बुधवार, 28 दिसंबर 2011

देसिल बयना - 111 : योगी था सो उठ गया आसन रही भभूत

 
- करण समस्तीपुरी
आधुनिकता का संक्रमण तेजी से फ़ैल रहा था। शहर गावों को लील रहे थे। तथाकथित सभ्यता आत्मीयता को निगल रही थी। प्रत्युपकार को प्रतिद्वंदिता निगल रही थी। प्रोत्साहन की जगह इर्ष्या घर कर रही थी। उदारता की जगह संकीर्णता बढ़ रही थी। प्रातकाली की जगह शीला की जवानी ने ले लिया था और भगतू फ़कीर की झोपरी की जगह थोड़ी सी राख।
धरोहरों के संरक्षण के नाम पर रेवाखंडवासी भगतू फ़कीर के झोपड़ी की राख को अब तक संजोये हुए थे। भगतू फ़कीर और उनकी झोपड़ी का किस्सा भी बहुत पुराना है। ‘परमारथ के कारणे साधुन धरा शरीर’। आह... भगतू बाबा सच्चे साधु थे। परम परोपकारी। कहते हैं कि एक बार ऐसे ही घने कोहरे और जानमारुक शीतलहर के प्रकोप से रेवाखंड को बचाने के लिये अपना झोंपड़ा तक जला दिये थे। लोग अभी तक कहते हैं, “आयी मौज फ़कीर की दिया झोपड़ा फ़ूंक।” आ.. हा.. हा...! दूसरे को बचाने के लिये अपनी झोपड़ी तक जला दिये। बबाजी थे जोगी। सिरिफ़ बिष्टी पहन कर पूस की रात से लड़ लिये। मगर माघ निकला घाघ। बेचारे बाबाजी को पछाड़ दिया।
एक दिन दुपहरिया में सूरुज महराज भुकभुकाए तो रेवाखंड में भी हलचल हुई। कोई अखारा दिश से आ रहा था। कहिस की भगतू बाबा भुइयां लोटे हुए हैं। जीभ बाहेर और आँखे खुली हुई...। अब तो शीत गिरे की पाला...! सब दौड़ा अखारा दिश। फ़टाक से कौनो लोटकन मिसिर को भी साइकिल पर चढ़ा लाया। मगर काल ग्रसत कछु औसध नाही। मिसिर बैद नाड़ी टटोल कर मुरी झुका लिये। कई जोड़ी आँखें गमगीन हो गयी थी। कुछ तो बह भी चलीं।
भगतू फ़कीर के परलोक गमन की खबर उभी स शीतलहर में जंगल के आग की तरह फ़ैल रही थी। देखते-देखते सिरिफ़ रेवाखंड ही नहीं अगल-बगल पाँच गाँव के महतो-मानजन इकट्ठा हो गए। कबीरहा कीर्तन मंडली ढोल-हरमुनिया पर जोर-जोर से निर्गुन गा रहे थे, “लूटल-लूटल-लूटल हो कौन ठगवा नगरिया लूटल हो....!” चंदा-चुटकी करके गांजा-बाजा के साथे उनहि के अखाड़ा पर भगतू बाबा को अग्नि-समाधि दे दी गई।
भगतू फ़कीर नहीं रहे ना ही उनकी झोपड़ी रही। रह गयी थी तो बस उनके चिता की राख। पखारन बाबू के मदद से वही अखाड़े पर एक कुंड बनाकर उनकी राख को संरक्षित कर दिया गया था। साधू का परताप...! भगतू फ़कीर की राख का भी बड़ा महात्म्य था। केस-फ़ौदारी हो कि सुल्लह-सफ़ाई... एक चुटकी राख माथा पर लगा लीजिये, हाकिम का मति जरूर फ़िरेगा। बरतुहारी-घटकैती में जाने से पहिले एक चुटकी भभूत रुमाल में बांध लीजिये, लड़का वाले पाँव लोटेंगे।
शीत ऋतु में तो यह अखाड़ा रेवाखंड के लिये संजीवनी हो जाती थी। रेवाखंड से ठंड भगाने के लिये भगतू बाबा सब कुछ निछावर कर दिये। लोगों का विश्वास था कि उनके राख में भी गरमी थी। एक जुग तक रेवाखंड वही राख तापकर पूस-माघ काट दिया।
उ साल बड़ी विकट समस्या थी। जाड़े की जुआनी जोर पर थी। आलू-मरुआ कौन कहे... उहां तो बड़े-बड़े गाछ-बिरिछ तक में पाला मार दिया था। अखाड़ा पर वाला बुढ़वा पीपल भी झुलस गया था। समय के साथ-साथ भगतू बाबा के भभूत की तासीर भी जाती रही थी। मगर रेवाखंडी विश्वास हिला नहीं था। मारे ठंडी के घर-द्वार में तो कल (चैन) नहीं पड़ता था। उ शीतलहरी में लोग कठुआते हुए अखाड़ा अगोरे रहते थे। शायद जमावरे की वजह से ठंड कुछ कम मालूम पड़ती होगी।
ई हाल सिरिफ़ रेवाखंड का ही नहीं था। आधा देश शीतलहर के भयंकर चपेट में था। सिरिफ़ परलियामिंट में गरमी थी बांकी पूरी दिल्ली में कंपकंपी। पंजाब-हिमाचल में तो लोगों का खून जम रहा था। परदेस कमाने वाले ई हाड़तोड़ ठंडी में देश लौट रहे थे। टहलू कक्का का परिवार भी आ गया था दिल्ली से।
टहलू कक्का के परिवार को गाँव में देखकर लोगों की ठंड और बढ़ गयी थी। अरे तोरी के...! गांती बांधे बुधना चीखा, “हउ देखो... उ के पास तो इंगलिश जाकिट भी है।” मगर टहलू कक्का ओवर-कोट में भी सांझ-सवेरे ठिठुरते रहते थे। जनम-जुआनी तो हुआ रेवाखंड में ही मगर एक जुग से दिल्लीए बसे थे। सपरिवार। तेरे को - मेरे को सुनकर रेवाखंडी ठठा-ठठा हँसते हैं तो कक्का का परिवार कहता है, “ओए...! भुच्च बिहारी है...!”
परदेसी परिवार का गाँव वालों से मेल-मिलाप तो है मगर गाँव के जीवन में घुले-मिले नहीं है। चौपट सिंघ अपना जमाना के मिडिल पास हैं। राज-दरभंगा में मोहरिरी भी कर आये हैं। जब से टहलू कक्का गाँव आये हैं सबसे ज्यादे आन-जान सिंघजी के परिवार में ही है। उ दिन पेठिया से लौटते हुए सिंघजी बतहू मिसिर को कह रहे थे, “रजधानी दिल्ली में रह गए। इडभांस हो गए हैं। गाँव-गँवैती में रमने में टेम लगेगा...। टहलू भाई रम भी जाएं मगर बाल-बच्चा...!”
जो भी हो टहलू कक्का का परिवार पूरे गाँव में चरचा का विषय था। चर्चा का सबसे बड़ा केन्द्र था भगतू फ़कीर का अखाड़ा। दू कारण से। एक तो गाँव भर के मरद-जनानी दुपहर से सांझ यहीं बिताते थे। और दूसरा यह कि टहलू कक्का के परिवार से यहाँ कोई नहीं आता था।
बुधनी माय बोल रही थी, “आकि देखो... क्या ससुर और कि पुतोहिया... आकि... बेटा-बहू...! एक्कहि बोरसी (अंगिठी) सेबे रहते हैं। आकि देखो... दुनिया-जहान में कहीं रहे लोक अपना धरम भूल जाएगा....। आकि देखो वही बोरसी तर धोधुआ हरिजन भी... ! आकि देखो कि सब के सिकरिट का धुआँ साथे उड़ता है...!”
तपेसर झा औरतिया बात में भी टप से टपक जाते हैं। बोले, “उ कि नाम से कि इहां दिल्ली वाली बेहआई खुलेआम नहीं चलेगी न.. इसीलिये घरे घुसे रहते हैं।”
बुलंती बुआ बोल रही थी, “लुत्ती लगे मुँह में... कौनो धरम-करम भी बांकी न रहा...! फ़गुनिया कह रहा था कि दैव-धरम, साधु-फ़कीर भी नहीं बुझता है। लुत्ती लगे... उ दिन अंगारघाट वला बबाजी को कह रहे थे, “एन्ना हट्टा-कट्ठा शरीर है...! कौनो चाकरी काहे नहीं कर लेते....!”
“बाप रे...!” बुलंती बुआ के बात पर छबीली मामी आदतन अपनी लंबी जीभ को दांतो से काट ली थी। तपेसर झा बोले थे, “उ परिवार ओरे से भठियारा है.... कि नाम से कि...!”
अलिजान मियाँ बोले, “अरे उ हाफ़-मैंड है। अबहि रस्ते में हमें रोक कर चाह पिला दिया। बतिया भी रहा था मनगर बात। मगर इहां आने बोले तो कहता है कि धुर्र... उ एक जमाना था। अब क्या है...? ‘योगी था सो उठ गया, आसन रही भभूत।’ न भगतू बबाजी रहे न उनकी धुनी। भगतू बबाजी अपने ठंडी से कठुआकर मर गए... अब उनकी राख सेंके जाड़ा जाएगा...! खों...खों... खों...!’ बताओ साधु-संत का कहीं मरण हो... उनका चोला भले बदलता मगर परभाव तो वही रहता है। हाफ़-मैंड कहीं का....!”
यह पूरी चरचा चौपट सिंघ को रास नहीं आ रही थी। बोले, “ए में हाफ़ मैंड वाली का बात हुई मौलबी साहेब? अरे गलत का कहे टहलू चौबे....? बेचारे भगतू बबाजी रहते थे तो कौनो दुनिया-जहान से जोगार लगा के धुनी रमाये रहते थे...। जब कुछ जोगार नहीं बचा तो बेचारे अपना झोपड़ी तक जला दिये...। तो ठंडी भागती थी उनके करम से।” सिंघ जी कुंड से एक मुट्ठी राख उठाते हुए बोले, “उ तो हम आप एक अंध-बिसबास से इसे अगोरे रहते हैं वरना ई राख खुदे कबकी ठंडी हो गयी...। भले तो कहे टहलू चौबे, ‘योगी था सो उठ गया, आसन रही भभूत।’ अब पुराना प्रभाव तो रहा नहीं। न उ जोगी-भगत रहे न और कौनो उपाय। तो बस उनके नाम पर समय काटे जा रहे हैं।”
बात खतम करते-करते सिंघजी अपना खादी भंडार वाला बड़का चद्दर झटक के कंधे पर रखे और उठ चले...।

14 टिप्‍पणियां:

  1. मगर काल ग्रसत कछु औसध नाही।
    पाठक को बांधे थामे चलती है यह कथा तीसरी कसम का भोलापन लिए .

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  2. Karan ji..e bar to aap aisan aisan shabd ka istemal kiye hai jo humre upare se chala gaya...chaliye kono bat ni desil bayna samjh mai to thoda thoda aaiye gaya hai...ketna swarthi hai jamana bhagtu baba k tyag ko samjhiye ni pa raha :(

    Waise e sab jo naam(पखारन बाबू,बुधनी माय,बुलंती बुआ,छबीली मामी,तपेसर झा) likha hai apne bahute pasand aaya khaskar टहलू कक्का..pahile to sochte the ki eho sab kono nam hota hogo ..lakn rewakhand mai rahne k bad pata chala ki e sab naam to sacho ka hota hai..

    Vartman samay mai logon ki soch ko darsha gaya aj ka ye desil bayna..dhanyabad :)

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  3. बहुत सरस बयना...आनंद आ गया....चरित्रों का चित्रण बेजोर है...

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  4. अब हमसे त फोर्मेलिटी वाला बात कहले नहीं जाता है... पहिला बात आपका सैली के बारे में कहेंगे आज... एक बार फिर से पढकर देखिये.. कहाँ कहाँ आपका लेखनी दिल्ली का गाड़ी धार लिहिस है अऊर कहाँ कहाँ रेबाखंड में बिचरण करके आया है.. हमको तो "आधा फागुन आधा जून" टाइप का बुझा रहा है!!
    बाकी बयना तो बास्तव में मन को छूने बाला है.. बताइये कल तक ओही झोंपडा में पूरा गाँव आग ताप रहा था, आज ओही भगत जी का भभूती भी ठंडा बुझाने लगा.. ऐसा भगत लोग का पुन्न परताप ई लोग नहीं समझ सकता है.. एगो शायरी याद आ गया.. कहिये देते हैं:
    बे-ख्याली में कहीं उंगलियां जल जायेंगी,
    राख गुज़ारे हुए लम्हों की कुरेदा न करो!!

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  5. देसिल-बयना का यह किस्सा अच्छा लगा।

    योगी के जाने के बाद उसके आसन की धूल भी बहुत कुछ कहती है।

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  6. भाषा वाली बात पर तो सलिल भाई पहले ही बाजी मार ले गए। अब वही दोहराने का कोई मतलब नहीं है न।

    देसिल बयना का यह अंक पिछले वाले अंक की ही शृंखला बन गया है, वही भगतू फकीर की कथा को आगे बढ़ाता हुआ। वर्तमान की मनोवृत्ति को प्रकाशित करते हुए एक नए देसिल बयना से जोड़ गया यह अंक।

    अति सुन्दर।

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  7. समय का बदलाव हुआ तो सब कुछ बद्लना लाजिमी है, चाहे भाषा हो या हो विचार-व्यवहार!

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  8. प्रातकाली की जगह शीला की जवानी ने ले लिया था ।

    भाई , करण समस्तीपुरी जी ,
    आज कल हम जैसे बुढ़उ लोग भी ठंडा के समय में गरम कपड़ा नही पहन रहे हैं । बहुत लोगों को भी इस मौसम में किसी की याद आती है एवं उन्हीं यादों के सहारे शीत के मौसम में भी अपने आपको उष्ण रखने की कोशिश करते रहने में काल्पनिक उड़ान भरते रहते हैं । आप जानते ही नही हैं कि हम जैसे लोग जवान लोगन के ई संदेश दे रहे हैं कि उन लोगों से भी हम जवान हैं । कोई बात नही है, जवान रहना नीमन बात है, लेकिन 'शीला की जवानी' और "मुन्नी बदनाम हई"......जईसन गाना सुनला के बाद "सियाचीन ग्लेसियर" जहाँ आज - 50 डिग्री सेल्सियस तापक्रम बा आपन देश के जवान लोग सीमा पर कान में EAR PHONE लगा के देश के सुरक्षा में हरदम सक्रिय रूप से आपन सैनिक के भूमिका के निर्बाह कर रहल बाड़न । हमरा और आप या और लोगन खातिर :शीला की जवानी" और मुन्नी बदनाम हुई........ के कवनो महत्व नईखे लेकिन समय मिले तो आपन देश के कौनो सैनिक के बात सुनब तब आपके समझ में आई कि शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम हुई फौजी लोगन खातिर कतना लोकप्रिय. बाडी लोग । हमार तरफ से उनका लोगन के प्रति मन में बहुत बडा स्थान बा । ई गीत कौनो अश्लील नईखे काहे कि छोट से लेकर बड़ के भीतर भी एकर जगह बन गईल बा । आपके पोस्ट शुरू से ही रूचिकर लागेला ,काहे कि ई पोस्ट हमनी के देश और माटी से जुडुड़ल रहेला । धन्यवाद ।

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  9. इस पोस्ट का श्रम सार्थक हुआ जान पड़ा। आप सभी मेरे प्रेरणास्रोत हैं और मार्गदर्शक भी। मैं हृदय से आपका सम्मान करता हूँ। धन्यवाद !

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  10. देसिल बयना अच्छा है। पर थोड़ी शैली बदल गयी और वर्णन में एकरूपता नहीं आ पायी है।

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  11. ये श्रुंखला क्यों बंद हो गयी ... बढ़िया लगता था देशज शब्दों और देसी वातावरण को पढने का आनंद.

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