बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

443. कैबिनेट मिशन-2

राष्ट्रीय आन्दोलन

443. कैबिनेट मिशन-2

442. कैबिनेट मिशन-1

1946

केन्द्र में मिश्र सरकार बनाने की प्रक्रिया

11 जून को वायसराय ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को मिलकर केन्द्र में मिश्र सरकार बनाने के लिए नाम निश्चित कर लेने की सलाह दी। लेकिन एक और कठिनाई पैदा हो गई। जिन्ना कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद के साथ एक टेबुल पर बैठने तक को तैयार नहीं था। वह ग़ैर लीगी मुसलमान मौलाना आज़ाद को गद्दार मानता था और ऐसे मुसलमान से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता था। इसके बावजूद कांग्रेस समझौते के लिए तैयार थी। गांधीजी ने कांग्रेस को सलाह दी कि मामले के निपटारे की ख़ातिर सम्मेलन में मौलाना साहब का प्रतिनिधित्व नेहरू करें। 12 जून को नेहरूजी वायसराय भवन गए। जिन्ना नहीं आया। नेहरू ने वायसराय को अंतरिम सरकार के लिए कांग्रेस की सूची सौंप दी। लेकिन तब वायसराय ने समान संख्या वाली बात उठाई। मुसलमान भारत की सारी आबादी के चौथे भाग से कुछ अधिक थे। उनका दावा एक तिहाई से कम का ही होना उचित था। किन्तु जिन्ना का तर्क था कि मुसलमान कोई जाति नहीं है, एक ‘राष्ट्र’ है और एक राष्ट्र के नाते उनका संख्याबल चाहे जितना हो, तो भी किसी रची जाने वाली सरकार में बहुमत वाले समुदाय के साथ उन्हें समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इस सिद्धान्त को कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया।

1945 के शिमला सम्मेलन में तो हिन्दू और मुसलमानों के एक स्तर (पैरिटी) का महत्त्व दिए जाने की बात थी, लेकिन यहां तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक स्तर (पैरिटी) का महत्त्व दिया जा रहा था। कांग्रेस तो पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी, जबकि मुसलिम लीग केवल मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती थी। 13 सदस्यों की अन्तरिम सरकार होती। इनमें से पांच मुस्लिम लीग के कोटे से मुस्लिम लीग के सदस्य होते, जबकि पहले यह प्रावधान किया गया था कि पांच मुसलमान होंगे, जिनमें से एक कांग्रेस द्वारा नामित ग़ैर-लीगी मुसलमान होगा। कांग्रेस के हिस्से के 6 सीटों में से कांग्रेस को एक राष्ट्रवादी संस्था होने के नाते किसी राष्ट्रवादी मुसलमान को और एक परिगणित जातियों के प्रतिनिधि को सीट सुरक्षित करनी होती। इस तरह 13 सदस्यों की बनी सरकार में कांग्रेस 4 के अल्पमत में रह जाती। 14 जून को कांग्रेस के अध्यक्ष ने वायसराय को स्पष्ट रूप से बता दिया कि उन्हें इस तरह से अन्तरिम सरकार बनाने की प्रस्ताव बिल्कुल भी मान्य नहीं है।

बातचीत बन्द करने का ऐलान

तीन स्तरीय संविधान योजना बड़ी सूक्ष्म व्यवस्था थी, जिसमें रोकथाम और संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत सारे उपाय किए गए थे। बड़े-बड़े दलों के बीच पूर्ण सहयोग के बिना संविधान बनाना असंभव था, उसे कार्यरूप देना तो दूर की बात थी। सहयोग का अभाव था। कैबिनेट मिशन-योजना में समझौते का प्रयास था, लेकिन यह कांग्रेस और लीग को एकमत नहीं कर सकी। जिन्ना को मनाने की पुरज़ोर कोशिश की गई, लेकिन सब असफल रहे। क्रिप्स अपने साथियों से अलग पड़ गए थे।

16 जून को वायसराय लॉर्ड वेवेल और कैबिनेट मिशन ने घोषणा की कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक अंतरिम सरकार की संरचना पर सहमत नहीं हो पाए हैं और इसलिए बातचीत बन्द की जाती है, और अन्तरिम सरकार बनाने के लिए अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करती एवं उस सरकार में चौदह भारतीयों को पदों पर नियुक्त कर रहे हैं। 14 लोगों को निमंत्रण पत्र भेजे गए। इसमें मौलाना आजाद की जगह कांग्रेस के अध्यक्ष बने नेहरू सहित छह कांग्रेस के हिन्दू सदस्य थे, जिसमें एक परिगणित (दलित) जाति का सदस्य था। जिन्ना सहित पांच मुस्लिम लीग के मुसलमान थे, और तीन अल्पसंख्यक जाति के (1 सिक्ख, 1 ईसाई और 1 पारसी)। लिस्ट में पांचो मुसलमान के नाम वही थे, जो मुस्लिम लीग ने दिए थे। परन्तु कांग्रेस के दिए नामों में परिवर्तन कर दिए गए थे, बिना किसी बातचीत के। शरतचन्द्र बोस का नाम हटा दिया गया था, और उनके स्थान पर हरेकृष्ण मेहताब का नाम रख दिया गया था। कांग्रेस की लिस्ट में एक महिला सदस्य राजकुमारी अमृत कौर, जो एक ईसाई भी थीं, का नाम शामिल था। उनका नाम भी हटा दिया गया था। मुसलमान सदस्य के तौर पर कांग्रेस की लिस्ट में डॉ. ज़ाक़िर हुसैन का नाम था। उनका नाम भी हटा दिया गया था। कांग्रेस की आपत्ति के बावज़ूद अब्दुर्रब निश्तर को शामिल कर दिया गया था। कांग्रेस के आग्रह पर 13 की संख्या को 14 तो कर दिया गया था, लेकिन वह चौदहवां नाम एक सरकारी अधिकारी एन.पी. इंजीनियर, एडवोकेट जनरल, का था। इन्होंने आज़ाद हिन्द फौज के मुक़दमे में सरकारी वकील के तौर पर काम किया था। इनके नाम के बारे में भी कांग्रेस से कोई चर्चा नहीं की गई थी।

जिन्ना को नई सरकार के गठन का यह प्रस्ताव पसंद नहीं आया, फिर भी वह कांग्रेस के रुख साफ हो जाने तक इंतजार करना चाह रहा था। 18 जून को कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार की योजना को स्वीकार करने का मन बना लिया। दूसरे दिन 19 जून को नेहरूजी कश्मीर चले गए, जहां, शेख अब्दुल्ला पर मुक़दमा चल रहा था। वह कश्मीर नेशनल कांफ्रेन्स के अध्यक्ष थे। इधर एक घटनाक्रम में जिन्ना के पत्र के जवाब में 20 जून को वायसराय ने जो पत्र लिखा था, वह ‘दि स्टेट्समैन’ समाचारपत्र के माध्यम से उजागर हो गया। वायसराय ने जिन्ना को आश्वासन दिया था कि दोनों बड़े दलों की स्वीकृति के बिना नामों की सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इसका मतलब तो यह हुआ कि जिन्ना की अनुमति के बिना कांग्रेस अपने हिस्से के नामों में किसी राष्ट्रवादी मुसलमान को नामजद नहीं कर सकती थी। दूसरा आश्वासन यह था कि अल्पसंख्यकों और परिगणित जातियों की जगहों में कोई जगह ख़ाली हुई तो उसे भरने से पहले दोनों दलों से सलाह ली जाएगी। इस क़दम से मुस्लिम लीग को परिगणित जातियों का प्रतिनिधि चुनने में वस्तुतः विशेषाधिकार (वीटो) मिल जाता। परिगणित जाति का सदस्य कांग्रेस के छह हिन्दू में सम्मिलित था। उसके चुनाव में मुस्लिम लीग की कोई आवाज़ क्यों होनी चाहिए थी। ये जातियां हिन्दू समाज का अविभाज्य अंग थीं। ऐसा लग रहा था कि समान संख्या का सिद्धान्त पिछले दरवाज़े से फिर लागू की जा रही थी।

22 जून को वायसराय ने कांग्रेस के अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि वह अपने प्रतिनिधियों में अपनी पसन्द के एक मुसलमान को शामिल करने का आग्रह न रखे। कांग्रेस को लगा कि कहीं वायसराय लीग के साथ तो नहीं मिल गया है। गांधीजी ने कार्यसमिति को कह दिया कि यदि उसने किसी राष्ट्रवादी मुसलमान को न लेने की बात और वायसराय के थोपे हुए एन.पी. इंजीनियर को मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात स्वीकार की तो उनका इस सारे मामले से कोई संबंध नहीं रहेगा और वे दिल्ली छोड़कर चले जाएंगे। सरदार ने उनका ज़ोरदार समर्थन किया। उधर कश्मीर सरकार ने पंडित नेहरू को 20 जून को ही गिरफ़्तार कर लिया था। क्रिप्स गांधीजी से मिलने आया तो गांधीजी ने उससे कहा, कैबिनेट मिशन को दोनों में से किसी एक दल को चुन लेना चाहिए। दोनों का मिश्रण करने की ज़रूरत नहीं है। गांधीजी ने कांग्रेसियों से कहा, न घुटने टेकने की ज़रूरत है और न ही नया कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। उससे कोई लाभ नहीं होगा। मौलाना आज़ाद के आग्रह पर सरकार ने नेहरूजी को दिल्ली भेजने की व्यवस्था करा दी। नेहरूजी दिल्ली आ गए थे।

24 जून को क्रिप्स ने गांधीजी को वार्तालाप के लिए निमंत्रण भेजा। उससे मिलने गांधीजी, सरदार पटेल और सुधीर घोष गए। उसने गांधीजी को बताया, मैंने यह निर्णय लिया है कि यदि कांग्रेस दीर्घकालीन योजना को स्वीकार कर ले और अल्पकालीन प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे, तो कैबिनेट मिशन अन्तरिम सरकार बनाने के लिए जो कुछ किया था उसे रद्द कर देगा और उसके लिए फिर से नए सिरे से प्रयास किया जाएगा। गांधीजी ने कहा कि बात कार्यसमिति में विचार करके कोई निर्णय लिया जाएगा। गांधीजी ने क्रिप्स से कहा था, मैं कांग्रेस कार्यसमिति को सलाह देना चाहूंगा कि वह दीर्घकालीन प्रस्ताव को अन्तरिम सरकार के साथ सम्बद्ध किए बिना उसे स्वीकार न करे। कैबिनेट मिशन की योजना के तहत हिंदू और मुस्लिम के लिए दो स्वतंत्र संविधान बनाए जाने थे। गांधीजी ने लॉर्ड पेथिक लॉरेंस को कहा कि स्थायी सरकार द्वारा ही संविधान सभा के लिए चुनावों की तैयारी होनी चाहिए। विदेशी हुक़ूमत की उपस्थिति में बना संविधान कभी सुदृढ़ और परिपूर्ण नहीं हो सकता। दूसरे दिन, यानी 25 जून को कार्यसमिति की बैठक हुई, जिसमें गांधीजी की उपस्थिति के बिना यह निर्णय लिया गया कि अन्तरिम सरकार बनाने का प्रस्ताव अस्वीकार किया जाता है। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि दीर्घकालीन योजना को स्वीकार किया जाता है। जिन्ना ने तुरंत घोषणा की कि लीग वेवेल के प्रस्ताव को स्वीकार करती है और उनके द्वारा प्रस्तावित सरकार में शामिल होगी। कैबिनेट मिशन ने दोपहर को कार्यसमिति के सदस्यों को मिलने के लिए बुलाया। गांधीजी कार्यसमिति के सदस्य नहीं थे, इसलिए उन्हें नहीं बुलाया गया। लौटकर किसी सदस्य ने गांधीजी को यह नहीं बताया कि क्या बात हुई।

मुस्लिम लीग द्वारा 16 अगस्त को ‘सीधी कार्रवाई’ का दिन

25 जून को जब कांग्रेस का उत्तर मिल गया, तो शाम को वायसराय और कैबिनेट मिशन ने जिन्ना को बुलाया। जिन्ना यह आस लगाए बैठा था कि अंग्रेज़ कांग्रेस के बिना उसे सरकार बनाने का निमंत्रण देंगे। लेकिन हुआ इसके विपरीत। मिशन ने उसे सूचना दी कि कांग्रेस ने 16 मई की योजना को स्वीकार कर लिया है, इसलिए कांग्रेस और लीग दोनों मिलकर सरकार बनाने के योग्य हैं। लेकिन कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार बनाने में असमर्थता प्रकट कर दी है। इसका कारण है 16 जून के मिशन के वक्तव्य का 8वां पारा, जिसमें कहा गया था कि यदि दोनों बड़े दलों में से कोई एक दल मिश्र सरकार रचने में सम्मिलित होने को तैयार न हो, तो वायसराय ऐसी अन्तरिम सरकार रचने का काम शुरू कर देंगे जो 16 मई के वक्तव्य को स्वीकार करने वाले दलों का अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व करने वाली हो। जिन्ना से जब इस पर विचार मांगा गया तो उसने लिखित में प्रश्न देने के लिए कहा और मिशन की बैठक से बाहर आ गया। वह सीधे लीग की कार्यसमिति में गया और यह प्रस्ताव पारित करवा लिया कि उसे अन्तरिम सरकार बनाने का 16 जून वाला प्रस्ताव स्वीकार है। उसे आशा थी कि वायसराय कांग्रेस के बिना सरकार बनाने के लिए कर्तव्यबद्ध है। लेकिन मिशन ने अपनी राय रखते हुए कहा कि यदि कांग्रेस मिश्र सरकार में आने के लिए तैयार नहीं होती तो मिश्र सरकार की योजना का अन्त हो जाता है। हमें कोई और अन्तरिम सरकार उन लोगों की बनानी होगी, जिन्हें 16 मई की योजना स्वीकार हो। 26 जून को इस आशय की घोषणा भी कर दी गई। जिन्ना को इससे गुस्सा आया। जिन्ना को लगा कि उसे उसकी ही चाल से छकाया गया है। उसके साथ धोखा हुआ है। उसने मांग की कि चूंकि अन्तरिम सरकार का मामला अभी स्थगित कर दिया गया है, इसलिए संविधान सभा का चुनाव भी स्थगित कर दिया जाना चाहिए। मिशन ने उसकी इस मांग को ठुकरा दिया। इससे जिन्ना काफी क्रुद्ध हुआ। उसने कांग्रेस पर ‘बेईमानी, वेवेल पर ‘दगाबाजी और मिशन पर घोर ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाया। अब मुस्लिम लीग ने सार्वजनिक तौर पर वैधानिक तरीक़ों को तिलांजलि दे दी। 29 जुलाई को मुस्लिम लीग की केन्द्रीय समिति ने कैबिनेट मिशन की योजना का अपना समर्थन वापस ले लिया। उसने विधान-परिषद के बहिष्कार की घोषणा कर दी। सबसे बढ़कर उसने 16 अगस्त, 1946 को पाकिस्तान के लिए सीधी कार्रवाई  करने का निश्चय किया। पाकिस्तान हासिल करने के लिए जिन्ना ने घोषणा की, मुसलमानों को आगामी संग्राम के लिए संगठित किया जाए और वह संग्राम जैसे और जब ज़रूरी हो छेड़ा जाए। मुस्लिम लीग काउंसिल के अन्तिम अधिवेशन में  जिन्ना ने कहा था, लीग ने भलमानसहत में पूरे हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए कांग्रेस की बेदी पर पाकिस्तान का पूर्ण स्वायत्त राज्य क़ुर्बान कर दिया लेकिन बदले में हमें अपमान और तिरस्कार ही मिला अब मुसलमानों ने वैधानिक उपायों को अलविदा कह दिया है। हमने पिस्तौल तैयार कर ली है और हम उसका इस्तेमाल करना भी जानते हैं। लीगियों ने नारा दिया, लड़कर लेंगे पाकिस्तान

गांधीजी और उनके क़रीबी साथियों के बीच मतभेद

उधर गांधीजी द्वारा उठाए गए बुनियादी प्रश्नों पर कैबिनेट मिशन ने हामी नहीं भरी। सिर्फ़ नकारात्मक उत्तर दिए। गांधीजी अब पृष्ठभूमि में पड़ने लगे थे। कार्यसमिति ने भी गांधीजी की सलाह नहीं मानी। ऐसा लग रहा था कि वार्ताओं के इस आख़िरी दौर में गांधीजी और उनके कुछ बहुत ही क़रीबी साथियों के बीच मतभेद शुरू हो गया था। आंतरिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सेना के उपयोग के बारे में गांधीजी का रुख अलग था। मिशन ने यह कहा था कि संविधान बनने तक वायसराय की हुक़ूमत कायम रहेगी। जब देश में सांप्रदायिक समझौता हो जाएगा तब तक सरकार पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण रहेगा।

गांधीजी ने इसका विरोध करते हुए कहा, जब तक विदेशी सेना रहेगी तब तक साम्प्रदायिक समझौता या अमन-चैन की उम्मीद करना ग़लत होगा। सेना को तुरंत हटा लिया जाना चाहिए। वायसराय को भी सरकार पर अंकुश रखने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। भारत का गवर्नर जनरल केवल मार्गदर्शन देगा, शासन और सत्ता राष्ट्रीय मंडल के अधीन रहना चाहिए। गांधीजी राजनीतिक सौदा करने में विश्वास नहीं रखते थे। इसीलिए अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद वह गृह-युद्ध का खतरा उठा कर भी मुस्लिम लीग के साथ सीधी बात-चीत के द्वारा समस्या का समाधान करने का विचार रखते थे। लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की दृष्टि शुद्ध राजनीतिक थी। गांधीजी ने कैबिनेट मिशन से यह भी कहा था कि इतने क्लिष्ट नियम खड़े करने के बदले अगर अंग्रेज़ों में ज़रा भी हिम्मत हो, तो दोनों दलों में से जिसे चाहें उसे सत्ता देकर अपनी सेना हटाकर अलग हो जाएं। गांधीजी का विश्वास था कि चाहे मुस्लिम लीग का ही शासन हो, वह देश के हित में होगा। आखिर जिन्ना भी तो इसी भारत भूमि की संतान थे। वे जो भी करते उससे देश को नुकसान नहीं होता। यह तो पराये देश के लोगों के हाथों में सत्ता थी, जिससे देश को नुकसान पहुंच रहा था। उन लोगों ने अपने फ़ायदे के लिए हिंदू-मुस्लिम का ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया था, जिसे सुलझाना असंभव हो गया था। गांधीजी को विभाजन की क़ीमत पर भारत के अधिकांश भाग पर जल्दी से जल्दी सत्ता जमा सकने के लिए की जा रही सौदेबाज़ी असह्य और अस्वीकार्य थी। जिन्ना के आग्रह पर अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने चाहा कि कांग्रेस को मात्र हिन्दू का प्रतिनिधित्व लेकर संतोष कर लेना चाहिए। इसका विरोध करते हुए गांधीजी ने 26 जून, 1946 को पत्र लिखकर वायसराय को कहा कि कांग्रेस ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता को सुदृढ़ किया है। सब क़ौमों का प्रतिनिधित्व करना कांग्रेस का हक़ ही नहीं धर्म है। हक़ तो हम छोड़ सकते हैं, लेकिन धर्म छोड़ना आत्महत्या के बराबर है। दुनिया के किसी भी संस्था को अपने हाथों ख़ुदकुशी करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कांग्रेस अपने राष्ट्रीय मुसलमानों को कभी तिरस्कृत नहीं कर सकती। गांधीजी के इस पत्र पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी में बहुत ही गरमा-गरम बहस हुई। गांधीजी ने अपना दृष्टिकोण साफ कर दिया, अगर कांग्रेस सरकार उस प्रस्ताव को स्वीकार करेगी तो मैं इस सारे मामले से अलग हो जाऊंगा और सेवाग्राम चला जाऊंगा। गांधीजी भारत के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। उसे वे भारत का अंग छेदन कहते थे।

कैबिनेट मिशन लंदन लौट गया

जब तनाव बढ़ रहा था तो केंद्र में स्थिर और दृढ़ सरकार का होना बहुत जरूरी था। कैबिनेट मिशन अंतरिम राष्ट्रीय सरकार बनाने में असफल रहा। उसने कुछ समय के लिए आन्तरिक सरकार बनवाने की बात मुलतवी कर दी।  29 जून को कैबिनेट मिशन रिपोर्ट देने के लिए दिल्ली छोड़कर वापस लंदन लौट गया। कैबिनेट मिशन के चले जाने के बाद देश की राजनीतिक परिस्थिति अस्थिर और उलझी हुई थी। गांधीजी ने हरिजन में कहा, 'कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहमत नहीं हुए, हो ही नहीं सकते थे। अगर इस समय हम मूर्खता से यह मान लें कि ये मतभेद अंग्रेजों की देन हैं, तो हम बहुत बड़ी गलती करेंगे।'

अंतरिम सरकार का गठन

सरकार के सामने दुविधा यह थी कि कांग्रेस के साथ मिलकर अंतरिम सरकार बनाई जाए या लीग के प्लान पर सहमत होने का इंतज़ार किया जाए। वेवेल, जिन्होंने एक साल पहले शिमला कॉन्फ्रेंस में दूसरा रास्ता चुना था, उन्होंने फिर से वही करना पसंद किया। लेकिन महामहिम की सरकार, खासकर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, ने तर्क दिया कि कांग्रेस का सहयोग मिलना बहुत ज़रूरी है। 1946 में अंग्रेजों ने, आज़ादी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए, सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देने और राष्ट्रवाद की वैधता और कांग्रेस के प्रतिनिधि स्वरूप को नकारने के अपने पहले के रवैये से अलग रुख अपनाया। 12 अगस्त, 1946 को वेवेल ने नेहरू को सरकार बनाने का काम सौंपा। नेहरू जिन्ना से मिलने गए और उसे मुस्लिम लीग के लिए सरकार में जगह चुनने का मौका दिया। जिन्ना ने मना कर दिया। 24 अगस्त, 1946 को अंतरिम सरकार का गठन किया गया जवाहरलाल नेहरू अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बने।

गांधीजी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में बताया, यह भारत के इतिहास में एक यादगार दिन था और वह अंग्रेजों के प्रति आभारी थे, लेकिन जश्न मनाने के मूड में नहीं थे। उन्होंने दर्शकों से वादा किया, 'जल्द ही, पूरी ताकत आपके हाथों में होगी, अगर पंडित नेहरू, आपके बिना ताज के राजा और प्रधानमंत्री, और उनके साथी अपना काम करें।' गांधीजी ने आगे कहा कि मुसलमान हिंदुओं के भाई हैं, भले ही वे अभी सरकार में न हों, और एक भाई गुस्से का जवाब गुस्से से नहीं देता।

नेहरू ने छह कांग्रेसियों की एक सरकार बनाई, जिनमें से पाँच सवर्ण हिंदू और एक दलित थे, और इसके अलावा, एक ईसाई, एक सिख, एक पारसी और दो मुसलमान थे जो मुस्लिम लीग के नहीं थे। वेवेल ने घोषणा की कि मुस्लिम लीग के लिए अंतरिम सरकार में अपने पाँच सदस्यों को नामित करने का रास्ता खुला है। जिन्ना को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।

सर शफ़ात अहमद खान, एक मुसलमान जिन्होंने नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल होने के लिए मुस्लिम लीग से इस्तीफा दे दिया था, उन पर 24 अगस्त को शाम के समय शिमला में एक सुनसान जगह पर हमला किया गया और उन्हें सात बार चाकू मारा गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस हमले के बारे में कहा, 'यह साफ तौर पर राजनीतिक था।' पहले जिन्ना इस सरकार में शामिल नहीं हुआ, लेकिन अक्तूबर में वह भी शामिल हो गया। कुछ ही दिनों में कांग्रेस और लीग के बीच गतिरोध उत्पन्न हो गया। इसे दूर करने का प्रयास भी सफल नहीं हुआ।

उपसंहार

कांग्रेस और लीग, दोनों ही कैबिनेट मिशन की योजना तकरीबन कबूल कर चुकी थी। कांग्रेस और लीग दोनों अपने हिसाब से कैबिनेट मिशन की योजना का मतलब निकाल रहे थे। ऐसे माहौल में नेहरू ने सात जुलाई 1946 को कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाई जिसमें उन्होंने साफ़ कर दिया कि कांग्रेस के हिसाब से इस योजना में क्या है। कांग्रेस मानती थी कि चूंकि प्रांतों को किसी समूह में रहने या न रहने की आज़ादी होगी, इसलिए ज़ाहिर है कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और असम, जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं, वे पाकिस्तान के बजाय हिंदुस्तान वाले समूह से जुड़ना चाहेंगे। जिन्ना कांग्रेस की इस व्याख्या से कतई सहमत नहीं था। उसके अनुसार कैबिनेट मिशन योजना के तहत पश्चिम के चार और पूर्व के दो राज्यों का दो मुस्लिम-बहुल समूह का हिस्सा बनना बाध्यकारी था। बस यहीं सोच का अंतर था। 10 जुलाई 1946 को नेहरू ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला तो कर लिया है लेकिन अगर उसे ज़रूरी लगा तो वह कैबिनेट मिशन योजना में फेरबदल भी कर सकती है। जिन्ना नाराज़ हो गया। उसे मौका मिल गया। उसने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और साफ़ कह दिया कि कांग्रेस के इरादे नेक नहीं। अब अगर ब्रिटिश राज के रहते मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो बहुत बुरा होगा।

वेवेल को संदेह था कि कैबिनेट मिशन कांग्रेस के साथ कुछ अधिक ही मैत्री दिखा रहा है। एक बार उसे यह देख कर बड़ा धक्का लगा कि क्रिप्स स्वयं जाकर गांधीजी के लिए पानी का गिलास लाया। ‘वायसराय जर्नल’ ने मिशन पर कांग्रेसियों की जेब में चले जाने का आरोप लगाया था। यदि स्थिति को सूक्ष्मता से देखें तो हम पाते हैं कि यदि कभी-कभी मिशन का रुझान अगर कांग्रेस की ओर होता प्रतीत होता था, तो इसका कारण यह नहीं था कि लेबर सरकार राष्ट्रवादियों के प्रति सहानुभूति रखती थी। इसका कारण यह भी नहीं था कि क्रिप्स के नेहरू के साथ पुराने संबंध थे। वेवेल ने खुद 29 मार्च को कहा था, जन-आन्दोलन या क्रान्ति से बचने की आवश्यकता है जिसे आरंभ करना कांग्रेस के हाथ में है, और जिसे हमें विश्वास नहीं है कि हम नियंत्रित कर सकेंगे। सुमित सरकार ने इस आधार पर निष्कर्षत: सही ही कहा है, शीघ्र और आसानी से सत्ता पाने की उत्सुकता और हर कीमत पर सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की इच्छा के कारण कांग्रेस ने एक बार फिर अपने हथियार कुंठित कर लिए थे

कैबिनेट मिशन का काम आम सहमति बनाना था। उसने पाकिस्तान को खारिज कर दिया, लेकिन मुस्लिम "ज़ोन" की संभावना बनाए रखी। मिशन के सदस्य महाराजाओं और राजकुमारों को वे शक्तियाँ देने के लिए तैयार थे जो ब्रिटिश विजय से पहले उनके पास थीं। सभी को खुश करने की कोशिश में, वे किसी को खुश नहीं कर पाए। कैबिनेट मिशन देश को वैधानिक चक्रव्यूह में फंसाकर चला गया था। सुमित सरकार ने सही ही कहा है कि अंत में मिशन योजना और अंतरिम सरकार की चालें सांप्रदायिक विनाश और विभाजन के सोपान बनाकर रह गईं। वायसराय वेवेल अपनी कुटिल चालों से देश को साम्प्रदायिकता के दलदल में धकेल रहा था उसका मक़सद था या तो आज़ादी अटक जाए या फिर देश टुकड़ों में बंट जाए। अंग्रेज़ तो देश छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन कैबिनेट मिशन की घोषणा के बाद आज़ादी देना ज़रूरी हो गया था। इसलिए वायसराय देश को बिखरा देना चाहता था, ताकि देश कभी पनप न सके। अंग्रेजों की इस कुटिल चालों के कारण 1942-1946 के दौरान भारत के संवैधानिक अवरोध का समाधान ढूँढने के प्रयास असफल हो गए थे अंग्रेज़ी सत्ता ने देश की सामाजिक, राजनीतिक एकता को खंडित कर कटुता, सांप्रदायिकता और संकीर्णता के विषाक्त बीज बो दिए थे। नव गठित मंत्रिमंडल को अपने काम करने में उपनिवेशवादी प्रशासकों द्वारा उत्पन्न किए गए अनेक रुकावटों का सामना कर पड़ रहा था। वेवेल हमेशा जिन्ना को अंतरिम सरकार में शामिल हो जाने के लिए मनाने का प्रयत्न कर रहा था। जून की शुरुआत तक वह जिन्ना के साथ बिना बराबरी के एक गठबंधन अंतरिम सरकार बनाने पर सहमत हो गया था; सबसे काबिल लोग शासन करेंगे। लेकिन जिन्ना सिर्फ़ सही समय का इंतज़ार कर रहा था। उसका हिंदुओं को मुसलमानों पर शासन करने देने का कोई इरादा नहीं था, न ही वह ऐसी कैबिनेट का सदस्य बनना चाहता था जिसमें ज़्यादातर हिंदू हों।

सारे देश में अराजकता फैली हुई थी। जिन्ना का ब्रिटिश लोगों को अपने अतीत से अलग होने देने का कोई इरादा नहीं था। उसने एटली को जो धमकी दी थी, जिसमें उसने कहा था कि उसे 'मुसलमानों को खून बहाने के लिए मजबूर करने से बचना चाहिए... (कांग्रेस के सामने) सरेंडर करके', वह पहले ही भेजी जा चुकी थी और डायरेक्ट एक्शन का हथियार तैयार हो चुका था। जिन्ना अब 'सड़कों के बड़े वोटर्स के प्रति जवाबदेह' हो गया था। 'लेकर रहेंगे पाकिस्तान, लड़कर लेंगे पाकिस्तान' के नारे के साथ, मुस्लिम सांप्रदायिक समूहों ने 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में सांप्रदायिक उन्माद भड़काया। हिंदू सांप्रदायिक समूहों ने भी उसी तरह जवाब दिया और इसका नतीजा 5000 लोगों की जान जाने के रूप में सामने आया। ब्रिटिश अधिकारियों को चिंता थी कि उन्होंने उस 'फ्रेंकस्टीन राक्षस' पर से नियंत्रण खो दिया है जिसे बनाने में उन्होंने मदद की थी, लेकिन उन्हें लगा कि अब उसे काबू करना बहुत देर हो चुकी है। जिन्ना की गृहयुद्ध भड़काने की क्षमता से डरकर उन्होंने लीग को खुश करने की कोशिश की। वेवेल ने 26 अक्टूबर 1946 को लीग को अंतरिम सरकार में शामिल कर लिया। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने तर्क दिया कि सरकार में लीग की मौजूदगी के बिना गृहयुद्ध तय था। जिन्ना ब्रिटिश लोगों को अपनी मुट्ठी में रखने में कामयाब रहा था।

लेकिन इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वाद-विवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में एकरसता के अभाव के कारण प्रांतों की शांति-व्यवस्था ख़तरे में पड़ गई। ऐसी परिस्थिति में सरकार में शामिल कांग्रेसी नेताओं ने अनुभव किया कि शासन चलाना असंभव है। उन्हें लगा कि ऐसी परिस्थिति में मुस्लिम लीग को पाकिस्तान मिलता हो तो भले मिल जाए, विभाजन के बाद जो प्रदेश भारत में रह जाएंगे, कम से कम उनमें तो वे सक्रिय और सक्षम रूप में शासन चला सकेंगे। उन दिनों ‘भारत की स्वाधीनता’ एक ऐसा शब्द-प्रयोग था जिसका तीनों पक्षों के लिए अर्थ अलग-अलग था। अंग्रेज़ों के लिए इसका अर्थ था कि क़ानूनी स्वाधीनता उनकी लगाई हुई कुछ शर्तों के पूरा होने के बाद आएगी। तब तक ब्रिटिश सेनाएं भारत पर अधिकार जमाए रहेगी और दोनों दलों पर अंग्रेज़ों की इच्छा लादी जाती रहेंगी। मुस्लिम लीग के लिए इसका अर्थ था कि देश का विभाजन पहले हो और दोनों भागों की स्वाधीनता बाद में। कांग्रेस के लिए स्वाधीनता का मतलब यह था कि पूरे भारत के लिए बिना किसी शर्त के स्वाधीनता हो। मिशन ने स्पष्ट कर दिया था कि संप्रभुता संपन्न पाकिस्तान बनाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें गैर-मुस्लिमों की बहुत बड़ी संख्या रहेगी। सांप्रदायिक आत्मनिर्णय के जिस सिद्धांत की बात लीग कर रही थी उसके अंतर्गत बंगाल और पाकिस्तान का विभाजन स्थापित आंचलिक संबंधों के विरुद्ध होता। अनेक आर्थिक और प्रशासनिक समस्याएँ उत्पन्न हो जातीं। जो विकल्प सुझाया गया था उसमें एक कमजोर केंद्र की धारणा थी। संविधान सभा का चुनाव करते समय प्रांतीय असेंबलियाँ तीन मंडलों में बाँट दी जातीं। इस सब के बावजूद योजना (कैबिनेट मिशन योजना) को नकारने के बजाय, कांग्रेस ने अध-कचडी विधिक युक्ति का सहारा अपने हितों को दूरगामी प्रबंधों से साधने के लिए, इसके सीमित (अल्पकालीन) प्रावधानों को स्वीकार कर लिया। 2 सितंबर को नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस की प्रधानता वाली अंतरिम सरकार ने शपथ ले ली थी।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

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