्रेन अन्य ट्रेनों की अपेक्षा बंबई पहुंचने में सोलह घंटे अधिक लेती थी। लग रहा था कि किसी को इस केस के महत्त्व का भान ही नहीं था। यदि त्वरित गति से कार्रवाई होती तो शायद 30 को हुई घटना का अंजाम देने वाले अपराधी पहले ही पुलिस की गिरफ़्त में होते। राणा ने जो ट्रेन पकड़ी वह इलाहाबाद होकर जाती थी। असल में, वह उसी दिशा में गया था जिस दिशा में नाथूराम और आप्टे दिल्ली से भागते समय गए थे। बस फ़र्क इतना था कि राणा उनसे ज़्यादा दूर तक गए। राणा ने बाद में कहा कि उसके डॉक्टर ने उसे हवाई जहाज़ में सफ़र करने से मना किया था। किसी ने भी राणा की उस धीमी रफ़्तार के लिए उनकी आलोचना नहीं की, जिसे जस्टिस कपूर ने 'घोंघे की चाल' (snail’s pace) कहा था। एक और वजह भी थी। राणा रिटायर होने वाले थे और सरकारी काम से दिल्ली आए थे। एक अच्छे हिंदू के तौर पर, इलाहाबाद के पास होने का फ़ायदा उठाकर वहाँ जाने और त्रिवेणी में, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नदियाँ मिलती हैं, पवित्र स्नान करने की इच्छा रखना कोई अजीब बात नहीं थी। राणा को इलाहाबाद में बस कुछ घंटों की ज़रूरत थी, जो दिल्ली-कलकत्ता मेल के इलाहाबाद स्टेशन पहुँचने और अगली कलकत्ता-बॉम्बे ट्रेन के बीच निकाले जा सकते थे। त्रिवेणी के जल में डुबकी लगाने से बहुत आध्यात्मिक पुण्य मिलता है। इसलिए राणा इलाहाबाद गए, जो उनके रास्ते से कम से कम तीन सौ मील दूर था, और 27 तारीख़ की दोपहर को बॉम्बे पहुँचे; यह हवाई जहाज़ से जाने की तुलना में दो दिन और सीधी ट्रेन पकड़ने की तुलना में पूरे एक दिन की देरी थी।

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25 तारीख की सुबह, जो कि रविवार था, करकरे ठाणे रेलवे स्टेशन पर उतरा। सुबह 5 बजे वह नवपाड़ा एन्क्लेव स्थित जोशी के घर 'शांता सदन' पहुँचा और सड़क से ही उसे आवाज़ दी। इतनी सुबह होने के बावजूद जोशी परिवार ने करकरे का स्वागत किया। जोशी ने सबसे पहले करकरे को यह बताया कि आप्टे और नाथूराम दो दिन पहले उसे ढूँढ़ते हुए आए थे। अपने साथियों के बारे में सुनकर करकरे बहुत खुश हुआ और तुरंत उनसे संपर्क करना चाहता था, लेकिन उसके मेज़बान (जोशी) को यह नहीं पता था कि वे बॉम्बे में कहाँ ठहरे हैं या वे बॉम्बे में हैं भी या नहीं।

करकरे ने पूना में आप्टे के घर टेलीग्राम भेजने का फ़ैसला किया, लेकिन उसे पता था कि पुलिस आप्टे के घर पर नज़र रख सकती है और वह अपनी उपस्थिति की जगह ज़ाहिर नहीं करना चाहता था, इसलिए उसने ठाणे से टेलीग्राम नहीं भेजा। जोशी के अठारह साल के बेटे वसंत को बॉम्बे के सेंट्रल टेलीग्राफ ऑफ़िस भेजा गया - जो ठाणे से बीस मील दूर है - ताकि टेलीग्राम भेजा जा सके; चूँकि रविवार था, इसलिए टेलीग्राम 'एक्सप्रेस' सेवा से भेजना पड़ा। करकरे ने अपने कोड नाम ‘व्यास’ से आप्टे के पूना वाले घर के पते पर ‘तुरंत मिलें’ संदेश का एक टेलीग्राम भेजा गया।

पूना में गोपाल गोडसे आप्टे के घर आया-जाया करता था। उसने आप्टे की पत्नी चम्पाताई को बताया कि आप्टे बंबई में है। रविवार, 25 जनवरी की दोपहर को चम्पा आप्टे को एक टेलीग्राम मिला। यह बॉम्बे में 'व्यास' नाम के एक व्यक्ति का था। उसे समझ नहीं आया कि यह ‘व्यास’ कौन है। उसने टेलीग्राम गोपाल को दिखाया। गोपाल समझ गया कि भेजने वाला कौन है। इसमें बताया गया था कि करकरे भी बॉम्बे पहुँच चुका था, लेकिन वह नाथूराम और आप्टे से संपर्क नहीं कर पाया था।

अब तीनों को फिर से एक साथ लाने की ज़िम्मेदारी गोपाल की थी। गोपाल स्टेशन गया और बंबई के लिए ट्रेन पकड़ी। उसने साथ में .32 बोर वाली रिवाल्वर भी रख ली। उसने यह बंदूक बड़गे के देना चाहा था, पर बड़गे  ने ऐसा करने से मना कर दिया। हालाँकि जब गोपाल बडगे से मिला था, तब बडगे जिस नफ़रत से नाथूराम और आप्टे के बारे में बात कर रहा था, उससे वह इतना नाराज़ हो गया था कि उसने रिवॉल्वर वापस करने का अपना इरादा बदल दिया था।  इसलिए उसने सोचा कि वह अपने बड़े भाई को इसे दे देगा, शायद यह उसके किसी काम आ जाए। वह ठाने उतरा। वहां से एक पब्लिक बूथ से फोन कर मनोरमा को बताया कि आप्टे को बता दे कि ‘व्यास’ ठाणे आ गया है। फिर वह जोशी के घर गया। करकरे वहीं था।

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आप्टे और नाथूराम एल्फिन्स्टन होटल में फंड एकत्रित करने की योजना बना रहे थे। वे हिंदू विचारधारा के समर्थक और अमीर व्यक्ति मिस्टर परांजपे के घर गए, जो सिल्वर बैंक कंपनी में पार्टनर थे। उससे उन्होंने अपने अख़बार के लिए 25 हज़ार रुपए उधार मांगे। परांजपे ने 10 हज़ार रुपए देने का आश्वासन दिया और अगले दिन सोमवार सुबह उनके ऑफिस से पैसे ले लें। काफी कैश का इंतजाम हो जाने के बाद, दोनों पास स्थित एयर इंडिया के कार्यालय में गए और मंगलवार 27 जनवरी का दिल्ली जाने के लिए विमान का टिकट बुक किया। इस बार भी फर्ज़ी नाम से, आप्टे का नाम रखा गया डी. नारायणराव और नाथूराम का एन. विनायकराव। हालांकि वे असल में एल्फिंस्टोन एनेक्स होटल में ठहरे हुए थे, पता लिखा गया सी ग्रीन होटल, मरीन ड्राइव।

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गोपाल शाम छह बजे के कुछ देर बाद ठाणे पहुंचा। सबसे पहले उसने नॉर्थकोट पुलिस हॉस्पिटल में फोन किया और मिस साल्वी के लिए एक मैसेज छोड़ा कि वे आप्टे को बता दें कि 'व्यास' आ गए हैं। फिर वह नवपाड़ा इलाके में जी.एम. जोशी के घर गया ताकि खुद 'व्यास' (करकरे) से मिल सके। तीन घंटे बाद ही वे दोनों मुख्य लोग उनसे जुड़ पाए।

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जब वे होटल लौटे तो मनोरमा गोपाल के संदेश के साथ उनका इंतज़ार कर रही थी। आप्टे और नाथूराम ठाणे के लिए निकल पड़े। गैंग का पुनर्मिलन हो रहा था। जोशी से एकांत का निवेदन किया। चारों की मीटिंग हुई। अब नाथूराम अपनी योजना उन्हें समझा रहा था।

प्लान समझाने में ज़्यादा समय नहीं लगा। नाथूराम ने उन्हें बताया कि वह एक भरोसेमंद पिस्तौल या रिवॉल्वर ढूंढेगा, गांधी के जितना हो सके करीब जाएगा, उन्हें गोली मारेगा और फिर खुद को सरेंडर कर देगा। इस बात के बाद सन्नाटा छा गया। वह और गोपाल आप्टे की ओर देखने लगे कि वह क्या कहते हैं। आप्टे ने कुछ नहीं कहा। लीडरशिप पहले ही उनके हाथों से निकल चुकी थी। जब करकरे ने उससे पूछा कि वह क्या करने वाला है, तो आप्टे ने कहा: "मैं भी दिल्ली जा रहा हूं। मैं वहां नाथूराम के साथ रहूंगा।" "तो मैं भी आ रहा हूं," करकरे ने घोषणा की। "मैं भी वहां रहना चाहता हूं, भले ही इसका मतलब पक्की मौत हो।"

गोपाल और करकरे को धीरे-धीरे यह समझ में आने लगा था कि इस बार आप्टे की स्वीकृति की ज़रूरत नहीं थी, उसका गैंग लीडर होने का ओहदा छिन चुका था। अब उनका लीडर नाथूराम विनायक गोडसे था। आप्टे और करकरे ने नाथूराम को साथ देने का वादा किया।

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गोपाल ने अपने भाई को बंदूक थमाई। इस हरकत से साफ़ था कि वह उनके साथ नहीं जाना चाहता था। असल में, उसने जल्द ही जोशी को आवाज़ दी और पूछा कि पूना के लिए अगली ट्रेन कब है। अब वह अपने परिवार और नौकरी को वक़्त देने जा रहा था। सात सदस्यों वाला गैंग अब मात्र तीन का रह गया था। लेकिन जो प्लान उनके मन में था, उसके लिए इतनी संख्या भी ज़रूरी नहीं थी। बात बस इतनी थी कि आप्टे और करकरे ने नाथूराम का साथ देने का फ़ैसला कर लिया था, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े।

गोपाल रात 10.00 बजे की ट्रेन से पूना जा रहा था।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-35

 

महात्मा गांधी हत्या केस-35

 

24 जनवरी, 1948

24 जनवरी को अपने एक मित्र को लिखे पत्र में अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए गांधीजी ने कहा था कि वे तो राम के सेवक हैं। उनकी जब-तक इच्छा होगी वे अपने सभी काम सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य की राह पर चलते हुए निभाते रहेंगे। उनके सत्य की राह के, ईश्वर ही साक्षी हैं।

मनु के पिता और अपने भतीजे जयसुखलाल गांधी को पत्र लिखकर गांधीजी ने बताया कि अगर ईश्वर ने चाहा तो वे फरवरी में सेवाग्राम जाएंगे।

एक और पत्र में उन्होंने लिखा, “अगर कोई मुझे जान से मारना चाहता है तो मार दे, परन्तु मेरे मन में उस मारने वाले के प्रति जरा भी विद्वेष न होगा। मेरी तो इच्छा है कि उस हत्यारे का शिकार होकर भी मैं मुस्कराता रहूं और मेरे ओठों पर राम का नाम हो।”

लाहौर से डॉ. सुशीला नय्यर का पत्र आया कि वह पाकिस्तान के शरणार्थी पुनर्वास मंत्री ग़ज़नफ़ार अली ख़ान से मिलीं और उनके साथ विभिन्न समस्याओं पर काम की बातें हुईं।

प्रार्थना सभा में उन्होंने उस दिखावे और शान-शौकत के जुनून की निंदा की, जो नई-नई आज़ादी के नशे में लोगों पर छा गया था। आज़ादी का मतलब शान-शौकत या दिखावा नहीं है। हमें अपनी चादर के हिसाब से ही पैर पसारने चाहिए। अपनी गरीबी छिपाने में कोई भलाई नहीं है। दुनिया में भारत की हैसियत उसकी नैतिक श्रेष्ठता पर निर्भर करेगी, जो उसे उसके अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) से मिली है। इस मामले में अभी उसका कोई मुकाबला नहीं है। दूसरे देश, चाहे बड़े हों या छोटे, अपने हथियारों और सैन्य वीरता पर गर्व करते हैं। वही उनकी पूंजी है। भारत के पास सिर्फ़ अपनी नैतिक पूंजी है, जो खर्च करने से बढ़ती है। किसी और स्थिति में, कांग्रेस का यह दावा कि सत्ता में आने पर वह मूल्यों में क्रांति लाएगी, बेकार हो जाएगा।

हत्या की साज़िश

23 की शाम दिल्ली पुलिस के दोनों अधिकारी ट्रेन से निकले और चौबीस घंटे बाद राजधानी लौट आए। 24 की शाम को स्टेशन से वे सीधे अपने हेडक्वार्टर गए। दिल्ली पुलिस मुख्यालय में जसवंत सिंह और बालकिशन द्वारा बंबई दौरे की रिपोर्ट सौंपी गई और बताया कि बॉम्बे में उनका अनुभव कैसा रहा। यह बताया गया कि करकरे सेठ को गिरफ़्तार नहीं किया गया है और न ही ‘हिन्दू राष्ट्र’ के संपादक की शिनाख़्त की गई है। उन्होंने अपने सीनियर अधिकारियों को यह भी बताया कि बॉम्बे में उनके साथ कैसा बुरा बर्ताव किया गया। उन्होंने शिकायत की, "हमें तो एक तरह से 'नज़र-क़ैद' [house arrest] में रखा गया था।" दिल्ली पुलिस और बंबई पुलिस के बीच तालमेल का अभाव था। होटल से प्राप्त धोने के लिए दिए गए कपड़ों पर जो नामाक्षर थे (N.V.G.) उसके बारे में बंबई पुलिस को जानकारी नहीं दी गई। इसी तरह से बंबई के जैन द्वारा दी गई जानकारियों को दिल्ली पुलिस को नहीं बताया गया।

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आगरा से करकरे ने बंबई के लिए ट्रेन पकड़ी। रात में उसने इटारसी में ट्रेन बदली। फिर वह कल्याण में उतर गया और वहां से दूसरी ट्रेन पकड़ी।

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होटल आर्य पथिक आश्रम का मालिक दुबे ने आप्टे के लिए दो बेड के कमरे की व्यवस्था कर दी। आप्टे ख़ुश हो गया। नाथूराम विक्टोरिया टर्मिनस के पास एलफिन्सटन होटल में एन. विनायकराव नाम से शिफ़्ट कर गया। आप्टे अपने रूम में मनोरमा को बुला लेता है। नाथूराम एक-दो सिनेमा देखकर समय बिताता है।

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गोपाल गोडसे, जो अभी भी छुट्टी पर था, हर सुबह-शाम आप्टे के घर जाकर पूछता था कि क्या आप्टे की पत्नी को अपने पति से कोई खबर मिली है; और जब 24 तारीख की सुबह उसे खुद नाथूराम से यह संदेश मिला कि वह और आप्टे बॉम्बे आ गए हैं, तो वह तुरंत आप्टे की पत्नी के पास गया और उन्हें यह बात बताई। उसने उनसे यह भी कहा कि जैसे ही उन्हें अपने पति से कोई खबर मिले, वह तुरंत उसे इसकी सूचना दें।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-34

 

महात्मा गांधी हत्या केस-34

 

23 जनवरी, 1948

अपने पोते कांति गांधी को गांधीजी ने पत्र लिखकर बताया कि उपवास के कारण उनके शरीर को बहुत नुकसान पहुंचा है। 20 तारीख को मैं मर गया होता, लेकिन ईश्वर ने मुझे बचा लिया। शायद वह मुझसे कुछ और काम कराना चाहता है। बस मेरी यही इच्छा है कि मैं सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलता रहूं और मानवता की सेवा करता रहूं।

23 जनवरी नेताजी का जन्मदिन था। और उसी दिन राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आयोजित की गई थी। गांधीजी ने उसमें भाग लिया। गांधीजी ने नेताजी के योगदान को याद करते हुए कहा कि हमने हमेशा एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान किया। वे एक महान देशभक्त थे। उन्होंने देश की ख़ातिर अपना बलिदान दिया। प्रांतीयता और जाति भेद के लिए उनके पास कोई उपयोग नहीं था। उनकी नज़रों में सभी भारतीय थे और देश के सेवक थे। सुभाष बाबू ने अपनी बहादुर सेना में बिना किसी भेदभाव के पूरे भारत से पुरुषों और महिलाओं को शामिल किया था और उनमें ऐसा स्नेह और निष्ठा जगाई थी, जो बहुत कम लोग जगा पाए हैं।

