शुक्रवार, 22 मई 2026

सूफ़ीमत ...5. सूफ़ीमत का उदय-5

5. सूफ़ीमत का उदय-5


5.11 जिहाद - उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष

पैग़म्बर हज़रत मुहम्द साहब और पाक क़ुरआन के असली मकसद और संदेश (पैग़ाम) को लेकर तरह-तरह की व्ाख्यएं सामने आती रही हैं। एक तबके का मानना है कि दीन (धर्म) और सियासत (राजनीति) एक ही बात है और इस्लाम का अव्ल मक़सद (सर्वोपरि लक्ष्) एक ऐसा राज् क़ायम करना है जो शरीअत के बताये उसूलों और क़ायदों के मुताबिक ख़ुद चले और लोगों को चलाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सबसे बड़ी समस्या यही है कि एक आदमी दूसरे आदमी को नेकी और सदाचार के उसूलों पर कैसे चला सकता है? क़ुरआन कहता है कि परस्पर प्रेम और सहयोग से ही ऐसा हो सकता है। परन्तु हर आदमी में प्रेम और परस्पर सहयोग की भावना पैदा होना आसान नहीं है। इस मक़सद को पूरा करने के लिए, इस मत के मानने वालों ने सबसे कारगर और वाजिब तरीक़ा जिहाद को ठहराया। यानी जिहाद अल्लाह की राह है। जिहाद का सामान्य अर्थ युद्ध या धर्म-युद्ध है। जिहाद का शाब्दिक अर्थ 'प्रयास करना', 'संघर्ष करना' या 'मेहनत करना' है। यानी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना। इस्लाम में, इसका तात्पर्य किसी नेक या न्यायपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देना है, जिसमें आंतरिक आध्यात्मिक सुधार से लेकर बाहरी संघर्ष तक शामिल हो सकते हैं।

पवित्र कुरआन में कहा गया है, धर्म में बल प्रयोग नहीं। (2:256) धर्म तथा आस्था के विषय में बल प्रयोग की अनुमति नहीं, धर्म दिल की आस्था और विश्वास की चीज़ है। जो शिक्षा-दीक्षा से पैदा हो सकता है, न कि बल प्रयोग और दबाव से। इस आयत (2:256) में यह संकेत भी है कि इस्लाम में जिहाद अत्याचार को रोकने तथा सत्धर्म की रक्षा के लिये है न कि धर्म के प्रसार के लिये। धार्मिक ग्रंथों के जानकारों और विद्वानों के अनुसार, इस आयत का स्पष्ट उद्देश्य विश्वास की स्वतंत्रता को स्थापित करना और यह स्पष्ट करना है कि आस्था एक व्यक्तिगत और आंतरिक चुनाव है।

आयत 22:78 में कहा गया है, तथा अल्लाह के लिए जिहाद करो, जैसे जिहाद करना चाहिए। उसी ने तुम्हें निर्वाचित किया है और नहीं बनाई तुम पर धर्म में कोई संकीर्णता (तंगी)। ये तुम्हारे पिता इब्राहीम का धर्म है, उसी ने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा है। यह इस्लाम में एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयत है। यह मुसलमानों को अल्लाह के मार्ग में संघर्ष करने, अल्लाह पर भरोसा रखने और अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों (नमाज़ और ज़कात) को पूरा करने का निर्देश देती है। आयत में कहा गया है कि अल्लाह के रास्ते में वैसे ही संघर्ष करो, जैसा कि संघर्ष करने का हक है। यह स्पष्ट किया गया है कि अल्लाह ने धर्म के पालन में इंसानों पर कोई तंगी या अत्यधिक कठिनाई नहीं डाली है। यह वही सीधा और सच्चा मार्ग (दीन) है जो तुम्हारे पिता इब्राहिम (अब्राहम) का था। इस आयत में बताया गया है कि स्वयं अल्लाह ने पहले की किताबों और इस कुरान में भी तुम्हारा नाम "मुसलमान" रखा है।

एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से प्रश्न किया, कोई धन के लिये लड़ता है, कोई नाम के लिये और कोई वीरता दिखाने के लिये। तो कौन अल्लाह के लिये लड़ता है? उन्होंने फ़रमायाः जो अल्लाह का शब्द ऊँचा करने के लिये लड़ता है। धर्म के प्रसार का साधन एक ही है, और वह प्रचार है, सत्य प्रकाश है। यदि अंधकार हो तो केवल प्रकाश की आवश्यकता है। फिर प्रकाश जिस ओर फिरेगा तो अंधकार स्वयं दूर हो जायेगा। क़ुरआन में प्रथम आयत, जिस में जिहाद की अनुमति दी गयी है, वह सूरह अल-हज (तीर्थयात्रा) की आयत 39 है, जिनसे युद्ध किया जा रहा है, उन्हें (लड़ने की) अनुमति दे दी गयी, क्योंकि उनपर अत्याचार किया गया है और निश्चय अल्लाह उनकी सहायता पर पूर्णतः सामर्थ्यवान है। (क़ुरआन22:39) इसमें जिहाद का कारण यह बताया गया है कि मुसलमान शत्रु के अत्याचार से अपनी रक्षा करें। मक्का में जब शुरुआती मुसलमानों (सहाबियों) को मूर्तिपूजकों द्वारा बेरहमी से प्रताड़ित किया जाता था और वे पैगंबर मुहम्मद से इसकी शिकायत करते थे, तब उन्हें धैर्य रखने का आदेश दिया गया था। पैगंबर के मदीना प्रवास के बाद, जब मुसलमानों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा, तब अल्लाह ने इस आयत के जरिए अत्याचार का विरोध करने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध की अनुमति प्रदान की। यह आयत स्पष्ट करती है कि युद्ध का कारण अपने धर्म, जान और सम्मान की रक्षा (आत्मरक्षा) के लिए किया गया संघर्ष है, जहाँ लोग "अन्याय (ज़ुल्म)" का शिकार हुए हों।

सूरह बक़रह, आयतः190 से 193 और 216 तथा 226 में युद्ध का आदेश दिया गया है, जो बद्र के युद्ध से कुछ पहले दिया गया है। क़ुरआन (2:190) में कहा गया है, तथा अल्लाह की राह में, उनसे युद्ध करो, जो तुमसे युद्ध करते हों और अत्याचार न करो, अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता।। स्पष्ट है कि मुसलमानों को उन्हीं लोगों से लड़ने की अनुमति है जो उनके खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं, लेकिन साथ ही यह सख्त हिदायत दी गई है कि वे युद्ध में हद पार न करें। यह आयत स्पष्ट करती है कि युद्ध केवल आत्मरक्षा या अपने धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ही लड़ा जा सकता है। आयत में "हद पार न करने" का अर्थ यह है कि महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, या आत्मसमर्पण करने वालों पर हमला नहीं किया जाना चाहिए।

क़ुरआन (2:191) में यह भी कहा गया है, और उन्हें हत करो, जहाँ पाओ और उन्हें निकालो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है, इसलिए कि फ़ितना (उपद्रव, सत्धर्म इस्लाम से रोकना), हत करने से भी बुरा है और उनसे मस्जिदे ह़राम के पास युद्ध न करो, जब तक वे तुमसे वहाँ युद्ध ( अर्थात स्वयं युद्ध का आरंभ न करो) न करें। परन्तु, यदि वे तुमसे युद्ध करें, तो उनकी हत्या करो, यही काफ़िरों का बदला है। यह आयत उन परिस्थितियों का वर्णन करती है जहाँ मुसलमानों को आत्मरक्षा में युद्ध करने और अत्याचारियों का सामना करने की अनुमति दी गई थी। इसमें कहा गया है कि "उत्पीड़न (फितना) हत्या से भी बदतर है"। इसका तात्पर्य यह है कि लोगों को उनके धर्म या आस्था के कारण सताना बहुत बड़ा अपराध है। आयत में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि पवित्र मस्जिद (मस्जिद अल-हराम/काबा) के आसपास युद्ध न करें, जब तक कि विरोधी पक्ष वहां हमला न करे। यदि वे हमला करते हैं, तभी जवाबी कार्रवाई की अनुमति है।

आयत (2:192) में आदेशित है, तथा उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना न रह जाये और धर्म केवल अल्लाह के लिए रह जाये, फिर यदि वे रुक जायें, तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी और पर अत्याचार नहीं करना चाहिए। आत्मरक्षा के युद्ध में यदि विरोधी पक्ष लड़ना छोड़ दे या अत्याचार से तौबा कर ले, तो बदला लेने के बजाय उन्हें माफ़ कर देना और अल्लाह की दया पर भरोसा करना। यह आयत सूरह अल-बक़राह का हिस्सा है जो न्यायसंगत युद्ध के दौरान भी शांति और क्षमा के महत्व को दर्शाती है। यह आयत उस समय की परिस्थितियों से जुड़ी है जब शुरुआती मुसलमानों को मक्का में भारी अत्याचार झेलने पड़े थे। कुरान में आत्मरक्षा में लड़ने की अनुमति तो दी गई (2:190-191) लेकिन इसके साथ ही स्पष्ट किया गया कि युद्ध का अंतिम लक्ष्य बदला लेना या खून-खराबा नहीं, बल्कि शांति की बहाली है। यदि हमलावर पक्ष युद्ध रोक देता है, तो मुसलमानों को भी लड़ाई बंद करने और उन्हें क्षमा करने का आदेश दिया गया है।

क़ुरआन (2:216) में वर्णन है, हे ईमान वालों! तुमपर युद्ध करना अनिवार्य कर दिया गया है, हालाँकि वह तुम्हें अप्रिय है। हो सकता है कि कोई चीज़ तुम्हें अप्रिय हो और वही तुम्हारे लिए अच्छी हो और इसी प्रकार सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते। इसका मुख्य संदेश यह है कि कभी-कभी इंसान जिन चीजों को अपने लिए बुरा या नापसंद समझता है, असल में वही उसके लिए सबसे अच्छी होती हैं। इसका भावार्थ यह है कि युद्ध ऐसी चीज़ नहीं, जो तुम्हें प्रिय हो। परन्तु जब ऐसी स्थिति आ जाये, जब शत्रु इसलिये आक्रमण और अत्याचार करने लगे कि लोगों ने अपने पूर्वजों की आस्था परम्परा त्याग कर सत्य को अपना लिया है, जैसा कि इस्लाम के आरंभिक युग में हुआ, तो सत्धर्म की रक्षा के लिये युद्ध करना अनिवार्य हो जाता हो। आयत में स्पष्ट किया गया है कि धर्म की रक्षा और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करना एक अनिवार्य कर्तव्य (फर्ज़) है, भले ही स्वाभाविक रूप से लोगों को युद्ध या संघर्ष करना पसंद न हो। केवल ईश्वर (अल्लाह) ही जानता है कि इंसान के भविष्य और भलाई के लिए क्या सही है। इसलिए, कठिन और नापसंद लगने वाले आदेशों के पीछे भी ईश्वरीय ज्ञान छिपा होता है।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तेरह वर्ष तक मक्का के मिश्रणवादियों के अत्याचार सहन किये। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को जब काफिरों ने मारने की योजना बनाई तो वे मदीना हिज़रत कर गये। पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के मक्कावासी अनुयायी, जिन्हें मुहाजिरून के नाम से जाना जाने लगा, एक अलग वर्ग बने रहे और शहर के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में समाहित नहीं हो पाए। वहाँ भी मक्का वासियों ने उनको चैन नहीं लेने दिया। उन पर निरन्तर आक्रमण करते रहे। मक्का वासियों ने अब्दुल्लाह बिन उब्य्य को पत्र लिखा और यह धमकी दी कि आप नबी को मदीना से निकाल दें अन्यथा वह मदीना पर आक्रमण कर देंगे। वे पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के प्रमुख सहाबियों में गिने जाते थे। मुसलमानों को मक्का के व्यापारिक काफिलों द्वारा लगातार खतरा बना हुआ था। अब मुसलमानों के लिये यही उपाय था कि शाम के व्यापारिक मार्ग से अपने विरोधियों को रोक दिया जाये। ध्यान रहे कि बद्र के युद्ध के समय मुसलमानों की संख्या मात्र 313 थी। और सिवाय एक व्यक्ति के किसी के पास घोड़ा न था। सन् 2 हिज्री (13 मार्च, 624 ईस्वी) में मक्के का एक बड़ा काफिला शाम से मक्का वापिस हो रहा था। जब वह मदीना के पास पहुँचा तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी रक्षा के लिये वीरता के साथ अपने 313 साथियों को लेकर बद्र के रणक्षेत्र में पहुँचे। इस दल में मुहाजिर और अंसार (मुहम्मद के मदीना के समर्थक) दोनों शामिल थे, और इसका नेतृत्व स्वयं मुहम्मद ने किया। मुसलमानों के भय से काफ़िले का मुखिया अबू सुफयान ने एक व्यक्ति को मक्का भेजा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने साथियों के साथ तुम्हारे काफिले की ताक में हैं। यह सुनते ही एक हज़ार की सेना निकल पड़ी। अबू सुफ्यान दूसरी राह से बच निकला। परन्तु मक्का की सेना ने यह सोचा कि मुसलमानों को सदा के लिये कुचल दिया जाये। इस प्रकार मुसलमानों से बद्र के क्षेत्र में मक्का की सेना का सामना हुआ तथा दोनों के बीच यह प्रथम ऐतिहासिक संघर्ष हुआ जिस में मक्का के काफ़िरों के बड़े-बड़े 70 व्यक्ति मारे गये और इतने ही बंदी बना लिये गये। मुस्लिम पक्ष के 14 सैनिक शहीद हुए।

इस विजय ने अरब प्रायद्वीप में मदीना के मुसलमानों की राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया और इस्लाम को एक सक्षम शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसे इस्लामी इतिहास में 'सत्य की असत्य पर विजय' माना जाता है। इस्लामी चेतना में इस युद्ध का महत्व इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि कुरान में केवल इसी युद्ध का नाम मिलता है। यह इस्लाम का प्रथम ऐतिहासिक युद्ध था (यह प्रथम युद्ध हिजरत के दूसरे वर्ष हुआ।)। मदीना से लगभग 150 किलोमीटर दूर बदर के मैदान में, मात्र 313 मुसलमानों ने मक्का के कुरैश कबीले की लगभग 1000 सैनिकों वाली सुसज्जित सेना को करारी शिकस्त दी थी। पैगंबर मुहम्मद के नेतृत्व में मिली यह पहली बड़ी सैन्य विजय थी। इस युद्ध में सत्य की विजय हुई। इसलिये इस में युद्ध से संबंधित क़ुरआन के सूरह अनफाल में कई नैतिक शिक्षाएं दी गई हैं। जैसे यह कि जिहाद धर्म की रक्षा के लिये होना चाहिये, धन के लोभ, तथा किसी पर अत्याचार के लिये नहीं। विजय होने पर अल्लाह का आभारी होना चाहिये। क्योंकि विजय उसी की सहायता से होती है। अपनी वीरता पर गर्व नहीं होना चाहिये। बदर की विजय नवगठित मुस्लिम समुदाय के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी कि इसे चमत्कार माना गया। इसने न केवल उम्माह को इस्लाम के नए धर्म की दैवीय स्वीकृति की पुष्टि की, क्योंकि कुरान इस सफलता का श्रेय दैवीय हस्तक्षेप को देता है (3:123), बल्कि कुरैश के प्रभुत्व को चुनौती देने में उम्माह की जीवंतता को भी पुष्ट किया। कुरआन (3:123) के अनुसार, जब मुसलमान बहुत कमजोर और संख्या में कम थे, तब अल्लाह ने उनकी मदद की और उन्हें शानदार जीत दिलाई ("और यकीनन अल्लाह ने बद्र में तुम्हारी मदद की थी, जबकि तुम निहायत कमजोर थे। इसलिए अल्लाह से डरो ताकि तुम शुक्रगुज़ार बन सको।")।

साधारणतः जिहाद को इस्लाम के प्रचार के लिए जो लड़ाइयां लड़ी गईं, मान लिया गया है। किंतु रिलिजन ऑफ इस्लाम के लेखक मुहम्मद अली के अनुसार इस शब्द का अर्थ इस्लाम के लिए युद्ध करना नहीं है , बल्कि "संघर्ष" या "कड़ी मेहनत/प्रयास" (struggling or striving) है। उनके अनुसार, जिहाद शब्द का मुख्य और व्यापक अर्थ अल्लाह के मार्ग में अपनी पूरी शक्ति और क्षमताओं को लगाना है। मक्का में उतरने वाले क़ुरआन के अंशों में जहां-जहां यह शब्द आया है, वहां-वहां इसका अर्थ परिश्रम या सामान्य संघर्ष ही है। लड़ने की इजाज़त नबी ने तब दी, जब वे हिजरत कर मदीना पहुंचे। मदीना में आत्मरक्षा के लिए तलवार उठाना आवश्यक हो गया था। तभी से लड़ाइयां जिहाद के नाम से लड़ी जाने लगीं। व्यापक अर्थ में जिहाद के भीतर वाणी और तलवार दोनों का समावेश है। हदीस तो हज को भी जिहाद में ही गिनता है। कुछ विद्वानों ने जिहाद से अभिप्राय उन बुराइयों से जिहाद करना बताया है जिनसे धर्मपालन में बाधा उत्पन्न हो रही हो, जिहाद में खुद की बुरी प्रवृत्तियों, वासनाओं और अहंकार के खिलाफ आंतरिक संघर्ष (Jihad-an-Nafs) भी शामिल है। बाद में चलकर क़ाज़ियों (न्यायपतियों) ने जिहाद का अर्थ युद्ध कर दिया। उन्होंने ही दारुल-इस्लाम (शांति का देश) और दारुल-हरब (युद्ध-स्थल) की अवधारणा सामने रखी।

इस्लामी परंपरा और धर्मशास्त्र में जिहाद केवल युद्ध नहीं, बल्कि एक बहुत व्यापक अवधारणा है। इस दृष्टिकोण से देखें, तो जिहादे अकबर (सबसे बड़ा जेहाद) का मतलब है ख़ुद अपनी आत्मा यानी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना, अपने आपको जीतना। जब ऐसा होगा तो उसमें त्याग और क़ुरबानी की भावना बलवती होगी। क़ुरआन कहता है इंसाफ़ करो, एहसान करो, इसार (त्याग) करो क्योंकि अल्लाह उन्हीं को प्यार करता है जो दूसरों पर एहसान करते हैं। ईश्वर के बताए मार्ग पर चलना, सच बोलना, और अपने परिवार या समुदाय की भलाई के लिए प्रयास करना भी जिहाद है। क़ुरआन में आत्मरक्षा के लिए तलवार उठाने की इज़ाजत तो है, लेकिन उसे जिहादे असगर (छोटा जिहाद) कहा गया है। इसमें अन्याय, अत्याचार या बाहरी आक्रमणकारियों के खिलाफ शारीरिक या सैन्य संघर्ष शामिल है। किंतु लोभ-लालच के जाल में फंस कर जिहादे असगर को ही लोगों ने जिहादे अकबर समझ लिया। परिणामस्वरूप लोग ताकत और ऐशो-आराम के सामान हासिल करने में जुट गए। इस लालच ने उसकी सारी रूहानी (आध्यात्मिक) और इखलाकी (नैतिक) ताकत को मिटा डाला।

क़ुरआन शरीफ़ में इंसान को इस संसार के अन्य जीवों से अलग माना गया है क्योंकि उसमें नेकी और बदी की समझ और एक रूहानी प्यास है और इसीलिए उसे अशरफ़-उल-मख़लूक़ात (और सब प्राणियों से बढ़कर) कहा गया है। उसे इजाज़त है कि वह ख़ुदा की दी हुई सब नियामतों से अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद फ़ायदा उठाए और दूसरों को फ़ायदा पहुंचाए। ख़ुदा सारी सृष्टि बनाने वाला ही नहीं है बल्कि उसका मालिक भी है। इस मालिक होने की हैसियत से उसने इंसान को, जो चूंकि अशरफ़-उल-मख़लूकात है, अपना ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) बनाया। खलीफ़ा का फ़र्ज़ है कि वह ख़ुदा की सब नियामतों को सब प्राणियों में उनकी आवश्यकता के अनुसार ठीक-ठीक वितरण करे। इस सर्वोच्च दर्जे के साथ मनुष्य की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। अच्छे कर्म उसे फरिश्तों से भी ऊंचा दर्जा दिला सकते हैं, जबकि बुरे कर्म उसे जानवरों से भी बदतर स्तर पर ले जा सकते हैं।

5.12 इस्लाम धर्म का आरम्भिक रूप

5.12 (क) पैग़म्बर, नबी और रसूल

इस्लामिक मान्यताओं में पैग़म्बर, नबी और रसूल वे विशेष व्यक्ति होते हैं जिन्हें अल्लाह (ईश्वर) द्वारा मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए चुना गया था। इस्लाम धर्म मुहम्मद साहब ने सोच-विचार कर नहीं निकाला। जब वे समाधि या प्रेरणा की उच्चावस्था में थे तब उन्हें इस धर्म का इलहाम हुआ। तब से लोग उन्हें पैग़म्बर, नबी और रसूल कहने लगे। पैग़म्बर कहते हैं पैग़ाम ले जानेवाले को। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के ज़रिए ख़ुदा का संदेश पृथ्वी तक पहुंचा। इसीलिए उन्हें पैग़म्बर कहा जाता है। नबा किसी उपयोगी या परम ज्ञान ख़बर को कहते हैं। नबी वह व्यक्ति होता है जिसे अल्लाह की तरफ से दिव्य ज्ञान/प्रकाशना (वही) प्राप्त होती है। चूंकि मुहम्मद साहब ने यह घोषणा की कि उनके पास ख़ुदा का संदेश पहुंचा है, इसीलिए वे नबी हुए। नबी का अर्थ दूत के रूप में भी होता है, क्योंकि वह ईश्वर और समझदार प्राणी के बीच आता है। रसूल का अर्थ प्रेषित या धर्मदूत होता है। रसूल वे नबी होते हैं जिन्हें अल्लाह द्वारा एक नई किताब (जैसे, कुरान, तौरात) और नई शरीअत (ईश्वरीय कानून) देकर एक विशेष समुदाय या पूरी दुनिया में भेजा जाता है।  उन्हें अपने संदेश का प्रचार करने की सख्त जिम्मेदारी दी जाती है। मुहम्मद साहब ईश्वर और मनुष्यों के बीच धर्मदूत हैं। हर 'रसूल' एक 'नबी' होता है, लेकिन हर 'नबी' का 'रसूल' होना आवश्यक नहीं है।

हज़रत मुहम्मद सल्ल.के अनुयायी मानते हैं कि मुहम्मद पूर्ण पुरुष थे इस्लाम कहता है कि मुहम्मद एक मानव थे, उन्हें ईश्वर की उपाधि लागू नहीं हो सकती ईश्वर एक है, वह अद्वितीय है उसकी बराबरी कोई मानव नहीं कर सकता ‘ला इलाह इल्लाल्लाहु मुहम्मदुर् रासुलिल्लाह’ यानी अल्लाह एक ही है, उसकी जगह कोई नहीं ले सकता मुहम्मद पैगम्बर भी उनका पैगाम लाने वाले रसूल मात्र हैं  जो संदेश ईश्वर के द्वारा मुहम्मद साहब को मिले थे, पैग़म्बर होने के नाते उनका प्रसार करना उनका कर्तव्य था। लोगों के बीच इस संदेश को ले जाने, उन्हें इसके अर्थ और मकसद समझाने का काम उन्होंने बड़े मनोयोग से किया। क़ुरआन के संदेशों के आधार पर उन्होंने एक नए समाज और पंथ की स्थापना की। एक प्रकार से वे क्रांतिकारी थे और उन्होंने पूरे अरब के लोगों के जीवन में बदलाव लाया।

पैगम्बर मोहम्मद की बातों में सूफ़ीवाद का ज़िक्र मिलता है जैसे उनके एक क़रीबी साथी उमर इब्न-अल-ख़त्ताब कहते हैं, "एक दिन हम हज़रत मोहम्मद के साथ बैठे हुए थे तभी काले बालों वाला, सफ़ेद लिबास में एक शख़्स हमारे सामने नमूदार हुआ उसके चेहरे पर सफ़र की थकान बिल्कुल भी नहीं थी हममें से कोई भी उसे नहीं पहचान पाया वो शख़्स मोहम्मद साहब के सामने घुटनों के बल बैठ गया और कहने लगा "मोहम्मद साहब मुझे इस्लाम के बारे में जानकारी दीजिए"

हज़रत मोहम्मद ने कहा, "इस्लाम इस बात की शहादत यानी गवाही देता है कि अल्लाह के सिवा कोई और भगवान नहीं, सभी इबादतें सिर्फ़ उसके लिए हैं और हज़रत मोहम्मद अल्लाह के दूत हैं तुम नमाज़ अदा करो, ज़कात दो, रमज़ान के महीने में रोज़े रखो, ये तुम पर फ़र्ज़ हैं अगर साहिबे हैसियत हो तो हज को ज़रूर जाओ"

पैगम्बर मोहम्मद की ये बातें सुनकर उस शख्स ने कहा "आपने मुझे सच से रूबरू करा दिया" इसके बाद उस शख्स ने फिर पूछा, "ऐ मोहम्मद मुझे एहसान के बारे में कुछ बताओ" पैगम्बर साहब ने कहा, "तुम अल्लाह की इबादत ऐसे करो जैसे तुम उसे देख पा रहे हो हालांकि वो वहां नहीं है लेकिन तुम उसकी मौजूदगी का एहसास करो तुम उसे नहीं देख पा रहे हो लेकिन वो तुम्हें देख रहा है" इसके बाद इस शख्स ने पूछा ईमान क्या है? मोहम्मद साहब ने जवाब दिया, "अल्लाह और उसके रसूल और उसकी क़िताब यानी 'क़ुरान' पर भरोसा ही तुम्हारा ईमान है क़यामत के रोज़ तुम्हारा हिसाब इसी भरोसे और ईमान पर किया जाएगा"

उस शख्स ने पैगम्बर साहब से कुछ इसी तरह के और भी कई सवाल पूछे और उसके बाद वो शख्स चला गया उमर अल-ख़त्ताब कहते हैं, "उसके जाने के बाद मोहम्मद साहब ने मुझसे पूछा, उमर क्या तुम उस शख्स को जानते थे?" मैंने कहा- अल्लाह और उसके रसूल से बेहतर और कौन जान सकता है" मोहम्मद साहब ने कहा, "वो जिब्रील थे असल में वो तुम्हारे पास आए थे और मुझसे ये सवाल इसलिए कर रहे थे ताकि तुम्हें इस्लाम की सही तालीम मिल सके" इस हदीस में हज़रत जिब्रील ने इस्लाम मज़हब की बुनियादी बातों के बारे में जानकारी मांगी थी

'इस्लाम' धर्म का वह रूप है जिसमें मज़हब के फ़र्ज़ अदा किए जाते हैं 'ईमान' अल्लाह और उसके रसूल के बारे में रखे जाने वाले भरोसे का नाम है यानी जो रसूल ने बताया है, जो सिखाया है, उस पर यक़ीन 'एहसान' उनके नाम पर की जाने वाली इबादत का नाम है, फिर आप चाहें उन्हें देखें या ना देखें और यही बात सूफ़ीपंथ की बुनियाद है

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर


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