5. सूफ़ीमत का उदय-4
5.6 इस्लाम की धार्मिक अवधारणा
इस्लाम के उदय से
पहले के समय को अरब इतिहास में अज्ञानता का काल (जाहिलिय्यत) के नाम से
जाना जाता है। जाहिलिय्यत का शाब्दिक अर्थ अज्ञानता, मूर्खता या अंधकार का
युग है। जाहिलिय्यत की रीति थी कि एक के बदले कई को ही नहीं, यदि निर्बल क़बीला हो, तो पूरे क़बीले ही को
मार दिया जाता था। इस्लाम ने यह नियम बना दिया कि स्वतंत्र तथा दास और नर-नारी सब मानवता
में बराबर हैं। अतः बदले में केवल उसी को मारा जाये जो अपराधी है। वह स्वतंत्र हो या
दास, नर हो या नारी। ठेठ रेगिस्तान होने के कारण उत्तरी अरब
के अरबी-भाषी लोग क़बायली जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुरा, सुंदरी, लूटपाट, कलह और पारस्परिक
ईर्ष्या-द्वेष उनकी प्रकृति का अंग थे। उमय्या
वंश (इस्लामी इतिहास का पहला
वंशानुगत राजवंश, जिसकी स्थापना
मुआविया प्रथम ने की थी) के
ख़लीफ़ाओं (661-750 ई.) ने संकीर्ण अरब राष्ट्रीयता के नाम
पर व्यक्तिगत शासन-व्यवस्था को धर्म का आधार बना दिया था। इसकी प्रतिक्रिया में
“शऊबी आन्दोलन” का प्रादुर्भाव हुआ।
'शऊब' का अर्थ है- 'राष्ट्र या जातियां'। इस आन्दोलन के
समर्थकों (शऊबियों) का मुख्य उद्देश्य आरंभिक इस्लामी विजयों के दौरान गैर-अरब
लोगों (विशेषकर फारसियों) पर अरबों की श्रेष्ठता और अरब-संस्कृति के बढ़ते वर्चस्व
का विरोध करना था। इस आन्दोलन का उदय उम्मय्यद और अब्बासिद खिलाफत (8वीं से 10वीं शताब्दी) के
दौरान हुआ था। यह इस्लामी इतिहास (विशेष रूप से उमय्यद और अब्बासिद काल, 750 ईस्वी में
अब्बासिदों ने उमय्यदों को हरा दिया) के दौरान गैर-अरब मुसलमानों (मुख्य रूप से
फारसियों) द्वारा अरबों की श्रेष्ठता को चुनौती देने और अपनी सांस्कृतिक और
राष्ट्रीय पहचान के संरक्षण के लिए चलाया गया एक बौद्धिक और सामाजिक आन्दोलन
था। शऊबियों का तर्क था कि इस्लाम में सभी नस्लें और जातियां समान हैं। कोई भी अरब
या गैर-अरब जाति जन्म के आधार पर एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है। समय के साथ इस आन्दोलन
का रुख़ अरब विरोधी और ईरान समर्थक का हो गया। इस्लाम के पहले ज़रस्थुस्त्रवाद (628-521 ई.पू.) ईरानी धार्मिक-आस्था
के रूप में प्रचलित था। इससे पहले मज़दकवद (651-224 ई.पू.) और मानी (275-216 ई.पू.) ने भी धर्म
और विश्वास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। कुछ विद्वानों द्वारा शऊबी आन्दोलन
को ईरानी सूफ़ीवाद भी कहा गया है। ईरान में लोगों ने इस्लाम धर्म-ग्रहण तो किया था,
लेकिन साथ ही वे प्राचीन धार्मिक विश्वासों का भी संरक्षण करते रहे। इसलिए ईरान का
तसव्वुफ़ अरबी तसव्वुफ़ से कुछ मामलों में भिन्न था।
समय
के साथ यह देखा गया कि सूफ़ी संतों के आचरण और व्यवहार ने लोगों का मन मोह लिया।
उन्होंने लोगों में इस्लाम के प्रति विश्वसनीयता उत्पन्न की। ज़ाफ़र रज़ा के
अनुसार “इस्लाम
मात्र उपासना पद्धति का नाम नहीं है, यह मानव-अधिकार-संरक्षण आंदोलन का दूसरा नाम
है। यह आन्दोलन व्यक्तिगत या निजी होने के बजाए आदि काल से अन्य धार्मिक आन्दोलनों
की निरन्तरता को न केवल स्पष्ट करता है, वरन् उसमें से कुछेक आन्दोलनों को
विस्तार भी देता है।”
इस्लाम
शब्द के दो अर्थ हैं। एक अर्थ है शांति (Peace) और
दूसरा अर्थ है भगवत-शरणता, "ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण" (Submission)। इस्लाम
शब्द में `सलम’ धातु है।
उसका अर्थ होता है शरण जाना। अर्थात्
अपनी इच्छा को सर्वशक्तिमान ईश्वर (अल्लाह) की इच्छा के अधीन कर देना या सौंप
देना। इस्लाम अरबी भाषा के शब्द “सिल्म”
से उद्धृत है। सिल्म का शाब्दिक अर्थ है सुख, शांति और समृद्धि। इस्लाम का अर्थ
होता है – “शांति
में प्रवेश करना”। परमेश्वर की शरण जाओ तो
शांति मिलेगी। इस्लाम धर्म के अनुयायी मुसलमान कहलाए। अरबी
व्याकरण में 'मुस्लिम' का अर्थ "वह व्यक्ति जिसने ईश्वर की
इच्छा के आगे अपना सिर झुका दिया हो"
(ईश्वर को समर्पित) होता है।
क़ुरआन
में मुसलमानों को कहा गया है,
“तुम, तुम मानव जाति के लिए उत्पन्न की गई सबसे
अच्छी उम्मत (समुदाय) हो,
जिसे सब लोगों के लिए उत्पन्न किया गया है कि तुम
भलाई का आदेश देते हो तथा बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान (विश्वास) रखते ” (3:110)।
इस आयत में मुसलमानों को संबोधित किया गया है,
तथा उन्हें उम्मत कहा गया है। इस आयत में उम्मत-ए-मुहम्मदिया
(मुसलमानों) को मानव जाति के लिए "सर्वश्रेष्ठ" (Best Nation) कहा गया है। इसका
कारण जन्म या जाति नहीं, बल्कि
उनके द्वारा मानवता के लिए किए जाने वाले अच्छे कर्म हैं। उन्हें किसी जाति अथवा वर्ग
और वर्ण के नाम से संबोधित नहीं किया गया है। और इस में यह संकेत है कि मुसलमान उन
का नाम है जो सत्धर्म के अनुयायी हों। तथा उन के अस्तित्व का लक्ष्य यह बताया गया है
कि वह सम्पूर्ण मानव विश्व को सत्धर्म इस्लाम की ओर बुलायें जो सर्व मानव जाति का धर्म
है। किसी विशेष जाति और क्षेत्र अथवा देश का धर्म नहीं है। इस प्रकार मुसलमान वह
है जो ईश्वर और मनुष्य के साथ पूर्ण शांति का संबंध रखता हो और इस्लाम वह धर्म है
जिसके बताए मार्ग पर चलकर मनुष्य मनुष्यों के प्रति अहिंसा और प्रेम का व्यवहार
करता है और ईश्वर की शरण को उपलब्ध होता है। किसी का निरादर करके कोई मुसलमान नहीं
रह सकता। उसी क्षण वह इस्लाम की परिधि के बाहर हो जाएगा। इस्लाम किसी भी रूप में
धर्म के नाम पर बल प्रयोग के अत्यंत विरुद्ध है। क़ुरआन में स्पष्ट आदेश दिया गया
है :
‘ला-इकराह-फ़िद्दीन’ (क़ुरआन :
2/256)
अर्थात्
धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती (बल
प्रयोग) नहीं है।
इसके
अनुसार, सच्चा
धर्म (ईमान) हृदय से मानने और इच्छा पर निर्भर करता है, जिसे दबाव या बल प्रयोग से
पैदा नहीं किया जा सकता। इस
आयत में कहा गया है कि सही मार्ग (सत्य) और भटकाव (असत्य) पूरी तरह से स्पष्ट हो
चुके हैं, इसलिए
किसी को भी इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस्लाम
की धार्मिक अवधारणाएं, नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक
संदेश विलक्षण हैं। क़ुरआन समस्त मानव-समाज को सहिष्णुतापूर्ण रहने की सलाह देता
है।
‘लकुम-दीनुकुम-वालि-यदीन’ (क़ुरआन :
109/6)
अर्थात्
तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन (धर्म) और मेरे लिए मेरा दीन (धर्म)।
इसमें
स्पष्ट किया गया कि आस्था और धर्म में कोई समझौता या मिलावट संभव नहीं है। यह वाक्य धार्मिक सहिष्णुता, स्पष्टता और स्वतंत्रता का प्रतीक है — यानी हर व्यक्ति अपने विश्वास का
पालन करने के लिए स्वतंत्र है और किसी पर कोई धर्म जबरन थोपा नहीं जा सकता।
5.7 इस्लामी
परंपरा के अनुसार सलाम
सलाम
करना मुसलमान होने का एक लक्षण है। क़ुरआन
में कहा गया है. “...
लो और कोई तुम्हें सलाम करे,
तो ये न कहो कि तुम ईमान वाले नहीं हो ... ”
(क़ुरआन 4:94)। यदि कोई व्यक्ति आपको 'अस्सलामु अलैकुम' ('आप पर शांति हो')
कहता है या इस्लाम स्वीकार करने की घोषणा करता है, तो उसे यह कहकर न ठुकराएं कि "तुम मोमिन
(विश्वासी) नहीं हो"।
इस्लाम शब्द में जो `सलम’ धातु है, उसी
से ‘सलाम’ शब्द बना है। सलाम यानी ‘शांति’,
‘सुरक्षा’
और ‘सलामती’। इस्लामी परंपरा के अनुसार सलाम - दूसरों
के लिए सलामती की प्रार्थना करना पहला गुण है। इसी तरह सलाम का उत्तर देना सलाम
करने वाले के लिए भी सलामती की दुआ करना है। यह अभिवादन असल में एक दूसरे के लिए
मंगल-कामना है। मुसलमान जब दूसरे व्यक्ति से मिलता है तो
कहता है :
‘अस्सलामु-अलैकुम’
अर्थात्
- आप पर ईश्वर की सलामती (शांति) हो।
दूसरा
व्यक्ति उत्तर देता है,
‘व-अलैकुम अस्-सलाम’
अर्थात्
- और आप पर भी सलामती (शांति) हो।
5.8 अल्लाह के सिवाय कोई इलाह (परम-पूज्य) नहीं है
प्रसिद्ध
सूफ़ी संत अमीर खुसरों कहते हैं – कम बोलने वाले पहाड़ तक सलाम का जवाब देते हैं। सलाम का जवाब देने में
कंजूसी करने वाला पत्थर से भी गया-गुजरा
है। इस्लाम का संबोधन मात्र मुसलमानों से नहीं है, यह
विश्व के सभी मानव को संबोधित करता है। इस धर्म के प्रवर्तक पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु
अलैहि वसल्लम’ साहब थे। इस धर्म में कहा गया
है -
ला इलाहा
इल्-लल्लाह
अर्थात अल्लाह
के सिवाय कोई इलाह (परम-पूज्य) नहीं है।
यह इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और
बुनियादी वाक्य है। यह एक ख़ास ज़िक्र है। इस ज़िक्र को अपनी सोच का हिस्सा बना लेने
के बाद इंसान हर ख़ौफ़ और ग़म से आज़ाद हो जाता है। इस ज़िक्र के ज़रिये अल्लाह के साथ
होने का अहसास पुख्ता हो जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि जिसके साथ अल्लाह है, उसे
सब कुछ हासिल है। यह साधना, अहसास की साधना है। ख़ुदा के हो जाओ, ख़ुदा
तुम्हारा हो जाएगा। तुम ख़ुदा की मानो, वह तुम्हारी मानेगा। यही जीने का मक़सद
भी है और जीने का तरीक़ा भी। इस से हटकर जीने का कोई भी तरीक़ा वासना कहलाता है।
लिहाजा कोई साधना में जीता है, कोई वासना में। अब हरेक आदमी यह देख ले कि वह कैसे
और किस लिए जी रहा है?
इसे अक्सर पूरा (कलमा-ए-तौहीद) इस
प्रकार पढ़ा जाता है:
ला इलाहा इल्लल्लाह
मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह
अर्थात् "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा ईश्वर नहीं है और हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) अल्लाह
के रसूल (दूत) हैं।" यह वाक्यांश एकेश्वरवाद (तौहीद) को दर्शाता है, यानी ईश्वर एक
है और उसी की पूजा की जानी चाहिए। यह इस्लाम के पांच स्तंभों में से पहला स्तंभ भी
है।
5.9 अहसास की साधना
जैसे रब के लिए ‘मक़ामे रूबूबियत’ ('मक़ाम' का अर्थ 'स्थान' या 'दर्जा' होता है और 'रबूबियत' का अर्थ 'पालनहार' या 'परवरदिगार') है, वैसे ही इंसान के लिए ‘मक़ामे अब्दियत’ है। मक़ामे
रूबूबियत सूफी और इस्लामी दार्शनिकों के अनुसार, वह आध्यात्मिक
अवस्था है जहाँ साधक (इंसान) ईश्वर के गुणों (जैसे दया, करुणा, और भरण-पोषण)
को अपने भीतर उतारने का प्रयास करता है। कुछ विशेष संदर्भों में, सूफी संत 'मक़ामे रुबूबियत' के जरिए उस आध्यात्मिक ऊँचाई का
ज़िक्र करते हैं जो ईश्वर के सबसे करीब पहुँचने वाले व्यक्तियों को प्राप्त होती
है।
यही ‘बंदगी का मक़ाम’ कहलाता है। इसका
शाब्दिक अर्थ 'बंदगी की चरम सीमा' या 'ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण का
उच्चतम स्तर' है। इंसान के
लिए इससे ऊंचा कोई मक़ाम नहीं है। सूफी और इस्लामी विद्वानों के अनुसार, इंसान के लिए
रूहानी (आध्यात्मिक) तरक्की का सबसे बुलंद मुकाम 'अबदियत' ही है। इस अवस्था में
पहुँचकर व्यक्ति 'अहंकार' से मुक्त होकर
विशुद्ध रूप से ईश्वर का सच्चा सेवक बन जाता है। इसी के बाद वह ख़ुदा की नज़र में
इंसान कहलाने का हक़दार बनता है। इंसान की हक़ीक़त इंसानियत है। इंसानियत का यह मक़ाम
इंसान तभी पा सकता है जबकि वह अपने रब का होकर जिए। इस ज़िक्र के
ज़रिये इंसान ‘मक़ामे अब्दियत’ को पा लेता है जो कि उसकी हक़ीक़त है।
यही इंसान की मंज़िल है और इसी के वास्ते रब ने उसे पैदा किया है। सूफीवाद के
अनुसार, 'मक़ाम-ए-अब्दियत' आध्यात्मिक यात्रा (सुलूक) का वह सर्वोच्च और
अंतिम शिखर है जहाँ पहुँचकर एक साधक (सालिक) पूरी
तरह से अपने अहंकार को मिटाकर ईश्वर का शुद्ध बंदा बन जाता है।
इस ज़ि़क्र के दो हिस्से हैं। पहले
हिस्से में अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात का ज़िक्र व दुआ है
और दूसरे हिस्से में कलमा है। दोनों हिस्से साथ साथ पढ़े जाएं, शुरू में
देखकर और याद हो जाने के बाद बिना देखे। जो कुछ कहा जाए उसे दिल में बहुत शिद्दत
से महसूस करके कहा जाए, क्योंकि यह अहसास की साधना है। अहसास जितना गहरा और मज़बूत
होगा, साधना उतनी ही पूर्ण होगी और फलदायक
भी। सुबह, दोपहर और शाम यह ज़िक्र किया जाए। तहज्जुद
के वक्त (ब्रहम मूहूर्त में) यह ज़िक्र बहुत जल्दी तरक्क़ी देता है। इसके बाद
हर वक्त इस ज़िक्र का दूसरा हिस्सा यानि कि कलमा ‘ला इलाहा इल्-लल्लाह’ ज़बान से या दिल से पढ़ते रहें और इसके
अर्थ का ख़याल मन में रखें। चिश्ती, क़ादिरी, सुहरावर्दी, नक्शबंदी, शतारी, मदारी और
क़लंदरी सब सूफ़ी सिलसिलों की बुनियाद इसी ज़िक्र पर है। तमाम पैग़ंबरों की दावत यही
रही है।
5.10 हिजरत
अपने पैग़म्बर के रूप में जिसको ईश्वर ने स्वयं चयनित किया वह “इस्तफ़ा” (अनेक वस्तुओं में
से सर्वश्रेष्ठ) है। इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के कई नामों और उपाधियों में से एक 'अल-मुस्तफ़ा' (चुना हुआ
सर्वश्रेष्ठ) है, वह इस पद के लिए सबसे उपयुक्त हैं। ईश्वर स्वयं अपने संदेशवाहकों
को चुनते हैं। कुरआन में कहा गया है: "अल्लाह फरिश्तों में से और इंसानों में
से रसूल (संदेशवाहक) चुनता है।" (सूरह अल-हज, 75) पैगंबर वे लोग होते
हैं जिन्हें ईश्वर अपनी सृष्टि में से सबसे पवित्र, चरित्रवान और योग्य
चुनते हैं।
इस समय तक इस्लाम को एक नए धर्म के रूप में नहीं देखा गया था। सन् 613
में उन्होंने लोगों को ये बताना आरंभ किया कि उन्हें परमेश्वर से यह संदेश आया है
कि ईश्वर एक है और वो इनसानों को सच्चाई तथा ईमानदारी की राह पर चलने को कहता है। शुरू
में मुहम्मद साहब का ज़ोर दो बातों पर होता था। ख़ुदा एक ही है और वह अमूर्त है। पैग़म्बर
कहते थे जो सबसे अव्वल है, वही अल्लाह है। और जो आख़िर में बचा रह जाएगा, वह भी अल्लाह
ही है। यानी अल्लाह सदा है, सदा रहेगा। बीच की सारी बातें महज़ खेल-तमाशा है। इसलिए
शुरू अल्लाह के नाम से और ख़त्म भी अल्लाह के नाम पर। इस पर क़ुरैशों को कोई ऐतराज़ न
था। मगर जब उन्होंने मूर्तिपूजा के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया तो यह बात अरबों के लिए ग्राह्य
नहीं थी। मूर्ति-पूजा अरब में ज़माने दराज़ (प्राचीन युग) से चली आ रही थी।
मक्का के लोगों को ये बात पसन्द नहीं आई। वे विरोध पर उतारू हो गए। लोग उनके पीछे पड़
गए। चूंकि काबा एक बहुत बड़ा आमदनी का
ज़रिया था, मक्का का कुरैश कबीला काबा की मूर्तियों के जरिए भारी तीर्थयात्रा
राजस्व कमाता था, इसलिए क़ुरैशों की उम्मैया शाखा वालों ने उनका विरोध शुरू कर
दिया। पैग़म्बर साहब की शिक्षाओं से उनकी सामाजिक स्थिति और आर्थिक एकाधिकार को
खतरा महसूस होने लगा था।
पहले तो सिर्फ मज़ाक़ उड़ाया लेकिन जब देखा इससे कुछ फ़ायदा नहीं हो रहा
है तो उन्हें और उनके अनुयायियों को तरह-तरह की तक़लीफें देनी शुरु कर दी। उनके बहुत से अनुयायियों ने मक्का छोड़कर
अबीनिसिया में शरण ली जहां का राजा बहुत भला था। मक्का के प्रभावशाली कुरैश कबीले
के जानलेवा विरोध और अत्याचारों के कारण मुहम्मद साहब को जान का खतरा था। उन्हें दी
जा रही तक़लीफों से तंग आकर पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को अपना
जन्मस्थान मक्का छोड़ देना पड़ा। अरबी में इसे ही हिजरत (एक स्थान को छोड़ कर कहीं
और चले जाना, 'स्थान-परिवर्तन') कहा जाता है। हिजरत का अर्थ हैः अल्लाह
के लिये स्वदेश त्याग देना और ऐसी जगह चले जाना जहां धार्मिक कर्तव्यों का पालन
पूरी तरह से हो सके।
24 सितंबर 622 को जिस दिन हज़रत मुहम्मद साहब ने मक्का से हिजरत
किया उसी दिन से मुसलमानों का हिजरी संवत शुरू होता है। बदक़िस्मती से इन्हीं दिनों
हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का भी इंतक़ाल हो गया। कुछ ही दिनों के बाद चाचा
हज़रत अबू तालिब भी न रहे। उस समय अरब में यहूदियों तथा ईसाइयों के अलावा अरबों का
एक ऐसा समूह भी था, जो सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करता था। ये लोग यहूदी या ईसाई
धर्मावलम्बी नहीं थे। वे मूर्ति पूजा भी नहीं करते थे। अंधविश्वास से भी दूर रहते
थे। यहूदी यमन, यसरिब (मदीना) और ख़ैरब में आबाद थे। हिरा में कुछ क़बीले थे, जिनको ‘अलअबाद’ कहा जाता था। रबीआ
वंशज क़बीले ग़सान और कज़ाअ की कुछ शाखाएं ईसाई थीं। यमन में नजरान ईसाइयों का गढ़ था।
अपने उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)
अपने देश से निकल पड़े। 622 ई. में उन्होंने मक्का छोड़कर मदीना (जिसे यस्रीब के नाम से जाना जाता
था) की हिजरत (प्रवास या स्थानांतरित) की। यह घटना हिजरा या इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत
को चिह्नित करता है, जिसे हिजरी कैलेंडर के रूप में भी जाना जाता है और जिसे 17 वर्षों
बाद ख़लीफ़ा उमर ने उसी वर्ष (622) को प्रथम वर्ष मानकर हिजरी सन चलाया। कई
विद्वानों द्वारा इसी वर्ष से जाहिलिया युग की समाप्ति और इस्लाम या मुस्लिम युग का
वास्तविक आरम्भ माना जाता है। यस-रिब नगर के लोगों ने पैग़म्बर साहब को शरण दी और उनका
आदर सत्कार किया। इसी के सम्मान में उस नगर का नाम मदीनत-उन-नबी (नबी का नगर)
रखा गया। दुनिया भर में यह नगर मदीना के नाम से मशहूर हो गया। इसे इस्लाम में
मक्का के बाद दूसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। जिन लोगों ने मदीने में मुहम्मद
साहब का साथ दिया वे अनसार ('सहायक' या 'समर्थक') कहलाए जाने लगे। 'अंसार' मदीना के उन
स्थानीय निवासियों को कहा जाता था जिन्होंने पैगंबर मुहम्मद और उनके शुरुआती
अनुयायियों (मुहाजिरुन) का तब समर्थन किया था, जब वे मक्का से
मदीना प्रवास (हिज्र) कर गए थे।
अपने लोगों को लेकर जब वो
मदीना आए तो उन्होंने तय किया कि सत्य के आधार पर काम करेंगे। उस सत्य की प्राप्ति
के लिए उनका साधन था सब्र यानी धीरज, शांति। उनके साथी उनकी नसीहत के अनुसार
ज़िंदगी बिताने की कोशिश करते थे। इसलिए उनके शिष्यों को बहुत सताया गया। तक़लीफें दी
गईं। पैग़म्बर हज़रत ने उन्हें समझाया
अल्लाह हमारे साथ हैं, डरो मत। अहिंसा के नाम पर लोग पलायन करने लगे। जब सत्य के विरोधियों
के अत्याचार से विवश हो कर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना हिजरत (प्रस्थान) कर
गये, तो अरब में दो प्रकार के देश हो गये- मदीना दारुल हिजरत प्रवासन
या शरण का स्थान (प्रवास गृह) था जिसमें मुसलमान हिजरत कर के एकत्र हो गये। हिजरत
केवल स्थान बदलना नहीं है, बल्कि बुराइयों को त्याग कर एक बेहतर, धार्मिक और
आज्ञाकारी जीवन की ओर बढ़ने का प्रतीक है।
तथा दूसरा था, दारुल ह़र्ब, वह क्षेत्र जो शत्रुओं
के नियंत्रण में था और जिसका केंद्र मक्का था। यहाँ जो मुसलमान थे वह अपनी आस्था तथा
धार्मिक कर्म से वंचित थे। उन्हें शत्रु का अत्याचार सहना पड़ता था। कुछ विद्वानों
के अनुसार, दारुल-हरब केवल गैर-मुस्लिम शासन होना ही नहीं, बल्कि वह स्थिति भी
है जहाँ मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता नहीं होती या उनके साथ
संघर्ष की स्थिति होती है। इसलिये उन्हें यह आदेश दिया गया था कि मदीना हिजरत कर जायें। तब पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ने कहा डरने
की अपेक्षा तो अल्लाह की सेवा में लड़ना अच्छा है और आत्मरक्षा के लिए शस्त्र धारण
किए। अपने अनुयायियों को सशस्त्र प्रतिकार की अनुमति दी। यह अनुमति धर्मयुद्ध (जिहाद)
के तौर पर थी। पैग़म्बर साहब ने फरमाया कि अल्लाह की राह में संघर्ष करना (जिहाद)
और अपने हक़ व इंसाफ के लिए खड़े होना, दुनिया की तमाम दौलत और आराम से बेहतर है।
पवित्र कुरान (सूरह अल-बकरा 2:190) में स्पष्ट रूप से निर्देश है: “तुम अल्लाह की राह
में उनसे लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, लेकिन ज़्यादती (अत्याचार) मत करो, यकीनन अल्लाह
ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।”
*** *** ***
मनोज कुमार
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