बुधवार, 9 सितंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-21

 

महात्मा गांधी हत्या केस-21


12 जनवरी, 1948

12 जनवरी, 1948 को सोमवार, यानी गांधीजी के मौनव्रत का दिन था।

उन दिनों समूचे उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत में साम्प्रदायिक स्थिति बहुत ही विकट थी। दिल्ली और उसके आस-पास के इलाक़ों में पश्चिमी पंजाब से शरणार्थियों के आने का तांता लगा हुआ था। उन सबको रहने की जगह, गरम कपड़े, भोजन और पानी की व्यवस्था करने में सरकार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। जिन मुसलमानों को उनके घर से भगा दिया गया था, वे जामा मस्जिद और चांदनी चौक के शरणार्थी कैम्प में रह रहे थे। हिन्दू और सिख मांग कर रहे थे कि जो घर मुसलमानों ने ख़ाली कर दिए हैं वे उन्हें दे दिए जाएं। कुछ घरों में ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा जमा लिया गया था। कुछ मस्जिदों पर भी क़ब्ज़ा जमा कर उसे मंदिर में तबदील कर दिया गया था। हिन्दू महासभा आदि के कुछ लोग हिन्दुओं पर पाकिस्तान में हो रहे वीभत्स अत्याचारों, बलात्कार, अपहरण, और धर्म परिवर्तन की कहानियां फैला रहे थे।

गांधीजी ने एक दोस्त से कहा, "हम धीरे-धीरे दिल्ली पर अपनी पकड़ खो रहे हैं। अगर दिल्ली हाथ से निकल गई, तो भारत भी हाथ से निकल जाएगा और उसके साथ ही दुनिया में शांति की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी।" उन्हें यह बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन या शहीद सुहरावर्दी जैसे लोग दिल्ली में उतनी आज़ादी और सुरक्षा के साथ न घूम सकें, जितनी आज़ादी और सुरक्षा उन्हें खुद हासिल थी। दिल्ली और दिल्ली के दूसरे हिस्सों में सांप्रदायिक उन्माद में धीरे धीरे कमी तो आई थी लेकिन दोनों समुदायों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर संदेह और नफरत का भाव भरा था जो जरा सी हवा मिलते ही सुलग उठता था। गांधीजी पिछले साढे़ चार महीने से जिस शांति के लिए प्रयत्न कर रहे थे वह ‘शमशान की शांति’ नहीं, दिलों को मिलाने वाली शांति थी। उस सच्ची शांति का दिल्ली में कहीं पता नहीं था। मुसलमान निडर और सर्वत्रता पूर्वक राजधानी की सडकों और गलियों में निकल नहीं सकते थे। हृदय परिवर्तन की कामना करने वाले गांधीजी के लिए यह स्थिति त्रासद और असहनीय थी। उन्हें पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की तकलीफों की भी उतनी ही चिंता थी। वह उनकी मदद के लिए जाना चाहते थे। लेकिन वह किस मुंह से वहां जाते, जब वह दिल्ली में मुसलमानों की समस्याओं का पूरा समाधान करने की गारंटी नहीं दे पा रहे थे? गांधीजी स्वयं को असहाय और लाचार महसूस कर रहे थे।

तीसरे पहर गांधीजी ने पुरजा लिखकर सुशीला नायर को दिया। सुशीला पढ़कर स्तब्ध रह गई। उन्होंने अपने भाई और गांधीजी के सचिव प्यारेलाल को बताया कि गांधीजी ने निश्चय किया है कि अगर दिल्ली का पागलपन बन्द नहीं हुआ, तो वे आमरण उपवास करेंगे। दलील की कोई गुंजाइश नहीं थी।  दो घंटे पहले नेहरू और पटेल उनके साथ थे। उन्होंने उन्हें इस बात का ज़रा भी संकेत नहीं दिया।

शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी का लिखित वक्तव्य सुनाया गया, “जब मैं नौ सितंबर को कलकत्ते से दिल्ली लौटा तो इरादा पश्चिम पंजाब जाने का था, लेकिन ऐसा न हो सका। उस समय ख़ुशदिल दिल्ली मुर्दों का शहर लग रही थी। मैं जब ट्रेन से उतरा तो हर चेहरे पर उदासी पुती थी। सरदार प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद थे। उन्होंने बिना वक़्त गँवाए मुझे इस महानगर की गड़बड़ियों के बारे में बताया। मैंने फ़ौरन समझ लिया कि मुझे दिल्ली में ही रहना है और करना है या मरना है' ... हालांकि फ़ौज और पुलिस की वजह से ऊपरी अमन था, लेकिन दिलों में तूफ़ान था। वह कभी भी फूट सकता था। इससे मेरा करनेका संकल्प पूरा नहीं होता था और वही मुझे मौत से अलग रख सकता था, मौत जो अतुलनीय मित्र है। जिस दिल्ली में ज़ाकिर हुसैन इत्मीनान से न चल-फिर सकें, वह उनकी नहीं हो सकती थी। मैंने एक व्रत रखने का फैसला किया है। यह व्रत अगली दोपहर को शुरू होगा और मेरी मृत्यु के साथ समाप्त होगा या तब समाप्त होगा जब मुझे विश्वास हो जाएगा कि विभिन्न समुदायों ने बाहरी दवाबों के कारण नहीं बल्कि मुक्त स्वेच्छा से फिर से आपस में मित्रवत संबंध कर लिए हैं। मैंने आमरण उपवास करने का निर्णय लिया है। इधर मेरी असहायता मेरा दिल कचोटती रही है। जैसे ही मैं अपना व्रत आरंभ करूंगा, यह समाप्त हो जाएगी। मैं इस पर पिछले तीन दिनों से चिंतन-मनन करता रहा हूँ। आखिरकार यह फैसला मेरे मन में कौंधा, और मुझे इससे प्रसन्नता हुई। साफ़ दिल वाला कोई भी इंसान अपनी जान से ज़्यादा कीमती किसी चीज़ की कुर्बानी नहीं दे सकता। यह एक ऐसा उपवास है जिसे अहिंसा का पालन करने वाला व्यक्ति कभी-कभी समाज द्वारा की गई किसी गलत बात के विरोध में करने के लिए मजबूर महसूस करता है; और वह ऐसा तब करता है जब अहिंसा के अनुयायी के तौर पर उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता। मेरे सामने भी ऐसा ही मौका आया है। उनकी गहरी पीड़ा से ही उपवास करने का फ़ैसला निकला। इस फ़ैसले पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी।

उनके वक्तव्य में उन कारणों का ज़िक्र था जिनकी वजह से उन्हें नया उपवास शुरू करना पड़ा। भारत की शान खत्म हो रही थी, कोई भी मुसलमान सुरक्षित नहीं था, दिल्ली में शांति का मतलब तलवार के ज़ोर पर बनी शांति थी, जहाँ पुलिस और सेना का राज था, और अब आखिरकार इंसानी दिल को बदलने का समय आ गया था। वे मौत को एक शानदार मुक्ति के तौर पर देख रहे थे क्योंकि इससे उन्हें भारत की बर्बादी देखने से छुटकारा मिल जाता।

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर आदि मुद्दों को लेकर बहुत तनातनी का माहौल बन गया था। भारत सरकार ने पाकिस्तान के लिए तय 55 करोड़ रुपये की राशि की दूसरी किस्त रोक ली थी जो उसे बंटवारे के अनुसार दी जानी थी। पाकिस्तान इस किश्त को जारी नहीं करने के लिए भारत की बदनामी कर रहा था। प्रार्थना सभा के बाद गांधीजी का साप्ताहिक मौन समाप्त हुआ। गांधीजी माउंटबेटन से मिलने गए। मंत्रिमंडल के फैसले की क़ानूनी वैधता चाहे जो हो, गांधीजी को नैतिक रूप से यह उचित नहीं लगता था। उन्होंने निजी तौर पर लॉर्ड माउंटबेटन से पूछा था, आप इस बारे में क्या सोचते हैं? उसने कहा, रुपया न देना भारत सरकार का प्रथम अकीर्तिकर कार्य हो जाएगा। गांधीजी का मानना था, इससे नैतिक स्तर पर सरकार की बदनामी होनी थी। अगर कठिनाई में नैतिकता छूट जाए तो उस नैतिकता का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए भारत सरकार इस नैतिक जिम्मेदारी का पालन करे। अंतरराष्ट्रीय करार के तहत जो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने थे, उसको पूरा किया जाए।

सात बजे वहां से लौटे। उन्होंने आमरण उपवास की घोषणा कर दी। माउंटबेटन को गांधीजी का निर्णय मंज़ूर था। माउंटबेटन ने गांधीजी के चलते कलकत्ते में हुए चमत्कार को देखा था। गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी ने कहा, उपवास का यह कदम उचित नहीं है। अभी उतावली करना ठीक नहीं है। गांधीजी ने देवदास को समझाया, ईश्वरीय संकेत के सामने औचित्य का प्रश्न नहीं हो सकता। बूंद-बूंद रिसते रहने के बदले एक झटके से मर जाना ज़्यादा सुखद और श्रेयस्कर है। जब तक क़ौमें समझौता नहीं करतीं मैं ज़िन्दा रहना नहीं चाहूंगा। देवदास ने उनसे पूछा कि क्या यह उपवास पाकिस्तान के ख़िलाफ़ है। उन्होंने जवाब दिया, "नहीं, यह तो सबके ख़िलाफ़ है।" गाँधीजी 78 साल के हो चुके थे। वे उपवास करने में माहिर थे, लेकिन इस थकी देह और उम्र में इस फ़ैसले ने पूरे देश को चिंता और हैरानी में डाल दिया। गांधीजी की मांग इस बार अपने ही लोगों से थी और वे भी ख़ासकर हिंदुओं से। वे हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों के दिलों के मिलने की मांग कर रहे थे।

गांधीजी के जीवनीकार लुई फिशर लिखते हैं, गांधीजी के जीवन का तरीका मायने रखता है, न कि उनके आस-पास के लोगों पर उनका तुरंत असर। हो सकता है गांधीजी को लगा हो कि उनके लोगों ने उन्हें छोड़ दिया है। इतिहास का फ़ैसला वे लोग पहले से नहीं जान सकते जो उसे बनाते हैं। किसी इंसान का कद उसे देखने वाले की नज़र पर निर्भर करता है। जो लोग उन्हें बहुत मानते थे, उन्हीं से परेशान, दुखी और नाकाम किए गए गांधीजी यह नहीं देख पाए कि अपनी ज़िंदगी के आखिरी महीनों में वे किस ऊँचाई पर पहुँच गए थे। उस दौरान उन्होंने किसी भी समाज के लिए बेहद कीमती काम किया: उन्होंने भारत को एक अलग और बेहतर ज़िंदगी का ठोस, जीता-जागता उदाहरण दिया। उन्होंने दिखाया कि इंसान भाई-भाई बनकर रह सकते हैं और खून से सने हाथों वाला वहशी इंसान भी, भले ही कुछ पल के लिए, आत्मा की पुकार पर प्रतिक्रिया दे सकता है। ऐसे पलों के बिना इंसानियत का खुद पर से भरोसा उठ जाएगा। उसके बाद हमेशा, समाज को उस रोशनी की झलक की तुलना आम ज़िंदगी के अंधेरे से करनी होगी। यह सच है कि गांधीजी के उपवास ने कलकत्ता को होश में लाया और वहाँ शांति बहाल की; यह सच है कि उनकी मौजूदगी ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर होने वाली हत्याओं को इक्का-दुक्का घटनाओं तक सीमित कर दिया; यह सच है कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन की ओखला अकादमी में उनकी छोटी सी यात्रा ने उसे हिंसा से सुरक्षित बना दिया; यह सच है कि खूंखार डाकुओं ने उनके कदमों में अपने हथियार डाल दिए; यह सच है कि हिंदू कुरान की आयतें सुनते थे और मुसलमान किसी हिंदू के मुंह से इस्लाम के पवित्र शब्द सुनने पर एतराज़ नहीं करते थे—ये सब बातें उन लोगों को प्रेरित करती रहेंगी या उन्हें कचोटती रहेंगी जिनके काम यह दिखाते हैं कि वे इसे भूल चुके हैं। यह ज़मीर का बीज और उम्मीद का स्रोत है।

हत्या की साज़िश

शनिवार पेठ, पूना में ‘हिन्दू राष्ट्र’ के दफ़्तर में गोडसे और आप्टे को मालूम हुआ कि गांधीजी 13 जनवरी से अपना उपवास शुरू कर रहे हैं। इनके लिए सरकार के कामकाज में गांधीजी का इस तरह से हस्तक्षेप करना असहनीय हो गया। उनके विचार से अगर गांधीजी को नहीं रोका गया तो देश को अपूरनीय क्षति हो जाएगी। आप्टे ने गोडसे से कहा, यह गांधीजी की हत्या करने के लिए सबसे बड़ा कारण है। इस काम को अंजाम देने के लिए हमारे लोग भी तैयार हैं। नाथूराम ने हामी भरी, हां, इस बार हमें गांधीजी को मार देना चाहिए। गोडसे, आप्टे और इनके साथी गांधीजी से दो कारणों से बेहद ख़फ़ा थे। पहला, गांधीजी ने दिल्ली में 13 जनवरी, 1948 को अपना उपवास शुरू करने का निर्णय क्यों लिया?  दूसरा, जब देश का विभाजन हुआ तब सरकारी संपत्ति भारत-पाकिस्तान में क्यों बंटी?

ह्त्या की साज़िश रची जाने लगी, लेकिन यदि समकालीन मानकों के आधार पर, मारने की साज़िश को देखें तो यह अनुभवहीनता और और भारी अयोग्यता से भरी थी। साज़िशकर्ता अंततः अपनी भयानक परियोजना में सफल हुए, तो उसमें महात्मा गांधी की अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के प्रति पूर्ण उदासीनता का हाथ अधिक था। नाथूराम गोडसे तो उन दिनों हिंदू राष्ट्र के संपादन, हिंदुओं के साथ अन्याय के खिलाफ ज्वलंत संपादकीय लिखने और पेरी मेसन थ्रिलर पढ़ने में अधिक व्यस्त रहा करता था। अब सब साथ में थे, उनके पास एक कारण और कुछ साहसी करने की इच्छा थी। केवल एक चीज गायब थी - लक्ष्य। 12 जनवरी 1948 को वह समस्या भी दूर हो गयी। जैसे ही गांधीजी के अनशन की खबर बाहर आई और सरकार पर पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए दबाव डाला गया, साज़िशकर्ताओं को लक्ष्य भी मिल गया। गोडसे और आप्टे ने तय कर लिया कि अब उन्हें मरना होगा। डी-डे' (हमले का दिन) तुरंत 20 जनवरी तय कर लिया गया।

इन दोनों की आदत के मुताबिक, इसके अलावा कुछ भी तय नहीं किया गया था — हत्या कैसे की जाएगी, कौन से हथियार इस्तेमाल होंगे, और हत्या में मदद के लिए दिल्ली जाने के लिए उन्हें और किन लोगों की ज़रूरत होगी। बाकी बातें बाद में तय होनी थीं साज़िश को अंजाम देने के लिए हथियार जमा करने थे, लोगों को इकट्ठा करना था और उन्हें उनकी भूमिकाएँ सौंपनी थीं। अगले हफ़्ते के दौरान, पूना, बॉम्बे और नई दिल्ली में, टैक्सी और ट्रेनों में, और बॉम्बे की सड़कों पर, उनकी कल्पना ने धीरे-धीरे ऐसी चीज़ें जोड़ीं कि एक भयानक राक्षस जैसा प्लान तैयार हो गया। आप्टे और नाथूराम ने सभी खतरनाक काम अपने साथियों पर डाल दिए थे और खुद पीछे रहने का इरादा किया था। उन्होंने तो उस सबसे सीधे-सादे आदमी, बडगे के नौकर शंकर किस्तय्या के हाथों में भी पिस्तौल थमा दी थी। बेचारे शंकर को यह भी नहीं पता था कि गांधीजी कौन थे, उन्होंने क्या किया था, या उन्हें उन पर पिस्तौल क्यों चलानी थी।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांमहात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-3

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


   11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-3


11.6 प्रेम-पथ की यात्रा और सात घाटियां - साधना सोपान

बारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध फारसी सूफी कवि फरीदुद्दीन अत्तार ने अपनी कालजयी रचना 'मंतक उत्-तैर' (पक्षियों का सम्मेलन / The Conference of the Birds) में सात रहस्यमय घाटियों (Seven Valleys) का रूपक दिया है। उन्होंने प्रेम-पथ की यात्रा के लिए सात घाटियों को पार करना आवश्यक माना है। इन घाटियों को पार किए बिना कोई भी साधक ईश्वर (दिव्य प्रियतम) से एकाकार नहीं हो सकता। उस महान आध्यात्मिक और दार्शनिक मसनवी (कविता) के अनुसार दुनिया भर के पक्षी इकट्ठा होते हैं। वे फैसला करते हैं कि उनका कोई राजा नहीं है। वे अपने राजा 'सीमुर्ग' (Simurgh) को खोजने के लिए निकलते हैं। एक समझदार पक्षी हूदहूद (Hoopoe) उनका रास्ता दिखाता है और उन्हें यात्रा के खतरों के बारे में बताता है। यात्रा के दौरान पक्षियों को सात बेहद कठिन और खतरनाक घाटियों से गुजरना पड़ता है: 1. तल्बी (खोज) - जहाँ इच्छा और जिज्ञासा पैदा होती है। 2. इश्क (प्रेम) - जहाँ दिल प्रेम की आग में जलता है। 3. मारिफत (ज्ञान) - जहाँ सच्चाई का अहसास होता है। 4. इस्तगना (संतोष) - जहाँ दुनिया की चाहत खत्म हो जाती है। 5. तौहीद (एकता) - जहाँ सब कुछ एक नजर आता है। 6. हैरत (आश्चर्य) - जहाँ इंसान चकित रह जाता है। 7. फक्र ओ फना (शून्यता/विस्मृति) - जहाँ अहंकार और खुद का वजूद मिट जाता है। रास्ते की कठिनाइयों, थकान और डर के कारण कई पक्षी मर जाते हैं या पीछे छूट जाते हैं। अंत में केवल तीस पक्षी ही सीमुर्ग के महल तक पहुँच पाते हैं। जब वे महल पहुँचते हैं, तो उन्हें एक आईना दिखाया जाता है। उस आईने में वे खुद को देखते हैं। फारसी में 'सी' का मतलब तीस और 'मुर्ग' का मतलब पक्षी होता है। यानी वे खुद ही 'सीमुर्ग' बन चुके होते हैं। यह इंसानी आत्मा की भगवान तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है। इसका संदेश है कि ईश्वर या सच्चाई बाहर नहीं, बल्कि इंसान के अपने भीतर ही मौजूद है। अहंकार को मिटाकर ही उसे पाया जा सकता है। प्रेम-पथ की यात्रा में सात घाटियां या साधना के सात सोपान पाए जाते हैं।

1. पहली घाटी खोज घाटी है। इसे अनुताप (ईश्वरोन्मुख होना) भी कह सकते हैं।  इसे फारसी में 'वादी-ए-तलब' या Valley of Search कहा जाता है यह लंबी तथा श्रम-साध्य यात्रा है। यहां साधक को सभी सांसारिक वस्तुओं (मोह-माया, पुरानी रूढ़ियों और अपने अहंकार) का परित्याग कर देना होता है। इसमें साधक के मन में अपने वास्तविक स्रोत (ईश्वर) से मिलने की तीव्र व्याकुलता और अटूट धैर्य होता है। साधक दुनिया की झूठी तार्किक समझ को छोड़ देता है। सूफी साधना के प्रारंभिक चरणों (मकामात) में सबसे पहला चरण 'तौबा' (अनुताप या पश्चाताप) होता है। तौबा का वास्तविक अर्थ केवल पापों पर रोना नहीं है, बल्कि सांसारिक विकर्षणों से मुंह मोड़कर पूरी तरह से ईश्वर की ओर उन्मुख हो जाना है। जब तक कोई साधक अपने अतीत की गलतियों पर अनुताप (पश्चाताप) करके अपने हृदय को शुद्ध नहीं करता, तब तक उसके भीतर 'सच्ची खोज' की आग (तलब) पैदा नहीं हो सकती। इसलिए, अनुताप वह पहली आंतरिक चेतना या प्रेरणा है जो साधक को 'खोज की घाटी' में कदम रखने की शक्ति देती है। इस घाटी में साधक को तब तक ठहरना चाहिए जब तक उसके मन को परम ज्योति अपनी रश्मियों में लपेट न ले। यह प्रेम की घाटी (वादी-ए-इश्क) है जहाँ तर्क पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल प्रेम की आग बचती है।

2. दूसरी सीढ़ी है आत्म संयम (जड़ आत्मा पर पूर्ण अधिकार कर लेने का प्रयत्न करना)। सूफी अध्यात्म में इसे 'मुजाहदा' (आंतरिक संघर्ष) या 'वरअ' (पवित्रता/परहेज) कहा जाता है, जिसका मूल उद्देश्य 'नफ्स' (जड़ आत्मा या निम्न अहंकार) पर पूर्ण नियंत्रण पाना है। यहाँ साधक अपनी इंद्रियों, वासनाओं और भौतिक इच्छाओं पर कड़ा पहरा बिठाता है ताकि उसकी आत्मा पवित्र हो सके। साधक उपवास (रोजा), मौन, एकांतवास और निरंतर ईश्वर के स्मरण (जिक्र) के जरिए इस जड़ आत्मा को बेड़ियों में जकड़ता है। इसे इश्क की घाटी (Valley of Love) कहते हैं। इस दूसरी घाटी में प्रवेश करते ही साधक का तर्क और बुद्धि पूरी तरह जलकर राख हो जाते हैं। यहाँ केवल शुद्ध और निश्छल प्रेम (इश्क) का राज होता है। प्रेमी अपने प्रियतम (ईश्वर) के विरह और मिलन के दर्द में पूरी तरह डूब जाता है। सूफी रहस्यवाद कहता है कि सच्चा प्रेम बिना आत्म संयम के जन्म ही नहीं ले सकता। जब साधक आत्म संयम के जरिए अपनी जड़ आत्मा को भस्म कर देता है, तभी उसके दिल में ईश्वर के लिए वास्तविक और निश्छल प्रेम की आग जलती है। जब तक इस पर अधिकार नहीं होता, तब तक रूह आजाद होकर ईश्वर की तरफ आगे नहीं बढ़ सकती। परम ज्योति का स्पर्श पाकर साधक प्रेम की अनंत घाटी में प्रवेश करता है। प्रेमी को प्रेमास्पद से मिलने की अदम्य इच्छा प्रेम-पथिक बनने के लिए विवश कर देती है। यहां से उसका रहस्यवादी साधक का जीवन शुरु होता है। प्रेमी इस पथ पर चलने के लिए समय की परवाह नहीं करता। उसकी आंखों में प्रेमाश्रु मात्र का संबल होता है।

प्रेम पंथ दिन घरी न देखा।

तब देखै जब होइ सरेखा॥

जेहि तन पेम कहां तेहि मांसू।

कया न रकत न नयन्हि आंसू॥ (जायसी)

मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित 'पद्मावत' की ये पंक्तियाँ प्रेम के सर्वोच्च और निश्छल रूप को दर्शाती हैं। सूफी काव्य परंपरा के अनुसार प्रेम का मार्ग कठिन है, जहाँ सच्चा अनुराग होने पर प्रेमी का शरीर विरह की अग्नि में तपकर क्षीण हो जाता है और शरीर में रक्त तथा आँखों में आँसू तक शेष नहीं बचते। यह स्थिति सूफी साधना में आत्म-उत्सर्ग और ईश्वर के प्रति तीव्र अनुराग की चरम अवस्था को प्रकट करती है।

3. तीसरी सीढ़ी है वैराग्य (वासना का परित्यागसांसारिक सुखों के प्रति विरक्ति)। सूफी शब्दावली में इसे 'ज़ुहद' (Asceticism) कहा जाता है। इसका वास्तविक अर्थ है वासना का परित्याग करना और सांसारिक सुखों व भौतिक आकर्षणों के प्रति पूरी तरह विरक्त (उदासीन) हो जाना। जब साधक आत्म संयम में सफल हो जाता है, तब उसके भीतर स्वाभाविक रूप से 'ज़ुहद' (वैराग्य) का जन्म होता है। अब उसे सांसारिक सुख, धन-दौलत और वासनाएँ आकर्षित नहीं करतीं। वह दुनिया में रहते हुए भी दुनिया का नहीं रहता। सूफी संतों के अनुसार, वैराग्य का मतलब हाथ में कटोरा लेकर जंगल भाग जाना नहीं है, बल्कि हृदय से संसार की इच्छा को निकाल देना है। प्रसिद्ध सूफी कथन है: "वैराग्य यह नहीं है कि आपके पास कुछ न हो, बल्कि वैराग्य यह है कि कोई भी सांसारिक वस्तु आपको (आपके दिल को) अपना गुलाम न बना सके।" इस सीढ़ी पर साधक का हृदय भौतिक सुखों और वासनाओं से पूरी तरह खाली हो जाता है, ताकि उसमें केवल और केवल ईश्वर (माशूक) के प्रेम के लिए जगह बचे। फरीदुद्दीन अत्तार ने इसे 'वादी-ए-इस्तिगना' (वैराग्य या स्वतंत्रता की घाटी) कहा था। सूफी सिद्धांतों में जिसे शुरुआत में एक 'साधना या सीढ़ी' (ज़ुहद) के रूप में अपनाया जाता है, वही यात्रा के आगे बढ़ने पर एक गहरे 'आध्यात्मिक अनुभव' (इस्तिगना) में बदल जाता है, जहाँ साधक ईश्वर के अलावा ब्रह्मांड की हर चीज से बेपरवाह हो जाता है। इस तीसरी अवस्था में वह मारिफ़त की घाटी में प्रवेश करता है। इस ज्ञान की घाटी (वादी-ए-मारिफत) में ईश्वरीय रहस्यों का बोध होता है। इस अवस्था में साधक के भीतर आत्मज्ञान और दिव्य ज्ञान का उदय होता है। यहाँ 'ज्ञान' का अर्थ किताबी विद्या नहीं, बल्कि ईश्वर के नूर (प्रकाश) का प्रत्यक्ष अनुभव है। साधक को हर सांसारिक वस्तु में ईश्वर की कारीगरी और उसकी उपस्थिति दिखने लगती है। इस घाटी में यात्री को सत्य का रहस्य ज्ञात हो जाता है। यह वह ज्ञान है जो ईश्वर की प्रकृतिगुण और उसके कार्यकलापों पर ध्यान लगाने से प्राप्त होता है। यहाँ मानव ईश्वर की उपलब्धि अनुभूति के द्वारा करता है। प्रेमी का लक्ष्य प्रेमोपलब्धि ही होता है। उसे पाकर वह फिर से इस नश्वर संसार में नहीं आना चाहता।

पेम पंथ जौं पहुंचै पारां।

बहुरि न आइ मिलै एहि छारां॥

भलेहिं पेम है कठिन दुहेला।

दुइ जग तरा पेम जेईं खेला॥ (जायसी)

मलिक मोहम्मद जायसी की इन पंक्तियों में प्रेम के आध्यात्मिक महत्व और उसकी कठिन राह का वर्णन किया गया है, जो उनकी प्रसिद्ध रचना 'पद्मावत' से ली गई हैं। जायसी के अनुसार, प्रेम का मार्ग भले ही अत्यंत कठिन और दुखों से भरा है, लेकिन इस पर चलकर पार पाने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। सच्चे प्रेम का खेल खेलने वाला इस लोक और परलोक दोनों में तर जाता है, क्योंकि लौकिक प्रेम ही अलौकिक यानी ईश्वरीय प्रेम प्राप्ति का माध्यम है।

4. चौथी सीढ़ी है दारिद्र्य (लोक निन्दाअपमान आदि से विचलित न होना)। सूफी साधना (मकामात) की चौथी सीढ़ी 'फ़क़्र' (दारिद्र्य) है, लेकिन इसका अर्थ समाज द्वारा किए गए अपमान को सहना नहीं है। यहाँ साधक यह मान लेता है कि उसका अपना कोई वजूद, धन या ज्ञान नहीं है। वह ईश्वर के सामने पूरी तरह 'भिखारी' या 'शून्य' बन जाता है। प्रसिद्ध सूफी वचन है: "अल्फ़क़्रू फ़ख़्री" (अर्थात् मेरी यह आध्यात्मिक दरिद्रता ही मेरा गौरव है)। यह चौथी घाटी एकत्व की घाटी है। यह आनंद की घाटी है। इसमें साधक को ईश्वरीय सौंदर्य की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। यह सोपान प्रेम साधक को उन्माद की स्थिति में ले जाता है जिसे समाधि कहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रेमी को तीनों लोक चौदह भुवन में प्रेम के अतिरिक्त कुछ भी लावण्यमय नहीं दिखता है।

तीन लोक चौदह भुवन खण्ड सबै परै मोहिं सूझि।

पेम छाड़ि किछु और न लोना जौं देखौं मन बूझि॥ (जायसी)

यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य 'पद्मावत' से ली गई हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से जायसी ने प्रेम की सर्वोच्चता और उसकी व्यापकता को प्रतिपादित किया है। इन पंक्तियों का सरल अर्थ है
"
यदि मैं अपने मन में भली-भाँति विचार करके (सोच-समझकर) देखूँ, तो मुझे तीनों लोक (आकाश, पाताल, मृत्युलोक) और चौदह भुवन (ब्रह्मांड के सभी चौदह खंड) दिखाई देते हैं। (परन्तु इस पूरी सृष्टि में) प्रेम को छोड़कर और कुछ भी सुंदर, सलोना या मूल्यवान नहीं है।" जायसी कहते हैं कि ज्ञान या आध्यात्मिक साधना के बल पर कोई व्यक्ति तीनों लोकों और चौदह भुवनों का रहस्य जान सकता है, लेकिन यदि उसके हृदय में प्रेम नहीं है, तो वह सब व्यर्थ है। यहाँ 'लोना' शब्द का अर्थ लावण्यमय, सुंदर, आकर्षक या नमक (जो भोजन में स्वाद लाता है) से है। कवि का तात्पर्य है कि जैसे बिना नमक के भोजन बेस्वाद है, वैसे ही प्रेम के बिना यह पूरी सृष्टि और जीवन फीका है।

5. पांचवीं सीढ़ी है धैर्य (दरिद्रता की दशा में शान्त भाव से सहना)। सूफी शब्दावली में इसे 'सब्र' (Sabr - Patience) कहा जाता है। इसका अर्थ है 'फ़क़्र' (दारिद्र्य, शून्यता या भौतिक अभाव) की कठिन दशा में बिना किसी शिकायत के, शांत और अडिग भाव से सब कुछ सहना। जब साधक चौथी सीढ़ी 'फ़क़्र' (दारिद्र्य/शून्यता) को स्वीकार करता है, तब उसका जीवन सांसारिक सुखों से पूरी तरह खाली हो जाता है। इस कठिन परीक्षा की घड़ी में पाँचवीं सीढ़ी के रूप में 'धैर्य' (सब्र) का जन्म होता है। जब भौतिक वस्तुएं पास न हों (दरिद्रता हो), या जब साधना का मार्ग बहुत कठिन हो जाए, तब साधक के मन में कोई शिकायत (शिकवा) नहीं आता। वह शांत भाव से ईश्वर के फैसले का इंतजार करता है। अपनी जड़ आत्मा की इच्छाओं (नफ्स/वासनाओं) को काबू में रखते समय शांत रहता है। साधक ईश्वर के स्मरण और कठिन आध्यात्मिक नियमों (इबादत/साधना) पर लगातार टिके रहता है। यह पांचवीं घाटी अनासक्ति की घाटी है, इसमें ईश्वरीय प्रेम से अभिभूत होना पड़ता है। यह अद्वैत की अवस्था है। यहाँ साधक को यह आभास होता है कि संसार में अनेकता केवल एक भ्रम है और वास्तव में सब कुछ एक ही सत्ता (ईश्वर) का रूप है। 'मैं' और 'तुम' का भेद मिटने लगता है। इस इस्तित्ना की घाटी में पहुँचकर साधक पूरी तरह से दुनिया से विरक्त हो जाता है। उसे अब संसार की किसी भी सुख-सुविधा, प्रशंसा या भय की परवाह नहीं रहती। वह केवल और केवल अपने दिव्य प्रियतम पर निर्भर हो जाता है। इस दशा में पहुँच कर साधक अपने आपको भूल जाता है। दिव्य प्रेमोपलब्धि के बाद प्रेमी कामना रहित हो जाता है, निष्काम हो जाता है।

न हैं सरग क चाहौं राजू।

ना मोहि नरक सेंति किछु काजू॥

चाहौं ओहि कर दरसन पावा।

जेइ मोहि आनि पेम पथ लावा॥ (जायसी)

मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित इन पंक्तियों का मुख्य अर्थ ईश्वर (प्रियतम) के प्रति निश्छल, अनन्य और निःस्वार्थ प्रेम को प्रकट करना है। सूफ़ी काव्य परंपरा में मोक्ष या स्वर्ग की चाह के स्थान पर केवल ईश्वर के दर्शन की लालसा को सर्वोपरि माना गया है। इसका अर्थ है, मुझे स्वर्ग के सुखों या वहाँ के राज्य की कोई चाह (इच्छा) नहीं है। और न ही मुझे नरक से कोई डर या उसके कष्टों से कोई सरोकार है। मैं तो केवल उस (ईश्वर/परमात्मा) के दर्शन पाना चाहता हूँ। जिसने मुझे इस संसार में लाकर प्रेम के मार्ग (प्रेम पंथ) पर अग्रसर किया है। सूफ़ी मत के अनुसार, सच्चा प्रेमी (साधक) स्वर्ग के लोभ या नरक के भय से मुक्त होता है। वह ईश्वर की भक्ति किसी लालच में नहीं, बल्कि केवल उसके प्रेम में डूबकर करता है। उन्हें न तो स्वर्ग का राजा बनना है और न ही नरक की चिंता है; उनका एकमात्र लक्ष्य उस परम सत्ता का साक्षात्कार करना है जिसने उनके हृदय में प्रेम की ज्योति जगाई है।

