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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

देसिल बयना - 111 : योगी था सो उठ गया आसन रही भभूत

 
- करण समस्तीपुरी
आधुनिकता का संक्रमण तेजी से फ़ैल रहा था। शहर गावों को लील रहे थे। तथाकथित सभ्यता आत्मीयता को निगल रही थी। प्रत्युपकार को प्रतिद्वंदिता निगल रही थी। प्रोत्साहन की जगह इर्ष्या घर कर रही थी। उदारता की जगह संकीर्णता बढ़ रही थी। प्रातकाली की जगह शीला की जवानी ने ले लिया था और भगतू फ़कीर की झोपरी की जगह थोड़ी सी राख।
धरोहरों के संरक्षण के नाम पर रेवाखंडवासी भगतू फ़कीर के झोपड़ी की राख को अब तक संजोये हुए थे। भगतू फ़कीर और उनकी झोपड़ी का किस्सा भी बहुत पुराना है। ‘परमारथ के कारणे साधुन धरा शरीर’। आह... भगतू बाबा सच्चे साधु थे। परम परोपकारी। कहते हैं कि एक बार ऐसे ही घने कोहरे और जानमारुक शीतलहर के प्रकोप से रेवाखंड को बचाने के लिये अपना झोंपड़ा तक जला दिये थे। लोग अभी तक कहते हैं, “आयी मौज फ़कीर की दिया झोपड़ा फ़ूंक।” आ.. हा.. हा...! दूसरे को बचाने के लिये अपनी झोपड़ी तक जला दिये। बबाजी थे जोगी। सिरिफ़ बिष्टी पहन कर पूस की रात से लड़ लिये। मगर माघ निकला घाघ। बेचारे बाबाजी को पछाड़ दिया।
एक दिन दुपहरिया में सूरुज महराज भुकभुकाए तो रेवाखंड में भी हलचल हुई। कोई अखारा दिश से आ रहा था। कहिस की भगतू बाबा भुइयां लोटे हुए हैं। जीभ बाहेर और आँखे खुली हुई...। अब तो शीत गिरे की पाला...! सब दौड़ा अखारा दिश। फ़टाक से कौनो लोटकन मिसिर को भी साइकिल पर चढ़ा लाया। मगर काल ग्रसत कछु औसध नाही। मिसिर बैद नाड़ी टटोल कर मुरी झुका लिये। कई जोड़ी आँखें गमगीन हो गयी थी। कुछ तो बह भी चलीं।
भगतू फ़कीर के परलोक गमन की खबर उभी स शीतलहर में जंगल के आग की तरह फ़ैल रही थी। देखते-देखते सिरिफ़ रेवाखंड ही नहीं अगल-बगल पाँच गाँव के महतो-मानजन इकट्ठा हो गए। कबीरहा कीर्तन मंडली ढोल-हरमुनिया पर जोर-जोर से निर्गुन गा रहे थे, “लूटल-लूटल-लूटल हो कौन ठगवा नगरिया लूटल हो....!” चंदा-चुटकी करके गांजा-बाजा के साथे उनहि के अखाड़ा पर भगतू बाबा को अग्नि-समाधि दे दी गई।
भगतू फ़कीर नहीं रहे ना ही उनकी झोपड़ी रही। रह गयी थी तो बस उनके चिता की राख। पखारन बाबू के मदद से वही अखाड़े पर एक कुंड बनाकर उनकी राख को संरक्षित कर दिया गया था। साधू का परताप...! भगतू फ़कीर की राख का भी बड़ा महात्म्य था। केस-फ़ौदारी हो कि सुल्लह-सफ़ाई... एक चुटकी राख माथा पर लगा लीजिये, हाकिम का मति जरूर फ़िरेगा। बरतुहारी-घटकैती में जाने से पहिले एक चुटकी भभूत रुमाल में बांध लीजिये, लड़का वाले पाँव लोटेंगे।
शीत ऋतु में तो यह अखाड़ा रेवाखंड के लिये संजीवनी हो जाती थी। रेवाखंड से ठंड भगाने के लिये भगतू बाबा सब कुछ निछावर कर दिये। लोगों का विश्वास था कि उनके राख में भी गरमी थी। एक जुग तक रेवाखंड वही राख तापकर पूस-माघ काट दिया।
उ साल बड़ी विकट समस्या थी। जाड़े की जुआनी जोर पर थी। आलू-मरुआ कौन कहे... उहां तो बड़े-बड़े गाछ-बिरिछ तक में पाला मार दिया था। अखाड़ा पर वाला बुढ़वा पीपल भी झुलस गया था। समय के साथ-साथ भगतू बाबा के भभूत की तासीर भी जाती रही थी। मगर रेवाखंडी विश्वास हिला नहीं था। मारे ठंडी के घर-द्वार में तो कल (चैन) नहीं पड़ता था। उ शीतलहरी में लोग कठुआते हुए अखाड़ा अगोरे रहते थे। शायद जमावरे की वजह से ठंड कुछ कम मालूम पड़ती होगी।
ई हाल सिरिफ़ रेवाखंड का ही नहीं था। आधा देश शीतलहर के भयंकर चपेट में था। सिरिफ़ परलियामिंट में गरमी थी बांकी पूरी दिल्ली में कंपकंपी। पंजाब-हिमाचल में तो लोगों का खून जम रहा था। परदेस कमाने वाले ई हाड़तोड़ ठंडी में देश लौट रहे थे। टहलू कक्का का परिवार भी आ गया था दिल्ली से।
टहलू कक्का के परिवार को गाँव में देखकर लोगों की ठंड और बढ़ गयी थी। अरे तोरी के...! गांती बांधे बुधना चीखा, “हउ देखो... उ के पास तो इंगलिश जाकिट भी है।” मगर टहलू कक्का ओवर-कोट में भी सांझ-सवेरे ठिठुरते रहते थे। जनम-जुआनी तो हुआ रेवाखंड में ही मगर एक जुग से दिल्लीए बसे थे। सपरिवार। तेरे को - मेरे को सुनकर रेवाखंडी ठठा-ठठा हँसते हैं तो कक्का का परिवार कहता है, “ओए...! भुच्च बिहारी है...!”
परदेसी परिवार का गाँव वालों से मेल-मिलाप तो है मगर गाँव के जीवन में घुले-मिले नहीं है। चौपट सिंघ अपना जमाना के मिडिल पास हैं। राज-दरभंगा में मोहरिरी भी कर आये हैं। जब से टहलू कक्का गाँव आये हैं सबसे ज्यादे आन-जान सिंघजी के परिवार में ही है। उ दिन पेठिया से लौटते हुए सिंघजी बतहू मिसिर को कह रहे थे, “रजधानी दिल्ली में रह गए। इडभांस हो गए हैं। गाँव-गँवैती में रमने में टेम लगेगा...। टहलू भाई रम भी जाएं मगर बाल-बच्चा...!”
जो भी हो टहलू कक्का का परिवार पूरे गाँव में चरचा का विषय था। चर्चा का सबसे बड़ा केन्द्र था भगतू फ़कीर का अखाड़ा। दू कारण से। एक तो गाँव भर के मरद-जनानी दुपहर से सांझ यहीं बिताते थे। और दूसरा यह कि टहलू कक्का के परिवार से यहाँ कोई नहीं आता था।
बुधनी माय बोल रही थी, “आकि देखो... क्या ससुर और कि पुतोहिया... आकि... बेटा-बहू...! एक्कहि बोरसी (अंगिठी) सेबे रहते हैं। आकि देखो... दुनिया-जहान में कहीं रहे लोक अपना धरम भूल जाएगा....। आकि देखो वही बोरसी तर धोधुआ हरिजन भी... ! आकि देखो कि सब के सिकरिट का धुआँ साथे उड़ता है...!”
तपेसर झा औरतिया बात में भी टप से टपक जाते हैं। बोले, “उ कि नाम से कि इहां दिल्ली वाली बेहआई खुलेआम नहीं चलेगी न.. इसीलिये घरे घुसे रहते हैं।”
बुलंती बुआ बोल रही थी, “लुत्ती लगे मुँह में... कौनो धरम-करम भी बांकी न रहा...! फ़गुनिया कह रहा था कि दैव-धरम, साधु-फ़कीर भी नहीं बुझता है। लुत्ती लगे... उ दिन अंगारघाट वला बबाजी को कह रहे थे, “एन्ना हट्टा-कट्ठा शरीर है...! कौनो चाकरी काहे नहीं कर लेते....!”
“बाप रे...!” बुलंती बुआ के बात पर छबीली मामी आदतन अपनी लंबी जीभ को दांतो से काट ली थी। तपेसर झा बोले थे, “उ परिवार ओरे से भठियारा है.... कि नाम से कि...!”
अलिजान मियाँ बोले, “अरे उ हाफ़-मैंड है। अबहि रस्ते में हमें रोक कर चाह पिला दिया। बतिया भी रहा था मनगर बात। मगर इहां आने बोले तो कहता है कि धुर्र... उ एक जमाना था। अब क्या है...? ‘योगी था सो उठ गया, आसन रही भभूत।’ न भगतू बबाजी रहे न उनकी धुनी। भगतू बबाजी अपने ठंडी से कठुआकर मर गए... अब उनकी राख सेंके जाड़ा जाएगा...! खों...खों... खों...!’ बताओ साधु-संत का कहीं मरण हो... उनका चोला भले बदलता मगर परभाव तो वही रहता है। हाफ़-मैंड कहीं का....!”
यह पूरी चरचा चौपट सिंघ को रास नहीं आ रही थी। बोले, “ए में हाफ़ मैंड वाली का बात हुई मौलबी साहेब? अरे गलत का कहे टहलू चौबे....? बेचारे भगतू बबाजी रहते थे तो कौनो दुनिया-जहान से जोगार लगा के धुनी रमाये रहते थे...। जब कुछ जोगार नहीं बचा तो बेचारे अपना झोपड़ी तक जला दिये...। तो ठंडी भागती थी उनके करम से।” सिंघ जी कुंड से एक मुट्ठी राख उठाते हुए बोले, “उ तो हम आप एक अंध-बिसबास से इसे अगोरे रहते हैं वरना ई राख खुदे कबकी ठंडी हो गयी...। भले तो कहे टहलू चौबे, ‘योगी था सो उठ गया, आसन रही भभूत।’ अब पुराना प्रभाव तो रहा नहीं। न उ जोगी-भगत रहे न और कौनो उपाय। तो बस उनके नाम पर समय काटे जा रहे हैं।”
बात खतम करते-करते सिंघजी अपना खादी भंडार वाला बड़का चद्दर झटक के कंधे पर रखे और उठ चले...।

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

देसिल बयना – 110 : आयी मौज फ़कीर की, दिया झोंपड़ा फ़ूँक

 

- करण समस्तीपुरी

कहते हैं कि ई दुनिया में सब कुछ अपने समय से चलता है। चलता होगा... चलता रहे! मगर रेवाखंड में दो चीज रेलबी के टाइम से चलता है। एक चरबजिया गाड़ी और दूसरा भगतु फ़कीर का परातकाली भजन। जाड़ा-गर्मी, मेघ-बतास सब दिन।

भगवानपुर देसुआ और अंगार घाट टीसन के बीच पड़ता है रेवाखंड। गाँव के उतरवारी सीमा पर है सुपौली टोला और उसी टोले के बीच से गुजरती है छोटी-लाइन और उसी लाइन पर नित-नियम से चार बजे भोरे गुजरती है जानकी इसपरेस। छुक-छुक-छुक-छुक..... पोंओंओं................! पता नहीं संजोग है कि उपरी हिदायत मगर सुपौली टोला से गुजरते हुए डरेबर भोंपू जरूर बजा देता है।

रेवाखंड में घड़ी और घंटा-घर का कौनो काम नहीं। वही चारबजिया गाड़ी का भोंपू एलारम है। टरेन का भोंपू बंद हुआ कि भगतू फ़कीर की परातकाली शुरू हो जाती है, “हो भोलानाथऽऽऽऽ.... ! कखन हरब दुख मोर....!” रात के आघात से मुर्छित रेवाखंड में नवप्राण का संचार हो जाता है। किसान उठ कर माल-मवेशी को घास-भूसा देते हैं तो मजदूर खेत-पथार की राह लेते हैं। महिलाएं चाह-चुक्का के जुगाड़ में चूल्हा फूँकने की तैय्यारी करती है और बड़े-बुजरूग सीता-राम...राधे-श्याम... हो महादेव कहते हुए पढ़ुए बिद्यार्थियों को पुचकारते हैं, “हौ बटुक...! उठऽ...उठऽ...। यही बखत है असली पढ़ाई का। ब्रहम-बेला में किया गया विद्याभ्यास कभी नहीं भुलाता है... उठऽ.... उठऽ....!”

धान कटाते-झराते ठंडी चरम पर पहुँच गयी। जीव-जंत तो छोड़िये प्रकृति भी एक पहर दिन तक मोटे कोहरे की धुंधली चादर ओढ़े रहती हैं। सूरुज महराज अबसेन्टी मारने लगे हैं। भगतू फ़कीर का घूरा (अलाव) दिनों-दिन बड़ा होता जा रहा है। भगतू बाबा को कौनो रोक-टोक नहीं है। कोई आय न व्यय। किसी के आगे कभी हाथ पसारने का रिकार्ड नहीं है। क्षुधाग्नि ज्यादे भड़की तो मक्के क्च्चा बाल, गेहूँ की बालियाँ, मूली, बथुआ, साग-सब्जी आकि फल-फलहरी... खेती-गाछी किसी की... पेड़-पौधे किसी के... भगतू फ़कीर को तो बस पेट-भरन से काम।

जाड़ा आया तो सरकारी कि पराइविट कौनो सूखा पेड़-टहनी हो दे कुल्हारी। फ़िर धुनी रमा के अपने कमंडल में बिना दूधे के गुर की चाह गरम। गर्मी बढ़ी तो कुआँ से कमंडल में पानी भर-भर बैठ गये सड़क किनारे। वैसे कहने के लिये पीपल गाछ तर एक झोपड़ी थी जो भगतजी की अपनी थी। बांकी आगे नाथ न पीछे पगहा।

“हो भोलानाथऽऽऽऽ.....” के अलाप के साथे लोग देह पर लोई-गिलोई लादे चल पड़ते थे भगतू फ़कीर के घूरा तर। कमंडल में राउंड के राउंड अदरक वाली गुरही चाह गरगरा रहा है। चुक्का धो-धो चढाते रहो। कप का कौनो हिसाब नहीं। कभी-कभी हमलोग भी छोटका कक्का के साथ लग जाते थे। सच्चे लोग कहते थे, भगतू बबाजी के चाह से ठंडी भी हार मानती है।

हार मानती होगी ठंडी...! मगर जवानी में कौन किसकी मानता है। जाड़े की जवानी चढ गयी है। अब तो एक बार कालहुँ सन लरहीं...! जाड़ा के मारे तो बेचारे सूरुज महराज हार मान गए। इधर कई दिनों से गाड़ी गुजरते ही भगतजी परातकाली के बीच-बीच में नाम ले-लेकर टोले-मोहल्ले के लोगों को बुलाते भी हैं। कई नामों को गीत में भी ढालकर परातकालिये के सुर में गाते हैं, “जागहुँ राम, कृष्ण दोऊ मूरत ! दशरथ, नंद, दुलारे....!”

उह्ह्ह्ह..... कट-कट-कट-कट-कट-कट.....! पहर दिन ढल गया था...! भगतू फ़कीर की परातकाली कब की ठंडी हो गयी थी मगर हमलोग रजाइये में दुबके हुए थे। जान-मारुक शीतलहरी। एक बार तो भगतू बबाजी की पुकार पर छोटका कका देह में कंबल लपेटे निकल ही रहे थे कि बाबा डपट दिये, “मार बुरबक...! ई हार कँपाने वाला ठंडी में कहाँ चला है? अब कौनो उ पहिला वला घूरा है... ठंडी मार देगा... ऐंठ जाओगे...! रहो रजाई तर शांति से।

सच्चे तो देश-परिवेश सब बदल रहा था। रेवाखंड में भी ‘मेरा-मेरी’ डिजिज का संक्रमण बड़ी तेजी से फ़ैल रहा था। कल तक पड़ोसी के घर आये अतिथियों के लिये दही भेजकर खुद सूखा खाने वाले लोग अब थाली-बर्तन भी उधार नहीं देते हैं। आजकल भगतू बबाजी भी एकाध दाता-दयाल को छोड़ कर किसी की खेती-गाछी में कदम नहीं रखते हैं। वही दिन तो धैंचा की दो सूखी टहनी काटने को लेकर कितना थूक्कम-फ़जीहत की थी फ़ोकचा की लुगाई। साधु-फ़कीर के भी सात पुरखों का उद्धार हो गया था।

गाँव-टोला के मूलगैन-मानजन मुखिया-सरपंच का परिक्रमा कर रहे हैं। जीप-गाड़ी पर सवार पूरा अमला के साथ बीडीओ साहेब आये थे काली-थान में। जबान दिए थे कि अगिले सांझ से काली-था, भगतू फ़कीर के मठ, गुरुजी के चौबटिया, अखारा, मंदिर पर, मंगल पेठिया, खादी भंडार, ढलानी और अन्य सार्बजनिक जगह पर सरकारी घूरा लगेगा...! जिला कलस्टर को कंबल बाँटने का फ़रियाद भी भेजेंगे...! हफ़्ता दिन गया... न कंबल न घूरा।

गाँव के बाबू-भैय्या भी बड़े कठोर हो गये हैं। शीशम-सखुआ तो छोड़ो लगता है खजूर-बबूर से भी कोठा उठाएंगे। कौनो एक खर देने के लिये तैय्यार नहीं। पूस की शीतलहरी हड्डी भेदने पर लगी है। सब तरफ़ त्राहि-माम! क्या दुखिया क्या सुखिया... सब पर ठंडी की मार।

ठंडी और ‘मेरा-मेरी’ डिजिज की मार सबसे ज्यादे भगतू बबाजी के धुनी पर पड़ी है। जलोधर बाबू से मिला धान का दू-चार झरुआ जला कर बेचारे परातकाली गा लेते थे। फ़्री गुरही चाह ठंढी के बावजूद लोगों की आमद काफ़ी कम हो गई थी।

गाँव में संक्रमण लगे मगर भगतू बबाजी अपने स्वभाव में क्यों संक्रमण लगने दें? दू पहर दिन गए सूरुज महराज झांके थे कोहरे की काली कंबलिया फ़ार के। लोग-वाग सुहुर-सुहुर काम-काज निपटाने लगे। भगतू बबाजी भी बिष्टी पहिरे निकल पड़े अपने काम पर। सबको हरकार रहे हैं, “हौ मरदे...! अरे ठंडी के डर से ऐसे दुबके रेवाखंड...! अपने-घर से एक-एक लकड़ी लेकर आओ आसरम पर...! फिर देखो.... कहाँ गई ठंडी-फ़तुरिया...!”

बाबा कहे थे, “का करें भगतजी...! सब आपहि जैसन निरबिकार सिध नहीं है न...? आप सनियासी हैं... हमलोग गिरहथ...! रसोई खातिर तो लकड़ी पर आफ़त है और...! मने कि न अब उ देवी न उ प्रसाद...! न सरकार कुछ सुने न जमींदार....! न धुनी न धधरा.... ई पूस के पुरबैय्या में कौन जाए हड्डी छेदाने....!” बाबा दहिने हाथ से कंबल का फ़ार बांए कंधे पर फ़ेंकते हुए बोले थे।

बाबा ही क्या पूरा मधकोठी का एही जवाब था। भगतू बबाजी कमंडल का चोंगा मुँह में लगाकर बोले, “कल से जौन कोई घूरा तापे चाहो आसरम पर आ जाओ...! सरकार से उपर भी सरकार है। सब जमींदार का सरदार है...! घूरा-धुनी जरूर लगेगा...! हर-हर महादेव! सब जन अइयो...! हर-हर महादेव!”

छुक-छुक-छुक-छुक.... पोंऽऽऽऽ.....! चारबजिया गाड़ी के भोंपू के साथ ही शुरू हो गया भगतू फ़कीर का “हो भोलानाथऽऽऽऽ.....!” कोहरे को चिरती हुई धान के झट्टे की लौ लुकझुकाने लगी थी। टोलबैय्या धीरे-धीरे ससरने लगे। हम फिर छोटका कक्का के साथ लग गए।

भगतू बबाजी तरे पर तर झरुआ जला रहे थे। खूब जोर धधरा उठ रहा था। मगर कहते हैं न कि ‘अंधा को जागे क्या धधरा को तापे क्या...!’ हनहना कर धधकता था और दुइये मिनिट में फ़ुस्स....! मगर भगतू बबाजी आज लौ को शांत नहीं होने देंगे...! एक के बुझने से पहिलहि दूसरा बोझा तैय्यार है।

एक सन्यासी के परताप से पूस की ठंडी मुँह चुराने लगी थी। देखते-देखते सारा बोझा स्वहा हो गया...! धुँधलके की गहराई जरा भी नहीं कमी थी। लोग-वाग उह-आह.... कट-कट-कट-कट... गिर-गिर-गिर-गिर.... करने लगे...! “ओह...अब चलो रजाइये तर...! ओह.. अब तो रजाई भी ठंडा गई होगी...! आह... बेकारे निकले ई काल के पहरा में...! अरे... बुरबक! उ तो धन के भगतू फ़कीर की घंटो भर के लिये तो देह-हाथ गरमाया....! रजाइयो तरे सिसियाते रहते...!” तरह-तरह की बातें होने लगी। कुछ लोग उठ कर घरमुँहा रस्ता लिये...! कुछ भगतू फ़कीर का मुखदर्शक बने रहे। पता नहीं किस उम्मीद में।

भगतू फ़कीर मिनिट भर सुने। फिर बोले, “मार ससुरी ई ठंडी नट्टिन को...! कौनो कहीं न जाओ...! अरे अबहि बहुत समान पड़ा हुआ है धुनी का। कुछ लोग बढ़ते गए। कुछ पलटे और फिर बढ़ गए। कुछ रुक कर देखने लगे।

भगतू बबाजी आखिरी बचे दो झड़ुए को सुलगाए। सुलगते हुए झड़ुए का एक छोड़ पकड़े। उठाए...! आहि रे तोरी के...! ई बबाजी! पूस में लुक्का-बाती काहे खेल रहे हैं...! मगर भगतू बबाजी तो बढ़ते जा रहे हैं। अरे....! ई क्या किये...! आहि लो...! धू... धू... फ़ट... फ़स्स... धू....! भगतू बबाजी जलता हुआ झट्टा झोपड़ी के बगल में जैसे ही रखे... झोपड़ी धू-धू... फ़ट.. स्वाहा...!

पूरे टोले में रोशनी की तेज लहर दौड़ गयी। लोग-वाग पलटे...! जो अभी तक नहीं आये थे उ भी चिखते-चिल्लाते दौड़े। जगथारी बूढा खाँसते हुए पूछ रहे हैं, “अरे कहाँ परलय आ गया...? सब ई शीतलहरी में कहाँ दौर रहा है...?”

बिसुनी झा बोले, “अरे थारीबाबू...! परलय काहे को आए...! भगतू फ़कीर को मौज आ गया है...!” “मतलब ?” “मतलब क्या...? मतलब कि ‘आयी मौज फ़कीर की दिया झोपड़ा फूँक....!’ गाँव-जवार, सरकार-जमींदार, ठाकुर-ठिकेदार, किसान-गिरहथ सबसे लकड़ी-काठी माँगा...! नहीं कुछ मिला तो अपना झोपड़ा ही जला दिया...। ऐसा भी मुरुख काहीं आदमी हुआ है...! दूसरे को तापने के लिये अपना झोपड़ा जला दिया...! अब मरेगा शीतलहरी में।”

हमरे बाबा भी वहीं खरे थे हमरा हाथ पकड़े। बोले, “अजब जमाना है झाजी...! परोपकारी जीव को आज सब मुरुख ही कहता है...! अरे भगतू सच्चा सनियासी है। दुनिया, मोह-माया से विरक्त। विरक्त आदमी को भला किस चीज की परवाह? झोपड़ा रहे ना रहे... उसे तो औरों को सुख पहुँचाने में मौज आता है। और भले तो आप कहे, ‘आयी मौज फ़कीर की, दिया झोपड़ा फ़ूँक।’ बैरागी आदमी ऐसा ही होता है। अपने धुन में आ जाए तो किसी भी चीज की चिंता नहीं करता। सरबस निछावर कर देता है। बस मौज आनी चाहिये।”

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

देसिल बयना – 109 : गाडर पाली ऊन को, लागी चरन कपास

 

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- करण समस्तीपुरी

भचलू कका का परिवार नगर सूरत से वापस आ गया है रेवाखंड। वैसे तो हर साल आते थे, सिजनल पंछी की तरह मगर ई बरस कुछ जल्दी आ गए। बदलते परिवेश ने मनुस की गत भी क्या कर दी है। बेचारे भचलू कका न देस के रहे न परदेस के। आधा परिवार सूरत में और आधा रेवाखंड में। रेवाखंड में पुश्तैनी खेती गिरहस्थी था। सूरत में भी काफ़ी माल-मवेशी खेती-बारी संजो लिये थे मगर दोनों जगह परवासी।

भचलु कका को नौटंकी बड़ा शौक। सुनते हैं कि कका जवानी में नौटंकी कंपनी के साथे लग गए। बैसाली, बलिया, बिजनौर, गुआलियर, दामोह, महोबा, जूनागढ़, जाम-नगर होते-होते सूरत में आकर बस गए। पाछे आधा परिवार को भी खींच लिये। जुआनी के साथे नौटंकी का शौक जाता रहा और किसानी बढ़ती गई। काफ़ी खेत-पथार अरज लिये थे सूरत में। बाहरी ही सही मगर सूरत के जथगर किसान में गिनती होने लगा भचलू कका का।

वैसे रेवाखंड में माल-मवेशी तो नहीं मगर थोड़-बहुत खेती-पथारी थी। मगर एक सीजन बाढ़ और एक सीजन रौदी... हे भगवान! मारे गए किसान। धीरे-धीरे भचलू कका सारा खेती बटाई लगाकर घरे-घरैने सूरत में जा बसे। साल में दो बार आते थे रेवाखंड। एंह... का शान होता था। भंडार पर वाला जटबा सेठ से भी जादे। गाँव के जमींदार-साहुकार भी गुजरतिया मसालेदार चाह पीने खातिर भचलू कका का दरवाजा अगोरे रहते थे।

और साल गये अगहन आते थे और रबी समेट कर जाते थे। ई दफ़े चढ़ते अगहन आ गए थे। महीना दिन से रेवाखंड मझटोली के कोनिया वाला घर से भी सांझ-सवेरे धुआँ उठने लगा था। मगर ई दफ़े न तो मसालेदार चाह पीने वालों की जमघट रहती थी ना ही कर्ज-उधार याचकों की। गए दिन बटाईदारों से भी चख-चख होती रहती थी। कहाँ एक दिन दानी राज कर्ण और आजकल तो तिनके-तिनके का हिसाब करते हैं। टोला क्या समझिये तो पूरा गाँवे भचलू कका के बदले हुए स्वभाव के अनबेसन (अन्वेषण) में जुटा हुआ था।

वही दिन खेलवना के लुगाई से झोट्टम-झोट्टी का नौबत आ गया। झगड़ा शांत हुआ तो आस-पास के मरद-मेहरारु सब बतिया रहे थे, “मार मुरी... उमर गए बुढौ खबीस कितना हो गया है...! धुर्र जाओ...! पता नहीं कौन हाहि पकड़ लिया है... अरे उ तो आते-जाते खेलवना के हाथ पर सौ-पचास रख देता था और आज धान बरोबर बंटाकर भूस्सा के लिये बट्टीदार से झोट्टम-झोट... जाओ रे कलजुग!

भिरिया वाला ईख लगा हुआ खेत ढोलना से बीचे साल में छीन लिये थे आधा-छिधा तनाजा देकर। जिस दिन पंचैती में फ़ैसला हुआ भचलू कका की आँखे चमक उठी थी। अगले ही दिन से गठिया-बात को दरकिनार कर सांझ-सवेरे अपने भिरिया का चक्कर लगा आते थे। ईंख के मोटापे के साथ-साथ बचलू कका की सहजता भी बढ़ती जा रही थी। अब टोला-मोहल्ला के एकाध लोगों को बुलाने लगे थे मसालेदार चाह पीने के लिये। सबेरे-सबेरे मुर्गा की तरह बांग देते थे, “हौजी माहटर...., बूधन भाई हौ..., ओरे फ़िरंगिया...., आबऽ हौ गंगाधर बाबू.....!”

भचलू कका की सहजता बढ़ने के साथ-साथ ढोलना को छोड़ पूरे टोल की खुशी बढ़ रही थी। उ दिन बाबूजी भी कह रहे थे, “चलो जो भी हो... सांझ-सवेरे कोनटा पर का काईं-कट-कट तो खतम हुआ। बीच फ़सिल में जमीन नहीं छीनना चाहिए मगर भचलू भाई एकदम गुजरतिया पारा के तरह अड़ गए थे। वैसे ढोलना को भी फ़सिल का लागत तो मिलिये गया...।”

खुशी की उमर बहुत कम होती है। उ दिन भोरे-भोर फिर भचलू कका बिकराल रूप धारन किए थे। लगता था कि बतहू महंथ का कपार फ़ोर देंगे। मगर उ में महंथ का क्या दोष? उ तो बेचारे ढांकर बछरा को सांढ़ छोड़ दिये थे। अब खुल्ला सांढ-भैंसा क्या बूझे...? उके लिये तो सभे पबलिक परोपट्टी। दू लग्गा भर ईंख को रौंद दिया था। बहुत समझाने-बुझाने तोख-भरोस देने पर शांत हुए भचलू कका।

दुपहरिये में भंडार पर जाकर गेहुमा को ईंख की रखवारी दे आए। उ भी पहलवान सांझे से तीन हाथ का ब्रहमसोंटा लेकर जुट गया। एंह... हट्ठा-कट्ठा गेहुमा भचलू कका का पुरनका कोट और कनटोप में तो पलटनिया जुआन लग रहा था। सुंघनी अम्मा मतलब कि उकी लुगाई एक नजर उठाकर देखी और फिर घुंघट काढ़ के थुकथुकाने लगी।

गेहुमा को रखवारी देकर भचलू कका भी निचिंत हो गए थे। अब आराम से तीन बखत खाना, पाँच बखत चाह और दोपहरिया में मंगटा हजाम से तारपिन के तेल से रगरौआ मालिस। अब खिलहा-भिरिया हफ़्ता दस-दिन में कभी घूम आते थे।

उधर मांझी टोल में गेहुमा की लुगाई की चलती बढ़ गई थी। गेहुमा को तो कनटोप वाला पलटन का दर्जा ही मिल गया था। पूरे पंदरह टका महीना... दरमाहा भी था। और कुछ उपरी फ़ायदा भी। सुंघनी अम्मा चाहेगी तो सब के माल-मवेशी के लिये घास मिलेगा। और भी कुछ-कुछ....! दूसरे टोले और परोसी गाँव के भी कुछ लोगों का आन-जान भी बढ़ गया था गेहुमा कने। कुछ तो बात थी। टोला-टप्पर में बहुत तरह का गुल-गुल होने लगा था मगर ढोलना आज-कल खुश था।

सांझ ढले से पहिले उ दिन भचलू कका चले गए भिरिया खेत...! ईंख खेत की आड़ से लगी साईकिल देखकर कुछ अचरज हुआ। जब तक कि कुछ समझें एक नौजवान मुँह पर गमछा बांधे साइकिल लेके दौड़ गया। मगर दूसरे तरफ़ दूसरा जुआन धरा गया। कका गेहुमा-गेहुमा चिल्लाए। “मालिक...!” गेहुमा उधर से लोटा डुलाते हुए दौड़ा...! मोकाबिले सारा पोल खुल गया।

सेंध पर पकड़ाया चोर गेहुमा के सन्मुखे रोते-रोते बोल दिया, “मालिक...! ई में हमरा का दोष है....? गाय नयी ब्यायी है। हमतो गेहुमसिंघ से पूछ कर पगारी (ईंख का ऊपरी पत्तेदार भाग) काट रहे थे। उपर से चार अना पैसा भी दिये हैं एडभांस में।” कुछ और नाम भी खुला था।

कुछ घसियारिन भागी गाँव की ओर कुछ बड़ी-बूढ़ी वहीं तमाशा देखने लगी। वही हाल हलवाह-चरवाह का। गाँव में भी बिजली की तरह खबर पहुँची कि भचलू कका के ईंख में दिन-दहारे चोर लग गया है...। लोग-वाग दौड़े। हमलोग तो सबसे अगारिये।

मिसिर जी के परती खेत में भचलू कका चिल्ला रहे हैं... गलिया रहे हैं। चारों तरफ़ से भीड़। भचलू कका के भाई-बंधु तो लगे लाठी-भाला नचाए। उ तो फ़ुदकन राय और मंगनीलाल बीच में घुसकर किसी तरह मामला शांत कराए, “अरे भाई...! हम कहते हैं कि नाम से कि.... कौनो कराइम के लिये कानून है कि नहीं.... अब अपने लठिया-गराँस भांज के मडल (मर्डर) कर दो फिर हरिजल (हरिजन) केस में झुलते रहने...!”

चट-पट खेते में पंचैती बैठ गया। अब जौन ईंख कट चुका था उ जुट तो नहिए सकता है। मगर फ़ैसला हुआ कि बचे हुए ईंख की रखवारी गेहुमा ईमानदारी से करेगा उ भी फ़िरी में। अगर एक्को तना कटा तो डेढ़ सौ रुपैय्या ताजन। अब जौन चोर पकराया उ को भी दंड। भचलू कका को फ़िरी में दूध देगा तीन महीना तक। सब शांति-शांति करा के पंच-पंचैती चले अपने-अपने रास्ते।

सब लोग संतुष्ट थे मगर दो जनें रस्ते-रस्ते भी सुर-संगराम मचा रहे थे। उधर दखिनवरिया पगदंदी पर सुंघनी अम्मा काली-भैरव को अराध रही थी तो इधर उतरवरिया रस्ता पर भचलू कका का गाली पुराण...!

टोल लगाचाए पर और तेज हो गये। महंगी पांडे पूछे तो और रगा-रगा कर गाने लगे, “हौ महँगी बाबू...! अपने जलमधरती पर जुलुम हौ....! लुट गए हौ बाबू...! परदेस में घाटा खाकर देस आए... और इहां इ अत्ताचार...! साल भर का पूँजी गया महिसिया के पेट में...! कट्ठा भर का ईंख काट लिया हौ....!”

“अरे मगर आप तो पलटनिया रखवार रखे हुए थे....!” महंगी पांडे का मुँह खुला रह गया। भचलू कका की दहार फिर शुरु हुई, “वही बात तो हुआ हौ बाबू...! ‘गाडर पाली ऊन को, लागी चरन कपास!’ रखवार रखे कि सांढ-भैंसा से बचाएगा... वही दिन-देखारे घसवाह लगा के कट्ठा-कट्ठा भर ईंख कटवा दिया हौ बाबू।”

मंगनी पांडे एक लंबा सा ‘हूँ....’ किए। फिर पूछे, “ओहोहो...! किसी का भरोसा नहीं रहा कका...! मगर ई ईंख में कपास कहाँ से आ गया?”

भचलू कका वहीं पांडेजी के बंसही मचान पर बैठकर किस्सा कहने लगे तो भीड़ भी वहीं रुक गयी। “हौ बाबू...! वही करम की मार...! जौन मार किस्मत ने सूरत में मारा वही रेवाखंड में। दोनो एक्कहि कहानी है हो...!”

“सूरत में सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। पंड्डह साल खूब कपास उपजाए। खूब कमाए। उ तो उहां से इहां तक जाहिर है। इधर कुछ दिन से कपास का मांग कम हो गया। परदेस में कमाई नहीं हो तो कैसे रहें...? अपना तबेला था ही। तोहरी काकी के लाख बिरोध को काटकर गाडर (भेंड़ का झुंड) पाल लिये। नहीं सूत तो ऊन। ऊनी कपड़ा का तो मारकिट में खूब डिमान है।” मंगनी पांडे और एकाध लोग बीच-बाच में ‘ऊँऊँ...’ ‘हूँ...’ ‘ओ...’ किए जा रहे थे। कभी-कभार उपर-नीचे माथा हिला देते थे।

कका कह रहे हैं, “हौ बाबू...! गाडर पालके खुशी... चलो ई साल ऊन बेचकर पछिला दोनों साल का रिकभरी हो जाएगा। खेती से सारा ध्यान हटा कर भेंड़ पर लगा दिये। तीन-तीन गरेरिया को गाडर की नौकरी पर रखे। साफ़-सफ़ाई, सम्फ़ू-कंघी...! सुरूज निकलने से पहिलहि बाद में चरने छोड़ देते थे।”

“बौआ... खुशी चार दिन के मेहमान! कपास फूलने का टेम आया तो एकदिन गए उ दिश। हौ बाबू...! कलेजा बैठ गया। अगल-बगल सब का खेत हरियर...! हमरे पट्टी में ई बड़का झुंड...! ससुर गरेरिया कात-किनार में बैठकर तमाखू पी रहा है और इधर गाडर सब कपास को चर-चर के खुटिया दिया...!”

“हौ बाबू...! किसी तरह कलेजा थाम के घर आए। रोते-बिलखते तोहरी काकी को कहे...! उका हिरदय और बैठ गया..! दो मिनिट हमरे निहारती रही फिर चंडी के तरफ़ फ़ुंफ़कार उठी। अब हुआ न...! हम कहते थे...कि जौन काम है वही करो...! कपास का बीज बदल दो...! हाइबिरिज (हायब्रिड) वला लत्ती लगाओ...! मगर नहीं...! बाबू साहेब गाडर पालेंगे...! ऊन बेचेंगे...! अब लो...! ‘गाडर पाली ऊन को, लागी चरन कपास!’ बेचो घड़ीघंट। ऊन बेचकर जादे मुनाफ़ा कमाने के लिये गाडर (भेंड़) पाले। ऊन तो हुआ नहीं उल्टे जो भी कपास था उहो चर गया....!”

श्रोताओं ने फिर से लंबा सा ‘हूँ...’ कहा था। कका माथे में बंधी गमछी से आँख-मुँह पोछकर फिर कहने लगे, “उ तो परदेस में जनावर ने नुकसान किया.. इहां अपना देस में ई गेहुमा...! उहाँ गाडर पाले ऊन के लिये, तो कपासे को चर कर दरिद्र कर दिया... और इहाँ रखवार रखे ईंख को सांढ़-भैंसा से बचाने के लिये तो आदमी के हाथों ही बेचने लगा...! क्या करेंगे बाबू...! एहि किस्मत है। अधिक लाभ की उम्मीद से काम करते हैं और हो जाता है उल्टा नुकसान।”

कहानी कहने के बाद भचलू चचा के ललाट पर संतोष की कुछ रेखाएं उभरी थी।