राष्ट्रीय आन्दोलन
496. कश्मीर का भारत में विलय
जम्मू और कश्मीर रियासत की नींव
हैदराबाद और जूनागढ़
का मामला सफलतापूर्वक सुलझा लिया गया। लेकिन कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच
विवाद की जड़ बन गया। यह दोनों देशों की राजनीति में एक नासूर की तरह बना रहा। जम्मू
और कश्मीर का क्षेत्रफल 84,471 वर्ग मील था और वह भारत
का तीसरा सबसे धनी राज्य था। क्षेत्रफल के लिहाज़ से यह हैदराबाद से भी बड़ा था, लेकिन
उसकी आबादी महज़ 40 लाख थी। यहां की 78 प्रतिशत प्रजा मुसलमान थी और राजा हिन्दू, हैदराबाद राज्य की स्थिति के ठीक उलट था। कश्मीर अपनी सुंदरता और प्राकृतिक
संपदा के लिए मशहूर थी। रणनीतिक रूप से चीन और रूस दोनों की सीमाओं पर स्थित थी। इसलिए, इसका अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान था। कश्मीर भारत और
पाकिस्तान दोनों की सीमा से लगा हुआ था और यह अनेक महत्त्वपूर्ण नदियों का उद्गम
स्थल था। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46) में सिखों की हार के बाद, ब्रिटिश सरकार
(गवर्नर-जनरल सर हेनरी हार्डिंग) और जम्मू के डोगरा राजा गुलाब सिंह के बीच 16 मार्च 1846 को ‘अमृतसर करार’ हुई थी। इसके अंतर्गत महाराजा हरि सिंह के पूर्वज राजा गुलाब सिंह को जम्मू-कश्मीर घाटी को 75 लाख रुपए में बेच दिया
था , जिससे आधुनिक जम्मू और
कश्मीर रियासत की नींव पड़ी। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध में सिख साम्राज्य की हार हुई और उन पर भारी युद्ध
हर्जाना लगाया गया। सिखों के पास नकद पैसे न होने के कारण अंग्रेजों ने उनके
पहाड़ी क्षेत्रों (कश्मीर सहित) पर कब्जा कर लिया। युद्ध में अंग्रेजों की मदद
करने के बदले राजा गुलाब सिंह इस क्षेत्र को खरीदना चाहते थे। गुलाब सिंह ने
ब्रिटिश सरकार को 75 लाख नानकशाही रुपये का भुगतान किया और साथ ही ब्रिटिश सर्वोच्चता को स्वीकार किया और हर साल कर के
रूप में घोड़े, शॉल और बकरियां देना तय किया। यह करार एक सौदा था जिसमें कश्मीर की जनता की
सहमति के बिना पूरी घाटी को बेच दिया गया था।
महाराजा हरि सिंह
1947 में महाराजा हरि सिंह इसका शासक थे। वह सितंबर, 1925 में कश्मीर की गद्दी पर बैठे थे। उन्होंने अपने चाचा, महाराजा प्रताप सिंह के निधन के बाद डोगरा वंश के अंतिम राजा के रूप में
रियासत की गद्दी संभाली थी। उन्हें एक दूरदर्शी, प्रगतिशील और जन हितैषी राजा माना जाता
था। उनके शासनकाल में कई क्रांतिकारी सामाजिक और प्रशासनिक सुधार हुए, जिन्हें आधुनिक कश्मीर की नींव माना जाता है। वे छुआछूत के खिलाफ थे और 1932 में उन्होंने राज्य के सभी मंदिरों को दलितों के लिए खोल दिया था, जो महात्मा गांधी के आंदोलन से भी पहले की एक क्रांतिकारी पहल थी। उन्होंने
बाल विवाह, भ्रूण हत्या और देह व्यापार पर प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने सभी के लिए
प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य की और राज्य में दर्जनों नए स्कूल खुलवाए। कृषि और किसानों की स्थिति सुधारने के लिए 'कृषि राहत अधिनियम' पारित किया। बाहरी
लोगों को कश्मीर में जमीन खरीदने और नौकरी पाने से रोकने के लिए उन्होंने 1927 में 'राज्य उत्तराधिकार कानून' लागू किया था।
उनके व्यक्तित्व का
दूसरा पहलू यह भी था कि वह अपना काफ़ी समय बंबई (मुंबई) के महालक्ष्मी रेसकोर्स के रेसकोर्स और अपनी रियासत
के विशाल घने जंगलों में शिकार करते हुए बिताया करते थे। उन्हें न तो इतिहास की समझ
थी और न ही इसे समझना चाहते थे। महाराजा के मन में विभाजन के बाद किसी भी देश में शामिल
न होने का विचार जड़ जमा चुका था। उन्हें न तो स्वतंत्रता की लहर और न ही प्रजातंत्र
की मांग पसंद थी। वे लोकतांत्रिक शासन की स्थापना के विरुद्ध थे। राज्य में पनपते राष्ट्रीय
आन्दोलन को उन्होंने कुचल डाला था। वे वहां अत्यंत अलोकप्रिय थे और लगभग निरंकुश भी।
उन्होंने मुस्लिम लीग और
हिंदू लॉबी दोनों के साथ कदम-ताल की कोशिश की। एक तरफ़ वे मुसलिम लीग के नेताओं से कहते
कि उनकी अधिकांश प्रजा मुसलमान है, इसलिए उन्हें उनका संरक्षण चाहिए, वहीं दूसरी ओर
वे हिन्दू कट्टरपंथियों से कहते कि एक हिन्दू राजा की रक्षा के लिए उन्हें आगे आना
चाहिए। हरि सिंह कांग्रेस से नफ़रत करते थे, इसलिए वो भारत में शामिल होने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन उन्हें ये
भी फ़िक्र थी कि अगर वो पाकिस्तान में शामिल होते हैं तो उनके हिंदू राजवंश के भाग्य
का सूरज सदा के लिए अस्त हो जाता। उधर कश्मीर की मुस्लिम बहुल जनसंख्या के कारण मोहम्मद अली जिन्ना यह उम्मीद लगाए
बैठा था कि कश्मीर उसकी झोली में 'पके हुए फल की तरह गिरेगा।'
जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस
कश्मीर के महाराजा हरि
सिंह लोकतांत्रिक सरकार बनाने के ख़िलाफ़ थे और उन्होंने अपने राज्य में
राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हरि सिंह एक निरंकुश शासक थे। सरकारी दमन के ख़िलाफ़
जब-जब विरोध होता था उसे ताक़त के ज़रिए दबा दिया जाता था। 1930 के दशक में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त करके कई कश्मीरी नौजवान
कश्मीर लौटे थे जिनमें शेख़ अब्दुल्लाह भी थे। उन्होंने अपनी तरह की सोच रखने वाले
शिक्षित दोस्तों के साथ मिलकर घायलों की मदद के लिए एक राहत अभियान चलाया। इस घटना
से कश्मीरियों में राजनीतिक हलचल पैदा हो गई और इसी दौरान अक्टूबर 1932 में कश्मीर की पहली राजनीतिक पार्टी 'ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस' की स्थापना हुई थी। इसे शेख मोहम्मद अब्दुल्ला और चौधरी गुलाम अब्बास द्वारा
बनाया गया था। 1938 में शेख़ अब्दुल्लाह ने
पार्टी का नाम 'ऑल जम्मू एंड कश्मीर
नेशनल कॉन्फ्रेंस' रखा और ये पार्टी पूरे
कश्मीर की प्रतिनिधि राजनैतिक पार्टी बन गई। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य महाराजा
के निरंकुश शासन को चुनौती देना, रियासत में प्रतिनिधि
सरकार (प्रजा सभा) स्थापित करना और आम जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ना था। नौजवान
नेता शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह राजशाही के ख़िलाफ़
‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। डोगराशाही के ख़िलाफ़ सौ साल में पहली बार विरोध
करने के लिए शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह को 'शेर-ए-कश्मीर' के नाम से पुकारा जाने लगा। हिंदुस्तान समर्थक शेख मुहम्मद अब्दुल्ला कांग्रेस
के साथ थे और जवाहरलाल के क़रीबी थे।
1946 में शेख अब्दुल्ला को महाराजा हरि सिंह ने महाराजा के खिलाफ शुरू किए गए 'कश्मीर छोड़ो आंदोलन' का नेतृत्व करने के कारण उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार कर जेल में डाल
दिया था। महाराजा ने वहां पर सभा, भाषण, जुलूस पर प्रतिबंध लगा रखा था। शेख अब्दुल्ला
का केस लड़ने जवाहरलाल नेहरू जब कश्मीर पहुंचे तो कश्मीर राज्य की सीमा पर कोहाला
में पंडित नेहरू को एक आदेश दिया गया। उनसे तुरंत कश्मीर का इलाका छोड़ने को कहा
गया और जब उन्होंने मना किया, तो उन्हें 20 जून 1946 को गिरफ़्तार कर लिया गया
और राजा ने उन्हें भी उनके ही गेस्टहाउस में नज़रबंद कर दिया था। इस बीच, शेख अब्दुल्ला का मुकदमा भी टाल दिया गया था।
तब देश में कैबिनेट मिशन
की बैठक चल रही थी। गांधीजी ने नेहरूजी को पत्र लिख कर कहा, आपका मान-अपमान कांग्रेस
का मान-अपमान है। लेकिन ऐसे मौक़े पर आपकी दिल्ली में उपस्थिति अनिवार्य है। नेहरूजी
दिल्ली लौट गए। गांधीजी स्वयं शेख अब्दुल्ला से मिलना चाहते थे। 11 जुलाई को गांधीजी ने वायसराय से कहा कि वे ख़ुद काश्मीर जाना चाहते हैं, वहां के
राजा से अनुमति लिया जाए। हरि सिंह ने मना कर दिया। महाराज को समझाने का गांधीजी ने
अनेक प्रयास किए लेकिन महाराजा के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
शेख अब्दुल्ला के मुकदमे
की सुनवाई फिर से 24 जुलाई, 1946 को शुरू हुई। इस बार नेहरू को कश्मीर जाने की इज़ाजत मिल गई। नेहरू ने अपने को
सिर्फ़ मुकदमे की पैरवी तक ही सीमित रखा और उनके काश्मीर आगमन से कोई अप्रिय घटना नहीं
हुई।
अगस्त 1946 में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि अब काश्मीर का मामला सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद
देखेंगे। नेहरू जी ने हरि सिंह को पत्र लिखा कि वह कांग्रेस के प्रतिनिधि सरदार पटेल
और मौलाना आज़ाद से बात करें। हरि सिंह ने कहा कि वह केवल पटेल को भेजें, वह भी उनके
व्यक्तिगत हैसियत से। लेकिन उसने इसका भी निरादर किया। नेहरू भी हरि सिंह और उनके प्रधानमंत्री
रामचन्द्र काक के व्यवहार से क्षुब्ध थे। उन्होंने ऐलान कर दिया कि वे काश्मीर जाएंगे,
महाराजा बुलाएं न बुलाएं, वहां के जनता का निमंत्रण उनको है।
महाराजा अनिश्चय की स्थिति में
1947 में विभाजन और आज़ादी दोनों ही आ गई थी। प्रश्न था कि वहां कौन जाए कि जो मरहम
का भी काम करे और विवेक भी जगाए? जून के मध्य में लॉर्ड
माउंटबेटन ने काश्मीर के महाराजा को समझाने की कोशिश की थी कि वे अपनी प्रजा की इच्छा
का पता लगाने के बाद दोनों में से किसी एक डोमिनियन के साथ सम्बद्ध होने का निश्चय
कर लें और 15 अगस्त से पहले उस निश्चय
की घोषणा कर दें। सदार पटेल ने आश्वासन दिया था कि यदि काश्मीर पाकिस्तान से सम्बद्ध
होने का निर्णय करेगा, तो संघ-सरकार उसे ‘अमित्रतापूर्ण’ कार्य नहीं मानेगी। लेकिन
महाराजा किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहे थे। वे अनिश्चय की स्थिति में थे। उन्हें
और अधिक समय चाहिए था।
गांधीजी कश्मीर में
माउंटबेटन ने प्रस्ताव
रखा, “क्या हम बापूजी से वहां जाने का अनुरोध कर सकते हैं?” इसके पहले गांधीजी कश्मीर
कभी नहीं जा सके थे। जब-जब योजना बनी, किसी-न-किसी कारण से अटक गई। जिन्ना भी एक बार ही कश्मीर गया था, तब टमाटर और अंडों से उसका स्वागत हुआ था। स्थानीय लोगों में उसके प्रति काफी ग़ुस्सा
था। लोग उसे ज़मींदारों व रियासत का पिट्ठू मानते थे। गांधीजी को कश्मीर जाने का प्रस्ताव
माउंटबेटन का था, और जवाब गांधीजी से आना
था। तब उनकी उम्र 77 साल की थी। गांधीजी यह
जानते थे कि आज़ाद भारत का भौगोलिक नक्शा मज़बूत नहीं बना तो रियासतें आगे नासूर बन
जाएंगी। वे जाने को तैयार हो गये। किसी ने उनसे कहा “इतनी मुश्किल यात्रा क्या
ज़रूरी है? आप महाराजा को पत्र लिख
सकते हैं” कहने वाले की आंखों में देखते हुए वे बोले, "हां, फिर तो मुझे नोआखली जाने
की भी क्या ज़रूरत थी? वहां भी पत्र भेज सकता
था। लेकिन भाई उससे काम नहीं बनता है।" 29 जुलाई 1947 की प्रार्थना सभा में उन्होंने
बताया, “मैं कश्मीर जा रहा हूं। मैं यह समझाने नहीं जा रहा हूं कि कश्मीर को भारत में रहना
चाहिए। वह फ़ैसला तो मैं या महाराजा नहीं, कश्मीर के लोग करेंगे। कश्मीर के लोग में महाराजा भी हैं, रैयत भी है। लेकिन राजा कल मर जाएगा तो भी प्रजा तो रहेगी। वो अपने कश्मीर का फ़ैसला
करेगी।” देश के विभाजन और स्वतंत्रता से ठीक पहले हुए इस 3-4 दिवसीय दौरे का मुख्य उद्देश्य महाराजा हरि सिंह से मिलकर लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला
की रिहाई की मांग करना और कश्मीर के भविष्य का जायज़ा लेना था।
30 जुलाई को गांधीजी रवाना हुए और 1 अगस्त को दोपहर में श्रीनगर पहुंचे। 31 जुलाई को लाहौर में फ़्रंटियर मेल को धमाके से उड़ाने की कोशिश नाकाम रही। उस वक्त
ट्रेन में महात्मा गांधी दलबदल सवार थे। श्रीनगर में लोगों ने उनका खूब स्वागत
किया। घाटी में लोगों का वैसा
जमावड़ा कभी नहीं देखा गया था जैसा उस रोज़ जमा हुआ था। झेलम नदी के पुल पर तिल धरने
की जगह नहीं थी। गांधीजी की गाड़ी पुल से हो कर श्रीनगर में प्रवेश कर ही नहीं सकती
थी। उन्हें गाड़ी से निकाल कर नाव में बिठाया गया और नदी के रास्ते शहर में लाया गया।
दूर-दूर से आए कश्मीरी लोग उनकी एक झलक पाकर तृप्त हो रहे थे और कह रहे थे, "बस, पीर के दर्शन हो गए!" गांधीजी का स्वागत महाराजा
ने अपने महल में आयोजित किया था। महाराजा हरि सिंह, महारानी तारा देवी तथा राजकुमार कर्ण सिंह ने महल से बाहर आकर उनकी अगवानी की थी।
युवराज के पैर में प्लास्टर बंधी थी, फिर भी वह मुलाक़ात के समय मौजूद था। गांधीजी ने महाराजा को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए अनुकूल माहौल बनाने की सलाह दी थी। महाराजा ने स्वीकार
किया, “ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता का अंत होते ही काश्मीर के लोगों की सच्ची सार्वभौम सत्ता
प्रारम्भ हो जाएगी। हम भारतीय संघ में शामिल होने की कितनी भी इच्छा क्यों न रखें,
तो भी हमें प्रजा की इच्छाओं के अनुसार चुनाव करना पड़ेगा।”
एक और नागरिक स्वागत का
दूसरा आयोजन किया गया था। इसका आयोजन बेगम अकबरजहां अब्दुल्लाह ने किया था। तब शेख़
अब्दुल्लाह जेल में ही थे। गांधीजी ने बेगम अकबरजहां के स्वागत समारोह में खुलकर बात
कही। वहां के वातावरण के बारे में उन्होंने कहा था, “यहां का वातावरण देखकर
लगता है कि श्रीनगर में मानों बारूद से भरे तोपखाने के पास एक नासमझ राजा चिनगारी लिए
लापरवाही से खेल रहा है। प्रजा राजनीतिक उत्थान की आशा लगाए हुए है और राजा सामंतवाद
में आकंठ डूबा है। ...
"इस रियासत की असली राजा
तो यहां की प्रजा है। वह पाकिस्तान जाने का फ़ैसला करे तो दुनिया की कोई ताक़त उसे
रोक नहीं सकती है। लेकिन जनता की राय भी कैसे लेंगे आप? उसकी राय लेने के लिए वातावरण तो बनाना होगा न। वो आराम
और आज़ादी से अपनी राय दे सके, ऐसा कश्मीर बनाना होगा। उस पर हमला कर, उसके गांव-घर जला कर आप उसकी राय तो ले नहीं सकते हैं। प्रजा कहे कि भले हम मुसलमान
हैं लेकिन रहना चाहते हैं भारत में तो भी कोई ताक़त उसे रोक नहीं सकती है। अगर पाकिस्तानी
यहां घुसते हैं तो पाक की हुकूमत को उनको रोकना चाहिए। नहीं रोकती है तो उस पर इल्ज़ाम
तो आएगा ही। ...
"कांग्रेस हमेशा ही राजतंत्र के ख़िलाफ़ रही है। फिर चाहे
वो इंग्लैंड का हो या यहां का। शेख़ अब्दुल्लाह लोक शाही की बात करते हैं, उसकी लड़ाई लड़ते हैं। हम उनके साथ हैं। उन्हें जेल से
छोड़ना चाहिए और उनसे बात कर आगे का रास्ता निकालना चाहिए। कश्मीर के बारे में फ़ैसला
तो यहां के लोग करेंगे। ... यहां के लोगों से मेरा मतलब है यहां के मुसलमान, यहां के हिंदू, कश्मीरी पंडित, डोगरा लोग और यहां के सिख।” गांधीजी ने 1846 की अमृतसर संधि को 'बिक्री विलेख' (Sale Deed) करार दिया था, जिसके तहत कश्मीर को अंग्रेजों द्वारा गुलाब सिंह को बेच दिया गया था। रणनीतिक क्षेत्र 'गिलगित' को अंग्रेजों द्वारा कश्मीर के राजा को सौंपे जाने पर गांधीजी ने नाराजगी जताई
थी और भविष्यवाणी की थी कि यह क्षेत्र अंततः 'छीन लिया जाएगा', जो कुछ ही महीनों बाद
सच साबित हुआ।
कश्मीर के बारे में भारत
की यह पहली घोषित आधिकारिक अभिव्यक्ति थी। गांधीजी सरकार के प्रवक्ता नहीं थे, क्योंकि स्वतंत्र भारत की सरकार अभी तो औपचारिक रूप से बनी नहीं थी, लेकिन वो भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के जनक और स्वतंत्र भारत की भूमिका के सबसे बड़े आधिकारिक
प्रवक्ता थे। गांधीजी की इस यात्रा ने कश्मीर के लोगों और भारत के बीच विश्वास की
एक मजबूत नींव रखी।
महाराज का ढुलमुल रवैया
इस मामले को सुलझाने के
लिए लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा हरि सिंह के साथ चार दिन बिताए थे। माउंटबेटन ने भी
महाराजा को समझाया कि वह जल्दी से निर्णय ले ले कि भारत में सम्मिलित होना चाहता है
या पाकिस्तान में। कश्मीर एक ऐसा मुस्लिम बहुल प्रांत था जिस पर हिंदू राजा का शासन
था। भारतीयों को अंदेशा था कि हरि सिंह अपनी आज़ादी की घोषणा कर सकते हैं या
पाकिस्तान में जा सकते हैं। पाकिस्तानियों को डर था कि हिन्दू होने के नाते वे
भारत में जा सकते हैं। साफ तौर पर हरि सिंह के लिए किसी को चुनना आसान नहीं था। आज़ादी
के समय महाराज कुछ तय नहीं कर पाए। वे ढुलमुल रवैया अपना रहे थे। वह चाहते थे कि दोनों
को देश को लटकाए रखकर वह अधिक फ़ायदे की स्थिति में होंगे। महाराजा हरि सिंह न तो
भारत में शामिल होना चाहते थे और न ही पाकिस्तान में। वे कश्मीर को 'पूरब का स्विट्जरलैंड' बनाना चाहते थे और
राज्य की संप्रभुता को बचाए रखने के पक्षधर थे। उन्हें डर था कि पाकिस्तान में
विलय से उनका हिंदू राजवंश इतिहास बन जाएगा और भारत में मिलने पर लोकप्रिय नेता
शेख अब्दुल्ला के हाथ में सत्ता चली जाएगी।
महाराज ने 12 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान के साथ एक
वर्ष के लिए 'यथास्थिति' (Standstill) प्रस्ताव का करार कर लिया।
यहीं वह भूल कर गए। पाकिस्तान ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिया। जिन्ना को पक्का
भरोसा था कि मुस्लिम आबादी और अपनी भौगोलिक स्थिति के चलते कश्मीर निश्चित रूप से
पके फल की तरह पाकिस्तान की गोद में आ गिरेगा। जिन्ना की ये उम्मीद लंबे समय तक कायम
नहीं रही। वह माउंटबेटन से चली लंबी बातचीत के बाद थक गया था। फेफड़े के घातक रोग से
पीड़ित होने के कारण उसका शरीर पहले से ही कमज़ोर था। सितम्बर के मध्य में उसने तय
किया कि कश्मीर में कुछ दिन बिताकर आराम करेगा। उसने अपने सचिव विलियम बिर्नी से कहा
कि वह कश्मीर जाकर उसके वहाँ ठहरने और आराम करने का प्रबंध करा दे। सचिव ने बताया, ''महाराजा हरि सिंह नहीं चाहते थे कि जिन्ना छुट्टी मनाने के लिए भी उनके क्षेत्र
में कदम रखें।'' पाकिस्तान के शासक को
पहली बार ये संकेत मिला कि कश्मीर का घटनाक्रम उस तरह से नहीं चल रहा है जैसा कि वह
अपने मन में सोचे बैठा था।
हालाँकि, महाराज हरी सिंह को 'यथास्थिति' (Standstill) प्रस्ताव के करार से मिला फ़ायदा बहुत कम समय के लिए रहा। उन दिनों कश्मीर अपनी
आर्थिक व्यवस्था और यातायात के लिए पूर्णतया पाकिस्तानी पंजाब पर निर्भर था। अब पाकिस्तान
काश्मीर को हथिया लेने का प्रयास करने लगा। पाकिस्तान ने समझौते के बावजूद कश्मीर
को मिलने वाली जरूरी चीजें (जैसे नमक, तेल, अनाज) रोक दीं ताकि महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने का दबाव बनाया जा सके।
यह धमकी दी कि यदि जल्दी से कश्मीर पाकिस्तान में नहीं मिलता तो उस पर भयानक आफ़त टूट
पड़ेगी।
प्रजा का समर्थन पाने के
उद्देश्य से हरि सिंह ने 29 सितंबर, 1947 को शेख अब्दुल्ला और उसके साथियों को रिहा कर दिया। रिहा होते ही शेख
अब्दुल्ला ने कश्मीर की जनता को लोकतंत्र और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने का
संदेश दिया। शेख अब्दुल्ला ने कहा कि जो सही होगा वही वह करेंगे। मेरा पाकिस्तान नारे
में कभी विश्वास नहीं रहा। नेहरू मेरे उत्तम मित्र हैं। कांग्रेस ने हमारे आन्दोलन
को मदद की है। मैं गांधीजी का बहुत सम्मान करता हूँ। मेरी निजी राय किसी एक डोमिनियन के पक्ष में स्वतंत्र फ़ैसला लेने में आड़े
नहीं आएगी। भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का हमारा फ़ैसला जम्मू-कश्मीर में
रहने वाले 40 लाख लोगों की भलाई पर आधारित होगा। और अगर हम
पाकिस्तान में शामिल भी होते हैं, तो भी हम 'टू-नेशन थ्योरी' (दो-राष्ट्र सिद्धांत) में यकीन नहीं करेंगे, जिसने इतना ज़हर फैलाया है।
15 अक्तूबर को काश्मीर के प्रधानमंत्री मेहरचन्द महाजन ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल
को लिखा कि काश्मीर पर हो रहे अत्याचारों की वे व्यक्तिगत रूप से जांच करें और यह भी
कहा कि काश्मीर का मित्रतापूर्ण सहायता मांगना और अपने मौलिक अधिकारों के अनुचित उल्लंघन
का विरोध करना उचित है। पाकिस्तान ने इसे धमकी समझा और पाकिस्तान के गवर्नर जनरल ने
इसे आरोप और पाकिस्तान की निन्दा कहा। पाकिस्तान को लगा कि काश्मीर भारतीय संघ में
विलय की योजना बना रहा है, इसलिए उसने कहा कि यह रियासत की 85% आबादी की इच्छा के विपरीत होगा। साथ ही चेतावनी दी गई कि अगर आप ऐसा कुछ कर रहे
हैं तो परिणाम गंभीर होंगे।
सितंबर के मध्य में प्रधानमंत्री
लियाक़त अली ने यह तय करने के लिए एक बैठक बुलाई कि महाराजा को पाकिस्तान में विलय
करने के लिए कैसे मजबूर किया जाए। वहीं तय हुआ कि सरहदी सूबे के पठान क़बायलियों को
हथियारों के साथ कश्मीर भेजा जाए। कबायली आक्रमण पाकिस्तान द्वारा
सुनियोजित सैन्य ब्लूप्रिंट था, जिसे 'ऑपरेशन गुलमर्ग' कोड नाम दिया गया था। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना के
जनरलों और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के नेताओं ने मिलकर 'ऑपरेशन गुलमर्ग' की योजना तैयार की।
इसके तहत पश्तून/पठान आदिवासियों के 20 लश्कर (सैन्य दस्ते)
तैयार करने और उन्हें आधुनिक हथियार देने का फैसला हुआ।
हर लश्कर को नियमित पाकिस्तानी
सेना से एक मेजर,एक कैप्टन और दस जूनियर
कमीशंड अफ़सर दिए गए थे। इनका चुनाव पठानों में से ही किया जाता था और वो कबायलियों
जैसे ही कपड़े पहनते थे। क़बायलियों के लश्कर को आगे बढ़ने के लिए लॉरियों और पेट्रोल
की व्यवस्था भी पाकिस्तान ने की थी। नेतृत्व में भले ही पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी थे
लेकिन क़बायली न तो आधुनिक युद्ध प्रणाली से परिचित थे और न ही किसी अनुशासन से। 22 अक्टूबर 1947 को मेजर खुर्शीद अनवर के
नेतृत्व में लगभग 5,000-20,000 कबायली लड़ाके (जिनमें
पाकिस्तानी सेना के जवान वेश बदलकर शामिल थे) मुज़फ्फराबाद और डोमेल सीमा को पार
कर कश्मीर में घुस गए। महाराजा की सेना के कुछ मुस्लिम सैनिकों ने विद्रोह कर दिया
और हमलावरों से हाथ मिला लिया। यहां के मुख्य निवासी हिन्दू थे। 23-24 अक्टूबर 1947 को दोनों तरफ़ से भारी मुठभेर हुई। गांव के गांव तबाह हो गए। गांव और कस्बे जला
दिए गए, लूट लिए गए। बलात्कार और अत्याचार किया गया। कश्मीरी सेना के हाथ से नियंत्रण
जा चुका था। आक्रमणकारी आधुनिक हथियारों से लैस थे। हमलावरों ने बहुत कम समय में
जम्मू प्रांत के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया।
दबाव काम न आने पर, पाकिस्तान की सेना के समर्थन से उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) के हजारों सशस्त्र कबाली आदिवासियों (पश्तूनों) ने कश्मीर पर अचानक हमला कर
दिया। पाकिस्तान के कबीलाई इलाक़ों के 5000 छापामारों ने पाकिस्तान-कश्मीर सीमा पार
की। 23 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तान की सेना और सरहद प्रांत के कबायलियों ने एबोटाबाद-मानसेरा के रास्ते
कश्मीर पर हमला बोल दिया। उन्होंने मकानों में आग लगाई, हत्याएं कीं, लूट मचाई, स्त्रियों
के साथ बलात्कार किया और उन्हें भगाने की करतूत की। 24 अक्टूबर को कबायलियों ने बारामूला पर कब्जा कर लिया। मज़फ़्फ़राबाद और डोमेल पाकिस्तान के 5,000 आक्रमणकारियों के क़ब्ज़े में तो था ही। पाकिस्तानी सेना अब श्रीनगर से 35 मील की दूरी पर थी। जब क़बायलियों की फ़ौज श्रीनगर की ओर बढ़ी, ग़ैर मुस्लिमों की हत्या और उनके साथ लूट पाट की ख़बरें आने लगीं, तब राज्य की सेना में घबराहट फैल गई। यहाँ सेंट जोसेफ कॉन्वेंट अस्पताल में
ननों की हत्या की गई और स्थानीय नागरिकों पर घोर अत्याचार हुए। इस बीच हमलावरों ने
उड़ी और बारामूला के बीच एक बिजलीघर को उड़ा दिया था और महाराजा की सेना के मुस्लिम
सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि महिलाओं और बच्चों
को पुरुषों से अलग कर दिया गया और सारे पुरुषों को गोली मार दी गई। पूरे दो दिनों तक
हत्या, बलात्कार और लूट जारी रही।
यहाँ तक कि पकड़ी गई लड़कियों की बोली तक लगाई गई। इस बर्बरता और लूटपाट के कारण
हमलावरों की गति 2-3 दिन धीमी हो गई, जो श्रीनगर को बचाने के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
कबीलाई लोगों के आ
धमकने से महाराज हरि सिंह की अनिर्णय की स्थिति समाप्त हो गई और उन्होंने भारत सरकार
से सैन्य मदद मांगी। माउंटबेटन ने भारत सरकार को सलाह दी कि जबतक कश्मीर भारत में सम्मिलित
नहीं होता, भारत सरकार का सहायता देना अनुचित होगा। नेहरूजी के घर पर एक बैठक हुई थी। कश्मीर के
दीवान मेहरचंद महाजन ने भारतीय सेना की मदद के लिए कहा था। महाजन ने यह भी कहा कि अगर
भारत इस मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है तब कश्मीर जिन्ना से मदद के लिए कहेगा।
नेहरू यह सुनकर गुस्से में आ गए और उन्होंने महाजन को चले जाने को कहा। उस वक़्त सरदार
ने महाजन को रोका और कहा, "महाजन, आप पाकिस्तान नहीं जा रहे हैं। कश्मीर भारत के
साथ रहेगा।" 25 अक्टूबर को सरदार पटेल के मुख्य सचिव वी.पी. मेनन कश्मीर गए। मेनन के साथ भारतीय
सेना के सैम मानेक शॉ और वायुसेना के एक और अधिकारी विंग कमांडर दीवान भी थे।
वीपी मेनन महाराजा हरि
सिंह के पास पहुंचे। उन्होंने महाराजा को सलाह दी कि आपके लिए बेहतर होगा अगर आप श्रीनगर
छोड़कर जम्मू चले जाएँ। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरी सिंह ने
जम्मू में भारत के साथ 'विलय पत्र' (Instrument of Accession) पर आधिकारिक हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह कश्मीर के रक्षा, विदेशी मामले और संचार का अधिकार भारत को सौंपा गया। वीपी मेनन 26 अक्तूबर को कश्मीर के विलय का दस्तावेज़ लेकर दिल्ली वापस लौटे।
जिस विलय संधि के आधार
पर जम्मू कश्मीर की रियासत भारत का हिस्सा बन गई, उसमें महज दो पेज थे और इसे ख़ास तौर पर तैयार भी नहीं किया गया था। करार के द्वारा
महाराजा ने यह भी आश्वासन दिया कि कश्मीर में प्रजातांत्रिक राज्य की स्थापना की जाएगी।
शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में सम्मिलित होने का समर्थन किया। यह तय किया गया
कि जैसे ही आक्रमणकारी हट जाएंगे और अमन-चैन स्थापित हो जाएगा, मतदान कराकर प्रजा की
इच्छानुसार आगे की व्यवस्था की जाएगी। कश्मीर की जनता ने भारत सरकार से सैन्य सहायता
मांगी। गांधीजी ने सैन्य सहायता का समर्थन किया। गांधीजी ने कहा, “यदि महाराजा अकेले ही भारत
के साथ मिलना चाहते, तो मैं उनका समर्थन नहीं कर पाता। परन्तु महाराजा और शेख अब्दुल्ला
दोनों ने ऐसा चाहा था। शेख अब्दुल्ला इसलिए मैदान में आए कि उनका दावा केवल मुसलमानों
का ही नहीं, बल्कि सारे काश्मीर के लोगों का प्रतिनिधि होने का था।”
गांधीजी की अहिंसा की नीति
की लोगों ने आलोचना की। कहा कि दूसरे लोगों
को उपदेश देने के लिए अहिंसा की बातें होती हैं। अपने देश के हित में गांधीजी ने अहिंसा
को छोड़कर हिंसा का समर्थन किया। गांधीजी ने कहा था, “मेरी अहिंसा कायरों की,
कमज़ोरों की अहिंसा नहीं है जो पहाड़ों की कंदराओं में छिपी रहे। मेरी अहिंसा कर्तव्यशील
पुरुषार्थ की अहिंसा है। वह निष्क्रिय बनकर बच नहीं सकती। आक्रमणकारी का प्रतिकार करना
कर्त्तव्य होता है। आत्मरक्षा में शत्रु का निवारण करना परम धर्म है। अहिंसा के नाम
पर हम कर्त्तव्यभ्रष्ट नहीं हो सकते। सत्य का साधक आलस्य या पिष्टपेषण में कर्तव्यच्युत
नहीं हो सकता।”
27 अक्टूबर 1947 को, भारत के गवर्नर-जनरल
लॉर्ड माउंटबेटन ने इस विलय को स्वीकार कर लिया। इसके तुरंत बाद, भारतीय सेना ने इतिहास
का सबसे बड़ा और पहला 'हवाई सैन्य अभियान' शुरू किया। लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय के नेतृत्व में सिख रेजिमेंट के सैनिकों को भारतीय वायुसेना के डकोटा विमानों
से सीधे श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतारा गया।
27 अक्तूबर को मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में 330 सिख सैनिकों का पहला दस्ता हवाई जहाज से श्रीनगर पहुंचा। क़बायली बारामूला-श्रीनगर
सड़क पर तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। काश्मीर की घाटी के प्रवेश द्वार बारामूला पर आक्रमणकारियों
ने पहले ही अधिकार जमा रखा था। काश्मीर की राजधानी को बिजली देने वाले मोहोर के बिजलीघर
को जला दिया गया था। श्रीनगर की हवाई पट्टी
को भी नष्ट किए जाने का ख़तरा बना हुआ था। ये आततायी थे। चर्च को इन्होंने नष्ट कर दिया
था। ब्रह्मचारिणियों के साथ बलात्कार किया था। बारामूला में नौ दिनों से आतंक का राज
था। ये तो इनकी विलासितापूर्ण चाहत थी जो ये बारामूला में उलझे रहे वरना ये श्रीनगर
पर भी क़ब्ज़ा कर लिए होते। श्रीनगर बेहाल था। न कोई फौज थी, न कोई पुलिस और न ही बिजली।
3 नवंबर 1947 को श्रीनगर हवाई अड्डे के ठीक पास बडगाम में भयंकर युद्ध
हुआ। भारतीय सैनिकों के दस्ते ने मोरचा संभाला। आक्रमणकारी पलायन करने लगे। उरी पर
अधिकार प्राप्त कर लिया गया। पाकिस्तान के हमले नाकाम हुए और श्रीनगर हवाई अड्डा पर
कब्ज़ा करने का पाकिस्तानी मंसूबा चूर-चूर हो गया। मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी टुकड़ी के साथ गोलियों से छिन्न-भिन्न होने के बावजूद आखिरी सांस तक
लड़कर कबायलियों को एयरपोर्ट पर कब्जा करने से रोका। मरनोपरान्त उन्हें भारत के प्रथम
परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सरकार ने कश्मीर में सेना
पहुंचाने में कोई देरी नहीं की। भारतीय जवानों ने हमलावरों को खदेरना शुरू कर दिया।
महाराजा भागकर जम्मू चले गए थे। लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेताओं और श्रीनगर के स्थानीय
लोगों ने स्थिति को संभाले रखा और श्रीनगर में साम्प्रदायिक भाईचारे का अनूठा नमूना
पेश किया। 7-8 नवंबर 1947 को भारतीय सेना ने शालतेंग की लड़ाई में कबायलियों को करारी शिकस्त दी और उन्हें श्रीनगर के दरवाज़े से पीछे खदेड़
दिया। भारतीय जवानों ने विजय हासिल की।
भारतीय सेना के ब्रिगेडियर
उस्मान राजौरी और पुंछ का रक्षण करते हुए शहीद हुए। तमाम दिक्क़तों के बावजूद भारतीय
फ़ौज ने पाकिस्तानियों को श्रीनगर में घुसने से रोक दिया। 9-14 नवंबर 1947 को भारतीय सेना ने बारामूला और उरी को दोबारा अपने नियंत्रण में ले लिया। कबायली
पीछे भागने लगे और इसके बाद पाकिस्तानी सेना सीधे और खुले तौर पर युद्ध में शामिल
हो गई। पूरे 1948 के दौरान पुंछ को घेरने, झांगड़, राजौरी और लद्दाख (ज़ोजी ला दर्रे पर टैंकों के इस्तेमाल के साथ) में भीषण
लड़ाइयाँ हुईं। भारतीय सेना ने हमलावरों को बड़े हिस्से से खदेड़ दिया।
1948 के मध्य तक, पाकिस्तानी सेना और कबायलियों ने कारगिल और द्रास पर कब्जा कर लिया था और वे लेह (लद्दाख) की ओर बढ़ रहे थे।
कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ने वाला एकमात्र रास्ता ज़ोजी ला दर्रा था, जिस पर पाकिस्तानियों ने मजबूत बंकर बना लिए थे। दुश्मन वहां ऊंचाई पर
(पहाड़ों की चोटियों पर) भारी तोपखाने (Howitzers) के साथ बैठा था।
भारतीय पैदल सेना (Infantry) ने जब भी आगे बढ़ने की
कोशिश की, दुश्मन ने ऊंचाई से भारी गोलाबारी कर उन्हें पीछे धकेल दिया। लद्दाख को बचाने
के लिए ज़ोजी ला दर्रे को जीतना अनिवार्य था, लेकिन सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी और बर्फबारी के कारण रास्ता बंद होने
वाला था। जब पैदल सेना के पारंपरिक हमले विफल हो गए, तब पश्चिमी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल के.एम. करियप्पा और कमान संभाल रहे मेजर जनरल थिमैया ने एक ऐसा फैसला लिया
जिसे सैन्य रणनीतिकार 'असंभव' और 'पागलपन' मान रहे थे। उन्होंने तय किया कि ज़ोजी ला की खड़ी चढ़ाई और संकरे रास्तों पर टैंक भेजे जाएंगे। इस काम
के लिए 7वीं लाइट कैवेलरी के स्टुअर्ट टैंकों को चुना गया। दुश्मन को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि इतनी ऊंचाई पर टैंक आ
सकते हैं।
नवंबर 1948 में भारतीय सेना द्वारा 11,578 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित ज़ोजी ला दर्रे (Zoji La Pass) पर टैंक चलाना सैन्य इतिहास का एक अभूतपूर्व चमत्कार माना जाता है। इसे 'ऑपरेशन स्पैरो' (Operation Sparrow) कोड नाम दिया गया था। दुनिया के युद्ध इतिहास में इतनी ऊंचाई पर बख्तरबंद
टैंकों (Armored Tanks) का इस्तेमाल इससे पहले
कभी नहीं हुआ था। इस अभियान में भारी गोपनीयता बरती गई। टैंकों के ऊपरी हिस्से (Turrets/गोला दागने वाले बुर्ज) को हटा दिया गया ताकि वे सामान्य सैन्य ट्रक जैसे
दिखें। उन्हें रात के अंधेरे में श्रीनगर से बालटाल (दर्रे के आधार) तक लाया गया। भारतीय
सेना के मद्रास सैपर्स ने दुश्मन की लगातार गोलीबारी के बीच, रातों-रात पहाड़ों को काटकर टैंकों के निकलने लायक एक बेहद संकरा और कच्चा
रास्ता तैयार किया। 1 नवंबर की सुबह भारी
बर्फबारी हो रही थी और दृश्यता बहुत कम थी। मेजर जनरल थिमैया खुद आगे चल रहे एक
बख्तरबंद वाहन में सवार हुए ताकि सैनिकों का हौसला बढ़ा सकें। सुबह 10:30 बजे, कैप्टन जमाल कुदरत के
नेतृत्व में 7 स्टुअर्ट टैंकों ने खड़ी और फिसलन भरी चढ़ाई पर आगे बढ़ना शुरू किया। जैसे ही टैंक दुश्मन के
बंकरों के ठीक सामने पहुंचे, भारतीय सेना ने
गोलाबारी शुरू कर दी। पाकिस्तानी सैनिकों ने जब बर्फ के तूफ़ान के बीच से लोहे के
भारी-भरकम टैंकों को अपनी ओर आते और आग उगलते देखा, तो उनके होश उड़ गए। शुरुआत में पाकिस्तानी सैनिकों को लगा कि वे टैंक नहीं, बल्कि कोई 'राक्षस' हैं या भारतीयों ने ट्रकों पर कोई अजीब ढाल लगा रखी है। जब टैंकों के गोलों ने
उनके मजबूत बंकरों को तबाह करना शुरू किया, तो पाकिस्तानी सेना में हड़कंप मच गया। वे डर के मारे अपने हथियार और बंकर
छोड़कर भाग खड़े हुए। भारतीय सेना ने बिना किसी बड़े नुकसान के कुछ ही घंटों में
पूरे ज़ोजी ला दर्रे पर दोबारा नियंत्रण कर लिया। इस जीत के बाद भारतीय सेना तेजी
से आगे बढ़ी। 15 नवंबर को द्रास और 23 नवंबर को कारगिल को दोबारा आजाद करा लिया गया। इससे लद्दाख हमेशा के लिए भारत का हिस्सा
सुरक्षित बना रहा।
जिन्ना का श्रीनगर जाने
का सपना धूल-धूसरित हुआ। भारत की हवाई कार्रवाई के क्रोधित जिन्ना ने पाकिस्तान का
कार्यवाहक प्रधान सेनापति जनरल ग्रेसी को पाकिस्तानी सेना को काश्मीर में प्रवेश करने
के आदेश देने के लिए कहा। वह हिन्दुस्तानी फौज के बंटवारे की देख-रेख के लिए
पाकिस्तान में रुका हुआ था। जनरल ग्रेसी ने सर्वोच्च सेनाधिकारी फील्ड मार्शल सर क्लॉड
आचिनलेक से इस विषय में पूछा। आचिनलेक ने ग्रेसी से कहा, कश्मीर में भारतीय सेना की मौजूदगी उचित है क्योंकि खुद महाराज ने उसे
बुलवाया है। अगर पाक सेना कोई कार्रवाई करती है तो वे उसमें तैनात अँग्रेज़
अधिकारियों को बुलाने के लिए बाध्य होंगे। पाकिस्तानी सेना को काश्मीर में भेजने से
दोनों देशों के विरुद्ध युद्ध छिड़ सकता है। जिन्ना ने अपने आदेश वापस ले लिए। जिन्ना
ने घोषणा की कि ‘काश्मीर का भारत में सम्मिलन धोखा, बल और हिंसा से हुआ है’। माउंटबेटन
ने जिन्ना को बताया, “काश्मीर का सम्मिलन बेशक
बल और हिंसा पर आधारित था, लेकिन यह बल प्रयोग और हिंसा क़बायलियों की तरफ़ से हुई थी।
और इसके लिए भारत नहीं, पाकिस्तान जिम्मेदार है। जब काश्मीर भारत से जुड़ा था, तब राज्य
में तीन से दस हज़ार के बीच ग़ैर-काश्मीरी आक्रमणकारी थे। वर्ष के अन्त तक इनकी संख्या
पचास हज़ार हो गई थी। क़रीब एक लाख आक्रमणकारी पाकिस्तान की सीमा की ओर जमा थे। काश्मीर
की रक्षा के लिए सोलह हज़ार भारतीय सैनिक वहां थे।
मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में
दोनों गवर्नर जनरलों और
दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच काश्मीर के मसले पर कोई समझौता न हो सका। पाकिस्तान का
आग्रह था कि जनमत संग्रह के पहले भारतीय सेनाएं काश्मीर से हटा ली जाएं। भारत सरकार
की मांग थी कि पहले कबायली हटा लिए जाएं। माउंटबेटन ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को तार
दिया कि वे स्वयं भारत आएं और इस मसले को मध्यस्थता करके सुलझाएं। एटली ने भारत जाने
से इंकार कर दिया और सलाह दिया कि संयुक्त राष्ट्र इसके लिए उपयुक्त माध्यम है। लॉर्ड
माउंटबेटन की सलाह के अनुसार भारत सरकार ने झगड़े को संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने रखने
का निश्चय किया। गांधीजी और सरदार पटेल ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि यह
दो भाइयों का आपसी मामला है। इसे आपसी समझौते से निपटाया जाएगा।
युद्ध के दौरान भारतीय
सेना लगातार जीत दर्ज कर रही थी और पाकिस्तानियों को पीछे खदेड़ रही थी। लेकिन
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कूटनीतिक समाधान चाहते थे। वे लॉर्ड माउंटबैटन की सलाह पर 1 जनवरी 1948 को इस विवाद को आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ले गए। भारत का तर्क था कि कश्मीर का कानूनी विलय भारत में हो चुका है, इसलिए पाकिस्तान एक 'आक्रामक' (Aggressor) देश है जो
अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर
पर संयुक्त राष्ट्र या अंतरराष्ट्रीय तत्वावधान में जनमत संग्रह कराने की बात कह दी।
संयुक्त राष्ट्र संघ के भारतीय प्रतिनिधि गोपालस्वामी अय्यंगर ने चर्चा में भारत का
पक्ष रखा।
लगातार 14 महीनों से चल रहे युद्ध के कारण दोनों देशों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा था। भारत
और पाकिस्तान दोनों देशों की सेनाओं के शीर्ष कमांडर उस समय भी ब्रिटिश सैन्य अधिकारी थे (जैसे भारत के जनरल
रॉय बुचर और पाकिस्तान के जनरल डगलस ग्रेसी)। ब्रिटिश सरकार और वैश्विक शक्तियां
(जैसे अमेरिका और ब्रिटेन) नहीं चाहती थीं कि दो नव-स्वतंत्र देश एक पूर्ण और लंबे
युद्ध में उलझे रहें। उन्होंने दोनों सरकारों पर युद्ध रोकने के लिए भारी कूटनीतिक
दबाव बनाया। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व का मानना था कि मुख्य कश्मीरी आबादी वाले
हिस्से (कश्मीर घाटी) और लद्दाख को सुरक्षित कर लिया गया है। शेष हिस्से (जो आज PoK है) को वापस लेने के लिए एक बेहद खूनी और लंबी जंग लड़नी पड़ती, जिससे पूरा देश आर्थिक संकट में आ सकता था। उन्हें भरोसा था कि संयुक्त
राष्ट्र कानूनी तौर पर भारत के पक्ष में फैसला सुनाएगा। इन परिस्थितियों के
बीच, दोनों देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार
कर लिया। 1 जनवरी 1949 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच युद्धविराम (Ceasefire) घोषित हुआ। युद्ध रुकने के समय जो सेना जिस स्थान पर थी, उसे युद्धविराम रेखा (Ceasefire Line) मान लिया गया, जिसे आज हम LOC (Line of
Control) कहते हैं। कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में रह गया, उसमें PoK (पाक अधिकृत कश्मीर, जिसे
पाकिस्तान 'आजाद कश्मीर' कहता है) और
गिलगिट-बाल्टिस्तान का क्षेत्र शामिल है। युद्धविराम ने रियासत को प्रभावी रूप से दो हिस्सों
में बांट दिया।
प्रारंभ में, पाकिस्तान ने अक्टूबर 1947 में हुए कबायली आक्रमण
में किसी भी तरह की भागीदारी से इनकार किया था। कई बार इंकार और टालमटोल करने के बाद
पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में माना कि उसकी सेना ने काश्मीर के आक्रमण में भाग
लिया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ आयोग ने यह मत व्यक्त किया कि काश्मीर की भूमि पर पाकिस्तान
ने भारत की प्रभुसत्ता का उल्लंघन किया था। इस तथ्य ने पूरी कश्मीर समस्या की
स्थिति को बदल दिया, जिसके बाद संयुक्त
राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 13 अगस्त 1948 को एक प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान से अपनी सेना हटाने को कहा था। लेकिन संयुक्त
राष्ट्रसंघ ने पाकिस्तान को आक्रमणकारी नहीं कहा। पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ कई शिकायतें
दायर की थीं, जिनमें से एक ‘जाति विनाश’ (जेनोसाइड) करने की भी थी। इन शिकायतों
को भारत की शिकायतों के बराबरी का दर्ज़ा दिया गया। ब्रिटिश प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान
का पक्ष लिया और उनके द्वारा पाकिस्तान को पीड़ित बताया गया। इस तरह भारत को अभियुक्त
के कटघरे में खड़ा कर दिया गया।
एक समय ऐसा भी आया कि कश्मीर
की बर्फ़ से ढँकी पहाड़ियों पर एक लाख से अधिक भारतीय सैनिक कबायलियों से लड़ रहे थे।
धीरे-धीरे उन्होंने कबायली हमलावरों को उसी रास्ते से पीछे धकेलना शुरू कर दिया जिससे
होकर वो श्रीनगर के पास तक पहुंचे थे। इस तरह कश्मीर घाटी भारत के नियंत्रण में रहा
और गिलगित के आसपास का उत्तरी इलाका (जिसे अब
गिलगित-बाल्टिस्तान कहा जाता है) पाकिस्तान के। भारत सरकार का रुख एकदम स्पष्ट है
कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है) का पूरा
क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। इतने सालों बाद भी कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच
झगड़े की जड़ और दोनों देशों के बीच शांति स्थापित होने के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा
बना हुआ है।
बाद में कश्मीर और
भारत के संबंधों को संचालित करने के लिए 17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 को एक अस्थायी प्रावधान के रूप में जोड़ा गया, जिसने राज्य को एक विशेष स्वायत्तता प्रदान की। मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के
जरिए संविधान में अनुच्छेद 35A जोड़ा गया, जिसने जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को विशेष अधिकार और पहचान दी। भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अनुच्छेद 370 और 35A को निष्प्रभावी कर दिया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर
पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर
(विधानसभा सहित) और लद्दाख (बिना विधानसभा)—में विभाजित कर दिया
गया, जिससे इसका भारत में पूर्ण और अंतिम एकीकरण सुनिश्चित हुआ।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर