महात्मा
गांधी हत्या केस-43
30 जनवरी,
1948
... और 30 जनवरी को जब वह काल की घड़ी
आई
30 जनवरी, 1948 को सरदार वल्लभभाई पटेल महात्मा गांधी से मिलने वाले अंतिम व्यक्ति थे। पटेल
के साथ बातचीत के दौरान गांधीजी चर्खा चलाते रहे और आभा का परोसा शाम का खाना, जिसमें तीन संतरे, 14 औंस बकरी का दूध और 14 औंस सब्जियों का सूप शामिल
था, खाते रहे। यह गंभीर चर्चा शाम
करीब 4:00 बजे शुरू हुई थी और तय समय से काफी लंबी खिंच गई। आभा को मालूम था कि गांधीजी
को प्रार्थना सभा में देरी से पहुँचना बिल्कुल पसंद नहीं। वह परेशान हुईं, पटेल हालांकि भारत के लौह पुरुष थे, उनकी भी हिम्मत नहीं हुई कि वह
गांधीजी को याद दिला सकें कि उन्हें देर हो रही है। इसका उन्होंने दूसरा उपाय
निकाला। उन्होंने गांधीजी की जेब घड़ी उठाई और धीरे से हिला कर गांधीजी को याद
दिलाने की कोशिश की कि उन्हें देर हो रही है। परन्तु इससे भी कुछ न हुआ। अंततः
सरदार की पुत्री मनीबेन ने हस्तक्षेप किया कि प्रार्थना सभा के लिए देर हो रही है।
गांधीजी की दो किशोर पोतियाँ (पोते की बेटियाँ), मनु और आभा, कमरे में आईं। गांधीजी ने अपनी कमर पर डोरी से लटकी
बड़ी घड़ी देखी और पटेल से कहा, “अब मैं प्रार्थना के लिए भागूं।” मनु ने गांधीजी को सूचना दी कि
काठियावाड़ से दो कार्यकर्ता मिलने आए हैं। गांधीजी ने कहा, “उनसे
कहो कि अगर मैं ज़िन्दा रहा तो प्रार्थना के बाद मेरे साथ चलते हुए बातें कर सकते हैं।”
अचानक, भीड़ में हलचल मच गई, और हर कोई महात्मा
गांधी के लिए एक मार्ग बनाने के लिए खड़ा हो गया, जो अपने हाथों से दो
लड़कियों के कंधों पर आराम करते हुए धीरे-धीरे ऊपर आते हुए दिखाई दे रहे थे, जो उनके बगल में चल
रही थीं। गांधीजी अपनी दोनों पौत्रियों मनु और आभा के कंधों का सहारा लेकर प्रार्थना सभा की
ओर बढ़ रहे थे। शाम 5 बजकर 17 मिनट का समय था। एक तरफ मनु थीं और दूसरी तरफ
गांधीजी का सहारा बनी हुई थी आभा। वहां बैठी भीड़ गांधीजी का अभिवादन करने के लिए
उठ खड़ी हुई। थोड़ा-थोड़ा खिसककर लोगों ने उनके जाने का रास्ता भी बना दिया। हाथ
जोड़कर लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हुए गांधीजी धीरे-धीरे सभा स्थल की ओर बढ़
रहे थे। वे तेज़ी से लॉन पार करके पाँच कम ऊँची, अर्ध-वृत्ताकार सीढ़ियाँ चढ़े, जो लॉन के ऊँचे हिस्से की ओर जाती थीं, जहाँ लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे। उस दिन
प्रार्थना सभा में काफी भीड़ थी; लगभग पाँच सौ लोग रहे होंगे। करकरे और आप्टे धक्का देते
हुए आगे आए और नाथूराम के दोनों तरफ खड़े हो
गए, लेकिन अगर नाथूराम ने उन्हें देखा भी, तो उसने पहचानने का कोई संकेत नहीं दिया।
तभी अचानक दाहिनी ओर से भीड़ को चीर कर एक
व्यक्ति धक्का-मुक्की करता हुआ वहां आ गया। उसने हरे रंग के पुलओवर के ऊपर खाकी
जैकेट पहने थे। गांधीजी के आगे चल रही दो लड़कियों को देखकर उसे चिढ़ हुई थी।
उसने हाथ जोड़े और कहा, “नमस्ते, बापू।” नाथूराम ने अपनी जेब में रखी बेरेटा
पिस्तौल का सेफ्टी कैच हटाया और उनकी ओर बढ़ गया। वह गांधीजी की ओर झुका। उसके
हावभाव से ऐसा लगा मानो वह उनके चरण छूना चाहता हो। आभा ने चिढ़ कर कहा कि उन्हें
पहले ही देर हो चुकी है। उनके रास्ते में व्यवधान न उत्पन्न किया जाए। मनु ने उसके
हाथ को पीछे की ओर करते हुए उसे हटने को कहा। उस व्यक्ति ने मनु को ज़ोर से धकेल
दिया। मनु के हाथ से नोटबुक, थूकदान और माला गिर गई। ज्योंही मनु
इन बिखरी हुई चीज़ों को उठाने के लिए झुकी तो उसे उस व्यक्ति का चेहरा याद आ गया।
उसे उसने दोपहर में देखा था। वह व्यक्ति गांधीजी के सामने प्रणाम की मुद्रा में
हाथ जोड़ते हुए खड़ा हो गया और अपनी सात कारतूसों वाली 9 एम.एम. बरेटा पिस्तौल से एक
के बाद एक, तीन गोलियां उनके सीने में उतार दीं। तीसरी गोली चलाने
के बाद उसने दोबारा से हाथ जोड़े।
उसने वार काफी
नज़दीक से किया था। पहली गोली पेट में दायीं तरफ़ नाभि के ढ़ाई इंच ऊपर और मध्य रेखा
की दाहिनी ओर साढ़े तीन इंच पर लगी। दूसरी गोली मध्यरेखा से एक इंच दायीं ओर सातवीं
पसली के नीचे लगी और तीसरी गोली स्तनाग्र से एक इंच ऊपर और मध्य रेखा से चार इंच
दूर वक्ष की बायीं ओर लगी। पहली और दूसरी गोलियां पीठ को पार करके बाहर निकल गई।
तीसरी दाहिने फेफड़े में फंसी पाई गई। पहली गोली लगने पर गांधीजी का जो पैर उठ रहा
था वह नीचे हो गया। दूसरी और तीसरी गोलियां जब चलीं तब तक गांधीजी पैरों पर ही खड़े
थे। इसके बाद वे ज़मीन पर लुढ़क गए।
उनकी सफेद ऊनी शॉल
पर खून के धब्बे फैलने लगे थे, तभी उनके मुंह से
आखिरी शब्द निकले: "हे राम! हे राम!"
गिरते समय भी उनके
हाथ जुड़े हुए थे।
लोगों का अभिवादन
स्वीकार करने हेतु उठे उनके हाथ धीरे-धीरे झुक गए। आभा ने गिरते हुए गांधीजी के
सिर को अपने हाथों का
सहारा दिया। उनकी दुबली काया ज़मीन पर टिक गई। भारतवर्ष के भाग्य का स्वर्णिम
नक्षत्र सदा के लिए अस्त हो गया।
ख़ून से भीगी उनकी धोती में मनु को गांधीजी
की इंगरसोल घड़ी दिखाई दी। उस समय उस घड़ी में 5 बज कर 17 मिनट हुए थे। उनके शरीर से जान पूरी तरह
निकली नहीं थी। उनका शरीर गर्म था और उनकी आंखें आधी मुंदी हुई थीं। उसकी हिम्मत
नहीं हुई कि वो गांधीजी को मृत घोषित कर दें, लेकिन अंदर ही अंदर वो महसूस कर पा रही थीं
कि गांधीजी अब इस दुनिया में नहीं है।
***
बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसा मदनलाल ने कहा था, 'फिर आएगा!' वे फिर आ गए थे, और इस बार उन्होंने हमला कर दिया।
पुलिस को कम से कम नौ दिन पहले ही बता दिया गया था कि इस साजिश के मुख्य नेताओं
में से एक, पुणे या बॉम्बे के किसी मराठी
अखबार का संपादक है, जिस अखबार का नाम मदनलाल ने 'हिंदू राष्ट्र' बताया था। अब उसी आदमी ने गांधीजी की हत्या कर दी थी।
***
ठीक एक दिन पहले ही 29 जनवरी को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था, “यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने
उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।” और यह कैसा संयोग था कि उस महात्मा को
मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।
***
गोडसे ने बच निकलने का कोई प्रयास नहीं किया।
दो लड़कियों को गांधीजी के सामने पा कर नाथूराम गोडसे थोड़ा परेशान हुआ था। फ़ायर
करने के बाद उसने कस कर पिस्टल को पकड़े हुए अपने हाथ को ऊपर उठाए रखा और ‘पुलिस....
पुलिस’ चिल्लाने लगा। वह चाहता था कि कोई यह देखे कि यह योजना बना कर और जान बूझ
कर किया गया काम था। उसने आवेश में आकर ऐसा नहीं किया था। वह यह भी नहीं चाहता था
कि कोई कहे कि उसने घटना स्थल से भागने या पिस्टल फेंकने की कोशिश की थी। लेकिन
यकायक सब चीज़ें जैसे रुक सी गईं, और कम से कम एक मिनट तक कोई इंसान उसके पास तक नहीं
फटका। उसे एहसास हुआ कि वे उसके पास आने से डर रहे थे जबकि उसके हाथ में अभी भी धुआँ
निकलती हुई पिस्तौल थी और उसे उम्मीद थी कि उन्हें किसी तरह एहसास हो जाएगा कि वह
गिरफ्तारी का विरोध नहीं करेगा।
***
30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाक़े में सफ़ाई कर्मी अपनी मांगों के
समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे। इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए
थे। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को बिड़ला भवन के माली रघुनाथ नायक ने
पकड़ा। नाथूराम ने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया। रघु नायक बिड़ला हाउस में माली
का काम कर रहे थे। गांधीजी पर गोली चलने के बाद वहाँ भाग दौड मच गई थी। इसी दौरान
रघुनाथ नायक ने गोडसे को पकड़ लिया। उनके हाथ में एक हंसिया था। उससे उन्होंने
नाथूराम के सिर पर वार किया था। गोडसे के ख़िलाफ़ चले मामले में रघुनाथ नायक
प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे। शुरू में रघुनाथ कोलकाता में बिड़ला परिवार में काम करते
थे। बाद में उनका तबादला दिल्ली कर दिया गया और उन्हें बिड़ला हाउस में तैनात किया
गया। गांधीजी जब भी दिल्ली आते, बिड़ला हाउस में ठहरते थे। माली होने के नाते रघुनाथ
गांधीजी को पहचानने लगे थे और जब तक गांधीजी वहां ठहरते उन्हें बकरी का दूध रघुनाथ
ही पहुंचाते थे। गांधीजी की हत्या के बाद रघुनाथ अवसाद से भर गए। उन्होंने नौकरी
छोड़ दी और ओडिशा वापस लौट गए। लेकिन वे इस हत्या के प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे, लिहाज़ा उन्हें कई बार दिल्ली में स्पेशल
कोर्ट में गवाही देने के लिए जाना पड़ा था।
***
गांधीजी की प्रार्थना सभा में नियमित रूप
से भाग लेने वाली पानीपत के एक व्यापारी गुरबचन सिंह, जो गांधीजी के भक्त थे और जो गांधीजी के
गिरते समय उनसे केवल कुछ ही कदम पीछे थे, गांधीजी के लिए रास्ता बना रहे थे। बाद में उन्होंने
कहा कि गांधीजी के अंतिम शब्द थे, 'हे राम!' उन्होंने जब देखा कि एक व्यक्ति गांधीजी के ऊपर गोली
चला रहा है, तो उन्होंने उसके हाथ पर ज़ोर से मारा।
बिड़ला भवन की सुरक्षा दल का इंचार्ज सब
इंस्पेक्टर अमरनाथ, वाकए के वक़्त गांधीजी के पीछे खड़ा था। जब पहली गोली चली, तो वह
हत्यारे की तरफ़ लपका। उसने जब तक उसकी गर्दन और कंधों को पकड़ा तब तक दो और गोलियां
चल चुकी थीं। तभी दौड़ कर रॉयल इंडियन एयरफ़ोर्स का सार्जेंट देवराज सिंह ने एक
हाथ से गोडसे की कलाई पीछे मोड़ते हुए दूसरे हाथ से उसके मुँह पर घूँसों की बरसात
कर दी। सार्जंट देवराज ने झटके से उसके हाथ से रिवाल्वर को झटका देकर गिरा दिया।
पिस्तौल में अभी भी चार बुलेट थे। पकड़े जाने के कुछ मिनटों बाद किसी ने छड़ी से
नाथूराम के सिर पर वार किया था, जिससे उसके सिर से ख़ून बहने लगा था। चारों ओर भीड़ जमा
हो गई, लोग गालियाँ देने लगे और उसे मारने लगे।
एक उत्तेजित व्यक्ति ने पिस्तौल को नाथूराम
के सामने करते हुए कहा कि मैं इसी पिस्तैल से तुम्हें मार डालूंगा। नाथूराम ने
जवाब दिया, ‘बहुत खुशी से, लेकिन ऐसा नहीं प्रतीत होता कि पिस्तौल को संभालने का
ज्ञान तुम्हें है। उसका सेफ़्टीकैच खुला है। ज़रा-सा धक्का लग जाने से तुम्हारे
हाथों दूसरा कोई मर जाएगा।’ बात वहां खड़े पुलिस अधिकारी की समझ में आ गई। उसने
तुरंत पिस्तौल अपने हाथ में लेकर उसका सेफ़्टीकैच बंद कर उसे अपनी जेब में रख लिया।
बाद में गोडसे को पार्लियामेंट स्ट्रीट के
डीएसपी जसवंत सिंह और तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौदा सिंह ने पकड़ा। बिड़ला
हाउस में भगदड़ मची हुई थी। वहां मौजूद उस पुलिस अधिकारी ने उसे बचाया और भीड़ के गुस्से
से दूर ले गया। जब पुलिस नाथूराम को भीड़ के एक हिस्से द्वारा पीट-पीटकर मार डाले जाने
से बचाने के लिए इमारत के एक तरफ ले जा रही थी, तब कई डरे हुए लोग बाहर निकलने के रास्तों की
ओर भाग रहे थे। उसे गिरफ्तार करके तुगलक रोड पुलिस स्टेशन ले जाया गया। गांधीजी के
हत्यारे नाथूराम को एक अंधेरे, बिना लाइट के एक कमरे में बंद किया गया था। उसके माथे
से ख़ून निकल रहा था और उसके चेहरे का बायां हिस्सा ख़ून से भरा हुआ था। हिंदुस्तान
टाइम्स अख़बार का एक संवाददाता उस कमरे में घुसा तो हत्यारा गोडसे अपनी जगह से उठ
गया। जब उसने उससे पूछा कि तुम्हें इस बारे में कुछ कहना है, तो उसका जवाब था, ‘मैंने जो कुछ भी किया है उसका मुझे कतई
दुख नहीं है।’ बाहर निकलते हुए उसने पुलिस वाले से पूछा कि नाथूराम के पास पिस्तौल
के अलावा क्या मिला तो उसका जवाब था, 400 रुपये।
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कनाट प्लेस के एम-56 में रहने वाले नन्दलाल मेहता ने गांधीजी को उठाया और
उनके सिर को आभाबेन की गोद में रखा। दो मिनट के अंदर ही उनके प्राणपखेरू उखड़ गए। किसी
को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। लोग चिल्ला रहे थे और रो रहे थे। अचानक पूरा बगीचा लोगों से भर गया; लोग इधर-उधर भाग रहे थे। लेकिन इतने सारे लोगों के बीच कोई डॉक्टर
नहीं था, और न ही घावों से बहते खून को रोकने की
कोई कोशिश की गई। वैसे भी, कोई डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाता; उनकी तो तुरंत ही मौत हो गई थी। अब बस उन्हें बिड़ला हाउस ले जाना बाकी था, जहाँ बत्तियाँ जलने लगी थीं। वे उन्हें बहुत धीरे-धीरे ले गए। गोली
चलने से लेकर उन्हें उनके कमरे के फर्श पर लिटाए जाने तक लगभग दस मिनट बीत चुके
थे। बाद में पता चला कि उनकी चप्पलें और चश्मा
गायब हो गए थे।
***
गांधीजी को बिड़ला हाउस के अंदर ले जाया गया।
तब जबकि पूरे देश ने गांधीजी की असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया, पुलिस ने अब तक के सबसे नृशंस अपराध की जांच
शुरू की। गोडसे को तुगलक रोड थाने में ले जाया गया। वहां पर गांधीजी की हत्या का
एफआईआर लिखा गया। डीएसपी सरदार जसवंत सिंह ने गांधीजी की हत्या का एफआईआर नंदलाल
मेहता से पूछ कर लिखा। उन्होंने एफ़.आई.आर. के क़ाग़ज़ात पर दस्तख़त किए थे।
इसके बाद हुई दहशत में आप्टे और करकरे बिड़ला हाउस से भाग गए। बिड़ला भवन के बगल
की गेट से आप्टे और करकरे भागे थे और सीधे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे।
प्लेटफॉर्म उन्होंने रात गुज़ारी। उन्होंने देखा कि पुलिस आई और प्रतीक्षालय से
नाथूराम का सामान ले गई।
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कहीं से अभी-अभी
लौटकर आए प्यारेलाल से गांधीजी के एक सहायक बी.पी. चंदवानी ने कहा, “फौरन डॉक्टर को फोन कीजिए। बापू गोली से मार दिए गए हैं!” लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की एक स्नातिका जो सुशीला की
सहेली भी थी, गांधीजी के सिर को अपनी गोद में ले लिया था। गांधीजी की आंखें आधी बन्द
थीं।
थोड़ी ही देर में चारों
तरफ अफरा तफरी मच गई। गांधीजी के निश्चल, शिथिल शरीर को लोग अन्दर ले आए थे। धीरे
से उन्हें उसी गद्दी पर लिटा दिया गया, जिस पर बैठकर वे काम करते थे। उनके मुंह
में एक चम्मच शहद और गरम पानी डाला गया, पर वह भीतर नहीं उतरा।
गांधीजी के
प्राण-पखेरू उड़ चुके थे!
अगले दिन आई
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया:
"मौत... शॉक
और अंदरूनी रक्तस्राव (internal
haemorrhage) के कारण हुई, जो पिस्तौल से चलाई गई गोलियों के लगने से... हुई थी।"
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
