बुधवार, 29 अप्रैल 2026

479. विभाजन की स्वीकारता पर मुहर

राष्ट्रीय आन्दोलन

479. विभाजन की स्वीकारता पर मुहर

1947

दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का अधिवेशन हुआ। नेहरूजी ने उसमें भारी मन से घोषणा की कि विभाजन ही सबसे कम घातक और अंतिम उपाय बचा था। इसलिए अनिच्छा के साथ विभाजन स्वीकार करना अनिवार्य हो गया था। उस दिन भारत के विभिन्न भागों में लोगों ने जमकर खुशियाँ मनायीं। दिल्ली में जब संविधान सभा के अध्यक्ष ने मोहनदास करमचंद गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि देते हुए संविधान सभा की बैठक शुरू की तो बहुत देर तक करतल ध्वनि होती रही। एसेम्बली के बाहर भीड़ महात्मा गाँधी की जय के नारे लगा रही थी। कांग्रेस और लीग दोनों ने विभाजन स्वीकार कर लिया था। बहुत से लोगों को विभाजन के विरुद्ध प्रचंड और उग्र आंदोलन की आशा थी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। जब कांग्रेस और लीग ने विभाजन की योजना पर हस्ताक्षर कर दिया था, तो राजनीतिक अर्थ में विभाजन की योजना उनके लिए जीवित प्रश्न नहीं रह गई।

बुनियादी मतभेद होने के बावजूद भी, जब गांधीजी ने देखा कि कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन को अपना लिया है, तो उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस के उन प्रतिनिधियों से नेहरू और पटेल के रुख़ का समर्थन करने का और विभाजन को स्वीकार करने का अनुरोध किया। गांधीजी जानते थे कि विदेशी तंत्र के सामने सत्याग्रह सरल था, लेकिन अब किसका विरोध करें? सब तो अपने थे। अपने विश्वस्त साथियों से क्या असहयोग करना या विवाद खड़ा करना? कांग्रेस मंत्रिमंडल पहले शांति-स्थापना की मांग करती और बाद में विभाजन स्वीकार करती तो ज़्यादा सही होता। हिंसा और आतंक की धमकी से पाकिस्तान की मांग करना ग़लत था। लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल ने शांति-स्थापना का आग्रह ही नहीं किया। लीग की गतिविधियों से त्रस्त और सरकारी अफसरों की दगाबाज़ी से परेशान कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन पर सहमति ज़ाहिर कर दी। जिन्ना की तो मन की मुराद पूरी हो गई। वायसराय ने 4 जून को गांधीजी को बुलाया, और उन्हें यह समझाने की पूरी कोशिश की कि विभाजन की योजना का विरोध करना क्यों उचित नहीं है। अपनी प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, लोकतंत्र में साधारण लोग ही सच्चे मालिक हैं। उनके नेता, जो अब सरकार में चले गए हैं, उनके सेवक हैं। इसलिए भारतीयों को अपने नेताओं को कठिन निर्णय लेने के लिए अकेले छोड़ने और बाद में अपने संतोष के लायक़ काम न होने पर उन्हें दोष देने के बजाए उन्हें बताना चाहिए कि वे क्या करें। कांग्रेस की राय है कि उसे परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा। पक्ष-विपक्ष का सावधानी से विचार करके उन्होंने अनिच्छापूर्वक विभाजन को मान लिया है। वायसराय को दोष देने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने खुल्लम-खुल्ला कह दिया था कि वे संयुक्त भारत चाहते हैं, परन्तु जब कांग्रेस ने मुसलिम लीग की स्थिति को मान लिया तब वे कुछ नहीं कर सके। मैंने भरसक प्रयत्न किया कि लोग संयुक्त भारत के पक्ष में डटे रहें, परन्तु मेरी कुछ नहीं चली। ऐसी परिस्थिति में मेरा और आपका क्या कर्तव्य है? क्या हम कांग्रेस के ख़िलाफ़ विद्रोह करें? जहां तक मेरा संबंध है, मैं तो कांग्रेस का सेवक हूं, क्योंकि मैं देश का सेवक हूं। मैं कभी कांग्रेस संगठन के साथ बेवफाई नहीं कर सकता। विभाजन निश्चित वस्तु बन चुका है। वह तो हो गया सो हो गया। लेकिन उसके ज़हर को मारा जा सकता है। उसने घृणा और शत्रुता की भावना बढ़ा दी है। उसे दबा कर मिठास और सद्भाव के साथ विभाजन के ब्यौरे की बातें तय कर ली जाएं, तो दोनों भाग अभी भी एक-दूसरे के स्थायी शत्रु बनने तथा एक-दूसरे के लिए और दुनिया की शांति व सुरक्षा के लिए ख़तरा बनने के बजाए मित्रों तथा भले पड़ोसियों की तरह साथ में रह सकते हैं।

अपने इस ध्येय को आगे बढ़ाने के लिए गांधीजी ने 6 जून को माउंटबेटन से मुलाक़ात की। उससे कहा जब भी आपको मौक़ा मिले आप जिन्ना को समझाएं कि अब तो निर्णय हो चुका है। आपको अपना पाकिस्तान मिल गया। आब आप ख़ुद जाकर कांग्रेस के नेताओं से मित्रों की तरह बातचीत क्यों न कर लें और शेष बातों पर आपस में निबटारा करने की कोशिश क्यों न करें? जिन्ना को समझाएं कि वे जाकर पूर्व पंजाब और पश्चिम बंगाल के ग़ैर-मुसलिम अल्पसंख्यकों को अपना बना कर पंजाब और बंगाल के विभाजन को रोकें। 7 जून को गांधीजी ने माउंटबेटन से हुई बातचीत का सार नेहरू को पत्र लिखकर बता दिया। गांधीजी के सुझाव के अनुसार माउंटबेटन ने जिन्ना से बात की, लेकिन उसका कोई फल नहीं निकला।

जामिया मिलिया इस्लामिया से मुसलमानों की मंडली गांधीजी से मिलने आई। विभाजन के भावी परिणामों से वे आशंकित थे। गांधीजी ने उनसे कहा, अगर एक पक्ष भी हिंसा का पूरी तरह परित्याग करने और अहिंसा की शक्ति पर निर्भर रहने का निश्चय कर लेता, तो साम्प्रदायिकता की फैलती हुई आग अपने आप बुझ जाती। पंजाब से सिक्ख नेता मास्टर तारा सिंह गांधीजी से मिलने आए। पंजाब का एक-तिहाई से अधिक भाग पाकिस्तान में चला जाने वाला था। गांधीजी ने उनसे कहा, आपस की फूट के कारण ही भारत का विभाजन हुआ है। पूना से आए विद्यार्थियों के एक दल को उन्होंने कहा, भारत ने स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए सत्य और अहिंसा की पद्धति को लक्ष्य के रूप में नहीं बल्कि एक साधन के रूप में अपनाया था, इसलिए ज्यों ही वह लक्ष्य सिद्ध हुआ वे दोनों हमसे अलग पड़ गए। नतीजा हमारी आज की दुर्दशा है।

उन्हीं दिनों एक प्रस्ताव आया कि गांधी-परिवार का पैतृक मकान राष्ट्र के लिए ले लिया जाए। गांधीजी की एक संबंधी महिला वहां रहती थीं। उन्होंने इसे संपत्ति हरण समझा और उसके विरुद्ध गांधीजी से सहायता मांगी। गांधीजी ने उसे समझाया, तुम्हें यह मकान छोड़ देना चाहिए और जो भी मुआवज़ा मिले उससे संतोष करना चाहिए। मुझे स्मारकों की परवाह नहीं है। ... लेकिन यदि हमारे पैतृक घर का की अच्छा उपयोग होता है, तो तुम्हें या तुम्हारे सलाहकारों को उसमें बाधक नहीं बनना चाहिए।

इन्हीं दिनों एक वाकया हुआ। गांधीजी ने एक दिन प्रार्थना सभा में कहा, वह समय तेज़ी से आ रहा है, जब भारत को अपन पहला राष्ट्रपति चुनना होगा। यदि चक्रैया ज़िन्दा होता, तो मैं इस पद के लिए ख़ुशी से उसके नाम का प्रस्ताव रखता। उसने आपने आप को मानव-जाति की सेवा में पूरी तरह अर्पण कर दिया था। वह हरिजन था। परन्तु छूत-अछूत का, हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं रखता था उसके लिए सब मनुष्य थे और वह सच्चे अर्थ में मनुष्य था। लेकिन आज वह हमारे बीच नहीं रहा। फिर भी मुझे इस विचार से ख़ुशी होगी कि कोई भंगी की लड़की हमारा प्रथम राष्ट्रपति बने। ऐसी लड़कियां मौज़ूद हैं। ... भारतीय गणतंत्र के भावी राष्ट्रपतियों के लिए अंग्रेज़ी जानना ज़रूरी नहीं होगा। ... मैंने 1917 या 1918 में ही एक सार्वजनिक भाषण में कह दिया था कि जब तक कोई मोची या भंगी भारत का राष्ट्रपति नहीं बनेगा, तब तक मुझे संतोष नहीं होगा।

7 जून को हिन्दू महासभा का एक दल गांधीजी से मिलने आया। उसमें से एक सदस्य ने कहा, प्रार्थनाओं में क़ुरान की आयतें न पढ़वाई जाएं। ... आपको राजनीति से हट जाना चाहिए। जितनी जल्दी आप हटेंगे उतना ही भारत का भला होगा। गांधीजी ने जवाब दिया, मेरा जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित है। मेरी राजनीति सत्य और अहिंसा के आदर्शों का सामाजिक क्षेत्र में किया जाने वाला विस्तार या प्रयोग मात्र है। मैं इन आदर्शों के प्रचार में मर जाना पसंद करूंगा, परन्तु स्वाधीनता के बदले में उन्हें छोड़ना पसंद नहीं करूंगा। इसलिए आपकी सलाह न मानने के लिए आप मुझे क्षमा करें। उसके बाद समाजवादियों का एक दल गांधीजी से मिलने आया। समाजवादी कांग्रेस के नेताओं से अलग हो गए थे। दोनों समूहों के बीच सैद्धान्तिक मतभेद थे। विभाजन की योजना कांग्रेस द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के कारण समाजवादी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से नाराज़ थे। गांधीजी ने उन्हें समझाया, अब विदेशी लोग जा रहे हैं। सत्ता भारतीयों के हाथ में आने वाली है। अब अगर सहयोग-वृत्ति प्रकट करने के बजाए आप लोग अड़ंगेबाज़ी की नीति अपनाते रहेंगे तो देश की कुसेवा होगी। कांग्रेस के नेता जो कुछ कर रहे हैं, वह यदि आपको नापसंद है, तो आपको उनसे मिल कर चर्चा करनी चाहिए और मित्रतापूर्ण ढंग से आपसी भेद मिटा लेना चाहिए।

लंबे समय तक गांधीजी के सेक्रेटेरियल स्टाफ़ की सदस्य के तौर पर काम करने वाली राजकुमारी अमृत कौर उनसे मिलने आई। इन दिनों वे संविधान सभा का काम देख रही थीं। इसलिए उन्हें गांधीजी से अलग रहना पड़ता। लेकिन जब भी उन्हें समय मिलता वह गांधीजी की सहायता करने आ जातीं। 8 जून को तपती दोपहरी में वह आईं, तो गांधीजी ने उनसे कहा, इतनी तेज़ धूप में आने की क्या ज़रूरत थी। संविधान सभा में जो काम तुम कर रही हो, वह भी मेरी सेवा ही है। उन दिनों गांधीजी का रक्तचाप बढ़ा रहता था। सीमाप्रांत से जो ख़बरें आ रही थीं, उससे गांधीजी को काफी वेदना हो रही थी। किसी ने गांधीजी को तार भेजा, भारत के विभाजन को कांग्रेस ने मान लिया है, लेकिन चारों ओर उसका तीव्र विरोध है। ऐसी स्थिति में क्या आप आमरण अनशन नहीं करेंगे? गांधीजी ने जवाब दिया, ऐसे उपवासों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। कांग्रेस का मेरे विचारों से मतभेद हैं, क्या इसीलिए मैं उपवास करूं?

9 जून को सुबह की सैर के समय हिन्दू महासभा के दो युवक आए और गांधीजी से कहने लगे, आप महात्मा नहीं हैं। आप हिन्दुओं को अहिंसा का उपदेश करके दुर्बल बना रहे हैं। गांधीजी ने उनसे कहा, तुम नहीं जानते कि तुम्हारे आपत्ति करने के बहुत पहले ही मैंने महात्मा की पदवी छोड़ दी है। ... जो लोग पाकिस्तान के अत्याचार का बदला लेना चाहते हैं, तो सही तरीक़ा यह है कि वे पाकिस्तान जाकर अत्याचार करने वाले से लड़ें। भारत में रहने वाले मुसलमानों से कायरतापूर्ण बदला लेने में कोई बहादुरी नहीं हो सकतीं। उन युवकों के चले जाने के बाद उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, मेरी इच्छा सारे देश में दौरा कर के एक नया आंदोलन छेड़ने की हो रही है। मैं देश के नौजवानों को रचनात्मक कार्य में लगाना चाहता हूं। मैं देश के लिए कुछ न कुछ करने का उत्साह उनमें देख रहा हूं। उस उत्साह को कोई सहारा नहीं मिल रहा है। इससे उसके ग़लत दिशा में जाने का ख़तरा है। लगातार काम करते रहने से गांधीजी के शरीर की ऊर्जा समाप्त हो गई थी। स्नानघर में व चक्कर खा कर गिर गए। पांच मिनट बाद होश आया तो वे बाहर निकले। बाहर में राजाजी और घनश्याम दास बिरला उनका इंतज़ार कर रहे थे। गांधीजी का पीला चेहरा देखकर उन्हें चिंता हुई। उन्होंने गांधीजी को सूचना दी कि प्रयत्नपूर्वक यह समाचार फैलाया जा रहा है कि आपका अपने साथियों के साथ मतभेद हो गया है और कांग्रेस महासमिति में आप कार्यसमिति के निर्णय के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएंगे। गांधीजी ने कहा, विभाजन के बारे में मेरा कार्यसमिति से मतभेद हो सकता है। मैंने मतभेद प्रकट भी किया है। लेकिन मेरा यह भी कहना है कि समिति ने जो निर्णय किया है उसे सभी कांग्रेसियों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए। संविधान के अनुसार कांग्रेस महासमिति ने अपना अधिकार कार्यसमिति को सौंप दिया था, इसलिए वह कार्यसमिति के निश्चय को गंभीर विचार के बिना नहीं ठुकरा सकती।

14 जून को नेहरू ने गांधीजी को कहा, शाम की महासमिति में आपको भाषण देना होगा। गांधीजी ने अपने भाषण में कहा, विभाजन पर कार्यसमिति के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना या उसमें संशोधन करना आप लोगों के लिए अनुचित होगा। सदन को ऐसा करने का अधिकार तो है, परन्तु सदस्यों को याद रखना चाहिए कि कार्यसमिति ने आपके प्रतिनिधि की हैसियत से योजना को स्वीकार किया है। आपका कर्तव्य है कि आप कार्यसमिति का समर्थन करें। नेहरू ने अपने वक्तव्य में कहा, लीगी सदस्यों के भीतर से तोड़-फोर करने और अंग्रेज़ों द्वारा अपने हाथ में नियंत्रण रखने के कारण अंतरिम सरकार देश में फैलती हुई अराजकता का सामना करने में इतना असमर्थ हो गई थी कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने देश के विभाजन की क़ीमत चुका कर भी इस असह्य स्थिति से बचने में सुख माना। पंजाब और बंगाल के विभाजन जो समस्या उपजी है, हमें उसे रोकने के लिए दृढ़ संकल्प होना है। अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे हैं। भारत की क़ानून व्यवस्था में उनकी अब कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। वे अधिक जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं। इन सब परिस्थितियों के कारण हमें लगा कि विभाजन को स्वीकार कर लेना ज़्यादा अच्छा है। पटेल ने नेहरू की बातों का समर्थन करते हुए कहा, हमारे सामने स्पष्ट वास्तविकताएं थीं। हमें यह चुनाव करना था कि भारत का एक ही विभाजन हो या अनेक हों। कांग्रेस के लिए तथ्यों का सामना करना ज़रूरी था। वह भावुकता में नहीं बह सकती थी। महासमिति इसे पसंद करे य न करे, असल में तो पंजाब और बंगाल दोनों में पहले से ही पाकिस्तान मौज़ूद है। ऐसी परिस्थितियों में मैं वास्तविक पाकिस्तान को अधिक पसंद करूंगा, क्योंकि तब उन लोगों को जिम्मेदारी का कुछ ख़्याल रहेगा। 9 घंटों की बहस के अंत में कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने निजी स्पष्टीकरण दिए। मैं पिछले तीस बरसों से गांधीजी के साथ रहा हूं। उनके प्रति मेरी निष्ठा कम नहीं हुई है। यह निष्ठा व्यक्तिगत नहीं, राजनीतिक है। जब मेरा उनसे मतभेद भी हुआ है, तब भी मैंने उन्हें राजनीतिक दृष्टि से अधिक सही माना है। आज भी मुझ लगता है वे और उनकी परम निर्भयता सच्ची है और मेरा रवैया दोषपूर्ण है। तब मैं उनके साथ क्यों नहीं हूं? क्योंकि मुझे लगता है कि सामुदायिक आधार पर समस्याओं का हल करने का अभी उन्हें कोई उपाय नहीं मिला है।  जब उन्होंने हमें अहिंसक असहयोग आंदोलन सिखाया, तब उनके पास एक निश्चित पद्धति थी। हमने उसका अनुसरण किया था। आज वे स्वयं अपना मार्ग खोज रहे हैं। वे नोआखाली में रहे। उनके प्रयत्न से स्थिति में सुधार हुआ। अब वे बिहार में हैं। वहां की स्थिति भी सुधरी है। परन्तु इससे पंजाब की आग नहीं बुझ रही है। वे कहते हैं कि मैं बिहार में सारे भारत के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की समस्या का हल ढूंढ रहा हूं। संभव है, ऐसा हो। परन्तु यह समझना कठिन है कि उसे हल कैसे किया जा रहा है। निश्चित कदम दिखाई नहीं दे रहे, जो हमें वांछित ध्येय तक पहुंचा सके। और फिर हमारे दुर्भाग्य से आज गांधीजी नीतियां तो निर्धारित कर सकते हैं, परन्तु वे कार्यान्वित मुख्यतः दूसरों के द्वारा की जाती हैं। और ये लोग उनकी विचारधारा के मानने वाले नहीं बने हैं। इस दुखद परिस्थिति में ही मैंने भारत के विभाजन का समर्थन किया है। मतगणना के बाद प्रस्ताव के पक्ष में 157 मत पड़े और विपक्ष में 15। विभाजन की स्वीकारता पर मुहर लग गई।

कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण से यह स्पष्ट था कि उन्होंने अहिंसा के असफलता की बात नहीं की थी। उन्होंने यह स्वीकारा था कि केवल बौद्धिक विश्वास पर आधारित अहिंसा अपर्याप्त है। अपनी आंखों के सामने हिंसा के भीषण दृश्यों को बुद्धि की आंख से देखकर वे घबरा उठे थे। गांधीजी ने उसी दृश्य को श्रद्धा की दृष्टि से देखा था। उन्होंने असुरक्षितता में भी सुरक्षितता महसूस की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विभाजन ही कांग्रेस अध्यक्ष को सबसे सुरक्षित मार्ग लगा। बाद के वर्षों में लगभग सभी बड़े नेताओं ने अपनी ग़लती स्वीकार की। 16 अक्तूबर, 1949 को न्यूयॉर्क की एक सभा में नेहरू ने स्वीकार किया, अगर हमें हत्याकांड के रूप  में होने वाले भयंकर परिणामों का ज्ञान होता, तो हम भारत के विभाजन का प्रतिकार करते। मौलाना आज़ाद ने एक वक्तव्य में 2 वर्ष बाद कहा था, उस समय बापू की बात न मान कर हमने बड़ी भूल की। राजेन्द्र प्रसाद ने दुखित हो कर कहा था, काश, हमें यह परिणाम मालूम होता! भारत के सभी बड़े नेताओं के प्रति आचार्य कृपलानी के भी विचार बदल गए थे और उन्हें वे विभाजन का जिम्मेदार मानने लगे थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

सूफ़ीमत ... 5. सूफ़ीमत का उदय-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


5. सूफ़ीमत का उदय-1

वह ईश्वर ऐसा है कि जिसके अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। वह सम्राट अत्यंत पवित्र, सर्व गुण-संपन्न, दोष-रहित, क्षमादानी, पर्यवेक्षक, प्रतिष्ठित, विराट स्वामी, सर्वथा शान्ति प्रदान करने वाला, रक्षक, प्रभावशाली, शक्तिशाली बल पूर्वक आदेश लागू करने वाला, बड़ाई वाला है।। वह उन सभी बातों से पवित्र और पावन है जिसे धर्मभ्रष्ट किया करते हैं। (क़ुरआन : 59/23)

5.1 विद्वानों में मतभेद 

निकोलसन के अनुसार आधुनिक शोध ने यह साबित कर दिया है कि सूफ़ीवाद की उत्पत्ति का पता एक निश्चित कारण से नहीं लगाया जा सकता है। हां यह तय है कि सूफ़ीमत का उद्भव तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक वातावरण की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव के संबंध में विद्वानों में बहुत मतभेद है। डॉ. यूसुफ हुसैन के अनुसार सूफ़ीवाद की उत्पत्ति इस्लाम धर्म से हुई है। मूल रूप से, सूफ़ीवाद इस्लाम में निहित है, जो इसका स्रोत और मूल है। सूफ़ीवाद का मूल स्रोत क़ुरआन और मुहम्मद साहब सल्ल. का जीवन है। क़ुरआन की मक्की सुरा में भक्ति भावना हैं और उनमें से एक में अल्लाह के नाम के लिए अल वदूद शब्द आया है जिसका अर्थ है मुहब्बत करने वाला, जो प्यार के रिश्ते का सुझाव देते हैं। सूफ़ियों की कई आध्यात्मिक शब्दावली क़ुरआन से ली गई है, जैसे भगवान की पवित्रता के लिए आग जैसे भावों में, 'पक्षी' के रूप में मानव आत्मा के पुनरुत्थान या अमरता का प्रतीक, मनुष्य के भाग्य और व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक के रूप में 'पेड़', या अभिवादन, शराब और प्याले की आकर्षक कल्पना जिसका सूफ़ी आदेशों में दीक्षा के लिए उपयोग किया जाता है। क़ुरआन से सूफ़ीवाद में कई  सूफ़ी क्रियाएं और सूफ़ी अवधारणाएं ली गयी हैं, जैसे मानव क्रिया की दैवीय प्रेरणा, दैवीय न्याय (अदल) की अवधारणा, संतोष (रिदा), अहवाल (रूहानी अनुभूति, अध्यात्म की मनःस्थितियां), अहदियत (ईश्वरीय एकता), तौबा (प्रायश्चित, अनुताप, अपने पाप पर लज्जित होना फिर उसे न करने का संकल्प लेना), अक़ल (बुद्धि) और क़ल्ब (दिमाग, हृदय) के बीच अंतर के बारे में, आरिफ़ (ज्ञानी) और मोमिन (ईमानवाला, आस्तिक) का अंतर आदि। सूफ़ी अभ्यास धिकर (दरवेशों की एक सभा जिसमें परमानंद की स्थिति उत्पन्न करने के लिए भगवान के नाम वाले एक वाक्यांश का लयबद्ध रूप से उच्चारण किया जाता है), किरा (क़ुरआन का शुद्ध उच्चारण) से व्युत्पन्न है। भारतीय सूफ़ी परंपरा ने गुप्त जप (ज़िक्र-ए-खफ़ी) को पैगंबर के साथियों के अभ्यास के रूप में माना। बुलंद आवाज़ में नाम लेना ज़िक्र ए जाली या जहरी’ कहलाता है।

इस्लाम की मान्यता है कि ईश्वर ही एकमात्र शासक है और उसका कोई भागीदार नहीं है। समस्त ब्रह्मांड पर उसी का राज है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ उसके रसूल हैं, जो उसके आदेशों को क्रियान्वित करते हैं। यहां तक तो सब ठीक है, किंतु इस्लाम धर्म के बीच एक विशिष्ट विद्या या धारा के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत के उदय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। आइये इन मतों को देखें:

डॉ. युसुफ़ हुसैन के अनुसार सूफ़ीमत का उदय इस्लाम के मध्य ही हुआ, और इस पर विदेशी धारणाओं और प्रथाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव यह मत स्वीकार न करते हुए कहते हैं कि सूफ़ीमत पर हिंदू सोच, मान्यताओं और प्रथाओं का गहरा असर है। उनका यह भी मानना है कि सूफ़ीमत में मौज़ूद आत्मा और परमात्मा के संबंध, ईश्वर के प्रति प्रेम, अहिंसा, शांति-प्रियता, उपवास, त्याग, आदि प्रथाएं हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से मिलती-जुलती हैं। निकोल्सन के अनुसार सूफ़ीमत के आविर्भाव में यूनानी प्रभाव का प्रमुख स्थान है। हालाकि प्रो. के.ए. निज़ामी मानते हैं कि सूफ़ियों के चिश्ती संप्रदाय ने भारत में इसके विकास के प्रारंभिक दौर में हिन्दुओं की कई प्रथाओं को अपनाया था, जैसे शेख़ के सामने झुकना, आगन्तुकों को पानी देना, सिर मुंड़वाना आदि, लेकिन सूफ़ीमत के आविर्भाव पर अन्य धर्मों के प्रभावों को अस्वीकार करते हुए उनका स्पष्ट मानना है कि सूफ़ीमत का मूल स्रोत क़ुरआन तथा पैगम्बर की जीवनी है। एडलबर्ट मार्क्स के अनुसार सूफ़ीमत का आविर्भाव यूनानी दर्शन से हुआ है। ब्राउन के अनुसार इस प्रभाव के कारण इस्लाम के संन्यासी जीवन में रहस्यवादी प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ। ब्राउन ने सूफ़ीमत पर बौद्ध तथा जैन धर्म के प्रभाव को भी स्वीकार किया है। सूफ़ीमत संबंधी शांति तथा अहिंसा पूर्णरूप से जैन तथा बौद्ध धर्म से संबंधित है। अनेक बौद्ध भिक्षु धर्म के प्रचार के लिये पश्चिम एशिया के देशों में गये अतसूफ़ी साधकों के ऊपर प्रभाव पड़ना स्वभाविक था। सूफ़ीमत पर ईसाई धर्म का भी प्रभाव पड़ा। ईसाई विचारधारा से प्रभावित होकर सूफ़ी साधक को व्यक्तिगत स्वार्थ में कोई रुचि नहीं थी। उनके हृदय में मानव सेवा का भाव ईसाई धर्म के प्रभाव की ही देन है। ईश्वर पर पूर्ण रूप से आश्रितभौतिक पदार्थों के प्रति अरुचि भी ईसाई धर्म के प्रभाव के कारण ही है। अबू अब्दुल्ला अल मुहासिबी नामक सूफ़ी सन्त ने अपने संदेश में बाइबिल के कुछ विषयों का उल्लेख किया है। सूफ़ियों की यौगिक क्रियाओं में हिन्दू संन्यासियों के क्रियाकलापों को ढूँढा जा सकता है।

राईट्स का मत है कि सूफ़ियों में भावाविष्टावस्था को उत्पन्न करने वाली कुछ क्रियाएं तथा प्राणायाम जैसी विधियाँ हिन्दू धर्म की ही देन हैं। अधिकांश विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि सूफ़ी मत के विकास में भारतीय विचारधारा का प्रभाव पड़ा है। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, "सूफ़ी साधकों का चिल्ला-ए-माकुस अर्थात् शरीर को यातना देनाखानक़ाह के प्रधान के समक्ष नतमस्तक होनानवागन्तुकों को जल देनासिर मुंडानासंकीर्तन का आयोजन आदि बातें पूर्ण रूप से हिन्दू प्रमाणों को स्पष्ट करती हैं।" डॉ. चौबे तथा श्रीवास्तव के कथनानुसार, "इस प्रकार सूफ़ी धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों की श्रेणी में ही नहीं हैबल्कि अनेक धर्मों के प्रभावों की उपज है।"

डॉ. ताराचन्द के अनुसार सूफ़ीमत एक ऐसा स्रोत है जिसमें अनेक देश की नदियों का समावेश है। क़ुरआन तथा पैगम्बर मुहम्मद का जीवन इसके मुख्य स्रोत हैं। ईसाई धर्म तथा नव अफलातून दर्शन के प्रभाव से इसका विकास हुआ। हिन्दू तथा बौद्ध सिद्धान्तों तथा नास्तिकों ने इसे अधिक प्रभावित किया। अतः हम निःसन्देह कह सकते हैं कि सूफ़ी मत के आविर्भाव में इस्लामईसाईबौद्धजैननास्तिक मतवेदान्त तथा हिन्दू आदि धर्मों का योगदान है। परन्तु यह प्रभाव नकल के रूप में नहीं रहा। बल्कि सूफ़ी साधकों एवं चिन्तकों ने उन बाहरी विचारधाराओं को अपने ढंग से अपनाया तथा सूफ़ीमत का विकास इस्लाम धर्म के अनुसार ही हुआ है।

इन विचारधाराओं को ध्यान में रखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आध्यात्मिक इस्लामी पुनरुत्थान आन्दोलन के रूप में प्रचलित सूफ़ीमत का बीजारोपण मुसलिम मानस में हुआ और वह वाह्य आडंबरों के विरुद्ध एक प्रचंड टंकार थी। जाफ़र रज़ा ने ठीक ही कहा है कि इस्लाम ने टुकड़ों में बंटी अरब-राष्ट्रीयता को मिटाकर व्यापक आध्यात्मिकता का विकास किया था। आरंभ में सूफ़ियों का कोई सम्प्रदाय नहीं था। इस्लाम के शुरू के दिनों (609-661 ई.) में ईश्वर से निकटता की वृत्ति मुसलमानों में जग चुकी थी। अरब में रहने वाले धर्मनिष्ठ और पवित्र व्यक्तियों के इस वर्ग ने स्वेच्छा से सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग किया और सादी वेशभूषा एवं सदाचार से अपनी अलग पहचान स्थापित की। हालाकि इसका नाम उस युग में सूफ़ीवाद तो नहीं ही था, फिर-भी प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा सय्यद अलहजवेरी ‘रहमतुल्लाह अलैह’ का मानना था कि उस युग में भले ही उसका कोई नाम नहीं था, लेकिन तथ्य के रूप में सूफ़ीवाद अस्तित्व में आ चुका था। हज़रत जामी का कहना है कि सूफ़ी शब्द का सबसे पहला प्रयोग सन् 800 से पहले हज़रत अबू हाशिम के लिए हुआ था।

5.2 तत्कालीन अरब समाज और इस्लाम का जन्म

सूफ़ीमत के उदय और विकास को जानने-समझने के लिए उस समय के अरब देशों के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को समझना बहुत ज़रूरी है। अरब प्रायद्वीप एशिया एवं अफ्रीका की संधि पर है। यह मुख्यतः रेगिस्तान है। प्रायद्वीप के तट, पश्चिम छोर पर लाल सागर एवं अकाबा की खाडी़, दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर (हिंद महासागर का भाग), उत्तर-पश्चिम में ओमान की खाडी़ एवं हॉर्मज़ जलडमरुमध्य तथा फारस की खाडी़ हैं। अरबी प्रायद्वीप में सबसे पहली मानवीय संस्कृति 2500 ईसा पूर्व के आसपास की उम्म अन-नार संस्कृति थी जो उत्तरी संयुक्त अरब अमीरात और ओमान के इलाक़े में लगभग 500 सालों तक चली।  इसके बाद यहाँ कई राज्य उभरे।  अरब प्रायद्वीप काफी हद तक शुष्क और ज्वालामुखीय था।

इस्लाम का जन्म अरब में हुआ, और भी सटीक कहा जाए तो मक्का में। ‘अल-रब अल ख़ाली’ नाम से प्रसिद्ध अरब के विशाल रेगिस्तान में मक्का एक मुख्य शहर था। अरब में दो भिन्न संस्कृति के लोग पाए जाते हैं। इस भिन्नता का मुख्य कारण भौगोलिक है। उत्तर और दक्षिण अरब के बीच एक विशाल मरुभूमि है। उत्तरी अरब का यह रेगिस्तान बेहद निर्मम था यहां की ज़िन्दगी कठोरताओं से भरी थी। इलाक़ा एक तरफ से समुद्र से घिरा था। इस रेगिस्तान में बद्दू नाम का एक घुमक्कड़ (खानाबदोश) क़बीला रहता था। यह क्षेत्र कृषि उत्पादन से पूरी तरह अज्ञात था। यहाँ कोई स्थाई चरागाहें भी नहीं थीं, बारिश भी बहुत कम होती थी। पारंपरिक रूप से ऊंट, भेड़ और बकरियां पालना इनका मुख्य पेशा था। अपने ऊंटों के लिए वे नए-नए चारागाह की खोज में घूमते रहते थे। कठिन से कठिन परिस्थितियों से जूझना और घोर कष्टों को सहना उनकी आदतों में शुमार था। घोर अनुशासन और सत्ता के प्रति आदर रखना उनका गुण था। वे बेहद सादी ज़िन्दगी बिताते थे, एक कमरबंद वाला लंबा वस्त्र पहनते थे जिसे सौब कहा जाता था। वदन के ऊपरी भाग में वे एक ढीला-ढाला वस्त्र अबा पहनते थे। सर एक शाल कूफ़िया से ढंका रहता था जो एक डोरी इक़ल से बंधी रहती थी। उनका भोजन भी सादा होता था, जिसमें खजूर और आटे की बनी कोई चीज़ या भुनी मकई की बाली शामिल होती थी। इसे वे पानी, ऊँट या बकरी के दूध के साथ खा लिया करते थे। वे अपनी बकरियों और ऊंटों के साथ किसी नए चारागाह की तलाश में या दुश्मनों से रक्षा के लिए लगातार चलते रहा करते थे। वे दुश्मन क़बीले के ऊपर छापे (गज्बा) भी मारा करते थे।

क़बीले की संरचना उसके गण्यमान्य व्यक्तियों द्वारा संचालित एक लोकतंत्रात्मक संस्था थी जो कुलीन वंश के उत्तम चरित्र वाले लोग होते थे। क़बीले की रक्षा करना उनका प्रमुख धर्म होता था। बद्दुओं का कोई मज़हब नहीं था। वे किसी देवी-देवता की पूजा-प्रार्थना नहीं करते थे। वे क़िस्मत को मानते थे और क़बीलाई सामूहिकता का पालन करते थे। एक क़बीलाई समाज में व्यक्तिवाद का कोई मूल्य नहीं होता और सामूहिकता का राज होता है। अभी तक इन समाजों में व्यक्तिगत संपत्ति का जन्म नहीं हुआ था। उनकी अपनी नैतिकता और मूल्य थे। उनका मज़हब मानववाद था। वे जीवन का अर्थ मनुष्य के उत्कृष्ट गुणों को व्यक्त करना मानते थे। बद्दुओं की दरियादिली भी काफी मशहूर थी। असग़र अली इंजीनियर अपनी पुस्तक इस्लाम का जन्म और विकास में लिखते हैं, औद्योगिक समाज की तरह घुमक्कड़ समाज भी अपनी ख़ुद की संस्थाओं, आदतों और संस्कृति का विकास करता है। बद्दू सख़्त लोग होते हैं, जूझने और सहने की क्षमता उन का प्रमुख गुण है, जब कि अनुशासन तथा सत्ता के प्रति आदर-भाव का अभाव उनका प्रमुख दुर्गुण है।

अरबों की एक भारी संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। और इस तरह मक्का में धीरे – धीरे व्यक्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होने लगी थी। क़बीलाई एकजुटता का महत्व कम हो रहा था। समय के साथ-साथ उनकी दरियादिली का रिवाज़ मक्का में कमज़ोर पड़ने लगा बद्दुओं के बीच कबीलाई समाज का घुमक्कड़ी रस्मो-रिवाज़ व्याप्त था, जबकि मक्का में व्यापारिक समाज का रस्मो-रिवाज़ बद्दू अपनी जीवन शैली को बेहद मामूली ज़रूरतों तक केन्द्रीत रखते थे जबकि मक्का जैसे शहरों के रहने वालों का सरोकार उनके हालात और रस्मो-रिवाज़ की सहूलतों और खुशियों से था

उस समय दक्षिणी अरब प्राचीन सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था दक्षिणी अरब के निवासी धनी और समृद्धिशाली थे वे कुशल व्यापारी और धर्म में आस्था रखने वाले थे मक्का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र था और मूर्तिपूजक अरबों का एक धार्मिक केंद्र भी। अरबों की एक भारी संख्या व्यापार और अपने देवी-देवताओं की पूजा के लिए भी मक्का आती रहती थी। वे सोना, मसाले और बहुमूल्य पत्थरों का व्यवसाय करते थे इस्लाम के आविर्भाव के पहले दक्षिणी अरब या तो अवीसिनिया या फारस (ईरान) के बादशाहों के अधीन रहा पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. नगरवासी थे रेगिस्तान की आज़ाद ज़िन्दगी के आदी ये बद्दू पैग़म्बर के द्वारा दिए गए अनुशासन को मानने को राज़ी नहीं हुए थे दक्षिणी अरब की सभ्यता कृषि पर आधारित थी और सामंतवाद का नामो-निशान नहीं था मदीना एक बड़ा समृद्ध कृषि व्यवसाय से जुडा शहर था जबकि मक्का कई आसपास के जनजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय केंद्र था। उत्तर के अरबियों को रेगिस्तानी स्थितियों में अस्तित्व के लिए सदैव संघर्षरत रहना पड़ता था कठोर पर्यावरण और कष्ट पूर्ण जीवनशैली इन जनजातियों को जुझारू बनाए रखता था। सामाजिक एकजुटता का एक महत्वपूर्ण स्रोत था जनजातीय संबंध। वे लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा करते थे और अपने क़बीले के लिए पानी और चरागाह मांगते थे बाद में उन्होंने व्यापार और कृषि पर भी ध्यान केंद्रित किया। नए संपत्ति-सम्बन्धों के विकास के साथ वंश, छोटी पारिवारिक इकाइयों में टूट रहे थे अर्थात अब किसी की सम्पति में उन के बच्चों को छोड़ घनिष्ठ सम्बन्धियों का कोई भाग नहीं होता था जब कि एक क़बीलाई समाज में संपत्ति का स्वामित्व सामूहिक होता था। इस नए आर्थिक सम्बन्धों से समाज में एक असंतोष और तनाव पैदा हो रहा था।

दक्षिण अरब वासी अनेक देवी देवताओं की पूजा किया करते थे अस्तर के रूप में शुक्र गृह की और अलमका के रूप में चंद्रदेव की पूजा की जाती थी शम्स देवी के रूप में सूरज की पूजा करते थे मंदिर पत्थर के बने होते थे मक्का में काबा मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवताओं की 360 मूर्तियां थीं। दक्षिणी अरब और यमन प्राचीन काल से अपने धन-दौलत की प्रचुरता के लिए मशहूर रहा है मक्का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का एक केंद्र था मूर्तिपूजक अरबों के लिए यह एक धार्मिक केंद्र भी था इस तरह यह भारी आमदनी का एक स्रोत था यह इलाक़ा बेहद उपजाऊ था इसका मुख्य कारण मआरिब का बाँध था इस्लाम के उदय के पहले यह बाँध किसी काम का नहीं रह गया था इससे फलों की पैदावार पर भारी असर पड़ा बैजन्तीनी और फारसी साम्राज्यों के बीच आए दिन होने वाले टकरावों के कारण व्यापारिक मार्ग पर अवरोध उत्पन्न होने लगे थे राजनीतिक दुश्मनियों का दौर बढ़ा और अराजकता फैलने लगी हाँ, दक्षिणी अरब से उत्तर अरब की ओर जाने वाले मसाला मार्ग पर मक्का का उदय ज़रूर हुआ इस नगर में रहने वाले लोग मूलतः बद्दू नस्ल के थे मंगोलों की तरह ही बद्दू भी हमले करते रहते थे

छठी शताब्दी का दूसरा भाग अरब में राजनीतिक विकार की अवधि थी और संचार मार्ग अब सुरक्षित नहीं थे। तत्कालीन अरब समाज में आतंक व्याप्त था। लूटपाट, चोरी-डकैती, हत्या, स्त्रियों का अपहरण बड़ा आम था। धार्मिक विभाजन संकट का एक महत्वपूर्ण कारण था। यहूदी धर्म यमन में प्रमुख धर्म बन गया, जबकि ईसाई धर्म ने फारस खाड़ी क्षेत्र में जड़ जमा ली थी। इस क्षेत्र में बहुसंख्यक संप्रदायों में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति दिलचस्पी में कमी होती जा रही थी। इतिहास गवाह है कि धर्म तभी और वहीं प्रकट होता है, जब और जहां उसकी ज़रूरत होती है। अरबी देशों की तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक अवस्था इस्लाम के उदय और तेज़ी से विकसित होने का कारण बनी। अरब में उस समय अय्याश लोगों का बोलबाला था, भोगवादियों का ज़माना था। जुआ, शराबखोरी, वेश्यागमन आम बात थी। विधवा, अनाथ और कमज़ोर लोगों को बहुत सी मुश्किलों का समाना करना पड़ रहा था। शादी जैसी संस्था का क्षरण हो रहा था। स्त्रियों का समाज में न आदर था और न ही अधिकार या जायदाद में कोई हिस्सा। अंधविश्वास, कुरीतियां और दुराचार ने सारे अरब पर अपना अधिकार जमाया हुआ था। विलासिता और भोगाचार अपनी हदें पार कर रहा था। शराब की महफ़िलों में गाने-बजाने के लिए महिलाएं होती थीं, जिनको क़ीनात कहा जाता था। शराब में डूबे लोगों को महिलाएं सुलभ थीं। अरब क़बीलों के जीवन में युद्ध, लूटमार, वध कर देना, आम बात थी। अरब के बाहर भी, रोमन साम्राज्य और ईरान में स्थिति बेहाल थी। इन दोनों साम्राज्य के बीच लड़ाइयां चलती रहती थीं, जिससे लोगों का बहुत ही बुरा हाल था। जो तत्कालीन धर्म थे, वे भी राजाओं के सहायक बन गए थे। उस समय अरब लोग घोर मूर्ति-पूजक थे। जाफ़र रज़ा ने अपनी पुस्तक इस्लाम के धार्मिक अयाम में बताया है मूर्तिपूजा का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ कि अरब जन व्यापार के संबंध में अन्य देशों में भी जाते थे तो काबा का कोई पत्थर महानता और पवित्रता के प्रतीक के रूप में अपने साथ ले जाते थे। जहां रहते उस पत्थर के चारों ओर परिक्रमा करते, मानो काबा का तवाफ़ कर रहे हैं। फिर स्थिति यह हुई कि जहां सुंदर पत्थर देखते, उसकी पूजा करने लगते। एक व्यक्ति उमरू-बिन-लही व्यापार के संबंध में एक बार सीरिया गया। वहां उसने मूर्ति पूजा देखी। लोगों ने उसे बताया कि यह मूर्ति अत्यंत सहायक होती हैं। उन्हीं से मांगकर एक मूर्ति मक्का लाया। इस मूर्ति को उसने काबा में स्थापित कर दिया। यही वह मूर्ति थी, जिसे हुबल कहा जाता है।

अरब के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी प्रान्तों के विपरीत मरुभूमि वाले हिस्से में रहने वाले अरब अपने आप में मस्त थे। वे स्वतंत्र थे और उन्हें इस बात की बिलकुल ही चिंता नहीं थी कि बाहर क्या चल रहा है। वे निश्चिंतता के साथ घुमक्कड़ी जीवन बिता रहे थे। उनके आपस की प्रतिस्पर्धा, लूट-मार चलते रहते थे। इस पृष्ठभूमि में मक्का में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का जन्म होता है। मुहम्मद साहब के जीवन के प्रारंभिक वर्षों के दौरान, कुरैशी जनजाति पश्चिमी अरब में एक प्रमुख शक्ति बन गई थी। हज़रत मुहम्मद साहब के जन्म के क़रीब सौ वर्ष पहले से ही काबा क़ुरैशियों के संरक्षण में था। मक्का भी उन्हीं के अधीन था।

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मनोज कुमार

 

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