मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-33

 

महात्मा गांधी हत्या केस-33

22 जनवरी, 1948

अपनी ज़िंदगी के इन आखिरी दिनों में गांधीजी कई स्तरों पर जी रहे थे। वे एक ही समय में हिंसक मौत की संभावना को लेकर बेपरवाह भी थे और उसी के बारे में सोच भी रहे थे। वे कैबिनेट के साथ बैठकें करते, बंगाली भाषा की अपनी क्लास जारी रखते, चरखे पर सूत कातते और बगीचे में प्रार्थना सभाओं को संबोधित करते थे। वे ये सब काम ऐसे करते थे मानो उनके पास जीने के लिए अभी बीस साल और हों, मानो हवा में हिंसा का कोई तनाव न हो; और साथ ही, उन्हें यह भी पता था कि किसी भी पल गन-कॉटन का धमाका हो सकता है या कोई हैंड ग्रेनेड फट सकता है।

हालांकि उन्हें पक्का यकीन था कि वे ईश्वर की सुरक्षा में हैं, फिर भी उन्हें यह भी लगता था कि हो सकता है ईश्वर ने ही उनकी मौत का आदेश दिया हो, और यह मौत उनके जीवन को सार्थक बना देगी। बम धमाके के दो दिन बाद, सुबह की प्रार्थना के बाद, एक ऐसा दिन जो उनके लिए बहुत पवित्र था, क्योंकि उस दिन महीने की बाईस तारीख थी, जिस दिन कस्तूरबा का निधन हुआ था, उन्होंने मनुबहन को एक तरफ बुलाया और अपने मन की बात बताई। उन्होंने कहा, धीरे-धीरे ईश्वर मुझे एक-एक करके लोगों का असली रूप दिखाएंगे। इसलिए यह धमाका उन्हीं की मर्ज़ी से हुआ। इस धमाके के पीछे एक बड़ा रहस्य है, जिसे कोई नहीं जान सकता। लेकिन अब मुझे इस मामले पर तुमसे बात करने में कोई फ़ायदा नहीं दिखता। मैं बहुत उदास हूँ, इसलिए तुम्हें मेरा हौसला बनाए रखना चाहिए। जैसा कि मैंने कल प्रार्थना-सभा में कहा था, मेरी इच्छा है कि मैं तुम्हारी गोद में सिर रखकर और चेहरे पर मुस्कान के साथ 'राम' का नाम जपते हुए हत्यारे की गोलियों का सामना करूँ। जब उनकी हत्या हुई, तो सब कुछ ठीक वैसा ही हुआ जैसा उन्होंने सोचा था।

इस बीच, उनकी सेहत सुधर रही थी। उपवास के बाद पहली बार, 22 जनवरी को गांधीजी प्रार्थना स्थल तक चलकर जा सके। हालाँकि यह देखा गया कि जब वे प्रार्थना स्थल तक जा रहे थे, तो उनके कदम धीमे थे और लड़खड़ा रहे थे। उन्हें अधिक ठंड लगती थी, इसलिए जब वे सुबह-सुबह अपने पत्र-व्यवहार का काम कर रहे थे, तो उनके पास दो इलेक्ट्रिक हीटर लगा दिए गए थे। वे अभी भी तरल भोजन ही ले रहे थे और उनके लिवर और किडनी में कोई सुधार नहीं हो रहा था। उन्होंने अपने प्रार्थना-भाषण में कहा कि धीरे-धीरे उनकी ताकत लौट रही है और ईश्वर की कृपा से उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही वे पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे।

22 जनवरी को गांधीजी ने शरणार्थियों की मदद का काम फिर से शुरू कर दिया। गांधीजी के सामने मुख्य समस्या थी कि सिंध प्रांत में हिन्दुओं पर काफी अत्याचार हुआ था। गांधीजी स्वयं पाकिस्तान जाना चाह रहे थे। कराची जाकर वह सिंधियों की सहायता करना चाहते थे। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। अब वहां उन्हें मदद पहुंचाने के लिए किसी को भेजना था। उन्होंने अपने दो सहयोगियों फ़्रेण्ड्स सर्विस यूनिट के लेसली क्रॉस और अपने निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नय्यर को बहावलपुर शीघ्र जाने के लिए कहा।

जब बम कांड का समाचार केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भेजा गया, तो सरदार पटेल ने कहा कि बंदूक धारी रक्षक गांधीजी के साथ रहेगा। प्रार्थना सभा में जाने वालों की जांच भी की जाएगी। गांधीजी ने मना कर दिया। कहा, बंदूकों की छांव में प्रार्थना करना, प्रार्थना नहीं होती। उस समय तो सब ईश्वर की शरण में होते हैं। सरदार कुछ न कर पाए। हां, हमले के बाद बिड़ला हाउस में सादी वर्दीधारी 25 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी। नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था।

हत्या की साज़िश

इक्कीस तारीख़ की दोपहर को, मदनलाल की गिरफ़्तारी के चौबीस घंटों के भीतर, दिल्ली पुलिस के दो अधिकारी, उपाधीक्षक जसवन्त सिंह और इंस्पेक्टर बालकिशन, बम्बई के लिए विमान में थे। उनको आदेश था कि वे बंबई में पुलिस उपायुक्त श्री जे.डी. नागरवाला से मिलें और उन्हें तथ्यों से अवगत कराएं, और फिर सीआईडी ​​के उप सहायक पुलिस महानिरीक्षक रावसाहेब गुर्टू से मिलने के लिए पूना जाएं। उन्हें मामले की जांच में बॉम्बे पुलिस की सहायता भी करनी थी। वे अपने साथ मदनलाल के बयान की एक प्रति ले गए थे। यह बयान, उस समय पूरे उत्तर भारत में प्रचलित पुलिस प्रक्रिया के अनुरूप, उर्दू लिपि में लिखा गया था।

दिल्ली के दोनों पुलिस अधिकारियों ने 22 जनवरी की सुबह-सुबह डिप्टी कमिश्नर नागरवाला से मुलाक़ात की और मदनलाल के बयान की कॉपी सौंपी। बयान उर्दू में दर्ज़ थे, बंबई के किसी अधिकारी को उर्दू पढ़नी नहीं आती थी। नागरवाला ने कहा कि जांच में किसी दखलअंदाज़ी की ज़रूरत नहीं है। उसने बयान की कॉपी को परे रख दिया। दिल्ली के दोनों पुलिस अधिकारियों ने ज़ुबानी तौर पर भी उन्हें सारी जानकारी दी, और ख़ास तौर पर यह बताया कि मदनलाल ने 'हिंदू राष्ट्र' या 'अग्रणी' के एडिटर का ज़िक्र अपने मुख्य साथियों में से एक के तौर पर किया था। बाद में जब जांच हुई तो नागरवाला का कहना था कि उन्होंने करकरे के अलावा किसी और का ज़िक्र कभी नहीं किया। इस बात पर काफ़ी हंगामा हुआ कि क्या दिल्ली पुलिस ने बॉम्बे पुलिस से उस आदमी का पता लगाने के लिए कहा था जो 'हिंदू राष्ट्र' का एडिटर था। यह भी आश्चर्य ही लगता है कि एक अखबार के संपादक के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए दिल्ली पुलिस को बंबई पुलिस की सहायता लेनी पड़ी। दिल्ली का कोई भी पुलिस अफ़सर, या कोई भी आम आदमी, बॉम्बे में बस एक फ़ोन करके यह पता लगा सकता था कि एडिटर का नाम नाथूराम विनायक गोडसे है। प्रेस एक्ट के तहत, हर राज्य सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में छपने वाले सभी अख़बारों का रजिस्टर रखती थी, जिसमें उनके एडिटरों और मालिकों के नाम होते थे। अगर नागरवाला को यह जानकारी मिल जाती, तो शायद वह नाथूराम को समय रहते पकड़कर गांधी की हत्या रोक सकते थे, या कम से कम बिड़ला हाउस में तैनात गार्डों के बीच पूना के कुछ ऐसे पुलिसवालों को तैनात करवा सकते थे जो नाथूराम को शक्ल से पहचानते थे। लेकिन उस समय नागरवाला भी अपने ही एक अजीबोगरीब अंदाज़े में उलझे हुए थे, और ऐसी बातों, विचारों या नतीजों को मानने के लिए तैयार नहीं थे जो उनकी अपनी पसंदीदा थ्योरी से मेल नहीं खाते थे।

नगरवाला ने उस समय पुलिस के एक साथी अफ़सर से कहा था, ‘साज़िश महात्मा गांधी को अगवा करने की थी। यह एक बहुत बड़ा संगठन था, जिसमें लगभग बीस मुख्य साज़िशकर्ता शामिल थे; हर एक की मदद के लिए बीस लोग थे और उनके पास काफ़ी मात्रा में बंदूकें और दूसरे घातक हथियार थे।’ नगरवाला को अपनी थ्योरी के सही होने का इतना पक्का यकीन था कि दिल्ली पुलिस से बाद में मिली जानकारी और मदनलाल के बयान की कॉपी पढ़ने के बाद भी, वे इसे ही सही मनवाने पर अड़े रहे। यहाँ तक कि उन्होंने साफ़ तौर पर यह भी कह दिया कि ‘दिल्ली पुलिस को अगवा करने वाले गैंग ने अपने पक्ष में कर लिया है।’ 30 जनवरी तक, नगरवाला ने दिल्ली पुलिस प्रमुख को दो पत्र लिखे जिनमें ‘अगवा करने की थ्योरी पर ज़ोर दिया गया था।’ गांधीजी की हत्या के बाद ही नगरवाला ने उस घटनाक्रम पर काम करना छोड़ा जिसकी कल्पना उन्होंने खुद की थी।

