महात्मा गांधी हत्या केस-45
30-31 जनवरी,
1948
अंतिम संस्कार
महात्मा गांधी की
हत्या (30 जनवरी 1948) भारतीय
इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। इस त्रासदी ने न केवल एक महान नेता को देश से
छीन लिया, बल्कि नव-स्वतंत्र भारत की राजनीति, समाज
और शासन व्यवस्था पर गहरे दूरगामी प्रभाव डाले। विभाजन के बाद देश के प्रशासनिक और
वैचारिक मुद्दों को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच गहरे मतभेद उभर रहे थे।
गांधी जी की अचानक मृत्यु ने दोनों नेताओं को गहरा झटका दिया। इस साझा राष्ट्रीय
शोक ने दोनों नेताओं को एकजुट कर दिया। दोनों ने मिलकर देश को बिखरने से बचाया, रियासतों के एकीकरण को गति दी और
एक स्थिर सरकार का संचालन किया।
गांधी जी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की विचारधारा 'हिंदू राष्ट्र' और दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद से जुड़ी
थी। इस घटना के बाद देश की बहुसंख्यक जनता में दक्षिणपंथी कट्टरपंथ के खिलाफ एक
तीव्र आक्रोश पैदा हो गया। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय संविधान का निर्माण कर रहे
नेताओं ने भारत को एक सच्चा
धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के संकल्प को और मजबूती से
आगे बढ़ाया। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और समान अधिकार देने की नीति को दृढ़ता से
लागू किया गया।
गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद, तत्कालीन सरकार ने कड़ी कार्रवाई
की। सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके तत्कालीन
प्रमुख सहित
हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। हालांकि, बाद में इस शर्त पर प्रतिबंध हटाया
गया कि संगठन खुद को विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक रखेगा और राजनीति से दूर रहेगा।
विभाजन (1947) के कारण पूरा देश भयानक
सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। गांधी जी की शहादत का देश की जनता पर
ऐसा मनोवैज्ञानिक असर हुआ कि दंगों की वह भयावह आग अचानक शांत हो गई। लोगों को
अहसास हुआ कि नफ़रत की राजनीति ने उनके सबसे बड़े नेता को लील लिया है। इस
आत्मग्लानि के कारण देश में अगले करीब एक दशक तक कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं
हुआ।
गांधीजी की हत्या से उपजी
सहानुभूति लहर ने राजनीतिक रूप से कांग्रेस पार्टी को अजेय बना दिया। विपक्ष
(विशेषकर दक्षिणपंथी धड़ा) पूरी तरह बैकफुट पर आ गया। नेहरू एक निर्विवाद वैश्विक और राष्ट्रीय
नेता के रूप में उभरे। इस घटना ने कांग्रेस को इतनी राजनीतिक ताकत दी कि पार्टी ने
आजादी के बाद लगातार तीन दशकों तक केंद्र में निर्बाध शासन किया।
गोडसे चूंकि एक चितपावन ब्राह्मण
था, इसलिए
गांधी जी की हत्या की खबर फैलते ही महाराष्ट्र के कई हिस्सों (विशेषकर पुणे, कोल्हापुर और सतारा) में हिंसा
भड़क उठी। आक्रोशित भीड़ ने चितपावन ब्राह्मणों के घरों, दुकानों और प्रेस को निशाना बनाया
और आगजनी की। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस हिंसा में सैकड़ों लोग हताहत
हुए थे।
गांधीजी की हत्या ने उनके वैचारिक
विरोधियों के तात्कालिक एजेंडे को पूरी तरह विफल कर दिया और स्वतंत्र भारत को एक
बहुसांस्कृतिक, धर्मनिरपेक्ष
और लोकतांत्रिक ढांचे की ओर मजबूती से मोड़ दिया, जिसकी गूंज आधुनिक भारतीय राजनीति
में आज भी महसूस की जाती है।
***
अंतिम संस्कार के आयोजन की जिम्मेदारी
माउंटबेटन
ने उनके अंतिम संस्कार (राजकीय
शवयात्रा और सुरक्षा व्यवस्था) के
आयोजन की
मुख्य जिम्मेदारी
ली। 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की
हत्या के बाद देश में माहौल बेहद तनावपूर्ण था। उस समय माउंटबेटन ने न केवल
कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भूमिका निभाई, बल्कि अंतिम संस्कार की पूरी योजना भी
तैयार की। वह
चाहता था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गांधीजी का शव सुरक्षित रखा जाए। लेकिन यह
हिंदू धर्म के विरुद्ध था। गांधीजी की भी यह इच्छा थी कि जहां उनकी मृत्यु हो वहीं
उनका दाह-कर्म कर दिया जाए। माउंटबेटन ने सुझाव दिया कि अंतिम संस्कार की शवयात्रा
का प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था भारतीय सेना को सौंपी जाए, क्योंकि वहां लाखों की भीड़ जुटने की
उम्मीद थी। शुरुआत में जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल इस बात से असहमत थे।
उनका मानना था कि गांधीजी जीवन भर अहिंसा के पुजारी रहे, इसलिए उनके अंतिम संस्कार में सेना (जो
हिंसा/युद्ध का प्रतीक है) का उपयोग करना ठीक नहीं होगा। माउंटबेटन ने उन्हें
समझाया कि गांधीजी सेना के कड़े अनुशासन और व्यवस्था की हमेशा तारीफ करते थे। इस
तर्क को सुनने के बाद नेहरू और पटेल मान गए और अंतिम संस्कार की कमान सेना को सौंप
दी गई।
दर्शन की व्यवस्था
माउंटबेटन
चाहते थे कि गांधीजी के पार्थिव शरीर को ट्रेन के जरिए पूरे भारत में ले जाया जाए
ताकि देश की जनता उनके अंतिम दर्शन कर सके। लेकिन गांधीजी के सचिव प्यारेलाल ने
बताया कि बापू की इच्छा मृत्यु के 24 घंटे
के भीतर अंतिम संस्कार किए जाने की थी। इसके बाद माउंटबेटन ने लोगों के भारी हुजूम
को देखते हुए बिड़ला हाउस की छत पर गांधीजी के पार्थिव शरीर को जनता के दर्शन के
लिए रखवाया।
रात
भर उनके पार्थिव शरीर के पास गीता का पाठ, सुखमनी साहब का पाठ होता रहा।
***
30 तारीख की शाम को मधुकर केशव काले ने
रेडियो पर गांधीजी की हत्या से संबंधित समाचार सुना। वह फौरन परचुरे से मराठा
बोर्डिंग हाउस के सामने मिला। उसने परचुरे को गांधीजी की मौत का समाचार सुनाया।
परचुरे ने उससे पूछा कि क्या गांधीजी की स्वाभाविक मौत हुई है या उनकी हत्या की गई
है। उसने बताया कि उसे इसकी विस्तृत जानकारी नहीं है। उसके बाद वे दोनों बाज़ार में
परचुरे की दुकान पर गए। कुछ ही देर में मधुकर खिरे भी वहां आ गया। गांधीजी की
हत्या की ख़बर पाकर मधुकर खिरे परचुरे से मिलने उसके क्लिनिक गया। उसने परचुरे से
कहा कि आज के बाद वह गांधीजी के दर्शन और आदर्श की ख़िलाफ़त नहीं करेगा। इससे परचुरे
उससे काफ़ी नाराज़ हो गया। खिरे ने परचुरे से पूछा कि किस तरह का आदमी होगा जिसने
गांधीजी ऐसे महात्मा कि हत्या कर दी? परचुरे ने कहा, वह हमारी तरह का ही एक है।
गांधीजी की हत्या का समाचार ग्वालियर में फैल चुका था, लेकिन हत्यारे का नाम सामने
नहीं आया था। उस दिन परचुरे ने गांधीजी की मौत के कारण दुकान बंद कर दी। उसने गांधीजी
की हत्या का समाचार सुन, मिठाइयां भी बांटी। काले अपने घर चला गया। उसके बाद खिरे
परचुरे के साथ राजपूत बोर्डिंग हाउस गया। वहां पर रामदयाल सिंह से मिलकर परचुरे ने
उससे कहा, मैंने अपना काम कर दिया है, अब तुम अपना काम पूरा करो। रामदयाल सिंह ने
गांधीजी की मृत्यु का समाचार सुना, तो उसने एक शोक सभा के आयोजन करने का मन बनाया।
लेकिन परचुरे उसके पास आया और बोला अंततोगत्वा एक अच्छी चीज़ हुई है। हिन्दू धर्म
का एक दुश्मन मारा गया है। जिसने हत्या की है वह हमारा ही आदमी था। कुछ दिनों पहले
जिसने बम धमाका किया था, वह भी हमारा ही आदमी था। गांधीजी की जिस पिस्तौल से हत्या
की गई है, वह भी ग्वालियर से ही गया था। जिसने गांधीजी की हत्या की है वह
महाराष्ट्र से ग्वालियर आया था और यहां से दिल्ली गया। रामदयाल सिंह का एक दोस्त
जगन्नाथ सिंह परचुरे पर चिल्लाया, चुप रहो। यहां से भागो। इसके बाद परचुरे और उसका
साथी वहां से चले गए। वहां से खिरे अकेले निकला। वह पहले तो घर जाना चाह रहा था,
लेकिन वह गृह मंत्री से मिलने चला गया और उसे सारी बातें बताई।
दूसरे दिन काले को मालूम हुआ कि नाथूराम
ने गांधीजी की हत्या की थी। उसने अपने घर में सारी बात बताई। लोगों ने उसे सलाह दी
कि यह बात वह ग्वालियर सरकार को जाकर बता दे। फिर लोग उसे ग्वालियर के गृह मंत्री
के पास ले गए।
31
जनवरी
इर्विन होस्पिटल के सिविल सर्जन
लेफ्टिनेन्ट कर्नल डॉ. पी.एन. तनेजा ने गांधीजी के शरीर का 31 जनवरी, 1948 को सुबह
8.30 बजे बिड़ला भवन में निरीक्षण किया था।
उसने गांधीजी के मृत्यु के कारणों के बारे में जांच की और बताया कि काफी नज़दीक से
बुलेट के लगने से उत्पन्न हुए शॉक से जो इंटरनल हिमोरेज हुआ था उससे उनकी मृत्यु
हुई थी। उसके पहले डॉ. जीवराज मेहता ने भी गांधीजी के शरीर का परीक्षण किया था।
उनके शरीर पर घावों के पांच निशान पाए गए। छाती की दाहिनी तरफ़ एक गहरा निशान था।
बाईं तरफ़ दो निशान थे। बुलेट के आर-पार कर जाने के कारण दो निशान पीठ की तरफ़ थे।
***
माउंटबेटन ने एक
अनुभवी सैन्य अधिकारी और गवर्नर जनरल के रूप में नेहरू को तुरंत एक आपातकालीन
कैबिनेट बैठक बुलाने की सलाह दी। देर रात तक
कैबिनेट मंत्रियों और गांधीजी के परिवार के बीच चर्चा हुई कि अगले दिन (31 जनवरी) दिल्ली में राजघाट पर उनका अंतिम संस्कार किया
जाएगा। बापू के शरीर को खादी के कपड़ों से सजाया गया और पूरी रात प्रार्थना सभाएं
व भजन चलते रहे।
रात को दो बजे जब भीड़ थोड़ी छंटी तो गांधी के साथी उनके पार्थिव शरीर को
बिरला हाउस के अंदर ले आए। गांधीजी के शव के स्नान करने की ज़िम्मेदारी ब्रजकृष्ण चाँदीवाला को दी गई। चाँदीवाला पुरानी दिल्ली के एक परिवार से आते थे और 1919 से ही जब उन्होंने पहली बार गांधी को अपने सेंट स्टीफ़ेंस
कॉलेज में बोलते हुए सुना, उस दिन से ही उन्होंने ख़ुद को गांधी की सेवा में लगा लिया था। ब्रजकृष्ण
चाँदीवाला ने गांधी के रक्तरंजित कपड़े उतार कर उनके बेटे देवदास गांधी के हवाले
किए। उन कपड़ो में उनकी ऊनी शॉल भी थी जिसमें गोलियों से तीन छेद बन गए थे। ख़ून
बहने से उनके कपड़े उनके जिस्म से चिपक गए थे। बाद में ब्रजकृष्ण ने अपनी किताब 'एट द फ़ीट ऑफ़ गांधी' में लिखा, "बापू का निर्जीव शरीर लकड़ी के तख़्ते पर रखा हुआ था। मैंने
उसे नहलाने के लिए टब से लोटे में ठंडा पानी भरा और बापू के शरीर पर डालने के लिए
अपना हाथ बढ़ाया। तभी अचानक अपने आप ही मेरे हाथ रुक गए, बापू ने कभी भी ठंडे पानी से स्नान नहीं किया था। उस समय रात के दो बज रहे थे।
जनवरी की रात की ज़बरदस्त ठंड थी। मैं किस तरह वो बर्फ़ीला पानी बापू को शरीर पर
डाल सकता था? मेरे टूटे हुए
दिल से एक आह-सी निकली और मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया। लेकिन फ़िर मैंने उसी
ठंडे पानी से बापू को नहलाया। मैंने उनके शरीर को पोंछा और वही कपड़ा उन्हें पहना
दिया जो मैंने उनके पिछले जन्मदिन पर उनके लिए ख़ुद काता था। मैंने उनके गले में
सूत की बिनी हुई माला भी पहनाई और मनु ने उनके माथे पर तिलक लगाया।"
31 जनवरी को उनके पार्थिव शरीर के अग्निदाह की व्यवस्था हुई।
ब्रह्म मुहूर्त में देवदास और उनकी पत्नी लक्ष्मी, उनकी पोतियों (आभा और मनु) और
परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा पवित्र जल (गंगाजल) से स्नान कराया गया। उनकी देह
पर चंदन का लेप लगाया गया। बापू के माथे पर पारंपरिक रूप से चंदन का तिलक लगाया
गया और उनके सीने पर गोलियों के घावों को ढकने के लिए गुलाब की पंखुड़ियाँ और फूल
रखे गए। जिस मसीहा ने जीवन भर खादी को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया, उनके अंतिम सफर के लिए भी हाथ से बुनी गई शुद्ध सफेद खादी की चादर (कफन) का उपयोग किया गया। बापू के शरीर को इसी बेदाग सफेद खादी से लपेटा गया था, जबकि उनका सीना खुला रखा गया था। उनके पार्थिव शरीर को जिस
स्ट्रेचर/अर्थी पर लेटाया गया था, उसके पैरों के पास गुलाब और गेंदे के फूलों की पंखुड़ियों से संसकृत भाषा में "राम" शब्द उकेरा गया था, क्योंकि उनके मुख से निकले अंतिम शब्द "हे राम" थे। बापू का चरखा
केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उनके
अहिंसक आंदोलन की आत्मा था। रात में जब उनके शरीर को अंतिम दर्शन के लिए तैयार
किया गया, तो उनके पार्थिव शरीर के ठीक बगल में उनका प्रिय चरखा रखा गया था। यह इस बात का प्रतीक था कि भले ही बापू का शरीर शांत हो
गया हो, लेकिन उनके विचार और स्वावलंबन का संदेश हमेशा जीवित रहेगा।
बापू को तैयार करने के बाद जब आधी रात को उन्हें बिड़ला हाउस की छत/बालकनी पर जनता
के दर्शन के लिए रखा गया, तब उनके चारों ओर बैठे परिवार के सदस्य, आश्रमवासी और प्रियजन लगातार श्रीमद्भगवद्गीता, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब की आयतों व श्लोकों का पाठ कर रहे थे। पूरा कमरा और बिड़ला हाउस का परिसर भजनों की
पवित्र ध्वनि, अगरबत्ती और ताजे फूलों की महक से सराबोर था।
***
भारत सरकार का
विमान भेजकर नागपुर से रामदास, रामदास की पत्नी, पुत्र कनु और पुत्री उषा को
दिल्ली बुलाया गया। भारत सरकार के विमान से सरोजिनी नायडू लखनऊ से आईं। सारी
दिल्ली में भीड़ उमर पड़ी थी। चारों तरफ़ ‘महात्मा गांधीजी की जय’ के नारे गूंज रहे
थे। लोगों की आंखों के आसूं थम नहीं रहे थे। जब गांधीजी की शव यात्रा का इंतज़ाम
किया जा रहा था तो बदहवास और किसी दूसरी दुनिया में खोए नेहरू ने माउंटबेटन से कहा
था, ''चलिए बापू से ही पूछते हैं क्या कुछ किया जाना है।'' जब गांधीजी के शव के सामने उनकी भतीजी मनु उनका प्रिय भजन
गा रही थीं तो नेहरू उनके पास आकर बोले थे, ''और ज़ोर से गाओ, क्या पता बापू
जाग ही जाएं।''
***
31 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार स्वतंत्र भारत का पहला सबसे बड़ा राजकीय और
सैन्य सम्मान वाला आयोजन था। चूंकि गांधीजी के पास कोई सैन्य रैंक या
आधिकारिक सरकारी पद नहीं था, इसलिए उनके अंतिम संस्कार के लिए तैयार किए गए सैन्य
प्रोटोकॉल ऐतिहासिक और अभूतपूर्व थे। लॉर्ड माउंटबेटन की देखरेख और ब्रिटिश-भारतीय
सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल सर रॉय बुचर के कमान में इस पूरे सैन्य प्रोटोकॉल को
अंजाम दिया गया। रक्षा-मंत्रालय ने श्मशान यात्रा का प्रबंध किया था। गांधीजी के
पार्थिव शरीर को सेना के एक विशेष ट्रक खुले डॉज वाहन (फौजी गाड़ी), जिसे फूलों से
सजी तोप गाड़ी/गन कैरिज के रूप में तैयार किया गया था, पर रखा गया
था। जीवन भर अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा की शवयात्रा में तोप गाड़ी का
उपयोग विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन सैन्य प्रोटोकॉल में यह किसी भी राष्ट्र प्रमुख
या महानतम हस्ती को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। फौजी गाड़ी के
बीच में उठे हुए मंच पर शव को रखा गया था।
***
साढ़े ग्यारह बजे अंतिम यात्रा आरंभ हुई। शव
तिरंगा में लिपटा था। फूलों और मालाओं से शरीर ढंका था। ट्रक झंडों और फूलों से
सजा था। उनके पैरों के पास बांयी तरफ़ सरदार बैठे और दायीं तरफ़ रामदास गांधी। सिर
के पास सामने देवदास और नेहरूजी खड़े थे। उस वाहन में गांधीजी के पुराने साथी
राजकुमारी अमृत कौर और जेबी कृपलानी भी सवार थे। श्मशान यात्रा शुरू होने ही वाली
थी कि गेट पर हलचल हुई। लोगों ने रास्ता ख़ाली कर दिया। सुशीला नय्यर लाहौर से
पहुंच चुकी थीं। सरदार पटेल ने हाथ बढ़ाकर उन्हें सेना की गाड़ी पर चढ़ाया। बहावलपुर
का अपना मिशन पूरा कर वह 30 जनवरी को मुलतान में रुकी
थीं। वहां के डिप्टी कमिश्नर के यहां वह चाय पर आमंत्रित थीं। वहीं पर उन्हें इस
दुखद घटना की सूचना मिलीं। वे तुरंत मोटर से लाहौर के लिए रवाना हुईं। जिस विमान
से वह दिल्ली आ रही थीं उसी में पश्चिम पंजाब के मुसलिम नेता इफ़्तेख़ारुद्दीन भी
थे, जो गांधीजी के अन्तिम दर्शन के लिए दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने सुशीला से कहा,
“प्यारी बहन, जिस आदमी ने
पिस्तौल का घोड़ा दबाया, वह बापू का हत्यारा नहीं है। हममें से वे सब उनकी हत्या के
लिए जिम्मेदार हैं, जिन्होंने किसी समय उनकी बात पर शक किया और अपने दिलों में
हिंसा और साम्प्रदायिकता की भावना रखी।”
***
थल सेना, वायु सेना और नौसेना के दो सौ
जवान चार मज़बूत और मोटे रस्सों द्वारा उस विशाल ट्रक को खींच रहे थे। गाड़ी का इंजन
पूरी यात्रा के दौरान बंद रखा गया था। शवयात्रा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए 4,000 सैनिक, 1,000 वायु सैनिक, 1,000 पुलिस के
सिपाही और 100 जलसेना के सैनिक आगे-पीछे चल रहे थे। यानी सेना के तीनों अंगों (थल
सेना, नौसेना और
वायुसेना) के जवान इस गंभीर जुलूस का हिस्सा थे। सामने गवर्नर जनरल का रक्षादल चल रहा था। सड़कें लोगों से
खचाखच भरी थीं। सैनिकों, पुलिस के जवानों और बख़्तरबंद मोटरें भीड़ को क़ाबू में रखने
में लगी हुई थी। जब सैन्य वाहनों का यह काफिला बिड़ला हाउस से राजघाट की ओर बढ़ रहा
था, तब भारतीय वायुसेना के विमानों ने आसमान से शवयात्रा के पूरे मार्ग
पर केसरिया और फूलों की पंखुड़ियों की बारिश की थी। अंतिम संस्कार के निर्धारित
प्रोटोकॉल के तहत सैनिकों ने बापू को अंतिम सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर) दी।
शायद दस लाख से ज़्यादा की भीड़ थी। बाद में
अनुमान लगाया गया कि महात्मा गांधी की शवयात्रा में कम से कम 15 लाख लोगों का एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक
जनसैलाब उमड़ा था। उस राजधानी की सड़कों पर मुंड ही मुंड दिख रहे थे। उस समय की
मीडिया रिपोर्ट्स और इतिहासकार इसे आजाद भारत का ही नहीं, बल्कि आधुनिक विश्व इतिहास का सबसे बड़ा और
सबसे भावुक शोक-प्रदर्शन मानते हैं। मशहूर फ़ोटोग्राफ़र मार्ग्रेट बर्के वाइट
ने जब अपने लाइका कैमरे के लेंस को फ़ोकस किया तो उनके ज़हन में आया कि वो शायद
धरती पर जमा होने वाली सबसे बड़ी भीड़ को अपने कैमरे में कैद कर रही हैं। सैकड़ों
लोगों ने गांधीजी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिए थे। राजधानी और इसके आसपास
के ग्रामीण इलाकों के हजारों लोग अपना देसी घी लेकर श्मशान स्थल पर पहुंच गए थे।
इनकी चाहत थी कि जो घी वे लेकर आए हैं, उसी से गांधीजी की अंत्येष्टि हो। माउंटबेटन के निजी
सचिव एलन कैंपबेल जॉन्सन ने अपनी किताब 'मिशन विद माउंटबेटन' में लिखा, "अंग्रेज़ी राज को भारत से हटाने में सबसे
बड़ी भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी को उनकी मृत्यु पर भारत के लोगों से ऐसी
श्रंद्धांजलि मिल रही थी जिसके बारे में कोई वायसराय कल्पना भी नहीं कर सकते थे।"
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर

