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शुक्रवार, 28 जून 2024

गांधी और गांधीवाद : 1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

 

गांधी और गांधीवाद

उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में लाया जा सके।

महात्मा गांधी

1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

मनोज कुमार

अनेक युगों के संचित पुण्य का मधुर फल

दुनिया में अनेक नैतिक दार्शनिक हुए हैं, जिनमें से यह कहना कि महात्मा गांधी का नाम सबसे ऊपर है, अतिशयोक्ति नहीं होगी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कल्पलता में कहा था, गांधी भारतवर्ष के अनेक युगों के संचित पुण्य का मधुर फल था। आइए हम गांधीजी के जीवन, दर्शन और विचारों की बात करें और उनके जीवन प्रसंगों से कुछ सीखने का प्रयत्न करें। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। उनका प्यार से पुकारा जाने वाला नाम था मनु, मोनिया, मोहन, मोहनदास, दक्षिण अफ़्रीका में सहयोगियों द्वारा भाई, सत्याग्रहियों द्वारा बापू। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर लोग उन्हें आदर से महात्मा कहते थे। उनके पिता का नाम  करमचन्द गांधी और माता का नाम पुतली बाई था। पिता श्री करमचन्द गांधी (काबा गांधी) राजकोट, पोरबंदर के दीवान थे। माता पुतली बाई अत्यंत धार्मिक और श्रद्धालु महिला थीं। गांधी जी के दादा का नाम उत्तमचंद गांधी था। बचपन में गांधी जी के माता-पिता एवं मित्र उन्हें मोनिया कह कर पुकारते थे।

गांधी परिवार

गांधी परिवार जाति से बनिया, व्यवसाय से पंसारी था। मूल निवासी वे जूनागढ़ के कुतियाणा गांव के थे। गांधी वंश के एक उद्योगी सदस्य हरजीवन गांधी ने 1777 में पोरबंदर में एक मकान ख़रीदा था। अपने बाल-बच्चों के साथ वह वहीं बस गए। छोटा-मोटा व्यापार करने लगे। हरजीवन के बेटे उत्तमचंद गांधी थे। उत्तमचंद (ओता) गांधी के कार्यों से प्रभावित होकर वहां के राणा खीमाजी ने उन्हें अपनी रियासत पोरबंदर का दीवान बनाया। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पोरबंदर गुजरात-काठियावाड़ की तीन सौ रियासतों में से एक रियासत थी। इसके शासक को राणा या ठाकुर या नवाब कहा जाता था। वे तानाशाह होते थे। ये एक दूसरे से जलते थे और आपस में भिड़ते रहते थे। चूंकि वे ब्रिटिश की मदद से राज करते थे, इसलिए ब्रिटिश रेजिडेंट का भय उनको क़ाबू में रखता था। वातावरण सामंती होता था। लोग यहां के हट्टे-कट्ठे होते थे। लोगों की समुद्र यात्रा और व्यापारिक उद्यमशीलता की एक परंपरा थी। यहां के लोग वैष्णव परंपरा में विश्वास रखते थे, जिस पर आगे चलकर जैन धर्म और सूफ़ीवाद ने अपना प्रभाव डाला। इसका परिणाम यहां के लोगों के रूढ़िवाद और सहिष्णुता, उदासीनता और करुणा, भोग और त्याग के एक विशेष प्रकार के मिश्रण के रूप में देखा जा सकता है। काठियावाड़ एक पिछड़ा और सामंती इलाक़ा था। उत्तमचंद गांधी एक सच्चरित्र, ईमानदार और निर्भीक व्यक्ति होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक थे। राजा, ब्रिटिश सत्ता के पोलिटिकल एजेंट और प्रजा के बीच वह काफी कूटनीतिक होशियारी, समझदारी और व्यवहारकुशलता से समन्वय बनाकर काम करते थे। जब वह दीवान बने तो पोरबंदर क़र्ज़ में डूबा हुआ था। दीवान बनने के बाद उन्होंने पोरबंदर को क़र्ज़ मुक्त किया। बदक़िस्मती से राणा खीमाजी का जवानी में ही देहावसान हो गया। महारानी ने हुकूमत की बागडोर संभाली। महारानी को दीवान उत्तमचंद की सच्चाई, स्वाभिमान और स्वतंत्र रूप से काम करने की आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी। एकबार एक ईमानदार कर्मचारी कोठारी ने महारानी की बंदियों का ग़लत हुक्म मानने से इंकार कर दिया। उसे बंदी बनाने का हुक्म दिया गया। उत्तमचंद ने उस कर्मचारी को अपने यहाँ शरण दी। महारानी गुस्से आगबबूला होकर फौज का एक दस्ता उत्तमचंद के घर पर भेज दिया। तोपें चलवा दीं। बहुत दिनों तक उत्तमचंद का घर गोली बारी का निशाना बना रहा। पोलिटिकल एजेंट को जब इस बात का पता चला तो उसने रानी की कार्रवाई को रुकवा दिया। इस घटना के बाद उत्तमचंद ने पोरबंदर छोड़ दिया और जूनागढ रियासत के अपने पैतृक गांव में आकर रहने लगे। वहां के मुसलमान नवाब ने उत्तमचंद को बुलवाया। उनका स्वागत-सत्कार किया। दरबार में उत्तमचंद ने नवाब को बाएं हाथ से सलाम किया। किसी ने उनसे इस गुस्ताख़ी का कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया, मेरा दाहिना हाथ तो सब कुछ हो जाने पर भी पोरबंदर को ही अपना मालिक तसलीम करता है। इस बेअदबी के लिए उन्हें धूप में दस मिनट तक नंगे पैर खड़े रहने की सज़ा दी गई। लेकिन साथ ही नवाब उनकी स्वामीभक्ति से ख़ुश भी हुआ और इनाम में यह ऐलान किया कि यदि वह अपने पुश्तैनी गांव में व्यापार करना चाहें तो उनसे चुंगी नहीं ली जाएगी। इस बीच रानी की मृत्यु हो गई। उसके बाद राणा विक्रमजीत सिंह पोरबंदर की गद्दी पर बैठे। उन्होंने उत्तमचंद को दीवान बनने के लिए न्यौता दिया। लेकिन उत्तमचंद इसके लिए राज़ी नहीं हुए। तो 1847 में उत्तमचंद के बेटे करमचंद को पच्चीस वर्ष की उम्र में पोरबंदर का दीवान बनाया गया। उत्तमचंद गांधी के दो विवाह हुए थे। पहले विवाह से उनके चार बच्चे थे और दूसरे से दो। इसमें से पांचवे करमचंद गांधी (काबा गांधी) और सातवें तुलसीदास गांधी थे।

अपने पिता की तरह करमचंद गांधी ने भी मामूली शिक्षा पाई थी। लेकिन वे साहसी और दृढ़ चरित्र के स्वामी थे। व्यावहारिक सहजबुद्धि उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। आट्ठाइस सालों तक वह पोरबंदर के दीवान रहे। करमचंद भी अपने पिता की तरह ही सच्चे और निडर थे और साथ ही राज्य के प्रति वफादार थे। उनका भी राजा से किसी बात को लेकर अनबन हो गई। तब वे अपने भाई तुलसीदास को दीवानगीरी सौंपकर राजकोट चले आए और वहां के दीवान बन गए। एक बार राजकोट के पोलिटिकल एजेंट ने महाराज के लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया। इससे नाराज़ करमचंद ने उसे बुरी तरह फटकारा। करमचंद को इस गुस्ताख़ी के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया। उनसे माफ़ी मांगने के लिए कहा गया। उन्होंने माफ़ी नहीं मांगी। उनकी इस निडरता से वह अंग्रेज़ अफसर काफी प्रभावित हुआ और उन्हें छोड़ दिया।

गांधीजी का जन्म

पोरबंदर के दीवान होते हुए भी करमचंद अपने पांचो भाईयों के साथ उसी तिमंजिले पैतृक मकान में रहते थे। एक के बाद एक करमचंद की तीन पत्नियों की मृत्यु हो गई। चालीस से ऊपर की उम्र में उन्होंने पुतलीबाई से चौथा विवाह किया। वह उनसे उम्र में बीस वर्ष छोटी थीं। उनसे तीन पुत्र हुए – लक्ष्मीदास (काला), कृष्णदास (करसनिया) और मोहनदास (मोनिया)। रलियात (गोकी) नामक एक पुत्री भी हुई। पहली पत्नियों से करमचंद के दो पुत्रियां और भी थीं। मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 (संवत्‌ 1925 की भादो वदी बारस के दिन) काठियावाड़ के पोरबंदर के सुदामापुरी नामक स्थान (गुजरात) में हुआ था। पोरबंदर उस समय बंबई प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत के तहत एक छोटी सी रियासत काठियावाड़ में कई छोटे राज्यों में से एक था।

भारत की स्थिति

गांधीजी के जन्म के समय तक (1869) ब्रिटिश राज्य भारत में अपनी जड़ें जमा चुका था। 1857 का सिपाही विद्रोह ने एक व्यापारी कम्पनी को एक साम्राज्य के रूप में रूपांतरित कर दिया था। भारत अब अंग्रेज़ों के अधीन था। यह अधीनता न सिर्फ़ राजनीतिक, बल्कि सामाजिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक भी थी। और जब गांधीजी की मृत्यु हुई तो भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र था। वंचित लोगों को उनकी विरासत मिल चुकी थी। यह एक चमत्कार से कम नहीं था कि गांधीजी द्वारा चलाए जाने वाले एक अहिंसक आंदोलन ने शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को भारत छोड़कर चले जाने पर विवश किया। वह देश के राष्ट्रपिता कहलाए।

