मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

442. कैबिनेट मिशन-1

राष्ट्रीय आन्दोलन

442. कैबिनेट मिशन-1



प्रवेश

विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ यह तो तय था कि भारत की आज़ादी को और ज्यादा टाला नहीं जा सकता था। आधिपत्य के संघर्ष में राष्ट्रवादी ताकतों की सफलता युद्ध के अंत तक काफी स्पष्ट थी। राष्ट्रवाद अब तक अछूते वर्गों और क्षेत्रों में प्रवेश कर चुका था। देश और देश के बाहर बहुत से ऐसे परिवर्तन हुए थे जिनके कारण ब्रिटेन को भारत की स्वतंत्रता की घोषणा करने के प्रति उन्मुख होना पडा। बाहर (देश के) रूस और अमेरिका दोनों महाशक्ति के रूप में उभर चुके थे और भारत की आज़ादी के पक्षधर थे। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई थी। उनके सैनिक युद्ध से थक चुके थे। चुनावों में कन्ज़र्वेटिव दल की पराजय हुई थी और लेबर दल की सरकार बन चुकी थी। यह पार्टी यह मानती थी कि भारत में परिस्थिति बदल चुकी है और उस पर आगे क़ब्ज़ा जमाये रखना संभव नहीं है। सुलह और दमन की ब्रिटिश रणनीति की अपनी सीमाएँ और विरोधाभास थे। क्रिप्स की पेशकश के बाद सुलह की पेशकश करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता को छोड़कर बहुत कम बचा था। लेबर पार्टी भारतीयों की मांग को स्वीकार करने के पक्ष में थी।

और इधर देश में प्रांतीय सरकार बन जाने के बाद केन्द्रीय तंत्र की व्यवस्था होनी थी। जब अहिंसक प्रतिरोध को ताकत से कुचला गया, तो उसके पीछे की अंग्रेजों की नंगी ताकत का पर्दाफाश हो गया। आज़ाद हिन्द फ़ौज के मुक़दमे की सुनवाई में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही थी कि भारत को दमन के भय से कब्जे में नहीं रखा जा सकता। भारत छोडो आन्दोलन के दौरान हुई गतिविधियों से यह स्पष्ट हो चुका था कि यदि राष्ट्रवादियों की मांगें ठीक ढंग से स्वीकार नहीं की गयीं तो परिस्थिति विस्फोटक हो जाएगी। मांगें न स्वीकारे जाने के कारण फरवरी में हुआ नौसैनिक विद्रोह इस बात का प्रमाण था। संविधानवाद या कांग्रेस राज एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला साबित हुआ था और इसने जनता के बीच देशभक्ति की भावनाओं को गहराई तक पहुँचाने में मदद की थी। वेवेल का मानना था, भारत में हमारा समय सीमित है और घटनाओं को नियंत्रित करने की हमारी शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी है। हमारे पास व्यापार करने के लिए केवल प्रतिष्ठा और पिछली गति है और ये लंबे समय तक नहीं रहेंगे।

कैबिनेट मिशन भारत भेजने का निर्णय

19 फरवरी, 1946 को ब्रिटेन की नई लेबर पार्टी के क्लीमेंट एटली ने दिल्ली की सरकार को हिन्दुस्तानी करने, सत्ता का हस्तांतरण करने और उससे संबद्ध लघुकालीन और लंबे समय की व्यवस्थाओं का विवरण तैयार करने के लिए ब्रिटिश संसद सदस्यों का एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल (कैबिनेट मिशन) भारत भेजने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को सत्ता सौंपने की योजना तैयार करना था। नेताओं से मिल कर उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना था कि सरकार संवैधानिक मामले पर शीघ्र ही समझौता करने को उत्सुक है। 15 मार्च को एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की हालाकि अल्पसंख्यकों का हित हमारे ध्यान में है, फिर भी बहुमत की प्रगति पर अल्पमत को वीटो के प्रयोग की अनुमति नहीं दे सकते। साथ ही उसने एक वक्तव्य भी दिया था, जिसमें शीघ्र पूर्ण स्वाधीनता देने का वादा किया गया था। यह शिमला सम्मेलन से बिल्कुल अलग था, जहां वेवेल ने जिन्ना को सम्मेलन को बर्बाद करने की अनुमति दी थी। यह 1942 के क्रिप्स मिशन की तरह कोई दिखावा नहीं था - कैबिनेट मिशन लंबे समय तक रुकने के लिए तैयार था। अब ब्रिटिश एकजुट और मैत्रीपूर्ण भारत की बात कर रहे थे, क्योंकि एक विभाजित भारत ब्रिटेन की कूटनीति पर एक धब्बा होता। 15 मार्च को एटली ने कॉमन्स में एक बयान देकर कांग्रेस की उम्मीदें काफी बढ़ा दीं, जिसमें उन्होंने जल्द और पूरी आज़ादी का वादा किया और घोषणा की कि 'हालांकि हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों का ध्यान रखते हैं... हम किसी अल्पसंख्यक को बहुमत की प्रगति पर वीटो लगाने की इजाज़त नहीं दे सकते। हालात समझौते के लिए बिल्कुल सही लग रहे थे क्योंकि साम्राज्यवादी शासक समझौते की ज़रूरत को समझते थे और राष्ट्रवादी नेता उनसे बातचीत करने को तैयार थे।

मिशन के सिद्धांत

इस मिशन ने तीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया:

1.    अल्पसंख्यकों को राजनीतिक प्रगति में वीटो (प्रतिनिषेध) का हक़ नहीं होगा,

2.    देशी राजाओं को भी आज़ादी में विक्षेप डालने का या विलंब करने का अधिकार नहीं होगा, और

3.    देश की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए सत्ता का स्थानांतरण तुरंत किया जाएगा।

कैबिनेट-मिशन का भारत आगमन

इस तरह ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनैतिक नेताओं के बीच निर्णायक चरण मार्च, 1946 में आया, जब मंत्रिमण्डल के तीन सदस्य भारत सचिव लार्ड पैथिक लारेंस, बोर्ड ऑफ ट्रेड के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और एडमिरलटी के फर्स्ट लॉर्ड ए.वी. अलेकजाण्डर 23 मार्च को कराची के हवाई अड्डे पर पहुंचे। दूसरे दिन 24 मार्च को वे दिल्ली आए। इस मिशन का मकसद एक अंतरिम सरकार यानी भारतीयों को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से शासन सौंपने की शर्तों और दशाओं और भारत के भावी संविधान की रूपरेखा बनाने के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं पर भारतीय नेताओं और वायसराय के साथ विचार करना था। यह एक नाटकीय घटना के रूप में लोगों के सामने आया। लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ। क्या ब्रिटिश सरकार सचमुच भारत छोड़ना चाहती थी? लोग ब्रिटेन के इरादों को लेकर सशंकित थे। यह कोई घिनावना खेल तो नहीं है? गांधीजी भी इस घोषणा से भौचक्के थे। उन्होंने कहा था, मेरा विश्वास है कि इस बार अँग्रेज़ सचमुच कुछ करना चाहते हैं। लेकिन यह प्रस्ताव एकाएक आया। क्या भारत झटकों के साथ स्वतंत्रता प्राप्त करेगा? मैं खुद को आज उस मुसाफिर की तरह महसूस कर रहा हूँ जिसे तूफानी समुद्र में जहाज की डेक पर बास्केट चेयर में बिठा दिया गया हो और जिसे पैरों तले धरती का पता न हो। वह उठकर चलने में गिर-गिर पडता है और प्रयत्न करके भी संभल नहीं पाता। उस समय देशवासियों को कैबिनेट मिशन में कोई श्रद्धा नहीं थी। लेकिन गांधीजी ने कांग्रेस का उत्साह बनाए रखा। पैथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स से गांधीजी बहुत अच्छी तरह से परिचित थे। उनका मानना था कि अब सत्याग्रह और आंदोलन का अवसर समाप्त हो गया है। अब तो शांति से बैठकर मंत्रणा और विचार-विमर्श का अवसर है। देश को संवैधानिक मामलों पर अपने कौशल का परिचय देना है।

कैबिनेट मिशन और गांधीजी 

आज़ादी आने वाली थी। इसके पूर्व तैयारी के लिए गांधीजी ने बिड़ला भवन छोड़ दिया। वे दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर के पास भंगी कॉलोनी में रहने चले आए थे। यह निर्णय केवल प्रतीक मात्र नहीं था। यह निर्णय जिस स्वराज्य की वह रचना कर रहे थे, उसी का एक अंग था। उनका कहना था कि जब तक दलितों का उत्थान नहीं होता, तब तक आज़ादी अपूर्ण रहेगी। भंगी कॉलोनी का गांधीजी का छोटा सा मकान इस समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो चुका था। वहीं से देश के महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे थे। कभी-कभी गांधीजी विलिंगडन क्रिसेंट भी जाते थे, जो मिशन का घर था, और एक बार, तय कार्यक्रम के अनुसार, वे अपनी शाम की सैर के दौरान पेथिक-लॉरेंस से मिले।

साम्प्रदायिक उपद्रवों की पृष्ठभूमि में 24 मार्च से जून 1946 तक मिशन भारतीय नेताओं से बातचीत करता रहा। आते ही मिशन ने गांधीजी को संदेश भेजा, आप अप्रैल 1946 के पहले सप्ताह में दिल्ली आएं और हमसे इस बात पर चर्चा करें कि अंग्रेज़ जल्दी से जल्दी भारत छोड़कर कैसे जा सकते हैं। ‘मिशन’ ने गांधीजी से औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह से अनेक बार सलाह-मशविरा किया। 1 से 17 अप्रैल तक मिशन ने भारतीय प्रतिनिधियों से वार्ता किया। कुल मिलाकर 472 नेताओं से 182 बैठकों में भेंट की। हालाकि राजनैतिक दलों के रूप में निर्णयात्मक महत्त्व केवल कांग्रेस और लीग का था, और मुख्य प्रश्न भी भारत की एकता अथवा विभाजन से ही संबंधित था।

2 अप्रैल को गांधीजी ने कैबिनेट मिशन के नेता लॉर्ड पेथिक लॉरेंस से आग्रह किया कि देश के हज़ारों सत्याग्रही क़ैदियों और राजनीतिक बंदियों को मुक्त कर दिया जाना चाहिए। उन लोगों ने जो भी किया वह देश की आज़ादी के लिए किया था। अब उन्हें जेल में रखना उचित नहीं है। गांधीजी की सलाह मानकर 12 अप्रैल को जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया को छोड़ दिया गया। धीरे-धीरे अन्य सत्याग्रही क़ैदियों और राजनीतिक बंदियों को मुक्त कर दिया गया। 14 अप्रैल को आज़ाद हिन्द फौज के अभियुक्त क़ैदियों को छोड़ने के आदेश ज़ारी हुए।

गांधीजी ने यह भी सलाह दिया कि नमक कर को हटा दिया जाना चाहिए। वायसराय के वित्त सदस्य सर अर्चीबोल्ड तो मान गए लेकिन वैवल को यह मंजूर नहीं था। उसका मानना था कि ऐसे नमक कर को हटाने से मुस्लिम लीग और जिन्ना पर बुरी गुजरेगी और व्यर्थ में गांधीजी की लोकप्रियता बढ़ जाएगी, जो सल्तनत के हित में नहीं होगा।

गांधीजी ने कैबिनेट मिशन का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि देश में सात सौ से भी ज़्यादा देशी राज्य थे। अंग्रेज़ों ने अपने समर्थन के लिए उनकी हस्ती बनाए रखी थी। न तो इनसे कभी कोई विचार-विमर्श होता और न ही उन्हें केन्द्रीय विधान सभा में कोई महत्व दिया जाता। गांधीजी ने सलाह दी कि इन देशी राजाओं का अंकुश हटा दिया जाना चाहिए ताकि देश में बसने वाली प्रजा को भी प्रजातंत्र का अधिकार प्राप्त हो सके। अथवा कम से कम इन देशी राज्यों को राष्ट्रीय सरकार के मातहत रखना चाहिए। लेकिन क्रिप्स को यह सुझाव मंजूर नहीं था। इसलिए जब देश को आज़ादी मिली तो छह सौ देशी राज्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर राष्ट्र से अलग अपनी स्वतंत्र हस्ती रखना चाह रहे थे। यह तो लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शिता और दृढ़ शासन का परिणाम था कि एक-डेढ़ साल के अन्दर लगभग सारे देशी राज्य भारत में सम्मिलित हो गए और देश की अखंडता का खतरा खत्म हुआ।

एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न था, असम और बंगाल में बसने वाले इक्कीस हज़ार यूरोपियन का। वे चाय बागान और विदेशी कंपनियों के मालिक थे। 1935 के क़ानून के तहत इन्हें विधान सभा में छह सीटें दी गई थीं। अनुपातिक तौर पर देखें तो यह संख्या अनुपात से काफी ज़्यादा थी। ये हमेशा अंग्रेज़ी हुक़ूमत का साथ देते आए थे। गांधीजी ने इन छह सीटों का विरोध किया था। इन छह सीटों को लेकर ये यूरोपियन सदस्य मुस्लिम लीग का साथ देते और आसाम भारत के साथ न रहकर बांग्लादेश का एक प्रांत बन गया होता। पूर्वांचल के अन्य राज्यों का भी हाथ से जाने का ख़तरा था। गांधीजी की दूरदर्शिता ने देश को टूटने से बचा लिया।

गांधीजी सत्ता के हस्तांतरण को जल्दी-जल्दी और जोड़-तोड़ कर निपटाया जाने वाला प्रश्न नहीं मानते ते। वे तो इसे न्याय और नैतिक समाधान का प्रश्न मानते थे। बंटवारे की धमकी को किसी शर्त पर स्वीकार नहीं कर सकते थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा जिन्ना को नाराज़ नहीं करने की बात उनकी समझ में आती थी, और वह उन्हें चिन्तित भी करती थी। कैबिनेट मिशन की चर्चाओं में गांधीजी अंग्रेज़ों और कांग्रेस दोनों की सहायता करते थे।

दूसरा शिमला सम्मेलन

17 अप्रैल को मिशन ने एक सप्ताह का ब्रेक लिया और काश्मीर के लिए प्रस्थान किया। 24 अप्रैल को मिशन के सदस्य वापस आए। 27 अप्रैल को पेथिक लॉरेन्स ने कांग्रेस और लीग को पत्र द्वारा सूचित किया कि दोनों दलों को आपसी सहमति बनाने के लिए एक और प्रयास किया जाए। विचार करने के लिए कुछ मौलिक सिद्धान्त होंगे जैसे - भारत का स्वतंत्र राज्य-विधान संघ के ढंग का होगा, जिसमें संघ सरकार पर केवल विदेशी मामले, सुरक्षा और यातायात संभालने का भार होगा। इसके साथ प्रान्तों के दो समूह होंगे, एक हिन्दू आबादी वाले प्रान्तों का और दूसरा मुस्लिम आबादी वाले प्रान्तों का। कांग्रेसी और मुस्लिम लीग ऐसी दो विधान सभाएं बनेंगी और उनमें से अलग-अलग लेकिन समान संख्या के दो मंत्रिमंडल बनेंगे ताकि हिंदू और मुसलमानों का एक समान शासन बन सकेगा। यदि दोनों दल सहमत हों, तो उनके विचार-विमर्श की व्यवस्था मिशन करेगा। मिशन ने सम्मेलन के लिए शिमला को नियत किया। दोनों दलों से चार-चार सदस्यों को आने के लिए कहा गया। कांग्रेस की तरफ़ से मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, नेहरू, पटेल और ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का नाम दिया गया। कांग्रेस की कार्यकारिणी ने गांधीजी से भी शिमला में रहने का निवेदन किया। 2 मई को गांधीजी शिमला पहुंच गए। दूसरा शिमला सम्मेलन 2 से 5 मई तक चला। कांग्रेस की ओर से बातचीत अबुल कलाम आजाद ने की। इस काम में नेहरू और पटेल ने उनकी सहायता की। गांधीजी से ये लोग सलाह लेते रहते थे।

‘मिशन’ के समक्ष मुख्य प्रश्न भारत की एकता अथवा विभाजन से संबंधित था। कांग्रेस विभाजन के पक्ष में नहीं थी। कांग्रेस की मांग थी कि सत्ता एक केंद्र को सौंपी जाए, जिसमें अल्पसंख्यकों की मांगों पर एक ऐसे फ्रेमवर्क में काम किया जाए जो मुस्लिम प्रांतों को स्वायत्तता से लेकर भारतीय संघ से अलग होने पर आत्मनिर्णय तक हो — लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद। लीग की तरफ़ से सुझाव आया कि संविधान सभा के तीन भाग होने चाहिए – एक हिन्दुओं के बहुमत वाले राज्य, दूसरे मुस्लिमों के बहुमत वाले राज्य और तीसरा रियासतों के लिए। संघ के लिए फंड पर कांग्रेस और लीग में मतभेद बना रहा। वह संघ के द्वारा किसी भी प्रशासनिक, विधिक या कार्यकारी निर्णय लिए जाने के ख़िलाफ़ था। जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर अड़ा हुआ था। कांग्रेस ने, जिसका नेतृत्व मौलाना आज़ाद कर रहे थे, जिन्ना से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। कांग्रेस का मानना था कि असम और पश्चिमोत्तर प्रान्त को ‘पाकिस्तान समूह में न जाने का हक़ मिलना चाहिए। जिन्ना इसके ख़िलाफ़ था। अंग्रेजों की कोशिश एक एकजुट भारत के लिए थी, जो ब्रिटेन का दोस्त हो और कॉमनवेल्थ रक्षा में एक सक्रिय भागीदार हो। ऐसा माना जाता था कि एक विभाजित भारत में रक्षा में गहराई की कमी होगी, संयुक्त रक्षा योजनाओं में बाधा आएगी और यह ब्रिटेन की कूटनीति पर एक धब्बा होगा।

बातचीत में गतिरोध

दुर्भाग्य से अपनी बेहतरीन इच्छाओं और अपनी समस्त राजनीतिक कुशलताओं के बावजूद कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य कांग्रेस और जिन्ना को एक मंच पर नहीं ला सके। कांग्रेस और लीग के आपसी मतभेदों को मिटाया न जा सका। इस मूल प्रश्न पर बातचीत में गतिरोध पैदा हो गया कि भारत की एकता बनी रहेगी अथवा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को पूरा करने के लिए देश का विभाजन होगा। कैबिनेट मिशन को यकीन था कि पाकिस्तान संभव नहीं है और अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता को किसी तरह एक एकजुट भारत के ढांचे के भीतर सुरक्षित किया जाना चाहिए। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष एक प्रमुख मुस्लिम विद्वान और देशभक्त मौलाना आज़ाद थे। कांग्रेस विभाजन का विरोध कर रही थी और विभिन्न प्रांतों को जितनी भी अधिक-से-अधिक आर्थिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय स्वायत्तता दे सकना संभव था, देने को तैयार थी।

जिन्ना अक्खड़ और अनुदार बना हुआ था। उसे लगा कि उसके हाथ से वह विशेषाधिकार (वीटो) छीन लिया जाएगा। उसने मिशन पर ‘लीग की उपेक्षा’ का आरोप लगाया। उसने मिशन के प्रयत्न को ‘घोर विश्वासघात’ कहकर उसकी निन्दा की। उसने कहा, भारत को एक राष्ट्र मानने वाला कोई भी मुस्लिम सवर्ण हिंदुओं के हाथों की कठपुतली के अलावा कुछ नहीं हो सकता। परिणाम यह  हुआ कि कांग्रेस और लीग के आपसी मतभेद दूर नहीं हो सके। जिन्ना की पाकिस्तान की मांग पर वार्ता अटक गई। जो बातें कांग्रेस की तरफ़ से प्रस्तुत की गई जिन्ना ने उसे ठुकरा दिया और जिन्ना जो प्रस्ताव दे रहा था, वह किसी को मंज़ूर नहीं था। कोई समझौता नहीं हुआ। दोनों भारतीय पार्टियाँ न तो कोई प्लान बनाने की ज़िम्मेदारी लेना चाहती थीं और न ही एक-दूसरे से सहमत होना चाहती थीं। 12 मई को घोषणा कर दी गई कि कैबिनेट मिशन कांग्रेस और लीग के बीच सहमति नहीं ला सका। अपनी असफलता स्वीकार करते हुए मिशन दिल्ली लौट आया।

समझौता योजना

कांग्रेस और लीग भारत की एकता या विभाजन के मूल मुद्दे पर किसी भी समझौते पर नहीं आ सके। इस गतिरोध की अवस्था में गांधीजी ने मिशन से कहा कि वह अपनी ख़ुद की एक योजना तैयार करे ताकि वह योजना विरोधी पक्षों के बीच विमर्श का आधार हो। उनके लिए यह सुझाव देना ही अपमानजनक था क्योंकि वह हमेशा कहते आए थे कि अगर अँग्रेज़ न रहे, तो मुसलमानों, हिन्दुओं और दूसरे भारतीय समुदायों के हितों में कोई टकराव न रहे। तब कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 को अपनी समझौता योजना एक वक्तव्य में पेश की। उन्होंने भारत के लिए तीन स्तरीय संवैधानिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की।

1.    मिशन ने पूर्ण पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार कर दिया।

2.    रियासतों को अब ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता के अधीन नहीं होना था। वे उत्तराधिकारी सरकारों या ब्रिटिश सरकार के साथ व्यवस्था करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

3.    भारत का स्वतंत्र राज्य-विधान संघ के ढंग का होगा, जिसमें देशी रियासतें भी सम्मिलित होंगी। इसके अनुसार संघीय विषय के अतिरिक्त अन्य सभी विषय प्रान्तों के हाथ में सुरक्षित रहेंगे। संघ की एक कार्यकारिणी और विधायिका होगी, जिसमें ब्रिटिश प्रान्तों और देशी रियासतों के प्रतिनिधि होंगे। सांप्रदायिक प्रश्नों पर दोनों मुख्य संप्रदायों के विधायक अलग-अलग मतदान करेंगे।

4.    प्रान्तों के दो समूह होंगे, एक हिन्दू आबादी वाले प्रान्तों का और दूसरा मुस्लिम आबादी वाले प्रान्तों का। कांग्रेसी और मुस्लिम लीग ऐसी दो विधान सभाएं बनेंगी और उनमें से अलग-अलग लेकिन समान संख्या के दो मंत्रिमंडल बनेंगे ताकि हिंदू और मुसलमानों का एक समान शासन बन सकेगा। संघ सरकार पर केवल विदेशी मामले, सुरक्षा और यातायात संभालने का भार होगा। एक संविधान सभा को प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा चुना जाना था। यह संविधान सभा 389 सदस्यीय निकाय होगी जिसमें प्रांतीय विधानसभाएँ 292, मुख्य आयुक्त प्रांत 4 भेजेंगे, और रियासतें 93 सदस्य भेजेंगे।

5.    संविधान सभा में, समूह ए, बी और सी के सदस्यों को प्रांतों के लिए संविधान तय करने के लिए अलग-अलग बैठना था।

6.    संविधान सभा से एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना था।

7.    एक साझा केंद्र रक्षा, संचार और बाहरी मामलों को नियंत्रित करेगा। भारत के लिए एक संघीय ढांचे की परिकल्पना की गई थी।

8.    केंद्रीय विधायिका में सांप्रदायिक प्रश्नों को उपस्थित और मतदान करने वाले दोनों समुदायों के साधारण बहुमत से तय किया जाना था।

9.    प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता और अवशिष्ट शक्तियां प्राप्त थीं।

10.                   नीचे के स्तर पर प्रांत और रियासतें होंगी और सारे अवशिष्ट अधिकार इन्हीं को मिलेंगे। बीच के स्तर पर प्रांतों द्वारा स्वेच्छा से बनाये ऐसे समूह होंगे जो समान विषयों पर विचार करेंगे। प्रांतों को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा,

a.    सिंध, बलूचिस्तान, उत्तर-पश्चिम सीमाप्रान्त और पंजाब, (ब विभाग)

b.    असम और बंगाल (क विभाग), और

c.    शेष सारे प्रांत (अ विभाग)।

गांधीजी ने चार दिनों तक इस घोषणा पर विचार किया और फिर कहा कि 'गहन जांच-पड़ताल के बाद... मेरा विश्वास है कि यह सबसे अच्छा दस्तावेज़ है जो ब्रिटिश सरकार इन परिस्थितियों में बना सकती थी।' अंग्रेज़ों के अनुसार इसमें सब लोगों की मांगों को समाहित किया गया था। देशी राजाओं को स्वतंत्रता थी। मुस्लिम लीग को अलग संविधान, अलग मंत्रिमंडल और छह अलग प्रांत था। कांग्रेस को अविभाज्य देश की चाह थी। कांग्रेस और लीग ने मिशन प्लान की अपने-अपने तरीके से व्याख्या की, दोनों ने इसे अपने रुख की पुष्टि के रूप में देखा।

जिन्ना की संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान मांग

जिन्ना संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान की मांग कर रहा था। मिशन का कहना था कि संप्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान का बनाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें ग़ैर-मुस्लिमों की बहुत बड़ी संख्या रहेगी। असम और बंगाल में यह संख्या 48.3% थी। पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी इलाके में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक 37.93 प्रतिशत होंगे, जबकि दो करोड़ मुस्लिम दूसरे भारत में अल्पसंख्यक के तौर पर पाकिस्तान से बाहर रहेंगे। मिशन द्वारा बयान में कहा गया है, 'ये आंकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिम लीग द्वारा दावा की गई तर्ज पर पाकिस्तान के एक अलग संप्रभु राज्य की स्थापना से सांप्रदायिक अल्पसंख्यक समस्या हल नहीं होगी।' इसके लिए पंजाब, बंगाल और असम को दो नए राज्यों में बांटना पड़ता, जबकि जिन्ना ने इन तीनों प्रांतों को पूरा का पूरा मांगा था। मंत्रियों ने कहा, 'हम खुद भी इस बात से सहमत हैं कि कोई भी ऐसा समाधान जिसमें पंजाब और बंगाल का बड़ा बंटवारा हो, जैसा कि इसमें होगा, वह इन प्रांतों के बहुत बड़े हिस्से के निवासियों की इच्छाओं के खिलाफ होगा। बंगाल और पंजाब दोनों की अपनी-अपनी आम भाषा और लंबा इतिहास और परंपरा है। इसके अलावा, पंजाब के किसी भी बंटवारे से सिखों का भी बंटवारा होगा, जिससे सिखों के बड़े समूह सीमा के दोनों ओर रह जाएंगे।' मिशन ने कहा कि भारत का बँटवारा देश की सुरक्षा को कमजोर कर देगा और इसके कम्युनिकेशन और ट्रांसपोर्ट सिस्टम को हिंसक रूप से दो हिस्सों में बाँट देगा।

सांप्रदायिक आत्मनिर्णय के जिस सिद्धांत की बात लीग कर रही थी उसके अंतर्गत पश्चिमी बंगाल के कलकत्ता जैसे हिन्दू बहुल क्षेत्रों जहां मुस्लिम आबादी केवल 23.6% थी, और पंजाब से अंबाला और जलंधर को अलग करना पड़ता। बंगाल और पंजाब का विभाजन अनेक प्रशासनिक और सैन्य समस्याएं उत्पन्न करता। यहाँ गहरे क्षेत्रीय संबंध अस्त-व्यस्त हो जाते। ब्रिटिश प्रधान मंत्री एटली शासन सौंपने का काम अपनी पहल को बनाए रखकर शीघ्र और शांतिपूर्वक करना चाहते थे। ब्रिटिश सरकार के निकट यह एक राजनैतिक समस्या थी, जो समझौते और विचार-विनिमय से हल की जा सकती थी। कांग्रेस और लीग आपस में मिलकर जो भी व्यावहारिक हल पेश करतीं, उसे वह स्वीकार करने को तैयार थी। मिशन के बयान में कहा गया, ‘हम ब्रिटिश सरकार को यह सलाह नहीं दे सकते, कि जो शक्ति अभी ब्रिटिश हाथों में है, उसे दो पूरी तरह से अलग-अलग संप्रभु राज्यों को सौंप दिया जाए।' इसके बजाय, ब्रिटिश मंत्रियों ने एक यूनाइटेड इंडिया की सलाह दी, जिसमें ब्रिटिश इंडिया और देसी रियासतें दोनों शामिल हों, और एक फेडरल सरकार हो जो विदेशी मामलों, रक्षा और कम्युनिकेशन को संभाले। नेशनल लेजिस्लेचर में, किसी भी बड़े सांप्रदायिक या धार्मिक मुद्दे पर फैसला करने के लिए वोट देने वालों में से ज़्यादातर लोगों, साथ ही वोट देने वाले ज़्यादातर हिंदुओं और ज़्यादातर मुसलमानों की सहमति ज़रूरी होगी।

जिन्ना ने 21 मई को कैबिनेट मिशन की आलोचना की। उसने ज़ोर देकर कहा कि पाकिस्तान ही एकमात्र समाधान है और पेथिक-लॉरेंस, क्रिप्स और अलेक्जेंडर द्वारा इसके खिलाफ दिए गए 'मामूली और बेकार तर्कों' पर दुख जताया... उसने आरोप लगाया, 'ऐसा लगता है कि मिशन ने यह सब सिर्फ़ कांग्रेस को खुश करने और मनाने के लिए किया।' जिन्ना ने कहा कि उसे बिना किसी यूनियन विधायिका और एक ऐसी कार्यकारी शाखा वाला यूनियन पसंद होता जिसमें मुसलमानों और हिंदुओं की संख्या बराबर हो। अगर कोई राष्ट्रीय विधायिका होती, तो उसे लगा कि उसमें भी पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों से बराबर प्रतिनिधि होने चाहिए; और 'किसी भी विवादित मामले के संबंध में,' कार्यकारी और विधायिका में तीन-चौथाई बहुमत ज़रूरी होगा। उसने शिकायत की कि ब्रिटिश मंत्रियों ने इन सभी विचारों को नज़रअंदाज़ कर दिया। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है। इनसे सरकार चलाना नामुमकिन हो जाता। फिर भी, 4 जून को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन प्लान को मान लिया।

जिन्ना ने घोषणा कर दी कि वह अपना मत 6 जून को होने वाली लीग की काउंसिल की बैठक में विचार-विमर्श के बाद देगा। गांधीजी ने देखा इसके पहले तो कुछ नया होने से रहा, तो वे 28 मई को अपने कुछ सहयोगियों के साथ विश्राम के लिए मसूरी चले गए। 7 जून को वे दिल्ली लौटे। गांधीजी का दृष्टिकोण भिन्न था। वह सत्ता के हस्तांतरण को ज़ल्दी-ज़ल्दी जोड-तोड करके निपटाया जानेवाला प्रश्न नहीं, न्याय और नैतिक समाधान का प्रश्न मानते थे। वह यह तो अवश्य चाहते थे कि अल्पसंख्यकों की आशंकाओं को निर्मूल किया जाए, लेकिन बँटवारे की धमकी उन्हें किसी भी शर्त पर स्वीकार नहीं थी, क्योंकि आगे चलकर इससे उन्हें भारत और हिन्दू-मुसलमानों का अहित ही होता दिखाई देता था। जिन कारणों से गांधीजी और कांग्रेस राजनैतिक तापमान को गिराना चाहते थे, जिन्ना और लीग के लिए तो, 'चूके तो गए' वाली बात थी।

योजना पर स्वीकृति

कांग्रेस के लिए, कैबिनेट मिशन योजना पाकिस्तान के निर्माण के खिलाफ थी क्योंकि समूह बनाना वैकल्पिक था; एक संविधान सभा की परिकल्पना की गई थी; और लीग के पास अब वीटो नहीं था। इस योजना की जिन्ना ने पहले तो आलोचना की, पर बाद में मुस्लिम लीग ने ऊपर से तो इस योजना को स्वीकार कर लिया लेकिन यह स्वीकृति वास्तविक न होकर दिखावा मात्र थी। 5 जून, 1946 को, जिन्ना ने मुस्लिम लीग काउंसिल में भाषण देते हुए कहा था : मैं आपको बता देना चाहता हूं कि जब तक हम अपने सारे क्षेत्र को मिला कर पूर्ण और प्रभुसत्ता संपन्न पाकिस्तान की स्थापना नहीं कर लेंगे तब तक हम संतुष्ट होकर नहीं बैठेंगे। लीग की इस विसंगति के कारण ही गांधीजी और कांग्रेस में उनके साथी, “प्रांतों के वर्ग बंधनकी योजना के विषय में आशंकित हो गए। लीग इस योजना को अनिवार्य करके इसे पाकिस्तान की स्थापना का साधन बनाना चाहती थी। 1945 के शिमला सम्मेलन में वेवेल ने एक ऐसा सिद्धांत प्रतिपादित किया था जिसके तहत दलित हिंदू, सिख, पारसी और ईसाई अलग होंगे और ऊंची जाति के हिंदू और मुसलमानों की संख्या एक होगी। गांधीजी ने तब इस समानता का विरोध किया था। लेकिन जिन्ना के अड़ियल रवैये से परिषद का काम अटक गया था, और आज़ादी मिलने में देरी होती इसलिए इच्छा न होते हुए भी कांग्रेस के नेताओं ने कुछ महीने की अस्थायी व्यवस्था के नाम पर सवर्ण हिंदूओं की मुसलमानों के साथ समान संख्या के सिद्धांत को स्वीकृत कर लिया था। उस अस्थायी व्यवस्था को जिन्ना ने अपना अधिकार मान लिया। इस समानता को वह हर जगह लागू करना चहता था। इस बार तो उसने सवर्ण हिंदू के साथ समनत्व के बदले एक तरफ़ पचास प्रतिशत मुसलमान और दूसरी तरफ़ सब जैसी समानता की मांग रख दी थी।

योजना पर मुख्य आपत्तियां

कांग्रेस को आपत्ति थी कि प्रांतों को एक समूह से बाहर आने के लिए पहले आम चुनाव तक इंतजार नहीं करना चाहिए। उनके पास सबसे पहले किसी समूह में शामिल नहीं होने का विकल्प होना चाहिए। कांग्रेस के दिमाग में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और असम के कांग्रेस शासित प्रांत थे जिन्हें क्रमशः समूह B और C में शामिल किया गया था। अनिवार्य समूहीकरण प्रांतीय स्वायत्तता पर बार-बार किए जाने वाले आग्रह का खंडन करता है। संविधान सभा में रियासतों से निर्वाचित सदस्यों के लिए प्रावधान का अभाव (वे केवल राजकुमारों द्वारा मनोनीत किए जा सकते थे) स्वीकार्य नहीं थे। लीग के अनुसार पाकिस्तान में भविष्य के अलगाव की दृष्टि से वर्गों बी और सी को ठोस संस्थाओं के रूप में विकसित करने के साथ समूहीकरण अनिवार्य होना चाहिए। लीग ने सोचा था कि कांग्रेस योजना को अस्वीकार कर देगी, इस प्रकार सरकार को अंतरिम सरकार बनाने के लिए लीग को आमंत्रित करना होगा।

अभी जारी है .... 

***  ***  ***

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।