सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
5. सूफ़ीमत का उदय-8
5.12 (ज) मरने के बाद आदमी का जीवन
क़ुरआन का
विश्वास है कि इस पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म पहला और आख़िरी है। क़ुरआन के अनुसार, सांसारिक जीवन
केवल एक परीक्षा है। मरने के बाद आदमी का जीवन खतम नहीं हो जाता। जब उसके पार्थिव
शरीर को क़ब्र में डाल दिया जाता है तो वहां से उसका दूसरा जीवन शुरू होता है। इसे “बरज़ख़” (दो वस्तुओं के
बीच खड़ी होने वाली बाधा या वस्तु, अन्तराल, किसी के मरने और क़यामत के बीच का समय
यानी इस दुनिया और परलोक के बीच की एक मध्यवर्ती अवस्था) कहते हैं। यह माना जाता
है कि इस पार्थिव जीवन के बाद एक और जीवन आएगा, जिसकी शुरुआत क़यामत से होगी (आख़िरत/ स्थायी जीवन)। शारीरिक
मृत्यु के बाद भी आत्मा का अंत नहीं होता, बल्कि मनुष्य एक
नए और शाश्वत जीवन (आख़िरत) में प्रवेश करता है। आख़िरत एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ 'परलोक' या 'मृत्यु के बाद
का जीवन' है। इस्लामी मान्यता के अनुसार, यह इस नश्वर संसार (दुनिया) के समाप्त होने के बाद का
शाश्वत जीवन है।
बरज़ख (कब्र का जीवन)
इस दुनिया और परलोक के बीच की एक मध्यवर्ती अवस्था है। कुरआन (23:100) सूरह
अल-मुअमिनून (The Believers) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयत है। इसमें मृत्यु के समय की स्थिति और पश्चाताप
का वर्णन किया गया है। इस आयत का मुख्य संदेश यह है: "ताकि मैं उन
अच्छे काम को करूँ जिन्हें मैं पीछे छोड़ आया हूँ। हरगिज़ नहीं! यह महज़ एक बात है
जो वह कह रहा है। और उनके पीछे एक आड़ (बर्ज़ख़) है, उस दिन तक जब वे
उठाए जाएंगे।" दफ़नाए जाने के बाद, दो फ़रिश्ते (मुनकर और नकीर) आकर मृतक से
उनके ईश्वर, धर्म और पैगंबर के बारे में सवाल करते हैं। वे तीन बुनियादी सवाल पूछते हैं : तुम्हारा
रब (ईश्वर) कौन है? तुम्हारा दीन
(धर्म) क्या है? हज़रत मुहम्मद
(सल्ल.) के बारे में तुम क्या कहते हो? नेक और
ईमानदार लोगों के लिए इन सवालों का जवाब देना आसान होता है, जिसके बाद उनकी कब्र जन्नत का हिस्सा बन जाती है। इसके विपरीत, नास्तिक या बुरे लोगों के लिए यह परीक्षा बहुत कठिन होती है और उन्हें सज़ा
मिलती है। अच्छे कर्म करने वालों को शांति मिलती है, जबकि पापियों को
उनके कर्मों का स्वाद (सज़ा) इसी अवस्था में मिलना शुरू हो जाता है। क़यामत
(पुनरुत्थान) एक निश्चित दिन, ईश्वर के आदेश से दुनिया समाप्त हो जाएगी और सभी मृत
लोगों को उनके शरीरों के साथ पुनर्जीवित (दोबारा उठाया) किया जाएगा।
आख़िरत में हर
इंसान को अपने इस दुनिया में किए गए अच्छे और बुरे (नेकी और बदी) कर्मों का हिसाब
(फैसला) देना होता है। क़यामत जब आएगी तब इस सृष्टि का अंत हो जाएगा। तब तक जीवन
क़ब्र में पड़ा रहेगा। मनुष्य की मृत्यु केवल उसके शरीर की मृत्यु है, उसकी आत्मा
क़ब्र में जीवित पड़ी रहेगी। क़यामत के दिन इसी आत्मा को ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत
होना पडेगा। क़ब्र में देह गल जाती है, मगर हड्डी का ढांचा बचा रहता है जिसे अल-अज्ब
कहते हैं। कर्मों के आधार पर ही व्यक्ति को स्वर्ग (जन्नत) या नर्क (दोज़ख/जहन्नुम)
में स्थान मिलता है। जब आत्मा ईश्वर के समक्ष खड़ी होगी, तब मुहम्मद उसके प्रवक्ता
होंगे। जिबरील द्वारा रूह के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा किया जाएगा और उसी आधार पर
उसे स्वर्ग या नर्क नसीब होगा। क़यामत के
बाद आदमी को स्वर्ग मिलेगा या नरक, इसका निर्धारण इस जन्म में किए गए उसके कर्मों
से तय होगा। क़ुरआन के अनुसार मनुष्य के जीवन का लक्ष्य आध्यात्मिकता की प्राप्ति
और “लका-उल्लाह” (ईश्वर-मिलन)
है। इस्लाम में, आख़िरत पर विश्वास रखना (ईमान का हिस्सा) अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह
लोगों को इस जीवन में सदाचारी और नैतिक बने रहने की प्रेरणा देता है।
5.13
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद की मृत्यु
मदीना से ही इस्लाम को एक धार्मिक सम्प्रदाय माना गया। पैगम्बर साहब के उपदेश
बड़े सहज, सरल और सुलभ थे इसलिए लोगों ने बड़े उत्साह के साथ उसे अपनाया। उन्होंने कहा
कि जो इस्लाम में दीक्षित हो जाता है वह आदमी-आदमी के बीच कोई भेद नहीं मानेगा। इस
बराबरी के सिद्धांत के कारण इस्लाम आम लोगों में काफ़ी लोकप्रिय हुआ। जो लोग पीड़ित,
निचले स्तर के थे, उनके बीच यह धर्म तेज़ी से फैला। अगले कुछ वर्षों में कई
प्रबुद्ध लोग पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के अनुयायी बने। उनके अनुयायियों के प्रभाव
में आकर भी कई लोग मुसलमान बने। मदीना में, मुहम्मद साहब ने
मदीना के संविधान के तहत जनजातियों को एकजुट किया। मदीने की अवस्था
में कुछ सुधार लाने के बाद उनकी दृष्टि मक्का की ओर गयी। काबा इस्लाम का
वास्तविक केंद्र था। इसे ईश्वर के आदेश से हज़रत इब्राहीम अलैहि. और उनके पुत्र
हज़रत इस्माइल अलैहि. ने बनवाया था। मुसलमानों को मक्का से निकले छह वर्ष हो चुके
थे। उनकी बहुत इच्छा थी कि काबा का हज करें।
मदीना हिजरत के बाद मक्का के मुश्रिकों ने मस्जिदे हराम
(काबा) पर अधिकार कर लिया। उन्होंने मुसलमानों को हज्ज तथा उमरा करने से रोक दिया।
हिजरत को कई साल बीत गए। पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीना ही में
रहते रहे। मुसलमानों के साथ अपना काम करते रहे। लोगों को इस्लाम की तरफ़ बुलाते
रहे। अब तक मुसलमानों और काफिरों के बीच तीन युद्ध हो चुके थे। मार्च 627 में नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह सपना देखा कि वे मस्जिदे हराम में प्रवेश कर गये
हैं। इसलिये उन्होंने उमरे का ऐलान (उमराह में मुख्य रूप से मक्का पहुंचकर पवित्र
काबा की परिक्रमा (तवाफ) करना होता है) कर दिया और अपने चौदह सौ साथियों के साथ
मक्का की ओर चल दिये। मक्का मुहाजिर मुसलमानों का प्यारा वतन था। वहाँ से वे
ज़बरदस्ती हटाए गए थे।
मदीना से 6 मील जा कर जुल हुलैफ़ा में उन्होंने एहराम बाँधा। वे
मक्का से 22 कि.मी. दूर हुदैबिया तक पहुँच गये तो उस्मान
(रज़ियल्लाहु अन्ह) को मक्का भेजा लोगों को यह बताने के लिए के वे उमरा के लिये
आये हैं। मक्का वासियों ने उनका आदर किया। किन्तु इस के लिये तैयार नहीं हुये कि
नबी अपने साथियों के साथ मक्का में प्रवेश करें। इस विवाद के कारण उस्मान
(रज़ियल्लाहु अन्हु) की वापसी में कुछ देर हो गई। उनके वापस न लौटने पर अफवाह फैल
गई कि उन्हें शहीद कर दिया गया है। जिससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि अब बलपूर्वक ही
मक्का में प्रवेश करना पड़ेगा। और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों
से जिहाद के लिये बैअत (वचन) ली कि वे उस्मान के खून का बदला लेंगे और युद्ध के
मैदान से पीठ नहीं मोड़ेंगे। इस ऐतिहासिक वचन (6 हिजरी / 628 ईस्वी) को
(बैअत-ए-रिज़वान/प्रसन्नता की शपथ) के नाम से याद किया जाता है। जब मक्का वासियों
को इस की सूचना मिली तो वह संधि के लिये तैयार हो गये। और संधि के लिये कुछ
प्रतिनिधि भेजे और संधि हुई कि इस साल नबी काबा का तवाफ़ किए बिना ही लौट जाएँ।
अगले साल आएँ और सिर्फ़ तीन दिन रहकर चले जाएँ। तलवार के अलावा कोई हथियार साथ न
हो और तलवार भी म्यान में हो। इस संधि से उन्हें दो बड़े लाभ प्राप्त हुए। एक मस्जिदे
हराम में प्रवेश की राह खुल गई और दूसरा इस्लाम और मुसलमानों पर आक्रमण की स्थिति
समाप्त हो गई। जिससे इस्लाम के प्रचार-प्रसार की बाधा दूर हो गई। इस्लाम तेजी से
फैलने लगा। हुदैबिया में मुशरिकों से समझौता करने के बाद मुसलमान मदीना लौट आए। अगले
साल मुसलमान मक्का गए। वहाँ तीन दिन ठहरे। तवाफ़ और ज़ियारत की। फिर मदीना लौट आए।
क़ुरैश ने भी अपना वादा निभाया और मुसलमानों से कोई छेड़-छाड़ न की।
अब इस्लामी आन्दोलन उस काल में प्रवेश कर चुका था कि केवल अपनी
सुरक्षा के लिए युद्ध की नीति से बाहर आकर यदि ज़रुरत पड़े तो आगे बढकर खतरे को दूर
करने के लिए युद्ध किया जाए की नीति अपना ली गयी। उस समय खैबर इस्लामी आन्दोलन के
विरोध का सबसे बड़ा केंद्र था। खैबर के यहूदियों के द्वारा आक्रमण की आशंका थी।
उनके उपद्रव को रोकने के लिए खैबर पर आक्रमण किया गया और मुसलमानों की विजय हुई।
हिजरत के आठ वर्षों के अंतराल में कई युद्धों के बाद, मक्का वासियों के
संधि भंग कर देने के कारण मुहम्मद साहब सल्ल. ने 10,000 मुसलमानों की एक सेना
इकट्ठी की और मक्का शहर की ओर दिसंबर 628 को प्रस्थान किया। बिना युद्ध किए मक्का नगर ने उनकी
अधीनता स्वीकार कर ली। हालाकि पैग़म्बर को नबी होने के बाद काफ़ी प्रताड़ना और दुख
झेलने पड़े थे, लेकिन उन्होंने मक्का विजय के बाद सब को क्षमा कर दिया। करते भी
क्यों न – उन्हें तो क़ुरआन ने “रहमत-उल-लिल-आलमीन” (समस्त विश्व के लिए दयानिधान) कहा
है। इस माफ़ी की घटना के बाद मक्का के सभी लोग तथा आस-पास के कबीले इस्लाम में परिवर्तित
हुए। दो साल के अन्दर पूरे अरब ने उन्हें अपना सरदार मान लिया। इस प्रकार
धीरे धीरे उनके (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) युग ही में सारे अरब, मुसलमान हो गये।
जनवरी 632 में
यह घोषणा की गई कि हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. हज के लिए जा रहे हैं। वे मदीना से
प्रस्थान किए और फरवरी 631 की सुबह मक्का पहुँच गए। इस हज को हिज्जतुल-वदा (विदाई
तीर्थयात्रा 10 हिजरी 632 ईस्वी) कहते हैं। इसमें लगभग एक लाख
बीस हजार से अधिक मुसलमानों ने भाग लिया था। यह हज उनका आख़िरी हज था। उन्होंने काबा की
परिक्रमा की, मुक़ाम-ए-इब्राहिम पर दो रक़ात नमाज़ पढी, सुफ़ा की पहाड़ी पर
गए, वहाँ से मरवा आए, मिना में ठहरे और मिना में नमाज़ पढ़कर अराफ़ात
पहुंचे। वहाँ पर उन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया। अपने प्रसिद्ध विदाई भाषण (Khutbatul Wada) में उन्होंने मानव अधिकारों, सामाजिक समानता और
महिलाओं के अधिकारों पर जोर दिया था। क़ुरआन 5:3 (सूरह अल-माइदा, आयत 3) आयत का यह हिस्सा
बहुत प्रसिद्ध है: "आज मैंने तुम्हारे
लिए तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया और तुम पर अपना उपकार पूरा कर दिया और
तुम्हारे लिए इस्लाम को धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया।" यह आयत पैगंबर
मुहम्मद के अंतिम हज (विदाई हज) के दौरान अवतरित हुई थी। मदीना लौटते समय, 'ग़दीर खुम्म' नामक स्थान पर
उन्होंने हज़रत अली को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
विदाई तीर्थयात्रा
(अंतिम हज्ज) से लौटने के कुछ महीने बाद, वह बीमार पड़ गए
और 8 जून 632 ई. (12 रबी अल-अव्वल, 11 हिजरी) को 63 वर्ष की आयु में वह इस दुनिया से विदा
हो गए। उनकी मदीना में मृत्यु हुई। अपनी
पत्नी हज़रत आयशा के कक्ष में अस्वस्थ थे, वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। कहा
जाता है कि मुहम्मद साहब ने सातवें आसमान की यात्रा इसी शरीर से की। इसे मेराज कहते हैं। शब-ए-मेराज पैगंबर मुहम्मद सल्ल.
की उस अलौकिक रात्रि यात्रा को कहा जाता है जिसमें उन्होंने आसमान की यात्रा की और
अल्लाह से सीधे संवाद किया। उर्दू/अरबी में 'मेराज' का शाब्दिक अर्थ 'सीढ़ी' या 'ऊंचाई/बुलंदी' होता है। यह भी कहा जाता है कि आसमानी
यात्रा से पहले उन्हें काबा की मस्जिद
अल-हरम से यरूशलम की मस्जिद-ए-अक्सा लाया गया था। इसे इसरा कहा जाता है। यही कारण है कि मक्का और मदीना के बाद
मुसलमान यरूशलम को पवित्र मानते हैं। मस्जिद-ए-अक्सा से जिब्रील
अलैहिस्सलाम पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सातों आसमानों पर ले गए। हर आसमान
पर अलग-अलग पैगंबरों से मुलाकात हुई। सातवें आसमान से आगे सिद्ध मुकाम तक पहुंचकर
जिब्रील अलैहिस्सलाम रुक गए। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अकेले आगे
बढ़े और अल्लाह से बिना किसी परदे के सीधी बातचीत की। इस रात अल्लाह ने मुसलमानों
पर नमाज़ फर्ज़ की।
उस समय तक सम्पूर्ण
अरब प्रायद्वीप इस्लाम के सूत्र में बंध चुका था।
5.14
ख़िलाफ़त - धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए संगठन
हज़रत मुहम्मद
की मृत्यु के बाद इस्लामी राज्य के सामने जो सबसे बड़ा प्रश्न आया वह था कि उनका
उत्तराधिकारी कौन हो? उन
दिनों मुस्लिम शासन व्यवस्था, जनजातीय संगठन
पर आधारित थी। इस्लाम में 'खिलाफत' एक ऐसी राजनैतिक-धार्मिक शासन प्रणाली
है, जिसका नेतृत्व एक खलीफा द्वारा
किया जाता है। ख़लीफ़ा का अर्थ हैः स्थानापन्न, अर्थात ऐसा जीव जिस का वंश हो और एक दूसरे का स्थान ग्रहण करे। ख़िलाफ़त (इस्लामी धर्म-राज्य) के पहले ख़लीफ़ा (नेता) स्वयं मुहम्मद
साहब सल्ल. हुए। पैग़म्बर मुहम्मद साहब सल्ल. के जीवनकाल तक किसी प्रकार
का मतभेद उत्पन्न नहीं हुआ। पैग़म्बर इस्लामी राज्य-व्यवस्था को ईश्वर के आदेशों के
अनुसार अच्छी तरह से चलाते रहे। उनकी मृत्यु के बाद नेतृत्व का विषय विवादों में घिर
गया।
पैग़म्बर मुहम्मद साहब उच्च कोटि के चरित्र वाले व्यक्ति थे। इसलिए इस धर्म की
ग्राह्यता बेहद सुलभ थी। इस धर्म में वैराग्य और लौकिक सुखों के त्याग की प्रमुखता
वाली बात नहीं थी। गिब ने भी माना है कि यह सांसारिकता के बहुत क़रीब था। यह धर्म गृहस्थाश्रम
के बहुत नज़दीक था। सन् 632 में जब पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु हुई मुस्लिमों के खंडित होने का भय उत्पन्न
हो गया। कोई भी व्यक्ति इस्लाम का वैध उत्तराधिकारी नहीं था। यही उत्तराधिकारी इतने
बड़े साम्राज्य का भी स्वामी होता। इससे पहले अरब लोग बैजेंटाइन या फारसी सेनाओं में
लड़ाको के रूप में लड़ते रहे थे पर ख़ुद कभी इतने बड़े साम्राज्य के मालिक नहीं बने
थे। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं थी कि इस्लाम को धर्म के साथ-साथ राजनैतिक रूप भी ग्रहण
करना पड़ा। पैग़म्बर मुहम्मद साहब को मक्का छोड़कर मदीना आना पड़ा था। धर्म के प्रचार-प्रसार
के लिए एक संगठन की आवश्यकता थी। जो संगठन बना उसमें राजनीति और धर्म एक स्थान पर आकर
मिल गए और इसका नाम पडा ख़िलाफ़त। इस संस्था का गठन इसलिए हुआ कि वह इस बात
का निर्णय करता कि इस्लाम का उत्तराधिकारी कौन है। उसके नेता ख़लीफ़ा कहलाए जाने लगे।
ख़लीफ़ा
के दोनों रूप थे, ये राजा की तरह भी थे, धर्मगुरु की तरह भी।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी का विवाद
गहराया कि उनका अगला रहनुमा – क़ाइद-ए-सानी – कौन बने? विरासत (उत्तराधिकार) का किसी स्पष्ट नियम का उल्लेख न तो क़ुरआन
में था, न पैग़म्बर साहब सल्ल. ख़ुद कुछ बता गए थे। कई तरफ़ और कई लोगों से अलग-अलग विचार
सामने रखे गए। मदीना के अनसार (मदीना के मुसलमान) चाहते थे कि ख़लीफ़ा उन्हीं में से कोई हो। मुहाजिरों (मक्का से आए
प्रवासी) का कहना था कि रहबरे-इस्लाम
(इस्लाम का मार्गदर्शक) कोई मुहाजिर हो। मक्का के क़ुरैशों की इच्छा थी कि चूंकि
पैग़म्बर की जन्म-भूमि मक्का थी और वे बनु-हाशिम ख़ानदान से थे, इसलिए उनके ख़ानदान का
ही कोई आदमी गद्दी पर बैठे। मुहम्मद साहब के कोई पुत्र न था। सिवाय एक बेटी के, जिनका नाम हज़रत
फातिमा था, उनकी कोई जीवित संतान नहीं थी। हज़रत फातिमा बीबी का ब्याह उनके चचेरे
भाई हज़रत अली से हुआ। इस लिहाज से हज़रत फ़ातिमा
रज़ि. (पैग़म्बर की सुपुत्री) या उनके पति हज़रत अली रज़ि. का हक़ सबसे पहले बनता था। वे बहुत वीर योद्धा थे। उनकी वीरता पर
हज़रत मुहम्मद साहब उन्हें “शेरेख़ुदा” कहा करते थे। नबी साहब के मरने पर ख़िलाफ़त
के सरदार हज़रत अली नहीं बनाए गए। कुछ लोगों का कहना था कि
मुहम्मद साहब ने अपने चचेरे भाई और दामाद हज़रत अली को इस्लाम का वारिस बनाया है (शिया) जबकि अन्य लोगों ने माना कि मुहम्मद
साहब ने सिर्फ़ हज़रत अली का ध्यान रखने को कहा है और असली वारिस हज़रत अबू बकर को होना चाहिए (सुन्नी)।
एक और घटना का विवरण
मिलता है जिसके अनुसार पैगंबर मोहम्मद साहब अपनी ज़िंदगी का आखिरी हज करके मक्का शहर से अपने शहर
मदीना की ओर जा रहे थे। रास्ते में ही ज़िलहिज्जा की 18वीं तारीख पड़ी। इस दिन मोहम्मद साहब मक्का शहर से 200 किलोमीटर दूर ज़ोहफा नामक स्थान पर
पहुंचे थे। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. ‘ग़दीरे-ख़ुम’ के मैदान में ठहरे थे। इसी जगह पर सारे हाजी एहराम (हज करने का वस्त्र) भी
पहनते थे। हज करने गए सारे हाजी वापिस इसी जगह तक आते थे और उसके बाद अपने-अपने
देशों के लिए रास्ता चुनते थे। इसी जगह से मिस्र, ईराक, सीरीया, मदीना, ईरान और यमन के रास्ते अलग होते थे। कहा जाता है
कि इसी जगह पर पैगंबर साहब को अल्लाह ने संदेश भेजा। यह संदेश कुरआन में भी मौजूद है, कुरआन के पांचवे सूरह (सूरह मायदा) की
67 वीं आयत में उस संदेश के बारे में
लिखा है कि - 'या अय्युहर रसूलु बल्लिग़ मा उनज़िला
इलैका मिन रब्बिक व इन लम् तफ़अल फ़मा बल्लग़ता रिसालतहु वल्लाहु यअसिमुका मिन
अन्नास'। इसका अर्थ है कि 'ऐ रसूल उस संदेश को पहुंचा दीजिये जो
आपके परवरदिगार (अल्लाह) की तरफ से आप पर नाज़िल (बताया जा) हो चुका है। अगर आपने यह संदेश नहीं पहुंचाया तो
गोया (मतलब) आपने रिसालत (इस्लाम का प्रचार प्रसार) का कोई काम ही नहीं अंजाम दिया’।
इस आयत में अल्लाह अपने पैगंबर को स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं कि उन्हें जो भी
ईश्वरीय ज्ञान या आदेश प्राप्त हुआ है, उसे
बिना किसी संकोच या कमी के लोगों तक पहुँचाना उनकी सर्वोच्च जिम्मेदारी है। यदि
इसमें कोई चूक होती है, तो
संदेश पहुंचाने का मूल कर्तव्य अधूरा रह जाता है।
इस आयत के नाज़िल होने के बाद पैगंबर मोहम्मद साहब ने सभी हाजियों को
ज़ोहफा से 3 किलोमीटर दूर गदीर नामक मैदान पर
रुकने के आदेश दे दिए। चारों ओर अत्यधिक चिंता का माहौल था और यह स्पष्ट था कि कुछ
बहुत महत्वपूर्ण घटित होने वाला है। मोहम्मद साहब ने उन लोगों को भी वापिस बुलवाया
जो लोग आगे जा चुके थे और उन लोगों का भी इंतज़ार किया जो लोग पीछे रह गए थे। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) को सर्वशक्तिमान ईश्वर से अंतिम और
सबसे महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन प्राप्त हुआ था, जो इसे पैगंबर के जीवन की सबसे
महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक बनाता है। तपती गर्मी और चढ़ती धूप के आलम में
भी लोग मोहम्मद साहब का आदेश पाकर ठहरे रहे। सर्वशक्तिमान ईश्वर ने स्वयं इस
स्थान का चयन किया था, क्योंकि यदि यात्री इस बिंदु से आगे
जाते, तो वे अपने-अपने घरों और गंतव्यों की
ओर बिखर जाते।
इस दौरान सीढ़ीनुमा ऊंचा मंच भी बनाया गया जिसे मिम्बर कहा जाता है। वहां उन्होंने मुसलमानों
को इकट्ठा किया और उन्होंने
अली इब्न अबी तालिब को भी ऊपर चढ़ने के लिए बुलाया और उन्हें अपने दाहिनी ओर खड़ा
किया। उन्होंने आगे कहा,
"मैं तुम्हारे बीच
दो चीज़ें छोड़ जाता हूँ,
जिन्हें अगर तुम थामे रहोगे, तो तुम कभी गुमराह नहीं होगे - वह है अल्लाह की किताब और मेरा परिवार
(अहल अल-बैत)।" पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने स्पष्ट शब्दों में कहा
कि पैगंबरी का दौर समाप्त हो गया है। मेरे बाद कोई पैगंबर नहीं होगा। इस घोषणा से
यह संदेह दूर हो गया कि मुहम्मद अल-मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के
आखिरी पैगंबर थे। हदीसों के मुताबिक इसी मंच यानी कि मिम्बर से एक ख़ुतबा (प्रवचन) पढ़ा। इसके बाद हज़रत अली रज़ि. को अपने हाथों
से ऊपर उठाकर पुकार कर घोषित किया :“जिसका मैं मौला (नेता/संरक्षक) हूं, उसके अली मौला हैं।”
यहां तक दोनों ही समुदाय एकमत हैं। दोनों ही समुदाय के लोग कहते हैं कि
हां यही घटना हुई थी। लेकिन दोनों ही समुदायों के बीच मतभेदों की जड़ भी यहीं से
पनपी। इस ऐलान में
मौला शब्द का प्रयोग किया गया है। मौला शब्द पर ही दोनों समुदाय एक
दूसरे से भिड़ पड़ते हैं। शिया मुसलमान मानते हैं कि मौला शब्द का मतलब उत्तराधिकारी का
है। जबकि सुन्नी
मुसलमान ऐसा नहीं मानते हैं। सुन्नी मुसलमान आम तौर पर इस कथन को
अली को एक विश्वसनीय साथी और मित्र के रूप में स्वीकार करने के रूप में देखते हैं, जिसका अर्थ राजनीतिक उत्तराधिकार नहीं
है। गदीर की घटना के बाद मोहम्मद साहब तीन दिन तक उसी मैदान पर रुके रहे। तमाम हाजी (हज करने वाले यात्री)
मोहम्मद साहब से मुलाक़ात करते रहे। शिया मुसलमान कहते हैं कि लोग
मोहम्मद साहब को उनके उत्तराधिकारी का ऐलान करने के लिए मुबारकबाद दे रहे थे। जबकि सुन्नी मुसलमानों का मानना है
कि लोग मोहम्मद साहब को हज की मुबारकबाद दे रहे थे। हालांकि उस वक्त तक शिया और सुन्नी
नाम के शब्दों की ही उपज नहीं हुई थी। यानी अभी तक मुसलमान धड़ों में नहीं
बंटा था।
पैगंबर मोहम्मद साहब अपने शहर पहुंचे और कुछ ही महीनों के बाद उनका निधन हो
गया। मोहम्मद साहब के निधन के बाद मोहम्मद साहब की गद्दी पर उनका कौन वारिस
बैठेगा इसी को लेकर दोनों ही समुदाय अलग-थलग पड़ गए। शिया मुसलमानों का मानना था कि मोहम्मद साहब ने गदीर के मैदान पर अपना
उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। इसलिए इस पद पर किसी और को नहीं बिठाया जा सकता है। जबकि सुन्नी मुसलमानों के अनुसार मोहम्मद साहब ने किसी को भी अपना
उत्तराधिकारी नहीं बनाया था इसलिए इस पद के लिए चुनाव किया जाना चाहिए। काफ़ी विचार-विमर्श
और बहस के बाद लोग हज़रत अबूबकर रज़ि. पर राज़ी हुए। हज़रत अबूबकर रज़ि. उन चंद लोगों में
से थे जिनको पैग़म्बर ने सबसे पहले दीक्षा दी थी। इसके अलावा वे सबके बुज़ुर्ग भी थे
और पैग़म्बर के वफ़ादारों में अव्वल थे। साथ ही उम्मुहातुल मोमिनीन (पैग़म्बर मुहम्मद
की पत्नियों) में सबसे प्रिय, हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के पिता थे। कहा जाता है
कि अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ अदा करने जब पैग़म्बर पहुंचे, तो उन्होंने हज़रत अबूबकर
को ही लोगों को नमाज़ पढ़ाने के लिए कहा और ख़ुद उनके पीछे जा खड़े हुए। यह एक बहुत बड़ा
संकेत था। उम्मत की आम राय से वे ख़लीफ़ा चुन लिए गए और इस तरह लोगों ने उस वक्त के बुजुर्ग हज़रत अबु बक्र को इस पद के लिए चुन लिया गया।
निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि पैगंबर मुहम्मद सल्ल.
की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का मुद्दा एक मूलभूत घटना है जिसने इस्लामी इतिहास
और धर्मशास्त्र की दिशा तय की है। इसके तुरंत बाद राशिदुन खलीफाओं (सही राह
पर चलने वाले खलीफा) का शासन स्थापित हुआ, जिनके
नेतृत्व को बाद में आंतरिक संघर्षों और उमय्यद वंश के उदय ने चुनौती दी।
परिणामस्वरूप उत्पन्न विभाजन ने नेतृत्व की वैधता और धार्मिक अधिकार की
भिन्न-भिन्न व्याख्याओं पर आधारित स्थायी सुन्नी-शिया विभाजन की नींव रखी।
*** *** ***
मनोज
कुमार