सोमवार, 28 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-30

 

महात्मा गांधी हत्या केस-30

20 जनवरी, 1948

शाम को 4 बजे कनॉट सर्कस के रीगल सिनेमा के पास के टैक्सी स्टैण्ड से उन चारों ने टैक्सी ली। टैक्सी ड्राइवर का नाम था सुरजीत सिंह। सुरजीत सिंह, पाकिस्तान से भागकर आया एक अनपढ़ युवा सिख था। वह किसी तरह से अपनी कार अपने साथ लाने में कामयाब रहा था। वह नई दिल्ली में अपनी कार को 'प्राइवेट' टैक्सी के तौर पर चलाकर गुज़ारा करता था। उसके पास इसे टैक्सी के तौर पर चलाने का लाइसेंस नहीं था। उसे इस बात पर गर्व था कि उसकी कार का रंग अनोखा पीला-हरा था, जिसे वह 'मूंगिया' (चने के रंग जैसा) कहता था। दिल्ली में शायद यह अकेली ऐसी 'टैक्सी' थी, जिसकी छत पर सामान रखने का कैरियर लगा हुआ था। 20 जनवरी की दोपहर को सुरजीत रीगल सिनेमा के पास सवारी का इंतज़ार कर रहा था, तभी चार लोग उसके पास आए। चूँकि टैक्सी में मीटर नहीं था, इसलिए उन्होंने उन्हें बिड़ला हाउस ले जाने, वहाँ आधे घंटे इंतज़ार करने और वापस लाने का किराया पहले ही तय कर लिया। वे चार यात्री थे—आप्टे, गोपाल, बडगे और शंकर।

आप्टे ने सारी चीज़ें फाइनल की थी। आने-जाने का भाड़ा 12 रुपया तय हुआ था। तीन आदमी (गोपाल गोडसे, आप्टे और किष्टैय्या) पीछे बैठे थे, और दाढ़ी वाला (बड़गे) आगे में बैठा था। वे पहले हिन्दू महासभा भवन गए। टैक्सी वहीं रुकी रही। वे अपने रूम में गए। अपने सामानों को समेटा। फिर वापस टैक्सी में बैठे। बड़गे ने अपना रिवाल्वर और हथगोला एक हैंड बैग में रखा हुआ था।

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बिड़ला भवन के पिछले हिस्से में सर्वेंट्स क्वार्टर के पीछे के गोलम्बर के पास एक गहरे हरे रंग की कार आकर रुकी और उसमें से चार लोग उतरे। ड्राइवर अपनी सीट पर बैठा रहा। गेट पर चौकीदार भूर सिंह बैठा हुआ था। बिड़ला हाउस का मोटर साफ करने वाला छोटूराम, प्रार्थना-स्थल के पीछे अपने कमरे के सामने बैठा हुआ था। छोटूराम और भूरसिंह का क्वार्टर अगल-बगल में था। सुरजीत ने उन्हें गेट से अंदर जाते और बगीचे में जाते हुए देखा। वह कुछ देर अपनी कार के पास रुका रहा, और फिर उसने सोचा कि वह भी गांधीजी की प्रार्थना सभा में शामिल हो जाए; इसलिए वह भी गेट से अंदर चला गया।

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बिड़ला भवन के कम्पाउंड से दो आदमी आए और उन चारों से बात करने लगे। आने वाले दो आदमी मदनलाल और करकरे थे और ये चार थे आप्टे, शंकर, गोपाल और बड़गे। आप्टे ने मदनलाल से पूछा, “तैयार हो क्या?” मदनलाल ने कहा, “हां, तैयार हूं। मैंने दीवार पर पलीता लगा दिया है। बस अब मुझे फ़्यूज़ में चिन्गारी लगानी है।” इस बीच भूर सिंह सामने के गेट पर अपनी ड्यूटी करने चला गया। थोड़ी देर की बातचीत के बाद वह ग्रूप अलग-अलग होकर प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ने लगे।

तीन लोग प्रार्थना स्थल की ओर चले गए। एक छोटूराम से बात करने लगा। वह करकरे था। करकरे ने छोटूराम से कहा, “मेरा एक साथी तुम्हारे कमरे की जाली में से प्रार्थना में बैठे हुए गांधीजी का फोटो लेना चाहता है। क्या तुम हमें इसका उपयोग करने दोगे?” उसने दस रुपए छोटूराम के हाथ में थमाए। साठ रुपए महीने कमाने वाले छोटूराम के लिए वह एक बड़ी राशि थी। छोटूराम ने पूछा, “आपके पास तो कैमरा है ही नहीं, फिर फोटो किससे लेंगे?” करकरे ने कहा, “कैमरा कार में है।” करकरे कार के पास आया। तब तक नाथूराम भी आ चुका था। बड़गे, किष्टैय्या और गोपाल पहले से थे। करकरे कार के पास आया। वहां से वापस आकर उसने आप्टे से कहा, “तुम लोग काफी देर से आए हो। प्रार्थना शुरू हो चुकी है। गांधीजी अपनी जगह पर बैठ चुके हैं। मैंने एक आदमी के अन्दर कमरे में फोटोग्राफी के लिए बात कर अनुमति ले ली है।” आप्टे ने बड़गे के फोटोग्राफर का रूप धारण कर लेने के लिए कहा और बैग के साथ अन्दर कमरे में जाने को बोला।

बड़गे ने देखा कि कमरे के बाहर दो-तीन लोग बैठे थे। उसे लगा कि अगर उसने गोली दाग दी तो फिर हत्या के बाद वहां से भागना उसके लिए मुश्किल होगा। उसके हाथ-पैर कांपने लगे। नाथूराम ने उससे कहा, “डरो मत। हमने इंतजाम कर लिया है। हम यहां से सुरक्षित निकल जाएंगे।” नाथूराम, करकरे और आप्टे ने तब बड़गे पर कमरे के अन्दर जाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। बडगे ने उस कमरे में जाने से मना कर दिया। बोला, “छोटूराम राम एक आंख वाला (काना) है। यह अशुभ लक्षण है।” काना आदमी का दिख जाना उसे एक बुरा शकुन लगा। किसी भी काम की शुरुआत में एक काने आदमी को देखना पक्की विफलता को न्योता देने जैसा था।

बडगे ने मुड़कर आप्टे से कहा कि अब कोई भी चीज़ उसे उस कमरे में नहीं ले जा सकती। बडगे डर के मारे सुन्न हो गया था। उसने खुद को यकीन दिला लिया था कि वह कमरा एक जाल की तरह है; कि अगर वह दरवाज़े पर खड़े एक आँख वाले आदमी के पास से गुज़रकर कमरे में चला गया, तो वह कभी ज़िंदा बाहर नहीं आ पाएगा। बड़गे ने कहा कि कमरे में जाकर गांधीजी पर पीछे से गोली चलाने से बेहतर है कि उनके नजदीक जाकर उन पर सामने से गोली चलाई जाए ताकि यह निश्चित हो जाए कि उन्हें मार दिया गया है। नाथूराम और आप्टे उसे समझाते रहे कि डरने की कोई बात नहीं है, और उनके भागने का प्लान एकदम पक्का है। लेकिन बडगे का इरादा नहीं बदला। उसने कहा, “मैं मंच के काफी निकट खड़ा हो जाता हूं। जैसे ही मदन लाल पलीता फोड़ेगा, मैं गांधीजी पर गोली चला दूंगा और ग्रेनेड फेंक दूंगा।” उसने अपने प्लान के बारे में गोडसे और आप्टे को आश्वस्त कर दिया। गैंग के बाक़ी सदस्यों को लगा कि अब बड़गे को समझा पाना मुश्किल ही है। समय तेज़ी से बीत रहा था। अतः इस अंतिम समय में उन्हें योजना में फेर बदल की ज़रूरत पड़ गई।

प्लान बदल चुका था!

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गांधीजी पहले ही आ चुके थे, और जहाँ वे खड़े थे, वहाँ से लगभग एक दर्जन युवा लड़कियों द्वारा गाई जा रही शुरुआती प्रार्थनाओं की गूँज सुनाई दे रही थी। प्रार्थना सभा शायद ही कभी पच्चीस मिनट से ज़्यादा चलती थी। सूरज डूबने का समय था, और आधे घंटे के भीतर ही ठीक से देख पाना मुश्किल हो जाता। हार मानकर प्लान बदलने के अलावा कोई चारा नहीं था। हाँ, बडगे खुली सभा में गांधीजी को गोली मार सकता था। लेकिन बडगे गांधीजी को मारने का विचार पहले ही छोड़ चुका था!