बॉम्बे के नज़रिए से देखें तो, बॉम्बे के ही अपराधियों को पकड़ने में मदद करने का दिल्ली पुलिस का प्रस्ताव कुछ ठीक नहीं लगा। और सच तो यह है कि अगले कुछ दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए जब एक नेटवर्क ने दूसरे नेटवर्क को कोई ज़रूरी सबूत नहीं दिया, जो उसे मिला था। गांधीजी की हत्या के बाद, दिल्ली में किसी ने इन आपसी मतभेदों को ध्यान में रखते हुए स्थिति को संभालने के लिए नागरवाला को जांच का विशेष अधिकारी नियुक्त किया। इस तरह उस अधिकारी के नेतृत्व में एक अलग पुलिस टीम बनी, जो किसी एक नेटवर्क से जुड़ी नहीं थी। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं थी कि दिल्ली के उन दो पुलिसकर्मियों को बॉम्बे में अच्छा स्वागत नहीं मिला। 22 और 23 तारीख को उनकी नागरवाला से कम से कम तीन बार मुलाकात हुई। नागरवाला उनसे ऊंचे पद पर थे और उन्होंने रूखे पन से कहा कि वे अपनी वर्दी उतार दें, अपना होटल का कमरा छोड़ दें (क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि बॉम्बे में उनकी मौजूदगी का पता चले) और खुद से कोई पूछताछ न करें। अगर बॉम्बे में रहते हुए वे किसी तरह अपने हेडक्वार्टर के संपर्क में रहते, तो उन्हें पता चलता कि होटल मरीना के धोबी ने कमरा नंबर 40 में रहने वालों के छोड़े हुए कपड़े सौंप दिए थे, और उनमें तीन ऐसे कपड़े थे जिन पर साफ तौर पर 'NVG' लिखा था। यह जानकारी और मदनलाल द्वारा 'हिंदू राष्ट्र' के संपादक का ज़िक्र, उन्हें नाथूराम की पहचान का पता लगाने में एक कदम और आगे ले जा सकते थे। लेकिन दिल्ली पुलिस ने बॉम्बे में मौजूद अपने लोगों को यह जानकारी नहीं दी; और नागरवाला, जो इसका इस्तेमाल कर सकते थे, उन्हें इसके बारे में कुछ पता ही नहीं था। 'NVG' के मिलने को कोई खास अहमियत नहीं दी गई और न ही इसका कोई इस्तेमाल किया गया।

20 जनवरी को गांधीजी की जान लेने की कोशिश नाकाम रही थी। हालांकि बाकी छह साज़िशकर्ता मौके से भागने में कामयाब रहे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने मदनलाल को गिरफ़्तार कर लिया। अपने उल-जुलूल बयानों और यह नाटक करके कि उसे मराठी भाषा समझ नहीं आती (जबकि बाकी लोग इसमें माहिर थे), वह अपने साथियों की पहचान छिपाने में कामयाब रहा। दिल्ली पुलिस को दिए गए उसके बयान को उर्दू में रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन बॉम्बे पुलिस के लिए यह किसी काम का नहीं रहा क्योंकि उसकी बिना अनुवाद की हुई कॉपी ही उन्हें भेजी गई थी। असल में, हत्या के बाद ही पुलिस को इस बात का पता चला, जब नाथूराम ने खुद सरेंडर किया और पुलिस को अपना नाम बताया। असल बात तो यह है कि हत्या के बाद तक पुलिस साज़िश रचने वालों की पहचान का पता नहीं लगा पाई थी।

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दिल्ली से बंबई जाने वाली ट्रेन में गोपाल गोडसे के पास सोचने के लिए बहुत समय था। मदनलाल का वह नज़ारा उसे बार-बार परेशान कर रहा था, हाथों में हथकड़ी, सिर पर बोरा ढका हुआ और पकड़ने वाले उसे उसके पुराने साथियों का पता लगाने के लिए इधर-उधर ले जा रहे थे। अगर किस्मत ने साथ न दिया होता, तो वह कैदी खुद गोपाल हो सकता था। वह पूना वापस जाकर अपनी पत्नी और छोटी बेटियों के साथ रहना चाहता था और उस सुखद दिनचर्या में फिर से खो जाना चाहता था जो पिछले हफ़्ते से पहले उसकी ज़िंदगी का हिस्सा थी।

दोपहर में दादर स्टेशन पर गोपाल गोडसे ट्रेन से उतरा। वह पूना जाने वाली अगली ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था। वह अपनी पत्नी सिन्धु और बेटी से मिलने के लिए आतुर था। तभी एक पुलिस वाला आया और उसके सामान की तलाशी का आग्रह किया। डर से गोपाल का चेहरा सफेद हो गया, उसे लगा अब उसका खेल ख़त्म हुआ। उस कपड़े के थैले के अलावा जिसमें वह दो रिवॉल्वर और बिना इस्तेमाल किया हुआ ग्रेनेड ले जा रहा था, गोपाल के पास बिस्तर का बंडल भी था। अपने डर को दबाते हुए, उसने फुर्ती से बिस्तर का बंडल खोला। पुलिस वाले ने बेडिंग की सरसरी तलाशी ली और उसका बैग बिना देखे चला गया। ज़ाहिर है, पुलिस वाला किसी चोरी के सामान की तलाश में था जो छोटे से कपड़े के थैले में नहीं आ सकता था। गोपाल के हलक में अटकी सांस बाहर आई।

उसकी ट्रेन 22 तारीख को शाम 5 बजे किर्की स्टेशन पहुँची। छह बजे घर पहुंचने के बाद उसने एक कमरे में खुद को बंद कर लिया और सोचने लगा। उसकी सबसे बड़ी चिंता अपनी रिवॉल्वर को कहीं सुरक्षित रखने की थी। वह बहुत किफ़ायती था, इसलिए शायद उसे यह ख्याल नहीं आया कि रात में या नदी पार करते समय उन्हें ट्रेन की खिड़की से बाहर फेंक दे; हथियार और उनके कारतूस दोनों ही उनके पास थे। उसने उन साक्ष्यों से छुटकारा पाने की योजना बनाई जो उसे गांधीजी पर हुए हमले के कांड से जोड़ते। नौ बजे तक उसने तय कर लिया कि कम से कम एक हथियार को कहीं सुरक्षित रख दिया जाए। उसने अपनी .38 रिवॉल्वर निकाली, उसे और उसके अतिरिक्त कारतूसों को बड्गे के तौलिये में लपेटा और उस बंडल को कपड़े के एक थैले में रख दिया। एक घंटे बाद वह पूना पहुँचा और सदाशिव पेठ में रहने वाले एक पारिवारिक मित्र के घर का दरवाज़ा खटखटाया। उस मित्र का नाम पांडुरंग गोडबोले था। उसने गोडबोले  से कहा कि वह उसके पास एक चीज़ रखना चाहता है। वह चीज़ एक रिवॉल्वर और कुछ कारतूस थे... जो तौलिये में लिपटे हुए और एक थैले में रखे हुए थे। उन चीजों को बड़गे को देना था। बड़गे उस .38 वेब्ले स्कॉट रिवाल्वर के बदले उसे .22 बोर का रिवाल्वर देता। उसने उस थैले को गोडबोले को रखने के लिए दिया, गोडबोले ने उस  थैले को ट्रंक में रख दिया। इस तरह कम से कम एक हथियार सुरक्षित रख दिया गया था, या कम से कम गोपाल को ऐसा ही लगा। उसके पास अभी भी .32 रिवॉल्वर थी; बाड्गे ने इसे पूना में रहने वाले शर्मा नाम के व्यक्ति से अदला-बदली में लिया था। गोपाल के मन में यह धुंधला सा विचार था कि वह बड्गे के ज़रिए इसे इसके असली मालिक को लौटा देगा और बदले में अपने भाई की .22 पिस्तौल वापस ले लेगा, जो शर्मा को दी गई थी। उसकी छुट्टी के अभी भी तीन दिन बाकी थे, इसलिए दूसरी रिवॉल्वर से छुटकारा पाने के लिए उनके पास काफ़ी समय था।

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गोपाल की ट्रेन के रवाना होने के बाद, करकरे दिल्ली रेलवे स्टेशन के टी-रूम में तब तक बैठा रहा जब तक उसे यह यकीन नहीं हो गया कि पुलिस पार्टी चली गई है। फिर वह फ्रंटियर हिंदू होटल गया, अपना बिल चुकाया और अपना सामान रेलवे स्टेशन के वेटिंग-रूम में ले आया। दोपहर में वह हिंदू महासभा के अपने एक-दो दोस्तों से मिलने गया। करकरे मदनलाल की मदद के लिए कुछ करना चाहता था, जैसे कि कोई अच्छा वकील करना जो उसे ज़मानत पर रिहा कराने की कोशिश करे या कम से कम उसे अपना बचाव करने के सबसे अच्छे तरीके के बारे में सलाह दे सके। लेकिन उसके दोस्तों की ऐसी किसी खतरनाक चीज़ में पड़ने की कोई इच्छा नहीं थी और उन्होंने मदद करने से मना कर दिया। करकरे ने बुधवार और गुरुवार का पूरा दिन दिल्ली की सड़कों पर एक भटके हुए इंसान की तरह घूमते हुए और रात में सोने के लिए वेटिंग-रूम में आते-जाते हुए बिताया। मदनलाल के कुछ रिश्तेदारों की मदद से, वह वकील मेहता पूरन चंद की सेवाएँ लेने में कामयाब रहा जो मदनलाल का केस लड़ सके।

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दिगंबर बड़गे और शंकर किष्टैय्या 20 जनवरी को बॉम्बे एक्सप्रेस से कल्याण के लिए निकले थे। 22 जनवरी की सुबह 11.30 बजे बड़गे और किष्टैय्या कल्याण रेलवे स्टेशन पर उतरे। उसी दिन दोनों पूणे के लिए निकल गए थे। पूना जाने वाली ट्रेन से शाम 19.30 बजे वे पूना पहुंचे। दूसरों के ग्रेनेड से अलग दिखने के लिए उसके द्वारा सप्लाई किए गए ग्रेनेड पर बड़गे लाल टेप से `X’ चिह्न लगा दिया करता था। अब तक उसने पचास-से-साठ ग्रेनेड बेचे होंगे। दिल्ली से लौटने के बाद बड़गे ने अपना पूरा घर साफ किया। वह कोई सबूत नहीं छोड़ना चाहता था जिसके कारण पकड़ा जाए। उसने अपने साथियों से भी संपर्क नहीं किया। 23 जनवरी से 31 जनवरी तक वह घर में ही रहा।

हत्या की साज़िश में शामिल लोग दिल्ली से भाग गए और किसी का पता भी नहीं चला!

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

“और सूर्य चन्द्रमा एवं नक्षत्र सब उसी के आदेशपालक हैं। प्रत्येक वस्तु अल्लाह की सिरजी हुई है तथा आदेश भी अल्लाह ही का है, वह वरदान देने वाला ईश्वर है जो अनेक जगतों का पालनहार है।” (क़ुरआन : 7/54)

यही ग़ैब की बातें हैं, जिन्हें (हे नबी!) हम आपकी ओर प्रकाशना (वह़्यी) कर रहे हैं। इससे पूर्व न तो आप इन्हें जानते थे और न आपकी जाति। अतः आप सहन करें। वास्तव में, अच्छा परिणाम आज्ञाकारियों के लिए है। (क़ुरआन : 11/49)

रहस्यवाद सभी धर्मों के मूल में निहित है। रहस्यवाद की अवधारणा अंतिम सत्य के साथ आत्मा के साक्षात्कार की चाहत से निकली है। इस विचार को अक्सर 'शाश्वत दर्शन' कहा जाता है, जिसके अनुसार दुनिया के सभी धर्म अलग-अलग रास्तों से होते हुए एक ही परम सत्य (ईश्वर, ब्रह्म या चेतना) तक पहुँचते हैं। रहस्यवादी पारंपरिक धार्मिक क्रिया-कलापों जैसे प्रार्थना, उपवास और तीर्थयात्रा से ही संतुष्ट नहीं होते। उनके लिए बिना रहस्यवादी अनुभूति के धर्म अर्थहीन है। उन्हें गहरी और विस्तृत अनुभूति की पिपासा होती है। रहस्यवाद मूल रूप से शब्दों, कर्मकांडों और ग्रंथों से परे जाकर उस परम सत्ता का सीधा, व्यक्तिगत और आंतरिक अनुभव करने का मार्ग है। धर्म जहाँ एक सामाजिक और बाहरी ढांचा प्रदान करता है, वहीं रहस्यवाद उसकी आंतरिक आत्मा है। जब कोई साधक अपने धर्म की बाहरी परतों (नाम, रूप, नियम) को छोड़ देता है, तो वह उसी गहरे आध्यात्मिक सत्य पर पहुँचता है जहाँ सभी धर्म आपस में मिल जाते हैं। इसलिए, रहस्यवाद को सभी धर्मों का साझा धागा माना जा सकता है। सूफी संत बाहरी नियमों (शरीयत) से आगे बढ़कर तरीकत (आंतरिक मार्ग) को अपनाते हैं। वे संगीत, नृत्य (जैसे दरवेशों का घूमना) और प्रेम के माध्यम से अल्लाह से सीधे मिलन (फना) की बात करते हैं।

माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में जन्मा। बसरा में दसवीं सदी में कुछ तेजस्वी लोगों का एक दल था, जिसे इख़्वानुस्सफ़ा (पवित्र बिरादरी) कहा जाता था। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य धर्म और दर्शन, तथा विज्ञान और आस्था के बीच समन्वय स्थापित करना था। इस बिरादरी का मानना था कि इंसानी आत्मा ज्ञान और दर्शन के माध्यम से ही पवित्र (शुद्ध) हो सकती है और मोक्ष प्राप्त कर सकती है। रूढ़िवादी धार्मिक विरोध से बचने के लिए इसके सदस्यों ने हमेशा अपनी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी। यद्यपि यह एक गैर-सांप्रदायिक बौद्धिक आंदोलन था, अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि इस संगठन का गहरा झुकाव रहस्यवादी सूफीमत की ओर था, जो धार्मिक ग्रंथों के बाहरी अर्थ के बजाय उनके आंतरिक या गुप्त (बातिन) अर्थ पर अधिक जोर देते हैं। इख़्वानुस्सफ़ा ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रसाइल' में एक आदर्श मनुष्य की कल्पना एक वैश्विक और बहु-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से की है। उनके अनुसार, एक परिपूर्ण या आदर्श मनुष्य किसी एक संस्कृति, देश या धर्म की सीमाओं में बंधा नहीं होता, बल्कि वह दुनिया की सभी सभ्यताओं और आध्यात्मिक परंपराओं के बेहतरीन गुणों का एक अद्भुत मिश्रण होता है।

एक आदर्श मनुष्य की चर्चा करते हुए इस बिरादरी ने लिखा है, 

“एक आदर्श आदमी वह है, जिसमें इस तरह की उत्तम बुद्धि और विवेक हो जैसे कि वह ईरानी मूल का हो, अरब आस्था का हो, धर्म में सीधी राह की ओर प्रेरित हनफ़ी (इस्लामी धर्मशास्त्र की सबसे तार्किक और उदार शाखा के मानने वाले) हो, शिष्टाचार में इराक़ी हो, परम्परा में यहूदी हो, सदाचार में ईसाई हो, समर्पण में सीरियाई हो, ज्ञान में यूनानी हो, दृष्टि में भारतीय हो, ज़िन्दगी जीने के ढंग में रहस्यवादी (सूफ़ी) हो।”

यह वक्तव्य इस्लामी संस्कृति को स्पष्ट करता है। उसके उदार प्रवृत्ति को उजागर करता है। विविधता में एकता की कल्पना को साकार करता है। दुनिया भर की अच्छी-अच्छी विचार-धाराओं को अपनाकर सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। सूफ़ीमत जिसका उदय पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ माना जाता है, उसके विकास में इस उदार मानसिक माहौल का बहुत बड़ा योगदान था। प्रारंभिक सूफ़ी संन्यासी थे। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. के कई साथियों ने उनके जीवन काल में ही संसार का त्याग कर दिया और सीधा-सादा पवित्र जीवन जीने लगे थे। उन्होंने स्वेच्छा से दारिद्र्य को अपना लिया था। वैराग्य सूफ़ीमत में एक अनिवार्य तत्व के रूप में अपना लिया गया था। सूफ़ियों ने तौबा (पश्चाताप) और तवक्कुल (ईश्वर में आस्था) पर अधिक बल दिया। वे ईश्वर की उत्कृष्टता की धारणा से काफ़ी प्रभावित थे। ऐसे कई पुण्यात्मा थे जिन्हें सत्य से साक्षात्कार की लगन लगी। ब्रह्म से व्यक्तिगत और सीधे अनुभूति की उनकी आकांक्षा थी। आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे रहस्यवाद की तरफ़ मुड़े। निश्चित रूप से सूफ़ी मत का स्रोत पैगम्बर मुहम्मद स. हैं। उनकी प्रकाशना के दो स्तर हैं, एक क़ुरआन, जिसे इल्मे-ए-सकीना (किताबी ज्ञान) कहा गया है, और यह सबके लिए है। दूसरा इल्म-ए-सिना (गुह्य ज्ञान) जो सूफ़ियों के लिए है। यह वह ज्ञान है जो किताबों (सफीना) को पढ़ने से नहीं, बल्कि एक गुरु (मुर्शिद या पीर) के दिल से सीधे शिष्य के दिल (सीना-दर-सीना) में स्थानांतरित होता है। इख़्वानुस्सफ़ा का मानना था कि आत्मा को मुक्त करने के लिए केवल बाहरी विज्ञान ही काफी नहीं है। आदर्श मनुष्य वही है जो अपनी आत्मा को पवित्र करके इस आंतरिक 'गुह्य ज्ञान' (इल्म-ए-सीना) को जाग्रत कर ले। इस ज्ञान के अनुसार, ईश्वर या परम सत्य को बुद्धि के तर्कों से सिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे केवल हृदय की शुद्धता से महसूस किया जा सकता है। सूफी संत बुल्ले शाह का एक प्रसिद्ध दोहा इस अंतर को स्पष्ट करता है:

"पढ़ पढ़ इल्म हज़ार किताबें,

कदे अपने आप नूं पढ़िया ई नहीं।"

अर्थात—हजारों किताबी ज्ञान पढ़ लिए, पर अपने भीतर के गुह्य ज्ञान को कभी नहीं जाना। इल्मे सीना वह आध्यात्मिक रोशनी या अंतर्ज्ञान है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को मिटाकर उसे सीधे परम चेतना (ईश्वर) से जोड़ती है। यह ज्ञान 'जानने' का नहीं, बल्कि 'हो जाने' का नाम है।

19.1 ख़िज़्रवाद

आगे बढ़ने के पहले सूफ़ियों के ख़िज़्रवाद के सिद्धांत पर एक नज़र डाल लें। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमयी अवधारणा है, जो सीधे तौर पर 'इल्म-ए-लदुन्नी' (ईश्वर द्वारा सीधे दिया गया गुह्य ज्ञान) और आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन से जुड़ी है। यह सिद्धांत पूरी तरह से क़ुरान के सूरह अल-कहफ़ में वर्णित पैगंबर मूसा और हज़रत ख़िज़्र की यात्रा पर आधारित है। इस कथा में, पैगंबर मूसा (जो शरीयत या बाहरी नियमों के प्रतीक हैं) हज़रत ख़िज़्र (जो बातिन या छिपे हुए ईश्वरीय रहस्यों के प्रतीक हैं) के साथ यात्रा करते हैं। ख़िज़्र कुछ ऐसे काम करते हैं जो इंसानी बुद्धि और कानून (ज़ाहिर) के हिसाब से गलत लगते हैं (जैसे एक नाव को तोड़ना, एक बच्चे की जान लेना, एक ढहती हुई दीवार को मुफ्त में ठीक करना)। लेकिन अंत में वे साबित करते हैं कि उनके इन कार्यों के पीछे एक गहरा, अदृश्य ईश्वरीय न्याय (बातिन) छिपा था। सिद्धांत का निचोड़ यह है कि इंसानी तर्कशास्त्र या बाहरी नियम हमेशा परम सत्य को नहीं समझ सकते। सच्चा ज्ञान (इल्मे सीना/लदुन्नी) तर्कों से परे होता है।

यह सिद्धांत उनके बाह्य ज्ञान (इल्म) और आंतरिक ज्ञान (मारिफ़) का प्रतीक है। धर्मशास्त्री (उलमा) दोनों के बीच कोई अंतर नहीं मानते हैं, जबकि सूफ़ियों का मानना है कि एक को दूसरे को लेकर हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए। इल्म साधारण ज्ञान है। परमात्मा विषयक सूफ़ियों के रहस्यमय ज्ञान जिसे मारिफ़ कहते हैं, आध्यात्मिक और सच्चा ज्ञान है। जो हम आँखों से देखते हैं, वह सांसारिक ज्ञान है, इल्म है। इल्म की प्राप्ति मनुष्य की चेष्टा और शिक्षक की सहायता से होती है। जो ह्रदय जान पाता है वह सच्चा ज्ञान है। आंतरिक ज्ञान ईश्वर के विशेष ज्ञान का एक अंग है और इसे ईश्वर अपने विशेष बंदों को देता है। परमात्मा का ज्ञान जिसे ‘इल्म-ए-मारिफ़त’ कहा जाता है, के द्वारा परमात्मा को उसके पैग़म्बर और संत जान पाते हैं। यह सम्पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छा और अनुग्रह पर निर्भर करता है। यह उसे ही मिलता है जो इसके योग्य होते है। इन्हें ‘आरिफ़’ (ज्ञानी) कहते है। जिन्हें आंतरिक ज्ञान प्राप्त होता है वे वली (उत्तराधिकारी) कहलाते हैं। इनके प्रतिनिधि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं। खिज्र शब्द का अर्थ समुद्री रंग का हरापन होता है। कहा जाता है कि वे जहां बैठते थे वहाँ का रंग हरा हो जाता था। हरापन सूफ़ियों के लिए आत्मा के पुनर्जीवन और आंतरिक ताज़गी का प्रतीक है। वाह्य ज्ञान के प्रतिनिधि हज़रत मूसा अलैहि. हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. में ये दोनों ज्ञान (बाह्य और आंतरिक) एकत्र हो गए।

जो वाह्य ज्ञान के धारक हैं उन्हें आंतरिक ज्ञान के लिए वली की ओर आकृष्ट होना पड़ता है। उन्हें अपने धर्मगुरु पर कभी कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए, उसे पैगम्बर मूसा की तरह पूर्ण धैर्य रखना चाहिए। भले ही गुरु की कोई बात या क्रिया उसकी बुद्धि को समझ न आए, ईश्वर तक पहुंचने के लिए धर्मगुरु का अनुपालन अनिवार्य है। उसे गुरु के आंतरिक ज्ञान पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि गुरु की दृष्टि 'ज़ाहिर' (दिखने वाले) से आगे 'बातिन' (अदृश्य भविष्य) को देख रही होती है। कुछ सूफ़ी संप्रदाय का मानना है कि ईश्वर अपने विशेष बंदों को सभी आंतरिक और वाह्य ज्ञान प्रदान करता है। सूफ़ियों का ख़िज़्रवाद यह स्थापित करता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर एक ऐसा क्षण आता है जहाँ इंसानी बुद्धि और किताबें काम नहीं आतीं। वहाँ केवल वही ईश्वरीय अंतर्ज्ञान काम आता है जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है, और हज़रत ख़िज़्र इसी सार्वभौमिक, शाश्वत और अदृश्य ईश्वरीय मार्गदर्शन के जीवंत प्रतीक हैं।

हज़रत खिज्र एक बहुत बड़े संत थे। उन्हें परमात्मा विषयक ज्ञान का पता था। वे परमात्मा के गुप्त नाम को जानने वाले थे। हज़रत खिज्र में सूफ़ियों को बहुत विश्वास है। परमात्मा के अनुग्रह प्राप्त संतों को परमात्मा के गुप्त नाम से परिचय कराना उनका काम था। ख़िज़्रवाद में हज़रत ख़िज़्र को 'अमर' माना जाता है। सूफ़ियों के अनुसार, उन्होंने 'आबे हयात' (अमरता प्रदान करने वाले जल) का पान किया था। इसलिए ऐसा माना जाता है कि संसार के अंत होने तक वे जीवित रहेंगे। यहाँ 'आबे हयात' कोई भौतिक पानी नहीं है, बल्कि यह ईश्वरीय चेतना और अमर आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है।

उनका नाम हज़रत अबुल अब्बास मलकान था, वे हज़रत मल्क़ान अलैहि. के पुत्र थे। हज़रत ख़िज़्र नूह अलैहिस्सलाम की आने वाली पीढ़ियों (वंशजों) में से थे। बताया जाता है कि हज़रत नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम मनुष्य हज़रत आदम अलैहिस्स्लाम के दसवें वंश में थे। उनके कुछ पहले तक लोग इस्लाम पर चले आ रहे थे। फिर अपने धर्म से फिर गये और अपने पुनीत पूर्वजों की मुर्तियाँ बना कर पूजने लगे। तब अल्लाह ने हज़रत नूह़ अलैहि. को भेजा। किन्तु कुछ के सिवा किसी ने उन की बात नहीं मानी। अन्ततः सब डुबो दिये गये। फिर हज़रत नूह़ अलैहि. के तीन पुत्रों से मानव वंश चला। इसलिये उन को दूसरा आदम भी कहा जाता है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के इतिहास में प्रसिद्ध बेटों के नाम साम, हाम, याफ़िस और याम/कनआन (जो सैलाब में डूब गए थे) मिलते हैं।

आम तौर पर सूफ़ी मत में किसी भौतिक गुरु (पीर या मुर्शिद) का होना अनिवार्य माना जाता है। लेकिन ख़िज़्रवाद के तहत एक विशेष अपवाद है जिसे 'उवेसी' सिलसिला कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई साधक सच्चा है और उसे कोई भौतिक गुरु नहीं मिल पा रहा है, तो हज़रत ख़िज़्र स्वयं अदृश्य रूप से प्रकट होकर उसे दीक्षा देते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं। महान सूफ़ी दार्शनिक इब्न अरबी ने स्वयं दावा किया था कि उन्हें आध्यात्मिक वस्त्र (ख़िरक़ा) सीधे हज़रत ख़िज़्र से प्राप्त हुआ था।

परमात्मा को बिना परमात्मा की सहायता के नहीं जाना जा सकता। प्रसिद्ध सूफी विद्वान ज़ुन्नून मिस्री का एक बहुत विख्यात कथन है: "मैंने परमात्मा को परमात्मा के ही माध्यम से जाना, और यदि परमात्मा न होते, तो मैं परमात्मा को कभी न जान पाता।" इसलिए ‘मारिफ़’ परमात्मा के द्वारा ही मिलता है। सूफी मानते हैं कि साधक (मुरीद) चाहे जितनी भी कठिन साधना, उपवास, या ध्यान (ज़िक्र) कर ले, वह अपने बलबूते परम सत्य को नहीं पा सकता‌। इंसानी प्रयास केवल हृदय के दर्पण को साफ़ करने के लिए हैं‌। उस साफ़ दर्पण में परमात्मा का जो प्रकाश चमकेगा, वह पूरी तरह से ईश्वरीय कृपा (फ़ज़्ल) पर निर्भर करता है‌। जब तक परमात्मा स्वयं को प्रकट नहीं करता, मनुष्य उसे नहीं जान सकता‌। सूफ़ी मारिफ़ को प्रकाश मानते हैं। इसके द्वारा ह्रदय आलोकित हो उठता है। जिसने ज्योतिस्वरूप परमात्मा से प्रकाश पाया है वह परमात्मा के एकत्व को देखने में समर्थ होता है। यह ज्ञान परमात्मा की ज्योति से ही ज्योतिवाला है इसलिए अंत में यह परमात्मा की ज्योति में ही जाकर मिल जाता है। इसलिए सूफ़ी प्रार्थना करता है, “हे परमात्मा, मेरे ह्रदय में प्रकाश दो, और मेरी कब्र में प्रकाश दो। मेरे श्रवन, मेरी दृष्टि और मेरे शरीर में प्रकाश दो। मेरे अन्तर की ज्योति को तीव्र कर दो। मेरे अंतर को प्रकाशित कर दो।” अपनी बुद्धि के द्वारा जो उस परमात्मा को जानना चाहता है वह एक सीमा तक ही आगे बढ़ पाता है। उसके बाद उसे अपनी असहाय अवस्था का बोध होने लगता है। वह परमात्मा से दया की भीख मांगता है। परमात्मा की दया से ही साधक उसे जान पाता है। सूफी मत में परम ज्ञान को मारिफ़त कहा जाता है‌। यह कोई ऐसा ज्ञान नहीं है जिसे इंसान अपनी बुद्धि, तर्कों या किताबों को पढ़कर 'अर्जित' कर सके‌। इसे 'इल्मे लदुन्नी' (वह ज्ञान जो सीधे ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलता है) कहा जाता है‌। सूफी संत सहल अल-तुस्तरी ने लिखा है कि वास्तविक स्मरणकर्ता मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा है जो मनुष्य के हृदय में अपना स्मरण जगाता है‌।

परमात्मा की सहायता (आकर्षण या जज़्बा) साधक के झूठे 'मैं' को मिटा देती है, जिसे सूफी 'फ़ना' (अहंकार का विलय) कहते हैं‌। जब इंसान का अस्तित्व ही नहीं बचता, तब केवल परमात्मा ही बचता है, और इस प्रकार परमात्मा ही स्वयं को जानता है‌। सूफियों का मानना है कि इंसान के दिल में ईश्वर के प्रति प्रेम भी उसकी अपनी इच्छा से पैदा नहीं होता‌। परमात्मा स्वयं अपने आनंद के लिए मनुष्य के हृदय में प्रेम की चिंगारी उत्पन्न करता है‌। कुरान की एक आयत का सूफी रहस्यवादी इस तरह अनुवाद करते हैं: "तुम ईश्वर को याद करते हो, क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें याद किया है"‌। सूफीवाद में मनुष्य की स्थिति एक प्यासे की तरह है, लेकिन वह कुआँ तक तभी पहुँच सकता है जब पानी स्वयं उसे अपनी ओर खींचे। इसलिए, सूफी साधना में स्वयं के प्रयासों से अधिक परमात्मा की दया, प्रेम और सहायता की प्रार्थना की जाती है‌।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

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