महात्मा गांधी हत्या केस-5
कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न
गांधीजी की हत्या की साज़िश
की पृष्ठभूमि में जब हम झांकते हैं तो कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आते
हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए गांधीजी ने बार-बार
लोगों को समझाया कि भारत के लोगों को अपने कार्यों से सिद्ध करना होगा कि सीमा के
उस पार पाकिस्तान में कुछ भी हुआ करे, हम तो अपने मुसलमान भाइयों के साथ बिलकुल
निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार ही करेंगे। उन्हीं दिनों खाद्य मंत्री डॉ. राजेंद्र
प्रसाद को गोवध-निषेध की मांग के क़रीब पचास हज़ार पत्र मिले। इसकी आलोचना करते हुए
गांधीजी ने कहा, “जैसे न्यायपूर्वक किसी
इस्लामी राज्य में ग़ैर-मुसलमानों पर मुसलिम क़ानून नहीं थोपा जा सकता, उसी तरह किसी
हिन्दू राज्य में ग़ैर-हिन्दुओं पर हिन्दू क़ानून नहीं लादा जा सकता। भारत जैसे
धर्म-निरपेक्ष राज्य में तो ऐसा होना ही नहीं चाहिए। हिन्दू धर्म में गोवध का
निषेध है। परन्तु वह तो हिन्दुओं के लिए ही है, सारी दुनिया के लिए नहीं है।” वह मानते थे कि भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक देश में बलपूर्वक या कानून के जरिए इसे दूसरों पर नहीं थोपा जा सकता। गांधीजी का
विचार था कि गोहत्या को रोकने का एकमात्र मार्ग हिंदुओं द्वारा प्रेम, सेवा और समझा-बुझाकर दूसरों का समर्थन प्राप्त करना है, न कि जबरदस्ती करना।
राष्ट्रभाषा के सवाल
पर भी झगड़े हो रहे थे। कुछ लोग यह मानते थे कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही होनी
चाहिए और उसकी लिपि देवनागरी। गांधीजी ने कहा, “मैं ऐसा प्रस्ताव नहीं
मान सकता। भारत जितनी हिन्दुओं की मातृभूमि है उतनी ही मुसलमानों की भी। इसलिए
भारत की राष्ट्रभाषा सादी हिन्दी और सादी उर्दू का सुमेल अर्थात हिन्दुस्तानी ही
हो सकती है। वह देवनागरी और उर्दू दोनों लिपि में लिखी जानी चाहिए। ... मैं अकेला
भी रह जाऊं तो भी हिन्दुस्तानी की हिमायत करूंगा।” गांधीजी विचार था कि आम जनता द्वारा बोली और समझ जाने वाली भाषा ही देश की राष्ट्रभाषा बन सकती है, जो कि हिंदी और उर्दू का सहज मिश्रण यानी हिन्दुस्तानी थी। उनका मानना था कि
यह साझी भाषा उत्तर और दक्षिण तथा देश के अलग-अलग समुदायों के बीच आपसी मेल-मिलाप
और एकता का सबसे बड़ा जरिया बन सकती है।
मुसलिम लीग का जो पहले
नारा था, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’, अब बदल कर ‘हंस के लिया है पाकिस्तान,
लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ में बदल गया था। उनकी नज़र मुसलिम संस्कृति के
केन्द्र दिल्ली, आगरा, अजमेर और अलीगढ़ पर थी। इसलिए ग़ैर मुसलिमों में भय और आशंका
था कि मुसलमान धोखा देने वाले काम कर सकते हैं। गांधीजी ने कहा, “कुछ भी हो जाए,
कांग्रेसी सरकार धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध भेदभाव नहीं रख सकती। संदेह से
प्रेरित होकर हमें काम नहीं करना चाहिए। विश्वास के बिना संसार का काम नहीं चल
सकता। यदि अल्पसंख्यक लोग धोखा देने का काम करेंगे, तो राज्य उनके ख़िलाफ़ काम
करेगा।”
गांधीजी पर मुसलमानों
के प्रति पक्षपात के आरोप लगते रहते थे। आने वाले अधिकाँश पत्रों में गालियां भरे
होते थे। मनु को धमकी दी गई कि वह यदि उसने प्रार्थना सभा में क़ुरान की आयतें पढ़ी,
तो उसे जान से मार दिया जाएगा। गांधीजी को कहा गया कि “जो बात आप मुझसे कहते
हैं, वही बात आप मुसलमानों से क्यों नहीं कहते?” गांधीजी ने जवाब
दिया, “वे आज मुझे अपना दुश्मन समझते हैं।
हिन्दू मुझे अपना दुश्मन नहीं समझते। इन प्रार्थना सभाओं में आपको रोज़ कौन सी
शक्ति लाती है। कोई ज़बरदस्ती नहीं है। फिर भी आप खिंचे चले आते हैं और मेरी बात
धीरज से सुनते हैं। वह शक्ति आपका मेरे प्रति प्रेम है। इसीलिए मैं आपसे कहता हूं
कि आप अपने हथियार समुद्र में फेंक दें और वीरों की अहिंसा की अद्वितीय शक्ति को
समझें।” सत्याग्रह के विज्ञान में केवल
उसके नियम के प्रतिपादन की ही बात नहीं आती। उसमें ऐसी कार्य-पद्धतियां सोच
निकालने की बात भी शामिल हैं, जिनके द्वारा आम लोगों को अपनी दैनिक समस्याएं हल
करने के लिए सत्याग्रह का प्रयोग करना सिखाया जा सके। धीरे-धीरे गांधीजी एक ऐसी ही
शक्ति के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहे थे।
ऐसा नहीं था कि केवल
हिन्दू ही उनपर पक्षपात के आरोप लगते थे। मुसलमान भी कुछ ऐसा ही सोचते थे। गांधीजी
के कांग्रेसी साथी सतारुढ़ थे। वे उनसे अपेक्षा रखते थे कि गांधीजी पटेल आदि से
कहकर उनके हित में कुछ करवा दें। गांधीजी को सावधानी रखनी पड़ती थी। गांधीजी नैतिक
दृष्टिकोण रखते थे। समस्याओं के बारे में शुद्ध नैतिक दृष्टिकोण सरकारी दृष्टिकोण
से भिन्न होता है। प्रशासन को लोकमत साथ लेकर चलना पड़ता है। परन्तु गांधीजी तो
सुधारक थे, सुधारक लोकमत से बहुत आगे जा सकता है। गांधीजी के साथी सरकार के सदस्य
थे। वे व्यावहारिक मनुष्य थे। गांधीजी अतिरिक्त सावधानी बरतते कि उनके मार्गदर्शन
में हस्तक्षेप की गंध न आए। मुस्लिम लीग के नेताओं ने आरोप लगाया कि गांधीजी अपनी
राजनीति में रामराज्य, गोसंरक्षण और सत्याग्रह जैसे हिंदू
धार्मिक शब्दों और प्रतीकों का उपयोग करके हिंदू पुनरुत्थानवाद को बढ़ावा दे रहे
हैं।
अल्लामा इनायतुल्ला
खान मशरिकी द्वारा स्थापित खाकसार आंदोलन के लोग (खाकसार) का एक
ऐसा वर्ग था, जिसने ‘कराची से कलकत्ते तक अखंड पाकिस्तान’ की मांग की थी। इस
समूह ने जिन्ना के ख़िलाफ़ भी हिंसक प्रदर्शन किया था। मशरिकी ने जिन्ना की
दो-राष्ट्र के सिद्धांत पर आधारित और देश के विभाजन वाली संकीर्ण सोच का विरोध
किया था। उन्होंने दिल्ली के अधिकारियों से झगड़ा मोल ले लिया था। वे पूरे
उपमहाद्वीप में एक मजबूत मुस्लिम प्रतिनिधित्व या प्रभाव चाहते थे, और उनके कार्यकर्ता 'कराची से कलकत्ते तक' व्यापक स्तर पर सक्रिय
रहते थे। मशरिकी ने बाद में 1947 के विभाजन को एक 'अधूरा पाकिस्तान' कहा था क्योंकि इसके
दायरे से बाहर करोड़ों मुसलमान भारत में पीछे छूट रहे थे। गांधीजी ने उन्हें
समझाया, तो वे गांधीजी से नाराज़ हो गए और बोले, “आप दिखावे के लिए
प्रार्थना सभाओं में क़ुरान का पाठ करवाते हैं। राजनीतिक मामलों पर जो आपके उद्गार
होते हैं, उसमें मुसलमानों के विरुद्ध कटुता और बदले की भावना भरी होती है। अब तो
यह साबित हो गया है कि आप भारत के दस करोड़ मुसलमानों के दुश्मन हैं। बिहार में जो हत्याकांड
हुए हैं, वे सब आपके निर्देश से हुए हैं।”
लॉर्ड
माउंटबेटन को भारतीय नेताओं ने संघ के प्रथम गवर्नर जनरल के पद पर चुना। उसके
अंग्रेज़ होने के कारण कुछ लोगों ने इसका सैद्धांतिक और राजनीतिक विरोध किया। इन लोगों का मानना था कि आज भारत
में ब्रिटिश राज के किसी बड़े अधिकारी को सर्वोच्च पद पर रखना पूर्ण स्वतंत्रता की
भावना के खिलाफ है। गांधीजी ने इस चुनाव का समर्थन किया था। बोले, “इस क़दम से यह साबित होता है कि हम सब प्रकार
के पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर अपने कल तक के विरोधियों पर विश्वास रखने की बहादुरी
दिखा सकते हैं। वे राज्य के जहाज को अशांत सागर से पार लगाने के लिए विशेष योग्य
हैं।” गांधीजी का इतना बोलना था कि एक अफ़वाह उड़ा
दी गई कि कनाडा जैसे उपनिवेशों के झंडों की तरह भारत के झंडे में भी यूनियन जैक
रहेगा। गांधीजी ने कहा, “जहां शौर्य और आदर व्यक्त करना उचित हो,
वहां हमें इन दोनों गुणों का परिचय देना ही चाहिए। यूनियन जैक ने कोई अपराध नहीं
किया है। ग़ुलामी की अवधि के दौरान भारत के साथ जो अन्याय हुआ वह ब्रिटिश
अधिकारियों ने किया था। अब वे जा रहे हैं।” बाद में यह अफ़वाह निराधार साबित हुई।
दक्षिण भारत में
द्राविड़िस्तान की मांग को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़
भाषा-भाषी के लिए अलग-अलग राज्यों की मांग उठी। हालांकि गांधीजी भाषावार राज्यों
के पुनर्गठन के पक्ष में थे, लेकिन वे नहीं चाहते थे कि यह आंदोलन देश को
छिन्न-भिन्न करने वाला कोई बड़ा आंदोलन बन जाए। इसलिए उन्होंने कहा, “क्या आप चाहेंगे कि
आपके बारे में यह कहा जाए कि आप ग़ुलामी में ही एक राजनीतिक प्रणाली के योग्य थे?
स्वतंत्र होने पर आप ग़ुलामों की भांति अलग-अलग गुटों में बंट जाएंगे और प्रत्येक
गुट अपनी डफली अलग ही बजाएगा?” महात्मा गांधी अखंड भारत के पक्षधर थे और वे देश के किसी भी हिस्से के विभाजन या अलग राष्ट्र की मांग के खिलाफ थे। जब ई. वी. रामास्वामी पेरियार और जस्टिस पार्टी ने दक्षिण भारत के लिए एक स्वतंत्र 'द्रविड़ नाडु' की मांग उठाई, तो गांधीजी ने देश की
एकता पर जोर देते हुए ऐसी क्षेत्रीय या भाषाई अलगाववादी प्रवृत्तियों का समर्थन
नहीं किया। गांधीजी पूरे देश को एक सूत्र में पिरोकर रखना चाहते थे और धार्मिक या
क्षेत्रीय आधार पर किसी भी तरह के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि
अंग्रेजों से स्वतंत्रता के बाद देश को एकजुट रहना चाहिए, न कि छोटे-छोटे संप्रभु राज्यों में विभाजित होना चाहिए।
अगस्त, 1947 के पूर्व
ही सरदार पटेल के प्रयासों से कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद के अलावे अन्य सभी
रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित हो गईं। पंजाब और बंगाल का विभाजन हो गया। सिंध
पाकिस्तान में मिल गया। सिलहट पाकिस्तान में चला गया। पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत भी
पाकिस्तान को मिला। विभाजन की विभीषिका में हज़ारों जानें गईं और लाखों लोग बेघर हो
गए। असंख्य स्त्रियों की इज़्ज़त लूटी गई। ऐसे में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे
सामने हैं, जिनका उत्तर खोजना निहायत ज़रूरी है। क्यों हुआ यह सब?
क्या कांग्रेस के नेताओं को सत्ता का इंतज़ार असह्य हो रहा था? क्या ब्रिटिश
साम्राज्य भारत छोड़ने के पहले अपना आख़िरी दांव खेल रहा था? गांधीजी अचानक इतने
अशक्त क्यों हो गए थे?
लंबे संघर्ष के बाद
भारत आज़ाद तो हो गया, लेकिन उसके साथ एक रक्त-रंजित विभाजन ने सारे देश के
ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। “भारत छोड़ो” आन्दोलन को बर्बर दमन
द्वारा दबा दिया गया था, फिर भी स्वतंत्रता आई। और जब स्वाधीनता आई, तो वह
स्वाधीनता नहीं निकली जिसके सपने भारत ने देखे थे। उसने हमारा अंग विच्छेद कर दिया
था। हमारा ख़ून बहाया था। भाई का भाई के हाथ रक्त-रंजित संघर्ष हुआ था। भारत का
विभाजन हुआ।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर