बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-2

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


19. सूफ़ी रहस्यवाद-2

19.2 रहस्यवाद

1046 ई. में लिखी गई पुस्तक 'अल-रिसाला अल-कुशायरिय्या' की प्रस्तावना में अबू अल-कासिम अल-कुशायरी (अबूक़ासिम कशीरी) ने लिखा है कि हरेक विद्या में कुछ शब्द ऐसे होते हैं, जिनसे विशेष अर्थ और ज्ञान निकाले जा सकते हैं। कुछ ऐसे शब्द होते हैं जिनसे भावार्थ स्पष्ट हो जाता है। लेकिन कुछ ऐसे भी शब्द होते हैं जो रहस्यात्मक और प्रतीकात्मक होते हैं। सूफ़ीमत में दोनों ही तरह के शब्दों का प्रयोग होता है। ऐसे भी शब्द जो रहस्यात्मक और प्रतीकात्मक होते हैं, कुछेक अवसरों पर अर्थ-विमोचन की जगह उनके अर्थ और ज्ञान को गोपनीय ही रखना उद्देश्य होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि जो इसकी योग्यता नहीं रखते उन लोगों से अध्यात्मिक रहस्य गोपनीय ही रखा जाए। सूफी संतों (तसव्वुफ़) के पास अपने कुछ विशेष शब्द (जैसे- हाल, मक़ाम, फ़ना, बक़ा) होते हैं, जिन्हें आम लोग सीधे अर्थों में नहीं समझ सकते। इन शब्दों का उद्देश्य केवल उन्हीं लोगों तक उस गहरे आध्यात्मिक ज्ञान को पहुँचाना होता है जो उस मार्ग पर चल रहे हैं।

जहां तक रहस्यवाद का सवाल है, प्रसिद्ध ब्रिटिश प्राच्यविद (Orientalist) और विद्वान आर्थर जॉन आरबेरी (A. J. Arberry) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Sufism: An Account of the Mystics of Islam" (1950) में कहा है, “यह वह भावना है जो हमेशा से प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए मानव को प्रेरित करती रही है।” ज्ञान के क्षेत्र का अद्वैतवाद भावना के क्षेत्र में आकर रहस्यवाद कहलाता है। आरबेरी के अनुसार, रहस्यवाद मूल रूप से एक ही है, चाहे रहस्यवादी किसी भी धर्म को मानने वाला हो। उन्होंने इसे "ईश्वर के साथ व्यक्तिगत मिलन के लिए मानव आत्मा की एक निरंतर और अपरिवर्तनीय सार्वभौमिक तड़प" कहा है। रहस्यवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार अव्यक्त अथवा अज्ञात को विषय बनाकर उसके प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव व्यक्त किये जाते हैं।

आरबेरी का मानना था कि रहस्यवाद एक ऐसा शुद्ध आध्यात्मिक अनुभव है जो विभिन्न प्रमुख धार्मिक परंपराओं को अलग करने वाली दीवारों और सीमाओं को तोड़ देता है। एक ईसाई रहस्यवादी और एक मुस्लिम सूफी का अंतिम आध्यात्मिक अनुभव बुनियादी तौर पर एक जैसा ही होता है। आरबेरी स्पष्ट करते हैं कि रहस्यवाद केवल धार्मिक कर्मकांडों या बौद्धिक सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस परम सत्य या ईश्वर को सीधे और व्यक्तिगत रूप से महसूस करने का मार्ग है। रहस्यवाद कोई विचार या चिंतन नहीं, यह एक प्रवृत्ति है, एक भावना है। रहस्यवादी भावना आध्यात्मिक रहस्यों को जानने के लिए इन्सान को प्रेरित करती है। इसके द्वारा व्यक्ति अलौकिक शक्ति से अपना संबंध कायम करना चाहता है। जब यह संबंध काफ़ी गहरा हो जाता है, तो इंसान की अनुभूतियां उस महाशक्ति के साथ जुड़ जाती हैं। अपने अस्तित्व को भूल व्यक्ति हर वक़्त अपने प्रिय का स्मरण करता रहता है तथा उसी में लीन हो जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि रहस्यवाद आत्मा की परमात्मा को प्राप्ति की प्रवृत्ति है।

19.3 रहस्यवाद के प्रकार

रहस्यवाद अपनी प्रकृति से दो प्रकार का होता है -- एक साधनात्मक रहस्यवाद और दूसरा भावनात्मक रहस्यवाद। हमारे यहां का योग मार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियां प्राप्त कराने की आशा देता है। तन्त्र भी साधनात्मक रहस्यवाद है। सूफ़ियों ने कभी भी रूढ़िवादी धर्म को नकारा नहीं, बल्कि वे बहुत ही धार्मिक व्यक्ति हुआ करते थे। लेकिन वे इसके नैतिक दृष्टिकोण से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। वे आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभूति के प्यासे थे। उन्होंने आंतरिक अनुशासन और हृदय की शुद्धि पर बल दिया। वे मानते थे कि ईश्वर से साक्षात्कार की राह में पुजारी वर्ग की रोक-टोक उचित नहीं है।  वे अस्तित्व के बिल्कुल अलग किस्म के आयाम का अध्ययन करना चाहते थे। यह तभी समझ में आता जब पांचों इंद्रियों पर क़ाबू कर लिया जाता। इंद्रियों पर क़ाबू कर लेने के बाद ही आंतरिक संसार की यात्रा संभव है। यह संसार बाहरी संसार से ज़्यादा संतोष और स्थायित्व प्रदान करने वाला है। इस संसार की यात्रा से अनंत का ज्ञान होता है। ब्रह्म की अनुभूति होती है। इससे शाश्वत आनंद की प्राप्ति होती है। उस सर्वोच्च सत्ता से एकाकार का सौभाग्य प्राप्त होता है।

सूफ़ी सन्त महान विचारक और चिन्तक भी थे। वे सांसारिक भोग-विलास से दूर रहते थे और पवित्र एवं सदाचारी जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे। उन लोगों ने न सिर्फ़  इस्लामी रहस्यवाद अपनाया बल्कि इस्लाम की सही जानकारी न रखने वालों  के कट्टरपंथी एवं कर्मकांडी विचारधाराओं का विरोध भी किया।  ज़कारिया इसहाक़ ने “साइंस और सूफ़िज़्म” शीर्षक आलेख के ज़रिए सूफीमत के उदय और उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए बताया है कि – “आध्यात्मिकता की जो शराब सूफ़ी मत में मिल रही थी, वो परम्परागत मुस्लिम समाज में उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि रूढ़िवादियों ने क़ुरआन के शाब्दिक अर्थ को ही महत्व दिया और भीतरी अर्थ को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ किया बल्कि नकार दिया।” पारंपरिक मुस्लिम समाज में जो रूढ़िवादी या कट्टरपंथी वर्ग था, उसने मुख्य रूप से क़ुरआन के केवल बाहरी या शाब्दिक अर्थ (ज़ाहिर) को ही सर्वोपरि माना। इस प्रक्रिया में उन्होंने धर्म के आंतरिक सार, रूहानी गहराई और भीतरी अर्थ (बातिन) को न सिर्फ अनदेखा किया बल्कि उसे पूरी तरह से खारिज (नकार) कर दिया। यही कारण था कि जो गहन आध्यात्मिक शांति और ईश्वर से सीधे जुड़ाव का आनंद (जिसके लिए उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से 'आध्यात्मिकता की शराब' शब्द का इस्तेमाल किया है) सूफी संतों के यहाँ मिल रहा था, वह आम पारंपरिक और रूढ़िवादी समाज में पूरी तरह से अनुपलब्ध था। सूफियों ने इसी भीतरी रूहानी प्यास को बुझाने का काम किया।

हालांकि पैग़म्बर ने शरीयत (बाहरी क़ानून) पर बल दिया था, लेकिन क़ुरआन के अध्ययन से पता चलता है कि इसकी कई आयतें तरीक़त (आधात्मिक मार्ग) और हक़ीक़त (ज्ञान मार्ग) की भी चर्चा करती हैं। ऐसी भी आयतें हैं जो सर्वशक्तिमान के गूढ़ तरीक़ों की बात करती हैं। ये आयतें उन रहस्यों की ओर इशारा करती हैं जो उसकी उन शक्तियों और आदेशों  की चर्चा करती हैं। इनके द्वारा सर्वशक्तिमान ब्रह्मांड को संचालित और नियंत्रित करता है। इन आयतों में यह बात निहित है कि उसका सभी मानवों के प्रति प्यार है। ये आयतें मनुष्यों के उसके पास उसे जाने की अनुमति देता है। क़ुरआन में ऐसे कई संदेश निहित हैं जो उस सर्वशक्तिमान से ऐक्य के अपरोक्ष रूप से संकेत देते हैं। तरीक़त का अर्थ है वह रास्ता जो मनुष्य के अहंकार (नफ़्स) को शुद्ध करके उसे ईश्वर के करीब ले जाता है। क़ुरआन में इसके कई संकेत हैं। सूरह अल-फ़ातिहा की आयत "इहदिनस सिरातल मुस्तक़ीम" (हमें सीधा मार्ग दिखा) को सूफी संत केवल सामान्य आचरण नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुँचने वाले 'तरीक़त' के रूहानी मार्ग का प्रतीक मानते हैं। सूरह अल-अशम्स (91:9) में कहा गया है: "क़द अफ़लहा मन ज़क्काहा" अर्थात "वह निश्चित ही सफल हुआ जिसने अपने नफ़्स (आत्मा) को शुद्ध कर लिया।" यह आयत पूरी तरह से तरीक़त के मूल उद्देश्य को दर्शाती है। सूरह अल-बक़रह (2:152) में आया है: "फ़ज़कुरूनी अज़कुरकुम" अर्थात "तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा।" यह निरंतर ध्यान और साधना (तरीक़त) का आधार है। सूरह क़ाफ़ (50:16) में अल्लाह फरमाता है: "और हम उसकी (मनुष्य की) शह रग (शाहरग) से भी ज़्यादा उसके करीब हैं।" यह आयत बताती है कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि इंसान के भीतर ही मौजूद है, जो कि हक़ीक़त का मुख्य सिद्धांत है। सूरह अल-कहफ़ में पैगंबर मूसा और हज़रत ख़िज़्र की प्रसिद्ध कथा है। हज़रत ख़िज़्र के पास जो ज्ञान था, उसे क़ुरआन में 'इल्म-ए-लादुनी' (अल्लाह की ओर से दिया गया गुप्त ज्ञान) कहा गया है। मूसा (जो शरीअत के प्रतीक थे) ख़िज़्र की उन बातों को बाहरी तौर पर नहीं समझ पा रहे थे जो 'हक़ीक़त' (आंतरिक सत्य) पर आधारित थीं। सूरह अल-बक़रह (2:115) में कहा गया है: "तुम जिधर भी रुख़ (चेहरा) करोगे, उधर ही अल्लाह का रुख़ है।" यह ब्रह्मांड में केवल एक ही परम वास्तविकता (हक़ीक़त) के होने की पुष्टि करता है। इन आयतों के आधार पर सूफ़ियों ने क़ुरआन के केवल 'ज़ाहिर' (बाहरी या शाब्दिक अर्थ) पर रुकने के बजाय उसके 'बातिन' (छुपे हुए आत्मिक अर्थ) को खोजना शुरू किया। उन्होंने माना कि ईश्वर से बात करने और उसे महसूस करने का रास्ता इंसान का अपना 'दिल' (हृदय) है।

इस सब से ऊपर यह बात भी मौज़ूद है कि ईश्वर ने पैग़म्बर से बातें की थी। यही सूफ़ियों के लिए इशारा था कि ईश्वर से सीधे संबंध बनाया जा सकता है। यदि ईश्वर पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. से बात कर सकता है, तो वह निश्चित रूप से दूसरों से भी कर सकता है, बशर्ते वह पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. के पदचिह्नों पर चले।

19.3 (क) मेराज

सूफी दर्शन और रहस्यवाद (तसव्वुफ़) में पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की मेराज (रूहानी और शारीरिक यात्रा) को केवल एक ऐतिहासिक चमत्कार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चरमसीमा का प्रतीक माना जाता है। सूफ़ी पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. के मेराज (मुहम्मद साहब का स्वर्ग में ख़ुदा के पास जाना और वहां से लौटकर आना) पर अधिक बल देते हैं। मेराज का शाब्दिक अर्थ ऊपर चढ़ना होता है। इसका दूसरा नाम ‘असरा’ भी है। असरा रात की यात्रा को कहते हैं। हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने यह यात्रा रात में की थी। हदीस में इसकी विस्तार से चर्चा की गई है।  एक जगह तो यह भी कहा गया कि पैग़म्बर मुहम्मद ने ईश्वर के सान्निध्य में एक रात बिताई थी। इस्लाम में ऐसा माना जाता है कि रजब के महीने की 27वीं तारीख को पैगंबर-ए-इस्लाम (अल्लाह के रसूल) हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैह व सल्लम और अल्लाह की मुलाकात हुई थी। इसीलिए इस रात को 'पाक रात' भी कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह घटना हिजरत के एक या डेढ़ वर्ष पहले की है। मेराज के दो भाग हैं, प्रथम भाग को असरा और दूसरे को मेराज कहा जाता है। असरा कहते हैं रात के एक भाग में चलना, अभिप्राय यह है कि मुहम्मद (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) का रात के एक भाग में मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक़सा (बैतुल मुक़द्दस) तक की यात्रा। मस्जिदे हराम मक्का में है और मस्जिदे अक़सा फलस्तिन में है, दोनों के बीच की दूरी चालीस दिन की थी, चालीस दिन की यह दूरी अल्लाह के आदेश से रात के एक थोड़े से भाग में तय हो गई। मेराज का अर्थ होता है चढ़ने का माध्यम अर्थात् सीढ़ी, मस्जिदे अक़सा से नबी (सल्ललाहो अलैहि वसल्लम) को सात आसमानों पर ले जाया गया, कुछ रवायतों में सीढ़ी का शब्द प्रयोग हुआ है कि इसी के द्वारा उनको आसमानों पर ले जाया गया था। इसी लिए आसमानी यात्रा के इस दूसरे भाग को मेराज कहा जाता है। इस यात्रा में हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को हज़रत जिब्राइल (अलैहि.)  ले गए, जहां पहले आकाश पर हज़रत आदम (अलैहि.) से, दूसरे आकाश पर हज़रत ईसा (अलैहि.) से, तीसरे आकाश पर हज़रत यूसुफ़ (अलैहि.) से, चौथे आकाश पर हज़रत इदरीस (अलैहि.) से, पांचवें आकाश पर हज़रत हारून (अलैहि.) से, छठे आकाश पर हज़रत मूसा (अलैहि.) से और सातवें आकाश पर हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) से भेंट हुई। यहाँ पर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने यथार्थ तत्त्वों का अध्ययन किया। ईश्वर ने उन्हें धार्मिक क़ानून स्थापित करने के लिए संसार में वापस लौट जाने को कहा था। क़ुरआन के अनुसार कई अन्य अवसरों पर भी पैग़म्बर साहब से ईश्वर ने बात की। इस बात ने सूफ़ी रहस्यवादियों को काफ़ी प्रभावित किया और संभवतः इसी ने इस्लामी रहस्यवाद का मार्ग प्रशस्त किया। सूफ़ियों के लिए पैग़म्बर साहब की आसमानों की यात्रा और ईश्वर से संवाद (मेराज) महज़ एक ऐतिहासिक चमत्कार नहीं है। वे इसे "आत्मा की यात्रा" के एक प्रतीक के रूप में देखते हैं। सूफ़ी संतों का मानना है कि जिस तरह पैग़म्बर साहब ने मेराज में दुनियावी बंधनों को पीछे छोड़कर ईश्वर का सामीप्य (निकटता) पाया, उसी तरह एक आम इंसान भी कठिन आत्मिक साधना (ज़िक्र और मुराक़बा) के ज़रिए ईश्वर के करीब पहुँच सकता है।

सूफी संतों ने मेराज की पूरी यात्रा को आध्यात्मिक प्रगति के तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया है। इसरा (मक्का से यरूशलेम की यात्रा) शरीअत (भौतिक और व्यावहारिक स्तर) का प्रतीक है, जहाँ पैगंबर साहब धरती के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। उरूज (यरूशलेम से आसमानों की यात्रा) तरीक़त (आध्यात्मिक मार्ग) का प्रतीक है। इसमें पैगंबर साहब सांसारिक बंधनों और गुरुत्वाकर्षण से ऊपर उठकर विभिन्न आकाशों को पार करते हुए रूहानी दुनिया में प्रवेश करते हैं। ला-मकाँ (स्थान और समय से परे का क्षेत्र) हक़ीक़त (परम सत्य) का प्रतीक है। यहाँ पहुँचकर समय और स्थान के सभी बंधन समाप्त हो जाते हैं और केवल अल्लाह की सत्ता शेष रहती है। मेराज के वर्णन में सिदरतुल-मुन्तहा (बेरी का एक विशाल वृक्ष जो सृष्टि की अंतिम सीमा है) का विशेष महत्व है। सूफी साहित्य में इसे एक महान आध्यात्मिक मोड़ माना गया है। इस स्थान पर पहुँचकर देवदूत हज़रत जिब्रील (जो बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं) रुक जाते हैं और आगे जाने से मना कर देते हैं। वे कहते हैं कि यदि मैं इससे एक इंच भी आगे बढ़ा, तो अल्लाह के नूर (दिव्य प्रकाश) से मेरे पर (पंख) जल जाएंगे। सूफियों का मानना है कि यहाँ जिब्रील का रुकना यह दर्शाता है कि 'अक़्ल' (इंसानी बुद्धि और तर्क) की एक सीमा होती है। ईश्वर को बुद्धि या तर्कों से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसके आगे की यात्रा केवल 'इश्क़' (दिव्य प्रेम) के सहारे ही तय की जा सकती है, जिसके माध्यम से पैगंबर साहब आगे बढ़े। क़ुरआन (सूरह अन-नज्म) में इस मिलाप का ज़िक्र करते हुए 'क़ाबा क़ौसैन अओ अदना' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है "दो कमानों के बराबर या उससे भी कम दूरी"। सूफी मत में इसे 'फ़ना' (अहंकार का मिटना) और 'बक़ा' (ईश्वर में विलीन होकर अमर हो जाना) की अवस्था कहा जाता है। यह वह क्षण था जहाँ भक्त और भगवान, प्रेमी और प्रियतम के बीच का पर्दा पूरी तरह उठ गया। जहाँ पारंपरिक उलेमा या रूढ़िवादी विद्वान अक्सर ईश्वर के न्याय, नियमों और नरक के डर (ख़ौफ़) पर ज़्यादा ज़ोर देते थे, वहीं सूफ़ियों ने क़ुरआन के उस संदेश को पकड़ा जो ईश्वर और बंदे के बीच पारस्परिक प्रेम की बात करता है। "वह उनसे प्रेम करता है और वे उससे प्रेम करते हैं।" (सूरह अल-माएदा: 54) पैग़म्बर साहब और ईश्वर के बीच के सीधे संवाद ने सूफ़ियों को प्रेरित किया कि धर्म का अंतिम लक्ष्य केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि अपने "महबूब" (ईश्वर) में पूरी तरह लीन (फ़ना) हो जाना है। क़ुरआन में दर्ज ईश्वरीय संवाद और पैग़म्बर साहब का गुफ़ा-ए-हिरा में एकांतवास (ख़लवत) व मेराज के अनुभव ही वे बुनियादी पत्थर थे, जिन्होंने इस्लाम के भीतर 'तसव्वुफ़' (सूफ़ीवाद) के मार्ग को प्रशस्त किया। इसी वजह से सूफ़ी संतों ने इस्लाम को शुष्क नियमों की जगह 'रूहानियत' (आध्यात्मिकता) और मोहब्बत का रूप दिया।

प्रसिद्ध सूफी कवि हज़रत अमीर खुसरो और हज़रत जलालुद्दीन रूमी ने अपनी कविताओं में इस क्षण को रूहानी आशिकों के लिए सर्वोच्च प्रेरणा बताया है। सूफियों का एक प्रसिद्ध कथन है: "अस्सलातु मेराजुल मोमिनीन" (नमाज़ मोमिन या साधक की मेराज है)। सूफी संतों का मानना है कि पैगंबर साहब की मेराज शारीरिक और रूहानी दोनों थी, लेकिन एक आम इंसान (साधक) अपनी ध्यान-साधना, ज़िक्र (ईश्वर का स्मरण) और आत्म-शुद्धि के ज़रिए आंतरिक मेराज का अनुभव कर सकता है। जब एक सूफी ध्यान (मुरक़बा) में डूबता है और दुनिया की हर चीज़ को भूल जाता है, तो उसकी आत्मा भी उसी तरह ईश्वर की निकटता का अनुभव करती है जैसे मेराज की रात हुआ था। सूफी कवियों ने मेराज को बहुत ही सुंदर प्रतीकों के माध्यम से समझाया है। उनका मानना है कि मेराज की रात समय को रोक दिया गया था, जब पैगंबर साहब लौटे तो उनके बिस्तर की गर्मी वैसी ही थी और वज़ू (प्रार्थना से पहले हाथ-मुँह धोना) का पानी अभी भी बह रहा था। यह इस बात का प्रमाण है कि परम सत्ता के पास पहुँचने पर समय का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

इस्लामी रहस्यवाद के शुरुआती दिनों में सूफ़ी यूनानी चिंतन से प्रभावित रहे। नव-प्लेटोनिकवाद की दो मुख्य अवधारणाएं थीं – सर्वेश्वरवाद और आध्यात्मिक संश्लेषण के लिए प्रेम एक बल के रूप में। वहदत-उल-वुजूद की अवधारणा यहीं से निकली हैं। ईश्वर सर्वव्यापी है, इसलिए वह हर इंसान में है। यह सूफ़ीमत का महत्वपूर्ण बिन्दु है।

19.4 समर्पण (तवक्कुल) करने पर ज़ोर

सूफ़ीमत समर्पण (तवक्कुल) करने पर ज़ोर देता है। सूफी मत में समर्पण को ही साधना की सबसे पहली और अंतिम सीढ़ी माना गया है। सूफी दर्शन के अनुसार, जब तक एक साधक (सालिक) अपने अहंकार, अपनी इच्छाओं और अपनी बुद्धि का पूरी तरह से त्याग करके ईश्वर और अपने गुरु के प्रति समर्पित नहीं हो जाता, तब तक वह आध्यात्मिक मार्ग पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। सूफ़ियों के यहां रहस्यात्मक माधुर्य भाव व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। सूफियों का मानना है कि इंसान और ईश्वर के बीच सबसे बड़ा पर्दा 'मैं' (अहंकार या नफ़्स) का है। समर्पण का अर्थ है अपनी 'मैं' को मिटाकर सब कुछ अल्लाह पर छोड़ देना। वे ईश्वर अथवा अल्लाह को सर्वव्यापी और सर्वगुण संपन्न मानते थे। इसलिए सूफ़ीमत कहता है कि अपने को पूर्णरूप से समर्पित कर ईश्वर की शरण में चले जाओ। उसकी किसी शक्ति पर अधिकार करने की कोशिश मत करो, उसके अधिकार में चले जाओ। 11वीं शताब्दी के महान फ़ारसी सूफ़ी संत और रहस्यवादी हज़रत अबू-सैय्यद अबुल ख़ैर रह. के अनुसार ईश्वर की इच्छा (अल्लाह की मर्ज़ी या तक़दीर) का पूर्ण पालन अनिवार्य है। हज़रत अबू सईद अबुल खैर का एक बहुत ही प्रसिद्ध कथन है: "अपनी बुद्धि और मन को भूल जाओ, जो कुछ तुम्हारे हाथ में है उसे दान कर दो, और अपनी नियति (ईश्वर की इच्छा) का सामना करो।" उनके अनुसार, एक सच्चे साधक को झाड़ू के आगे धूल की तरह होना चाहिए, जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती, न कि एक कठोर चट्टान की तरह जो विरोध करे। वे मानते थे कि इंसान और ईश्वर के बीच एकमात्र बाधा 'मैं' (अहंकार या नफ़्स) है। जब मनुष्य अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को ईश्वर की इच्छा में विलीन कर देता है (जिसे सूफ़ी शब्दावली में फ़ना कहा जाता है), तभी वह परम सत्य को प्राप्त कर सकता है। उनका एक प्रसिद्ध सूत्र था कि सूफ़ी के चोगे के भीतर 'अल्लाह के सिवा कुछ नहीं' है। उन्होंने सूफ़ी की परिभाषा देते हुए कहा था: "सूफ़ी वह है जो अल्लाह के किए गए हर कार्य (इच्छा) से प्रसन्न रहता है, ताकि अल्लाह भी उसके हर कार्य से प्रसन्न हो सके।" सूफ़ी इतिहास की प्रसिद्ध पुस्तक 'असरार अल-तौहीद' में एक घटना दर्ज है, जहाँ उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया था कि धरती पर जो कुछ भी घटित होता है, वह ईश्वर की ही इच्छा से होता है। उनके अनुसार आध्यात्मिक मार्ग पर पूर्णता तभी मिल सकती है जब साधक अपनी मर्जी को पूरी तरह छोड़ कर ईश्वर की रज़ा (इच्छा) के आगे नतमस्तक हो जाए।

हज़रत अबू सईद अबुल खैर के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना, जिसमें उन्होंने ईश्वर की इच्छा (तक़दीर या भाग्य) के सिद्धांत को एक व्यावहारिक और बेहद सटीक उदाहरण से समझाया था, सूफ़ी इतिहास की महान पुस्तक ‘असरार अल-तौहीद’ में दर्ज है। दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने भी अपने शिष्यों के बीच इस घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया था। यह घटना इस प्रकार है। एक बार हज़रत अबू सईद अबुल खैर अपने ख़ानक़ाह (आश्रम) में शिष्यों और मुरीदों को जमा करके आध्यात्मिक उपदेश दे रहे थे। वे शिष्यों को यह समझा रहे थे कि, "इस धरती पर जो कुछ भी घटित होता है, चाहे वह अच्छा (ख़ैर) हो या बुरा (शर्), वह सब कुछ केवल और केवल ईश्वर (अल्लाह) की इच्छा और उसकी मर्ज़ी से ही तय होता है। इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।" उसी समय वहाँ एक उद्दंड और शरारती युवक (जो सूफ़ी मत का विरोधी था) बैठा हुआ था। वह शेख की इस बात को गलत साबित करना चाहता था और उन्हें नीचा दिखाना चाहता था। उसने सोचा कि क्यों न एक व्यावहारिक तरीका अपनाकर इनके इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ा दी जाएँ। वह युवक चुपके से उठा, शेख के पीछे गया और उसने अपनी पूरी ताकत से शेख अबू सईद की गर्दन पर एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया। थप्पड़ इतना तेज़ था कि शेख की गर्दन लाल हो गई और वे दर्द से सहम गए। आश्रम में सन्नाटा छा गया। सभी शिष्य गुस्से में खड़े हो गए और उस युवक को पकड़ने ही वाले थे कि तभी शेख ने मुसकुराते हुए अपने शिष्यों को शांत रहने का इशारा किया। शेख अबू सईद ने धीरे से अपनी गर्दन को सहलाया और पलटकर उस युवक की तरफ देखा। युवक ने तुरंत मुसकुराते हुए व्यंग्य (ताने) के लहजे में कहा, "शमा न मिगुयिद के हर ख़ैर ओ शर् के मिरेसद अज़ ख़ुदा अस्त?" अर्थात: "क्या आपने अभी-अभी यह नहीं कहा था कि जो भी भलाई या बुराई इंसानों तक पहुँचती है, वह सीधे ईश्वर की तरफ से आती है? फिर आप मुझे क्यों देख रहे हैं? मुझे थप्पड़ मारने की प्रेरणा भी तो ईश्वर ने ही दी थी!" युवक को लगा था कि इस तर्क से शेख लाजवाब हो जाएंगे और मान लेंगे कि इंसानी कर्मों में उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा भी होती है। शेख ने बहुत ही शांत और गंभीर आवाज़ में उस युवक को उत्तर दिया, "आरी हमचुनिन अस्त, वली मिबीनम कोदाम बदबख़्त रा नामज़द-ए इन कार कर्दे अन्द।" अर्थात: "हाँ मेरे भाई! तुम्हारा सोचना बिल्कुल सही है, यह थप्पड़ भी ईश्वर की इच्छा से ही पड़ा है। लेकिन मैं तो केवल पलटकर यह देख रहा था कि ईश्वर ने इस बुरे काम को अंजाम देने के लिए किस बदनसीब (दुर्भाग्यशाली) इंसान को चुना है!" इस व्यावहारिक उत्तर के ज़रिए हज़रत अबू सईद अबुल खैर ने तक़दीर के दो बेहद गहरे पहलुओं को स्पष्ट किया। ब्रह्मांड में हर घटना (अच्छी या बुरी) अंततः परमात्मा की अनुमति या उसकी मर्जी के दायरे में ही होती है, क्योंकि उसके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। भले ही सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति कोई बुरा या हिंसक काम करने का विकल्प चुनता है, तो वह स्वयं को ईश्वर के 'बुरे कार्यों के माध्यम' के रूप में पेश करता है। तक़दीर का बहाना बनाकर कोई भी व्यक्ति अपने बुरे कर्मों और उसके पाप से बच नहीं सकता; उसे अपनी बदनसीबी या चुनाव की कीमत चुकानी ही पड़ती है। इस उत्तर को सुनकर वह युवक अत्यंत शर्मिंदा हुआ और उसने तुरंत शेख के पैर पकड़कर माफ़ी मांग ली।

परिस्थितियों की अनुकूलता या प्रतिकूलता के संबंध में ऊहापोह, शंका या परीक्षा सूफ़ीमत के विरुद्ध है। सूफ़ीमत के अनुसार ईश्वर कभी कोई इच्छा पूरी नहीं करता। अगर कभी कुछ करता है तो यह उसकी रहमत है। इसलिए सबसे अच्छा उपाय समर्पण है। पूर्ण समर्पण। इसका मतलब यह है कि जो है उसी में राज़ी हो जाना चाहिए। सूफ़ी आनन्द और शांति की खोज में रहते हैं। सूफ़ीमत कहता है जब ख़ुशी आए तो ख़ुशी का आनंद लें, जब दुख आए तो दुख का आनंद लें। ख़ुशी और ग़म दोनों का स्वागत करें। एक व्यक्ति को दोनों ही स्थितियों में समग्रता से होना चाहिए। तभी सर्वोच्च आनंद घटता है। धीरे-धीरे प्रसन्नता और दुख का यह भेद ही मिट जाता है। फिर किसी ऐसी चीज़ का उद्भव होता है, जो शाश्वत रूप से वहां पहले ही था। इसलिए समर्पण अन्तः-प्रेरणा से हो। तभी एक साधक दोनों ही स्थितियों में साक्षी भाव से रह सकता है। इसके लिए स्वयं में होना आधारभूत ज़रूरत है। अस्तित्वगत होने की अवस्था को साधक समर्पण के द्वारा ही उपलब्ध हो पाता है। वह तो वह सब कुछ समर्पित करता है, जो वह नहीं है। नकली “मैं” का जब वह समर्पण करता है, तो असली “मैं” (आत्मा) का उसे साक्षात्कार होने की संभावना बढ़ जाती है। पूर्ण समर्पण की अंतिम अवस्था को सूफी मत में 'फ़ना-फ़िल्लाह' कहा जाता है, जहाँ साधक का अपना अस्तित्व पूरी तरह मिट जाता है और केवल ईश्वर ही शेष रह जाता है। सूफी मत में समर्पण कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) की वह शक्ति है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

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