सोमवार, 12 दिसंबर 2011

शरद का चांद

शरद का चांद

Sn Mishraश्यामनारायण मिश्र

Indian-motifs-59एक चुल्लू चांदनी भी पी नहीं पाए

रात  भर छलका   शरद का चांद।

मन भ्रमर दुबका रहा संशय तले

रात भर महका   शरद का चांद।

 

क्या नहीं बीती, घटा क्या क्या नहीं

जंगलों   से हम गुजर कर आ रहे,

भर न पाए एक गहरा घाव भी

रात भर पिघला   शरद का चांद।

 

अस्मिता जिसमें झुलसकर रह गई

यह  किसी  से दूरियों की  है जलन।

भाप   जैसी   चांदनी   तिरती   रही

रात  भर  उबला   शरद   का   चांद।

 

अनछुई इच्छा अंगुलियों की रही

मौन  गुंबद  ताज के हिलते रहे।

थरथराकर झोल से हम रह गए

रात भर मचला शरद का चांद।

 

सामने प्याला अधर में प्यास थी

और   हम  ठहरे  हुए  मजबूर  से।

बांह  तो   फैली  प्रतीक्षा   में  रही

रात भर फिसला  शरद का चांद।

17 टिप्‍पणियां:

  1. सामने प्याला अधर में प्यास थी

    और हम ठहरे हुए मजबूर से।

    बांह तो फैली प्रतीक्षा में रही

    रात भर फिसला शरद का चांद।

    ग़ज़ब की प्रस्तुति,
    वाह.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अस्मिता जिसमें झुलसकर रह गई

    यह किसी से दूरियों की है जलन।

    भाप जैसी चांदनी तिरती रही

    रात भर उबला शरद का चांद।

    सुन्दर पंक्तियाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक और शानदार
    और
    प्रभावी प्रस्तुति ||
    बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. अस्मिता जिसमें झुलसकर रह गई
    यह किसी से दूरियों की है जलन।
    भाप जैसी चांदनी तिरती रही
    रात भर उबला शरद का चांद।
    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनछुई इच्छा अंगुलियों की रही

    मौन गुंबद ताज के हिलते रहे।

    थरथराकर झोल से हम रह गए

    रात भर मचला शरद का चांद।

    .....उत्कृष्ट भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक चुल्लू चांदनी भी पी नहीं पाए

    रात भर छलका शरद का चांद।

    मन भ्रमर दुबका रहा संशय तले

    रात भर महका शरद का चांद।

    बहुत सुंदर रचना ......

    उत्तर देंहटाएं
  7. chaand lubhaa kar chala gaya hum haath malte rah gaye
    bahut hi sundar jajbaat bahut khoob.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  9. waah behtreen bahut hee umdaa rachnaa ..maza aagaya padh kar abhaar....samay milekabhi to zarur aaiyegaa meri post par aapk svagat haihttp://mhare-anubhav.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  10. सामने प्याला अधर में प्यास थी
    और हम ठहरे हुए मजबूर से।
    बांह तो फैली प्रतीक्षा में रही
    रात भर फिसला शरद का चांद।

    bahut sunder prastuti.

    उत्तर देंहटाएं
  11. सामने प्याला अधर में प्यास थी

    और हम ठहरे हुए मजबूर से।

    बांह तो फैली प्रतीक्षा में रही

    रात भर फिसला शरद का चांद।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बांह तो फैली प्रतीक्षा में रही
    रात भर फिसला शरद का चांद।

    वाह! खुबसूरत खयालात.....
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  13. बांह यूं ही फैली रहे, चांद आयेगा देर सबेर उनमें!

    उत्तर देंहटाएं
  14. हल्के फुल्के तथा जन साधारण को सहज ही समझ आ जाने वाले शब्दों से सजा यह गीत मन की वीणा के तारों को झंकृत कर जाता है। मनोज जी, आ. श्याम नारायण जी के इस गीत को पढ़वाने के लिए बहुत बहुत आभार।

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।