6. छठी सीधी है ईश्वर में विश्वास। धैर्य (सब्र) की पांचवीं सीढ़ी को पार करने के बाद ही साधक के भीतर छठी सीढ़ी 'तवक्कुल' (ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और आत्मसमर्पण) का उदय होता है। जो साधक शांत भाव से सहना सीख जाता है, वह अंततः अपना सब कुछ ईश्वर के हाथों में सौंपने के काबिल बन जाता है। इस अवस्था में साधक अपनी इच्छाओं, योजनाओं और अपने पूरे अस्तित्व को परमात्मा की मर्जी के हवाले कर देता है। इस सीढ़ी पर पहुँचकर साधक कल की चिंता पूरी तरह छोड़ देता है। उसे पक्का विश्वास होता है कि जिसने उसे पैदा किया है, वही उसकी हर जरूरत को पूरा करेगा। सूफी संत मानते हैं कि तवक्कुल का मतलब हाथ पर हाथ धरकर बैठना नहीं है। इसका अर्थ है—अपने हिस्से का कर्म पूरी ईमानदारी से करना, लेकिन उसके परिणाम को पूरी तरह ईश्वर पर छोड़ देना। सूफी ग्रंथों में तवक्कुल की चरम स्थिति को समझाने के लिए एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया जाता है: "साधक को ईश्वर के हाथों में वैसा ही हो जाना चाहिए, जैसे नहलाने वाले (ग़स्साल) के हाथों में एक मृत शरीर (लाश) होता है।"
जैसे एक मृत शरीर खुद को नहलाने वाले की मर्जी पर छोड़ देता है (वह न खुद हिल सकता है, न विरोध कर सकता है), वैसे ही तवक्कुल की अवस्था में साधक का अपना कोई विरोध या मर्जी नहीं बचती। वह ईश्वर की इच्छा की लहरों पर तैरता है। साधक ईश्वर पर वैसे ही भरोसा करता है जैसे कोई मुवक्किल अपने वकील पर करता है। साधक ईश्वर पर इस तरह निर्भर हो जाता है जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ पर करता है। बच्चा नहीं जानता कि भोजन कहाँ से आएगा, लेकिन उसे पता है कि माँ है तो उसे भूखा नहीं रहना पड़ेगा। जब मान बच्चे को हाथों में लेकर हवा में ऊपर उछालती है तो बच्चा डरता या रोता नहीं, हंसता है। उसे मालूम है कि जब वह नीचे आएगा तो वह मान के सुरक्षित हाथों में होगा। साधक अपनी चेतना को इतना विलीन कर देता है कि उसे ईश्वर के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता। यहाँ उसकी व्यक्तिगत इच्छा पूरी तरह समाप्त हो जाती है।

यह छठी घाटी कौतूहल तथा चकाचौंध (हैरत की घाटी) की घाटी है। इसे हैरत की घाटी कहते हैं। ईश्वर की असीम सुंदरता और उसकी महिमा को देखकर साधक पूरी तरह स्तब्ध और विस्मित (हैरान) रह जाता है। वह सुध-बुध खो बैठता है और यह अंतर भी भूल जाता है कि वह स्वयं क्या है और उसका प्रियतम क्या है। वह केवल असीम विस्मय में डूबा रहता है।

यहां सूफ़ी साधक की अंतर्दृष्टि का पुनः लोप हो जाता है और वह अंधकार में फंसता अनुभव करता है। जिसने प्रेम-मार्ग पर चलकर अपना सिर उतारकर ज़मीन पर नहीं रखा, उसका पृथ्वी पर आना ही व्यर्थ हो गया। प्रेम के बल पर ही मनुष्य बैकुण्ठ का जीव बन पाता है, अन्यथा उसकी स्थिति एक मुट्ठी धूल के समान है।

मानुस पेम भएउ बैकुंठी।

नाहिं त काह छार एक मूंठी॥ (जायसी)

इस पंक्ति के माध्यम से जायसी ने जीवन में प्रेम की महिमा और उसके सर्वोच्च मूल्य को रेखांकित किया है। मनुष्य प्रेम के कारण ही बैकुंठ (स्वर्ग या मोक्ष/परम आनंद) का अधिकारी बनता है, अर्थात् उसका जीवन धन्य और दिव्य हो जाता है। अन्यथा (यदि जीवन में प्रेम न हो तो) यह मानव शरीर एक मुट्ठी राख (छार) के समान निरर्थक और तुच्छ है। सूफी विचारधारा में ईश्वर को प्रेम के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। पंचतत्त्वों से बना यह क्षणभंगुर मानव शरीर तब तक सार्थक नहीं है, जब तक इसमें प्रेम का संचार न हो। जब मनुष्य के हृदय में सच्चा, निश्छल और उदार प्रेम उत्पन्न होता है, तो वह सांसारिक विकारों से ऊपर उठकर दिव्य (बैकुंठी) बन जाता है। प्रेम ही मनुष्य को अमरत्व प्रदान करता है। यदि जीवन में प्रेम, करुणा और सहानुभूति नहीं है, तो मनुष्य चाहे जितना भी धन, ज्ञान या शक्ति अर्जित कर ले, मृत्यु के बाद उसका भौतिक अस्तित्व केवल एक मुट्ठी राख बनकर रह जाता है। प्रेम के बिना मानव जीवन पूरी तरह से शून्य और मूल्यहीन है। संदेश यह है कि प्रेम ही इस नश्वर संसार में शाश्वत तत्व है। प्रेम के बल पर ही आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव है और यही मानव जीवन का चरम उद्देश्य है।

7. सातवीं सीढ़ी है सन्तोष (आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता होना)।  तवक्कुल (पूर्ण ईश्वर-विश्वास) की इस छठी सीढ़ी को पार करने के बाद साधक सातवीं और अंतिम सीढ़ी 'रिदा' या 'रज़ा' (पूर्ण संतुष्टि और आनंद) पर पहुँचता है, जहाँ उसे ईश्वर की हर मर्जी में परम सुख मिलने लगता है। 'रिदा' या 'रज़ा' का अर्थ है—ईश्वरीय इच्छा में पूर्ण संतुष्टि और परम आनंद की स्थिति। जब साधक छठी सीढ़ी यानी 'तवक्कुल' (पूर्ण ईश्वर-विश्वास) को पूरी तरह आत्मसात कर लेता है, तब वह इस सर्वोच्च अवस्था में प्रवेश करता है। यहाँ साधक का अपना कोई दुख, सुख, इच्छा या शिकायत नहीं बचती। ईश्वर उसे जिस हाल में रखता है—चाहे वह सुख हो या कठिन से कठिन विपत्ति—वह हर परिस्थिति को परमात्मा का प्रसाद मानकर उसमें परम आनंद का अनुभव करता है। 'रिदा' का वास्तविक अर्थ है शिकायत का पूर्ण अंत। इस अवस्था में साधक के दिल से 'क्यों' और 'काश्' (ऐसा क्यों हुआ या ऐसा होना चाहिए था) जैसे शब्द हमेशा के लिए मिट जाते हैं। वह ईश्वर के हर फैसले पर मुस्कुराता है। आम इंसान मुश्किलों में दुखी होता है, लेकिन 'रिदा' पर पहुँचा सूफी संत विपत्ति में भी उसी आनंद का अनुभव करता है जो उसे सुख में मिलता है। उसे दुःख देने वाले में भी केवल अपने प्रियतम (ईश्वर) का हाथ दिखाई देता है। यह सातवीं सीढ़ी साधक को अध्यात्म के उच्चतम अनुभवों से जोड़ती है। हाँ साधक की व्यक्तिगत इच्छा ईश्वर की इच्छा में पूरी तरह विलीन (फ़ना/अहंकार का विनाश) हो जाती है। जब साधक खुद को मिटा देता है, तब वह ईश्वर के शाश्वत अस्तित्व का हिस्सा (बका /परमात्मा में स्थायित्व) बन जाता है। अब वह जो कुछ देखता है, सुनता है या करता है, वह सब ईश्वर के माध्यम से ही होता है।

इसे फ़ना और बक़ा की घाटी भी कहते हैं यह सूफी यात्रा की अंतिम मंजिल है। 'फ़ना' का अर्थ है साधक के अहंकार, अस्तित्व और 'स्व' का पूरी तरह से नष्ट हो जाना। जब साधक का अहंकार मर जाता है, तब वह 'बक़ा' (ईश्वर के शाश्वत अस्तित्व) को प्राप्त करता है। जैसे नदी समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है, वैसे ही आत्मा परमात्मा में लीन होकर एक हो जाती है।

यह सातवीं घाटी हक़ीक़तकी घाटी है। इसमें आत्मा का प्रेम के महासागर में विलय हो जाता है। वस्ल (मिलन) में साधक ईश्वर को अपने सामने देखता है और उसे पूर्ण संतोष की प्राप्ति होती है। प्रेम और समुद्र समान हैं। दोनों ही अनंत और अगाध हैं। जिस व्यक्ति ने प्रेम-सागर के दर्शन कर लिये, उसे साधारण समुद्र बूंद के समान प्रतीत होता है।

औ जेइं समुंद पेम कर देखा।

तेइं यह समुंद बुंद बरु लेखा॥ (जायसी)

यह पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य 'पद्मावत' के 'प्रेम खंड' (या कड़बक) से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने ईश्वर और सृष्टि में व्याप्त प्रेम की असीमता, व्यापकता और उसकी महिमा का वर्णन किया है। इसका अर्थ है, जिस किसी ने भी उस अलौकिक या ईश्वरीय प्रेम रूपी समुद्र को देख लिया है (अर्थात उसके रहस्य और गहराई को समझ लिया है), उसके सामने यह विशाल भौतिक (संसार का) समुद्र महज़ एक छोटी सी बूँद के समान प्रतीत होता है। संसार में जिसे हम सबसे बड़ा और असीम मानते हैं—जैसे कि समुद्र—वह भी ईश्वर के विराट प्रेम के सामने एक छोटी सी पानी की बूँद जैसा तुच्छ है। सूफी काव्य परंपरा में ईश्वर को प्रेम का अनंत सागर माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य को उस सच्चे, आध्यात्मिक और परम प्रेम की अनुभूति हो जाती है, तो संसार की बड़ी से बड़ी वस्तु या भौतिक विस्तार भी उसके सामने बहुत छोटा और नगण्य (बूँद के समान) लगने लगता है।

प्रसिद्ध सूफी महिला संत हज़रत राबिया अल-अदविया 'रिदा' और निश्छल प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती हैं। एक बार उनसे पूछा गया: "क्या आप शैतान से नफरत करती हैं?" हज़रत राबिया ने बहुत सुंदर उत्तर दिया: "प्रियतम (ईश्वर) के प्रेम ने मेरे हृदय को इस कदर भर दिया है कि वहाँ किसी और के लिए—यहाँ तक कि शैतान से नफरत करने के लिए भी—कोई जगह नहीं बची है।"
यही 'रिदा' की स्थिति है, जहाँ साधक द्वेष, नफरत और सांसारिक द्वंद्वों से ऊपर उठकर केवल दिव्य प्रेम के सागर में तैरता है।

इस प्रकार, अनुताप (तौबा) से शुरू हुई यह प्रेम-पथ की यात्रा आत्म संयम, वैराग्य, दरिद्रता, धैर्य और तवक्कुल के कठिन रास्तों से गुजरती हुई अंततः 'रिदा' (पूर्ण संतुष्टि) के शिखर पर पहुँचकर विश्राम पाती है। यहाँ साधक और ईश्वर (आत्मा और परमात्मा) के बीच का पर्दा हमेशा के लिए हट जाता है।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर