सोमवार, 20 अप्रैल 2026

474. गांधीजी फिर बिहार में

राष्ट्रीय आन्दोलन

474. गांधीजी फिर बिहार में

1947

दिल्ली में चल रही वार्ताओं से यह तय लग रहा था कि ब्रिटिश सरकार सांप्रदायिक आधार पर दो देश बनाकर भारत को आजाद करेगी। हालात से आशंकित हो एक तरफ मुस्लिम बाहुल्य बंगाल पंजाब और सिंध से हिन्दुओं का पलायन शुरू हो गया तो दूसरी तरफ बिहार और दिल्ली के कई मुस्लिम इलाकों से मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने की तैयारी शुरू कर दी। हालाँकि कांग्रेस का हमेशा यह सिद्धांत रहा था कि विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों को वही समान अविकार रहेंगे जो हिन्दू, और सिख, ईसाई आदि के होंगे फिर भी मुस्लिम लीग के प्रभाव के इलाकों से मुसलमानों का पलायन हो रहा था। इस दौर में भारत में बहुत दर्दनाक हालात थे इसीलिए शायद इसकी सबसे अधिक पीडा गांधीजी को ही थी। वे कभी मुस्लिम लीग और कांग्रेस में समझौता कराने के लिए वायसराय से मुलाकात के लिए दिल्ली आते तो कभी सांप्रदायिक दंगों से झुलसते बंगाल बिहार को शांत करने दौड पड़ते12 अप्रैल को गांधीजी पटना के लिए चल पड़े। 78 वर्ष की उम्र में गांधीजी फिर से बिहार के लिए अकेले निकल पड़े थे, जहां से 30 वर्ष पहले उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था!

फिर से बिहार पहुंचकर गांधीजी को शांति का अनुभव हुआ। अब वे वहां फिर से नए सिरे से काम शुरू कर सकते थे। दिल्ली में तो न तो कांग्रेस, न मुस्लिम लीग और न ही अंग्रेज़ उनकी सलाह पर चलने को तैयार थे। उन्हें अब लगने लगा था कि भारत के विभाजन को कोई चीज़ रोक सकती थी तो वह थी समग्र स्थिति में मौलिक परिवर्तन। वे ऐसा वातावरण बनाने में लग जाना चाहते थे जिससे राजनीतिक दलों को मज़बूर होकर फिर से सोचना पड़े। काम आसान नहीं था। जिन आदर्शों के लिए उन्होंने निरन्तर कार्य किया था, उसके विरुद्ध तेज़ी से ज्वार चढ़ रहा था। लेकिन सफलता के लोभ से न तो कभी उन्होंने कोई काम किया और न ही असफलता के डर से किसी काम से विमुख हुए। इसलिए लोगों की सोई हुई अन्तरात्मा को जगाने के लिए वे पूरे तन-मन से जुट गए।

अपराधियों को उनका अपराध समझाना तो उनके लिए आसान था लेकिन अत्याचारों के शिकार हुए लोगों को ग़लत रवैयों का ख़तरा समझाना बहुत मुश्किल था। गांधीजी ने अपने आपको हिन्दू-मुस्लिम समस्या तक ही सीमित रखा। गांधीजी अब भी यही मानते थे कि केवल अंग्रेज़ भारत से चले जाएं, तो देश के सब लोग एक हो जाएंगे। जब हमारी सरकार बन जाएगी तो हम एक-दूसरे को समझाकर विभाजन की समस्या का हल कर लेंगे। गांधीजी चाहते थे कि संदेह का वातावरण दूर होना चाहिए। मुस्लिम लीग के ग़लत बहकावे में आकर अधिकांश मुसलमान अपने को भारत में पराया समझते थे। ऐसे अनेकों लोग थे जो कटुता को मिटाने के बजाए उसका दुरुपयोग करने में अधिक आनन्द उठाते थे। पुराने घाव भरने के जगह उसे कुरेदने में उन्हें मज़ा आता था। गांधीजी मानते थे कि भूल का उत्तम पश्चाताप यह है कि उसे फिर कभी न किया जाए। वे अपराधियों से कहते कि आप अपने आपको क़ानून के समक्ष समर्पण कर दो और जो भी सज़ा मिले उसे स्वीकार करो। कांग्रेसी कार्यकर्ता उनकी आलोचना से चिढ़ते थे। उनकी नियत पर शक करते।

अप्रैल में बिहार में बहुत गर्मी थी, और गांधीजी गाँवों में लगातार यात्रा करने की थकान सहन नहीं कर पा रहे थे। लेकिन अगर हिंदुओं ने अपनी गलती नहीं मानी और डर के मारे भाग गए मुसलमानों को वापस नहीं बुलाया, तो उन्हें जाना ही पड़ता। उन्हें एक पत्र मिला जिसमें सुझाव दिया गया था कि उन्हें कृष्ण की तरह जंगल में चले जाना चाहिए; पत्र लिखने वाले ने कहा था कि देश का अहिंसा पर से विश्वास उठ गया है, और इसके अलावा, भगवद् गीता भी अहिंसा नहीं सिखाती। उन्होंने पटना में अपनी प्रार्थना सभा में इस बात का ज़िक्र किया। फिर भी, कई बातों से उन्हें हौसला मिला। गांधीजी के कहने पर, जनरल शाहनवाज़, जो एक मुसलमान और इंडियन नेशनल आर्मी के हीरो थे, बिहार में ही रुक गए थे। शाहनवाज़ ने अब बताया कि मुसलमान अपने गाँवों को लौट रहे हैं और हिंदू तथा सिख उनकी मदद कर रहे हैं। गांधीजी को लगा कि 'अगर हिंदू सच्चे हिंदू होते और मुसलमानों से दोस्ती करते, तो अभी जो चारों तरफ आग लगी हुई है, वह बुझ जाती।' बिहार एक बड़ा प्रांत था। इसका उदाहरण दूसरों को प्रेरित करता। बिहार में शांति से कलकत्ता और दूसरी जगहों की समस्याएँ 'खत्म' हो जातीं।

अपने विभिन्न संगठनों को भी कई महीनों से उन्होंने देखभाल नहीं की थी। पहले नोआखाली की धर्म यात्रा में थे, अब बिहार में। इसलिए उन्होंने अपने संगठनों के लिए भी समय निकाला और विभिन्न पदाधिकारियों के साथ प्रगति की चर्चा की। पहले वे ‘नई तालीम’ के प्रतिनिधियों से मिले, फिर ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ के सदस्यों से। सदाकत आश्रम और हरिजन सेवक संघ के कार्यकर्ताओं से भी मिले। दिल्ली जाने के पहले बिहार के मंत्रियों से भी मिले। जैसी की सहमति बनी थी, उसके विपरीत पुनर्वास का कार्यक्रम सुस्त था। उन्होंने शिकायत करते हुए कहा कि आपने मुझे कहा कुछ और था और कर कुछ और रहे हैं। इससे देश की आज़ादी मिलने में देरी होगी।

23 अप्रैल को नेहरू ने गांधीजी को पत्र लिखकर कहा, 1 मई को कांग्रेस कार्यसमिति की दिल्ली में बैठक हो रही है। मेरी बड़ी इच्छा है कि उस समय आप यहां रहें। मई के पहले सप्ताह में माउंटबेटन की योजना तैयार हो जाएगी। हम सब चाहते हैं आप सलाह और मार्गदर्शन के लिए हमारे पास रहें।29 अप्रैल को बिहार में उनका अन्तिम दिन था। उन्होंने बिहार के लोगों को शांति, सौहार्द्र और सद्भावना से रहने का संदेश दिया। अब वे फिर दिल्ली की ओर जा रहे थे। उन्हें मालूम था कि उनके राजनीतिक सहयोगी अब अलग राह पकड़ चुके हैं। उन्हें साथ लाना मुश्किल था। देश के विभाजन को रोकना अब उनके वश की बात नहीं रह गई थी, फिर भी वे एक अंतिम प्रयास तो कर ही सकते थे। दुख की स्थिति में उन्होंने एक बार कह ही दिया था, कोई अपने आपको मेरा बेटा कहता है, तो कोई चेला, पर कोई भी मेरी नहीं सुनता।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर

 

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