गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान 

1886

गांधी जी तब सत्ताइस वर्ष के थे। उन्हें पता लगा कि बम्बई (मुंबई) में ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी फूट पड़ी। चारों तरफ़ घबराहट फैल गई। पूरे पश्चिम भारत में आतंक छा गया। जब बम्बई में प्लेग फैला तो राजकोट में भी खलबली मच गई। यह आवश्यक हो गया कि राजकोट में निवारक उपाय किए जाएं। गांधी जी ने हर बार की तरह इस बार भी सरकार को आरोग्य विभाग में अपनी सेवाएं अर्पित करने की इच्छा, पत्र द्वारा जता दीं। सार्वजनिक सेवा गांधी जी की राजनीति का मुख्य अंग थी। वे जनसेवा और देवाराधना में कोई व्यवधान न देखते थे। उनकी ईश्वरभक्ति जनता जनार्दन की सेवा थी।

उन्हें सनिटरी विजिटर्स कमिटी का सदस्य बना दिया गया। वे सार्वजनिक सेवा कार्य में जुट गए। सफ़ाई की सुचारु व्यवस्था में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। राजकोट नगर की आरोग्य रक्षा के लिए उन्होंने घर-घर और घर-बाहर की सफ़ाई का कार्यक्रम अपनाया। यह उन्हें काफ़ी रुचिकर काम लगा। गांधी जी ने शौचालय की सफ़ाई पर ज़ोर दियाउन्होंने कहा कि यही वह जगह जो इस बीमारी के फैलने का घर है।

शौचालयों का निरीक्षण

कमेटी ने निश्चय किया कि गली-गली जाकर शौचालयों का निरीक्षण किया जाए। पहली बार उन्हें भारतीय घरों में शौचालयों और सफ़ाई व्यवस्था को देखने का मौक़ा मिला था। अपने दौरों में उन्हें पता चला कि समृद्ध लोगों के घर, अत्यंत ग़रीब लोगों और विशेषकर अछूतों के घरों की तुलना में, कम साफ़ थे। उन दिनों अछूत माने जाने वाले लोगों को पहली बार उन्होंने उनके घरों में देखा। ग़रीब लोगों ने अपने शौचालय का निरीक्षण करने देने में बिल्कुल आनाकानी नहीं की। कुछ धनाढ़्य लोगों के शौचालयों और मूत्रालयों के बारे में उन्होंने लिखा है कि उच्चतम वर्ण के हिन्दू, ऐसी स्थायी सड़ांध में रह, खा और सो सकते होंगे, ऐसा सोचा न था। कई लोगों ने तो घरों का मुआयना करने की इज़ाज़त तक न दी। उनके शौचालय अधिक गन्दे थे, उनमें अंधेरा था, कुड्डी पर कीड़े बिलबिलाते थे। जीते-जी रोज़ नरक में प्रवेश करने जैसी स्थिति थी।

भारतीय समाज के अपने सुधार कार्य में उन्हें भविष्य में भी कई बड़े लोगों के कम सहयोग और अधिक प्रतिरोध का अनुभव होना था। बाद के दिनों में जब उन्होंने सुधार कार्यक्रमों को हाथ में लिया तो अपने सहकर्मियों से मल-मूत्र की टंकियों को साफ़ करने को कहते। उनका मानना था कि यह जातिप्रथा की जकड़न से हमे आज़ाद करेगा। उनका यह भी मानना था कि कोई काम खराब नहीं होता।

भंगी की बस्ती में

कमेटी भंगी की बस्ती में भी गई। गांधी जी के साथ सिर्फ़ एक सदस्य गया, अन्य कोई गण्यमान्य व्यक्ति नहीं गया। अन्य सदस्यों को लगा कि वहां जाना अनर्थक है। पर गांधी जी को भंगियों की बस्ती देखकर सानन्द आश्चर्य हुआ। भंगी लोगों को भी गांधी जी को वहां देख कर अचम्भा हुआ। जब गांधी जी ने शौचालय देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो उनमें से एक ने कहा, “हमारे यहां शौचालय कैसे? हमारे शौचालय तो जंगल में हैं। शौचालय तो आप बड़े आदमियों के यहां होते हैं।”

गांधी जी ने पूछा, “तो क्या आप अपने घर हमें देखने देंगे?”

“आइए न भाई साहब! जहां भी आपकी इच्छा हो, जाइये। ये ही हमारे घर हैं।”

जब वे अन्दर गए और घर तथा आंगन की सफ़ाई देखा तो ख़ुश हो गए। घर के अन्दर सब लिपा-पुता देखा। आंगन झाड़ा-बुहारा था। बरतन चमचमा रहे थे। गांधी जी को उस बस्ती में बीमारी फैलने का डर नहीं दिखाई दिया।

वैष्णव मंदिर में

वे उस वैष्णव मंदिर भी गए, जहां उनकी मां पुतली बाई देव-दर्शन के लिए नित्य-नियम से जाती थीं। वहां गए बिना मां अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। मंदिर के पुजारी ने उनका स्वागत किया। मंदिर के अहाते का कोना-कोना उन्होंने देखा। उन्हें देख कर दुख हुआ कि एक कोने में जूठी पत्तलों के ढ़ेर थे। वह भाग कौऔं और चीलों का अड्डा बन गया था। देव भूमि के आंचल में ही कूड़ाघर बन गया था। इस तरह के पवित्र स्थल पर तो आरोग्य के नियमों का अधिक से अधिक पालान होने की आशा रखी जाती है। गांधी जी को यह देखकर दुख हुआ कि जिस देश की सदियों से प्रथा रही हो अपना अंदर-बाहर को स्वच्छ रखने की वहां के लोग इस विषय में इतने असावधान और उदासीन हो गए हैं।

***

शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई

1901

जब गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका से भारत पहुंचे, उसी समय देश की राजधानी कलकत्ते में उस साल (1901, दिसम्बर) दिनशॉ एदलजी वाच्छा की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा का 17वां वार्षिक अधिवेशन हो रहा था। गांधी जी को लगा कि चूंकि कलकत्ते में सारे दिग्गजों का जमावड़ा होगा इसलिए शायद वहां भारत की नब्ज़ पकड़ में आ जाए। इसी सोच के साथ गांधी जी ने उस अधिवेशन में जाना तय किया। वहां आए प्रतिनिधि भी कुछ कम नहीं थे। उन्हें भी तो इतने ही दिन मिलते थे कुछ सीखने को। कांग्रेस के कामकाज के ढ़ंग ने गांधीजी को प्रभावित नहीं किया। उन्हें प्रतिनिधियों के बीच एकता की कमी का एहसास हुआ। वे अंग्रेजी में वार्तालाप कर रहे थे। उनके हावभाव एवं बातचीत में पाश्‍चात्य शैली टपक रही थी। वे अपने हाथ से कोई काम नहीं करते। सब बातों में उनके हुक्म निकलते, “स्वयंसेवक यह लाओ; स्वयं सेवक वह लाओ”। ऊपर से डेलिगेट की छुआछूत और खानपान की लंबी-चौड़ी व्यवस्था, दकियानुसी रंग-ढंग देख कर गांधी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, साथ ही दुख भी। छुआ-छूत को मानने वाले वहां बहुत से लोग उपस्थित थे। द्राविड़ी रसोई बिल्कुल अलग थी। उन प्रतिनिधियों को तो ‘दृष्टिदोष’ भी लगता था। उनके लिए कॉलेज के अहाते में चटाइयों का रसोईघर बनाया गया था। उसमें धुआं इतना रहता था कि आदमी का दम घुट जाए। खाना-पीना सब उसी के अन्दर। वह रसोईघर क्या था, एक तिजोरी थी। वह कहीं से भी खुला न था।

यह सब गांधी जी को चिंता में डाल रहा था। कांग्रेस में आनेवाले प्रतिनिधि जब इतनी छुआछूत मानते थे, तो उन्हें भेजने वाले लोग कितनी रखते होंगे? ऊपर से गंदगी की हद नहीं थी। कैम्प की अनिवार्य ज़रूरतों, जैसे साफ-सफाई आदि की तरफ किसी का जरा भी ध्यान नहीं था। शौचालय जाम था और चारों तरफ़ मल और पानी ही पानी फैल रहा था। शौचालयों की संख्य़ा ज़रूरत से कम थी। दुर्गन्ध चारों तरफ़ फैल रही थी। एक स्वयंसेवक को गांधी जी ने गन्दगी दिखाई। उसने कहा यह काम तो भंगी का काम है। गांधीजी उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। उनसे गंदगी और बदबू सहन नहीं हुई। बहुत परिश्रम से उन्होंने एक झाड़ू खोज निकाला। चुपचाप उन्होंने शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई शुरु कर दी। पर यह साफ़-सफ़ाई तो उनकी अपनी सुविधा के लिए हुई थी। भीड़ इतनी अधिक थी और शौचालय इतने कम कि हर बार के उपयोग के बाद उनकी सफ़ाई होनी ज़रूरी थी। वह काम गांधी जी अकेले तो कर नहीं पाते। यदि उनका वश चलता तो शौचालयों की सफ़ाई वे स्वयं ही करते, लेकिन उन्हें उसी शौचालय की सफ़ाई पर ही संतोष करना पड़ा, जिसे वे स्वयं इस्तेमाल कर रहे थे। गांधी जी ने अपने लिए तो वह काम कर लिया और उन्होंने यह पाया कि वहां आए लोगों को वह गन्दगी ज़्यादा अखरती भी नहीं थी।

लोगों की सफ़ाई का स्तर इतना गिरा हुआ था कि कि प्रतिनिधिगण रात में कमरे के बाहर सामने वाले बरामदे में ही टट्टी-पेशाब कर देते थे। उठने-बैठने, चलने-फिरने की जगह पर ऐसी गंदगी और बदबू थी की वहां रहना असह्य था। सवेरे गांधी जी ने स्वयंसेवकों को मैला दिखाया, पर कोई उसे साफ़ करने को तैयार न था। गंधी जी उसे साफ़ करने लगे।

लोगों ने उनसे पूछा, आप क्यों अछूतों का काम कर रहें हैं?”

गांधीजी का जवाब था क्योंकि सवर्ण लोगों ने इस जगह को अछूत बना दिया है

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8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    अष्टमी-नवमी और गाऩ्धी-लालबहादुर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    --
    मान्यवर,
    दिनांक 18-19 अक्टूबर को खटीमा (उत्तराखण्ड) में बाल साहित्य संस्थान द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।
    जिसमें एक सत्र बाल साहित्य लिखने वाले ब्लॉगर्स का रखा गया है।
    हिन्दी में बाल साहित्य का सृजन करने वाले इसमें प्रतिभाग करने के लिए 10 ब्लॉगर्स को आमन्त्रित करने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गयी है।
    कृपया मेरे ई-मेल
    roopchandrashastri@gmail.com
    पर अपने आने की स्वीकृति से अनुग्रहीत करने की कृपा करें।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
    सम्पर्क- 07417619828, 9997996437
    कृपया सहायता करें।
    बाल साहित्य के ब्लॉगरों के नाम-पते मुझे बताने में।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (03.10.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1755)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  3. आज भी स्वच्छता को लेकर हम बहुत गंभीर नहीं हैं।कूड़ेदान में कूड़ा न डालना,सड़क किनारे मूत्र-विसर्जन कर लेना आदि हमारी सामान्य आदतें हैं।प्रधानमंत्री द्वारा चलाये गए स्वच्छता अभियान का कोई भी असर मुझे मेरे मेहल्ले या वार्ड में नजर नहीं आया।आज से14वर्ष पूर्व जब आठ फ्लेट्स के अपने छोटे से अपार्टमेंट में मैंने रहवासियों को आसपास गंदगी न फैलाने की सलाह दी तो उन्होंने इस सलाह पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं समझी और अपना आचरण यथावत रखा।

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  4. गाँधी जी के विचारों को उनके फालोवेर ने छोड़ दिया था आदाजी से ही ... बस उनका नाम केश कर रहे हैं तब से ...
    आज भी अगर समाज अगर कुछ भी जागरूक हो जाए तो सुधार संभव है ...

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  5. बापू फिर याद आएं , जब काँग्रेस की सरकार नहीं हैं तब बात भले ही हज़म न हो पर सच है।
    http://savanxxx.blogspot.in

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  6. गांधी जी विचारों को व्यवहार में भी उतारते थे…

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