गांधीजी एक समाज-सुधारक संत

मूलतः गांधीजी एक समाज-सुधारक संत थे। उनका मुख्य कार्य जनता को प्रबुद्ध बनाना था। उन्होंने समाज को नया मार्ग बताया, एक नई दिशा दी। उन्होंने किसी दर्शन और धर्म को जन्म नहीं दिया, किसी सम्प्रदाय की स्थापना नहीं की। फिर भी एक विचारक के रूप में हमारे सामने आए। उनके मत को हम गांधीवाद कहते हैं। गांधीवाद ने सारे विश्‍व को एक नई दिशा दी। गांधीजी ने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया। सत्य के मार्ग पर चलकर किए गए कार्यों ने उन्हें जीते जी संत बना दिया। इसका सबसे प्रमुख कारण यह था कि वे दुनिया की मोहमाया से अपने आपको अलग रख पाए। वह सच के रास्ते पर जीवन भर चलते रहे। अपने व्यवहार, आदर्श और विचारों से उन्होंने पूरे देश का आचरण ही बदल डाला। उनका व्यक्तित्व हमें हमेशा प्रेरणा देता रहता है। अपने जीवन में वे जब-जब अत्यंत विनीत लगे तब-तब वे अत्यंत शक्तिशाली थे, साथ ही अत्यंत व्यावहारिक भी। पं. सोहन लाल द्विवेदी की "युगावतार गांधी" शीर्षक कविता की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं

चल पड़े जिधर दो पग डगमग,

चल पड़े कोटि पग उसी ओर,

पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि,

गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।

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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान 

1886

गांधी जी तब सत्ताइस वर्ष के थे। उन्हें पता लगा कि बम्बई (मुंबई) में ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी फूट पड़ी। चारों तरफ़ घबराहट फैल गई। पूरे पश्चिम भारत में आतंक छा गया। जब बम्बई में प्लेग फैला तो राजकोट में भी खलबली मच गई। यह आवश्यक हो गया कि राजकोट में निवारक उपाय किए जाएं। गांधी जी ने हर बार की तरह इस बार भी सरकार को आरोग्य विभाग में अपनी सेवाएं अर्पित करने की इच्छा, पत्र द्वारा जता दीं। सार्वजनिक सेवा गांधी जी की राजनीति का मुख्य अंग थी। वे जनसेवा और देवाराधना में कोई व्यवधान न देखते थे। उनकी ईश्वरभक्ति जनता जनार्दन की सेवा थी।

उन्हें सनिटरी विजिटर्स कमिटी का सदस्य बना दिया गया। वे सार्वजनिक सेवा कार्य में जुट गए। सफ़ाई की सुचारु व्यवस्था में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। राजकोट नगर की आरोग्य रक्षा के लिए उन्होंने घर-घर और घर-बाहर की सफ़ाई का कार्यक्रम अपनाया। यह उन्हें काफ़ी रुचिकर काम लगा। गांधी जी ने शौचालय की सफ़ाई पर ज़ोर दियाउन्होंने कहा कि यही वह जगह जो इस बीमारी के फैलने का घर है।

शौचालयों का निरीक्षण

कमेटी ने निश्चय किया कि गली-गली जाकर शौचालयों का निरीक्षण किया जाए। पहली बार उन्हें भारतीय घरों में शौचालयों और सफ़ाई व्यवस्था को देखने का मौक़ा मिला था। अपने दौरों में उन्हें पता चला कि समृद्ध लोगों के घर, अत्यंत ग़रीब लोगों और विशेषकर अछूतों के घरों की तुलना में, कम साफ़ थे। उन दिनों अछूत माने जाने वाले लोगों को पहली बार उन्होंने उनके घरों में देखा। ग़रीब लोगों ने अपने शौचालय का निरीक्षण करने देने में बिल्कुल आनाकानी नहीं की। कुछ धनाढ़्य लोगों के शौचालयों और मूत्रालयों के बारे में उन्होंने लिखा है कि उच्चतम वर्ण के हिन्दू, ऐसी स्थायी सड़ांध में रह, खा और सो सकते होंगे, ऐसा सोचा न था। कई लोगों ने तो घरों का मुआयना करने की इज़ाज़त तक न दी। उनके शौचालय अधिक गन्दे थे, उनमें अंधेरा था, कुड्डी पर कीड़े बिलबिलाते थे। जीते-जी रोज़ नरक में प्रवेश करने जैसी स्थिति थी।

भारतीय समाज के अपने सुधार कार्य में उन्हें भविष्य में भी कई बड़े लोगों के कम सहयोग और अधिक प्रतिरोध का अनुभव होना था। बाद के दिनों में जब उन्होंने सुधार कार्यक्रमों को हाथ में लिया तो अपने सहकर्मियों से मल-मूत्र की टंकियों को साफ़ करने को कहते। उनका मानना था कि यह जातिप्रथा की जकड़न से हमे आज़ाद करेगा। उनका यह भी मानना था कि कोई काम खराब नहीं होता।

भंगी की बस्ती में

कमेटी भंगी की बस्ती में भी गई। गांधी जी के साथ सिर्फ़ एक सदस्य गया, अन्य कोई गण्यमान्य व्यक्ति नहीं गया। अन्य सदस्यों को लगा कि वहां जाना अनर्थक है। पर गांधी जी को भंगियों की बस्ती देखकर सानन्द आश्चर्य हुआ। भंगी लोगों को भी गांधी जी को वहां देख कर अचम्भा हुआ। जब गांधी जी ने शौचालय देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो उनमें से एक ने कहा, “हमारे यहां शौचालय कैसे? हमारे शौचालय तो जंगल में हैं। शौचालय तो आप बड़े आदमियों के यहां होते हैं।”

गांधी जी ने पूछा, “तो क्या आप अपने घर हमें देखने देंगे?”

“आइए न भाई साहब! जहां भी आपकी इच्छा हो, जाइये। ये ही हमारे घर हैं।”

जब वे अन्दर गए और घर तथा आंगन की सफ़ाई देखा तो ख़ुश हो गए। घर के अन्दर सब लिपा-पुता देखा। आंगन झाड़ा-बुहारा था। बरतन चमचमा रहे थे। गांधी जी को उस बस्ती में बीमारी फैलने का डर नहीं दिखाई दिया।

वैष्णव मंदिर में

वे उस वैष्णव मंदिर भी गए, जहां उनकी मां पुतली बाई देव-दर्शन के लिए नित्य-नियम से जाती थीं। वहां गए बिना मां अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। मंदिर के पुजारी ने उनका स्वागत किया। मंदिर के अहाते का कोना-कोना उन्होंने देखा। उन्हें देख कर दुख हुआ कि एक कोने में जूठी पत्तलों के ढ़ेर थे। वह भाग कौऔं और चीलों का अड्डा बन गया था। देव भूमि के आंचल में ही कूड़ाघर बन गया था। इस तरह के पवित्र स्थल पर तो आरोग्य के नियमों का अधिक से अधिक पालान होने की आशा रखी जाती है। गांधी जी को यह देखकर दुख हुआ कि जिस देश की सदियों से प्रथा रही हो अपना अंदर-बाहर को स्वच्छ रखने की वहां के लोग इस विषय में इतने असावधान और उदासीन हो गए हैं।

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शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई

1901

जब गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका से भारत पहुंचे, उसी समय देश की राजधानी कलकत्ते में उस साल (1901, दिसम्बर) दिनशॉ एदलजी वाच्छा की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा का 17वां वार्षिक अधिवेशन हो रहा था। गांधी जी को लगा कि चूंकि कलकत्ते में सारे दिग्गजों का जमावड़ा होगा इसलिए शायद वहां भारत की नब्ज़ पकड़ में आ जाए। इसी सोच के साथ गांधी जी ने उस अधिवेशन में जाना तय किया। वहां आए प्रतिनिधि भी कुछ कम नहीं थे। उन्हें भी तो इतने ही दिन मिलते थे कुछ सीखने को। कांग्रेस के कामकाज के ढ़ंग ने गांधीजी को प्रभावित नहीं किया। उन्हें प्रतिनिधियों के बीच एकता की कमी का एहसास हुआ। वे अंग्रेजी में वार्तालाप कर रहे थे। उनके हावभाव एवं बातचीत में पाश्‍चात्य शैली टपक रही थी। वे अपने हाथ से कोई काम नहीं करते। सब बातों में उनके हुक्म निकलते, “स्वयंसेवक यह लाओ; स्वयं सेवक वह लाओ”। ऊपर से डेलिगेट की छुआछूत और खानपान की लंबी-चौड़ी व्यवस्था, दकियानुसी रंग-ढंग देख कर गांधी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, साथ ही दुख भी। छुआ-छूत को मानने वाले वहां बहुत से लोग उपस्थित थे। द्राविड़ी रसोई बिल्कुल अलग थी। उन प्रतिनिधियों को तो ‘दृष्टिदोष’ भी लगता था। उनके लिए कॉलेज के अहाते में चटाइयों का रसोईघर बनाया गया था। उसमें धुआं इतना रहता था कि आदमी का दम घुट जाए। खाना-पीना सब उसी के अन्दर। वह रसोईघर क्या था, एक तिजोरी थी। वह कहीं से भी खुला न था।

यह सब गांधी जी को चिंता में डाल रहा था। कांग्रेस में आनेवाले प्रतिनिधि जब इतनी छुआछूत मानते थे, तो उन्हें भेजने वाले लोग कितनी रखते होंगे? ऊपर से गंदगी की हद नहीं थी। कैम्प की अनिवार्य ज़रूरतों, जैसे साफ-सफाई आदि की तरफ किसी का जरा भी ध्यान नहीं था। शौचालय जाम था और चारों तरफ़ मल और पानी ही पानी फैल रहा था। शौचालयों की संख्य़ा ज़रूरत से कम थी। दुर्गन्ध चारों तरफ़ फैल रही थी। एक स्वयंसेवक को गांधी जी ने गन्दगी दिखाई। उसने कहा यह काम तो भंगी का काम है। गांधीजी उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। उनसे गंदगी और बदबू सहन नहीं हुई। बहुत परिश्रम से उन्होंने एक झाड़ू खोज निकाला। चुपचाप उन्होंने शौचालय एवं मूत्रालय की सफाई शुरु कर दी। पर यह साफ़-सफ़ाई तो उनकी अपनी सुविधा के लिए हुई थी। भीड़ इतनी अधिक थी और शौचालय इतने कम कि हर बार के उपयोग के बाद उनकी सफ़ाई होनी ज़रूरी थी। वह काम गांधी जी अकेले तो कर नहीं पाते। यदि उनका वश चलता तो शौचालयों की सफ़ाई वे स्वयं ही करते, लेकिन उन्हें उसी शौचालय की सफ़ाई पर ही संतोष करना पड़ा, जिसे वे स्वयं इस्तेमाल कर रहे थे। गांधी जी ने अपने लिए तो वह काम कर लिया और उन्होंने यह पाया कि वहां आए लोगों को वह गन्दगी ज़्यादा अखरती भी नहीं थी।

लोगों की सफ़ाई का स्तर इतना गिरा हुआ था कि कि प्रतिनिधिगण रात में कमरे के बाहर सामने वाले बरामदे में ही टट्टी-पेशाब कर देते थे। उठने-बैठने, चलने-फिरने की जगह पर ऐसी गंदगी और बदबू थी की वहां रहना असह्य था। सवेरे गांधी जी ने स्वयंसेवकों को मैला दिखाया, पर कोई उसे साफ़ करने को तैयार न था। गंधी जी उसे साफ़ करने लगे।

लोगों ने उनसे पूछा, आप क्यों अछूतों का काम कर रहें हैं?”

गांधीजी का जवाब था क्योंकि सवर्ण लोगों ने इस जगह को अछूत बना दिया है

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सोमवार, 22 सितंबर 2014

सत्याग्रह का आंदोलन फिर से …

गांधी और गांधीवाद-159

सत्याग्रह का आंदोलन फिर से …

1913

शादियां अवैध घोषित कर दी गई

उधर जनरल स्मट्स के धोखे से भारतवासियों का रोष बढ़ रहा था। इस बीच उच्चतम न्यायालय के बाई मरियम के एक मुकदमे के फैसले ने आग में घी का काम किया। इस घटना ने स्त्रियों को भी लड़ाई में शामिल कर लेने का मौका दे दिया। तीन पौंड के कर को हटा लिए जाने के गोखले को दिए गए वादे को निभाने के विपरीत, भारतीय वहां के सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से और भड़क उठे, जिसके अनुसार हिंदू, मुस्लिम और पारसी रीति-रिवाज़ से सम्पन्न दक्षिण अफ्रीका में गैर-ईसाइयों की शादियां अवैध घोषित कर दी गई। भारत के अधिकांश विवाहित लोग दक्षिण अफ़्रीका गए थे और उनमें से कुछ ने वहीं विवाह किया था। भारत में सामान्य विवाहों की रजिस्ट्री कराने का क़ानून तो था नहीं। धार्मिक क्रिया ही काफ़ी समझी जाती थी। दक्षिण अफ़्रीका में भी भारतीयों के लिए यही प्रथा होनी चाहिए थी।

हुआ यह कि केपटाउन के एक मुसलमान व्यापारी हसन ईसप की पत्नी बाई मरियम भारत से आई थी। इमीग्रेशन वालों ने उसे अफ़्रीका की धरती पर उतरने नहीं दिया। उसके परिजनों ने कोर्ट में न्याय की गुहार लगाई। हाई कोर्ट के जज सरले ने फैसला दिया कि पत्नी को पति के साथ रहने का पूरा हक़ है। लेकिन यह सवाल भी उठाया कि यह महिला वास्तव में पत्नी है कि नहीं यह तभी माना जाएगा जब उसके विवाह का क़ानूनी सबूत न पेश किया जाए। दक्षिण अफ़्रीका के क़ानून में वही विवाह जायज माना जाएगा जो ईसाई धर्म की रीति से सम्पन्न हुआ हो और जिसकी रजिस्ट्री विवाह के अधिकारी के यहां करा ली गई हो। हिंदू, मुसलमान, पारसी शादियां तो धार्मिक रीति से होती है। इसका कोई क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं होता। कोई लिखित सबूत नहीं होता। इसलिए कोई क़ानूनी सबूत न होने के कारण उस महिला को दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने वापस भारत भेज दिया।

सत्याग्रह का आंदोलन को फिर से प्रज्ज्वलित

इस फैसले ने भारतवासियों को जड़मूल से अफ़्रीका से निकाल देने की स्थिति खड़ी कर दी। इस फैसले का अर्थ यह था कि जो शादियां सरकारी क़ाग़ज़ातों में दर्ज़ हों, वही मान्य होंगी। बाक़ी शादिया अवैध मानी जाएंगी। अर्थात विवाहित पत्नी का दर्ज़ा एक रखैल के बराबर हो गया था। ऊपर से उनके बच्चों को नाजायज़ होने के नाते पिता की संपत्ति का भी कोई अधिकार नहीं रहेगा। भारतीयों की मृत्यु के उपरांत उनकी संपत्ति सरकार हड़प सकती थी। यह एक ऐसी स्थिति थी, जिसे स्त्री-पुरुष दोनों नहीं सह सकते थे। यह भारतीयों के अपमान की पराकाष्ठा थी। इस फैसले से पूरे देश में भारतीय भड़क गए। इतना तो किसी अन्य बात ने भारतीयों को आहत नहीं किया था। इस फैसले ने लगभग बंद पड़े सत्याग्रह के आंदोलन को एक बार फिर से प्रज्ज्वलित कर दिया। उक्त निर्णय के विरुद्ध अपील की जाए या नहीं, इस पर विचार करने के लिए सत्याग्रह-मंडल की बैठक हुई। सभी ने निश्चय किया कि ऐसे मामले में अपील हो ही नहीं सकती। गांधी जी ने पत्र आदि लिख कर यह प्रयास किए कि सरकार अपनी भूल सुधार ले। लेकिन मदांध सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। 10 मई 1913 को गांधी जी ने सरकार के साथ हुए पत्र-व्यवहार को ‘इंडियन ओपिनियन’ में प्रकाशित कर दिया। इस पत्र के प्रकाशन से सत्याग्रह की अनिवार्यता लोगों की समझ में आ गई।

महिलाएं भी सत्याग्रह में

गांधी जी ने भारतीय समुदाय के बंधुआ मज़दूरों कुछ वीर स्त्रियां सत्याग्रह में शामिल होने की मांग पहले भी कर चुकी थीं। जब बिना परवाना दिखाए फेरी करके जेल जाना शुरू हुआ था, तब फेरी करने वालों की स्त्रियों ने भी जेल जाने की इच्छा प्रकट की थी। पर उस वक़्त परदेश में स्त्रीवर्ग को जेल भेजना गांधी जी को अयोग्य जान पड़ा था। इसके साथ-साथ यह भी दिखाई दिया था कि जो क़ानून खास तौर पर मर्दों पर लागू होता हो उसको रद्द कराने में स्त्रियों को शामिल करना उचित नहीं है। इतने वर्षों से चल रहे सत्याग्रह आंदोलन में सत्याग्रहियों की ओर से नैतिक आचार-विचार का बड़ा ऊंचा स्तर रखा गया था। उन्होंने कभी सरकार को तंग करके अनुचित लाभ नहीं लिया। हर कदम पर सरकार को मौक़ा दिया, ताकि वह अत्याचारी नीति बदल सके। इसीलिए गांधी जी ने महिलाओं को सत्याग्रह आंदोलन में शामिल नहीं होने दिया था। उनकी आड़ लेकर वे विपक्ष के साथ अन्याय नहीं करना चाहते थे। वे सरकार को बदनाम नहीं करना चाहते थे कि उसने महिलाओं को भी कष्ट दिया। लेकिन इस बार तो स्त्रियां, जिनका खास तौर से अपमान होता था, उन्हें लगा कि इस अपमान को दूर करने के लिए वे भी बलिदान हो जाएं तो अनुचित न होगा। हुआ भी यही, अब स्त्रियों को रोकना संभव नहीं था। इस बार तो, घर-घर की महिलाएं, जो अब तक आंदोलन में सक्रिय नहीं थीं, भी आंदोलन में कूद पड़ीं। उनमें बलिदान की मशाल जल उठी। इस अन्याय को सह पाना असंभव हो गया था। लोग स्वाभिमान की रक्षा में मर-मिटने को तैयार थे। अब सत्याग्रह को विशाल मंच मिल गया था।

सबसे पहले टॉल्सटॉय फार्म की महिलाओं ने अपनी मान-मर्यादा की रक्षा के लिए सत्याग्रह करने का निश्चय किया। गांधी जी ने तय किया कि महिलाओं का एक जत्था बिना अनुमति के ट्रांसवाल से नेटाल जाएगा। इनमें से कई महिलाओं की गोद में बच्चे थे, लेकिन अपनी इज़्ज़त की रक्षा के लिए वे सारे कष्ट सहने को तैयार थीं। ग्यारह महिलाओं का एक जत्था क़ानून भंग करने के आशय से ट्रांसवाल की सरहद से बिना परमिट नेटाल प्रांत में प्रवेश किया। लेकिन सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया। अपराध करके जेल जाना आसान है। निर्दोष होते हुए अपने-आपको गिरफ़्तार करना कठिन है। जो अपनी ख़ुशी से और निरपराध होते हुए जेल जाना चाहता है उसको पुलिस तभी पकड़ती है जब वह इसके लिए लाचार हो जाती है। उन बहनों का पहला यत्न विफल हुआ। अब उन महिलाओं के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि वह किस तरह अपने-आपको गिरफ़्तार कराएं।

अब गांधी जी ने सोचा कि फीनिक्स के अपने साथियों को इस आंदोलन में लगाएंगे। फिनिक्स में रहनेवाले गांधी जी के अंतरंग सहयोगी और संबंधी थे। यह सोचा गया कि अख़बार चलाने के लिए जितने आदमी चाहिए उतने आदमियों और सोलह बरस से नीचे के लड़के-लड़कियों को छोड़कर बाक़ी सबको जेल-यात्रा के भेज दिया जाए। इस सोलह आदमियों की मंडली को सरहद लांघकर ट्रांसवाल में बिना परवाने के प्रवेश करने के अपराध में गिरफ़्तार कराना था। इस कदम की बात किसी को नहीं बताई गई, नहीं तो पुलिस को पता चल जाने का ख़तरा था। यह भी तय किया गया कि पुलिस को नाम-पता भी नहीं बताना था, नहीं तो यदि वे जान जाते तो शायद उन्हें पता चल जाता कि वे सभी गांधी जी के सहयोगी हैं। इसके साथ-साथ यह भी तय किया गया कि उन बहनों को भी नेटाल में दाखिल होना है जो ट्रांसवाल में दाखिल होने का विफल प्रयत्न कर रही थीं। तय हुआ कि पुलिस इन बहनों को पकड़ें तो ये अपने-आपको नेटाल में गिरफ़्तार करा दें और यदि ना पकड़ें तो नेटाल के कोयले खानों के केन्द्र न्यूकैसल में जाकर वहां के गिरमिटिया मज़दूरों से खानों से निकल आने का अनुरोध करें। मज़दूर यदि इन बहनों की बात सुनकर काम छोड़ दें तो सरकार मज़दूरों के साथ-साथ उन्हें भी गिरफ़्तार किए बिना नहीं रहती। यह सब योजना बनाकर गांधी जी फिनिक्स गए।

कस्तूरबाई ने सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया

फिनिक्स में गांधी जी ने सबके साथ बातें की। उन्होंने वहां रहनेवाली महिलाओं के साथ जेल जाने के संबंध में मशवारा किया। उन्हें डर था कि कसौटी के समय डरकर या जेल में जाने के बाद वहां के कष्ट से घबराकर माफ़ी न मांग लें। कस्तूरबा के बारे में तो उन्होंने निश्चय कर लिया था कि उनको जेल जाने के बारे में कभी नहीं कहेंगे। दूसरी महिलाओं से तो उन्होंने बात की पर इस विषय में कस्तूरबा से उन्होंने कोई बात नहीं की। महिलाओं ने तुरंत ही जेल जाने के लिए हामी भर दी और गांधी जी को विश्वास दिलाया कि कैसे भी कष्ट क्यों न सहने पड़े, वे अपनी सज़ा की मुद्दत पूरी करेंगीं। जब कस्तूरबा ने फीनिक्स आश्रम में गांधी जी को कुछ भारतीय महिलाओं के साथ उनके सत्याग्रह में शामिल होने की बात करते सुना, तो उन्होंने गांधी जी से पूछा, “मुझे दुख है कि आप मुझसे इस जेल जाने के संबंध में कुछ नहीं कह रहे। मुझमें क्या खराबी है कि मैं जेल नहीं जा सकती? जिस रास्ते पर चलने की सलाह आप औरों को दे रहे हैं उस पर मैं भी चलना चाहती हूं।”

गांधी जी यह नहीं चाहते थे कि कोई उनके कहने से जेल जाए। उनका मानना था कि सत्याग्रह तो स्व-प्रेरणा से ही टिक सकता है। भारतीय पत्नी तो पति की सब इच्छाओं को आज्ञा समझ कर पालन करती हैं। लेकिन ऐसी आज्ञाकारिता हृदय, बुद्धि से उद्भावित न हो, तो ऐन मौक़े पर हिम्मत और आस्था टूट जाएगी. तब और भी दुख की बात हो जाएगी। इसलिए गांधी जी कस्तूरबाई से कुछ भी कहने से हिचकिचाते थे। गांधी जी कस्तूरबाई के स्वास्थ्य के बारे में चिंतित थे, और उनके प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा, “तू अभी कमज़ोर है। अनाज नहीं खाती है। ऐसी हालत में तू कारावास कैसे सहेगी?”

कस्तूरबा ने कहा, “लेकिन ऐसे अधम क़ानून के सामने लड़ना ही चाहिए न।”

गांधी जी बोले, “जेल में बड़े दुख सहने पड़ते हैं। यह बच्चों से पूछ कर देख।”

कस्तूरबा ने कहा, “मगर इससे क्या? जेल में जो यातना पड़ेगी मैं सह लूंगी। सत्याग्रहियों की लिस्ट में मेरा नाम प्रथम लिखना।”

गांधी जी ने बा को इसकी इजाज़त दे दी। कस्तूरबाई ने सत्याग्रहियों के पहले जत्थे का नेतृत्व किया। गिरफ़्तारी देने के लिए जत्थे में कस्तूरबा, रामदास गांधी, छगनलाल और जेकी के अलावा बारह और शामिल थे, का एक दल बनाया गया। 16 सितम्बर 1913 को फीनिक्स से फोक्सरस्ट रवाना होने की पूर्व संध्या को सत्याग्रह के यात्रियों को गांधी जी ने अपने हाथ का पका सुस्वादु भोजन कराया। उसमें चपातियां, सब्जियां, टमाटर के चटनी और खजूर के साथ बनाया गया मीठा चावल शामिल था।

रविवार, 18 मई 2014

सत्याग्रह फिर आरम्भ

गांधी और गांधीवाद-158

1913

सत्याग्रह फिर आरम्भ

DSCN1361सत्याग्रह आंदोलन में काफ़ी सूक्ष्म विचार से काम लिया जा रहा था। नीति के विरुद्ध कोई भी क़दम न उठाया जाए इस पर विशेष ध्यान रखा जाता था। जैसे ख़ूनी क़ानून केवल ट्रांसवाल के भारतीयों पर लागू किया गया था, तो इस आंदोलन में केवल ट्रांसवाल के भारतीय ही दाखिल किए गए थे। लड़ाई भी इस क़ानून को रद्द कराने तक सीमित थी। हालांकि भारतीयों की ओर से मांग होती थी कि अन्य कष्टों को भी इस लड़ाई के उद्देश्यों में शामिल किया जाए, लेकिन गांधी जी का कहना था कि इससे सत्य भंग होता है। उनका कहना था कि सत्याग्रही के लिए एक ही निश्चय होता है, वह उसे न घटा सकता है, न बढ़ा सकता है। इससे सत्याग्रहियों की संख्या कमती गई, फिर भी जो मुट्ठी भर सत्याग्रही बचे रहे थे, वे युद्ध का त्याग न कर सके। उन दिनों फिनिक्स आश्रम में बार-बार यह प्रश्न उठता रहता था कि अब आगे लड़ाई कौन लड़ेगा? सात-सात साल से लोग ट्रांसवाल की लड़ाई लड़ रहे थे। वे निरुत्साह हो रहे थे। गांधी जी ने पाया कि सत्याग्रहियों की संख्या अब 40-50 के आसपास ही रह गई थी। गांधी जी के प्रति इन लोगों की निष्ठा निर्विवाद थी। वे तो प्राणों की बाजी लगा देने वाले योद्धा थे। गांधी जी ने ऐलान किया, “इन चालीस को साथ लेकर मैं अंत तक लड़ सकता हूं। ये चालीस तो चालीस हज़ार के बराबर हैं। अगर कोई साथ नहीं देगा तो मैं अकेला ही झोंपड़ी-झोंपड़ी जाकर लोगों को तीन पौंड के अनैतिक कर का विरोध समझाऊंगा, लेकिन यह सत्याग्रह बंद नहीं होगा। सल्तनत ने भारतीय कौम और गोखले जी का अपमान किया है। यह असह्य है।”

वचन भंग हुआ

उस समय के प्रख्यात भारतीय राजनीतिज्ञ गोपाल कृष्ण गोखले ने 1912 में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की और जनरल स्मट्स तथा मंत्रिमण्डल के अन्य सदस्यों से भारतीयों की समस्याओं पर बातचीत की। जब वह भारत लौटे तो वह समझते थे कि एशियाटिक रजिस्ट्रेशन ऐक्ट (एशियावासियों से सम्बद्ध पंजीकरण विधेयक) और गिरमिट-मुक्त मजदूरों पर लगाया गया तीन पौण्ड का घृणित कर रद्द कर दिया जाएगा। उन्हें लगता था कि उनके जाने के बाद यूनियन पार्लियामेंट का जो अधिवेशन होगा उसमें उसे उठा देने के क़ानून का मसविदा पेश कर दिया जाएगा। ऐसा हुआ नहीं। गोखले जी के जाने के बाद एक वर्ष के भीतर ही सरकार की तरफ़ से वचन भंग हुआ। जनरल स्मट्स और जनरल बोथा अपने दिए आश्वासनों से मुकर गए। उसने यूनियन पार्लियामेंट में कहा, “गांधी जैसा चाहते हैं, वैसी मांगें पूरी करना असंभव है। नेटाल के यूरोपियन यह कर उठाने को तैयार नहीं हैं। यूनियन सरकार गिरमिटयुक्त भारतीय मज़दूरों और उनके परिवारों पर लगाए गए तीन पौंड के कर को रद्द करने का क़ानून पास करने में असमर्थ है।”

वचन-भंग की बात गांधी जी ने गोखले जी को लिखी और कहा, आप निश्चिंत रहें, हम मरते दम तक लड़ेंगे और इस कर को रद्द कराके रहेंगे। गोखले जी ने गांधी जी से पूछा था, तुम्हारे पास अधिक से अधिक और कम से कम कितने लड़ने वाले हो सकते हैं। गांधी जी ने जवाब भेजा था, अधिक से अधिक 65-66 और कम से कम 16। उन्होंने यह भी लिखा कि इतनी छोटी से तादाद के लिए मैं भारत से पैसे की मदद की अपेक्षा नहीं रखूंगा। गोखले जी का जवाब आया, “जैसे तुम लोग दक्षिण अफ़्रीका में अपना फ़र्ज़ समझते हो वैसे हम भी कुछ अपना फ़र्ज़ समझते होंगे। हमें क्या करना उचित है, यह तुमको बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं तो महज वहां की स्थिति जानना चाहता था। हमारी ओर से क्या होना चाहिए इस बारे में सलाह नहीं मांगी थी।” इन कड़े शब्दों का मर्म गांधी जी समझ गए थे। इसंमें आश्वासन भी था, चेतावनी भी। उन्होंने इसके बाद चुप रहना ही बेहतर समझा।

स्मट्स ने असेम्बली भवन में यह घोषणा करके कि नेटाल के यूरोपीय लोग गिरमिटियों पर से तीन पौंड का वार्षिक कर हटाए जाने के लिए तैयार नहीं हैं, अंतिम संघर्ष को और क़रीब ला दिया। इससे इस क्रूर कर को युद्ध के कारणों में शामिल कर लेने का सुयोग गांधी जी को सहज ही मिल गया। चलती लड़ाई के बीच सरकार की ओर से कोई वचन दिया जाए और फिर से उस वचन का भंग किया जाए तो यह वचन भंग चलते सत्याग्रह के कार्यक्रम में दाखिल कर लेना नीति विरुद्ध नहीं था। उससे भी बड़ी बात यह थी कि भारत के गोखले जी सरीखे प्रतिनिधि को दिया हुआ वचन तोड़ा जाए तो यह उनका ही नहीं, सारे भारत का अपमान था और यह अपमान सहन नहीं किया जा सकता था। इसलिए तीन पौंड कर को सत्याग्रह के युद्ध में शामिल कर लिया गया और इससे गिरमिटिया भारतीयों को भी सत्याग्रह में शामिल होने का मौक़ा मिल गया। अब तक ये लोग आंदोलन के बाहर ही रखे गए थे। 1913 में फिर सत्याग्रह आंदोलन छिड़ गया। इस बार सत्याग्रह का दायरा बड़ा था। इकरारनामे की अवधि ख़त्म होने पर भी दक्षिण अफ़्रीका में बसे भारतीयों पर तीन पौण्ड का कर लगाया गया था। इसके ख़िलाफ़ भी सत्याग्रह छिड़ा। भारतीय में ज़्यादातर ग़रीब थे और बमुश्किल एक महीने में 10 शिलिंग कमा पाते थे। तीन पौण्ड का कर उनके लिए बहुत ज़्यादा था। जब इसके ख़िलाफ़ सत्याग्रह शुरु हुआ, तो लगभग सारे भारतीय इसमें शामिल हो गए और सत्याग्रह सही मायने में जनआंदोलन बन गया।

सरकार की इस वादाख़िलाफ़ी ने सत्याग्रह आंदोलन में नई जान फूंक दी। गांधी जी ने तैयारियां शुरू कर दी। इस बार की लड़ाई में शांति से बैठना तो हो ही नहीं सकता था। सज़ाएं भी लंबी होनी तय थी। इसलिए टॉल्सटॉय फ़ार्म को बंद कर देने का निश्चय किया गया। वैसे भी मर्दों के जेल से छूटने के बाद वे अपने परिवार के साथ अपने-अपने घर चले गए थे। जो लोग बचे थे, उनमें से अधिकांश फीनिक्स के थे। इसलिए निश्चय हुआ कि सत्याग्रहियों का केन्द्र फीनिक्स हो। फिर भी समस्या तो यह थी ही कि जो आंदोलन एक बार ठण्डा पड़ गया था उसके लिए उत्साह कैसे जुटाया जाए। किंतु सरकार ने ही उसके लिए वो मौक़ा जुटा दिया। सरकार के एक नए फैसले के अनुसार दक्षिण अफ़्रीका में क्रिश्चियन रीति के अलावा की गई सारी शादियां, और वे शादियां जिनका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ था, निरस्त कर दी गईं थीं।

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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

गोखले की दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा

गांधी और गांधीवाद-157

1912

गोखले की दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा

दक्षिण अफ़्रीका के आंदोलन की गूंज भारत तक पहुंची। भारत में ‘वायसरीगल काउंसिल के ऑफ इंडिया’ के गोपालकृष्ण गोखले ने रंगभेद के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की थी। भारत और इंग्लैंड दोनों ही देशों में गोखले जी को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर और भारत सेवक समिति के अध्यक्ष गोखले जी केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य थे। कलकत्ते की बड़ी काउंसिल के भीतर और बाहर से भी वे दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई का हर तरह से समर्थन करते रहे थे। मुम्बई में प्रसिद्ध बैरिस्टर फिरोजशाह मेहता भी दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों की समस्या के निदान में रुचि रखते थे। गांधी जी की गोखले में परम श्रद्धा थी। पिछले पंद्रह वर्षों से उनका गांधी जी से पत्र-व्यवहार चला आ रहा था। वे उनके राजनीतिक गुरु थे। उनके आग्रह पर गोखले ने दक्षिण अफ़्रीका का दौरा किया। उनकी दक्षिण अफ़्रीका की योजना ब्रिटिश सरकार की मंजूरी से बनी थी। उनके आने के पहले तक अफ़्रीका के गोरों को भारत या भारतवासियों के बारे में कोई खास जनकारी नहीं थी। गोरों का मानना था कि भारतीय जनता अनपढ़, निकम्मी, रूढ़िग्रस्त और संस्कारहीन थी। कुल मिलाकर भारतीयों का स्थान गोरों के नौकर-चाकर से अधिक का नहीं था। इसीलिए तो वे भारतीयों को कुली कहते थे।

गांधी जी काफ़ी दिनों से गोखले जी और अन्य कई भारतीय नेताओं से निवेदन कर रहे थे कि वे दक्षिण अफ़्रीका जाकर भारतीयों की स्थिति से अवगत हों। गोखले जी 1911 में इंग्लैंड में थे। उनके साथ गांधी जी का पत्र-व्यवहार चलता रहता था। भारतमंत्री के साथ उन्होंने सलाह-मसविरा किया कि दक्षिण अफ़्रीका जाकर उन्हें पूरे मसले को समझना चाहिए। भारत मंत्री को उनकी यह योजना पसंद आई। गोखले जी ने अपने छह सप्ताह के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे की सूचना गांधी जी को दी। गांधी जी के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होंने निश्चय किया कि गोखले जी का ऐसा स्वागत सम्मान किया जाए जैसा कभी किसी बादशाह का भी न हुआ हो। इस स्वागत में शामिल होने के लिए गोरों को भी निमंत्रण दिया गया। यह तय किया गया कि जहां-जहां सार्वजनिक सभा होगी वहां के मेयर को सभा का सभापति बनाया जाएगा। रेलवे स्टेशनों को सजाया जाएगा। जोहान्सबर्ग स्टेशन को सजाने में पंद्रह दिन लगे। कालेनबैक के निर्देशन में वहां एक सुंदर चित्रित तोरण बनाया गया था।

गोखले जी लंदन में थे। वहीं से उनका दक्षिण अफ़्रीका का कार्यक्रम था। भारत मंत्री ने दक्षिण अफ़्रीका की सरकार को सूचना दे दी। ब्रिटिश सरकार ने उनकी दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा का प्रबंध किया था। स्टीमर में उनके लिए प्रथम श्रेणी की व्यवस्था की गई थी। ब्रिटिश सरकार का एक वरिष्ठ अफ़सर उनकी हिफ़ाज़त के लिए साथ भेजा गया था। दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने उन्हें अपना राजकीय मेहमान माना। उनके प्रवास की सुख-सुविधा के लिए जनरल स्मट्स ने ट्रेन का अपना निजी सैलून उनके उपयोग के लिए दिया था। 22 अक्तूबर 1912 को वे केपटाउन पहुंचे। उन दिनों गांधी जी टॉल्सटॉय फार्म पर रहते थे। कालेनबाख और ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष कछालिया के साथ गांधी जी गोखले जी का स्वागत करने केपटाउन बंदरगाह गए। वहां सैंकड़ो भारतीय एकत्रित हुए। गांधी जी और गोखले जी एक दूसरे के गले मिले। गोखले जी ने गांधी जी से कहा, “देखो गांधी, बहुत दिनों से तुम बुलाते थे, तो मैं आ गया। मैं यहां से विदा होऊं तब तक जो चाहो सो मेरा उपयोग कर लो, मैं कुछ नहीं जानता। तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। बाद में मुझे दोष न देना।”54

केपटाउन में एक बड़ी सभा हुई। उस शहर के मुखिया सिनेटर डब्ल्यू. पी. श्राइनर ने सभा का सभापतित्व किया। उसने गोखले जी का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीयों के साथ उसकी काफ़ी हमदर्दी है। गोखले जी का भाषण छोटा, परिपक्व विचारों से भरा, दृढ़ पर विनययुक्त था। उन्हें सुनकर न सिर्फ़ भारतीय बल्कि गोरे भी प्रसन्न हुए। केपटाउन से वे जोहान्सबर्ग रवाना हुए। असली लड़ाई तो वहीं के ट्रांसवाल में लड़ी जा रही थी। वे दक्षिण अफ़्रीका में पांच सप्ताह रहे। जगह-जगह पर उनका भव्य स्वागत हुआ।

टॉल्सटॉय फार्म में गोखले जी का आगमन

फार्म जब चल रहा था उसी समय गोखले जी दक्षिण अफ़्रीका गए थे। गोखले जी नाजुक तबियत वाले व्यक्ति थे। फार्म का जीवन बड़ा कठिन था। गांधी जी ने निश्चय किया कि गोखले जी को फार्म पर बुलाया जाए। फार्म में खाट जैसी कोई चीज़ नहीं थी। सभी ज़मीन पर सोते थे। गोखले जी के लिए एक खाट मंगवाई गई। दूसरी समस्या यह थी कि वहां कोई ऐसा कमरा नहीं था जहां गोखले जी को पूरा एकांत मिल सके। तय यह हुआ कि कालेनबेक के कमरे में उन्हें रखा जाएगा। स्टेशन से फार्म तक का डेढ़ मील का सफर पैदल तय किया गया। उसी दिन वर्षा भी हो गई। मौसम का ठंडा हो गया। गोखले जी को ठंड लग गई। उन्हें कालेनबेक के कमरे में ठहराया गया। वहां से रसोई दूर थी। उन्हें रसोई घर में ले जाया नहीं जा सकता था, और वहां तक खाना लाने में वह ठंडा हो जाता। पर गोखले जी ने सारे कष्ट सहते हुए एक शब्द भी नहीं कहा। यहां तक कि जब उन्हें मालूम हुआ कि फार्म में सभी लोग ज़मीन पर ही सोते हैं, तब उनके लिए जो खाट लाई गई थी उसे हटा दिया और अपना बिस्तर उन्होंने फ़र्श पर ही लगा लिया। गोखले जी देह-आदि की मालिश के लिए नौकर की सेवा ही स्वीकार करते थे। उस रात गांधी जी और कालेनबेक ने उनसे बहुत विनती की कि उन्हें पांव दबाने दें, पर गोखले जी टस से मस न हुए। उल्टे नाराज होते हुए बोले, “जान पड़ता है कि आप सब लोगों ने यह समझ लिया है कि कष्ट भोगने के लिए अकेले आप ही लोग जन्मे हो और हम जैसे लोग इसलिए पैदा हुए हैं कि तुम्हें कष्ट दें। अपनी अति की सज़ा तुम पूरी-पूरी भोग लो। मैं तुम्हें अपना शरीर छूने तक नहीं दूंगा। तुम सब लोग निबटने के लिए दूर जाओगे और मेरे लिए कमोड रखोगे। ऐसा क्यों? चाहे जितनी तकलीफ़ उठानी पड़े, मैं भोग लूंगा; पर तुम्हारा गर्व चूर करूंगा।”

गोखले जी की पूरी यात्रा के दौरान साथ रहकर गांधी जी ने उनके दुभाषिए और अनुचर का काम किया। गोखले जी जहां भी गए उनका शाही ढंग से स्वागत किया गया। वे जिस स्टेशन पर उतरते उसे ख़ूब सजाया जाता। रोशनियां की जातीं। गलीचे बिछाए जाते। मानपत्र भेंट किए जाते। जगह-जगह पर गोखले जी का भाषण हुआ। गांधी जी के विशेष आग्रह पर गोखले जी ने मराठी में भाषण दिया। गांधी जी उसका हिंदी अनुवाद करते। लोग भावविभोर होकर उनकी बातें सुनते। गांधी जी और कालेनबाख गोखले की सेवा करते। गांधी जी उनके कपड़े ख़ुद धोते, और उसपर इस्तरी भी करते। उनका भोजन भी ख़ुद ही बनाते। गोखले जी मधुमेह के मरीज़ थे, इसलिए उनके आहार का पूरा ध्यान रखा जाता। गांधी जी उनके भोजन की तैयारी पर खुद नज़र रखते। जोहान्सबर्ग में गोखले जी पन्द्रह दिनों तक रहे। गोखले जी टॉल्सटॉय फार्म और फीनिक्स आश्रम भी गए।

गोखले जी के दक्षिण अफ़्रीका आने का उद्देश्य था भारतीय समुदाय की अवस्था का अनुमान करना और उसके सुधारने में गांधी जी की सहायता करना। जब वे दक्षिण अफ़्रीका गए, तो उनकी विद्वता, गरिमा, गंभीरता, संस्कारिता और विलक्षण राजनैतिक निपुणता देखकर गोरी सरकार चकित रह गई। प्रवासी भारतीयों ने उनकी अभूतपूर्व आवभगत की। चूंकि गोखले जी लंबे समय से असहयोग आंदोलन के साथ जुड़े हुए थे, इसलिए आंदोलन में उनकी उपस्थित से नई स्फूर्ति आई। जहां जहां वे गए वहां भारतीयों में ही नहीं, गोरी प्रजा में भी उत्साह का संचार हुआ।

जोहान्सबर्ग से गोखले जी प्रिटोरिया गए। वहां उन्हें यूनियन सरकार से मिलना था। अफ़्रीकी संघ की अधिकांश यात्रा पर गांधी जी उनके साथ रहे। लेकिन प्रिटोरिया में जब वे जनरल स्मट्स और जनरल बोथा से भी मिलने गए तो गांधी जी उनके साथ नहीं गए। गांधी जी ने गोखले जी को मुख्य मुद्दों के बारे में पहले ही बता दिया था। उन्होंने गोखले जी को 20 पेज का एक मैमोरेण्डम बनाकर दे दिया था। दो घंटे तक चली मीटिंग में बेकार झंझटों के बिना संघ की स्थापना के लिए उत्सुक, दोनों जनरलों ने वास्तव में गोखले जी से भारतीयों के ख़िलाफ़ अत्यधिक भेदभाव वाली व्यवस्थाओं को समाप्त करने का वादा किया था। गोखले जी जब मीटिंग से वापस लौटे तो बहुत आशान्वित और संतुष्ट थे। वे सरकार द्वारा किए गए सत्कार और जनरल बोथा और जनरल स्मट्स के आश्वासनों के बहलावे में आ गए। जब बैठक से लौटे तो गोखले जी ने गांधी जी से कहा, “तुम्हें एक वर्ष के भीतर भारत लौट आना है। सब बातों का फैसला हो गया। काला क़ानून रद्द हो जाएगा। इमिग्रेशन क़ानून से वर्ण-भेद वाली दफ़ा निकाल दी जाएगी। तीन पौंड का कर हटा दिया जाएगा।”

गांधी जी इस पर बिल्कुल विश्वास करने को तैयार नहीं थे, राजनीतिक विषयों में वे पेशेवर राजनीतिज्ञों से कहीं अधिक चतुर थे। उन्होंने कहा, “मुझे इसमें पूरी शंका है। इस मंत्रीमंडल को जितना मैं जानता हूं उतना आप नहीं जानते। आपका आशावाद मुझे प्रिय है, क्योंकि मैं ख़ुद भी आशावादी हूं; पर अनेक बार धोखा खा चुका हूं। इसलिए इस विषय में आपकी जितनी आशा मैं नहीं रख सकता।” गांधी जी सही थे। यह वादा पूरा न हुआ।

17 नवंबर 1912 को गोखले जी जब भारत वापस जाने लगे तो गांधी जी और कालेनबैक जंजीबार तक उन्हें छोड़ने स्टीमर में साथ गए। बोट पर गांधी जी और गोखले जी शतरंज खेलते थे। दोनों ही अच्छे खिलाड़ी थे। विदा होते समय गोखले ने गांधी जी से कहा, देश की ख़ातिर जल्द ही भारत लौट आओ। वहां तुम्हारी बहुत ज़रूरत है।

भारत लौटने पर मुम्बई के एक सार्वजनिक सभा में कहा था, “निःसंदेह गांधी ऐसी मिट्टी के बने हैं जिनसे नायक और शहीद बने होते हैं। उनके अंदर अपने आसपास के साधारण व्यक्तियों को भी नायकों और शहीदों में रूपांतरित करने की प्रशंसनीय आध्यात्मिक शक्ति मौजूद है।”

गोखले जी को विदा करके जब गांधी जी और कालेनबेक वापस लौट रहे थे, तो उन्हें रोक दिया गया, क्योंकि उनके पास ज़रूरी काग़ज़ात नहीं थे। कालेनबेक के पास भी काग़ज़ात नहीं थे, लेकिन उन्हें उसी समय परमिट दे दी गई। कालेनबेक को इस घटना से बेहद दुख हुआ। जब गांधी जी परमिट की प्रतिक्षा कर रहे थे, तो अधिकारी ताने कस रहे थे, “तुम एशियाई हो। तुम्हारी चमड़ी काली है। मैं यूरोपियन हूं, और देखो मेरी चमड़ी गोरी है।” सौभाग्य से भारतीय समुदाय बीच में कूद पड़ा और उनके लिए डट कर खड़ा हो गया। अधिकारियों को झुकना पड़ा। गांधी जी को कुछ घंटों में ही जाने की परमिट मिल गई।

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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

सरकार और भारतीयों के बीच समझौता

गांधी और गांधीवाद-157

1911

सरकार और भारतीयों के बीच समझौता

सत्याग्रहियों की साख

टॉल्स्टॉय फार्म में रह रहे सत्याग्रहियों के जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते थे। कोई सत्याग्रही जेल जाने वाला होता था तो कोई छूटकर आया होता था। ऐसे ही छूटकर आने वाले सत्याग्रहियों में से दो ऐसे थे जिन्हें मजिस्ट्रेट ने जाती मुचलके पर छोड़ा था। उन्हें सज़ा सुनाने के लिए अगले दिन अदालत में हाज़िर होना था। वे बेठे आपस में बातें कर रहे थे। इतने में उनके लिए जो आख़िरी ट्रेन थी उसके जाने का वक़्त हो गया। ट्रेन वे पा सकेंगे या नहीं यह संदिग्ध हो गया था। वे दोनों और फार्म के कुछ लोग जो उन्हे विदा करने वाले थे लॉली स्टेशन की तरफ़ दौड़े। रास्ते में ही ट्रेन के आने की सीटी सुनाई दी। जब वे स्टेशन के बाहरी हद तक पहुंचे तो स्टेशन के छूटने की सीटी सुनाई दी। दोनों काफ़ी तेजी से दौड़ रहे थे। गांधी जी तो पीछे ही छूट गए थे। ट्रेन चल चुकी थी। दोनों युवकों को दौड़ते देखकर स्टेशन मास्टर ने चलती ट्रेन रोक दी और उनको बिठा लिया। स्टेशन पहुंचने पर गांधी जी ने स्टेशन मास्टर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। इस घटना से यह स्पष्ट है कि सत्याग्रहियों को जेल जाने और प्रतिज्ञा पालन करने की कितनी उत्सुकता होती थी। दूसरी यह कि स्थानीय कर्माचारियों के साथ उन्होंने काफ़ी मधुर संबंध स्थापित कर लिया था। ये युवक अगर उस ट्रेन को न पकड़ पाते तो अगले दिन अदालत में हाजिर न हो पाते। उन्हें महज भलमानसी के आधार पर ज़मानत मिली थी। सत्याग्रहियों की साख इतनी हो गई थी कि उनके ख़ुद जेल जाने से आतुर होने के कारण मजिस्ट्रेट उनसे जमानत लेने की ज़रूरत नहीं समझते थे। सत्याग्रह के आरंभ में अधिकारियों की ओर से सत्याग्रहियों को कुछ कष्ट आवश्य दिए गए थे, पर ज्यों-ज्यों लड़ाई बढती गई, अधिकारी पहले से कम कड़वे होते गए। कई तो स्टेशन मास्टर की तरह मदद भी करने लगे। इसका कारण था सत्याग्रहियों का सौजन्य, उनका धैर्य और कष्ट सहन करने की उनकी शक्ति।

दुख कभी अकेले नहीं आता। गांधी जी के साथ भी यही हुआ। पारिवारिक समस्याओं के साथ-साथ राजनैतिक समस्याएं भी आ गईं। आंदोलन बहुत लंबा खिंच गया था। सत्याग्रह की लड़ाई चार साल तक चली। इसकी वजह से लोगों का जोश ठंडा पड़ने लगा था। सत्याग्रही जेल जाते और जेल से छूट कर आते रहे। हालांकि भारतीय समाज के धनी वर्ग के लोगों में उतना जोश नहीं रह गया था, फिर भी गांधी जी के नेतृत्व में जो थोड़े चुने और पक्के लोग काम कर रहे थे उनके उत्साह और मनोबल में कोई कमी नहीं होने पाई। केवल फिनिक्स और टॉल्सटॉय फार्म के निवासी आन्दोलनकारियों के प्रतीक के रूप में बने रहे और संघर्ष चलता रहा।

‘साउथ अफ़्रीकन इमीग्रेशन रजिस्ट्रेशन एक्ट’

इस बीच भारतीयों पर होने वाले दमन बहुत बढ़ गए थे। भारतीय निवासियों के अवयस्क बच्चों की पत्नियों को अधिकारी अक्सर परेशान करते थे और कई बार लड़कियों को देश छोड़ने के आदेश मिल जाते। भारतीयों को व्यापार के लाइसेंस मिलने मुश्किल हो गए थे। जो भारतीय बंधुआ बन कर आए थे उन पर भारी टैक्स लगा दिए गए थे। जले पर नमक छिड़कने के लिए सरकार ने ‘साउथ अफ़्रीकन इमीग्रेशन रजिस्ट्रेशन एक्ट’ भी लागू कर दिया। भारतीयों ने एक्ट का विरोध किया। इस का विरोध करने के लिए असहयोग आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई। गांधी जी ने जनरल स्मट्स से बातचीत की। उनका कहना था कि इमीग्रेशन एक्ट में कुछ ऐसे संशोधन कर दिए जाएं जिससे किसी भी प्रकार का जातीय भेदभाव न फैले।

भारत में

भारत का जनमत भी इस प्रश्न पर विक्षुब्ध हो रहा था। कलकत्ते की बड़ी काउंसिल में गोखले जी ने गिरमिटियों का दक्षिण अफ़्रीका भेजना बंद करने का प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव स्वीकार हो गया। भारत में बादशाह जॉर्ज पंचम के दरबार का समय नज़दीक आता जा रहा था। इंग्लैंड की सरकार मामले को सुलझाकर भारतीयों को ख़ुश करना चाह रही थी।

सरकार और भारतीयों के बीच समझौता

इसका नतीज़ा यह हुआ कि 1911 के फरवरी महीने में दक्षिण अफ़्रीका की सरकार ने घोषणा की कि वह रंगभेद वाली रोक को उठा लेगी। एशियावासी होने के कारण ट्रांसवाल में भारतीयों के प्रवेश पर जो प्रतिबंध लगा हुआ है वह नहीं रहेगा। उसके बदले सिर्फ़ उनकी शिक्षा संबंधी योग्यता की कड़ी जांच का प्रतिबंध रहेगा। ट्रांसवाल में प्रवेश एक शैक्षिक परीक्षण के आधार पर दिया जाएगा।

27 मई 1911 को ‘इंडियन ओपिनियन’ ने घोषणा की कि सरकार के साथ एक अस्थायी समझौता हो गया है। इसलिए सभी भारतीयों को अपने काम-धंधे पर लग जाना चाहिए। पहली जून को सभी सत्याग्रही क़ैदी रिहा कर दिए गए। पर यह एक साल तक भी नहीं चल सका।

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सोमवार, 31 मार्च 2014

संदर्भ ग्रंथों की सूची


संदर्भ

1.    

Baapu’s letters to Miraa

nawajeewan

2.   

Catching up with Gandhi

Graham Turner

3.   

Gandhi : Prisioner of Hope, New Heaven

Judith Brown

4.   

GANDHI A LIFE REVISITED

Krishna Kripalani

5.   

Gandhi and his Ashrams

Mark Thomson

6.   

Gandhi His Life And Thaughts

J.B. Kripalani

7.   

Gandhi in Champaran

D.G. Tendulakar

8.   

Gandhi in South Africa

R.A. Huttenback

9.   

Gandhi Ordained in South Afrika

J.N. Uppal

10.           

Gandhi through a Child’s eyes

Narayan Desai

11.  

Gandhi. – A Patriot in South Africa

Joseph J Doke 

12.           

Gandhi;s Civil Disobedience

Judith Brown

13.           

Gandhi’s Emissary

Sudhir Ghosh

14.           

Gandhi’s Rise to Power

Judith Brown

15.           

Gandhi’s Truth: On the Origins of Militant Nonviolence Kindle Edition

Erik Ericson

16.           

Gitta serene, a life with gandhi

new York time magazine, 14.11.1982

17.           

In the shadow of the Mahatma

G.D. Birla

18.           

LET’S KILL GANDHI!’

Tushar A. Gandhi

19.           

Mahatma

G.D. Tendulakar

20.           

 MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi By: D. G. Tendulkar 1920-29

D. G. Tendulkar

21.           

MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi By: D. G. Tendulkar [1930-1934

D. G. Tendulkar

22.           

MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi 1934-1938

D. G. Tendulkar

23.           

MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi 1938-1940

D. G. Tendulkar

24.           

Mahatma Gandhi – a chronology

K.P. Goswami 

25.           

Mahatma Gandhi a new approach

Vishnu Dayal

26.           

Mahatma Gandhi Essays and Reflections on His Life and Work

Ed. S. Radhakrishnan 

27.           

MAHATMA GANDHI VOLUME I THE EARLY PHASE

PYARELAL

28.           

MAHATMA GANDHI Volume II The Discovery of Satyagraha – On the Threshold

PYARELAL

29.           

MAHATMA GANDHI By  PYARELAL VOL 3

PYARELAL

30.           

Mira Ben, The Spirits Pilgrimage

arlingaton, great ocean publishers

31.           

Mohandas

Rajamohan Gandhi 

32.           

Mr. Gandhi : The Man

Milie Graham Polak

33.           

My Days With Gandhi

Nirmal Kumar Bose

34.           

My Memorable Moments with Bapu

Manuben Gandhi

35.           

Roma Roland, Gandhi correspondence

Publicatin Division

36.           

Satyagraha

Savita Singh

37.           

The African Element in Gandhi

Anil Nauriya

38.           

The Life And Death Of Mahatma Gandhi

Robert Payne 

39.           

The Life of MAHATMA GANDHI

LOUIS FISCHER

40.           

The Making of the Mahatma

D.S. Devanesan Chandran

41.           

The Men Who Killed Gandhi

Manohar Malgaonkar 

42.           

The Miraa Ben papers

नेहरू स्मारक, नई दिल्ली

43.           

The Murder Of The Mahatma and Other Cases From A Judges Note Book

G. D. Khosla

44.           

THE SELECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI VOL. I AN AUTOBIOGRAPHY

M.K. GANDHI

45.           

THE SELECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI VOL. II SATYAGRAHA IN SOUTH AFRICA

M.K. GANDHI

46.           

THE SELECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI VOL. III THE BASIC WORKS

M.K. GANDHI

47.           

THE SELECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI VOL. IV SELECTED LETTERS

M.K. GANDHI

48.           

THE SELECTED WORKS OF MAHATMA GANDHI VOL. V THE VOICE OF TRUTH

M.K. GANDHI

49.           

The Untold Story of Kasturba.– Wife of Mahatma Gandhi

Arun & Sunanda Gandhi

50.           

Pen Portraits and Tributes by Gandhi

M.K. GANDHI

51.           

Why I Killed Gandhi

नाथूराम गोडसे

52.           

Women behind Mahatma Gandhi

एल्यानोर मॉर्टोन

53.           

THE SWADESHI MOVEMENT IN BENGAL 1903-1908

SUMIT SARKAR

54.           

अकाल पुरुष गांधी

जैनेन्द्र कुमार

55.           

अस्तेय और आत्म-तोष

सं. यशपाल जैन

56.           

आधुनिक भारत

सुमित सरकार

57.           

इतिहास का स्पर्शबोध एक आत्मकथा

कृष्ण कुमार बिड़ला 

58.           

इतिहास के सवाल

नंदकिशोर आचार्य

59.           

ऐसे थे बापू

यू. आर. राव

60.           

कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर

सौम्या सरकार, एस. मुखर्जी 

61.           

कस्तूरबा

डॉ. सन्ध्या भराडे

62.           

कस्तूरबा गांधी

महेश शर्मा 

63.           

कुली बैरिस्टर

राजेन्द्र मोहन भटनागर

64.           

गांधी

नलिनी पंडित 

65.           

गांधी विचार और हम

पी.के. अग्रवाल, शिप्रा अग्रवाल

66.           

गांधी : एक जीवनी

कृष्ण कृपलानी

67.           

गांधी अध्ययन 

सं. मनोज सिन्हा 

68.           

गांधी की कहानी

लुई फ़िशर

69.           

गांधी के सपनों का भारत

महेश प्रसाद सिंह 

70.           

गांधी जी एक झलक

श्रीपाद जोशी

71.           

गांधी जी एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी

विंसेंट शीन 

72.           

गांधी जी और ईसाइयत

रामेश्वर मिश्र पंकजऔर कुसुमलता केडिया 

73.           

गांधी जी का खोया हुआ धन हरिलाल गांधी

नीलम पारीख (हरिलाल गांधी की दोहित्री)

74.           

गांधी जी का जीवन-प्रभात

गांधी जी

75.           

गांधी जी ने लिखा अपने पुत्रों और पुत्रवधुओं को जहां रहो वहां महकते रहो

नीलम पारीख

76.           

गांधी दर्शन

सं. यशपाल जैन

77.           

गांधी ने कहा था

गिरिराज शरण

78.           

गांधी शतदल

सं. सोहनलाल द्विवेदी

79.           

गांधी साहित्य

सस्ता साहित्य मंडल

80.           

गांधी स्मृति

गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति

81.           

गांधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं

डॉ. रामविलास शर्मा 

82.           

गांधी, नेहरू, सुभाष

सरदार पटेल

83.           

गांधी, सचित्र जीवन गाथा

बल राम नंदा

84.           

गांधी-विचार-दोहन

कि.घ. मशरूवाला

85.           

गीता बोध

मो.क. गांधी

86.           

ग्रंथावली खंड-

डॉ. नगेन्द्र

87.           

ग्राम स्वराज्य

महात्मा गांधी

88.           

जीवन प्रभात

प्रभुदास गांधी

89.           

दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह का इतिहास

मोहनदास करमचंद गांधी 

90.           

दांडी यात्रा व नमक सत्याग्रह

राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय

91.           

नमक आंदोलन

डॉ. प्रभाकर माचवे 

92.           

नीतिशास्त्र

डॉ. बी.एन. सिंह

93.           

पत्रकारिता के युग निर्माता महात्मा गांधी

कमल किशोर गोयनका

94.           

पहला गिरमिटिया

गिरिराज किशोर

95.           

बा और बापू

मुकुलभाई कलार्थी

96.           

बापू

घनश्यामदास बिड़ला

97.           

बापू कथा

हरिभाऊ उपाध्याय

98.           

बापू की ऐतिहासिक यात्रा

वियोगी हरि

99.           

बापू की कारावास की कहानी

सुशीला नैयर 

100.         

बापू की गोद में

नारायण देसाई

101.          

बापू की झलकियां

काकासाहेब कालेलकर

102.         

बापू की मीठी-मीठी बातें (भाग-1)

साने गुरुजी

103.         

बापू की मीठी-मीठी बातें (भाग-2)

साने गुरुजी

104.         

बापू के कदमों में

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

105.         

बापू के साथ

कनु गांधी और आभा गांधी

106.         

बापू मेरी मां

मनुबहन गांधी

107.         

बापू सहचर आत्मा के

जैनेन्द्र कुमार

108.         

बाबा पृथ्वी सिंह आज़ाद : द लिजेंडरी क्रुसेडर

भारतीय विद्या भवन

109.         

बाबा पृथ्वी सिंह आज़ाद पेपर्स

नेहरू स्मारक संग्रहालय

110.          

ब्रह्मचर्य महात्मा गांधी के शब्दों में

सं. डॉ. त्रिलोकचन्द

111.          

भारत छोड़ो आंदोलन

शंकर दयाल सिंह

112.          

मंगल प्रभात

गांधी जी

113.          

महात्मा गांधी सहस्राब्द का महानायक

सं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 

114.          

महात्मा गांधी एंड हिज अपॉसल्स

वेद मेहता

115.          

महात्मा गांधी एक जीवनी

बी.आर. नन्दा 

116.          

महात्मा गांधी और अस्पृश्यता समस्या और विकल्प

द्वारकाप्रसाद गुप्ता 

117.          

महात्मा गांधी और उनकी महिला मित्र

गिरिजा कुमार 

118.          

महात्मा गांधी के विचार

आर.के. प्रभु, यू.आर. राव

119.          

महात्मा गांधी के सहकर्मी

मोहिनी माथुर

120.         

महात्मा गांधी जीवन और दर्शन

रोमां रोलां

121.          

महात्मा गांधी जीवनी और जीवन-दर्शन

प्रकाश नागाइच

122.         

महात्मा गांधी पूर्णाहुति चतुर्थ खंड

प्यारेलाल

123.         

महात्मा गांधी पूर्णाहुति तृतीय खंड

प्यारेलाल

124.         

महात्मा गांधी पूर्णाहुति द्वितीय खंड

प्यारेलाल

125.         

महात्मा गांधी पूर्णाहुति प्रथम खंड

प्यारेलाल

126.         

महात्मा गांधी प्रथम दर्शन : प्रथम अनुभूति

शंकरदयाल सिंह 

127.         

महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग

दयाशंकर शुक्ल सागर 

128.         

महात्मा गांधी मेरे पितामह (खंड-1)

सिमित्रा गांधी कुलकर्णी

129.         

महात्मा गांधी मेरे पितामह (खंड-2)

सिमित्रा गांधी कुलकर्णी

130.         

महादेव देसाई की डायरी एवं अन्य लेख

महादेव देसाई

131.          

मीरा और महात्मा

सुधिर कक्कड़

132.         

मोहन से महात्मा

फातिमा मीर

133.         

मोहनदास करमचंद गांधी एक प्रेरक जीवनी

नरेंद्र शर्मा

134.         

राष्ट्रपिता

जवाहरलाल नेहरू

135.         

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

महेश शर्मा

136.         

राष्ट्रीय आंदोलन, हिंदी और गांधी

गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति

137.         

विश्वभारती पत्रिका महात्मा गांधी जन्मशती विशेशांक

 

138.         

शरीर-श्रम और कार्य-साधना

सं. यशपाल जैन

139.         

शांति दूत गांधी

मनोरमा जफ़ा

140.         

संयम और संतति नियमन

गांधी जी

141.          

सत्य के प्रयोग आत्मकथा

एम.के. गांधी

142.         

सत्याग्रह की कहानी

वर्षा दास, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय

143.         

सबके बापू

बाबूराव जोशी

144.         

सम्पूर्ण गांधी वांमय

प्रकाशन विभाग

145.         

सरदार पृथ्वी सिंह

राहुल सांकृत्यायन

146.         

सरोजिनी नायडू

तारा अली बेग

147.         

सर्वोदय

मो.क. गांधी 

148.         

साम्राज्य हिला चुटकीभर नमक से

सरोजिनी सिन्हा

149.         

सुनो विद्यार्थियों

महात्मा गांधी 

150.         

स्वदेशी और राष्ट्रचेतना

सं. यशपाल जैन

151.          

हमारी बा

वनमाला पारीख, सुशीला नय्यर

152.         

हिंद स्वराज गांधी का शब्द-अवतार

गिरिराज किशोर 

153.         

गांधी की शहादत

जगन फडणीस

154.         

MOHOMED ALI JINNAH: AN AMBASSADOR OF UNITY

सरोजिनी नायडू

155.         

गिल्टी मेन ऑफ पार्टिशन

डॉ० राममनोहर लोहिया

156.         

India Wins Freedom

Maulana Azad

157.         

Mahatma Life of Mohandas Karamchand Gandhi Vol1

D. G. Tendulkar

158.         

KASTURBA – A PERSONAL REMINISCENCE

SUSHILA NAYAR

159.         

KASTURBA GANDHI AN EMBODIMENT OF EMPOWERMENT

SIBY K. JOSEPH

160.         

PEN PORTRAITS AND TRIBUTES

MK GANDHI

161.          

GUILTY MEN OF INDIAS PARTITION

DR. RAMMANOHAR LOHIA

162.         

गाँधी सिद्धांत और व्यवहार

अनिल दत्त मिश्र

163.         

महात्मा गाांधी: एक जीवनी

बी. आर. नंदा

164.         

गांधी जीवन और विचार

आर.के . पालीवाल

165.         

GANDHI AND SOUTH AFRICA

Ed E.S.Reddy & Gopalkrishna Gandhi

166.         

MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi VOL 1

D. G. Tendulkar

167.         

MAHATMA Life of Mohandas Karamchand Gandhi VOL 2

D. G. Tendulkar

168.         

MAHATMA GANDHI Volume V INDIA AWAKENED

SUSHILA NAYAR

169.         

Volume VI SALT SATYAGRAHA THE WATERSHED By SUSHILA NAYAR

 

170.         

Volume VII PREPARING FOR SWARAJ By SUSHILA NAYAR

 

171.          

VOLUME VIII Final Fight for Freedom by SUSHILA NAYAR

 

172.         

The Last Phase PART – I Volume IX Book-One

PYARELAL

 173.         

THE TRANSFER OF POWER IN INDIA

V. P. MENON