राष्ट्रीय आन्दोलन
482. गांधीजी की निराशा में आशावादिता
1947
भारत को स्वाधीनता मिलने
वाली थी। परन्तु अपनी एकता व अखंडता की बलि देकर! यह वह स्वतंत्रता नहीं थी जिसे गांधीजी
या कांग्रेस ने सिद्ध करने का बीड़ा उठाया था। लेकिन गांधीजी को इसमें निराशा का कोई
कारण नहीं दिखाई दिया। गांधीजी ने कहा भी, “मैं कभी निराश नहीं होता।
मैं जीवन भर विद्रोही और योद्धा रहा हूं।” असफल उनकी अहिंसा नहीं रही। बल्कि अहिंसा का पालन करने में भारत की जनता असफल
रही। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अपनी कल्पना की अहिंसा जनता में उत्पन्न करने
में गांधीजी की कार्य-पद्धति असफल रही। गांधीजी को इस दोष को दूर करने के लिए प्रयत्न
करना अनिवार्य लगा। इसलिए कितने दिनों तक गांधीजी अपने को अलग-थलग रखते। अटल निश्चय
के साथ वे जनता को यह बताने लगे कि विभाजन के बावज़ूद एकता की लड़ाई कैसे जीती जा सकती
है। उन्होंने कहा कि दोनों क़ौमों के बीच हार्दिक एकता स्थापित करके विभाजन के दुष्परिणामों
को मिटाया जा सकता है। उन्होंने देशवासियों को आज़ादी मिलने पर क्या करना है, उनका क्या
कर्त्तव्य होगा यह सब समझाना शुरू कर दिया। “देश में प्रजातंत्र आने
वाला है। अब देश के नागरिक ही देश के असली मालिक होंगे। इसलिए मालिक की जिम्मेदारी
और गरिमा से देश की जनता को पेश आना चाहिए। सुचारु शासन के लिए जनता को जागृत रहना
चाहिए।” उन्होंने कांग्रेस को भी समझाया कि “रचनात्मक कार्य को प्राथमिकता
देनी चाहिए। जेल गए हुए लोगों को मंत्री न बनाकर बाहर के सुयोग्य कुशल व्यक्ति को शासन
की जिम्मेदारी देनी चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को सरकार से बाहर रहकर शासन का
मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि कांग्रेस जनता के संपर्क में रहे और प्रजा से विमुख न हो
जाए।”
1935 में इस तरह का प्रयोग काफी सफल रहा था। लेकिन 1946 की अंतरिम सरकार में सभी वरिष्ठ नेता सत्ता की कुर्सी पर आसीन थे। कांग्रेस का
संस्थागत काम दूसरों पर छोड़ दिया गया था। इसलिए सत्ता और सरकार में हमेशा अनबन बनी
रही। गांधीजी जैसे सत्याग्रही के लिए यह पराभव का ही काल माना जा सकता है। लेकिन सत्याग्रही
की पराजय में भी ग्लानि का कारण नहीं होता। उसका सत्य सदा उज्ज्वल होता है। इसलिए हार
में भी सत्याग्रही निस्तेज नहीं होता। इसलिए उन निराशा के दिनों में भी गांधीजी आशा,
उत्साह, विश्वास और ओजस्विता से भरे थे।
जैसे-जैसे 15 अगस्त नज़दीक आ रहा था, गांधीजी का दिल दिल्ली से घबरा रहा था। वे नोआखाली या बिहार के लोगों के बीच काम करना चाहते थे। दिल्ली के सत्ताधारी कांग्रेसियों
को उनकी सलाह की ज़रूरत भी नहीं रह गई थी। कुछ लोगों ने तो उन्हें उत्साह भंग करने वाला
बताया। गांधीजी से तरह-तरह के प्रश्न पूछे जा रहे थे। आपने बंटवारे के प्रश्न पर हार
क्यों स्वीकार की। राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसा बढ़ती जा रही है, इसका
कारण क्या है? 30 वर्षों से जिस अहिंसा
के सिद्धान्त पर आप चल रहे थे, उसका यह अंतिम फल है क्या? गांधीजी अहिंसा को धर्म मानते
थे, जबकि कांग्रेस के लिए यह एक नीति थी। नीति तो ज़रूरत पड़ने पर बदली भी जा सकती है।
जिस अहिंसा का 30 वर्षों से पालन किया गया
वह निष्क्रिय प्रतिकार था। पाकिस्तान संबंधी निर्णय निश्चय ही ग़लत था, पर गांधीजी अब
किससे लड़ते। सब तो अपने ही थे। 20 वर्षों तक उन्होंने दक्षिण
अफ़्रीका में गोरों की प्रभु सत्ता के विरुद्ध लड़ाई की। 30 वर्षों से भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ रहे थे। किन्तु अपने ही देश वासियों
के विरुद्ध लड़ने की कल्पना मात्र से ही वे कांप उठते थे। और असहयोग सिर्फ़ इसलिए कि
उनका निर्णय गांधीजी के निर्णय से भिन्न था, इसकी तो गांधीजी सोच भी नहीं सकते थे।
भूतकाल में भी कई ऐसे अवसर थे जब गांधीजी ने कांग्रेस के द्वारा उनसे अलग लिए गए निर्णय
की न तो आलोचना की न ही उसमें बाधा पहुंचाने की कोशिश की।
मार्च, 1947 में जब बंटवारे के प्रस्ताव को कांग्रेस कार्य समिति की सहमति मिल गई, तो गांधीजी निराश और दुखी थे। फिर भी, इस फ़ैसले के बाद भी
जब वे दिल्ली लौटे, तो उन्होंने आशावादी रहने की कोशिश की। जब चीनी
राजदूत, जो उनसे मिलने आए थे, ने उनसे भविष्य की
स्थिति के बारे में पूछा, तो गांधीजी ने जवाब दिया: "मैं एक ऐसा आशावादी
हूँ जिसकी आशा कभी नहीं टूटती। हमने इतने सालों तक जो जीवन जिया है और जो मेहनत की
है, वह बेकार नहीं जाएगी; हम बर्बर नहीं
बनेंगे—जैसा कि बंगाल, बिहार और पंजाब में हो रहे बेमतलब के खून-खराबे को
देखकर अब लग रहा है कि हम बन रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह बस इस बात का
संकेत है कि जैसे-जैसे हम विदेशी गुलामी की बेड़ियों को तोड़ रहे हैं, सारी गंदगी और मैल अब सतह पर आ रही है। जब गंगा में बाढ़ आती है, तो पानी गंदा हो जाता है। गंदगी सतह पर आ जाती है। जब बाढ़ उतर जाती है, तो आपको साफ़ नीला पानी दिखाई देता है जो आँखों को सुकून देता है। यही मेरी
आशा है और इसी के लिए मैं जीता हूँ। मैं यह देखने के लिए जीवित नहीं रहना चाहता कि
भारतीय इंसानियत बर्बर बन जाए। भविष्य की भविष्यवाणी कौन कर सकता है?" हालाँकि, बाद की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि गांधीजी कुछ
ज़्यादा ही आशावादी थे!
पाकिस्तान बनने का अंतिम रूप से फैसला
हो जाने पर गांधीजी ने उसके दुष्परिणामों के रोकथाम की कोशिश शुरू कर दी। उन्होंने
जल्दी से कश्मीर, पंजाब और बंगाल
का दौरा किया । सत्ता के हस्तान्तरण के ठीक पहले कलकत्ता में उनकी उपस्थिति ने
जादू का सा काम किया। गत बारह महीनों का सांप्रदायिक तनाव और विद्वेष एकाएक समाप्त
हो गया। जब एक पखवाड़े के बाद फिर दंगे शुरू हुए तो उनके उपवास ने सारे कलकत्ते को
इस तरह हिला दिया मानों बिजली छू गई हो । मुसलमान विचलित हो उठे और हिन्दू लज्जा
से नतमस्तक। सभी संप्रदायों के नेताओं ने शांति का प्रण लिया और गांधीजी से उपवास
तोड़ने की प्रार्थना की। कलकत्ते के अनशन को ‘चमत्कार’ कह कर लोगों ने
उसके प्रभाव को स्वीकार किया । ‘लंदन टाइम्स’ ने इसके विषय में जो कहा था उसे बार-बार उद्धृत
किया गया है। इस पत्र ने लिखा था कि एक उपवास ने वह कर दिखाया जो सेना की कई डिवीजन
भी नहीं कर पाती ।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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