गांधी और गांधीवाद
438. डॉ.
दिनशा मेहता के प्राकृतिक चिकित्सालय में
नेताओं की, खासकर कार्य-समिति की जेल से मुक्ति
के बाद गांधीजी ने घोषणा कर दी कि आइन्दा कांग्रेस को भावी कार्यक्रमों के लिए
सलाह कार्यसमिति और अध्यक्ष के द्वारा ही लेना चाहिए। इससे उनको जो राहत मिली,
उसके कारण वे अपने प्रिय कामों में अधिक मन और समय लगा सके। सरदार पटेल जेल से
छूटने के बाद काफी बीमार हो गए थे। आंत में इन्फ़ेक्शन था और डॉक्टर ने उन्हें
ऑपरेशन कराने की सलाह दी थी। ऑपरेशन में गंभीर ख़तरा था। गांधीजी ने उन्हें
प्राकृतिक चिकित्सा कराने की सलाह दी, सरदार मान गए। अगस्त के तीसरे सप्ताह में
गांधीजी सरदार को डॉ. दिनशा मेहता के प्राकृतिक चिकित्सालय, उर्ली कांचन, पूना ले
गए। यहां एक दिलचस्प वाकया हुआ। एक दिन एक युवक एक बड़ी सी टोकड़ी लेकर आया। वह
गांधीजी से मिलना चाहता था। उसने गांधीजी के दूसरे पुत्र मणिलाल की पत्नी सुशीला
से कहा, “मैं गांधीजी के लिए फल लाया हूं।” सुशीला ने कहा, “तुम अपना नाम बताओ। मैं उन्हें बता दूंगी। वे
अभी व्यस्त हैं, तुम उनसे नहीं मिल सकते।” उस युवक ने नाम नहीं बताया और प्रतीक्षालय में टोकड़ी छोड़कर
चला गया। कुछ देर के बाद गांधीजी का पोता कनु गांधी ने जब उस टोकड़ी को खोला तो उसे
धक्का लगा। उसमें पुराने जूते-चप्पल भरे हुए थे। उसने सुशीला को सारी बातें बताई।
गांधीजी को वाकया बताया गया, गांधीजी ने आदेश दिया कि इसे बाज़ार में ले जाकर बेच
दो। कनु पूना बाज़ार में उसे बेच आया। उसके उसे चार रुपए मिले। गांधीजी ने कहा इन
रुपयों को हरिजन फंड में जमा कर दो। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने इस
घटना का ज़िक्र करते हुए कहा, “कल मेरे एक अनाम मित्र ने मुझे कुछ पुराने जूते-चप्पल उपहार
में दिए। जिन्हें बेचकर हमें चार रुपए प्राप्त हुए। उन्हें हरिजन फंड में जमा करा
दिया गया है। मैं उस अनाम मित्र को इस सद्भावना के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा।”
दर्शकों में वह युवक मौज़ूद था। वह उठ खड़ा हुआ और चिल्लाया, “आपको उसे बेचने का कोई अधिकार नहीं था। मेरा
पैसा लौटाइए। आप उसे हरिजन फंड में जमा नहीं कर सकते।” गांधीजी ने उसे समझाया, “एक बार जब तुम्हारा उपहार मैंने स्वीकार कर
लिया, उस पर से तुम्हारा अधिकार समाप्त हो गया। अब उपहार स्वीकार करने वाले की
इच्छा पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे किया जाए।” पटेल भी उस सभा में उपस्थित थे। सभी लोगों ने
गुस्से से तमतमाए उस युवक के चेहरे को भलीभाँति देखा। वह चिल्ला रहा था और गांधीजी को गालियां दे रहा
था। उस युवक को वहां के स्वयंसेवकों ने बलपूर्वक निकाल बाहर किया। जब गांधीजी की
हत्या हुई, तो उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे का फोटो अख़बारों में छपा। सुशीला ने
फौरन उसे पहचाना, यह वही युवक था।
लगभग तीन महीने बाद जब वे पूना से सेवाग्राम
वापस लौटे डॉ. मेहता उनके साथ थे। उनकी सहायता से गांधीजी ने प्राकृतिक चिकित्सा
महाविद्यालय की नींव रखी। डॉ. मेहता ने पूना और सिंहगढ़ की अपनी संस्थाएं एक ट्रस्ट
को सौंप दी। गांधीजी उसकी ट्रस्टी थे। आने वाले रोगियों में से कई की चिकित्सा
गांधीजी ख़ुद भी करते थे।
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मनोज कुमार
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