सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
10. सूफ़ी दर्शन-5
10.8 हज़रत अब्दुल करीम अल-जीली रह. (1365 - मृ. 1428 ई.)
प्रसिद्ध मुस्लिम सूफी संत, रहस्यवादी,
दार्शनिक और ‘इंसान-उल-कामिल’ के प्रणेता और शुहूदिया शखा के प्रवर्तक शेख़ करीम जीली हज़रत
इब्न अरबी संप्रदाय के ही थे। चौदहवीं शताब्दी के अंत में वे फारस में रहते थे।
ऐसा कहा जाता है कि वे अपने जीवन काल में भारत भी आए थे। उनके सिद्धांत हज़रत
इब्न अरबी से बहुत मिलते-जुलते हैं। उन्होंने 'वहदत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) के
सिद्धांत को आगे बढ़ाया। वे वहदतुश शुहूद (दृष्टि की एकता) के सिद्धांत को
मानते हैं। हज़रत अल-जीली ने गुणों
वाली दुनिया किस प्रकार फिर शुद्ध और सरल तत्व में लौट आती है इस पर भी अपने विचार
प्रकट किए हैं। सूफी तत्वमीमांसा के अनुसार, समस्त विविधता और गुणों का यह
खेल अंततः अपनी मूल एकता की ओर लौटता है। जब आंतरिक शुद्धि या चेतना अपने स्रोत की
ओर यात्रा करती है, तो गुण-दोष के आवरण विलीन हो जाते हैं और वह भिन्नता पुनः उस परम, शुद्ध और सरल दिव्य सार-तत्व
में समाहित हो जाती है। हज़रत इब्न-अरबी ने पूर्ण मानव के चिंतन पर अपनी पुस्तक ‘फ़ुसूस-अलहकम’ में प्रकाश डाला है। उनसे
काफ़ी पहले हज़रत मंसूर हल्लाज रह. (मृ. 922 ई.) ने अपनी पुस्तक ‘किताब-अलवास्तैन’ में पूर्ण मानव के सिद्धांत
को प्रकाश में लाया था। मरातिब अल-वुजूद पुस्तक में उन्होंने अस्तित्व के
विभिन्न आध्यात्मिक स्तरों का वर्णन किया है।
हज़रत अब्द अल-करीम बिन इब्राहिम अल-जिली का जन्म 1365 में आधुनिक इराक
के बगदाद के पास हुआ था और उनकी मृत्यु 1412 में हुई थी। वह प्रसिद्ध
सूफ़ी संत हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानी रह. के वंशज माने जाते हैं। वह शेख़ शराफ अल-दीन अल-जबरती
के शिष्य थे और ज़ाबिद (यमन) में रहते थे। उनका दावा है कि उन्हें रहस्यवादी रोशनी मिली, जिसने उन्हें अपनी प्रसिद्ध
पुस्तक, `अल-इंसान अल-कामिल फी मारिफ़त अल-अवाखिर व-अल-अवेल’ (द परफेक्ट मैन) लिखने के लिए
प्रेरित किया। इस पुस्तक का उद्देश्य सत्य की व्याख्या और अभिव्यक्ति करना है।
‘अलइंसानुल-अल कामिल’ में हज़रत अब्दुल कलीम अल-जीली रह. ने पूर्ण मानव के
सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की है। उनका मानना है कि परमात्मा का स्वरुप (ज़ात) इतना महान है कि
उसके सामने सृष्टि के अन्य पदार्थ नहीं के बराबर हैं। निरपेक्ष सत्ता एक है और सभी
बहुलता मिथ्या है। निरपेक्ष होना सृष्टि (ख़ल्क़) और ईश्वर (हक़) का गुण (ऐन) है। निरपेक्ष
सत्ता स्वयं को दो अलग-अलग वास्तविकताओं, ख़ल्क़ और हक़ में प्रकट करती है। यह ज़ात
(स्वरुप) ही दृश्यमान है। सिफ़त
(गुण) बराबर अव्यक्त रहती है। कोई भी विवरण शब्दों में उस तत्त्व को पूरी तरह से व्यक्त
नहीं कर सकता है।
ब्रह्मांड में ऐसा कुछ
भी नहीं है जो उस परम सत्ता से संबंधित है। यह शुद्ध सत्ता अंतर्विरोधों का योग है। इसकी दो विशेषताएं
हैं: अनंत और चिरस्थायी; दो गुण हैं: ईश्वर (हक्क़) और सृष्टि (ख़ल्क़); दो विवरण: अनंत काल/अनश्वर (किदम) और सीमित
(हुदूद); दो नाम: रब और अब्द (ईश्वर और दास)। इसके दो चेहरे हैं: बाहरी
(दृश्यमान), यानी प्रत्यक्ष जगत, और भीतरी (अदृश्य), यानी परलोक। यह स्वयं के लिए अस्तित्वहीन
है और दूसरों के लिए अस्तित्व में है। यह स्पष्ट है कि हज़रत अल-जिली के अनुसार वास्तविकता एक है और वह दिव्य पदार्थ
(जौहर) से
संबंधित है जिसके दो अलग-अलग पहलू: ईश्वर और दुनिया हैं। तशबीह (अमरता/ शरीरधारी ब्रह्म) दिव्य सौंदर्य का
रूप है जो बिना किसी भेद के अभूतपूर्व दुनिया की सभी चीज़ों में प्रकट होता है।
हज़रत अल-जिली के अनुसार, भौतिक दुनिया एक असत्य (माया) नहीं है, बल्कि एक वास्तविकता है जो परम
सत्य के बाहरी रूप को व्यक्त करती है। वे परमार्थ और अपरमार्थ दो सत्ता मानते हैं।
एक परमात्मा की सत्ता दूसरे जीव की। जीव की सत्ता शून्य जैसी है। उसे अपने
अस्तित्व के लिए परमार्थ सत्ता की अपेक्षा है। जब गुण (सिफ़त) अभिव्यक्त होते हैं तब उसको नाम
दिए जाते हैं। ये नाम दर्पण के सामान है जो परम सत्ता के सभी रहस्यों को प्रकट
करते हैं। उसकी अभिव्यक्ति सम्पूर्ण सत्ताओं में अन्तर्निहित है। वह सृष्टि के
प्रत्येक अणु-परमाणुओं में अपनी पूर्णता को अभिव्यक्त करता है। वह खण्डों में
विभक्त नहीं है। सृष्टि के सम्पूर्ण पदार्थ उसकी पूर्णता के कारण हैं। सृष्टि
परमात्मा के गुणों में उसकी (परमात्मा की) अभिव्यक्ति मात्र है। परमात्मा अपनी
सत्ता को अपने गुणों में अभिव्यक्त करता है। मनुष्य परमात्मा के नाम और गुणों में
विश्वास करता है। इसलिए मनुष्य के विश्वासों में ही वह अभिव्यक्त होता है। यह
विश्वास ज्ञान के सहारे ही टिका हुआ है। इसलिए वह ज्ञान के सहारे ही मनुष्य के
निकट अभिव्यक्त होता है।
उनका विचार सत-असत के चक्र को
पूरा करता है। उनके अनुसार इस चक्र के बीच में आदमी है क्योंकि उसकी आत्मा एक ओर
ब्रह्म और दूसरी ओर प्रकृति से मिल जाती है। आदमी सत और असत के बीच पुल बांधता है। आत्मा
में सत्ता के सारे गुण एक हो जाते हैं। इसीलिए उसके द्वारा बहुत्व में फंसा हुआ एक
अपने एकत्व के बारे में सचेत हो जाता है। जिस मनुष्य में इस एकत्व के ज्ञान का उदय
हो जाता है वह इन्साने
कामिल (पूर्ण पुरुष – परम हंस) कहलाता है। इस ज्ञान के उदय की तीन अवस्थाएं हैं – नाम की ज्योति, गुणों की
ज्योति और तत्व की ज्योति। यह अवस्थाएं ब्रह्म के प्रकृति में उतरने की तीन
मंजिलें हैं। इन्हें अहदियत
(एकत्व, एक होना), हुविय्यत
(तदीयता, उससे संबंध रहनेवाला) और अनिय्यत (अस्मदीयता) के नामों से पुकारते हैं। अहदियत
(परम एकता) ईश्वर की वह अवस्था है जहाँ वह पूरी तरह निराकार, अज्ञात और शुद्ध चेतना है। हुवियत
(दिव्य आंतरिकता) के चरण में ईश्वर के भीतर अपनी पहचान और छिपे हुए गुणों का
अहसास प्रकट होता है। इनायिया (दिव्य प्रकटीकरण) अंतिम चरण है, जिसमें ईश्वर के नाम और गुण
(जैसे दया, ज्ञान, शक्ति) ब्रह्मांड और मानव के रूप में दृश्यमान होते हैं।
सृष्टिकर्ता (रब) और सृष्टि (अब्द) में संबंध को
बताने के लिए तीन अवस्थाओं की चर्चा की गयी है। पहली अवस्था अहदत में वह
(परमात्मा) केवल सत्ता (अज़-ज़ात)
मात्र है। इस अवस्था में वह निर्गुण, निरपेक्ष रहता है। इस अवस्था के दो रूप अल-अमा और अहदियत हैं। अल-अमा
अभ्यंतर रूप है और अहदियत वाह्य रूप। अल-अमा घना अन्धकार है। होने वाली सृष्टि के
बीज मात्र के रूप में परमात्मा इस अवस्था में रहता है। ‘अहदियत’ (बाह्यरूप) में परमात्मा
अपने आपको सर्वातीत सत्ता के रूप में जानता है। परमात्मा को अपने एकत्व का ज्ञान
रहता है।
दूसरी अवस्था को ‘वहदत’ कहा जाता है। इस अवस्था में ‘ज़ात’ (सत्ता) से भिन्नत्व नहीं
होता। इस अवस्था के भी दो रूप हैं, हूवीय्यत (अभ्यंतर) और अनीय्यत
(बाह्यरूप)। हूवीय्यत से मतलब तत्त्व है। इसमें शुद्ध सत्ता अनेक विरोधी रूप में
ही अपने एकत्व को जानती है। अनीय्यत जो बाह्यरूप है उसमें विशुद्ध सत्ता को एक की
अनेक में अभिव्यक्ति का बोध होता है। तत्त्व उस एक से बाहर नहीं है। न इस तत्त्व
का बोध कराने वाला उस से बाहर है। इस वहदत की हूवीय्यत अवस्था में वह एक
अंतर्दर्शन करता रहता है और अनीय्यत अवस्था में वह सृष्टि को ध्यान में रखकर अपनी
और संकेत करता रहता है। इस अवस्था में भी परमात्मा अनाभिव्यक्त रूप में रहता है।
लेकिन उसे अपने आपका ज्ञान रहता है यानी वह आत्मज्ञ है। इस अवस्था में वह अनेक का
विरोधी एक है और अनेक का आश्रय एक है, लेकिन द्वैत नहीं है। परम
सत्य में ‘वह’, ‘मैं’ और ‘तू’ एक ही वस्तु है। उसका एकत्व ‘विभेद’ से परे है।
तीसरी अवस्था ‘वाहिदीयत’ है। यह परमात्मा के
नामरूप-विशिष्ट जगत-प्रपंच में अभिव्यक्त होने की अवस्था है। इस अवस्था में
अनेकत्व में एकत्व की अभिव्यक्ति होती है। परमात्मा का ज्ञान सभी पदार्थों में
व्याप्त हो जाता है। स्थूल जगत प्रकाशित हो जाता है। जीवन प्रकट होता है। इस तरह ‘अहदियत’
की अवस्था में परमात्मा निरपेक्ष, निर्गुण, संबंधविहीन, अनभिव्यक्त रहता है। ‘वहदत’ की अवस्था में वह आत्मज्ञ होता है और सत्ता, प्रकाश और शक्ति का उसे भान होता
है। ‘वाहिदीयत’ की अवस्था में सत्ता जीवन में, प्रकाश, शक्ति और इच्छा में परिणत हो
जाता है। जब सत्ता के विभिन्न गुण जीवन, ज्ञान, शक्ति, इरादा, सुनना, देखना और बोलना आदि प्रकट होते हैं, तब वह लाहूत (देवत्व) के नाम से जाना जाता है। जब उसके गुण
क्रियात्मक रूप धारण करते हैं, जैसे सृष्टि करना, जीवनदान करना, मारना, तब उसे ज़बरूत
(शक्ति) कहते है। जब ये क्रियाशील गुण विभिन्न लोकों में प्रकट हुए तब उन्हीं के
अनुरूप उनका नामाकरण हुआ। जैसे जब ये देवलोक में प्रकट हुए तो ‘आलमे-मलकूत’ कहलाए। जब सदृश रूपों में
प्रकट हुए तो ‘आलमे-मिसाल’ कहलाए। जब ये भौतिक जगत में
प्रकट हुए तो ‘आलमे-नासूत’ कहलाए।
हज़रत अलजीली ने पूर्ण मानव के अध्यात्मिक
प्रशिक्षण के तीन शिखर बताए हैं। पहले शिखर में ईश्वर का नाम जपते हुए समाधि लेना
है। दूसरा शिखर ‘तजल्ली-सिफ़ात’ (प्रकाश गुण) है। इसमें
इंसान ईश्वरीय गुणों से प्रकाश ग्रहण कर ब्रह्मांड की आत्मा में सम्मिलित हो जाता
है। फिर तो उसमें कुछ चमत्कारी गुण आ जाते हैं, जैसे हवा में उड़ना, पानी पर चलना।
तीसरा शिखर परमसत्ता के राज्य में प्रवेश करने का होता है। इस शिखर पर पैग़म्बर
हज़रत मुहम्मद सल्ल. विराजमान थे। सरल शब्दों में कहें तो पूर्ण मानव मनुष्य और
ईश्वर के बीच की कड़ी है। उनके अनुसार, पैगंबर मुहम्मद साहब ब्रह्मांड के सबसे आदर्श और पूर्ण
मनुष्य हैं, जो ईश्वर के गुणों का सबसे सुंदर रूप प्रस्तुत करते हैं।
अल-जिली के अनुसार, एक सामान्य व्यक्ति तौहीद को
केवल बौद्धिक स्तर पर समझता है। 'अल-इंसान अल-कामिल' (पूर्ण मानव) वह है जो अपने 'अहम' (Self) को मिटाकर ईश्वर की एकता में
लीन (फना) हो जाता है। पूर्ण मानव ही वह बिंदु है जहाँ ईश्वर की एकता और सृष्टि की
विविधता आपस में मिलती हैं। अल-जिली के तौहीद में ईश्वर के जलाल (क्रोध/महानता) और
जमाल (सौंदर्य/दया) जैसे विपरीत गुण अंततः एक ही स्रोत में विलीन हो जाते हैं। अच्छाई
और बुराई का अंतर केवल मानवीय स्तर पर है; दिव्य स्तर पर सब कुछ उसी एक
इच्छा का हिस्सा है।
10.9 हज़रत अब्द अल-रहमान जामी (1414-1492)
हज़रत मौलाना नूर अल-दीन अब्द
अल-रहमान जामी (1414-1492), फारसी भाषा के महान क्लासिक कवि और सूफी संत और महान विद्वान थे। उन्हें 'खतम अल-शुअरा' (कवियों की मुहर/अंतिम महान
कवि) भी कहा जाता है। उनका जन्म खुरासान (वर्तमान अफगानिस्तान) के जाम कस्बे में हुआ था और
उनका अधिकांश जीवन हेरात में बीता। 'जामी' उपनाम उन्होंने अपने जन्मस्थान जाम के सम्मान और प्रसिद्ध
सूफी अहमद जाम से आध्यात्मिक संबंध के कारण चुना। उन्होंने हेरात और समरकंद के
प्रसिद्ध मदरसों में इस्लामी विज्ञान, अरबी साहित्य, दर्शन और खगोल विज्ञान की उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपनी
आध्यात्मिक खोज में वे सूफी संत साद अल-दीन काशगरी के शिष्य बने और बाद में
नक़्शबंदिया संप्रदाय के प्रमुख मार्गदर्शक ख़्वाजा उबैदुल्लाह अहरार के
प्रभाव में आए। यद्यपि वे स्वभाव से एकांतप्रिय और तपस्वी थे, फिर भी तैमूरी वंश के सुल्तान
हुसैन मिर्ज़ा और ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान मुहम्मद फातह (कुस्तुनतुनिया के
विजेता) जैसे महान शासक उनका बेहद सम्मान करते थे।
वे हज़रत इब्न अरबी के अनुयायी
थे। वे सूफी आध्यात्मिक साधना में उच्च स्थान रखते थे। उनका
इंतकाल 1492 ईस्वी (898 हिजरी) में हेरात (अफ़गानिस्तान) में हुआ, जहाँ उनकी मज़ार स्थित है। हफ्त औरंग उनकी सात
मसनवियों का प्रसिद्ध संग्रह, जिसमें यूसुफ और जुलेखा, लैला और मजनू जैसी अमर प्रेम
और आध्यात्मिक कथाएँ शामिल हैं। उन्होंने सूफीवाद, इस्लामी दर्शन और तत्वज्ञान
पर लगभग 11 महत्वपूर्ण गद्य ग्रंथ लिखे। पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की शान में लिखी उनकी
रचित नाअत और फारसी कविताएँ पूरी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध और आदरणीय हैं।
हज़रत अब्द अल-रहमान जामी की
रचना 'लवाइह' (चमक) सूफी दर्शन और इस्लामी रहस्यवाद (तसव्वुफ़) का एक अनमोल और विश्वप्रसिद्ध
ग्रंथ है। इस पुस्तक में अस्तित्व की एकता के सिद्धांत का एक विवरण है। 'लवाइह' शब्द का अरबी में अर्थ होता है "प्रकाश की किरणें"
या "चमक" (Flashes
of Light)। इस किताब में जामी ने सूफी मत के बेहद कठिन और गहरे सिद्धांतों को बहुत ही
सरल और खूबसूरत अंदाज में समझाया है। यह पूरी किताब महान सूफी दार्शनिक इब्न अरबी
के 'वहदत अल-वुजूद' (Unity of Existence/अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत पर आधारित है। जामी समझाते
हैं कि इस ब्रह्मांड में केवल एक ही वास्तविक अस्तित्व (सत्य) है, और वह ईश्वर (अल्लाह) है। हम
जो कुछ भी दुनिया में देखते हैं, वह उसी एक परमेश्वर का प्रतिबिंब या प्रकाश है। इस पुस्तक
की सबसे बड़ी खूबी इसकी शैली है। जामी पहले गद्य (Prose) में किसी गहरे आध्यात्मिक
सिद्धांत को समझाते हैं, और फिर तुरंत उसे और स्पष्ट करने के लिए एक खूबसूरत रूबाई
या कविता (Poetry) पेश करते हैं। पूरी किताब छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी है, जिन्हें 'लवीहा' (किरण या फ्लैश) कहा जाता है।
हर अध्याय पाठक के दिमाग में ज्ञान की एक नई रोशनी जगाता है। पुस्तक में 'फना' (स्वयं के अहंकार और अस्तित्व
को मिटा देना) के आध्यात्मिक चरण को बहुत महत्व दिया गया है। जामी के अनुसार, जब तक इंसान सांसारिक मोह और
अपने 'मैं' (अहंकार) से मुक्त नहीं होता, तब तक वह उस परम सत्य का अनुभव नहीं कर सकता। अहंकार मिटते
ही साधक ईश्वर के रंग में रंग जाता है। 'लवाइह' केवल एक किताब नहीं है, बल्कि ईश्वर को अपने भीतर
महसूस करने और आध्यात्मिक यात्रा को समझने की एक व्यावहारिक गाइडबुक है।
निरपेक्ष सत्ता को ईश्वर कहा जाता
है जो सभी जीवों का स्रोत है और फिर भी बहुलताओं से ऊपर है। वह सभी अभिव्यक्तियों से
परे है और अज्ञेय है। वह शुद्ध और सरल पूरी तरह से बिना किसी निर्धारण के है और नाम, गुण और संबंधों के भेदों से ऊपर
है। परम सत्य हर मौजूद चीज़ का आधार है। ईश्वर और संसार एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। ब्रह्मांड ईश्वर की बाहरी (अभिव्यक्ति) है और ईश्वर ब्रह्मांड
की आंतरिक (वास्तविकता) है। प्रकट होने से पहले संसार ईश्वर था और प्रकट होने के बाद
ईश्वर संसार के समान है। वास्तव में वह तो एक ही है, ईश्वर और दुनिया को अलग-अलग
देखने का हमारा तरीक़ा अलग-अलग है। जामी के अनुसार सृष्टिकर्ता और
जीव एक ही वास्तविकता के दो पहलू हैं। बाहरी दुनिया में एक वास्तविकता
के अलावा कुछ भी नहीं है जो विविध रूपों और विशेषताओं में होने के कारण कई प्रतीत होता
है।
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मनोज
कुमार