गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

आँच-102 काव्य की भाषा – 5


आँच-102
काव्य की भाषा – 5
हरीश प्रकाश गुप्त
काव्य की भाषा विषयक शृंखला के अंक-3 में महाकवि भारवि द्वारा उत्तम भाषा की जो विशेषताएँ बतलाई गई हैं उनमें से अपवर्जितविप्लव पर चर्चा की गई थी। अंक-4 में दूसरी विशेषता शुचौ अर्थात शुचिता पर चर्चा की गई। इस क्रम में, इस अंक में तीसरी विशेषता हृदयग्राहिणी पर चर्चा की जाएगी।
हृदयग्राहिणी
प्रत्येक रचनाकार रचना के माध्यम से अपने भाव सम्प्रेषित करने के लिए उसकी भाषा में सांकेतिक प्रतीकों, बिम्ब-विधान, प्रचलित रीति एवं रूढ़ियों तथा शिल्प के विविध स्वरूपों का प्रयोग करता है। ये समस्त संकेत, विधान और अभिप्राय प्रतीकात्मक संकेत मात्र होते हैं और जब ये प्रसंगानुकूल और भावानुकूल होते हैं तो रचनाकार के मन्तव्य से पाठक के हृदय तक तादाम्य स्थापित करते हैं। जब पाठक रचना में निहित अर्थ और अनुभूति से अपने स्वयं के संस्कारों का तादाम्य पाता है तो वह उसका हो जाता है और रचना हृदयस्पर्शी, अन्यथा वह उससे मुँह फेर लेता है।   
महाकवि भारवि कहते हैं की काव्य की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो पाठक अथवा श्रोता के हृदय को स्पर्श कर सके, तभी काव्य का मर्म पाठक के अन्तस को झंकृत कर सकेगा। रचनाकार का उद्देश्य भी तो उसके हृदय को स्पर्श करने का ही है, अन्यथा काव्य प्रयोजन ही समाप्त हो जाएगा। प्रत्येक रचना में भाव तथा विषय का अन्योन्य अवगुण्ठन होना चाहिए। भाषा को हृदय तक पहुँच बनाने के लिए उसे भाव तथा विषय, दोनों के स्तर पर अनुरूप शब्द विधान तथा उपयुक्त शैली से सुसज्जित होना चाहिए। काव्य में प्रधानता व्यंजना की होती है। यदि भावों की अभिव्यक्ति सीधी सपाट बयानी द्वारा अथवा उथलेपन से की गई होगी तो भाषा में कोई आकर्षण नहीं होगा और रचना रसहीन होगी तथा वह पाठक को प्रभावित किए बिना ही अपने संस्कारों को प्राप्त होगी। यदि भावों की अभिव्यंजना अत्यधिक निगूढ़ होती है और रसिक तथा विद्वज्जनों को उसे समझने में कठिनाई आती है, तो भी रचना का उत्कर्ष नहीं होगा। भावों का अर्थ पाठक के समक्ष सीधे-सीधे प्रकट न होकर व्यंजना के माध्यम से अर्थबोध कराने वाला होना चाहिए। भाषा हृदयग्राही एवं आकर्षक हो इसके लिए यह भी आवश्यक है कि उसमें प्रयोगों की नवीनता हो, ताकि वह पाठक को चमत्कृत कर सके। पारम्परिक प्रयोग भाषा को प्रायः बेजान बना देते हैं। अतः साहित्य में शब्दों का प्रयोग कौशल द्वारा किया जाना चाहिए, जिससे काव्य में प्रयुक्त शब्द नए से प्रतीत हों। इससे पाठक को रचना की भाषा में ताजगी की अनुभूति होगी। ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धन ने इस विषय में कहा है कि एक प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार की लेखनी से निर्गत वही पुराने शब्द नए से प्रतीत होते हैं जैसे पतझड़ के बाद नई कोंपले आ जाने से पुराने पेड़ नए से लगने लगते हैं। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि काव्य की भाषा अर्धावृत्त अंगों-उपांगो वाली सद्यस्नाता की तरह होनी चाहिए जिसका आकर्षण उसके अनावृत्त होने पर क्षीण हो जाता है।
भाषा में भावानुरूप शब्दों का विशेष महत्व है। कोमल और मधुर भावों की अभिव्यक्ति के लिए कोमल और मधुर शब्दावलि प्रयोग की जानी चाहिए। मधुर वर्णन में कठोर अथवा कर्णकटु शब्दों से बचना चाहिए। इसी प्रकार कठोर भावों की अभिव्यक्ति के लिए कठोर व रूखे शब्द अधिक उपयुक्त प्रतीत होते हैं। टवर्ग को कठोर अक्षरों वाला माना जाता है। संयुक्ताक्षर भी इसी श्रेणी के अक्षर हैं। इसी प्रकार प्रत्येक वर्ग के द्वितीय तथा चतुर्थ अक्षर भी कठोर माने जाएँगे क्योंकि वे भी संयुक्ताक्षर ही हैं। सब में महाप्राण ध्वनि 'ह' चुपके से उपस्थित है। अतः कोमल-कान्त भावों की अभिव्यक्ति के लिए कठोर वर्णों से युक्त शब्दों की अधिकता हृदयस्पर्शी नहीं हो सकती। 'म' और 'न' कोमल वर्गीय होते हैं, ये जब किसी अक्षर से संयुक्त होते हैं, तो उसे भी अपने में ढालने की सामर्थ्य रखते हैं, और तो और, इनके अनुस्वार स्वरूप तो और भी मनभावन बन जाते हैं। उदाहरण के लिए 'क' के तुरन्त बाद फिर 'क' का प्रयोग अग्राह्य ही होता है। जैसे - 'काक कहो अपनी तुम भी कथा' में 'काक' के बाद 'कहो' में 'क' का उच्चारण असहज हो रहा है। लेकिन, जैसा कि पहले कहा है, 'म' और 'र' की अनन्तर आवृत्ति कर्णकटु या जिहृवा के लिए दुरूह नहीं होतीं - 'नाम महीपति का इतना'। यहाँ 'म' की पुनरावृत्ति और मधुर बन गई है। ये उदाहरण तो संकेत मात्र हैं तथापि उद्धरणों की शृंखला का कोई अंत नहीं है। कहने का तात्पर्य इतना कि रचना की भाषा को शब्द, अर्थ और अभिव्यंजना, सभी के स्तर पर विषयानुकूल और सुगम होना चाहिए तभी वह हृदयस्पर्शी बन सकेगी। इसलिए भाषा को अग्राह्य होने से बचाना चाहिए और अश्रव्य प्रयोग नहीं करने चाहिए।
क्रमशः

24 टिप्‍पणियां:

  1. @ मुझे आपका यह भाषाविज्ञान सम्मत विश्लेषण बहुत पसंद आया.... कैसे काव्य की भाषा में रुक्षता आ जाती है? ... इसे आपने बहुत अच्छे से समझाया है... आपका यह लेख भी हृदयग्राह्य बन पड़ा है... गद्य की भाषा सहजग्राह्य तभी होती है जब वह छोटे-छोटे वाक्यों वाली होती है... आपने इसका भी ध्यान रखा है... इस कारण और अच्छा लगा.

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  2. aatmsaat karna chahiye hame aise lekhon ko. aapne udaahran kam diye...lekin aur dete jaise N aur H ka udaahran nahi diya...kyuki gyan jitna mile kam hai.

    aabhar.

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  3. ्ज्ञानवर्धक जानकारी मिल रही है………आभार्।

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  4. बहुत सुन्दर ज्ञानवर्धक लेख |
    आप को नव वर्ष की शुभकामनाएँ|

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  5. जितना पढ़ती जाती हूँ लगता है कुछ भी तो नहीं जानती थी :).

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  6. @ प्रतुल वशिष्ठ जी,

    सम्मति के लिए धन्यवाद। साहित्य के प्रति आपकी रुचि, समझ और गहन पैठ के प्रति विश्वास है। जब आप-से सुधी जन विषय पर टिप्पणी करते हैं तो उसका अर्थ होता है।

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  7. हरीश जी! जिस सहजता एवं सरलता से आपने कविता की भाषा के विषय में बताया है, वह किसी भी नवोदित कवि के लिए सीखने योग्य है. ये इतनी छोटी-छोटी बातें हैं कि जिन्हें अपनी कविता का आधार बनाना कोइ दुरूह कार्य नहीं, तनिक अभ्यास से इनको साधा जा सकता है!! बहुत ही उपयोगी श्रृंखला.. आभार!

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  8. बहुत बढ़िया जानकारी दे रहे हैं ,हरीश जी.

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  9. सलिल भाई का बीजारोपण बहुत सुन्दर ढंग से पल्लवित हो रहा है। हरीश जी शृंखला को अच्छी और उपयोगी राह पर ले जा रहे हैं। आप दोनों को हार्दिक साधुवाद।

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  10. shikha varshney ने आपकी पोस्ट " आँच-102 काव्य की भाषा – 5 " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    जितना पढ़ती जाती हूँ लगता है कुछ भी तो नहीं जानती थी :).

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  11. harish ji aapke aalekhon ko padh kar kuchh naya seekhne kee koshish me hoon... meri kavitaon me dikhti hain ya nahi maalum nahi hai... lekin seekh jarur raha hoon... aanch kee lau prakahar ho rahi hai...

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  12. सारगर्भित जानकारी
    सारगर्भित जानकारी

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  13. बहुत ही उपयोगी और काम की जानकारी।

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  14. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।
    मेरा शौक
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है,नई रोशनी में सारा जग जगमगा गया |
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.
    * नया साल मुबारक हो आप सभी को *

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  15. बहुत सुंदर उपयोगी जानकारी ,.....
    नए साल की बहुत२ शुभकामनाये बधाई,...

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  16. बेहतरीन........आपको नववर्ष की शुभकामनायें

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