मंगलवार, 5 मई 2026

480. विभाजन के काम में तेज़ी आई

राष्ट्रीय आन्दोलन

480. विभाजन के काम में तेज़ी आई

1947

जिस बात का गांधीजी को भय था, वह हो ही गई। भारत का बंटवारा होने को था, लेकिन विभाजन ऊपर से लादा नहीं जा रहा था। इसे नेहरू, पटेल और कांग्रेस के अधिकतर नेताओं ने स्वीकार कर लिया था। गांधीजी को इस निर्णय की बुद्धिमत्ता में गंभीर संशय था। जिन उत्पातों के डर के कारण कांग्रेसी नेताओं और ब्रिटिश सरकार के लिए विभाजन नितान्त आवश्यक हो गया था, उन्हीं उत्पातों और हिंसा के कारण गांधीजी विभाजन का दृढ़ता से विरोध कर रहे थे। उन्होंने कहा, देश में गृह-युद्ध के खतरे की वजह से विभाजन स्वीकार करने का अर्थ होगा, इस बात को मान लेना कि यदि उन्मत्त होकर हिंसा और उत्पात का यथेष्ट मात्रा में सहारा लिया जाए तो हर चीज प्राप्त की जा सकती है।

कई विद्वानों द्वारा गांधीजी की नाराज़गी और बेबसी की ओर अक्सर इशारा किया गया है। उनकी निष्क्रियता की व्याख्या इस रूप में की गई है कि उन्हें कांग्रेस की फ़ैसला लेने वाली परिषदों से ज़बरदस्ती अलग कर दिया गया था। कुछ विचारकों ने मानना है कि वे अपने शिष्यों, नेहरू और पटेल, की निंदा नहीं कर पाए जिन्होंने सत्ता के लालच के आगे घुटने टेक दिए थे। इन शिष्यों ने कई वर्षों तक, भारी निजी त्याग करके, पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण किया था। अगर सही आकलन करें तो गांधीजी की बेबसी की जड़ न तो जिन्ना की ज़िद थी, और न ही उनके शिष्यों की सत्ता की कथित लालसा। बल्कि उनके लोगों का सांप्रदायिकरण था। जून 1947 में अपनी प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा भी था कि कांग्रेस ने विभाजन इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि लोग यही चाहते थे: ‘यह मांग इसलिए मान ली गई, क्योंकि अपनों ने ही इसकी मांग की थी। कांग्रेस ने कभी इसकी मांग नहीं की थी... लेकिन कांग्रेस लोगों की नब्ज़ पहचान सकती है। उसे एहसास हो गया था कि खालसा और हिंदू, दोनों ही यही चाहते थे।’ हिंदुओं और सिखों की विभाजन की इसी चाहत ने उन्हें बेअसर, असहाय और शक्तिहीन बना दिया था। मुसलमान तो उन्हें पहले से ही अपना दुश्मन मानते थे। एक जन नेता, बिना उन लोगों के क्या कर सकता था, जो उसकी पुकार पर उसके पीछे चलने को तैयार हों? वह सांप्रदायिक लोगों के सहारे, सांप्रदायिकता से लड़ने का कोई आंदोलन कैसे खड़ा कर सकते थे? ऐसी कोई ‘सकारात्मक शक्तियां’ मौजूद नहीं थीं, जिनका सहारा लेकर गांधीजी कोई ‘कार्यक्रम तैयार कर सकते। 14 जून, 1947 को वे पूरी हिम्मत के साथ AICC की बैठक में गए और कांग्रेसियों से कहा कि वे मौजूदा हालात में बँटवारे को एक ऐसी ज़रूरत मानकर स्वीकार कर लें जिससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन लंबे समय में इसे अपने दिल से स्वीकार न करके इसका विरोध करें। उन्होंने इसे अपने दिल से कभी स्वीकार नहीं किया और अपने लोगों पर अपना भरोसा बनाए रखा। उन्होंने अकेले ही आगे बढ़ने का रास्ता चुना—नोआखली के गाँवों में नंगे पाँव घूमते हुए, बिहार के मुसलमानों को अपनी मौजूदगी से हिम्मत देते हुए, और कलकत्ता में अपनी बातों से समझाकर और अनशन की धमकी देकर दंगों को रोकते हुए। 'एकला चलो' लंबे समय से उनका पसंदीदा गीत रहा था—'अगर कोई तुम्हारी पुकार न सुने, तो अकेले चलो, अकेले चलो।' उन्होंने ठीक वैसा ही किया।

लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का काम पूरा करने के लिए अपने लिए तीन महीने का समय तय किया। यह कोई आसान काम नहीं था। विभाजन के काम में तेज़ी लाई गयी और लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने इस काम को तीन महीने से भी कम समय में सभी समस्याओं का हल निकाला, और अगस्त 1947 में भारत दो राष्ट्रों में विभाजित हो गया।

बंगाल में हिंदुओं की मांग थी कि वे भारत में रहें। मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने जब देखा कि बंगाल के हिंदू विभाजन चाह रहे हैं तो उसे बहुत ईर्ष्या हुई। उसने सांप्रदायिकता पर अंकुश लगाने की कोशिश की लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। 20 जून को बंगाल विधान-सभा के हिन्दू बहुमत वाले प्रदेशों के सदस्यों ने बंगाल विभाजन का निर्णय किया। पूर्वी बंगाल का हिन्दू कलकत्ता में आ चुका था। लीग ने सुहरावर्दी की जगह ख़्वाजा नज़ीमुद्दीन को पूर्वी पाकिस्तान का मुख्यमंत्री मनोनीत कर दिया। कांग्रेस ने प्रफुल्ल चंद्र सेन को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। बंगाल का भी विभाजन हो गया।

मुसलमान तो चाहते थे कि आसाम भी हड़प लिया जाए, लेकिन गोपीनाथ बारदोलाई की सरकार ने स्थिति पर सख्ती से नियंत्रण रखा। इसलिए सारा आसाम तो बच गया लेकिन सिलहट ज़िले को पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाक़े के साथ जोड़ा गया।

पंजाब के सिख पाकिस्तान में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे। लीग ने दगाबाज़ी कर पंजाब के मुख्यमंत्री मलिक ख़िज्र हयात ख़ान की सरकार गिरा दी थी, लेकिन अपनी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई थी। लीग ने नेशनल गार्ड नामक संस्था चला कर वहां ख़ूब दंगे कराए। 4 मार्च को हिंदू सिखों ने मिलकर लाहौर में पाकिस्तान विरोधी दिवस मनाया था। पंजाब के गवर्नर ने गोली चलवा दी। कई लोग मारे गए। 5 मार्च को गवर्नर सर ईवांस जेकिंग ने विधान सभा स्थगित कर दी और शासन अपने हाथ में ले लिया। अब पंजाब में लीग को सुविधा हो गई। पंजाब के विभाजन का रास्ता खुल गया। मार्च के पहले सप्ताह में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बिना गांधीजी से सलाह मशवरा किए पंजाब को मुस्लिम बहुमत वाले और हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्रों में बांट देने का अपना प्रस्ताव पास किया। गांधीजी ने जब पटेल को पत्र लिखा कि आप अपना पंजाब संबंधी प्रस्ताव मुझे समझाने की कोशिश कीजिए। तो पटेल का जवाब आया, पंजाब संबंधी प्रस्ताव आपको समझाना कठिन है। स्थिति तेज़ी से बदल रही थी। कांग्रेसी नेता बिना गांधीजी की सलाह के महत्त्वपूर्ण निश्चय करने लगे थे। 23 जून को पंजाब बंटवारे का निर्णय कर दिया गया।

सिंध विधान सभा ने विशेष बैठक करके पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का बहुमत निर्णय किया। हालाकि AICC की बैठक में, सिंध के सदस्यों ने प्रस्ताव का ज़ोरदार विरोध किया था। बलूचिस्तान ने 29 जून को एक विशेष बैठक में पाकिस्तान में मिलने का निर्णय किया। ग़ैर मुसलिम सदस्यों की कोई राय नहीं ली गई।

पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में सरहद के पठान शुरू से गांधीजी की अहिंसा की नीति अपनाई थी और कांग्रेस का साथ दिया था। हालाँकि मौजूदा N.W.F.P. विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत था और उसने संविधान सभा में शामिल होने के पक्ष में मतदान भी किया था, फिर भी इस प्रांत पर भारत या पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के प्रश्न पर एक जनमत संग्रह (plebiscite) थोप दिया गया। यह जिन्ना के लिए चिंता का विषय था। उसे लगा कि अगर मतदान हुआ, तो यहां के लोग भारत के साथ रहने के प्रति वोट देंगे। इसलिए डॉ. ख़ान साहेब के नेतृत्व वाली वहां की कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने के लिए उसने अपनी सारी ताकत झोंक दी।  सरहद के पठानों को पाकिस्तान की सांप्रदायिक मांग पसंद नहीं थी। डॉ. ख़ान साहेब के नेतृत्व में वहां कांग्रेस की सरकार थी। वायसराय के निजी कर्मचारी-मंडल के मुख्य अधिकारी लॉर्ड इस्मे ने इस स्थिति को वर्णसंकर स्थिति का नाम दिया था। इस प्रांत में द्विविध शासन प्रणाली थी। गवर्नर प्रांतीय सरकार का वैधानिक अध्यक्ष था। लेकिन क़बायली इलाक़ों में वह सम्राट के एजेण्ट का काम करता था। गवर्नर के रूप में तो उसे मंत्रियों की सलाह पर चलना पड़ता था, लेकिन सम्राट के प्रतिनिधि के तौर पर वह स्वतंत्र था। लेकिन वस्तुस्थिति यह थी कि वह मंत्रियों की परवाह किए बिना अपनी मनमानी चलाता था। इस कारण से गवर्नर और मंत्रिमंडल के बीच संबंध अच्छे नहीं थे। ऊपर से लीग के लोग हर काम में बाधा पहुंचाते ही रहते थे। गवर्नर उनको शह देता था। गवर्नर चाहता था कि लीगियों को मंत्रिमंडल में शामिल कर वहां मिश्र सरकार बनाई जाए। यदि उसकी बात न मानी गई तो वह मंत्रिमंडल बरख़ास्त कर देने की धमकी भी देता था।

लॉर्ड इस्मे के लिए, उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत एक "अजीबोगरीब स्थिति" थी — एक ऐसा प्रांत जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा थी, लेकिन सत्ता में कांग्रेस की सरकार थी। खान साहब की सरकार के पास न केवल पूर्ण बहुमत था, बल्कि सीमांत विधानसभा में मौजूद ज़्यादातर मुस्लिम सदस्यों का समर्थन भी उसे हासिल था। एक साल पहले हुए वहां चुनाव हुए थे और 50 में से 32 सीटें कांग्रेस ने जीती थी। यहां की 38 सीटें मुस्लिम, 9 हिन्दू और 3 सिक्ख सीटें थीं। कांग्रेस को 21 मुस्लिम, 9 हिन्दू और 2 सिक्ख सीटें हासिल हुई थी। इस तरह ख़ान साहब के मंत्रिमंडल को मुसलिम सदस्यों के बहुमत का समर्थन भी प्राप्त था। सीमाप्रांत के नेताओं को लगता था कि जनमत के द्वारा लोगों का अन्तिम निर्णय लेना ग़लत है। इससे मुस्लिम लीग को सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का मौक़ा मिलेगा। स्थानीय कांग्रेस का विचार था कि इस प्रांत को लीग द्वारा पाकिस्तान में मिलाने के प्रयास को विफल करने का एकमात्र उपाय यह है कि एक स्वतंत्र पठान राज्य पठानिस्तान की मांग की जाए। गांधीजी ख़ान बन्धुओं से पूरी तरह सहमत थे। गांधीजी ने कहा, कांग्रेस और मुसलिम लीग दोनों फिलहाल पठानों को न छेड़ें। पठानों की भावना का दोनों आदर करें इससे पठानों की एकता बढ़ेगी। कांग्रेस ने तो अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। जिन्ना को आगे आना चाहिए। लेकिन दिल्ली के नेताओं ने पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के राजनीतिक गतिविधियों में विशेष रुचि नहीं दिखाई। न उन्होंने वायसराय पर दबाव बनाया और न ही गवर्नर पर। मुसलिम लीग को वहां खुला खेल करनी की छूट मिल गई। उसने आतंक का तांडव मचाया। गवर्नर सर ओलाफ़ कैरो ने तो ठान ही ली थी कि वहां लीग की सरकार बनवा देगा। चुनी गई सरकार को समर्थन देने के बजाए उसने उत्पात मचाने वालों को साथ दिया। उसने वायसराय से कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए स्थानीय शासन को बर्खास्त करने और ताज़ा चुनाव की सिफ़ारिश की। पेशावर के अपने दौरे पर वायसराय माउंटबेटन ने भी इसकी बात डॉ. ख़ान साहेब से कही। जिन्ना ने कहा कि यदि ताज़ा चुनाव होते हैं, तो वह सीधी कार्रवाई वापस ले लेगा और वहां कोई हिंसा नहीं होगी। अहिंसा बंद करने की लीग के आश्वासन के बाद माउंटबेटन ने लीग के सभी गिरफ़्तार नेताओं को रिहा करने का आदेश दे दिया।

3 जून की योजना के अनुसार जनमत लेने की शर्तों में लीग की सहमति के बिना कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। 6 जून को गांधीजी माउंटबेटन से मिले और उसे सुझाया कि वह जिन्ना से बात करे और उसे जनमत न कराने के लिए सीमाप्रांत जाकर वहां के नेताओं से बातचीत के लिए राज़ी करे। जिन्ना से वायसराय ने बात की लेकिन जिन्ना ने शर्त रख दी कि वह सीमाप्रांत जाकर वहां के नेताओं से बात करने को राज़ी है, लेकिन कांग्रेस को यह आश्वासन देना होगा कि वह इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। गांधीजी ने कहा मैं कांग्रेस को आत्महत्या करने के लिए नहीं कह सकता। जिन्ना की बात मानने का मतलब था कि कांग्रेस संगठन अपने पर प्रतिबंध लगा दे। जिन्ना को यह कहने के लिए खुला मैदान छोड़ दे कि कांग्रेस ने तो आपको छोड़ दिया है, इसलिए आपके सामने मेरी शर्तें मान लेने की ही बात रह जाती है। जिन्ना के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया।

जनमत संग्रह की बातचीत हुई। गांधीजी का मानना था कि अगर ऐसा हुआ तो वहां बहुत ख़ून-ख़राबा होगा। बादशाह ख़ान ने गांधीजी से कहा, मैंने अपने सारे महत्त्वपूर्ण कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा किया है। हम सबका यह मानना है कि हम जनमत मंज़ूर नहीं कर सकते। प्रांत में इस समय ऐसे हालात हैं कि जनमत से गंभीर हिंसा भड़क उठेगी। हम पाकिस्तान के भी विरुद्ध हैं। हम चाहते हैं कि भारत के भीतर हमारा एक स्वतंत्र पठान राज्य हो। बादशाह ख़ान को यह सलाह दी गई कि वे जाकर जिन्ना से मिलकर उसे राज़ी करना चाहिए। 18 जून को बादशाह ख़ान जिन्ना से मिलने इसके घर गए। लेकिन मुस्लिम लीग के साथ सम्मान पूर्ण समझौता करने का बादशाह ख़ान का प्रयत्न असफल हुआ। जिन्ना को मालूम था कि सीमाप्रांत उसे मिलने ही वाला है। लॉर्ड माउंटबेटन किसी भी नई मांग को सुनने के लिए तैयार नहीं थे। वह अपनी योजना को जितनी जल्दी हो सके, आगे बढ़ाना चाहते थे, और एक आज़ाद पख्तूनिस्तान के सवाल पर तो विस्तार से चर्चा भी नहीं की गई। लॉर्ड माउंटबेटन ने साफ़ कर दिया कि सरहदी इलाका एक अलग और आज़ाद रियासत नहीं बन सकता, बल्कि उसे या तो भारत में या फिर पाकिस्तान में शामिल होना होगा। स्वतंत्र पठानिस्तान का प्रयत्न असफल रहा।

पाकिस्तान के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को ब्रिटिश अफ़सरों की गतिविधियों से और भी ज़्यादा मज़बूती मिली; ये अफ़सर खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन कर रहे थे और सरहदी इलाके के ज़्यादातर कबीलाई सरदारों को मुस्लिम लीग का साथ देने के लिए मना रहे थे। कांग्रेस की सरकार की व्यवस्था को तोड़ने के लिए गवर्नर ओलेफ़ कैरो ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। मुख्यमंत्री के आदेशों का अनादर शुरू हो गया। लाहौर और पेशावर से गुंडों को लाकर प्रदर्शन करवाया गया। हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी। गवर्नर की सत्ता और सेना मुख्यमंत्री को दगा दे रही थी। गवर्नर ओलेफ़ कैरो के ख़िलाफ़ वायसराय से विरोध व्यक्त करने पर इतनी रियायत मिली कि कैरो को दो महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया और लेफ़्टिनेन्ट जनरल रॉव लॉकहार्ट को उसके स्थान पर नियुक्त किया गया। लेकिन सीमाप्रांत की स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। इसका का कारण यह था कि गांधीजी की अहिंसा का सहारा लेकर जो सरकार वहां चल रही थी वह अंग्रेज़ों को बिल्कुल पसंद नहीं थी। हालांकि एसेम्बली में कांग्रेस ने संविधान सभा में शामिल होने के पक्ष में मत दिया था, लेकिन फिर भी भारत और पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने के सवाल पर उस प्रांत पर एक जनमत-संग्रह थोप दिया गया। वे चाहते थे कि सीमाप्रांत के लोगों को पाकिस्तान या पठानिस्तान में से एक चुनने का स्वतंत्र अधिकार हो।

जनमत संग्रह के नाम पर वहां चुनाव हुए। कांग्रेस और ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने विरोध में चुनाव में भाग नहीं लिया। लेकिन, उनके विरोध का कोई फ़ायदा नहीं हुआ। जब गिनती शुरू हुई तो पता चला कि हरेक मतदान केन्द्र पर अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक मतदान हुए है। अंग्रेज़ हुक़ूमत ने बोगस वोट डलवाए थे। नतीजा मुस्लिम लीग के पक्ष में रहा और ब्रिटिश सरकार ने तुरंत इसे मान लिया। वायसराय ने सरहद प्रांत का ख़ून कर दिया था। सरकार ने किसी भी तरह की शालीनता या न्याय की परवाह किए बिना काम किया और हर तरह के गैर-कानूनी तथा अनुचित उपायों को अपनाकर 'खुदाई खिदमतगारों' को कुचल दिया। यह प्रांत पाकिस्तान में सम्मिलित कर लिया गया। 'सीमांत गांधी' ने बाद में पूरी तरह से सही तौर पर यह घोषणा की थी कि कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें और उनके आंदोलन को 'भेड़ियों के आगे फेंक दिया' था। गांधीजी ने बादशाह ख़ान से कहा, आपका कर्तव्य सीमाप्रांत जाकर पाकिस्तान को सचमुच पाक बनाने का है।

30 जुलाई को गांधीजी काश्मीर के लिए रवाना हुए और बादशाह ख़ान अपने प्रान्त को लौट गए। इसके बाद दोनों फिर कभी नहीं मिले। 15 अगस्त को देश स्वतंत्र हो गया। 21 अगस्त को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल जिन्ना ने एक सरकारी आदेश द्वारा डॉ. ख़ान को पदच्युत कर दिया। सितम्बर में एक सभा में बादशाह ख़ान ने एक बार फिर पठानिस्तान की मांग की बात उठाई। उन्हें धमकियां दी जाने लगीं। गांधीजी को जब समाचार मिला तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने सुझाया कि वे सीमाप्रांत छोड़ दें। भारत में बैठकर अहिंसक कार्य-प्रणाली का विकास करें। बादशाह ख़ान ने जवाब दिया, आप चिंता न करें। सिर्फ़ अपना आशीर्वाद और दुआएं भेज दीजिए। बादशाह ख़ान पाकिस्तान से निष्कासित हो गए। भारत में परदेशी कहलाए जाने लगे। खान अब्दुल गफ्फार खान, डॉ. खान साहब और खुदाई खिदमतगारों के अन्य सभी नेताओं को बिना किसी कानूनी आरोप या मुकदमे के जेल में डाल दिया गया। लगभग छह साल तक वे जेल में ही सड़ते रहे। वे पाकिस्तान के कारागार में ही रहे। डॉ. ख़ान का किसी ने ख़ून कर दिया। आजादी की लड़ाई में अनेक बार जेल गए बादशाह ख़ान का शेष अधिकांश जीवन अपने घर में नज़रबंदी के रूप में बीता।

AICC की बैठक 14 जून 1947 को हुई। इस बैठक में मौलाना आज़ाद ने कहा था, वर्किंग कमेटी ने जो फ़ैसला लिया था, वह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना का नतीजा था। बँटवारा भारत के लिए एक त्रासदी थी, और इसके पक्ष में बस यही एक बात कही जा सकती थी कि हमने बँटवारे से बचने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन हम नाकाम रहे। अब हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था, और अगर हम अभी और इसी वक़्त आज़ादी चाहते थे, तो हमें भारत के बँटवारे की माँग माननी ही पड़ती। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र एक है, और उसका सांस्कृतिक जीवन एक है और हमेशा एक ही रहेगा। राजनीतिक तौर पर हम नाकाम रहे थे, और इसीलिए देश का बँटवारा कर रहे थे। हमें अपनी हार मान लेनी चाहिए, लेकिन साथ ही हमें यह भी पक्का करने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारी संस्कृति का बँटवारा न हो।

जब विभाजन का प्रस्ताव मान लिया गया, तो यह तय करना ज़रूरी हो गया था कि इन विभाजित नए प्रांतों की सीमा क्या होगी। लॉर्ड माउंटबेटन ने इस सवाल पर विचार करने के लिए एक 'सीमा आयोग' (Boundary Commission) नियुक्त किया और रैडक्लिफ़ से यह काम संभालने को कहा। उस समय रैडक्लिफ़ शिमला में था। उसने यह नियुक्ति स्वीकार कर ली, लेकिन सुझाव दिया कि वह अपना सर्वे जुलाई की शुरुआत में शुरू करेगा। उसने बताया कि जून की भीषण गर्मी में पंजाब में जाकर ज़मीनी सर्वे करना लगभग असंभव काम होगा, और वैसे भी जुलाई का मतलब सिर्फ़ तीन या चार हफ़्तों की देरी ही तो थी। लॉर्ड माउंटबेटन ने उससे कहा कि वह एक दिन की देरी के लिए भी तैयार नहीं है, और तीन-चार हफ़्तों की देरी का कोई भी सुझाव तो बिल्कुल ही नामुमकिन है। उसके आदेशों का पालन किया गया। यह इस बात का एक उदाहरण है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने कितनी तेज़ी और फुर्ती से काम किया।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

संदर्भ : यहाँ पर

 

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