आंच-39 (समीक्षा) परश्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविताक्या जग का उद्धार न होगा!
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इस ब्लॉग पर साधना जी अपनी माँ, श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’, की रचनाओं को हम तक पहुँचा रहीं हैं! कहती हैं,
जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा! इस ब्लॉग की कविताएं पढते हुए बरबस यह मन में आता है कि जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा! इस ब्लॉग पर प्रस्तुत कविताओं का अवलोकन एक समृद्ध और जीवंत साहित्यकार की लगभग चौथे दशक से लेकर आठवें/नौवें दशक तक की काव्य-यात्रा से रू-ब-रू होना है। जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ।
4 नवम्बर 1986 को उनका निधन हुआ। यह ब्लॉग और इस पर मां की कविताओं की प्रस्तुति साधना जी और उनकी बहन आशा जी की माँ की सृजनशीलता के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि है!
आज की आंच के लिए हमने चयन किया है श्रीमती ‘किरण’ की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * । कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर जाते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए। कम-से-कम किरण जी की कविता इस तर्क को नकारती है। किरण जी की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * के सरोकार केवल फूल, पत्ते, कलि, उपवन, तितली, भंवरों से ही नहीं, कहीं न कहीं पूरे भूमंडल से जुड़े हैं। कवयित्री `किरण’ सरल और सहज मुहावरे में पिरो कर कठिन समय को कविता में साधती हैं। ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ? कोई भी रचनाकार समय, समाज और परिवेश की उपेक्षा नहीं कर सकता है, क्योंकि जहाँ वह रहता है, जहाँ से वह पलकर बड़ा होता है, मनुष्य बनता है, उनके समस्त क्रियाकलाप, ऊहापोह, घात-प्रतिघात, संघर्ष आदि उनके मस्तिष्क में गुंफित होते हैं। अतः रचनाकार की संघर्षशीलता, जुझारूपन, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों के प्रति चेतना और दिशाबोध, उसे यहीं से मिलते हैं। डॉ. `किरण’ भी अपने समय, समाज और परिवेश की उपज है। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय-फलक पर हताशा है, निराशा है, भूख है, गरीबी है, शोषण है, अशिक्षा है, टूटन है और मोहभंग भी है। मुरझाये फूलों का यौवन आज धूल में तड़प रहा है, काँटों के संग रह जीवन में कितना उसने कष्ट सहा है, किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ? उनकी लेखनी में हम आग और शीतलता आक्रोश और सरलता, निर्भीकता तथा स्पष्टता, भावुकता तथा कठोरता सभी भाव पायेंगे! उनका रुझान समाजपयोगी साहित्य के सृजन की ओर है। कारुणिक, त्रासद, शक्तिहीनों के विकल्प को दर्शाने वाली रचना होते हुए भी यह कविता नये आशावाद की सूचक है और यह आशावाद आने वाली पीढ़ी के जरिये व्यक्त होता है। जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ। ओ माली तेरी बगिया में आ वसंत कब मुस्कायेगा, कब कोकिल आग्रह के स्वर में स्वागत गीत यहाँ गायेगा, क्या तितली भौरों के जीवन में सुख का संचार न होगा ? शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम है। `किरण’ जी एक समर्थ सर्जक हैं। कविता की पंक्तियां कभी सादगी के अंदाज में ताना मारती है....... तो कभी अनुरोध और विनती करती प्रतीत होती हैं तो कभी सांत्वना के स्वर सुनाई पड़ते हैं। मुरझाये फूलों का यौवन आज धूल में तड़प रहा है, काँटों के संग रह जीवन में कितना उसने कष्ट सहा है, किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ? बिल्कुल अपठनीय और गद्यमय होते जा रहे काव्य परिदृश्य पर ..... `किरण’ जी की यह कविता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे कविता की मूलभूत विशेषताओं को प्रयोग के नाम पर छोड़ नहीं देतीं। बेहद संश्लिष्ट इस कविता में उपस्थित लयात्मकता इसे दीर्घ जीवन प्रदान करती है। कविता पढ़ने पर लू में शीतल छाया की सुखद अनुभूति मिलती है। कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज्यादा समकालीन भी। उन्मादिनी हवा ने आकर सूखे पत्तों को झकझोरा, मर्मर कर धरिणी पर छाये सुखद वृक्ष का आश्रय छोड़ा, कुम्हलाई कलियों के उर में क्या जीवन का प्यार न होगा ? इनकी काव्यभाषा सहज है। यह कविता तरल संवेदनाओं से रची गई है, जो दिल से पढे जाने की अपेक्षा रखती है। भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्दों का खूबसूरत चयन, जिनमें सटीक शब्दो का प्राचुर्य है, आकर्षक है। ओ माली तेरी बगिया में आ वसंत कब मुस्कायेगा, कब कोकिल आग्रह के स्वर में स्वागत गीत यहाँ गायेगा, तितली भौरों के जीवन में क्या सुख का संचार न होगा ? कविता महज कवयित्री का बयान भर नहीं है। इसमें कवयित्री की भावनाएं सीधे-साधे सच्चे शब्दों में बेहद ईमानदारी से अभिव्यक्त हुई हैं। कविता इतनी लयात्मक है कि इसे बार-बार पढने का मन करता है। इस कविता में कवयित्री ने प्रकृति का सहारा लेकर अपनी बात कही है। अगर यह कहें कि उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है तो अनुचित नहीं होगा। इस रचना में प्रकृति के बहाने जीवन के मर्म को समझाने की कोशिश की गई है। जैसे ‘अज्ञेय’ का - “दुख हृदय को मांझता है ज़्यादा रगड़ने से बर्तन का मुलम्मा छूट जाता है।” - वैसे ही इस कविता को पढने से भौतिकता की चमक-दमक का मुलम्मा छूट जाता है। लोग नैसर्गिक स्थिति में आ जाते हैं और मन संवेदनशील हो जाता है। जब संवेदना का जल हृदय में डोलता है तो वाणी अवाक हो जाती है। कविता सचमुच विभोर करने वाली है। कविता को पढते वक़्त इसपर ‘बच्चन’ की और उनकी कविता की छाप दिखाई देती है। “इस पार प्रिये मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा?” कुछ लोगों को इसमें शैलीगत कमज़ोरियां दिख सकती है, पर मुझे नहीं दिखती क्योंकि फॉर्म और कंटेंट में बिखराव बिल्कुल नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि यह कविता एकदम ताज़ी है, और आज के ताजा प्रसंगों पर आधारित है, न ही यह कि इन्हें प्रतिमान मानकर आज की हिन्दी कविता के संबंध में कोई निर्णायक बात कही जाय। हाँ, इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने कुछ ऐसी समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचा है, जो आज से 20-25 वर्ष पहले भी थीं, आज भी हैं और तब तक रहेंगी जब तक कि सामंती एवं पूँजीवादी आधारों पर टिकी व्यवस्था खत्म नहीं हो जाती। |
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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
आंच-39 (समीक्षा) पर श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता क्या जग का उद्धार न होगा!
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साधना वैद जी एक संवेदनशील, भावुक और न्यायप्रिय महिला हैं। अपने स्तर पर अपने आस पास के लोगों के जीवन में खुशियाँ जोड़ने की यथासम्भव कोशिश में जुटे रहना उन्हें अच्छा लगता है।
श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ का जन्म 14 अगस्त 1917 को उदयपुर के सम्मानित कायस्थ परिवार में हुआ ! मात्र 6 वर्ष की अल्पायु में ही क्रूर नियति ने उनके सिर से पिता का ममता भरा संरक्षण छीन लिया और यहीं से उनके संघर्षों का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह आजीवन अनवरत रूप से चलता ही रहा !