महात्मा
गांधी हत्या केस-21
12 जनवरी, 1948
12 जनवरी, 1948 को
सोमवार, यानी गांधीजी के मौनव्रत का दिन था।
उन दिनों समूचे उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत में
साम्प्रदायिक स्थिति बहुत ही विकट थी। दिल्ली और उसके आस-पास के इलाक़ों में
पश्चिमी पंजाब से शरणार्थियों के आने का तांता लगा हुआ था। उन सबको रहने की जगह,
गरम कपड़े, भोजन और पानी की व्यवस्था करने में सरकार को काफी मुश्किलों का सामना
करना पड़ रहा था। जिन मुसलमानों को उनके घर से भगा दिया गया था, वे जामा मस्जिद और
चांदनी चौक के शरणार्थी कैम्प में रह रहे थे। हिन्दू और सिख मांग कर रहे थे कि जो
घर मुसलमानों ने ख़ाली कर दिए हैं वे उन्हें दे दिए जाएं। कुछ घरों में ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा
जमा लिया गया था। कुछ मस्जिदों पर भी क़ब्ज़ा जमा कर उसे मंदिर में तबदील कर दिया
गया था। हिन्दू महासभा आदि के कुछ लोग
हिन्दुओं पर पाकिस्तान में हो रहे वीभत्स अत्याचारों, बलात्कार, अपहरण, और धर्म
परिवर्तन की कहानियां फैला रहे थे।
गांधीजी ने एक दोस्त से कहा, "हम धीरे-धीरे दिल्ली पर अपनी पकड़ खो रहे
हैं। अगर दिल्ली हाथ से निकल गई, तो भारत भी हाथ से निकल जाएगा और उसके साथ
ही दुनिया में शांति की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी।" उन्हें यह बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी कि
डॉ. ज़ाकिर हुसैन या शहीद सुहरावर्दी जैसे लोग दिल्ली में उतनी आज़ादी और सुरक्षा
के साथ न घूम सकें, जितनी आज़ादी और सुरक्षा उन्हें खुद हासिल
थी। दिल्ली और दिल्ली के दूसरे हिस्सों में सांप्रदायिक
उन्माद में धीरे धीरे कमी तो आई थी लेकिन दोनों समुदायों के मन में एक दूसरे के प्रति
घोर संदेह और नफरत का भाव भरा था जो जरा सी हवा मिलते
ही सुलग उठता था। गांधीजी पिछले साढे़ चार महीने से जिस शांति के लिए प्रयत्न कर
रहे थे वह ‘शमशान की शांति’ नहीं, दिलों को मिलाने वाली शांति थी। उस सच्ची शांति
का दिल्ली में कहीं पता नहीं था। मुसलमान
निडर और सर्वत्रता पूर्वक राजधानी की सडकों और गलियों में निकल नहीं सकते थे। हृदय
परिवर्तन की कामना करने वाले गांधीजी के लिए यह स्थिति
त्रासद और असहनीय थी। उन्हें पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की तकलीफों की भी उतनी ही
चिंता थी। वह उनकी मदद के लिए जाना चाहते थे। लेकिन वह किस मुंह से वहां जाते, जब वह दिल्ली में मुसलमानों की समस्याओं का पूरा समाधान करने की
गारंटी नहीं दे पा रहे थे? गांधीजी स्वयं को असहाय और लाचार महसूस कर
रहे थे।
तीसरे पहर गांधीजी ने पुरजा लिखकर सुशीला
नायर को दिया। सुशीला पढ़कर स्तब्ध रह गई। उन्होंने अपने भाई और गांधीजी के सचिव प्यारेलाल
को बताया कि गांधीजी ने निश्चय किया है कि अगर दिल्ली का पागलपन बन्द नहीं हुआ, तो
वे आमरण उपवास करेंगे। दलील की कोई गुंजाइश नहीं थी। दो घंटे पहले नेहरू और पटेल उनके साथ थे।
उन्होंने उन्हें इस बात का ज़रा भी संकेत नहीं दिया।
शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी का लिखित वक्तव्य सुनाया गया, “जब मैं नौ सितंबर को कलकत्ते से दिल्ली लौटा
तो इरादा पश्चिम पंजाब जाने का था, लेकिन ऐसा न हो सका। उस समय ख़ुशदिल दिल्ली मुर्दों का
शहर लग रही थी। मैं जब ट्रेन से उतरा तो हर चेहरे पर उदासी पुती थी। सरदार
प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद थे। उन्होंने बिना वक़्त गँवाए मुझे इस महानगर की गड़बड़ियों
के बारे में बताया। मैंने फ़ौरन समझ लिया कि मुझे दिल्ली में ही रहना है और ‘करना है या मरना है'। ... हालांकि फ़ौज और पुलिस की वजह से ऊपरी अमन था, लेकिन दिलों में तूफ़ान था। वह कभी भी फूट
सकता था। इससे मेरा ‘करने’ का संकल्प पूरा नहीं होता था और वही मुझे मौत से अलग रख
सकता था, मौत जो अतुलनीय मित्र है। जिस दिल्ली में
ज़ाकिर हुसैन इत्मीनान से न चल-फिर सकें, वह उनकी नहीं हो सकती थी। मैंने एक व्रत रखने का फैसला
किया है। यह व्रत अगली दोपहर को शुरू होगा और मेरी मृत्यु के साथ समाप्त होगा या
तब समाप्त होगा जब मुझे विश्वास हो जाएगा कि विभिन्न समुदायों ने बाहरी दवाबों के
कारण नहीं बल्कि मुक्त स्वेच्छा से फिर से आपस में मित्रवत संबंध कर लिए हैं।
मैंने आमरण उपवास करने का निर्णय लिया है। इधर मेरी असहायता मेरा दिल कचोटती रही
है। जैसे ही मैं अपना व्रत आरंभ करूंगा, यह समाप्त हो जाएगी। मैं इस पर पिछले तीन
दिनों से चिंतन-मनन करता रहा हूँ। आखिरकार यह फैसला मेरे मन में कौंधा, और मुझे इससे प्रसन्नता हुई। साफ़ दिल वाला
कोई भी इंसान अपनी जान से ज़्यादा कीमती किसी चीज़ की कुर्बानी नहीं दे सकता। यह एक
ऐसा उपवास है जिसे अहिंसा का पालन करने वाला व्यक्ति कभी-कभी समाज द्वारा की गई
किसी गलत बात के विरोध में करने के लिए मजबूर महसूस करता है; और वह ऐसा तब करता है जब अहिंसा के अनुयायी
के तौर पर उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता। मेरे सामने भी ऐसा ही मौका आया है।” उनकी गहरी पीड़ा से ही उपवास करने का
फ़ैसला निकला। इस फ़ैसले पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी।
उनके वक्तव्य में उन कारणों का ज़िक्र था
जिनकी वजह से उन्हें नया उपवास शुरू करना पड़ा। भारत की शान खत्म हो रही थी, कोई भी मुसलमान सुरक्षित नहीं था, दिल्ली में शांति का मतलब तलवार के ज़ोर पर
बनी शांति थी, जहाँ पुलिस और सेना का राज था, और अब आखिरकार इंसानी दिल को बदलने का समय आ
गया था। वे मौत को एक शानदार मुक्ति के तौर पर देख रहे थे क्योंकि इससे उन्हें
भारत की बर्बादी देखने से छुटकारा मिल जाता।
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर आदि मुद्दों को लेकर बहुत तनातनी
का माहौल बन गया था। भारत सरकार ने पाकिस्तान के लिए तय 55 करोड़ रुपये की राशि की दूसरी किस्त रोक ली थी जो उसे बंटवारे के अनुसार दी जानी थी। पाकिस्तान इस किश्त को जारी नहीं
करने के लिए भारत की बदनामी कर रहा था। प्रार्थना
सभा के बाद गांधीजी का साप्ताहिक मौन समाप्त हुआ। गांधीजी माउंटबेटन से मिलने गए।
मंत्रिमंडल के फैसले की क़ानूनी वैधता चाहे जो हो, गांधीजी को नैतिक रूप से यह उचित
नहीं लगता था। उन्होंने निजी तौर पर लॉर्ड माउंटबेटन से पूछा था, “आप इस बारे में क्या सोचते हैं?” उसने कहा, “रुपया न देना
भारत सरकार का प्रथम अकीर्तिकर कार्य हो जाएगा।” गांधीजी का मानना था, “इससे नैतिक स्तर पर सरकार की बदनामी होनी थी। अगर कठिनाई
में नैतिकता छूट जाए तो उस नैतिकता का कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए भारत सरकार इस
नैतिक जिम्मेदारी का पालन करे। अंतरराष्ट्रीय करार के तहत जो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये
देने थे, उसको पूरा किया जाए।”
सात बजे वहां से लौटे। उन्होंने आमरण उपवास की घोषणा कर दी। माउंटबेटन को गांधीजी का निर्णय मंज़ूर था।
माउंटबेटन ने गांधीजी के चलते कलकत्ते में हुए चमत्कार को देखा था। गांधीजी के
सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी ने कहा, “उपवास का यह कदम उचित नहीं है। अभी उतावली
करना ठीक नहीं है।” गांधीजी ने देवदास को समझाया, “ईश्वरीय संकेत के सामने औचित्य का प्रश्न
नहीं हो सकता। बूंद-बूंद रिसते रहने के बदले एक झटके से मर जाना ज़्यादा सुखद और
श्रेयस्कर है। जब तक क़ौमें समझौता नहीं करतीं मैं ज़िन्दा रहना नहीं चाहूंगा।” देवदास ने उनसे पूछा कि क्या यह उपवास
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ है। उन्होंने जवाब दिया, "नहीं, यह तो सबके ख़िलाफ़ है।" गाँधीजी 78 साल
के हो चुके थे। वे उपवास करने में माहिर थे, लेकिन इस थकी देह और उम्र में इस फ़ैसले ने पूरे देश को चिंता और
हैरानी में डाल दिया। गांधीजी की मांग इस बार अपने ही लोगों से थी और वे भी ख़ासकर
हिंदुओं से। वे हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों के दिलों के मिलने
की मांग कर रहे थे।
गांधीजी के जीवनीकार लुई फिशर लिखते
हैं, “गांधीजी के जीवन का तरीका मायने रखता
है, न कि
उनके आस-पास के लोगों पर उनका तुरंत असर। हो सकता है गांधीजी को लगा हो कि उनके
लोगों ने उन्हें छोड़ दिया है। इतिहास का फ़ैसला वे लोग पहले से नहीं जान सकते जो
उसे बनाते हैं। किसी इंसान का कद उसे देखने वाले की नज़र पर निर्भर करता है। जो
लोग उन्हें बहुत मानते थे, उन्हीं से परेशान,
दुखी और नाकाम किए गए गांधीजी
यह नहीं देख पाए कि अपनी ज़िंदगी के आखिरी महीनों में वे किस ऊँचाई पर पहुँच गए
थे। उस दौरान उन्होंने किसी भी समाज के लिए बेहद कीमती काम किया: उन्होंने भारत को
एक अलग और बेहतर ज़िंदगी का ठोस, जीता-जागता उदाहरण दिया। उन्होंने
दिखाया कि इंसान भाई-भाई बनकर रह सकते हैं और खून से सने हाथों वाला वहशी इंसान भी,
भले ही कुछ पल के लिए,
आत्मा की पुकार पर प्रतिक्रिया
दे सकता है। ऐसे पलों के बिना इंसानियत का खुद पर से भरोसा उठ जाएगा। उसके बाद
हमेशा, समाज को
उस रोशनी की झलक की तुलना आम ज़िंदगी के अंधेरे से करनी होगी। यह सच है कि गांधीजी
के उपवास ने कलकत्ता को होश में लाया और वहाँ शांति बहाल की;
यह सच है कि उनकी मौजूदगी ने
दिल्ली में बड़े पैमाने पर होने वाली हत्याओं को इक्का-दुक्का घटनाओं तक सीमित कर
दिया; यह सच है
कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन की ओखला अकादमी में उनकी छोटी सी यात्रा ने उसे हिंसा से
सुरक्षित बना दिया; यह सच है कि खूंखार डाकुओं ने उनके कदमों में अपने हथियार डाल दिए;
यह सच है कि हिंदू कुरान की
आयतें सुनते थे और मुसलमान किसी हिंदू के मुंह से इस्लाम के पवित्र शब्द सुनने पर
एतराज़ नहीं करते थे—ये सब बातें उन लोगों को प्रेरित करती रहेंगी या उन्हें
कचोटती रहेंगी जिनके काम यह दिखाते हैं कि वे इसे भूल चुके हैं। यह ज़मीर का बीज
और उम्मीद का स्रोत है।”
हत्या की साज़िश
शनिवार पेठ, पूना में ‘हिन्दू राष्ट्र’
के दफ़्तर में गोडसे और आप्टे को मालूम हुआ कि गांधीजी 13 जनवरी से अपना उपवास शुरू कर रहे हैं। इनके
लिए सरकार के कामकाज में गांधीजी का इस तरह से हस्तक्षेप करना असहनीय हो गया। उनके
विचार से अगर गांधीजी को नहीं रोका गया तो देश को अपूरनीय क्षति हो जाएगी। आप्टे
ने गोडसे से कहा, “यह गांधीजी की हत्या करने के लिए सबसे बड़ा कारण है। इस
काम को अंजाम देने के लिए हमारे लोग भी तैयार हैं।” नाथूराम ने हामी भरी, “हां, इस बार हमें गांधीजी को मार देना
चाहिए।” गोडसे, आप्टे और इनके साथी गांधीजी से दो कारणों से बेहद ख़फ़ा
थे। पहला, गांधीजी ने दिल्ली में 13 जनवरी, 1948 को अपना उपवास शुरू करने का निर्णय क्यों लिया? दूसरा, जब देश का विभाजन हुआ तब सरकारी संपत्ति भारत-पाकिस्तान
में क्यों बंटी?
ह्त्या की साज़िश रची जाने लगी, लेकिन यदि समकालीन मानकों के आधार पर, मारने की साज़िश को देखें तो यह अनुभवहीनता
और और भारी अयोग्यता से भरी थी। साज़िशकर्ता अंततः अपनी भयानक परियोजना में सफल हुए, तो उसमें महात्मा गांधी की अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा
के प्रति पूर्ण उदासीनता का हाथ अधिक था। नाथूराम गोडसे तो उन दिनों हिंदू राष्ट्र
के संपादन, हिंदुओं के साथ अन्याय
के खिलाफ ज्वलंत संपादकीय लिखने और पेरी मेसन थ्रिलर पढ़ने में अधिक व्यस्त रहा
करता था। अब सब साथ में थे, उनके पास एक कारण और कुछ
साहसी करने की इच्छा थी। केवल एक चीज गायब थी - लक्ष्य। 12 जनवरी 1948 को वह
समस्या भी दूर हो गयी। जैसे ही गांधीजी के अनशन की खबर बाहर आई और सरकार पर
पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए दबाव डाला गया, साज़िशकर्ताओं को लक्ष्य भी मिल गया। गोडसे
और आप्टे ने तय कर लिया कि अब उन्हें मरना होगा। डी-डे' (हमले का दिन) तुरंत 20
जनवरी तय कर लिया गया।
इन दोनों की आदत के मुताबिक, इसके अलावा कुछ भी तय
नहीं किया गया था — हत्या कैसे की जाएगी, कौन से हथियार इस्तेमाल होंगे, और हत्या में मदद के
लिए दिल्ली जाने के लिए उन्हें और किन लोगों की ज़रूरत होगी। बाकी बातें बाद में
तय होनी थीं। साज़िश को अंजाम देने के लिए हथियार
जमा करने थे, लोगों को इकट्ठा करना
था और उन्हें उनकी भूमिकाएँ सौंपनी थीं। अगले हफ़्ते के दौरान, पूना, बॉम्बे और नई दिल्ली
में, टैक्सी और ट्रेनों
में, और बॉम्बे की सड़कों
पर, उनकी कल्पना ने
धीरे-धीरे ऐसी चीज़ें जोड़ीं कि एक भयानक राक्षस जैसा प्लान तैयार हो गया। आप्टे
और नाथूराम ने सभी खतरनाक काम अपने साथियों पर डाल दिए थे और खुद पीछे रहने का
इरादा किया था। उन्होंने तो उस सबसे सीधे-सादे आदमी, बडगे के नौकर शंकर
किस्तय्या के हाथों में भी पिस्तौल थमा दी थी। बेचारे शंकर को यह भी नहीं पता था
कि गांधीजी कौन थे, उन्होंने क्या किया था, या उन्हें उन पर
पिस्तौल क्यों चलानी थी।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर