राष्ट्रीय आन्दोलन
490.
दिल्ली में उपद्रवों का वहशियाना तांडव
1947
कलकत्ता और बंगाल में वातावरण
अब शांत था। अपने शांति-मिशन के काम को ज़ारी रखने के लिए वे पंजाब यात्रा के लिए निकल
पड़े। पंजाब, पश्चिमोत्तर
सीमाप्रांत और सिंध में आग की भीषण लपटें उठ रही थीं। रावलपिंडी में हिन्दू क़त्लेआम
के समाचार आ रहे थे। अमृतसर आदि शहरों
में मुसलमानों के साथ मार काट शुरू हो गया और फिर लाहौर में यही सब होने लगा। पंजाब के दोनों तरफ
मुख्य रूप से यह सिखों और मुसलमानों के बीच उन्माद का चरमोत्कर्ष था। लगभग एक करोड़ लोग अपना घर-बार छोड़ कर आसरा ढूँढने के लिए सरहद के इस पार आ रहे
थे। भीषण आपाधापी थी। कैम्पबेल ने अपनी डायरी में लिखा था, “मैं पतली सड़कों पर रेंगते हुए, शरणार्थियों की साठ मील से अधिक लंबी कतारों के
ऊपर से उड़ा जिसमें परिवार अपना सब-कुछ गाड़ियों पर लादे चले जा रहे थे।”
7 सितंबर, 1947 को गांधीजी रात को नौ
बजे बेलूर स्टेशन से विदा हुए। उन्हें विदा करने मुख्यमंत्री प्रफुल्ल घोष और सुहरावर्दी
आए थे। जब ट्रेन छूटी तो सुहरावर्दी की आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी। जाना तो
वे पंजाब चाह रहे थे लेकिन जा न पाए। उनकी इच्छा थी कि पंजाब में सांप्रदायिक घृणा
की कौंधती लपटों पर ‘पानी की एक बाल्टी डाल सकें’। लेकिन जब 9 सितंबर को कलकत्ता मेल से गांधीजी दिल्ली पहुंचे
तो उन्हें पता चला कि पंजाब को हिला देने वाले पागलपन का केन्द्र अब दिल्ली था। स्टेशन
पर सरदार पटेल उन्हें लेने आए थे। सरदार ने रास्ते में गांधीजी को बताया, “उच्छृंखल हिंसा और भीषण उपद्रवों का वहशियाना तांडव
दिल्ली को अपनी जकड़ में लिया हुआ है और इसके कारण वहां का कामकाज ठप्प हो गया है। देश
की राजधानी दिल्ली सुलग रही है। नेहरू के नेतृत्व में सरकार ने निष्पक्षता से और बड़ी
फुर्ती से काम किया है। सेना के ज़ोर पर शहर में श्मशान सी निर्जीव शांति छाई हुई है।”
बिरला भवन
4 सितम्बर से राजधानी में साम्प्रदायिक दंगे फूट पड़े थे। शहर में 24 घंटे का कर्फ़्यू लगा हुआ था। सेना बुला ली गई थी। सड़कों पर लाशें बिछी हुई थीं।
इस बार गांधीजी को भंगी बस्ती की झोंपड़ी में नहीं
लाया गया। भंगी कॉलोनी का उनका घर शरणार्थियों को दे दिया गया था, इसलिए कलकत्ते से
लौटने के बाद गांधी जी को घनश्यामदास बिरला के नई दिल्ली के बिरला भवन ले जाया गया।
सरकार की सारी सुख-सुविधाओं से लैस बिरला भवन में गांधीजी ख़ुद को कलकत्ते से अधिक असहाय
महसूस कर रहे थे। दिल्ली पर पुलिस और सेना द्वारा थोपी गयी शांति से गांधीजी भला कैसे
संतुष्ट हो सकते थे। वह हिन्दू और मुसलमानों के दिल से हिंसा को दूर करना चाहते थे।
काम बड़ा ही दुसाध्य था। राजधानी में कई शरणार्थी कैम्प थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान
से भाग कर आये हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान
सीमा के पार जाने की प्रतीक्षा में पड़े थे।
मुसीबत की जो कहानियां गांधीजी ने सुनी, उनसे उनकी अन्तरात्मा
को भारी आघात पहुंचा। अन्न की दुकानें लूट ली गई थीं। खाने-पीने का सामान मिलना मुश्किल
हो गया था। डॉ. जोशी जैसे मशहूर सर्जन, जो एक मुसलमान पेशेण्ट देखने जा रहे थे, को
एक मुसलमान घर से गोली चलाकर मार दिया गया था। समाज-विरोधी तत्वों का बोलबाला था। हिंसा
अचानक शुरू हुई थी और कुछ ही दिनों में इसने इतना विकराल रूप धारण कर लिया था कि जब तक कुछ
हो पाता तब तक मानवीयता के तमाम मूल्य ताक पर रख कर बर्बरता ने दोनों तरफ के कमजोर
अल्पसंख्यकों के साथ नंगा नाच खेला था। पश्चिम पंजाब से आने वालों शरणार्थियों का तांता
लगा हुआ था। वे भयंकर कहानियां लेकर आए थे। गांव के गांव बरबाद कर दिए गए थे। औरतों
की बेइज़्ज़ती कर दी गई थी और उन्हें लूट के माल की तरह बांटा गया था। कभी-कभी तो खुले
आम बेचा गया था। शिशुओं को भाले से गोद-गोद कर मार डाला गया था। ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन
किया गया था। निराश्रितों के काफिले और ट्रेनों पर हमले किए गए थे। दिल्ली में जो कुछ
हुआ, वह सीधे-सीधे इन्हीं कहानियों का परिणाम था। साम्प्रदायिक ज़हर पुलिस और सेना में
भी घुस गया था। गांधीजी का दिल आर्तनाद कर उठा, “क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या
उनमें कुछ भी इंसानियत नहीं बची है?”
संयुक्त रक्षा परिषद की सलाह पर पंजाब बाउंड्री
फ़ोर्स को 31 अगस्त की रात से समाप्त
कर दिया गया था। सीमा पर शांति बहाली के लिए अब दोनों देशों की कानून-व्यवस्था का उत्तरदायित्व
था। माउंटबेटन की भी सारी जिम्मेदारियां समाप्त हो गई थीं, और वह शिमला में विश्राम
करने चला गया था। दिल्ली की घटनाओं के कारण उसने अपनी छुट्टियां रद्द कर दी और 5 सितम्बर को दिल्ली आ गया। माउंटबेटन की अध्यक्षता में आपातकालीन समिति की बैठक
हुई। दिल्ली को अशान्त क्षेत्र
घोषित कर दिया गया। दंगाइयों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दिए जा चुके थे। दिल्ली
में हर चौथा आदमी शरणार्थी था। लिखित इतिहास में सबसे बड़ा पलायन हो रहा था। पंजाब की
दोनों सीमाओं के पार कोई एक करोड़ लोग इधर से उधर आ-जा रहे थे। शरणार्थियों के आवागमन
के लिए लगभग सभी प्रकार के यातायात संसाधनों का उपयोग किया जा रहा था। 27 अगस्त से 6 नवम्बर के बीच 673 ट्रेनें चलाई गईं, जिन्होंने 27,99,000 लोगों को अपने गन्तव्य तक पहुंचाया था। 4,27,000 से अधिक ग़ैर-मुसलमान और 2,17,000 से अधिक मुसलमानों को
1,200 मोटर वाहनों से ढोया गया था। 963 हवाई जहाजों द्वारा 27,000 लोगों को सीमा पार कराया
गया। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। इससे कहीं अधिक लोग सड़क के रास्ते पैदल आए। साफ-सफाई
की पर्याप्त सुविधा न रहने के कारण महामारी का ख़तरा बना हुआ था। सामने आते और विपरीत
दिशा में जाते शरणार्थियों के कारवां पर हिंसक वारदात होने की संभावना बनी रहती थी।
सीमा के दोनों ही तरफ़ अल्पसंख्यकों के ऊपर भीषण अत्याचार हो रहे थे। सरकार और कांग्रेस के नेताओं के सामने सिर्फ़ एक आशा की किरण थी – महात्मा गांधी! क्या वो कलकत्ता वाला कोई चमत्कार कर दिखाएंगे?
दिल्ली को सांप्रदायिक आग की लपटों में जलता
छोड पंजाब जाने का कोई
तुक गांधीजी की समझ में न आई। सरकार ने स्थिति को संभालने में काफी मुस्तैदी दिखाई
थी। लेकिन पुलिस और सेना के ज़ोर से थोपी हुई शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते थे!
लोगों के दिलों से ही हिंसा और घृणा को मिटाना होगा। काम बहुत ही कठिन था। राजधानी में
कई शरणार्थी कैंप थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भागकर आए हुए हिन्दू और सिख शरणार्थी
भरे हुए थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने के इंतज़ार में पडे
थे। गांधीजी के लिए यहां
जख्मों पर करुणा का मरहम लगाने के सिवा कुछ नहीं बचा था। दिल्ली में अपने पहले
सार्वजनिक वक्तव्य में गांधीजी ने कहा, “मुझे मुस्लिम, सिख या हिंदू नेताओं में कोई नज़र
नहीं आता है जो मुझे अपने-अपने समुदाय के शरारती तत्त्वों पर नियंत्रण करने में सहायता
दे सके।” लेकिन उनका यह विश्वास अडिग बना रहा कि विद्वेष
और हिंसा की उत्तरोत्तर वृद्धि का अन्त केवल प्रेम और अहिंसा से ही हो सकता है। उन्होंने
कहा, “जब तक दिल्ली में फिर से शांति बहाल नहीं हो जाती,
तब तक मैं इस स्थान को नहीं छोड़ सकता।”
10 सितम्बर से गांधीजी ने शहर के उपद्रव पीड़ित भागों का दौरा करना
शुरू कर दिया। पहले ही दिन उन्होंने इकतालीस मील का दौरा किया। उस दिन का आरंभ उन्होंने
हुमायूं मक़बरे के पास अरब की सराय से किया। वहां पर अलवर और भरतपुर से आए मुसलमान पाकिस्तान
ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। मुसलमानों ने कहा, हममें से कोई भारत से जाना नहीं
चाहता। गांधीजी ने उनकी सहायता करने का वचन दिया। फिर वे ओखला स्थित जामिया मिलिया
इस्लामिया विश्वविद्यालय गए। आसपास के गांवों के मुसलिम लोगों ने वहां शरण ले रखी थी।
वहां के उपकुलपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन थे। कुछ दिनों पहले ही उनपर भी जालंधर में भीड़ का
जानलेवा हमला हुआ था। गांधीजी ने कहा, “यदि डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे
पुरुष भी सुरक्षित नहीं हैं, तो भारत में जीकर क्या करना?” यहां के बाद वे दीवान
हॉल गए जहां हिन्दू निराश्रितों का शिविर था। लोगों ने गांधीजी को कठोर हृदय का व्यक्ति
कहा और आरोप लगाया कि आपको हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों से अधिक सहानुभूति है। मुसलमान
नंबर एक कह कर उन पर लांछन लगाया गया कि उनको पीड़ित हिन्दुओं की चिंता कम थी
बनिस्बत उन लोगों की जिन्होंने जानबूझकर इस पीड़ा को जन्म दिया था। वे हिन्दू
‘पंचमांगी’ हैं, मोहनदास गाँधी नहीं बल्कि मुहम्मद गांधी हैं। कुछ दिनों पहले तक उनके
देशवासी ने उनके ‘सनकीपन’ के बावजूद ख़ुशी से
उनका अनुसरण किया था। अब आज़ादी मिल चुकी थी। अब इस बूढ़े को क्यों बर्दाश्त किया
जाए? वह अपनी उपयोगिता खो चुका था।
गांधीजी ने कहा, “आपको नाराज़ होने का हक़
है।” लोग कितने भी नाराज़ हो जाएं, उन्हें मालूम था, “यह बूढ़ा सबका दोस्त है,
किसी का दुश्मन नहीं।” फिर गांधीजी रेलवे स्टेशन
के पास वेवेल कैन्टीन के शिविर में गए। यहां मुसलमान निराश्रित थे। अन्त में गांधीजी
किंग्सवे के निराश्रित शिविर गए। किंग्सवे कैंप की प्रार्थना सभा में जब कुरान की आयतें पढी जाने लगी तो लोग उग्र हो गये क्योंकि कुरान और इस्लाम के नाम पर
ही मुस्लिम गुंडों ने वहाँ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था। गांधीजी की कार पर
पथराव भी हुआ था।
11 सितंबर को गांधीजी राजकुमारी अमृत कौर और सुशीला नायर के साथ
इर्विन अस्पताल गए। दिन रात वहां मरीज़ों का तांता लगा हुआ था। डॉक्टर और कर्मचारी बुरी
तरह थके हुए थे। गांधीजी ने हर बेड के पास खड़े होकर रोगी और उसके रिश्तेदारों को शांति
और सांत्वना दी। गांधीजी के लौटते ही उस अस्पताल पर गोलियों से हमला हुआ। अस्पताल के चारों तरफ़ मुसलमानों की बस्तियां और दफ़्तर थे। दिल्ली की ज़्यादातर पुलिस
मुसलिम थी। उनके बहुत से सिपाही हथियार लेकर भाग गए थे। बंगाल और मध्यप्रदेश से पुलिस
बुलाई गई। मुसलमानों के घरों से छापे में बड़ी भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद
मिले। ऐसे ही अस्त्र-शस्त्र हिन्दुओं के घरों से भी बरामद हुए। कट्टरपंथियों का खुला
खेल चल रहा था, लोग बहकावे में आ रहे थे।
12 सितम्बर को शुक्रवार का दिन था। गांधीजी जामा मस्जिद देखने गए।
वहां पर बहुत गंदगी थी। चप्पल उतारकर गांधीजी सीढ़ियों पर नंगे पैर चले। उस दिन जुम्मे
की नमाज़ थी। बहुत से लोग जमा हुए थे। इसके अलावा उस मस्जिद में 5,000 निराश्रित भी थे। गांधीजी ने गंदगी की ओर उनका ध्यान दिलाया। शाम को राष्ट्रीय
स्वयं सेवक संघ के अधिकारी गांधीजी से मिलने आए। यह बात बहुत प्रचलित थी कि शहर के
विभिन्न भागों में हुए हत्याकांडों में आर.एस.एस. का प्रमुख हाथ था। जो व्यक्ति गांधीजी
से मिलने आया था, गांधीजी से बोला, “हमारा संघ किसी का शत्रु
नहीं है। वह हिन्दुओं की रक्षा के लिए है, मुसलमानों को मारने के लिए नहीं। हम शांति
के समर्थक हैं।” गांधीजी ने कहा, “आपको एक सार्वजनिक वक्तव्य
निकालना चाहिए और अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का खंडन करना चाहिए। साथ ही मुसलमानों
पर हो रहे अत्याचारों की निन्दा करनी चाहिए।” कुछ दिनों के बाद आर.एस.एस.
का एक सम्मेलन भंगी बस्ती में हो रहा था। संघ
की ओर गांधीजी को वहां जाने का निमंत्रण मिला। गांधीजी गए। गांधीजी का स्वागत करते
हुए संघ के नेता ने कहा, “गांधीजी हिन्दू धर्म द्वारा
उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष हैं।” जवाब में गांधीजी ने कहा,
“मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और
न बहिष्कार वादी है। हिन्दू धर्म की विशिष्टता यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों
को आत्मसात कर लिया है। ... मुझे आपके आश्वासन से ख़ुशी है कि आपकी नीति इस्लाम के प्रति
शत्रुतापूर्ण नहीं है।”
गांधीजी ने साफ कहा कि हम यहाँ के मुसलमानों को
पाकिस्तान नहीं भेज सकते। हम वैसा नहीं
करेंगे जैसे पाकिस्तान ने किया। गांधीजी की इच्छा थी कि यदि यहां के हालात सुधरे तो वे पाकिस्तान
जाकर जिन्ना से पूछेंगे कि तुम्हारे उस वादे का क्या हुआ जिसमें तुमने पाकिस्तान में हिन्दुओं के समान
अधिकार की बात कही थी। नित्य संध्या समय अपनी प्रार्थना-सभा में वह इस
प्रश्न की चर्चा करते। वह इस बात पर जोर देते कि बदला लेने से समस्या हल नहीं होगी।
लोगों को शिक्षित करने के प्रयास में उन्होंने अपने को थका डाला। वे रोज लोगों की शिकायतें
सुनते, दुख दूर करने के उपाय
सुझाते, रोज के अनगिनत मिलने
वालों में किसी की पीठ ठोंकते, किसी को झिड़कते, शरणार्थी कैम्पों का
चक्कर लगाते और स्थानीय अधिकारियों से भी मिलते रहते थे। भाग दौड़ और मानसिक पीड़ा
के कारण गांधीजी बीमार पड़ गये थे। उन्होंने पैंसिलीन तो क्या देशी दवा भी नहीं
ली और आराम भी नहीं किया। कहते थे- जब जनता कष्ट से है तब मैं कैसे आराम कर सकता हूं।
मुस्लिम शरणार्थी कैम्प में जाते और वहां की प्रार्थना सभाओं
में गांधीजी कहते, जो हुआ सो हो गया, उसे भूल जाओ। अब दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। भारत में
रहने वाले मुसलमान भी देश के उतने ही नागरिक हैं। उन लोगों को हथियार लौटा देने चाहिए
और तिरंगे का सम्मान कर शांति से रहना चाहिए। पाकिस्तान भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे
मुसलमानों से मिलते, उन्हें भारी दुख झेल रहे दृश्यों का सामना करना पड़ता। लोगों की
बदले की भावना का परिणाम देख कर उनका दिल आर्तनाद करता, “क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या उनमें कुछ इंसानियत
नहीं बची है? पाकिस्तान चाहे कुछ करे, दिल्ली को सभ्य व्यवहार का झंडा ऊपर ही रखना
होगा।” लेकिन लगता था उनकी वाणी में वह पहले वाला जादू नहीं रह गया
था।
हिंदू शरणार्थी कैम्प में भी जाते। लेकिन राजधानी में ही शरणार्थियों
की आपत्तियों के कारण उनकी सभाएँ अस्त-व्यस्त होने
लगीं। बहुत सारे शरणार्थियों को उनकी सभाओं में कुरान की आयतों को पढ़ने की प्रथा पर
आपत्ति थी। “इन्हीं आयतों के साथ हिंदू महिलाओं पर बलात्कार हुआ था। हम आपको
क़ुरान पढ़ने नहीं देंगे। आप मुसलमान नंबर एक हैं। आपको पीड़ित हिंदुओं की चिंता ही नहीं
है। बल्कि आपको उनकी चिंता अधिक है जिन्होंने जानबूझकर इन पीड़ाओं को जन्म दिया है।
आप मोहनदास गांधी नहीं, आप मुहम्मद गांधी हैं।” गांधी मुर्दाबाद के नारे लगते। गांधीजी ने उन लोगों से कहा,
“कोई धर्म बुरा नहीं होता। उनके अनुयायिओं की दुर्मति के कारण
धर्म का द्रोह करना ठीक नहीं है।” आज़ादी मिल जाने के बाद क्या लोगों को यह लग रहा था कि गांधी
अपनी उपयोगिता खो चुका?
साम्प्रदायिकता का ज़हर इतना फैला था कि उसको निरस्त करना कठिन
था। कई लोग इस बात पर नारे लगाने लगते थे कि गाँधीजी उन हिंदुओं और सिखों की पीड़ा के
बारे में बात क्यों नहीं करते जो अभी भी पाकिस्तान में फँसे हुए हैं। डी.जी. तेंदुलकर के शब्दों में, गाँधी जी पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदाय के कष्टों के बारे
में समान रूप से चिंतित थे। उन्हें राहत प्रदान करने के लिए वे वहाँ भी जाना चाहते
थे। लेकिन वहाँ वे किस मुंह से जा सकते थे जबकि दिल्ली में ही वे मुसलमानों को पूरी
सुरक्षा का आश्वासन नहीं दे पा रहे थे।
एक कैम्प के मुस्लिम शरणार्थी से जब गांधीजी मिलने गए तो वहां
की भीड़ बिफर गई। लोग मरने-मारने पर उतारू हो गए। लेकिन निर्भय, करुणा की मूर्ति गांधीजी
ने उन उत्तेजित लोगों को शांत किया, समझाया “मैं तो इन मुसलमानों को बचाने या फिर यहीं मर जाने के लिए ही
दिल्ली आया हूं।” लोगों का रोष पिघला। लेकिन इन
सब घटनाओं के बीच कई ऐसे भी वाकयात हुए जिनमें कई मुसलमानों ने हिंदू-सिखों को बचाया,
वैसे ही अनेक हिंदुओं ने मुसलमान पड़ोसियों की रक्षा की। लेकिन अव्यवस्था अधिक फैली
हुई थी। इस सारी अव्यवस्था में पुलिस की क्रूरता और अनुशासनहीनता और भी भयानक थी। वह
आग में घी डालने का काम कर रही थी।
13 सितम्बर को साम्यवादी नेता पी.सी. जोशी गांधीजी से मिलने आए थे। साम्यवादी
गांधीजी की लगातार निन्दा करते रहते थे। उन पर यह आरोप लगाते थे कि गांधीजी क्रांति
को शुरू करके अपने मूल ‘पूंजीवादी दृष्टिकोण’ के कारण अहिंसा का सहारा लेकर क्रांति
को उसके ‘तर्क-संगत’ अन्तिम परिणाम तक नहीं आने देते थे। साम्यवादियों का कहना था कि
यदि वे इसे अंतिम परिणाम तक आने देते तो पूंजीपतियों
को हानि होती। इसलिए वे इसे बीच में ही रोक देते। ऐसी मान्यता रखने वाले समूह के नेता
जोशी गांधीजी से बोले, “लोकतांत्रिक शक्तियां साम्प्रदायवाद
से लड़ने के लिए तैयार हैं। आप हमें कूच का हुक्म दीजिए। हम आपके आदेशों का पालन करेंगे।” गांधीजी ने कहा, “मैं तो अपने को बिना सेना का सेनापति मानता हूं। मैं किसे कूच
का हुक्म दूं?” जोशी बोले, “यहां सौगुना अधिक ख़राब हालत वाले
कलकत्ते में आपने चमत्कार कर दिखाया। वहां आपके साथ शांति सेना थी, हम यहां आपको होमगार्ड
देंगे। आपने राष्ट्र को बनाया है, अब इसे आगे बढ़ाइए।” गांधीजी बोले, “मैंने ही राष्ट्र को बनाया और मैंने ही इसे बिगाड़ा भी है। मैं
आपकी सलाह से लाभ उठाने का प्रयत्न करूंगा।” हमेशा गांधीजी की नीतियों की आलोचना करने वाले उनसे नेतृत्व
का आग्रह क्यों कर रहे थे? ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय अंग्रेज़ों का साथ देकर साम्यवादियों
ने अपनी लोकप्रियता खो दी थी। उसे फिर से प्राप्त करने के लिए वे गांधीजी के नाम का
उपयोग करना चाहते थे। लेकिन मौक़ापरस्तों को गांधीजी ख़ूब पहचानते थे।
उस दिन गांधीजी पुराने क़िले का मुसलिम निराश्रित शिविर गए। वहां
क़रीब 75,000 मुसलिम पाकिस्तान ले जाये जाने की
प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां राशन की भारी कमी थी। लीगी नेता राशन का गुप्त व्यापार कर
रहे थे। पुलिस वाले की इसमें मिली-भगत थी। गांधीजी के पहुंचते ही भीड़ ने गांधीजी को
घेर लिया। उनके विरोध में नारे लगाए जाने लगे। लोगों ने गाड़ी पर आक्रमण कर दिया। गांधीजी
गाड़ी से बाहर निकल आए। लोगों को दूब के मैदान में बैठ जाने के लिए कहा। गांधीजी
ने पीड़ितों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। अपना दुख जताया। लोगों ने अपने दुखों और कष्टों
की कहानी गांधीजी को सुनाई। गांधीजी ने उनके प्रति अपना भरसक प्रयास करने का वचन दिया।
जो ख़ून के प्यासे थे, अब मित्र बन चुके थे। गांधीजी ने हाथ जोड़कर लोगों से विदाई ली।
इसके बाद गांधीजी दो और शिविर गए, एक मोतिया ख़ान और दूसरा ईदगाह। शाम होते-होते ख़बर
आई कि एक राष्ट्रवादी मुसलिम नेता डॉ. अंसारी की बेटी और दामाद को उनके घर से ज़बरन
निकाल दिया गया और मज़बूरी में उन्हें होटल में शरण लेनी पड़ी है। गांधीजी बहुत निराश
हुए और शाम की प्रार्थना सभा में इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा, “यह बड़े शर्म की बात है कि डॉ. अंसारी
जैसे राष्ट्र-भक्त और हिन्दू-मुसलिम एकता के हिमायती के परिवार वालों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार
हुआ है।”
18 सितंबर को गांधीजी दरियागंज गए और वहां के
मुसलमानों की व्यथा-कथा सुनी। वहां पर मुसलमानों की रक्षा करने के बजाए पुलिस ही उन्हें
उत्पीड़ित कर रही थी। उन दिनों सरदार का भी अंदेशा था कि भारत के मुसलमानों का विशाल
बहुमत भारतीय संघ के प्रति वफ़ादार नहीं है। ऐसे लोगों के लिए पाकिस्तान चले जाना बेहतर
होगा। गांधीजी ने प्रश्न किया, “मैं पूछता हूं कि भारत की सबसे बड़ी
मस्जिद जामा मस्जिद या पश्चिम पंजाब का गुरुद्वारा ननकाना साहब और पंजा साहब का क्या
होगा, अगर कोई भी मुसलमान भारत में और कोई भी सिक्ख पाकिस्तान में नहीं रह सकता? क्या
इन पवित्र स्थानों का और कोई उपयोग किया जाएगा? हरगिज़ नहीं।”
कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि मुसलमानों
द्वारा परित्यक्त घर में शरणार्थियों को बसाया जाए। गांधीजी को यह सुझाव उपयुक्त नहीं
लगा। उन्होंने कहा कि अगर यह सिद्धान्त अपना लिया गया, तो इसका परिणाम बहुत घातक होगा।
तब एक भी ग़ैरमुसलिम पाकिस्तान में और एक भी मुसलिम हिन्दुस्तान में नहीं बचेंगे। इसलिए
बेहतर है कि सरकार इन घरों की तब तक देखभाल करे जब तक इसका मालिक वापस आकर इसे अपनाता
नहीं।
जब वे पुल बंगश, बड़ा हिन्दू राव, खरी
बाओली और चांदनी चौक जैसे मुसलिम बहुल क्षेत्रों की तंग गलियों से गुज़र रहे थे, तो
उन्होंने पूरा इलाक़ा वीरान पाया। बचे-खुचे मुसलमानों ने उनका दिल से स्वागत किया जबकि
कुछ हिन्दू भाइयों ने उनकी कार पर हमला किया और वापस जाओ के नारे लगाए।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर