421. भारत छोड़ो आन्दोलन-1
1942
प्रवेश :
दूसरे विश्वयुद्ध के विषय को लेकर गांधीजी का
अपने साथियों से मौलिक मतभेद था। अहिंसा के प्रश्न पर वे कोई समझौता करने को तैयार
नहीं थे। एक हिंसक युद्ध के समर्थन में किसी भी प्रकार के प्रयत्न में भागीदार
बनने से उन्होंने इंकार कर दिया। लेकिन अपने
सिद्धांतों पर दृढ़तापूर्वक डटे रहकर भी उन्होंने अपने साथियों को उनके विवेक के
अनुसार देश की सेवा करने का पूरा मौक़ा दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों के बीच
आपसी संबंध और विश्वास बना रहा। बल्कि जिनका गांधीजी से आपसी मतभेद था वे भी यह
बात समझ गए कि गांधीजी सही थे और अपना कार्यक्रम छोड़कर उनके नेतृत्व में काम करने
के लिए तैयार हो गए। लेकिन प्रश्न यह है कि मुश्किल हालात में, जब बेरहम दमन की संभावना पक्की थी, तब एक आंदोलन शुरू करना क्यों ज़रूरी
हो गया था?
क्रिप्स मिशन की असफलता से यह तो स्पष्ट हो गया
था कि ब्रिटिश सरकार युद्ध से भारत की साझेदारी को बरकरार रखना चाहती थी। मिशन की
विफलता से भारत में कुंठा का वातावरण गहरा गया तथा देश को विषाद और आक्रोश का
शिकार बना दिया। लोगों में तत्काल कुछ करने की बेचैनी थी। गांधीजी ने क्रिप्स के
प्रस्ताव में बहुत दिलचस्पी नहीं ली थी लेकिन उसकी असफलता से उन्हें भी बड़ी निराशा
हुई। गांधीजी युद्ध और भारत की स्थिति पर नज़र रखे हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के
गहराने से आम आदमी का जीवन कठिन होता जा रहा था। ब्रिटिश सरकार को जन-भावनाओं की
कोई परवाह नहीं थी। युद्ध के कारण ज़रूरी वस्तुओं की न सिर्फ़ कमी थी बल्कि क़ीमतें
आसमान छू रही थीं।
‘स्कॉर्च्ड
अर्थ नीति’
सुरक्षा में नाम पर विनाशकारी ‘स्कॉर्च्ड अर्थ नीति’ (scorched economic
policy दुश्मन
के लिए उपयोगी कोई भी चीज़ हो उसे नष्ट कर दें) अपना ली गई, जिससे देश बरबादी के
कगार पर आ गया था। स्कॉर्च्ड अर्थ नीति एक मिलिट्री
टैक्टिक है जिसमें एक सेना आगे बढ़ रहे दुश्मन को रिसोर्स न मिलें, इसके लिए किसी
इलाके में काम की सभी चीज़ों (खाना, पानी, इंफ्रास्ट्रक्चर, फसलें, रहने की जगह) को
नष्ट कर देती है, जिससे
आम लोगों के लिए तबाही और मुश्किलें पैदा होती हैं। इस नीति के तहत बंगाल और उड़ीसा की नावों को
जापानियों द्वारा संभावित इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार ने ज़ब्त कर लिया था,
जिससे लोगों को यातायात में काफ़ी परेशानियां उठानी पड़ रही थी। भारतीय
प्रवासियों को जंगलों और पहाड़ों से भयानक परिस्थितियों में पैदल चलकर जाना पड़ता
था। मानसून के दौरान बंगाल के कई हिस्सों में घर-घर संचार के लिए भी नावों की
ज़रूरत होती थी— गांधीजी ने कहा था,
'पूर्वी बंगाल के
लोगों को नावों से वंचित करना महत्वपूर्ण अंगों को काटने जैसा है।' बाँध तोड़कर नहरों के पानी को बहा दिया गया था
ताकि जापानी उन नहरों का इस्तेमाल परिवहन के लिए नहीं कर पाएं। इसके परिणामस्वरूप
फलों की सिंचाई बाधित हुई और फसलें सूखने लगीं। मकानों
और मोटर वाहनों को सेना ने क़ब्ज़ा कर रखा था।
जुलाई 1942 में, ब्रिटिश जनरल, अमेरिकी जनरल जोसेफ
डब्ल्यू. स्टिलवेल और एक छोटा सा हथियारबंद दस्ता, और हजारों भारतीय
शरणार्थी जीतने वाले जापानियों से बचने के लिए बर्मा से बाहर निकल रहे थे। जापान
भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। इंग्लैंड में जाहिर तौर पर भारत को हमले से
बचाने की ताकत नहीं थी। लोगों को ऐसा लग रहा था कि ब्रिटिश शासन जल्द ही गिरने
वाला है। अंग्रेजों को एक बड़े पैमाने पर जापानी आक्रमण की स्थिति में बंगाल और
असम की रक्षा करने की अपनी क्षमता पर बहुत कम भरोसा था, और वे छोटा नागपुर पठार रक्षा रेखा की
ओर पीछे हटने की तैयारी कर रहे थे।
मुखर भारतीय अपनी लाचारी से चिढ़े हुए
और परेशान थे। देश में इमरजेंसी थी;
तनाव बढ़ रहा था; खतरा मंडरा रहा था; मौका था;
लेकिन भारतीयों के पास न तो कोई आवाज़ थी और न ही काम करने की
कोई शक्ति। गांधीजी को यह स्थिति बर्दाश्त नहीं थी। हार मान लेना उनके स्वभाव में
नहीं था। उनका मानना था और उन्होंने अपने अनुयायी को सिखाया था कि भारतीयों को
अपना भविष्य खुद बनाना चाहिए। गांधीजी ने तुरंत बदलाव की सख्त ज़रूरत महसूस की। वह
एक आज़ाद राष्ट्रीय सरकार की जल्द स्थापना के लिए इंग्लैंड पर ज़्यादा से ज़्यादा
दबाव डालने के लिए दृढ़ थे।
जापानी
हमले की आशंका
देश की सरहद पार कर जापानी हमले के लिए तैयार थे।
अंग्रेज़ सरकार इस आक्रमण को रोकने में असमर्थ थी। सिंगापुर और रंगून को अंग्रेज़ों
ने जापानियों को सुपुर्द कर दिया था। कलकत्ता पर बम गिराए जाने लगे। असम सीमा से
आने वाली रेलगाड़ियां घायल सिपाहियों से भरी होती थीं। लोग पूर्व और पूर्वोत्तर
भारत से भाग कर कानपुर आदि में शरण ले रहे थे। देश की जनता डरी हुई, निराश
और असहाय थी। जापानियों के आक्रमण का ख़तरा तो था ही, लोगों में
आशंका घर कर गई थी कि कहीं इसका कोई प्रतिरोध ही न हो। ब्रिटिश शासन की स्थिरता
में लोगों का विश्वास इतना कम था कि लोग बैंकों और डाकघरों से जमा राशि निकाल रहे
थे। कांग्रेस और अंग्रेजी शासन के बीच पसरी अविश्वास की दीवार लगातार गहरी और चौड़ी
होती जा रही थी।
भारतीयों के लिए सांत्वना की बात यह थी कि सुभाष
चन्द्र बोस आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के साथ उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए कमर कस
चुके थे। उधर जिन्ना और मुस्लिम लीग और भी ज़ोर-शोर से एक अलग मुस्लिम राज्य की
मांग करने लगे थे। भारत को बर्मा और मलाया की-सी स्थिति से बचाने के लिए तुरंत कुछ-न-कुछ करने की आवश्यकता थी।
सत्ता को भारतीयों के हाथ सौंप देने की मांग
असल
में, राष्ट्रीय
आंदोलन के नेतृत्व द्वारा संघर्ष शुरू करने को ज़रूरी समझने का एक मुख्य कारण यह
था कि उन्हें लग रहा था कि लोग हतोत्साहित हो रहे हैं और जापानियों के
कब्ज़े की स्थिति में, शायद
बिल्कुल भी विरोध न करें। जापानी आक्रमण का विरोध करने की उनकी क्षमता बनाने के
लिए, उन्हें
इस हतोत्साहित मनःस्थिति से बाहर निकालना और उन्हें अपनी शक्ति का विश्वास दिलाना
ज़रूरी था। गांधीजी
नहीं चाहते थे कि भारत को भी जापान हड़प ले। गांधीजी का विश्वास था कि यदि ब्रिटिश सरकार अब भी भारत की स्वाधीनता की फौरन घोषणा कर
दे तो लोगों को देश-रक्षा के लिए संगठित किया जा सकता था। जापानियों से अगर अंग्रेज़ रक्षा नहीं कर सकते तो वे निकल जाएं।
भारतवासी अपनी रक्षा ख़ुद कर लेंगे। भारतीयों ने जब
गांधीजी से पूछा, 'अगर जापानी आते हैं, तो
हम उनका अहिंसक तरीके से विरोध कैसे करेंगे?' गांधीजी ने 14 जून, 1942 के हरिजन में
जवाब दिया, 'न
तो खाना देना है और न ही रहने की जगह, और न ही उनके साथ
कोई लेन-देन करना है। उन्हें यह महसूस कराया जाना चाहिए कि उन्हें यहाँ नहीं चाहा
जाता।'
जैसे-जैसे
1942 की गर्मियां बीतती गईं, यह साफ़ हो गया कि लंदन ठुकराए गए
क्रिप्स प्रस्ताव से पीछे नहीं हटेगा। नेहरू वाशिंगटन से किसी संकेत का इंतज़ार कर
रहे थे; उन्हें
उम्मीद थी कि रूजवेल्ट चर्चिल पर दबाव डालेंगे ताकि वह भारत में कोई और कदम उठाएं।
कोई संकेत नहीं आया। गांधीजी एक राष्ट्र की आत्म-अभिव्यक्ति की अंधी इच्छा को
महसूस कर रहे थे। गांधीजी को लगा कि अगर इस समय लोगों के अधैर्य को
किसी प्रकार के सुनियोजित सत्याग्रह के रूप में अभिव्यक्ति नहीं दी गई तो यह
अनियंत्रित हिंसा के रूप में फूट पड़ेगा। गांधीजी अब ब्रिटिश साम्राज्य से अंतिम
संघर्ष के लिए तैयार हो गए। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद और जापानियों द्वारा
संभावित आक्रमण के कारण भारतीयों में निराशा और घबड़ाहट व्याप्त थी। इसको हटाने के
लिए महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन को सीधे भारत छोड़ने की मांग करके अपनी मांग के समर्थन में अपना तीसरा बड़ा अहिंसक आंदोलन छेड़ने का फ़ैसला लिया। उन्होंने भारतीयों के दिल में यह
विश्वास पैदा करने की कोशिश की कि वह ब्रिटेन पर आश्रित नहीं हैं। गांधीजी और
कांग्रेस के नेता बेचैनी के साथ चाहते थे कि जो कुछ सिंगापुर, मलाया और बर्मा में घटित हुआ, भारत में उसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी
चाहिए। अपने जीवनीकार लुई फिशर से उन्होंने कहा था, “मुझे अंग्रेजों से चले जाने की मांग करने का मूल
विचार एकाएक आया। इस विचार को क्रिप्स की असफलता ने प्रेरित किया था। अभी मुश्किल
से वे गए ही थे कि यह विचार मेरे मन में मंडराने लगा था। मैं
अब बेचैन हो गया हूँ... हो सकता है मैं कांग्रेस को मना न पाऊँ, फिर
भी मैं आगे बढ़ूंगा और सीधे लोगों से बात करूँगा।”
एक एशियाई शक्ति (जापान) द्वारा एक यूरोपीय शक्ति
(ब्रिटेन) की हार ने गोरों की प्रतिष्ठा को चकनाचूर कर दिया था। अंग्रेजों ने
दक्षिण-पूर्व एशिया से प्रजा को उनके भाग्य पर छोड़ कर पलायन कर लिया। दक्षिण-पूर्व
एशिया में भारतीय विषयों के प्रति ब्रिटिश व्यवहार ने शासकों के नस्लवादी रवैये को
उजागर किया। दो सड़कें बना दी गईं - भारतीय शरणार्थियों (कालों)
के लिए काली सड़क और विशेष रूप से यूरोपीय शरणार्थियों (गोरों) के लिए सफेद सड़क। जब
जनता को सैनिक आक्रमण का सामना करना पड़ा तो वह भय और आतंक का शिकार हो गई। उन्होंने संकट का चुनौती के साथ सामना नहीं किया।
भारत को ऐसी स्थिति से भी बचाना चाहिए।
राष्ट्रीय नेतृत्व जनता को संभावित
जापानी आक्रमण के लिए तैयार करना चाहता था। गांधी जी इस नतीज़े पर पहुंचे कि भारतीय
जनता के मन से इस भय को दूर भगाने और आक्रमण का मुक़ाबला करने के लिए तैयार करने का
यही एक रास्ता हो सकता है कि उसके दिमाग में यह बैठा दिया जाए कि वह अपना मालिक
खुद है और देश की रक्षा करना उसका दायित्व है। जनता इस विश्वास पर अपनी जिम्मेदारी
से मुक्त नहीं हो सकती कि सुरक्षा की जिम्मेदारी ब्रिटेन की है। आशंका यह थी कि अगर
जापान
ने
भारत
पर
हमला
किया
तो
सिंगापुर, मलाया
और
बर्मा
की
तरह
अँग्रेज़
वैसे
ही
देश
छोड़
कर
चले
जाएंगे।
इसलिए गांधीजी ने
जापानियों के भारत आने के पहले ही ब्रितानी सरकार से भारत छोड़ देने और सत्ता को
भारतीयों के हाथ सौंप देने की मांग के साथ एक आंदोलन शुरु करने की योजना बनाई, जिसे
“भारत छोड़ो आन्दोलन” या “अगस्त क्रांति” भी कहा जाता है।
वर्धा
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक
14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस के कार्य समिति की बैठक
हुई। कांग्रेस ने पहली बार संघर्ष के विचार
को स्वीकार किया। इस
बैठक में राष्ट्रीय मांग का मसविदा तैयार हुआ, ‘भारत
में ब्रिटिश शासन तुरंत खत्म होना चाहिए; विदेशी शासन अपने
सबसे अच्छे रूप में भी एक बुराई और लगातार
नुकसान है।’ ब्रिटेन से मांग की गयी कि ब्रिटेन फौरन सत्ता भारतीय को सौंप दे और
भारत छोड़ दे। यदि ब्रिटिश-राज्य को भारत से तुरंत हटा लेने की मांग को स्वीकार
नहीं किया गया, तो गांधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू किया जाएगा। जवाहरलाल
नेहरू द्वारा प्रस्तावित और सरदार पटेल द्वारा समर्थित, इस प्रस्ताव को अगस्त में बंबई में
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक द्वारा अनुमोदित किया जाना था। इसमें कहा गया
कि “कांग्रेस
ब्रिटेन के खिलाफ मौजूदा दुश्मनी को सद्भावना में बदलना चाहती है और भारत को एक
संयुक्त प्रयास में एक इच्छुक भागीदार बनाना चाहती है... यह तभी संभव है जब भारत
आजादी की चमक महसूस करे।”
बंबई में कांग्रेस महासमिति की बैठक
वर्धा में लिए गए नीति संबंधी फैसले का अनुमोदन करने के लिए 7 अगस्त, 1942 को बंबई में
कांग्रेस महासमिति की बैठक बुलाई गई। यह ऐतिहासिक सभा बंबई के ग्वालिया टैंक
मैदान में हुई, जिसे आज अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है।
देश के कोने-कोने से महासमिति के सदस्य, देशी रियासतों के अनेकों कार्यकर्ता
सम्मेलन में पहुंचे। उपस्थिति लगभग बीस हज़ार थी। उत्तेजना चरम पर था। सम्मेलन के
अध्यक्ष मौलाना आज़ाद थे। इस बैठक में सार्वजनिक रूप से वर्धा में पारित प्रस्ताव
पर विचार किया। यह एक विस्तृत प्रस्ताव था। इसमें भारत की स्वतंत्रता को स्वीकार करने की बात कही गई थी। इसमें नाज़ीवाद,
फासीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष की घोषणा की गई थी। साथ ही विभिन्न दलों के सहयोग से एक स्थायी सरकार के गठन का सुझाव भी रखा गया था। मुस्लिम लीग से
वायदा किया गया था कि ऐसा संविधान बनेगा जिसमें भारतीय संघ में सम्मिलित इकाइयों
को अधिक-से-अधिक स्वायत्तता मिलेगी और बचे हुए अधिकार उसी के पास रहेंगे। इन
उद्देश्यों को पूरा करने के लिए गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसक एवं व्यापक
जन-आंदोलन आरंभ करने का निश्चय किया गया। 'अहिंसा इस आंदोलन का आधार होगा।' यह प्रस्ताव 8 अगस्त को काफ़ी
रात गए पास हुआ। इसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ भी कहते हैं।
प्रस्ताव में कहा गया था, “भारत में ब्रिटिश शासन का तुरंत खत्म होना बहुत
ज़रूरी है, भारत के लिए भी और संयुक्त राष्ट्र के मकसद की
सफलता के लिए भी। उस शासन का जारी रहना भारत को अपमानित और कमज़ोर कर रहा है और
उसे धीरे-धीरे खुद की रक्षा करने और दुनिया की आज़ादी के मकसद में योगदान देने में
कम सक्षम बना रहा है। भारत की
स्वतन्त्रता की घोषणा के साथ एक स्थायी सरकार गठित हो जाएगी और स्वतंत्र भारत
संयुक्त राष्ट्र का मित्र बनेगा।”
“अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नारा दिया गया था। उन्होंने
सरकार से भारत छोड़ने और सत्ता भारतीयों को सौंपने की मांग की। कुछ लोगों ने ‘भारत छोड़ो’ नारे को
निराशा, पराजय और जापानियों के स्वागत-सत्कार की नीति कहा। बहुतों ने इसे निरा
पागलपन माना। ऐसे लोगों ने गांधीजी की नीतियों को ज़रा भी समझने की कोशिश नहीं की।
शासकों और स्वामियों की अदला-बदली के संबंध में उन्होंने कई बार कहा था, “ब्रिटिश राज्य को किसी भी दूसरे परदेशी शासन से बदलने के लिए मैं ज़रा
भी तैयार नहीं हूं। जिस दुश्मन को मैं नहीं जानता उससे तो वही दुश्मन अच्छा, जिसे
मैं कम-से-कम जानता तो हूं।”
गांधीजी ने शांत और बिना
किसी बनावटीपन के अंदाज़ में भाषण दिया। उन्होंने सबसे पहले यह साफ़ किया कि ‘असली
संघर्ष अभी शुरू नहीं हो रहा है। आपने अभी सिर्फ़ अपनी सारी शक्तियाँ मेरे हाथों
में सौंपी हैं। मैं अब वायसराय से मिलूंगा और उनसे कांग्रेस की मांगों को मानने की
विनती करूंगा। इस प्रक्रिया में दो या तीन हफ़्ते लग सकते हैं।’ गांधीजी ने
निश्चय कर लिया था कि वे ब्रितानी सरकार से भारत छोड़ देने और सत्ता को भारतीयों के
हाथ सौंप देने की मांग के साथ एक आंदोलन शुरु करेंगे। प्रस्ताव पास होने के बाद गांधीजी
ने उपस्थित प्रतिनिधियों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, “सारी दुनिया के
राष्ट्र मेरा विरोध करें और सारा भारत मुझे समझाए कि मैं ग़लती पर हूं, तो भी मैं
भारत की ख़ातिर ही नहीं परन्तु सारे संसार की ख़ातिर भी इस दिशा में आगे बढूंगा।” 8 अगस्त की रात्रि को बंबई के गवालिया टैंक के
मैदान में गांधीजी ने घोषणा की, “मैं तुरंत
स्वतंत्रता चाहता हूं। अगर हो सके, आज ही रात, पौ फटने से पहले भारत का शासन
भारतीयों के हाथों में सौंपकर यहां से चले जाओ अन्यथा तुम्हें सम्पूर्ण भारतीय
राष्ट्र की उमड़ती हुई शक्ति का सामना करना पड़ेगा। ... मैं पूर्ण स्वतंत्रता से कम
किसी चीज़ से संतुष्ट नहीं हो सकता ... एक
मंत्र है, कोमल सा मंत्र, जो मैं आपको दे रहा हूं। उसे आप अपने हृदय में अंकित कर
सकते हैं और अपनी सांस-सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। वह मंत्र है – ‘करो या
मरो’। या तो हम भारत को आज़ाद करायेंगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगे। ...
“मैं जानता हूं कि ऐसे नाजुक वक़्त पर इस अद्भुत विचार से लोग स्तंभित हुए हैं।
यदि मुझे अपने प्रति ईमानदार रहना था तो पागल करार दिए जाने का खतरा मोल लेकर भी
मुझे सच्चाई की बात करनी थी। मैं इसे युद्ध और भारत को विपत्ति से मुक्त करने में
अपनी ठोस देन मानता हूं। ...”
गांधीजी के भाषण में लोगों के अलग-अलग वर्गों
के लिए खास निर्देश भी थे। “सरकारी
कर्मचारी अपनी नौकरी न छोड़ें लेकिन कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा कर
दें। सैनिक सेना को मत छोडें, लेकिन अपने
देशवासियों पर गोली चलाने इंकार कर दें। राजा-महाराजा भारतीय जनता की प्रभुसत्ता
स्वीकार करें और उनकी रियासतों में रहने वाली जनता अपने को भारतीय राष्ट्र का अंग
मंज़ूर कर लें। किसान, अगर ज़मींदार सरकार विरोधी हैं तो आपस में तय किया गया लगान
अदा करें, और अगर ज़मींदार सरकार समर्थक हैं तो लगान देने से इंकार कर दें।
ज़मींदार, कर देना बंद कर दें। रियासतों की प्रजा, शासक का तभी समर्थन करें जब वह
सरकार विरोधी हो और खुद को भारतीय राष्ट्र का हिस्सा घोषित करें।
“आपको पूरी दुनिया के खिलाफ खड़ा होना है, भले ही आपको अकेले खड़ा होना पड़े। आपको दुनिया
की आँखों में आँखें डालकर देखना है, भले ही दुनिया आपको गुस्से भरी आँखों से देखे। आप
में से हर कोई, इस पल से, खुद को आज़ाद आदमी या औरत समझे और ऐसे काम करे
जैसे आप आज़ाद हैं और अब इस विद्रोह के नीचे नहीं हैं।”
गांधीजी के भाषण का बिजली जैसा असर हुआ। भारत छोड़ो प्रस्ताव ने देश के
राजनीतिक माहौल को एकदम से गरम कर दिया। गांधीजी नहीं चाहते थे कि लोग निरी कटुता
और निराशा के मारे जापानी आक्रमणकारियों का स्वागत करके अपने को कलंकित करें। उनके लिए यह एक नैतिक प्रश्न था। कुछ भी हो जाए, परन्तु भारत
को अपनी आत्मा नहीं खोनी चाहिए। गांधीजी ने कहा था, “मैं जानता हूं कि देश आज विशुद्ध रूप से अहिंसक
प्रकार का सविनय अवज्ञा करने के लिए तैयार नहीं है। किन्तु जो सेनापति आक्रमण करने
से इसलिए पीछे हटे कि उसके सिपाही तैयार नहीं हैं, वह अपने हाथों धिक्कार का पात्र
बनता है। भगवान ने अहिंसा के रूप में मुझे एक अमूल्य भेंट दी है। यदि वर्तमान संकट
में मैं उसका उपयोग करने में हिचकिचाऊँ, तो ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।”
बहुत से नेताओं का ख़्याल था कि वह अवसर ऐसी
सख़्त मांग के लिए उपयुक्त नहीं था। एक तरफ़ उन्हें आतंक और अराजकता के परिणामों का
और दूसरी तरफ़ जापान तथा दूसरे निर्दयी दुश्मनों द्वारा भारतीय जनता को निःसहाय
दासता में जकड़ देने का भय था। राजाजी को भारत छोड़ो मांग अनुचित
लगी इसलिए उन्होंने उस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। 8 अगस्त, 1942 को
उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। राजगोपालाचारी को हैरानी थी कि “सरकार के एक साथ हटने और उसकी जगह दूसरी सरकार न
आने से राज्य और समाज का ही विघटन हो सकता है।” नेहरू के मन
में घोर द्वन्द्व मचा हुआ था। एक तरफ़ चीन से उन्हें हमदर्दी थी, तो दूसरी तरफ़
ब्रिटिश साम्राज्यवाद था, जिसे वे नापसंद करते थे। जब वे गांधीजी से चर्चा कर रहे
थे, तो उन्होंने कहा, “मैंने गांधीजी
की आंखों में आवेश देखा और तभी समझ लिया कि समग्र दृष्टि से देखते हुए यह आवेश
समस्त भारत का आवेश है। इस प्रचंड उत्साह के सामने छोटे-छोटे तर्क और विवाद तुच्छ
और अर्थहीन बन जाते हैं।” आज़ाद के मन में भी संदेह था। उन्होंने सोचा
कि अँग्रेज़ इस आन्दोलन को उभरने के पहले ही कुचल देंगे।
गांधीजी भारत छोड़ो मांग पर दृढ़ थे, लेकिन समझाने-बुझाने पर उन्होंने इस बात पर
रजामंदी ज़ाहिर की कि यदि राजनैतिक सत्ता फ़ौरन भारत को सौंप दी जाती है तो ब्रितानी
सेनाएं भारत में रह सकती है और ऐसे अड्डे भी दिए जा सकते हैं जहां से वे अपना
युद्ध संचालन कर सकें। यदि यह भी स्वीकार नहीं किया गया तो वे कांग्रेस छोड़ देंगे
और “भारत की बालू
से एक ऐसा आंदोलन पैदा करेंगे जो खुद कांग्रेस से भी बड़ा होगा।” गांधीजी ने असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलनों या सत्याग्रह, संगठनात्मक सुधार और सतत प्रचार अभियान के माध्यम से एक गति
का निर्माण किया था। वे इस गति को इसकी परिणति तक ले जाना चाह रहे थे। कांग्रेस
गांधीजी के साथ हो ली और मैदान में कूद पड़ी। लीग से सहमति के बिना इस आन्दोलन को छेडने के गांधीजी के फैसले से जिन्ना काफी नाराज़ हुआ। जिन्ना ने ‘भारत छोड़ो’ को आज़ादी के लिए आन्दोलन न मानकर गांधीजी और कांग्रेस की अंग्रेजों के साथ ब्लैकमेल की नीति माना।
गांधीजी ने कहा था कि आन्दोलन शुरू करने के पहले वे वायसराय को पत्र लिखेंगे
और पन्द्रह दिनों के अन्दर उनकी तरफ़ से उत्तर नहीं मिला तो वे ‘भारत छोड़ो’
आन्दोलन शुरू करेंगे। गांधीजी ने कहा था, “ ‘भारत छोड़ो’ कोई नारा नहीं
है, बल्कि आत्म-शासन के लिए छटपटाती हुई भारतीय आत्मा की प्रबल पुकार है।” अब ब्रिटिश
सत्ता के बिना किसी शर्त के भारत से हटने की बात ही भारतीय प्रश्न के निपटारे की
एकमात्र शर्त हो गई। अब भारत का संविधान इंग्लैंड के बनाने की चीज़ नहीं रही,
भारत-वासियों ने निश्चय कर लिया कि अब तो अपना संविधान वे स्वयं बनाएंगे। भारत की आज़ादी के लिए गांधीजी ने ‘करो या मरो’ के
नारे के साथ अंतिम संघर्ष शुरू करने का निश्चय किया। आजादी की लड़ाई
में अब ‘करो या मरो’ का युग शुरू
होने वाला था।
गांधीजी को गिरफ़्तार कर लिया गया
सरकार कांग्रेस
के साथ बातचीत करने या आंदोलन के औपचारिक रूप से शुरू होने की प्रतीक्षा करने के
मूड में नहीं थी। सभा से लौटकर गांधीजी ने बंबई के बिरला हाउस में प्रार्थना की।
फिर सोने चले गए। गांधीजी ने वायसराय से मिलने का समय मांगा था, लेकिन वायसराय
लिनलिथगो कड़े हाथ से काम लेने का फैसला किया। सरकार ने दमन की पूरी तैयारियां कर
रखी थी। दमन और गिरफ़्तारी के सरकारी निर्देश ज़ारी हो चुके थे। सुबह-सुबह ही मुम्बई
और देश भर में बहुत-सी गिरफ़्तारियां हुईं। रविवार, 9 अगस्त को गांधीजी सुबह चार बजे अपनी प्रार्थना के लिए
उठे। गांधीजी ने महादेव देसाई से कहा, "मेरी कल रात की स्पीच के बाद, वे मुझे कभी गिरफ्तार नहीं करेंगे।" गांधीजी को यह विश्वास इसलिए था कि पिछले दो
साल से गांधीजी ने जल्दबाजी में और समय से पहले हड़ताल
करने से इनकार करके अपने लिए बिछाए गए जाल में फंसने से खुद को बचाया था और
व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन, संगठनात्मक सुधार और एक लगातार प्रचार अभियान
के माध्यम से सावधानी से माहौल बनाया था। लेकिन अब, सरकार
उन्हें अपनी रणनीति पर आगे बढ़ने के लिए और समय देने को तैयार नहीं थी। प्रार्थना
के बाद वह अपनी रोज़ की दिनचर्या शुरू करने ही वाले थे, तभी खबर
आई कि पुलिस कमिश्नर बिड़ला हाउस के गेट पर हैं और गांधीजी के सेक्रेटरी से मिलना
चाहते हैं। वह अपने साथ गांधीजी, महादेव देसाई और मीराबहन के लिए डिफेंस ऑफ
इंडिया रूल्स के तहत गिरफ्तारी और हिरासत के वारंट लाए थे। पुलिस उन्हें जेल ले गई।
इस तरह 9 अगस्त, 1942 को
गांधीजी को गिरफ़्तार कर लिया गया। (ब्रिटिश शासन काल
के दौरान यह गांधी जी की अंतिम जेल यात्रा थी। उन्होंने अपने जीवन के 2,338 दिन जेल में गुज़ारे। इनमें से 249 दिन दक्षिण
अफ़्रीका की जेल में और 2,089 दिन भारत की जेलों में।)
गांधीजी ने
बिरला हाउस से जेल के लिए चलने के पहले कहा था, “मेरी गिरफ़्तारी
के बाद हर एक भारतवासी अपना नेता है, ऐसा समझकर अहिंसा का विचार ध्यान में रखकर
आन्दोलन ज़ारी रहे। स्वाधीनता की इच्छा एवं प्रयास करने वाला प्रत्येक भारतीय स्वयं
अपना मार्गदर्शक बने। प्रत्येक भारतीय आपने आपको स्वाधीन समझे। केवल जेल जाने से
काम नहीं चलेगा।
“आज़ादी का हर अहिंसक सिपाही 'करो या मरो' का नारा एक कागज़ या कपड़े के टुकड़े पर लिखे, और उसे अपने कपड़ों पर चिपका ले, ताकि अगर
सत्याग्रह करते समय उसकी मौत हो जाए, तो उस निशान से
उसे उन दूसरे लोगों से अलग पहचाना जा सके जो अहिंसा में विश्वास नहीं रखते।”
उसी समय गिरफ्तार हुईं मिसेज नायडू, मीराबेन, महादेव देसाई और प्यारेलाल नैयर को भी उनके साथ
रखा गया। अगले दिन, कस्तूरबा ने यह घोषणा करके खुद को गिरफ्तार
करवा लिया कि वह बंबई में एक मीटिंग को संबोधित करेंगी, जिसमें
गांधीजी को बोलने का कार्यक्रम था। शाम तक कस्तूरबा भी गिरफ़्तार थीं। गांधीजी
को आगा ख़ां पैलेस पूना में बा, महादेव देसाई, श्रीमती सरोजिनी
नायडू, डॉ सुशीला नय्यर, प्यारेलाल, डॉ गिल्डर और मीरा बेन के साथ नज़रबंद करके रखा
गया। डॉ. सुशीला नय्यर को गांधीजी की ‘डॉक्टरी
परिचारिका’ बनाकर आगाखां महल में नज़रबंद करने
का प्रबंध कर लिया गया था। हालांकि तब वो कांग्रेस से दूर थीं। सेवाग्राम आश्रम तो
उन्होंने एक वर्ष पहले ही छोड़ दिया था। जब ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव
पास किया गया, तब वह दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में अध्यापन का काम कर
रही थीं। अंग्रेजों ने कोई रिस्क नहीं लिया। गांधीजी
सशस्त्र पहरे में आगाख़ां महल में नज़बन्द थे। गांधीजी को उस महल जैसे क़ैदख़ाने में
रखा जाना बहुत अखर रहा था। सरकार उनको उस ‘महल’ में रखने पर भारी रकम ख़र्च कर रही
है। ग़रीबों के कल्याण के लिए किया जाने वाला धन उनको क़ैद में रखने के लिए व्यय
किया जा रहा था। महल
के चारों ओर कटीले तार लगे थे, और सभी रास्तों पर हथियारबंद पुलिस खड़ी थी।
गिरफ्तारी की
खबर फैलते ही पूरे भारत में गंभीर दंगे भड़क गए थे। 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस नेताओं की बड़ी संख्या में
गिरफ़्तारी हुई। भारत छोडो प्रस्ताव स्वीकार कर लिए जाने के कुछ
ही घंटों के भीतर नेहरूजी, सरदार पटेल और कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद भी
गिरफ़्तार कर लिए गए। महात्मा गाँधी, कस्तूरबा गाँधी, सरोजिनी नायडू, भूला भाई देसाई
को गिरफ्तार कर पूना के आगा खाँ पैलेस में नजरबन्द कर
दिया गया। गोविन्द बल्लभ पन्त को गिरफ्तार करके अहमदनगर के किले में रखा।
जवाहरलाल नेहरू को अल्मोड़ा जेल, राजेन्द्र प्रसाद
को बाँकीपुर तथा मौलाना अबुल
कलाम आजाद को बाँकुड़ा जेल में रखा गया।
1908 के आपराधिक
कानून संशोधन अधिनियम के तहत कांग्रेस कार्य समिति, अखिल भारतीय
कांग्रेस समिति और प्रांतीय कांग्रेस समितियों को गैरकानूनी संघ घोषित किया गया था
और उन पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। भारत रक्षा
नियमावली के नियम 56 के तहत जनसभाओं का जमावड़ा प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। इसके
विरोध में पूरे भारत में क्रांति की लहर दौड़ गई। हर जगह
प्रदर्शनकारी सड़क पर थे। सभी प्रमुख नेताओं का राजनीतिक परिदृश्य से बाहर रहने के
कारण, युवा अरुणा आसफ अली, जो उस समय तक अपेक्षाकृत अज्ञात थी, ने 9 अगस्त को कांग्रेस कमेटी के सत्र की अध्यक्षता की और राष्ट्रीय
झंडा फहराया। सारे देश में गांधीजी की जय-जयकार हो रही थी।
अभी
जारी है ...
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ पर