गुरुवार, 5 नवंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-45

                                   महात्मा गांधी हत्या केस-45

30-31 जनवरी, 1948




अंतिम संस्कार

महात्मा गांधी की हत्या (30 जनवरी 1948) भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। इस त्रासदी ने न केवल एक महान नेता को देश से छीन लिया, बल्कि नव-स्वतंत्र भारत की राजनीति, समाज और शासन व्यवस्था पर गहरे दूरगामी प्रभाव डाले। विभाजन के बाद देश के प्रशासनिक और वैचारिक मुद्दों को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच गहरे मतभेद उभर रहे थे। गांधी जी की अचानक मृत्यु ने दोनों नेताओं को गहरा झटका दिया। इस साझा राष्ट्रीय शोक ने दोनों नेताओं को एकजुट कर दिया। दोनों ने मिलकर देश को बिखरने से बचाया, रियासतों के एकीकरण को गति दी और एक स्थिर सरकार का संचालन किया।

गांधी जी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे की विचारधारा 'हिंदू राष्ट्र' और दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद से जुड़ी थी। इस घटना के बाद देश की बहुसंख्यक जनता में दक्षिणपंथी कट्टरपंथ के खिलाफ एक तीव्र आक्रोश पैदा हो गया। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय संविधान का निर्माण कर रहे नेताओं ने भारत को एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के संकल्प को और मजबूती से आगे बढ़ाया। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और समान अधिकार देने की नीति को दृढ़ता से लागू किया गया।

गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद, तत्कालीन सरकार ने कड़ी कार्रवाई की। सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके तत्कालीन प्रमुख सहित हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। हालांकि, बाद में इस शर्त पर प्रतिबंध हटाया गया कि संगठन खुद को विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक रखेगा और राजनीति से दूर रहेगा।

विभाजन (1947) के कारण पूरा देश भयानक सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। गांधी जी की शहादत का देश की जनता पर ऐसा मनोवैज्ञानिक असर हुआ कि दंगों की वह भयावह आग अचानक शांत हो गई। लोगों को अहसास हुआ कि नफ़रत की राजनीति ने उनके सबसे बड़े नेता को लील लिया है। इस आत्मग्लानि के कारण देश में अगले करीब एक दशक तक कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ।

गांधीजी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर ने राजनीतिक रूप से कांग्रेस पार्टी को अजेय बना दिया। विपक्ष (विशेषकर दक्षिणपंथी धड़ा) पूरी तरह बैकफुट पर आ गया। नेहरू एक निर्विवाद वैश्विक और राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। इस घटना ने कांग्रेस को इतनी राजनीतिक ताकत दी कि पार्टी ने आजादी के बाद लगातार तीन दशकों तक केंद्र में निर्बाध शासन किया।

गोडसे चूंकि एक चितपावन ब्राह्मण था, इसलिए गांधी जी की हत्या की खबर फैलते ही महाराष्ट्र के कई हिस्सों (विशेषकर पुणे, कोल्हापुर और सतारा) में हिंसा भड़क उठी। आक्रोशित भीड़ ने चितपावन ब्राह्मणों के घरों, दुकानों और प्रेस को निशाना बनाया और आगजनी की। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस हिंसा में सैकड़ों लोग हताहत हुए थे।

गांधीजी की हत्या ने उनके वैचारिक विरोधियों के तात्कालिक एजेंडे को पूरी तरह विफल कर दिया और स्वतंत्र भारत को एक बहुसांस्कृतिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे की ओर मजबूती से मोड़ दिया, जिसकी गूंज आधुनिक भारतीय राजनीति में आज भी महसूस की जाती है।

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अंतिम संस्कार के आयोजन की जिम्मेदारी

माउंटबेटन ने उनके अंतिम संस्कार (राजकीय शवयात्रा और सुरक्षा व्यवस्था) के आयोजन की मुख्य जिम्मेदारी ली। 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या के बाद देश में माहौल बेहद तनावपूर्ण था। उस समय माउंटबेटन ने न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भूमिका निभाई, बल्कि अंतिम संस्कार की पूरी योजना भी तैयार की। वह चाहता था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गांधीजी का शव सुरक्षित रखा जाए। लेकिन यह हिंदू धर्म के विरुद्ध था। गांधीजी की भी यह इच्छा थी कि जहां उनकी मृत्यु हो वहीं उनका दाह-कर्म कर दिया जाए। माउंटबेटन ने सुझाव दिया कि अंतिम संस्कार की शवयात्रा का प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था भारतीय सेना को सौंपी जाए, क्योंकि वहां लाखों की भीड़ जुटने की उम्मीद थी। शुरुआत में जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल इस बात से असहमत थे। उनका मानना था कि गांधीजी जीवन भर अहिंसा के पुजारी रहे, इसलिए उनके अंतिम संस्कार में सेना (जो हिंसा/युद्ध का प्रतीक है) का उपयोग करना ठीक नहीं होगा। माउंटबेटन ने उन्हें समझाया कि गांधीजी सेना के कड़े अनुशासन और व्यवस्था की हमेशा तारीफ करते थे। इस तर्क को सुनने के बाद नेहरू और पटेल मान गए और अंतिम संस्कार की कमान सेना को सौंप दी गई।

दर्शन की व्यवस्था

माउंटबेटन चाहते थे कि गांधीजी के पार्थिव शरीर को ट्रेन के जरिए पूरे भारत में ले जाया जाए ताकि देश की जनता उनके अंतिम दर्शन कर सके। लेकिन गांधीजी के सचिव प्यारेलाल ने बताया कि बापू की इच्छा मृत्यु के 24 घंटे के भीतर अंतिम संस्कार किए जाने की थी। इसके बाद माउंटबेटन ने लोगों के भारी हुजूम को देखते हुए बिड़ला हाउस की छत पर गांधीजी के पार्थिव शरीर को जनता के दर्शन के लिए रखवाया।

रात भर उनके पार्थिव शरीर के पास गीता का पाठ, सुखमनी साहब का पाठ होता रहा।

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30 तारीख की शाम को मधुकर केशव काले ने रेडियो पर गांधीजी की हत्या से संबंधित समाचार सुना। वह फौरन परचुरे से मराठा बोर्डिंग हाउस के सामने मिला। उसने परचुरे को गांधीजी की मौत का समाचार सुनाया। परचुरे ने उससे पूछा कि क्या गांधीजी की स्वाभाविक मौत हुई है या उनकी हत्या की गई है। उसने बताया कि उसे इसकी विस्तृत जानकारी नहीं है। उसके बाद वे दोनों बाज़ार में परचुरे की दुकान पर गए। कुछ ही देर में मधुकर खिरे भी वहां आ गया। गांधीजी की हत्या की ख़बर पाकर मधुकर खिरे परचुरे से मिलने उसके क्लिनिक गया। उसने परचुरे से कहा कि आज के बाद वह गांधीजी के दर्शन और आदर्श की ख़िलाफ़त नहीं करेगा। इससे परचुरे उससे काफ़ी नाराज़ हो गया। खिरे ने परचुरे से पूछा कि किस तरह का आदमी होगा जिसने गांधीजी ऐसे महात्मा कि हत्या कर दी? परचुरे ने कहा, वह हमारी तरह का ही एक है। गांधीजी की हत्या का समाचार ग्वालियर में फैल चुका था, लेकिन हत्यारे का नाम सामने नहीं आया था। उस दिन परचुरे ने गांधीजी की मौत के कारण दुकान बंद कर दी। उसने गांधीजी की हत्या का समाचार सुन, मिठाइयां भी बांटी। काले अपने घर चला गया। उसके बाद खिरे परचुरे के साथ राजपूत बोर्डिंग हाउस गया। वहां पर रामदयाल सिंह से मिलकर परचुरे ने उससे कहा, मैंने अपना काम कर दिया है, अब तुम अपना काम पूरा करो। रामदयाल सिंह ने गांधीजी की मृत्यु का समाचार सुना, तो उसने एक शोक सभा के आयोजन करने का मन बनाया। लेकिन परचुरे उसके पास आया और बोला अंततोगत्वा एक अच्छी चीज़ हुई है। हिन्दू धर्म का एक दुश्मन मारा गया है। जिसने हत्या की है वह हमारा ही आदमी था। कुछ दिनों पहले जिसने बम धमाका किया था, वह भी हमारा ही आदमी था। गांधीजी की जिस पिस्तौल से हत्या की गई है, वह भी ग्वालियर से ही गया था। जिसने गांधीजी की हत्या की है वह महाराष्ट्र से ग्वालियर आया था और यहां से दिल्ली गया। रामदयाल सिंह का एक दोस्त जगन्नाथ सिंह परचुरे पर चिल्लाया, चुप रहो। यहां से भागो। इसके बाद परचुरे और उसका साथी वहां से चले गए। वहां से खिरे अकेले निकला। वह पहले तो घर जाना चाह रहा था, लेकिन वह गृह मंत्री से मिलने चला गया और उसे सारी बातें बताई।

दूसरे दिन काले को मालूम हुआ कि नाथूराम ने गांधीजी की हत्या की थी। उसने अपने घर में सारी बात बताई। लोगों ने उसे सलाह दी कि यह बात वह ग्वालियर सरकार को जाकर बता दे। फिर लोग उसे ग्वालियर के गृह मंत्री के पास ले गए।

31 जनवरी

इर्विन होस्पिटल के सिविल सर्जन लेफ्टिनेन्ट कर्नल डॉ. पी.एन. तनेजा ने गांधीजी के शरीर का 31 जनवरी, 1948 को सुबह 8.30 बजे बिड़ला भवन में निरीक्षण किया था। उसने गांधीजी के मृत्यु के कारणों के बारे में जांच की और बताया कि काफी नज़दीक से बुलेट के लगने से उत्पन्न हुए शॉक से जो इंटरनल हिमोरेज हुआ था उससे उनकी मृत्यु हुई थी। उसके पहले डॉ. जीवराज मेहता ने भी गांधीजी के शरीर का परीक्षण किया था। उनके शरीर पर घावों के पांच निशान पाए गए। छाती की दाहिनी तरफ़ एक गहरा निशान था। बाईं तरफ़ दो निशान थे। बुलेट के आर-पार कर जाने के कारण दो निशान पीठ की तरफ़ थे।

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माउंटबेटन ने एक अनुभवी सैन्य अधिकारी और गवर्नर जनरल के रूप में नेहरू को तुरंत एक आपातकालीन कैबिनेट बैठक बुलाने की सलाह दी। देर रात तक कैबिनेट मंत्रियों और गांधीजी के परिवार के बीच चर्चा हुई कि अगले दिन (31 जनवरी) दिल्ली में राजघाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। बापू के शरीर को खादी के कपड़ों से सजाया गया और पूरी रात प्रार्थना सभाएं व भजन चलते रहे।

रात को दो बजे जब भीड़ थोड़ी छंटी तो गांधी के साथी उनके पार्थिव शरीर को बिरला हाउस के अंदर ले आए। गांधीजी के शव के स्नान करने की ज़िम्मेदारी ब्रजकृष्ण चाँदीवाला को दी गई। चाँदीवाला पुरानी दिल्ली के एक परिवार से आते थे और 1919 से ही जब उन्होंने पहली बार गांधी को अपने सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में बोलते हुए सुना, उस दिन से ही उन्होंने ख़ुद को गांधी की सेवा में लगा लिया था। ब्रजकृष्ण चाँदीवाला ने गांधी के रक्तरंजित कपड़े उतार कर उनके बेटे देवदास गांधी के हवाले किए। उन कपड़ो में उनकी ऊनी शॉल भी थी जिसमें गोलियों से तीन छेद बन गए थे। ख़ून बहने से उनके कपड़े उनके जिस्म से चिपक गए थे। बाद में ब्रजकृष्ण ने अपनी किताब 'एट द फ़ीट ऑफ़ गांधी' में लिखा, "बापू का निर्जीव शरीर लकड़ी के तख़्ते पर रखा हुआ था। मैंने उसे नहलाने के लिए टब से लोटे में ठंडा पानी भरा और बापू के शरीर पर डालने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। तभी अचानक अपने आप ही मेरे हाथ रुक गए, बापू ने कभी भी ठंडे पानी से स्नान नहीं किया था। उस समय रात के दो बज रहे थे। जनवरी की रात की ज़बरदस्त ठंड थी। मैं किस तरह वो बर्फ़ीला पानी बापू को शरीर पर डाल सकता था? मेरे टूटे हुए दिल से एक आह-सी निकली और मैं अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया। लेकिन फ़िर मैंने उसी ठंडे पानी से बापू को नहलाया। मैंने उनके शरीर को पोंछा और वही कपड़ा उन्हें पहना दिया जो मैंने उनके पिछले जन्मदिन पर उनके लिए ख़ुद काता था। मैंने उनके गले में सूत की बिनी हुई माला भी पहनाई और मनु ने उनके माथे पर तिलक लगाया।"

31 जनवरी को उनके पार्थिव शरीर के अग्निदाह की व्यवस्था हुई। ब्रह्म मुहूर्त में देवदास और उनकी पत्नी लक्ष्मी, उनकी पोतियों (आभा और मनु) और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा पवित्र जल (गंगाजल) से स्नान कराया गया। उनकी देह पर चंदन का लेप लगाया गया। बापू के माथे पर पारंपरिक रूप से चंदन का तिलक लगाया गया और उनके सीने पर गोलियों के घावों को ढकने के लिए गुलाब की पंखुड़ियाँ और फूल रखे गए। जिस मसीहा ने जीवन भर खादी को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया, उनके अंतिम सफर के लिए भी हाथ से बुनी गई शुद्ध सफेद खादी की चादर (कफन) का उपयोग किया गया। बापू के शरीर को इसी बेदाग सफेद खादी से लपेटा गया था, जबकि उनका सीना खुला रखा गया था। उनके पार्थिव शरीर को जिस स्ट्रेचर/अर्थी पर लेटाया गया था, उसके पैरों के पास गुलाब और गेंदे के फूलों की पंखुड़ियों से संसकृत भाषा में "राम" शब्द उकेरा गया था, क्योंकि उनके मुख से निकले अंतिम शब्द "हे राम" थे। बापू का चरखा केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि उनके अहिंसक आंदोलन की आत्मा था। रात में जब उनके शरीर को अंतिम दर्शन के लिए तैयार किया गया, तो उनके पार्थिव शरीर के ठीक बगल में उनका प्रिय चरखा रखा गया था। यह इस बात का प्रतीक था कि भले ही बापू का शरीर शांत हो गया हो, लेकिन उनके विचार और स्वावलंबन का संदेश हमेशा जीवित रहेगा। बापू को तैयार करने के बाद जब आधी रात को उन्हें बिड़ला हाउस की छत/बालकनी पर जनता के दर्शन के लिए रखा गया, तब उनके चारों ओर बैठे परिवार के सदस्य, आश्रमवासी और प्रियजन लगातार श्रीमद्भगवद्गीता, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब की आयतों व श्लोकों का पाठ कर रहे थे। पूरा कमरा और बिड़ला हाउस का परिसर भजनों की पवित्र ध्वनि, अगरबत्ती और ताजे फूलों की महक से सराबोर था।

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भारत सरकार का विमान भेजकर नागपुर से रामदास, रामदास की पत्नी, पुत्र कनु और पुत्री उषा को दिल्ली बुलाया गया। भारत सरकार के विमान से सरोजिनी नायडू लखनऊ से आईं। सारी दिल्ली में भीड़ उमर पड़ी थी। चारों तरफ़ ‘महात्मा गांधीजी की जय’ के नारे गूंज रहे थे। लोगों की आंखों के आसूं थम नहीं रहे थे। जब गांधीजी की शव यात्रा का इंतज़ाम किया जा रहा था तो बदहवास और किसी दूसरी दुनिया में खोए नेहरू ने माउंटबेटन से कहा था, ''चलिए बापू से ही पूछते हैं क्या कुछ किया जाना है।'' जब गांधीजी के शव के सामने उनकी भतीजी मनु उनका प्रिय भजन गा रही थीं तो नेहरू उनके पास आकर बोले थे, ''और ज़ोर से गाओ, क्या पता बापू जाग ही जाएं।''

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31 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी का अंतिम संस्कार स्वतंत्र भारत का पहला सबसे बड़ा राजकीय और सैन्य सम्मान वाला आयोजन था। चूंकि गांधीजी के पास कोई सैन्य रैंक या आधिकारिक सरकारी पद नहीं था, इसलिए उनके अंतिम संस्कार के लिए तैयार किए गए सैन्य प्रोटोकॉल ऐतिहासिक और अभूतपूर्व थे। लॉर्ड माउंटबेटन की देखरेख और ब्रिटिश-भारतीय सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल सर रॉय बुचर के कमान में इस पूरे सैन्य प्रोटोकॉल को अंजाम दिया गया। रक्षा-मंत्रालय ने श्मशान यात्रा का प्रबंध किया था। गांधीजी के पार्थिव शरीर को सेना के एक विशेष ट्रक खुले डॉज वाहन (फौजी गाड़ी), जिसे फूलों से सजी तोप गाड़ी/गन कैरिज के रूप में तैयार किया गया था, पर रखा गया था। जीवन भर अहिंसा का संदेश देने वाले महात्मा की शवयात्रा में तोप गाड़ी का उपयोग विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन सैन्य प्रोटोकॉल में यह किसी भी राष्ट्र प्रमुख या महानतम हस्ती को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। फौजी गाड़ी के बीच में उठे हुए मंच पर शव को रखा गया था।

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साढ़े ग्यारह बजे अंतिम यात्रा आरंभ हुई। शव तिरंगा में लिपटा था। फूलों और मालाओं से शरीर ढंका था। ट्रक झंडों और फूलों से सजा था। उनके पैरों के पास बांयी तरफ़ सरदार बैठे और दायीं तरफ़ रामदास गांधी। सिर के पास सामने देवदास और नेहरूजी खड़े थे। उस वाहन में गांधीजी के पुराने साथी राजकुमारी अमृत कौर और जेबी कृपलानी भी सवार थे। श्मशान यात्रा शुरू होने ही वाली थी कि गेट पर हलचल हुई। लोगों ने रास्ता ख़ाली कर दिया। सुशीला नय्यर लाहौर से पहुंच चुकी थीं। सरदार पटेल ने हाथ बढ़ाकर उन्हें सेना की गाड़ी पर चढ़ाया। बहावलपुर का अपना मिशन पूरा कर वह 30 जनवरी को मुलतान में रुकी थीं। वहां के डिप्टी कमिश्नर के यहां वह चाय पर आमंत्रित थीं। वहीं पर उन्हें इस दुखद घटना की सूचना मिलीं। वे तुरंत मोटर से लाहौर के लिए रवाना हुईं। जिस विमान से वह दिल्ली आ रही थीं उसी में पश्चिम पंजाब के मुसलिम नेता इफ़्तेख़ारुद्दीन भी थे, जो गांधीजी के अन्तिम दर्शन के लिए दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने सुशीला से कहा, “प्यारी बहन, जिस आदमी ने पिस्तौल का घोड़ा दबाया, वह बापू का हत्यारा नहीं है। हममें से वे सब उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार हैं, जिन्होंने किसी समय उनकी बात पर शक किया और अपने दिलों में हिंसा और साम्प्रदायिकता की भावना रखी।”

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थल सेना, वायु सेना और नौसेना के दो सौ जवान चार मज़बूत और मोटे रस्सों द्वारा उस विशाल ट्रक को खींच रहे थे। गाड़ी का इंजन पूरी यात्रा के दौरान बंद रखा गया था। शवयात्रा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए 4,000 सैनिक, 1,000 वायु सैनिक, 1,000 पुलिस के सिपाही और 100 जलसेना के सैनिक आगे-पीछे चल रहे थे। यानी सेना के तीनों अंगों (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) के जवान इस गंभीर जुलूस का हिस्सा थे। सामने गवर्नर जनरल का रक्षादल चल रहा था। सड़कें लोगों से खचाखच भरी थीं। सैनिकों, पुलिस के जवानों और बख़्तरबंद मोटरें भीड़ को क़ाबू में रखने में लगी हुई थी। जब सैन्य वाहनों का यह काफिला बिड़ला हाउस से राजघाट की ओर बढ़ रहा था, तब भारतीय वायुसेना के विमानों ने आसमान से शवयात्रा के पूरे मार्ग पर केसरिया और फूलों की पंखुड़ियों की बारिश की थी। अंतिम संस्कार के निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत सैनिकों ने बापू को अंतिम सलामी (गार्ड ऑफ ऑनर) दी।

शायद दस लाख से ज़्यादा की भीड़ थी। बाद में अनुमान लगाया गया कि महात्मा गांधी की शवयात्रा में कम से कम 15 लाख लोगों का एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जनसैलाब उमड़ा था। उस राजधानी की सड़कों पर मुंड ही मुंड दिख रहे थे। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स और इतिहासकार इसे आजाद भारत का ही नहीं, बल्कि आधुनिक विश्व इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे भावुक शोक-प्रदर्शन मानते हैं। मशहूर फ़ोटोग्राफ़र मार्ग्रेट बर्के वाइट ने जब अपने लाइका कैमरे के लेंस को फ़ोकस किया तो उनके ज़हन में आया कि वो शायद धरती पर जमा होने वाली सबसे बड़ी भीड़ को अपने कैमरे में कैद कर रही हैं। सैकड़ों लोगों ने गांधीजी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिए थे। राजधानी और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के हजारों लोग अपना देसी घी लेकर श्मशान स्थल पर पहुंच गए थे। इनकी चाहत थी कि जो घी वे लेकर आए हैं, उसी से गांधीजी की अंत्येष्टि हो। माउंटबेटन के निजी सचिव एलन कैंपबेल जॉन्सन ने अपनी किताब 'मिशन विद माउंटबेटन' में लिखा, "अंग्रेज़ी राज को भारत से हटाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले महात्मा गांधी को उनकी मृत्यु पर भारत के लोगों से ऐसी श्रंद्धांजलि मिल रही थी जिसके बारे में कोई वायसराय कल्पना भी नहीं कर सकते थे।"

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

बुधवार, 4 नवंबर 2026

सूफ़ीमत... 22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-6

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-6

22.3 पुरुषों की तीन श्रेणियाँ

हज़रत अल-हुजविरी रह. के अनुसार पुरुषों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है: सांसारिक (अहल अल-दुनिया), धार्मिक (अहल-अल-दीन) और विशिष्ट व्यक्ति (अहल अल-खुसुसियत), यानी रहस्यवादी और संत। रहस्यवादी और संत ईश्वर के ज्ञान की खोज में लिप्त रहते है। अहल अल-दुनिया (सांसारिक लोग): वे लोग होते हैं जिनका पूरा ध्यान केवल भौतिक जीवन, धन-दौलत, वासनाओं और दुनियावी सुखों पर होता है। वे आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों से दूर रहते हैं। अहल अल-दीन (धार्मिक लोग) वे आम धार्मिक लोग होते हैं जो शरीयत (धार्मिक नियमों) का पालन करते हैं, इबादत करते हैं और परलोक (आख़िरत) की भलाई के लिए प्रयासरत रहते हैं। अहल अल-खुसुसियत (विशिष्ट या चुनिंदा लोग) सबसे ऊंची श्रेणी के लोग होते हैं, जिसमें सूफी संत, औलिया और वे आध्यात्मिक पुरुष आते हैं जो दुनिया और वासनाओं को त्याग कर पूरी तरह से अल्लाह की मार्फ़त (परम ज्ञान) और उसकी मोहब्बत में लीन हो जाते हैं। हज़रत हुजविरी रह. ने समाज को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाने के लिए वर्गीकरण किए हैं, जिसमें यह विभाजन इंसानों की आध्यात्मिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

सूफी विचारधारा और हज़रत अल-हुजविरी रह. की पुस्तक कशफ़ अल-महजूब के 'तौहीद' (ईश्वरीय एकता) वाले अध्याय में वर्णित सिद्धांतों के अनुसार तौहीद (ईश्वरीय एकता) एक रहस्य है जिसे ईश्वर ने अपने सेवकों के लिए प्रकट किया है, और इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। इसे परिभाषित करने का कोई भी प्रयास बहुदेववाद के समान होगा। हज़रत अल-हुजविरी रह. के अनुसार, 'तौहीद' या अल्लाह की एकता केवल एक बौद्धिक या शाब्दिक अवधारणा नहीं है। यह अल्लाह का एक ऐसा छिपा हुआ रहस्य (सिम्र) है, जिसे वह केवल अपने सच्चे और चुने हुए सेवकों (औलिया और सूफियों) के दिलों में प्रकट  करता है। सूफीवाद में माना जाता है कि जब कोई बंदा अल्लाह की एकता और उसकी उपस्थिति का वास्तविक अनुभव (अनुभूति) करता है, तो वह अवस्था मानवीय भाषा से परे हो जाती है। मानवीय शब्द इतने सीमित हैं कि वे उस परम दिव्य आनंद, रहस्य और ईश्वर की असीमित सत्ता को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते। हज़रत अल-हुजविरी रह. के अनुसार, तौहीद के बारे में केवल बातें करना या उसे शब्दों में बयां करना 'तौहीद की हकीकत' (वास्तविकता) नहीं है। वास्तविक तौहीद वह है जो बंदे के वजूद (अस्तित्व) पर छा जाए और उसे दुनिया से पूरी तरह बेगाना करके केवल ईश्वर से जोड़ दे। भाषा केवल तौहीद का इशारा दे सकती है, लेकिन उसकी असल गहराई एक रहस्य है जो केवल आध्यात्मिक अनुभव के माध्यम से महसूस की जा सकती है।

22.4 ग़रीबी या दरवेशी 

सूफ़ी ग़रीबी का जीवन जीते हैं जिसका एक रूप (रसम) होता है, जो कि अभाव और ग़रीबी का होता है, और एक मूल तत्त्व होता है जो स्वतंत्र विकल्प होता है। जो ग़रीबी के मूल तत्त्व को प्राप्त कर लेता है, वह सृजित चीज़ों से पूर्ण विनाश (फ़ना) को प्राप्त करता है, और केवल ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करने से अनन्त जीवन की पूर्णता तक पहुँच जाता है। उन्होंने अपनी कालजयी रचना कशफ़ अल-महजूब के 'किताब अल-फक्र ' (ग़रीबी या दरवेशी का अध्याय) में आध्यात्मिक ग़रीबी (फ़क्र) को बेहद सूक्ष्मता से परिभाषित किया है। भौतिक अभाव या दरिद्रता का संबंध बाहरी या भौतिक जीवन से है। इसका अर्थ सांसारिक धन-दौलत, सुख-सुविधाओं और भौतिक संपत्तियों का पास में न होना है। यह केवल एक बाहरी आवरण (रसम) है, जो दुनियावी चीज़ों से खाली होने को दर्शाता है। हज़रत हुजविरी रह. के अनुसार, केवल बाहरी रूप से गरीब या साधनहीन होना ही वास्तविक फक्र नहीं है। स्वतंत्र विकल्प और आध्यात्मिक संन्यास ग़रीबी का आंतरिक या वास्तविक रूप है। इसका अर्थ यह है कि सूफी अपनी मर्ज़ी या स्वतंत्र विकल्प से दुनियावी इच्छाओं, वासनाओं और खुदगर्जी का त्याग करता है। इसमें व्यक्ति का दिल अल्लाह के अलावा हर दूसरी चीज़ से पूरी तरह खाली हो जाता है। सच्चा गरीब (फ़कीर) वह नहीं है जिसके हाथ खाली हैं, बल्कि वह है जिसका दिल अल्लाह के अलावा किसी भी चीज़ की इच्छा या लालसा से आज़ाद (स्वतंत्र) है। हज़रत अल-हुजविरी रह. के अनुसार, जब तक बाहरी रूप (सांसारिक वस्तुओं का अभाव) और आंतरिक मूल तत्त्व (दिल का इच्छाओं से मुक्त होना और स्वतंत्र विकल्प से ईश्वर को चुनना) आपस में नहीं मिलते, तब तक वास्तविक सूफी दरवेशी या 'फक्र' की स्थिति हासिल नहीं होती। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वास्तविक आध्यात्मिक ग़रीबी इंसान को अल्लाह के सबसे करीब लाती है क्योंकि ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से केवल अल्लाह पर निर्भर हो जाता है।

22.5 फ़ना और बक़ा

ईश्वर का वह प्रेमी जो निर्वाण प्राप्त (फ़नी) है, अपने गुणों में और अपने प्रिय के गुणों में रहने वाला है। वह मत विधर्मी है जो कहता है कि जीव के अस्तित्व  को ईश्वर के अस्तित्व में विलीन किया जा सकता है। हज़रत अल-हुजविरी रह. (दाता गंज बख्श) ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक कशफ़ अल-महजूब के 'फ़ना और बक़ा' वाले अध्याय में इस गहरे आध्यात्मिक सिद्धांत को ठीक इसी प्रकार स्पष्ट किया है। हज़रत अल-हुजविरी रह. के अनुसार, जब ईश्वर का कोई सच्चा प्रेमी 'फ़ना' (निर्वाण या अहम् का मिट जाना) की उच्च अवस्था को प्राप्त करता है, तो उसका स्वयं का स्वार्थ, वासना और मानवीय इच्छाएं पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं। इस अवस्था में वह अपने दोषों और मानवीय कमियों से 'फ़ना' (मुक्त) हो जाता है। वह ईश्वर की इच्छा और उसके दिव्य गुणों की चेतना में 'बाक़ी' (जीवित) रहता है। वे इसे आग और लोहे के उदाहरण से समझाते हैं: जैसे लोहे को आग में डालने पर वह आग के गुण (गर्मी और लालिमा) अपना लेता है, लेकिन लोहा फिर भी लोहा ही रहता है, वह आग नहीं बनता। ठीक इसी तरह प्रेमी ईश्वर के रंग में रंग जाता है, लेकिन उसकी मूल पहचान बनी रहती है। हज़रत अल-हुजविरी रह. ने उन भ्रांतियों और मतों का कड़ा विरोध किया है जो सूफी सिद्धांतों को सही ढंग से नहीं समझते। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वह मत विधर्मी (गुमराह करने वाला) है जो यह दावा करता है कि मनुष्य का अस्तित्व भौतिक रूप से ईश्वर की असीम सत्ता में विलीन या एकाकार हो जाता है। इस गलत धारणा को सूफी शब्दावली में हुलूल या इत्तिहाद कहा जाता है। हज़रत हुजविरी रह. के अनुसार, ईश्वर अनादि और अनंत है, जबकि मनुष्य एक निर्मित जीव है। जीव के गुण और इच्छाएं तो ईश्वर की आज्ञा में मिट सकती हैं, लेकिन जीव का अस्तित्व कभी भी ईश्वर की ज़ात (सत्ता) में समाकर नष्ट नहीं हो सकता। अतः उनका सिद्धांत यह है कि सूफीवाद 'अहंकार और वासनाओं को मिटाने' (फ़ना) का नाम है, 'ईश्वर की सत्ता में विलीन होकर स्वयं ईश्वर का हिस्सा बन जाने' का नहीं।

22.6 मलाइका और मलामत (दोष या लोक-निंदा)

वह तीन प्रकार के कार्यों को मलमा (दोष) मानते थे, जिसमें से दो को तो वे कुछ हद तक जायज़ मान लेते हैं,  जैसे कि जो सही मार्ग अहल अल-हक़ (सत्य के अनुयायी) का अनुसरण करने के कारण धार्मिक क़ानून का परित्याग करता है, या फिर मात्र दिखावा करता है और मात्र पाखंड करता है। लेकिन वे तीसरी श्रेणी को जो धार्मिक क़ानून से परहेज़ करती है, उसे किसी भी परिस्थिति में जायज़ नहीं मानते। धार्मिक क़ानून के निर्धारित कर्तव्यों पर अल-हुजविरी का ज़ोर मूल रूप से धार्मिक है। हज़रत अल-हुजविरी रह. (दाता गंज बख्श) ने अपनी पुस्तक कशफ़ अल-महजूब के 'मलाइका और मलामत' (दोष या लोक-निंदा) के अध्याय में यह स्पष्ट किया है कि निंदा या दोष (Malamat) तीन प्रकार के कार्यों या स्थितियों से उत्पन्न होता है। इनमें से दो श्रेणियों को वे कुछ हद तक जायज़ और सही मानते हैं, जबकि तीसरी श्रेणी को वे पूरी तरह से गलत (विधर्मी) ठहराते हैं। जब कोई साधक या सूफी पूरी तरह से शरीयत और अल्लाह के सीधे रास्ते (सत्य) पर चलता है, तो समाज के सांसारिक लोग उसकी आलोचना या निंदा करते हैं। इसे वे पूरी तरह जायज़ और उच्च श्रेणी मानते हैं। उनका कहना है कि अल्लाह के रास्ते में दुनिया की परवाह न करना और लोगों के ताने सुनना संतों की पहचान है, क्योंकि यह निंदा उन्हें अहंकार से बचाती है। जब कोई सूफी समाज में बहुत प्रसिद्ध (लोकप्रिय) होने लगता है, तो वह डरता है कि कहीं उसके अंदर अहंकार (रिया/दिखावा) न आ जाए। अपने इस अहंकार को तोड़ने और लोगों की भीड़ से दूर होकर केवल अल्लाह पर ध्यान केंद्रित करने के लिए, वह जानबूझकर समाज के सामने कोई ऐसा सामान्य या अजीब कार्य कर देता है (जिससे शरीयत का उल्लंघन न हो) ताकि लोग उसकी इबादत की तारीफ करना बंद कर दें और उसकी निंदा करें। इसे वे कुछ विशेष परिस्थितियों में और कुछ हद तक जायज़ मानते हैं, बशर्ते इसका उद्देश्य केवल अहंकार को मारना हो, न कि कोई ढोंग रचना। जब कोई व्यक्ति धार्मिक नियमों (शरीयत) को छोड़ देता है, पाप या वर्जित कर्म करता है और इसके कारण समाज उसकी निंदा करता है। इसे हज़रत हुजविरी रह. पूरी तरह नाजायज़, गुमराह करने वाला और पाखंड मानते हैं। उनका कहना है कि कुछ ढोंगी लोग खुद को सूफी दिखाने के लिए जानबूझकर पाप करते हैं और कहते हैं कि हम तो 'मलामती' (निंदा झेलने वाले) हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जो निंदा शरीयत को छोड़ने से मिले, वह केवल आत्म-मोह और विनाश का रास्ता है। उनके अनुसार लोक-निंदा (मलामत) केवल तभी तक आध्यात्मिक रूप से जायज़ है जब तक कि वह इंसान के अहंकार को मिटाने में मदद करे और शरीयत के दायरे के भीतर हो।

22.7 सूफ़ीवाद का आध्यात्मिक इतिहास 

हज़रत अल-हुजविरी रह. (दाता गंज बख्श) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कशफ़ अल-महजूब में सुन्नी इस्लाम के सिद्धांतों और सूफ़ीवाद के आध्यात्मिक इतिहास का एक बहुत ही सुंदर और मजबूत एकीकरण प्रस्तुत किया है। सुन्नी इस्लाम के साथ सूफ़ीवाद के धार्मिक इतिहास को पूरी तरह से एकीकृत करते हुए, उन्होंने इस विचार को दोहराया कि हज़रत अबू बक्र सूफ़ी शेखों के पहले नेता थे जिन्होंने चिंतनशील जीवन (मुशाहदा) के अनुशासन को अपनाया था। हज़रत हुजविरी रह. ने स्पष्ट रूप से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि. को सूफियों का प्रमुख मार्गदर्शक और 'इमाम' माना है। उन्होंने पुस्तक के 'इमामों के वर्णन' वाले अध्याय में हज़रत अबू बक्र रज़ि. को चिंतनशील जीवन (अहल अल-मुशाहदा) जीने वालों की श्रेणी में सबसे शीर्ष पर रखा है। हज़रत हुजविरी रह. के अनुसार, हज़रत अबू बक्र रज़ि. ने अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर के गहरे चिंतन, ध्यान और आंतरिक साक्षात्कार (मुशाहदा) में समर्पित कर दिया था। वे लिखते हैं कि उन्होंने अपने अस्तित्व को ईश्वर के प्रेम में इस तरह लीन कर लिया था कि वे इस मायावी संसार से पूरी तरह विरक्त (आज़ाद) हो गए थे। हज़रत हुजविरी रह. का मुख्य उद्देश्य यह साबित करना था कि सूफ़ीवाद कोई नया या इस्लाम से अलग पंथ नहीं है। उन्होंने दिखाया कि सूफीवाद के मूल सिद्धांत सीधे पैगंबर मुहम्मद सल्ल. और उनके सबसे वफ़ादार साथियों (ख़ुलाफ़ा-ए-राशीदीन) के जीवन से निकले हैं। हज़रत अबू बक्र रज़ि. को सूफियों का पहला नेता बताना इसी सुन्नी-सूफी एकीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। वे यह स्थापित करते हैं कि शरियत का पालन और आंतरिक रूप से अल्लाह के ध्यान में डूबे रहना (मुशाहदा) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और हज़रत अबू बक्र रज़ि. इसके सबसे पहले और सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

हज़रत अल-हुजविरी रह. (दाता गंज बख्श) ने अपनी पुस्तक 'कशफ़ अल-महजूब' में हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब रज़ि. को सूफियों के इमामों और मार्गदर्शकों की श्रेणी में शामिल करते हुए उन्हें कठोर वैराग्य, सत्यनिष्ठा और तीव्र आध्यात्मिक गरिमा (मर्दानगी व प्रतिष्ठा) का प्रतीक माना है। हज़रत उमर का जीवन बताता है कि वह मुजाहिदा (अभ्यास) में विश्वास करते थे। हज़रत हुजविरी रह. के अनुसार, हज़रत उमर रज़ि. का जीवन भौतिक सुख-सुविधाओं के पूर्ण त्याग की मिसाल था। वे सांसारिक ऐश्वर्य और विलासिता से पूरी तरह विरक्त थे, जो सूफ़ीवाद में 'फ़क्र' (आध्यात्मिक दरवेशी) की मूल शर्त है। वे लिखते हैं कि हज़रत उमर रज़ि. सूफियों के लिए इस बात के सबसे बड़े आदर्श हैं कि किस प्रकार एक साधक को सत्य और शरीयत के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए। उनकी सत्यनिष्ठा इतनी गहरी थी कि पैगंबर साहब (सल्ल.) ने फरमाया था कि "सत्य उमर की ज़ुबान पर बोलता है।" जहाँ उन्होंने हज़रत अबू बक्र रज़ि. को गहरे आंतरिक चिंतन (मुशाहदा) से जोड़ा, वहीं हज़रत उमर रज़ि. को उन्होंने होश और व्यावहारिक न्याय के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया। वे एक ऐसे सूफी का आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो आध्यात्मिक रूप से ईश्वर से गहराई से जुड़ा है, लेकिन साथ ही सांसारिक कर्तव्यों, शरीयत के नियमों और समाज के प्रति पूरी तरह सचेत व सक्रिय रहता है। हज़रत अल-हुजविरी रह. ने स्थापित किया कि हज़रत उमर रज़ि. की यह श्रेणी दर्शाती है कि सच्चा सूफी केवल एकांत में ध्यान लगाने वाला ही नहीं होता, बल्कि वह समाज में रहकर सत्य, न्याय और मर्यादा की रक्षा करने वाला भी होता है।

हज़रत हुजविरी रह. के अनुसार, हज़रत उस्मान रज़ि. का पूरा जीवन और व्यक्तित्व आध्यात्मिक सुंदरता और ईश्वर की मर्ज़ी में पूरी तरह समर्पित रहने का उदाहरण है। हज़रत उस्मान ने ईश्वर  के साथ दोस्ती (खुला) की स्थिति का प्रतिनिधित्व किया। वे लिखते हैं कि हज़रत उस्मान रज़ि. सूफ़ियों के लिए 'हया' के सबसे बड़े प्रतीक हैं। सूफ़ीवाद में हया का अर्थ केवल बाहरी संकोच नहीं, बल्कि यह बोध है कि "ईश्वर हर पल मुझे देख रहा है," जिससे साधक का मन किसी भी अनुचित विचार से दूर हो जाता है। जब हज़रत उस्मान रज़ि. को उनके अंतिम दिनों में विद्रोहियों द्वारा घेर लिया गया था, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाने या दूसरों की जान जोखिम में डालने के बजाय अल्लाह के फैसले के आगे पूरी तरह सिर झुका दिया। हज़रत हुजविरी के अनुसार, परीक्षा की घड़ी में अल्लाह की रज़ा (मर्ज़ी) पर इस तरह राजी रहना सूफ़ियों का एक सर्वोच्च गुण है।

हज़रत अल-हुजविरी रह. सूफ़ी संतों की शृंखला में हज़रत अली रज़ि. को अत्यंत उच्च और केंद्रीय स्थान देते हैं। हज़रत अली का स्थान सूफ़ी परंपरा में बहुत ऊंचा है। उन्होंने दिव्य सत्य (हक़ीक़त) के सिद्धांतों को अत्यधिक सूक्ष्मता के साथ समझाया। वे लिखते हैं कि हज़रत अली रज़ि. सूफ़ियों के लिए आध्यात्मिक ज्ञान (मारिफ़त) और संतों के प्रमुख (इमाम) हैं। आध्यात्मिक रहस्यों को समझने और उन्हें व्यक्त करने की उनकी क्षमता अतुलनीय थी। सूफ़ीवाद में हज़रत अली रज़ि. को 'फुतूवत' (Spiritual Chivalry) का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है—अपने अधिकारों का त्याग करके दूसरों के अधिकारों को प्राथमिकता देना, दुश्मनों के प्रति भी करुणा रखना, और बिना किसी स्वार्थ या अहंकार के ईश्वर के मार्ग में वीरता दिखाना।

हज़रत हुजविरी रह. ने चारों ख़लीफ़ाओं (अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली) के जीवन के अलग-अलग पहलुओं को सूफ़ी मत के स्तंभों के रूप में स्थापित किया है। इस तरह वे यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा सूफ़ीवाद इन सभी दिव्य गुणों (चिंतन, होश, हया और आध्यात्मिक उदारता) का एक सुंदर मिश्रण है।

22.8 भारत में सूफ़ीमत 

हज़रत अल-हजवेरी रह. का ग्यारहवीं शताब्दी के प्रथम चरण में भारत में आगमन हुआ। इसलिए हम यह मान सकते हैं कि भारत में सूफ़ीमत हज़रत अल-हजवेरी रह. के साथ आया। उन्हें दक्षिण एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप) में सूफ़ीमत की नींव रखने वाला सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण सूफ़ी संत माना जाता है। हज़रत अल-हुजविरी रह. ग्यारहवीं शताब्दी (लगभग 1039-1040 ईस्वी) में अफगानिस्तान के ग़ज़नी शहर से लाहौर आए थे। उस दौर में लाहौर भारतीय उपमहाद्वीप (अविभाजित भारत) का एक प्रमुख प्रवेश द्वार और सांस्कृतिक केंद्र बन रहा था। उनसे पहले कुछ अन्य व्यक्तिगत साधक भी इस क्षेत्र में आए थे, लेकिन भारत में व्यवस्थित और व्यापक रूप से सूफ़ी सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार हज़रत हुजविरी रह. के आगमन के साथ ही शुरू हुआ। उन्होंने लाहौर में रहते हुए ही अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'कशफ़ अल-महजूब' लिखी, जिसे फ़ारसी भाषा में सूफ़ीवाद पर लिखी गई दुनिया की पहली विस्तृत और व्यवस्थित मार्गदर्शिका माना जाता है। इस पुस्तक ने भारत में आने वाले बाद के सभी सूफ़ी संतों के लिए एक वैचारिक और आध्यात्मिक आधार तैयार किया।

हज़रत अल-हजवीरी रह.  को ‘दातागंजबख़्श‘ की उपाधि मिली हुई है। ख़्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती ने उनकी मज़ार पर श्रद्धा-सुमन स्वरूप निम्न पक्तियां प्रस्तुत की थीं –

‘गंजे-बख़्शे-फै़ज़े-अलम, मज़हरे-नूर-ए-ख़ुदा

नाकि़सां रा पीरे-कामिल, कामिलां रा रहनुमां’।

हज़रत अल-हजवेरी रह. का विसाल (स्वर्गवास) लाहौर में ही सन् 1072 ई. में हुआ। महमूद गज़नवी के पोते ज़हीरउद्दीन ने वहां मज़ार बनवाई तथा बाद में सम्राट अकबर ने ख़ानकाह और ड्योढ़ी का निर्माण कराया। उनकी मज़ार शरीफ़ 'दाता दरबार' के नाम से मशहूर है। यह पूरे दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और सबसे ज़्यादा ज़ियारत किए जाने वाले सूफ़ी तीर्थस्थलों में से एक है, जहाँ हर साल लाखों की तादाद में हर धर्म के लोग मन्नतें और दुआएं लेकर आते हैं।

भारत में सूफ़ीवाद को घर-घर पहुंचाने वाले चिश्ती सिलसिले के महान संत सुल्तान-उल-हिन्द ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रह. (ग़रीब नवाज़) जब भारत आए, तो उन्होंने अजमेर जाने से पहले लाहौर में हज़रत अल-हुजविरी रह. के मज़ार (दाता दरबार) पर स्थित उनकी चिल्लागाह (इबादत की जगह) पर चालीस दिनों तक ध्यान और साधना (चिल्ला) की थी। उन्होंने ही हज़रत हुजविरी रह. को 'दाता गंज बख्श' (आध्यात्मिक खजाने बांटने वाला) की उपाधि दी थी। ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रह. ने अपने शिष्यों से कहा था कि जिसके पास कोई आध्यात्मिक गुरु (मुरशिद) न हो, उसे 'कशफ़ अल-महजूब' पढ़नी चाहिए, यह पुस्तक खुद गुरु का काम करेगी

हज़रत हुजविरी रह. ने भारतीय उपमहाद्वीप की स्थानीय जनता के बीच रहकर उनके दिलों को जीता। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के ईश्वर के प्रति प्रेम, शुद्ध आचरण और मानवता की सेवा का संदेश दिया, जिसने आगे चलकर भारत की साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) और सूफ़ी परंपरा को एक स्थायी रूप दिया। यद्यपि बाद के सदियों में चिश्ती, सुहरावर्दी, नक़्शबंदिया और क़ादरिया जैसे विभिन्न सिलसिले भारत में फले-फूले, लेकिन भारत की भूमि पर सूफ़ीमत का जो पहला बीज बोया गया था, वह निश्चित रूप से हज़रत अल-हुजविरी रह. के ही पवित्र प्रयासों का परिणाम था।

हालांकि कुछ विद्वान भारत में सूफ़ीमत का प्रवेश ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती से मानते हैं। सही तो यह कहना होगा कि भारत में सूफ़ीमत का क्रमबद्ध इतिहास ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के आने के बाद शुरू हुआ। तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में भारत के कुछेक भागों में ही इसका प्रचार था। ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अलावा जो तीन बड़े सूफ़ी भारत में हुए उनके नाम थे ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बाबा बुल्ले शाह। ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया भी चिश्तिया सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते थे। फ़रीदुद्दीन गंज-ए-शकर से दीक्षा लेने वाले ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया को हज़रत अमीर ख़ुसरो का गुरु बताया जाता है। उनकी मज़ार दिल्ली में मौजूद है।

22.9 सूफ़ी संतों से मुगलों के घनिष्ठ संबंध 

एक बार जब मुस्लिम शासन की स्थापना दिल्ली में हो गई, तो अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते से अनेक सूफ़ी संत भारत आए और भारत के विभिन्न भागों में बस गए। सल्तनत काल में विद्यमान धार्मिक अभिजात वर्ग में दो प्रमुख वर्गीकरण विद्यमान थे। उलमा को विशिष्ट धार्मिक विद्वानों के रूप में जाना जाता था, जिन्होंने अध्ययन की कुछ इस्लामी क़ानूनी शाखाओं में महारत हासिल की थी। वे शरिया उन्मुख थे और मुस्लिम प्रथाओं के बारे में अधिक रूढ़िवादी थे। धार्मिक अभिजात वर्ग के अन्य समूह सूफ़ी रहस्यवादी, या फ़क़ीर थे। यह एक अधिक समावेशी समूह था जो अक्सर ग़ैर-मुस्लिम परंपराओं के प्रति अधिक सहिष्णु था। इस कारण उस समय के भारतीय समाज में प्रचलित धार्मिक मान्यताओं का भी प्रभाव सूफ़ीमत पर पड़ा। जैसे ईश्वर के प्रति श्रद्धा या प्रेम, अहिंसा, तप एवं सांसारिकता से दूर रहना आदि। वहीं ईरान के सूफ़ी संतों, खास तौर पर- जलालुद्दीन रुमी और हाफि़ज शीराज ने सूफ़ीवाद को अपने कलामों के जरिये बुलंदी पर पहुंचाया।

22.10 मुगल शासक और सूफी संस्कृति 

मुगल शासकों और सूफी संस्कृति के बीच का संबंध बेहद गहरा, आध्यात्मिक और राजनीतिक था। अधिकतर मुगल शासकों ने सूफ़ी संस्कृति को अपनाया। कई महत्वपूर्ण सूफ़ी संतों से मुगलों के घनिष्ठ संबंध रहे। मुगल साम्राज्य की स्थापना से लेकर उसके पतन तक, अधिकांश मुगल शासकों ने सूफी संतों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखे और उनके खानकाहों (आश्रमों) को संरक्षण दिया। विशेष रूप से चिश्ती और नक्शबंदी संप्रदाय (सिलसिला) का मुगल दरबार पर गहरा प्रभाव था।

मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर, मध्य एशिया के प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा उबैदुल्लाह अहरार (नक्शबंदी सिलसिला) के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। बाबर ने अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' में भी सूफी विचारों का उल्लेख किया है। हुमायूं भी सूफी संतों, विशेषकर शत्तारी और नक्शबंदी सिलसिले के संतों का सम्मान करता था। वह सूफी दर्शन के रहस्यवाद से काफी प्रभावित था। अकबर के शासनकाल में मुगल-सूफी संबंध अपने चरम पर पहुंचे। अकबर अजमेर स्थित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह (अजमेर शरीफ) का परम भक्त था। वह कई बार आगरा से अजमेर पैदल यात्रा पर गया था। अकबर को वर्षों तक कोई पुत्र नहीं हुआ था। उसने फतेहपुर सीरी के सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से आशीर्वाद लिया। पुत्र रत्न की प्राप्ति के बाद अकबर ने अपने बेटे का नाम 'सलीम' (बाद में जहांगीर) रखा और शेख के सम्मान में फतेहपुर सीरी को अपनी राजधानी बनाया। सूफियों के 'वहदत-उल-वजूद' (ईश्वर की एकता) के सिद्धांत ने अकबर को 'दीन-ए-इलाही' और 'सुलह-ए-कुल' (सार्वभौमिक शांति) की नीति विकसित करने में मदद की। जहांगीर ने अपने पिता की परंपरा को जारी रखा। उसने अजमेर में लंबा समय बिताया और दरगाह पर बहुमूल्य उपहार और देग (बड़े बर्तन) भेंट किए। शाहजहां भी चिश्ती और कादिरी संप्रदायों का सम्मान करता था। उसने दिल्ली और आगरा में सूफी संतों के मकबरों के निर्माण और रखरखाव के लिए शाही अनुदान दिए।

शेख़ सलीम चिश्ती (फतेहपुर सिकरी) और ख़्वाजा निज़ामुद्दीन (दिल्ली) की दरगाहों को दिया गया महत्व आज भी हमारे सामने हैं। मुगल इतिहास में सूफी संस्कृति को पूरी तरह आत्मसात करने वाला सबसे बड़ा नाम शाहजहां का बड़ा बेटा दारा शिकोह था। दारा शिकोह (20 मार्च, 1615-10 सितम्बर,1659 ई.) को सूफ़ियों के साथ देखा गया। दारा शिकोह सूफियों के 'कादिरी सिलसिले' का अनुयायी था और लाहौर के प्रसिद्ध संत मियां मीर का शिष्य था। उसने सूफ़ी संतों के जीवन चरित्र पर ‘सूफ़ीनात अल औलिया’, ‘सकीनात अल औलिया’ नामक पुस्तकें लिखीं। उसकी ‘रिसाल-ए-हक़नुमा’ (1646), और ‘तारीक़ात-ए-हक़ीक़त’ नामक सूफ़ी दर्शन की पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। उसने ‘मजमा अल बहरेन’ (दो समुद्रों का मिलन) में वेदांत और सूफ़ीवाद के शास्त्रीय शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। उसने उपनिषदों का फारसी में 'सिर्र-ए-अकबर' (महान रहस्य) नाम से अनुवाद भी किया।

आमतौर पर औरंगजेब को एक सख्त शासक माना जाता है, लेकिन वह खुद भी सूफी संस्कृति से गहराई से जुड़ा था। औरंगजेब नक्शबंदी सिलसिले के शेख सैफुद्दीन का शिष्य था। औरंगजेब के जीवन पर सूफी सादगी का इतना प्रभाव था कि उसने अपने लिए कोई भव्य मकबरा नहीं बनवाया। उसकी कब्र औरंगाबाद (खुल्दाबाद) में सूफी संत शेख जैनुद्दीन शिराजी की दरगाह के परिसर में एक खुले और साधारण स्थान पर बनी हुई है।

22.11 मुगलों के लिए सूफी संस्कृति का महत्व

सूफी संतों को आम जनता में 'अल्लाह का प्रतिनिधि' माना जाता था। उनसे आशीर्वाद मिलने पर मुगल शासकों की सत्ता को जनता के बीच नैतिक और धार्मिक वैधता मिलती थी। सूफियों के प्रेम और सद्भाव के संदेश ने मुगलों को भारत की बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक आबादी पर शासन करने में मदद की। मुगलों ने सूफी संतों के लिए आलीशान मकबरे और दरगाहें बनवाईं (जैसे फतेहपुर सीरी में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा), जो आज भी मुगल वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरण हैं।

22.12 भारत में आकर सूफ़ीमत का विकास

भारत में आकर उदार-सूफ़ीमत यहां के दार्शनिक मतों और उनके सिद्धांतों का प्रभाव ग्रहण कर निरंतर विकासमान रहा। यही कारण है कि पैगम्बरी एकेश्वरवाद (शुद्ध एकेश्वरवाद) से आरंभ सूफ़ी साधकों की यात्रा सर्वात्मवाद, एकतत्ववाद से होती हुई अद्वैतवाद तक पहुंचती है। एकेश्वरवाद (Monotheism) और अद्वैतवाद (Non-dualism) दोनों ही ईश्वर और सृष्टि के संबंध को समझाने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांत हैं। हालांकि दोनों ईश्वर की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हैं, लेकिन दोनों के दृष्टिकोण में बुनियादी अंतर है।

एकेश्वरवाद का सरल अर्थ है — "ईश्वर एक है।" मतलब यह है कि एक सर्वशक्तिमान सबसे बड़ा देवता है, जो सृष्टि की रचना, पालन और नाश करता है। इस पूरे ब्रह्मांड को बनाने वाली और चलाने वाली केवल एक ही परम शक्ति (God) है। इसमें ईश्वर और उसकी बनाई गई सृष्टि (मनुष्य, प्रकृति आदि) को एक-दूसरे से अलग माना जाता है। ईश्वर निर्माता (Creator) है और संसार उसकी रचना (Creation) है। आमतौर पर इसमें ईश्वर को 'सगुण' (गुणों से युक्त) और 'साकार' या एक सर्वोच्च सत्ता के रूप में देखा जाता है, जो न्याय करता है, प्रार्थना सुनता है और दया करता है। इस्लाम के 'तौहीद' का सिद्धांत इसका उदाहरण है, जिसके अनुसार अल्लाह एक है और उसका कोई साझीदार नहीं है। ईसाई और यहूदी धर्म में भी एक ही परमेश्वर (God) की आराधना की जाती है। सिख धर्म में कहा गया है 'इक ओंकार' (ईश्वर एक है)।

अद्वैतवाद का शाब्दिक अर्थ है — "जो दो नहीं है" (अ + द्वैत यानी दो का न होना)। यह दर्शन केवल एक ही परम सत्य को स्वीकार करता है। अद्वैतवाद का मतलब है कि दृश्य जगत की तह में उसका आधार स्वरूप अखंड नित्य-तत्व कोई दूसरा नहीं (अद्वैत) है और वही सत्य है। उससे स्वतंत्र और कोई अलग सत्ता नहीं है और आत्मा परमात्मा में भेद है। इस सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर (ब्रह्म) और यह संसार या आत्मा दो अलग-अलग चीजें नहीं हैं। जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है, वह उसी एक ब्रह्म का ही रूप है। जीव (आत्मा) और ब्रह्म (परमात्मा) वास्तव में एक ही हैं; अज्ञानता के कारण वे अलग दिखाई देते हैं। इसमें ईश्वर को 'निर्गुण-निराकार' (बिना किसी आकार या भौतिक गुण के) माना जाता है, जिसे 'ब्रह्म' कहा गया है। यह संसार उस ब्रह्म की 'माया' (आभास) है। हिंदू दर्शन में आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया। उनका प्रसिद्ध कथन है: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" (केवल ब्रह्म ही सत्य है, संसार परिवर्तनशील/मिथ्या है, और जीव तथा ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है)। सूफी संस्कृति में 'वहदत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) का सिद्धांत काफी हद तक अद्वैतवाद के समान है, जिसे दारा शिकोह जैसे विचारकों ने बहुत बढ़ावा दिया था।

तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में सूफ़ी ख़ानक़ाहों का ज़ोर भारत के कई भागों में फैल रहा था। मुल्तान, पंजाब, बंगाल, दक्षिण भारत, कश्मीर और देश के कई पूर्वी भागों में सामाजिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ रहा था। अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते अनेक सूफ़ी सिलसिलों से संबंध रखने वाले लोग भारत में आए। ये लोग स्वेच्छा से ही भारत आए थे। ईश्वर-प्रेम और मानव सेवा उनका ध्येय था। उनका जीवन पवित्र था। उनके पवित्र आचरण, सत्यवादिता, न्यायप्रियता एवं शुद्ध आध्यात्मिकता ने भारत की जनता को शीघ्र ही अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। उनकी उदारता, कट्टरवादिता से विरक्ति ने धार्मिक सीमाएं तोड़ दीं। उन्होंने न सिर्फ़ धर्मशास्त्रवादियों की अनेक पाबंदियों को तोड़ा बल्कि हिंदू जनमानस से घुल-मिल गए और उनसे उन्हीं की शैली में बात की।

22.13 भारत में सूफ़ियों  की पंद्रह आध्यात्मिक परंपराएं 

“आइन-ए-अक़बरी” में अबुल फ़ज़ल ने चौदह सूफ़ी सिलसिलों का उल्लेख किया है। इनमें से चिश्ती, सुहरावर्दी, नक़्शबन्दी, क़ादिरी, क़लन्दरिया, और सत्तारिया महत्वपूर्ण थे। शाहज़ादा दारा शिकोह ने छह परंपराओं की बात की है। प्रो. के. ए. निज़ामी ने भी छह सिलसिलों की बात की है। जाफ़र रज़ा के अनुसार भारत में सूफ़ियों  की पंद्रह आध्यात्मिक परंपराएं प्रचलित हैं, ये हैं-

1.   चिश्तिया,

2.  सुहरवर्दिया,

3.  क़ादिरिया,

4.  नक़्शबंदिया,

5.  शतारिया,

6.  फ़िरदौसिया,

7.  कुबराविया,

8.  हमदानिया,

9.  मदारिया,

10.          नियामतौल्लाहिया,

11. क़लंदरिया,

12.          ताऊसिया,

13.          रिफ़ाइया,

14.          मुनैमिया, और

15.          उवैसिया

इनमें से कई परंपराओं जैसे चिश्तिया, सुहरवर्दिया, क़ादिरिया और नक़्शबंदिया की अनेकों उप-परंपराएं भी थीं

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर