महात्मा
गांधी हत्या केस-22
13 जनवरी, 1948
आमरण
अनशन
मंगलवार 13 जनवरी, 1948 को दिन के ग्यारह बजकर पचपन मिनट पर गांधी जी ने अपने जीवन का अठारहवां
और अंतिम उपवास शुरु किया। इसने भारत के लोगों के मन
पर अच्छाई की एक अमिट छाप छोड़ी। उपवास शुरू करने से पहले, उन्होंने अपनी रोज़मर्रा
की दिनचर्या पूरी की, कुछ ज़रूरी कागज़ात देखे और कुछ लोगों से मुलाक़ात भी की। सुबह के
समय नेहरू, पटेल और मौलाना आज़ाद समेत कई लोग उनसे मिलने आए। उनके बीच लंबी
बातचीत हुई। इसके बाद उनका बिस्तर बगीचे में लगा दिया गया, जहाँ उन्होंने अपना आखिरी
खाना खाया—जिसमें कुछ रोटियाँ, दूध, चकोतरे (grapefruit) के तीन
टुकड़े और एक सेब शामिल था।
इसके बाद बौद्ध, मुस्लिम और पारसी
प्रार्थनाएँ हुईं, उनका पसंदीदा भजन 'वैष्णव जन' गाया गया, फिर डॉ. सुशीला नय्यर ने
"व्हेन आई सर्वे द वंडरस क्रॉस" (When I Survey the Wondrous Cross) गाया, और आखिर में कुरान, सिखों की पवित्र किताब और
हिंदू धर्मग्रंथों से धार्मिक पाठ किए गए। उसके बाद रामधुन हुई। माहौल गमगीन था।
बीच-बीच में गांधीजी मौत के बारे में ऐसी बातें करते थे जिनसे उदासी और बढ़ जाती
थी। उन्होंने खुद की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से की जो लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और
धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रहा हो। इसके संबंध में उन्होंने अपनी अंग्रेज शिष्या
मीरा बहन को लिखा था : “मेरा सब से बड़ा उपवास है।
परिणाम क्या होगा, यह मालूम नहीं है।”
गांधीजी के सचिव प्यारेलाल लिखते हैं, “उपवास शुरू करने के
साथ ही, गांधीजी उथल-पुथल से निकलकर शांति की स्थिति में आ गए। सितंबर में 'मृतकों के शहर' (City of the Dead) में लौटने के बाद से उन्हें करीब से देखने वालों का कहना था कि उपवास
शुरू होने के ठीक बाद वे जितने खुशमिजाज और बेफिक्र दिखे, उतने पहले कभी नहीं
दिखे थे।” उनका यह अंतिम उपवास अंशतः
पटेल के दृष्टिकोण के विरुद्ध भी था। गांधीजी दो माँगो को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे
थे। पहली माँग थी कि पाकिस्तान को भारत द्वारा 55 करोड़ रुपए दिए जाएं और
दिल्ली में मुसलमानों पर होने वाले हमले रुकें। गृहमंत्री पटेल जनसंख्या के पूर्ण
स्थानांतरण की बात सोचने लगे थे। वे उस समझौते को भी मानने से इंकार कर रहे थे,
जिसके अनुसार विभाजन-पूर्व सरकार की संपत्ति में से भारत 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने के लिए
वचनबद्ध था। हिंदुओं और मुसलमानों का आपस में लड़ना गांधीजी के बर्दाश्त से बाहर
था। उनके अनुसार अगर लड़ाई खत्म हो जाती, तो भारत और उसका सम्मान बच जाता, वरना नहीं।
उसी दिन पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब के गुजरात रेलवे स्टेशन पर
फ्रंटियर एक्सप्रेस से उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत से आने वाले हिन्दू और सिक्ख
शरणार्थियों की लूट, स्त्री-अपहरण और वीभत्स हत्या की गई। दिल्ली पाकिस्तान से आए शरणार्थियों
से भरी हुई थी। उनके साथ पाकिस्तान में हिंदुओं पर हुए ज़ुल्म की भयानक कहानियां
भी आ रहीं थीं। यहाँ मुसलमानों पर हमले हो रहे थे, वे अपने इलाक़ों को छोड़ने पर मजबूर थे। मस्जिदों को तोड़ा और
मंदिरों में बदला जा रहा था। महरौली के ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन के मज़ार पर हिन्दुओं
का क़ब्ज़ा हो गया था। गांधीजी की मांग थी कि शरणार्थी हिंदू और सिख, मुस्लिम घरों और पूजा स्थलों से निकलें। ये पाकिस्तान से अपना सब
कुछ खो कर आए थे और यहाँ उनसे जनवरी की कड़ाके की ठंड को झेलने को कहा जा रहा था।
गांधीजी पाकिस्तान जाना चाहते थे और
वहां मुसलमानों को वही कहना चाहते थे जो यहाँ हिन्दुओं को कह रहे थे। आख़िर
नोआखाली के हमलावर मुसलमानों की नफ़रत झेलकर भी उन्होंने उन्हें हिंसा के रास्ते
से अलग कर लिया था, लेकिन अगर यहाँ भारत में मुसलमानों पर
हमले होते रहे तो वे किस मुंह से पाकिस्तान जाएंगे। उन्होंने कहा, "मुझे बेबसी महसूस हुई। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी बेबसी को
बर्दाश्त नहीं किया।"
आमरण अनशन के सवाल पर इस बार न पंडित
नेहरू ने और न ही पटेल ने गांधीजी को समझाने की कोशिश की। पटेल ने कहला भेजा कि
गांधीजी जो भी कहेंगे, वे वही करेंगे। गांधीजी ने सलाह दी कि सबसे पहले नकद रकम से
संबंधित पाकिस्तान के हिस्से का सवाल निबटाया जाना चाहिए।
कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख़
अब्दुल्ला और उप-प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद दिल्ली आए थे। उन्होंने भी
दूसरों की तरह गांधीजी से अपना उपवास खत्म करने का अनुरोध किया, "सिर्फ़ कश्मीर की खातिर ही सही। कश्मीर को अब आपकी पहले से कहीं
ज़्यादा ज़रूरत है।" उन्होंने कहा कि जब तक गांधीजी उनकी बात नहीं मानेंगे, वे कश्मीर वापस नहीं लौटेंगे। गांधीजी ने कहा, “यह उपवास कश्मीर के लिए भी है।” मौलाना आज़ाद ने शेख़ अब्दुल्ला से कहा,
“आप कितना
भी सिर दीवार पर पटक लीजिए एक बार जो प्रण उन्होंने ठान लिया है, उससे पीछे नहीं
हटेंगे। उनसे और बहस करने का मतलब है उनकी तकलीफ़ को और बढ़ाना। हमारे लिए बस यही
एक रास्ता है कि हम सोचें कि उनकी शर्तें कैसे पूरी की जाएं, क्योंकि सिर्फ़ ऐसा करने से ही वे अपना उपवास तोड़ेंगे।”
गांधीजी के इस उपवास का पाकिस्तान पर कुल मिलाकर बहुत ही अच्छा
प्रभाव पडा। पिछले दस वर्षों से लीग और उसके अखबार बराबर यही प्रचार करते चले आ
रहे थे कि गांधी इस्लाम का दुश्मन है। इस उपवास से उस सारे प्रचार का भंडाफोड हो गया।
भारत को भी उनके इस उपवास ने झकझोर दिया। जिस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने अपने
प्राणों की बाज़ी लगा दी थी उसपर नए सिरे से सोचने के लिए लोग बाध्य हुए। हमेशा
की तरह, वे शाम की प्रार्थना सभा में शामिल हुए और लोगों से कहा कि उनके पैदल
चलकर प्रार्थना स्थल तक आने में कोई खास बात नहीं है। खाना खाने के बाद शुरुआती
चौबीस घंटों में उपवास से किसी की सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ता। प्रार्थना सभा में गांधीजी ने ऐलान किया, “जब मानवीय प्रयासों
के तहत मैंने अपने सभी संसाधनों का उपयोग कर लिया... तब मैंने अपना सिर ईश्वर की
गोद में रख दिया... ईश्वर ने ही मुझे यह उपवास करने की प्रेरणा दी... हमारी
एकमात्र प्रार्थना यही होनी चाहिए कि उपवास के दौरान ईश्वर मुझे आत्मिक शक्ति
प्रदान करें, ताकि जीने की इच्छा मुझे जल्दबाजी में या समय से पहले उपवास तोड़ने
के लिए प्रेरित न कर सके। यह उपवास 'सभी की अंतरात्मा' को जगाने के लिए है—भारतीय संघ के हिंदुओं और मुसलमानों के लिए, और पाकिस्तान के मुसलमानों के लिए भी। अगर इनमें से कोई भी एक समूह
या सभी समूह पूरी तरह से इस पर अमल करते हैं, तो मुझे यकीन है कि चमत्कार हो जाएगा। उदाहरण के लिए, अगर पंजाब के सिख एक होकर मेरी अपील का जवाब देते हैं, तो मैं पूरी तरह संतुष्ट हो जाऊंगा। जब सेना और पुलिस की आवश्यकता नहीं रहेगी और दिल्ली में शांति हो
जाएगी तब मैं उपवास तोड़ूंगा। अन्यथा अपना आमरण अनशन मैं तब तक जारी रखूंगा जब तक
दंगा ग्रसित दिल्ली में अल्प संख्यकों पर हो रहे अत्याचार
और नरसंहार बंद नहीं होता।”
उन्हें पता था कि उनकी मौत हो सकती है, 'लेकिन मेरे लिए मौत एक
शानदार मुक्ति होगी, बजाय इसके कि मैं भारत, हिंदू धर्म, सिख धर्म और इस्लाम के विनाश का बेबस गवाह बनूँ।' उन्होंने कहा कि उनके दोस्तों को उन्हें रोकने की कोशिश में बिड़ला
हाउस नहीं भागना चाहिए। और न ही उन्हें परेशान होना चाहिए। 'मैं ईश्वर के हाथों में हूँ।' उनकी चिंता करने के बजाय
उन्हें 'अपनी कमियों को खुद में खोजना चाहिए; असल में यह हम सभी के लिए
परीक्षा का समय है।'
मंच पर उन्हें एक लिखित सवाल मिला जिसमें पूछा गया था कि इस उपवास के
लिए कौन ज़िम्मेदार है। उन्होंने जवाब दिया, 'कोई नहीं, लेकिन अगर हिंदू और सिख दिल्ली से मुसलमानों को निकालने पर अड़े रहे, तो वे भारत और अपने धर्मों के साथ धोखा करेंगे; और इससे मुझे दुख होता है।' उन्होंने कहा कि कुछ लोगों
ने मुसलमानों के लिए उपवास करने को लेकर उन पर ताने भी कसे। वे सही थे। 'पूरी ज़िंदगी मैं अल्पसंख्यकों और ज़रूरतमंदों के साथ खड़ा रहा हूँ, और हर किसी को ऐसा ही करना चाहिए...' उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि दिलों
की पूरी तरह से सफ़ाई होगी।" इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि पाकिस्तान में
मुसलमान क्या कर रहे थे। हिंदुओं और सिखों को टैगोर का पसंदीदा गाना याद रखना
चाहिए: "अगर तुम्हारी पुकार का कोई जवाब न दे, तो अकेले चलो, अकेले चलो।"
हत्या की साज़िश
दो साल पहले, गोडसे ने अपनी ज़िंदगी पर दो इंश्योरेंस पॉलिसी ली थीं -
एक 3,000 रुपये की और दूसरी 2,000 रुपये की। 13 जनवरी की सुबह उसने
इंश्योरेंस कंपनी को लिखा कि उसने दोनों पॉलिसी के लिए अपने नॉमिनी (लाभार्थी) तय
कर लिए हैं। पहली थीं सिंधु, जो उसके भाई गोपाल की पत्नी थी; और दूसरी चंपा, जो नारायण आप्टे की पत्नी थी। आप्टे ने उस
पर साक्षी के नाते हस्ताक्षर किया। यह तो समझ में आता है कि आप्टे का नाम नॉमिनी
के तौर पर नहीं दिया गया था; लेकिन यह भी साफ़ था कि नाथूराम जानता था कि आप्टे और उसे
जिन खतरों का सामना करना था, उसमें गोपाल भी शामिल होगा। गोपाल गोडसे सत्ताईस साल का था।
उससे ज़्यादा शांत, कम बोलने वाले और सादगी पसंद इंसान—यानी एक
शांत गृहस्थ की परिभाषा पर पूरी तरह खरे उतरने वाले व्यक्ति—की कल्पना करना
मुश्किल था। बेशक, हिंदू धर्म के प्रति अपने भाई के ज़बरदस्त
जोश का उस पर असर था, लेकिन अब तक उसने कभी खुद को इसमें शामिल
महसूस नहीं किया था। उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी की समस्याओं, परिवार की परवरिश, नौकरी और दोस्तों व पड़ोसियों की अच्छी राय
की ज़्यादा चिंता रहती थी। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद, वह मिलिट्री ऑर्डनेंस सर्विस में सिविलियन
क्लर्क के तौर पर भर्ती हुआ था। जब युद्ध शुरू हुआ, तो उसने विदेश में सेवा के लिए स्वेच्छा से नाम दिया और
1941 में उसे ब्रिटिश टुकड़ी के साथ ईरान और इराक भेजा गया। वह अगले तीन साल तक उनके
साथ रहा और अप्रैल 1944 में भारत लौटा। तब से वह पूना से चार मील दूर किर्की में
ऑर्डनेंस डिपो के विशाल परिसर में असिस्टेंट स्टोरकीपर के तौर पर तैनात था। उसका
सर्विस रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग़ था और उसे जल्द ही प्रमोशन मिलने की उम्मीद थी। उसकी
शादी हो चुकी थी और उसकी दो बेटियाँ थीं—एक दो साल की और दूसरी चार महीने की।
उसने किर्की बाज़ार के पीछे कुछ कमरे किराए
पर लिए थे, जहाँ वह अपनी पत्नी के साथ रहता था, लेकिन उसकी पत्नी कुछ दिनों के लिए पूना में
अपने माता-पिता के घर चली गई थी और बच्चों को भी साथ ले गई थी। गोपाल हमेशा से
नाथूराम के बहुत करीब था और इसलिए उसे उन योजनाओं का अच्छा-खासा अंदाज़ा था जो
नाथूराम और उसका साथी लगातार बना रहे थे, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि वह खुद भी उनमें शामिल
होगा। बड्गे, जो हिंदू राष्ट्र कार्यालय में अक्सर
आता-जाता रहता था और आप्टे और नाथूराम के साथ उसका लेन-देन भी था, वह गोपाल से कभी नहीं मिला था। गोपाल को
उनके भरोसे में लेने की एक वजह यह थी कि उसके पास एक रिवॉल्वर थी। यह एक सर्विस
रिवॉल्वर थी जो उसे ब्रिटिश फ़ोर्स में रहते हुए मिली थी, और जिसे वह भारत वापस लाने में कामयाब रहा था। सर्विस
रिवॉल्वर 'प्रतिबंधित' बोर की होती है और इसे आम नागरिक खरीद या बेच नहीं सकते।
साथ ही, गोपाल की सामाजिक स्थिति और आय ऐसी नहीं थी
कि उसे गैर-प्रतिबंधित बोर वाली पिस्तौल या रिवॉल्वर का लाइसेंस भी मिल पाता। घर
लौटने पर उसने इसे अपने गाँव वाले घर के आँगन में गाड़ दिया था। रिवॉल्वर का इस
तरह वापस लाना शायद उसके दोहरे व्यक्तित्व का संकेत हो सकता है, क्योंकि जैसे ही गोपाल ने सुना कि उसका भाई
और आप्टे क्या करने की योजना बना रहे हैं, वह मानो खून का प्यासा आतंकवादी बन गया। ऐसा लगा मानो
उसका सीधा-सादापन एक मुखौटा था, और उसकी पूरी ज़िंदगी बस ऐसे ही मौके का इंतज़ार करने
में गुज़री थी जब वह अपनी असली हिंसक प्रकृति दिखा सके। उसने साफ़ कह दिया कि वह
अपनी रिवॉल्वर तब तक नहीं देगा जब तक उसे खुद उसका इस्तेमाल करने की इजाज़त न मिले, और नाथूराम की कोई भी कोशिश उसके इरादे को
नहीं बदल सकती थी। वह साज़िश का हिस्सा बन गया और वादा किया कि हत्या के काम के
लिए वह सही समय पर अपनी रिवॉल्वर दिल्ली ले आएगा; नाथूराम ने उसे खर्च के लिए 250 रुपये दिए। गोपाल के
दोहरे व्यक्तित्व की एक दिलचस्प बात यह थी कि हत्या जैसा काम करने के लिए भी वह
अपने ऑफ़िस से छुट्टी लिए बिना नहीं जा सकता था। चौदह तारीख की सुबह, उसने 'गाँव में खेती-बाड़ी के कुछ ज़रूरी कामों' को निपटाने के लिए पंद्रह तारीख से सात दिन
की छुट्टी के लिए अर्ज़ी दी। और जब उनके कमांडिंग ऑफ़िसर ने उनकी अर्ज़ी ठुकरा दी, तो गोपाल ने 17 तारीख़ से छुट्टी के लिए एक
और अर्ज़ी दी। जब उनकी अर्ज़ी मंज़ूर हो गई, तभी वे अपने मिशन पर आगे बढ़े। इसलिए गोपाल पर एक
रिवॉल्वर का इंतज़ाम करने के लिए भरोसा किया जा सकता था।
हत्यारे गैंग की तैयारियां शुरू हो चुकी
थीं। इस योजना के क्रियान्वयन के लिए पूर्वविवेक, टीम वर्क और गतिविधियों और व्यवस्थाओं के मेल-मिलाप की आवश्यकता
थी जो एक जटिल कार्य था। गोडसे ने जो पहला काम किया, वह था अपनी संपत्ति की लिस्ट बनाना और उसे सौंपना। वह
स्वयं अविवाहित था और अपने पीछे वह क्या और किसे सौंप कर जाएगा इसकी उसे कोई चिंता
नहीं थी। दो व्यक्ति जो उसके सबसे निकट थे, और जिनके लिए उसे सबसे अधिक चिंता थी, वे उसके भाई गोपाल, और दोस्त और सहयोगी, आप्टे थे। इन दोनों की पत्नियों के नाम से
उसने अपनी वीमा की पालिसी में परिवर्तन कर उनके पक्ष में नामांकन कर दिया था।
आप्टे-गोडसे ने यह तय किया कि वे अपने साथ वे ग्रेनेड और विस्फोटक ले
जाएंगे जो मदनलाल को बडगे की दुकान पर दिखाए गए थे और जिनके बारे में कहा गया था
कि वह उनका इस्तेमाल कर सकता है। आप्टे ने बडगे को बुलवाया। यह 13 जनवरी की शाम की
बात है। बडगे, जो कुछ ही घंटे पहले ही कहीं से लौटा था, आप्टे से मिलने गया। आप्टे
ने उससे कहा कि वह वे सभी ग्रेनेड और विस्फोटक खरीदना चाहता है जो उसने मदनलाल को
दिखाए थे, लेकिन वह उनकी डिलीवरी और पेमेंट बॉम्बे में करेगा। हो सकता है कि
आप्टे कम से कम बॉम्बे तक हथियारों से भरा बैग लेकर पकड़े जाने का कोई भी जोखिम
नहीं उठाना चाहता हो। एक और वजह यह भी हो सकती है कि उसके पास सामान के लिए पैसे
नहीं थे और उसे यकीन था कि वह बॉम्बे में पैसे का इंतज़ाम कर लेगा। बडगे को इसमें
कोई आपत्ति नहीं थी, बशर्ते आप्टे उसके और उसके नौकर के यात्रा का खर्च उठाए। वे अगली शाम
बॉम्बे में हिंदू महासभा के दफ़्तर में मिलने पर सहमत हुए। डेक्कन एक्सप्रेस दोपहर
3.30 बजे पूना रेलवे स्टेशन से निकलती थी और चार घंटे बाद बॉम्बे के विक्टोरिया
टर्मिनस पहुँचती थी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
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