बुधवार, 26 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-8

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम



10. सूफ़ी दर्शन-8

10.13 शेख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी (1154-1191)

प्रकाशवाद दर्शन के प्रवर्तक शेख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी (मृ. 1191  .) थे। उनका पूरा नाम शिहाब अल-दीन अबू अल-फुतुह याह्या इब्न हबश सुहरावर्दी। उनका जन्म उत्तर-पश्चिमी ईरान के पास सुहरावर्द गाँव में सन 1154 ई. में हुआ था। उन्होंने पहले मजद अल-दीन जिली से और बाद में ज़हीर अल-दीन कारी से शिक्षा ग्रहण की। मजद अल-दीन अल-जीली ने उन्हें दर्शन और धर्मशास्त्र की शिक्षा दी। इसके बाद वे इस्फहान (ईरान) गए, जो उस समय इस्लामी ज्ञान का एक बड़ा केंद्र था। वहाँ उन्होंने तर्कशास्त्र और इब्न सीना के दर्शन का गहराई से अध्ययन किया। अपनी औपचारिक पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने ईरान, अनातोलिया और सीरिया की यात्रा करना शुरू किया और विभिन्न सूफ़ी आचार्यों से मिले और उनकी शिक्षाओं से लाभान्वित हुए। इस अवधि के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक एकांतवास में ध्यान और वंदना में अधिक समय बिताया।

अपनी एक यात्रा पर, वह दमिश्क से अलेप्पो आए और प्रसिद्ध मुस्लिम शासक साहिब अल-दीन अय्यिबी के पुत्र मलिक ज़हीर से मिले। मलिक अल-ज़ाहिर गाज़ी उनके ज्ञान और विचारों से बेहद प्रभावित हुए और उन्हें अपने दरबार में ऊंचा स्थान दिया। मलिक ज़हीर शिहाब अल-दीन सुहरवर्द के प्रति समर्पित हो गए। यहाँ सुहरवर्दी  शहर के धार्मिक अधिकारियों के साथ उलझ गए। उनके क्रांतिकारी सूफी विचारों, प्राचीन दार्शनिक सिद्धांतों और बढ़ती लोकप्रियता से वहाँ के रूढ़िवादी उलेमा (धार्मिक गुरु) ईर्ष्या करने लगे। धार्मिक अधिकारियों ने उनके कुछ बयानों को इस्लाम के लिए खतरनाक माना। उन्होंने उनकी मृत्यु के लिए मलिक ज़हीर से कहा, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उलेमाओं ने शासक साहिब अल-दीन के पास याचिका दायर की, जिन्होंने धार्मिक नेताओं के आदेशों का पालन करने तक अपने बेटे को पद छोड़ने की धमकी दी। इस प्रकार शिहाब अल-दीन सुहरवर्दी को क़ैद कर लिया गया और वर्ष 1191 में, 38 वर्ष की आयु में, उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बाद उन्हें 'अल-मक्तूल' (हत्या किया हुआ/शहीद) कहा जाने लगा।

उन्हें 'शेख-ए-इशराक' (ज्ञान या प्रकाश का स्वामी) भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने प्राचीन ईरानी और इस्लामी रहस्यवाद का अनूठा समन्वय किया था। उनके दर्शन का केंद्रबिंदु 'प्रकाश' है। उन्होंने ईश्वर को "नूर अल-अनवार" (प्रकाशों का प्रकाश) के रूप में परिभाषित किया। अरबी शब्द इशराक़ का अर्थ है रोशनी और मशरिक़ का अर्थ पूर्व है, दोनों व्युत्पत्ति रूप से मूल शर्क से व्युत्पन्न हैं जिसका अर्थ है सूर्य का उदय। सभी प्राणी सर्वोच्च प्रकाश की रोशनी (इशराक़) हैं। मनुष्य की आत्मा निश्चित रूप से प्रकाश से बनी है; इसलिए मनुष्य सूर्य या अग्नि के प्रकाश को देखकर हर्षित हो जाता है और अंधकार से डरता है। ब्रह्मांड के सभी कण अंततः प्रकाश में लौट आते हैं। सर्वोच्च प्रकाश और शरीर के अन्धकार के बीच विभिन्न चरण होते हैं जिनमें सर्वोच्च प्रकाश इस दुनिया के अंधेरे तक पहुंचने के लिए धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाता है। इस सर्वोच्च प्रकाश को नूर अल-अनवर या नूर अल-आज़म कहा जाता है। चूंकि बीच में कोई पर्दा नहीं है, इसलिए इससे साधक को प्रत्यक्ष रोशनी प्राप्त होती है। इस रोशनी के माध्यम से, एक नया विजयी प्रकाश (नूर अल-क़ाहिर) अस्तित्व में आता है जो दो रोशनी प्राप्त करता है, एक सीधे सर्वोच्च प्रकाश से और दूसरा पहली रोशनी से।

सुहरवर्दी 'मक्तूल' का सबसे बड़ा योगदान उनका 'हिकमत अल-इशराक' (The Philosophy of Illumination) ग्रंथ है। उन्होंने ग्रीक दर्शन (विशेषकर प्लेटो), प्राचीन ईरानी/जरथुस्त्र हिकमत और सूफी अध्यात्म का एक अनूठा समन्वय तैयार किया। उनके अनुसार ईश्वर का अस्तित्व ब्रह्मांड के हर कण में है। वे भी अद्वैतवाद के समर्थक थे। चूंकि प्रत्येक वस्तु जो दिख रही है, उसका मूल कारण प्रकाश में निहित है, इसलिए उसका अंतिम सत्य ईश-प्रकाश है। इसमें दीप्ति है। प्रकाश नहीं दिखता लेकिन किसी वस्तु के माध्यम से दृश्य दिखने लगता है। उच्च प्रकाश उन वस्तुओं को प्रकाशित करता है, जो प्रकाश रहित है। इस सिद्धांत में ब्रह्मांड को ला-नूर (प्रकाश रहित) कहते हैं। प्रकाश सत्य से और अंधकार असत्य से संबद्ध है। सत्य ही प्रकाश स्रोत है। उसकी दीप्ति प्राप्त करने की इच्छा समस्त दृश्य जगत के मूल में निहित है। सूफ़ी प्रकाश के मूल स्रोत से संपर्क स्थापित करने के लिए साधना के विभिन्न आयामों से गुज़रते हैं। हालाकि यह यात्रा एक बिंदु के रूप में शुरू होती है, लेकिन वर्चस्व (क़हर) और प्रेम (मुहब्बत), स्वतंत्रता और निर्भरता, रोशनी (इशराक़) और चिंतन (शुहुद) जैसे कई अन्य "आयाम" जुड़ जाते हैं। इसके लिए एक माध्यम की ज़रूरत होती है, जिसे वली कहते हैं।  प्रकाश की ओर बढ़ना मनुष्य की प्रकृति का अंग है। वह अपने व्यक्तित्व को अधिक से अधिक प्रकाशमान करना चाहता है। ज्ञान और पुण्य के माध्यम से आत्मा अंधकारमय जगत से स्वतंत्रता प्राप्त करती है।

उनके विचारों का बाद के इस्लामी दर्शन, विशेषकर ईरान और भारत के रहस्यवादी चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने तर्क के साथ-साथ 'कश्फ़' (आंतरिक अनुभूति) को वास्तविक ज्ञान का जरिया माना। उनका मानना था कि आत्मा पवित्र होकर सीधे दिव्य प्रकाश से ज्ञान प्राप्त कर सकती है। प्रसिद्ध सूफ़ी साधकों के अनुसार आत्मा में ऐसी शक्ति है कि वह भौतिक जगत से परे होकर परमात्मा से साक्षात्कार कर सकता हैउसके साथ एकैक हो सकता है। इस भौतिक जगत से अध्यात्मिक जगत में पहुंच जाना सच्चे साधक के लिए बहुत सहज है। उस पर परमात्मा की बराबर दया बनी रहती है और उसी के सहारे बिना किसी अभ्यास के इस स्थूल जगत के बंधनों को छिन्न-भिन्न कर वह उस जगत में पहुंच जाता है। विभिन्न उपायों से साधक इस शक्ति को प्राप्त करता हैक्रमशः वह अग्रसर होता है और उसके सामने के पर्दे धीरे-धीरे हटते जाते हैं और वह परमात्मा की विभूतियों के दर्शन कर पाता है। साधक का लक्ष्य इससे भी आगे बढ़ने का होता है। वह उस अवस्था को प्राप्त करना चाहता हैजिसमें वह परमात्मा के साथ एकैक हो सके। यह एक ऐसी कैफ़ियत है जिसका बयान शब्दों के द्वारा संभव नहीं है। अतएव आत्मा के रहस्यों को जानना और उस पर नियंत्रण करना सूफ़ी साधना का महत्वपूर्ण अंग है। उन्होंने भौतिक दुनिया और आध्यात्मिक दुनिया के बीच एक मध्यवर्ती सूक्ष्म दुनिया का सिद्धांत दिया।

