गुरुवार, 27 अगस्त 2026

सूफ़ीमत... 10. सूफ़ी दर्शन-9

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम



10. सूफ़ी दर्शन-9

10.15 सूफ़ी दर्शन का दूसरा सिद्धांत

सूफ़ी दर्शन का दूसरा सिद्धांत यह है कि धार्मिक क्रिया-कर्म को विशेष महत्व देना व्यर्थ है। नजात (मोक्ष) पाने का मार्ग तो यह है कि अपना हृदय पवित्र रखें क्योंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में निवास करता है।

सूफी संत मानते हैं कि ईश्वर (अल्लाह) किसी भौतिक स्थान पर नहीं, बल्कि मनुष्य के शुद्ध और पवित्र हृदय में निवास करता है। सूफ़ीमज़हबी दस्तूर को भी अपनी व्यापक मानवीय दृष्टि के साथ ही स्वीकारते हैं। वे विधि मार्ग विरोधी न थे।  क़ुरआन के साथ साथ उन्हें वेद वचन में भी सार नज़र आया:

राघव पूज जाखिनीदुइज देखाएसि सांझ।

वेदपंथ जे नहिं चलहिंते भुलहि बन मांझ।

झूठ बोल थिर रहै न रांचा।

पंडित सोइ वेदमत सांचा।

सूफी विचारधारा में तज़किया-ए-नफ़्स (आत्मा की शुद्धि) की बात की गई है। उनके अनुसार लालच, क्रोध और घमंड को दिल से निकालना जरूरी है। ईश्वर से निस्वार्थ और सच्चा प्रेम करना ही मुक्ति का आधार है। सूफ़ी मानते हैं कि इंसान का दिल एक आईने (दर्पण) की तरह है। जब दिल से दुनियावी इच्छाओं का मैल साफ होता है, तभी उसमें ईश्वर का नूर (प्रकाश) चमकता है। हर जीव में ईश्वर का अंश देखना और सबसे प्रेम करना उनका लक्ष्य होना चाहिए। बिना किसी भेदभाव के मानवता की सेवा करना ही सच्ची इबादत है।

हज़रत अबुल हसन एक विख्यात सूफ़ी संत थे। एक दिन एक भक्त उनके पास आया और बोला, मैं सत्संग और उपासना करते-करते थक गया हूं। मुझे कोई लाभ नहीं हो रहा। मैं इस उलझन में हूं कि मुझे क्या करना चाहिए?

हज़रत अबुल हसन ने उस व्यक्ति से पूछा, तुम्हारी समस्या क्या है?

उस व्यक्ति ने कहा, मुझे गुस्सा बहुत आता है। लालच के मारे मेरा बुरा हाल है। दुनिया की मोह-माया मुझे बहुत सताती है। इन सब कारणों से मैं बहुत दुखी हूं। अब आप ही मुझे कोई रास्ता दिखाइए।

हज़रत अबुल हसन ने उसकी बातें बड़े ध्यान से सुनीं, फिर बोले, ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी सच्चाई है, इसे याद रख।

उस व्यक्ति ने पूछा, वह सच्चाई क्या है?

हज़रत अबुल हसन ने उससे पूछा, गंदे बर्तन में कोई चीज़ डालो, तो वह कैसी हो जाती है?

उस व्यक्ति ने कहा, गंदी।

हज़रत अबुल हसन ने उसे समझाया, याद रख, दिल तेरा बर्तन के समान है। जब तक वह साफ़ नहीं होगा, तब तक तू जो कुछ भी उसमें डालेगा, वह भी गंदा हो जाएगा। पहले दिल साफ़ कर।

सत्संग और उपासना का फ़ायदा तभी मिलता है, जब दिल साफ़ होगा। मन में तरह-तरह की वासनाएं और दूसरे विकार भरे होते हैं, उन्हें साफ़ करके ही इंसान कुछ पा सकता है। मौलाना जलालुद्दीन रूमी कहते हैं कि ईश्वर को खोजने के लिए मस्जिद, मंदिर या काबा जाने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने लिखा है, "मैंने ईसाइयों के क्रूस को देखा, वह वहाँ नहीं था। मैं मंदिरों में गया, वहाँ भी उसका कोई निशान नहीं था। अंत में, मैंने अपने दिल के भीतर देखा; वह वहीं रहता था, वह कहीं और नहीं था।" मौलाना रूमी के अनुसार, आपका दिल एक दर्पण है। अगर इस पर अहंकार और इच्छाओं की धूल जमी रहेगी, तो इसमें ईश्वर का अक्स (चेहरा) दिखाई नहीं देगा।

पंजाब के महान सूफी संत बुल्ले शाह बाहरी दिखावे और कर्मकांड के सख्त खिलाफ थे। उनका एक प्रसिद्ध कलाम है:

मक्का गयां, गल्ल मुकदी नाहीं,

जचरों दिलों ना आप मुकाइए।

अर्थात: केवल मक्का जाने से बात नहीं बनती, जब तक इंसान अपने दिल से 'मैं' यानी अहंकार को खत्म नहीं करता। बुल्ले शाह मानते थे कि दिल को साफ किए बिना की गई कोई भी इबादत बेकार है।

10.16 सूफ़ी दर्शन का तीसरा सिद्धांत

सूफ़ी दर्शन का तीसरा सिद्धांत यह है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए अहंकार (नफ़्स) का नाश आवश्यक है। जब तक मनुष्य में मैं की भावना रहती है तब तक वह ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकेगा।

इसे सूफ़ी मत में 'फ़ना' (अहंकार का मिट जाना) कहा जाता है, जिसके बाद ही 'बक़ा' (ईश्वर में शाश्वत जीवन) प्राप्त होता है। नफ़्स (अहंकार) सांसारिक इच्छाओं और बुरे विचारों का केंद्र है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए नफ़्स को पवित्र करना (तज़किया-ए-नफ़्स) पहली शर्त है। जब तक व्यक्ति 'मैं' (अहंकार) से मुक्त नहीं होता, तब तक वह 'तू' (ईश्वर) से सच्चा प्रेम नहीं कर सकता। जैसे नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है, वैसे ही आत्मा अहंकार मिटाकर परमात्मा में लीन हो जाती है।

अहंकार बहुत सूक्ष्म चीज़ है। यह रहस्यमय भी है। मनुष्य की जो मूलभूत समस्याएं हैं, उनमें से यह प्रमुख समस्या है। यह सत्य और साधक के बीच बाधा उत्पन्न करता है। यह कोई तथ्य नहीं है। यह एक विचार है। जब कोई कहता है कि इस पूरे ब्रह्मांड के केन्द्र में मैं ही हूं, तो उस व्यक्ति का अहंकार एक विचार के रूप में उसके इस कथन में झलकता है। यहाँ व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ या ब्रह्मांड का स्वामी समझता है। यह अज्ञानता और भ्रम से पैदा होता है। लेकिन यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिनके अंदर अहंकार है, उनके अंदर अंधकार है। जब अहंकार टूटता है तो आंखें खुल जाती हैं, व्यक्ति होश में आ जाता है। उसकी मूर्च्छा ख़त्म हो जाती है। अहंकार छोड़ते ही उसकी सारी कामनाएं गिर जाती हैं। इसलिए साधना के पथ पर आगे बढ़ने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। व्यक्ति खुद को ब्रह्मांड से अलग नहीं देखता; वह अनुभव करता है कि जो चेतना (ईश्वर) पूरे ब्रह्मांड को चला रही है, वही उसके भीतर भी है। जैसे पानी की एक बूँद समुद्र में मिलकर कहे कि "मैं ही समुद्र हूँ", वैसे ही यह कथन अहंकार का नहीं बल्कि परम सत्य का अनुभव है।

एक कथा है। एक शिष्य अपने एकान्तप्रिय गुरु से मिलने गया। गुरु की कुटिया का दरवाज़ा अंदर से बंद था। शिष्य ने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ आई, कौन है?

शिष्य ने अहंकार से जवाब दिया, मैं।

दरवाज़ा नहीं खोला गया।

शिष्य ने काफ़ी समय तक सोच-विचार किया। फिर उसने अहंकार रहित होकर कुटिया का दरवाज़ा खटखटाया। फिर अंदर से गुरु की आवाज़ आई, कौन है?

शिष्य ने विनम्र स्वर में जवाब दिया, तू।

यह सुनकर गुरु ने दरवाज़ा खोल दिया। शिष्य गदगद हो गया। वह इस साधना के रहस्य को समझ गया था।

कहा गया है,

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।

प्रेम गली अति सांकरी, ता मैं दो न समाहिं॥

जिसके भीतर अहंकार नहीं होता, उसके भीतर डर भी नहीं होता। उसे कोई चीज़ डरा नहीं सकती।

जब हज़रत मंसूर हल्लाज को फांसी दी जा रही थी, तो उन्हें देखने के लिए लाखों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। मंसूर हल्लाज उस अंतिम घड़ी में भी हंसे जा रहे थे। किसी ने पूछा, मंसूर तुम पागल तो नहीं हो गए हो? ये लोग तुम्हारी जान लेने जा रहे हैं, और एक तुम हो कि हंसे जा रहे हो।

हज़रत मंसूर हल्लाज ने कहा, मैं तो उनकी नादानी पर हंस रहा हूं, वे एक ऐसे व्यक्ति को मारने जा रहे हैं, जो है ही नहीं।

उस वक़्त भी मंसूर हंस रहे थे। वे पागल नहीं थे। वे पूरे होश में थे। अहंकार को गिराने के लिए बहुत होश, निरंतर जागरूकता और साक्षी भाव की ज़रूरत होती है। बिना होश के अहंकार को पहचानना और उसे मिटाना पूरी तरह असंभव है। साधक को सजग रहना पड़ता है। सजग इसलिए रहना पड़ता है क्योंकि  एक आध्यात्मिक मनुष्य जिसने अहंकार का त्याग कर दिया है, उसके नज़दीक बहुत से चमत्कार होते हैं। वह उन चमत्कारों को करता नहीं, बस ये चमत्कार घटित होते हैं। इन चमत्कारों को अपनी शक्ति मान लेने की वे भूल न कर बैठें इसलिए उन्हें सजग रहना पड़ता है। अहंकार कोई स्थूल वस्तु नहीं है जिसे पकड़कर फेंका जा सके। यह एक विचार प्रक्रिया और आदत है। यह बहुत चालाक है; जब आप इसे 'त्याग' के माध्यम से गिराने की कोशिश करते हैं, तो यह "मैं बहुत बड़ा त्यागी हूँ" का नया 'धार्मिक अहंकार' ओढ़ लेता है। इसे केवल गहरे होश (साक्षी भाव) से ही पकड़ा जा सकता है, बलपूर्वक दबाकर नहीं।

सूफ़ी साधक निरंतर अपने दिल और विचारों पर पहरा देता है। वह होश रखता है कि कहीं कोई सांसारिक इच्छा या अहंकार (नफ़्स) चुपके से उसके भीतर न प्रवेश कर जाए। साधकों का कहना है कि अपने विचारों, भावनाओं और अहंकार को केवल एक होशपूर्ण दर्शक की तरह देखें। जैसे ही आप अहंकार के प्रति पूरी तरह होश में आते हैं, वह पिघलने लगता है। अहंकार अंधकार की तरह है। आप अंधकार से लड़कर उसे हरा नहीं सकते; आपको केवल प्रकाश (होश) जलाना होता है। जब आप होश पूर्वक देखते हैं कि कैसे आपका 'मैं' (Ego) हर बात में अपनी प्रशंसा, सुरक्षा या श्रेष्ठता ढूंढ रहा है, तो देखते ही देखते उसकी शक्ति कम होने लगती है। होश में आते ही तादात्म्य टूट जाता है। आप समझ जाते हैं कि "मैं यह अहंकार नहीं हूँ, मैं तो इसे देखने वाली चेतना हूँ।"

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर   

महात्मा गांधी हत्या केस-14

 

महात्मा गांधी हत्या केस-14


दिगम्बर रामचन्द्र बडगे

पूर्वी खानदेश के चालीस गाँव का एक मराठा दिगम्बर रामचन्द्र बडगे बड़ा ही बेढ़ब सा दिखने वाला शख्स था। चालीस गाँव वर्तमान समय में महाराष्ट्र के जलगाँव जिले के अंतर्गत आता है (उस समय यह क्षेत्र पूर्वी खानदेश कहलाता था)। बडगे का जन्म एक मराठा परिवार में हुआ था। वह लंबी दाढ़ी और कंधे तक झूलता बाल रखता था। तरह-तरह के परिधान पहन कर कभी वह साधु, तो कभी सिख आदि का वेश धारण कर लेता था। उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी टेढ़े-मेढ़े शीशे में दिख रहा हो; बडगे कद में छोटा, लगभग बौना जैसा था, लेकिन उसका शरीर गठीला और मज़बूत था, जिससे वह किसी कमज़ोर या अविकसित पहलवान जैसा लगता था। बचपन की किसी चोट के कारण उसकी एक आँख दूसरी आँख से काफ़ी छोटी थी, जिससे ऐसा लगता था जैसे वह तिरछी हो। कम कद और बेमेल आँखों की वजह से भीड़ में भी उसे आसानी से पहचाना जा सकता था। फिर भी, उसे लगता था कि वह अजीबोगरीब भेष बदलकर पकड़े जाने से बच सकता है। अपनी इस काबिलियत के सबूत के तौर पर वह अपने उन फ़ोटो का एक एल्बम रखता था जिनमें उसने नाटकीय अंदाज़ में अलग-अलग भेष धारण किए होते थे, ऐसे भेष जो उसने कथित तौर पर किसी बेहद खतरनाक मिशन को अंजाम देते समय अपनाया था। उसमें किसी छाया-नाटक (शैडो-प्ले) के योद्धा जैसा अकड़ भरा अंदाज़ था। वह बड़े-बड़े नाम लेकर अपनी पहुँच दिखाने और डींगें हाँकने का आदी था। उसे आसानी से टाला नहीं जा सकता था। लोग अक्सर उससे पीछा छुड़ाने के लिए ही उसके चाकू और खंजर खरीद लेते थे।

उसने बहुत थोड़ी सी स्कूली शिक्षा पाई थी। उसने अपनी स्कूली शिक्षा की शुरुआत भी चालीस गाँव से ही की थी। लेकिन मैट्रिक के स्तर तक पहुँचने से बहुत पहले उसने पढ़ाई छोड़ दी और अपनी आजीविका कमाने के लिए पूना चला गया।

दिगम्बर रामचंद्र बडगे को अपने शुरुआती जीवन में स्थायी रोजगार प्राप्त करने के लिए तीव्र आर्थिक तंगी, कम शैक्षणिक योग्यता और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसी कई गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। चालीस गाँव से स्कूल छोड़ने के बाद, पुणे में एक स्थायी और सम्मानजनक काम खोजने के लिए उसे काफी संघर्ष करना पड़ा। किसी डिग्री या तकनीकी कौशल के न होने के कारण उसे शुरुआत में कोई अच्छी या स्थायी नौकरी नहीं मिल सकी और उसे विभिन्न प्रकार की अस्थायी नौकरियों से संतोष करना पड़ा। उसने शुरुआत में एक घरेलू नौकर के रूप में काम किया और जीविका चलाने के लिए कड़ा शारीरिक श्रम (मैनुअल लेबर) भी किया। नौकरी पाने के लिए एक बार उसने पूना नगर पालिका के अध्यक्ष के आवास के सामने सत्याग्रह का सहारा लिया, लेकिन जिस पद की उसे पेशकश की गई उससे उसे संतुष्टि नहीं हुई और उसने उसे छोड़ दिया। कुछ समय के लिए उसने एक धर्मार्थ संस्था के लिए धन एकत्र किया और घर-घर जाकर पैसे की पेटी लेकर पैसा इकट्ठा किया करता था। उसका पारिश्रमिक उसके द्वारा किए गए संग्रह का एक चौथाई था।

कुछ समय बाद उसने पुणे के सदाशिव पेठ इलाके में चाकू-छुरियां तेज करने और साइकिल की मरम्मत करने का एक छोटा सा काम शुरू किया। उसने एक दुकान से कम मात्रा में चाकू, खंजर और पोर-डस्टर (हाथ में पहनने वाला हथियार) खरीदे और उसने एक ठेला लगा दिया। इसके बाद वह फुटपाथ पर पुरानी किताबें और बर्तन भी बेचने लगे, लेकिन इन कामों से भी उन्हें कोई निश्चित या स्थायी आय नहीं हो पाती थी। 

इस व्यवसाय से उसे अब तक जो कमा रहा था, उससे थोड़ी अधिक आमदनी हुई। लेकिन कम उम्र में शादी हो जाने और परिवार की जिम्मेदारी आ जाने के कारण उस पर लगातार कमाने का दबाव था। गरीबी और कर्ज के चलते वह हमेशा एक ऐसे काम की तलाश में रहता था जिससे अधिक मुनाफा हो सके। धीरे-धीरे उसने अपनी गतिविधियों के दायरे का विस्तार किया, और अंत में शुरू किया खुद की एक दुकान! कानूनी और सामान्य व्यापारों में लगातार मिल रही विफलता और कम कमाई के कारण, वह धीरे-धीरे हथियारों की अवैध खरीद-बिक्री की ओर आकर्षित हुआ। उसने पुणे में एक शस्त्र भण्डार खोला, जहाँ शुरुआत में वह कानूनी तौर पर चाकुओं का व्यापार करता था, लेकिन बाद में अधिक पैसे कमाने और राजनीतिक झुकाव के कारण वह अवैध हथियारों और विस्फोटकों की तस्करी में पूरी तरह शामिल हो गया।

इस तरह वह अवैध शस्त्र व्यापारी बन गया, पूना में ‘शस्त्र भंडार’ नाम से एक आग्नेय अस्त्रों-शस्त्रों की दुकान चलाने लगा और उसके ग्राहक शायद ही कभी ख़ाली हाथ लौटते हों। दिगम्बर रामचंद्र बडगे का हथियार व्यापार साधारण दुकानों जैसा नहीं था; बल्कि वह राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक तनाव और भूमिगत गतिविधियों से पूरी तरह जुड़ा हुआ था। 1942 में उसने अपने कुछ फ़र्निचर और पैतृक संपत्ति को बेचकर 75-100 रुपए इकट्ठा कर शस्त्र भंडार की स्थापना की थी। ‘शस्त्र भंडार’ नाम से जिस दुकान का वह मालिक था, उसमें चाकू-छूरे, तलवार और ख़ंज़र आदि बिकते थे, जिसके लिए किसी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वह धातुओं का बना ऐसा जैकेट भी बेचता जिससे चाकू घोंपे जाने पर सुरक्षा मिलती थी। यही बडगे वह व्यक्ति था जिसने करकरे के ग्रुप को नोआखली यात्रा के लिए छह चेनमेल जैकेट सप्लाई किए थे। चूंकि साधारण चाकुओं में अधिक मुनाफा नहीं था, इसलिए बडगे ने अधिक पैसे कमाने और अपने हिन्दू महासभा के संपर्कों का लाभ उठाते हुए आग्नेयास्त्रों और विस्फोटकों की अवैध ब्लैक-मार्केटिंग शुरू कर दी। पूना कंटोनमेन्ट डिपो में उसकी पहुंच थी, और हथगोला तो कभी भी आसानी से प्राप्त कर सकता था। जिन शस्त्रों की ख़रीद-बिक्री वह किया करता था उसकी उस समय राजनीतिक आंदोलनकारियों और मुस्लिम विरोधी संघों के सदस्यों द्वारा बहुत मांग की जाती थी।

मुस्लिम राज्य हैदराबाद की सीमा के पास रहने वाले हिंदू विशेष रूप से उसके अच्छे ग्राहक थे। उसके अधिकतर ग्राहक इसी संगठन के थे, जो हैदराबाद के निजाम के रजाकारों के खिलाफ हिंदुओं को हथियार मुहैया कराते थे। उसके इस काम में हिन्दू भंडार नाम से दुकान चलाने वाला शस्त्र व्यापारी एम.टी. कुलकर्णी मदद करता था। वह देश के विभिन्न हिस्सों से अवैध हथियार और गोला-बारूद इकट्ठा करता था और उन्हें हैदराबाद सीमा पर रजाकारों के खिलाफ लड़ रहे हिंदू लड़ाकों और कार्यकर्ताओं को भारी मुनाफे पर बेचता था। इसी वजह से वह राजनीतिक हलकों में एक 'विश्वसनीय हथियार आपूर्तिकर्ता' के रूप में जाना जाने लगा। बडगे केवल साधारण बंदूकें ही नहीं बेचता था, बल्कि वह अत्याधुनिक सैन्य सामग्री की तस्करी भी करता था। वह विभिन्न प्रकार की अवैध और चोरी की हुई पिस्तौलें भी रखता था। उसके पास गन-कॉटन स्लैब, डेटोनेटर और हैंड ग्रेनेड (हथगोले) भी उपलब्ध रहते थे, जिन्हें वह भूमिगत गुटों को सप्लाई करता था।

1940 में वह हिन्दू महासभा के संपर्क में आया। उसने नामजोशी से रिक्वेस्ट किया था कि वह जी.वी. केतकर को उसे हिन्दू महासभा में कोई काम दिलाने के लिए कहें। केतकर ने बाद में उसे हिन्दू संगठन निधि और हिन्दू अनाथ आश्रम के लिए दान इकट्ठा करने का काम दिया था। वह हिंदू महासभा के सम्मेलनों में भाग लिया करता था। वहाँ वह एक किताबों की दुकान लगाया करता था जिसमें न केवल किताबें बल्कि चाकू, खंजर और पोर-डस्टर का स्टॉक भी होता था। वहीं उसने दामोदर विनायक सावरकर के भाषण सुने। उसकी उनसे मुलाक़ात 1944-45 में हुई। उनके अंगरक्षक अप्पा कसार से उसकी दोस्ती हो गई थी। गोडसे-आप्टे को वह 1940-41 से जानता था। सावरकर के सचिव दामले से भी वह मिलता रहता था। पिछले दो-तीन साल से वह करकरे को भी जानता था। वह वाढगांवकर को भी जानता था। 1947 से वह दादर स्थित महासभा के दफ़्तर में महीने में कम से कम दो बार ज़रूर जाता रहा था। 1947 में उसने पूने में वीर सावरकर वाचनालय की स्थापना की थी। महासभा के विचारों से प्रभावित मराठी प्रकाशनों को यहां  रखा जाता था। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे पुणे से 'अग्रणी' नाम का अखबार चलाते थे। बडगे की दुकान और उसके राजनीतिक झुकाव के कारण गोडसे-आप्टे उससे अच्छी तरह परिचित हो गए थे। महासभा के विचारों को दैनिक अग्रणी भी अपने अखबार द्वारा आगे बढ़ाता था। इसमें विभाजन का विरोध होता था। ऐसा माना जाता था कि कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण और अहिंसावादी नीतियां ही इस देश के लिए घातक हैं।

बडगे ने आप्टे को कई बार शस्त्रों की सप्लाई की थी। जुलाई 1947 के अंत में एक दोपहर, जब पुणे में तेज बारिश हो रही थी, नारायण आप्टे पहली बार बडगे की दुकान 'शस्त्र भण्डार' (300 नारायण पेठ, पुणे) पहुंचा था। आप्टे अकेला नहीं था; वह अपने सहयोगी विष्णु करकरे के साथ एक उधार ली गई कार में बडगे की दुकान पर आया था। आप्टे ने बडगे को बताया कि वह कुछ "प्रभावशाली लोगों" की तरफ से काम कर रहा है और उसने बडगे से एक स्टेन गन खरीदने की इच्छा जताई थी। यही वह पहली मुलाकात थी जिसने बडगे को नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे के उस गुट से जोड़ा, जिसने आगे चलकर जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या की अंतिम साजिश रची।

इस पहली मुलाकात में बडगे ने नारायण आप्टे को स्टेन गन नहीं दी थी। उस समय बडगे के पास स्टेन गन उपलब्ध नहीं थी। जब आप्टे और विष्णु करकरे ने स्टेन गन मांगी, तो बडगे ने कहा कि उसके पास अभी स्टेन गन स्टॉक में नहीं है। स्टेन गन न होने पर बडगे ने उन्हें विकल्प के तौर पर एक ब्रिटिश सर्विस रिवॉल्वर (.38 बोर) और एक छोटी ऑटोमैटिक पिस्तौल दिखाई। आप्टे को वे हथियार पसंद आ गए। उसने स्टेन गन के बदले बडगे से वह ब्रिटिश रिवॉल्वर और ऑटोमैटिक पिस्तौल तुरंत खरीद ली। आप्टे ने इन हथियारों के लिए बडगे को 300 रुपये नगद दिए और बचे हुए पैसों का भुगतान बाद में करने का वादा किया। इस तरह, भले ही आप्टे को स्टेन गन नहीं मिली, लेकिन वह बडगे से दो कीमती आग्नेयास्त्र खरीदने में कामयाब रहा। इसी सौदे के बाद बडगे पर आप्टे का भरोसा बढ़ गया और वे आगे चलकर बड़े हथियारों और विस्फोटकों के सौदे करने लगे।

बाद में बडगे ने शंकर को दुकान संभालने के लिए कहा और कार में बैठ गया। उसने गुरदयाल सिंह नाम के एक सिख को साथ लिया और उस सड़क पर चल पड़े जो विशाल यरवदा सेंट्रल जेल की पिछली दीवार के किनारे-किनारे जाती थी। यहाँ गुरदयाल ने उन्हें रुकने के लिए कहा और कार से बाहर निकल गया। वह कुछ ही मिनटों में वापस आ गया। उसकी बाहों में एक स्टेन गन थी। बडगे, जिसे उन्होंने पहले कभी गंभीरता से नहीं लिया था, ने अपनी काबिलियत साबित कर दी थी; वह सामान का इंतज़ाम कर सकता था। उन्होंने गुरदयाल सिंह को उतारा और 'शास्त्र भंडार' वापस आकर, आप्टे ने खुशी-खुशी बडगे को उसकी माँगी हुई कीमत, 1200 रुपये दे दी। फिर वह और करकरे बडगे के काम से खुश होकर हिंदू राष्ट्र के दफ़्तर लौट आए।

दिसम्बर 1947 तक बडगे ने आप्टे को तकरीबन 3000 रुपयों के विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र दिए थे। दिसम्बर में आप्टे ने उसे कुछ सामानों की लिस्ट दी (जिनमें गन-कॉटन स्लैब और डेटोनेटर, हैण्ड ग्रेनेड (हथगोले) और पिस्तौलें, कारतूस, डेटोनेटर और फ्यूज वायर शामिल थे)  और उसका इंतजाम करने के लिए कहा। उसने उसके सामानों की व्यवस्था कर ली और इसकी उसको जानकारी दी तो उसने कहा कि वह करकरे को भेजेगा।

1945 में जब बडगे अपने व्यापार के सिलसिले में  शोलापुर गया था, तो वहां उसकी मुलाक़ात शंकर किष्टैय्या से हुई थी।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियांमहात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर