शनिवार, 8 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-7

                     महात्मा गांधी हत्या केस-7



क्या विभाजन के कारण गांधीजी की त्या हुई?

भारत के विभाजन के बीज औपनिवेशिक काल की 'फूट डालो और राज करो' की नीति, 1905 के धार्मिक आधार पर बंगाल विभाजन, 1909 के पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates) और बाद में उभरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) के राजनीतिक घटनाक्रम में तलाशे जा सकते हैं। ब्रिटिश राज द्वारा 19वीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू की गई जनगणना ने पारंपरिक और मिली-जुली भारतीय पहचानो को सख्त धार्मिक खानों में बांट दिया। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच राजनीतिक और सामाजिक दूरियां बढ़ाने की सोची-समझी नीति अपनाई। वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुधार का ढोंग कर बंगाल को भाषाई और धार्मिक आधार पर विभाजित किया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवादी एकता को तोड़ना था। मार्ले-मिंटो सुधारों के तहत अलग मतदाता सूची बनाई गई, जिसने धर्म को राजनीतिक पहचान का मुख्य आधार बना दिया। साम्प्रदायिक राजनीति को संस्थागत रूप देने के लिए ढाका में इसकी नींव रखी गई। मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा यह प्रचारित किया गया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं जो एक साथ नहीं रह सकते। डायरेक्ट एक्शन डे और उसके बाद हुए भीषण दंगों ने राजनीतिक वार्ताओं के सारे रास्ते बंद कर दिए और अंततः विभाजन अपरिहार्य हो गया।

गांधीजी के विरोध के बावजूद विभाजन को स्वीकार कर लिया गया पंजाब में बड़े पैमाने पर दंगे तो अगस्त के पहले से ही चल रहे थे, और अगस्त 1947 तक 5,000 लोग मारे गए थे। अप्रैल से जून तक घटनाएं इतनी तेज़ी से घटित हो रही थीं कि देश के नेता सांप्रदायिक विस्फोट के नतीज़ों का आकलन करने में असमर्थ थे। उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि नक्शे पर लकीर खींचने का यह फैसला करोड़ों लोगों के जीवन को इतने भीषण रक्तपात और विस्थापन में झोंक देगा। ब्रिटिश योजना और लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा प्रक्रिया को बहुत जल्दबाजी में पूरा किया गया, जिससे किसी को तैयारी का समय नहीं मिला। नेताओं को लगा कि कुछ तनाव होगा, लेकिन उन्होंने मानव इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन और नरसंहार की कल्पना नहीं की थी। सरकारें और सुरक्षा तंत्र रातों-रात पैदा हुई शरणार्थी समस्या और सीमा पार की हिंसा को संभालने के लिए तैयार नहीं थीं। तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व ने गृह युद्ध को टालने के लिए एक छोटे संघर्ष (बंटवारे) को बेहतर मान लिया था।

यह झूठी आशा ही साबित हुई कि एक बार अंग्रेज़ चले जाएंगे तो भारतीय अपने मतभेद सुलझा लेंगे। सांप्रदायिकता को तो एक ऐसे ज़िद्दी नेता ने हवा दी थी, जो किसी भी क़ीमत पर अपना अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध था। उन दिनों गांधीजी कहा करते थे, यदि लोगों ने विभाजन स्वीकार नहीं किया, तो पाकिस्तान ज़्यादा दिनों तक टिक नहीं सकता। कुछ लोगों ने तो यह तक आशा लगा रखी थी कि विभाजन शांतिपूर्ण होगा। उन्हें ऐसा लगता था कि जब पाकिस्तान की मांग मंज़ूर कर ली जाएगी, तो फिर लड़ने के लिए क्या रह जाएगा? कुछ लोग कहते थे कि यह जो नासूर है, यदि विभाजन के रूप में उसका ऑपरेशन हो जाता है तो सारा साम्प्रदायिक उन्माद का पागलपन हवा हो जाएगा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद सीमा के दोनों ओर से जो नरसंहार शुरू हुआ वह सर्वनाशी युद्ध के सामने कुछ भी नहीं था। कभी-कभी तो पूरी की पूरी रेलगाड़ी लाशों से भरी आती थी। एक अनुमान के अनुसार 1,80,000 लोग मारे गए थे। इनमें से 60,000 लोग पश्चिम के थे और 1,20,000 लोग पूर्व के थे। मार्च 1948 तक 60 लाख मुसलमान और 45 लाख हिंदू शरणार्थी बन चुके थे।

हमने ऊपर देखा है कि सन् 1934 से गांधीजी की त्या के प्रयास किए जा रहे थे अत: विभाजन को गांधीजी की हत्या का कारण मानने का दवा सही नहीं ठहरता गांधीजी ख़ुद को सनातनी हिन्दू कहा करते थे। गांधीजी हिन्दू थे परन्तु वे सब धमों को मानते थे। वे मानते थे कि सभी धमों का मूतत्त्व मानवता है गांधीजी सहिष्णु हिन्दू थे। गांधीजी मुस्लिमों का तुष्टिकरण नहीं करते थे, ल्कि सलाम, क्रिश्चियन दि सभी धमों का आदर करते थे। वे सर्व-धर्म समभावी थे। गांधीजी का विश्वास था कि समन्वय, शान्ति, परस्पर विश्वास, एक-दूसरे के प्रति आदर की भावना से म एक राष्ट्र होकर रह सकेंगे। गांधीजी कहा करते थे धर्म के आधार पर द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त स्वीकार करने पर धार्मिंक दंगों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। गांधीजी मेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते रहे

गांधीजी ने एक लीगी नेता से कहा था, मैं अपने प्राण देकर भी इसका सामना करना चाहता हूं। मैं मुसलमानों को भारत की सड़कों पर रेंगने नहीं दूंगा। वे आत्मसम्मान के साथ चलेंगे। नेहरू की अंतरिम सरकार इस बढ़ते हुए साम्प्रदायिक नरसंहार को असहाय होकर देखती रही। बिहार और नोआखाली के बिगड़ते हालात देखकर गांधीजी की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। गांधीजी ने कहा भी था, इतने दिनों से दिल्ली में रहकर मैंने ‘कुछ भी उपयोगी सिद्ध नहीं’ किया। मुझे मानसिक वेदना हो रही है। देश में भाई-भाई का ख़ून करने वाली छाया सर्वत्र छायी है।

जुलाई के अंतिम सप्ताह में विभाजन परिषद ने पंजाब के विभाजन क्षेत्रों में पचास हज़ार अफसरों और सैनिकों की एक सीमा सेना तैनात कर दी। इसके बावजूद देश के अन्य भागों में सांप्रदायिक आग की लपटें थम नहीं रही थी। गांधीजी को लगा, ऐसी परिस्थिति में मेरा सच्चा स्थान राजधानी में नहीं है। मुझे लोगों के साथ रहना चाहिए। कश्मीर से लौटते हुए वे दिल्ली न जाकर लाहौर पहुंचे। 3 अगस्त को श्रीनगर से वह जम्मू गए फिर रावलपिंडी। वहाँ के शरणार्थी कैम्पों में आश्रितों का हालचाल लिया। रावलपिंडी और उसके आसपास के क्षेत्रों के क़रीब 9,000 शरणार्थियों ने वहां शरण ले रखी थी। उनकी अवस्था बहुत ही भयानक थी। वहां के शरणार्थी चाहते थे कि गांधीजी उनके साथ कम से कम 15 अगस्त तक रहें, लेकिन ज़रूरी व्यस्तताओं के कारण उन्हें लौटना ही था। उन्होंने कहा, मैं अपनी जगह डॉ. सुशीला नय्यर को छोड़े जा रहा हूं। यह आपकी हर तरह से देखभाल करेगी। लौटते वक़्त वे पंजा साहेब गुरुद्वारा भी गए। इस पर मुसलिम भीड़ द्वारा दो बार आक्रमण हुआ था। वहां से वे सीधे ट्रेन पकड़ने के लिए लाहौर स्टेशन पहुंचे जहां से पटना होते हुए कलकत्ता होकर नोआखाली जाते। जो गांधीजी का विचार था, उसके कारण 15 अगस्त के स्वाधीनता-दिवस के अवसर पर सरकारी उत्सव में दिल्ली में गांधीजी का कोई स्थान नहीं था।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


10. सूफ़ी दर्शन-1

समस्त वंदना ईश्वर के लिए है, दुख-सुख प्रत्येक स्थिति में उसकी वंदना है। हे ईश्वर! तू धन्य है, कि तूने हमें नबूवत1 दी। क़ुरआन का ज्ञान दिया। धार्मिकता का अपार कोष प्रदान किया। .. (शबे-आसूर’ – दसवीं रात को इमाम हुसैन द्वारा दिए गए भाषण का अंश।)

(1 = नबी या पैग़म्बर होने का भाव)

10.1 पहला सिद्धांत परमात्मा एक और सर्वव्यापी है

ज्यों तिल माहिं तेल है, ज्यों चकमक में आग।

त्यौं साईं तुझ्य में है, जागि सकै तो जाग ॥

संत कबीर दास जी का यह प्रसिद्ध दोहा हमें बताता है कि ईश्वर बाहर नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर ही निवास करते हैं। जिस प्रकार तिल में तेल और चकमक पत्थर में आग छिपी होती है, उसी तरह परमात्मा हमारे भीतर हैं। अज्ञानता को छोड़कर हमें आत्म-ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।

सूफ़ी दर्शन का पहला सिद्धांत यह है कि परमात्मा एक और सर्वव्यापी है। परमात्मा का वास मस्जिदों और मंदिरों में नहीं बल्कि मनुष्य के हृदय में है और आत्मा ईश्वर का ही एक अम्र (हुक्म) है। इस पूरी कायनात में केवल एक ही परम सत्य (अल्लाह/ईश्वर) का अस्तित्व है और हर चीज़ में उसी की झलक या उपस्थिति समाई हुई है। सृष्टिकर्ता तथा उसकी रचना में कोई वास्तविक अलगाव नहीं है। ईश्वर के प्रति सच्चा और अनन्य प्रेम ही उस तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए अपने झूठे अहंकार (नफ़्स) को मिटाना जरूरी है।

पैगा़मे क़ुरआन (क़ुरआन का संदेश) समझे बग़ैर हम सूफ़ी-दर्शन को नहीं समझ सकते। सूफी-दर्शन की जड़ें सीधे तौर पर कुरान की आयतों और इस्लामी शिक्षाओं में गहराई से जुड़ी हुई हैं। क़ुरआन मजीद एक बड़ी किताब है। इसमें अल्‍लाह की तारीफ और इबादत (आराधना) है। क़ायनात (सृष्टि) के कि़स्‍से हैं। गुमराही (भटकाव) की दास्तान हैं। जंगो-जिहाद के तरीक़े अमल और हिदायतें हैं। समाज के संगठन-संचालन के नियम हैं। फ़रियादों की बावत फैसलों व फ़त्‍वों का ज़िक्र है। सूफी-दर्शन का मुख्य लक्ष्य ईश्वर (अल्लाह) से प्रेम और उसकी पहचान पाना है। कुरान इस प्रेम और पहचान का मूल स्रोत है। सूफी लोग कुरान के शब्दों के साथ-साथ उनके गहरे और छिपे हुए आंतरिक अर्थों को खोजते हैं। इसे 'तफसीर-ए-इशारा' कहते हैं। 'तफसीर-ए-इशारा' (गूढ़ व्याख्या) कुरान (इस्लाम का पवित्र ग्रंथ) के अर्थों को समझने की एक विशेष आध्यात्मिक शैली है, जिसमें शब्दों के सामान्य और शाब्दिक अर्थ से आगे बढ़कर दिल या अंतः प्रेरणा (इशारे) से मिलने वाले सूक्ष्म और गहरे रहस्यों को समझा जाता है। यह मुख्य रूप से सूफियों (रहस्यवादियों) द्वारा उपयोग की जाने वाली व्याख्या है, जो अल्लाह के वचनों में छिपे गहरे और प्रतीकात्मक अर्थों को तलाशते हैं। इसमें आयत के बाहरी या प्रकट अर्थ (ज़ाहिर) को नकारा नहीं जाता, बल्कि उसके साथ-साथ आंतरिक और परोक्ष अर्थ (बातिन) पर ध्यान दिया जाता है। इस्लामिक विद्वानों के अनुसार यह व्याख्या तभी मान्य है जब इसके निकाले गए अर्थ कुरान की मूल भावना, शरिया (इस्लामी कानून) और पैगंबर की शिक्षाओं के खिलाफ न हों।

सूफी संत पैगंबर हजरत मुहम्मद के जीवन और आचरण का पालन करते हैं। पैगंबर का जीवन पूरी तरह कुरान के संदेश पर आधारित था। क़ुरआन में वैसी आयतें हैं जो रसूले-इस्‍लाम पर उनकी गहन ध्यानावस्था में प्रकट हुई थीं। बहुत सारे कलाम (वचन) हैं जिन्हें किसी ने उनसे बुलवाया था। इसमें एक जगह लिखा है ‘’ऐ पैग़ंबर! खुदा ने तुम पर यह किताब उतारी है जिसकी बाज़ आयतें न केवल अटल (मुहकम) हैं बल्कि किताब के मूल आधार भी वही हैं, जबकि इसकी बाज आयतें अस्‍पष्‍ट (मुतशाबिह) हैं। ज्ञानी लोग इन पर ईमान लाते हैं और कहते हैं कि सब कुछ हमारे रब की तरफ से है। (सुरह 3, आयत-7) मुहकम आयतें (स्पष्ट) ऐसी आयतें हैं जिनके अर्थ बिल्कुल साफ हैं। आदेश, नियम और बुनियादी बातें इन्हीं पर आधारित हैं। इन्हें किताब की जड़ या 'उम्मुल किताब' कहा गया है। मुतशाबिह आयतें (अस्पष्ट/सन्दिग्थ) ऐसी आयतें हैं जिनके एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं या जिनका गूढ़ ज्ञान केवल अल्लाह को ही ज्ञात है। जिन लोगों के मन में खोट होता है, वे भ्रम फैलाने के लिए केवल इन्हीं अस्पष्ट आयतों के पीछे भागते हैं। जो लोग सच्चे ज्ञान में सुदृढ़ होते हैं, वे स्पष्ट और अस्पष्ट दोनों तरह की आयतों पर विश्वास करते हैं और मानते हैं कि सब कुछ ईश्वर की ही ओर से है।

अल्लाह ने मानव का रूप आकार बनाने और उस की आर्थिक आवश्यकता की व्यवस्था करने के समान, उस की आत्मिक आवश्यकता के लिये क़ुरआन उतारा है, जो अल्लाह की प्रकाशना तथा मार्गदर्शन और फ़ुर्क़ान है। जिस के द्वारा सत्य व असत्य में विवेक (अन्तर) कर के सत्य को स्वीकार करना मानव का कर्तव्य है। इसमें निहित मुह़कम (सुदृढ़) आयातों से अभिप्राय वह आयतें हैं, जिन के अर्थ स्थिर, खुले हुये हैं। जैसे एकेश्वरवाद, रिसालत तथा आदेशों और निषेधों एवं ह़लाल (वैध) और ह़राम (अवैध) से संबन्धित आयतें, यही पुस्तक का मूल आधार हैं। दूसरी प्रकार की आयतों में मुतशाबिह (संदिग्ध) से अभिप्राय वह आयतें हैं, जिन में उन तथ्यों की ओर संकेत किया गया है, जो हमारी ज्ञानेंद्रियों में नहीं आ सकते, जैसे मौत के पश्चात् जीवन, तथा परलोक की बातें, इन आयतों के विषय में अल्लाह ने हमें जो जानकारी दी है, हम उन पर विश्वास करते हैं, क्योंकि इन का विस्तार विवरण हमारी बुद्धि से बाहर है। इन आयतों का उद्देश्य यह देखने के लिए है कि क्या इंसान अपनी सीमित बुद्धि पर घमंड करता है या अल्लाह के असीमित ज्ञान के सामने झुककर कहता है कि "हम इस पर ईमान लाए, यह सब हमारे रब की तरफ से है।" परन्तु जिन के दिलों में खोट है वह इन की वास्तविकता जानने के पीछे पड़ जाते हैं, जो उन की शक्ति से बाहर है।

सूफ़ीमत की आधारशिला दो चीज़ों पर रखी हैं 1. ईश-प्रेम और 2. परमात्मा का सानिध्य 

तसव्वुफ़ सदाचरण, अच्छे व्यवहार और नैतिकता का ही का नाम है। यह माना जाता है कि जिसने आचरण में तुमसे ज़्यादा बढ़त ले ली, उसने तसव्वुफ़ में भी तुमसे बढ़त ले ली। सदाचरण दो तरह का है, एक स्रष्टा के प्रति सदाचरण, दूसरा सृष्टि के प्रति सदाचरण। स्रष्टा के प्रति सदाचरण का अर्थ यह है कि बन्दा (दास, भक्त) उसके फैसले से रज़ामन्द हो, उसके किसी फैसले पर उसे कोई शिकायत न हो, उसके हर निर्णय पर वह पूरी तरह समर्पित हो। सूफियों के अनुसार स्रष्टा (ईश्वर/अल्लाह) के प्रति सदाचरण (अदब) का अर्थ है—पूर्ण समर्पण, प्रेम, विनम्रता और हर हाल में उसकी रज़ा (इच्छा) में राजी रहना। इसके तहत इंसान बाहरी आडंबरों से दूर रहकर अपने हृदय को पवित्र करता है और परम सत्ता के प्रति पूर्ण निष्ठा रखता है। सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि ईश्वर में विश्वास में संदेह का कोई तत्व नहीं होना चाहिए। यह नई-नई धारणाओं और गुमराह करने वाली अवधारणाओं से दूषित नहीं होना चाहिए, और इसकी जड़ें स्वयं स्पष्ट तथ्यों में होनी चाहिए।

सृष्टि के प्रति सदाचरण यह है कि जीवों के प्रति उसका जो कर्तव्य बनता है, उन्हें स्रष्टा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए निभाए। इस कार्य में कोई और स्वार्थ उसके सामने न हो। समस्त जीवों और प्रकृति के साथ प्रेम, करुणा और निस्वार्थ सेवा का व्यवहार करना, क्योंकि वे पूरी सृष्टि को उसी एक परमपिता परमेश्वर (ईश्वर) का प्रकटीकरण या रूप मानते हैं। सूफी संत यह मानते हैं कि ब्रह्मांड की हर चीज़ में ईश्वर की ही ज्योति समाई है, इसलिए किसी भी प्राणी को ठेस पहुँचाना सीधे सृष्टिकर्ता का अनादर करने जैसा है। सदाचरण के प्रमुख रूप हैं, करुणा, परोपकार, क्षमा, सहिष्णुता और नम्रता।

सूफ़ी साधकों के अनुसार ईश्वर अद्वितीय पदार्थ जो निरपेक्ष है, अगोचर है, अपरिमित है और नानातत्व (बहुलता) से परे है, वही परम सत्य है। परम सत्य के अतिरिक्त वह परम कल्याण भी है, परम कल्याण के रूप में वह परम सुन्दर है। निरपेक्षता माने ईश्वर किसी पर निर्भर नहीं है, बल्कि समस्त संसार उसी पर आश्रित है। अगोचरता यानी वह साधारण इंद्रियों या साधारण बुद्धि से परे है, उसे केवल आंतरिक शुद्धि और प्रेम (इश्क-ए-हकीकी) द्वारा ही महसूस किया जा सकता है। अपरिमित और अद्वितीय से तात्पर्य है उसकी कोई सीमा नहीं है और उसके समान या उसके जैसा अन्य कोई नहीं है। नानातत्व से परे का मतलब है वह दुनिया की अनेकता और विभाजनों से परे एक अखंड पूर्णता है। सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् - सूफियों का यह दृष्टिकोण सत्य और परम सौंदर्य के रूप में ईश्वर की प्राप्ति पर जोर देता है। साधक अपने अहंकार को मिटाकर उसी अद्वितीय परम सत्य में लीन होने का प्रयास करता है।

हालाकि सूफ़ियों के विभिन्न सम्प्रदायों में सूफ़ी तकनीकों का अपना अनूठा पैटर्न था, फिर भी अंततोगत्वा सभी एक ढाँचे पर सहमत थे, और वह शरीयत की रूपरेखा थी। सूफ़ी हर स्तर पर शरीयत को अंतिम मानदंड के रूप में ध्यान में अवश्य रखते थे। प्रारंभिक सूफ़ी हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि उनकी मौलिक स्थिति रूढ़िवादी विद्वानों और धर्मशास्त्रियों के साथ-साथ नवउन्मेषकों और दार्शनिकों से स्पष्ट रूप से अलग होनी चाहिए। वे ख़ुद को इस्लाम की मुख्यधारा के भीतर रखते थे, लेकिन अपने अनुभवों को वाह्य कर्मकांड या शुष्क तर्क से अलग और गहरा मानते थे। पारंपरिक धर्मशास्त्री शरिया (बाह्य कानून) को ही सब कुछ या एकमात्र वैध मार्ग मानते हैं और आंतरिक रहस्यवाद या हक़ीक़त के उस स्वतंत्र दायरे को खारिज या गौण करते हैं जिसे सूफ़ी अलग से प्रस्तुत करते हैं। वहीं, सूफ़ी शरिया और हक़ीक़त को एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि क्रमिक और गहरे आयाम मानते हैं। धर्मशास्त्री कुरान और हदीस के शाब्दिक और कानूनी पहलुओं (फिक़्ह) पर टिके रहते हैं। उनके लिए धर्म का मतलब आदेशों का पालन, इबादत के नियम और सामाजिक-नैतिक आचरण का पालन करना है। वे शरिया से परे किसी गुप्त या अलग 'हक़ीक़त' के दावे को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि उनके अनुसार ईश्वरीय विधान पूर्ण और प्रत्यक्ष है। महान सूफी संतों (जैसे जुनैद बगदादी या गजाली) का यह स्पष्ट मत रहा है कि हक़ीक़त तक पहुँचने के लिए शरिया की नींव जरूरी है। शरिया के बिना हक़ीक़त का दावा भ्रम है। हालांकि, साधना के उच्च स्तर पर जाकर वे शरिया के स्थूल विधान से आगे बढ़कर दिव्य अनुभव (हक़ीक़त) को उसका सार मानते हैं।

सूफ़ी संतों और विचारकों का मानना है कि शरिया बाहरी नियम और कर्मकांड हैं, जबकि हकीकत आंतरिक सत्य और ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव है। इस दृष्टिकोण से देखें तो वास्तविकता ईश्वर का एक विशेष पहलू है, जैसे कि मनुष्य इसे कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं सकता है, जबकि शरीयत मानव आचार संहिता है जिसे मनुष्य को यथासंभव पूरी तरह से समझने और अमल में लाना चाहिए। शरीयत की समझ विकसित करने के लिए किसी विशेष संकाय की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन हक़ीक़त की समझ के लिए एक विशेष क्षमता की आवश्यकता होती है, और ऐसी क्षमता के साथ केवल नबियों को संपन्न किया गया है। सूफ़ियों और नवउन्मेषकों के बीच अंतर के बारे में, यह बताया गया है कि सूफ़ियों का मानना है कि शरिया और हक़ीक़त, उनके सैद्धांतिक भेद के बावज़ूद, एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि हमेशा घनिष्ठ संबंध में काम करते हैं, जबकि नवउन्मेषकर्ता यह मानते हैं कि शरीयत तभी तक कार्य करता है जब तक कि मनुष्य ने वास्तविकता के साथ संपर्क स्थापित नहीं किया है; क्योंकि जब भी वह इस संपर्क को स्थापित करता है, तो शरीयत काम करना बंद कर देती है।

इजादिया वर्ग के सूफ़ी विद्वानों का सिद्धांत इस्लाम धर्म का सिद्धांत है। इनके अनुसार ईश्वर का अस्तित्व जगत से अलग है। रूढ़िवादी इस्लाम के अनुसार परमात्मा अपने जैसा आप है, उसके जैसा और कुछ भी नहीं है। ज़ात (सत्ता), सिफ़त (गुण) और कर्म में परमात्मा अद्वितीय है। उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। सृष्टि के सभी पदार्थों से वह भिन्न है। वेदान्त मत में यह तटस्थेश्वरवाद के सामान है। इजादिया वर्ग के अनुसार अल्लाह इस क़ायनात का इजाद करने वाला ज़रूर है, लेकिन वह इसके किसी कार्य-प्रणाली में हस्तक्षेप नहीं करता। वह जगत से पृथक और परे है। वह तटस्थ है। शंकराचार्य दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीव ब्रह्म ही है। उससे भिन्न नहीं है। ब्रह्म और आत्मा एक हैं। जगत प्रपंच माया की प्रतीति है। अविद्या या माया के कारण जीव जगत प्रपंच रूप में प्रतीत होता है। सूफ़ियों के अनुसार अल्लाह ने इस सृष्टि को अपनी इच्छा से उत्पन्न किया है, और केवल वही सत्य है, शेष मिथ्या है। प्रसिद्द सूफ़ी साधक हज़रत अल हुज्वेरी ने ‘कश्फ़-उल-महजब (रहस्योद्घाटन) में ईश्वर और जगत के अलग अस्तित्व का वर्णन किया है। यही मत शंकराचार्य के आभासवाद में भी प्रकट होता है। 

वुजूदिया सम्प्रदाय के अनुसार वास्तव में ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। ईश्वर ही एकमात्र सत्ता है तथा विश्व की सभी वस्तुएँ उसी का रूप हैं। ईश्वर संबंधी सूफ़ियों का यही प्रमुख तथा मान्य मत है। सूफ़ी सन्त अन्य किसी सत्ता को नहीं स्वीकारते हैं। ईश्वर बेमिस्लो-बेकैफ़ है अर्थात न तो कोई उसके जैसा है और न ही उसकी कैफ़ियत का बयान करना संभव है। ईश्वर सूक्ष्म है और हर जगह वह मौज़ूद है। उसके इन्हीं गुणों की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए सूफ़ियों ने उसे नूर कहा है। सृष्टि उसकी सिफ़ात का अक्स है अर्थात उसके गुणों का प्रतिबिंब है। क़ुरआन के इस बयान की सत्यता को सूफ़ियों ने भी अपनी साधनाओं के माध्यम अनुभव किया। ईश्वर की ओर रूहानी क़दम बढ़ाते हुए जब वे अपने वुजूद के मूल पर पहुंचे तो उन्होंने इस हक़ीक़त का मुशाहिदा (दर्शन) स्वयं किया। इस मुशाहिदे का बयान सूफ़ियों ने अपने अनुभव में किया है।

शेख़ अबुल फ़िअज़ ज़ुन्नून-बिन-इब्राहिम मिस्री (मृ. 859 ई.) ने एक वाकये का ज़िक्र किया है। एक श्रद्धालु शेख़ बायज़ीद बुस्तामी (मृ. 874 ई.) के दर्शन के लिए उनके पास पहुंचा। उसने उनके घर के बंद दरवाज़े की कुंडी खटखटायी। भीतर से शेख़ बिस्तामी ने पूछा, कौन है? क्या काम है?

उसने जवाब दिया, शेख़ बायज़ीद बुस्तामी के दर्शन के लिए आया हूं।

शेख़ बुस्तामी ने जवाब दिया, कौन बायज़ीद, कहां रहता है? बहुत समय हुआ मैंने भी उसे खोजा था, वह न मिला।

श्रद्धालु लौट गया। उसने शेख़ ज़ुन्नून मिस्री से इस वाक़ये का ज़िक्र किया। शेख़ ज़ुन्नून मिस्री ने कहा, मेरा भाई बायज़ीद ईश्वर की ओर जाने वालों में शामिल हो गया।

एक धार्मिक व्यक्ति जो अध्यात्म के मार्ग पर चल चुका है वह यह नहीं जानता कि वह कौन है?

इन अद्वैतवादी विचारों का प्रसिद्ध सूफ़ी चिंतक इब्नुल अरबी (मृ. 1240 ई.) ने विस्तार से वर्णन किया है। इन विचारों के परिणामस्वरूप सूफि़यों के दो विचार मिलते हैं। एक वहदतुल वजूद में और दूसरा वहदतुल शहूद में विश्वास प्रकट करता है। वहदतुल वजूद (अस्तित्व की एकता’ या परमात्मा का एकत्व’) का तात्पर्य है अस्तित्व, अन्य का नहीं। इस ब्रह्मांड में केवल एक ही परम सत्य और वास्तविक अस्तित्व (वजूद) अल्लाह या ईश्वर का है, और बाकी पूरी सृष्टि का अस्तित्व उसके प्रतिबिम्ब हैं जो उससे भिन्न नहीं कहे जा सकते। इसके प्रतिकूल वहदतुल शहूद के प्रतिपादक ईश्वर को एकमात्र सत्य मानते हैं। सृष्टिकर्ता (अल्लाह) और उसकी रचना (सृष्टि) वास्तव में एक नहीं हैं, बल्कि दोनों अलग-अलग हैं। सृष्टि, उनके अनुसार प्रतिबिम्ब या आभास मात्र है। छाया में उस परमसत्य का आभास अवश्य मिलता है पर छाया को ही सत्य नहीं माना जा सकता।

उपरोक्त दोनों विचारधाराएं इस्लामी तौहीद (एकेश्वरवाद) की प्रतिपादक हैं। परमेश्वर एक है, इस विचार का क़ुरआन में ज़ोर देकर प्रतिपादन किया गया है तौहीद की मूल भावना यह है कि ईश्वर एक है, पर सूफ़ी चिन्तकों ने इस विचार को एक डग आगे बढ़ाकर यह प्रतिपादित किया कि एक ईश्वर ही है अन्य कोई नहीं। बगदाद के हज़रत जुनैद जैसे सूफ़ी का मानना ​​था कि तौहीद का मतलब है कि ईश्वर अपनी कालातीतता में अद्वितीय है, और उसके जैसा कोई नहीं है, और, आगे, कुछ भी नहीं और कोई भी उन कार्यों को नहीं कर सकता है जिन्हें करने में वह और वह अकेले सक्षम हैं। तौहीद को बुनियादी और मौलिक के रूप में सूफ़ी की स्वीकृति ही उसे भगवान के साथ सही प्रकार के संबंध बनाने में मदद करती है जिसके बिना उसके जीवन में कुछ भी नहीं है जिसके कारण उसे सूफ़ी कहा जा सकता है। सूफ़ी विचारकों में एक विचार प्रभाव हज़रत बायजीद बुस्तामी, हज़रत मंसूर हल्लाज जैसों का है जिसके मुख्य प्रतिपादक हज़रत इब्नुल अरबी तथा हज़रत अब्दुल करीम-अल-जिली हैं जिन्होंने सूफ़ी दर्शन को भारतीय अद्वैतवाद की धारणा पर अवस्थित करने का प्रयास किया। इसके विपरीत दूसरा प्रभाव उन विचारकों का है जो मूल इस्लाम और तौहीद के दायरे के भीतर ही सूफ़ी दर्शन को समेटने का प्रयास करते हैं, जैसे प्रसिद्ध मीमांसक हज़रत अल गज़ाली

एक अंदाज़े बयान वहदतुल वुजूद का नज़रिया (अद्वैतवाद) कहलाता है जबकि दूसरा वहदतुश्-शुहूद का नज़रिया (नज़र में केवल एक का होना) कहलाता है। एक का ताल्लुक़ शैख़ इब्ने अरबी से है और दूसरे का ताल्लुक़ शैख़ अहमद सरहिंदी से है। वहदतुल वुजूद का नज़रिया हो या वहदतुश्-शुहुद का नज़रिया, दरअसल यह है एक ही बात बस इसे कहने के लिए अलग अलग उपमाएँ ली गई हैं। वहदतुल वुजूद का शाब्दिक अर्थ है वुजूद का एक होनाऔर वहदतुश्-शुहूद का मतलब है कि देखी जाने वाली चीज़ का एक होना। यह एक गहन अनुभूति है जिसे समझने के लिए सूफ़ी लोग शब्दों के बजाय साधना का मार्ग ही पकड़ते हैं और कामिल वली होने के लिए यह बुनियादी सिफ़त है। सूफ़ी साधनाओं का केंद्र बिंदु इसी गुण और इसी भाव की प्राप्ति है।

10.2 वहदत-उल-वुजूद

यह सिद्धांत कि संसार में केवल एक ईश्वर के सिवा कुछ नहीं है, (वेदान्त में ब्रह्मवाद) वहदत-उल-वुजूद कहलाता है। सूफी दर्शन में वहदत-उल-वुजूद का अर्थ "अस्तित्व की एकता" या "सत्ता का एकत्व" है। इस विचार के अनुसार इस ब्रह्मांड में वास्तविक और परम अस्तित्व केवल ईश्वर (अल्लाह) का है, और बाकी, जो कुछ भी हम देखते हैं, वह उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति या उसका रूप है। ईश्वर और उसकी रचना अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि यह पूरा संसार उसी एक परम सत्य (वजूद) की परछाई या प्रकटीकरण है। सूफी संत समझाते हैं कि जिस प्रकार समुद्र एक ही होता है और उससे उठने वाली लहरें अलग-अलग दिखाई देती हैं, उसी तरह परमेश्वर एक है और यह तमाम दुनिया उसी का अलग-अलग रूप या प्रकटीकरण है।

सूफ़ीमत में वहदतुलवुजूद को चिंतन का मुख्य आधार माना जाता है। इस चिंतन पर नव-अफ़लातूनवाद, यहूदी  धर्म, ईसाई धर्म, ईरान के पारसी तत्व, बुद्ध के मत, वेदांत और उपनिषद के तत्व की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता। अब्बासी ख़िलाफ़त (874-950 ई.) के समय बग़दाद पश्चिमी और पूर्वी विचारधाराओं का संगम स्थल बन गया था। इस समय यहां अरब तथा अन्य देशों के सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का समागम हुआ।

शेख़ अबू अब्दुल्लाह तस्तरी (मृ. 896 ई.), इमाम ग़ज़ाली (मृ. 1011 ई.) ने वहदतुल वुजूद की जिन मान्यताओं को प्रस्तुत किया था उसको शेख़ इब्न-उल-अरबी (1165–1240) ने समुचित रूप से संकलित कर एक नया रूप दिया। सूफ़ियों का मक़सद क़ुरआन से ज़रा सा भी हटा हुआ नहीं है। क़ादिरी सिलसिले के संस्थापक ग़ौसे पाक शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैहि (मृ. 1165 ई.) ने फ़रमाया है कि इन साधनाओं का मक़सद केवल यह है कि जो कुछ ख़बर है वह मुशाहिदे (दर्शन) में बदल जाए ताकि यक़ीन का आला दर्जा हासिल हो जाए क्योंकि अपने देखे हुए का विश्वास कभी जाता नहीं है।

रूढ़िवादी इस्लामी विद्वानों (जैसे इब्न तैमियाह) ने इस सिद्धांत की यह कहकर आलोचना की कि यह ईश्वर को उसकी रचना के बराबर यानी सर्वेश्वरवाद (Pantheism) जैसा मान लेता है, जिससे तौहीद (ईश्वर की एकता/विशिष्टता) की मूल अवधारणा पर असर पड़ता है। हज़रत इब्न-तैमिया रह. (मृ. 1328 ई.) का मानना था कि सभी संरचनाओं का अस्तित्व वास्तविक रूप में रचनाकार (ईश्वर) का अस्तित्व है। यह सिद्धांत यह नहीं कहता कि "इंसान ही ख़ुदा है" (जिसे हुलूल या सर्वेश्वरवाद का गलत अर्थ समझा जा सकता है), बल्कि यह स्पष्ट करता है कि हर इंसान और कण में उसी ईश्वरीय सत्ता की एक झलक या नूर समाया हुआ है। वहदतुल वुजूद के क़ायल सूफ़ियों के कलाम को यदि सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाता तो कभी यह भ्रम न होता कि वे ख़ुद को ईश्वर का अंश कह रहे हैं। जहां-जहां उन्होंने ऐसा कहा है वहां-वहां ईश्वर के गुणों के प्रतिबिंबित होने का ही तात्पर्य है। जो लोग उनकी अनुभूतियों से नहीं गुज़रे थे, उन्होंने जब उनके कलाम की व्याख्या की तो वे उनके रहस्यमय और आलंकारिक कलाम को न समझ सके और वे कुछ का कुछ समझ बैठे। क़ुरआन की आयतों से स्पष्ट है कि प्रत्येक वह वस्तु, जो नष्ट हो सकती थी, नष्ट हो चुकी है और केवल ईश्वर शेष है और रहेगा। सभी प्राणियों के अस्तित्व के तिरोहण में सिर्फ़ ईश्वर सत्य और मौज़ूद है। प्राणियों के वाह्य रूप एक-दूसरे से अलग भले हों लेकिन पूर्ण निस्तारण के साथ ईश्वर के अविभाज्य एकत्व रूप में विद्यमान हैं।

वहदतुल वुजूद की अनुभूति के बावजूद शैख़ इब्ने अरबी रह. (मृ. 1240 ई.) ज़िंदगी भर शरीअते इस्लाम के ठीक वैसे ही पाबंद रहे जैसे कि उस दौर के ग़ैर सूफ़ी आलिम पाबंद थे बल्कि वे उनसे भी बढ़कर पाबंद थे। उनके कलाम को उनके जीवन से जोड़कर ही समझना चाहिए। उन्होंने सूफ़ी सिद्धांत के ऊपर एक पुस्तक भी लिखी थी, जिसका नाम है - फ़सूस अलहकम

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मनोज कुमार

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