हत्या की साज़िश

21 जनवरी की सुबह 11:30 बजे आप्टे-गोडसे ने कानपुर से लखनऊ-झाँसी मेल पकड़ी थी, जिससे उन्हें झाँसी में दिल्ली-बॉम्बे पंजाब मेल का कनेक्शन मिल गया। 23 जनवरी की शाम पंजाब मेल से नाथूराम गोडसे और आप्टे बंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुंचे। उन्होंने सैंडहर्स्ट ब्रिज के लिए टैक्सी लिया। वे आर्य पथिक आश्रम में ठहरे। इसका मैनेजर, गया प्रसाद दुबे, आप्टे को एक खास ग्राहक मानता था, क्योंकि आप्टे हमेशा अपने लिए पूरा कमरा लेता था और उसका पूरा किराया देता था। आप्टे उसमें पहले भी मनोरमा के साथ आता रहा था। लेकिन इस बार कोई रूम नहीं ख़ाली था, इसलिए उन्हें डॉरमेटरी में अन्य छह यात्रियों के साथ ठहरना पड़ा। होटल मैनेजर ने वादा किया कि अगली सुबह उनके लिए कुछ बेहतर इंतज़ाम करेगा। आप्टे ने रजिस्टर में अपना असली नाम दर्ज़ किया और दूसरे के लिए दोस्त लिखा। होटल में सामान रखकर वे मनोरमा के पास गए। मनोरमा को लेकर वे ठाने जी.एम. जोशी के घर गए, जहाँ करकरे अक्सर बॉम्बे आने पर रुका करता था। उन्होंने उससे करकरे के बारे में पूछा। जोशी ने उसकी कोई जानकारी नहीं होने की बात कही। जोशी ने करकरे को तब से नहीं देखा था जब से वह दिल्ली गया था। उन्होंने एक-दो जगह और पूछ-ताछ की लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। करकरे से संपर्क करने की उनकी बेचैनी अजीब लगती है, लेकिन मदनलाल की गिरफ्तारी के बाद से उनका संपर्क टूट गया था और उन्हें यह भी नहीं पता था कि बाकी लोग अभी भी आज़ाद हैं या नहीं।  हालांकि नई योजना में किसी अन्य साथी की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन फिर भी गोडसे एक बार फिर से पूरे गैंग से मिलना चाह रहा था।  उनका यह भी निश्चित नहीं था कि वे बॉम्बे में ही रुकेंगे या पूना चले जाएंगे, और इसलिए उन्होंने उन घरों में करकरे के लिए कोई निर्देश नहीं छोड़ा कि जब वह आए तो उनसे कैसे संपर्क करे। शाम को उन्होंने एक दोस्त को पूना भेजा ताकि गोपाल को खबर दी जा सके कि वे बॉम्बे पहुँच गए हैं और मिस मनोरमा साल्वी को पता होगा कि वे कहाँ ठहरे हैं।

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23 जनवरी को करकरे दिल्ली से निकला, लेकिन उसके मन में यह भारी पछतावा था कि वह अपने दोस्त को अकेला छोड़ रहा है। करकरे दिल्ली से बंबई के लिए चला तो था, लेकिन किसी अपराधी की तरह, जो पीछा करने वाली पुलिस से बचने के लिए मथुरा में ट्रेन से उतर गया था और बस से आगरा आ गया था। वहाँ से उसने एक और ट्रेन ली। रात के समय उसने दो बार ट्रेन बदली - एक बार इटारसी जंक्शन पर और दूसरी बार कल्याण में - और 25 तारीख की सुबह, जो रविवार था, वह ठाणे रेलवे स्टेशन पर उतरा।

