सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
6. सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था -3
6.6 सूफ़ीमत के वास्तविक इतिहास का आरंभ
इस्लाम के आरंभिक और ख़िलाफ़त
के दिनों में सूफ़ियों (तसव्वुफ़ मानने वालों) को अपनी आत्म-शुद्धि, 'ज़िक्र' (अल्लाह की
याद) और अध्यात्म-साधना के लिए पर्याप्त समय और अवसर
मिलता था। प्रारंभिक सूफी संतों ने सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर अपना पूरा
जीवन एकांत में ईश्वर की भक्ति और इबादत में समर्पित कर दिया था। राशिदुन
खिलाफ़त (632–661 ईस्वी) के दौरान 'सूफ़ीवाद' एक अलग या
संस्थागत विचारधारा के रूप में मौजूद नहीं था। राशिदुन खिलाफत (632-661
ईस्वी)
इस्लामी इतिहास का पहला काल था, जिसे सुन्नी परंपरा में 'सही राह पर
चलने वाला' माना जाता है। पैगंबर मुहम्मद सल्ल.
के निधन के बाद, मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करने वाले पहले
चार खलीफाओं—हज़रत अबू बक्र, हज़रत उमर, हज़रत
उस्मान और हज़रत अली—के शासनकाल
को राशिदुन खिलाफत कहा जाता है। उस दौर में आरंभिक साधक अध्यात्म में लीन रहते थे, जिसके लिए
उन्हें अपना अधिकांश समय ईश्वर की स्तुति और साधना में बिताने का पर्याप्त अवसर
मिलता था। उस समय के प्रारंभिक आध्यात्मिक लोग सांसारिक मोह-माया से दूर रहते थे।
वे कुरान की आयतों पर गहराई से मनन करते थे, और ईश्वर
से सीधे जुड़ाव व आंतरिक शुद्धीकरण को ही अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य मानते थे। राशिदुन खिलाफ़त
के दौरान इन विरक्तों (सूफ़ियों) को अध्यात्म-साधना के लिए पर्याप्त समय मिलता रहा।
ये तीनों ख़लीफ़ा चूंकि स्वयं अत्यंत विनम्र, मितव्ययी, धर्म-परायण और सदाचारी थे, इसलिए अध्यात्म-साधकों को इनके
ख़िलाफ़त-काल में अनुकूल वातावरण उपलब्ध रहा।
नबी श्री के निधन के बाद जब
तमाम सहाबा ग़मगीन हो गए और उन्हें दफ़नाने में देर होने लगी तो उस समय हज़रत अबूबक्र
रज़ि. ने एक अटल सच्चाई का बयान करते हुए सहाबा से कहा, “तुम में से जो लोग मुहम्मद की इबादत करते
थे वो ये जान लें कि मुहम्मद तो मर गये और तुम में से जो लोग अल्लाह की इबादत करते
थे वो जान लें कि अल्लाह को कभी मौत नहीं आती।” हज़रत अबूबक्र रज़ि. का यह कहना
अल्लाह के उस हुक्म को याद दिलाना था जो कि क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया है - ‘मुहम्मद तो
बस एक रसूल है। उनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके हैं। तो क्या यदि उनकी मृत्यु हो जाए
या उनकी हत्या कर दी जाए तो (दीन से) उल्टे पांव फिर जाओगे ? जो कोई
उल्टे पांव फिरेगा, वह अल्लाह
का कुछ नहीं बिगाड़ेगा। और कृतज्ञ लोगों को अल्लाह बदला देगा। क़ुरआन,
3, 144 यही ताकीद पैग़म्बर साहब की हदीसों में भी बार बार मिलती
है कि मुझसे मुहब्बत करने में हद से न निकल जाना कि पहले आ चुके ईसा मसीह के साथ
यही किया जा चुका है। हज़रत अबूबक्र रज़ि. के इस संबोधन के बाद पैग़म्बर को दफ़नाने की
तैयारी शुरू की गई।
इससे स्पष्ट है कि हज़रत
अबूबक्र रज़ि. का तौहीद (अल्लाह को एक मानना) में
दृढ़
विश्वास था। इस पक्के ईमान और सच्चाई के करण उन्हें "अस-सिद्दीक" (सच्चा और
तस्दीक करने वाला) की उपाधि दी गई थी। परम सत्ता तक पहुंचने के दो मार्ग बताए गए
हैं – पहला फ़रिश्ते द्वारा प्राप्त ईश्वरीय आदेश
और नबियों की शिक्षा और दूसरा आत्मप्रकाशना (इल्हाम) और सिद्ध
पुरुषों (औलिया) की परम
सत्तात्मक मनः स्थिति (सिद्धि)। सूफीवाद
में 'इल्हाम' और 'औलिया' बहुत
महत्वपूर्ण पारलौकिक और गहरे आध्यात्मिक शब्द हैं। इल्हाम का अर्थ है दिल में आने वाली दैवीय
प्रेरणा या अंतर्ज्ञान, जो ईश्वर द्वारा सीधे किसी
सच्चे भक्त या वली (संत) के मन में डाला जाता है। पैगंबर (नबी)
को जो ज्ञान मिलता है वह 'वही' कहलाता है, जो फरिश्ते
(जैसे जिब्राइल) के माध्यम से आता है और अचूक होता है। पैगंबरों को मिलने वाली 'वही' एक सीधी और
कानून बनाने वाली ईश्वरीय वाणी है। इसके विपरीत, इल्हाम
केवल 'प्रेरणा' है जो आम
इंसानों या औलियाओं को प्राप्त हो सकती है। इल्हाम बिना किसी मध्यस्थ के सीधे
ईश्वर द्वारा औलिया (संतों) के दिल में उतरता है। सूफी साधक अक्सर एकांत और ध्यान
(मुरकाबा) के जरिए अपने नफ्स (अहंकार) को मिटाकर इस दैवीय ज्ञान को प्राप्त करने
की कोशिश करते हैं। इल्हाम वह प्रकाश है जो केवल उसी शुद्ध हृदय (क़ल्ब) में
प्रवेश कर सकता है जो सांसारिक मोह-माया से मुक्त हो और लगातार ईश्वर के स्मरण
(ज़िक्र) में लीन रहता है। इल्हाम की शक्ति के
माध्यम से महान सूफी संत सूफियाना कलाम लिखते हैं, रहस्यमयी
किताबें बनाते हैं और ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को गाते हैं।
औलिया (वली का
बहुवचन) उन नेक और सिद्ध संतों को कहा जाता है जो अपनी आध्यात्मिक साधना-मार्ग (तसव्वुफ़), आत्म-शुद्धि
(जहाद अन-नफ्स) और ईश्वर प्रेम से उसके बेहद करीब पहुँच जाते हैं। औलिया अरबी भाषा
के शब्द 'वली' से बना है, जिसका
शाब्दिक अर्थ "मित्र" या "संरक्षक" है। औलिया वे लोग होते हैं
जो कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं का पूरी तरह पालन करते हुए आंतरिक शांति (एहसान)
और ईश्वर के प्रेम (मारिफत) को हासिल कर लेते हैं। ये लोग आम इंसानों की तरह ही
रहते हैं, लेकिन उनकी चेतना निरंतर ईश्वरीय उपस्थिति
में डूबी रहती है। माना जाता है कि एक सच्चे औलिया का दिल सांसारिक मोह-माया से
पूरी तरह खाली होता है। वे सीधे ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं और उनका पूरा
जीवन दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित होता है।
सूफीवाद का पूरा दर्शन ही इन
दोनों अवधारणाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। सूफी गुरुओं (पीर/शेख) को 'औलिया' का दर्जा
दिया जाता है। उन्हें ध्यान (धिकर) और आत्म-समर्पण के माध्यम से ही
इल्हाम या अंतर्ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे वे
मुरीदों (शिष्यों) को सही राह दिखा पाते हैं। सूफी साधना का मुख्य लक्ष्य ही 'इल्हाम' (ईश्वरीय
प्रेरणा) के माध्यम से आध्यात्मिक गहराइयों को छूना है। जब कोई साधक कठिन
आध्यात्मिक संघर्ष (मुजाहिदा) से गुजरता है, तब उसके
हृदय पर पड़े पर्दे हट जाते हैं और उसे इल्हाम की अवस्था प्राप्त होती है। इसी अवस्था
के निरंतर अनुभव से एक साधारण आस्तिक, ईश्वर का
दोस्त यानी 'वली' बन जाता
है। भारत में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और शेख निजामुद्दीन औलिया इसी श्रेणी के
महानतम सूफी संत थे।
सूफ़ियों के एक वर्ग में हज़रत
अबूबक्र “कुतुब” की उपाधि से याद किए जाते हैं। "कुतुब"
शब्द आमतौर पर आध्यात्मिक सिलसिले और सूफी परंपरा में एक उच्च दर्जे के बुज़ुर्ग
या वली के लिए इस्तेमाल होता है। सूफ़ियों में एक बड़ी तादाद अपना सिलसिला हज़रत
अली रज़ि. से स्वीकार करती हैं। ईरान, तुर्किस्तान, बदख़्शां, बल्ख़, बुख़ारा, समरकन्द, ख़ुरासन, इराक़, अरब के
ज़्यादातर सूफ़ी अपने ज्ञानार्जन का सिलसिला हज़रत अली रज़ि. से जोड़ते हैं। अबूबकर
सिराजउद्दीन ने “दायरा-ए-मआरिफ़े-इस्लामिआ” में लिखा है, “इस प्रकार के सर्वाधिक महत्व के सूफ़ी वर्ग में, जिसकी ओर लोग
खिंचे चले आ रहे थे, वह वर्ग था, जो हज़रत अली
के सत्संग में जमा था … ।”
सूफियों के लिए ईमान केवल
किताबों तक सीमित सैद्धांतिक विश्वास नहीं है, बल्कि यह आंतरिक
अनुभूति, ईश्वर के प्रेम, और आध्यात्मिक
साक्षात्कार (कश्फ-ओ-शहूद) की अवस्था है। सूफी मानते हैं
कि वास्तविक ईमान वह है जो सांसारिक मोह-माया को त्याग कर हृदय की पूर्ण शुद्धि और
ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण से प्राप्त होता है। एक व्यक्ति ने हज़रत अली रज़ि. से
पूछा, “ईमान क्या है?” हज़रत अली रज़ि. ने कहा कि
ईमान चार स्तंभों धैर्य (सब्र), विश्वास (यक़ीन), न्याय (अद्ल) और धर्म
युद्ध (जिहाद) पर टिका है। बाद में उन्होंने चारों
स्तंभों के दस-दस मुक़ामात (पड़ावों) का विवेचन किया। इस दृष्टि से हज़रत अली रज़ि.
पहले सूफ़ी हैं जिन्होंने अहवाल (अध्यात्म
की मनःस्थितियां) और मुक़ामात (पड़ाव) पर
बात की है। सूफ़ीमत (तसव्वुफ़) में अहवाल और मुक़ामात आध्यात्मिक
यात्रा के दो मुख्य स्तंभ हैं जो ईश्वर (अल्लाह) की निकटता प्राप्त करने के लिए
साधक के आंतरिक और बाहरी विकास को दर्शाते हैं। 'अहवाल',
'हाल' का बहुवचन
है, जिसका अर्थ है - 'दशा' या 'मनोस्थिति'। यह साधक
के हृदय में अचानक उत्पन्न होने वाली क्षणिक आध्यात्मिक भावनाएं या अनुभूतियां
हैं। ये अवस्थाएं ईश्वर का उपहार होती हैं। इन्हें इंसान अपनी मेहनत से नहीं पा
सकता और न ही रोक सकता है। ये अवस्थाएं वज्द (आनंद/परमानंद), शौक (ईश्वर
के प्रति तीव्र लालसा), कुर्ब (समीपता), और मुहब्बत
(ईश्वर के प्रति प्रेम) कहलाती हैं। मुक़ामात 'मक़ाम' शब्द से
बना है जिसका अर्थ है - 'स्थान' या 'पड़ाव'। यह साधक
(मुरीद) द्वारा कठोर आध्यात्मिक अभ्यास (मुजाहदा) और साधना से प्राप्त की गई स्थायी
आध्यात्मिक अवस्थाएं हैं। इन पड़ावों को मानव के अपने प्रयासों, लगन और
निरंतर अभ्यास से हासिल किया जाता है। सूफी परंपरा में आमतौर पर 7 प्रमुख
मक़ाम माने जाते हैं - तौबा (पश्चाताप), वरा' (पाप से
बचना), ज़ुहद (वैराग्य या अनासक्ति), फ़क़्र
(ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता), सब्र (धैर्य), तवक्कुल
(ईश्वर पर भरोसा), और रिज़ा (ईश्वर की रज़ा/इच्छा में संतुष्ट
रहना)। अहवाल और मुक़ामात, इन दोनों के बीच का मुख्य अंतर यह है कि मुक़ामात
स्थायी होते हैं (साधक एक मक़ाम पार करके ही अगले में प्रवेश
करता है), जबकि अहवाल अस्थायी और परिवर्तनशील होते
हैं - जो ईश्वर की कृपा से अचानक आते हैं और फिर
चले जाते हैं।
शेख़ अबू
नस्र मिराज तूसी का मानना है कि हज़रत अली रज़ि. पहले व्यक्ति हैं
जिन्हें ईश्वरीय गूढ़ रहस्यों का ज्ञान (इल्मे लदुन्नी) प्रदान
किया गया। सूफ़ीमत (तसव्वुफ़) में 'इल्मे लदुन्नी' अर्थ उस
गुप्त, आध्यात्मिक या दिव्य ज्ञान से है जो किसी
इंसान को बिना किसी सांसारिक गुरु, किताब या बौद्धिक प्रयास के
सीधे अल्लाह (ईश्वर) की ओर से उपहार स्वरूप मिलता है। यह ईश्वर (अल्लाह) की कृपा
से दिल और रूह (आत्मा) में उतरता है। हज़रत जुनैद बगदादी का कहना है कि उदूल
और आज़माइश के क्षणों में हज़रत अली रज़ि. ही हमारे पीर (शैख़) हैं। शाह वलीउल्लाह
का मत है कि हज़रत अली इस उम्मत के पहले सूफ़ी, पहले मजज़ूब (ब्रह्मलीनता की स्थिति
में रहने वाला) और पहले आरिफ़ (ईश्वरज्ञ) हैं। सूफ़ियों द्वारा हज़रत अली रज़ि. को
जहां एक ओर सूफ़ी विचारधारा का मूल स्रोत माना गया है वहीं दूसरी ओर उन्हें ख़िलाफ़ते-बातिनी
(रूहानी ख़लीफ़ा) का अधिकारी भी माना जाता है।
इस्लामी दर्शन और सूफी विचारधारा में ख़िलाफ़ते-बातिनी (आंतरिक या
आध्यात्मिक खिलाफत) से तात्पर्य एक ऐसे विशुद्ध आध्यात्मिक और आंतरिक रुहानी पद से
है जो पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के बाद सीधे हजरत अली (रजि.) और उनके
माध्यम से अहल अल-बेत (पैगंबर के परिवार) और औलिया-ए-उम्मत को हस्तांतरित हुआ। 'बातिन' शब्द का
अर्थ है 'छिपा हुआ' या 'आंतरिक'। सांसारिक
व्यवस्था बनाए रखने और कानूनों को लागू करने वाली राजनीतिक सत्ता, जो अक्सर
चुनाव या आम सहमति से तय होती है, उसे खिलाफ़ते-जाहिरी कहते हैं। जबकि ईश्वरीय
ज्ञान और मार्गदर्शन की विरासत को खिलाफ़ते-बातिनी कहते हैं। अधिकांश सूफी और शिया
मान्यता के अनुसार, हालांकि पैगंबर के बाद शुरूआती खलीफाओं
(जैसे हजरत अबू बक्र) ने जाहिरी (राजनीतिक) दायित्व संभाले, पैगंबर का
वास्तविक आध्यात्मिक वारिस (खिलाफ़ते-बातिनी) हजरत अली को माना जाता है। लगभग सभी
सूफी सिलसिले (जैसे चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया)
पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) के बाद अपना आध्यात्मिक वंश (सिलसिला) हज़रत अली से ही
जोड़ते हैं। सूफी संत 'हज़रत जुनैद बगदादी' के अनुसार, हज़रत अली
ही सूफीवाद के सिद्धांतों और व्यवहारों के असली शिक्षक हैं।
अगर सूफ़ी शब्द उनके समय में मौजूद
था, तो एक सवाल उठता है कि पवित्र पैगंबर के किसी भी साथी को कभी सूफ़ी क्यों नहीं कहा
गया? अल सर्राज इसका जवाब देते हैं, कि पैगंबर को
व्यक्तिगत रूप से अपने गुरु के रूप में रखने का सम्मान और ईश्वर की महिमा के लिए पैगंबर
के साथ काम करना हर सच्चे आस्तिक की नजर में सर्वोच्च सम्मान था, किसी ने भी
पैगंबर के साथियों को किसी अन्य नाम से बुलाने के बारे में कभी नहीं सोचा था। अपनी
बात को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए कि सूफ़ी शब्द पूर्व-इस्लामी दिनों में मौजूद
था सर्राज, मुहम्मद बिन इशाक बिन यासर द्वारा रचित "मक्का का
इतिहास" से उद्धृत करते हैं, कि मक्का
के इतिहास में एक अवधि थी जब हर कोई मक्का से दूर चला गया था ताकि काबा को
श्रद्धांजलि देने और उसके चारों ओर परिक्रमा के लिए वहां कोई न बचे। इन दिनों एक
सूफ़ी बहुत दूर से नियमित रूप से काबा की परिक्रमा करने के आते थे। अगर यह कहानी सच
है, जैसा हज़रत सर्राज बताते हैं, तो यह
स्पष्ट है कि ‘सूफ़ी’ शब्द पूर्व-इस्लामी दिनों में प्रचलित था, और
उत्कृष्ट और पुण्य व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
पवित्र पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के किसी भी
साथी (सहाबा) को कभी 'सूफ़ी' इसलिए नहीं
कहा गया क्योंकि यह शब्द उनके समय में अस्तित्व में ही नहीं था। 'सूफ़ी' की
शब्दावली और संस्थागत रूप पैगंबर और सहाबा के युग के काफी बाद, इस्लाम के
प्रसार के साथ विकसित हुए। इसलिए नबी श्री के जीवन में कोई अपने आपको मुहद्दिस
और सूफ़ी न कहता था। उनका सहाबी कहलाना ही
अपने आप में बड़ी बात थी। इस एक मक़ाम के सामने हरेक मक़ाम छोटा पड़ जाता है। सहाबा का
जीवन पहले से ही अत्यधिक आध्यात्मिक, त्याग और
ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से भरा हुआ था। पैगंबर के कुछ साथी (उदा. अबू जर अल-घिफारी)
अपने गहन आध्यात्मिक झुकाव के लिए जाने जाते थे, प्रारंभिक
काल में धर्मपरायणता और आध्यात्मिक शुद्धता का अभ्यास करने के लिए किसी विशेष पदवी
की आवश्यकता नहीं थी। 'अहल अल-सुफ़ा' (मस्जिद-ए-नबवी
के बरामदे में रहने वाले गरीब और भक्त साथी, जैसे अबू
हुरैरा) लगातार ध्यान और ईश्वर के स्मरण में लीन रहते थे। किन्तु इसका यह मतलब
नहीं कि उस समय तसव्वुफ़ की कोई कल्पना नहीं थी। स्वयं नबी श्री और हज़रत अली रज़ि.
का जीवन अध्यात्म की दृष्टि से आदर्श था। हज़रत अली को सूफीवाद में सबसे प्रमुख
आध्यात्मिक गुरु और सूफी संप्रदायों (सिलसिलों) के मुख्य स्रोत के रूप में माना
जाता है। हालांकि सूफीवाद एक व्यवस्थित रूप में बाद में विकसित हुआ, लेकिन
अध्यात्म और आंतरिक ज्ञान की दृष्टि से सूफी संत हज़रत अली को सबसे बड़ा मार्गदर्शक
और शुरुआती आध्यात्मिक हस्तियों में से एक मानते हैं।
हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के
बाद इस्लामी दुनिया में वैमनस्यता इस प्रकार बढ़ गई कि उमैय्या वंश के हाथों में
ख़लीफ़ा का पद रहना असंभव हो गया था। असहाब (मुहम्मद साहब के साथ रहने वाले)
और अनसार (मदीना में मुहम्मद साहब के सहायक) के लिए उमैय्यों की बर्बरता
बर्दाश्त के बाहर थी। शिया सम्प्रदाय वाले क़र्बला की घटना के बाद उनके ख़िलाफ़ तो थे
ही। खारिजी
नेता नज्द इस्लाम के सख्ती से पालन पर ज़ोर देते थे। असंतोष और मतभेद काफी बढ़ गए
थे।
सन् 940 में अबू
मुस्लिम खोरासानी (लगभग 718-727
ईस्वी से 755 ईस्वी) नाम के एक
फ़ारसी (ईरानी) मुस्लिम परिवर्तित ने उमय्यदों के ख़िलाफ़ एक विशाल जनमानस तैयार किया।
उसने खोरासान (पूर्वी ईरान)
में उम्मयदों के ख़िलाफ विद्रोह कर दिया। खोरासान में पहले से ही अरबों की उपस्थिति
के ख़िलाफ़ नाराज़गी थी अतः उसको बड़े पैमाने पर जन समर्थन मिला। उसने यह कहकर लोगों
को उमय्यदों के ख़िलाफ़ सावधान किया कि वे लोग इस्लाम के सही वारिस नहीं हैं और वे सत्ता
का दुरुपयोग कर रहे हैं। उमय्यदों का विलासिता पूर्ण जीवन-शैली ने इनको और भी भड़काया।
सन् 949-950 के बीच उम्मयदों द्वारा भेजे गए सैनिकों को
हरा दिया और इसके बाद अपना एक नया ख़लीफ़ा घोषित कर दिया - अबुल अब्बास। इस तरह
उसने शक्तिशाली उमय्यद ख़िलाफ़त का तख्तापलट कर अब्बासिद ख़िलाफ़त की स्थापना
की थी। क्रांति की सफलता के बाद अबू मुस्लिम को विशाल और शक्तिशाली खुरासान
प्रांत का राज्यपाल (गवर्नर) नियुक्त किया गया। समय के साथ अबू मुस्लिम की
लोकप्रियता और सैन्य शक्ति इतनी बढ़ गई कि दूसरे अब्बासिद खलीफा, अबू जाफर
अल-मंसूर, उनसे असुरक्षित महसूस करने लगे। खलीफा
अल-मंसूर ने साल 755 ईस्वी में अबू मुस्लिम को दरबार में बुलाया
और धोखे से उनकी हत्या करवा दी। जिस व्यक्ति ने पूरा साम्राज्य बदल दिया, अंत में वह
खुद अपनी ही बनाई सत्ता की राजनीति का शिकार हो गया।
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मनोज
कुमार