गुरुवार, 6 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-6

                    महात्मा गांधी हत्या केस-6



भारत का विभाजन

विभाजन हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम था। भारत के विभाजन के लिए सामान्यतः अंग्रेज़ी सरकार, गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मुहम्मद अली जिन्ना को दोषी ठहराया जाता है। किंतु यह भी सत्य है कि भारत की एकता बनाए रखने के लिए यथासंभव प्रयास किए गए। वे विफल हो गए। इसके लिए किसी एक पक्ष या किसी एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भारत का विभाजन एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम था। इसके लिए न तो अंग्रेज़ी राज, न जिन्ना, न कांग्रेस, और न ही गांधी, नेहरू, पटेल या सांप्रदायिकता की भावना अकेले उत्तरदायी थी। इस सभी ने चाहे-अनचाहे विभाजन की प्रक्रिया में सहयोग दिया। जिन्ना की नए राष्ट्र की लालसा और नेहरू पटेल द्वारा भारत को शीघ्र अंग्रेज़ी राज से मुक्त कराने की प्रबल उत्कंठा ने अंततः 14-15 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और भारत का निर्माण कर दिया। भारत दो हिस्सों में बंट गया।

1857 की क्रान्ति में हिन्दू-मुस्लिम साथ मिकर ड़े थे। तब हिन्दू-मुस्लिम में फूट डाकर अपने साम्राज्य की नींव पक्की करने की नीति अंग्रेजों ने अपनायी और लॉर्ड जन ने 1905 में बंगा का विभाजन किया। लेकिन उस समय ‘फूट डालो और राज करो' नीति कारगर न हो पायी। हिन्दू-मुस्लिम हाथ में हाथ डा कन्धे से कन्धा मिलाकर अंग्रेजों के विरोध में खड़े हुए और विभाजन रद्द करवाया। यह देखकर अंग्रेजों ने सोचा कि साम्राज्य बचाये रखने के लिए दोनों में फूट डाने की नीति आगे बढ़ाना आवश्यक है

कांग्रेस के जिम्मे यह काम था कि वह विभिन्न वर्गों, समुदायों, समूहों और अंचलों को एक राष्ट्र के ढांचे में लाये। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस इस राष्ट्र-निर्माण के काम को पूरा नहीं कर सकी। खासकर मुसलमानों  को राष्ट्र के साथ नहीं जोड़ सकी। दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासक हिटलर के ख़िलाफ़ तो युद्ध जीत गए लेकिन भारतीय मोरचे पर हार गए थे। भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र काफी बड़ा हो चुका था। आज़ाद हिंद फौज के मुकदमों के कारण राष्ट्रीय चेतना का विस्तार आन्दोलन की मुख्यधारा के बाहर के लोगों तक हो चुका था। यहां तक कि सेना और नौसेना के ने भी ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ विद्रोह का तेवर दिखाया दिया था। इन सब से ब्रिटिश अधिकारियों का मनोबल गिरता जा रहा था। राष्ट्रीय आन्दोलन ने साम्राज्यवाद के असर का ख़ात्मा कर दिया था। औपनिवेशिक शासन का सामाजिक आधार सिमट रहा था। सरकार परस्त अधिकारी ब्रिटिश राज से बाहर निकल रहे थे। भारतीय सिविल सेवा में ब्रिटिश वर्चस्व समाप्त हो चुका था। सामूहिक अहिंसक कार्रवाइयों के द्वारा सत्ता का भय ख़त्म हो चुका था। कांग्रेस की सरकारों ने लोगों में आत्मविश्वास का संचार भी किया था। यह बात जब ब्रिटिश सत्ता को समझ में आ गई तो उन्होंने यह मान लिया कि अब सत्ता का हस्तांतरण तथा भारत की स्वतंत्रता का समय आ गया है। हां यह निर्णय ज़रूर उन्होंने लिया कि ब्रिटेन के साथ रिश्ता क्या होगा, इस बारे में समझौता कर सम्मानपूर्वक भारत छोड़ दिया जाए।

समझौते के लिए कांग्रेस भी उत्सुक थी। बड़े आन्दोलन की तैयारी का प्रदर्शन कर वह सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहती थी। इधर सितम्बर 1946 के बाद से ब्रिटिश सरकार ने ‘अल्पमत को बहुमत की प्रगति रोकने की छूट नहीं देने’ की नीति अपना ली थी। लीग की इस मांग को परे कर दिया गया कि लीग की मंज़ूरी के बिना कोई भी समझौता नहीं होगा। ब्रिटिश सरकार ने भारत को आज़ादी देने का निर्णय कर लिया था और ब्रिटिश सरकार का हित इसी में था कि भारत अखंड रहे। लेकिन जिस जिन्ना को और उसके मुसलिम लीग को इतने वर्षों से संरक्षण दे कर खड़ा किया था, वह अखंड भारत कहां स्वीकार करने वाला था। वह पूरी ताकत के साथ विभाजन के लिए अड़ गया। कांग्रेस यह कहती रही कि अगर विभाजन होना भी है तो वह आज़ादी के बाद होना चाहिए। जिन्ना ने सीधी कार्रवाई घोषित कर दी। लीग अंतरिम सरकार में शामिल हो कर भी सरकार की गतिविधियों में अड़ंगे डालती रही। जिन्ना को सिर्फ़ ताक़त चाहिए थी, वह भी सरकार को तोड़ने के लिए। उसका मानना था कि अगर पाकिस्तान चाहिए तो सरकार में हिस्सेदारी ज़रूरी है। लीग ने संविधान सभा में शामिल होने से इंकार कर दिया। नेहरू ने वायसराय से कहा कि लीग या तो कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करे या सरकार से बाहर हो जाए।

उधर एटली ने घोषणा कर दी कि जून 1948 तक ब्रिटिश सरकार भारत को आज़ाद कर देगी। माउंटबेटन ने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि कांग्रेस और लीग किन बातों पर एक हो सकती है। माउंटबेटन ने जो योजना तैयार की वह यह थी कि भारत को दोहरी डोमिनियन हैसियत प्रदान करना और 15 अगस्त 1947 तक सत्ता का हस्तांतरण। यह स्थिति लॉर्ड माउंटबेटन की उत्पन्न की हुई थी।  उस समय की परिस्थिति में सरकार को कामकाज करने देने का एकमात्र वैकल्पिक हल गांधीजी की योजना को स्वीकार करना था। परन्तु अंग्रेज़, लीग और कांग्रेस तीनों ने इसे नहीं माना। माउंटबेटन को लगा कि मौजूदा परिस्थिति में सबसे अच्छा काम वह यही कर सकता कि भारतीय दलों को किसी न किसी तरह सहमत करके ख़ुद को मिले हुए आदेश के अनुसार सत्ता को जल्दी हस्तांतरित कर दे। इसमें उसे सफलता भी मिली। कुछ लोग इसे माउंटबेटन की कूटनीति की विजय मानते हैं। लेकिन क्या यह उसके मिशन की भी जीत थी?

ब्रिटिश सरकार अपने ही बनाए जाल में फंस गई थी। जिन्ना की बात को उसे मंज़ूर करना पड़ा। नेहरू और पटेल ने कांग्रेस कार्य समिति में 3 जून की योजना की वकालत की। सभा में प्रस्ताव पारित हो गया और कांग्रेस ने भी विभाजन मंज़ूर कर लिया। कांग्रेस ने गांधीजी की सलाह की उपेक्षा कर दी। गांधीजी के लिए यह असह्य था। नेहरू, पटेल और गांधीजी के सामने विभाजन स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। कांग्रेस मुस्लिम जनसमूह को राष्ट्रीय आन्दोलन में नहीं खींच सकी थी। मुस्लिम साम्प्रदायिकता को रोकने में वे सफल सिद्ध नहीं हुए थे। कलकत्ता, रावलपिंडी, नोआखाली और बिहार के साम्प्रदायिक दंगों के फूट पड़ने से स्थिति और भी हाथ से बाहर चली गई थी। कांग्रेस के नेताओं को लग रहा था कि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद इस पर काबू पाया जा सके। अंतरिम सरकार अपंग हो चुकी थी। बंगाल और पंजाब में तो ऐसा लग रहा था जैसे पाकिस्तान की सरकार काम कर रही हो। प्रांतीय सरकारों की निष्क्रियता और लीगी मंत्रियों की अड़ंगेबाज़ी से त्रस्त नेहरू को लगने लगा था कि सत्ता में बने रहने का औचित्य क्या है? यदि सत्ता का हस्तांतरण हो जाए तो शायद परिस्थितियों पर नियंत्रण आसान हो जाए।

दो डोमिनियन राज्यों की योजना स्वीकार कर ली गई। इससे एक फायदा तो यह निश्चय ही हुआ था कि विखंडीकरण पर अंकुश लगा और रियायतों को इस या उस देश में शामिल होना पड़ा। प्रांतों का समूहीकरण किया जाने वाला प्रस्ताव भी कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया। अधिकारिक तौर पर विभाजन की बात भी कांग्रेस ने मान ली। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत को पाकिस्तान का अंग मान लिया गया। घटनाएं तेज़ी से घटित हो रही थीं। अंग्रेज़ों ने जो दो ब्रह्मास्त्र अंत तक अपने हाथ में रखा हुआ था, उसका उन्होंने बहुत ही सफलता से उपयोग किया और भारतीय नेताओं को शीघ्र सत्ता हस्तांतरण के लिए एकता का बलिदान भी क़ुबूल हुआ। एक अस्त्र था सुरक्षित अधिकारों और नौकरशाहों पर नियंत्रण का और दूसरा अस्त्र था देशी राज्यों के संबंध में उनकी सार्वभौम सत्ता। कांग्रेसियों ने अंतिम उपाय के रूप में विभाजन को स्वीकार किया। उस समय वे ऐसी हालत में पहुंच गए थे कि उसे स्वीकार न करते, तो सब कुछ उनके हाथ से निकल जाता।

कुछ लोग इस विवाद को तूल देते हैं कि यदि 1937-39 के दौरान जिन्ना के साथ समझौता कर लिया जाता और 1937 में युक्तप्रांत में कांग्रेस और लीग का मंत्रिमंडल बन जाता, तो सांप्रदायिकता की समस्या ख़त्म हो जाती। ऐसे लोगों को मानना है कि जिन्ना की कुंठित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने ही उसे अलगाववाद की ओर मोड़ दिया। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि कुंठित किए जाने के पहले ही जिन्ना संप्रदायवादी हो चुका था। 1937 से 39 तक कांग्रेस के नेताओं ने उससे बातचीत और समझौता करने की बहुत कोशिश की। लेकिन जिन्ना के पास ऐसी कोई मांग ही नहीं थी जिसपर तर्कपूर्ण विचार किया जा सके। जिन्ना ने ऐसा कोई प्रस्ताव भी नहीं रखा कि कांग्रेस उसकी कौन-कौन सी बात मान ले, ताकि वह कांग्रेस के साम्राज्यवादी विरोध के संघर्ष में शामिल हो जाए। वह तो सिर्फ़ यह कहता रहा कि कांग्रेस अपना धर्मनिरपेक्षवादी चरित्र छोड़ दे और ख़ुद को हिंदू संगठन घोषित कर दे और लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मान ले। इस शर्त को स्वीकार करना कांग्रेस के लिए असंभव था। राजेन्द्र प्रसाद के शब्दों में कांग्रेस द्वारा इसे मान लेना कांग्रेस के लिए अपने अतीत को अस्वीकार करने और अपने भविष्य के साथ विश्वासघात करने के बराबर होता। दरअसल जिन्ना ऐसे शर्त रख रहा था जो सांप्रदायिक राजनीति से परिचालित हो रहे थे, जैसे पाकिस्तान की मांग। सांप्रदायिक राजनीति का परित्याग उसे मंज़ूर नहीं था।

ब्रिटिश सत्ता भारत में न ख़ुद शासन करती थी, न दूसरों को करने देती थी। मुसलिम लीग के नामजद प्रतिनिधियों के अन्तरिम सरकार में बने रहने के सवाल का कभी ईमानदारी से सामना नहीं किया गया। लीग को मंत्रिमंडल में शामिल करने के पहले ही जिन्ना मुसलमानों को ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस से अलग तीसरा पक्ष घोषित कर चुका था। लीग को सरकार में शामिल करने का मतलब होता कि कांग्रेस सभी भारतीयों की ओर से बोलने का अधिकार खो देती। यह तो राष्ट्रवादी मुसलमानों के साथ विश्वासघात होता। उसपर से लीग युक्तप्रांत विधानसभा के उपचुनाव में  ‘इसलाम ख़तरे में है’ का नारा लगा चुकी थी। जिन्ना ने ख़ुद अल्लाह और क़ुरान के नाम पर वोट देने की अपील की थी। सिर्फ़ दो सीट उसे एक प्रांतीय मंत्रिमंडल में नहीं मिली थी, और वह सांप्रदायिक घृणा फैला रहा था। ऐसे नेता को कब तक संतुष्ट रखा जा सकता था। सांप्रदायिक विचारधारा को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता। इसका मुक़ाबला किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया जा सका। 1942 से 1946 तक इस उम्मीद में कि उसके बेहतर लोग साथ आ जाएं, मुसलिम लीग को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन हुआ उलटा। इस दौरान सांप्रदायिकता से राष्ट्रवादी हिन्दू और मुसलमान दोनों संघर्ष कर रहे थे। नरमपंथी संप्रदायवादी कट्टर और घृणावादी सम्प्रदायियों का विरोध नहीं कर सके।

कुछ लोग कहते हैं कि कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार करके ग़लती की। सांप्रदायिकता के मामले में यह उसकी असफलता थी। लेकिन उस वक़्त शायद इसके अलावा कोई विकल्प था भी नहीं। उस समय तक सांप्रदायिकता ने काफी दूरी तय कर ली थी। लंदन की रॉयल एम्पायर सोसायटी के भाषण में लॉर्ड इस्मे ने स्वीकार किया कि भारत आने के पहले उसका यह ख़्याल था कि अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने की क्रिया पूरी करने के लिए जून 1948 की अन्तिम तिथि ‘अत्यधिक जल्दी’ रख दी गई है, परन्तु भारत पहुंचने पर उसका यह विचार होने लगा कि वह तारीख़ ‘अत्यधिक विलम्बशाली’ है। दिल्ली और प्रांतों की राजधानियों में साम्प्रदायिक कटुता इतनी अधिक तीव्र हो गई थी जिसकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। अगर विभाजन स्वीकार न किया जाता तो शायद देश गृहयुद्ध में चला जाता। ऐसी परिस्थिति में पुलिस और सेना की सहायता लेनी होती, और उन पर उस समय विदेशी शासकों का नियंत्रण था। इसलिए विभाजन को रोकने का उस समय कोई तात्कालिक समाधान उपलब्ध था भी नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि सांप्रदायिकता का कोई तात्कालिक समाधान होता ही नहीं। अनेक दशकों तक समाधान की दिशा में काम करना होता है। राष्ट्रीय आंदोलन ने इस दिशा में काम नहीं किया। उन्हें राष्ट्रवाद की सामाजिक-आर्थिक जड़ों में जाना चाहिए थी। सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरुद्ध और उसके वैचारिक आधार पर विचारधारात्मक-राजनीतिक संघर्ष चलाना चाहिए था। कांग्रेस ने सांप्रदायिक नेताओं से बातचीत पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा किया। सांप्रदायिकता का मुक़ाबला करने के लिए विचारधारात्मक और सांस्कृतिक स्तरों पर कोई दीर्घकालिक रणनीति विकसित नहीं हो पाई।

ख़ैर, स्थिति ऐसी हो गई थी कि जिसमें दोनों पक्ष ऐसी योजना मानने के लिए तैयार हो गए, जिसे वे नापसंद करते थे, जिन्ना को ‘कीड़ों का खाया हुआ, विकलांग पाकिस्तान’ मिला, तो कांग्रेस को विभाजित भारत। फिर भी दोनों ही पक्ष इसका प्रतिकार करने की स्थिति में नहीं थे। भारत का विभाजन उन लोगों की अनुमति, सहमति से हुआ, जिन्होंने यह कहकर विभाजन की निन्दा की थी कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हित में भारत को बंटा हुआ और कमज़ोर रखने की एक चाल है।

ऐसा नहीं है कि अगर गांधीजी नहीं होते तो ब्रिटिश राज सदा सदा के लिए टिका रहता। राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई गांधीजी के 1915 से भारत में सक्रिय होने के आधी शताब्दी पहले से चल रही थी। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि गांधीजी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को तीन विशिष्ट गुणों से अनोखा बनाया था। पहला- गांधीजी ने स्वराज को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की तार्किक परिणीति के रूप में न सिर्फ प्रचारित किया बल्कि कठिन मौकों पर अलोकप्रिय निर्णय लेकर अहिंसा और सत्याग्रह के मूल को गांव-गांव तक स्थापित किया। इससे जनसाधारण का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करना सहज हो गया। दूसरा- गांधीजी ने स्वराज की राजनीतिक और सामाजिक परिभाषा के बीच के पुराने द्वंद्व को लगभग ख़त्म किया। आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वराज को एक ही भवन के चार स्तंभ के रूप में प्रचारित किया। रचनात्मक कार्यक्रमों के ज़रिए आम लोगों के बीच में एक जीवनशैली के रूप में और सांस्कृतिक क्रांति के रूप में स्थापित किया। तीसरा- गांधीजी ने अपनी कथनी और करनी में एकता, निजी और सार्वजनिक जीवन की एकरूपता के जरिए आश्रमों से शुरू करके जनआंदोलन तक हिंदू-मुस्लिम दूरी, छुआछूत की बीमारी और औरतों को सार्वजनिक भूमिकाओं से दूर रखने की मर्दवादी परंपरा का विमूलन किया। अब अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी का नेतृत्व एक प्रकार से अहिंसक और नैतिक आधारों पर भारतीय समाज और राष्ट्रीयता के नवनिर्माण की कोशिश थी। 

भारत में ब्रिटिश सत्ता का चरित्र अर्द्ध-लोकतांत्रिक था। वह न्याय, आधुनिकता, यूरोपीय सभ्यता की श्रेष्ठता आदि कुछ ख़ास विचारों के आधार पर अपना नैतिक औचित्य स्थापित करती थी। लेकिन उसका टिकाव तो मुख्यतः पाशविक बल पर ही था। राष्ट्रीय आंदोलन ने लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाया। उसने ब्रिटिश सता के मानवीय दावों का पर्दाफ़ाश भी किया। अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अहिंसक संघर्ष का सहारा लिया। औपनिवेशिक विधायिकाओं का इस्तेमाल किया गया। संघर्ष-तैयारी-संघर्ष की अनोखी रणनीति का सहारा लिया गया। राष्ट्रवादी रणनीति ब्रिटिश शासन की खास प्रकृति के अनुसार विकसित हुई। उनकी सत्ता संरक्षण और निरंकुशतावाद के मिश्रण से तैयार स्तंभ पर टिकी हुई थी। इस सत्ता की स्थापना शक्ति द्वारा हुई थी। इसका विकास और स्थायित्व भी शक्ति द्वारा ही हुआ। यहां तक शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन करने के लिए भी शक्ति का ही सहारा लिया जाता था। कुछ नागरिक संस्थानों, जैसे स्कूल, कॉलेज, न्यायालय, विधायिकाओं की भी उसने रचना की। जब आंदोलन स्थगित रहता तो लोगों को कुछ नागरिक अधिकार भी दे दिए जाते। दमन के समय भी कुछ नागरिक संहिताओं का पालन किया जाता। इस तरह ब्रिटिश शासन का निरंकुशतावादी और लोकतांत्रिक चरित्र साथ-साथ चलता रहा। भय और प्रलोभन दोनों का उसने सहारा लिया। उसने यह धारणा फैला रखी थी कि वे भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास कर उसे आधुनिक बना रहे हैं। साथ ही यह भी ज़ाहिर कर रखा था कि वे अपराजेय हैं और उनका विरोध करना बेकार है।

उपरोक्त वर्णित सारे पहलुओं का ध्यान में रख भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति तैयार की गई। इसी के आधार पर वर्चस्व के दीर्घकालीन संघर्ष की योजना तैयार की गई। इस संघर्ष में आम जनता के दिलों को जीतने का प्रयत्न किया गया। इसका प्रभाव हर संघर्ष के बाद बढ़ता गया। अधिकांश समय क़ानून सम्मत तरीक़ों से संघर्ष किया गया, ज़रूरत पड़ने पर जनसंघर्ष के लिए क़ानून तोड़ा भी गया। इससे राष्ट्रीय आंदोलन और मज़बूत हुआ। सक्रिय संघर्ष का लक्ष्य औपनिवेशिक शासकों के हाथ से सत्ता छीन लेना था। गांधीजी ने जनसाधारण को सक्रिय राजनीति में लाने का काम किया, जिन्हें अंग्रेज़ों ने बख़ूबी रणनीति बना कर जनता को सुषुप्ति की अवस्था में रखा था। इसके अलावा गांधीजी ने इन धारणाओं का खंडन भी करने का महत्वपूर्ण काम किया कि ब्रिटिश सत्ता भारत की शुभचिंतक है और वह अपराजेय भी है। सिविल नाफ़रमानी आंदोलन ने लोगों को निर्भीक और साहसी बनाया। उसमें संघर्ष और त्याग करने की क्षमता पैदा हुई। लोगों में यह विश्वास आया कि उनकी सहमति के बिना यहां शासन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने अगला लक्ष्य निर्धारित किया कि प्रशासनिक वर्ग पर ब्रिटिश शासन की पकड़ कमज़ोर हो। इसकी पूर्ति के लिए नौकरशाहों और फौज के लोगों को राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में लाया गया। 1945 के बाद पुलिस, सेना और नौकरशाहों में ब्रिटिश सत्ता के प्रति वफ़ादारी लगभग ख़त्म हो चुकी थी। जनता के बीच भारत का पक्ष रखकर औपनिवेशिक विचारधारा के वर्चस्व को कमज़ोर करने का लगातार प्रयास किया जाता रहा। इसके अलावा अर्द्ध-लोकतांत्रिक स्वाधीनताओं के नाम पर जो भी रियायतें मिली, उसके विस्तार के लिए लगातार कोशिश की गई। इसमें जनमत  का भी भरपूर सहयोग मिला।

राष्ट्रवादियों द्वारा ब्रिटिश वर्चस्व को समाप्त करने के लिए दीर्घकालीन संघर्ष की रणनीति अपनाई गई। इस रणनीति को अंजाम देने के लिए संघर्ष-तैयारी-संघर्ष के मार्ग पर चला गया। पहले संवैधानिक तरीक़ों से सशक्त आंदोलन चलाए जाते, फिर खुली मुठभेड़ का रास्ता छोड़ दिया जाता। फिर दी गई रियायतों को अपर्याप्त बता कर कुछ और रियायतें हासिल की जातीं। शांति के दौर में उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करते हुए गहन राजनीतिक-वैचारिक काम किया जाता। पहले ज़्यादा प्रभावशाली आंदोलन छेड़ने के लिए ताकत संजोयी जाती। इस रणनीति की पराकाष्ठा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के रूप में हुई, जब सत्ता हस्तांतरण का समझौता हुआ। इस तरह हर दौर का इस्तेमाल औपनिवेशिक वर्चस्व को ख़त्म करने, राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने और उन्हें राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने एवं लोगों में संघर्ष की क्षमता पैदा करने के लिए किया गया। इस रणनीति से स्वतंत्रता आंदोलन लगातार ऊपर की ओर उठता रहा। आंदोलन को सुधारों तक ही सीमित नहीं रखा गया। संवैधानिक सुधारों को भी औपनिवेशिक व्यवस्था का ही अंग मानकर देखा गया। जब तक आज़ादी पूरी नहीं मिली तबतक यह मानकर चला गया कि वह मिली ही नहीं है। जब जनआंदोलन नहीं होते तब भी उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक संघर्ष ज़ारी रहता। सिर्फ़ संघर्ष का रूप बदल जाता। जनजागरण और रचनात्मक काम ज़ारी रहता। गांधीजी ने कहा था, सिविल नाफ़रमानी रोकने का मतलब यह नहीं है कि युद्ध थम गया है। युद्ध तो तभी थमेगा, जब भारत में उसका अपना बनाया हुआ संविधान लागू होगा।

एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्त होने तक लगातार नहीं चल सकता था? क्या अगर ऐसा होता, तो स्वतंत्रता जल्द नहीं प्राप्त कर ली जाती? गांधीजी के नेतृत्व के दौर में यह मानकर चला जा रहा था कि जनांदोलन का चरित्र ही ऐसा होता है कि उसे अनिश्चित काल तक लगातार नहीं चलाया जा सकता। दो आंदोलनों के बीच विश्राम और तैयारी का समय होना ही चाहिए। आंदोलन जनता से चलते थे। कुछ समय के बाद जनता थक जाती थी। जनता में दमन को सहने की क्षमता असीमित नहीं थी। कष्ट सहने के बाद लोग विश्रांति चाहते हैं, ताकि नए जोश के साथ फिर आगे बढ़ सकें। इसलिए नेतृत्व ने ज़रूरत से ज़्यादा उन पर दबाव नहीं डाला। औपनिवेशिक सत्ता के पास आंदोलनों को नष्ट करने की प्रचंड क्षमता थी। उस पर आघात करने की क्षमता तो जनता के बीच से ही आनी थी। इसलिए राजनीतिक कौशल इसी में थी कि औपनिवेशिक राज्य से टकराने के बाद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संघर्ष का दौर चलाया जाए। इस प्रकार गांधीजी ने अपनी रणनीति में जनता और सरकार दोनों की सीमाओं को समझा और उसी के अनुसार संघर्ष का कार्यक्रम बनाया। 1938 में गांधीजी ने लिखा था, चतुर सेनापति अपने पांव उखड़ने तक इंतज़ार नहीं करता, जब वह समझ जाता है कि किसी खास मोरचे पर वह और अधिक देर तक नहीं टिक सकता, तो वह वहां से सामान्य तरीक़े से हट जाता है। आंदोलन कब शुरू करना है और कब उसे वापस लेना है, इस अतिमहत्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय गांधीजी और कुछ प्रमुख नेता इस विषय पर मूल्यांकन करने के बाद लेते थे कि आंदोलन की ताक़त और कमज़ोरी क्या-क्या है। लोग कितनी देर तक साथ देंगे। सरकार की तैयारी कैसी है। इसी तरह वे यह देखते थे कि सरकार से बातचीत करने का उचित समय है या नहीं। अतः गांधीजी और कांग्रेस की नीति रही कि जब संभव हो, तब बातचीत और समझौता और जब ज़रूरी हो, तब असहयोग और सीधी कार्रवाई। इन सबके बीच रचनात्मक कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खादी, कताई, ग्रामोद्योग का प्रसार, राष्ट्रीय शिक्षा, हिन्दू-मुसलिम एकता, अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ संघर्ष, हरिजनों की सामाजिक स्थिति में सुधार, विदेशी वस्त्र और शराब का बहिष्कार, आदि महत्वपूर्ण कार्य थे। इन कामों के सुचारू रूप से चलाने के लिए आश्रम मुख्यतः गांवों में बनाए जाते थे। आंदोलन की वापसी के बाद जो शून्य पैदा होता था, उसे भरने में इन रचनात्मक कार्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सक्रिय जन-आंदोलन के दौर में जो सक्रिय और उत्साहित कार्यकर्ता होते थे, उन्हें ये रचनात्मक कार्य हतोत्साहित और अवसादग्रस्त होने से बचाते थे। रचनात्मक कार्य में लाखों लोगों को समाहित किया जा सकता था। जो रचनात्मक कार्य से जुड़ जाते, वे ही आगे चलकर सिविल नाफ़रमानी के आंदोलन में शरीक होते।

राष्ट्रीय आंदोलन की चुनौती का सामना करने के लिए औपनिवेशिक सत्ता ने संवैधानिक सुधार और विधायिकाओं का सहारा लिया। उन्हें आशा थी कि संसदीय प्रक्रिया राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा करेगी। राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने इसका लाभ भी उठाया और इसका विरोध भी किया। संवैधानिक सुधारों को भारत की कसौटी पर कसा जाता। जब भी उपनिवेशवाद थोड़ी-सी भी राजनीतिक ज़मीन छोड़ने के लिए बाध्य होता था, तो राष्ट्रवादी उस पर तुरंत क़ब्ज़ा जमा लेते, ताकि उनके विरोध के संघर्ष को और तेज़ किया जा सके। सुधारों को इस तरह लागू किया जाता कि उपनिवेशवादियों के मंसूबे पूरे न हो पाएं। चुनी गई सरकारों का उपयोग इस तरह किया जाता कि कठिनाइयों से घिरी जनता को राहत पहुंचे। लोगों में स्वशासन की क्षमता पर विश्वास पैदा हुआ। राष्ट्रीय आंदोलन की प्रतिष्ठा बढ़ी। जो लोग विधायिकाओं और नगरपालिकाओं के माध्यम से काम कर रहे थे, उन लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का अंग होने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज़ी हुक़ूमत की चालों को उन्होंने उजागर किया। जब भी जनांदोलन में उभार आता वे विधायिकाओं का परित्याग भी कर देते और औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध संघर्ष करते।

गांधीजी ने अहिंसा का सिद्धांत अपनाया। इस समय के अधिकांश नेताओं ने इस नीति का अनुपालन किया। अहिंसा कांग्रेस की समग्र रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग थी। राष्ट्रीय आंदोलन को अहिंसा सूट भी बहुत हुई। अहिंसक संघर्षों के कारण अधिक-से-अधिक जनता इसमें शामिल हुई। स्त्रियों का इसमें शामिल होना बहुत बड़ी मिसाल थी। अहिंसा संघर्ष को एक नैतिक आधार देती थी। जब अंग्रेज़ शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हिंसक हथियारों का प्रयोग किया जाता तो ब्रिटिश सत्ता की वास्तविकता सामने आ जाती। यह शासकों के लिए समस्या का कारण बनती। और अगर शासक कोई कार्रवाई न करता तो इससे यह साबित होता कि ब्रिटिश सरकार में शासन चलाने की क्षमता ही नहीं है। अतः औपनिवेशिक शासकों के लिए एक तरफ कुंआ तो दूसरी तरफ़ खाई वाली स्थिति बनी रहती। दो विकल्पों के बीच वे दमन का सहारा लेते और इसमें उनकी नैतिक हार होती। प्रतिष्ठा के इस युद्ध में अहिंसा ने भारतीयों को राजनीतिक शक्ति दी, जिससे वे सशस्त्र औपनिवेशिक सत्ता का मुक़ाबला कर सके। इस तरह इस अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम ने विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण जगह दर्ज़ कर लिया। यह राजनीतिक लड़ाई लंबी, ज़रूर थी, पर थी अनोखी।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ़ ब्रिटेन की राजनीतिक ग़ुलामी से छुटकारा पाने का संघर्ष नहीं था, इसके पीछे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की आकांक्षाएं भी थीं। ब्रिटिश सत्ता भारत पर अपने राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयोग ब्रिटिश समाज और अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था का शोषण करने के लिए कर रही थी। आर्थिक दृष्टि से देश पिछड़ रहा था। औपनिवेशिक शोषण प्रणालियों की राष्ट्रीय नेताओं को समझ थी। वे इस बात की आलोचना करने लगे कि भारत का सारा धन विदेश जा रहा है। इस बात की सच्चाई को उन्होंने जान लिया था कि भारत का उपनिवेश बनना न तो इतिहास की कोई दुर्घटना है और न ही ब्रिटिश सत्ता की राजनीति का नतीजा। यह तो ब्रिटिश समाज के चरित्र और भारत की ग़ुलामी का स्वाभाविक फल है। जब यह समझ विकसित हुई तो उपनिवेश विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। राष्ट्रीय आंदोलन के नेता उपनिवेशवाद का विश्लेषण कर लोगों के सामने रखते। गांधीजी ने जन-राजनीति के द्वारा इस दृष्टिकोण को गांव-गांव तक फैलाया। इस बात पर ख़ूब ज़ोर दी कि भारत की संपदा को लूटा जा रहा है। भारत को ब्रिटेन के तैयार माल का बाज़ार बनाया जा रहा है। इससे औपनिवेशिक शासन की बुनियाद कमज़ोर हुई। ब्रिटेन भारतवासियों के हित के लिए काम कर रहा, यह मिथक को टूटा। इससे सुदृढ़ और लगातार चलने वाले आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

राष्ट्रीय आंदोलन की लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता थी। लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया गया। गांधीजी ने व्यस्क मताधिकार पद्धति की मांग की। कांग्रेस के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती थी।  विषयों पर बहस होती और अंत में मतदान होता। ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय ‘करो या मरो’ वाले भाषण की शुरुआत में ही गांधीजी ने कहा था, मैं उन 13 मित्रों को बधाई देता हूं, जिन्होंने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। ऐसा कर उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिसके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना पड़े। राष्ट्रीय आंदोलन नागरिक अधिकारों का पक्षधर रहा। प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इसने संघर्ष किया। गांधीजी भी नागरिक अधिकारों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध थे। गांधीजी ने यंग इंडिया में जनवरी 1922 में लिखा था, सरकार ने देश के सामने जो मुद्दा पैदा कर दिया है, उसकी तुलना में स्वराज, ख़िलाफ़त और पंजाब सवाल गौण सवाल हैं। हम अपने लक्ष्य की तरफ़ एक कदम भी बढ़ा सकें, इसके पहले स्वतंत्र अभिव्यक्ति और संगठन के अधिकार को हमें हासिल करना ही होगा ... हमें इन अधिकारों की रक्षा जान देकर भी करनी चाहिए। नेहरू भी इसके सबसे बड़े हिमायती थे। धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रवादी विचारधारा का बुनियादी तत्व माना गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने आधुनिक उद्योगों और कृषि विकास के आधार पर समाज के पूर्ण आर्थिक रूपांतरण का लक्ष्य स्वीकार किया। गांधीजी सिर्फ़ उन मशीनों के विरोधी थे जो बेरोज़गार फैलाती या बहुसंख्यक लोगों को ग़रीब कर कुछ लोगों को अमीर बनाती थीं। देश आर्थिक विकास के मामले में आत्मनिर्भर बने इसके प्रति वे प्रतिबद्ध थे। विदेशी पूंजी के विनियोग का वे विरोध करते थे। उनका कहना था कि विदेशी पूंजी देश का विकास नहीं करेगी, बल्कि पिछड़ापन लाएगी। राष्ट्रीय आंदोलन शुरू से ही ग़रीबों का पक्षधर रहा। इससे आंदोलन को समाजवादी आधार मिला। 1919 के बाद गांधीजी ने किसानों और दस्तकारों पर आधारित आर्थिक दृष्टि विकसित की और उसका प्रचार किया। गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन की सामाजिक दृष्टि भी विकसित की। वे ग़रीबों के हितों की रक्षा के लिए भी हिंसा के प्रयोग के विरुद्ध थे। लेकिन उनकी बुनियादी दृष्टि समाज के परिवर्तन की थी। वे क्रांतिकारी परिवर्तन की दिशा में भी आगे बढ़ते हैं, खासकर 1930 और 40 के दशकों में, जब वे कहते हैं, निहित स्वार्थों में ठोस तबदीली लाये बिना जनसाधारण की स्थिति में सुधार नहीं लाया जा सकता। वे निजी संपत्ति का विरोध करने  लगते हैं। वे बार-बार उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की वकालत करते हैं। उन्होंने पूंजीवाद और ज़मींदारी प्रथा की भर्त्सना की। जाति के आधार पर विषमता और जुल्म का विरोध करते थे। इन सब चीज़ों ने राष्ट्रीय आंदोलन को क्रांतिकारी बनाने में मदद पहुंचाई।

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मनोज कुमार

 

 

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

बुधवार, 5 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 9. सूफ़ीवाद के विकास का तृतीय चरण-3

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


   9. सूफ़ीवाद के विकास का तृतीय चरण-3

9.5 हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी रह. (30 सितंबर 1207 – 17 दिसंबर 1273)

हज़रत जलाल अल-दीन रूमी इस्लाम के सबसे महान फारसी कवि, सूफी संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। वह दिव्य प्रेम और आंतरिक जागृति की कविताओं के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। हज़रत रूमी की विशिष्टता इस तथ्य में निहित है कि उनमें तर्क एक व्यापक और गहरे धार्मिक अनुभव से जुड़ा है। उनके लिए ईश्वर एक वास्तविकता है जिसे अनुभव किया जा सकता है। मनुष्य ईश्वर को अपने स्वयं के अस्तित्व की गहराई में महसूस कर सकता है, वह परमात्मा के साथ तालमेल बिठा सकता है। उन्हें मानवता के संदेश के लिए पूरी दुनिया में याद किया जाता है।

उनका जन्म 30 सितंबर 1207 को बल्ख (वर्तमान अफगानिस्तान) में हुआ था। उनके पिता बहाउद्दीन वलाद एक सम्मानित विद्वान और उपदेशक थे। बहाउद्दीन अपनी शिक्षा और धर्मपरायणता के लिए प्रसिद्ध थे। मंगोल आक्रमणों से बचकर उनका परिवार अनाटोलिया (तुर्की के कोन्या शहर) में बस गया था, जहाँ उन्होंने अपने अधिकांश जीवन का अध्यापन किया। आरंभिक वर्षों में रूमी ने अपने पिता और उनके साथी महान विद्वानों से बहुत कुछ सीखा। पच्चीस साल की उम्र में ज्ञान की तलाश में उन्होंने दमिश्क और हलाब (अलेप्पो) जैसे महान केंद्रों की यात्रा की। रूमी ने क़ुरआन पर भाष्य, हदीस, न्यायशास्त्र और अरबी भाषा और साहित्य की शिक्षा हासिल की। उनके द्वारा रचित मसनवी ग्रन्थ इस बात का प्रमाण है कि उनका रहस्यवाद केवल भावनात्मक नहीं है। मसनवी छह खंडों में लिखा गया उनका आध्यात्मिक महाकाव्य है, जिसे फारसी का कुरान भी कहा जाता है। रूमी की महान कृति 'मसनवी' की शुरुआत बांसुरी (नेह) की कहानी से होती है। बाँसुरी जब बजती है, तो वह एक दर्द भरी आवाज़ निकालती है। रूमी कहते हैं कि बाँसुरी इसलिए रोती है क्योंकि उसे उसके बांस के जंगल (जड़) से काट कर अलग कर दिया गया है। इसी तरह, इंसान की रूह भी परमात्मा से अलग होकर तड़प रही है और उसका अंतिम लक्ष्य वापस उसी परमात्मा में विलीन हो जाना है। रूमी ने अपना सारा जीवन लोगों को धर्मशास्त्र सिखाने और उपदेश देने में लगा दिया। उस समय तक उन्होंने संगीत से परहेज़ किया था।

उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उनकी मुलाक़ात शम्स तबरेज़ से हुई। साल 1244 में कोन्या के एक बाज़ार में दोनों की मुलाक़ात हुई। उस समय रूमी किताबों के ढेर के साथ बैठे थे। शम्स ने पूछा, "यह क्या है?" रूमी ने जवाब दिया, "यह वो ज्ञान है जिसे तुम नहीं जानते।" शम्स ने उन किताबों को पानी में फेंक दिया। जब रूमी दुखी हुए, तो शम्स ने उन्हें पानी से बाहर निकाला—किताबें पूरी तरह सूखी थीं। शम्स ने कहा, "यह वो रहस्य (इल्म) है जिसे तुम नहीं जानते।" इस घटना के बाद रूमी ने बाहरी किताबों को छोड़कर आंतरिक ज्ञान और दिव्य प्रेम (इश्क़ हक़ीक़ी) की राह चुन ली। दोनों महीनों तक एक कमरे में बंद रहते थे। वे बिना खाए-पिए लगातार आध्यात्मिक चर्चा और ईश्वर की इबादत में डूबे रहते थे। रूमी शम्स को कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि अपने भीतर के ईश्वर का आईना मानते थे। उन्होंने लिखा कि शम्स में उन्हें साक्षात् खुदा का नूर दिखाई देता था। रूमी के शिष्य और परिवार के लोग शम्स से जलने लगे थे। उन्हें लगता था कि शम्स ने उनके गुरु को उनसे छीन लिया है। इस ईर्ष्या के कारण शम्स एक बार कोन्या छोड़कर चले गए। रूमी के मनाने पर वे लौटे, लेकिन 1248 में वे दोबारा हमेशा के लिए गायब हो गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि रूमी के छोटे बेटे की शह पर शम्स की हत्या कर दी गई थी। शम्स के जाने से रूमी गहरे सदमे और विरह (हिज्र) में डूब गए। इसी दर्द से उनके भीतर का कवि जागा। वे रोते हुए गोल-गोल घूमने लगते थे, जिसे आज 'व्हर्लिंग दरवेश' का डांस कहा जाता है। शम्स तबरेज़ से मिलने से पहले रूमी एक पारंपरिक धार्मिक विद्वान और उस्ताद थे। शम्स ने उन्हें सिखाया कि सिर्फ किताबों को रटने से खुदा नहीं मिलता, बल्कि खुद के भीतर झांकने और अहंकार को मिटाने से मिलता है। सूफी दर्शन में इसे 'फ़ना' (अहंकार का मिट जाना) और 'बका' (ईश्वर के साथ अमर हो जाना) कहा जाता है। हज़रत रूमी ने शिक्षण और उपदेश देना छोड़ दिया और शम्स की संगति में दिन-रात बिताने लगे। शम्स ने हज़रत रूमी को एक अकादमिक धर्मशास्त्री और पारंपरिक उपदेशक से एक परमानंद रहस्यवादी में बदल दिया। नीरस हज़रत रूमी रातोंरात एक उत्साही गीतकार में बदल गए, और अब सत्य की अभिव्यक्ति के वाहन के रूप में कविता और संगीत उन्हें दर्शन और धर्मशास्त्र से बेहतर लगने लगा। रूमी ने अपने सबसे बड़े दीवान (प्रेम गीतों के संग्रह) का नाम अपने नाम पर रखने के बजाय 'दीवान-ए-शम्स-ए तबरेज़ी' रखा। उन्होंने अपनी कविताओं के आखिर में अपना नाम हटाकर शम्स का नाम लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि वे खुद को शम्स में पूरी तरह फना (विलीन) मान चुके थे।

रूमी ने 'शमा' यानी घूमकर किए जाने वाले रूहानी नृत्य 'व्हर्लिंग दरवेश' (Whirling Dervishes, नर्तक, साधुओं की घूम-घूमकर इबादत करने की अनूठी पद्धति) वाले मेवलेवी संप्रदाय की नींव रखी थी। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि एक ध्यान (Meditation) है। इसमें दरवेश गोल-गोल घूमते हैं, जो ब्रह्मांड के ग्रहों की गति को दर्शाता है। उनका एक हाथ आसमान की तरफ (ईश्वर से कृपा पाने के लिए) और दूसरा हाथ जमीन की तरफ (उस कृपा को दुनिया में बांटने के लिए) होता है। यह नृत्य अहंकार को भूलकर पूरी तरह ईश्वर के प्रेम में डूब जाने का प्रतीक है।

हज़रत रूमी का न तो कोई नया संप्रदाय स्थापित करने का और न ही एक नया धार्मिक आंदोलन शुरू करने का कोई इरादा था। लेकिन उनके भक्तों और शिष्यों ने उनकी मृत्यु के बाद एक विशिष्ट समूह बनाया। उन्होंने कुछ बाहरी अनुष्ठानों को क़ायम किया। समूह को नाचने वाले दरवेशों के समुदाय के रूप में मान्यता मिली। वे बिना सिलाई वाली टोपी पहनते थे। सर के चारों ओर पगड़ी बांधते थे। कई तहों की भारी पतलून पहनते थे। ये वेश-भूषा इस समूह की मानक पोशाक बन गई। लेकिन वे हज़रत रूमी के विचार की गहराई या उसके धार्मिक अनुभव की भावना को समझने में असमर्थ थे। हज़रत रूमी, जो धार्मिक जीवन में नक़ल और अंध अनुरूपता के सख्त ख़िलाफ़ थे, भाग्य की उस विडंबना का शिकार बन गए, जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने लगातार लड़ाई लड़ी थी। हज़रत रूमी के लिए उत्साहपूर्ण नृत्य के साथ-साथ स्वतः-स्फूर्त गीत एक गहरी उत्तेजित आत्मा की एक अनैच्छिक अभिव्यक्ति थी। जबकि नक़ल करने वालों ने यह विश्वास करते हुए कि किसी भावना की शारीरिक अभिव्यक्ति को स्वैच्छिक रूप से अपनाने से भावना ही पैदा होती है, इसे धार्मिक भावनाओं को प्रेरित करने के एक नियमित अभ्यास के रूप में अपनाया।

परमानंद चाहने वाला समूह एक वृत्ताकार समूह में बैठता है, जबकि उनमें से एक नृत्य करने के लिए खड़ा होता है, जिसका एक हाथ छाती पर और दूसरा हाथ फैला हुआ होता है। नृत्य में कोई आगे या पीछे की गति नहीं होती है, बल्कि बढ़ती गति के साथ चक्कर लगाने की होती है। संगीत के साथ, केवल बांसुरी और ड्रम का उपयोग किया जाता है।

समूह की सदस्यता के लिए एक उम्मीदवार के योग्य होने से पहले दूसरों की सेवा के अनुशासन से गुज़रने की एक प्रक्रिया से गुज़रनी होती है। यह चालीस दिनों के लिए जानवरों की सेवा के साथ शुरू होता है, इस विचार के साथ कि यदि कोई व्यक्ति प्रेम और सम्मान के साथ जानवरों की सेवा कर सकता है, तो वह अपने साथी की सेवा और भी बेहतर करेगा। इसके बाद वह ग़रीब भक्तों के आवास के फर्श की सफाई करते हैं। इसके दौरान कुएं से पानी खींचते हैं और ईंधन के लिए लकड़ी आदि इकट्ठा करते हैं। यह सत्ता के प्रति मनुष्य के प्रेम और वर्ग और जाति के विशेषाधिकार के लिए एक इलाज माना जाता है। अंत में उसे स्नान कराया जाता है, जो निचली वासना से छुटकारा का प्रतीक है। फिर वह सभी निषिद्ध कार्यों से पूर्ण परहेज़ करने का संकल्प लेता है और तब जाकर उसे संप्रदाय की पोशाक पहनने की अनुमति दी जाती है।

हज़रत रूमी अस्तित्व की प्रकृति के बारे में एक निश्चित दृष्टिकोण रखते थे। वास्तविकता और आभास की एकता के बारे में उनका विश्वास बहुत गहरा है। वे मानते हैं कि समस्त अस्तित्व का आधार आध्यात्मिक है। उनके लिए अस्तित्व का आधार वैसा ही है जैसा हम अपने आप में आत्मा या अहंकार के रूप में महसूस करते हैं। ब्रह्मांडीय अहंकार से निकलने वाले अहं की अनंत संख्या अस्तित्व की समग्रता का निर्माण करती है। इस दृष्टि से हर तत्त्व आध्यात्मिक है। दैवीय रूह के अतिप्रवाह से सभी प्राणी ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं, लेकिन प्रत्येक प्राणी अपने मूल में लौटने की इच्छा से प्रेरित होता है। हज़रत रूमी के अनुसार यह इच्छा  ईश्वर के प्रति प्रेम है। यही समस्त अस्तित्व का विकास वादी सिद्धांत है। जीवन तत्त्व से विकसित हुआ है, लेकिन हज़रत रूमी के लिए पदार्थ शुरू से ही अनिवार्य रूप से आध्यात्मिक था। मानव आत्मा के लिए चेतना और वास्तविकता के इस ग़ैर-आयामी आयाम में प्रवेश करना संभव है। ऐसा अनुभव आश्चर्य की चेतना है।

हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी का सूफी दर्शन मुख्य रूप से ईश्वरीय प्रेम (इश्क हकीकी), आत्मा के मिलन और अहंकार के त्याग पर आधारित है। उनका मानना था कि ईश्वर तक पहुँचने का एकमात्र जरिया रस्म-ओ-रिवाज़ नहीं, बल्कि दिल का सच्चा प्रेम है। रूमी के दर्शन के केंद्र में 'प्रेम' है। उनके अनुसार, यह पूरी सृष्टि प्रेम की शक्ति से ही चल रही है। इंसान के भीतर जो तड़प है, वह असल में अपनी रूह के मूल (ईश्वर) से दोबारा जुड़ने की तड़प है। उनका एक प्रसिद्ध विचार है: "ईश्वर का रास्ता दिमाग से नहीं, दिल से होकर जाता है। अपने दिल को साफ करो, ईश्वर वहीं मिलेगा।"

हज़रत रूमी का मानना था, बिना प्रेम के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। प्रेम आध्यात्मिक जीवन का पानी है और जो इसे चख लेता है, उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। हज़रत रूमी ने प्रेम के अर्थ को विस्तार दिया और इसे धार्मिक तथा नैतिक जीवन का आधार बनाया। इसे सभी प्राणियों और अस्तित्व के सभी स्तरों में एक रचनात्मक, सुधारात्मक और विकासवादी आग्रह के रूप में एक वैश्विक महत्व दिया। उनके अनुसार दिव्य प्रेम (इश्क हक़ीक़ी) ही वह एकमात्र मार्ग है जो मनुष्य की आत्मा को सीधे परमात्मा से जोड़ता है। प्रेम ईश्वर में उत्पन्न होता है और ईश्वर की ओर बढ़ता है जो अनिवार्य रूप से एक निर्माता है, इसलिए, प्रेम जैसे-जैसे सृष्टि की ऊपर की ओर गति में चरण-दर-चरण आगे बढ़ता है, हर क़दम पर अस्तित्व के नए रूपों को लाता है। आत्मसात करने की प्रक्रिया प्रेम की अभिव्यक्ति है। सभी चीज़ें शाश्वत सौंदर्य की ओर बढ़ रही हैं और किसी चीज़ का मूल्य उस सुंदरता के आत्मसात के अनुपात में होता है। यह आत्म-साक्षात्कार का आग्रह है। जैसे उनका स्रोत ईश्वर है, वैसे ही उनका लक्ष्य भी ईश्वर है, और इस लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रक्रिया हर स्तर पर नई सिद्धियों का निर्माण करती है। हर जगह जीवन है और जीवन अनिवार्य रूप से एक लक्ष्य-प्राप्ति गतिविधि है। निचला उच्चतर में विलीन हो जाता है; यह प्रगतिशील विनाश की प्रक्रिया नहीं बल्कि आत्मसात करने की प्रक्रिया है। यदि ब्रह्मांडीय प्रेम नहीं होता, तो सारा अस्तित्व जड़ हो जाता और शून्य में सिमट जाता। उनका धर्म किसी एक विशेष धार्मिक समुदाय का पंथ नहीं है बल्कि ब्रह्मांड का धर्म है, एक सार्वभौमिक धर्म है। हज़रत रूमी के अनुसार ब्रह्मांड प्रेम का क्षेत्र है। ब्रह्मांड एक ही धागे से बुना हुआ है। किसी दूसरे इंसान से नफरत करना असल में खुद से और ईश्वर से नफरत करने के बराबर है।

हज़रत जलाल-उद-दीन रूमी रह. ने हाल  या वज्द (भावाविष्टावस्था) को सूफ़ी-साधना की महत्वपूर्ण पद्धति के रूप में प्रकाशित किया। जाफ़र रज़ा कहते हैं मौलाना जलालुद्दीन रूमी के अनुसार अनलहक़ विनम्रता की अंतिम सीढ़ी है। जिस तरह शहद में डूबी हुई मक्खी हिल-डुल नहीं सकती, उसी तरह इस्तग़राक़ (तल्लीनता) में कोई सूफ़ी अनल अबद (मैं बंदा हूं) नहीं कह सकता, क्योंकि अनल अबद में दुई (द्वैतवास) है एक अल्लाह और एक बंदा। यह दंभ ही है कि अल्लाह के अस्तित्व के सामने कोई अपने अस्तित्व का एलान करे। लेकिन यह कहने का अधिकार सिर्फ़ अहले-बातिन (अंतर्ज्ञानी) को है। अहले-ज़ाहिर (कर्मकांडी) को नहीं है। क्योंकि इसका परिणाम मौत है, जिसे अहले-बातिन जश्ने-उरूसी (विवाहोत्सव) समझते हैं और अहले-ज़ाहिर सज़ा कहते हैं।हज़रत रूमी का संदेश था कि इंसान जिस सुकून और खुदा को बाहर ढूंढता है, वह असल में उसके अपने दिल के भीतर ही निवास करता है। रूमी का सूफीवाद किसी एक मजहब की सीमाओं में नहीं बंधा है। वे सभी इंसानों को एक ही ईश्वर की संतान मानते थे, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। रूमी कहते हैं, हम ईश्वर को जिस रूप में देखते हैं, वह असल में हमारे अपने आंतरिक चरित्र का आईना होता है। अगर हम ईश्वर के नाम पर केवल डर और दोष देखते हैं, तो इसका मतलब है कि हमारे भीतर डर और नफरत भरी है। अगर हम ईश्वर को प्रेम और करुणा के रूप में देखते हैं, तो हम खुद भी वैसे ही बन जाते हैं। सूफी मार्ग में ज्ञान इकट्ठा करना लक्ष्य नहीं है, बल्कि अपने अहंकार (Ego) को पूरी तरह मिटा देना लक्ष्य है, ताकि भीतर का खालीपन ईश्वर के नूर से भर सके। 

रूमी अपनी मसनवी में लिखते हैं कि कुछ लोग एक अंधेरे कमरे में एक हाथी को लेकर आए। उस शहर के लोगों ने पहले कभी हाथी नहीं देखा था। चूंकि कमरे में अंधेरा था, इसलिए लोग छूकर यह जानने की कोशिश करने लगे कि हाथी कैसा दिखता है। पहले व्यक्ति ने हाथी की सूंड छूई और कहा, "हाथी तो एक मोटे पाइप या पानी के सांप जैसा है। दूसरे व्यक्ति ने हाथी का कान छुआ और कहा, "नहीं, हाथी तो एक बड़े पंखे जैसा है।" तीसरे व्यक्ति ने हाथी का पैर छुआ और दावा किया, "तुम सब गलत हो, हाथी एक मजबूत खंभे जैसा है।" चौथे व्यक्ति ने हाथी की पीठ पर हाथ फेरा और कहा, "हाथी तो एक ऊंचे सिंहासन या चबूतरे जैसा होता है।" रूमी समझाते हैं कि वे सभी लोग अपनी जगह सही थे, क्योंकि उन्होंने हाथी के एक हिस्से को अनुभव किया था। लेकिन वे सब पूरी सच्चाई को नहीं देख पा रहे थे। रूमी कहते हैं कि इंसानी इंद्रियां और दिमाग उस अंधे आदमी के हाथ की तरह हैं, जो पूरी सच्चाई को एक बार में नहीं समझ सकते। लोग ईश्वर और धर्म को भी अपने-अपने सीमित नजरिए से देखते हैं और आपस में लड़ते हैं। अगर सबके हाथ में 'ज्ञान और रूहानियत की मोमबत्ती' आ जाए, तो सारा मतभेद खत्म हो जाएगा और पूरी सच्चाई साफ दिखने लगेगी।

रूमी अपनी मसनवी में लिखते हैं कि एक बार एक घमंडी व्याकरण शास्त्री (किताबी विद्वान) एक नाव में सवार हुआ। यात्रा के दौरान उसने अपनी विद्वता का दिखावा करने के लिए नाविक से पूछा, "क्या तुमने कभी व्याकरण या साहित्य पढ़ा है?" नाविक ने बड़ी सादगी से जवाब दिया, "नहीं, मैंने कभी स्कूल जाकर यह सब नहीं सीखा।" विद्वान ने हंसते हुए कहा, "ओह! तब तो तुमने अपनी आधी जिंदगी बर्बाद कर दी!" नाविक को बहुत दुख हुआ, लेकिन वह चुप रहा। कुछ देर बाद नदी में एक भयानक तूफान आ गया और नाव डूबने लगी। अब नाविक ने विद्वान से पूछा, "जनाब, क्या आपको तैरना आता है?" विद्वान घबराकर रोते हुए बोला, "नहीं, मुझे तैरना नहीं आता!" नाविक ने मुसकुराते हुए कहा, "फिर तो आपने अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी! क्योंकि यह नाव अब डूबने वाली है और किताबों का ज्ञान आपको डूबने से नहीं बचा सकता।" यहाँ रूमी समझाते हैं कि किताबी ज्ञान, नियम, और बौद्धिक अहंकार (किताबी व्याकरण) आपको संसार के दुखों और मृत्यु के तूफान से पार नहीं लगा सकते। सूफी मार्ग में खुद को मिटाना यानी 'फ़ना' होना (तैरना सीखना) जरूरी है। जब तक इंसान अपने 'मैं' (अहंकार) को नहीं डुबोता, तब तक वह ईश्वर के प्रेम के सागर में तैर नहीं सकता।

उनका निधन 17 दिसंबर 1273 को कोन्या (तुर्की) में हुआ। उनकी मजार (ग्रीन टॉम्ब) पर मेवलाना संग्रहालय स्थित है, जहाँ आज भी विभिन्न धर्मों के लोग श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं।

9.6. चतुर्थ चरण- में सूफ़ियों का सिलसिला

चतुर्थ चरण- में सूफ़ी उलमा के विरोध एवं शासक वर्ग की नाराज़गी के बावज़ूद सूफ़ियों का प्रभाव बढ़ता गया। तेरहवीं शताब्दी तक सूफ़ियों की अनेक ख़ानक़ाहें (आश्रम) स्थापित हो चुकी थीं। विचारों और साधना-पद्धति में भिन्नता के कारण सूफ़ी मतावलंबियों की कई शाखाएं विकसित हुईं जिन्हें सिलसिला कहा जाता है। सूफ़ियों के सिलसिलों की संख्या निश्चित करना कठिन है, पर उनमें से कई सिलसिले भारत में भी पाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं  चिश्ती, सुहरावर्दी, क़ादिरी, शत्तारी, नक्शबंदी, फिरदौसी, आदि। अकबर के ज़माने का मशहूर विद्वान अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में चौदह सूफ़ी सिलसिलों का ज़िक्र किया, जो हैं – चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, शत्तारी, हबीबी, तफूरी, जुनैदी, करबी, सकती, इयादी, तूसी, दुबरी, अधमी और फिरदौसी

सूफीमत में इस्लामी कानून यानी शरिया के पालन के आधार पर सूफी सिलसिलों (परंपराओं) के दो मुख्य वर्गीकरण हैं  बा-शरअ और बे-शरअ बा-शरअ पंथी इस्लामी क़ानून के पालन पर बल देते थे और ख़ानक़ाहों में रहते थे। ये सूफी संत कुरान और पैगंबर के नियमों को मानते हैं। ये नमाज, रोजा और अन्य इस्लामी कर्तव्यों का पूरा पालन करते हैं। इनका मानना था कि आंतरिक प्रेम और रहस्यवाद के साथ-साथ बाहरी धार्मिक व कानूनी अनुशासन का पालन करना भी जरूरी है। भारत में प्रसिद्ध चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले इसी श्रेणी में आते हैं।

जबकि कुछ सूफ़ियों पर जज़्ब की कैफ़ियत तारी रहती थी और वे अक्सर घूमते ही रहते थे। आम लोग उन्हें बे-शरअ कहते थे क्योंकि वे उन्हें नमाज़-रोज़ा करते नहीं देखते थे। हक़ीक़त यह होती थी कि वे अपने होशो हवास में ही नहीं होते थे और शरीअत की पाबंदी के लिए होशो हवास क़ायम होना ज़रूरी है। इस्लामी उलमा ने कहा है कि न तो ऐसे लोगों को बुरा कहो और न ही उनका अनुसरण करो। इन्हें मस्त, कलंदर या मदारी भी कहा जाता है। ये इस्लामी कर्मकांडों और बाहरी नियमों को उतना महत्व नहीं देते। इनका पूरा ध्यान केवल ईश्वर के प्रेम और आंतरिक रहस्यवाद पर होता है। ये ईश्वर के साथ सीधे और गहन आंतरिक प्रेम पर इतना अधिक ध्यान केंद्रित करते थे कि कई बार सामाजिक और पारंपरिक धार्मिक कर्मकांडों की उपेक्षा कर देते थे। हालांकि ये शरिया के पाबंद नहीं थे, फिर भी इनका मूल उद्देश्य भी आध्यात्मिक ज्ञान, आंतरिक शुद्धि और ईश्वर (अल्लाह) से मिलन ही था।

9.7 सूफ़ीमत पर विभिन्न सम्प्रदायों का प्रभाव

कुछ विद्वानों का मानना है कि सूफ़ियों के मत और सिद्धान्त तथा उनकी साधना पद्धति का आधार क़ुरआन और हदीस है। हालांकि समय के साथ इसमें आंतरिक और रहस्यवादी व्याख्याओं को प्रधानता दी गई। सूफी संत क़ुरआन की आयतों का शाब्दिक अर्थ लेने के साथ-साथ उनका गूढ़, आध्यात्मिक और भावनात्मक अर्थ निकालते हैं। हदीस में वर्णित 'इह्सान' (ईश्वर की इस प्रकार इबादत करना जैसे कि तुम उसे देख रहे हो) को सूफी साधना का शीर्ष माना जाता है। मन के विकारों को दूर करने और आत्मशुद्धि (तज़्किया) पर जोर देने वाले विचार सीधे तौर पर क़ुरआन और पैगंबर की चर्या से प्रेरित हैं। ईश्वर के नामों का निरंतर स्मरण करना (ज़िक्र) क़ुरआन के आदेश "अल्लाह को अधिक याद करो" पर आधारित है। सूफी साधना के शुरुआती चरण में इस्लामिक कानून (शरीयत) का पालन अनिवार्य माना गया है, जिसके बाद आध्यात्मिक मार्ग (तरीकत) आता है। हालांकि मूल ढाँचा इस्लामिक है, लेकिन कुछ साधना पद्धतियों और दर्शन पर बाद में स्थानीय संस्कृतियों और दर्शनों का भी हल्का प्रभाव पड़ा।

कुछ विद्वानों के अनुसार इस्लाम धर्म के अनुयायियों में भी रहस्यवादी प्रवृत्ति देखने को मिलती है। ‘सूफ़ीमत साधना और साहित्य’ में रामपूजन तिवारी कहते हैं, सूफ़ियों के प्रेम सम्बन्धी कुछ मत भी क़ुरआन में मिल जाते हैं - यदि परमात्मा से तुमको प्रेम है, तो मेरा अनुसरण करो और तब परमात्मा तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा, क्योंकि वह क्षमाशील और दयालु है। सूफीमत में अल्लाह से डरने के बजाय उससे अगाध प्रेम करने और उसकी इबादत में पूरी तरह लीन हो जाने को सर्वोपरि माना गया है। इस्लाम में आत्मशुद्धि के लिए पंचकर्तव्यों, तौहीद (एक ईश्वर पर विश्‍वास), सलात (प्रार्थना), रोज़ा (उपवास), ज़कात (दान) और हज (काबे की यात्रा), का विधान है। लेकिन सूफ़ियों ने इनसे प्रेरणा लेते हुए भी इसे हूबहू नहीं अपनाया है। सभी विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। इस मार्ग के अनुयायी आत्म-ज्ञान और आंतरिक साधना (इरफ़ान और मारिफ़त) के माध्यम से परम सत्य को पाने की कोशिश करते हैं।

निकोल्सन (R. A. Nicholson) तथा ब्राउन (E. G. Browne) ने नास्तिक मत, यूनानी मत तथा नव-अफ़लातूनी (Neoplatonism) दर्शन के प्रभाव को स्वीकार किया है। इन विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि पश्चिमी एशिया और ईरान के संपर्क में आने से यूनानी एवं हेलेनिस्टिक दार्शनिक विचार सूफियों तक पहुँचे। निकोल्सन ने माना है कि सूफी चिंतन में व्याप्त रहस्यवाद, आत्मा के परमात्मा से मिलन और इल्हाम के सिद्धांत पर नव-अफ़लातूनी दर्शन का गहरा प्रभाव है। नव-अफ़लातूनी दर्शन, तर्क और बुद्धि द्वारा चरम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं मानते थे, बल्कि उनका मानना था कि हृदय द्वारा वहाँ पहुँचा जा सकता है, उनकी मान्यता के अनुसार वही परमात्मा सभी चीज़ों का केन्द्र है। यह संसार उसकी प्रतिच्छाया है। लेकिन सूफ़ियों से इस साम्य के बावज़ूद, सूफ़ियों की तरह परमात्मा के साथ रागात्मक संबन्ध स्थापित किया जा सकता है, इस बात से वे सहमत नहीं थे। नास्तिक मत को मानने वाले आध्यात्मिक जगत को बुद्धि से परे तथा आत्म प्रकाश और रहस्यानुभूति की बात मानते थे। सूफ़ियों में जो संन्यास-व्रत की बात कही गई है उस पर नास्तिक मत का भी ज़ोर है ताकि इस दुनिया की बुराइयों को दूर कर आध्यात्मिक जगत को पाया जा सके।

निकोल्सन ने ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म के प्रभाव को भी स्वीकार किया है। ब्राउन ने भी सूफीमत पर बौद्ध, जैन तथा वेदांत दर्शन के प्रभावों को भी रेखांकित किया है, जिसके तहत सूफी साधकों ने सादगी और प्रेम मार्ग को अपनाया। बौद्धों के निर्वाण के साथ फ़ना के सिद्धान्त में बहुत समानता है। सूफ़ियों का चरम लक्ष्य फ़ना होना है। सूफ़ियों के फ़ना के मार्ग में ध्यानावस्था (मुराकबा) की मंजिल आती है, जो बौद्धों के निर्वाण के पहले के ध्यान अथवा समाधि’ की अवस्था जैसी है।

ब्राउन इस बात से सहमत नहीं है कि सूफ़ीमत पर भारतीय दर्शन का प्रभाव है, लेकिन अन्य कई विद्वान जैसे वानक्रेमर और गोल्डजिहर इस बात से सहमत है कि भावाविष्ट अवस्था, योग प्राणायाम आदि भारतीय दर्शन की देन है। सूफ़ीमत और अद्वैतवाद में काफी समानता है। उपवास, जप, तप का विधान, गुरु के प्रति आत्मसमर्पण, आत्मा तथा परमात्मा में एकत्व, दोनों ही मत में समान है। प्रसिद्ध सूफ़ी साधक हज़रत मंसूर ह्लल्लाज के अनहल-हक़ में अद्वैत की ही गूँज है। सृष्टि के सम्बन्ध में सूफ़ीमत की तथा उपनिषदों में प्रकट किए गए विचारों में समानता है , विशेषकर परमात्मा की इच्छा से सृष्टि के विस्तार और 'अद्वैत' या 'एकत्व' के सिद्धांत में। दोनों ही परंपराएं मानती हैं कि एक ही परम सत्य से यह संपूर्ण संसार प्रकट हुआ है। परमात्मा जब एक है तो अनेक कैसे हो गया? इसके लिए सूफ़ी एक हदीस का प्रमाण देते हैं जिसका अर्थ है मैं एक छिपा हुआ खज़ाना था, फिर मैंने इच्छा की कि लोग मुझे जाने। इसलिए उसने सृष्टि रची। इसी बात को तैतिरियोपनिषद में इस प्रकार कहा गया है सोअकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति’ अर्थात परमेश्वर ने इच्छा की मैं एक से बहुत हो जाऊँ। लेकिन सूफ़ीमत अवतारवाद और पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करता। सूफियों का 'वहदतुल वजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत उपनिषदों के अद्वैत वेदांत (सब कुछ ब्रह्म है) से बहुत हद तक मिलता-जुलता है, जहाँ संपूर्ण सृष्टि उसी एक परमात्मा का रूप मानी जाती है। दोनों ही मार्ग बाहरी कर्मकांडों के बजाय आंतरिक शुद्धि, प्रेम, भक्ति और ईश्वर के साथ सीधे आध्यात्मिक मिलन पर जोर देते हैं।

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मनोज कुमार

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