शेख सुहरवर्दी ने अरबी और फारसी भाषा में लगभग 50 से अधिक लघु और वृहद ग्रंथ लिखे। हिकमत अल-इशराक (प्रबुद्धता का दर्शन) उनका सबसे मुख्य दार्शनिक ग्रंथ है। हायाकिल अल-नूर (प्रकाश के मंदिर) और क़िसा अल-ग़ुर्बात अल-ग़रबीय्या (पश्चिमी निर्वासन की कहानी - एक आध्यात्मिक रूपक कथा) उनके अन्य प्रमुख ग्रन्थ हैं। ध्यान दें कि चिश्ती और सुहरावर्दी सूफी संतों द्वारा पढ़ी जाने वाली प्रसिद्ध किताब 'अवारिफ़-उल-मआरिफ़' के लेखक 'शेख शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी' (1144-1234) थे, जो इनके समकालीन थे, लेकिन दोनों अलग-अलग शख्सियतें हैं।‌

महान फारसी सूफी संत हज़रत शेख शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी (1145–1234 ई.) सुहरवर्दी सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध संस्थापक और महान संत थे। मूल नाम अबू हफ़स शहाबुद्दीन उमर था। वे अपने समय में 'शेख-उल-शायख' (शेखों के शेख) की उपाधि से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म ईरान के जंजान शहर के पास सोहरवर्द कस्बे में (539 हिजरी) हुआ था। उनका निधन 1234 ईस्वी में बगदाद (इराक) में, जहाँ उनका मजार स्थित है।

वे अपने चाचा अबू नजीब सुहरावर्दी के मुख्य शिष्य (मुरीद) थे, जिन्होंने सुहरावर्दी सिलसिले की शुरुआती नींव रखी थी। अपने चाचा से आध्यात्मिक मार्ग (तसव्वुफ) की पूरी शिक्षा लेकर उन्होंने खिलाफत (उत्तराधिकार) प्राप्त की। उन्होंने ही सुहरवर्दी सूफी सिलसिले को औपचारिक रूप दिया और इसका विस्तार किया। शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी द्वारा लिखित 'अवारिफ अल-माआरिफ' सूफी मत और अध्यात्म का एक कालजयी ग्रंथ माना जाता है। यह पुस्तक दुनिया भर के सूफी खानकाहों (मठों) में एक गाइडबुक और पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। उनके प्रसिद्ध खलीफाओं और शिष्यों में हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया मुल्तानी (भारत में इस सिलसिले का प्रसार करने वाले) और शेख सादी शिराजी शामिल हैं। शेख बहाउद्दीन जकारिया ने मुल्तान (वर्तमान पाकिस्तान) को केंद्र बनाकर उत्तर-पश्चिम भारत में सुहरावर्दी सिलसिले को अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। जलालुद्दीन तबरेजी इनके एक अन्य प्रसिद्ध शिष्य थे जिन्होंने बंगाल और भारत के पूर्वी हिस्सों में सूफी सिद्धांतों का प्रचार किया।

10.14 वहदतुल-शुहूद’ (एकत्व प्रतिभास)

वहदतुल-शुहूद का मतलब है कि देखी जाने वाली चीज़ का एक होना यानी वाह्याकृति / आविर्भाव का एकत्व ('दृष्टि की एकता')। हालांकि ईश्वर और उसकी कृति (मनुष्य) अलग हैं फिर भी कभी-कभी वे एक ही लगते हैं। यह एक रहस्यवादी विवेचना है। यह स्थिति ईश्वर से सम्मिलन की स्थिति है। इस सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर (अल्लाह) और उसकी बनाई हुई सृष्टि (ब्रह्मांड) वास्तविक रूप में एक नहीं हैं, बल्कि दोनों बिल्कुल अलग हैं। ईश्वर और सृष्टि की एकता का अनुभव केवल एक साधक (सूफी) के मन और उसकी आध्यात्मिक दृष्टि में होता है, वास्तविक दुनिया में उनका अस्तित्व अलग-अलग ही रहता है। सूफी साधकों के लिए समस्त वास्तविकता एक हैअर्थात्‌ हमें पृथ्वी पर जो भी दिखाई देता है वह एक सत्ता का विकास है। सभी वस्तुओं का उद्गम एक है और उसी तत्व में उनका लौटना भी निश्चित है। यह सिद्धांत मानता है कि संसार अल्लाह का रूप या उसका हिस्सा नहीं है, बल्कि संसार केवल अल्लाह के गुणों और उसकी रोशनी की एक परछाई या प्रतिबिंब मात्र है। जब कोई सूफी संत गहन ध्यान या साधना (तपस्या) करता है, तो उसे अपनी चेतना में ऐसा अनुभव होता है कि सब कुछ एक ही है। लेकिन यह अनुभव केवल उसकी आत्मिक दृष्टि (शुहूद) तक सीमित होता है।

सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर एक व्यापक शक्ति है और यह शक्ति सारी सृष्टि में फैली हुई है। इसलिए धर्म के आधार पर भेद-भाव व्यर्थ है। प्रेम ही ईश्वर का सच्चा रूप है। हज़रत शेख़ अलाउद्दौला समनानी रह. (मृ. 1336 ई.) ने वहदतुश्शुहूद (Unity of Witness / गवाही की एकता) का प्रतिपादन करते हुए कहा कि परमात्मा की छवि इतनी महान है कि इसके सामने संसार की अन्य वस्तुएं नहीं के बराबर हैं। उसका वह स्वरूप ही दृश्यमान रहता है। उसका गुण बराबर अव्यक्त रहता है। जैसे हित पहुंचाने वाले में छिपे हुए अहित नाम के गुण को कोई देख नहीं सकता और हितकारी ही प्रकट रहता है। हज़रत अलाउद्दौला समनानी ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि सृष्टिकर्ता (अल्लाह) और उसकी रचना (संसार) एक नहीं हैं, बल्कि दोनों में बुनियादी अंतर है। हज़रत समनानी के अनुसार परमार्थ और अपरमार्थ दो सत्ता है – एक परमात्मा की सत्ता हैदूसरा जीव की। परन्तु जीव की सत्ता शून्य जैसी है। उसे अपने अस्तित्व के लिए परमार्थ सत्ता की अपेक्षा है। जब व्यक्ति में छिपे गुण अभिव्यक्त होते हैंतब उनको नाम दिए जाते हैं। इसलिए ये मात्र दर्पण के सदृश हैं जो परम सत्ता के सभी रहस्यों को प्रकट करते हैं। समनानी द्वारा रखे गए इन विचारों को बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में हज़रत मुजद्दिद अलिफ़ सानी (शेख अहमद सरहिंदी) ने 'वहदतुश्‌शुहूद' के रूप में पूरी तरह से विकसित और लोकप्रिय किया।

अगर वहदतुल वुजूद के अनुसार केवल ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। साधक ईश्वर के अस्तित्व के अलावा सृष्टि की अन्य रचनाओं को नहीं होने के समान समझता है, तो वहदतुश्शुहूद के अनुसार साधक ईश्वर के अलावा किसी और वस्तु को देख ही नहीं पाता। वहदतुल वुजूद सिद्धांत समुद्र और लहर जैसा है। जैसे लहर समुद्र से अलग नहीं होती, वैसे ही यह संसार और हम सब ईश्वर से अलग नहीं हैं। जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है, वह ईश्वर का ही रूप है। मतलब रचयिता और रचना में कोई भेद नहीं है। वहदतुश्शुहूद सिद्धांत सूरज और परछाई जैसा है। परछाई सूरज के होने से ही बनती है, लेकिन परछाई कभी भी सूरज नहीं बन सकती। इसी तरह, संसार ईश्वर की बनाई हुई एक परछाई है, वह स्वयं ईश्वर नहीं है। दोनों में एकता केवल साधक को अपनी साधना के दौरान महसूस होती है, असलियत में नहीं। मतलब रचयिता श्रेष्ठ है, रचना उसकी परछाई है। इस प्रकार सूफ़ियों ने बताया कि ईश्वर ही एक मात्र सत्ता है जो भक्ति और उपासना का अधिकारी है। चूंकि सृष्टि की एक-एक वस्तु उसकी उपासना में लगी हुई हैउसकी प्रसन्नता ही सबकी मंजिल हैइसलिए मनुष्य का दिल उसी में रमना चाहिएमनुष्य का हृदय उसी में अटका रहना चाहिए। ईश्वर ही है जो प्रेम का पात्र हैइसका अधिकारी है।

उस समय के घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि वहदतुश्शुहूद का सिद्धांत वहदतुलवजूद की प्रतिस्पर्धा में सामने आया। शीआ सम्प्रदाय के विस्तार को रोकने के लिए शेख़ समनानी ने इस सिद्धांत को पेश किया था। शेख़ अहमद सरहिन्दी रह. ने इस सिद्धांत को भारत में प्रचारित किया। अपने विवादास्पद विचारों के कारण उन्हें मुग़ल बादशाह जहांगीर के शासन काल (1605-27 ई.) में अनेक वर्षों तक ग्वालियर की जेल में गुज़ारना पड़ा। शैख़ अहमद सरहिन्दी रह. ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. से अपनी बराबरी का दावा पेश कर दिया था। वहदतुश्शुहूद का सिद्धांत नक़्शबंदिया परंपरा तक सीमित रहा, अधिकांश सूफ़ियों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियांसूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-13

 

महात्मा गांधी हत्या केस-13 


विष्णु रामकृष्ण करकरे

विष्णु रामकृष्ण करकरे (1910 - 6 अप्रैल 1974) एक चितपावन या करहाड़े ब्राह्मण परिवार से था और उस का बचपन और यौवन अस्त व्यस्त था। शैशवावस्था में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उसकी परवरिश नॉर्थकोट अनाथालय बंबई में हुई थी। उसने मामूली शिक्षा ग्रहण की थी। अनाथालय में रहने के कारण वह स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाया। बाद में उसने स्वयं ही हिंदी और मराठी लिखना-पढ़ना सीखा।

दस वर्ष की अवस्था में वह अनाथालय से भाग गया और बॉम्बे की एक चाय की दुकान में बर्तन मांजने और मजदूरी का काम करने लगा। यहां भी वह अधिक दिनों तक नहीं टिका और एक दिन पूना भाग गया। वह यात्रा करने वाले अभिनेताओं की एक मंडली में शामिल हो गया। वहां वह पन्द्रह वर्षों तक रहा।

पच्चीस वर्ष की उम्र में वह अहमदनगर आ गया। यहाँ, मोटर स्टैंड के पास एक बंद पड़े गौशाला में उसने अपनी चाय की दुकान शुरू की। चाय के साथ वह खाने में सिर्फ़ पूरियाँ और मिर्च का एक खास मिश्रण परोसता था, जिसे वह 'खून साफ़ करने वाली चटनी' कहता था। उसका व्यापार चल निकला। अहमदनगर आकर उसने आर्थिक रूप से खुद को स्थापित किया और अहमदनगर के कपड़ा बाज़ार में 'दक्कन गेस्ट हाउस' (Deccan Guest House) नाम से अपना एक छोटा होटल (लोजिंग एंड बोर्डिंग) शुरू किया। इस तरह वह एक होटल का मालिक बन गया। उस होटल में रहने की सुविधा भी थी। अब वह एक अनाथ से सेठ करकरे बन चुका था। उसने शादी की और अपने होटल में काम करने के लिए नौकरों को नियुक्त किया।

उसने कुछ समाज सेवा के काम भी करने शुरू कर दिए थे। स्वयं अशिक्षित होने के कारण, उसने सोचा कि वह छात्रों को रियायती दरों पर या कभी-कभी अपने होटल में मुफ्त कमरे देकर शिक्षा के क्षेत्र में मदद करेगा।

उसने एक शौकिया नाटकीय कंपनी बनाई और हिंदू महासभा के काम में भी गहरी दिलचस्पी लेने लगा। अहमदनगर में हिन्दू महासभा की शाखा भी उसने खोल ली थी। मनोहर मलगोनकर की ऐतिहासिक पुस्तक 'The Men Who Killed Gandhi' के विवरण के अनुसार, वर्ष 1938 में जब विनायक दामोदर सावरकर अपनी पार्टी के काम के सिलसिले में अहमदनगर आए थे, तब विष्णु रामकृष्ण करकरे ने उनके सम्मान में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था। करकरे ने उन्हें अपने थिएटर समूह के एक विशेष प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया। वीर सावरकर अत्यधिक व्यस्त थे, लेकिन अंत में पंद्रह मिनट के लिए आने को तैयार हो गये। वह पूरे शो में तीन घंटे तक बैठे रहे।

1939 महासभा की एक बैठक में आप्टे, करकरे से मिला, तब तक करकरे हिंदू महासभा का जिला सचिव बन चुका था। तीन साल बाद, अहमदनगर के नगरपालिका के चुनाव में करकरे ने नामांकन भरा और निर्विरोध चुना गया। इस प्रकार बत्तीस वर्ष की आयु में विष्णु करकरे डेक्कन गेस्ट हाउस, कपडा बाज़ार, अहमदनगर का मालिक होने के साथ-साथ नगरपालिका पार्षद भी था। मुसलिम विरोधी उसकी गतिविधियां बढ़ती गईं। निज़ाम के विरुद्ध आंदोलन में उसने भी योगदान दिया। विष्णु करकरे ने अहमदनगर में शरणार्थियों के लिए भोजन और रहने की जगह का इंतज़ाम करने के लिए दिन-रात काम किया।

इन्हीं दिनों मुसलिम लीग के सीधी कार्रवाई के आह्वान पर बंगाल के नोआखाली और अन्य क्षेत्रों में भीषण दंगे हुए थे। अनगिनत हिन्दुओं के घर तबाह हुए, हज़ारों मार दिए गए, स्त्रियों की आबरू लूट ली गई। इसकी सूचना पूरे देश में आग की तरह फैल गई। गांधीजी शांति मिशन पर नोआखाली पहुंच गए थे। दंगा ग्रसित क्षेत्रों का वह पैदल दौरा करने लगे। वे दंगा पीड़ित हिन्दुओं के हृदय में बल संचार कार्य कर रहे थे। जिनका धर्म परिवर्तन कर दिया गया था उसके पुनः धर्म वापसी की कोशिश कर रहे थे। जिन स्त्रियों का अपहरण कर लिया गया था, उनकी रिहाई करा रहे थे।

जब नोआखली का नरसंहार शुरू हुआ तो करकरे ने अपने एक दोस्त से कहा, 'मैं कुछ करना चाहता हूँ। उन लोगों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए जिन्हें जबरन धर्मांतरित किया गया था, कुछ महिलाओं को मुक्त कराने के लिए जिनका अपहरण कर लिया गया था - कुछ भी। मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है मैं क्या कर सकता हूँ। मैं पहले वहां पहुंचूंगा और देखूंगा कि क्या करने की जरूरत है।'

उसे पता था कि अकेले वह कुछ नहीं कर सकता। उसे साथ चलने के लिए दूसरों की ज़रूरत थी। इसके लिए उसके पास काफ़ी पैसे नहीं थे। इसलिए 'भाई-दूज' के दिन - जब भाई अपनी बहनों को तोहफ़े देते हैं – उसने अहमदनगर के लोगों से अपनी दुकान पर आने और नोआखाली में अपनी 'बहनों' के लिए जो भी हो सके, दान करने को कहा। दिन के अंत तक उसने 3000 रुपये से ज़्यादा जमा कर लिए थे। 1946 में हिंसा के पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के लिए वह एक राहत दल के रूप में छह महासभा कार्यकर्ता के साथ नोआखाली गया।

वह तीन महीने तक वहां रहा और हिंदू महिलाओं के अपहरण और बलात्कार को देखा। उसके दिलो-दिमाग पर मुसलमानों से बदला लेने की धुन सवार हो गई। बंगाल के एक मुस्लिम एमएलए गुलाम सरवर को जब 10,000/- रुपये का भुगतान किया गया, तो उसने कहा था, यह एक शातिर अपराधी को पुरस्कृत करने के लिए दी गयी राशि है, क्योंकि गुलाम सरवर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के कई कृत्यों के लिए जिम्मेदार था। 

करकरे गुस्से से भरा हुआ था और नोआखाली में देखी गई भयानक चीज़ों के बारे में दुनिया को बताने के लिए बेताब था। उसने पूना में अपने उन दो दोस्तों से मिलने के लिए समय निकाला जो पार्टी का अख़बार चलाते थे। वह पूना स्थित आप्टे और गोडसे से मिला। उसने नोआखाली के अपने तरीक़े से बयान किए गए किस्से को उनके अख़बार में छापने के लिए कहा। आप्टे और नाथूराम, भले ही उन्होंने खुद वे अत्याचार नहीं देखे थे, फिर भी वे भी उतने ही गुस्से में थे जितने कि करकरे खुद था। करकरे ने बदला लेने की बात भी कही। इस तरह से बदले की योजना की नींव पड़ी।

करकरे नाथूराम गोडसे का गहरा मित्र था और दोनों मिलकर 'हिन्दू राष्ट्र' (अथवा दैनिक अग्रणी) नामक पत्रिका का संपादन व संचालन करते थे। आप्टे-गोडसे गैंग को उसने वित्तीय सहायता देने की बात भी कही। 1947 की गर्मियों से, करकरे टीम के लिए संदेश पहुँचाने और संपर्क करने वाले व्यक्ति बन गया; उसका काम विस्फोटक, हथियार और अक्सर नकद पैसे देने वालों का पता लगाना था। इन गुप्त गतिविधियों के सिलसिले में, उसे लगातार अहमदनगर और पूना के बीच आना-जाना पड़ता था और बहुत कम समय की सूचना पर बॉम्बे और दूसरी जगहों की यात्राएँ करनी पड़ती थीं।

1947 की शुरुआत में, जब उनका अखबार अच्छा चल रहा था, आप्टे और नाथूराम ने सहायक संपादक के तौर पर एक और व्यक्ति को रखने का फैसला किया - बी.डी. खेर, जो करकरे का करीबी दोस्त था। जब भी करकरे आप्टे से मिलने पूना आता था, तो वह खेर के साथ ही ठहरता था। जिस घर में खेर रहता था, वह कभी शहर के बड़े लोगों की हवेलियों में से एक हुआ करता था। खेर के घर से सटा एक बड़ा फ्लैट एक सीनियर पुलिस अधिकारी, डिप्टी सुपरिटेंडेंट एन.वाई. देउलकर के पास था। देउलकर वही अधिकारी थे जो 1944 की गर्मियों में पंचगनी में ड्यूटी पर थे, जब आप्टे ने एक जनसभा में गांधीजी को टोका-टाकी की थी। वह नाथूराम और आप्टे दोनों को शक्ल से पहचानते थे - गर्म मिजाज वाले संगठनवादी जो गांधीजी को भारत का दुश्मन मानते थे। इसके अलावा, देउलकर उस व्यक्ति को भी शक्ल से पहचानने लगे थे जो अहमदनगर से आता था और अक्सर खेर के साथ ठहरता था - यानी करकरे। इस तरह सीक्रेट पुलिस के एक सीनियर और बहुत काबिल अफ़सर, गांधी हत्याकांड की साज़िश के तीन मुख्य साज़िशकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से जानते थे: आप्टे और नाथूराम, जिनसे उनका सामना तब हुआ था जब उन्होंने पंचगनी में गांधीजी को परेशान किया था, और करकरे, जो उनके पड़ोसी खेर के यहाँ अक्सर आते-जाते थे।

इन्हीं दिनों करकरे का सम्पर्क पूना के एक शस्त्र व्यापारी दिगम्बर बाडगे से हुआ। जब भी वह पूना जाता बाडगे से अधिकृत या अनधिकृत अस्त्र-शस्त्र ख़रीदकर जमा करता।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांमहात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर