रविवार, 11 जनवरी 2026

424. महादेव देसाई की मृत्यु

गांधी और गांधीवाद

424. महादेव देसाई की मृत्यु



1942

आगा खान पैलेस में हिरासत में लिए जाने के एक हफ़्ते के अंदर, गांधीजी को एक बहुत बड़ा दुख हुआ। एकाएक आगाखां महल में महादेव देसाई पर हृदय-रोग का आक्रमण हुआ और कुछ ही देर में पिछले पच्चीस वर्षों से छाया की तरह साथ रहने वाले गंधीजी के मानसपुत्र आधे रास्ते पर उनका साथ छोड़कर चल बसे। वह शांति से बात कर रहे थे, और अचानक ज़मीन पर गिर पड़े। उन्हें बिस्तर पर ले जाया गया, उनका चेहरा लाल था, होंठों से झाग निकल रहा था, उनके हाथ-पैर छटपटा रहे थे। गांधीजी जल्दी से उनके पास गए। गांधीजी बिस्तर के पास खड़े होकर 'महादेव, महादेव' पुकार रहे थे। दुख में गांधीजी ने कहा, "अगर वह बस एक बार अपनी आँखें खोलकर मुझे देख ले, तो वह नहीं जाएगा।" महादेव ने कभी आँखें नहीं खोलीं। 'महादेव, देखो, बापू तुम्हें बुला रहे हैं,' कस्तूरबाई ने कहा। जब उन्होंने अपनी अंतिम सांसे ली, उनका सिर बापू की गोद में था। इस दुखद घटना का सदमा और भी बढ़ गया क्योंकि जहां तक ​​पता था, महादेव भाई को पहले कभी दिल का दौरा नहीं पड़ा था और उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की भी कोई बीमारी नहीं थी। उन्हें सिर्फ कभी-कभी चक्कर आते थे। काँपते हाथों से गांधीजी ने शरीर को धोया और चंदन लगाया और फूलों से सजाते हुए फुसफुसाए, "महादेव, मैंने सोचा था कि तुम यह मेरे लिए करोगे। अब मुझे यह तुम्हारे लिए करना पड़ रहा है।"

बा इस कठोर आघात को सह नहीं सकीं। बा की आंखों से झर-झर आंसू बहते रहे। कस्तूरबा, जिन्हें गांधीजी की गिरफ्तारी के अगले दिन गिरफ्तार किया गया था, रोते हुए बोलीं: "बापू ने अपना दायां और बायां हाथ खो दिया! बापू ने अपने दोनों हाथ खो दिए!" उनके मुंह से बार-बार निकल रहा था, मुझे जाना था; महादेव क्यों चला गया? मैं दुर्गा को क्या मुंह दिखाऊंगी। सरकार ने महादेव देसाई की पत्नी दुर्गा देसाई और उनके पुत्र नारायण देसाई को भी उनके अंतिम दर्शन नहीं करने दिया। वे सेवाग्राम में ही थे। जो तार गांधीजी ने भेजा था वह भी उन्हें तीन सप्ताह बाद मिला। गांधीजी ने उसमें लिखा था, महादेव को एक योगी और देशभक्त की मृत्यु प्राप्त हुई है।

गांधीजी ने पूछा कि क्या शव को मृतक के दोस्तों और रिश्तेदारों को सौंपा जा सकता है। आई.जी. प्रिज़न्स ने कहा, ऐसा नहीं किया जा सकता, लेकिन अधिकारी शव को ले सकते हैं और अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर सकते हैं। अधिकारियों ने पुलिस और ब्राह्मणों के साथ एक लॉरी मंगवाई थी। वे शव को ले जाकर खुद उसका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। लेकिन गांधीजी इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया, "कोई भी पिता अपने बेटे का शव अजनबियों को नहीं सौंप सकता। महादेव मेरे लिए बेटे से भी बढ़कर था। मैं खुद उसके अंतिम संस्कार करना चाहता हूं। लेकिन अगर सरकार मुझे बाहर नहीं ले जा सकती, तो मैं इसे दोस्तों को सौंपने के लिए तैयार हूं, लेकिन मैं इसे जेल अधिकारियों को नहीं सौंपूंगा।" हालांकि सरकार हत्यारों के शव फांसी के बाद उनके रिश्तेदारों और दोस्तों को सौंप देती है और उन्हें सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने देती थी, लेकिन वे एक विद्रोही के लिए, चाहे वह कितना भी अहिंसक क्यों न हो, ऐसी इजाज़त देने को तैयार नहीं थे। माहौल में तनाव था। गांधीजी कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा: "मैं अपने बेटे की मौत को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। अगर सरकार मुझे बाहर जाकर शव का अंतिम संस्कार करने की इजाज़त नहीं देगी और न ही इसे दोस्तों को सौंपने देगी, तो मैं यहीं अंतिम संस्कार करूंगा।" जेल अधिकारियों ने टेलीफोन पर नई दिल्ली से संपर्क किया। आखिरकार सरकार मान गई।

दोपहर में, एक दुख भरी छोटी सी शव यात्रा महादेव की अर्थी को महल के मैदान के एक कोने में बनी अस्थायी श्मशान भूमि तक ले गई। गांधी जी एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में आग का बर्तन लिए शव के पीछे-पीछे चल रहे थे। एक छोटी सी धार्मिक रस्म के बाद उन्होंने आग जलाई और जल्द ही आग की लपटें उठने लगीं। उन्होंने कहा, "महादेव ने 'करो या मरो' के मंत्र को सच कर दिखाया है। यह बलिदान भारत की आज़ादी के दिन को ज़रूर करीब लाएगा।" शाम 5 बजे तक अंतिम संस्कार पूरा हो गया था। गांधीजी पूरे तीन घंटे तक जलती हुई चिता के पास खड़े रहे और वह शारीरिक और भावनात्मक रूप से बहुत थक गए थे।

तीसरे दिन हड्डियाँ और राख इकट्ठा की गईं। जिस जगह उनके शरीर का दाह-संस्कार किया गया, वहां गांधीजी ने पत्थर और मिट्टी की एक समाधि बनवाई। गांधीजी के कहने पर मीरा बहन ने समाधि के ऊपर ‘ॐ’ लिख दिया और उसके नीचे क्रास बना दिया। उस जगह पर एक चबूतरा बनाया गया और पत्थरों का एक छोटा सा घेरा बनाया गया। महात्मा गांधी इस मौत से स्तब्ध थे। गांधीजी हर सुबह और शाम समाधि पर जाते थे। ताज़े फूल चढ़ाए जाते थे और गीता का बारहवाँ अध्याय रोज़ पढ़ा जाता था। मीरा बहन लिखती हैं, गांधीजी फूल चढाते तो हमेशा क्रॉस के ऊपर। जब मैं बापू को देखती, मुझे रोम की वह सलीब याद आती जिसने उन्हें इस कदर अभिभूत कर दिया था और मुझे लगता कि महानतम बलिदान का वह प्रतीक उनके लिए उनके अस्तित्व की सबसे मूलभूत आकांक्षा का प्रतीक था। 

गांधीजी ने कहा, "महादेव का पूरा जीवन भक्ति का एक अटूट गीत था, और यह सही है कि हम उनकी समाधि पर भक्ति योग का पाठ करें। शिष्य होने से वह मेरे गुरु बन गए हैं। मैं हर दिन उनकी समाधि पर जाता हूँ ताकि सेवा के प्रति उनके जीवन भर के समर्पण का उदाहरण मेरे मन में ताज़ा रहे। आइए हम सब भगवान से प्रार्थना करें कि हम उनके नक्शेकदम पर चल सकें।"

जिस जगह महादेव भाई का अंतिम संस्कार किया गया था, वह घर के चारों ओर लगी कंटीली तार की बाड़ से थोड़ी दूरी पर थी। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, गांधीजी, दूसरे कैदियों के साथ, सुबह-शाम वहाँ जाते थे, उस जगह पर फूल चढ़ाते थे और गीता के बारहवें अध्याय, भक्ति मार्ग का पाठ करते थे। तीन दिन बाद, जब राख इकट्ठा करके रख ली गई, तो सरकार की तरफ से आदेश आया कि वे और दूसरे कैदी अब कंटीली तार की बाड़ से बाहर कदम नहीं रखेंगे। डिटेंशन कैंप का जेलर कटेली खुद इस मनमानी हुक्म से परेशान था। उसने गांधीजी की तरफ से समाधि पर फूल चढ़ाने की पेशकश की। उसने उन झाड़ियों को भी साफ करवाने की पेशकश की जो कंटीली तार के गेट से समाधि का नज़ारा रोक रही थीं। उसने उस जगह पर एक आयताकार चबूतरे के आकार में पत्थर लगवाए ताकि उस जगह की पहचान हो सके। चौथे दिन से, सुबह और शाम, गांधीजी और उनका छोटा सा ग्रुप बंद कंटीली तार के गेट के पास खड़े होकर समाधि को देखते और प्रार्थना करते थे, जबकि उनकी तरफ से उस पर फूल चढ़ाए जाते थे।

महादेव देसाई का जन्म 1 जनवरी, 1892 में सूरत के पास अनाविल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे एक गाँव के स्कूल टीचर के बेटे थे, और गरीबी में पले-बढ़े थे। वे एक ट्रांसलेटर बने, और फिर वकील, लेकिन वकालत में इतनी कम कमाई हुई कि वे खेती की कोऑपरेटिव सोसाइटी के बैंक इंस्पेक्टर बनकर खुश थे। गांधीजी ने सितंबर 1917 में उनसे मिलकर महसूस किया कि उन्हें अपना खोया हुआ बेटा मिल गया है। गांधीजी ने कहा, "मुझे लोगों को समझने में ज़्यादा समय नहीं लगता। मुझे तुममें वह इंसान मिल गया है जिसे मैं ढूंढ रहा था, वह एक इंसान जिसे मैं एक दिन अपना काम सौंप सकूंगा। मुझे तुम्हारी ज़रूरत अपने लिए है, आश्रम के लिए या किसी और काम के लिए नहीं।" गांधीजी अड़तालीस साल के थे; महादेव देसाई पच्चीस साल के थे। अपनी पच्चीस वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपना समस्त जीवन बापू को समर्पित कर दिया था। गांधीजी ने भी प्रथम परिचय में ही उनकी तेजस्विता, विद्वता और उत्तम चरित्र को पहचान लिया था। गुजरात प्रांत राजकीय परिषद का पहला अधिवेशन 1916 में गोधरा में हो रहा था। जिसके अध्यक्ष गांधीजी थे। वहीं बंबई विश्वविद्यालय से वकालत पास महादेव देसाई ने पहली बार गांधीजी को देखा था। उनका भाषण भी सुना। गांधीजी ने महादेव की लिखी हुई सामग्री देखकर कहा था, तुम्हारा स्थान तो मेरे पास है। उस दिन एलिस ब्रिज पर से वापस आते हुए महादेव ने नरहरिभाई पारिख से कहा था, सारी ज़िन्दगी किसी के चरणों के पास बैठकर बिताना चाहूं, तो इस पुरुष के पास बिताऊं, ऐसा लगता है। तब उन्होंने गांधीजी का सान्निध्य स्वीकार किया और 1917 से जीवन भर इसे निभाया। उन्होंने पच्चीस साल तक बिना किसी आराम के उनकी सेवा की थी और उन्होंने "खुद को शून्य बना लिया था"1919 तक वे गांधीजी के इतने प्रिय हो चुके थे कि गांधीजी ने उन्हें यह कहते हुए, महादेव मेरा बेटा, सचिव और मुझपर जान देने वाला है, अपना मानसपुत्र और उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्हें जो चाहिए था, वह था वफ़ादारी, समझदारी, पक्का समर्पण, और ये सब उन्हें महादेव देसाई में मिला, जिन पर उन्होंने वह सारा प्यार बरसाया जो उन्होंने अपने बेटों को नहीं दिया था। हरिलाल को, जो उस समय कलकत्ता में अपना बिज़नेस शुरू कर रहे थे, उन्होंने लिखा कि उन्हें "परफेक्ट सेक्रेटरी" मिल गया है और यह दुख की बात है कि हरिलाल ने यह पद ठुकरा दिया।

गांधीजी का सुझाया हुआ शायद ही ऐसा कोई रचनात्मक कार्य होगा, जिसे महादेव भाई ने न अपनाया हो। इसे संदर्भ में सूत कताई एक ऐसा कार्यक्रम था जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया। चाहे जितना भी काम हो, काते बगैर एक दिन भी नहीं सोते थे। हर दिन 500 गज सूत कातने का उन्होंने ने नियम बनाया हुआ था। 15 अगस्त 1942 को मृत्यु हुई थी, 14 अगस्त तक उन्होंने 500 गज सूत कातने का नियम निभाया। वह गुजराती के कुशल अनुवादक थे, रोज़ डायरी लिखते थे, और उनकी लिखावट बहुत सुंदर थी।

महात्मा गांधी के निजी सचिव का काम निरी मुंशीगिरी तो हो नहीं सकती थी। गांधीजी के प्रति उनकी सेवा-भक्ति अद्वितीय थी। प्रथम असहयोग आन्दोलन के पहले, जब गांधीजी भारत में इतने प्रख्यात नहीं हुए थे, उनके देशव्यापी दौरे में महादेव भाई अकेले ही उनकी सुख सुविधाओं का पूरा-पूरा ख्याल रखते थे। उनके कपड़े धोते, कमोड साफ करते, मालिश करते, दवाई लगाते, फलों का रस देते। क्या नहीं करते। महादेव का व्यक्तित्व मोहन से बिल्कुल भिन्न था। एक सूर्य जैसा था, तो दूसरा चन्द्रमा जैसा शीतल। एक अनासक्त कर्मयोगी था, तो दूसरा रसिक भक्त। भाषा और साहित्य की दृष्टि से गांधीजी यथार्थवादी थे, तो महादेव अलंकार युक्त रसमय शैली वाले। फिर भी महादेव ने लेखों में गांधीजी की शैली को ठीक आत्मसात किया था। हरिजन या हरिजन बंधु में लिखे लेखों को पढ़कर पाठक सहज यह अनुमान नहीं लगा पाते कि यह महादेव (एम.डी.) का लिखा है या मोहन (एम.के.जी.) का। चर्चा में अधिक समय नष्ट न हो, इस दृष्टि से राजाजी, पटेल, नेहरूजी सरीखे नेता भी महादेव से ही चर्चा करके काम निपटा लेते थे। गांधीजी के भाषणों की रिपोर्ट भी लिखने का काम उनका ही था। यह उतना सहज काम नहीं था। गांधीजी की भाषा में तो सहजता होती थी, लेकिन उनके भाषण में क्रमबद्धता नहीं होती थी। महादेव को रिपोर्ट लिखते समय उसे ठीक करना होता था। यहां तक कि गांधीजी की गिरफ्तारी के समय राजनीतिक कैदी की हैसियत से वह जले में भी गांधीजी की संगत में रहते थे यही कारण था कि 1942 के आंदोलन में गांधीजी  की गिरफ्तारी के समय महादेव देसाई को भी गिरफ्तार कर लिया गया था और गांधीजी के साथ आगा खान पैलेस की जेल में रखा गया था।

जैसे जैसे गांधीजी का सार्वजनिक काम बढता गया, महादेव भाई के काम का बोझ भी उसी अनुपात में अधिक होता गया। वे बहुत मेहनती थे। महादेव देसाई की मेहनतकशी का उदाहरण यह है कि जिन दिनों गांधीजी सेवाग्राम में रहते थे तब महादेव देसाई वर्धा से प्रतिदिन गांधीजी की डाक लाने ले जाने के लिए 11 मील पैदल चलते थे और किसी किसी दिन तो उन्हें जरूरी डाक के लिए दो बार 22 मील पैदल चलना पड़ता था। ट्रेन में सफर के समय वे रात में पाखाने में बैठकर लेख लिखते थे ताकि ट्रेन के डिब्बे की बत्ती जलने से गांधीजी की नींद में खलल न पड़े। गांधीजी की सेवा के लिए उन्होंने कांग्रेस सरकार में मंत्री पद भी अस्वीकार कर दिया था। हालांकि उन्हें आशुलिपि नहीं आती थी, फिर भी सुयोग्य सचिव के गुण उनमें कूट-कूट कर भरे थे। उनके लिखने की गति असामान्य थी, और वे गांधीजी के मुंह निकला एक शब्द भी नहीं छोड़ते थे। डाक देखकर विशाल पत्र-व्यवहार को निपटाना, देश-विदेश के आगंतुकों के साथ चर्चा करके गांधीजी का समय बचाना, मुलाक़ातों की रिपोर्ट लिखना, यंग इंडिया और हरिजन का संपादन, लेख लिखना, गुजराती लेखों का हिंदी-अंग्रेज़ी अनुवाद करना, गांधीजी के दिनचर्या का विवरण तैयार करना, प्रवास का विवरण डायरी में लिखना, गांधीजी के साथ हुए वाद-विवाद को शब्द-बद्ध करना आदि उनके दैनिक काम थे। इसके अलावा गांधीजी के प्रयोगों में उनकी सहायता करना भी उनकी जिम्मेदारी थी। वे गांधीजी के व्यापक राजनीतिक संबंधों का निर्वाह भी उतनी ही कुशलतापूर्वक करते। उनका दिमाग बहुत तेज़ और शानदार था, और कभी-कभी वह गांधीजी की बातों का भी अपनी समझदारी से विरोध कर पाते थे। महादेव देसाई गांधीजी के लिए कसौटी थे; अगर गांधीजी अपने सेक्रेटरी को अपने कामों या विचारों की सही होने का यकीन नहीं दिला पाते थे, तो उन्हें पता चल जाता था कि वे फेल हो गए हैं। इतने सारे काम महादेव कैसे कर लेते थे, यह आश्चर्य का विषय है। शायद मोहन और महादेव की असाधारण एकात्मकता की वजह से।

एक बार उनकी जेब कटने से संस्था के 400 रुपये चोरी हो गये थे उसकी भरपाई उन्होंने कई किताबों का अनुवाद करके पूरी की। महादेव देसाई साहित्य लेखन के साथ साथ गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी भाषा के विद्वान और अनुवादक थे। उनकी कई खंड में प्रकाशित डायरी भारत की आजादी के आंदोलन का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है। आख़िर तक महादेव देसाई को गांधीजी की तरफ़ से सत्तर रुपए माहवार मिलते थे। इतने में बमुश्किल घर का ख़र्च चला पाते थे। लेकिन उन्होंने बापू का साथ कभी नहीं छोड़ा और गांधीजी के पास आने के बाद पच्चीस वर्षों में महादेव देसाई ने सिर्फ़ दो बार छुट्टी ली थी। पहली बार टायफायड हो जाने पर और दूसरी बार ब्लड प्रेशर बढ़ जाने पर। उनके पिताजी का भी जब देहान्त हुआ था तब भी उनका काम ज़ारी रहा था। इन दो अपवादों को छोड़कर महादेव भाई ने एक भी रविवार, दीवाली, होली या गरमी की छुट्टी नहीं ली। इस बार जब वे तीसरी बार बीमार हुए तो, तीव्र हृदय घात के हमले से, डा सुशीला नायर की उपस्थिति में भी, उन्हें तमाम कोशिशों के बाद भी बचाया नहीं जा सका और वह  सदा के लिए छुट्टी मनाने चले गए। मोहन और महादेव का साथ छूट गया। महादेव देसाई जैसे निष्काम देशभक्त का असामयिक निधन आजादी की लड़ाई लड़ते भारत के लिए भी बहुत दुखदाई था।

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर

 

शनिवार, 10 जनवरी 2026

423. भारत छोड़ो आंदोलन - अहिंसा की नीति का त्याग?

राष्ट्रीय आन्दोलन

423. भारत छोड़ो आंदोलन - अहिंसा की नीति का त्याग?

421. भारत छोड़ो आन्दोलन-1

421. भारत छोड़ो आन्दोलन-2

422. भारत छोड़ो आंदोलन एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन

 

1942

जिन गांधीजी ने चौरी-चौरा में हिंसा के मुद्दे पर असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था, उन्हीं ने भारत छोडो आन्दोलन के दौरान लोगों द्वारा की गयी हिंसा की भर्त्सना करने से इनकार कर दिया था इसे कुछ विद्वानों ने माना कि गांधीजी अहिंसा के प्रभावशाली होने के विश्वास को खो रहे थे तथा इसके पथ से अलग होने को सोच रहे थे? यह विचारणीय विषय है कि हमेशा अहिंसा व सविनय विरोध की राजनीति करने वाले गांधी अपेक्षाकृत उग्र प्रतीत होने वाले नारे ‘‘करो या मरो’’ तक कैसे पहुंच गए? सुमित सरकार ने कहा है, . . . हालाँकि अहिंसा की आवश्यकता हमेशा दोहराई जाती थी, गांधी का करो या मरो का मंत्र गांधीजी के उग्रवादी मिजाज का प्रतिनिधित्व करता है। अंग्रेजों से अपील करते हुए कि ‘भारत को ईश्वर या अराजकता के भरोसे छोड़ दें’, एक साक्षात्कार में गांधीजी ने कहा था, इस सुव्यवस्थित अनुशासनपूर्ण अराजकता को जाना ही होगा, और यदि इसके परिणामस्वरूप पूर्ण अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होती है तो मैं यह खतरा उठाने के लिए तैयार हूँ हालाकि गांधीजी ने हमेशा अहिंसा की नीति पर जोर दिया, और भारत छोडो प्रस्ताव में भी ‘अहिंसक रूप में जितना संघर्ष संभव हो उतने बड़े स्तर पर जन-संघर्ष’ का आह्वान किया गया था, लेकिन यह भी कहा था कि यदि कांग्रेस के नेता गिरफ्तार हो जाएँ, तो स्वाधीनता की इच्छा एवं प्रयास करने वाला प्रत्येक भारतीय स्वयं अपना मार्गदर्शक बने। प्रत्येक भारतीय अपने आपको स्वाधीन समझे। केवल जेल जाने से काम नहीं चलेगा। इसके दो दिन पहले उन्होंने कहा था, ‘यदि आम हड़ताल करना आवश्यक हो तो मैं उससे पीछे नहीं हटूंगा।’ पहली बार गांधीजी ने राजनीतिक हड़ताल के समर्थन में वक्तव्य दिया था। इन सब वक्तव्यों के परिप्रेक्ष्य में कई लोग यह कहते हैं कि गाँधीजी का अहिंसा के प्रति रवैये में भारी परिवर्तन आया था। ऐसे लोगों को गांधीजी का यह वक्तव्य भी ध्यान में रखना चाहिए जो उन्होंने भारत छोडो आन्दोलन के प्रस्ताव के वक़्त दिया था कि, मैं जानता हूं कि देश आज विशुद्ध रूप से अहिंसक प्रकार का सविनय अवज्ञा करने के लिए तैयार नहीं है। किन्तु जो सेनापति आक्रमण करने से इसलिए पीछे हटे कि उसके सिपाही तैयार नहीं हैं, वह अपने हाथों धिक्कार का पात्र बनता है। भगवान ने अहिंसा के रूप में मुझे एक अमूल्य भेंट दी है। यदि वर्तमान संकट में मैं उसका उपयोग करने में हिचकिचाऊँ, तो ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। गांधीजी के लिए अहिंसा एक नैतिक प्रश्न था। गांधीजी ने हमेशा माना था, कुछ भी हो जाए, परन्तु भारत को अपनी आत्मा नहीं खोनी चाहिए।

कुछ और तथ्यों पर हमें गौर करना चाहिए। टोटेनहैम के रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत छोडो आन्दोलन के दौरान हुए उपद्रवों के पीछे धुरी राष्ट्रों के प्रति गुप्त सहानुभूति निहित थी। यह अंग्रेजों की चाल थी। अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस को बदनाम करने और फासीवाद विरोधी विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए इस जन-आन्दोलन को राजद्रोहमूलक षड्यंत्र घोषित कर दिया गया। तथ्य यह भी था कि ‘करो या मरो के अपने भाषण में गांधीजी ने कहा था, मैं रूस या चीन की हार का कारण नहीं बनाना चाहता। जापानियों को कभी भी उन्होंने मुक्तिदाता के रूप में नहीं देखा। गांधीजी ने जापानियों के आने के पहले ही ब्रितानी सरकार से भारत छोड़ देने और सत्ता को भारतीयों के हाथ सौंप देने की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि जापानियों से हम अहिंसा के सहारे निपट लेंगे। उन्होंने तो यहाँ तक कहा था, ब्रिटिश राज्य को किसी भी दूसरे परदेशी शासन से बदलने के लिए मैं ज़रा भी तैयार नहीं हूं। जिस दुश्मन को मैं नहीं जानता उससे तो वही दुश्मन अच्छा, जिसे मैं कम-से-कम जानता तो हूं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि गांधीजी जापानियों को अंग्रेजों के ऊपर तरजीह देते हुए हिंसात्मक आन्दोलन को भी समर्थन दे रहे थे और अहिंसा के प्रभावशाली होने के विश्वास को खो रहे थे तथा इसके पथ से अलग होने को सोच रहे थे, कहना भारी भूल होगी।

9 अगस्त की सुबह राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद के कुछ ही दिनों में आंदोलन ने व्यापक उग्र रूप धारण कर लिया। जिन लोगों ने इस आंदोलन को संगठित किया और नेतृत्व दिया, वे भूल गए कि गांधीजी, नेहरू, आज़ाद और दूसरे नेताओं वाली कांग्रेस इस विचार से सहमत नहीं थी और यह 8 अगस्त को A.I.C.C. द्वारा पास किए गए प्रस्ताव के अनुरूप नहीं था। जिस संघर्ष को मंज़ूरी दी गई थी, वह "अहिंसक तरीकों से एक जन संघर्ष" होना था जो अनिवार्य रूप से गांधीजी के नेतृत्व में होगा। गांधीजी ने A.I.C.C. में अपने भाषणों में उन शर्तों को बताया था जो आंदोलन को नियंत्रित करेंगी। यह एक "खुली बगावत" होगी, जिसमें "धोखाधड़ी या झूठ या किसी भी तरह की असत्यता" के लिए कोई जगह नहीं होगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि कुछ भी गुप्त रूप से नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गोपनीयता एक पाप था और एक आज़ाद आदमी को किसी गुप्त आंदोलन में शामिल नहीं होना चाहिए। सबसे बढ़कर, आंदोलन को अहिंसा की "नीति" द्वारा नियंत्रित किया जाना था, जिसमें कोई ढील नहीं दी जा सकती थी। लेकिन गांधीजी को आंदोलन के लिए आह्वान करने का मौका ही नहीं मिला। सरकार ने गांधीजी और कांग्रेस के नाम पर बोलने वाले सभी नेताओं को गिरफ्तार करके अहिंसक जन आंदोलन की योजना को पहले ही नाकाम कर दिया था। जो लोग बाहर बचे थे, उनमें से ज़्यादातर मध्यम और निचले स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता थे, और अब उन्हें प्रस्ताव की शर्तों और गांधीजी की बातों की व्याख्या अपने हिसाब से करनी पड़ी, और जो लोग आखिर में आंदोलन के नेता बनकर उभरे, उनकी व्याख्या प्रस्ताव के इरादे और गांधीजी द्वारा बताए गए दिशानिर्देशों से बिल्कुल अलग थी।

9 अगस्त को लीडरशिप पर गिरफ्तारी की कार्रवाई के तुरंत बाद, A.I.C.C. मीटिंग के सिलसिले में बॉम्बे में मौजूद कुछ कांग्रेसी नेता जो गिरफ्तारी से बच गए थे, उन्होंने चुपके से मुलाकात की और खुद को A.I.C.C. के तौर पर स्थापित कर लिया। इनमें राम मनोहर लोहिया, राम नंदन मिश्रा, अच्युत पटवर्धन, सादिक अली, सुचेता कृपलानी और अरुणा आसफ अली शामिल थे। बाद में कई और लोग, जो अंडरग्राउंड थे, "A.I.C.C." में शामिल हो गए। इनमें गिरधारी कृपलानी, बी. वी. केसकर, द्वारकानाथ कचरू, राम सेवक पांडे, पुरुषोत्तमदास त्रिकमदास, मोहनलाल सक्सेना, एस. एम. जोशी, साने गुरुजी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और पूर्णिमा बनर्जी शामिल थे। सेंट्रल डायरेक्टोरेट "A.I.C.C." ने कांग्रेस की नीति की अपने तरीके से व्याख्या की, जो कांग्रेस सोशलिस्ट तरीका था। इस तरह जो नीति हर जगह कांग्रेस कमेटियों को लागू करने के लिए भेजी गई, वह कांग्रेस की नीति नहीं थी, बल्कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की नीति थी। लोगों के मन में हिंसा और अहिंसा के बीच का फर्क धुंधला हो गया और उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मौका मिला जो कभी अहिंसा में विश्वास नहीं करते थे, कि वे अपने भड़काए गए हिंसक कामों को एक प्रतिरोध आंदोलन में जायज़ व्यवहार बता सकें।

‘भारत छोडो प्रस्ताव भावी आन्दोलन की विस्तृत गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त अस्पष्ट थाआंदोलन का अहिंसक चरित्र खत्म होने लगा। आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व से वंचित था। फलतः जनता ने क़ानून को अपने हाथ में ले लिया। भीड़ अदालतों, थानों, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों और अँग्रेज़ी सरकार के अन्य प्रतीकों पर हमले करने लगी। ब्रिटिश राज्य से संबंधित इन संस्थाओं को जलाया जाने लगा। रेल की पटरियां उखाड़ दी गईं। टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिए गए। इस व्यापक विस्फोट का कारण यह था कि अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर दमन की नीति अपना ली थी। ऐसा कोई भी दस्तावेज़ नहीं मिलता जिससे यह साबित हो कि कांग्रेस ने सचमुच हिंसक विद्रोह की योजना बनाई थी। कान्ग्रेस ने केवल ‘तैयार रहने, एकदम संगठित होने, चौकस रहने, किन्तु किसी भी स्थिति में तब तक कार्रवाई न करने’ के लिए कहा था। जिस कार्यक्रम की रूपरेखा दी गई थी उसमें मुख्य रूप से नमक सत्याग्रह, न्यायालयों, स्कूलों और सरकारी नौकरियों का बहिष्कार, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर धरने और लगभग अंतिम चरण में लगानों की नाअदायगी जैसे पारंपरिक गांधीवादी कार्यक्रम ही थे। अतः यह स्पष्ट है कि भड़काने वाली कार्रवाई अंग्रेजों की ओर से ही की गई। अंग्रेजी नौकरशाहों ने समझौते की सभी कोशिशों को विफल कर दिया था और स्पष्ट रूप से वह संघर्ष चाहती थी। अंग्रेजों को इसका परिणाम भुगता पडा। भारत छोडो आन्दोलन ने ऐसा व्यापक रूप धारण कर लिया जिसे लिनलिथगो ने 1857 के बाद का सबसे बड़ा विद्रोह कहा था। आवश्यकता उन गहन कारणों को समझने की है जो लोगों की इस नई मनोवृत्ति के पीछे निहित थे, और जिसे गांधीजी ने बहुत अच्छी तरह से समझ लिया था।

दक्षिण-पूर्वी एशिया में अंग्रेजों की करारी शिकस्त से गोरों की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई थी। इसे भारत के शासकों की नस्लपरस्ती भी बेनकाब हुई थी। दो सड़कें बना दी गईं - भारतीय शरणार्थियों (कालों) के लिए काली सड़क और विशेष रूप से यूरोपीय शरणार्थियों (गोरों) के लिए सफेद सड़क। मलाया, सिंगापुर और बर्मा से पलायन के दौरान यूरोपियों ने यातायात के सभी साधनों को अपने अधिकार में कर लिया था और वहाँ के भारतीय प्रवासियों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जंगल और पहाड़ लांघकर पैदल ही आना पडा। इसके कारण आने वाले प्रवासी लोगों में भयंकर रोष था। वे आशा कर रहे थे कि अंग्रेजों का राज जल्द समाप्त होना चाहिए। इन प्रवासी श्रमिकों ने बिहार और संयुक्त प्रांत के भारत छोडो आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। विदेशों में अंग्रेजों द्वारा अपने हाल पर छोड़ दिए गए और भटकते हुए स्वदेश लौटने वाले भारतीयों को देखकर जनता में रोष भर गया था। रेलगाड़ियों में भर-भरकर बर्मा के मोर्चे से घायल होकर लौटने वाले सिपाहियों को देखकर आम जनता का खून खौल उठा और उनके ह्रदय में अंग्रेजों के प्रति शत्रुता की भावना बढ़ी। वे किसी भी हाल में ब्रिटिश शासन का अंत चाहते थे। भारत में रह रहे सैनिकों का व्यवहार स्थानीय लोगों के प्रति बहुत  दुर्भावना पूर्ण और नस्लभेदी था। विशेषकर बलात्कार की घटना बढ़ी। सामान्य चीजों के दाम आसमान को छू रहे थे। कालाबाजारी और मुनाफाखोरी चरम पर था। देश भयंकर अकाल से ग्रसित था। जनता को लग रहा था कि देश के खाद्यान्न भण्डार को सेना समाप्त किए जा रही थी। जापानी आक्रमण से बचाव के लिए विदेशी सेना असम और बंगाल से भागकर छोटा नागपुर पठार के पीछे छुप रही थी। अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने नावों को ज़ब्त कर लिया था, और बाँध को उड़ा दिया था। इन तरीकों का प्रयोग भड़काने वाला था। मलाया और बर्मा में होने वाले घाटे ने भारतीय बनियों और व्यापारियों की हिला दिया था। ऐसा युद्ध जिससे कोई मुनाफ़ा न हो उन्हें सख्त नापसंद था। ऐसा व्यापारी वर्ग ऐसे आन्दोलन को समर्थन देने के लिए तैयार था जो शीघ्र अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल दे।

ऐसे बहुत से लोग थे जिन्होंने इस आंदोलन के दौरान भी हिंसा का सहारा नहीं लिया। बहुत से ऐसे भी थे जिन्हें लग रहा था कि हिंसक साधनों का प्रयोग परिस्थिति की मांग थी। उनका मानना था कि टेलीग्राफ के तारों का काटना या पुलों को उड़ा देना या रेल की पटरी को उखाड़ देना तब तक अनुचित नहीं है जब तक किसी की जान को ख़तरा नहीं पहुंचता। बिपन चन्द्र मानते हैं, कांग्रेस ने नागरिक अवज्ञा का आवाहन नहीं किया था। अतः अलग-अलग व्यक्तियों ने आक्रोश भरी चुनौती के रूप में जो कार्रवाई शुरू की, वह बढकर एक आन्दोलन में बदल गयी और फिर आन्दोलन ने विद्रोह का रूप ले लिया।

1942 में जो उपद्रव हुए थे, उसके लिए कौन जिम्मेदार है इसपर लंबी चौड़ी बहस चली थी। यह सही है कि गांधीजी ने चौरी-चौरा में हिंसा के मुद्दे पर असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था। लेकिन तब वह जेल में नहीं थे, और आन्दोलन को अपने नेतृत्व में चला रहे थे। इस बार आन्दोलन शुरू होने के पहले ही अंग्रेजों ने उन्हें और कांग्रेस के हर बड़े नेता को गिरफ्तार कर जेल में डाल कर नज़रबंद कर दिया था। जनता से उनका कोई संपर्क नहीं रहा ब्रिटिश सरकार और भारत-सरकार ने देश में फैली हिंसा के लिए कांग्रेस और गांधीजी को दोषी ठहराया। चर्चिल ने हाउस ऑफ कामंस में कहा था, कांग्रेस ने अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधीजी सिद्धांत के रूप में अपनाते रहे हैं, त्याग दिया है। सरकार द्वारा देश में यह प्रचार किया जाता रहा कि जितनी भी तोड़-फोड़ हो रही है वह कांग्रेस नेताओं द्वारा तैयार किए गए षड्यंत्र का परिणाम है। आंदोलन में हिंसा को प्रोत्साहन देने और किसी षड्यंत्र में उनका या उनके सहयोगियों का हाथ होने के आरोप को उन्होंने बिलकुल ही गलत बताया और नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारी के द्वारा संकट को गहरा करने के लिए उलटे सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। गांधीजी अभी महासमिति को अपनी पूरी योजना समझा भी नहीं पाए थे कि सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वायसराय लिनलिथगो ने  तो गांधीजी की अहिंसा में आस्था और उनकी ईमानदारी में ही संदेह प्रकट कर दिया था। सरकार द्वारा गांधीजी पर लगातार दबाव डाला जा रहा था कि वे भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान हो रही हिंसा की भर्त्सना करें। लेकिन गांधीजी का कहना था कि इस हिंसा के लिए सरकार ही जिम्मेदार है। गांधीजी ने वायसराय से इसका विरोध करते हुए कहा, यह सत्य की हत्या है। वायसराय ने अन्यायपूर्ण ढंग से मुझे यह अधिकार देने से इंकार कर दिया कि मैं उनसे मिलूं और ख़ुद अपनी बात रख सकूं। बल्कि सरकार ने अंधाधुंध गिरफ़्तारी करके संकट को गहराया है। जानबूझकर वायसराय ने जनता को मेरे अहिंसक मार्गदर्शन से वंचित करके हिंसा पर उतारू बना दिया है। यदि मैं या मेरे अन्य प्रमुख कांग्रेसी नेता जेल के बाहर होते तो आंदोलन का रुख ऐसा न होता। सच तो यह था कि वायसराय ने गांधीजी से मिलने से इंकार कर दिया था ताकि वह अपनी बातें उसके सामने न रख सकें, दूसरे उन्हें नज़रबंद करके आगाखां महल में रखा गया था, जिससे जनता उनके अहिंसक मार्गदर्शन से वंचित हो गई थी और हिंसा पर उतारू हो गई थी। गांधीजी ने कहा भी था कि यदि वह गिरफ़्तार नहीं हुए होते, तो आंदोलन का दूसरा रूप होता। यदि वे बाहर होते, और आंदोलन हिंसात्मक रूप धारण कर लिया होता, तो वह उसे रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ति, यहां तक कि प्राणों की बाज़ी भी लगा देते। लिनलिथगो ने गांधीजी को पत्र लिख कर कहा, मुझे इस बात का दुःख है कि हिंसा की भर्त्सना करते हुए आपने लोगों से एक शब्द भी नहीं कहा है। गांधीजी ने लिनलिथगो को ज़वाब दिया, देश में हो रही घटनाओं से मैं दुखी हूँ, लेकिन मुझे जिस हाल में रखा गया है, उसमें मैं लोगों को न तो प्रभावित कर सकता हूँ और न ही नियंत्रित। सारा दोष तो भारत सरकार का ही है। हिंसा की निंदा करने से गांधीजी कभी भी झिझके नहीं। इस मामले में वह ऐसा नहीं करना चाहते थे। इसका कारण यह था कि उनके सामने घटनाओं का ‘इकतरफा पक्ष ही रखा जाता था। सत्य का स्वयं पता लगाने का उनके पास कोई साधन नहीं था। बाद में जब उन्हें समाचार पत्र मिलना शुरू हुआ तो उन्हें पता चला कि दिल्ली और लन्दन दोनों की अंग्रेजी सरकारें तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने और मिथ्यारोपण में लगी हुई थी। सारा दोष गांधीजी के ऊपर मढा जा रहा था। इस दुष्प्रचार से वह बहुत अप्रसन्न थे। उन्होंने लोगों की हिंसा की निंदा करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने इसे राज्य की बहुत बड़ी हिंसा की प्रतिक्रिया के रूप में देखा। फ्रांसिस हचिंस के विचार में, हिंसा पर गांधीजी की मुख्य आपत्ति यह थी कि इसका इस्तेमाल किसी आंदोलन में बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी को रोकता है, लेकिन 1942 में, गांधीजी इस विचार पर आ गए थे कि हिंसा के कारण बड़े पैमाने पर लोगों की भागीदारी सीमित नहीं होगी।

सरकार द्वारा अपने ऊपर लगाए गए लांछन, भीषण असत्य, अनाचार और आतंक के प्रतिरोध में बापू ने आगाखां महल में इक्कीस दिन के उपवास का निश्चय किया। उन्होंने वायसराय को लिखा, देशभर में हो रही हिंसा से मुझे बहुत कष्ट हो रहा है। अगर अपने कष्ट के लिए एक राहत देने वाला मरहम मैं नहीं पा सकता, तो मुझे एक सत्याग्रही के लिए निर्धारित नियम का सहारा लेना होगा। मैं अपनी क्षमता के अनुसार इक्कीस दिनों के अनशन का व्रत रखने जा रहा हूं। गांधीजी के इस ऐलान से लिनलिथगो तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने चुटकी लेते हुए कहा, मैं राजनीतिक उद्देश्यों के लिए व्रत के उपयोग को एक प्रकार का राजनीतिक ब्लैकमेल समझता हूं जिसका कोई नैतिक औचित्य नहीं है। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। शरीर उस महाकष्ट को सहने लायक नहीं था। फिर भी बापू ने उपवास रखा। यह अनशन 10 फरवरी, 1943 को शुरू हुआ। उन्होंने घोषणा की कि यह उपवास 21 दिनों तक चलेगा। उस समय वे 74 वर्ष के थे। 21 दिनों तक उन्होंने अन्न का स्पर्श भी नहीं किया। लेकिन लिनलिथगो टस से मस नहीं हुआ। बल्कि उसने गांधीजी के उपवास को ‘राजनीतिक धौंस’ कहा। विस्टन चर्चिल ने कहा, जब दुनिया में हम हर कहीं जीत रहे हैं, ऐसे वक़्त में हम एक कमबख़्त बुड्ढ़े के सामने कैसे झुक सकते हैं, जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा है। गांधीजी 21 दिनों तक चलने वाले इस दैहिक कष्ट को भी झेल गए और 2 मार्च को उन्होंने अपना 21 दिनों का उपवास पूरा किया। उनके इस महा उपवास से जनसाधारण का मनोबल ऊंचा हुआ। ब्रिटिश विरोधी भावनाओं में उभार आया। सारी दुनिया के सामने यह उजागर हो गया कि सरकारी दमन के तौर-तरीक़े कितने कठोर हैं। सबके सामने यह साबित हो गया कि ग़लती सरकार की ही है। उपर्युक्त विवेचनों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि गांधीजी न तो अहिंसा के प्रभावशाली होने के विश्वास को खो रहे थे और न ही इसके पथ से अलग होने को सोच रहे थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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