राष्ट्रीय आन्दोलन
475. गांधीजी दिल्ली में- विभाजन
का सवाल
1947
नेहरूजी के आग्रह पर गांधीजी पाँच सौ मील की यात्रा एक गर्म ट्रेन से कर 1 मई को दिल्ली के भंगी कॉलोनी में रहने
आ गए। देश में जगह-जगह दंगे हो रहे थे। पूरा पंजाब सुलग रहा था। गांधीजी और नेहरू ने
एक साथ तत्कालीन स्थिति पर एक घंटे तक चर्चा की। दिल्ली में औपनिवेशिक प्रशासन का राजनीतिक
महकमा अपनी घिनौनी चालें चल रहा था। गांधीजी का मत था कि लीग से बाज़ी मार ले जाने के
लिए कांग्रेस को अंग्रेज़ों के साथ कूटनीति का खेल नहीं खेलना चाहिए। उन्होंने साफ-साफ
कहा कि अंग्रेज़ों से कोई रियायत लेने के लिए हमें भारत की एकता को बेचना नहीं चाहिए।
हमें यह मांग करनी चाहिए कि अंग्रेज़ दुरंगी नीति छोड़कर सीधा-सच्चा व्यवहार करें। सत्ता
हस्तांतरण तक देश भर में सख्ती से क़ानून का शासन हो। कांग्रेस को यह मांग करनी
चाहिए कि अंग्रेज अपनी 'बीच का रास्ता' वाली नीति को छोड़कर सीधे-सीधे काम करें, सत्ता हस्तांतरण होने तक पूरे देश
में कानून के शासन को सख्ती से लागू करें, और ऐसी किसी भी पार्टी के साथ
बातचीत करने से इनकार कर दें जो इस मामले में कोताही बरत रही हो या सहयोग करने से
मना कर रही हो। और यदि अंग्रेज ऐसा करने को तैयार न हों, तो उन्हें इस खेल से
बाहर हो जाना चाहिए और तब तक इंतज़ार करना चाहिए जब तक कि अंग्रेज देश छोड़कर चले
न जाएँ, और भारतीय पार्टियों को आपस में ही मामला सुलझाने के लिए छोड़ देना चाहिए। गांधीजी
का सुझाव था कि सरकार देश में फैली अराजकता के लिए जिन्ना को दोषी घोषित करे। लेकिन
माउंटबेटन जिन्ना के ऊपर कोई आरोप स्वीकार करने को तैयार नहीं था। उल्टे वह गांधीजी का कोई सुझाव नहीं मानता था। कांग्रेस मंत्री
मंडल के सांप-छछूंदर वाली स्थिति थी। कांग्रेस आलाकमान को डर था कि अगर हालात को
यूं ही बेकाबू होने दिया गया, तो वे उस अराजकता और विघटन की ताकतों के आगे दब जाएंगे, जो इस बीच ज़ोर पकड़
रही थीं।
जब गांधीजी बिहार में व्यस्त थे, तब माउंटबेटन अपनी योजनाओं पर बेहद
सक्रिय रहा था, वह प्रांतों का दौरा करता, नेताओं से बातचीत करता और भारत के
भविष्य से जुड़ी समस्याओं को गहराई से समझने में खुद को पूरी तरह खपा देता।
जैसे-जैसे उसके विचार स्पष्ट होते गए, उसे पाकिस्तान के गठन के अलावा कोई
और रास्ता नज़र नहीं आया। माउंटबेटन इस दुखद निष्कर्ष पर पहुँच गया कि देश को
विभाजित किए बिना लीग और कांग्रेस की परस्पर विरोधी आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया
जा सकता। यही तर्क उन प्रांतों पर भी लागू करना होगा जहाँ दोनों समुदायों की आबादी
लगभग बराबर थी, यानी पंजाब और बंगाल। जितनी जल्दी यह हो सके और अँग्रेज़ भारत छोड़ सकें, सभी संबद्ध पक्षों के लिए
उतना ही बेहतर होगा। वास्तव में स्थिति इतनी विषम लगती थी कि उनके चीफ ऑफ स्टाफ
लॉर्ड इसमें ने इसकी तुलना ‘बीच समुद्र में ऐसे जहाज की कप्तानी संभालने से की
जिसके डेक पर आग लगी हो और जिसके गोदाम में गोला-बारूद भरा हो।’
माउंटबेटन ने कांग्रेस पार्टी के सामने विभाजन का सवाल रखा। क्या वे भारत के
विभाजन को स्वीकार करेंगे? नेहरू ने 21 अप्रैल को 'यूनाइटेड प्रोविंसेस पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस' में पहले ही कह दिया था कि, "मुस्लिम लीग पाकिस्तान ले सकती है, अगर वे ऐसा चाहते हैं; लेकिन इस शर्त पर कि
