फ़ुरसत में … हिन्दी दिवसकुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातेंऔर दो क्षणिकाएं
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फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखा हुआ बहुत कुछ पढने, देखने और सुनने को मिला। कुछ अखबारों के शीर्षक देखिए“हिंदी अपने घर में प्रवासिनी”, “हाशिए पर हिंदी”, “हिदी को राष्ट्रभाषा बनाने में राजभाषा विभाग का टालू रवैया”, “हिंदी के प्रति कब खत्म होगी लापरवाही”, आदि, आदि। इस दिन जब ये सब पढता हूं तो एक शे’र बरबस आ जाता है ज़ुबान पर कोई हद ही नहीं शायद मुहब्बत के फसाने की सुनाता जा रहा है जिसको जितना याद आता है। इन दिनों मैंने अखबार पढना ही बंद कर दिया है, क्योंकि है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं। अखबारों और अन्य कई जगह इन सूर्ख़ियों को देख लगता है जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो हमारे हाथ में भाला बरछी, लाठी सोंटा सब होता है, पर आइना नहीं होता। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि मुझे यह गाना बहुत अच्छा लगता है, ये न पूछे मिला क्या है हमको हम ये पूछें किया क्या है अर्पण हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। सरकारी कार्यालयों में जो प्रयोग होता है वह राजभाषा है। और १४ सितंबर को जो मनाया जाता है वह राजभाषा हिंदी दिवस है भाषा हिंदी दिवस नहीं। राजभाषा नीति, प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना पर आधारित है। यह माना जाता है कि जब तक एक भी हिंदीतर भाषी राज्य असहमत होगा तब तक हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो हिंदी तो जगन्नाथी रथ है, इसे हम सब मिलकर खीचें। इक्कीसवीं सदी की व्यावसायिकता जब हिन्दी को केवल शास्त्रीय भाषा कह कर इसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाने लगी तब इस समर्थ भाषा ने न केवल अपने अस्तित्व की रक्षा की, वरण इस घोर व्यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा और टेलीविजन ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में वैश्विक क्रांति दी है। आज हर कोई हिंदी बोल समझ लेता है, लिख पढ़ भले न पाए। विज्ञापन की दुनियां में हिंदी का बोलबाला है। विज्ञापन की दुनियां का हिंदी के बगैर काम नहीं चलता। विज्ञापन गुरु यह जान और मान चुके हैं कि माल अगर बेचना है तो उन्हें हिंदी में ही बाज़ार में उतरना पड़ेगा। हां ये जो हिंदी परोसी जा रही है उसे कुछ लोग “हिंगलिश” की संज्ञा देते हैं। परन्तु यह सर्वग्राह्य हिंदी है। आज बाज़ारबाद शबाब पर है। उत्पादक तरह-तरह से उपभोक्ताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में विज्ञापन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दिवा-रात्री समाचार चैनल, एफ.एम. रेडियो और विज्ञापन एजेंसियों की बाढ़ में बिना लाग लपेट बेवाक और संक्षिप्त शब्दों में पूरी रचनात्मकता वाली हिन्दी का ही बाज़ार है। इंटरनेट पर भी हिंदी का अभूतपूर्व विकास हो रहा है। इंटरनेट पर हिंदी की कई वेबसाइटें हैं। हिंदी के कई अख़बार नेट पर उपलब्ध हैं। कई साहित्यिक पत्रिकाएं नेट पर पढ़ी जा सकती हैं। हिंदी में ब्लॉग लेखक आज अच्छी रचनाएं दे रहें हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यमों का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के विकास का स्पष्ट संकेत देता है। यह भी कहा जाता है कि बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से लोग आतंकित हैं। कुछ यह कहते मिल जाएंगे कि “हमें बाज़ार की हिंदी से नहीं बाज़ारू हिंदी से परहेज़ है।” जिस बाज़ारू भाषा को बाज़ारवाद से ज़्यादा परहेज़ की चीज़ कहा जा रहा है वह वास्तव में कोई भाषा रूप ही नहीं है। कम से कम आज के मास कल्चर और मास मीडिया के जमाने में। आज अभिजात्य वर्ग की भाषा और आम आदमी और बाज़ारू भाषा का अंतर मिटा है। क्योंकि आम आदमी की गाली-गलौज वाली भाषा भी उसके अंतरतम की अभिव्यक्ति करने वाली यथार्थ भाषा मानी जाती है। उसके लिए साहित्य और मीडिया दोनों में जगह है, ब्लॉग पर भी। आज सुसंस्कृत होने की पहचान जनजीवन में आम इंसान के रूप में होने से मिलती है। दबे-कुचलों की जुबान बनने से मिलती है, गंवारू और बाज़ारू होने से मिलती है। यह हिन्दी उनकी ही भाषा में पान-ठेले वालों की भी बात करती है, और यह पान-ठेले वालों से भी बात करती है, और उनके दुख-दर्द को समझती और समझाती भी है। साथ ही उनमें नवचेतना जागृत करने का सतत प्रयास करती है। अत: यह आम आदमी की हिंदी है, बाज़ारू है तो क्या हुआ। बाज़ार में जो चलता है वही बिकता है और जो बिकता है वही चलता भी है। प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही संपर्कभाषा का रूप ले सकती है। साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। सामान्य बोलचाल में प्रचलित अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, उर्दू से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों के हिंदी में प्रयोग से सही अर्थों में यह जनभाषा बन सकेगी और तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी पट सकेगी। हिन्दी की विकास यात्रा में इसे और अधिक प्रयोजनमूलक यानी फंक्शनल बनाया जाए। प्रयोजनमूलक हिन्दी जीवन और समाज की ज़रूरतों से जुड़ी एक जीवन्त, सशक्त और विकासशील हिन्दी भाषा है। आज ऐसी ही प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। हिंदी लाहे लाहे पूरे देश में पसर रही है । कह कर न मैं हिंदी को कमजोर कर रहा हूँ न उसका दायरा सीमित । अगर ट्रेन लेट है कहकर बात बनती है तो उसे विलम्ब क्यों कर दूँ । अगर ट्रेन स्टेशन में ढुक रही है से बात ज्यादा समझ में आए तो आगमन के इंतजार में क्यों बैठूँ । और अब क्षणिकाएं |
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दुर्वासा न बनो मुझे नहीं मरना किसी बहेलिए के हाथों तुम्हारी जुदाई ही काफी है मुझे हरपल मारने के लिए। |
| (2) पीपल ! |
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शनिवार, 18 सितंबर 2010
फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस- कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं
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