चाय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चाय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 4 सितंबर 2010

फ़ुरसत में ….! कुल्हड़ की चाय!

फ़ुरसत में ….!

कुल्हड़ की चाय!


मनोज कुमार

मेहरबान! क़दरदान!!

कोलकाता !

बारीश की नम फुहार .. पूरबइया,पछुआ बयार .. पसीनों से सराबोर तन ... परोपकार से भरा मन .. लोकल की भीड़-भाड़ .. ट्रामों की सुस्त रफ्तार .. घर लौटते मजदूर थक-हार!! सुबह-सबेरे होती भोर .. देर रात तक ट्राफिक का शोर .. संस्कृति की पहचान .. कल्पनाओं की उड़ान .. शब्दों की मिठास .. सफलता का आकाश ... काली की आस्था .. मौलिकता की परकाष्ठा .. आपस का प्यार .. सिग्नल पर टैक्सी की कतार .. ! विक्टोरिया मेमोरियल .. हुगली कलकल छलछल ... दयानंद का ज्ञान .. परमहंस का मकान .. टैगोर की गीतांजली .. शरत की रचनावली !! बरसों का अपनापन .. आत्‍मीय, चिरपरिचित जन!

कोलकाता !

मुझे तुम अच्छे लगे!!

बंगाल की धरती, समाज को देखने और अनुभव करने के सुख के मामले में, अपने आप में अद्वितीय है। यहां की भूमि जहां एक ओर सहृदय, सामाजिक और रसिक लोगों की दुनियां है, वहीं दूसरी ओर जीवन की आपाधापी, और बिखराव के बीच परम्परा को सहेजती-समेटती दुनियां का आंगन भी है।

कोलकाता आप आइए तो आपको कुछ ही घंटो में ऐसा लगने लगेगा जैसे आप यहां बरसों से थे। बड़ा ही आत्‍मीय, परिचित और सगा-सा। वैसे तो पूरे देश में और खास कर सभी महानगरों में तेजी से बदलाव आ रहा है। कोलकाता भी इसका अपवाद नहीं है। बदलाव के साथ अगर इस शहर का मिजाज़ बदला है तो आत्मीय लोगों की भीड़ भी बढ़ी है। साथ ही साथ टैक्सियों, गाडि़यों, बसों के भोपुओं से निकलने वाली आवाज़ भी। उच्‍च न्‍यायालय ने निर्णय के बाद 15 साल से पुरानी बसों के सड़क से हटने के बाद नई, डिजाइनर बसें भी आ गई है। कुछ ट्रामों का कायाकल्‍प हुआ है तो कुछ नई आ गई है।

कुल्हड़ में चाय पीते हुए न तो मुझे ये लगा कि मैं देश की अर्थव्यवस्था पर शहीद हो गया हूं, और न ही ये कि देश में समाजवाद आ गया हो। बल्कि हर चुस्की के साथ मिट्टी का यह कुल्हड़ मुझे आपनी माटी के साथ जुड़े होने के मेरे संकल्प को और मज़बूत कर रहा था।

पर, .... जो सदा बहार है इस शहर में, वह है नुक्कड़ पर, फ़ुटपाथ पर, ठेले पर, यहां पर, वहां पर, कुल्‍हड़ की चाय !!! .... अहा !!! जब मैं पहली बार सत्तर के दशक में यहां आया था तब भी, नौकरी में आने के बाद जब नब्बे में आया था तब भी, चाय कुल्हड़ में मिलती थी, अभी भी मिलती है।

कोलकाता जब जगता है, तो सड़क किनारे की चाय की दुकानें भी कुल्‍हड़ के साथ जग जाती हैं। फुटपाथ अभी भी बहुत सारे लोगों का आवास है। और उनमें से कई आपको सुबह की चाय का सुबह-सुबह निमंत्रण देते मिलेंगे। एक और, ... जो खास बात है इस शहर में, वह है, हर नुक्कड़ पर, चौराहों पर, स्‍थानीय स्‍वयंसेवी दलों द्वारा प्रदत्त अखबार, एक खास किस्म के डिज़ाइन किए स्टैण्ड पर। आस पास के लोग सुबह-सुबह जुट जाते हैं इसे पढने। आज भी, कुल्‍हड़ चाय के साथ इन अखबारों को पढ़ते लोग भी, नहीं बदले हैं। ... और मज़े की बात तो यह है कि वे मोहनबगान से लेकर मैनचेस्‍टर युनाइटेड के परफारमेंस पर अपने विशिष्‍ट कमेंट के साथ चर्चारत हैं, आज भी !

अपनी मॉर्निन्ग वॉक के दर्मियान गुज़रते हुए खास स्थानीय अंदाज़ में बड़ी ही आत्मीयता से मुझे पकड़ा देता है चिड़्याखाना के सामने ठेला लगाए हुए चाय वाला! देसी, खालिस बंगाली कुल्हड़ की चाय! मेरे बगल से गुज़रते हुए मेहता सहब थोड़े से हत्प्रभ हैं, फ़ुटपाथ पर खड़े होकर कुल्हड़ में चाय पीते हुए मुझे देख कर। मैं अपनी चाय की चुस्कियों का मज़ा लेते हुए उन्हें नज़र अंदाज़ कर देता हूं।

कुल्हड़ में चाय पीते हुए न तो मुझे ये लगा कि मैं देश की अर्थव्यवस्था पर शहीद हो गया हूं, और न ही ये कि देश में समाजवाद आ गया हो। बल्कि हर चुस्की के साथ मिट्टी का यह कुल्हड़ मुझे आपनी माटी के साथ जुड़े होने के मेरे संकल्प को और मज़बूत कर रहा था।