वे भारत के उन अन्य हिस्सों को अपने साथ न ले जाएं, जो पाकिस्तान में शामिल नहीं होना
चाहते।" क्या कार्यसमिति भी वही रुख अपनाएगी? गांधीजी इसके खिलाफ थे। पटेल
हिचकिचाए; वह जिन्ना की धमकियों को बल-प्रयोग की कसौटी पर कसना चाहते थे। वह मुस्लिम
हिंसा को दबाने के लिए केंद्र सरकार का इस्तेमाल करते। लेकिन आखिर में वह भी मान
गए। ढाई साल बाद उन्होंने खुलासा किया, 'मैंने विभाजन को आखिरी उपाय के तौर
पर तब स्वीकार किया, जब हम एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गए थे जहाँ हम सब कुछ खो चुके होते।' गृहयुद्ध या आज़ादी
खोने का जोखिम उठाने के बजाय, कांग्रेस ने पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया।
1 मई को ही कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। गांधीजी को लगा कि उनके और कार्यसमिति
के लोगों के बीच दृष्टिकोण का इतना बड़ा अंतर है। इसलिए चर्चा में उनके भाग लेने से
कोई लाभ नहीं होगा। लेकिन कार्यसमिति के विशेष आग्रह पर वे बैठक में मूक-दर्शक की तरह
उपस्थित रहे। कार्यसमिति ने विभाजन का सिद्धान्त स्वीकार कर लिया। पाकिस्तान वह
भारी कीमत थी, जो उन्होंने आज़ादी के लिए चुकाई। अब भी गांधीजी यह स्वीकार नहीं करते कि विभाजन
ही भारत की समस्या का एकमात्र हल है। न ही वे यह मानने को तैयार थे कि अव्यवस्था और
अराजकता के डर से हमें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। वे तो यह मानते थे कि “यदि अंग्रेज़ शासक और अंग्रेज़ उच्च अधिकारी ईमानदारी और सच्चाई का खेल खेलें, तो
देश में कोई अव्यवस्था और अराजकता नहीं होनी चाहिए। लेकिन मान लीजिए कि बुरी से बुरी
परिस्थिति खड़ी हो और मुझे अराजकता और लादी हुई शांति के बीच चुनाव करना पड़े, तो मैं
बिना किसी संकोच के अराजकता को पसंद करूंगा। मैं किसी भी हालत में शांति के मूल्य के
रूप में अंग्रेज़ों के हाथों देश का विभाजन होना स्वीकार नहीं करूंगा।” लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गांधीजी की बात मानने को तैयार नहीं थे। 3 मई को गांधीजी ने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, “मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि हमारी आज़ादी की लड़ाई शुद्ध अहिंसा पर आधारित नहीं
थी। यदि सारे कांग्रेस-जन सच्ची अहिंसा की शर्तें ईमानदारी से पूरी करते, तो आज हम
अपने को इस भयंकर अराजकता की स्थिति में न पाते। साम्प्रदायवाद हमारे बीच सिर न उठाता,
अस्पृश्यता भूतकाल की बात बन जाती, और अमीर-ग़रीब दोनों बिना किसी भेद-भाव के समान रूप
से शरीर-श्रम करते। ईर्ष्या-द्वेष और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हमारी भीतरी राजनीति
की शक्ल न बिगाड़ देते। ... आज जो झूठ, दम्भ और धोखेबाज़ी चल रही है, उसके चलते हुए जीवित
रहने की अब मेरी इच्छा नहीं है।”
ऐसी परिस्थिति में माउंटबेटन ने भारत की स्वतंत्रता की घड़ी घोषित करने का फैसला
लिया। भारत में माउंटबेटन की चुनौतियों पर डोमिनिक लैपीयर और लैरी
कॉलिन्स ने अपनी पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में विस्तार से
चर्चा की है। उसने लिखा है
कि 4 जून 1947 को माउंटबेटन
को भारत की आज़ादी की तारीख़ का एलान करना था, लेकिन उसने कोई
तारीख़ तय नहीं कर रखी थी। तभी उसे अपने
जीवन की एक बड़ी उपलब्धि और दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की याद आई
जो दो साल पुरानी ही घटना थी। यह तारीख़ एक
बार फिर से आने वाली थी और माउंटबेटन ने भारत की आज़ादी की तारीख़ का भी एलान कर
दिया, 15 अगस्त 1947।
3 मई को लॉर्ड माउंटबेटन के साथ अपनी मुलाक़ात के दौरान, उन्होंने दंगो और हिंसा मामला उनके सामने उठाया और पूछा कि वह इन सब बातों के
मूक गवाह क्यों बने हुए हैं? आप मुझे या जिन्ना साहब को, जो कोई भी इस संयुक्त अपील को लागू करने में
कोताही बरत रहा है, उसे जवाबदेह क्यों नहीं ठहराते? वायसराय ने उस बात को मानने से
इनकार कर दिया, जिसका मतलब गांधीजी ने माउंटबेटन
के उन्हें और जिन्ना दोनों को शांति की अपील जारी करने के लिए बुलाने से निकाला था; दोनों हस्ताक्षरकर्ताओं ने अपनी मर्ज़ी से और खुशी-खुशी उस पर दस्तखत किए थे।
न ही माउंटबेटन अशांति जारी रहने की ज़िम्मेदारी किसी पर डालने और दोषी पक्ष का
नाम बताने को तैयार था। उसने कहा कि इस मोड़ पर ऐसा करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा।
उसकी एकमात्र चिंता यह थी कि सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण तरीके से और जितनी
जल्दी हो सके, भारतीय हाथों में कर दिया जाए। वह
इस बात को लेकर बहुत चिंतित था कि भारत एकजुट रहे। अगर सांप्रदायिक झगड़े जारी
रहते, तो यह न तो ब्रिटेन के लिए और न ही
भारत के लिए कोई गर्व की बात होती। गांधीजी को आखिर में उसने यह भरोसा दिलाया कि
अगर ब्रिटिश सत्ता के खत्म होने के दौर में, उसकी पूरी कोशिशों के बावजूद झगड़े जारी रहते हैं, तो वह सेना का इस्तेमाल करने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाएगा। गांधीजी को लगा कि
फिलहाल के लिए इतना ही काफ़ी है।
इसके बाद 6 मई तक माउंटबेटन ने सभी प्रमुख दलों
के भारतीय नेताओं के साथ 133 मुलाक़ातें की। 5 मई को माउंटबेटन और जिन्ना की बात हुई। माउंटबेटन, कांग्रेस कार्यसमिति और मुस्लिम लीग सब एक दूसरे
से अलग-अलग कारणों से मतभेद रहते हुए भी चर्चा करते रहे। इन चर्चाओं से साफ हो गया कि लॉर्ड माउंटबेटन, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं
ने राजनीति के गहन मामलों में गांधीजी की आवाज़ को अनसुना कर दिया था। जिन्ना के नेतृत्व
में मुस्लिम लीग पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ी रही।
विभाजन के प्रति कांग्रेस के दृष्टिकोण में भी कुछ
परिवर्तन हुआ। अभी तक कांग्रेस इस बात पर अड़ी थी कि यदि बंटवारा होना ही है तो वह
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हो, पहले नहीं जैसाकि मौलाना आज़ाद ने उस समय कहा था, “शादी पहले, तलाक उसके बाद।” लेकिन अंतरिम सरकार में कुछ महीने मुस्लिम लीग के साथ काम करके
और उसके विचारों को बदलने की जी तोड़ कोशिश को बेकार जाते देख चुकने के बाद, नेहरू, पटेल और दूसरे कांग्रेसी नेता मुस्लिम लीग के साथ किसी तरह के
गहरे मेल-मिलाप या एकता की आशा छोड़ चुके थे। हालत यह हो गई कि उनके सामने एक ही विकल्प
था – अराजकता या विभाजन।
अराजकता की जो विभीषिका पूरे देश का संहार करने जा रही थी, उससे तीन चौथाई देश को बचाने के लिए उन्होंने कलेजे पर पत्थर
रख कर विभाजन स्वीकार कर लिया।
गांधीजी ने कांग्रेसी
नेताओं को मनाने की जी-तोड़ कोशिश की कि जल्दबाज़ी में विभाजन स्वीकार न करें। गांधीजी
ने बार-बार कहा कि अगर विभाजन होना ही है, तो वह आज़ादी के बाद हो, न कि उसके पहले।
लेकिन गांधीजी की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ थी। बाघ की पीठ पर सवार
कांग्रेसी नेता उससे उतरने में असमर्थ थे। शायद वे सचमुच
विश्वास करते थे की जिन्ना की पाकिस्तान की मांग मानकर वे साम्प्रदायिक समस्या को
हमेशा के लिए हल कर लेंगे। जवाहरलाल नेहरू से किसी ने खा था, “सर काटकर हम सिरदर्द से छुटकारा पा
लेंगे।” मौलाना आज़ाद ने लॉर्ड माउंटबेटन
से कहा कि वह देश के बँटवारे के संभावित नतीजों पर भी विचार करें। बँटवारे के बिना
भी, कलकत्ता, नोआखली, बिहार, बंबई और पंजाब में दंगे हो रहे थे। हिंदुओं ने मुसलमानों पर हमला किया था और
मुसलमानों ने हिंदुओं पर। अगर ऐसे माहौल में देश का बँटवारा हुआ, तो देश के अलग-अलग
हिस्सों में खून की नदियाँ बह जाएंगी और इस तरह की खून-खराबी के लिए ब्रिटिश ही
ज़िम्मेदार होंगे। बिना एक पल भी हिचकिचाए, लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाब दिया, 'कम से कम इस एक सवाल
पर तो मैं आपको पूरा भरोसा दिलाता हूँ। मैं यह पक्का करूँगा कि कोई खून-खराबा या
दंगा न हो। मैं एक सैनिक हूँ, आम नागरिक नहीं। एक बार जब बँटवारे का सिद्धांत मान लिया जाएगा, तो मैं ऐसे आदेश जारी
करूँगा जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि देश में कहीं भी कोई सांप्रदायिक अशांति न
हो। अगर ज़रा सी भी अशांति हुई, तो मैं उस समस्या को शुरू में ही खत्म करने के लिए कदम उठाऊँगा। मैं तो
हथियारबंद पुलिस का भी इस्तेमाल नहीं करूँगा। मैं सेना और वायु सेना को कार्रवाई
करने का आदेश दूँगा और जो कोई भी गड़बड़ करने की कोशिश करेगा, उसे दबाने के लिए टैंक
और हवाई जहाज़ों का इस्तेमाल करूँगा।' पूरी दुनिया जानती है कि लॉर्ड
माउंटबेटन की उस साहसी घोषणा का परिणाम क्या हुआ। जब वास्तव में देश का बँटवारा
हुआ, तो देश के बड़े हिस्सों में खून की नदियाँ बह गईं। निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का
नरसंहार किया गया। भारतीय सेना भी बँट गई, और निर्दोष हिंदुओं तथा मुसलमानों
की हत्याओं को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सका।
अगले कुछ सप्ताहों
में यह स्पष्ट हो गया कि भारत के विभाजन द्वारा ही राजनैतिक गतिरोध दूर किया जाएगा।
वायसराय इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि देश को विभाजित किए बिना लीग और कांग्रेस
की परस्पर-विरोधी आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग पाकिस्तान की अपनी मांग
पर अड़ी रही। माउंटबेटन जिन्ना को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो सका कि विभाजन
के अन्दर भी विभाजन होगा और जिस अपरिहार्य आवश्यकता के कारण भारत का विभाजन होगा
उसी के कारण बंगाल और पंजाब को भी भारत या पाकिस्तान में मिलने से पहले अपने खुद के विभाजन का फैसला करने का अधिकार
होगा। इस नियति से भयाक्रांत और उसके तर्क का प्रतिरोध करने में असमर्थ होकर
जिन्ना को एक ‘घुन लगा पाकिस्तान’ स्वीकार करना पडा। माउंटबेटन और
सहयोगियों के भारत पहुँचाने के 73 दिनों के अन्दर विभाजन की योजना घोषित की गई और
उसके 72 दिनों के बाद खुद वायसरायल्टी ही समाप्त हो गई।
गाँधी जी और नेहरू के आग्रह पर कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों
के अधिकारों पर एक प्रस्ताव पारित कर दिया। कांग्रेस ने दो राष्ट्र सिद्धान्त को
कभी स्वीकार नहीं किया था। जब उसे अपनी इच्छा के विरुद्ध बँटवारे पर मंजूरी देनी
पड़ी तो भी उसका दृढ़ विश्वास था कि भारत बहुत सारे धर्मों और बहुत सारी नस्लों का
देश है और उसे ऐसे ही बनाए रखा जाना चाहिए। पाकिस्तान में हालात जो रहें, भारत एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र
होगा जहाँ सभी नागरिकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे तथा धर्म के आधार पर भेदभाव
के बिना सभी को राज्य की ओर से संरक्षण का अधिकार होगा। कांग्रेस ने आश्वासन दिया
कि वह अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों के किसी भी अतिक्रमण के विरुद्ध हर मुमकिन
रक्षा करेगी।
गांधीजी जिन्ना से मिले
जिन्ना ने एक बयान जारी किया कि बंगाल और पंजाब के बँटवारे का प्रस्ताव 'द्वेष और कड़वाहट से
प्रेरित एक कुटिल चाल' था। उसने कहा कि पाकिस्तान के लिए मुसलमानों की माँग का मूल सिद्धांत यह था कि
मुसलमानों के पास अपने ही क्षेत्रों में एक राष्ट्रीय घर और एक राष्ट्रीय राज्य
होना चाहिए, जिसमें पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, सिंध, बलूचिस्तान, बंगाल और असम, ये छह प्रांत शामिल हों। यदि पंजाब और बंगाल का बँटवारा होता है, तो बाकी सभी प्रांतों
को भी इसी तरह से काटना पड़ेगा। ऐसी प्रक्रिया उन प्रांतों के प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक
जीवन की जड़ों पर ही प्रहार करेगी, जो लगभग एक सदी से इसी आधार पर
विकसित और निर्मित हुए थे, तथा जो स्वायत्त प्रांतों के रूप में विकसित होकर कार्य कर रहे थे। उसने रक्षा
बलों के बँटवारे की माँग की और इस बात पर ज़ोर दिया कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान के
राज्यों को पूर्णतः स्वतंत्र, स्वाधीन और संप्रभु बनाया जाना चाहिए।
6 मई को गांधीजी ने जिन्ना से मिलने के लिए समय मांगा। सरदार पटेल इसके विरुद्ध थे
क्योंकि इससे जिन्ना की प्रतिष्ठा बढ़ती। गांधीजी ने कहा, “मैं जिन्ना को समझाने के लिए एक बार नहीं, ज़रूरत हुई तो पचास बार भी उससे मिलूंगा।
नम्रता कभी हानि नहीं पहुंचा सकती। उससे हमारे ध्येय की प्रगति ही हो सकती है। उसके
पास जाने से मैंने कुछ नहीं खोया है।” गांधीजी जिन्ना से मिले। पौने तीन घंटे का समय दोनों ने साथ में बिताया। उन्होंने
अहिंसा संबंधी बात की। पाकिस्तान और देश के विभाजन के बारे में भी बातें की। गांधीजी
ने जिन्ना से कहा, “पाकिस्तान के प्रति मेरा विरोध पहले की तरह अब भी बना हुआ है।” किंतु जिन्ना पाकिस्तान के बिल्कुल दृढ़ था। वह बोला, “पाकिस्तान का प्रश्न चर्चा के लिए खुला नहीं है।”
गांधी ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने में कोई संकोच नहीं किया। 7 मई को दिल्ली
में अछूतों की बस्ती में अपनी प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा, 'कांग्रेस ने पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया है और पंजाब तथा बंगाल के बँटवारे
की माँग की है। जो लोग पाकिस्तान चाहते हैं, उनसे घुटने टेक कर मैं प्रार्थना करता
हूं कि वे मुझे यह समझा दें कि पाकिस्तान भारत के लाभ के लिए है। मैंने जिन्ना से साफ-साफ
कह दिया है कि भारत के अंग-भंग में मैं भाग नहीं ले सकता और भारत विभाजन की किसी योजना
पर मैं अपने हस्ताक्षर नहीं करूंगा। मैं भारत के किसी भी बँटवारे के ख़िलाफ़ हूँ, जैसा कि मैं हमेशा से रहा हूँ। लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मैं बस इतना ही कर सकता हूँ कि मैं ख़ुद को इस योजना से अलग कर लूँ। भगवान के
अलावा कोई भी मुझे इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।'
गांधीजी माउंटबेटन से मिलने गए। उन्होंने अंग्रेजों को सलाह दी कि वे अपनी
सेना के साथ चले जाएं और 'भारत को अराजकता या अव्यवस्था के
हवाले करने का जोखिम उठाएं'। गांधी ने समझाया कि अगर अंग्रेज
भारत छोड़कर चले जाते हैं, तो हो सकता है कि कुछ समय के लिए
अराजकता फैल जाए; 'निस्संदेह हमें उस अग्नि-परीक्षा
से गुज़रना पड़ेगा, लेकिन वह अग्नि हमें पवित्र कर
देगी।' माउंटबेटन का दिमाग इतना सटीक और
सैनिक-जैसा था कि वह भविष्य को किसी संयोग के भरोसे नहीं छोड़ सकता था। गांधीजी के
लिए, भारत का विभाजन एक पूर्ण बुराई थी।
गांधीजी की सलाह का मतलब था, भारत को कांग्रेस के हाथों सौंप देना। यदि
इंग्लैंड ऐसा करने से इनकार कर देता, तो गांधीजी चाहते थे कि कांग्रेस
सरकार छोड़ दे। तब देश में शांति-व्यवस्था बनाए रखने का सारा दायित्व केवल
ब्रिटिशों के कंधों पर आ पड़ता, और वे ऐसी किसी भी ज़िम्मेदारी को उठाने के इच्छुक नहीं थे। इसलिए, गांधीजी ने अंग्रेजों
के सामने यह विकल्प रखा: या तो कांग्रेस को भारत पर शासन करने दें, या फिर इन मुश्किल भरे
समय में आप स्वयं शासन करें। गांधीजी ने देखा कि जब तक अंग्रेज पाकिस्तान नहीं
बनाते, तब तक उसका बनना संभव नहीं था; और अंग्रेज तब तक पाकिस्तान नहीं
बनाते, जब तक कांग्रेस उसे स्वीकार न कर ले। वे जिन्ना और अल्पसंख्यकों को खुश करने
के लिए भारत का विभाजन करके बहुसंख्यकों को नाराज़ नहीं करते। इसलिए, कांग्रेस को इसे
स्वीकार नहीं करना चाहिए। गांधीजी की बात किसी ने नहीं सुनी। गांधीजी के एक करीबी
सहयोगी लिखते हैं, 'हमारे नेता थके हुए थे और उनकी सोच दूरदर्शी नहीं थी।' कांग्रेस के नेता
आज़ादी मिलने में देरी होने से डरते थे। गांधीजी तो शायद आज़ादी मिलने में देरी भी
कर देते, इस उम्मीद में कि दो आपस में बैरी देशों के रूप में आज़ादी पाने के बजाय, अंततः एक अखंड देश के
रूप में आज़ादी हासिल हो सके।
वर्किंग कमिटी द्वारा भारत के बँटवारे को स्वीकार कर लेने से गांधीजी का यह
एहसास और पक्का हो गया कि दिल्ली के बजाय उनका सही स्थान बिहार और नोआखली में है।
अगर लोग इस बीच एक-दूसरे के साथ शांति से रहना नहीं सीख पाए, तो आज़ादी एक भ्रम ही
साबित होगी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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