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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

101. गोखले - सार्वजनिक जीवन के प्रकाश पुंज

 गांधी और गांधीवाद

101. गोखले - सार्वजनिक जीवन के प्रकाश पुंज

 

गोपालकृष्ण गोखले 

1902

प्रवेश

स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक गोपालकृष्ण गोखले पूना के फ़र्ग्यूसन कॉलेज में प्राध्यापक थे। महादेव गोविन्द रानडे के शिष्य गोपाल कृष्ण गोखले को वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ थी। उन्होंने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी। 1896 में जब गांधीजी पहली बार उनसे मिले थे, तब से उनके मन में गोखले जी के प्रति बड़ा आदर का भाव था, और गोखले जी की गांधीजी की गतिविधियों में दिलचस्पी। वे गांधीजी को भारतीय राजनीति में लाना चाहते थे। गोखले जी गांधीजी की ईमानदारी, लगन और काम करने के ढंग से प्रभावित थे, तो गांधीजी गोखले जी की लोकसेवा और देश-भक्ति पर निछावर थे। उन दिनों सत्ता का केन्द्र कलकत्ता था। गोखले जी केंद्रीय विधान सभा (Imperial Council) के सदस्य भी थे, जिसकी खास अन्तराल पर बैठक होती रहती थी। इसलिए वे उन दिनों कलकत्ते के अपने आवास में रहते थे।

गोखले के मेहमान

कलकत्ते में गांधीजी ने जब एक महीना और रहने का मन बनाया, तो गांधीजी को गोखले जी अपने पास लेकर चले आए। जब से वे छह साल पहले मिले थे, तब से गोखलेजी की नजर उन पर थी। उन्हें खुद यह देखने के लिए पर्याप्त अवसर मिले थे कि उनका शिष्य किस तरह का है। पहले दिन से ही उनके साथ गांधीजी को ऐसा लगा जैसे वे एक बड़े भाई की छत्र छाया में है। मेहमान की तरह होने का तो एक पल का भी उन्हें अहसास न हुआ। गोखलेजी ने उनकी सभी जरूरतों की खोज-ख़बर ली और उन्हें पूरा किया। गांधीजी को पूरी तरह से अपने विश्वास में लिया। उनसे कुछ भी गुप्त न रखते हुए उन्हें अभिभूत कर दिया और उन दिनों की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों से उनका परिचय कराया। हालाकि गांधीजी की आवश्यकताएं सीमित थीं, फिर भी जो भी थीं, गोखले जी ने उन्हें पूरी की। अपने सारे काम गांधीजी खुद कर लिया करते थे। किसी से सेवा कराने की उनकी आदत तो थी नहीं। स्वावलंबन की गांधीजी की आदत से गोखले जी न सिर्फ़ काफ़ी प्रभावित थे बल्कि इसकी तारीफ़ भी किया करते थे। एक ही छत के नीचे बिताए इस समय ने उन्हें एक-दूसरे को जानने का मौका दिया। गोखले गांधीजी के तपस्वी की तरह जीवन जीने के तौर-तरीकों की प्रशंसा करते थे, लेकिन वे चाहते थे कि गांधीजी अपनी संकोची प्रवृत्ति पर काबू पाएं। अपने तरीके से वे गांधीजी को कांग्रेस के काम के लिए तैयार कर रहे थे। एक महीना गोखले जी के साथ गुज़ारे दिन गांधीजी के लिए परम संतोष और सुख के दिन थे। गोखले जी के ज़रिए गांधीजी कई महान हस्तियों से मिले और दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की सहायता के बारे में उन्हें बता सके। उनमें से एक थे आचार्य (बाद में डॉ.) पी.सी. राय, जो एक प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्होंने कभी शादी नहीं की, केवल स्वदेशी कपड़े पहने।

प्रफुल्ल चन्द्र राय से स्नेह संबंध


डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र राय



एक छत के नीचे रहकर गांधीजी और गोखलेजी, दोनों को एक-दूसरे को अच्छी तरह जानने-समझने का मौक़ा मिला। गोखले जी चाहते थे कि गांधीजी अपने संकुचित स्वभाव से बाहर निकलें और पूरी ऊर्जा से देश हित में काम करें। उनके घर में जो भी नामी-गरामी लोग आते, उनसे गोखले जी उनको ज़रूर मिलाते। यह गोखले द्वारा गांधीजी को दिया जाने वाला प्रशिक्षण था, ताकि गांधीजी कांग्रेस के काम के लिए तैयार हो सकें। गोखले जी के घर के पास ही महान रसायनज्ञ, उद्यमी तथा महान शिक्षक डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र राय (2 अगस्त 1861 -- 16 जून 1944)) रहते थे। वे लगभग रोज़ ही गोखले जी के घर आया करते थे। गोखले जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा, “ये प्रोफेसर राय हैं। इन्हें हर महीने आठ सौ रुपये मिलते हैं। ये अपने खर्च के लिए चालीस रुपये रखकर बाक़ी सब सार्वजनिक कामों में दे देते हैं। इन्होंने ब्याह नहीं किया है और न करना चाहते हैं।” गांधीजी को ऐसे लोग बहुत पसंद थे और गोखलेजी को ऐसे लोगों को गांधीजी के ध्यान में लाने में बहुत खुशी होती थी।  'सादा जीवन उच्च विचार' वाले उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने कहा था, "शुद्ध भारतीय परिधान में आवेष्टित इस सरल व्यक्ति को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि वह एक महान वैज्ञानिक हो सकता है।" इस मुलाक़ात के बाद देशभक्त डॉक्टर प्रफुल्ल चन्द्र राय के साथ गांधीजी का जीवन भर के लिए स्नेह संबंध जुड़ गया। गोखले और प्रो. राय की बातचीत सुनते हुए गांधीजी को तृप्ति ही न होती थी, क्योंकि उनकी बातें देश हित की ही होती थी। उनकी आत्मकथा "लाइफ एण्ड एक्सपीरियेंसेस ऑफ बंगाली केमिस्ट" (एक बंगाली रसायनज्ञ का जीवन एवं अनुभव) के प्रकाशित होने पर अति प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका "नेचर" ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए लिखा था कि "लिपिबद्ध करने के लिए संभवतः प्रफुल्ल चन्द्र राय से अधिक विशिष्ट जीवन चरित्र किसी और का हो ही नहीं सकता।" डॉ॰ राय को 'नाइट्राइट्स का मास्टर' कहा जाता है। उन्होंने वर्ष 1895 में स्थिर यौगिक मर्क्यूरस नाइट्राइट की खोज की। वह भारत में रसायन विज्ञान के जनक माने जाते हैं। उन्होंने  हिंदू रसायन का इतिहास नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा, जिससे उनकी बड़ी प्रसिद्धि हुई। 

सार्वजनिक जीवन के प्रकाश पुंज

गोखले जी, गांधीजी की नज़र में भारत के सार्वजनिक जीवन के प्रकाश पुंज थे। गोखले जी के काम करने के ढंग से गांधीजी को काफ़ी प्रेरणा मिलती थी। गांधीजी गोखले की देश सेवा के प्रति एकनिष्ठ निष्ठा, सार्वजनिक प्रश्नों का गहन, श्रमसाध्य अध्ययन करने की आदत, तथ्यों को प्रस्तुत करने की उनकी सटीकता और अद्भुत क्षमता के साथ-साथ जिस तरह से वे अपने समय के प्रत्येक क्षण को सार्वजनिक भलाई के लिए उपयोग करने के लिए संरक्षित करते थे, उसके लिए वे उनके प्रशंसक थे। वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ जाने नहीं देते थे। उनके सारे संबंध देश के काम के निमित्त थे। उनके साथ सारी चर्चाएं देश के काम के लिए ही होती थीं। उनकी बातों में कहीं कोई दम्भ या झूठ नहीं होता था। भारत की ग़रीबी और ग़ुलामी उन्हें अखरती थी। साथ ही अगर गांधीजी को कुछ खटकता, तो वह भी कहने से हिचकिचाते नहीं थे।

महादेव गोविंद रानाडे

गोखले जी के मन में महादेव गोविंद रानाडे  (18 जनवरी 1842-16 जनवरी 1901), के प्रति आदर का भाव था। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने पूना सार्वजनिक सभा, महाराष्ट्र ग्रंथोत्तेजक सभा और प्रार्थना समाज की स्थापना में मदद की। रानाडे का जन्म दिन हो या पुण्य तिथि, गोखले उसे हमेशा मनाते थे। इस अवसर पर वे रानाडे से जुड़े संस्मरण सुनाना न भूलते। रानाडे केवल न्यायमूर्ति नहीं, एक इतिहासकार, अर्थशास्त्री और सुधारक भी थे।  उन्हें "महाराष्ट्र का सुकरात" कहा जाता है।  रानाडे 'दक्कन एजुकेशनल सोसायटी' के संस्थापकों में से एक थे। रानाडे स्वदेशी के समर्थक और देश में ही निर्मित वस्तुओं का प्रयोग करने के पक्षधर थे। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें से प्रमुख हैं- विधवा पुनर्विवाह. मालगुजारी क़ानून, राजा राममोहन राय की जीवनी, मराठों का उत्कर्ष, धार्मिक एवं सामाजिक सुधार।

गोखलेजी ने गांधीजी को अपने राजनीतिक गुरु रानाडे की जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में आमंत्रित किया। उन्होंने इस अवसर पर अपने भाषण में न केवल एक महान इतिहासकार, बल्कि एक महान अर्थशास्त्री, सुधारक और देशभक्त भी बताया; एक बहुमुखी प्रतिभा, जो अपने सभी समकालीनों से कहीं आगे थे। जो एक न्यायाधीश होने के बावजूद कांग्रेस के अधिवेशनों में निडरता से शामिल होते थे। इसने गांधीजी पर गहरी छाप छोड़ी। बाद में अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान उन्होंने भी एक अवसर पर गोखले द्वारा बताए गए उदाहरण का अनुकरण करते हुए समान परिस्थितियों में ऐसा ही किया।

बग्गी की सवारी

गोखले के प्रति अपने पूरे सम्मान के बावजूद वे गोखले की कुछ कमियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सके। एक तो यह कि गोखले ट्राम की जगह घोड़ागाड़ी का इस्तेमाल करते थे और दूसरी यह कि वे शारीरिक व्यायाम की उपेक्षा करते थे। उन दिनों गोखले जी के पास घोड़े से खींचे जाने वाली एक बग्गी थी, जिससे वे यहां-वहां जाया करते थे। एक दिन गांधीजी ने उनसे पूछा, “आप शहर में इधर-उधर जाने के लिए ट्राम का उपयोग क्यों नहीं करते? क्या उससे सफ़र करना आप जैसे कद के नेता के लिए अपमानजनक है?”

यह सुनकर गोखले जी को दुख हुआ। हल्के-फुलके उलाहने के लहज़े में जवाब दिया, “तो, तुम भी मुझे पहचान न सके ! अपनी निजी सुविधा के लिए मैं परिषद के भत्तों का उपयोग नहीं करता। तुम जिस तरह से ट्राम की सवारी स्वतंत्रतापूर्वक करते हो, इससे मुझे जलन होती है। पर खेद के साथ कहना पड़ता है कि मैं वैसा नहीं कर सकता। जब तुम भी मेरी तरह प्रसिद्ध हो जाओगे तो तुम्हारे लिए भी इस तरह से विचरण करना अगर असंभव नहीं तो उतना ही कठिन हो जाएगा, जितना आज मुझे है। मैं जितने साधारण तरीक़े से रह सकता हूं, रहता हूं, लेकिन कुछ ऐसे खर्च हैं जो करना ही पड़ता है, खासकर मेरे जैसे लोगों को लिए।” गांधीजी ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन एक महात्मा के रूप में उन्हें देश भर में यात्रा करने के लिए एक विशेष ट्रेन से जाना पड़ेगा, ताकि वे जिस रास्ते से यात्रा कर रहे हैं, उस रास्ते पर सभी रेलवे स्टेशनों पर दर्शन के लिए पागल भीड़ जमा न हो जाए और पूरा रेलवे यातायात अस्त-व्यस्त न हो जाए।

शारीरिक व्यायाम की उपेक्षा

इस उत्तर से गांधीजी को संतुष्टि हुई, किन्तु किसी भी प्रकार के व्यायाम या सुबह की सैर नहीं करने की उनकी आदत से गांधीजी को चिन्ता हुई। अगर थोड़ा-बहुत भी वे नियमित और अनुशासित जीवन जीते तो उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता। गांधीजी ने कहा, “पर आप टहलने भी तो ठीक से नहीं जाते। ऐसी दशा में आप बीमार रहें तो इसमें आश्चर्य क्या ? क्या देश के काम में से व्यायाम के लिए भी फ़ुरसत नहीं मिल सकती ?”

गोखले जी बोले, “तुम मुझे किस समय फ़ुरसत में देखते हो कि मैं घूमने जा सकूं?”

इस उत्तर से गांधीजी को संतोष न हुआ। पर गोखले जी के प्रति उनके मन में इतना आदर था कि वे प्रतिउत्तर दे नहीं सकते थे। गांधीजी चुप रहे। गांधीजी कहते हैं, "मैं तब भी यही मानता था और आज भी मानता हूँ कि चाहे किसी के पास कितना भी काम क्यों न हो, उसे व्यायाम के लिए हमेशा समय निकालना चाहिए ... ठीक वैसे ही जैसे कोई अपने भोजन के लिए करता है।" यदि शरीर आत्मा का निवास है, तो उन्होंने तर्क दिया कि यदि आत्मा स्वस्थ है, तो यह आत्मा के स्वास्थ्य को प्रतिबिंबित करेगा। इसके विपरीत, एक बीमार शरीर आत्मा की बीमारी का संकेत देता है और इसलिए यह पाप है - प्रकृति के नियमों के विरुद्ध पाप। हमारा शरीर निर्माता की ओर से उसकी सेवा में उपयोग किए जाने के लिए एक ट्रस्ट है। उसके साथ सामंजस्य का परिणाम स्वास्थ्य के नियमों का सहज ज्ञान और उनके अनुरूप जीवन होना चाहिए। बीमारी आत्मा के विरुद्ध पाप है; पाप, आत्मा की बीमारी। एक प्रायश्चित करने योग्य अपराध है; दूसरा ठीक करने योग्य रोग है।

वायसराय कर्ज़न से मिलने की कोशिश

बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष की मदद से गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की अक्षमताओं के बारे में वायसराय से मिलने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल की संभावना तलाशने की कोशिश की। लेकिन लॉर्ड कर्जन, हालांकि बहुत सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखते थे, लेकिन उन्होंने इस आधार पर प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी कि इससे उनके विचारों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति होगी जो शायद इस उद्देश्य के लिए फायदेमंद न हो। इसलिए इस विचार को छोड़ दिया गया। हालांकि, गांधीजी ने अल्बर्ट हॉल में दो सार्वजनिक बैठकों को संबोधित किया। वह पहले से ही नफरत को प्यार से जीतने और हर कीमत पर सच्चाई पर अड़े रहने की बात कर रहे थे।

उपसंहार

गांधीजी  गोखले की इस बात से प्रभावित थे कि वे असत्य और कपट के छोटे से भी दाग ​​से मुक्त थे, जो उनके प्रसिद्ध कथन, ‘राजनीति को आध्यात्मिक बनाया जाना चाहिए’ का पूर्वाभास देता था, जिसे उन्हें अपना बनाना था। गोखले ने सामाजिक सशक्तीकरण, शिक्षा के विस्तार और तीन दशकों तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में कार्य किया तथा प्रतिक्रियावादी या क्रांतिकारी तरीकों के इस्तेमाल को खारिज किया।

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद

संदर्भ : यहाँ पर

 




शनिवार, 26 अप्रैल 2014

गोखले की दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा

गांधी और गांधीवाद-157

1912

गोखले की दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा

दक्षिण अफ़्रीका के आंदोलन की गूंज भारत तक पहुंची। भारत में ‘वायसरीगल काउंसिल के ऑफ इंडिया’ के गोपालकृष्ण गोखले ने रंगभेद के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की थी। भारत और इंग्लैंड दोनों ही देशों में गोखले जी को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर और भारत सेवक समिति के अध्यक्ष गोखले जी केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य थे। कलकत्ते की बड़ी काउंसिल के भीतर और बाहर से भी वे दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई का हर तरह से समर्थन करते रहे थे। मुम्बई में प्रसिद्ध बैरिस्टर फिरोजशाह मेहता भी दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों की समस्या के निदान में रुचि रखते थे। गांधी जी की गोखले में परम श्रद्धा थी। पिछले पंद्रह वर्षों से उनका गांधी जी से पत्र-व्यवहार चला आ रहा था। वे उनके राजनीतिक गुरु थे। उनके आग्रह पर गोखले ने दक्षिण अफ़्रीका का दौरा किया। उनकी दक्षिण अफ़्रीका की योजना ब्रिटिश सरकार की मंजूरी से बनी थी। उनके आने के पहले तक अफ़्रीका के गोरों को भारत या भारतवासियों के बारे में कोई खास जनकारी नहीं थी। गोरों का मानना था कि भारतीय जनता अनपढ़, निकम्मी, रूढ़िग्रस्त और संस्कारहीन थी। कुल मिलाकर भारतीयों का स्थान गोरों के नौकर-चाकर से अधिक का नहीं था। इसीलिए तो वे भारतीयों को कुली कहते थे।

गांधी जी काफ़ी दिनों से गोखले जी और अन्य कई भारतीय नेताओं से निवेदन कर रहे थे कि वे दक्षिण अफ़्रीका जाकर भारतीयों की स्थिति से अवगत हों। गोखले जी 1911 में इंग्लैंड में थे। उनके साथ गांधी जी का पत्र-व्यवहार चलता रहता था। भारतमंत्री के साथ उन्होंने सलाह-मसविरा किया कि दक्षिण अफ़्रीका जाकर उन्हें पूरे मसले को समझना चाहिए। भारत मंत्री को उनकी यह योजना पसंद आई। गोखले जी ने अपने छह सप्ताह के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे की सूचना गांधी जी को दी। गांधी जी के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होंने निश्चय किया कि गोखले जी का ऐसा स्वागत सम्मान किया जाए जैसा कभी किसी बादशाह का भी न हुआ हो। इस स्वागत में शामिल होने के लिए गोरों को भी निमंत्रण दिया गया। यह तय किया गया कि जहां-जहां सार्वजनिक सभा होगी वहां के मेयर को सभा का सभापति बनाया जाएगा। रेलवे स्टेशनों को सजाया जाएगा। जोहान्सबर्ग स्टेशन को सजाने में पंद्रह दिन लगे। कालेनबैक के निर्देशन में वहां एक सुंदर चित्रित तोरण बनाया गया था।

गोखले जी लंदन में थे। वहीं से उनका दक्षिण अफ़्रीका का कार्यक्रम था। भारत मंत्री ने दक्षिण अफ़्रीका की सरकार को सूचना दे दी। ब्रिटिश सरकार ने उनकी दक्षिण अफ़्रीका की यात्रा का प्रबंध किया था। स्टीमर में उनके लिए प्रथम श्रेणी की व्यवस्था की गई थी। ब्रिटिश सरकार का एक वरिष्ठ अफ़सर उनकी हिफ़ाज़त के लिए साथ भेजा गया था। दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने उन्हें अपना राजकीय मेहमान माना। उनके प्रवास की सुख-सुविधा के लिए जनरल स्मट्स ने ट्रेन का अपना निजी सैलून उनके उपयोग के लिए दिया था। 22 अक्तूबर 1912 को वे केपटाउन पहुंचे। उन दिनों गांधी जी टॉल्सटॉय फार्म पर रहते थे। कालेनबाख और ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष कछालिया के साथ गांधी जी गोखले जी का स्वागत करने केपटाउन बंदरगाह गए। वहां सैंकड़ो भारतीय एकत्रित हुए। गांधी जी और गोखले जी एक दूसरे के गले मिले। गोखले जी ने गांधी जी से कहा, “देखो गांधी, बहुत दिनों से तुम बुलाते थे, तो मैं आ गया। मैं यहां से विदा होऊं तब तक जो चाहो सो मेरा उपयोग कर लो, मैं कुछ नहीं जानता। तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। बाद में मुझे दोष न देना।”54

केपटाउन में एक बड़ी सभा हुई। उस शहर के मुखिया सिनेटर डब्ल्यू. पी. श्राइनर ने सभा का सभापतित्व किया। उसने गोखले जी का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीयों के साथ उसकी काफ़ी हमदर्दी है। गोखले जी का भाषण छोटा, परिपक्व विचारों से भरा, दृढ़ पर विनययुक्त था। उन्हें सुनकर न सिर्फ़ भारतीय बल्कि गोरे भी प्रसन्न हुए। केपटाउन से वे जोहान्सबर्ग रवाना हुए। असली लड़ाई तो वहीं के ट्रांसवाल में लड़ी जा रही थी। वे दक्षिण अफ़्रीका में पांच सप्ताह रहे। जगह-जगह पर उनका भव्य स्वागत हुआ।

टॉल्सटॉय फार्म में गोखले जी का आगमन

फार्म जब चल रहा था उसी समय गोखले जी दक्षिण अफ़्रीका गए थे। गोखले जी नाजुक तबियत वाले व्यक्ति थे। फार्म का जीवन बड़ा कठिन था। गांधी जी ने निश्चय किया कि गोखले जी को फार्म पर बुलाया जाए। फार्म में खाट जैसी कोई चीज़ नहीं थी। सभी ज़मीन पर सोते थे। गोखले जी के लिए एक खाट मंगवाई गई। दूसरी समस्या यह थी कि वहां कोई ऐसा कमरा नहीं था जहां गोखले जी को पूरा एकांत मिल सके। तय यह हुआ कि कालेनबेक के कमरे में उन्हें रखा जाएगा। स्टेशन से फार्म तक का डेढ़ मील का सफर पैदल तय किया गया। उसी दिन वर्षा भी हो गई। मौसम का ठंडा हो गया। गोखले जी को ठंड लग गई। उन्हें कालेनबेक के कमरे में ठहराया गया। वहां से रसोई दूर थी। उन्हें रसोई घर में ले जाया नहीं जा सकता था, और वहां तक खाना लाने में वह ठंडा हो जाता। पर गोखले जी ने सारे कष्ट सहते हुए एक शब्द भी नहीं कहा। यहां तक कि जब उन्हें मालूम हुआ कि फार्म में सभी लोग ज़मीन पर ही सोते हैं, तब उनके लिए जो खाट लाई गई थी उसे हटा दिया और अपना बिस्तर उन्होंने फ़र्श पर ही लगा लिया। गोखले जी देह-आदि की मालिश के लिए नौकर की सेवा ही स्वीकार करते थे। उस रात गांधी जी और कालेनबेक ने उनसे बहुत विनती की कि उन्हें पांव दबाने दें, पर गोखले जी टस से मस न हुए। उल्टे नाराज होते हुए बोले, “जान पड़ता है कि आप सब लोगों ने यह समझ लिया है कि कष्ट भोगने के लिए अकेले आप ही लोग जन्मे हो और हम जैसे लोग इसलिए पैदा हुए हैं कि तुम्हें कष्ट दें। अपनी अति की सज़ा तुम पूरी-पूरी भोग लो। मैं तुम्हें अपना शरीर छूने तक नहीं दूंगा। तुम सब लोग निबटने के लिए दूर जाओगे और मेरे लिए कमोड रखोगे। ऐसा क्यों? चाहे जितनी तकलीफ़ उठानी पड़े, मैं भोग लूंगा; पर तुम्हारा गर्व चूर करूंगा।”

गोखले जी की पूरी यात्रा के दौरान साथ रहकर गांधी जी ने उनके दुभाषिए और अनुचर का काम किया। गोखले जी जहां भी गए उनका शाही ढंग से स्वागत किया गया। वे जिस स्टेशन पर उतरते उसे ख़ूब सजाया जाता। रोशनियां की जातीं। गलीचे बिछाए जाते। मानपत्र भेंट किए जाते। जगह-जगह पर गोखले जी का भाषण हुआ। गांधी जी के विशेष आग्रह पर गोखले जी ने मराठी में भाषण दिया। गांधी जी उसका हिंदी अनुवाद करते। लोग भावविभोर होकर उनकी बातें सुनते। गांधी जी और कालेनबाख गोखले की सेवा करते। गांधी जी उनके कपड़े ख़ुद धोते, और उसपर इस्तरी भी करते। उनका भोजन भी ख़ुद ही बनाते। गोखले जी मधुमेह के मरीज़ थे, इसलिए उनके आहार का पूरा ध्यान रखा जाता। गांधी जी उनके भोजन की तैयारी पर खुद नज़र रखते। जोहान्सबर्ग में गोखले जी पन्द्रह दिनों तक रहे। गोखले जी टॉल्सटॉय फार्म और फीनिक्स आश्रम भी गए।

गोखले जी के दक्षिण अफ़्रीका आने का उद्देश्य था भारतीय समुदाय की अवस्था का अनुमान करना और उसके सुधारने में गांधी जी की सहायता करना। जब वे दक्षिण अफ़्रीका गए, तो उनकी विद्वता, गरिमा, गंभीरता, संस्कारिता और विलक्षण राजनैतिक निपुणता देखकर गोरी सरकार चकित रह गई। प्रवासी भारतीयों ने उनकी अभूतपूर्व आवभगत की। चूंकि गोखले जी लंबे समय से असहयोग आंदोलन के साथ जुड़े हुए थे, इसलिए आंदोलन में उनकी उपस्थित से नई स्फूर्ति आई। जहां जहां वे गए वहां भारतीयों में ही नहीं, गोरी प्रजा में भी उत्साह का संचार हुआ।

जोहान्सबर्ग से गोखले जी प्रिटोरिया गए। वहां उन्हें यूनियन सरकार से मिलना था। अफ़्रीकी संघ की अधिकांश यात्रा पर गांधी जी उनके साथ रहे। लेकिन प्रिटोरिया में जब वे जनरल स्मट्स और जनरल बोथा से भी मिलने गए तो गांधी जी उनके साथ नहीं गए। गांधी जी ने गोखले जी को मुख्य मुद्दों के बारे में पहले ही बता दिया था। उन्होंने गोखले जी को 20 पेज का एक मैमोरेण्डम बनाकर दे दिया था। दो घंटे तक चली मीटिंग में बेकार झंझटों के बिना संघ की स्थापना के लिए उत्सुक, दोनों जनरलों ने वास्तव में गोखले जी से भारतीयों के ख़िलाफ़ अत्यधिक भेदभाव वाली व्यवस्थाओं को समाप्त करने का वादा किया था। गोखले जी जब मीटिंग से वापस लौटे तो बहुत आशान्वित और संतुष्ट थे। वे सरकार द्वारा किए गए सत्कार और जनरल बोथा और जनरल स्मट्स के आश्वासनों के बहलावे में आ गए। जब बैठक से लौटे तो गोखले जी ने गांधी जी से कहा, “तुम्हें एक वर्ष के भीतर भारत लौट आना है। सब बातों का फैसला हो गया। काला क़ानून रद्द हो जाएगा। इमिग्रेशन क़ानून से वर्ण-भेद वाली दफ़ा निकाल दी जाएगी। तीन पौंड का कर हटा दिया जाएगा।”

गांधी जी इस पर बिल्कुल विश्वास करने को तैयार नहीं थे, राजनीतिक विषयों में वे पेशेवर राजनीतिज्ञों से कहीं अधिक चतुर थे। उन्होंने कहा, “मुझे इसमें पूरी शंका है। इस मंत्रीमंडल को जितना मैं जानता हूं उतना आप नहीं जानते। आपका आशावाद मुझे प्रिय है, क्योंकि मैं ख़ुद भी आशावादी हूं; पर अनेक बार धोखा खा चुका हूं। इसलिए इस विषय में आपकी जितनी आशा मैं नहीं रख सकता।” गांधी जी सही थे। यह वादा पूरा न हुआ।

17 नवंबर 1912 को गोखले जी जब भारत वापस जाने लगे तो गांधी जी और कालेनबैक जंजीबार तक उन्हें छोड़ने स्टीमर में साथ गए। बोट पर गांधी जी और गोखले जी शतरंज खेलते थे। दोनों ही अच्छे खिलाड़ी थे। विदा होते समय गोखले ने गांधी जी से कहा, “देश की ख़ातिर जल्द ही भारत लौट आओ। वहां तुम्हारी बहुत ज़रूरत है।”

भारत लौटने पर मुम्बई के एक सार्वजनिक सभा में कहा था, “निःसंदेह गांधी ऐसी मिट्टी के बने हैं जिनसे नायक और शहीद बने होते हैं। उनके अंदर अपने आसपास के साधारण व्यक्तियों को भी नायकों और शहीदों में रूपांतरित करने की प्रशंसनीय आध्यात्मिक शक्ति मौजूद है।”

गोखले जी को विदा करके जब गांधी जी और कालेनबेक वापस लौट रहे थे, तो उन्हें रोक दिया गया, क्योंकि उनके पास ज़रूरी काग़ज़ात नहीं थे। कालेनबेक के पास भी काग़ज़ात नहीं थे, लेकिन उन्हें उसी समय परमिट दे दी गई। कालेनबेक को इस घटना से बेहद दुख हुआ। जब गांधी जी परमिट की प्रतिक्षा कर रहे थे, तो अधिकारी ताने कस रहे थे, “तुम एशियाई हो। तुम्हारी चमड़ी काली है। मैं यूरोपियन हूं, और देखो मेरी चमड़ी गोरी है।” सौभाग्य से भारतीय समुदाय बीच में कूद पड़ा और उनके लिए डट कर खड़ा हो गया। अधिकारियों को झुकना पड़ा। गांधी जी को कुछ घंटों में ही जाने की परमिट मिल गई।

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