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जब बिड़ला हाउस के गार्ड्स ने मदनलाल को काबू में करके हथकड़ी पहनाई थी और उसे गर्व के साथ गेट के बाहर अपने टेंट में ले गए, तो उसने नफ़रत भरी आवाज़ में उनसे कहा: ‘फिर आएगा!’ (‘वे फिर आएंगे!’) इस धमकी से पुलिस चौंक गई। तो यह मामला सिर्फ़ एक सनकी रिफ़्यूजी का नहीं था जो चौंकाने वाले और नए तरीके से अपना विरोध जता रहा था। उसके साथी भी थे। वे फिर आएंगे। कौन? कब? दिल्ली पुलिस के चीफ़, टी.जी. संजीव ने तुरंत बिड़ला हाउस में गार्ड्स की संख्या पांच से बढ़ाकर छब्बीस करने का आदेश दिया। इनमें से सात सादे कपड़ों में थे। उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन अफ़सरों को यह पता लगाने का काम सौंपा कि मदनलाल के साथी कौन थे और वे क्या करने वाले थे। दिल्ली पुलिस के लगभग एक दर्जन अफ़सरों ने बारी-बारी से मदनलाल से पूछताछ की। अगले दस दिनों तक लगभग लगातार पूछताछ चलती रही। उन दस दिनों के दौरान, दिल्ली में जांच करने वाले अफ़सर अपने अकेले पकड़े गए आरोपी से पूछताछ में इतने डूबे हुए थे कि उन्होंने जानकारी के एक ऐसे स्रोत को नज़रअंदाज़ कर दिया जो कम असहयोगी और ज़्यादा भरोसेमंद साबित हो सकता था — नई दिल्ली में हिंदू महासभा का ऑफ़िस। आख़िरकार, मदनलाल की गिरफ़्तारी के कुछ ही घंटों के भीतर, उन्हें मरीना होटल के कमरे में आशुतोष लाहिड़ी के पिछले दिन के बयान की एक कॉपी मिल गई थी। अगर वे इस नतीजे पर जल्दी पहुँचने के बजाय कि इस बयान से पता चलता है कि हत्या की साज़िश में महासभा का हाथ था, उस बयान के लेखक से सफ़ाई मांगते, तो वह कम से कम उन्हें यह तो बता ही देता कि मदनलाल ने जिस एडिटर का ज़िक्र किया था, वह कोई और नहीं बल्कि ‘हिंदू राष्ट्र’ का नाथूराम गोडसे था।

जांच का स्तर ऊंचा नहीं था और इससे ऐसा लगा कि दिल्ली पुलिस पूरी तरह से बेबस हो गई थी। हिंदू महासभा भवन की कोई जांच नहीं की गई, जहां ज़्यादातर साज़िशकर्ता ठहरे हुए थे... और न ही आशुतोष लाहिड़ी की जांच हुई, जो नाथूराम गोडसे और आप्टे को अच्छी तरह जानते थे। और मदनलाल ने भी उन्हें ज़्यादा कुछ नहीं बताया। उससे पूछताछ करने वाले अफ़सरों की केस-डायरी में उसके अड़ियल रवैये का साफ़ ज़िक्र है; बताया गया है कि उसने अलग-अलग या विरोधाभासी बयान दिए और अपने साथियों के बारे में जानकारी नहीं दी, जिसके लिए, डायरी के अनुसार, उसे उचित निर्देश दिए गए थे। एक और डायरी में ज़्यादा चिंताजनक बात लिखी थी कि उसे सिविल लाइन्स ले जाया गया और सलाह दी गई कि वह सच बताए और ग़लत बयान न दे। मदनलाल ने भी माना है कि जब वह संभल गया, तो उसने ज़्यादा जानकारी नहीं दी। लेकिन, गिरफ़्तारी के दिन उसने पुलिस को बताया था कि उसके छह और साथी थे और उसने उनका हुलिया बताया था, उस टैक्सी की जानकारी दी थी जिससे वे बिड़ला हाउस गए थे, अहमदनगर के करकरा सेठ का नाम साथियों में से एक के तौर पर लिया था और यह भी बताया था कि एक और साथी हिंदू राष्ट्र या अग्रणी का एडिटर था, जो बॉम्बे या पूना से छपने वाला मराठी अख़बार था।

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23 जनवरी की दोपहर को, दिल्ली के दो पुलिसकर्मियों को फिर से नागरवाला के सामने बुलाया गया। याद होगा कि उन्हें पूना जाकर CID के असिस्टेंट डिप्टी इंस्पेक्टर-जनरल रावसाहेब गुर्टू से मिलने का आदेश दिया गया था, जो एडिटर की पहचान का राज़ तुरंत खोल सकते थे, और वे दोनों पूना जाने के लिए तैयार भी थे। लेकिन बंबई के पुलिस मुख्यालय में दिल्ली पुलिस के दोनों अधिकारियों को नागरवाला ने समय बरबाद किए बिना दिल्ली वापस चले जाने का आदेश दिया। वे इस आदेश की पालना करते हुए बंबई से दिल्ली के लिए रवाना हुए।

 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर