शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

422. भारत छोड़ो आंदोलन एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन

राष्ट्रीय आन्दोलन

422. भारत छोड़ो आंदोलन एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन


421. भारत छोड़ो आन्दोलन-1

421. भारत छोड़ो आन्दोलन-2

1942

विद्वानों के बीच ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ पर इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या यह आंदोलन अचानक हुआ था, या यह एक संगठित विद्रोह था। कुछ विचारकों द्वारा भारत छोडो आन्दोलन को एक ‘स्वतः स्फूर्त आन्दोलन के रूप में चरित्रांकित किया गया है। यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्या इसने भारतीय स्वतन्त्रता की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान की? कुछ विद्वान इसे गांधीवादी सत्याग्रह आन्दोलनों के चरम बिंदु के रूप में देखते हैं। जो इसे ‘स्वतः स्फूर्त आन्दोलन मानते हैं, ऐसे लोगों का कहना है कि 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू भले ही गांधीजी और कांग्रेस ने किया हो लेकिन इसकी गति मूलतः स्वतः स्फूर्त थी।

9 अगस्त, 1942 की सुबह नेताओं की गिरफ्तारी के बाद के कुछ ही दिनों में आंदोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया। ‘भारत छोडो प्रस्ताव भावी आन्दोलन की विस्तृत गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त अस्पष्ट था। इस व्यापक विस्फोट का कारण यह था कि अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर दमन की नीति अपना ली थी। ऐसा कोई भी दस्तावेज़ नहीं मिलता जिससे यह साबित हो कि कांग्रेस ने सचमुच हिंसक विद्रोह की योजना बनाई थी। इसमें किसी केन्द्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन में चलने के बजाय अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय जनता ने इसे स्वयं संचालित किया। स्थानीय स्तर पर यकायक जनता के नए-नए जन-नेता पैदा हुए और उन्होंने ब्रितानी हुकूमत की लाठी गोली की परवाह न करते हुए, आंदोलन को आगे बढ़ाया। गांधीजी व कांग्रेस ने 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो यह कितना व्यापक व प्रचंड रूप ले लेगा, इसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जनता का आक्रोश फूट पड़ा। गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद जल्द ही कांग्रेस के सभी बड़े नेता जेल में ड़ाल दिए गए। ऐसे में स्वतः स्फूर्त तरीके से जनता का विराट आंदोलन आगे बढ़ा। वस्तुतः इस आंदोलन की व्यापकता व प्रचंडता का एक कारण यह भी था कि इसकी गति को थामने-रोकने वाला कांग्रेसी नेतृत्व जेल के भीतर था।

अगर सही आकलन करें तो हम कह सकते हैं कि भारत छोडो आन्दोलन को ‘स्वतः स्फूर्त क्रान्ति के रूप में चित्रित करना आंशिक व्याख्या होगी। स्वतः स्फूर्तता का तत्व पहले की तुलना में अधिक था, हालांकि कुछ हद तक लोकप्रिय पहल को नेतृत्व ने ही मंजूरी दी थी, जो निर्देशों की सीमाओं के अधीन थी। 1942 के आंदोलन में सहजता का तत्व पिछले आंदोलनों की तुलना में निश्चित रूप से ज़्यादा था। गांधीवादी जन आंदोलनों का पूरा पैटर्न यह था कि नेतृत्व एक व्यापक कार्य योजना बनाता था और उसके कार्यान्वयन को स्थानीय स्तर पर स्थानीय और जमीनी स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं और जनता की पहल पर छोड़ देता था। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी गांधीजी ने दांडी मार्च और नमक कानून तोड़कर संघर्ष शुरू करने का संकेत दिया था, और स्थानीय स्तर पर नेताओं और लोगों ने तय किया कि वे भू-राजस्व और किराया देना बंद करेंगे, या वन कानूनों के खिलाफ सत्याग्रह करेंगे, या शराब की दुकानों पर धरना देंगे, या कार्यक्रम के किसी अन्य बिंदु का पालन करेंगे। 1942 में, व्यापक कार्यक्रम भी अभी तक स्पष्ट रूप से बताया नहीं गया था क्योंकि नेतृत्व को अभी औपचारिक रूप से आंदोलन शुरू करना था। गांधीजी ने कहा था, मेरी गिरफ़्तारी के बाद हर एक भारतवासी अपना नेता है, ऐसा समझकर अहिंसा का विचार ध्यान में रखकर आन्दोलन ज़ारी रहे। स्वाधीनता की इच्छा एवं प्रयास करने वाला प्रत्येक भारतीय स्वयं अपना मार्गदर्शक बने। प्रत्येक भारतीय आपने आपको स्वाधीन समझे। केवल जेल जाने से काम नहीं चलेगा।

साथ ही, कांग्रेस लंबे समय से वैचारिक, राजनीतिक और सांगठनिक रूप से संघर्ष की तैयारी कर रही थी। गांधीजी ने असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलनों या सत्याग्रह, संगठनात्मक सुधार और सतत प्रचार अभियान के माध्यम से एक गति का निर्माण किया था। देश की आम जनता इस गति को इसकी परिणति तक ले जाना चाह रही थी। गांधीजी ने खुद 1940-41 में व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा अभियान के माध्यम से, और 1942 की शुरुआत से अधिक सीधे तौर पर, लोगों को आने वाली लड़ाई के लिए तैयार किया था, जिसे उन्होंने कहा था कि यह 'छोटा और तेज़' होगा।

राजनीतिक और वैचारिक रूप से भी, मंत्रालयों ने कांग्रेस के समर्थन और प्रतिष्ठा में काफी इज़ाफ़ा किया था। 1942 में सबसे ज़्यादा सक्रियता वाले क्षेत्र ठीक वही थे जहाँ 1937 से काफी लामबंदी और संगठनात्मक काम किया गया था। 1942 में देश के विभिन्न स्थानों पर आंदोलन का संगठनात्मक ढांचा भी दिखता था। किसी भी मामले में संघर्ष की तैयारी को, तुरंत होने वाली संगठनात्मक गतिविधि की मात्रा से नहीं, बल्कि आंदोलन ने लोगों पर कितना वर्चस्व वाला प्रभाव हासिल किया है, उससे मापा जा सकता है।  आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ़ अली, राममनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, छोटूभाई पुराणिक, बीजू पटनायक, आर.पी. गोयनका और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने संभाल ली थी। आम लोगों के साथ-साथ व्यावसायिक वर्ग का भी इन्हें सहयोग मिलता रहा। मलाया और बर्मा में होने वाले घाटे ने भारतीय बनियों और व्यापारियों की हिला दिया था। ऐसा युद्ध जिससे कोई मुनाफ़ा न हो उन्हें सख्त नापसंद था। ऐसा व्यापारी वर्ग ऐसे आन्दोलन को समर्थन देने के लिए तैयार था जो शीघ्र अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल दे।

अंग्रेजों द्वारा इस आंदोलन का क्रूर दमन किया गया। फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय तक विद्रोह छिटपुट रूप में चलता रहा। स्वतःस्फूर्त आन्दोलन में इतना दम नहीं होता कि वह लंबे समय तक चलता रहे। आन्दोलन को लंबे समय तक चलाने के लिए आन्दोलनकारियों का संगठित होना ज़रूरी है। कुछ जगहों पर इसका नेतृत्व सोशलिस्टों ने भी किया। जयप्रकाश नारायण 9 नवम्बर, 1942 को अपने 5 साथियों (रामानंदन मिश्र, सूरज नारायण सिंह, योगेंद्र शुक्ल, गुलाबी सोनार और शालीग्राम सिंह) के साथ हजारीबाग सेण्ट्रल जेल से  फरार हो गए और एक केन्द्रीय संग्राम समिति का गठन किया। इस आन्दोलन के दौरान ही देश में अच्युत पटवर्धन, अरूणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, छोटूभाई पुरानीक, बीजू पटनायक, आर.पी. गोयनका, जयप्रकाश नारायण, उषा मेहता, सुमति मुखर्जी इत्यादि जैसे नेतृत्व उभरे, जिन्होंने प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं के जेल में रहने के बावजूद आन्दोलन को दिशा दी। कई नेताओं ने भूमिगत होकर आन्दोलन को चलाया, तो कई जगह समानांतर सरकार का गठन कर साम्राज्यवादियों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की गयी

उसी प्रकार इस आन्दोलन को गांधीवादी सत्याग्रह आन्दोलनों के चरम बिंदु के रूप में देखना भी आंशिक व्याख्या होगी। असहयोग आन्दोलन या सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तुलना में भारत छोडो आन्दोलन पर विस्तृत अध्ययन बहुत कम उपलब्ध है। फिरभी जो तथ्य उपलब्ध हैं, उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि कांग्रेसी नेतृत्व के लिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कोई निर्णायक मुक्ति संघर्ष नहीं था बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवादियों पर दबाव बनाकर अपनी मांगें हासिल करने का एक उपक्रम था। गांधीजी ने खुद एक व्यापक जनांदोलन की जगह इसे व्यक्तिगत सत्याग्रह की तरह चलाने की अपील की थी। यह आन्दोलन गांधीजी के अन्य आन्दोलनों से भिन्न था। इस आन्दोलन ने भारत के कुछ भागों में किसान आन्दोलन का रूप ले लिया। बिहार और संयुक्त प्रांत में किसान सभा ने आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसानों के भारी विद्रोह ने आन्दोलन को प्रचंड बनाया। कुछ विचारक (कांग्रेस एंड दि राज) तो यहाँ तक मानते हैं कि 1942 का आन्दोलन वंचित उपद्रवी तत्त्वों का आन्दोलन न होकर मूलतः किसानों का विद्रोह था।

गांधीजी का कार्यक्रम, हड़ताल करना, लोगों को स्वतंत्र नागरिक घोषित करना, विधानमंडलों से त्यागपत्र देना, शिक्षण संस्थाओं का त्याग करना, आदि पूरी तरह से वैधानिक था। लेकिन आन्दोलन गांधीजी की योजना के अनुसार नहीं चला। इसमें विध्वंसक कार्रवाइयों का समर्थन किया गया। बड़े नगरों से शुरू होकर आन्दोलन गाँव-गाँव तक फैल गया। जो विध्वंसक कार्रवाई हो रही थी, उसके प्रति लोगों को विश्वास था कि सचमुच कांग्रेस वर्किंग कमिटी की यही योजना थी। बाद में, अनेक भूमिगत गुटों ने वर्किंग कमिटी के नाम से अनेक निर्देश ज़ारी किए जिसके अधिकाँश सदस्य उस समय जेल में थे। तीन महीने तक उषा मेहता की देखरेख में एक गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया गया। मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों ने आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया इस आन्दोलन में श्रमिकों की भी, सीमित ही सही, भूमिका रही। इसका कारण यह था कि गांधीवादी प्रभाव के कारण पूंजी और श्रम के बीच सौहार्द्र पूर्ण संबंध बना हुआ था। ट्रेड यूनियन के नेताओं ने भी इस आन्दोलन को आगे बढाया। गुप्त राष्ट्रवादी गतिविधियों को उच्च वर्ग और उच्च सरकारी अधिकारियों का भी समर्थन प्राप्त था। ऐसे समर्थन के कारण ही आंदोलनकारी पर्याप्त प्रभावकारी अवैध ढांचा स्थापित करने में सफल रहे।

हाँ, यह हम मान सकते हैं कि इस आन्दोलन ने भारतीय स्वतन्त्रता की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान की। भारत छोडो आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत के आक्रोश को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया। इसने अंग्रेजों के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि देश में राष्ट्रीयता की भावना उस सीमा के पार पहुँच चुकी है, जहां पर जनता अपनी स्वतंत्रता के अधिकार के लिए बड़ी से बड़ी तकलीफें उठाने और बलिदान करने के लिए तैयार है। स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के आकाश छूते आवेश को देखकर ब्रिटिश साम्राज्यवादी किस कदर घबरा गए थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा 1857 के विद्रोह के बाद से अब तक का यह सबसे बड़ा विद्रोह था।

यह आंदोलन पूरे देश में फैला। दो वर्षों तक संघर्ष के योद्धाओं ने त्याग, बलिदान व संघर्ष के जज्बे की अद्भुत मिसालें पेश की। भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों को हिलाकर रख दिया। भारत छोड़ो  आन्दोलन को  सही मायने में एक जन-आन्दोलन माना जाता है  जिसमें लाखों आम भारतीयों ने हिस्सा लिया था। हालाँकि आन्दोलन का दमन कर दिया गया, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत को इस बात का एहसास हो गया अब भारत पर शासन करना उनके लिए अत्यंत दुष्कर हो गया है। भारत छोड़ो आन्दोलन अपने मूल लक्ष्य भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति को तात्कालिक रूप से प्राप्त नहीं कर सका, लेकिन इस आन्दोलन ने भारत की जनता में एक ऐसी अपूर्व जागृति उत्पन्न कर दी जिससे ब्रिटेन के लिए भारत पर लम्बे समय तक शासन कर सकना सम्भव नहीं रहा।  बिपन चन्द्र भी मानते हैं, 1942 का आन्दोलन एक अर्थ में भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की समाप्ति का परिचायक है। प्रश्न सिर्फ यह तय करने के समय का रह गया था कि सत्ता का हस्तांतरण किस तरीके से हो और स्वतंत्रता के बाद सरकार का स्वरुप क्या हो? युद्ध के बाद अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में लोकमत इतना अधिक भारत के पक्ष में हो गया कि इंग्लैण्ड को विवश होकर भारत छोड़ना पड़ा। इस प्रकार यह निश्चित तथ्य है कि भारत छोड़ो आन्दोलन ने भारतीय स्वतन्त्रता की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान की।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

421. भारत छोड़ो आन्दोलन-2

राष्ट्रीय आन्दोलन

421. भारत छोड़ो आन्दोलन-2



421. भारत छोड़ो आन्दोलन-1

1942

गिरफ़्तारियों पर प्रतिक्रिया में आंदोलन ने व्यापक रूप धारण कर लिया

9 अगस्त की सुबह कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं की गिरफ़्तारियों की खबर जनता तक पहुँच गई इसने देश में जन-आक्रोश की एक अभूतपूर्व और देशव्यापी लहर उत्पन्न कर दी। देश के सारे कार्यकलाप रुक गए हर शहर और कस्बे में हड़ताल हुई हर जगह प्रदर्शन हुए जुलूस निकले गिरफ्तार नेताओं के रिहाई की मांग की गई बंबई में लाखों लोग ग्वालिया टैंक की मैदान में उमड़ पड़े। 9 अगस्त को अहमदाबाद और पूना में भी यही हुआ। 10 अगस्त को दिल्ली और यूनाइटेड प्रोविंस के कुछ कस्बों में गड़बड़ी हुई। धीरे-धीरे यह आंदोलन फैलने लगा और हड़तालों, विरोध सभाओं और इसी तरह के प्रदर्शनों के अलावा अलग-अलग तरीकों से सामने आने लगा। उत्तेजित होने के बावजूद जनता शांतिपूर्ण थी शीर्ष नेताओं के गिरफ़्तार हो जाने के कारण आंदोलन का नेतृत्व अधिक युवा एवं संघर्षशील लोगों के हाथों में आ गया। अगले छह-सात हफ़्ते में देश भर में प्रदर्शनों और जनसभाओं का सिलसिला चलता रहा। कई लोगों ने ग़ैर-क़ानूनी ढंग से पर्चे लिखकर छपवाए और बांटे। इसमें अँग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ बग़ावत करने और गांवों में जाकर प्रतिकार को संगठित करने की अपील की  गई थी। सारे देश में गांधीजी की जय-जयकार हो रही थी।

भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में एक जनांदोलन था जिसमें लाखों आम हिंदुस्तानी शामिल थे। इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। वे अपने स्कूल-कॉलेज छोड़कर सड़कों पर उतर आए और जेल का रास्ता अपनाया। देश भर के युवा कार्यकर्ता, खासकर बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रांत और बंबई में, हड़तालों और तोड़फ़ोड़ की कार्रवाइयों के रिए आंदोलन चलाते रहे। काशी विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘भारत छोड़ो’ का संदेश फैलाने के लिए गांवों में जाने का फैसला लिया। किसान, मज़दूर और सामान्य जन भी इसमें शरीक़ हुए। बड़ी संख्या में किसान पास के कस्बे में जुटते और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमला बोल देते। आम जनता ने सत्ता के प्रतीकों पर हमला किया, और सार्वजनिक भवनों पर जबरन राष्ट्रीय झंडे फहराए। सरकारी बयानों के अनुसार, गिरफ्तारियों के तुरंत बाद के हफ़्ते में, लगभग 250 रेलवे स्टेशनों को नुकसान पहुंचाया गया या नष्ट कर दिया गया, 500 से ज़्यादा पोस्ट ऑफिसों पर हमला किया गया। 150 से ज़्यादा पुलिस स्टेशनों पर हमला किया गया, इसके अलावा दूसरी सरकारी इमारतों पर भी। सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी के लिए खुद को पेश किया, पुलों को उड़ा दिया गया, रेलवे ट्रैक हटा दिए गए और टेलीग्राफ लाइनें काट दी गईं। इस तरह की गतिविधि पूर्वी संयुक्त प्रांत और बिहार में सबसे तीव्र थी। मजदूर हड़ताल पर चले गए। अहमदाबाद में साढ़े तीन महीने तक मिल बंद रहे। यही हाल जमशेदपुर और पूना में भी रहा। अगस्त के मध्य से आंदोलन का केन्द्र ग्रामीण क्षेत्र हो गया था।  9 अगस्त के बाद पहले छह या सात हफ्तों तक, पूरे देश में जबरदस्त जन-उभार देखने को मिला।

भूमिगत आंदोलन

इस बीच, भूमिगत नेटवर्क मज़बूत हो रहे थे, जिनमें अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ़ अली, राम मनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, छोटूभाई पुराणिक, बीजू पटनायक, आर.पी. गोयनका और बाद में, जेल से भागने के बाद, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रमुख सदस्य उभरने लगे थे। भारत छोड़ो आंदोलन की एक अहम विशेषता थी व्यापक पैमाने पर भूमिगत  आंदोलनों का संचालित होना जैसे-जैसे सरकारी दमन व्यापक और उग्र बनता गया वैसे-वैसे अधिकाधिक कार्यकर्ता भूमिगत होने लगे। परिणामस्वरूप आंदोलन भी भूमिगत होता गया और भूमिगत आन्दोलनकारियों द्वारा विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया गया। इन गतिविधियों में भाग लेने वाले समाजवादी, फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य, गांधी आश्रमवासी, क्रांतिकारी राष्ट्रवादी और बंबई, पूना, सतारा, बड़ौदा और गुजरात, कर्नाटक, केरल, आंध्र, संयुक्त प्रांत, बिहार और दिल्ली के अन्य हिस्सों में स्थानीय संगठन थे। परिवहन व्यवस्था को निशाना बनाया जाने लगा। टेलीफोन के तार काट दिए जाते। रेल पटरियों की फ़िशप्लेट उखाड़ दिए जाते। कुछ के ख़िलाफ़ हिंसा के गंभीर अभियोग लगाए गए थे, कुछ लोगों की गिरफ़्तारी के लिए इनाम घोषित किए गए थे। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोधी गतिविधियों में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। जयप्रकाश नारायण भूमिगत आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिए 9 नवम्बर, 1942 को अपने 5 साथियों (रामानंदन मिश्र, सूरज नारायण सिंह, योगेंद्र शुक्ल, गुलाबी सोनार और शालीग्राम सिंह) के साथ हजारीबाग सेण्ट्रल जेल से  फरार हो गए और एक केन्द्रीय संग्राम समिति का गठन किया। उनकी गिरफ़्तारी के लिए अधिकारियों ने 10,000 रुपए का इनाम घोषित किया था। बिहार एवं नेपाल सीमा पर जयप्रकाश नारायण तथा रामानन्द मिश्रा ने समानान्तर सरकार का भी  गठन किया। भूमिगत आन्दोलनकारियों को समाज के हर वर्ग के  लोगों से गुप्त सहायता मिलती थी। उदाहरणार्थ, सुमति  मुखर्जी जो बाद में भारत की अग्रणी महिला उद्योगपति बनीं, ने  अच्युत पटवर्द्धन को बहुत आर्थिक सहायता दी। भूमिगत आन्दोलनकारियों ने गुप्त कांग्रेस रेडियो का भी संचालन किया। ऐसे ही एक गुप्त रेडियो का संचालन  बंबई में उषा मेहता ने  किया। इसका एक अन्य प्रसारण केन्द्र नासिक में भी था जिसका संचालन बाबू भाई करते  थे। राम मनोहर लोहिया नियमित रूप से इस रेडियो पर प्रसारण करते थे, और यह रेडियो नवंबर 1942 तक चलता रहा जब पुलिस ने इसे ढूंढ निकाला और ज़ब्त कर लिया। बाबू भाई तथा उषा मेहता पकड़े गए तथा उन्हें 4 वर्ष की सजा हुई।

समानान्तर सरकार अथवा प्रति-सरकार का गठन

भारत छोड़ो संग्राम के दौरान कांग्रेस में दो धाराएं स्पष्ट दिख रही थीं। एक वह धारा जो मुख्यतः समाजवादी विचारधारा रखते थे और खुले तौर पर कहते थे कि अहिंसा का काम अब पूरा हो गया है, तथा वे शस्त्रों के निषेध का आग्रह नहीं रखते थे। दूसरी विचारधारा वाले अहिंसा के सिद्धांत में विश्वास तो रखते थे, लेकिन कहते थे कि उनकी कार्य-प्रणाली में संशोधन और विकास की गुंजाइश है। वे इसे नव सत्याग्रह या नव गांधीवाद कहते थे। उनकी कार्य-प्रणाली में व्यापक तोड़-फोड़ और समानान्तर सरकार के गठन का समावेश था। फलस्वरूप अनेक जगहों पर अंग्रेज़ी शासन समाप्त कर समानांतर शासन स्थापित कर दी गई। सबसे पहले अगस्त 1942 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में चित्तू पांडे के नेतृत्व में प्रथम समानांतर सरकार की घोषणा की गई अपने को गांधीवादी कहने वाले चित्तू पांडे ने कलेक्टर के सारे अधिकार छीन लिए और सभी गिरफ़्तार कांग्रेसी नेताओं को रिहा कर दिया। लेकिन इनका प्रभाव ज़्यादा दिनों तक क़ायम नहीं रह सका। एक सप्ताह के बाद सेना आई और स्थिति फिर पहले जैसी हो गई। बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक नामक स्थान पर 17 दिसम्बर, 1942 को जातीय सरकार का गठन किया गया, जो 1944 तक चलती रही। जातीय सरकार ने चक्रवात राहत कार्य किया, स्कूलों को अनुदान स्वीकृत किया, अमीरों से गरीबों को धान की आपूर्ति की, विद्युत वाहिनी का आयोजन किया। स्थापित स्वशासित समानान्तर सरकारों में सर्वाधिक लम्बे समय तक चलने वाली सरकार सतारा की थी। यहाँ की सरकार 1943 में गठित की गई और 1945 तक चली जिसके नेता वाई बी चाह्वाण तथा नाना पाटिल थे। इस सरकार द्वारा ग्रामीण पुस्तकालयों और न्यायदान मंडलों का आयोजन किया गया, शराबबंदी अभियान चलाए गए और 'गांधी विवाह' आयोजित किए गए। ब्रिटिश सरकार का नाम-निशान कुछ समय के लिए उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, आंध्र, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र के अनेक भागों से समाप्त हो गया। बिहार के तिरहुत प्रखंड में कोई सरकार ही नहीं थी। सचिवालय गोली कांड के बाद पटना दो दिन तक बेकाबू रहा। उत्तर और मध्य बिहार के अधिकांश स्थानों पर जनता का राज स्थापित हो चुका था।

1942 के अंत तक, 60,000 से ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था। छब्बीस हज़ार लोगों को दोषी ठहराया गया और 18,000 लोगों को डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के तहत हिरासत में लिया गया। मार्शल लॉ घोषित नहीं किया गया था, लेकिन सेना अक्सर सीधे अधिकारियों से पूछे बिना अपनी मनमर्जी करती थी। दमन उतना ही गंभीर था जितना मार्शल लॉ के तहत हो सकता था।

सत्य की हत्या

जैसे ही आगाखां महल में गांधीजी के पीछे जेल के दरवाज़े बंद हुए, देश में हिंसा के दरवाज़े खुल गए। चर्चिल ने हाउस ऑफ कामंस में कहा कि कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधीजी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर इतने दिनों से ज़ोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रांतिकारी आंदोलन का रास्ता अपना लिया है। देश और विदेशों में यह धुआँधार प्रचार किया जाने लगा कि यह सारी तोड-फोड, हिंसा और आगजनी कांग्रेसी नेताओं द्वारा तैयार किए हुए षड्यंत्र का ही परिणाम है। गांधीजी ने आगाखां-महल से वायसराय को पर लिखकर शिकायत की कि तोड-फोड की घटनाओं के बारे में सरकारी वक्तव्य सत्य की हत्या ही है। यदि मुझे गिरफ्तार न कर लिया जाता तो सरकार से समझौता करने की  कोई कोशिश बाकी नहीं छोडता। आंदोलन में हिंसा को प्रोत्साहन देने और किसी षड्यंत्र में उनका या उनके सहयोगियों का हाथ होने के आरोप को उन्होंने बिलकुल ही गलत बताया और नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारी के द्वारा संकट को गहरा करने के लिए उलटे सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। गांधीजी अभी महासमिति को अपनी पूरी योजना समझा भी नहीं पाए थे कि सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। यदि वह गिरफ्तार न कर लिए जाते तो आंदोलन का रूप कुछ दूसरा ही होता—उसमें सरकार को युद्धकाल में परेशान न करनेवाली बात ही अधिक होती। यदि आंदोलन हिंसात्मक हो ही जाता तो वह उसे रोकने में अपनी पूरी शक्ति, यहाँ तक कि प्राणों की बाजी भी, लगा देते। उत्तेजित जन-समुदाय को बस में करने का रामबाण उपाय—उपवास तो उनके हाथ में था ही। गांधीजी की गिरफ्तारी से अंग्रेजों को उन्हें जेल में रखने की संतुष्टि के अलावा कुछ नहीं मिला, जिसमें सिरदर्द भी शामिल था। गांधीजी की आज़ादी से कई भारतीयों को शांति मिलती। उनकी गिरफ्तारी ने उन्हें और भड़का दिया। गांधीजी के साथ अन्य कांग्रेसी नेताओं के गिरफ्तार होते ही जनता की ओर से तोड-फोड, आगजनी और विध्वंस एवं सरकार की ओर से क्रूर दमन और लोमहर्षक आतंक का जो दौर चला, उसमें सत्याग्रह के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई थी। इन गिरफ्तारियों से यह आम धारणा और गहरी हो गई कि इंग्लैंड भारत में सत्ता छोड़ने का इरादा नहीं रखता। इसलिए विद्रोह हुआ।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान टोटेनहम के ‘कांग्रेस रिस्पॉन्सिबिलिटी फॉर द डिस्टर्बेंस’ (फरवरी 1943) जैसे दस्तावेजों में अंग्रेजों ने बार-बार कांग्रेस की नीति में बदलाव का कारण गुप्त धुरी-समर्थक सहानुभूति को बताया। पूरे विद्रोह को एक साजिश के रूप में चित्रित करना निस्संदेह एक बड़े लोकप्रिय विद्रोह के क्रूर दमन के लिए दुनिया भर में फासीवाद विरोधी राय जीतने का सबसे अच्छा तरीका था। ज़बरदस्त प्रयासों के बावजूद, अंग्रेज यह साबित करने में विफल रहे कि 9 अगस्त से पहले कांग्रेस ने वास्तव में हिंसक विद्रोह की योजना बनाई थी। उदाहरण के लिए, 29 जुलाई 1942 का आंध्र PCC का गोपनीय सर्कुलर, जिसका उल्लेख टोटेनहम रिपोर्ट में किया गया था, ने कांग्रेसियों से केवल 'तैयार रहने, तुरंत संगठित होने, सतर्क रहने, लेकिन महात्माजी के फैसला करने तक किसी भी तरह से कार्रवाई न करने' का आग्रह किया था।

जेल में उपवास

10फरवरी 1943 को गांधीजी ने जेल में उपवास शुरू किया। उन्होंने ऐलान किया कि यह उपवास इक्कीस दिनों तक चलेगा। यह उस सरकार को उनका जवाब था जो लगातार उनसे भारत छोड़ो आंदोलन में लोगों की हिंसा की निंदा करने के लिए कह रही थी। गांधीजी ने न सिर्फ लोगों द्वारा हिंसा का सहारा लेने की निंदा करने से इनकार कर दिया, बल्कि साफ तौर पर इसके लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यह राज्य की 'शेर जैसी हिंसा' थी जिसने लोगों को उकसाया था। और यह राज्य की इसी हिंसा के खिलाफ था, जिसमें हजारों कांग्रेसियों की बिना वजह गिरफ्तारी भी शामिल थी।

उपवास की खबर पर लोगों का रिएक्शन तुरंत और ज़बरदस्त था। पूरे देश में हड़तालें, प्रदर्शन और स्ट्राइक हुईं। जेलों में बंद कैदी और बाहर के लोग भी सहानुभूति में उपवास पर बैठ गए। लोगों के ग्रुप चुपके से पूना पहुँचे ताकि आगा खान पैलेस के बाहर सत्याग्रह कर सकें। पब्लिक मीटिंग्स में उनकी रिहाई की मांग की गई। 19-20 फरवरी को दिल्ली में एक नेताओं की कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें जाने-माने लोग, राजनेता और जानी-मानी हस्तियां शामिल हुईं। उन सभी ने गांधीजी की रिहाई की मांग की। वायसराय की एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल के तीन भारतीय सदस्यों, एम.एस. आने, एन.आर. सरकार और एच.पी. मोदी ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन वायसराय और उनके अधिकारी टस से मस नहीं हुए। विंस्टन चर्चिल ने अपनी कैबिनेट से कहा था कि 'दुनिया में हर जगह हमारी जीत का यह समय उस बेचारे बूढ़े आदमी के सामने झुकने का नहीं है जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा है।’ जब एक परेशान देश उनकी जान बचाने की अपील कर रहा था, तब सरकार उनके अंतिम संस्कार की व्यवस्था को अंतिम रूप देने में लगी हुई थी। सेना के जवानों को किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहने को कहा गया था। उनकी राख ले जाने के लिए एक विमान और सार्वजनिक अंतिम संस्कार के लिए 'उदार' व्यवस्था की गई थी और दफ्तरों में आधे दिन की छुट्टी भी रखी गई थी। लेकिन गांधीजी ने हमेशा की तरह अपने विरोधियों को मात दी, और मरने से इनकार कर दिया।

अंगेज़ों की बर्बरता पूर्वक दमन की नीति

गिरफ्तार होने के कई दिन पहले गांधीजी लिनलिथगो से बात करना चाहते थे। वायसराय ने जवाब दिया, 'यह एक उच्च नीति का मामला है और इस पर इसके गुणों के आधार पर विचार करना होगा' 1942 चर्चिल के लिए ऑफिस में भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन से निपटने का पहला मौका था। ब्रिटिश सरकार ने चर्चा के बजाय दमन को प्राथमिकता दी। अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति काफ़ी बर्बरता पूर्वक दमन की नीति अपनाते हुए सख्त रवैया अपनाया और अमानवीय दमन के द्वारा पूरी शक्ति से वार किया तथा इसे कुचलने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। निहत्थी जनता पर आंसू गैस, लाठी चार्ज आदि का इस्तेमाल किया। गिरफ़्तारियां की और आंदोलन के सभी नेताओं को जेल में डाल दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार सालभर के अन्दर लगभग एक लाख लोगों को जेल में डाल दिया गया था। प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाई गई।

ग्रामीणों पर सामूहिक ज़ुर्माना ठोंका गया। निब्लेट 'आधिकारिक उन्माद के दौर' की बात करते हैं, जिसमें 'बदला लेना आम बात थी', और सामूहिक जुर्माना एक तरह की 'आधिकारिक डकैती' थी। गांव के गांव अंगेज़ों द्वारा जला दिया गया। लोग गांव खाली कर भागने लगे। आर.एच. निबलेट, आज़मगढ़ (पूर्वी यू.पी.) के जिला मजिस्ट्रेट ने अपनी आकर्षक डायरी में 'बिल्कुल अनावश्यक ... टेरर ब्लैंच' (सफेद आतंक) के कई उदाहरण दर्ज किए हैं, जिसमें अंग्रेजों ने 'कई मील तक गाँवों में आग लगाने' के लिए 'आग लगाने वाली पुलिस' को तैनात किया था। आन्दोलन को दबाने के लिए सेना की सहायता ली गई। कई जगह हवाई जहाज से मशीनगनों द्वारा गोलियां चलाई गई और बम बरसाए गए। पटना में प्रदर्शनकारियों पर मशीनगन से गोलियां बरसाई गई। बंगाल में वायुयान का प्रयोग किया गया। पुलिस और सेना की गोलियों से 10 हज़ार से अधिक लोगों को मार दिया गया था। सरकार ने प्रेस पर भी हमला बोला। बहुत से अख़बार या तो बंद कर दिए गए या बंद रहे। ‘नेशनल हेराल्ड’ और ‘हरिजन’ तो पूरे आंदोलन के दौरान निकल ही नहीं सके। देश एक पुलिस राज्य में बदल गया। पुलिस द्वारा सैकड़ों बलात्कार के रिपोर्ट आए। एक कांग्रेस सूत्र ने तमलुक उप-मंडल में बलात्कार के 74 मामलों की सूची दी, जिसमें 9 जनवरी 1943 को एक ही गाँव में 46 मामले शामिल थे। सार्वजनिक रूप से कोड़े लगाना आम बात थी। गुदा में डंडा डालने जैसी यंत्रणा भी दी जाती थी। सही मायनों में अंग्रेज़ों ने आतंक का राज्य स्थापित कर दिया था।

भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध

ऐसे समय में जब लाखों लोगों ने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहूति देने की कसम खाई थी, देश में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें ‘भारत छोड़ो’ की मांग पसन्द नहीं थी। अधिकांश देशी रियासतें इससे अलग रहीं। लीग और साम्यवादियों ने इस आंदोलन में भाग नहीं लिया। 1941 में रूस पर नाज़ी आक्रमण होने के बाद से साम्यवादियों ने इस युद्ध को जनता का युद्ध कहना शुरू कर दिया था। ब्रिटिश सरकार ने उन पर पाबंदी हटा ली और उनका अंग्रेज़ों से समझौता हो गया था। साम्यवादियों ने भारत छोड़ो आन्दोलन को विफल करने के लिए अपनी सारी शक्ति का उपयोग किया। राजगोपालाचारी ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और कांग्रेस कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने पाकिस्तान की मांग पर लीग से बातचीत करने पर बल दिया। बाद के दिनों में वे राजनीतिक गतिरोध को सुलझाने के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मेल कराने की कोशिश करने लगे। उन्हें लगता था कि अगर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मेल हो जाए और दोनों एक ही मंच पर आ जाएं, तो स्वाधीनता की लड़ाई आसानी से जीती जा सकती है। उनकी मान्यता थी कि यदि मुस्लिम बहुमत वाले प्रान्तों के लिए मुस्लिम लीग के मांगे हुए आत्म-निर्णय के अधिकार को कांग्रेस स्वीकार कर ले, तो लीग भारतीय स्वाधीनता की मांग में कांग्रेस के साथ हो जाएगी। फिर ब्रिटिश सत्ता के लिए दोनों की सम्मिलित मांग को अस्वीकार करना संभव नहीं होगा।

मुस्लिम लीग द्वारा आंदोलन का विरोध  

राजाजी की दोनों धारणाएं ग़लत थीं। जिन्ना उस समय तक कांग्रेस के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं था। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन का घोर विरोध किया। उन्हें आज़ादी क्यों नापसंद थी, यह रोचक विषय है। अंग्रेज़ शासक तो चाहते ही थे कि संप्रदायिक प्रश्न की आड़ में भारतवासियों को स्वराज की मांग को ठुकराती रहे। जिन्ना की स्थिति मज़बूत होने लगी। बंगाल में हक़ से इस्तीफ़ा ले लिया गया। उनकी जगह जिन्ना के भरोसेमंद लीग के ख्वाजा नज़ीमुद्दीन को प्रधानमन्त्री बनाया गया। अन्य जगहों पर भी कांग्रेस के सत्ता से हटने और बगावत से खाली हुई जगह को झपटने के जिन्ना तैयार था। जिन्ना देश भर में घूम-घूम कर मुस्लिम राष्ट्रवाद का प्रचार करने लगा।

जो 'भारत छोडो' को निराशा, पराजय और जापानियों के स्वागत-सत्कार की नीति कहते थे, उन्होंने गांधीजी के विचारों को सही रूप में समझने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। देश त्रिकोण में फंसा था, कांग्रेस (राष्ट्रीयता), मुस्लिम लीग (सांप्रदायिकता) और ब्रिटिश शासन (साम्राज्यवाद)। एक आर्थिक त्रिकोण भी देश में विद्यमान था, एक वर्ग अंग्रेज़ और उसके समर्थक ज़मिन्दार और सामंतवादियों का, दूसरा वर्ग मध्यम वर्ग के लोगों का था, जो अंग्रेज़ों से तो छुटकारा चाहता था, लेकिन ग़रीबों का शोषण करके अपना भरण-पोषण करता था, और तीसरा वर्ग था करोड़ों ग़रीब, मज़बूर और बेसहाय लोगों का, जो दो सौ वर्षों से अंग्रेज़ी हुक़ूमत की शोषण की चक्की में पिस रहा था। इस वर्ग का भारत छोडो आन्दोलन को भरपूर समर्थन मिला।

भारत छोड़ो आंदोलन का महत्त्व

भारत छोड़ो आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन में लोगों की भागीदारी और राष्ट्रीय उद्देश्य के प्रति सहानुभूति के मामले में एक नई ऊंचाई हासिल की। हालाकि सरकार की बर्बर नीति ने इस आंदोलन को कुचल दिया, फिरभी इस आन्दोलन का भारतीय राष्ट्रीय संघर्ष के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान  है। इस आंदोलन ने युवाओं, कृषकों, महिलाओं व मजदूर वर्ग  को भी बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। कॉलेजों और यहाँ तक कि स्कूलों के छात्र सबसे ज़्यादा दिखाई देने वाले तत्व थे। महिलाओं, खासकर कॉलेज और स्कूल की लड़कियों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मज़दूर भी प्रमुख थे, और उन्होंने लंबी हड़तालें करके और सड़कों पर पुलिस के दमन का सामना करके काफी बलिदान दिया। गांधीजी के प्रभाव ने 'मज़दूरों और पूंजीपतियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों में योगदान दिया था - 'मिल मालिकों को अपने मज़दूरों की गैरमौजूदगी से कोई आपत्ति नहीं थी'। ब्रिटिश सरकार के अपने ही अधिकारियों की वफादारी में कमी आना भारत छोड़ो आंदोलन के सबसे खास पहलुओं में से एक था। जेल अधिकारी पिछले सालों की तुलना में कैदियों के प्रति ज़्यादा दयालु थे, और अक्सर खुले तौर पर अपनी सहानुभूति व्यक्त करते थे।

भारत छोड़ो आन्दोलन की एक प्रमुख विशेषता थी देश के कुछ हिस्सों में समानांतर सरकारों की स्थापना। यह दिलचस्प है कि 'राष्ट्रीय सरकारें' तामलुक, तालचेर या सतारा जैसे इलाकों में सबसे ज़्यादा समय तक टिकी रहीं, जहाँ स्थानीय परिस्थितियों ने विद्रोहियों को कुछ ज़्यादा ठोस और कट्टर सामाजिक-आर्थिक नीतियाँ अपनाने पर मजबूर किया। भले ही इस आंदोलन में मुस्लिम लीग ने हिस्सा नहीं लिया, लेकिन कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। भले ही इस आंदोलन को ज़्यादातर मुस्लिम जनता से ज़्यादा समर्थन न मिला हो, लेकिन इसने उनमें दुश्मनी भी पैदा नहीं की। मुस्लिम लीग के समर्थकों ने भी मुखबिर का काम नहीं किया। यह आन्दोलन कांग्रेस के अन्य पूर्ववर्ती आंदोलनों के विपरीत कुछ हद तक हिंसक था इसका शायद सबसे बड़ा कारण यह रहा होगा कि आंदोलन की घोषणा होते ही कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और आंदोलन की बागडोर आम जनता के हाथों में आ गई और उन्होंने अपने-अपने ढंग से इसकी  विवेचना की इस आंदोलन के 3  स्पष्ट चरण देखे जा सकते हैं पहले चरण में यह आंदोलन मुख्यत: शहरों तक सीमित रहा दूसरे चरण में आंदोलन का केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तृत हुआ  तीसरे चरण में भूमिगत गतिविधियों एवं क्रांतिकारी घटनाओं  का वर्चस्व रहा 1942 में गुप्त राष्ट्रवादी गतिविधियों को ऊपरी वर्ग और यहाँ तक कि भारतीय उच्च अधिकारियों के काफी गुप्त समर्थन के बारे में भी कहानियाँ प्रचलित हैं। ऐसे समर्थन ने कार्यकर्ताओं को एक काफी प्रभावी गैर-कानूनी तंत्र स्थापित करने में सक्षम बनाया, जिसमें बंबई में उषा मेहता के तहत तीन महीने के लिए एक गुप्त रेडियो स्टेशन भी शामिल था।

इस जनांदोलन ने देश के हर वर्ग को प्रभावित किया कृषकों की इसमें अहम भूमिका थी। जयप्रकाश नारायण ने लिखा था, बयालीस में लड़ाई ने जनक्रांति का रूप ले लिया। अंग्रेजी राज्य का किला, जो अब तक इतना सुदृढ़ और दुर्भेद्य दीख रहा था, अकस्मात् टूटने लगा। कहीं दीवार टूटी तो कहीं कंगूरा, कहीं कुछ पाए तो कहीं मेहराब। जनता ने समझ लिया कि यह बालू की भीतों का बना हुआ किला है और उसने सिख लिया उन भीतों को ढाह देने का एक नया तरीका। इस आन्दोलन में हिंसा के बावजूद राष्ट्रीय भावना प्रमुख बनी रही, इसने सामाजिक क्रान्ति का रूप नहीं लिया।

इस आन्दोलन में युवा वर्ग की सक्रिय भागीदारी बहुत ही प्रशंसनीय थी। अरुणा आसफ़ अली और सुचेता कृपलानी ने भूमिगत रूप से संगठन का काम किया। कांग्रेस रेडियो चलाने काम उषा मेहता करती थीं।  किसानों ने भी इस आंदोलन में बेहद सक्रियता दिखाई। बहुत से ज़मींदारों ने भी भारत छोड़ो की लड़ाई में हिस्सा लिया। दरभंगा के राजा तो ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ खुल कर सामने आए। इस आंदोलन की खास बात यह थी कि निजी संपत्ति पर हमला नहीं किया गया निबलेट आज़मगढ़ के बारे में याद करते हैं। जिले में 'निजी संपत्ति पर सिर्फ एक हमला हुआ' और वह भी एक गैर-मौजूद अंग्रेज ज़मींदार की संपत्ति पर, जबकि दूसरी जगहों पर 'बीज के गोदामों को भी नहीं लूटा गया'। कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक रुख के बावजूद, स्थानीय और गाँव के लेवल पर सैकड़ों कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया। हालाँकि वे अपने नेताओं की मज़बूत फासीवाद-विरोधी भावनाओं से सहमत थे, फिर भी उन्हें आंदोलन का ज़बरदस्त खिंचाव महसूस हुआ और, कम से कम कुछ दिनों या हफ़्तों के लिए, वे बाकी भारतीय लोगों के साथ इसमें शामिल हो गए।

1942 के आखिर तक, ब्रिटिश लोग भारतीय राष्ट्रवाद के साथ अपने सीधे टकराव में निश्चित रूप से विजयी हो गए थे, और युद्ध के बाकी ढाई साल देश के अंदर से बिना किसी गंभीर राजनीतिक चुनौती के बीत गए। भारत छोडो आन्दोलन सफल नहीं हुआ क्योंकि बिना नेतृत्व वाली असंगठित और निहत्थी जनता साम्राज्यवादी सरकार की बड़ी शक्ति से जीत नहीं सकती थी। विफल होकर भी इस आंदोलन ने जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला। इस आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत के आक्रोश और स्वतंत्र होने के संकल्प को प्रभावशाली और सुनिश्चित ढंग से व्यक्त किया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसके द्वारा आज़ादी की मांग राष्ट्रीय आंदोलन की पहली मांग बन गई। अब कोई बातचीत ‘भारत छोड़ो’ से कम की नहीं हो सकती थी। ब्रिटिश हुक़ूमत के विरुद्ध आंदोलन अब एक जनक्रांति का रूप ले रहा था। ब्रिटिश भी अब समझने लगे थे कि भारतीयों को दबा कर अधिक दिनों तक नहीं रखा जा सकता और भारत में उनके साम्राज्यवादी शासन के सिर्फ गिने-चुने दिन रह गए हैं।

उपसंहार

भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 'भारत छोड़ो', 'क्विट इंडिया' इस सरल लेकिन शक्तिशाली नारे ने वह महान संघर्ष शुरू किया जो 'अगस्त क्रांति' के नाम से भी मशहूर हुआ। 9 अगस्त 1942 को शुरू हुआ यह आंदोलन भारतीय इतिहास के सबसे बड़े जनान्दोलनों में से एक है। इस संघर्ष में देश के आम लोगों ने बेमिसाल वीरता और जुझारूपन दिखाया। यह आन्दोलन ब्रिटिश-विरोधी जुझारूपन की दृष्टि से कांग्रेस के नेतृत्व वाले सभी पिछले आन्दोलन को पीछे छोड़ गया था। इस आन्दोलन में ब्रिटिश-विरोधी भावना इतनी प्रबल थी कि इसने आंतरिक वर्गीय तनावों और सामाजिक जुझारूपन को भी कम कर दिया था। इस आन्दोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि निजी संपत्ति पर आक्रमण नहीं किया गया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को यह अहसास दिला दिया कि भारतीय जनता अब किसी भी स्थिति में ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के अधीन रहने को तैयार नहीं है। अंग्रेजों को अहसास हो गया कि बलपूर्वक भारत में राज करने के ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के दिन लद गए हैं। उन्होंने मान लिया कि भारत से जल्द रुखसत होने में ही उनकी भलाई है। वहीं दूसरी ओर इस आंदोलन की व्यापकता, तेवर व आवेग ने उन सीमाओं व बंदिशों को भी तोड़ डाला जिसके भीतर कांग्रेस नेतृत्व आंदोलन को कैद रखना चाहता था। थानों को घेरने के पीछे भीड़ का यह विश्वास काम कर रहा था की ‘अब स्वराज आ गया है। लगभग सभी स्थानों पर मुसलमान इस आन्दोलन से अलग-थलग रहे। कम से कम यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि वे आन्दोलन के प्रति वैर-भाव रखने या ब्रिटिश समर्थक होने की अपेक्षा तटस्थ ही रहे थे। इस बात को और अधिक बल इस बात से मिलता है कि आन्दोलन के दौरान कोई बड़ी सांप्रदायिक वारदात नहीं हुई। रजवाड़ों में आन्दोलन तीव्र नहीं हुआ। इस आन्दोलन में आदिवासियों की पर्याप्त भागीदारी रही।

एक ओर तो जहां इस आन्दोलन में भारतीय जन समुदाय बहुत ही वीरता और आक्रामक प्रवृत्ति से शामिल हुई, वहीँ दूसरी ओर अंग्रेज़ों ने इसका दमन भी बहुत ही पाशविक प्रवृत्ति से किया। भारतीयों को जिस दमन का सामना करना पड़ा, वह राष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ इस्तेमाल किया गया अब तक का सबसे क्रूर दमन था। युद्ध की आड़ में सरकार ने अपने आपको कठोरतम क़ानूनों  से लैस कर लिया था। यहां तक कि शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके कारण सरकार के प्रति वफादारी में काफी गिरावट आई। इससे ह भी पता चलता है कि राष्ट्रवाद कितना गहरा हो चुका था। आंदोलन ने इस सच्चाई को स्थापित किया कि भारतीयों की इच्छा के बिना भारत पर शासन करना अब संभव नहीं था। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन के तत्काल एजेंडे पर रखा। भारत छोड़ो के बाद कोई वापसी नहीं हो सकती थी।

अभी जारी है ...

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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