साज़िश करने वालों का प्लान बदल चुका था। उन्होंने तय किया कि वे प्रार्थना स्थल पर मौजूद भीड़ में घुल-मिल जाएंगे। मदनलाल के गनकॉटन स्लैब में धमाका करने से जो अफ़रा-तफ़री मचेगी, उसका फ़ायदा उठाकर वे मंच की ओर दौड़ेंगे और बड्गे गांधीजी पर हैंड-ग्रेनेड फेंक देगा। बडगे ने सोचा अगर उसके बाद वह गांधीजी को गोली मारता तो हत्यारे के रूप में निश्चित रूप से पकड़ा जाता। मदनलाल बौम्बर के रूप में काम करता और शायद बच भी जाता। और जो मुख्य साज़िश-कर्ता थे, वे बेदाग बच जाते। बडगे के मन में चल रही सोच उल्टी दिशा में मुड़ रही थी। शंकर को बदली हुई योजना समझाने के बहाने, बडगे उसे वापस इंतज़ार कर रही टैक्सी के पास ले गया, जबकि साज़िश में शामिल अन्य लोग घबराहट में बगीचे में टहल रहे थे।

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बड़गे और शंकर टैक्सी के नजदीक पहुंचे। गैंग के बाक़ी सदस्य प्रांगण में ही रहे। संयोग से, टैक्सी ड्राइवर वहाँ नहीं था, और बडगे के पास अपनी और शंकर की रिवॉल्वर को उस तौलिए में लपेटने का काफ़ी समय था जिसे उसने अपने कंधों पर डाला हुआ था। बड़गे ने शंकर और उसके ख़ुद के रिवाल्वर और हथगोलों को गमछे में लपेटा और हैंड बैग में रख दिया। हैंड बैग उसने टैक्सी की पिछली सीट के नीचे रख दिया। उसके बाद उसने अपना हैंड ग्रेनेड शंकर को रखने के लिए दिया और उसे चेतावनी दी कि जब तक वह (बडगे) उसे इशारा न करे, तब तक वह 'उससे कुछ न करे'। फिर, अपनी दोनों मुट्ठियाँ भींचकर और उन्हें अपनी नेहरू शर्ट की जेबों में गहराई तक डालकर—ताकि ऐसा लगे कि उसने उनमें रिवॉल्वर और हैंड ग्रेनेड दोनों रखे हुए हैं—वह और शंकर बाकी लोगों के पास वापस चले गए।

बड़गे ने गोडसे और आप्टे को कहा कि वह तैयार है। आप्टे ने आश्वस्त होने के लिए फिर से पूछा, “बन्दोपन्त, तुम तैयार हो?” बड़गे ने कहा, “हां”। आप्टे ने प्रार्थना सभा की भीड़ में दाखिल हो जाने का निश्चय किया और यह भी तय किया कि मदनलाल बारूदी पलीता लगाएगा बाद में मचने वाली गड़बड़ी में वे मंच की तरफ़ झपटेंगे और बड़गे गांधीजी पर गोली चलाकर हथगोला फेंकेगा। फिर सब मची हुई अफ़रा-तफ़री में टैक्सी से भाग जाएंगे। इसके लिए टैक्सी भी तैयार रखी गई थी। बड़गे प्रार्थना स्थल की अगली पंक्ति में अपनी जगह लेने के लिए आगे बढ़ गया। शंकर भी उसके साथ था। आप्टे मदनलाल की तरफ़ बढ़ा। उसने मदनलाल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “चलो।” मदनलाल उस जगह की ओर बढ़ा जहां उसने बारूद लगाए थे। शंकर और बड़गे प्रार्थना सभा की ओर पहुंच गए। करकरे उनके पीछे था।

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प्रार्थना सभा में भीड़ सामान्य से अधिक थी, क्योंकि यह 13 तारीख, जब उन्होंने अपना उपवास किया था, के बाद महात्मा गांधी की पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी। बिजली के इंस्टालेशन की विफलता ने लाउड-स्पीकरों को अनुपयोगी कर दिया था, और गांधीजी की कमजोर आवाज केवल उनके पास बैठे कुछ लोगों द्वारा ही सुनी जा सकती थी।  लेकिन उनके प्रवचन को एक प्रमुख कांग्रेस कार्यकर्ता और महात्मा गांधी की करीबी सहयोगी डॉ सुशीला नैयर ने दर्शकों के सामने दोहराने का फ़र्ज़ निभाया। गांधीजी ने दिल्ली के निवासियों द्वारा ली गई शांति प्रतिज्ञा का उल्लेख किया, और कहा कि दिल्ली ने एक महान काम किया है और उन्हें आशा है कि गण्य-मान्य व्यक्तियों ने सत्य के साथ, जिसका प्रतिनिधित्व भगवान ने अपने गवाह के रूप में किया था, अपनी प्रतिज्ञा ली थी। अगर दिल्ली ने सच्चाई से काम लिया, तो उसकी कार्रवाई का असर पूरी दुनिया में महसूस किया जाएगा। हालाँकि, उन्हें इस बात का खेद था कि हिंदू महासभा ने अपने एक अधिकारी के माध्यम से प्रतिज्ञा को अस्वीकार कर दिया था। मुसलमानों के प्रति शत्रुता का अर्थ भारत के प्रति शत्रुता था। उन्होंने एक सुझाव के बारे में बात की कि उन्हें गैर-मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के कृत्यों को रोकने के लिए पाकिस्तान का दौरा करना चाहिए।

थोड़ी ही देर में प्रार्थना-स्थल पर माइक ठीक कर दिया गया था। गांधीजी लोगों को संबोधित कर रहे थे। गैंग उस कम्पाउंड में दाखिल हुआ। सभी सदस्यों ने अपनी-अपनी नियत जगह ली। गांधीजी के सामने बीस-तीस महिलाएं और बच्चे बैठे थे। गांधीजी की दाहिनी ओर पंद्रह कदम की दूरी पर बड़गे था। उसने प्रार्थना सभा में सुहरावर्दी को नहीं देखा। उसके कुछ कदमों की दूरी पर दाहिनी ओर शंकर और करकरे थे। मदनलाल पाहवा ने अपनी तैयारी पूरी की और फुसफुसाते हुए कहा कि उसने दीवार पर बारूद का पलीता रख दिया है। करकरे ने पूछा क्या वह तैयार है? मदनलाल ने हां कहा और जहां बारूद था, उस ओर बढ़ चला।

सुलोचना ने देखा दीवार पर कुछ रखा हुआ है!

बिड़ला हाउस के नौकरों के क्वार्टर से लगभग सौ गज की दूरी पर, 9 अल्बुकर्क रोड के नौकरों के क्वार्टर थे, और उनमें से एक में नानक चंद और उनकी युवा पत्नी सुलोचना रहते थे। उनका तीन साल का बेटा, मोहिंदर, अक्सर बिड़ला हाउस के नौकरों के बच्चों के साथ खेलने के लिए दूर चला जाता था। 20 जनवरी की शाम को, जब सुलोचना अपने बेटे को खोजने के लिए बिड़ला हाउस के पिछले हिस्से में गई, तो उसने देखा कि एक व्यक्ति बम रख रहा था और फिर माचिस की तीली जला रहा था। उसने ज़बरदस्ती अपने बच्चे को उठाया... देखा कि बम से जुड़ी डोरी या चीज़ से चिंगारियां निकल रही थीं।

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इधर बड़गे के हाथ पैंट की जेब में थे, मानों उसने बंदूक और ग्रेनेड पकड़ रखा हो। उसके बाक़ी साथियों को उसकी कारस्तानिओं का कोई इल्म नहीं हुआ। बड़गे ने आप्टे को इशारा किया कि वह तैयार है। आप्टे ने मदनलाल पाहवा को इशारा किया। पाहवा ने माचिस की तिली से पलीते में आग लगा दी और वहां से अलग हट गया। छोटूराम ने देखा कि एक आदमी चहार दिवारी पर कुछ रख कर उसमें आग लगा रहा है। भीड़ में खड़ी सुलोचना देवी ने एक आदमी को दियासलाई से कोई चीज़ जलाते देखा था। उसमें से चिनगारियां भी निकली थीं। मदनलाल ने भी सुलोचना को देखा। असल में, उसने उससे कहा कि वह अपने बच्चे को उठाए और भाग जाए।

मदनलाल पाहवा ने इशारा से अपने साथियों को बताया कि उसने अपना काम कर दिया है और किसी भी क्षण विस्फोट हो सकता है। आप्टे ने पाहवा को भरोसा दिलाया कि सब कुछ कंट्रोल में है। आप्टे अपने दोनों फ्रंट-लाइन सैनिकों, बाड्गे और शंकर को देख सकता था, जिन्होंने गांधी के दोनों तरफ़ अपनी जगह ले ली थी, और वे साफ़ तौर पर तैयार थे कि जैसे ही 'बम' फटेगा, वे अपनी रिवॉल्वर से उन पर गोलियां चला देंगे।

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गांधीजी अपना संबोधन दे रहे थे। बड़गे उनकी दाईं तरफ़ चार-पांच फीट की दूरी पर खड़ा था। करकरे और किष्टैय्या उसकी दाईं तरफ़ कुछ ही कदम दूर खड़े थे। अचानक सभा की शांति को भंग करता हुआ जोर की आवाज सुनाई दी जैसे कुछ विस्फोट हो गया हो। भीड़ में मौजूद हर किसी ने उसे सुना। जब विस्फोट हुआ छोटूराम अपने क्वार्टर के बाहर बैठा था। उस बम के विस्फोट से दीवार का एक हिस्सा गिर गया था। चारों तरफ़ गर्द और धुआं के गुबार छा गए। गांधीजी जहां बैठे थे उससे 75 फुट की दूरी पर विस्फोट हुआ था। गांधीजी बाल-बाल बच गये थे। कोई घबराहट नहीं थी, कोई उछलकर भागा नहीं, लेकिन सबने गर्दन घुमाकर देखा कि धमाका कहाँ से हुआ है। किसी ने गोली नहीं चलाई; किसी ने ग्रेनेड नहीं फेंका। मदनलाल, जो शंकर की तरफ़ देख रहा था, उसने देखा कि वह 'भाग खड़ा हुआ', और फिर देखा कि बड्गे भी भाग रहा था। उसी समय, आप्टे ने उसके कंधे पर थपथपाया और धीरे से कहा कि प्लान नाकाम हो गया है।

कुछ लोग घटना-स्थल की ओर दौड़े। गैंग के सदस्य अगली योजना के अमल होने का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन उस दिन प्रार्थना सभा में ऐन वक़्त पर प्लानिंग के हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। मदनलाल पाहवा के भगदड़ मचाने के लिए पलीते में आग लगाने के बाद भी प्रार्थना सभा में कोई भगदड़ नहीं मची। कुछ नहीं हुआ। कोई गोली नहीं चली। न तो करकरे न और न ही गोपाल ने ग्रेनेड फेंके। दर्शकों की परिधि पर एक क्षण की बेचैनी देखी गई, और कुछ व्यक्ति दूर जाते हुए देखे गए, लेकिन गांधीजी ने अपना प्रवचन जारी रखा और हाथ जोड़ कर लोगों से शांत रहने की अपील की। धमाके की आवाज़ से घबराकर मनुबहन उनके पैरों पर गिर पड़ीं और पूरी ताक़त से उन्हें जकड़ लिया। गांधीजी ने पूछा, "तुम क्यों डरे हुए हो? शायद कुछ सैनिक नकली लड़ाई का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन अगर वे सचमुच तुम पर और मुझ पर गोली चलाने आ जाएं, तो तुम क्या करोगे?"

दर्शक शांतिपूर्वक बैठे रहे। उस समय बडगे और किष्टैय्या गाँधीजी के पास ही खड़े थे, पर फिर भी किसी तरह के ख़ास हलचल न मचने की वज़ह से गाँधी को मार देने की योजना बुरी तरह विफ़ल हो गई थी। 

गांधीजी की सीट के पास दर्शकों के एक बड़े हिस्से को यह नहीं पता था कि जोरदार विस्फोट का कारण क्या था और वास्तव में विस्फोट कहां हुआ था। गांधीजी ने स्वयं सोचा था कि यह किसी प्रकार का सैन्य अभ्यास है और इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। गांधीजी ने बम विस्फोट पर ध्यान न देकर अपना भाषण जारी रखा, “अगर हम इस तरह न-कुछ-सी बात पर घबरा जाएंगे, तो सचमुच कुछ हो जाने पर तो हमारा क्या हाल होगा? ... सुनो! सुनो! सब लोग सुनो कि ... कुछ नहीं हुआ है। ...शांतिपूर्वक बैठ जाओ।” (एक छोटी, दर्द भरी हंसी और फिर खामोशी)। गैंग को जिस हो-हल्ले और अफरा-तफरी की आशा थी वैसा कुछ नहीं हुआ। गांधीजी के शब्दों ने भीड़ को शांत कर दिया था।

प्रार्थना सभा में मौजूद लोगों को धीमी आवाज़ में संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा कि दिल्ली ने एक बहुत अच्छा काम किया है और उन्हें उम्मीद है कि शांति की शपथ लेने वालों ने 'सत्य' रूपी ईश्वर को साक्षी मानकर ही हस्ताक्षर किए होंगे। उन्होंने सुना था कि हिंदू महासभा के एक अधिकारी ने इस शपथ को मानने से इनकार कर दिया है। उन्हें इस बात का दुख था। जब प्रार्थना सभा समाप्त हो गयी और लोग जाने लगे तो गांधीजी के दीवान के पास बैठे लोगों को पता चला कि एक पंजाबी युवक ने बिड़ला हाउस के पिछले गेट के पास बंदूक-सूती की पटिया उड़ा दी थी।

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कुछ सुरक्षा कर्मचारी विस्फोट स्थल की तरफ़ जा रहे थे। मदनलाल भाग नहीं पाया। मदनलाल पहले कभी बिड़ला हाउस नहीं गया था, और उसे पता नहीं था कि कहाँ जाना है। वह उस तरफ़ चल पड़ा जिसे उसने बाहर निकलने का रास्ता समझा, लेकिन पहुँच गया बिड़ला हाउस के आलीशान पोर्च में। वह मुड़ा और झाड़ियों व रास्ते से होते हुए तेज़ी से आगे बढ़ा, तो देखा कि वह बिल्डिंग के मुख्य दरवाज़े के पास पहुँच गया है, जहाँ कुछ परेशान-से दिखने वाले पुलिसवाले खड़े थे। अब वह किसी भी हाल में अपनी तलाशी नहीं होने दे सकता था, क्योंकि उसकी जेब में अभी भी ग्रेनेड था। वह वापस मुड़ा और किसी तरह नौकरों वाला वह गेट ढूँढ़ निकाला जिससे वह अंदर आया था; यह उसे उस जगह के पास ले आया जहाँ उसने विस्फोटक रखा था। सुलोचना देवी नाम की वह गरीब और अनपढ़ महिला ने उसे माचिस से कुछ जलाते हुए और बम से जुड़ी बत्ती से चिंगारियां निकलते हुए देखा था। वह अपने बच्चे के साथ अभी भी वहीं थी। सुलोचना देवी ने राइफ़ल लिए एक पुलिसवाले और दो अन्य लोगों को बताया कि बम इसी आदमी ने लगाया था। विस्फोट होने के बाद छोटूराम दौड़ा और उसने मदनलाल का हाथ पकड़ा। और भी लोग आए और मदनलाल पकड़ा गया। उसे गेट की तरफ़ ले जाया गया। गेट के बाहर पुलिस पोस्ट थी। कोई घायल नहीं हुआ, और पथभ्रष्ट युवक को तुरंत पकड़ लिया गया और पुलिस को सौंप दिया गया।  पुलिस ने मदनलाल को गिरफ़्तार किया और हथकड़ी लगाकर मैदान से बाहर ले गई। कुछ मिनटों बाद, बिड़ला हाउस के गेट पर बने पुलिस बूथ में मदनलाल पाहवा की तलाशी ली जा रही थी और उससे पूछताछ हो रही थी। उसके पास एक हैंड ग्रेनेड मिला। वह बिल्कुल शांत था। उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं लग रहा था। जब उससे पूछा गया कि उसने गनकॉटन में धमाका क्यों किया, तो उसने कहा कि उसका मकसद गांधी को मारना था। मदनलाल पाहवा ने कहा, "मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मुझे मुसलमानों के साथ दोस्ती और शांति की गांधी की नीति पसंद नहीं है।" उसे पास के पुलिस स्टेशन ले जाया गया।

कुछ लोगों ने कहा कि युवक का नाम मदन लाल पाहवा था, और वह एक असंतुष्ट शरणार्थी था जो केवल अपने बुरे स्वभाव का प्रदर्शन कर रहा था। पाहवा को पुलिस पूछताछ के लिए ले गई, और आगंतुक दबे स्वर में घटना की बात करते हुए घर चले गए। पाहवा मुख्य साज़िशकर्ता बिल्कुल नहीं था। वह एक बेढंगा और साधारण-सा दिखने वाला नौजवान था, जिसमें ज़्यादा समझ-बूझ नहीं थी। साज़िश में उसकी क्या भूमिका थी, यह तो साफ नहीं था, लेकिन यह बात स्पष्ट थी कि वह इस पूरी मशीन का बस एक छोटा-सा पुर्जा था।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर