सोमवार, 14 सितंबर 2026

सूफ़ीमत... 11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-6

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


11. सूफ़ियों की प्रेमोपासना-6


11.10 प्रेमाख्यान की चरम सीमाएं- उल्लास और तड़पन

प्रेमाख्यानों में ईश्वर को परम सुन्दरी माना जाता है और जीव (आत्मा) को उसके प्रेमी या नायक के रूप में। यह भारतीय सूफ़ी परंपरा (जैसे मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन आदि की रचनाओं) की एक बहुत ही अनूठी और प्रमुख विशेषता है। अरब और फ़ारस (पारस) की पारंपरिक सूफ़ी शायरी में अक्सर ईश्वर को 'प्रियतम' (पुरुष) और साधक को 'प्रेमी' माना गया है। लेकिन जब सूफ़ी संत भारत आए, तो उन्होंने यहाँ की लोक-कथाओं और भारतीय अद्वैतवाद (जिसमें आत्मा को पत्नी और परमात्मा को पति माना जाता है) को देखा। सूफ़ियों ने इस भारतीय परंपरा को थोड़ा सा उलट दिया—उन्होंने ईश्वर को एक ऐसी अनुपम और अलौकिक सुन्दरी के रूप में चित्रित किया, जिसका सौंदर्य पूरे संसार में चमक रहा है।

जहां साधक पुरुष है, उसकी आसक्ति स्त्री के प्रति ही हो सकती है। मलिक मुहम्मद जायसी की 'पद्मावत' में रानी पद्मावती, मंझन की 'मधुमालती' में मधुमालती, और कुतुबन की 'मृगावती' में मृगावती केवल साधारण स्त्रियाँ नहीं हैं। वे अलौकिक सौंदर्य (Divine Beauty) की प्रतीक हैं। उनकी सुंदरता का वर्णन करते हुए सूफ़ी कवि यह दर्शाते हैं कि यह सौंदर्य किसी इंसान का नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर (अल्लाह) की नूर (आभा) का है। इन काव्यों में दिखाया गया है कि उस परम सुन्दरी (ईश्वर) का रूप इतना दिव्य है कि नायक (साधक) उसके सौंदर्य का केवल वर्णन सुनकर ही मूर्छित हो जाता है और सब कुछ छोड़कर जोगी (वैरागी) बन जाता है। मंझन की 'मधुमालती' हो या कुतुबन की 'मृगावती', इन सभी में नायिका का अलौकिक सौंदर्य वास्तव में ईश्वर के परम सौंदर्य का ही प्रतीक है।

इन कहानियों के नायक (जैसे पद्मावत में राजा रत्नसेन) उस जीवात्मा के प्रतीक हैं जो उस परम सुन्दरी (ईश्वर) को पाने के लिए बेताब है। चूंकि ईश्वर को परम सुन्दरी माना गया, इसलिए उस तक पहुँचने का रास्ता भी बहुत कठिन दिखाया गया। नायक को सिंहलद्वीप (ईश्वर के घर) जाने के लिए सात समंदर पार करने पड़ते हैं, अनेक राक्षसों (काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों) से लड़ना पड़ता है और अंत में सूली पर चढ़ने के लिए भी तैयार होना पड़ता है। यह सब साधक की कठिन आध्यात्मिक यात्रा (सुलूक) को दर्शाता है। नायक अपना राज-पाट, सुख-सुविधाएं सब छोड़ देता है और जोगी (तपस्वी) बनकर कठिन रास्तों, जंगलों और पहाड़ों को पार करता हुआ अपनी प्रियतमा को पाने के लिए निकल पड़ता है। यह नायक की साधना और कष्टों का सफर असल में सूफ़ी साधक की आध्यात्मिक यात्रा (तसव्वुफ़) है। सूफ़ी कवियों का मानना था कि ईश्वर इस सृष्टि का सबसे सुंदर रूप है। वे फ़ारसी परंपरा के 'इश्क़-ए-मजाज़ी' (सांसारिक प्रेम) को माध्यम बनाकर 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' (ईश्वरीय प्रेम) तक पहुँचने का रास्ता दिखाते थे। उनका मानना था कि किसी स्त्री या लौकिक रूप के प्रति सच्चा, निश्छल और गहरा प्रेम ही अंत में साधक को ईश्वर के उस सर्वोच्च और निराकार सौंदर्य से मिला सकता है।

प्रेमाख्यान की दो चरम सीमाएं हैं -  उल्लास और तड़पन। आध्यात्मिक दृष्टि से, इन दोनों अवस्थाओं के बिना किसी भी सूफ़ी प्रेमाख्यान की कल्पना करना असंभव है। सूफ़ी काव्यों में प्रेम की शुरुआत ही 'तड़पन' से होती है। जब तक साधक के दिल में अपने प्रियतम (ईश्वर) के लिए एक गहरी बेचैनी और दर्द पैदा नहीं होता, तब तक उसकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू ही नहीं हो सकती। सूफ़ी प्रेमाख्यानों में नायक का नायिका को पाने के लिए तड़पना और कठिन साधना करना, असल में एक भक्त (आत्मा) का उस परम सुन्दरी रूपी ईश्वर (परमात्मा) से मिलने का आध्यात्मिक सफर है। यह तड़पन साधक के भीतर के 'मैं' (Ego) को पूरी तरह गला देती है। प्रेमी प्रेम में मस्त हो जाता है। वह मस्ती में झूमता रहता है। मस्ती में वह भजन (क़व्वाली) गाता है और झूमता है। जहां उसमें मस्ती और दीवानगी होती है वहीं उसमें विरह की असीम तड़प होती है। एक सूफ़ी परमेश्वर को अपना परम आत्मीय समझता है वह अपने को उससे बिछुड़ा हुआ अनुभव करता है उसके विरह में वह तड़पता रहता है। विरह की तड़पन ही उसके प्रेम को व्यंजित करती है। वह ईश्वर की उपलब्धि के लिए आतुर हो जाता है इसी भावना के साथ वह अपनी साधना में भी लगा रहता है वह विरह को समस्त सुखों का आधार मानता है। मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत में जब राजा रत्नसेन, रानी पद्मावती के सौंदर्य की बात सुनते हैं, तो वे तुरंत मूर्छित हो जाते हैं। होश में आते ही वे राजसी सुख त्यागकर जोगी बन जाते हैं। यह घर-बार छोड़ना और कष्ट सहना प्रेम की इसी तड़पन का परिणाम है। जायसी ने पद्मावत के 'सिंहलद्वीप खंड' (या जोगी खंड) में कहा है

जेहि के बोल विरह के धाया।

कहु तेहि भूख कहां तेहि छाया।

फेरे भेस रहह भा तपा।

धूरो लपेटा मानिक छपा॥

इन पंक्तियों में राजा रत्नसेन की उस दशा का वर्णन है जब वह रानी पद्मावती (जो कि परम सुन्दरी रूपी ईश्वर का प्रतीक हैं) के प्रेम में सब कुछ त्यागकर एक जोगी (तपस्वी) बन जाता है। यहाँ जायसी ने सूफ़ी मत के 'विरह' (ईश्वर से जुदाई की तड़प) और 'फ़ना' (अहंकार और भौतिकता का नाश) को बहुत खूबसूरती से दर्शाया है। जो साधक ईश्वर के विरह की आग में जल रहा है, वह भूख-प्यास और शारीरिक सुख-सुविधाओं (छाया) जैसी भौतिक चीज़ों से बहुत ऊपर उठ जाता है। उसका ध्यान केवल अपने प्रियतमा (ईश्वर) पर टिका होता है। राजा रत्नसेन ने जोगी का रूप धर लिया है और धूल में लिपटे होने के कारण वह बाहर से भले ही मैला या साधारण दिखे, लेकिन उसके भीतर राजा और सच्चे प्रेमी की रूहानी चमक (मानिक) छिपी हुई है। सूफ़ी संदर्भ में, बाहर की धूल सांसारिक फकीरी है और भीतर का माणिक्य ईश्वर के प्रेम से शुद्ध हुई आत्मा है। सूफ़ी मत में 'विरह' को आत्मा को शुद्ध करने वाली आग माना गया है। जब तक आत्मा इस विरह की आग में तपकर कंचन (सोना) नहीं बनती, तब तक वह परमात्मा से नहीं मिल सकती। रत्नसेन की भूख-प्यास का मिट जाना इसी रूहानी अवस्था को दिखाता है।

कठिन परीक्षाओं, पहाड़ों, और सात समंदरों को पार करने के बाद जब नायक अपनी नायिका (परमात्मा) से मिलता है, तो वह 'उल्लास' की चरम सीमा होती है। उल्लास मिलन का परमानंद है। यह उल्लास किसी सांसारिक सुख जैसा नहीं है, बल्कि यह वह स्थिति है जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं। सूफ़ी मत में इसे 'वस्ल' (मिलन) कहा जाता है। जब रत्नसेन अंततः तमाम बाधाओं को पार करके पद्मावती को प्राप्त करते हैं, तो वह मिलन पूरे ब्रह्मांड के उल्लास के रूप में चित्रित किया जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो, 'तड़पन' यात्रा है और 'उल्लास' उसकी मंज़िल है। तड़पन के बिना उल्लास का आनंद महसूस नहीं हो सकता, और उल्लास की आस के बिना इतनी भयानक तड़पन झेली नहीं जा सकती। प्रेमाख्यानों के कवि इन्हीं दोनों सीमाओं के बीच मानव हृदय की सबसे सुंदर और गहरी भावनाओं को पिरोते हैं।

11.11 प्रेम दर्शन में वियोग-संयोग

सूफ़ियों के प्रेम दर्शन में वियोग-संयोग का भी विशेष स्थान है। सूफ़ी अध्यात्म में इन्हें क्रमशः 'फ़िराक़' (वियोग) और 'विसाल' (संयोग) कहा जाता है। सूफ़ियों ने संयोग से तात्पर्य विलीन होने के बजाए ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करना पाया है। जब साधक साधना में लगा रहता है तो उसके भीतर की बुराइयां दूर होने लगती हैं और भलाइयां जड़ पकड़ने लगती हैं। ऐसे लोग ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करते हैं। अल्लाह जितना अधिक अपने बन्दों के दिलों को अपने क़रीब देखता है उतना ही वह भी उनके क़रीब आ जाता है। सूफ़ीमत की अवधारणा में कहीं जाना नहीं है। परमात्मा के पास जाना नहीं है। वह तो यहीं है। लेकिन साधक यहां नहीं है। वह कहीं और होता है। साधना के द्वारा वह वापस लौटता है। परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करता है। जब साधक वियोग की चरम सीमा पर पहुँचता है, तो उसका स्वयं का अस्तित्व (अहंकार) पूरी तरह मिट जाता है, जिसे 'फ़ना' कहते हैं। इसके बाद जो अवस्था आती है, वह 'बक़ा' (ईश्वर में सदा के लिए लीन हो जाना) है. यही सच्चा 'संयोग' या 'विसाल' है। आम दुनिया के लिए मौत एक शोक है, लेकिन सूफ़ी दर्शन में एक सच्चे सूफ़ी संत की मृत्यु को 'विसाल' (ईश्वर से मिलन की रात) माना जाता है। यही कारण है कि सूफ़ी संतों की पुण्यतिथि को 'उर्स' (जिसका शाब्दिक अर्थ विवाह या मिलन की रात है) के रूप में बड़े जश्न के साथ मनाया जाता है।

वियोग की कल्पना भी सूफ़ीमत में पाई जाती है। मिलन का न होना ही वियोग है। सूफ़ी इसे क़ब्ज कहते हैं। एक सूफ़ी ईश्वर को अपना परम आत्मीय समझता है और वह अपने को उससे बिछुड़ा हुआ अनुभव करता है। उसके विरह में तड़पता है। उसको पाने के लिए आतुर, व्याकुल रहता है। अपनी इस तड़प, इस विरह की भावना के साथ साधक अपनी साधना में जुटा रहता है। उसे इसकी परवाह नहीं रहती कि उसका प्रियतम उसे किसी स्थूल शरीर में आकर दर्शन दे। वह तो उसके सान्निध्य में रहना चाहता है, उसके समक्ष रहने का उसे अवसर मिले, यह चाहता है। वह उसके नूर (दिव्य प्रकाश) से अपने को अभिभूत मानता है। जब साधक सान्निध्य प्राप्त करने की ओर रास्ते की बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ता है, तो उसे बसत कहते हैं। इसीलिए सूफ़ी कहते हैं कि भविष्य की आशाओं को लेकर बसत की क्रिया बराबर चलती रहती है और क़ब्ज वर्तमान में मौजूद रहता है। सूफ़ी कहते हैं कि क़ब्ज (वियोग) बसत (संयोग) के मुक़ाबले अधिक लाभप्रद और उपयोगी होता है।  क़ब्ज अहंभाव समाप्त करता है और प्रियतम की ज्योति उसके मन में उतरती जाती है। सूफ़ी मानते हैं कि अल्लाह का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि साधक को किसी मुसीबत में डाला जाए। मुसीबत वही है जो साधक के दिल को बेचैन कर दे, परेशान रखे। जो साधक मुसीबत आने पर परेशान और बेचैन नहीं होता, धैर्य से काम लेकर उसे आसानी से जीत जाता है, तो सच में यह उसके लिए मुसीबत हुई ही नहीं। दुख से मन को कष्ट अवश्य पहुंचता है, लेकिन उससे आत्मा प्रज्ज्वलित जो उठती है। उसका विश्वास बढ़ता है। उर्दू साहित्य के सबसे महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर है,

इशरत--क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना।

दर्द के हद से गुज़र जाना है दवा हो जाना।

सूफ़ी दर्शन के अनुसार, एक बूंद (जीवात्मा/इंसान) का परम आनंद और उसका अंतिम लक्ष्य इसी में है कि वह महासागर (परमात्मा/ईश्वर) में मिलकर अपना अस्तित्व पूरी तरह मिटा दे (फ़ना हो जाए)। जब बूंद दरिया में गिरती है, तो वह एक बूंद के रूप में समाप्त हो जाती है, लेकिन असल में वह खुद दरिया बन जाती है। इसी तरह, जब इंसान का अहंकार मिटता है, तो वह ईश्वर के नूर में विलीन होकर अमर हो जाता है। जब कोई साधक ईश्वर के वियोग में तड़पता है, तो एक वक्त ऐसा आता है जब यह दर्द अपनी आखिरी सीमा को पार कर जाता है। उस चरम सीमा पर पहुँचकर दर्द इतना बढ़ जाता है कि साधक को दर्द महसूस होना ही बंद हो जाता है, और वह दर्द खुद ही उसकी दवा (चैन/सुकून) बन जाता है।

यह वह अवस्था है जहाँ साधक को समझ आता है कि दुःख और सुख, दर्द और दवा सब उसी एक ईश्वर की मर्ज़ी हैं, और वह हर हाल में संतुष्ट हो जाता है।

प्रेम मार्ग में रस की मधुरता के साथ-साथ विरह की अग्नि भी होती है। यह तपस्या का मार्ग है जिसमें दो मार्ग होते हैं, एक वैरागी होकर तप साधना का और दूसरा सर्वस्व न्यौछावर करने का, यहां तक कि प्राण भी। जब साधक प्रेम के मार्ग में मृत्यु का आवाहन करके अपनी परीक्षा में पूरा उतरता है तब वह सिद्ध बन जाता है। किंतु सिद्ध होने के बाद भी उसे प्रियतम की प्राप्ति नहीं होती, पर उसे सभी प्रकार के विशिष्ट अधिकार मिल जाते हैं। उसका अहं भाव समाप्त हो जाता है। उसका सब कुछ प्रेमिका रूप हो जाता है। वह स्वयं ही गुरु और स्वयं ही शिष्य बन जाता है, यानी वह ख़ुद अपने लिए आगे का मार्ग निश्चित करता है।

11.12 सारांश

सारांश यह है कि सूफ़ीमत की संपूर्ण साधना अंतः-साधना के ही विविध रूप हैं, जो प्रेमाश्रित रही हैं। सूफ़ियों के लिए प्रेम का लक्ष्य ईश-सान्निध्य प्राप्ति है। इसी के लिए वह साधना करता है, इसी के लिए वह दुखों को बर्दाश्त करता है, पीड़ाओं को सहन करता है। इसी के लिए वह तड़पता है, परेशान रहता है। जैसे-जैसे साधक में दृढ़ता आती जाती है, साधक एवं साध्य के बीच का व्यवधान कम होता जाता है। और जब वह मंजिल पा लेता है, तो स्वयं  को मिटा कर वह केवल उसी का हो जाता है, जिसको उसने अपना प्रियतम बनाया था।  साधना के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने पर भी इनकी दृष्टि में लोकरक्षा और लोकरंजन के प्रति गहरा सरोकार बना रहा। परम्परा को स्वीकार करते हुए भी रूढ़ एवं जर्जर तत्वों की जकड़न को इन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया।

प्रेम मानव मन की नैसर्गिक पिपासा  है। प्रेम के लिए किसी प्रकार की संहिता की रचना संभव नहीं है प्रेम तर्कातीत  है। तर्क और प्रेम एक साथ नहीं रह सकते। तर्क प्रेम का निषेध करता है। अवरोध उत्पन्न करता है। जब कोई प्रेम करता है तो वह तर्क से परे  हो  जाता है। इसी तरह जब कोई तर्कनिष्ठ होता है तो वह प्रेमपूर्ण नहीं रह जाता। इसलिए सूफ़ी साधकों को तर्क और बुद्धि के दाँव-पेंच पसंद नहीं वे उन लोगों का मजाक उड़ाते हैं, जो तर्क और बुद्धि के द्वारा इसे समझना चाहते है इस प्रेम को शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता संदेह की दृष्टि से छाना-बीन करने वाला इसे नहीं समझ सकता

प्रेम का अनुभव नितांत वैयक्तिक होता है। इसलिए सूफ़ी-साधक प्रेम के जिन नियमों का पालन कर परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करता है, वे नियम उसके नितांत वैयक्तिक होते हैं। जैसे संसार की प्रत्येक वस्तु का स्वभाव अपने मूल की ओर लौटना है, उसी तरह आत्मा भी अपने मूल की ओर लौटना चाहती है। प्रत्येक आत्मा में उसी की ओर लौटने की इच्छा निहित रहती है। साधारण व्यक्ति मोहमाया में पड़कर अपनी आत्मा की इस नैसर्गिक क्षुधा की उपेक्षा ही नहीं करता बल्कि उसकी इच्छा का इतना दमन करता है उसे आत्मा की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती। जब साधारण व्यक्ति के भीतर परमात्मा को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है, तब वह अध्यात्म-मार्ग पर चलना शुरु करता है। ऐसे व्यक्ति को  सालिक  (साधक) कहते हैं। भावाविष्टा के द्वारा सूफ़ी साधक उस अवस्था तक पहुँच जाता है जहाँ उसका साक्षात्कार परम सत्य से होता है। सूफ़ी साधक परमात्मा में पूर्ण लीन हो जाने को ही फ़ना की अवस्था मानते हैं। कुछ सन्तों के अनुसार सूफ़ी साधना का यही चरम लक्ष्य है। इस अवस्था में साधक सांसारिक वासनाओं से अलग होकर अपने अस्तित्व को कम कर देता है। कुछ सूफ़ी सन्तों के अनुसार फ़ना सूफ़ी सन्तों की अन्तिम अवस्था नहीं है। वास्तविक अस्तित्व का प्रारम्भ तो फ़ना के बाद होता है। अहं को मिटाकर साधक को फ़ना की अवस्था प्राप्त होती है और उसके बाद बक़ा की अवस्था आती है जिसमें वह परमात्मा के साथ एकमेक होकर रहने लगता है। सूफ़ीवाद का परम लक्ष्य यही है। वह मोमीन बन जाता है हज़रत जुनैद बग़दादी रह.अ. ने कहा है, मोमीन (ईमानवाला) वही है कि जो बात अपने लिए पसंद करे, वही बात दूसरे के लिए भी पसंद करे। दरअसल जब कोई मोमीन अपने नफ़्स (इंद्रियों) और क़ल्ब (दिल) की क़ैद से आज़ाद हो जाता है, तो सारी दुनिया को एक समझने लगता है।

एक बार हज़रत शिबली रह.अ. कहीं बैठे थे। तभी उन्होंने देखा कि एक चरवाहे ने गाय की पीठ पर लकड़ी मारी। उधर चरवाहे ने गाय की पीठ पर वार किया इधर हज़रत बेचैन हो गए। यह देख चरवाहे ने कहा, क्या बात है? आप बेचैन हो उठे? मैंने आपको तो नहीं मारा। हज़रत ने अपनी पीठ उघाड़कर दिखाया, तो उनकी पीठ पर लाठी के निशान थे।

सूफ़ियों की प्रेमोपासना हरेक जीव के साथ प्रेम करना सिखाती है। दयालुता, शिष्टाचार, उदारता और सज्जनता से ही यह प्रेम व्यक्त होता है। जब मन विशुद्ध होता है तब साधक अहं, अभिमान, क्रोध, ईर्ष्या और लोभ, लिप्सा, लालच से स्वतंत्र होता है। ऐसी स्थिति मस्तिष्क को बाहरी संसार के प्रलोभन की तरफ़ से आंतरिक शांति की खोज की ओर मोड़ देती है। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति की तरफ़ यह पहला क़दम है। बिना नैतिकता और नैतिक जीवन की गहरी चेतना के आध्यात्मिक जीवन शुरू ही नहीं होता। जो कायनात के कण-कण में व्याप्त है उसको खोजने की यात्रा भीतर की यात्रा है। इस शरीर के भीतर ही उस दिव्य परम चैतन्य ज्योति को प्राप्त किया जा सकता है। हृदय की आत्म-ज्योति से वह परमतत्व दिखाई पड़ता है। उसे प्राप्त करने का अगर कोई उपयुक्त स्थान है, तो मनुष्य का अपना हृदय ही है। जहां मन बुद्धि का व्यापार है वहीं हृदय वह चैतन्य केन्द्र है जहां सभी भावनाओं का जन्म होता है। इसे ही प्राण केन्द्र कहा जाता है। इसी प्राण-केन्द्र में ब्रह्म का निवास है। मस्तिष्क तो मानस व्यापार का केन्द्र है। यह चिंता प्रधान और तर्क प्रधान का केन्द्र है। हृदय में सत का निवास है। हृदय के सत से ही नेत्रों में नए दर्शन की शक्ति आती है। प्रियतम हृदय के दर्पण में दर्शन देता है। प्रेम मार्ग में प्रेम ही संसार का सबसे सुंदर और सबसे विशिष्ट तत्व है। उससे ही जीवन में पूर्ण सौंदर्य उपलब्ध होता है। सूफ़ी प्रेमाख्यान परंपरा के महान कवि मंझन द्वारा रचित प्रसिद्ध सूफ़ी महाकाव्य 'मधुमालती' में कहा गया है,

तीन लोक चौदह खण्ड, सबै परै मोहि सूझि।

पेम छाड़ि किछु और न लोना जौं देखौं मन बूझि॥

तीनों लोक (आकाश, पाताल, और मृत्युलोक) और चौदह खण्ड (ब्रह्मांड के समस्त चौदह भाग), इन सब के परे (या इन सब के भीतर) मुझे केवल एक ही चीज़ दिखाई देती है, मेरी दृष्टि उसी पर टिकती है। यदि मैं अपने मन को अच्छी तरह समझाकर और गहराई से विचार करके (मन बूझि) देखूँ, तो मुझे इस पूरे ब्रह्मांड में 'प्रेम' (पेम) के अलावा कुछ भी सुंदर या लावण्यमय (लोना) नहीं दिखाई देता। प्रेम को छोड़कर बाकी सब कुछ नीरस और व्यर्थ है। प्रेम के बिना इस संसार में कुछ भी सुंदर या मूल्यवान नहीं है।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर