राष्ट्रीय आन्दोलन
439. शिमला सम्मेलन के बाद देश यात्रा
1945
संकट
का वर्ष
1945 गांधी जी के लिए
संकट का वर्ष था। सामूहिक और व्यक्तिगत सभी प्रकार की आलोचना उन्हें झेलनी पड़ रही
थी। शिमला सम्मेलन में गतिरोध नहीं हटा लेकिन सम्मेलन
के बाद की दो महत्वपूर्ण घटनाओं के कारण एक नई पहल करना संभव हो सका। 15 अगस्त, 1945 को, जापान ने हथियार डाल दिए और द्वितीय महायुद्ध समाप्त हो गया।
ब्रिटेन में जुलाई 1945 में हुए आम चुनावों
में वाम पक्ष की भारी जीत हुई। अनुदार पक्ष के लोग चुनाव हार गए। मजदूर दल ने नया मंत्रिमण्डल बनाया। एटली
प्रधानमंत्री बनाए गए। लॉर्ड पेथिक लॉरेन्स भारत-मंत्री बने। उनकी गांधीजी से 40 वर्षों से मित्रता
थी। गांधीजी के बधाई संदेश के जवाब में उन्होंने लिखा था, “मुझे बड़ी आशा है कि
हमारी इतने वर्षों की मित्रता भारत और उसकी जनता का स्थायी कल्याण साधने के लिए
सामंजस्यपूर्ण सहयोग निर्माण करने में सफल होगी।” इससे भारत में नए सुधारों की आशा जगने लगी। ब्रिटिश
सरकार ने घोषणा की कि वह भारत में शीघ्र स्वशासन की स्थापना कराना चाहती है।
शीतकाल में विधान-सभाओं के चुनाव किए जाने की घोषणा की गई। अगस्त के आख़िरी सप्ताह
में लॉर्ड वेवेल इंग्लैंड गए और भारत लौटने पर 19 सितम्बर, 1945 को उन्होंने घोषणा की कि सरकार अभी भी 1942 के “क्रिप्स प्रस्तावों की भावना” से प्रेरित है और उनका इरादा संविधान
निर्मात्री परिषद बनाने का है। यह घोषणा की गई कि केन्द्रीय और प्रान्तीय
विधानमण्डलों के चुनाव कराए जाएंगे। ये चुनाव तो बहुत पहले हो जाने चाहिए थे।
चुनाव की बात से भारतीय राजनीति में बड़ी खलबली मच गई और अत्यधिक उत्तेजना, समझौते की अंतहीन बातचीत और कटु वाद विवाद का
वातावरण पैदा हो गया।
असंतुलित और
अल्पविकसित भारतीय अर्थव्यवस्था युद्ध की लोलुप मांगों के कारण पूरी तरह तबाह हो
चुकी थी। वातावरण में
भ्रष्टाचार और बहशीपन की बदबू फैली थी। बंगाल पहले ही एक भयानक अकाल से
नष्ट हो चुका था।
बेईमानों ने युद्ध के दौरान बेपनाह मुनाफे कमाए थे। सरकार जनता के कल्याण के प्रति
उदासीन थी। गांधीजी तूफ़ान की सनसनाहट सुन रहे थे। पूना के नेचर क्योर क्लिनिक में
अपने तीन महीने के प्रवास के दौरान, गांधीजी शायद ही कभी उसके परिसर से बाहर निकले। वह मुख्य रूप से वल्लभभाई पटेल के लिए पूना गए
थे, जिन्हें नेचुरोपैथी इलाज की ज़रूरत थी। जनता को अपने भाग्य निर्माण को प्रेरित करने के
लिए, शिमला सम्मेलन के बाद गांधीजी बंगाल, असम और दक्षिण भारत की यात्रा पर गए। वे
जनता को भाग्य के निर्माण के लिए प्रेरित करते रहे। वे लोगों से कहते, “तुम्हारा भाग्य अंग्रेज़ों के नहीं, तुम्हारे
अपने हाथ में है। जैसे ही तुम दूसरों पर निर्भर रहना छोड़ दोगे, तुम्हें आज़ादी मिल
जाएगी। यही स्वाधीनता एकमात्र सच्ची स्वाधीनता है। इसे कोई तुमसे नहीं छीन सकता।”
बंगाल
में
30 नवंबर, 1945 को गांधीजी उस समय के गवर्नर रिचार्ड गाविन केसी
के बुलावे पर बंगाल के लिए रवाना हुए। शहर में पहुंचने के कुछ ही घंटों के अंदर, 1 दिसंबर को, उनकी
बंगाल के गवर्नर मिस्टर केसी से मुलाकात हुई। मिस्टर केसी ने उनसे कहा कि अगर वे मदद करें तो
राजनीतिक गतिरोध खत्म हो सकता है। गांधीजी ने जवाब दिया कि अगर सरकार ने भारत के
साथ पूरा न्याय करने का पक्का मन नहीं बनाया है, तो
उन्हें सरकार से बहुत कम मदद मिलेगी। मिस्टर केसी ने गांधीजी को भरोसा दिलाया कि
आज़ादी जल्द ही मिलने वाली है। अंग्रेजों ने मन बना लिया था। गांधीजी ने जवाब दिया
कि ऐसे में आने वाली घटनाओं की झलक पहले ही दिखनी चाहिए। उदाहरण के लिए, राजनीतिक कैदियों की रिहाई का सवाल था। मिस्टर
केसी ने कहा कि वे अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं।
दिसंबर 1945 में, वायसराय
लॉर्ड वेवेल ने एसोसिएटेड चैंबर्स को दिए अपने भाषण में अपनी नीति के बारे में कुछ
संकेत दिए। उसने भारतीय लोगों से अपील की कि जब वे 'राजनीतिक
और आर्थिक अवसर के दरवाज़े पर' खड़े
हैं, तो वे झगड़े और हिंसा से बचें। 10 दिसंबर को, कलकत्ता में गांधीजी की वायसराय लॉर्ड वेवेल से
मुलाक़ात हुई। इस 30 मिनट की मुलाक़ात को किसी भी दृष्टि से एक सफल मुलाक़ात नहीं कहा जा
सकता। वेवेल ने कहा, “भारत छोड़ो का नारा ऐसे किसी मंत्र का काम नहीं देगा, जिससे अली
बाबा की गुफा का दरवाज़ा खुल जाए। समझौते के लिए अलग-अलग दल हैं, जिन्हें किसी न
किसी तरह आपस में एक हद तक समझौता करना होगा।” गांधीजी ने जवाब दिया, “भारतीय प्रश्न का एकमात्र हल यह है कि अंग्रेज़
इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि भारत पर अधिकार बनाए रखने और ‘वानर-न्याय’ करते रहने का उन्हें
कोई नैतिक अधिकार नहीं है। जो भी दल शासन संभालने को तैयार हो उसे सत्ता सौंप कर
उन्हें भारत से चले जाना चाहिए।” वायसराय ने कांग्रेस
नेताओं के दिए जा रहे कड़े भाषणों के बारे में शिकायत की। गांधीजी ने उनसे
कहा कि अगर अंग्रेजों ने सच में जाने का फैसला कर लिया है, तो इस बात पर कोई
संवेदनशीलता नहीं होनी चाहिए।
जब वह कलकत्ता में
वायसराय के घर से निकले, तो एक बहुत बड़ी भीड़ ने सड़क रोक दी और जब तक उन्होंने बात
नहीं की, तब तक उनकी कार को आगे नहीं बढ़ने दिया। वह कार में खड़े हो
गए और कहा, 'भारत ने पूरब में अपनी महान स्थिति शांति के संदेश के कारण
हासिल की है।' इसके बाद भीड़ ने उनके लिए रास्ता बनाया ताकि वह शहर से आठ
मील दूर अपने आश्रम जा सकें। पूरे रास्ते में, उनके गुजरने से पहले
और बाद में भारतीयों ने सड़क की धूल को छुआ।
दिसम्बर के पहले
सप्ताह में कलकत्ते में कांग्रेस कार्य-समिति की बैठक रखी गई थी। इसमें चर्चा का
मुख्य मुद्दा था आगामी चुनाव। इस बैठक में गांधीजी ने कहा कि कांग्रेस की सच्ची
जीत तभी होगी जब वह एक पाई भी ख़र्च किए बिना चुनाव में जीते। रचनात्मक कार्य के
द्वारा ही कांग्रेसजन सत्याग्रह की शक्ति पैदा कर सकते हैं। गांधीजी की सलाह
कार्यसमिति ने मान ली।
उसी दिन, जिन्ना ने बंबई में एक
बयान दिया। उसने कहा, "अगर मिस्टर गांधी यह
कहें कि, 'मैं सहमत हूँ कि
पाकिस्तान होना चाहिए; मैं सहमत हूँ कि भारत का एक-चौथाई
हिस्सा, जिसमें छह प्रांत -
सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत
प्रांत, बंगाल और असम - अपनी
मौजूदा सीमाओं के साथ, पाकिस्तान राज्य बनाएंगे, तो हम दस मिनट में
भारतीय समस्या सुलझा सकते हैं।" लेकिन गांधीजी ऐसा कह नहीं सकते
थे और उन्होंने ऐसा कहा भी नहीं; वह भारत के बंटवारे को ईश्वर का
अपमान मानते थे।
18 दिसंबर को कुछ दिनों के लिए गांधीजी
शांतिनिकेतन भी गए। गांधीजी ने एक छोटा भाषण दिया, जिसमें
उन्होंने गुरुदेव की तुलना एक ऐसे पक्षी से की जिसके पंख फैले हुए थे और वह अपने
घोंसले पर बैठा था: "उनके पंखों की गर्मी में, शांतिनिकेतन
आज इतना बड़ा हुआ है। बंगाल उनके गीतों से भरा हुआ है। उन्होंने न केवल अपने गीतों
से, बल्कि अपनी कलम और ब्रश से भी पूरी दुनिया में
भारत का नाम रोशन किया है। हम सभी गुरुदेव के रक्षा करने वाले पंखों की गर्मी को
याद करते हैं। लेकिन हमें दुख नहीं करना चाहिए। इसका उपाय हमारे अपने हाथों में
है।" चार साल पहले गुरुदेव टैगोर और उनके मित्र ‘दीनबंधु’ दोनों का स्वर्गवास
हो चुका था। उन्होंने गुरुदेव को ‘शाश्वत प्रकाश’ कहा था। अपनी मृत्यु के पहले गुरुदेव ने
गांधीजी के कंधों पर दो जिम्मेदारियां डाल दी थी – एक शांतिनिकेतन के लिए धन की
व्यवस्था कराना और दूसरे शांतिनिकेतन के काम काज और प्रबंधन में गहरी दिलचस्पी
लेना। 19 तारीख को शांतिनिकेतन में प्रस्तावित दीनबंधु स्मारक अस्पताल की उन्होंने
आधारशिला रखी। गांधीजी ने गुरुदेव का गीत "यहाँ तेरा आसन है और वहाँ तेरे पैर टिकते हैं जहाँ सबसे गरीब, सबसे निचले और खोए हुए लोग रहते हैं" गाया।
20 दिसंबर को गांधीजी कलकत्ता पहुंचे। सोदपुर
आश्रम में हुई प्रार्थना सभा में भाषण देते हुए गांधीजी ने कहा कि वह बंगाल की
राजनीति या आने वाले चुनावों में हिस्सा लेने के लिए बंगाल नहीं आए हैं। बल्कि वह
सिर्फ़ बंगाल के लोगों के बीच अपनी मौजूदगी से अकाल पीड़ितों को सांत्वना देने और
उनकी तकलीफ़ कम करने के लिए जो कुछ भी कर सकते थे, वह
करने आए थे। उन दिनों मिदनापुर ज़िले में तूफान, बाढ़, अकाल और सरकारी दमन के कारण
भयंकर जान-माल का नुकसान हुआ था।
वह 24 तारीख की रात को सोदपुर से निकले और अगले
दिन महिषादल पहुँचे। उन्होंने सिर्फ़ मिदनापुर ज़िले को ही घूमने के लिए चुना, क्योंकि वहाँ पुलिस और सेना के दमन, चक्रवात और अकाल का सबसे बुरा दौर देखा गया था।
महीनों तक वहां धान के खेतों में मनुष्य और पशुओं की लाशें तैरती रहीं। वे वहां के
लोगों को सहारा देने गए थे।
आसाम
में
मिदनापुर से लौटकर गांधीजी ने आसाम का दौरा
किया। वह 9 जनवरी, 1946 को गुवाहाटी पहुंचे। इस यात्रा में वे
ब्रह्मपुत्र के साथ ऊपर की ओर ठेठ सुआलकुची तक गए। अगले दिन एक प्रार्थना सभा को
संबोधित करते हुए गांधी ने लोगों के अनुशासनहीन व्यवहार का ज़िक्र किया। उन्होंने
कहा कि इससे पता चलता है कि जनता ने अभी तक अहिंसा के सिद्धांत को पूरी तरह से
नहीं अपनाया है। उन्होंने आगे कहा कि अनुशासनहीनता भी एक तरह की हिंसा ही है। अंग्रेजों
को एक दिन यह एहसास ज़रूर होगा, जैसा
कि होना ही था, कि वे जागृत लोगों को हमेशा के लिए संगीनों की
ताकत से दबा नहीं सकते और इसलिए वे उन्हें सत्ता सौंपने का फैसला करेंगे। अगर
लोगों में अनुशासन और संगठन नहीं होगा, तो
ऐसी स्थिति में वे खुद को मुश्किल में पाएंगे। असम में अपने एक हफ़्ते के प्रवास
के दौरान, उन्होंने लोगों को रचनात्मक कार्यक्रम का महत्व
समझाया।
असम से गांधीजी मद्रास के लिए निकले। रास्ते
में वे उड़ीसा से गुज़रे। आधी रात को कटक पहुँचे। वहाँ बहुत भीड़ जमा थी और वे
उन्हें संबोधित करने के लिए ट्रेन से बाहर आए। वहाँ शोर और अफरा-तफरी थी। उन्होंने
कहा, "मुझे इन पड़ावों के दौरान आपकी स्वागत की
तालियाँ या आपका पैसा नहीं चाहिए। मैं चाहता हूँ कि आप अपनी आत्मा से झूठ को निकाल
दें। यह मुझे आपके तोहफों से ज़्यादा खुश करेगा, शोर
कभी नहीं करेगा और न ही कभी किया है।"
मद्रास
में
गांधीजी 21 जनवरी को मद्रास पहुंचे। 25 जनवरी
को मद्रास में उन्होंने दक्षिण भारतीय हिंदुस्तानी प्रचार सभा की रजत जयंती समारोह
का उद्घाटन किया। इस सभा के बाद उन्होंने श्रीनिवास शास्त्री और डॉ. जयकर तथा डॉ.
सप्रू और अन्य सभी संबंधित लोगों से कहा, “क्या आप भविष्य में मुझ से राष्ट्रभाषा में
पत्र-व्यवहार कर सकते हैं? हमारी सामान्य जनता की स्वाधीनता की पुकार झूठी और थोथी
होगी, यदि हम उसकी भाषा में बोलने और सोचने की आदत नहीं डालेंगे। यह काम या तो अभी
होगा या फिर कभी नहीं होगा।”
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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