सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
18.
सूफ़ी साधना की स्थितियां
“हे मनुष्यों!
हमने तुमको एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और फिर तुममें शाखाएं और सम्प्रदाय
(जातियाँ तथा प्रजातियाँ ) निश्चित किए ताकि तुम आपस में एक-दूसरे को पहचान सको।
निश्चय ही तुममें से वह व्यक्ति ईश्वर को प्रिय है जो अधिक सदाचारी है।” (क़ुरआन
: 49/13)
सूफ़ी
मत के अनुसार इंसान के अंदर फ़रिश्ते और हैवान, दोनों
तरह की प्रवृत्तियां हैं। आदमी के पीछे हैवान हैं और उसके आगे फ़रिश्ते। जो पाशविक
वृत्ति इंसान को हैवानियत की तरफ़ खींचती है उसे नफ़्स (वासनामय
आत्मा, काम वासना) कहा जाता है। सूफ़ी संत और तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) के विद्वान
यह मानते हैं कि नफ़्स (अहंकार या निचले स्तर की प्रवृत्तियों) को शारीरिक
रूप से मारना या समाप्त करना नहीं चाहिए, बल्कि
उसे अनुशासित करके उस पर क़ाबू पाना और उसका शुद्धिकरण (तज़्कीया) करना
चाहिए। सूफ़ी परंपरा के अनुसार नफ़्स कोई बाहरी राक्षस या ऐसी चीज़ नहीं है जिसे ख़त्म
कर दिया जाए, बल्कि यह इंसान के वजूद का हिस्सा है
जिसमें सुधार की गुंजाइश होती है। असली बहादुरी अपनी इच्छाओं को पूरी तरह नष्ट
करने में नहीं, बल्कि गुस्से,
लालच
और अहंकार जैसे विकारों पर नियंत्रण पाने में है। नफ़्स की सिफ़तों (विशेषता)
की वजह से ही इंसान का जीवन चलता है और वह तरक्क़ी करता है। वह अपनी आत्मा को शुद्ध
करने से, परिष्कार करने से,
क़ाबू
में आ सकता है। आत्म-परिष्कार के लिए साधना करनी होती है। इस साधना में कई मकाम से
गुज़रना होता है।
आर. ए. निकोलसन ने “मिस्टिक्स ऑफ इस्लाम” में ‘नफ़्स’ की भौतिकता और उसकी प्रकृति को समझाने के लिए हज़रत
मुहम्मद बिन इल्यान रह. नाम के एक सूफ़ी की बड़ी ही रोचक कहानी का ज़िक्र किया है।
इस किताब के 'द पाथ' (The
Path) अध्याय में नफ़्स का ज़िक्र करते
हुए निकोलसन ने इस घटना को लिखा है।
एक दिन हज़रत मुहम्मद बिन इल्यान रह. के गले से लोमड़ी के बच्चे जैसा एक जानवर बाहर कूद
गया। ईश्वर (अल्लाह) ने उन्हें आत्मज्ञान दिया कि यह कोई और नहीं बल्कि उनका अपना 'नफ़्स' है। हज़रत इल्यान रह. ने उस जानवर को ठोकर मारी। जानवर
की आकृति का वह जीव बड़ा हो गया। उन्होंने फिर ठोकर मारी वह और बड़ा हो गया। यह
बार-बार होता रहा। हर ठोकर के साथ वह जानवर और बड़ा होता गया। हैरानी से हज़रत
इल्यान ने उससे पूछा, “दुनिया की
सारी चीज़ें तो पीटने से दबती हैं, तुम बढ़ते कैसे जाते हो?”
नफ़्स ने जवाब दिया, “क्योंकि
मुझे पैदा ही उल्टा (Perverse)
किया गया है। दूसरों के लिए जो दर्द है, मेरे लिए वह मज़ा है। इसी तरह जो दूसरों के लिए मज़ा है, मेरे लिए वह दर्द है।”
निकोलसन
इस कहानी के ज़रिए यह समझाते हैं कि नफ़्स को सीधे तौर पर दबाने या उस पर हिंसक रूप
से प्रहार करने से वह और अधिक विद्रोही और मज़बूत हो जाता है। यह कहानी इस बात का
सटीक उदाहरण है कि सूफ़ी परंपरा में नफ़्स को नष्ट करने के बजाय आध्यात्मिक साधना और
आत्म-नियंत्रण से साधने पर क्यों ज़ोर दिया जाता है। इसी अध्याय में वे आगे बताते
हैं कि कई अन्य सूफ़ियों ने भी अपने नफ़्स को सांप, कुत्ते
या चूहे के रूप में देखा है। यह भी कहा गया है कि हज़रत मंसूर हल्लाज रह. का नफ़्स
उनके पीछे कुत्ते के रूप में दौड़ता था। आर. ए. निकोलसन ने अपनी किताब The Mystics of Islam में इस
घटना का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है: “हल्लाज
का नफ़्स उनके पीछे एक कुत्ते के रूप में दौड़ता हुआ देखा गया था”। सूफ़ी
साहित्य (जैसे फ़रीदुद्दीन अत्तार की तज़्किरातुल औलिया)
में
इस घटना और इसके पीछे के गहरे रूहानी संदेश को एक बेहद दिलचस्प प्रसंग के ज़रिए
समझाया गया है। एक बार लोगों ने हज़रत मंसूर हल्लाज रह. को देखा कि वे कहीं जा रहे
हैं और एक कुत्ता उनके पीछे-पीछे चल रहा है। सूफ़ी संतों ने अपनी आत्मिक
दृष्टि (बसीरत) से पहचान लिया कि वह कोई आम कुत्ता नहीं, बल्कि
मंसूर का 'नफ़्स' है जो
उनके नियंत्रण में आ चुका है। जब लोगों ने इस पर हैरानी जताई,
तो
सूफ़ियों ने इसकी गहराई समझाते हुए कहा, "मंसूर
हल्लाज का कुत्ता (नफ़्स) उनके वश में है, इसलिए
वह उनके बाहर आ चुका है और उनके पीछे-पीछे गुलाम की तरह दौड़ता है। जबकि आम
दुनियावी लोगों का कुत्ता (नफ़्स) उनके अंदर छिपा बैठा है और इंसान खुद उस कुत्ते
के पीछे-पीछे भागता है।" मंसूर हल्लाज की यह कहानी इसी बात का प्रमाण है कि
उन्होंने कड़ी आध्यात्मिक साधना (मुजाहिदा) के ज़रिए अपने नफ़्स को इस हद तक काबू और
वश में कर लिया था कि वह उनके अधीन एक आज्ञाकारी जानवर की तरह दिखने लगा था। सूफ़ियों
को ये अनुभूतियां उन्हें अपनी रूहानी आंख से नज़र आती हैं। इनका कोई भी संबंध
प्रत्यक्ष जगत से नहीं होता।
कहने
का मतलब यह है कि अल्लाह की ओर सफ़र के दौरान नफ़्स को क़ाबू में करना होता है और
इसके दौरान साधकों को कई मकामात तय करने होते हैं। सूफ़ी विचारक हज़रत
अत्तार रह. ने सूफ़ी साधना के सात मक़ामात (अवस्थाएं)
बताए हैं।
15.1. उबूदियत –
यानी
दास्य-भाव। इसमें साधक अपने ह्रदय को पवित्र करने में लगा रहता है, जिससे कि
वह साधना के मार्ग पर आगे बढ़ सके। जब साधक को तलब यानी
ईश-अन्वेषण की त्वरा होती है तो वह ख़ुद को प्रभु का दास मानकर उसकी खोज की यात्रा शुरु
करता है। फ़क़्र (ग़रीबी) व दास्य-भाव उसके हृदय के कलुष को धो देता है।
उसका मन अकलुष हो जाता है। इससे उसका मन अपने प्रिय की छवि का ज़िक्र (स्मरण, शाब्दिक
मौन जाप) करने के योग्य हो जाता है।
15.2. इश्क़ – परम प्रिय की छवि का फ़िक्र (ध्यान) कर
उसके भीतर प्रेम भाव उदित होता है। मारिफ़त (ज्ञान) के रास्ते जब सालिक चल पड़ता है, तो उसे
गहरी अनुभूति का ज्ञान हासिल होता है और उसका भावावेगमय रूप इश्क़ है। फिर वह प्रभु के इश्क़ (प्रेम) के
मार्ग पर चल देता है। इस स्थिति में आकर सालिक अपने आपको क्रमश: विस्मृत करने
लगता है. इस तरह साधना के द्वारा वह ‘हाल’ (तन्मयता)
की स्थिति में पहुंच जाता है। उसे अपने तन-बदन की सुध-बुध नहीं रहती।
15.3 जुहद – अर्थात इंद्रिय-निग्रह, विरक्ति।
ईश-प्रेम के मार्ग पर बढ़ने के लिए विषय-वासना का त्याग ज़रूरी है। यह संयम और
इच्छा-कामनाओं के त्याग द्वारा ही संभव है। इसमें सांसारिक इच्छाओं का अवसान हो
जाता है.
15.4 मारिफ़त – अर्थात दिव्यज्ञान। जुहद के द्वारा वह दिव्यज्ञान
प्राप्त करता है और परमात्मा के गुणों, स्वभाव और कर्म पर पूर्ण ध्यान लगाता है।
15.5 वज्द – मारिफ़त के द्वारा साधक वज्द अर्थात
भावाविष्टावस्था को प्राप्त करता है। यह उन्माद की स्थिति है. उसमें इस्तिग़ना यानी
स्वतंत्र-चिंतन का विकास होता है। फिर वह उसके साथ
एकत्व को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
15.6 हक़ीक़त – सत्य का वास्तविक ज्ञान होना। तौहीद (एकेश्वरवाद)
की इस अवस्था में जब उसे सत्य का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है तो तवक्कुल (उस पर पूरी
तरह निर्भरता) और रिज़ा (संतुष्टि) की प्राप्ति होती है।
15.7 वस्ल –
अर्थात ईश-मिलन।
अध्यात्म मार्ग की यात्रा का अंतिम चरण है जब वह ईश्वर का साक्षात्कार करने में
सफल होता है। तब वह हैरत या
ईश्वरीय सौंदर्य से अभिभूत हो जाता है। फिर तो वह फ़करो-फ़ना यानी
पूर्ण अपरिग्रह व्रत द्वारा ईश्वर के प्रति पूर्ण-रूपेण समर्पित हो जाता है।
15.8 फ़ना व बक़ा की स्थिति
इसके
बाद फ़ना (अहं
की समाप्ति) व बक़ा (तद्रूप
होने की स्थिति) की स्थिति आती है जहां सालिक (साधक)
का व्यक्तित्व भाव रूप में परमात्मा में विलीन हो जाता है। महामिलन
के इस क्षण में आत्मा अपने मूल, अपने
उद्गम, अपने स्वामी, अपने
परम-प्रिय में विलीन होकर अपना व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त कर देती है। सूफ़ियों ने इसी अवस्था को फ़ना (विलय)
कहा है। इस हालत में उसे ज़र्रे-ज़र्रे में
ख़ुदा के नूर का ज़हूर दिखता है। अब तो वह ईश्वर के हक़ (सत्य), जमाल (सौंदर्य), जलाल (गौरव)
और कमाल (पूर्णता)
से मंडित हो जाता है।
परम
तत्व में विलय के बाद आत्मा को एक नया जन्म प्राप्त होता है अर्थात् अब वह अभिन्न
रूप से अपने स्रष्टा में निवास करती है। इस अवस्था को ‘बक़ा’
(अनश्वरता, नित्यता)
कहा जाता है। जो इस मक़ाम पर पहुंच जाता है उसे इन्सानुल
कामिल (पूर्ण मनुष्य) कहा जाता है। अब तो
उसे इस जामे शराब में यार का अक्स नज़र आता है। इसका नशा हमेशा उस पर छाया रहता है।
उसे अपने महबूब के अलावा कुछ नहीं दिखता। उसके अंदर एक ज्वाला प्रस्फुटित होती है,
इश्क़ (प्रेम) वह आग है, जो
महबूब (प्रियतम/ईश्वर) के अलावा बाकी सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है। – “अल इश्क़ु नारुन् यह्रिक़ु मा सिवा अल महबूब” सूफी मत में दिव्य प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) को एक तीव्र आग माना गया है। जब यह आग किसी साधक (सालिक) के दिल में भड़कती है, तो यह भीतर की तमाम परतों को प्रभावित करती है। वह सब कुछ जो ईश्वर नहीं है—जैसे कि
इंसान का अहंकार (अना), सांसारिक इच्छाएं, लोभ, मोह, धन-दौलत का लालच और यहाँ तक कि खुद का
अस्तित्व भी। यह आग इन सभी सांसारिक बंधनों को जला डालती है। जब आग सब कुछ जला
देती है, तो अंत में केवल वही बचता है जो जल नहीं
सकता। सूफी साधना में वह तत्व केवल 'महबूब' (परमात्मा) है।
इसका अर्थ यह है कि इस अवस्था में साधक के दिल में ईश्वर के अलावा किसी और की जगह
नहीं रह जाती।
सूफ़ी साहित्य में मैख़ाना, शराब, रिंद और
साक़ी शब्दों का ख़ूब प्रयोग किया गया है। ये शब्द प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुए
हैं। सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति अपने अगाध प्रेम और आध्यात्मिक अनुभवों को
व्यक्त करने के लिए इन रूपकों का सहारा लिया, जिन्हें
बाहरी तौर पर देखने पर सांसारिक वासना या नशा समझा जा सकता है, लेकिन इनका
आंतरिक अर्थ बेहद पवित्र और अलौकिक है। मय यानी शराब का प्रयोग प्रगाढ़ प्रेम के
प्रतीक के रूप में किया गया है। यह अंगूर के रस से बनने वाली नशीली शराब नहीं है, बल्कि ईश्वरीय
प्रेम का रस (इश्क़-ए-हक़ीक़ी का नशा) है। यह वह रूहानी ज़हर या अमृत है जिसे
पीकर साधक दुनियावी सुध-बुध भूल जाता है।
मयख़ाना यानी शराब
पीने की जगह का प्रयोग प्रेम-स्थल के रूप में हुआ है। यह शराब पीने का अड्डा नहीं
है, बल्कि 'इबादतगाह' (प्रार्थना
स्थल), गुरु का आश्रम, या साधक
का अपना दिल है, जहाँ रूहानी महफ़िल जमती है और ईश्वरीय ज्ञान की चर्चा
होती है।
साक़ी यानी शराब
पिलाने वाला का मार्गदर्शक के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। आम तौर पर
साक़ी का मतलब शराब परोसने वाला होता है, लेकिन सूफ़ी साहित्य में साक़ी 'मुरशद' (आध्यात्मिक
गुरु) या स्वयं 'ईश्वर' (परमात्मा) को कहा जाता है, जो साधक के
दिल के प्याले में ईश्वरीय प्रेम की शराब भरता है।
रिंद का अर्थ
है वह 'सच्चा साधक' या प्रेमी
(सालिक) जो ईश्वर के प्रेम में पूरी
तरह डूब चुका है। दुनिया की नज़रों में वह मतवाला या पागल (मस्त) हो सकता है, लेकिन
आध्यात्मिक रूप से वह सबसे जागृत व्यक्ति होता है। आशिक़ यानी प्रेमी सूफ़ी साधक के
प्रतीक के रूप में और प्रियतम ईश्वर के रूप में। आशिक़ सूफ़ी काशिफुल
हिजाबात (अज्ञान के परदे का उठ जाना) को प्राप्त करता है। और
उसे ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने “नफ़्स—अम्मारा” (अहं को नष्ट कर देना) किया था।
पैमाना (या जाम/प्याला) शराब पीने का पात्र नहीं, बल्कि साधक
का दिल (हृदय) है, जिसकी पवित्रता और क्षमता के अनुसार साक़ी उसमें प्रेम
का रस ढालता है।
सूफ़ियों ने इन प्रतीकों को क्यों चुना? चूँकि
ईश्वर से मिलन के आनंद और उस परम शांति को सांसारिक या किताबी शब्दों में समझाना
असंभव था, इसलिए सूफ़ी संतों ने दुनिया के सबसे तीव्र
अनुभवों—जैसे प्रेम, नशा और दीवानगी—के शब्दों को चुना ताकि वे रूहानी मस्ती
की उस अवस्था को आम इंसानों को समझा सकें। प्रसिद्ध सूफ़ी संत उमर ख़ैयाम, हाफ़िज़
शिराज़ी और अमीर ख़ुसरो की रचनाओं में ये प्रतीक प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
सूफ़ी साहित्य के इन प्रतीकों को और गहराई से समझने के
लिए आइए अमीर ख़ुसरो और बाबा बुल्ले शाह दोनों की एक-एक बेहद
प्रसिद्ध रचना को देखते हैं, जहाँ इन शब्दों का जीवंत आध्यात्मिक उपयोग हुआ है। हज़रत
अमीर ख़ुसरो की कालजयी रचना "छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके" उनके गुरु (मुरशिद) हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रति
समर्पित है। इस कलाम की दो पंक्तियाँ इन प्रतीकों को बहुत सुंदर ढंग से स्पष्ट
करती हैं,
"प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।
हरी-हरी चूड़ियाँ गोरी-गोरी
बइयाँ, कलाई पकड़ लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके।"
यहाँ 'मदवा' (शराब/मदिरा) किसी अंगूर का रस नहीं है, बल्कि गुरु के दिव्य प्रेम और ज्ञान का रस है। 'प्रेम भटी' वह आध्यात्मिक पाठशाला या गुरु का सानिध्य है जहाँ यह प्रेम रूपी मदिरा तैयार होती है। ख़ुसरो कहते हैं कि गुरु ने उन्हें अपने ज्ञान और प्रेम की ऐसी
शराब पिलाई है कि वे दुनियावी मान-सम्मान, अहंकार और
होश-ओ-हवास खोकर पूरी तरह ईश्वर के रंग में रंग गए हैं (फ़ना हो गए हैं)। यहाँ
गुरु स्वयं साक़ी की भूमिका में
हैं।
बाबा बुल्ले शाह पंजाब के एक ऐसे बेबाक सूफ़ी संत थे जिन्होंने
रूढ़िवादी मुल्ला-मौलवियों की परवाह न करते हुए रूहानी मस्ती को खुलकर गाया। उनकी प्रसिद्ध
कृति "इक रांझा मैनु लोड़िंदा" की पंक्ति को देखिए
"पी शराब ते खा कबाब, बाळ बालन दे विच अग्ग
चोरी कर ते
भन्न घर रब्ब दा, उस ठगबाज़ नूं ठग्ग।"
यदि कोई इसका शाब्दिक अर्थ निकाले तो लगेगा कि बुल्ले शाह शराब पीने, कबाब खाने, आग लगाने और चोरी करने के लिए कह रहे हैं। यही कारण था कि उस दौर के कट्टरपंथी उनसे नाराज़ रहते थे। जब इसका आंतरिक और वास्तविक
सूफ़ी अर्थ देखते हैं, तो हम पाते हैं कि अपने भीतर ईश्वरीय प्रेम का ऐसा नशा
पैदा करो कि तुम्हें दुनिया की कोई और चीज़ दिखाई न दे। अपने अहंकार (नफ़्स) और
बुरी इच्छाओं के मांस को भूनकर नष्ट कर दो। अपने भीतर के सारे सांसारिक मोह-माया, पाखंड और
झूठी पवित्रता की लकड़ियों में ईश्वरीय विरह की आग लगा दो। उस परमात्मा को, जो स्वयं
सब कुछ जानने वाला परम चतुर (ठगबाज़) है, अपने निश्छल और बेइंतहा प्रेम से जीत लो (यानी उसे अपने
दिल में चुरा लो)। दोनों ही संतों की रचनाओं से यह साफ़ होता है कि सूफ़ी मत में 'मस्ती' साधना का
मुख्य अंग है। जब एक सूफ़ी कहता है कि वह मैख़ाने में बैठा है, तो इसका
अर्थ है कि वह अपने गुरु की महफ़िल में ईश्वरीय चर्चा में लीन है, जहाँ गुरु
रूपी साक़ी अपनी नज़रों से प्रेम की शराब परोस रहा है।
“तसव्वुफ़” या सूफ़ी मत प्रेमोपासना द्वारा अद्वैत-स्थिति की
प्राप्ति के सिद्धांत का प्रतिपादक है। ईश्वर के प्रति अपने चित्त में प्रगाढ़
प्रेम जागृत कर ब्रह्म-स्वरूप हो जाना सूफ़ी साधकों (सालिक) का लक्ष्य होता है। सूफ़ीमत के
अनुसार इंसान के जीवन का उद्देश्य यही यात्रा है। इस रूहानी सफ़र में इंसान के जिस्म
में जितने भी लतीफ़े अर्थात चक्र हैं, जैसे कि नफ़्स, क़ल्ब,
रूह,
सिर्र,
ख़फ़ी,
अख़्फ़ा,
वे
सभी अल्लाह के ज़िक्र से ज़ारी हो जाते हैं। ये लतीफ़े सोने की हालत में भी ज़िक्र
करते रहते हैं और सूफ़ी के मरने के बाद भी। इनकी गतिशीलता देखकर नब्ज़ देखने वालों
को यही गुमान होता है कि सूफ़ी ज़िन्दा है। सूफ़ी की मौत की तसदीक उसके ख़लीफ़ा या
उसके स्तर के दीगर सूफ़ी करते हैं। तभी उसे दफ़नाया जाता है।
ईश्वर को पाना आसान है, बस एक इंसान को ख़ुद को उसे पाने
लायक बनाना मुश्किल होता है। आध्यात्मिकता कोई धार्मिक कर्मकांड, रीति-रिवाज़ नहीं
है, यह तो एक अहसास है कि ईश्वर हर कण में मौज़ूद है। हमारे अंदर है। हमारे पास है।
सूफ़ीमत उस परम सत्ता का गुणगान करता है और इश्क़ के ज़रिए उसे पाने का रास्ता बताता
है। इस तरह हम पाते हैं कि सूफ़ीमार्ग का लक्ष्य ईश्वर की ओर बढ़ना और उसके गुणों को
आत्मसात करना है। सूफ़ी साधक परमात्मा को प्रेम और सौंदर्य का रूप मानता है, इसलिए इश्क़े-मजाज़ी को इश्क़े-हक़ीक़ी का साधन
समझता है। मतलब वह लौकिक प्रेम भी करता है। सूफ़ी विचारकों के अनुसार लौकिक या
शरीरी प्रेम अलौकिक या अशरीरी प्रेम की साधना की सीढ़ी का पहला पायदान है।
मा ताब अज़ इश्क़ रूए गरचे मजाज़ी सत
कि आन बहर हक़ीक़त कारसाज़ी सत। (ज़ामी)
अर्थात् "प्रेम के मार्ग से कभी अपना चेहरा मत मोड़ो, चाहे वह
सांसारिक (मानवीय) प्रेम ही क्यों न हो; क्योंकि यही प्रेम आगे चलकर उस परम सत्य (ईश्वरीय
प्रेम) के समुद्र तक पहुँचने का जरिया और माध्यम बनता है।" सूफ़ी संतों का
मानना है कि एक साधारण इंसान के लिए सीधे निराकार ईश्वर से लौ लगाना या दिव्य
प्रेम (इश्क़-ए-हक़ीक़ी) को समझना बहुत कठिन है। इसलिए, इश्क़-ए-मजाज़ी (किसी इंसान से किया गया प्रेम) पहली
सीढ़ी है। जब कोई व्यक्ति किसी इंसान से सच्चा प्रेम करता है, तो उसके
भीतर से अहंकार, स्वार्थ और 'मैं' की भावना खत्म होने लगती है। वह किसी दूसरे के लिए
झुकना और त्याग करना सीखता है। जब साधक का दिल सांसारिक प्रेम में पूरी तरह तड़पकर
शुद्ध हो जाता है, तो सूफ़ियों के अनुसार, उसका यही
लौकिक प्रेम धीरे-धीरे अलौकिक यानी ईश्वरीय प्रेम में तब्दील हो जाता है। बशीर
अहमद मयूख ने अपने आलेख “इस्लामी
रहस्यवाद और भक्ति-धारा का संगम” में कहा है
कि “आधुनिक
भारतीय रहस्यदर्शी ओशो रजनीश भी इसी पक्ष के प्रवक्ता हैं।” वे इस आलेख में समझाते हैं कि जिस प्रकार सूफ़ी संत सांसारिक प्रेम से ईश्वरीय प्रेम (इश्क़-ए-मजाज़ी से इश्क़-ए-हक़ीक़ी) की यात्रा को सही ठहराते हैं और जीवन के हर रंग को उत्सव के रूप में देखते हैं, आधुनिक काल में ओशो रजनीश भी ठीक इसी दर्शन और दृष्टिकोण के बड़े पुरोधा रहे हैं।
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मनोज
कुमार
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