शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

शिवस्वरोदय – 72


शिवस्वरोदय – 72
आचार्य परशुराम राय

आज शिवस्वरोदय समाप्त हो रहा है। प्रारम्भिक नौ-दस अंकों में स्वरोदय विज्ञान के मूलभूत तथ्यों को स्पष्ट करने के बाद मन में आया था कि इस विषय पर उपलब्ध अत्यन्त प्राचीन ग्रंथ शिवस्वरोदय को हिन्दी और अंग्रेजी में भावार्थ सहित ब्लॉग जगत में उतारा जाय। इसके अनुवाद में यत्र-तत्र त्रुटियाँ पोस्ट होने के बाद ध्यान में आयीं, कहीं हिन्दी में, तो कहीं अंग्रेजी में। अतएव कोशिश की जाएगी कि उन त्रुटियों को दूर किया जाय।

इस कार्य में कई ग्रंथों और मित्रों से सहायता ली है, विशेषकर अपने बाल सखा श्री सुरेन्द्रनाथ राय, श्री मनोज कुमार एवं श्री हरीश प्रकाश गुप्त की। अतएव उन सभी ग्रंथकारों और मित्रों का मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। उन सभी पाठकों का मैं आभारी हूँ, जिन्होंने इसे पूरा करने में अपनी प्रतिक्रियाओं से मुझे प्रोत्साहित किया। विघ्नविनाशक भगवान गणेश, जगद्गुरु और इस विद्या के आदि प्रवक्ता भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा सर्वोपरि है, जिससे यह कार्य आज पूरा हो सका है।

इस ब्लॉग पर इसके प्रकाशन की अनुमति देने के लिए मैं आदरणीय श्री मनोज कुमार जी को हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ और इस ब्लॉग को बहूपयोगी बनाने के लिए उन्हें हृदय से बधाई देता हूँ।

इस ग्रंथ के समाप्त होने के बाद भी इस विद्या की कुछ ऐसी बातों की ओर संकेत करते हुए, जिनका उपयोग एक सामान्य व्यक्ति के लिए दैनिक जीवन में उपयोगी हो सकता है या इस विद्या की साधना गुरु के मिलने तक कैसे जारी रखी जा सकती है, इस पर एक समापन अंक और लिखा जायगा। कुछ पाठकों के मन में ऐसे प्रश्न थे, जिन्हें समय-समय पर वे प्रतिक्रिया के रूप में व्यक्त करते रहें हैं, उनपर भी अपनी बुद्धि के अनुसार स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा।

नाडीत्रयं विजानाति तत्त्वज्ञानं तथैव च।
नैव तेन  भवेत्तुल्यं  लक्षकोटिरसायनम्।।391।।

भावार्थ – तीन नाडियों और पाँच तत्त्वों का जिन्हें सम्यक ज्ञान होता है, उन्हें समग्र ज्ञान हो जाता है। विभिन्न प्रकार की औषधियों, जड़ी-बूटियों अथवा अनेक प्रकार के रसायनों का ज्ञान भी उनकी बराबरी नहीं कर सकता। तीन नाड़ियों और पाँच तत्त्वों के ज्ञाता को इन चीजों की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि वह इनकी सहायता से सब कुछ करने में समर्थ होता है, यहाँ तक कि मृत्यु को भी पराजित करने में सक्षम होता है।

English Translation – A person, who has perfected in the knowledge of three Nadis (channel)- Ida, Pingala and Sushumna; and five Tattvas- earth, water, fire, air and ether, he possesses perfect knowledge. The knowledge of medicine and medicinal plants, chemical drugs etc. cannot be compared to this knowledge. The person well versed in this knowledge never needs these things in his life. Because he is capable to do all the things with the help of knowledge he possesses, even he defeats the death.  

एकाक्षरप्रदातारं       नाडीभेदविवेचकम्।
पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा चानृणी भवेत्।।392।।

भावार्थ – इस प्रकार के ज्ञान से सम्पन्न महात्मा यदि आपको इस विद्या का थोड़ा ज्ञान भी देता है, तो इससे बढ़कर इस विश्व में कुछ भी नहीं है तथा उसके ऋण से कभी भी उऋण नहीं हो सकते।

English Translation – A saint, who is competent in this science, gives a minor instruction to some in this field, he is lucky enough. Because nothing is more valuable in this world than the knowledge of what has been given.

स्वरतत्त्वं तथा युद्धे देविवश्यं स्त्रियस्तथा।
गर्भाधानं च रोगश्च कलाख्यनं तथोच्यते।।393।।

भावार्थ –  भगवान शिव कहते हैं कि हे देवि, युद्ध, स्त्री-वशीकरण, गर्भाधान, व्याधि एवं मृत्युकाल के परिप्रेक्ष्य में मैंने तुम्हें स्वर और तत्त्वों का वर्णन किया है।
English Translation – Lord Shiva told Goddess that he has described Swara and Tattvas with reference to war, hypnotizing of women, proper way of conceiving a child, diseases and death timing.

एवं प्रवर्तितं लोके प्रसिद्धं सिद्धयोगिभिः।
चन्द्रार्कग्रहणे जाप्यं पठतां सिद्धिदायकम्।।394।।

भावार्थ – इस संसार में सिद्धों और योगियों द्वारा प्रसिद्ध ज्ञान का प्रवर्तन किया गया है, उसका जो नियम-पूर्वक जप और पाठ करेगा तथा पालन करेगा, विशेषकर सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय, तो वह सिद्धिदायक होगा और उससे साधक को पूर्णत्व प्राप्त होगा।

English Translation – If the knowledge invented by the great Yogis and Siddhas in the world is practiced and studied regularly as per instruction therein, especially during the period of solar and lunar eclipse, the practitioner gets yogic accomplishments and becomes perfect.

स्वस्थाने तु समासीनो निद्रां चाहारमल्पकम्।
चिन्तयेत्परमात्मानं यो वेद स भवेत्कृती।।395।।

भावार्थ – जो व्यक्ति अपने स्थान पर बैठकर परमात्मा का ध्यान करता है, अधिक नहीं सोता तथा मिताहारी (कम भोजन करनेवाला) है और उसे जानता है, वही कर्मशील होता है।

English Translation – A person who meditate on  the cosmic consiousness by sitting in his  convenient posture, takes less sleep and less food,  only knows him and he is the real man of action.

7 टिप्‍पणियां:

  1. यह समय इस ब्लाग का स्वर्ण-काल है। नित नये मील-स्तंभ। कल आँच का शतक (प्रतिक्रिया नहीं दे पाने के लिये क्षमाप्रार्थी) और आज लगभग डेढ़ वर्षों से प्रति शुक्रवार नियमित चल रहे ’शिव-स्वरोदय’ का निस्तार। शिव-स्वरोदय इस ब्लाग की अमूल्य थाती है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अन्तरजाल जगत में इस पुरातन विद्या पर इतनी व्यापक सामग्री अन्यत्र नहीं मिलेगी।

    आज जबकि पाठकों में अस्थिरता अधिक और सतहीपन कम होने लगा है, ’शिव-स्वरोदय’ जैसे विषय पर इतने मनोयोग से लिखना और पाठकों की सुविधा अनुसार उसके सूत्रों की हिन्दी एवं अँग्रेजी में व्याख्या... यह आचर्यवर के वश की बात ही हो सकती है। इसका अध्ययन, मनन,प्रस्तुती कितना श्रमसाध्य होगा...!

    इसके लिये महज ‘धन्यवाद’पर्याप्त नहीं होगा। मैं श्री आचार्यजी को सादर नमन करता हूँ। और इस प्रतीक्षा में हूँ कि आगामी शुक्रवार से भी एक नये युग का आरम्भ हो।

    अभिनंदन ! आभार !! आग्रह !!!

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  2. Sir have u realised all five elements ??
    can u elaborate more your experience regarding the `tatva'

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी अनमोल राय की अपेक्षा करती है हमारी यह पोस्ट-
    http://shalinikikalamse.blogspot.com/2011/12/blog-post.html

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  4. इस श्रृंखला ने हिंदी ब्लॉग जगत में एक इतिहास रचा है जिसके लिए आचार्य परशुराम जी के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा !
    आभार !

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  5. यह सारा ज्ञान और शास्त्र हमसे छिपा था, आचार्य जी के प्रयास से यह हमें पुनः उपलब्ध हो पाया है.. आभार!!

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